अम्बिका खण्ड · अध्याय 60
दैत्यों का उद्योग
श्लोक 1 (skanda.8.60.1)
सूत उवाच। । अथासौ ब्रह्मणः पुत्रं व्यासः प्राह कृताञ्जलिः । किमर्थं कौशिकी विन्ध्यं देव्या संप्रेषिता तदा
sūta uvāca| | athāsau brahmaṇaḥ putraṁ vyāsaḥ prāha kṛtāñjaliḥ | kimarthaṁ kauśikī vindhyaṁ devyā saṁpreṣitā tadā
सूत ने कहा — तब व्यास ने हाथ जोड़कर ब्रह्मा के उस पुत्र से पूछा — देवी द्वारा कौशिकी को विन्ध्य पर तब किसलिये भेजा गया था?
श्लोक 2 (skanda.8.60.2)
एवमुक्तस्तदा धीमान् व्यासेन ब्रह्मणः सुतः । यथावृत्तं पुरा सर्वमाख्यातुमुपचक्रमे
evamuktastadā dhīmān vyāsena brahmaṇaḥ sutaḥ | yathāvṛttaṁ purā sarvamākhyātumupacakrame
व्यास द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर उन बुद्धिमान् ब्रह्मपुत्र ने जैसा पूर्व में घटित हुआ था, वह सब बताना आरम्भ किया।
श्लोक 3 (skanda.8.60.3)
आरिराधयिषुर्देवीं विन्ध्यस्तेपे पुरा तपः । ततस्तुष्टाब्रवीन्विन्ध्यं पार्वती वरदास्मि ते
ārirādhayiṣurdevīṁ vindhyastepe purā tapaḥ | tatastuṣṭābravīnvindhyaṁ pārvatī varadāsmi te
देवी को प्रसन्न करने की इच्छा से विन्ध्य ने पूर्वकाल में तप किया; तब संतुष्ट होकर पार्वती ने विन्ध्य से कहा — मैं तुम्हें वर देने वाली हूँ।
श्लोक 4 (skanda.8.60.4)
मयि वासोस्तु ते नित्यमेवमादित्यरोधनः । वव्रे गिरीन्द्रतनयां प्राह सा च तथास्त्विति
mayi vāsostu te nityamevamādityarodhanaḥ | vavre girīndratanayāṁ prāha sā ca tathāstviti
मेरे साथ आपका निवास सदा बना रहे — इस प्रकार उस आदित्यरोधक ने गिरीन्द्र-पुत्री से माँगा; और उन्होंने कहा — ऐसा ही हो।
श्लोक 5 (skanda.8.60.5)
स्वतनुं सा द्विधाभूतामग्नेर्दीप्तां शिखामिव । दाहाय दानवेन्द्राणां प्राहिणोत् कौशिकीमतः
svatanuṁ sā dvidhābhūtāmagnerdīptāṁ śikhāmiva | dāhāya dānavendrāṇāṁ prāhiṇot kauśikīmataḥ
उन्होंने अपने शरीर से द्विधा होकर, अग्नि की प्रज्वलित शिखा के समान कौशिकी को दानवेन्द्रों के दहन के लिये भेजा।
श्लोक 6 (skanda.8.60.6)
अथ तं ब्रह्मणः सूनुमुवाच मुनिसत्तमः । गिरिर्विन्ध्यो महाप्रज्ञ कथमादित्यरोधनः
atha taṁ brahmaṇaḥ sūnumuvāca munisattamaḥ | girirvindhyo mahāprajña kathamādityarodhanaḥ
तब उस मुनिश्रेष्ठ ने ब्रह्मपुत्र से कहा — हे महाप्राज्ञ! विन्ध्य पर्वत आदित्यरोधक कैसे बना?
श्लोक 7 (skanda.8.60.7)
सनत्कुमारः प्रोवाच पृष्टो व्यासेन धीमता । शृणु यस्मादभूद्विन्ध्यो गिरिरादित्यरोधनः
sanatkumāraḥ provāca pṛṣṭo vyāsena dhīmatā | śṛṇu yasmādabhūdvindhyo girirādityarodhanaḥ
बुद्धिमान् व्यास द्वारा पूछे जाने पर सनत्कुमार ने कहा — सुनो, विन्ध्य पर्वत किस कारण से आदित्यरोधक बना।
श्लोक 8 (skanda.8.60.8)
पुरा विन्ध्योब्रवीत् सूर्यं कस्मात्त्वं न करोषि माम्
purā vindhyobravīt sūryaṁ kasmāttvaṁ na karoṣi mām
पूर्वकाल में विन्ध्य ने सूर्य से कहा — तुम मुझे मेरु के समान क्यों नहीं करते...
श्लोक 9 (skanda.8.60.9)
प्रदक्षिणं यथा मेरुं का तेवज्ञा मयि प्रभो
pradakṣiṇaṁ yathā meruṁ kā tevajñā mayi prabho
—जैसे तुम मेरु की प्रदक्षिणा करते हो? हे प्रभो! मेरे प्रति यह उपेक्षा क्यों?
श्लोक 10 (skanda.8.60.10)
स उवाच तदा विन्ध्यं नैवं कर्तुं हि शक्यते । प्रत्याख्यातः स सूर्येण विन्ध्यो गिरिरवर्धत । रुद्धा तस्य स्थितो मार्गं तस्मादादित्यरोधनः
sa uvāca tadā vindhyaṁ naivaṁ kartuṁ hi śakyate | pratyākhyātaḥ sa sūryeṇa vindhyo giriravardhata | ruddhā tasya sthito mārgaṁ tasmādādityarodhanaḥ
उन्होंने विन्ध्य से कहा — ऐसा करना सम्भव नहीं है। सूर्य द्वारा अस्वीकृत होने पर विन्ध्य पर्वत बढ़ने लगा; और उनके मार्ग को रोककर खड़ा हो गया, इसीलिये वह आदित्यरोधक बना।
श्लोक 11 (skanda.8.60.11)
नष्टालोके ततो लोके देवाः संविग्नचेतसः । अगस्त्यमुपसंगम्य वाक्यमूचुः समाहिताः
naṣṭāloke tato loke devāḥ saṁvignacetasaḥ | agastyamupasaṁgamya vākyamūcuḥ samāhitāḥ
इस प्रकार लोक में प्रकाश नष्ट होने पर, व्याकुलचित्त देवगण अगस्त्य के पास जाकर, स्थिर होकर यह वचन बोले —
श्लोक 12 (skanda.8.60.12)
सवितुर्मार्गमावृत्य गिरिर्विन्ध्यो व्यवस्थितः । तं वारय महाप्राज्ञ गतिर्नः सर्वदा भवान्
saviturmārgamāvṛtya girirvindhyo vyavasthitaḥ | taṁ vāraya mahāprājña gatirnaḥ sarvadā bhavān
विन्ध्य पर्वत सूर्य के मार्ग को रोककर खड़ा है; हे महाप्राज्ञ! उसे रोकिये — आप सदा हमारी गति हैं।
श्लोक 13 (skanda.8.60.13)
ततोगस्त्यो गिरिं गत्वा प्रोवाचेत्थं महातपाः । यास्यामि दक्षिणामाशां पन्थानं देहि पर्वत
tatogastyo giriṁ gatvā provācetthaṁ mahātapāḥ | yāsyāmi dakṣiṇāmāśāṁ panthānaṁ dehi parvata
तब महातपस्वी अगस्त्य ने पर्वत के पास जाकर इस प्रकार कहा — मैं दक्षिण दिशा को जाऊँगा; हे पर्वत! मुझे मार्ग दो।
श्लोक 14 (skanda.8.60.14)
यावत्प्रतिनिवर्त्तेयं तावच्च स्थातुमर्हसि । ततः प्रभृति चैवेह नाभूदागमनं मुनेः
yāvatpratinivartteyaṁ tāvacca sthātumarhasi | tataḥ prabhṛti caiveha nābhūdāgamanaṁ muneḥ
जब तक मैं वापस न लौटूँ, तब तक तुम्हें ऐसे ही रहना चाहिये। और तब से लेकर आज तक उस मुनि का यहाँ पुनरागमन नहीं हुआ।
श्लोक 15 (skanda.8.60.15)
अथ पप्रच्छ तं व्यासः पितामहसुतं प्रभुम्
atha papraccha taṁ vyāsaḥ pitāmahasutaṁ prabhum
तब व्यास ने उस समर्थ पितामह-पुत्र से पूछा —
श्लोक 16 (skanda.8.60.16)
कौशिकी प्रहिता विन्ध्यं दानावानां विनाशने
kauśikī prahitā vindhyaṁ dānāvānāṁ vināśane
कौशिकी को दानवों के विनाश के लिये विन्ध्य पर भेजा गया...
