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अम्बिका खण्ड · अध्याय 62

शुंभ-निशुंभ का विजय

अध्याय 61अध्याय-सूचीअध्याय 63

श्लोक 1 (skanda.8.62.1)

सनत्कुमार उवाच । अथ निर्जित्य दैत्येन्द्रौ दिवं विक्रमशालिनौ । जग्मतुः सहितौ दैत्यैर्विन्ध्यं तुङ्गशिलोच्चयम्

sanatkumāra uvāca | atha nirjitya daityendrau divaṁ vikramaśālinau | jagmatuḥ sahitau daityairvindhyaṁ tuṅgaśiloccayam

सनत्कुमार ने कहा - तत्पश्चात् स्वर्ग को जीतकर वे दोनों पराक्रमी दैत्येंद्र दानवों के साथ ऊँची शिलाओं वाले विंध्य पर्वत की ओर चले गए।

श्लोक 2 (skanda.8.62.2)

संपूज्य विधिवद्दैत्यान् प्रस्थाप्य भ्रातरौ तदा । रेमाते विन्ध्यपादेषु फुल्लपादपसानुषु

saṁpūjya vidhivaddaityān prasthāpya bhrātarau tadā | remāte vindhyapādeṣu phullapādapasānuṣu

विधिपूर्वक दानवों का सम्मान करके उन्हें विदा करके, वे दोनों भाई विंध्य की तलहटी में, खिले हुए वृक्षों वाली चोटियों पर विहार करने लगे।

श्लोक 3 (skanda.8.62.3)

दैत्याभ्यामथ विज्ञाय ब्रह्मा सुरपराभवम् । विचिन्त्यैकमनाः सम्यग् वधोपायं तयोस्तदा

daityābhyāmatha vijñāya brahmā suraparābhavam | vicintyaikamanāḥ samyag vadhopāyaṁ tayostadā

तब उन दोनों दैत्यों के हाथों देवताओं की पराजय जानकर ब्रह्मा एकाग्रचित्त होकर उन दोनों के वध का उपाय भलीभाँति सोचने लगे।

श्लोक 4 (skanda.8.62.4)

तिलं तिलं समादाय रत्नेभ्यश्चारुदर्शनाम् । ससर्ज कमनीयाङ्गीमङ्गनां वल्गुनिस्वनाम्

tilaṁ tilaṁ samādāya ratnebhyaścārudarśanām | sasarja kamanīyāṅgīmaṅganāṁ valgunisvanām

उन्होंने रत्नों में से एक-एक कण लेकर सुंदर दर्शन वाली, मनोहर अंगों वाली, मधुर स्वर वाली एक स्त्री की रचना की।

श्लोक 5 (skanda.8.62.5)

तिलोत्तमेति तस्याश्च नाम चक्रे पितामहः । दिव्यानामपि सा स्त्रीणामुपमेव तदा बभौ

tilottameti tasyāśca nāma cakre pitāmahaḥ | divyānāmapi sā strīṇāmupameva tadā babhau

पितामह ने उसका नाम तिलोत्तमा रखा; वह उस समय दिव्य स्त्रियों के लिए भी मानो उपमा-स्वरूप शोभित हुई।

श्लोक 6 (skanda.8.62.6)

अतिसंपूर्णवक्त्रां तामतींदीवरलोचनाम् । अतिहंसस्वनालापामतिमत्तेभगामिनीम्

atisaṁpūrṇavaktrāṁ tāmatīṁdīvaralocanām | atihaṁsasvanālāpāmatimattebhagāminīm

उसका मुख अत्यंत पूर्ण था, नेत्र नीलकमल के समान, वाणी हंस के स्वर जैसी मधुर, और चाल मदमस्त गजराज के समान थी।

श्लोक 7 (skanda.8.62.7)

लक्ष्मीर्निरीक्ष्य सव्रीडा पङ्कजेनावृणोन्मुखम् । वपुर्भिश्चैव चार्वङ्ग्यास्त्रेपुरुद्यानदेवताः

lakṣmīrnirīkṣya savrīḍā paṅkajenāvṛṇonmukham | vapurbhiścaiva cārvaṅgyāstrepurudyānadevatāḥ

उसे देखकर लक्ष्मी ने लज्जित होकर अपना मुख कमल से ढक लिया, और त्रिपुर के उद्यानों की देवियाँ भी उस सुंदरांगी के शरीर-सौंदर्य से लज्जित हो गईं।

श्लोक 8 (skanda.8.62.8)

तामुत्पाद्य ततो धाता पाकशासनमब्रवीत् । शम्भुना मदनः पूर्वं निर्दग्धो लोचनाग्निना

tāmutpādya tato dhātā pākaśāsanamabravīt | śambhunā madanaḥ pūrvaṁ nirdagdho locanāgninā

उसकी रचना करके धाता ने इंद्र से कहा - 'पहले शंभु के नेत्राग्नि से मदन भस्म कर दिया गया था।'

श्लोक 9 (skanda.8.62.9)

तस्य प्रोद्भूतये याम सर्वे पार्श्व पिनाकिनः । तमाराध्य ततः कुर्म्मो यथा स्यान्मदनः पुनः

tasya prodbhūtaye yāma sarve pārśva pinākinaḥ | tamārādhya tataḥ kurmmo yathā syānmadanaḥ punaḥ

'हम सब उसके पुनर्जीवन के लिए पिनाकी के पास चलें; उन्हें प्रसन्न करके हम ऐसा करें कि मदन फिर से जीवित हो सके।'

श्लोक 10 (skanda.8.62.10)

अथ ते ब्रह्मणा सार्धं तया चासुरविद्विषः । जग्मुर्विन्ध्यगिरेः शृङ्गं यत्रास्ते भगवान् हरः

atha te brahmaṇā sārdhaṁ tayā cāsuravidviṣaḥ | jagmurvindhyagireḥ śṛṅgaṁ yatrāste bhagavān haraḥ

तब ब्रह्मा और उस असुर-शत्रु तिलोत्तमा के साथ वे सब विंध्य पर्वत के उस शिखर पर गए जहाँ भगवान् हर विराजमान थे।

श्लोक 11 (skanda.8.62.11)

तत्र शर्वमपश्यन्तो दध्युस्ते सुरसत्तमाः । गृणन्तः प्रणवं सर्वे शिवसन्यस्तचेतसः

tatra śarvamapaśyanto dadhyuste surasattamāḥ | gṛṇantaḥ praṇavaṁ sarve śivasanyastacetasaḥ

वहाँ शर्व को न देखकर श्रेष्ठ देवगण ध्यान करने लगे, सब प्रणव (ॐ) का उच्चारण करते हुए शिव में मन लगाए।

श्लोक 12 (skanda.8.62.12)

अथ लिङ्गं समुत्तस्थौ तेषां मध्ये दिवौकसाम् । सुसंहतं सुसंश्लिष्टं समूहस्तेजसामिव

atha liṅgaṁ samuttasthau teṣāṁ madhye divaukasām | susaṁhataṁ susaṁśliṣṭaṁ samūhastejasāmiva

तब उनके बीच एक लिंग प्रकट हुआ, घना और सुसंश्लिष्ट, मानो तेजों का समूह हो।

श्लोक 13 (skanda.8.62.13)

उच्चचार तदा तस्मादुच्चैर्वाग् विशदाक्षरा । निर्दग्धोयं मया पापस्तपस्विजनकण्टकः

uccacāra tadā tasmāduccairvāg viśadākṣarā | nirdagdhoyaṁ mayā pāpastapasvijanakaṇṭakaḥ

तब उससे ऊँची और स्पष्ट अक्षरों वाली वाणी निकली - 'तपस्वियों का यह कंटकरूप पापी मेरे द्वारा भस्म कर दिया गया है।'

श्लोक 14 (skanda.8.62.14)

युष्मदर्थे विमोक्ष्यामि कार्यं वोयं करिष्यति । करोतु परितश्चेयं मां प्रदक्षिणमङ्गना

yuṣmadarthe vimokṣyāmi kāryaṁ voyaṁ kariṣyati | karotu paritaśceyaṁ māṁ pradakṣiṇamaṅganā

'तुम्हारे लिए मैं उसे मुक्त करूँगा; तुम्हारा यह कार्य यह स्त्री पूर्ण करेगी - यह स्त्री मेरी परिक्रमा करे।'

श्लोक 15 (skanda.8.62.15)

एवमुक्ता महेशेन सा चकार प्रदक्षिणाम् । सन्निधायाञ्जलिं मूर्ध्नि रक्तेन्दीवरकोमलम्

evamuktā maheśena sā cakāra pradakṣiṇām | sannidhāyāñjaliṁ mūrdhni raktendīvarakomalam

