अम्बिका खण्ड · अध्याय 58
कौशिकी की उत्पत्ति
श्लोक 1 (skanda.8.58.1)
व्यास उवाच। । वरान् गृहीत्वा रुद्राणी तस्मिञ्छिखरिसत्तमे
vyāsa uvāca| | varān gṛhītvā rudrāṇī tasmiñchikharisattame
व्यास ने कहा — वर प्राप्त करके रुद्राणी ने उस श्रेष्ठ शिखर पर...
श्लोक 2 (skanda.8.58.2)
अकरोत् किमिति ब्रूहि सर्वं देव्या विचेष्टितम्
akarot kimiti brūhi sarvaṁ devyā viceṣṭitam
—उन्होंने क्या किया? मुझे देवी की समस्त लीला बताइये।
श्लोक 3 (skanda.8.58.3)
सनत्कुमार उवाच। । स्वयम्भुवि गते देवी तपसो विरराम ह । सा तुष्टा वरलाभेन चिन्तयन्ती तदा वरम्
sanatkumāra uvāca| | svayambhuvi gate devī tapaso virarāma ha | sā tuṣṭā varalābhena cintayantī tadā varam
सनत्कुमार ने कहा — स्वयंभू के चले जाने पर देवी ने तप बन्द कर दिया। वर प्राप्ति से संतुष्ट होकर वे तब उस वर का चिन्तन करने लगीं...
श्लोक 4 (skanda.8.58.4)
न्यवैक्षत दिशः सर्वाः प्रसन्नवदनेक्षणा । कस्यैतत् कथयामीति देवं हित्वेति चाब्रवीत्
nyavaikṣata diśaḥ sarvāḥ prasannavadanekṣaṇā | kasyaitat kathayāmīti devaṁ hitveti cābravīt
—प्रसन्न मुख तथा नेत्रों से सभी दिशाओं में देखने लगीं, यह सोचते हुए — देव के अतिरिक्त यह मैं किससे कहूँ?
श्लोक 5 (skanda.8.58.5)
शास्त्रज्ञं कञ्चिदुद्दिश्य यथार्थं शास्त्रचिन्तकः
śāstrajñaṁ kañciduddiśya yathārthaṁ śāstracintakaḥ
—जैसे शास्त्र का चिन्तक किसी शास्त्रज्ञ की ओर लक्ष्य करके यथार्थ बात कहना चाहे...
श्लोक 6 (skanda.8.58.6)
पुत्रलभ्भकृतं हर्षं चिन्तयन्त्या मुहुर्मुहुः
putralabhbhakṛtaṁ harṣaṁ cintayantyā muhurmuhuḥ
—पुत्र-प्राप्ति से उत्पन्न हर्ष का बार-बार चिन्तन करते हुए।
श्लोक 7 (skanda.8.58.7)
अपतज्जलमत्यर्थं शीतलं सु सुगन्धि च । बह्वभूत् सरसि स्वच्छं तस्यास्तत्तेजसा जलम्
apatajjalamatyarthaṁ śītalaṁ su sugandhi ca | bahvabhūt sarasi svacchaṁ tasyāstattejasā jalam
अत्यंत शीतल तथा सुगन्धित जल गिरा; उनके तेज से एक सरोवर में स्वच्छ जल प्रचुर मात्रा में बन गया।
श्लोक 8 (skanda.8.58.8)
शिष्ये बुद्धिगुणेनेव गुरुणा ज्ञानमाहितम् । विगाहमाना सा देवी तत्सरो विमलोदकम्
śiṣye buddhiguṇeneva guruṇā jñānamāhitam | vigāhamānā sā devī tatsaro vimalodakam
—जैसे गुरु द्वारा शिष्य में बुद्धि के गुण से ज्ञान स्थापित किया जाता है। वह देवी उस निर्मल जल वाले सरोवर में स्नान करती हुई...
