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अम्बिका खण्ड · अध्याय 63

मूक का संदेश और युद्ध-मंत्रणा

अध्याय 62अध्याय-सूचीअध्याय 64

श्लोक 1 (skanda.8.63.1)

१ तदनु जयति दीर्घः पीनबाहूरुपादः पृथुरुचिरसुवक्षाश्चोन्नतांसः सुनेत्रः । अथ निर्जित्य समरे देवान् देवद्विषस्तदा । आजग्मुः सहिता विन्ध्यं शिखरालीनतोयदम्

1 tadanu jayati dīrghaḥ pīnabāhūrupādaḥ pṛthurucirasuvakṣāśconnatāṁsaḥ sunetraḥ | atha nirjitya samare devān devadviṣastadā | ājagmuḥ sahitā vindhyaṁ śikharālīnatoyadam

और उसके बाद भी विजयी है वह - लंबी भुजाओं, जंघाओं और पैरों वाला, चौड़े सुंदर वक्षस्थल वाला, ऊँचे कंधों वाला, सुंदर नेत्रों वाला! तत्पश्चात् युद्ध में देवताओं को जीतकर वे देव-शत्रु साथ मिलकर विंध्य पर्वत पर आए, जिसकी चोटियाँ मेघों से आवृत थीं।

श्लोक 2 (skanda.8.63.2)

प्रस्थाप्य विधिवत् सर्वान् तौ तदा दैत्यदानवान् । रेमाते सहितौ विन्ध्ये किन्नरोद्गीतकन्दरे

prasthāpya vidhivat sarvān tau tadā daityadānavān | remāte sahitau vindhye kinnarodgītakandare

समस्त दैत्य-दानवों को विधिपूर्वक विदा करके, वे दोनों तब विंध्य पर्वत पर, किन्नरों के गीतों से गूँजती कंदराओं में, साथ मिलकर विहार करने लगे।

श्लोक 3 (skanda.8.63.3)

आरक्षिकस्तयोस्तत्र मूको नाम महासुरः । अपश्यच्छिखरे देवीं ज्वलन्तीमिव तेजसा

ārakṣikastayostatra mūko nāma mahāsuraḥ | apaśyacchikhare devīṁ jvalantīmiva tejasā

वहाँ उनके रक्षक मूक नामक महाअसुर ने शिखर पर एक देवी को, मानो तेज से जलती हुई, देखा।

श्लोक 4 (skanda.8.63.4)

पुण्यलक्षणसंपूर्णां पुण्याभरणभूषिताम् । आगतां तत्र तां सिद्धिं पुण्यानां कर्मणामिव

puṇyalakṣaṇasaṁpūrṇāṁ puṇyābharaṇabhūṣitām | āgatāṁ tatra tāṁ siddhiṁ puṇyānāṁ karmaṇāmiva

शुभ लक्षणों से संपूर्ण, पवित्र आभूषणों से सुसज्जित, वहाँ आई हुई वह मानो पुण्य-कर्मों की सिद्धि-स्वरूपा थी।

श्लोक 5 (skanda.8.63.5)

अथ मूकस्तदा देवीं विस्मयोत्फुल्ललोचनः । दृष्ट्वा जगाम मनसा शुंभं दानवसत्तमम्

atha mūkastadā devīṁ vismayotphullalocanaḥ | dṛṣṭvā jagāma manasā śuṁbhaṁ dānavasattamam

तब उस देवी को देखकर विस्मय से नेत्र फैलाए मूक ने मन ही मन दानव-श्रेष्ठ शुंभ का स्मरण किया।

श्लोक 6 (skanda.8.63.6)

यथेयं चारुसर्वाङ्गी प्रधाना सर्वयोषिताम् । तथा पुंसां प्रधानोसौ शुम्भो दैत्येन्द्रचन्द्रमाः

yatheyaṁ cārusarvāṅgī pradhānā sarvayoṣitām | tathā puṁsāṁ pradhānosau śumbho daityendracandramāḥ

'जैसे यह सुंदरांगी समस्त स्त्रियों में प्रधान है, वैसे ही वह शुंभ, दैत्येंद्रों में चंद्रमा-सदृश, पुरुषों में प्रधान है।'

श्लोक 7 (skanda.8.63.7)

विस्तीर्णवक्षसस्तस्य विशालजघनस्थला । अनुरूपा भवेत् पत्नी दीर्घाक्षस्यासितेक्षणा

vistīrṇavakṣasastasya viśālajaghanasthalā | anurūpā bhavet patnī dīrghākṣasyāsitekṣaṇā

'उस विशाल वक्षस्थल वाले के लिए, यह विस्तृत जघन-स्थल वाली, काली और लंबी आँखों वाली, उपयुक्त पत्नी होगी।'

श्लोक 8 (skanda.8.63.8)

इति संचिन्त्य मनसा तामुवाच सुमध्यमाम् । का त्वं त्रस्त समुद्भ्रान्तसृगशाव विलोचने

iti saṁcintya manasā tāmuvāca sumadhyamām | kā tvaṁ trasta samudbhrāntasṛgaśāva vilocane

मन में ऐसा विचार करके उसने उस सुमध्यमा से कहा - 'तुम कौन हो, हे भयभीत, चकित मृगशावक जैसे नेत्रों वाली?'

