अम्बिका खण्ड · अध्याय 61
अमरावती में प्रवेश
श्लोक 1 (skanda.8.61.1)
सनत्कुमार उवाच । अथ दानवमुख्यानां लोकनाशाय निर्ययौ । मत्तवारणसम्बाधं रथाश्ववलितं बलम्
sanatkumāra uvāca | atha dānavamukhyānāṁ lokanāśāya niryayau | mattavāraṇasambādhaṁ rathāśvavalitaṁ balam
सनत्कुमार ने कहा - तत्पश्चात् दानवों के प्रमुखों की वह सेना, जो मदमत्त हाथियों से भरी और रथों-घोड़ों से आच्छादित थी, लोक के विनाश हेतु निकल पड़ी।
श्लोक 2 (skanda.8.61.2)
तत्तदा दानवानीकं विससार दिशो दिशः । प्रलये मारुतोद्धूतमौदन्वतमिवोदकम्
tattadā dānavānīkaṁ visasāra diśo diśaḥ | pralaye mārutoddhūtamaudanvatamivodakam
उस समय वह दानव-सेना दिशा-दिशा में उसी प्रकार फैल गई जैसे प्रलयकाल में वायु से उद्वेलित समुद्र का जल फैलता है।
श्लोक 3 (skanda.8.61.3)
निजघ्नुर्ब्राह्मणान् केचित् केचिन्निष्पिपिषुर्विशः । तुस्तुभुः क्षत्रियानन्ये शूद्रानन्ये बभक्षिरे
nijaghnurbrāhmaṇān kecit kecinniṣpipiṣurviśaḥ | tustubhuḥ kṣatriyānanye śūdrānanye babhakṣire
उनमें से किन्हीं ने ब्राह्मणों को मार डाला, किन्हीं ने वैश्यों को कुचल डाला, कुछ ने क्षत्रियों पर प्रहार किया और कुछ ने शूद्रों को खा डाला।
श्लोक 4 (skanda.8.61.4)
जग्लसुर्ल्लिलिहुर्न्नेदुर्बभञ्जुश्च समन्ततः । यज्ञेष्वन्नं हविर्नादान् यूपाँश्चामरविद्विषः
jaglasurllilihurnnedurbabhañjuśca samantataḥ | yajñeṣvannaṁ havirnādān yūpā~ścāmaravidviṣaḥ
अमरों के वे शत्रु चारों ओर यज्ञों के अन्न और हवि को निगल गए, चाट गए, गरज उठे और यज्ञस्तंभों को तोड़ डाला।
श्लोक 5 (skanda.8.61.5)
स्वधीतवेदाध्ययनाभिनादितान् मुनिप्रवेकाचितगुल्मपादपान् । प्रभूतचीराजिनदर्भसंचयान् निकामपर्यन्तहिमाम्बुनिर्झरान्
svadhītavedādhyayanābhināditān munipravekācitagulmapādapān | prabhūtacīrājinadarbhasaṁcayān nikāmaparyantahimāmbunirjharān
जो आश्रम वेदाध्ययन की ध्वनि से गूँजते थे, श्रेष्ठ मुनियों तथा झाड़ी-वृक्षों से भरे थे, वल्कल-मृगचर्म-कुशों के ढेरों से युक्त थे और चारों ओर शीतल जल-निर्झरों से घिरे थे,
श्लोक 6 (skanda.8.61.6)
उपान्तनीवारगवेधुकाचितान् प्रसुप्तविश्वस्तमृगर्क्षवानरान् । हबिर्भुजो धूमवितानसंकुलान् विसृत्य चान्ये प्रविजघ्नुराश्रमान्
upāntanīvāragavedhukācitān prasuptaviśvastamṛgarkṣavānarān | habirbhujo dhūmavitānasaṁkulān visṛtya cānye pravijaghnurāśramān
जिनके निकट नीवार तथा गवेधुक उगे थे, जहाँ मृग, भालू और वानर निर्भय होकर सोते थे, जो हवन के धुएँ से व्याप्त थे - उन आश्रमों को उजाड़कर अन्य दानवों ने नष्ट कर डाला।