महेश द्वारा ऐसा कहे जाने पर उसने परिक्रमा की, अपने मस्तक पर लाल कमल के समान कोमल अंजलि जोड़कर।

श्लोक 16 (skanda.8.62.16)

नेमे मूर्तिं तदा पूर्वां निस्ससार ततो मुखम् । त्र्यक्षं प्रसन्नबिम्बोष्ठममितद्युति कान्तिमत्

neme mūrtiṁ tadā pūrvāṁ nissasāra tato mukham | tryakṣaṁ prasannabimboṣṭhamamitadyuti kāntimat

उसने तब पूर्व मूर्ति को नमस्कार किया; उससे तीन नेत्रों वाला, प्रसन्न बिंबाधर वाला, अपरिमित कांतिमय मुख प्रकट हुआ।

श्लोक 17 (skanda.8.62.17)

अथ तेजो विनिःसृत्य वदनेन्दोः पिनाकिनः । तां विवेशाङ्गनामाशु शरद्भास्करभास्वरम्

atha tejo viniḥsṛtya vadanendoḥ pinākinaḥ | tāṁ viveśāṅganāmāśu śaradbhāskarabhāsvaram

तब पिनाकी के चंद्रमुख से शरद्-सूर्य के समान तेज निकलकर शीघ्र ही उस स्त्री में प्रवेश कर गया।

श्लोक 18 (skanda.8.62.18)

अथ सा दक्षिणां मूर्त्तिं प्रणेमे चारुदर्शना । निर्जगाम तदा दीप्तं मुखं सुरगुरोस्ततः

atha sā dakṣiṇāṁ mūrttiṁ praṇeme cārudarśanā | nirjagāma tadā dīptaṁ mukhaṁ suragurostataḥ

फिर उस सुंदरी ने दक्षिण मूर्ति को प्रणाम किया; उससे तब देवगुरु-रूप का दीप्तिमान मुख निकल आया।

श्लोक 19 (skanda.8.62.19)

वारिभारालसाम्भोदरुचिमद् भीमनिस्वनम् । करालदशशनोद्भासि दीप्तरक्तान्तलोचनम्

vāribhārālasāmbhodarucimad bhīmanisvanam | karāladaśaśanodbhāsi dīptaraktāntalocanam

जल-भार से आलसित मेघ के समान कांतिमान, भयंकर स्वर वाला, विकराल दाँतों से चमकता, जलते हुए लाल कोनों वाले नेत्रों से युक्त वह मुख था।

श्लोक 20 (skanda.8.62.20)

अत्यादित्यं ततस्तेजो मुखान्निःसृत्य दक्षिणात् । दृश्यमानं सुरैस्सर्वैर्विवेश प्रमदोत्तमाम्

atyādityaṁ tatastejo mukhānniḥsṛtya dakṣiṇāt | dṛśyamānaṁ suraissarvairviveśa pramadottamām

तब सूर्य से भी अधिक तेज उस दक्षिण मुख से निकलकर, सभी देवताओं के देखते हुए, उस श्रेष्ठ स्त्री में प्रविष्ट हो गया।

श्लोक 21 (skanda.8.62.21)

प्रणेमे सा ततस्तस्य पश्चिमां मूर्त्तिमञ्जसा

praṇeme sā tatastasya paścimāṁ mūrttimañjasā

तब उसने तुरंत उनके पश्चिम मुख को नमस्कार किया।

श्लोक 22 (skanda.8.62.22)

निश्चक्राम ततस्तस्या मुखं त्र्यक्षमनुत्तमम्

niścakrāma tatastasyā mukhaṁ tryakṣamanuttamam

तब उससे तीन नेत्रों वाला अनुपम मुख निकला।

श्लोक 23 (skanda.8.62.23)

ततस्तेजो विनिःसृत्य मुखेन्दोर्मदनद्विषः । दीप्यमानं विवेशाशु तामेव प्रमदोत्तमाम्

tatastejo viniḥsṛtya mukhendormadanadviṣaḥ | dīpyamānaṁ viveśāśu tāmeva pramadottamām

तब मदन-शत्रु के चंद्रमुख से दीप्तिमान तेज निकलकर शीघ्र ही उसी श्रेष्ठ स्त्री में प्रविष्ट हो गया।

श्लोक 24 (skanda.8.62.24)

उत्तरां मूतिमागत्य प्रणेमे सा कृताञ्जलिः । तस्या मुखं सुसंपूर्णं सुप्रसन्नं विनिर्ययौ

uttarāṁ mūtimāgatya praṇeme sā kṛtāñjaliḥ | tasyā mukhaṁ susaṁpūrṇaṁ suprasannaṁ viniryayau

उत्तर मूर्ति के पास आकर उसने अंजलि जोड़कर प्रणाम किया; उससे अत्यंत पूर्ण, अत्यंत प्रसन्न मुख निकला।

श्लोक 25 (skanda.8.62.25)

तस्मात्तेजो विनिःसृत्य सूर्यदीप्तानलप्रभम् । विवेश प्रमदामाशु तामेव वरवर्णिनीम्

tasmāttejo viniḥsṛtya sūryadīptānalaprabham | viveśa pramadāmāśu tāmeva varavarṇinīm

उससे सूर्य के समान प्रदीप्त अग्नि की-सी प्रभा वाला तेज निकलकर शीघ्र उसी सुंदरी में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 26 (skanda.8.62.26)

मुखानि देवदेवस्य सुराणामर्थसिद्धये । चत्वारि निर्ययुर्दिक्षु न तस्या रूपविस्मयात्

mukhāni devadevasya surāṇāmarthasiddhaye | catvāri niryayurdikṣu na tasyā rūpavismayāt

इस प्रकार देवताओं के प्रयोजन-सिद्धि के लिए देवदेव के चार मुख दिशाओं में निकले, न कि केवल उसके रूप के विस्मय से।

श्लोक 27 (skanda.8.62.27)

आत्मसंस्थं पुरा तेजो दग्ध्वा यन्मदनं कृतम् । अनुजग्राह देवेशस्तेन तां प्रमदोत्तमाम्

ātmasaṁsthaṁ purā tejo dagdhvā yanmadanaṁ kṛtam | anujagrāha deveśastena tāṁ pramadottamām

जिस तेज से पहले उन्होंने अपने भीतर स्थित रहकर मदन को भस्म किया था, उसी तेज से देवेश ने उस श्रेष्ठ स्त्री का अनुग्रह किया।

श्लोक 28 (skanda.8.62.28)

अब्रवीच्च सुरान् सर्वाँस्तत्रेदं वचनं शिवः । यस्मादियं मां युष्मांश्च मण्डलेन प्रदक्षिणम्

abravīcca surān sarvā~statredaṁ vacanaṁ śivaḥ | yasmādiyaṁ māṁ yuṣmāṁśca maṇḍalena pradakṣiṇam

और शिव ने वहाँ सब देवताओं से यह वचन कहा - 'चूँकि इसने मुझे और तुम सबको मंडल बनाकर परिक्रमा किया है,'

श्लोक 29 (skanda.8.62.29)

चक्रे सर्वान् सुरश्रेष्ठाः स्थानं तस्मादिदं मम । भविष्यति गिरौ विन्ध्ये मण्डलेश्वरसंज्ञितम्

cakre sarvān suraśreṣṭhāḥ sthānaṁ tasmādidaṁ mama | bhaviṣyati girau vindhye maṇḍaleśvarasaṁjñitam

'-इसलिए, हे श्रेष्ठ देवगण, विंध्य पर्वत पर मेरा यह स्थान मंडलेश्वर नाम से जाना जाएगा।'

श्लोक 30 (skanda.8.62.30)

मंडलेश्वरमेतच्च यः करोति प्रदाक्षिणम् । प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा मही भवेत् । सान्निध्यं सर्वदा ह्यस्मिन् करिष्यामि वरप्रदः

maṁḍaleśvarametacca yaḥ karoti pradākṣiṇam | pradakṣiṇīkṛtā tena saptadvīpā mahī bhavet | sānnidhyaṁ sarvadā hyasmin kariṣyāmi varapradaḥ

'जो कोई इस मंडलेश्वर की परिक्रमा करेगा, उसके द्वारा सप्तद्वीपा पृथ्वी की परिक्रमा हो जाएगी; और मैं, वरदाता, यहाँ सदा अपनी सन्निधि रखूँगा।'

श्लोक 31 (skanda.8.62.31)

मण्डलेश्वरमीशानं दृष्टवा तु प्रयतो नरः । अश्वमेधफलं प्राप्य मम लोकमवाप्स्यति

maṇḍaleśvaramīśānaṁ dṛṣṭavā tu prayato naraḥ | aśvamedhaphalaṁ prāpya mama lokamavāpsyati