श्लोक 9 (skanda.8.63.9)

कः पिता तेनवद्याङ्गि का वा माता तवानघे । किमर्थं वा वसस्यत्र गिरौ दानवसेविते

kaḥ pitā tenavadyāṅgi kā vā mātā tavānaghe | kimarthaṁ vā vasasyatra girau dānavasevite

'हे निर्दोष अंगों वाली, तुम्हारे पिता कौन हैं, या हे निष्पाप, माता कौन हैं? और तुम इस दानव-सेवित पर्वत पर क्यों निवास करती हो?'

श्लोक 10 (skanda.8.63.10)

एवमुक्ताश्च मूकेन महायोगा सुरेश्वरी । विज्ञाय मनसा कालं प्राप्तं शुंभनिशुंभयोः

evamuktāśca mūkena mahāyogā sureśvarī | vijñāya manasā kālaṁ prāptaṁ śuṁbhaniśuṁbhayoḥ

मूक द्वारा ऐसा कहे जाने पर वह महायोगिनी देवेश्वरी, मन में यह जानकर कि शुंभ-निशुंभ का नियत समय आ गया है,

श्लोक 11 (skanda.8.63.11)

स्मितपूर्वमिदं प्राह वाक्यं वाक्यविशारदा । मानुषीं मां विजानीहि गिरावस्मिन् कृतालयाम्

smitapūrvamidaṁ prāha vākyaṁ vākyaviśāradā | mānuṣīṁ māṁ vijānīhi girāvasmin kṛtālayām

पहले मुस्कुराकर, वाक्य-कुशल उस देवी ने यह वचन कहा - 'मुझे इस पर्वत पर निवास करने वाली एक मानवी स्त्री जानो।'

श्लोक 12 (skanda.8.63.12)

आत्रेयः स्वर्गतो विद्वान् पिता चक्रचरो मम । विहाय मां पुरो बालां माताप्यनुगता पतिम्

ātreyaḥ svargato vidvān pitā cakracaro mama | vihāya māṁ puro bālāṁ mātāpyanugatā patim

'मेरे पिता, विद्वान् आत्रेय, स्वेच्छाचारी, स्वर्ग को चले गए; और मेरी माता भी मुझे बालिका छोड़कर अपने पति के पीछे चली गईं।'

श्लोक 13 (skanda.8.63.13)

आज्ञप्तास्मि तदा मात्रा प्रदायास्त्राणि दानव । वस विन्ध्ये गिरौ रम्ये योगं च कुरु सर्वदा

ājñaptāsmi tadā mātrā pradāyāstrāṇi dānava | vasa vindhye girau ramye yogaṁ ca kuru sarvadā

'हे दानव, मुझे तब माता ने अस्त्र देकर आज्ञा दी थी - "रमणीय विंध्य पर्वत पर रहो और सदा योग करो।"'

श्लोक 14 (skanda.8.63.14)

साहं वचनमार्यायाः पालयन्ती नगोत्तमे । वसामि सिंहशार्दूल मातङ्गमृगसेविते

sāhaṁ vacanamāryāyāḥ pālayantī nagottame | vasāmi siṁhaśārdūla mātaṅgamṛgasevite

'सो मैं, अपनी आर्या माता के वचन का पालन करते हुए, इस श्रेष्ठ पर्वत पर, जो सिंह, व्याघ्र, गज और मृगों से सेवित है, निवास करती हूँ।'

श्लोक 15 (skanda.8.63.15)

इति देव्या वचः श्रुत्वा मूकः संहृष्टमानसः । जगाम दानवश्रेष्ठं शुम्भं द्रष्टुं कृतत्वरः

iti devyā vacaḥ śrutvā mūkaḥ saṁhṛṣṭamānasaḥ | jagāma dānavaśreṣṭhaṁ śumbhaṁ draṣṭuṁ kṛtatvaraḥ

देवी का यह वचन सुनकर, अत्यंत प्रसन्नचित्त मूक शीघ्रता से दानव-श्रेष्ठ शुंभ को देखने चल पड़ा।

श्लोक 16 (skanda.8.63.16)

अथ शुंभं समासाद्य हर्षेणोत्फुल्ललोचनः । आचचक्ष इवाकारैरपूर्वं रत्नदर्शनम्

atha śuṁbhaṁ samāsādya harṣeṇotphullalocanaḥ | ācacakṣa ivākārairapūrvaṁ ratnadarśanam