श्लोक 7 (skanda.8.61.7)
केचिन्मुनीनामसुरा जीर्णोरगसमत्विषः । जटाः संगृह्य लुलुचुः क्षालितास्तीर्थवारिणा
kecinmunīnāmasurā jīrṇoragasamatviṣaḥ | jaṭāḥ saṁgṛhya lulucuḥ kṣālitāstīrthavāriṇā
पुराने सर्प की केंचुली के समान चमकीले शरीर वाले कुछ असुरों ने मुनियों की जटाओं को, जो तीर्थ के पवित्र जल से धुली थीं, पकड़कर उखाड़ डाला।
श्लोक 8 (skanda.8.61.8)
पातयित्वासुराः केचिच्चरणैः पिपिषुः क्षितौ । ऋषीनात्मविनाशाय हुताशान् ज्वलितानिव
pātayitvāsurāḥ keciccaraṇaiḥ pipiṣuḥ kṣitau | ṛṣīnātmavināśāya hutāśān jvalitāniva
कुछ असुरों ने ऋषियों को गिराकर, मानो अपने ही विनाश के लिए जलती हुई अग्नि हों, उन्हें पैरों से कुचल डाला।
श्लोक 9 (skanda.8.61.9)
शिरांसि मुनिपत्नीनां करैः केचित् तलैस्तथा । पूतानि वारिभिः पुण्यैः पस्पृशुर्दानवाधमाः
śirāṁsi munipatnīnāṁ karaiḥ kecit talaistathā | pūtāni vāribhiḥ puṇyaiḥ paspṛśurdānavādhamāḥ
उन नीच दानवों ने मुनि-पत्नियों के, पवित्र जल से शुद्ध हुए, सिरों पर हाथों और थप्पड़ों से प्रहार किया।
श्लोक 10 (skanda.8.61.10)
अथ ते जगृहुर्यात्रां ज्ञात्वाभ्युदयमात्मनः । विक्षिप्तं लोकनाशाय बलमाहूय सर्वशः
atha te jagṛhuryātrāṁ jñātvābhyudayamātmanaḥ | vikṣiptaṁ lokanāśāya balamāhūya sarvaśaḥ
तब उन्होंने अपने अभ्युदय को जानकर, लोक-विनाश के लिए भेजी गई बिखरी हुई सेना को सब ओर से बुलाकर, प्रस्थान की तैयारी की।
श्लोक 11 (skanda.8.61.11)
प्रशस्तेहनि नक्षत्रे मुहूर्त्ते च जयान्विते । सन्नाहभेरीराहत्य क्रियाश्चक्रुर्जयावहाः
praśastehani nakṣatre muhūrtte ca jayānvite | sannāhabherīrāhatya kriyāścakrurjayāvahāḥ
शुभ दिन, शुभ नक्षत्र और विजय देने वाले मुहूर्त में उन्होंने युद्ध-भेरी बजाकर विजय लाने वाले अनुष्ठान किए।
श्लोक 12 (skanda.8.61.12)
सन्नाह्यान् बलिनो सत्तानानाय्य वरवारणान् । सम्यगभ्यर्च्य वर्माणि बबन्धुर्विधिनासुराः
sannāhyān balino sattānānāyya varavāraṇān | samyagabhyarcya varmāṇi babandhurvidhināsurāḥ
बलवान् दानवों ने श्रेष्ठ हाथियों को मँगाकर, विधिपूर्वक उनकी पूजा करके, कवच बाँधे।
श्लोक 13 (skanda.8.61.13)
यन्त्राणि धौतैर्नाराचैः पूर्णान्यासनपार्श्वयोः । बबन्धुः शक्तिपूर्णाँश्च वेणून् तिर्यगवस्थितान्
yantrāṇi dhautairnārācaiḥ pūrṇānyāsanapārśvayoḥ | babandhuḥ śaktipūrṇā~śca veṇūn tiryagavasthitān
उन्होंने हौदों के दोनों ओर पॉलिश किए हुए लौह-बाणों से भरे यंत्र तथा शक्तियों से भरे तरकश और आड़े बाँस बाँधे।
श्लोक 14 (skanda.8.61.14)