'जो संयमी पुरुष मंडलेश्वर रूप ईशान का दर्शन करेगा, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाकर मेरे लोक को प्राप्त होगा।'

श्लोक 32 (skanda.8.62.32)

नैकसिद्धसमाकीर्णं किन्नरोरगसेवितम् । युष्माभिः सर्वदा युक्तं भविष्यति मम प्रियम्

naikasiddhasamākīrṇaṁ kinnaroragasevitam | yuṣmābhiḥ sarvadā yuktaṁ bhaviṣyati mama priyam

'अनेक सिद्धों से भरा, किन्नरों और नागों से सेवित, तुम देवताओं से सदा युक्त रहने वाला यह स्थान मुझे प्रिय होगा।'

श्लोक 33 (skanda.8.62.33)

एषा तिलोत्तमा चैव यदर्थं सुरसत्तमाः । सृष्टा युष्माभिरव्यग्रा तद्वः कार्यं करिष्यति

eṣā tilottamā caiva yadarthaṁ surasattamāḥ | sṛṣṭā yuṣmābhiravyagrā tadvaḥ kāryaṁ kariṣyati

'और यह तिलोत्तमा, हे श्रेष्ठ देवगण, जिस प्रयोजन से तुमने इसे रचा है, वह निश्चिंत होकर तुम्हारा वह कार्य पूर्ण करेगी।'

श्लोक 34 (skanda.8.62.34)

एतामवेक्ष्य तौ दैत्यौ मोहितौ मदनार्दितौ । अन्योन्यं यास्यतो नाशमेषा चैव भविष्यति

etāmavekṣya tau daityau mohitau madanārditau | anyonyaṁ yāsyato nāśameṣā caiva bhaviṣyati

'इसे देखकर वे दोनों दैत्य मोहित और काम-पीड़ित होकर परस्पर विनाश को प्राप्त होंगे - यह अवश्य होगा।'

श्लोक 35 (skanda.8.62.35)

अजरा चामरा चैव सर्वाप्सरवरा शुभा । पूज्या चेह सदा स्थाने वन्द्या चैव भविष्यति

ajarā cāmarā caiva sarvāpsaravarā śubhā | pūjyā ceha sadā sthāne vandyā caiva bhaviṣyati

'और वह अजर-अमर, समस्त अप्सराओं में श्रेष्ठ और शुभ होगी, तथा इस स्थान में सदा पूजनीय और वंदनीय होगी।'

श्लोक 36 (skanda.8.62.36)

सनत्कुमार उवाच । एवमुक्ते महेशेन सुराः सुप्रीतचेतसः । तां स्त्रियं प्रेषयामासुर्वधार्थं दैत्ययोस्तदा

sanatkumāra uvāca | evamukte maheśena surāḥ suprītacetasaḥ | tāṁ striyaṁ preṣayāmāsurvadhārthaṁ daityayostadā

सनत्कुमार ने कहा - महेश के ऐसा कहने पर देवगण अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर उस स्त्री को उन दोनों दैत्यों के वध के लिए भेज दिया।

श्लोक 37 (skanda.8.62.37)

सहायान् प्रददौ चास्यै ब्रह्मा कमलवाहनः । क्रोधं दर्पमृतूत्सर्वान् मात्सर्यं मदमेव चः

sahāyān pradadau cāsyai brahmā kamalavāhanaḥ | krodhaṁ darpamṛtūtsarvān mātsaryaṁ madameva caḥ

कमल पर विराजने वाले ब्रह्मा ने उसे सहायकों के रूप में क्रोध, दर्प, समस्त ऋतुएँ, मात्सर्य और मद प्रदान किए।

श्लोक 38 (skanda.8.62.38)

कालं मृत्युं च मोहञ्च विषादञ्चामितद्युतिः । अथ संप्रेषयित्वा तु देवतास्तां तिलोत्तमाम्

kālaṁ mṛtyuṁ ca mohañca viṣādañcāmitadyutiḥ | atha saṁpreṣayitvā tu devatāstāṁ tilottamām

उस अपरिमित तेजस्वी ने काल, मृत्यु, मोह और विषाद भी दिए। इस प्रकार तिलोत्तमा को भेजकर,

श्लोक 39 (skanda.8.62.39)

आत्मानं पिण्डयामासुर्देवास्ते सर्व एव हि । कः कः कतम आयात इहाद्येति सुरर्षभाः

ātmānaṁ piṇḍayāmāsurdevāste sarva eva hi | kaḥ kaḥ katama āyāta ihādyeti surarṣabhāḥ

वे सभी देवता अपने आपको एक पिंड के रूप में एकत्रित करने लगे; श्रेष्ठ देवगण पूछने लगे - 'कौन, कौन यहाँ आज आया है?'

श्लोक 40 (skanda.8.62.40)

ततो मध्ये स्थितं नत्वा भूयस्ते परमेश्वरम् । पिण्ड्यमानेषु देवेषु यस्मान्मध्ये समास्थितः

tato madhye sthitaṁ natvā bhūyaste parameśvaram | piṇḍyamāneṣu deveṣu yasmānmadhye samāsthitaḥ

तब उन्होंने पुनः बीच में स्थित परमेश्वर को नमस्कार किया; चूँकि देवताओं के पिंडीभूत होने पर वे बीच में ही स्थित रहे,

श्लोक 41 (skanda.8.62.41)

पिण्डारेश्वर इत्येव तत्रासावभवत्ततः । पिण्डारेश्वरमीशानं दृष्ट्वा भक्त्या तु मानवः

piṇḍāreśvara ityeva tatrāsāvabhavattataḥ | piṇḍāreśvaramīśānaṁ dṛṣṭvā bhaktyā tu mānavaḥ

इसलिए वे वहाँ पिंडारेश्वर कहलाए। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक पिंडारेश्वर रूप ईशान का दर्शन करता है,

श्लोक 42 (skanda.8.62.42)

सर्वाशुभविनिर्मुक्तो देहभेदे गणो भवेत् । पृथिव्यां यानि लिङ्गानि चतुर्मुखायतनानि च

sarvāśubhavinirmukto dehabhede gaṇo bhavet | pṛthivyāṁ yāni liṅgāni caturmukhāyatanāni ca

वह समस्त अशुभ से मुक्त होकर देह त्यागने पर गण बन जाता है। पृथ्वी पर जितने भी लिंग और चतुर्मुख मंदिर हैं,

श्लोक 43 (skanda.8.62.43)

तानि सर्वाणि दृश्यानि इदं दृष्ट्वा भवन्ति हि । ततस्ता देवताः सर्वाः कृत्वा कार्यमतन्द्रिताः

tāni sarvāṇi dṛśyāni idaṁ dṛṣṭvā bhavanti hi | tatastā devatāḥ sarvāḥ kṛtvā kāryamatandritāḥ

उन सबका दर्शन इसके दर्शन से ही हो जाता है। तब वे सभी देवता अपना कार्य पूर्ण करके, बिना आलस्य के,

श्लोक 44 (skanda.8.62.44)

प्रणम्य परमेशानं स्वानि सद्मानि भेजिरे । सापि चारुमुखापाङ्गी पीनोन्नतपयोधरा

praṇamya parameśānaṁ svāni sadmāni bhejire | sāpi cārumukhāpāṅgī pīnonnatapayodharā

परमेश्वर को प्रणाम करके अपने-अपने धामों को चली गईं। वह भी, सुंदर मुख और चितवन वाली, पुष्ट-उन्नत स्तनों वाली,

श्लोक 45 (skanda.8.62.45)

आक्षिपन्तीव चेतांसि सुराणां विभ्रमैस्तदा । प्रतस्थे दक्षिणामाशामासाते यत्र दानवौ

ākṣipantīva cetāṁsi surāṇāṁ vibhramaistadā | pratasthe dakṣiṇāmāśāmāsāte yatra dānavau

अपने हाव-भाव से मानो देवताओं के मन को खींचती हुई, उस दक्षिण दिशा की ओर चल पड़ी जहाँ वे दोनों दानव थे।

श्लोक 46 (skanda.8.62.46)

विन्ध्यपादेषु रम्येषु विहगोद्गीतसानुषु । भ्रमन्तावथ दैत्येन्द्रौ स्थितां ददृशतुस्तु ताम्

vindhyapādeṣu ramyeṣu vihagodgītasānuṣu | bhramantāvatha daityendrau sthitāṁ dadṛśatustu tām

विंध्य की उन रमणीय तलहटियों में, जहाँ पक्षी चोटियों पर गा रहे थे, विचरण करते हुए उन दोनों दैत्येंद्रों ने उसे खड़ी हुई देखा।

श्लोक 47 (skanda.8.62.47)