फिर शुंभ के पास पहुँचकर, हर्ष से नेत्र फैलाए, उसने मानो अपनी मुद्राओं से ही एक अपूर्व रत्न-दर्शन का वर्णन कर दिया।

श्लोक 17 (skanda.8.63.17)

तं दृष्टवा विस्मयोत्फुल्लं रक्तायतविलोचनः । मूकमाह तदा शुंभः कस्मात्तुष्टोसि दानव

taṁ dṛṣṭavā vismayotphullaṁ raktāyatavilocanaḥ | mūkamāha tadā śuṁbhaḥ kasmāttuṣṭosi dānava

उसे विस्मय से फूले हुए देखकर, लाल और विशाल नेत्रों वाले शुंभ ने तब मूक से कहा - 'हे दानव, तुम इतने प्रसन्न क्यों हो?'

श्लोक 18 (skanda.8.63.18)

एवमुक्तः स शुंभेन मूको वचनमब्रवीत् । अपूर्वमद्य दृष्टं मे स्त्रीरत्नं शिखरे गिरेः

evamuktaḥ sa śuṁbhena mūko vacanamabravīt | apūrvamadya dṛṣṭaṁ me strīratnaṁ śikhare gireḥ

शुंभ द्वारा ऐसा पूछे जाने पर मूक ने यह वचन कहा - 'आज मैंने पर्वत के शिखर पर एक अपूर्व स्त्री-रत्न देखा है।'

श्लोक 19 (skanda.8.63.19)

न तादृशी मनुष्येषु न देवेष्वपि सुन्दरी । न रक्षस्सु न यक्षेषु न गन्धर्वपुरेषु वा

na tādṛśī manuṣyeṣu na deveṣvapi sundarī | na rakṣassu na yakṣeṣu na gandharvapureṣu vā

'ऐसी सुंदरी न मनुष्यों में है, न देवताओं में भी, न राक्षसों में, न यक्षों में, न गंधर्व-नगरों में,'

श्लोक 20 (skanda.8.63.20)

न नागेषु न सिद्धेषु न दैत्यपतिवेश्मसु । दृष्टपूर्वा मया राजन् यादृशी सा वरांगना

na nāgeṣu na siddheṣu na daityapativeśmasu | dṛṣṭapūrvā mayā rājan yādṛśī sā varāṁganā

'-न नागों में, न सिद्धों में, न दैत्येंद्रों के भवनों में, हे राजन्, मैंने पहले कभी वैसी उत्तम स्त्री नहीं देखी जैसी वह है।'

श्लोक 21 (skanda.8.63.21)

का त्वं कस्य किमर्थं वा वससीह गिराविति । पृ । ष्टाब्रवीन्मया वाक्यमात्रेयदुहिता ह्यहम्

kā tvaṁ kasya kimarthaṁ vā vasasīha girāviti | pṛ | ṣṭābravīnmayā vākyamātreyaduhitā hyaham

'तुम कौन हो, किसकी हो, और यहाँ पर्वत पर क्यों रहती हो?' - ऐसा पूछे जाने पर उसने मुझसे यह वचन कहा - 'मैं आत्रेय की पुत्री हूँ,'

श्लोक 22 (skanda.8.63.22)

वसामि चात्र विन्ध्यस्य शिखरे मातुराज्ञया । इति भर्त्तुः समाख्याय विरराम स दानवः

vasāmi cātra vindhyasya śikhare māturājñayā | iti bharttuḥ samākhyāya virarāma sa dānavaḥ

'-और यहाँ विंध्य के शिखर पर अपनी माता की आज्ञा से निवास करती हूँ।' अपने स्वामी को इस प्रकार बताकर वह दानव चुप हो गया।

श्लोक 23 (skanda.8.63.23)

अथ शुंभस्य हृदये मूकस्य वचसा सह । कामोवकाशमकरोद्विनाशाय सुरद्विषाम्

atha śuṁbhasya hṛdaye mūkasya vacasā saha | kāmovakāśamakarodvināśāya suradviṣām

तब मूक के वचनों के साथ ही, काम ने शुंभ के हृदय में स्थान बना लिया - देव-शत्रुओं के विनाश के लिए।

श्लोक 24 (skanda.8.63.24)

ततः प्रोवाच दैत्येन्द्रः कामाकुलितमानसः । गच्छ मूक मदर्थे तां प्रलोभय सुमध्यमाम्

tataḥ provāca daityendraḥ kāmākulitamānasaḥ | gaccha mūka madarthe tāṁ pralobhaya sumadhyamām

तब काम से व्याकुलचित्त दैत्येंद्र ने कहा - 'हे मूक, जाओ और मेरे लिए उस सुमध्यमा को प्रलोभित करो।'