तोमरान् कणपान् शंकून् शूलचक्रपरश्वधान् । आबबन्धुर्नियुक्ताश्च मध्यमासनपार्श्वयोः
tomarān kaṇapān śaṁkūn śūlacakraparaśvadhān | ābabandhurniyuktāśca madhyamāsanapārśvayoḥ
नियुक्त सैनिकों ने मध्य के हौदे के दोनों ओर तोमर, कणप, शंकु, त्रिशूल, चक्र और परशु बाँधे।
श्लोक 15 (skanda.8.61.15)
सज्जानि परमास्त्राणि बालधीँश्च सुसंस्कृतान् । संपूर्णान् गन्धवासोभिर्निशिताग्रैः शिलीमुखैः
sajjāni paramāstrāṇi bāladhī~śca susaṁskṛtān | saṁpūrṇān gandhavāsobhirniśitāgraiḥ śilīmukhaiḥ
उन्होंने श्रेष्ठ अस्त्र तैयार किए, हाथियों की पूँछें सजाईं और सुगंधित, तीक्ष्ण-मुख बाणों से भरे तरकश तैयार किए।
श्लोक 16 (skanda.8.61.16)
सन्नाह्यानकुशाँल्लौहान् बालेन्दुसदृशद्युतीन् । ग्रैवेयेषु सिताँश्चक्रुर्मध्ये मस्तकपिण्डयोः
sannāhyānakuśā~llauhān bālendusadṛśadyutīn | graiveyeṣu sitā~ścakrurmadhye mastakapiṇḍayoḥ
उन्होंने बालचंद्र के समान चमकते श्वेत लौह-अंकुशों को हाथियों की गलपट्टियों में, मस्तक के दोनों गोलार्धों के मध्य बाँधा।
श्लोक 17 (skanda.8.61.17)
क्षुरप्रमालां संयस्तां शातकुम्भमयीं शुभाम् । आबबन्धुश्च कुम्भेषु गजानां गजसादिनः
kṣurapramālāṁ saṁyastāṁ śātakumbhamayīṁ śubhām | ābabandhuśca kumbheṣu gajānāṁ gajasādinaḥ
हाथी-सवारों ने हाथियों के गंडस्थलों पर स्वर्ण से बनी सुंदर छुरे जैसी धारदार माला बाँधी।
श्लोक 18 (skanda.8.61.18)
वैजयन्तीपताकाश्च विचित्राः स्वभिलक्षिताः । उच्छ्रयामासुरायत्ता दन्त्यनीकस्य दानवाः
vaijayantīpatākāśca vicitrāḥ svabhilakṣitāḥ | ucchrayāmāsurāyattā dantyanīkasya dānavāḥ
गजसेना के अध्यक्ष दानवों ने विचित्र, अपने-अपने चिह्नों से पहचानी जाने वाली वैजयंती पताकाएँ ऊँची फहराईं।
श्लोक 19 (skanda.8.61.19)
घण्टा वारणमुख्यानामाससज्जु र्महास्वनाः । चामराणि सुदीर्घाणि हंसांशुरुचिराणि च
ghaṇṭā vāraṇamukhyānāmāsasajju rmahāsvanāḥ | cāmarāṇi sudīrghāṇi haṁsāṁśurucirāṇi ca
श्रेष्ठ हाथियों पर तेज़ स्वर वाली घंटियाँ बाँधी गईं तथा हंस के समान चमकीले लंबे चँवर लगाए गए।
श्लोक 20 (skanda.8.61.20)
एकैकस्य चतस्रश्च करेण्वश्चारुदर्शनाः । स्थापिताः पुरतो दैत्यैः परवारणवारणाः
ekaikasya catasraśca kareṇvaścārudarśanāḥ | sthāpitāḥ purato daityaiḥ paravāraṇavāraṇāḥ
प्रत्येक बड़े हाथी के आगे सुंदर दिखने वाली चार-चार हथिनियाँ दानवों ने शत्रु के हाथियों को रोकने के लिए खड़ी कीं।
श्लोक 21 (skanda.8.61.21)
यूनो युवभिरारूढान् शिक्षितानस्त्रकोविदैः । चक्रुरग्रेसरानश्वान् वर्मिणो लोहजालिनः