श्लोक 17 (skanda.8.60.17)
के ते कस्य किमर्थं वा कौशिक्या दानवा हताः । एतत् सर्वं समासेन मुने मे वक्तुमर्हसि
ke te kasya kimarthaṁ vā kauśikyā dānavā hatāḥ | etat sarvaṁ samāsena mune me vaktumarhasi
—वे दानव कौन थे, किसके थे तथा किस कारण कौशिकी द्वारा मारे गये? हे मुने! यह सब मुझे संक्षेप में बताइये।
श्लोक 18 (skanda.8.60.18)
पितामहसुतो धीमान् व्यासेनैवं प्रचोदितः । प्रश्नमेतं समासेन व्याख्यातुमुपचक्रमे
pitāmahasuto dhīmān vyāsenaivaṁ pracoditaḥ | praśnametaṁ samāsena vyākhyātumupacakrame
व्यास द्वारा इस प्रकार प्रेरित किये जाने पर, उन बुद्धिमान् पितामह-पुत्र ने इस प्रश्न का संक्षेप में उत्तर देना आरम्भ किया।
श्लोक 19 (skanda.8.60.19)
देवासुरे पुरातीते संयुगे परमाद्भुते । सुन्दो निसुन्दश्च सुतौ निशुम्भस्य बभूवतुः
devāsure purātīte saṁyuge paramādbhute | sundo nisundaśca sutau niśumbhasya babhūvatuḥ
पूर्वकाल के एक अत्यंत अद्भुत देवासुर-संग्राम में सुन्द तथा निसुन्द निशुम्भ के दो पुत्र थे।
श्लोक 20 (skanda.8.60.20)
हतान् निशम्य तौ बन्धून्सुरैः सर्वान्महाहवे । देवान्प्रति सुसंक्रुद्धौ गर्जन्तौ गोवृषाविव
hatān niśamya tau bandhūnsuraiḥ sarvānmahāhave | devānprati susaṁkruddhau garjantau govṛṣāviva
अपने सभी बन्धुओं को उस महासंग्राम में देवताओं द्वारा मारा गया सुनकर, वे दोनों देवताओं के प्रति अत्यंत क्रुद्ध होकर बैलों के समान गरजने लगे।
श्लोक 21 (skanda.8.60.21)
सिंहाविव महासत्त्वौ हृतदंष्ट्रानखायुधौ
siṁhāviva mahāsattvau hṛtadaṁṣṭrānakhāyudhau
—महाबली सिंहों के समान, जिनके दाढ़ तथा नख के अस्त्र छीन लिये गये हों...
श्लोक 22 (skanda.8.60.22)
श्वसन्तौ सविषावुग्रौ भग्नदंष्ट्राविवोरगौ
śvasantau saviṣāvugrau bhagnadaṁṣṭrāvivoragau
—फुफकारते हुए, विषैले, भयंकर, मानो दाढ़ों से रहित सर्प हों।
श्लोक 23 (skanda.8.60.23)
अशक्तौ तौ सुरैर्योद्धुं हतपक्षौ महासुरौ । सुपर्णाविव संक्रुद्धौ छिन्नपक्षौ महाबलौ
aśaktau tau surairyoddhuṁ hatapakṣau mahāsurau | suparṇāviva saṁkruddhau chinnapakṣau mahābalau
देवताओं से युद्ध करने में असमर्थ, अपने सहायकों से रहित वे दोनों महासुर, मानो पंख कटे हुए क्रुद्ध गरुड़ हों, महाबली...
श्लोक 24 (skanda.8.60.24)
णः सुतौ चैतौ गोकर्णं प्रति जग्मतुः । आरिराधयिषू देवं ब्रह्माणममितौजसौ
ṇaḥ sutau caitau gokarṇaṁ prati jagmatuḥ | ārirādhayiṣū devaṁ brahmāṇamamitaujasau
स्रोत में यहाँ पाठ खण्डित है ...ये दोनों पुत्र गोकर्ण की ओर गये, अमित तेजस्वी ब्रह्मा देव को प्रसन्न करने की इच्छा से।
श्लोक 25 (skanda.8.60.25)
अथोवाच ततो व्यासो गोकर्णं कथयस्व मे । कस्मिन्देशे किमर्थं वा केन वोत्पादितं पुरा
athovāca tato vyāso gokarṇaṁ kathayasva me | kasmindeśe kimarthaṁ vā kena votpāditaṁ purā
तब व्यास ने कहा — मुझे गोकर्ण के विषय में बताइये — यह किस देश में, किस कारण से तथा किसके द्वारा पूर्वकाल में उत्पन्न हुआ?
श्लोक 26 (skanda.8.60.26)
प्रोवाच ब्राह्मणः सूनुर्व्यासेनैवं प्रचोदितः । शृणु वत्स समासेन पुण्यं गोकर्णसंभवम्
provāca brāhmaṇaḥ sūnurvyāsenaivaṁ pracoditaḥ | śṛṇu vatsa samāsena puṇyaṁ gokarṇasaṁbhavam
व्यास द्वारा इस प्रकार प्रेरित किये जाने पर उस ब्राह्मणपुत्र ने कहा — हे वत्स! गोकर्ण की पुण्य उत्पत्ति को संक्षेप में सुनो।
श्लोक 27 (skanda.8.60.27)
हते त्रिशिरसि त्वष्टा पुत्रे ज्यायसि वज्रिणा । बृत्रं नाम ततः पुत्रमसृजत्तपसां निधिः
hate triśirasi tvaṣṭā putre jyāyasi vajriṇā | bṛtraṁ nāma tataḥ putramasṛjattapasāṁ nidhiḥ
जब त्वष्टा के ज्येष्ठ पुत्र त्रिशिरा को वज्रधारी इन्द्र ने मार डाला, तब तपों के निधि त्वष्टा ने वृत्र नामक पुत्र को उत्पन्न किया।
श्लोक 28 (skanda.8.60.28)
प्रलम्बबाहुं वृत्तास्यं पीनविस्तीर्णवक्षसन् । सुश्लिष्टजानु सहनुं जलदध्वाननिस्वनम्
pralambabāhuṁ vṛttāsyaṁ pīnavistīrṇavakṣasan | suśliṣṭajānu sahanuṁ jaladadhvānanisvanam
—लम्बी भुजाओं, गोल मुख, चौड़ी तथा विस्तृत छाती, सुगठित घुटनों तथा जबड़ों वाला, मेघ-गर्जन के समान स्वर वाला।
श्लोक 29 (skanda.8.60.29)
स्वक्षं सुपार्श्वं सुकटिं दीर्घरक्तान्तलोचनम् । समरे सर्वदेवानां जेतारमपराजितम्
svakṣaṁ supārśvaṁ sukaṭiṁ dīrgharaktāntalocanam | samare sarvadevānāṁ jetāramaparājitam
—सुन्दर नेत्रों, सुन्दर पार्श्वों, सुन्दर कटि वाला, दीर्घ तथा रक्तवर्ण कोनों वाले नेत्रों से युक्त; युद्ध में सभी देवताओं का विजेता, अपराजित।
श्लोक 30 (skanda.8.60.30)
स निर्जित्यामरान् सर्वान् जग्रासेन्द्रं महाद्युतिः । ततो महर्षिभिः सृष्टा जृम्भिका तं समाविशत्
sa nirjityāmarān sarvān jagrāsendraṁ mahādyutiḥ | tato maharṣibhiḥ sṛṣṭā jṛmbhikā taṁ samāviśat
उस महातेजस्वी ने समस्त देवताओं को जीतकर इन्द्र को निगल लिया। तब महर्षियों द्वारा उत्पन्न जृम्भिका ने उसमें प्रवेश किया।
श्लोक 31 (skanda.8.60.31)
तस्याथ जृम्भमाणस्य निर्जगाम शतक्रतुः । वदनादाशु संक्षिप्य स्वां तनुं योगमायया
tasyātha jṛmbhamāṇasya nirjagāma śatakratuḥ | vadanādāśu saṁkṣipya svāṁ tanuṁ yogamāyayā
उसके जँभाई लेने पर शतक्रतु ने योगमाया से अपने शरीर को संकुचित करके तत्काल उसके मुख से बाहर निकल गये।
श्लोक 32 (skanda.8.60.32)
तस्य योगबलं दृष्ट्वा वीर्यं शौर्यं च संयुगे । ततो भीताः सुराः सर्वे ब्रह्माणं शरणं ययुः
tasya yogabalaṁ dṛṣṭvā vīryaṁ śauryaṁ ca saṁyuge | tato bhītāḥ surāḥ sarve brahmāṇaṁ śaraṇaṁ yayuḥ
उसके योगबल, वीर्य तथा युद्ध में शौर्य को देखकर, तब भयभीत होकर सभी देवता ब्रह्मा की शरण में गये।
श्लोक 33 (skanda.8.60.33)
तान्दृष्ट्वा स तदा भीतानमरान् सुरविद्विषः । प्रोवाचाशु प्रजेशानः पद्मयोनिः पितामहः
tāndṛṣṭvā sa tadā bhītānamarān suravidviṣaḥ | provācāśu prajeśānaḥ padmayoniḥ pitāmahaḥ
उन देवताओं को देवद्वेषी से भयभीत देखकर, प्रजापति पद्मयोनि पितामह ने शीघ्र यह कहा —
श्लोक 34 (skanda.8.60.34)
पराजितान् वो जानामि वृत्रेण रणमूर्धनि । उपायं तं न पश्यामि येनासौ जीयते युधि । । ः । यास्याम सहिताः सर्वे देवं द्रष्टुमुमापतिम् । विश्वेश्वरं विधातारं वरदं भक्तवत्सलम्
parājitān vo jānāmi vṛtreṇa raṇamūrdhani | upāyaṁ taṁ na paśyāmi yenāsau jīyate yudhi | | ḥ | yāsyāma sahitāḥ sarve devaṁ draṣṭumumāpatim | viśveśvaraṁ vidhātāraṁ varadaṁ bhaktavatsalam
मैं जानता हूँ कि युद्ध के अग्रभाग में वृत्र से तुम पराजित हुए हो; मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखता जिससे उसे युद्ध में जीता जा सके। हम सब मिलकर उमापति देव के दर्शन करने चलें, जो विश्वेश्वर, विधाता, वरदाता तथा भक्तवत्सल हैं।
श्लोक 35 (skanda.8.60.35)
स नः प्रणामैर्भक्त्या च स्तुत्या चाराधितः प्रभुः । महादेवो महायोगी शम्भुः शान्तिं विधास्यति
sa naḥ praṇāmairbhaktyā ca stutyā cārādhitaḥ prabhuḥ | mahādevo mahāyogī śambhuḥ śāntiṁ vidhāsyati