अशोकशाखामुत्फुल्लामालम्ब्योन्मत्तषट्पदाम् । वसानामंशुकं चित्रमाबद्ध मणिमेखलाम्

aśokaśākhāmutphullāmālambyonmattaṣaṭpadām | vasānāmaṁśukaṁ citramābaddha maṇimekhalām

वह खिली हुई अशोक की डाल का सहारा लिए, जिस पर मतवाले भौंरे मँडरा रहे थे, चित्र-विचित्र वस्त्र पहने, मणि-मेखला बाँधे हुए,

श्लोक 48 (skanda.8.62.48)

गायन्तीं मधुरं रक्तं समं कलमनाकुलम् । तारमन्द्रातितारैश्च स्वरैः सम्यगलंकृतम्

gāyantīṁ madhuraṁ raktaṁ samaṁ kalamanākulam | tāramandrātitāraiśca svaraiḥ samyagalaṁkṛtam

मधुर, अनुरागपूर्ण, सम, कोमल और अव्याकुल स्वर में गाती हुई, तार, मंद्र और अतितार स्वरों से सुसज्जित।

श्लोक 49 (skanda.8.62.49)

साक्षादिव तपःसिद्धिं श्रियं मूर्त्तिमतीमिव । प्राप्तामिव रतिं साक्षात् कान्तिं चान्द्रमसीमिव

sākṣādiva tapaḥsiddhiṁ śriyaṁ mūrttimatīmiva | prāptāmiva ratiṁ sākṣāt kāntiṁ cāndramasīmiva

वह मानो साक्षात् तपःसिद्धि हो, मूर्तिमती श्री हो, साक्षात् प्राप्त हुई रति हो, चंद्रमा की कांति के समान हो।

श्लोक 50 (skanda.8.62.50)

ममैवेयं ममैवेय मिति तौ दानवोत्तमौ । अभिसृत्य तु तौ देवीं पाण्योर्जगृहतुः समम्

mamaiveyaṁ mamaiveya miti tau dānavottamau | abhisṛtya tu tau devīṁ pāṇyorjagṛhatuḥ samam

'यह मेरी है, यह मेरी है' - ऐसा कहते हुए वे दोनों श्रेष्ठ दानव उस देवी के पास दौड़कर एक साथ उसके दोनों हाथ पकड़ बैठे।

श्लोक 51 (skanda.8.62.51)

अथ दर्पमदक्रोधमात्सर्याविष्टचेतसौ । तौ चुक्रुधतुरत्यर्थमन्योन्यस्यासुरोत्तमौ

atha darpamadakrodhamātsaryāviṣṭacetasau | tau cukrudhaturatyarthamanyonyasyāsurottamau

तब दर्प, मद, क्रोध और मात्सर्य से आविष्ट होकर वे दोनों श्रेष्ठ असुर परस्पर अत्यंत क्रुद्ध हो गए।

श्लोक 52 (skanda.8.62.52)

तयोर्गदेन्तकः कालो मृत्युश्चाविविशुर्द्रुतम् । प्रगृह्याथ गदे क्रुद्धावन्योन्यमभिजघ्नतुः

tayorgadentakaḥ kālo mṛtyuścāviviśurdrutam | pragṛhyātha gade kruddhāvanyonyamabhijaghnatuḥ

अंतक, काल और मृत्यु शीघ्र ही उनकी गदाओं में प्रविष्ट हो गए; तब क्रुद्ध होकर गदाएँ उठाकर वे परस्पर प्रहार करने लगे।

श्लोक 53 (skanda.8.62.53)

अथैकैकेन तौ तत्र प्रहारेणाभिताडितौ । विषण्णौ भिन्नसर्वाङ्गौ शिवशापविमोहितौ

athaikaikena tau tatra prahāreṇābhitāḍitau | viṣaṇṇau bhinnasarvāṅgau śivaśāpavimohitau

वहाँ एक-एक प्रहार से आहत होकर, शिव के शाप से मोहित, वे विषण्ण और सर्वांग-विदीर्ण हो गए।

श्लोक 54 (skanda.8.62.54)

विसंज्ञौ पतितौ भूमौ छिन्नमूलाविव द्रुमौ । अथ निर्ययतुस्तत्र कामोपहतचेतसौ

visaṁjñau patitau bhūmau chinnamūlāviva drumau | atha niryayatustatra kāmopahatacetasau

वे मूर्च्छित होकर उसी प्रकार भूमि पर गिर पड़े जैसे जड़ से कटे हुए वृक्ष। तब काम से आहत-चित्त उन दोनों में से,

श्लोक 55 (skanda.8.62.55)

आत्मानौ सह शुक्रेण तयोर्दानवमुख्ययोः । तौ तदा निर्गतौ तत्र तयोर्जीवौ दुरात्मनोः

ātmānau saha śukreṇa tayordānavamukhyayoḥ | tau tadā nirgatau tatra tayorjīvau durātmanoḥ

उन दोनों दुरात्मा दानव-प्रमुखों की आत्माएँ शुक्र सहित तथा उनके दोनों जीव वहाँ से निकल पड़े।

श्लोक 56 (skanda.8.62.56)

बलिनौ चारुसर्वाङ्गौ बालावाशु बभूवतुः । एकस्तत्राब्रवीद्बालः शुंभोहं द्विषतामिति

balinau cārusarvāṅgau bālāvāśu babhūvatuḥ | ekastatrābravīdbālaḥ śuṁbhohaṁ dviṣatāmiti

वे शीघ्र ही दो बलवान्, सुंदर सर्वांग वाले बालक बन गए। वहाँ एक बालक ने कहा - 'मैं शत्रुओं के लिए शुंभ हूँ।'

श्लोक 57 (skanda.8.62.57)

निशुंभोप्यहमन्यस्तु बालस्तत्रावदत्तदा । अथ विन्ध्यः समासाद्य बालौ तावमितद्युती

niśuṁbhopyahamanyastu bālastatrāvadattadā | atha vindhyaḥ samāsādya bālau tāvamitadyutī

'और मैं दूसरा निशुंभ हूँ' - ऐसा दूसरे बालक ने कहा। तब विंध्य ने उन अपरिमित तेजस्वी दोनों बालकों के पास आकर,

श्लोक 58 (skanda.8.62.58)

आदिदेशात्मनः पत्नीं पाहि त्वं बालकाविति । ववृधातेथ तौ तत्र दानवेन्द्रसुतावुभौ

ādideśātmanaḥ patnīṁ pāhi tvaṁ bālakāviti | vavṛdhātetha tau tatra dānavendrasutāvubhau

अपनी पत्नी को आदेश दिया - 'तुम इन बालकों की रक्षा करो।' तब वे दोनों दानवेंद्र-पुत्र वहाँ बड़े होने लगे,

श्लोक 59 (skanda.8.62.59)

कृष्णपक्षक्षये यद्वद् युगपच्छशिसागरौ । बुद्ध्वा तौ च तदा जन्म दानवाभ्यामरिन्दमौ

kṛṣṇapakṣakṣaye yadvad yugapacchaśisāgarau | buddhvā tau ca tadā janma dānavābhyāmarindamau

जैसे कृष्णपक्ष के क्षय होने पर चंद्रमा और समुद्र साथ-साथ बढ़ते हैं। और वे दोनों शत्रुदमन, दानवों से अपने जन्म का वृत्तांत जानकर,

श्लोक 60 (skanda.8.62.60)

तपश्चेरतुरत्युग्रं पर्णाम्बुपवनाशनौ । तपसाराधितस्ताभ्यां तत्रागत्याब्रवीत्प्रभुः

tapaśceraturatyugraṁ parṇāmbupavanāśanau | tapasārādhitastābhyāṁ tatrāgatyābravītprabhuḥ

अत्यंत उग्र तपस्या करने लगे, केवल पत्ते, जल और वायु पर निर्वाह करते हुए। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर प्रभु वहाँ आकर बोले -

श्लोक 61 (skanda.8.62.61)

तुष्टास्मि युवयोः पुत्रौ वरं किं ५ वा ददान्यहम् । वव्राते तौ वरं वीरावजय्या वध्यतां सदा

tuṣṭāsmi yuvayoḥ putrau varaṁ kiṁ 5 vā dadānyaham | vavrāte tau varaṁ vīrāvajayyā vadhyatāṁ sadā

'हे पुत्रो, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ; मैं तुम्हें क्या वर दूँ?' उन दोनों वीरों ने वर माँगा कि वे सदा अजेय और अवध्य रहें।

श्लोक 62 (skanda.8.62.62)

प्रार्थनां तां तयोः श्रुत्वा प्रत्युवाच पितामहः । अवश्यं पुत्रयोरेष्यं मरणं येनकेनचित्

prārthanāṁ tāṁ tayoḥ śrutvā pratyuvāca pitāmahaḥ | avaśyaṁ putrayoreṣyaṁ maraṇaṁ yenakenacit