yūno yuvabhirārūḍhān śikṣitānastrakovidaiḥ | cakruragresarānaśvān varmiṇo lohajālinaḥ
अस्त्र-विद्या में निपुण युवकों द्वारा सवार, प्रशिक्षित, लौहजाल से आवृत घोड़ों को उन्होंने सेना के आगे किया।
श्लोक 22 (skanda.8.61.22)
वर्मिणो बद्धकवचाञ्छितनिस्त्रिंशधारिणः । तेषां पुरस्सरान् पत्तीननुयाताँश्च धन्विभिः
varmiṇo baddhakavacāñchitanistriṁśadhāriṇaḥ | teṣāṁ purassarān pattīnanuyātā~śca dhanvibhiḥ
बँधे हुए कवच पहने, तीक्ष्ण तलवारें धारण किए हुए कवचधारी पैदल सैनिक उनके आगे चले, और उनके पीछे धनुर्धारी।
श्लोक 23 (skanda.8.61.23)
दैत्ययोधास्ततश्चान्ये वर्मिणो लोहजालिनः । आरूढा बद्धनिस्त्रिंशाः स्नातपीताँस्तुरङ्गःमान्
daityayodhāstataścānye varmiṇo lohajālinaḥ | ārūḍhā baddhanistriṁśāḥ snātapītā~sturaṅgaḥmān
फिर लौहजाल से आच्छादित कवचधारी अन्य दानव-योद्धा, कमर में तलवार बाँधे, स्नान कराए और खिलाए गए घोड़ों पर सवार हुए।
श्लोक 24 (skanda.8.61.24)
केचिद्विनीतैर्युवभिः स्नपितैः कृतमङ्गलैः । रथान् संयोजयामासुरश्वैरग्रजवैस्तदा
kecidvinītairyuvabhiḥ snapitaiḥ kṛtamaṅgalaiḥ | rathān saṁyojayāmāsuraśvairagrajavaistadā
कुछ ने विनम्र, स्नान कराए, मंगल-कृत युवा सारथियों द्वारा तेज़ अग्रगामी घोड़ों को रथों में जोता।
श्लोक 25 (skanda.8.61.25)
आयुधान् सपताकाँश्च किंकिणीजालनादितान् । अधितस्थुस्तदा केचिद् रथान् हाटकसंस्कृतान्
āyudhān sapatākā~śca kiṁkiṇījālanāditān | adhitasthustadā kecid rathān hāṭakasaṁskṛtān
कुछ छोटी घंटियों के जाल से गूँजते, आयुधों और पताकाओं से युक्त स्वर्ण-रथों पर सवार हुए।
श्लोक 26 (skanda.8.61.26)
एवं तत् कल्पितं श्रुत्वा सैन्यं सैन्यनमस्कृतः । सुन्दो दानवशार्दूलो निर्ययौ कृतमङ्गलः
evaṁ tat kalpitaṁ śrutvā sainyaṁ sainyanamaskṛtaḥ | sundo dānavaśārdūlo niryayau kṛtamaṅgalaḥ
सेना को इस प्रकार सुसज्जित सुनकर, सेना द्वारा वंदित दानव-श्रेष्ठ सुंद, मंगल-कर्म करके निकल पड़ा।
श्लोक 27 (skanda.8.61.27)
स्वीषं सुकूबरं स्वक्षं शातकुम्भमयं वरम् । नानामणिमयैश्चित्रैर्भक्तिपुष्पमृगद्विजैः
svīṣaṁ sukūbaraṁ svakṣaṁ śātakumbhamayaṁ varam | nānāmaṇimayaiścitrairbhaktipuṣpamṛgadvijaiḥ
अपने सुंदर धुरे और पहियों वाले, स्वर्णमय, अनेक मणियों से जड़े, फूल-मृग-पक्षियों के चित्रों से सुशोभित उत्तम रथ पर,
श्लोक 28 (skanda.8.61.28)
युक्तं परमसंहृष्टैर्मनोवेगैस्तुरङ्गमैः । आरुह्याथ रथं दिव्यं पताकाध्वजशोभितम्
yuktaṁ paramasaṁhṛṣṭairmanovegaisturaṅgamaiḥ | āruhyātha rathaṁ divyaṁ patākādhvajaśobhitam