श्लोक 25 (skanda.8.63.25)

एवमुक्तः स शुंभेन द्रुतमुत्थाय दानवः । प्रययौ यत्र सा देवी प्रागनेनाभिलक्षिता

evamuktaḥ sa śuṁbhena drutamutthāya dānavaḥ | prayayau yatra sā devī prāganenābhilakṣitā

शुंभ द्वारा ऐसा आज्ञप्त होकर वह दानव तुरंत उठकर वहाँ गया जहाँ उसके द्वारा पहले देखी गई वह देवी थी।

श्लोक 26 (skanda.8.63.26)

तं दृष्टवा दानवं देवी कृताञ्जलिमुपस्थितम् । किमर्थमागतोसीति मूकं पृष्टवती तदा

taṁ dṛṣṭavā dānavaṁ devī kṛtāñjalimupasthitam | kimarthamāgatosīti mūkaṁ pṛṣṭavatī tadā

उस दानव को अंजलि जोड़े हुए सामने खड़ा देखकर, देवी ने तब मूक से पूछा - 'तुम किसलिए आए हो?'

श्लोक 27 (skanda.8.63.27)

एवं पृष्टोथ कौशिक्या प्राहेत्थं मूकदानवः । आर्ये दूतोस्मि शुम्भस्य त्वत्समीपमुपागतः

evaṁ pṛṣṭotha kauśikyā prāhetthaṁ mūkadānavaḥ | ārye dūtosmi śumbhasya tvatsamīpamupāgataḥ

कौशिकी द्वारा ऐसा पूछे जाने पर मूक दानव ने कहा - 'हे आर्ये, मैं शुंभ का दूत हूँ, तुम्हारे समीप आया हूँ।'

श्लोक 28 (skanda.8.63.28)

अथ देवी स्मितं कृत्वा प्रसन्नमभिवीक्ष्य तम् । इत्थमाहागतं दूतं किं स आहा सुरेश्वरः

atha devī smitaṁ kṛtvā prasannamabhivīkṣya tam | itthamāhāgataṁ dūtaṁ kiṁ sa āhā sureśvaraḥ

तब देवी ने मुस्कुराकर, प्रसन्नता से उसकी ओर देखकर, आए हुए दूत से कहा - 'वह असुरेश्वर क्या कहते हैं?'

श्लोक 29 (skanda.8.63.29)

इति पृष्टस्तदा देव्या प्राह मूकः कृताञ्जलिः । आर्ये दैत्येश्वरः शुंभः पत्नीत्वेन वृणोति ते

iti pṛṣṭastadā devyā prāha mūkaḥ kṛtāñjaliḥ | ārye daityeśvaraḥ śuṁbhaḥ patnītvena vṛṇoti te

देवी द्वारा ऐसा पूछे जाने पर, अंजलि जोड़े मूक ने कहा - 'हे आर्ये, दैत्येश्वर शुंभ तुम्हें पत्नी रूप में वरण करते हैं -'

श्लोक 30 (skanda.8.63.30)

तस्य दानवसिंहस्य जेतुः शक्रस्य संयुगे । भवाग्र्या सर्वपत्नीनां पत्नी मृगविलोचने

tasya dānavasiṁhasya jetuḥ śakrasya saṁyuge | bhavāgryā sarvapatnīnāṁ patnī mṛgavilocane

'-उस दानव-सिंह, युद्ध में इंद्र के विजेता, की तुम, हे मृगनयनी, समस्त पत्नियों में प्रधान पत्नी बनो।'

श्लोक 31 (skanda.8.63.31)

एवमुक्ता तदा तेन विहस्याहामरेश्वरी । स्वबाहूनवलोक्येत्थं युद्धशुल्का मवेहि माम्

evamuktā tadā tena vihasyāhāmareśvarī | svabāhūnavalokyetthaṁ yuddhaśulkā mavehi mām

उसके ऐसा कहने पर अमरेश्वरी देवी ने हँसकर, अपनी भुजाओं की ओर देखते हुए, यह कहा - 'मुझे युद्ध-शुल्का जानो।'

श्लोक 32 (skanda.8.63.32)

मां विनिर्जित्य दैत्योसौ पत्नीं वै कर्तुमर्हति । मया वा निहतो यातु काकगोमायुभक्ष्यताम्

māṁ vinirjitya daityosau patnīṁ vai kartumarhati | mayā vā nihato yātu kākagomāyubhakṣyatām

'वह दैत्य मुझे युद्ध में जीतकर ही पत्नी बना सकता है; अन्यथा मेरे द्वारा मारा जाकर वह कौवों और गीदड़ों का भक्ष्य बने।'

श्लोक 33 (skanda.8.63.33)

एवमुक्तवतीं देवीमाह मूको हसन्निव । पत्या दानवदैत्यानां किं ते युद्धेन भामिनि

evamuktavatīṁ devīmāha mūko hasanniva | patyā dānavadaityānāṁ kiṁ te yuddhena bhāmini

ऐसा कहने वाली देवी से मूक ने मानो हँसते हुए कहा - 'हे भामिनि, दैत्य-दानवों के स्वामी से युद्ध करने की तुम्हें क्या आवश्यकता है?'