उनकी उस प्रार्थना को सुनकर पितामह ने उत्तर दिया - 'हे पुत्रो, तुम्हें किसी न किसी रूप में मृत्यु अवश्य आएगी।'

श्लोक 63 (skanda.8.62.63)

सुरेभ्योन्यत्र दैत्येन्द्रावमरत्वं न विद्यते । इत्युक्तवन्तं ब्रह्माणं वव्राते दानवौ वरम्

surebhyonyatra daityendrāvamaratvaṁ na vidyate | ityuktavantaṁ brahmāṇaṁ vavrāte dānavau varam

'हे दैत्येंद्रो, देवताओं के अतिरिक्त किसी से अमरत्व संभव नहीं है।' ऐसा कहने वाले ब्रह्मा से उन दोनों दानवों ने एक और वर माँगा -

श्लोक 64 (skanda.8.62.64)

उभावपि सुनिश्चित्य संप्रहृष्टतनूरुहौ । जगन्मातुश्च या कन्या विना तस्याः पितामह

ubhāvapi suniścitya saṁprahṛṣṭatanūruhau | jaganmātuśca yā kanyā vinā tasyāḥ pitāmaha

दोनों ने भलीभाँति निश्चय करके, रोमांचित होकर कहा - 'हे पितामह, जगन्माता जो कन्या है, उसके अतिरिक्त,'

श्लोक 65 (skanda.8.62.65)

मा भूतामावयोर्देव सदा मृत्युपराजयौ । एवमस्त्विति तौ प्रोच्य दैत्येन्द्रतनयावुभौ

mā bhūtāmāvayordeva sadā mṛtyuparājayau | evamastviti tau procya daityendratanayāvubhau

'हे देव, हम दोनों की मृत्यु और पराजय कभी न हो।' 'ऐसा ही हो' कहकर उन दोनों दैत्येंद्र-पुत्रों से,

श्लोक 66 (skanda.8.62.66)

विश्वस्य जगतः स्रष्टा तत्रैवान्तरधीयत । अथ तौ तपसस्तीव्राद्विरम्य कृतमङ्गलौ

viśvasya jagataḥ sraṣṭā tatraivāntaradhīyata | atha tau tapasastīvrādviramya kṛtamaṅgalau

समस्त विश्व के स्रष्टा वहीं अंतर्धान हो गए। तब वे दोनों उस उग्र तपस्या से विरत होकर, मंगल-कृत्य करके,

श्लोक 67 (skanda.8.62.67)

मौलिनौ बद्धकवचौ हाराङ्गदविभूषितौ । हरिचन्दनदिग्धाङ्गौ पीतकौशेयवाससौ

maulinau baddhakavacau hārāṅgadavibhūṣitau | haricandanadigdhāṅgau pītakauśeyavāsasau

मुकुट धारण किए, कवच बाँधे, हार-बाजूबंद से सुशोभित, चंदन से लिप्त अंग, पीत रेशमी वस्त्र पहने हुए,

श्लोक 68 (skanda.8.62.68)

विन्ध्यप्रस्थेषु रम्येषु चेरतुर्दानवोत्तमौ । पितामहाद् वरप्राप्तिं श्रुत्वा शुंभनिशुंभयोः

vindhyaprastheṣu ramyeṣu ceraturdānavottamau | pitāmahād varaprāptiṁ śrutvā śuṁbhaniśuṁbhayoḥ

उन दोनों श्रेष्ठ दानवों ने विंध्य के रमणीय पठारों पर विचरण किया। शुंभ-निशुंभ द्वारा पितामह से वर प्राप्ति का समाचार सुनकर,

श्लोक 69 (skanda.8.62.69)

आजग्मुर्दानवा हृष्टाः पातालतलवासिनः । शंभुर्मयो घनः केशिर्नरको नमुचिर्द्रुमः

ājagmurdānavā hṛṣṭāḥ pātālatalavāsinaḥ | śaṁbhurmayo ghanaḥ keśirnarako namucirdrumaḥ

पाताल-तल में रहने वाले दानव प्रसन्न होकर आए - शंभु, मय, घन, केशी, नरक, नमुचि, द्रुम,

श्लोक 70 (skanda.8.62.70)

अन्ये च कोटिशो दृप्ता हतशेषाः सुरद्विषः । विन्ध्यप्रस्थे निषेदुस्ते समेताः सर्वदानवाः

anye ca koṭiśo dṛptā hataśeṣāḥ suradviṣaḥ | vindhyaprasthe niṣeduste sametāḥ sarvadānavāḥ

और अन्य करोड़ों अभिमानी, पूर्व-युद्धों से बचे हुए देव-शत्रु भी आए। वे सभी दानव मिलकर विंध्य के पठार पर बैठ गए।

श्लोक 71 (skanda.8.62.71)

नानाद्रुमलतागुल्मविकीर्णकुसुमोत्करे । धन्विनो बद्धनिस्त्रिंशाश्चित्राभरणभूषिताः

nānādrumalatāgulmavikīrṇakusumotkare | dhanvino baddhanistriṁśāścitrābharaṇabhūṣitāḥ

अनेक वृक्षों, लताओं और झाड़ियों के बिखरे फूलों वाले उस स्थान में, धनुर्धारी, तलवारें बाँधे, विचित्र आभूषणों से सुसज्जित,

श्लोक 72 (skanda.8.62.72)

सेन्द्रचापास्तडित्वन्तो नभसीव बलाहकाः । अथोवाच मयस्तत्र दानवो दानवोत्तमौ

sendracāpāstaḍitvanto nabhasīva balāhakāḥ | athovāca mayastatra dānavo dānavottamau

वे इंद्रधनुष और बिजली से युक्त आकाश के मेघों के समान शोभित हुए। तब वहाँ मय नामक दानव ने उन दोनों श्रेष्ठ दानवों से कहा -

श्लोक 73 (skanda.8.62.73)

पितृभ्यां युवयोर्भुक्तं त्रैलोक्यमखिलं पुरा । युवाभ्यामधुना दैत्यो कस्मान्नादीयते पुनः

pitṛbhyāṁ yuvayorbhuktaṁ trailokyamakhilaṁ purā | yuvābhyāmadhunā daityo kasmānnādīyate punaḥ

'तुम्हारे पिताओं द्वारा पहले संपूर्ण त्रैलोक्य भोगा गया था। हे दैत्यो, अब तुम दोनों द्वारा वह फिर से क्यों नहीं प्राप्त किया जाता?'

श्लोक 74 (skanda.8.62.74)

समेतानमरान् सर्वान्निर्जित्य रणमूर्धनि । ये सहाया हि वां पित्रो र्बभूवुः सुरविद्विषः

sametānamarān sarvānnirjitya raṇamūrdhani | ye sahāyā hi vāṁ pitro rbabhūvuḥ suravidviṣaḥ

'रणभूमि के शिखर पर समस्त एकत्रित देवताओं को जीतकर - वे ही देव-शत्रु जो तुम्हारे पिताओं के सहायक थे,'

श्लोक 75 (skanda.8.62.75)

त एवामी बलोन्मत्ताः सहाया युवयोर्युधि । इत्युक्तवति दैत्येन्द्रे मये शुम्भो महासुरः

ta evāmī balonmattāḥ sahāyā yuvayoryudhi | ityuktavati daityendre maye śumbho mahāsuraḥ

'-वे ही, बल से उन्मत्त, युद्ध में तुम दोनों के भी सहायक हैं।' दैत्येंद्र मय के ऐसा कहने पर महाअसुर शुंभ ने,

श्लोक 76 (skanda.8.62.76)

निशुम्भस्य मुखं प्रेक्ष्य वाक्यमित्थं तदाब्रवीत् । भूर्लोकमखिलं दैत्या युष्माभिः सह सांप्रतम्

niśumbhasya mukhaṁ prekṣya vākyamitthaṁ tadābravīt | bhūrlokamakhilaṁ daityā yuṣmābhiḥ saha sāṁpratam

निशुंभ के मुख की ओर देखकर तब यह वचन कहा - 'हे दैत्यो, तुम सबके साथ अब हम'

श्लोक 77 (skanda.8.62.77)

संविभज्य सुरान्सर्वाञ्जेष्यामो रणमूर्धनि । जम्बूद्वीपं स्वयं सोथ जग्राहासुरसत्तमः

saṁvibhajya surānsarvāñjeṣyāmo raṇamūrdhani | jambūdvīpaṁ svayaṁ sotha jagrāhāsurasattamaḥ

'-रणभूमि के शिखर पर समस्त देवताओं को जीतकर [पृथ्वी] का विभाजन करेंगे।' तब उस श्रेष्ठ असुर ने स्वयं जंबूद्वीप ले लिया,