मन के समान वेगवान्, अत्यंत उल्लसित घोड़ों से जुते हुए उस दिव्य, पताका-ध्वजों से शोभित रथ पर वह आरूढ़ हुआ।
श्लोक 29 (skanda.8.61.29)
कवची बद्धनिस्त्रिंशो विधूतसितचामरः । अभितः स्तूयमानश्च सूतमागधबन्दिभिः
kavacī baddhanistriṁśo vidhūtasitacāmaraḥ | abhitaḥ stūyamānaśca sūtamāgadhabandibhiḥ
कवच पहने, तलवार बाँधे, श्वेत चँवर हिलते हुए, सूत-मागध-वंदीजनों द्वारा चारों ओर से स्तुति किया जाता हुआ,
श्लोक 30 (skanda.8.61.30)
निसुन्दोपि मदश्यामकपोलालीनषट्पदम् । आरुह्य निर्जगामाशु सांग्रामिकमनेकपम्
nisundopi madaśyāmakapolālīnaṣaṭpadam | āruhya nirjagāmāśu sāṁgrāmikamanekapam
निसुंद भी मद से काले कपोलों पर भौंरे मँडराते हुए युद्ध-योग्य गजराज पर सवार होकर शीघ्र निकल पड़ा।
श्लोक 31 (skanda.8.61.31)
अन्ये च दानवास्तत्र रथैरश्वैर्मतङ्गजैः । निर्ययुः परमप्रीता युद्धशौण्डाः सुदंशिताः
anye ca dānavāstatra rathairaśvairmataṅgajaiḥ | niryayuḥ paramaprītā yuddhaśauṇḍāḥ sudaṁśitāḥ
वहाँ अन्य दानव भी रथों, घोड़ों और हाथियों पर, युद्ध के नशे में चूर, सुसज्जित होकर परम प्रसन्नता से निकल पड़े।
श्लोक 32 (skanda.8.61.32)
बलस्याग्रेसरं कृत्वा तारकाक्षं महासुरम् । सहितं बहुभिः शूरै रथनागाश्वपत्तिभिः
balasyāgresaraṁ kṛtvā tārakākṣaṁ mahāsuram | sahitaṁ bahubhiḥ śūrai rathanāgāśvapattibhiḥ
उन्होंने अनेक शूरवीरों तथा रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सेना से युक्त महाअसुर तारकाक्ष को सेना के अग्रभाग में रखा।
श्लोक 33 (skanda.8.61.33)
पृष्ठतः संविधायाशु बलोन्मत्तं महासुरम् । बलेन चतुरङ्गेण महिषं पार्ष्णिरक्षिणम्
pṛṣṭhataḥ saṁvidhāyāśu balonmattaṁ mahāsuram | balena caturaṅgeṇa mahiṣaṁ pārṣṇirakṣiṇam
बल से उन्मत्त महाअसुर महिष को, चतुरंगिणी सेना सहित, पार्श्व-रक्षक के रूप में पीछे शीघ्र स्थापित किया।
श्लोक 34 (skanda.8.61.34)
पार्श्वयोरुभयोर्न्यस्य मेघस्वनमहास्वनौ । सैन्येन महता दृप्तौ दानवावरिसूदनौ
pārśvayorubhayornyasya meghasvanamahāsvanau | sainyena mahatā dṛptau dānavāvarisūdanau
दोनों पार्श्वों में गर्जन में मेघ के समान गंभीर स्वर वाले, अभिमानी और शत्रु-नाशक मेघस्वन तथा महास्वन नामक दानवों को विशाल सेना सहित रखा गया।
श्लोक 35 (skanda.8.61.35)
मध्ये सुन्दो निसुन्दश्च मयः शम्भुः खरो मुरः । सन्नद्धा बलिनः शूरा परसैन्यविदारणाः
madhye sundo nisundaśca mayaḥ śambhuḥ kharo muraḥ | sannaddhā balinaḥ śūrā parasainyavidāraṇāḥ