श्लोक 9 (skanda.8.58.9)
रेजे वियन्मध्यगता दीप्तेव सवितुः प्रभा । विगाहमाना व्यजहत् कृष्णां कोशीं तदानघा
reje viyanmadhyagatā dīpteva savituḥ prabhā | vigāhamānā vyajahat kṛṣṇāṁ kośīṁ tadānaghā
—आकाश के मध्य में स्थित सूर्य की प्रभा के समान चमकने लगीं; स्नान करती हुई उन निष्पापा ने अपनी काली कोशी त्याग दी।
श्लोक 10 (skanda.8.58.10)
सा विरेजे तया मुक्ता कलेवेन्दोर्घनात्यये । तस्याः कोश्याः समभवत् कौशिकी लोकविश्रुता । विश्वं सिसृक्षतो धातुर्देहादिव पुरा निशा
sā vireje tayā muktā kalevendorghanātyaye | tasyāḥ kośyāḥ samabhavat kauśikī lokaviśrutā | viśvaṁ sisṛkṣato dhāturdehādiva purā niśā
उससे मुक्त होकर वे मेघों के हट जाने पर चन्द्रकला के समान शोभित हुईं। उनकी उसी कोशी से लोकविख्यात कौशिकी उत्पन्न हुईं, जैसे पूर्वकाल में सृष्टि की इच्छा करने वाले धाता के शरीर से रात्रि उत्पन्न हुई थी।
श्लोक 11 (skanda.8.58.11)
विम्बाधरा तीक्ष्णसुचारुदंष्ट्रा प्रसन्नताराधिपचारुवक्त्रा । सुजातनीलांचितदीर्घकेशी किञ्चित्समभ्युन्नतरोमराजी
vimbādharā tīkṣṇasucārudaṁṣṭrā prasannatārādhipacāruvaktrā | sujātanīlāṁcitadīrghakeśī kiñcitsamabhyunnataromarājī
उसके होंठ बिम्बफल के समान, दाँत तीक्ष्ण तथा सुन्दर, मुख प्रसन्न चन्द्रमा के समान सुन्दर था; उसके केश सुन्दर, काले तथा लम्बे थे, और उसकी रोमराजि कुछ उठी हुई थी।
श्लोक 12 (skanda.8.58.12)
सुसंस्थिताभ्यां चरणाम्बुजाभ्यां प्रदक्षिणावर्तनिमग्ननाभिः । विगूढजान्वस्थिशिरा सुगुल्फा विनाकृतेवाम्बुरुहेण लक्ष्मीः
susaṁsthitābhyāṁ caraṇāmbujābhyāṁ pradakṣiṇāvartanimagnanābhiḥ | vigūḍhajānvasthiśirā sugulphā vinākṛtevāmburuheṇa lakṣmīḥ
—उसके चरण सुन्दर कमल के समान थे, नाभि दक्षिणावर्त तथा गहरी थी, घुटनों की हड्डियाँ छिपी हुई थीं, टखने सुन्दर थे — मानो लक्ष्मी हों, केवल कमल के बिना।
श्लोक 13 (skanda.8.58.13)
प्रसन्नरूपा प्रथमोद्गतस्तनी प्रफुल्लनीलाम्बुजचारुलोचना
prasannarūpā prathamodgatastanī praphullanīlāmbujacārulocanā
—प्रसन्न रूप वाली, अभी उभरे हुए स्तनों वाली, प्रफुल्लित नीले कमल के समान सुन्दर नेत्रों वाली।
श्लोक 14 (skanda.8.58.14)
सुसंस्कृतैर्वज्रमणिप्रवेकिभिर्विभूषिता चाभरणै स्सुमध्यमा
susaṁskṛtairvajramaṇipravekibhirvibhūṣitā cābharaṇai ssumadhyamā
—हीरों तथा उत्तम मणियों से जड़े हुए सुसंस्कृत आभूषणों से अलंकृत, पतली कमर वाली।
श्लोक 15 (skanda.8.58.15)
साङ्गदा बद्धकेयूरा कटकोद्भासितत्विषा
sāṅgadā baddhakeyūrā kaṭakodbhāsitatviṣā
—अंगद तथा केयूर धारण किये हुए, कंकणों की कान्ति से दीप्त।
श्लोक 16 (skanda.8.58.16)
बिभर्त्ति सा भुजानष्टौ सायुधानपराजिता