हमारे प्रणाम, भक्ति तथा स्तुति से आराधित हुए वे प्रभु महादेव, महायोगी शम्भु, हमें शान्ति प्रदान करेंगे।
श्लोक 36 (skanda.8.60.36)
अथोत्तस्थुः सुराः सर्वे देवदेवं दिदृक्षवः । अपश्यन्तो विचेरुश्च महीं सोदधिपर्वताम्
athottasthuḥ surāḥ sarve devadevaṁ didṛkṣavaḥ | apaśyanto viceruśca mahīṁ sodadhiparvatām
तब सभी देवता देवाधिदेव के दर्शन की इच्छा से उठे; और उन्हें न देख पाकर वे सागरों तथा पर्वतों सहित पृथ्वी पर विचरण करने लगे।
श्लोक 37 (skanda.8.60.37)
अथ विष्णुर्महायोगी देवीं हिमवतः सुताम् । अपश्यत् पांशुदिग्धाङ्गीमासीनां बालरूपिणीम्
atha viṣṇurmahāyogī devīṁ himavataḥ sutām | apaśyat pāṁśudigdhāṅgīmāsīnāṁ bālarūpiṇīm
तब महायोगी विष्णु ने हिमवत्पुत्री देवी को, जिनके अंग धूल से लिपटे थे, बालिका-रूप में बैठी हुई देखा।
श्लोक 38 (skanda.8.60.38)
लेखामिव नवामिन्दोः प्रातः सूर्यप्रभामिव । हविषा हूयमानस्य तन्वीमग्नेः शिखामिव
lekhāmiva navāmindoḥ prātaḥ sūryaprabhāmiva | haviṣā hūyamānasya tanvīmagneḥ śikhāmiva
—मानो चन्द्रमा की नयी कला हों, प्रातःकालीन सूर्य की प्रभा के समान, आहुति से प्रज्वलित अग्नि की पतली शिखा के समान।
श्लोक 39 (skanda.8.60.39)
विज्ञाय स तदा योगान्महायोगां सुरेश्वरीम् । ईश्वरो जगतो विष्णुर्जिष्णुस्तुष्टाव पार्वतीम्
vijñāya sa tadā yogānmahāyogāṁ sureśvarīm | īśvaro jagato viṣṇurjiṣṇustuṣṭāva pārvatīm
अपने योग से उन्हें महायोगिनी, देवेश्वरी जानकर, जगत् के ईश्वर तथा विजयी विष्णु ने पार्वती की स्तुति की।
श्लोक 40 (skanda.8.60.40)
विष्णुरुवाच त्वं स्रष्ट्री सर्वभूतानां संहर्त्री त्वं सुरेश्वरि । त्वमस्य जगतो धात्री नित्या प्रकृतिरव्यया
viṣṇuruvāca tvaṁ sraṣṭrī sarvabhūtānāṁ saṁhartrī tvaṁ sureśvari | tvamasya jagato dhātrī nityā prakṛtiravyayā
विष्णु ने कहा — हे सुरेश्वरि! तुम सभी प्राणियों की सृष्टिकर्त्री हो, तथा संहारकर्त्री भी। तुम इस जगत् की धात्री, नित्य तथा अव्यय प्रकृति हो।
श्लोक 41 (skanda.8.60.41)
त्वं प्रभा शर्वरी ज्योत्स्ना कीर्तिस्तुष्टिरुमा धृतिः । बुद्धिमेधा स्मृतिः प्रज्ञा सन्ध्या कान्तिः स्तुतिर्मतिः
tvaṁ prabhā śarvarī jyotsnā kīrtistuṣṭirumā dhṛtiḥ | buddhimedhā smṛtiḥ prajñā sandhyā kāntiḥ stutirmatiḥ
तुम प्रभा, रात्रि, चाँदनी, कीर्ति, संतुष्टि, उमा, धृति हो; बुद्धि, मेधा, स्मृति, प्रज्ञा, संध्या, कान्ति, स्तुति तथा मति हो।
श्लोक 42 (skanda.8.60.42)
त्वमीशा देवि देवानां गणमाता गणाम्बिका । भद्रकाली महागौरी कौशिकी विन्ध्यवासिनी
tvamīśā devi devānāṁ gaṇamātā gaṇāmbikā | bhadrakālī mahāgaurī kauśikī vindhyavāsinī
हे देवी! तुम देवताओं की स्वामिनी, गणमाता, गणाम्बिका हो; भद्रकाली, महागौरी, कौशिकी, विन्ध्यवासिनी हो।
श्लोक 43 (skanda.8.60.43)
दुर्गा ख्यातिर्महाविद्या गायत्री त्वं सरस्वती
durgā khyātirmahāvidyā gāyatrī tvaṁ sarasvatī
तुम दुर्गा, ख्याति, महाविद्या, गायत्री तथा सरस्वती हो।
श्लोक 44 (skanda.8.60.44)
स्वाहा स्वधा महामाया लक्ष्मीर्योगेश्वरेश्वरी
svāhā svadhā mahāmāyā lakṣmīryogeśvareśvarī
तुम स्वाहा, स्वधा, महामाया, लक्ष्मी तथा योगेश्वरों की भी ईश्वरी हो।
श्लोक 45 (skanda.8.60.45)
उल्का सती गिरेः पुत्री मैत्रेयी ब्रह्मचारिणी । तापसी रेवती षष्ठी वरावरसहस्रदा
ulkā satī gireḥ putrī maitreyī brahmacāriṇī | tāpasī revatī ṣaṣṭhī varāvarasahasradā
तुम उल्का, सती, पर्वत-पुत्री, मैत्रेयी, ब्रह्मचारिणी हो; तापसी, रेवती, षष्ठी तथा हजारों वरों को देने वाली हो।
श्लोक 46 (skanda.8.60.46)
कुन्दकार्मुकसारङ्गकोकिलाशोकपल्लवैः । तुल्यासि दन्तभ्रू नेत्रस्वरपाणिभिरीश्वरि
kundakārmukasāraṅgakokilāśokapallavaiḥ | tulyāsi dantabhrū netrasvarapāṇibhirīśvari
हे ईश्वरि! तुम्हारे दाँत, भौंहें, नेत्र, स्वर तथा हाथ क्रमशः कुन्द-पुष्प, धनुष, मृग, कोकिल तथा अशोक की कोंपल के समान हैं।
श्लोक 47 (skanda.8.60.47)
प्रमत्तोत्फुल्लपूर्णन्तान् नागोत्पलनिशाकरान् । विशिनक्षि सदा देवि गतिलोचनकान्तिभिः
pramattotphullapūrṇantān nāgotpalaniśākarān | viśinakṣi sadā devi gatilocanakāntibhiḥ
हे देवी! तुम अपनी गति, नेत्रों तथा कान्ति से मत्त हाथी, पूर्ण खिले कमल तथा पूर्ण चन्द्रमा को सदा पीछे छोड़ देती हो।
श्लोक 48 (skanda.8.60.48)
शिरोभिर्महिषोद्भ्रान्तरक्तपर्यन्तलोचनैः । नृभिः क्षितितलन्यस्तकरजानुमिरिज्यसे
śirobhirmahiṣodbhrāntaraktaparyantalocanaiḥ | nṛbhiḥ kṣititalanyastakarajānumirijyase
तुम्हारी पूजा भैंसों के, लाल तथा घूमती हुई कोरों वाले नेत्रों वाले सिरों से, तथा पृथ्वी पर हाथ-घुटने रखने वाले मनुष्यों द्वारा की जाती है।
श्लोक 49 (skanda.8.60.49)
मत्तान्यपुष्टाकलवल्गुभाषिता द्विरेफमालासितचारुमूर्धजा । प्रफुल्लपुष्पस्तबकोद्गतस्तनी विराजसे कल्पलतेव पुष्पिता
mattānyapuṣṭākalavalgubhāṣitā dvirephamālāsitacārumūrdhajā | praphullapuṣpastabakodgatastanī virājase kalpalateva puṣpitā
—तुम्हारी मधुर वाणी मतवाली कोयल की कोमल ध्वनि के समान है, तुम्हारे सुन्दर केश भ्रमरमालाओं से सुशोभित हैं, तुम्हारे स्तन प्रफुल्लित पुष्प-गुच्छों के समान उभरे हैं — तुम खिली हुई कल्पलता के समान शोभित होती हो।
श्लोक 50 (skanda.8.60.50)
देवि देवीभिरनिशं भक्त्याभिवन्द्यसे दिवि । इज्यसे मुनिभिः शश्वद् गिरिजे गिरिमूर्धसु
devi devībhiraniśaṁ bhaktyābhivandyase divi | ijyase munibhiḥ śaśvad girije girimūrdhasu
हे देवी! स्वर्ग में देवियाँ सतत भक्तिपूर्वक तुम्हारी वन्दना करती हैं; हे गिरिजे! पर्वत-शिखरों पर मुनिगण सदा तुम्हारा पूजन करते हैं।
श्लोक 51 (skanda.8.60.51)
अर्च्यसे द्धिगन्धर्वैर्गन्धपुष्पोत्करैः सदा । सदागतिपथं प्राप्ता प्राप्त्या च स्तूयसेनघे
arcyase ddhigandharvairgandhapuṣpotkaraiḥ sadā | sadāgatipathaṁ prāptā prāptyā ca stūyasenaghe
सिद्ध तथा गन्धर्व सुगन्ध और पुष्पों के समूहों से सदा तुम्हारी पूजा करते हैं; हे निष्पापे! सनातन पथ को प्राप्त होकर उसी प्राप्ति के द्वारा तुम्हारी स्तुति की जाती है।
श्लोक 52 (skanda.8.60.52)
भासि सिंहं समारूढा चलत्पिङ्गलकेसरम् । दीप्ता प्रभेव सावित्री मेरुमूर्धानमास्थिता
bhāsi siṁhaṁ samārūḍhā calatpiṅgalakesaram | dīptā prabheva sāvitrī merumūrdhānamāsthitā
तुम हिलती हुई पिंगल केसर वाले सिंह पर आरूढ़ होकर, मेरु-शिखर पर स्थित सूर्य की दीप्त प्रभा के समान शोभित होती हो।
श्लोक 53 (skanda.8.60.53)
जिघांसती रणे दैत्याञ्छरौघैर्भास्यजिह्मगैः । रवेर्मूर्तिस्तमांसीव विकिरन्तो गभस्तिभिः
jighāṁsatī raṇe daityāñcharaughairbhāsyajihmagaiḥ | ravermūrtistamāṁsīva vikiranto gabhastibhiḥ
—युद्ध में सीधे उड़ने वाले बाणों के प्रवाह से दैत्यों का वध करने की इच्छा करती हुई, जैसे सूर्य की मूर्ति अपनी किरणों से अंधकार को बिखेर देती है।
श्लोक 54 (skanda.8.60.54)
परशुं शितमुदगृह्य देवदानवसंयुगे
paraśuṁ śitamudagṛhya devadānavasaṁyuge
—देव-दानव संग्राम में अपने तीक्ष्ण परशु को उठाकर...