श्लोक 34 (skanda.8.63.34)

क्रुद्धस्य यस्य समरे न शशाक निरीक्षितुम् । मुखमैरावतस्कन्धगतोपि बलवृत्रहा

kruddhasya yasya samare na śaśāka nirīkṣitum | mukhamairāvataskandhagatopi balavṛtrahā

'-जिसके क्रुद्ध मुख को युद्ध में, ऐरावत के कंधे पर बैठा हुआ बलवान् वृत्रहंता इंद्र भी नहीं देख सका,'

श्लोक 35 (skanda.8.63.35)

तृणानि मम दैत्येन्द्राः सर्वेपि रणमूर्धनि

tṛṇāni mama daityendrāḥ sarvepi raṇamūrdhani

'मेरे लिए सभी दैत्येंद्र युद्ध के शिखर पर तृण-मात्र हैं!'

श्लोक 36 (skanda.8.63.36)

निवेदयस्व शुंभस्य गच्छ त्वं दानवाधम । दौत्येनासि यतः प्राप्तो मयातो न विहन्यसे

nivedayasva śuṁbhasya gaccha tvaṁ dānavādhama | dautyenāsi yataḥ prāpto mayāto na vihanyase

'जाओ और शुंभ को यह सूचित करो, हे नीच दानव; चूँकि तुम दूत बनकर आए हो, इसलिए मेरे द्वारा तुम मारे नहीं जाओगे।'

श्लोक 37 (skanda.8.63.37)

अथ प्रणम्य तां मूको ययौ पार्श्वं सुरद्विषः । अनुज्ञातश्च तेनासावाख्यातुमुपचक्रमे

atha praṇamya tāṁ mūko yayau pārśvaṁ suradviṣaḥ | anujñātaśca tenāsāvākhyātumupacakrame

तब उसे प्रणाम करके मूक उस देव-शत्रु के पास गया; और उससे अनुमति पाकर सब कुछ बताने लगा।

श्लोक 38 (skanda.8.63.38)

सा मया प्रार्थिता कन्या त्वदर्थे दानवोत्तम । उवाच युद्धशुल्कास्मि जित्वा मां नेतुमर्हसि

sā mayā prārthitā kanyā tvadarthe dānavottama | uvāca yuddhaśulkāsmi jitvā māṁ netumarhasi

'हे दानवश्रेष्ठ, मैंने तुम्हारे लिए उस कन्या से निवेदन किया; उसने कहा - "मैं युद्ध-शुल्का हूँ, मुझे जीतकर ही ले जाना।"'

श्लोक 39 (skanda.8.63.39)

भूयश्चोक्तवती राजन् गर्वमालम्ब्य साङ्गना । तृणानि मम संग्रामे दैत्या इति सविस्मया

bhūyaścoktavatī rājan garvamālambya sāṅganā | tṛṇāni mama saṁgrāme daityā iti savismayā

'और आगे, हे राजन्, उस स्त्री ने गर्व धारण करके, विस्मयपूर्वक कहा - "युद्ध में सब दैत्य मेरे लिए तृण-मात्र हैं।"'

श्लोक 40 (skanda.8.63.40)

तत्तदा वचनं तस्या मूकेनोक्तं निशाम्य सः । क्रोधाद्दर्पाच्च कामाच्च ममृषे नासुरोत्तमः

tattadā vacanaṁ tasyā mūkenoktaṁ niśāmya saḥ | krodhāddarpācca kāmācca mamṛṣe nāsurottamaḥ

मूक द्वारा कहे गए उसके उस वचन को सुनकर, वह श्रेष्ठ असुर क्रोध, दर्प और काम - तीनों के कारण सहन नहीं कर सका।

श्लोक 41 (skanda.8.63.41)

अथोत्थाय सभां रम्यामगच्छद्दानवाधिपः । स्फाटिकस्तम्भनिर्व्यूहां विचित्रमणितोरणाम्

athotthāya sabhāṁ ramyāmagacchaddānavādhipaḥ | sphāṭikastambhanirvyūhāṁ vicitramaṇitoraṇām

तब उठकर दानवाधिप उस रमणीय सभा में गया, जो स्फटिक स्तंभों से बनी थी, जिसके तोरण विचित्र मणियों से जड़े थे।

श्लोक 42 (skanda.8.63.42)