bibhartti sā bhujānaṣṭau sāyudhānaparājitā
वह अपराजिता आठ भुजाओं में शस्त्र धारण किये हुए थीं।
श्लोक 17 (skanda.8.58.17)
बद्धगोधाङ्गुलित्राणा कवचं बिभ्रती शुभम्
baddhagodhāṅgulitrāṇā kavacaṁ bibhratī śubham
—गोधा-अंगुलित्राण बाँधे हुए, शुभ कवच धारण किये हुए।
श्लोक 18 (skanda.8.58.18)
दुर्भेद्यं सहजं भास्वत् सेन्द्रैरपि सुरासुरैः
durbhedyaṁ sahajaṁ bhāsvat sendrairapi surāsuraiḥ
—वह कवच इन्द्र सहित देवों तथा असुरों द्वारा भी अभेद्य, सहज तथा तेजस्वी था।
श्लोक 19 (skanda.8.58.19)
निबद्धतूणीरयुगा प्रगृहीतशरासना । वसाना पद्मकिञ्जल्करुचिरे वाससी तदा
nibaddhatūṇīrayugā pragṛhītaśarāsanā | vasānā padmakiñjalkarucire vāsasī tadā
—दो तरकश बाँधे हुए, धनुष हाथ में लिये हुए, तब कमल के केसर के समान सुन्दर दो वस्त्र धारण किये हुए थीं।
श्लोक 20 (skanda.8.58.20)
जानुभ्यामवनिं गत्वा शिरस्याधाय चाञ्जलिम् । व्यज्ञापयत सा देवी ब्रूहि किङ्करवाणि ते
jānubhyāmavaniṁ gatvā śirasyādhāya cāñjalim | vyajñāpayata sā devī brūhi kiṅkaravāṇi te
घुटनों के बल पृथ्वी पर बैठकर तथा सिर पर हाथ जोड़कर, उस देवी ने निवेदन किया — कहिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?
श्लोक 21 (skanda.8.58.21)
मूर्ध्न्युपाघ्राय तां देवीं परिष्वज्य च पीडितम्
mūrdhnyupāghrāya tāṁ devīṁ pariṣvajya ca pīḍitam
उस देवी को सिर पर सूँघकर तथा दृढ़तापूर्वक आलिंगन करके...
श्लोक 22 (skanda.8.58.22)
भवानी प्राह संहृष्टा मूर्त्तिस्थानं ममाव्यये
bhavānī prāha saṁhṛṣṭā mūrttisthānaṁ mamāvyaye
भवानी ने अत्यंत प्रसन्न होकर कहा — तुम मेरे अविनाशी स्वरूप का ही स्थान हो।
श्लोक 23 (skanda.8.58.23)
जरामरणहीना त्वं शोकदुःखविवर्जिता । भविष्यसि महायोगा संयुगेष्वपराजिता
jarāmaraṇahīnā tvaṁ śokaduḥkhavivarjitā | bhaviṣyasi mahāyogā saṁyugeṣvaparājitā
तुम जरा-मृत्यु से रहित, शोक-दुःख से वर्जित होगी; तुम महायोगमयी तथा युद्धों में अपराजित होगी।
श्लोक 24 (skanda.8.58.24)
कौशिकीति च नाम्ना त्वं लोके ख्यातिं गमिष्यसि । अन्यैश्चनामभिः श्लाघ्यैर्गुणकर्माभिसंश्रयैः
kauśikīti ca nāmnā tvaṁ loke khyātiṁ gamiṣyasi | anyaiścanāmabhiḥ ślāghyairguṇakarmābhisaṁśrayaiḥ
तुम लोक में कौशिकी नाम से प्रसिद्ध होगी; और अपने गुणों तथा कर्मों पर आधारित अन्य प्रशंसनीय नामों से भी।
श्लोक 25 (skanda.8.58.25)
तव भक्ताः स्मरिष्यन्ति येति दुर्गेषु संस्थिताः । दुर्गाणि ते तरिष्यन्ति त्वत्प्रसादाद्वरानने
tava bhaktāḥ smariṣyanti yeti durgeṣu saṁsthitāḥ | durgāṇi te tariṣyanti tvatprasādādvarānane