श्लोक 55 (skanda.8.60.55)
भ्राजसे देवि संक्रुद्धा पाटयन्तीव रोदसी
bhrājase devi saṁkruddhā pāṭayantīva rodasī
—हे देवी! तुम क्रुद्ध होकर, मानो आकाश और पृथ्वी को विदीर्ण करती हुई शोभित होती हो।
श्लोक 56 (skanda.8.60.56)
अथ सा शैशवं हित्वा तनुमन्यां समाददे
atha sā śaiśavaṁ hitvā tanumanyāṁ samādade
तब उन्होंने बाल्यरूप त्यागकर एक अन्य शरीर धारण किया।
श्लोक 57 (skanda.8.60.57)
एकीकृतामिवाकाशे संहतिं सर्वतेजसाम्
ekīkṛtāmivākāśe saṁhatiṁ sarvatejasām
—मानो आकाश में समस्त तेजों का एकत्रित समूह हो।
श्लोक 58 (skanda.8.60.58)
दीप्तामपि सुखालोकां शान्तामपि सविभ्रमाम्
dīptāmapi sukhālokāṁ śāntāmapi savibhramām
—दीप्त होते हुए भी देखने में सुखद, शान्त होते हुए भी सुन्दर चंचलता से युक्त।
श्लोक 59 (skanda.8.60.59)
बालामपि जगद्धात्रीं तन्वीमपि सुसंहताम्
bālāmapi jagaddhātrīṁ tanvīmapi susaṁhatām
—बाला होते हुए भी जगत् की धात्री, कोमलांगी होते हुए भी सुदृढ़।
श्लोक 60 (skanda.8.60.60)
उवाचेदं च सा प्रीता वरदास्मि तव प्रभो । एवमुक्तस्तया सोथ प्रोवाचाम्भोदनिस्वनः
uvācedaṁ ca sā prītā varadāsmi tava prabho | evamuktastayā sotha provācāmbhodanisvanaḥ
और वे प्रसन्न होकर यह बोलीं — हे प्रभो! मैं तुम्हें वर देने वाली हूँ। उनके इस प्रकार कहे जाने पर, मेघ के समान गम्भीर स्वर वाले उन्होंने कहा —
श्लोक 61 (skanda.8.60.61)
शरण्ये देवि भक्तानां शरणागतवत्सले । भवानि भव मे नित्यं सुप्रसन्ना महेश्वरि
śaraṇye devi bhaktānāṁ śaraṇāgatavatsale | bhavāni bhava me nityaṁ suprasannā maheśvari
हे भक्तों के शरणदाता देवी! हे शरणागतवत्सले! हे भवानी! हे महेश्वरी! मुझ पर सदा सुप्रसन्न रहिये।
श्लोक 62 (skanda.8.60.62)
कथयस्व च देवेशं शाश्वतं स्थाणुमव्ययम् । विश्वात्मानं महादेवं सर्वयोगेश्वरेश्वरम्
kathayasva ca deveśaṁ śāśvataṁ sthāṇumavyayam | viśvātmānaṁ mahādevaṁ sarvayogeśvareśvaram
और मुझे शाश्वत, अविनाशी, स्थाणुरूप, विश्वात्मा, महादेव, सभी योगेश्वरों के भी ईश्वर देवेश के विषय में बताइये।
श्लोक 63 (skanda.8.60.63)
तथास्त्विति प्रतिज्ञाय कथयामास शंकरम् । मृगयूथस्य मध्यस्थं क्रीडन्तं मृगरूपिणम्
tathāstviti pratijñāya kathayāmāsa śaṁkaram | mṛgayūthasya madhyasthaṁ krīḍantaṁ mṛgarūpiṇam
ऐसा ही हो कहकर वचन देते हुए, उन्होंने शंकर के विषय में बताया, जो मृगों के झुण्ड के मध्य मृग-रूप धारण करके क्रीड़ा कर रहे थे।
श्लोक 64 (skanda.8.60.64)
एकशृङ्गं महाग्रीवमेकाक्षममितौजसम् । एकपादं सुसंश्लिष्टमापाण्डुकपिलोदरम्
ekaśṛṅgaṁ mahāgrīvamekākṣamamitaujasam | ekapādaṁ susaṁśliṣṭamāpāṇḍukapilodaram
—एक सींग वाला, विशाल ग्रीवा वाला, एक नेत्र वाला, अमित तेजस्वी; एक पैर वाला, सुगठित, पीतवर्ण उदर वाला।
श्लोक 65 (skanda.8.60.65)
अथ विष्णुर्द्रुतं गत्वा शृङ्गे जग्राह तं प्रभुम् । तस्मिन्नेव ततो ब्रह्मा जग्राहेन्द्रश्च वीर्यवान्
atha viṣṇurdrutaṁ gatvā śṛṅge jagrāha taṁ prabhum | tasminneva tato brahmā jagrāhendraśca vīryavān
तब विष्णु ने शीघ्रता से जाकर उन प्रभु को सींग से पकड़ लिया; फिर वहीं ब्रह्मा ने तथा बलवान् इन्द्र ने भी उन्हें पकड़ लिया।
श्लोक 66 (skanda.8.60.66)
त्रिधा तदभवच्छृङ्गं चलितं दीप्ततेजसम्
tridhā tadabhavacchṛṅgaṁ calitaṁ dīptatejasam
वह प्रज्वलित तेज वाला सींग हिलकर तीन भागों में विभक्त हो गया।
श्लोक 67 (skanda.8.60.67)
त्रयाणां सुरमुख्यानां पृथक् पाणिषु संस्थितम्
trayāṇāṁ suramukhyānāṁ pṛthak pāṇiṣu saṁsthitam
—और उन तीनों प्रमुख देवताओं के हाथों में अलग-अलग रह गया।
श्लोक 68 (skanda.8.60.68)
अथादृश्यस्तदा शर्वस्तानुवाच सुरोत्तमान् । यदर्थमागता यूयं तद् ब्रूत सुरसत्तमाः
athādṛśyastadā śarvastānuvāca surottamān | yadarthamāgatā yūyaṁ tad brūta surasattamāḥ
तब अदृश्य होकर शर्व ने उन श्रेष्ठ देवताओं से कहा — हे देवश्रेष्ठो! जिस उद्देश्य से आये हो, वह बताओ।
श्लोक 69 (skanda.8.60.69)
अथोवाच तदा ब्रह्मा परमेशं वृषध्वजम् । राज्यं पुनरवाप्नोतु हत्वा वृत्रं पुरन्दरः
athovāca tadā brahmā parameśaṁ vṛṣadhvajam | rājyaṁ punaravāpnotu hatvā vṛtraṁ purandaraḥ
तब ब्रह्मा ने वृषभध्वज परमेश्वर से कहा — वृत्र का वध करके पुरन्दर पुनः अपना राज्य प्राप्त करें।
श्लोक 70 (skanda.8.60.70)
ततस्तानमरान् तत्र वृषकेतुः समागतान् । स्वरेण वारिदध्वानगम्भीरेणाब्रवीत्ततः
tatastānamarān tatra vṛṣaketuḥ samāgatān | svareṇa vāridadhvānagambhīreṇābravīttataḥ
तब वहाँ एकत्रित उन देवताओं से वृषकेतु ने मेघ-गर्जन के समान गम्भीर स्वर में कहा —
श्लोक 71 (skanda.8.60.71)
वैष्णवं परमं तेजः फेनमाचक्ष्यते सुराः
vaiṣṇavaṁ paramaṁ tejaḥ phenamācakṣyate surāḥ
हे देवो! यह फेन विष्णु का परम तेज कहा जाता है...