तस्यां सिंहासने हैमे स्वास्तीर्णे महति स्थिरे । निषसाद महाबाहुः सुखायां वरुणो यथा

tasyāṁ siṁhāsane haime svāstīrṇe mahati sthire | niṣasāda mahābāhuḥ sukhāyāṁ varuṇo yathā

वहाँ उस विशाल, सुदृढ़, सुसज्जित स्वर्ण-सिंहासन पर वह महाबाहु सुखपूर्वक बैठ गया, जैसे वरुण अपने आसन पर बैठते हैं।

श्लोक 43 (skanda.8.63.43)

अनु तस्य निशुंभोपि निषसाद वरासने । रत्नाङ्गदांशुनिवहच्छुरितोरःस्थलस्तदा

anu tasya niśuṁbhopi niṣasāda varāsane | ratnāṅgadāṁśunivahacchuritoraḥsthalastadā

उसके बाद निशुंभ भी उत्तम आसन पर बैठ गया, जिसका वक्षस्थल तब रत्न-बाजूबंदों की किरण-राशि से चमक रहा था।

श्लोक 44 (skanda.8.63.44)

तयोरनु महासत्वा विविशुर्दैत्यदानवाः । दरीं हिमवतो रम्यां वारिश्यामा इवाम्बुदाः

tayoranu mahāsatvā viviśurdaityadānavāḥ | darīṁ himavato ramyāṁ vāriśyāmā ivāmbudāḥ

उन दोनों के बाद महाबली दैत्य-दानव सभा में प्रविष्ट हुए, जैसे जल से काले मेघ हिमालय की रमणीय गुफा में प्रवेश करते हैं।

श्लोक 45 (skanda.8.63.45)

अथ तेषूपविष्टेषु दैत्यदानवराजसु । प्रोवाच वचनं शुम्भो घनस्तनितनिस्वनः

atha teṣūpaviṣṭeṣu daityadānavarājasu | provāca vacanaṁ śumbho ghanastanitanisvanaḥ

फिर जब वे दैत्य-दानव राजा बैठ गए, तब मेघ-गर्जन जैसे स्वर वाले शुंभ ने यह वचन कहा -

श्लोक 46 (skanda.8.63.46)

आरक्षिको गिरो विन्ध्ये मदीयो मूकदानवः । विन्ध्यस्य शिखरे कन्यां दृष्टवान् चारुरूपिणीम्

ārakṣiko giro vindhye madīyo mūkadānavaḥ | vindhyasya śikhare kanyāṁ dṛṣṭavān cārurūpiṇīm

'विंध्य पर्वत पर मेरे रक्षक मूक दानव ने विंध्य के शिखर पर एक सुंदर रूप वाली कन्या को देखा।'

श्लोक 47 (skanda.8.63.47)

युद्धशुल्काहमित्याह न मदर्थेनेन सार्थिता । तृणानि मम दैत्येन्द्रा भूयश्चोक्तवती किल

yuddhaśulkāhamityāha na madarthenena sārthitā | tṛṇāni mama daityendrā bhūyaścoktavatī kila

'उसने कहा - "मेरा शुल्क युद्ध है" - और जब इसने मेरी ओर से निवेदन किया, तो उसने आगे कहा, ऐसा सुना गया - "मेरे लिए दैत्येंद्र तृण-मात्र हैं।"'

श्लोक 48 (skanda.8.63.48)

जित्वा तां प्रसभं कन्यां समरे गर्वशालिनीम् । विचेष्टमाना मवशामद्यैवानेतुमुत्सहे

jitvā tāṁ prasabhaṁ kanyāṁ samare garvaśālinīm | viceṣṭamānā mavaśāmadyaivānetumutsahe

'उस अभिमानिनी कन्या को युद्ध में बलपूर्वक जीतकर, चाहे वह कितना भी छटपटाए, मैं आज ही उसे विवश करके ले आने का संकल्प करता हूँ।'

श्लोक 49 (skanda.8.63.49)

अथ तस्य वचः श्रुत्वा शंभुर्नाम महासुरः । प्रहस्योच्चैर्महाबाहुरिदमाहासुरेश्वरम्

atha tasya vacaḥ śrutvā śaṁbhurnāma mahāsuraḥ | prahasyoccairmahābāhuridamāhāsureśvaram

तब उसके वचन सुनकर शंभु नामक महाअसुर, वह महाबाहु, ऊँचे स्वर में हँसकर असुरेश्वर से यह बोला -

श्लोक 50 (skanda.8.63.50)

वामप्रकृतयः सर्वाः स्वभावेन वराङ्गनाः । परिसान्त्व्या सकृद् राजन् तां त्वमादातुमर्हसि

vāmaprakṛtayaḥ sarvāḥ svabhāvena varāṅganāḥ | parisāntvyā sakṛd rājan tāṁ tvamādātumarhasi

