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अम्बिका खण्ड · अध्याय 59

पार्वती का शिव के समीप गमन

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60

श्लोक 1 (skanda.8.59.1)

सनत्कुमार उवाच। । ततस्तां कौशिकीं तत्र प्रस्थाप्य हिमवत्सुता । विरेमे तपसस्तीव्रात् सस्नौ च विधिवत्तदा

sanatkumāra uvāca| | tatastāṁ kauśikīṁ tatra prasthāpya himavatsutā | vireme tapasastīvrāt sasnau ca vidhivattadā

सनत्कुमार ने कहा — तब कौशिकी को वहाँ भेजकर हिमवत्पुत्री ने अपने तीव्र तप को रोका और विधिपूर्वक स्नान किया।

श्लोक 2 (skanda.8.59.2)

वसाना वाससी शुक्ले दिव्य स्रगनुलेपना । पार्श्वस्थं पर्वतं वीक्ष्य प्रोवाच वरदास्मि ते

vasānā vāsasī śukle divya sraganulepanā | pārśvasthaṁ parvataṁ vīkṣya provāca varadāsmi te

श्वेत वस्त्र धारण किये, दिव्य माला तथा अनुलेपन से युक्त होकर, पास खड़े पर्वत को देखकर उन्होंने कहा — मैं तुम्हें वर देने वाली हूँ।

श्लोक 3 (skanda.8.59.3)

एवमुक्तवतीं देवीं शिखरी मूर्त्तिमान् तदा । प्रणिपत्य वरं वव्रे मयि सान्निध्यमस्तु ते

evamuktavatīṁ devīṁ śikharī mūrttimān tadā | praṇipatya varaṁ vavre mayi sānnidhyamastu te

इस प्रकार कहने वाली देवी से, मूर्तिमान् पर्वत ने तब प्रणाम करके वर माँगा — आपकी सन्निधि मुझमें बनी रहे।

श्लोक 4 (skanda.8.59.4)

नाम चैव मम ख्यातिं तव नामा भिलक्षितम् । यातु लोकेषु सर्वेषु त्वत्प्रसादान्महेश्वरि

nāma caiva mama khyātiṁ tava nāmā bhilakṣitam | yātu lokeṣu sarveṣu tvatprasādānmaheśvari

और हे महेश्वरी! आपकी कृपा से मेरा नाम भी आपके नाम से चिह्नित होकर समस्त लोकों में विख्यात हो।

श्लोक 5 (skanda.8.59.5)

अग्निश्च वरदां वव्रे मागाः कोपं मयीश्वरि । सदा पुष्पफलत्वं च वृक्षास्तां तत्र वव्रिरे

agniśca varadāṁ vavre māgāḥ kopaṁ mayīśvari | sadā puṣpaphalatvaṁ ca vṛkṣāstāṁ tatra vavrire

और अग्नि ने उन वरदायिनी से माँगा — हे ईश्वरि! मुझ पर क्रोध मत कीजिये। और वहाँ के वृक्षों ने सदा पुष्प-फल की प्राप्ति माँगी।

श्लोक 6 (skanda.8.59.6)

सुप्रसन्ना भवास्माकं त्वयि भक्तिश्च नोस्त्विति । ततस्तां वव्रिरे देवीं सर्वाश्च परिचारिकाः

suprasannā bhavāsmākaṁ tvayi bhaktiśca nostviti | tatastāṁ vavrire devīṁ sarvāśca paricārikāḥ

हमारे प्रति सुप्रसन्न रहिये, और आपके प्रति हमारी भक्ति बनी रहे — इस प्रकार सभी परिचारिकाओं ने भी उस देवी से माँगा।

श्लोक 7 (skanda.8.59.7)

उपास्यमाना बह्वीभिर्देवताभिर्गिरीन्द्रजा । अभिभूयान्यतेजांसि भानवीव बभौ प्रभा

upāsyamānā bahvībhirdevatābhirgirīndrajā | abhibhūyānyatejāṁsi bhānavīva babhau prabhā

अनेक देवताओं द्वारा उपासित होते हुए, गिरीन्द्र-पुत्री, अन्य समस्त तेजों को अभिभूत करते हुए, सूर्य की प्रभा के समान शोभित हुईं।

श्लोक 8 (skanda.8.59.8)

हृदयेपि स्थिता पत्युः पत्यौ हृदयसंस्थिते । सा वै गिरीन्द्रतनया वियुक्ता स्मीत्यमन्यत

hṛdayepi sthitā patyuḥ patyau hṛdayasaṁsthite | sā vai girīndratanayā viyuktā smītyamanyata

यद्यपि वे अपने पति के हृदय में स्थित थीं और पति उनके हृदय में स्थित थे, फिर भी वह गिरीन्द्र-पुत्री यह मानती रहीं — मैं उनसे बिछुड़ी हुई हूँ।

श्लोक 9 (skanda.8.59.9)

अथ सा तेजसां धाम पतिं सर्वजगत्पतिम् । वरदा वरदं द्रष्टुं गमनायोपचक्रमे

atha sā tejasāṁ dhāma patiṁ sarvajagatpatim | varadā varadaṁ draṣṭuṁ gamanāyopacakrame

तब वह वरदायिनी, समस्त तेजों के आधार, सम्पूर्ण जगत् के स्वामी, अपने वरदायक पति को देखने के लिये प्रस्थान करने लगीं।

श्लोक 10 (skanda.8.59.10)

नमस्कृता तद्वनदेवताभिः प्रदक्षिणीकृत्य समिद्धमग्निम् । ऋषीँस्ततो वन्द्यतमाभिवन्द्य जनञ्च तेषां प्रतिपूज्य पूज्यम्

namaskṛtā tadvanadevatābhiḥ pradakṣiṇīkṛtya samiddhamagnim | ṛṣī~stato vandyatamābhivandya janañca teṣāṁ pratipūjya pūjyam

उस वन की देवताओं द्वारा नमस्कृत होकर, प्रज्वलित अग्नि की प्रदक्षिणा करके, फिर, स्वयं परम वन्दनीय होते हुए भी, ऋषियों को प्रणाम करके तथा उनके पूज्य जनों की भी पूजा करके...

श्लोक 11 (skanda.8.59.11)

उत्पपात ततो व्योम सा सार्द्धं सोमनन्दिना । सिंहेन च जगद्धात्री गणैः परिजनेन च

utpapāta tato vyoma sā sārddhaṁ somanandinā | siṁhena ca jagaddhātrī gaṇaiḥ parijanena ca

—वह जगद्धात्री तब सोमनन्दी, सिंह, गणों तथा परिजनों सहित आकाश में उड़ गयीं।

श्लोक 12 (skanda.8.59.12)

वियति जलदवृन्दान् विक्षिपन्ती स्वधाम्ना हिमजलकणशीतैर्वीज्यमाना मरुद्भिः । गिरिवरतनया सा पत्युरेव स्मरन्ती मदनदहनमूर्तेराशु पार्श्वं जगाम

viyati jaladavṛndān vikṣipantī svadhāmnā himajalakaṇaśītairvījyamānā marudbhiḥ | girivaratanayā sā patyureva smarantī madanadahanamūrterāśu pārśvaṁ jagāma

आकाश में मेघों के समूहों को अपने ही तेज से बिखेरती हुई, हिम-जल के कणों से शीतल पवनों द्वारा पंखे की भाँति झोंकी जाती हुई, वह गिरिवर-पुत्री केवल अपने पति का ही स्मरण करती हुई, कामदहन-मूर्ति के पास शीघ्र पहुँच गयीं।

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