श्लोक 78 (skanda.8.62.78)

शाकद्वीपं निशुम्भाय ददौ भ्रात्रे कनीयसे । शाल्मलिद्वीपगोमेदौ दानवेभ्यो ददौ प्रभुः

śākadvīpaṁ niśumbhāya dadau bhrātre kanīyase | śālmalidvīpagomedau dānavebhyo dadau prabhuḥ

और शाकद्वीप अपने छोटे भाई निशुंभ को दे दिया। प्रभु ने शाल्मलिद्वीप और गोमेद अन्य दानवों को दिए,

श्लोक 79 (skanda.8.62.79)

क्रौञ्चद्वीपकुशद्वीपौ दैत्येभ्यः प्रददौ च सः । दैत्येन्द्रः पुष्करद्वीपं भार्गवाय न्यवेदयत्

krauñcadvīpakuśadvīpau daityebhyaḥ pradadau ca saḥ | daityendraḥ puṣkaradvīpaṁ bhārgavāya nyavedayat

और क्रौंचद्वीप तथा कुशद्वीप दैत्यों को दिए। दैत्येंद्र ने पुष्करद्वीप भार्गव (शुक्राचार्य) को सौंप दिया।

श्लोक 80 (skanda.8.62.80)

एवं प्रतिविभज्याशु भूर्लोकमखिलं तदा । इज्याञ्जलिनमस्कारान् यज्ञान् सर्वाश्च सत्क्रियाः

evaṁ prativibhajyāśu bhūrlokamakhilaṁ tadā | ijyāñjalinamaskārān yajñān sarvāśca satkriyāḥ

इस प्रकार संपूर्ण भूलोक को शीघ्र आपस में बाँटकर, तब पूजा, अंजलि, नमस्कार, यज्ञ और समस्त सत्कर्मों को,

श्लोक 81 (skanda.8.62.81)

आच्छिद्य दैवतेभ्यस्ते जगृहुर्दैत्यदानवाः । बभूवाथ ततो यज्ञः कश्यपस्य महात्मनः

ācchidya daivatebhyaste jagṛhurdaityadānavāḥ | babhūvātha tato yajñaḥ kaśyapasya mahātmanaḥ

देवताओं से छीनकर दैत्य-दानवों ने ले लिया। तत्पश्चात् महात्मा कश्यप का एक यज्ञ हुआ।

श्लोक 82 (skanda.8.62.82)

आगत्य तं तदा यज्ञं ममृदुः सुरशत्रवः । आधिपत्यं हि नः कृत्स्ने भूर्लोके कश्यपाधुना

āgatya taṁ tadā yajñaṁ mamṛduḥ suraśatravaḥ | ādhipatyaṁ hi naḥ kṛtsne bhūrloke kaśyapādhunā

उस यज्ञ में आकर देव-शत्रुओं ने उसे रौंद डाला - 'हे कश्यप, अब संपूर्ण भूलोक पर हमारा आधिपत्य है;'

श्लोक 83 (skanda.8.62.83)

सर्वावस्थासु यज्ञेस्मिन्नस्मान् त्वं यष्टुमर्हसि । एवमुक्तस्ततो दैत्यैर्मारीचः कश्यपस्तदा

sarvāvasthāsu yajñesminnasmān tvaṁ yaṣṭumarhasi | evamuktastato daityairmārīcaḥ kaśyapastadā

'-इस यज्ञ की सभी अवस्थाओं में तुम्हें हमारी पूजा करनी होगी।' दैत्यों द्वारा ऐसा कहे जाने पर मरीचि-पुत्र कश्यप ने तब,

श्लोक 84 (skanda.8.62.84)

गम्भीरमर्थवद्वाक्यमुवाचेत्थं स्मयन्निव । त्रैलोक्यमात्मनः कृत्वा जित्वा सर्वामरान् रणे

gambhīramarthavadvākyamuvācetthaṁ smayanniva | trailokyamātmanaḥ kṛtvā jitvā sarvāmarān raṇe

मुस्कुराते हुए-से यह गंभीर और अर्थपूर्ण वचन कहा - 'युद्ध में समस्त देवताओं को जीतकर तथा त्रैलोक्य को अपना बनाकर,'

श्लोक 85 (skanda.8.62.85)

यज्ञभागाँस्ततो दैत्याः सर्वानादातुमर्हथ । एवमुक्तास्तदा तेन दैत्यदानवसत्तमाः

yajñabhāgā~stato daityāḥ sarvānādātumarhatha | evamuktāstadā tena daityadānavasattamāḥ

'-तभी हे दैत्यो, तुम समस्त यज्ञ-भाग लेने के अधिकारी होगे।' उनके ऐसा कहने पर उन श्रेष्ठ दैत्य-दानवों ने,

श्लोक 86 (skanda.8.62.86)

बलं सर्वं समादाय कृत्वा साङग्रामिकीः क्रियाः । प्रशस्तेषु कृताचारा मुहूर्त्त र्क्षदिनेषु ते

balaṁ sarvaṁ samādāya kṛtvā sāṅagrāmikīḥ kriyāḥ | praśasteṣu kṛtācārā muhūrtta rkṣadineṣu te

अपनी संपूर्ण सेना एकत्र करके तथा युद्ध-संबंधी अनुष्ठान करके, शुभ मुहूर्त, नक्षत्र और दिन में विधिपूर्वक आचरण करके,

श्लोक 87 (skanda.8.62.87)

रथैर्नागैस्तुरङ्गैश्च निर्ययुर्दैत्यदानवाः । पृष्ठतः पुरतः सम्यक् पार्श्वयोरुभयोरपि

rathairnāgaisturaṅgaiśca niryayurdaityadānavāḥ | pṛṣṭhataḥ purataḥ samyak pārśvayorubhayorapi

दैत्य-दानव रथों, हाथियों और घोड़ों पर सवार होकर निकल पड़े - पीछे, आगे और दोनों ओर सुव्यवस्थित होकर।

श्लोक 88 (skanda.8.62.88)

विधाय रक्षो संयत्ता ययुर्देवान् जिगीषवः । तेषामागमनं ज्ञात्वा द्विषतां पाकशासनः

vidhāya rakṣo saṁyattā yayurdevān jigīṣavaḥ | teṣāmāgamanaṁ jñātvā dviṣatāṁ pākaśāsanaḥ

रक्षा-व्यवस्था करके, पूर्ण सुसज्जित होकर, देवताओं को जीतने की इच्छा से वे चल पड़े। उन शत्रुओं के आगमन को जानकर इंद्र ने,

श्लोक 89 (skanda.8.62.89)

संहतानां सुसंयत्तो युद्ध्वा नाकं जिगीषताम् । विधिं विधाय स्वपुरे समस्तं दौर्गकर्मिकम्

saṁhatānāṁ susaṁyatto yuddhvā nākaṁ jigīṣatām | vidhiṁ vidhāya svapure samastaṁ daurgakarmikam

स्वर्ग को जीतने की इच्छा रखने वाले उन एकत्रित शत्रुओं से युद्ध हेतु सुसज्जित होकर, अपनी नगरी में समस्त दुर्ग-संबंधी व्यवस्था करके,

श्लोक 90 (skanda.8.62.90)

पुण्येषु तिथिनक्षत्र मुहूर्त्त करणेषु सः । मुनीन् विधिवदभ्यर्च्य नमस्कृत्वा पिनाकिने

puṇyeṣu tithinakṣatra muhūrtta karaṇeṣu saḥ | munīn vidhivadabhyarcya namaskṛtvā pinākine

शुभ तिथि, नक्षत्र, मुहूर्त और करण में, मुनियों की विधिपूर्वक पूजा करके तथा पिनाकी को नमस्कार करके,

श्लोक 91 (skanda.8.62.91)

सार्धं सुरगणैः सर्वेर्निर्ययौ कृतमङ्गलः । हिमवच्छिखराकारं चतुर्दन्तमनेकपम्

sārdhaṁ suragaṇaiḥ sarverniryayau kṛtamaṅgalaḥ | himavacchikharākāraṁ caturdantamanekapam

मंगल-कृत्य करके वह समस्त देवगणों के साथ निकल पड़ा, हिमालय के शिखर के समान आकार वाले, चार दाँतों वाले गजराज पर सवार होकर,

श्लोक 92 (skanda.8.62.92)

आरुह्यैरावतं शश्वन्मदतोयौघवर्षिणम् । महताहैमदण्डेन रत्नांशुपरिवेषिणा

āruhyairāvataṁ śaśvanmadatoyaughavarṣiṇam | mahatāhaimadaṇḍena ratnāṁśupariveṣiṇā

ऐरावत पर, जो निरंतर मद-जल की धाराएँ बरसा रहा था, तथा एक विशाल स्वर्ण-दंड वाले, रत्नों की किरणों से घिरे,