'हे राजन्, सभी उत्तम स्त्रियाँ स्वभाव से वक्र-प्रकृति की होती हैं; उन्हें एक बार समझा-बुझाकर तुम्हें उसे ले लेना चाहिए।'

श्लोक 51 (skanda.8.63.51)

श्रुत्वाथ वचनं शम्भोर्मयो दानवसत्तमः । प्रोवाचाभिनवोत्फुल्लनीलनीरजलोचनः

śrutvātha vacanaṁ śambhormayo dānavasattamaḥ | provācābhinavotphullanīlanīrajalocanaḥ

तब शंभु के वचन सुनकर, नवीन खिले हुए नीलकमल के समान नेत्रों वाले दानव-श्रेष्ठ मय ने कहा -

श्लोक 52 (skanda.8.63.52)

आकारः कः पुनस्तस्याः का वा चेष्टा सुराधिप । पार्श्वस्थानि च कान्यस्याः सदोपकरणानि वा

ākāraḥ kaḥ punastasyāḥ kā vā ceṣṭā surādhipa | pārśvasthāni ca kānyasyāḥ sadopakaraṇāni vā

'परंतु उसका रूप कैसा है, हे राजन्, और उसकी चेष्टा कैसी है? और उसके पास सदा रहने वाली वस्तुएँ तथा उसका साज-सामान क्या है?'

श्लोक 53 (skanda.8.63.53)

इत्युक्तवति दैत्येन्द्रे मये मत्तेभविक्रमे । अथ दैत्यपतिर्मूकं पार्श्वस्थं समचोदयत्

ityuktavati daityendre maye mattebhavikrame | atha daityapatirmūkaṁ pārśvasthaṁ samacodayat

मतवाले हाथी के समान पराक्रमी दैत्येंद्र मय के ऐसा कहने पर, दैत्यपति ने पास खड़े मूक को उत्तर देने के लिए प्रेरित किया।

श्लोक 54 (skanda.8.63.54)

यं प्रश्नं पृष्टवाँस्तत्र मयो मतिमतां वरः । मूकस्तु तं तदा सर्वमाख्यातुमुपचक्रमे

yaṁ praśnaṁ pṛṣṭavā~statra mayo matimatāṁ varaḥ | mūkastu taṁ tadā sarvamākhyātumupacakrame

बुद्धिमानों में श्रेष्ठ मय ने वहाँ जो प्रश्न पूछा था, उसका मूक तब पूरा उत्तर देने लगा।

श्लोक 55 (skanda.8.63.55)

सदा सुसंस्थिता व्यक्षा करालदशनानना । अष्टबाहुर्घनश्यामा सुनासा वल्गुनिस्वना

sadā susaṁsthitā vyakṣā karāladaśanānanā | aṣṭabāhurghanaśyāmā sunāsā valgunisvanā

'वह सदा संयत खड़ी रहती है, विशाल नेत्रों वाली, मुख में विकराल दाँतों वाली, अष्टभुजी, मेघ के समान श्याम, सुंदर नासिका वाली, मधुर स्वर वाली।'

श्लोक 56 (skanda.8.63.56)

सा र्श्वस्थानि सदा तस्याः सर्वप्रहरणानि च । तनुत्राणि च मुख्यानि चित्राण्याभरणानि च

sā rśvasthāni sadā tasyāḥ sarvapraharaṇāni ca | tanutrāṇi ca mukhyāni citrāṇyābharaṇāni ca

'उसके सदा पास रहने वाली वस्तुएँ हैं - उसके सभी अस्त्र-शस्त्र, प्रमुख कवच और विचित्र आभूषण।'

श्लोक 57 (skanda.8.63.57)

अत्यादित्यं वपुस्तस्याः कान्तिश्चातिनिशाकरा । इत्याख्याय तदा मूको विरेमे दैत्यसंसदि

atyādityaṁ vapustasyāḥ kāntiścātiniśākarā | ityākhyāya tadā mūko vireme daityasaṁsadi

'उसका शरीर सूर्य से भी अधिक तेजस्वी है, और उसकी कांति चंद्रमा से भी अधिक है।' ऐसा बताकर मूक तब दैत्य-सभा में चुप हो गया।

श्लोक 58 (skanda.8.63.58)

अथ दीर्घं विनिःश्वस्य तदा मय महासुरः । प्रोवाच सदसि स्वन्तं वचो वचनकोविदः

atha dīrghaṁ viniḥśvasya tadā maya mahāsuraḥ | provāca sadasi svantaṁ vaco vacanakovidaḥ

तब गहरी साँस लेकर महाअसुर मय, वचन-कुशल, उस सभा में अपने मन का यह वचन बोला -

श्लोक 59 (skanda.8.63.59)