मध्य में सुंद और निसुंद, तथा मय, शंभु, खर और मुर - ये बलवान्, शूरवीर, कवचधारी, शत्रु-सेना को विदीर्ण करने वाले दानव चले।
श्लोक 36 (skanda.8.61.36)
प्रतस्थिरे सुसंयत्ता दिवं दानवसत्तमाः । प्रलये मारुतोद्धूता घनाः संवर्त्तका इव
pratasthire susaṁyattā divaṁ dānavasattamāḥ | pralaye mārutoddhūtā ghanāḥ saṁvarttakā iva
इस प्रकार सुसज्जित होकर श्रेष्ठ दानव स्वर्ग की ओर उसी प्रकार चल पड़े जैसे प्रलयकाल में वायु से उड़ाए गए मेघ चलते हैं।
श्लोक 37 (skanda.8.61.37)
तेषामागमनं ज्ञात्वा सह स्वर्लोकवासिभिः । अपसृत्य जगामाशु जनस्थानं शतक्रतुः
teṣāmāgamanaṁ jñātvā saha svarlokavāsibhiḥ | apasṛtya jagāmāśu janasthānaṁ śatakratuḥ
उनका आगमन जानकर इंद्र स्वर्गवासियों के साथ पीछे हटकर शीघ्र जनस्थान चला गया।
श्लोक 38 (skanda.8.61.38)
मेरो शिखरमारुह्य सर्वेथ सहितास्तदा । सेना निवेशयामासुर्नन्दने ते सुरद्विषः
mero śikharamāruhya sarvetha sahitāstadā | senā niveśayāmāsurnandane te suradviṣaḥ
तब वे देव-शत्रु सब मिलकर मेरु के शिखर पर चढ़कर नंदन वन में अपनी सेना ठहरा गए।
श्लोक 39 (skanda.8.61.39)
अथ सैन्यस्य दैत्येन्द्रा रक्षामाधाय सर्वशः । प्रविभक्तानसंबाधानावासान् जगृहुस्ततः
atha sainyasya daityendrā rakṣāmādhāya sarvaśaḥ | pravibhaktānasaṁbādhānāvāsān jagṛhustataḥ
फिर दैत्येंद्रों ने सेना की सब ओर से रक्षा का प्रबंध करके, विभक्त तथा असंकुल आवासों को ग्रहण किया।
श्लोक 40 (skanda.8.61.40)
दत्तानुज्ञास्ततः सर्वे दानवा दानवोत्तमैः । सन्नाह्यमपनिन्युस्ते सर्वोपकरणं तदा
dattānujñāstataḥ sarve dānavā dānavottamaiḥ | sannāhyamapaninyuste sarvopakaraṇaṁ tadā
तब दानव-श्रेष्ठों की आज्ञा पाकर सभी दानवों ने अपने कवच और सारा सामान उतार दिया।
श्लोक 41 (skanda.8.61.41)
आरूढा गजकन्यासु वर्माणि मुमुचुः शनैः । आयुधान्यपनीयाशु सैनिका मत्तदन्तिनाम्
ārūḍhā gajakanyāsu varmāṇi mumucuḥ śanaiḥ | āyudhānyapanīyāśu sainikā mattadantinām
मदमस्त हाथियों की सवारी करने वाले सैनिकों ने हथिनियों पर सवार होकर धीरे-धीरे कवच उतारे और शीघ्र ही अपने अस्त्र भी हटा दिए।
श्लोक 42 (skanda.8.61.42)
सन्नाहानपनिन्युश्च मुमुचुः कवचानि च । तनुत्राणि च चित्राणि तदा दानवसैनिकाः
sannāhānapaninyuśca mumucuḥ kavacāni ca | tanutrāṇi ca citrāṇi tadā dānavasainikāḥ
दानव-सैनिकों ने अपने साज-सामान उतारे, कवच उतारे और चित्र-विचित्र देहरक्षक वस्त्र भी उतार दिए।
श्लोक 43 (skanda.8.61.43)
अपेत कक्षान् मातङ्गान् स्नातपीतान् गतक्लमान् । बबन्धुः कल्पवृक्षेषु केचिद्दानवसैनिकाः