श्लोक 72 (skanda.8.60.72)
शिरश्छेत्स्यति वृत्रस्य तदादाय शतक्रतुः
śiraśchetsyati vṛtrasya tadādāya śatakratuḥ
—उसे लेकर शतक्रतु वृत्र का सिर काट देंगे।
श्लोक 73 (skanda.8.60.73)
हृषीकेशोथ तत्खण्डमनयत् स्वं निकेतनम् । न्यवेशयत तत्रैव वारिजोदरसंभवः
hṛṣīkeśotha tatkhaṇḍamanayat svaṁ niketanam | nyaveśayata tatraiva vārijodarasaṁbhavaḥ
तब हृषीकेश ने उस सींग के खण्ड को अपने निवास में ले जाकर स्थापित किया; और कमल-गर्भ से उत्पन्न ब्रह्मा ने उसे वहीं स्थापित किया।
श्लोक 74 (skanda.8.60.74)
नीयमानं तृतीयं च खण्डमाखण्डलेन तु । रक्षसामधिपः श्रीमान् जग्राहाथ दशाननः
nīyamānaṁ tṛtīyaṁ ca khaṇḍamākhaṇḍalena tu | rakṣasāmadhipaḥ śrīmān jagrāhātha daśānanaḥ
और इन्द्र द्वारा ले जाये जा रहे तीसरे खण्ड को श्रीमान् राक्षसाधिपति दशानन ने छीन लिया।
श्लोक 75 (skanda.8.60.75)
चकार सन्ध्यामुदधौ दक्षिणे न्यस्य तत्तदा । न विचालयितुं शक्तः सन्ध्यामास्थाय रावणः
cakāra sandhyāmudadhau dakṣiṇe nyasya tattadā | na vicālayituṁ śaktaḥ sandhyāmāsthāya rāvaṇaḥ
उसे दक्षिण समुद्र में रखकर उन्होंने वहाँ संध्या-वन्दन किया; संध्या में लीन रावण को कोई विचलित नहीं कर सका।
श्लोक 76 (skanda.8.60.76)
तत्पुण्यं देवदेवस्य व्यास क्षेत्रं महाद्युते । गोकर्णमिति नामास्य चकार कमलासनः
tatpuṇyaṁ devadevasya vyāsa kṣetraṁ mahādyute | gokarṇamiti nāmāsya cakāra kamalāsanaḥ
हे व्यास! हे महाद्युते! देवाधिदेव का वह पुण्य क्षेत्र, जिसका नाम कमलासन ब्रह्मा ने गोकर्ण रखा...
श्लोक 77 (skanda.8.60.77)
तत्र गत्वा नरो भक्त्या प्रणिपत्य महेश्वरम् । अश्वमेधमवाप्नोति सर्वपापैः प्रमुच्यते
tatra gatvā naro bhaktyā praṇipatya maheśvaram | aśvamedhamavāpnoti sarvapāpaiḥ pramucyate
वहाँ जाकर जो मनुष्य भक्तिपूर्वक महेश्वर को प्रणाम करता है, वह अश्वमेध यज्ञ के फल को प्राप्त करता है तथा सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 78 (skanda.8.60.78)
गोकर्णमुत्तरं व्यास स्थापितं पद्मयोनिना
gokarṇamuttaraṁ vyāsa sthāpitaṁ padmayoninā
हे व्यास! उत्तरी गोकर्ण पद्मयोनि ब्रह्मा द्वारा स्थापित किया गया...
श्लोक 79 (skanda.8.60.79)
उदन्वतः स्थितं तीरे स्वयमेव तु दक्षिणे
udanvataḥ sthitaṁ tīre svayameva tu dakṣiṇe
—समुद्र के तट पर स्थित है; जबकि दक्षिणी गोकर्ण स्वयं रावण द्वारा ही स्थापित हुआ।
श्लोक 80 (skanda.8.60.80)
यः शृणोति नरो नित्यं पुण्यगोकर्णसंभवम् । सर्वपापविधूतात्मा स यातिपरमां गतिम्
yaḥ śṛṇoti naro nityaṁ puṇyagokarṇasaṁbhavam | sarvapāpavidhūtātmā sa yātiparamāṁ gatim
जो मनुष्य गोकर्ण की इस पुण्य उत्पत्ति-कथा को सदा सुनता है, वह समस्त पापों से शुद्धात्मा होकर परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 81 (skanda.8.60.81)
अथ तौ दानवौ व्यास गोकर्णमभिजग्मतुः । तत्र चेरतुरत्युग्रं तपोम्बुपवनाशनौ
atha tau dānavau vyāsa gokarṇamabhijagmatuḥ | tatra ceraturatyugraṁ tapombupavanāśanau
हे व्यास! तब वे दोनों दानव गोकर्ण गये; वहाँ उन्होंने जल तथा वायु का आहार करते हुए अत्यंत उग्र तप किया।
श्लोक 82 (skanda.8.60.82)
कस्यचित्त्वथ कालस्य विदित्वोग्रं तयोस्तपः । आजगाम तयोः पार्श्वं ब्रह्मा सुरनमस्कृतः
kasyacittvatha kālasya viditvograṁ tayostapaḥ | ājagāma tayoḥ pārśvaṁ brahmā suranamaskṛtaḥ
कुछ समय पश्चात् उनके उग्र तप को जानकर, देवताओं द्वारा नमस्कृत ब्रह्मा उनके समीप आये।
श्लोक 83 (skanda.8.60.83)
अथ तौ विश्वधातारं चतुर्वक्त्रं पितामहम् । अपश्यतां महाबाहू ब्रह्माणं पुरतः स्थितम्
atha tau viśvadhātāraṁ caturvaktraṁ pitāmaham | apaśyatāṁ mahābāhū brahmāṇaṁ purataḥ sthitam
तब उन दोनों महाबाहुओं ने विश्वधाता, चतुर्मुख पितामह ब्रह्मा को अपने सामने खड़ा हुआ देखा।
श्लोक 84 (skanda.8.60.84)
शुक्लाम्बरधरं दीप्तं शुक्लस्रगनुलेपनम्
śuklāmbaradharaṁ dīptaṁ śuklasraganulepanam
—श्वेत वस्त्र धारण किये, तेजस्वी, श्वेत माला तथा अनुलेपन से युक्त।
श्लोक 85 (skanda.8.60.85)
एकीकृतमसंप्रेक्ष्यं तेजो दिनकृतामिवम्
ekīkṛtamasaṁprekṣyaṁ tejo dinakṛtāmivam
—एकत्रित, दुर्निरीक्ष्य तेज, मानो अनेक सूर्यों का हो।
श्लोक 86 (skanda.8.60.86)
प्रीतोस्मि युवयोः पुत्रावथोवाच पितामहः । अनेन तपसोग्रेण वरं ब्रूत मभीप्सितम्
prītosmi yuvayoḥ putrāvathovāca pitāmahaḥ | anena tapasogreṇa varaṁ brūta mabhīpsitam
हे पुत्रो! मैं तुम दोनों से प्रसन्न हूँ, पितामह ने तब कहा। इस उग्र तप से, अपना अभीष्ट वर बताओ।
श्लोक 87 (skanda.8.60.87)
अमरत्वं तु वव्राते तौ प्रणम्य पितामहम् । ब्रह्माथाह विना देवानमृतत्वं न विद्यते
amaratvaṁ tu vavrāte tau praṇamya pitāmaham | brahmāthāha vinā devānamṛtatvaṁ na vidyate
पितामह को प्रणाम करके उन दोनों ने अमरत्व माँगा। ब्रह्मा ने तब कहा — देवताओं के अतिरिक्त अमरत्व सम्भव नहीं है।
श्लोक 88 (skanda.8.60.88)
अवश्यमेष्यो युवयोर्मृत्युरेकेन केनचित् । अथामरत्वं वव्राते परस्परवधं विना
avaśyameṣyo yuvayormṛtyurekena kenacit | athāmaratvaṁ vavrāte parasparavadhaṁ vinā
तुम दोनों को किसी न किसी कारण से मृत्यु अवश्य आयेगी। तब उन्होंने परस्पर वध के अतिरिक्त अमरत्व माँगा।
श्लोक 89 (skanda.8.60.89)
एवमस्त्विति ताभ्यां तं वरं दत्त्वा पितामहः । हंसयुक्तेन यानेन जगाम स्वं निकेतनम्
evamastviti tābhyāṁ taṁ varaṁ dattvā pitāmahaḥ | haṁsayuktena yānena jagāma svaṁ niketanam
ऐसा ही हो कहकर पितामह ने उन्हें वह वर देकर, हंस-युक्त विमान से अपने निवास को प्रस्थान किया।
श्लोक 90 (skanda.8.60.90)
असुरावपि तौ तस्मात्तपसोग्राद्विरेमतुः । आजग्मतुर्निकेतं स्वं वरं लब्ध्वा पितामहात्
asurāvapi tau tasmāttapasogrādvirematuḥ | ājagmaturniketaṁ svaṁ varaṁ labdhvā pitāmahāt
वे दोनों असुर भी उस उग्र तप से निवृत्त हो गये, और पितामह से वर प्राप्त कर अपने निवास को लौट आये।
श्लोक 91 (skanda.8.60.91)
वरदानं ततो ज्ञात्वा दैत्याः पातालवासिनः । आजग्मुर्दानवाश्चैव तयोः पार्श्वं मुदान्विताः
varadānaṁ tato jñātvā daityāḥ pātālavāsinaḥ | ājagmurdānavāścaiva tayoḥ pārśvaṁ mudānvitāḥ
तब उस वरदान को जानकर, पाताल-निवासी दैत्य तथा दानव भी प्रसन्नतापूर्वक उनके समीप आये।
श्लोक 92 (skanda.8.60.92)
केशी मुरो मयः शम्भुः कार्तस्वरमहारवौ । इन्द्रशत्रुः कतिर्धुन्धुस्त्विल्वलो नमुचिर्द्रुमः
keśī muro mayaḥ śambhuḥ kārtasvaramahāravau | indraśatruḥ katirdhundhustvilvalo namucirdrumaḥ
केशी, मुर, मय, शम्भु, कार्तस्वर और महारव, इन्द्रशत्रु, कति, धुन्धु, इल्वल, नमुचि, द्रुम...