हे वरानने! जो तुम्हारे भक्त संकटों में पड़कर तुम्हारा स्मरण करेंगे, वे तुम्हारी कृपा से उन संकटों को पार कर लेंगे।
श्लोक 26 (skanda.8.58.26)
वरा वरेण्या वरदा दुर्गा सर्वार्थसाधनी । इत्थं त्वां नामभिर्दिव्यैः स्तोष्यन्ति मुनयः सदा
varā vareṇyā varadā durgā sarvārthasādhanī | itthaṁ tvāṁ nāmabhirdivyaiḥ stoṣyanti munayaḥ sadā
वरा, वरेण्या, वरदा, दुर्गा, सर्वार्थसाधनी — इन दिव्य नामों से मुनि सदा तुम्हारी स्तुति करेंगे।
श्लोक 27 (skanda.8.58.27)
जापैः प्रणतिभिर्होमैरुपहारैः पृथग्विधैः । प्राणिनः पूजयिष्यन्ति भवतीं भुवि सर्वदा
jāpaiḥ praṇatibhirhomairupahāraiḥ pṛthagvidhaiḥ | prāṇinaḥ pūjayiṣyanti bhavatīṁ bhuvi sarvadā
जप, प्रणाम, हवन तथा नाना प्रकार के उपहारों से प्राणी पृथ्वी पर सदा तुम्हारी पूजा करेंगे।
श्लोक 28 (skanda.8.58.28)
सिंहयुक्तं ततो देवी रथमादित्यवर्चसम् । ससर्ज सपताकं च किंकिणीजालमण्डितम् । विन्ध्यं गिरिवरं चास्या निवासाय समादिशत्
siṁhayuktaṁ tato devī rathamādityavarcasam | sasarja sapatākaṁ ca kiṁkiṇījālamaṇḍitam | vindhyaṁ girivaraṁ cāsyā nivāsāya samādiśat
तब देवी ने उसके लिये सिंह से जुते हुए, सूर्य के समान तेजस्वी, ध्वजायुक्त, घंटियों के जाल से अलंकृत रथ की रचना की; और उसके निवास के लिये श्रेष्ठ विन्ध्य पर्वत का निर्देश किया।
श्लोक 29 (skanda.8.58.29)
सनत्कुमार उवाच। । सैव मुक्ता तदा देवी प्रणम्य भुवनेश्वरीम् । आरुरोह रथं दिव्यं कार्तस्वरमयं शुभम्
sanatkumāra uvāca| | saiva muktā tadā devī praṇamya bhuvaneśvarīm | āruroha rathaṁ divyaṁ kārtasvaramayaṁ śubham
सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार विदा पाकर उस देवी ने भुवनेश्वरी को प्रणाम करके उस दिव्य, शुभ, स्वर्णमय रथ पर आरोहण किया।
श्लोक 30 (skanda.8.58.30)
व्योमगेन रथेनाथ नानारत्नांशुमालिना । जगामाशु ततो विन्ध्यं नानाद्रुमलतान्वितम्
vyomagena rathenātha nānāratnāṁśumālinā | jagāmāśu tato vindhyaṁ nānādrumalatānvitam
फिर उस आकाशगामी, नाना रत्नों की किरणों की माला वाले रथ पर वे शीघ्र ही अनेक वृक्षों तथा लताओं से युक्त विन्ध्य पर्वत को गयीं।
श्लोक 31 (skanda.8.58.31)
विहङ्गविरुतैर्विन्ध्यः स्वागतेनेव कौशिकीम् । अपूजयदमेयां तां तत्र प्राप्तां तदानघाम्
vihaṅgavirutairvindhyaḥ svāgateneva kauśikīm | apūjayadameyāṁ tāṁ tatra prāptāṁ tadānaghām
पक्षियों के कलरव से मानो स्वागत करते हुए विन्ध्य ने वहाँ पधारी हुई उस अपरिमित, निष्पापा कौशिकी का सम्मान किया।
श्लोक 32 (skanda.8.58.32)
वारिभिर्विमलैः शोक्तंनिर्झरोदरनिःसृतैः
vāribhirvimalaiḥ śoktaṁnirjharodaraniḥsṛtaiḥ
—अपने झरनों के भीतर से निकले हुए निर्मल जल से...