नूनमुत्पादिता देवैः कृत्या युधि पराजितैः । विन्ध्यं महीध्रमायाता विनाशाय सुरद्विषाम्

nūnamutpāditā devaiḥ kṛtyā yudhi parājitaiḥ | vindhyaṁ mahīdhramāyātā vināśāya suradviṣām

'निश्चय ही यह युद्ध में पराजित देवताओं द्वारा उत्पन्न की गई कृत्या (मायावी शक्ति) है, जो देव-शत्रुओं के विनाश के लिए विंध्य पर्वत पर आई है।'

श्लोक 60 (skanda.8.63.60)

तदलं ते तया राजन् सन्ति कन्याः सुमध्यमाः । दीर्घाक्ष्यश्चारुसर्वाङ्ग्यो दैत्यदानववेश्मसु

tadalaṁ te tayā rājan santi kanyāḥ sumadhyamāḥ | dīrghākṣyaścārusarvāṅgyo daityadānavaveśmasu

'हे राजन्, उससे बस करो! दैत्य-दानवों के भवनों में सुमध्यमा, दीर्घनेत्रा, सर्वांगसुंदरी कन्याएँ मौजूद हैं।'

श्लोक 61 (skanda.8.63.61)

सम्यगाहृत्य ता राजन्ननुरूपाः कलस्वनाः । यथेष्टं क्रीड सततं प्रासादोदरसंस्थितः

samyagāhṛtya tā rājannanurūpāḥ kalasvanāḥ | yatheṣṭaṁ krīḍa satataṁ prāsādodarasaṁsthitaḥ

'हे राजन्, उन उपयुक्त, मधुर-स्वर वाली कन्याओं को भलीभाँति ले आओ और अपने प्रासाद के भीतर रहकर सदा इच्छानुसार क्रीड़ा करो।'

श्लोक 62 (skanda.8.63.62)

एवमुक्ते तदा वाक्ये मयेनासुरसंसदि । प्राह वाक्यं तदा शुम्भो विहस्येत्थं महासुरः

evamukte tadā vākye mayenāsurasaṁsadi | prāha vākyaṁ tadā śumbho vihasyetthaṁ mahāsuraḥ

मय द्वारा असुर-सभा में यह वचन कहे जाने पर, महाअसुर शुंभ ने तब हँसकर यह वचन कहा -

श्लोक 63 (skanda.8.63.63)

यदि सा दैवतैः सृष्टा कृत्या दानवशासने । अहत्वा दानवानाशु तदा सा न विरंस्यते

yadi sā daivataiḥ sṛṣṭā kṛtyā dānavaśāsane | ahatvā dānavānāśu tadā sā na viraṁsyate

'यदि वह देवताओं द्वारा दानव-शासन के विनाश के लिए रची गई कृत्या है, तो वह दानवों को मारे बिना शीघ्र शांत नहीं होगी।'

श्लोक 64 (skanda.8.63.64)

यावदेव न कृत्यास्मानभियुंक्ते कृतोद्यमा । तावदेव प्रसह्याशु तां वशे कर्तुमर्हथ

yāvadeva na kṛtyāsmānabhiyuṁkte kṛtodyamā | tāvadeva prasahyāśu tāṁ vaśe kartumarhatha

'जब तक यह कृत्या, प्रयत्नशील होकर, हम पर आक्रमण नहीं करती, तब तक ही तुम्हें शीघ्र बलपूर्वक उसे वश में कर लेना चाहिए।'

श्लोक 65 (skanda.8.63.65)

ततोनुमेनिरे सर्वे दैत्यदानवसत्तमाः । वचनं दैत्यराजस्य कालेनाभिप्रचोदिताः

tatonumenire sarve daityadānavasattamāḥ | vacanaṁ daityarājasya kālenābhipracoditāḥ

तब सभी श्रेष्ठ दैत्य-दानव, काल द्वारा प्रेरित होकर, दैत्यराज के इस वचन का अनुमोदन करने लगे।

श्लोक 66 (skanda.8.63.66)

अथ सदसि समस्तान् दैत्यसिंहाँस्तदानीं । त्रिदशपतिविजेता वाक्यमेतद् विहृत्य । उदपतदवलम्बिस्वच्छशुभ्रोरुहारो । नवजलभरनम्रः प्रावृषीवाम्बुवाहः

atha sadasi samastān daityasiṁhā~stadānīṁ | tridaśapativijetā vākyametad vihṛtya | udapatadavalambisvacchaśubhroruhāro | navajalabharanamraḥ prāvṛṣīvāmbuvāhaḥ

तब सभा में उपस्थित समस्त सिंह-सम दैत्यों से यह वचन कहकर, त्रिदशपति (इंद्र) का विजेता उठ खड़ा हुआ, उस पर लटकती हुई विशाल स्वच्छ श्वेत माला के साथ, मानो वर्षा-ऋतु में नए जल-भार से झुका हुआ मेघ हो।

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