apeta kakṣān mātaṅgān snātapītān gataklamān | babandhuḥ kalpavṛkṣeṣu keciddānavasainikāḥ
कुछ दानव-सैनिकों ने कसे हुए साज उतारकर, स्नान कराए, जल पिलाए और थकान मिटाए हाथियों को कल्पवृक्षों से बाँध दिया।
श्लोक 44 (skanda.8.61.44)
केचित् कल्पद्रुमान्नागा मदसंलीनषटपदाः । बभंजुर्बलिनस्त्रस्तमत्तोद्भ्रान्तविहङ्गमान्
kecit kalpadrumānnāgā madasaṁlīnaṣaṭapadāḥ | babhaṁjurbalinastrastamattodbhrāntavihaṅgamān
मद में लीन भ्रमरों के झुंड वाले कुछ बलवान् हाथियों ने कल्पवृक्षों को तोड़ डाला, जिससे भयभीत और मदमस्त होकर पक्षी उड़ चले।
श्लोक 45 (skanda.8.61.45)
चुक्रशुर्बलिनः केचिन्मदश्यामान् मतङ्गजाः । कपोलान् कल्पवृक्षेषु पुष्पालीनालिपंक्तिषु
cukraśurbalinaḥ kecinmadaśyāmān mataṅgajāḥ | kapolān kalpavṛkṣeṣu puṣpālīnālipaṁktiṣu
कुछ बलवान्, मद से काले हुए कपोलों वाले हाथियों ने कल्पवृक्षों पर, जो फूलों पर मंडराते भौंरों की पंक्तियों से भरे थे, अपने कपोल रगड़े।
श्लोक 46 (skanda.8.61.46)
नागा जगाहिरे केचिन्मत्ता मन्दाकिनीं नदीम् । हैमवारिजकिञ्जल्कपिञ्जरोपान्तरोधसम्
nāgā jagāhire kecinmattā mandākinīṁ nadīm | haimavārijakiñjalkapiñjaropāntarodhasam
कुछ मदमस्त हाथी मंदाकिनी नदी में घुस गए, जिसके तट स्वर्ण-कमलों के पराग से पीत हो रहे थे।
श्लोक 47 (skanda.8.61.47)
विमुक्तसाङ्ग्रामिकवर्मजालान् प्रसन्नचित्तान् परिघृष्टकायान् । निपीततोयानपनीतखेदान् बबन्धुरश्वान्पृथगश्वबन्धाः
vimuktasāṅgrāmikavarmajālān prasannacittān parighṛṣṭakāyān | nipītatoyānapanītakhedān babandhuraśvānpṛthagaśvabandhāḥ
युद्ध के कवच-जाल से मुक्त, प्रसन्नचित्त, शरीर मले हुए, जल पीकर थकान दूर किए हुए घोड़ों को अश्व-रक्षकों ने अलग-अलग बाँधा।
श्लोक 48 (skanda.8.61.48)
अथ सूक्ष्माणि वासांसि चित्राश्च परमाःस्रजः । आनिन्युः कल्पवृक्षेभ्यः फलानि मधुराणि च
atha sūkṣmāṇi vāsāṁsi citrāśca paramāḥsrajaḥ | āninyuḥ kalpavṛkṣebhyaḥ phalāni madhurāṇi ca
फिर वे सूक्ष्म वस्त्र, विचित्र श्रेष्ठ मालाएँ तथा कल्पवृक्षों के मधुर फल ले आए।
श्लोक 49 (skanda.8.61.49)
हैमानि केचित् पद्मानि तद्रजोरुणमूर्त्तयः । बभञ्जुर्दानवा हृष्टा गता मन्दाकिनीं नदीम्
haimāni kecit padmāni tadrajoruṇamūrttayaḥ | babhañjurdānavā hṛṣṭā gatā mandākinīṁ nadīm
कुछ प्रसन्न दानव मंदाकिनी नदी में जाकर स्वर्ण-कमल तोड़ लाए, जिनके पराग से उनके अंग लाल हो गए।
श्लोक 50 (skanda.8.61.50)
आनिन्युः सैनिकाः केचिन्मन्दारकुसुमोत्करान् । फलान्याजह्रिरे केचित् स्वादूनि च बहूनि च