श्लोक 33 (skanda.8.58.33)
स पुष्पनिकरैः पुण्यैरर्घञ्चास्यै ददन्निव
sa puṣpanikaraiḥ puṇyairarghañcāsyai dadanniva
—तथा पवित्र पुष्पों के समूहों से मानो उसे अर्घ्य देते हुए...
श्लोक 34 (skanda.8.58.34)
अथ मृगपतिनागं त्रस्तपर्यन्तनागं चकितहरिणयूथक्षुण्णदर्भाङ्कुराग्रम् । वरमहिषविषाणच्छिन्नगुल्मावतानं गिरिवरमति रम्यं कौशिकी साभ्यपश्यत्
atha mṛgapatināgaṁ trastaparyantanāgaṁ cakitahariṇayūthakṣuṇṇadarbhāṅkurāgram | varamahiṣaviṣāṇacchinnagulmāvatānaṁ girivaramati ramyaṁ kauśikī sābhyapaśyat
तब कौशिकी ने उस अत्यंत रमणीय श्रेष्ठ पर्वत को देखा — जहाँ सिंह किनारों पर हाथियों को भयभीत करते हैं, जहाँ भयभीत मृगयूथों द्वारा कुश के अंकुरों के अग्रभाग कुचले हुए हैं, जहाँ श्रेष्ठ भैंसों के सींगों से झाड़ियाँ कटी-फटी हैं।
श्लोक 35 (skanda.8.58.35)
व्यरोचयत सा देवी वासाय शिखरं गिरेः
vyarocayata sā devī vāsāya śikharaṁ gireḥ
उस देवी ने निवास के लिये पर्वत का एक शिखर चुना।
श्लोक 36 (skanda.8.58.36)
उत्फुल्लं पादपालीनविहङ्गगणनादितम्
utphullaṁ pādapālīnavihaṅgagaṇanāditam
—जो पुष्पों से खिला हुआ था तथा वृक्षों में बसे पक्षी-समूहों की ध्वनि से गूँज रहा था।
श्लोक 37 (skanda.8.58.37)
निर्झरोदकसंपर्कहरितोपलशाद्वलम् । नानाद्रुमलतापुष्पसुरभीकृतमारुतम्
nirjharodakasaṁparkaharitopalaśādvalam | nānādrumalatāpuṣpasurabhīkṛtamārutam
—झरनों के जल के स्पर्श से हरी शिलाओं वाला, अनेक वृक्षों, लताओं तथा पुष्पों से सुगन्धित पवन वाला।
श्लोक 38 (skanda.8.58.38)
तुहिननिकरशीतैर्निर्झराम्बुप्रवाहैर्निचितपृथुनितम्बोत्तुङ्गपर्यन्तसानुम् । गिरिवरशिखरं तत्साध्युवासाथ देवी कुसुमिततरुशाखाश्लिष्टमत्तद्विरेफम्
tuhinanikaraśītairnirjharāmbupravāhairnicitapṛthunitambottuṅgaparyantasānum | girivaraśikharaṁ tatsādhyuvāsātha devī kusumitataruśākhāśliṣṭamattadvirepham
—जिसके विस्तृत ढलान तथा ऊँचे शिखर झरनों की धाराओं से, जो हिम के समान शीतल थीं, आच्छादित थे। उसी श्रेष्ठ पर्वत-शिखर पर, जिसकी खिली हुई शाखाओं पर मतवाले भँवरे मँडरा रहे थे, वह देवी निवास करने लगीं।
श्लोक 39 (skanda.8.58.39)
य इदं पठते नित्यं शृणुयाद्वा समाहितः । कौशिक्याः संभवं सम्यक् स याति परमां गतिम्
ya idaṁ paṭhate nityaṁ śṛṇuyādvā samāhitaḥ | kauśikyāḥ saṁbhavaṁ samyak sa yāti paramāṁ gatim
जो कोई इसे सदा पढ़ता है अथवा एकाग्रचित्त होकर सुनता है — कौशिकी की इस सम्यक् उत्पत्ति-कथा को — वह परम गति को प्राप्त होता है।