श्लोक 93 (skanda.8.60.93)
वातापी दुन्दुभिर्मेघः प्रभुरन्ये च दानवाः । सर्वे कवचिनः शूरा गदापरिघपाणयः
vātāpī dundubhirmeghaḥ prabhuranye ca dānavāḥ | sarve kavacinaḥ śūrā gadāparighapāṇayaḥ
वातापी, दुन्दुभि, मेघ, प्रभु तथा अन्य दानव — सभी कवचधारी, शूरवीर, गदा तथा परिघ हाथों में लिये हुए।
श्लोक 94 (skanda.8.60.94)
ऊचुश्च शोकमग्नानामस्माकं शत्रुतापनौ । युवां प्लवाविवायातौ शोकसागरतारणौ
ūcuśca śokamagnānāmasmākaṁ śatrutāpanau | yuvāṁ plavāvivāyātau śokasāgaratāraṇau
और वे बोले — शत्रुओं को संतप्त करने वाले तुम दोनों, शोक में डूबे हम लोगों के लिये, मानो शोक-सागर को पार कराने वाले दो नौका के समान आये हो।
श्लोक 95 (skanda.8.60.95)
पुरेप्रतिभये रम्ये कान्तां नाम ततः सभाम् । आजग्मुस्तुष्टमनसो दानवेन्द्राः समागताः
purepratibhaye ramye kāntāṁ nāma tataḥ sabhām | ājagmustuṣṭamanaso dānavendrāḥ samāgatāḥ
तब उस निर्भय, रमणीय नगरी में, प्रसन्नचित्त होकर एकत्रित दानवेन्द्र कान्ता नामक सभा में गये।
श्लोक 96 (skanda.8.60.96)
तस्यां प्रशस्ते विस्तीर्णे शातकौम्भे वरासने । आससाद महाबाहुः सुन्दो दानवसत्तमः
tasyāṁ praśaste vistīrṇe śātakaumbhe varāsane | āsasāda mahābāhuḥ sundo dānavasattamaḥ
उस उत्कृष्ट तथा विस्तृत स्वर्ण-आसन पर महाबाहु दानवश्रेष्ठ सुन्द विराजमान हुए।
श्लोक 97 (skanda.8.60.97)
निसुन्दोन्यत्ततो भेजे हेमरत्नमयं शुभम् । आससाद ततो धीमान् कार्तस्वरमयं मयः
nisundonyattato bheje hemaratnamayaṁ śubham | āsasāda tato dhīmān kārtasvaramayaṁ mayaḥ
निसुन्द ने फिर सोने-रत्नों से बना एक अन्य शुभ आसन ग्रहण किया; फिर बुद्धिमान् मय ने स्वर्णमय आसन ग्रहण किया।
श्लोक 98 (skanda.8.60.98)
अन्ये च दानवा भेजुरासनानि तदा मुने । हेमरत्नविचित्राणि भास्वन्ति च महान्ति च
anye ca dānavā bhejurāsanāni tadā mune | hemaratnavicitrāṇi bhāsvanti ca mahānti ca
हे मुने! और अन्य दानवों ने भी तब स्वर्ण-रत्नों से चित्रित, तेजस्वी तथा महान् आसन ग्रहण किये।
श्लोक 99 (skanda.8.60.99)
विरेजे सा सभा तत्र दानवेन्द्रैः समागतैः । सबलाकैस्तडित्वद्भिः प्रलये द्यौरिवाम्बुदैः
vireje sā sabhā tatra dānavendraiḥ samāgataiḥ | sabalākaistaḍitvadbhiḥ pralaye dyaurivāmbudaiḥ
वहाँ एकत्रित दानवेन्द्रों से वह सभा ऐसी शोभित हो रही थी, जैसे प्रलयकाल में बगुलों तथा बिजली से युक्त मेघों वाला आकाश।
श्लोक 100 (skanda.8.60.100)
अथोन्नाम्य शिरो रत्नमरीचिपरिवेषवत् । सुन्दो वचनमाहेत्थमम्मोदरुचिरस्वनः
athonnāmya śiro ratnamarīcipariveṣavat | sundo vacanamāhetthamammodarucirasvanaḥ
तब सिर उठाकर, मणि-किरणों के प्रभामण्डल से युक्त, मेघ के समान मनोहर स्वर वाले सुन्द ने यह वचन कहा —
श्लोक 101 (skanda.8.60.101)
दानवेन्द्राः करिष्यामि सर्वेषामश्रुमार्जनम् । विजित्य दैवतैः सार्द्धमिन्द्रमाहवमूर्धनि
dānavendrāḥ kariṣyāmi sarveṣāmaśrumārjanam | vijitya daivataiḥ sārddhamindramāhavamūrdhani
हे दानवेन्द्रो! देवताओं सहित इन्द्र को युद्ध के अग्रभाग में जीतकर, मैं तुम सबके आँसू पोंछूँगा।
श्लोक 102 (skanda.8.60.102)
प्रयाम दंशिताः सर्वे सज्जीभवत दानवाः । त्रैलोक्यविजयं कर्तुमुद्यतायुधपाणयः
prayāma daṁśitāḥ sarve sajjībhavata dānavāḥ | trailokyavijayaṁ kartumudyatāyudhapāṇayaḥ
हम सब कवच धारण करके चलें; हे दानवो! तैयार हो जाओ, हथियार उठाये हाथों से त्रिलोक-विजय के लिये।
श्लोक 103 (skanda.8.60.103)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रभुः प्राहासुरेश्वरम्
tasya tadvacanaṁ śrutvā prabhuḥ prāhāsureśvaram
उसके उस वचन को सुनकर प्रभु ने असुरेश्वर से कहा —
श्लोक 104 (skanda.8.60.104)
यज्ञैर्व्रतैस्तपोभिश्च नियमैश्चासुरद्विषः
yajñairvrataistapobhiśca niyamaiścāsuradviṣaḥ
हे असुरद्वेषी! यज्ञों, व्रतों, तपों तथा नियमों से...
श्लोक 105 (skanda.8.60.105)
आप्याययन्ति संरब्धाः शश्वद्वर्णाश्रमा भुवि । तानेव प्रथमं हत्वा ततो जेष्याम देवताः
āpyāyayanti saṁrabdhāḥ śaśvadvarṇāśramā bhuvi | tāneva prathamaṁ hatvā tato jeṣyāma devatāḥ
—पृथ्वी पर उत्साहपूर्वक स्थित वर्णाश्रम सदा उन्हें पुष्ट करते हैं। पहले उन्हीं का वध करके, फिर हम देवताओं को जीतेंगे।
श्लोक 106 (skanda.8.60.106)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्राहुर्दानवसत्तमाः । आयतिं प्रथमं हत्वा विजेष्यामस्ततोमरान्
tasya tadvacanaṁ śrutvā prāhurdānavasattamāḥ | āyatiṁ prathamaṁ hatvā vijeṣyāmastatomarān
उसके उस वचन को सुनकर श्रेष्ठ दानवों ने कहा — पहले उनकी भावी समृद्धि को नष्ट करके, फिर हम देवताओं को जीतेंगे।
श्लोक 107 (skanda.8.60.107)
अथोवाच तदा धुन्धुर्मेघदुन्दुभिनिस्वनः । राजानुगामी लोकोयमपापो बध्यते कथम्
athovāca tadā dhundhurmeghadundubhinisvanaḥ | rājānugāmī lokoyamapāpo badhyate katham
तब मेघ-दुन्दुभि के समान स्वर वाले धुन्धु ने कहा — राजा का अनुगमन करने वाली यह निष्पाप प्रजा कैसे मारी जाये?
श्लोक 108 (skanda.8.60.108)
अस्मत्तो दैवतै राज्यं लोकं हत्वा पुरा हतम् । विक्रमेणैव निर्जित्य दैत्यराज्यं सुरैर्हृतम्
asmatto daivatai rājyaṁ lokaṁ hatvā purā hatam | vikrameṇaiva nirjitya daityarājyaṁ surairhṛtam
हमारा राज्य देवताओं द्वारा पूर्वकाल में प्रजा का वध करके छीना गया था; दैत्यों का राज्य देवताओं ने केवल पराक्रम से जीतकर हर लिया था।
श्लोक 109 (skanda.8.60.109)
तथा तेभ्यो वयमपि प्रोत्थितध्वजसंकुले
tathā tebhyo vayamapi protthitadhvajasaṁkule
उसी प्रकार हम भी, उठी हुई ध्वजाओं से भरे युद्ध में, उनसे...
श्लोक 110 (skanda.8.60.110)
आनेष्यामो रणे जित्वा श्रियमाविग्नलोचनाम्
āneṣyāmo raṇe jitvā śriyamāvignalocanām
—युद्ध में जीतकर भयभीत नेत्रों वाली उस राज्यश्री को वापस लायेंगे।
श्लोक 111 (skanda.8.60.111)
अपकारे सति समे स्वभावेन मनस्विनाम् । तेजो विजृम्भते दीप्तं शक्तिमत्स्वेव सर्वदा
apakāre sati same svabhāvena manasvinām | tejo vijṛmbhate dīptaṁ śaktimatsveva sarvadā
समान अपकार होने पर, स्वभाव से ही, मनस्वी तथा शक्तिशाली पुरुषों में सदा प्रज्वलित तेज उभर आता है।
श्लोक 112 (skanda.8.60.112)
अथ धुन्धोर्वचः श्रुत्वा मुरो मुरजनिस्वनः । उच्चैरुत्क्षिप्य मूर्धानं प्रोवाच प्रहसन्निव
atha dhundhorvacaḥ śrutvā muro murajanisvanaḥ | uccairutkṣipya mūrdhānaṁ provāca prahasanniva
तब धुन्धु के वचन सुनकर, मृदंग के समान स्वर वाले मुर ने अपना सिर ऊँचा उठाकर, मानो हँसते हुए कहा —
श्लोक 113 (skanda.8.60.113)
पुराभवन् महात्मानो दानवेन्द्रा महाबलाः । हिरण्यकशिपुर्वृत्रः प्रह्लादो नमुचिर्बलिः
purābhavan mahātmāno dānavendrā mahābalāḥ | hiraṇyakaśipurvṛtraḥ prahlādo namucirbaliḥ
पूर्वकाल में महात्मा, महाबली दानवेन्द्र हुए थे — हिरण्यकशिपु, वृत्र, प्रह्लाद, नमुचि, बलि...