श्लोक 93 (skanda.8.62.93)

उच्छ्रितेनातपत्रेण ध्रियमाणेन भास्वता । वीज्यमानः शरच्चन्द्रकिरणोत्करनिर्मलैः

ucchritenātapatreṇa dhriyamāṇena bhāsvatā | vījyamānaḥ śaraccandrakiraṇotkaranirmalaiḥ

ऊँचे उठाए हुए दीप्तिमान छत्र को धारण किए हुए, तथा शरद्-चंद्र की किरणों के समान निर्मल चँवरों से हवा किया जाता हुआ,

श्लोक 94 (skanda.8.62.94)

चामरै रत्नदण्डांशुसमूहखचितोदरैः । आशीर्भिर्जयशब्दैश्च मुनिभिः परिवर्द्धितः

cāmarai ratnadaṇḍāṁśusamūhakhacitodaraiḥ | āśīrbhirjayaśabdaiśca munibhiḥ parivarddhitaḥ

जिनके हत्थे रत्नों की किरण-समूह से जड़े थे; मुनियों द्वारा आशीर्वादों और जय-जयकारों से अभिनंदित होते हुए,

श्लोक 95 (skanda.8.62.95)

अभितः स्तूयमानश्च सूतमागधबन्दिभिः । अथावकाशे विस्तीर्णे समे पादपवर्जिते

abhitaḥ stūyamānaśca sūtamāgadhabandibhiḥ | athāvakāśe vistīrṇe same pādapavarjite

तथा सूत-मागध-वंदीजनों द्वारा चारों ओर से स्तुति किया जाता हुआ - फिर एक विस्तृत, समतल, वृक्षरहित खुले स्थान में,

श्लोक 96 (skanda.8.62.96)

रचयामास देवानां पद्मव्यूहं बृहस्पतिः । मरुद्भिः सहितं कृत्वा कणिकायां शतक्रतुम्र

racayāmāsa devānāṁ padmavyūhaṁ bṛhaspatiḥ | marudbhiḥ sahitaṁ kṛtvā kaṇikāyāṁ śatakratumra

बृहस्पति ने देवताओं का पद्म-व्यूह रचा, इंद्र को मरुतों सहित कर्णिका (मध्य भाग) में स्थापित करके,

श्लोक 97 (skanda.8.62.97)

पत्रेषु च वसून् रुद्रानादित्याँश्च न्यवेशयत् । केशरेषु यमं कालं कुबेरवरुणावपि

patreṣu ca vasūn rudrānādityā~śca nyaveśayat | keśareṣu yamaṁ kālaṁ kuberavaruṇāvapi

तथा पंखुड़ियों पर वसुओं, रुद्रों और आदित्यों को स्थापित किया, और केसरों में यम, काल, कुबेर तथा वरुण को।

श्लोक 98 (skanda.8.62.98)

अनन्तं सहितं नागैर्नाले गुरुरकल्पयत् । देवानन्यान् समेताँश्च रक्षोगन्धर्वसेनया

anantaṁ sahitaṁ nāgairnāle gururakalpayat | devānanyān sametā~śca rakṣogandharvasenayā

गुरु (बृहस्पति) ने नागों सहित अनंत को नाल (डंठल) में स्थापित किया, तथा अन्य एकत्रित देवताओं को राक्षस-गंधर्व-सेना सहित,

श्लोक 99 (skanda.8.62.99)

पुनः सरः स पद्मस्य परितः पर्यकल्पयत् । अथ दानवतूर्याणां शब्दं श्रुत्वा दिवौकसः

punaḥ saraḥ sa padmasya paritaḥ paryakalpayat | atha dānavatūryāṇāṁ śabdaṁ śrutvā divaukasaḥ

पद्म के चारों ओर सरोवर के रूप में पुनः व्यवस्थित किया। तब दानवों की तुरहियों की ध्वनि सुनकर देवगण ने,

श्लोक 100 (skanda.8.62.100)

आजघ्नुर्मुदिता भेरीर्नेदुर्नादाँश्च संघशः । विमिश्रान् तूर्यशब्देन श्रुत्वा नादान् दिवौकसाम्

ājaghnurmuditā bherīrnedurnādā~śca saṁghaśaḥ | vimiśrān tūryaśabdena śrutvā nādān divaukasām

प्रसन्न होकर अपनी भेरियाँ बजाईं और समूहबद्ध होकर गर्जना की। देवताओं की तुरही-मिश्रित उस ध्वनि को सुनकर,

श्लोक 101 (skanda.8.62.101)

संयत्ताः सुतरां चक्रुः प्रयत्नं दानवेश्वराः । अथ ते दानवा दृष्ट्वा पद्मव्यूहं दिवौकसाम्

saṁyattāḥ sutarāṁ cakruḥ prayatnaṁ dānaveśvarāḥ | atha te dānavā dṛṣṭvā padmavyūhaṁ divaukasām

दानवेश्वरों ने पूर्ण सुसज्जित होकर अपने प्रयत्न को और भी बढ़ा दिया। तब उन दानवों ने देवताओं के पद्म-व्यूह को देखकर,

श्लोक 102 (skanda.8.62.102)

पप्रच्छुर्भार्गवं तत्र तद्भेदममितौजसः । स पृष्टो दानवश्रेष्ठैर्व्यूहभेदमनाकुलः

papracchurbhārgavaṁ tatra tadbhedamamitaujasaḥ | sa pṛṣṭo dānavaśreṣṭhairvyūhabhedamanākulaḥ

वहाँ अमित तेजस्वी भार्गव से उसे भेदने का उपाय पूछा। श्रेष्ठ दानवों द्वारा पूछे जाने पर वे अविचलित होकर व्यूह-भेद का उपाय बताने लगे।

श्लोक 103 (skanda.8.62.103)

विचिन्त्य भार्गवो धीमानीत्थमाहासुराँस्तदा । विकीर्णाः परितः सर्वे तुषारनिकरा इव

vicintya bhārgavo dhīmānītthamāhāsurā~stadā | vikīrṇāḥ paritaḥ sarve tuṣāranikarā iva

बुद्धिमान भार्गव ने विचार करके तब असुरों से यह कहा - 'चारों ओर बिखरे हुए, मानो तुषार-राशि हों,'

श्लोक 104 (skanda.8.62.104)

पद्मव्यूहं सुरेन्द्राणां हत सम्यक् सुरद्विषः । एवमुक्तास्ततो दैत्या भार्गवेण महात्मना

padmavyūhaṁ surendrāṇāṁ hata samyak suradviṣaḥ | evamuktāstato daityā bhārgaveṇa mahātmanā

'-हे देव-शत्रुओं, देवेंद्रों के पद्म-व्यूह पर भलीभाँति प्रहार करो!' महात्मा भार्गव द्वारा ऐसा कहे जाने पर दैत्यगण,

श्लोक 105 (skanda.8.62.105)

सिंहनादं विनद्याशु परितस्तेभिसंपतन् । ततो युद्धं समभवद् देवदानवसैन्ययोः

siṁhanādaṁ vinadyāśu paritastebhisaṁpatan | tato yuddhaṁ samabhavad devadānavasainyayoḥ

सिंहनाद करके शीघ्र ही चारों ओर से उन पर टूट पड़े। तब देव-सेना और दानव-सेना के बीच युद्ध छिड़ गया,

श्लोक 106 (skanda.8.62.106)

आयुधैर्विविधैस्तीक्ष्णैः परस्परमभिध्नतोः । सादिनः सादिभिः सार्धं नागा नागै रथा रथैः

āyudhairvividhaistīkṣṇaiḥ parasparamabhidhnatoḥ | sādinaḥ sādibhiḥ sārdhaṁ nāgā nāgai rathā rathaiḥ

अनेक प्रकार के तीक्ष्ण अस्त्रों से परस्पर प्रहार करते हुए - घुड़सवार घुड़सवारों से, हाथी हाथियों से, रथ रथों से,

श्लोक 107 (skanda.8.62.107)

पत्तयः पत्तिभिर्दृप्तैर्दृप्ता युयुधिरे युधि । केचिद्विभिन्ना नाराचैश्छिन्नाः केचित् परश्वधैः

pattayaḥ pattibhirdṛptairdṛptā yuyudhire yudhi | kecidvibhinnā nārācaiśchinnāḥ kecit paraśvadhaiḥ

और अभिमानी पैदल सैनिक अभिमानी पैदल सैनिकों से युद्ध करने लगे। कुछ लौह-बाणों से बिंधे, कुछ फरसों से कटे,

श्लोक 108 (skanda.8.62.108)