āninyuḥ sainikāḥ kecinmandārakusumotkarān | phalānyājahrire kecit svādūni ca bahūni ca
कुछ सैनिक मंदार-पुष्पों के ढेर ले आए, कुछ ने प्रचुर मधुर फल एकत्र किए।
श्लोक 51 (skanda.8.61.51)
तत्रोष्य रजनीमेकां भेरीराहत्य दानवाः । तेनैव विधिना यत्ताः प्रजग्मुरमरावतीम्
tatroṣya rajanīmekāṁ bherīrāhatya dānavāḥ | tenaiva vidhinā yattāḥ prajagmuramarāvatīm
वहाँ एक रात्रि निवास करके दानवों ने युद्ध-भेरी बजाई और उसी विधि से सुसज्जित होकर अमरावती की ओर प्रस्थान किया।
श्लोक 52 (skanda.8.61.52)
ततस्तूर्यनिनादेन गजानां बृंहितेन च । सिंहनादैश्च दैत्यानां चचालेवामरावती
tatastūryaninādena gajānāṁ bṛṁhitena ca | siṁhanādaiśca daityānāṁ cacālevāmarāvatī
तब तुरही की ध्वनि, हाथियों की चिंघाड़ तथा दैत्यों की सिंह-गर्जना से मानो अमरावती स्वयं काँप उठी।
श्लोक 53 (skanda.8.61.53)
अथ शून्यां समुद्वीक्ष्य पुरीं दानवसत्तमाः । इत्थमूचुः सुसंहृष्टा नदन्तो भैरवस्वनम्
atha śūnyāṁ samudvīkṣya purīṁ dānavasattamāḥ | itthamūcuḥ susaṁhṛṣṭā nadanto bhairavasvanam
फिर नगरी को शून्य देखकर श्रेष्ठ दानव अत्यंत हर्षित होकर भयंकर स्वर में गरजते हुए इस प्रकार बोले -
श्लोक 54 (skanda.8.61.54)
जयति विबुधशत्रुः सुन्ददैत्येन्द्रसिंहः । कठिनरुचिरबाहुः पीनविस्तीर्णवक्षाः । शतमखपुरजेता चारुपृथ्वायताक्षः । सजलघननिनादो मत्तनागेन्द्रगामी
jayati vibudhaśatruḥ sundadaityendrasiṁhaḥ | kaṭhinarucirabāhuḥ pīnavistīrṇavakṣāḥ | śatamakhapurajetā cārupṛthvāyatākṣaḥ | sajalaghananinādo mattanāgendragāmī
देवशत्रु, दानवेंद्रों में सिंह के समान सुंद की जय हो, जिसकी भुजाएँ कठोर और सुंदर हैं, वक्षस्थल चौड़ा और भरा हुआ है, जो इंद्रपुरी का विजेता है, जिसकी विशाल सुंदर आँखें हैं, जिसकी गर्जना जलभरे मेघ के समान है और जिसकी चाल मदमस्त गजराज के समान है!
श्लोक 55 (skanda.8.61.55)
तदनु जयति चारुप्रान्तरक्तायताक्षो । मृगपतिगतिलीलः संयुगेष्वप्रधृष्यः । त्रिदशवरविजेता दानवेन्द्रो निसुन्दः । प्रहतमुरजनादः पीनदीर्घोरुबाहुः
tadanu jayati cāruprāntaraktāyatākṣo | mṛgapatigatilīlaḥ saṁyugeṣvapradhṛṣyaḥ | tridaśavaravijetā dānavendro nisundaḥ | prahatamurajanādaḥ pīnadīrghorubāhuḥ
तत्पश्चात् उस दानवेंद्र निसुंद की जय हो, जिसकी बड़ी-बड़ी आँखों के किनारे सुंदर लाल हैं, जिसकी चाल सिंह की सी सुंदर लीलामय है, जो युद्धों में अजेय है, देवश्रेष्ठों का विजेता है, जिसकी भुजाएँ पुष्ट, लंबी और बड़ी हैं और जिसकी गर्जना युद्ध-मृदंग के समान है!