श्लोक 114 (skanda.8.60.114)
कोटिशो दानवाश्चान्ये महासत्वा महाबलाः । यैः कृता प्रसभं लक्ष्मीः स्ववक्षःस्थलवासिनी
koṭiśo dānavāścānye mahāsatvā mahābalāḥ | yaiḥ kṛtā prasabhaṁ lakṣmīḥ svavakṣaḥsthalavāsinī
—और करोड़ों अन्य महाबली दानव, जिन्होंने बलपूर्वक लक्ष्मी को अपने ही वक्षःस्थल पर निवास कराया।
श्लोक 115 (skanda.8.60.115)
अल्पावशेषैरधुना युष्माभिरसुरोत्तमाः । कथमानीयते राज्यं सुरान्निर्जित्य संयुगे
alpāvaśeṣairadhunā yuṣmābhirasurottamāḥ | kathamānīyate rājyaṁ surānnirjitya saṁyuge
—हे असुरश्रेष्ठो! अब तुम जैसे थोड़े से बचे हुए लोगों से, युद्ध में देवताओं को जीतकर राज्य कैसे पुनः प्राप्त किया जाये?
श्लोक 116 (skanda.8.60.116)
इष्टार्थसाधकेनाशु देशकालाविरोधिना । उपायेन परीप्सध्वं राज्यमन्येन केनचित्
iṣṭārthasādhakenāśu deśakālāvirodhinā | upāyena parīpsadhvaṁ rājyamanyena kenacit
इष्ट अर्थ को शीघ्र सिद्ध करने वाले, देश-काल के अनुकूल किसी अन्य उपाय से ही राज्य प्राप्त करने का प्रयत्न करो।
श्लोक 117 (skanda.8.60.117)
एतछ्रुत्वा तदा वाक्यमंशुमाली महासुरः । प्रोवाच मधुरं श्लक्ष्णमर्थानुगमिदं वचः
etachrutvā tadā vākyamaṁśumālī mahāsuraḥ | provāca madhuraṁ ślakṣṇamarthānugamidaṁ vacaḥ
यह वचन सुनकर महासुर अंशुमाली ने तब यह मधुर, कोमल तथा सारगर्भित वचन कहा —
श्लोक 118 (skanda.8.60.118)
सापराधा बलीयांसो बद्धवैराश्च दानवैः । जयिनः श्रीमदोन्मत्ताः साम देवेष्वनर्थकम्
sāparādhā balīyāṁso baddhavairāśca dānavaiḥ | jayinaḥ śrīmadonmattāḥ sāma deveṣvanarthakam
देवता अपराधी, बलवान्, दानवों के प्रति बद्धवैर, विजयी तथा ऐश्वर्य के मद से उन्मत्त हैं — उनके साथ साम-नीति व्यर्थ है।
श्लोक 119 (skanda.8.60.119)
सुरेषु मानसी सिद्धिर्विभुता भुवनत्रये । अणिमाद्यैर्गुणैर्योगस्तेषु दानमपार्थकम्
sureṣu mānasī siddhirvibhutā bhuvanatraye | aṇimādyairguṇairyogasteṣu dānamapārthakam
देवताओं में मानसिक सिद्धि तथा त्रिभुवन का प्रभुत्व है; वे अणिमा आदि सिद्धियों से युक्त हैं — उन्हें दान देना व्यर्थ है।
श्लोक 120 (skanda.8.60.120)
एकार्था नार्थिनः सर्वे संहताश्चासुरद्विषः । न ते भेदयितुं शक्या दानैस्ते दानवोत्तमाः
ekārthā nārthinaḥ sarve saṁhatāścāsuradviṣaḥ | na te bhedayituṁ śakyā dānaiste dānavottamāḥ
असुरद्वेषी देवता सभी एकजुट, एकार्थी तथा अलोलुप हैं; हे दानवश्रेष्ठो! उन्हें दान से विभाजित नहीं किया जा सकता।
श्लोक 121 (skanda.8.60.121)
मन्त्रप्रभावशक्तिभ्या मुत्साहेन परेण च । संपन्नाः सर्वथा देवा न युद्धं तैः सहेष्यते
mantraprabhāvaśaktibhyā mutsāhena pareṇa ca | saṁpannāḥ sarvathā devā na yuddhaṁ taiḥ saheṣyate
मन्त्र, प्रभाव तथा शक्ति से, और परम उत्साह से युक्त, सर्वथा सम्पन्न देवताओं के साथ युद्ध नहीं करना चाहिये।
श्लोक 122 (skanda.8.60.122)
युक्तो दानवमुख्यानां हीन सन्धिः सुरैस्सह । स्थानवृद्धिं परीप्सूनां क्षीणानामधुना भृशम्
yukto dānavamukhyānāṁ hīna sandhiḥ suraissaha | sthānavṛddhiṁ parīpsūnāṁ kṣīṇānāmadhunā bhṛśam
अब अत्यंत क्षीण हो चुके तथा अपनी स्थिति एवं समृद्धि की वृद्धि चाहने वाले प्रमुख दानवों के लिये देवताओं के साथ हीन संधि ही उचित है।
श्लोक 123 (skanda.8.60.123)
अथाह तेजसा स्वेन तेजांसि सुरविद्विषाम् । अभिभूय सदस्युच्चैरंशुमानंशुमानिव
athāha tejasā svena tejāṁsi suravidviṣām | abhibhūya sadasyuccairaṁśumānaṁśumāniva
तब अपने तेज से सभा में देवद्वेषियों के तेज को अभिभूत करते हुए, ऊँचे स्वर में अंशुमाली ने सूर्य के समान...
श्लोक 124 (skanda.8.60.124)
प्रणामपूर्वः क्रियते हीनसन्धिः कुराजभिः । न चक्रुर्दानवाः पूर्वं कुर्वते न च सांप्रतम्
praṇāmapūrvaḥ kriyate hīnasandhiḥ kurājabhiḥ | na cakrurdānavāḥ pūrvaṁ kurvate na ca sāṁpratam
प्रणामपूर्वक की जाने वाली हीन संधि कुत्सित राजाओं द्वारा की जाती है; दानवों ने न पहले ऐसा किया है, न अब करते हैं।
श्लोक 125 (skanda.8.60.125)
शिरांसि दानवेन्द्राणां कथं यास्यन्ति नम्रताम् । सुमेरोरिव शृङ्गाणि भानुमन्त्युच्छ्रितानि च
śirāṁsi dānavendrāṇāṁ kathaṁ yāsyanti namratām | sumeroriva śṛṅgāṇi bhānumantyucchritāni ca
दानवेन्द्रों के शिर, जो सुमेरु के शिखरों के समान ऊँचे तथा तेजस्वी हैं, कैसे झुक सकते हैं?
श्लोक 126 (skanda.8.60.126)
आदास्यामोथ वा राज्यं देवान्निर्जित्य संयुगे । प्राप्स्यामो वा गतिं पुण्यां निहताः समरेमरैः
ādāsyāmotha vā rājyaṁ devānnirjitya saṁyuge | prāpsyāmo vā gatiṁ puṇyāṁ nihatāḥ samaremaraiḥ
या तो हम युद्ध में देवताओं को जीतकर राज्य ग्रहण करेंगे, अथवा देवताओं द्वारा युद्ध में मारे जाकर पुण्य गति को प्राप्त करेंगे।
श्लोक 127 (skanda.8.60.127)
इत्थमंशुमतः श्रुत्वा वाक्यं वाक्यार्थकोविदः । गम्भीरमर्थवत् प्राह महिषो वदतां वरः
itthamaṁśumataḥ śrutvā vākyaṁ vākyārthakovidaḥ | gambhīramarthavat prāha mahiṣo vadatāṁ varaḥ
अंशुमाली के इस वचन को सुनकर, वचन के अर्थ में कुशल, वक्ताओं में श्रेष्ठ महिष ने यह गम्भीर तथा सारगर्भित वचन कहा —
श्लोक 128 (skanda.8.60.128)
विदितं वः समस्तानां पूर्वजा भवतां यथा । हता दानवशार्दूला विक्रमैकरसाः सुरैः
viditaṁ vaḥ samastānāṁ pūrvajā bhavatāṁ yathā | hatā dānavaśārdūlā vikramaikarasāḥ suraiḥ
तुम सभी को यह ज्ञात है कि तुम्हारे पूर्वज, जो पराक्रम में ही रत रहने वाले दानव-शार्दूल थे, देवताओं द्वारा किस प्रकार मारे गये।
श्लोक 129 (skanda.8.60.129)
तदलं दानवश्रेष्ठा वृत्त्या वोग्निपतङ्गयोः
tadalaṁ dānavaśreṣṭhā vṛttyā vognipataṅgayoḥ
अतः हे दानवश्रेष्ठो! अग्नि और पतंगे के समान आचरण अब पर्याप्त है!