निपेतुर्व्यसवो यौधाः सेनयोरुभयोरपि । छिन्धि भिन्धि सहेदानीं तिष्ठ मूढ क्व गच्छसि

nipeturvyasavo yaudhāḥ senayorubhayorapi | chindhi bhindhi sahedānīṁ tiṣṭha mūḍha kva gacchasi

और दोनों सेनाओं के योद्धा प्राणहीन होकर गिर पड़े। 'काटो! भेदो! अब सहन करो! खड़े रहो, मूर्ख, कहाँ भागते हो?' -

श्लोक 109 (skanda.8.62.109)

इति वाचः सुमुत्तस्थुर्युधि योधैरुदीरिताः । वसारुधिरसंसिक्तं तनुत्रावरणाचितम्

iti vācaḥ sumuttasthuryudhi yodhairudīritāḥ | vasārudhirasaṁsiktaṁ tanutrāvaraṇācitam

युद्ध में योद्धाओं द्वारा ऐसे वचन उठने लगे। वह रणभूमि चर्बी और रक्त से भीगी हुई, कवच-ढालों से पटी हुई,

श्लोक 110 (skanda.8.62.110)

हतनागाश्वकललं तद्बभूव रणाजिरम् । अथ तैर्दानवैस्तत्र पीड्यमाना दिवौकसः

hatanāgāśvakalalaṁ tadbabhūva raṇājiram | atha tairdānavaistatra pīḍyamānā divaukasaḥ

तथा मारे गए हाथी-घोड़ों से अस्तव्यस्त हो गई। तब वहाँ उन दानवों द्वारा पीड़ित देवगण,

श्लोक 111 (skanda.8.62.111)

सव्रणा हतभूयिष्ठाः शक्रमेवाभिशिश्रियुः । अनन्तं नागमुख्याश्च कुबेरं यक्षराक्षसाः

savraṇā hatabhūyiṣṭhāḥ śakramevābhiśiśriyuḥ | anantaṁ nāgamukhyāśca kuberaṁ yakṣarākṣasāḥ

घायल और अधिकांश मारे जाकर इंद्र की ही शरण में गए; नाग-प्रमुखों ने अनंत की तथा यक्ष-राक्षसों ने कुबेर की शरण ली।

श्लोक 112 (skanda.8.62.112)

भिन्ने व्यूहेय देवानां प्रहृष्टा दैत्यदानवाः । सिंहनादान् विनद्योच्चै स्तूर्याण्याहत्य भूयशः

bhinne vyūheya devānāṁ prahṛṣṭā daityadānavāḥ | siṁhanādān vinadyoccai stūryāṇyāhatya bhūyaśaḥ

देवताओं का व्यूह टूट जाने पर अत्यंत प्रसन्न दैत्य-दानव, ऊँचे सिंहनाद करते हुए तथा बार-बार तुरही बजाते हुए,

श्लोक 113 (skanda.8.62.113)

अभ्यद्रवन्तः संयत्ताः समरे पाकशासनम् । अथोत्थाप्य गजं शक्रो वज्रेण शतपर्वणा

abhyadravantaḥ saṁyattāḥ samare pākaśāsanam | athotthāpya gajaṁ śakro vajreṇa śataparvaṇā

पूर्ण सुसज्जित होकर युद्ध में इंद्र पर टूट पड़े। तब इंद्र ने अपने हाथी को उभारकर, सौ पर्वों वाले वज्र से,

श्लोक 114 (skanda.8.62.114)

चूर्णयामास संक्रुद्धो वेत्यदानववाहिनीम् । ददाह दानवामाकं परितः पाकशासनः

cūrṇayāmāsa saṁkruddho vetyadānavavāhinīm | dadāha dānavāmākaṁ paritaḥ pākaśāsanaḥ

क्रुद्ध होकर दानव-सेना को चूर्ण करके खदेड़ दिया। इंद्र ने दानव-सेना को चारों ओर से भस्म कर दिया,

श्लोक 115 (skanda.8.62.115)

निदाघसमये दीप्तः शुष्ककक्षमिवानलः । अथ शुम्भः समभेत्य समरे शक्रमब्रवीत्

nidāghasamaye dīptaḥ śuṣkakakṣamivānalaḥ | atha śumbhaḥ samabhetya samare śakramabravīt

जैसे ग्रीष्म-ऋतु में सूखी घास में प्रज्वलित अग्नि जलती है। तब शुंभ ने आगे बढ़कर युद्ध में इंद्र से कहा -

श्लोक 116 (skanda.8.62.116)

दृष्टोस्यद्य मया शक्र न जीवन् प्रतियास्यसि । अथागत्य तदा ब्रह्मा प्राहेत्थं सुरसत्तमान्

dṛṣṭosyadya mayā śakra na jīvan pratiyāsyasi | athāgatya tadā brahmā prāhetthaṁ surasattamān

'हे शक्र, आज तुम मुझे दिख गए हो - तुम जीवित लौटकर नहीं जा सकोगे।' तब ब्रह्मा वहाँ आकर श्रेष्ठ देवताओं से इस प्रकार बोले -

श्लोक 117 (skanda.8.62.117)

न योद्धव्यं सुरा दैत्यैरवध्या वः सुरद्विषः । न योद्धव्यं न योद्धव्यं सुरा दैत्यैर्महाबलैः

na yoddhavyaṁ surā daityairavadhyā vaḥ suradviṣaḥ | na yoddhavyaṁ na yoddhavyaṁ surā daityairmahābalaiḥ

'हे देवो, दैत्यों से युद्ध मत करो - ये देव-शत्रु तुम्हारे द्वारा अवध्य हैं। हे देवो, महाबली दैत्यों से युद्ध मत करो, युद्ध मत करो!'

श्लोक 118 (skanda.8.62.118)

पूर्वलब्धवरा ह्येते अवध्याश्च सुरद्विषः । अन्तर्दधुस्ततस्तस्य वाक्यं श्रुत्वा दिवौकसः । विहाय समरं सर्वे क्षिप्रं सबलवाहनाः

pūrvalabdhavarā hyete avadhyāśca suradviṣaḥ | antardadhustatastasya vākyaṁ śrutvā divaukasaḥ | vihāya samaraṁ sarve kṣipraṁ sabalavāhanāḥ

'क्योंकि इन देव-शत्रुओं ने पहले ही वर पा लिया है और ये अवध्य हैं।' उनके वचन सुनकर देवगण तब अपनी सेना और वाहनों सहित शीघ्र युद्ध छोड़कर अंतर्धान हो गए।

श्लोक 119 (skanda.8.62.119)

अथ दैत्याः सुसंहृष्टास्तूर्याण्याहत्य भूयशः । नेदुरुच्चैर्वचश्चेदमूचुः समरशालिनः

atha daityāḥ susaṁhṛṣṭāstūryāṇyāhatya bhūyaśaḥ | neduruccairvacaścedamūcuḥ samaraśālinaḥ

तब अत्यंत प्रसन्न दैत्यगण बार-बार तुरही बजाकर ऊँचे स्वर में गरजे, और उन युद्ध-कुशलों ने यह वचन कहा -

श्लोक 120 (skanda.8.62.120)

तुरगखुरपुटान्तक्षुण्णरेण्वन्धकारे । द्विरदरथनिनादत्रस्तपादातवृन्दे । विगतभयविषादः संयुगे शुंभसिंहो । जयति सुरविजेता वारिवाहोरुनादः

turagakhurapuṭāntakṣuṇṇareṇvandhakāre | dviradarathaninādatrastapādātavṛnde | vigatabhayaviṣādaḥ saṁyuge śuṁbhasiṁho | jayati suravijetā vārivāhorunādaḥ

'युद्ध में, घोड़ों के खुरों से उड़ी धूल के अंधकार में, हाथियों-रथों की गर्जना से भयभीत पैदल सैनिकों की भीड़ के बीच, भय और विषाद से रहित, देव-विजेता, मेघ के समान महागर्जन करने वाला सिंहरूप शुंभ विजयी है!'

श्लोक 121 (skanda.8.62.121)

तदनु जयति दीर्घपीनथुबाहुः पृथुरुचिरोन्नतसंहतोरुवक्षाः । मृगपतिगमनोम्बुवाहनादः समरवरे विजयी निशुंभसिंहः

tadanu jayati dīrghapīnathubāhuḥ pṛthurucironnatasaṁhatoruvakṣāḥ | mṛgapatigamanombuvāhanādaḥ samaravare vijayī niśuṁbhasiṁhaḥ

'और उसके बाद, श्रेष्ठ युद्ध में विजयी है वह सिंहरूप निशुंभ, जिसकी भुजाएँ लंबी और पुष्ट हैं, वक्षस्थल चौड़ा, सुंदर, उन्नत और सुदृढ़ है, जिसकी चाल सिंह की सी और गर्जना मेघ के समान है!'

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