श्लोक 130 (skanda.8.60.130)
सन्धाय दैवतैस्सार्ध वृत्तिं कुर्मः स्वकर्मभिः
sandhāya daivataissārdha vṛttiṁ kurmaḥ svakarmabhiḥ
देवताओं के साथ संधि करके हम अपने ही कर्मों से जीविका चलायें।
श्लोक 131 (skanda.8.60.131)
ज्यायोभिर्दानवा देवै रन्ध्रव्यसनवर्जितैः
jyāyobhirdānavā devai randhravyasanavarjitaiḥ
हे दानवो! देवता हमसे श्रेष्ठ हैं, तथा किसी छिद्र या दुर्बलता से रहित हैं।
श्लोक 132 (skanda.8.60.132)
विग्रहेण कथं सिद्धिमिच्छथ स्रस्तशक्तयः
vigraheṇa kathaṁ siddhimicchatha srastaśaktayaḥ
शक्ति क्षीण हो जाने पर तुम विग्रह से सिद्धि की आशा कैसे करते हो?
श्लोक 133 (skanda.8.60.133)
गुणातिशययुक्तानां यानमभ्युच्चये सति । मन्त्रोत्साहप्रभावाणामवाप्तौ देशकालयोः
guṇātiśayayuktānāṁ yānamabhyuccaye sati | mantrotsāhaprabhāvāṇāmavāptau deśakālayoḥ
जब गुणों में अतिशयता हो, तब यान उचित है; जब मन्त्र, उत्साह तथा प्रभाव प्राप्त हों, और देश-काल अनुकूल हों...
श्लोक 134 (skanda.8.60.134)
अथ संभूय यानेन मन्यध्वे सिद्धिमात्मनः । दंशिताः समरे यत्ताः समेता यक्षराक्षसैः
atha saṁbhūya yānena manyadhve siddhimātmanaḥ | daṁśitāḥ samare yattāḥ sametā yakṣarākṣasaiḥ
—तब एकत्रित होकर यान करना चाहिये। किन्तु अब तुम कवचधारी, युद्ध के लिये तत्पर, यक्ष-राक्षसों से मिलकर, सिद्धि मान बैठे हो...
श्लोक 135 (skanda.8.60.135)
रक्षांसि हुतशेषाणि ज्वलने शक्तिसूनुना । श्रितानि दैवतान्येव भीतान्यबलवन्ति च
rakṣāṁsi hutaśeṣāṇi jvalane śaktisūnunā | śritāni daivatānyeva bhītānyabalavanti ca
—किन्तु राक्षस तो अग्नि में हवन के शेष के समान बचे हुए हैं, भयभीत तथा निर्बल होकर उन्होंने देवताओं की ही शरण ले रखी है।
श्लोक 136 (skanda.8.60.136)
आयत्ता सर्वदा यक्षाः कुबेरेसुरसत्तमाः । स चापि सुरमुख्यानां कुरुते कार्यमुद्यतः
āyattā sarvadā yakṣāḥ kuberesurasattamāḥ | sa cāpi suramukhyānāṁ kurute kāryamudyataḥ
हे असुरश्रेष्ठ! यक्ष सदा कुबेर पर आश्रित हैं; और वे भी सदा तत्पर होकर प्रमुख देवताओं का ही कार्य करते हैं।
श्लोक 137 (skanda.8.60.137)
अन्यत्र दैत्यशत्रुभ्यो भुवनेषु बलीयसः । अभावादसुरश्रेष्ठा द्वैधीभावो न विद्यते
anyatra daityaśatrubhyo bhuvaneṣu balīyasaḥ | abhāvādasuraśreṣṭhā dvaidhībhāvo na vidyate
—दैत्यों के शत्रुओं के अतिरिक्त लोकों में कोई बलवान् नहीं है; अतः हे असुरश्रेष्ठो! उनके अभाव के कारण कोई द्वैधीभाव सम्भव नहीं है।
श्लोक 138 (skanda.8.60.138)
महिषे सदसि स्वस्थमित्युक्तवति दानवे । विस्पष्टमर्थवद्वाक्यं द्रुमः प्राह महासुरः
mahiṣe sadasi svasthamityuktavati dānave | vispaṣṭamarthavadvākyaṁ drumaḥ prāha mahāsuraḥ
जब सभा में स्वस्थचित्त दानव महिष ने इस प्रकार कहा, तब महासुर द्रुम ने यह स्पष्ट तथा सारगर्भित वचन कहा —
श्लोक 139 (skanda.8.60.139)
समरे निर्जितैः पूर्वमस्माभिरबलैस्सह । जयिनः शक्तिसंपन्नाः संधास्यन्ते कथं सुराः
samare nirjitaiḥ pūrvamasmābhirabalaissaha | jayinaḥ śaktisaṁpannāḥ saṁdhāsyante kathaṁ surāḥ
जो देवता युद्ध में विजयी तथा शक्तिसम्पन्न हैं, वे पहले पराजित हुए हम निर्बलों के साथ संधि कैसे करेंगे?
श्लोक 140 (skanda.8.60.140)
संविधायाशु दुर्गाणि पर्वतानुदकानि च
saṁvidhāyāśu durgāṇi parvatānudakāni ca
शीघ्र ही दुर्गों, पर्वतों तथा जल-दुर्गों की व्यवस्था करके...
श्लोक 141 (skanda.8.60.141)
विजये सततं युक्ता विगृह्यासनमास्महे
vijaye satataṁ yuktā vigṛhyāsanamāsmahe
—सदा विजय में तत्पर होकर हम विग्रह की स्थिति में रहें।
श्लोक 142 (skanda.8.60.142)
नाशयन्तः सदा यज्ञान् व्रतानि नियमांस्तथा । वर्णाश्रमांश्च लोकेस्मिन् जिघांसन्तः समन्ततः
nāśayantaḥ sadā yajñān vratāni niyamāṁstathā | varṇāśramāṁśca lokesmin jighāṁsantaḥ samantataḥ
—यज्ञों, व्रतों तथा नियमों को सदा नष्ट करते हुए, इस लोक में सब ओर वर्णाश्रमों का वध करने की इच्छा करते हुए...
श्लोक 143 (skanda.8.60.143)
ततो लोकविनाशेन विच्छिन्ने सत्क्रियापथे । विदित्वापचितान् देवानभियास्याम दंशिताः
tato lokavināśena vicchinne satkriyāpathe | viditvāpacitān devānabhiyāsyāma daṁśitāḥ
—फिर लोक के विनाश से सत्क्रिया के मार्ग के छिन्न हो जाने पर, देवताओं को क्षीण जानकर, हम कवच धारण करके उन पर आक्रमण करें।
श्लोक 144 (skanda.8.60.144)
अथ ते तस्य वचनं सर्व एवानुमेनिरे । आसन्नमृत्यवोपथ्यमन्नं प्राणभृतो यथा
atha te tasya vacanaṁ sarva evānumenire | āsannamṛtyavopathyamannaṁ prāṇabhṛto yathā
तब उन सबने उसके वचन का अनुमोदन किया — जैसे मृत्यु के समीप पहुँचे प्राणी अपथ्य भोजन को स्वीकार कर लेते हैं।
श्लोक 145 (skanda.8.60.145)
उत्तस्थुर्लोकनाशाय मतिं कृत्वामरद्विषः । उदन्वन्त इवोद्वेलाः प्रलये मारुताकुलाः
uttasthurlokanāśāya matiṁ kṛtvāmaradviṣaḥ | udanvanta ivodvelāḥ pralaye mārutākulāḥ
अमरद्वेषी उन दानवों ने लोक-विनाश का निश्चय करके उठ खड़े हुए, जैसे प्रलयकाल में वायुओं से क्षुब्ध होकर सागर अपने तटों को लाँघ जाते हैं।
श्लोक 146 (skanda.8.60.146)
जलद इव सुनीलः पीनवृत्तोन्नताङ्गो हिमकरकरशुभ्रां हारयष्टिं दधानः । उदपतदथ सुन्दस्त्वासनात् स्वात्तदानीं जलधिरिव विघूर्णन् फेनमाली युगान्ते
jalada iva sunīlaḥ pīnavṛttonnatāṅgo himakarakaraśubhrāṁ hārayaṣṭiṁ dadhānaḥ | udapatadatha sundastvāsanāt svāttadānīṁ jaladhiriva vighūrṇan phenamālī yugānte
मेघ के समान गहरे नीले वर्ण वाले, पुष्ट, गोल तथा उन्नत अंगों वाले, चन्द्रकिरणों के समान श्वेत मुक्ता-हार धारण किये हुए सुन्द तब अपने आसन से उठ खड़े हुए, मानो प्रलयकाल में फेनमय क्षुब्ध सागर हों।
श्लोक 147 (skanda.8.60.147)
तदनु तदनुजोम्बुवाहनीलः परिघभुजः पृथुरक्तदीर्घनेत्रः । अजहदविमनाः स्वमासनान्तं प्रतिभयकृद् द्विषतां तदा निसुन्दः
tadanu tadanujombuvāhanīlaḥ parighabhujaḥ pṛthuraktadīrghanetraḥ | ajahadavimanāḥ svamāsanāntaṁ pratibhayakṛd dviṣatāṁ tadā nisundaḥ
उसके पश्चात् उसका छोटा भाई, मेघ के समान श्याम, परिघ के समान भुजाओं वाला, विशाल, लाल तथा दीर्घ नेत्रों वाला, अविचलित निसुन्द भी, शत्रुओं के लिये भयंकर बनकर, अपने आसन से उठ खड़ा हुआ।