अम्बिका खण्ड · अध्याय 9
वरदान
श्लोक 1 (skanda.8.9.1)
सनत्कुमार उवाच। ते दृष्ट्वा देवदेवेशं ब्रह्मेन्द्रप्रमुखाः सुराः । अस्तुवन् वाग्भिरिष्टाभिः प्रणम्य वृषवाहनम्
sanatkumāra uvāca| te dṛṣṭvā devadeveśaṁ brahmendrapramukhāḥ surāḥ | astuvan vāgbhiriṣṭābhiḥ praṇamya vṛṣavāhanam
सनत्कुमार बोले — देवाधिदेव को देखकर ब्रह्मा और इन्द्र आदि प्रमुख देवगण वृषभ-ध्वज (शिव) को प्रणाम कर मनोहर वचनों से उनकी स्तुति करने लगे।
श्लोक 2 (skanda.8.9.2)
पितामह उवाच। नमः शिवाय सोमाय भक्तानां भयहारिणे । नमः शूलाग्रहस्ताय कमण्डलुधराय च
pitāmaha uvāca| namaḥ śivāya somāya bhaktānāṁ bhayahāriṇe | namaḥ śūlāgrahastāya kamaṇḍaludharāya ca
पितामह (ब्रह्मा) बोले — शिव को, सौम्य को, भक्तों के भय को हरने वाले को नमस्कार है; त्रिशूल हाथ में धारण करने वाले तथा कमण्डलु धारण करने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 3 (skanda.8.9.3)
नमस्ते नीलकण्ठाय करालदशनाय च । त्रेताग्निदीप्तनेत्राय त्रिनेत्राय हराय च
namaste nīlakaṇṭhāya karāladaśanāya ca | tretāgnidīptanetrāya trinetrāya harāya ca
नीलकण्ठ को, विकराल दाढ़ों वाले को नमस्कार है; तीनों अग्नियों के समान दीप्त नेत्र वाले, त्रिनेत्र हर को नमस्कार है।
श्लोक 4 (skanda.8.9.4)
नमः पिनाकिने चैव नमोऽस्त्वशनिधारिणे । व्यालयज्ञोपवीताय कुण्डलाभरणाय च
namaḥ pinākine caiva namo'stvaśanidhāriṇe | vyālayajñopavītāya kuṇḍalābharaṇāya ca
पिनाकधारी को नमस्कार है, वज्रधारी को भी नमस्कार हो; सर्प का यज्ञोपवीत धारण करने वाले तथा कुण्डलों से अलंकृत को नमस्कार है।
श्लोक 5 (skanda.8.9.5)
नमश्चक्रधरायैव व्याघ्रचर्मधराय च । कृष्णाजिनोत्तरीयाय सर्पमेखलिने तथा
namaścakradharāyaiva vyāghracarmadharāya ca | kṛṣṇājinottarīyāya sarpamekhaline tathā
चक्रधारी को नमस्कार है और व्याघ्रचर्म धारण करने वाले को भी; कृष्णमृगचर्म को उत्तरीय बनाने वाले तथा सर्प को मेखला बनाने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 6 (skanda.8.9.6)
वरदात्रे च पुत्राय सरस्वतीसुवे तथा । सोमसूर्याक्षमालाय अक्षसूत्रकराय च
varadātre ca putrāya sarasvatīsuve tathā | somasūryākṣamālāya akṣasūtrakarāya ca
वरदाता को, पुत्र-स्वरूप को तथा सरस्वती को उत्पन्न करने वाले को नमस्कार है; चन्द्र-सूर्य रूपी अक्षमाला धारण करने वाले तथा हाथ में अक्षसूत्र धारण करने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 7 (skanda.8.9.7)
ज्वालामालासहस्राय ऊर्ध्वलिङ्गाय वै नमः । नमः पर्वतवासाय शिरोहर्त्रे च मे पुरा
jvālāmālāsahasrāya ūrdhvaliṅgāya vai namaḥ | namaḥ parvatavāsāya śirohartre ca me purā
सहस्रों ज्वालाओं की माला धारण करने वाले, ऊर्ध्वलिंग को नमस्कार है; पर्वतवासी तथा पूर्वकाल में मेरा शिर काटने वाले को नमस्कार है।
श्लोक 8 (skanda.8.9.8)
हालाहलविनाशाय कपालवरधारिणे । विमानवरवाहाय जनकाय ममैव च
hālāhalavināśāya kapālavaradhāriṇe | vimānavaravāhāya janakāya mamaiva ca
हालाहल विष का नाश करने वाले, उत्तम कपाल धारण करने वाले को नमस्कार है; उत्तम विमान को वाहन बनाने वाले तथा मेरे ही जनक (पिता) को नमस्कार है।
श्लोक 9 (skanda.8.9.9)
वरदाय वरिष्ठाय श्मशानरतये नमः । नमो नरस्य कर्त्रे च स्थितिकर्त्रे नमः सदा
varadāya variṣṭhāya śmaśānarataye namaḥ | namo narasya kartre ca sthitikartre namaḥ sadā
वरदाता को, वरिष्ठ को, श्मशान में रमण करने वाले को नमस्कार है; मनुष्य के रचयिता को नमस्कार है और स्थिति के कर्ता को सदा नमस्कार है।
श्लोक 10 (skanda.8.9.10)
उत्पत्तिप्रलयानां च कर्त्रे सर्वसहाय च । ऋषिदैवतनाथाय सर्वभूताधिपाय च । शिवः सौम्यश्च देवेश भव नो भक्तवत्सल
utpattipralayānāṁ ca kartre sarvasahāya ca | ṛṣidaivatanāthāya sarvabhūtādhipāya ca | śivaḥ saumyaśca deveśa bhava no bhaktavatsala
उत्पत्ति और प्रलय के कर्ता, सबका भार वहन करने वाले को नमस्कार है; ऋषियों और देवताओं के स्वामी, सभी प्राणियों के अधिपति को नमस्कार है। हे देवेश! आप हम पर शिव (कल्याणकारी) और सौम्य हों, हे भक्तवत्सल!
श्लोक 11 (skanda.8.9.11)
सनत्कुमार उवाच। ब्रह्मण्यथैवं स्तुवति देवदेवः स लोकपः । उवाच तुष्टस्तान्देवानृषींश्च तप्तैधितान्
sanatkumāra uvāca| brahmaṇyathaivaṁ stuvati devadevaḥ sa lokapaḥ | uvāca tuṣṭastāndevānṛṣīṁśca taptaidhitān
सनत्कुमार बोले — इस प्रकार ब्रह्मा के स्तुति करने पर लोकपाल देवदेव प्रसन्न होकर उन तपस्या से देदीप्यमान देवताओं और ऋषियों से बोले।
श्लोक 12 (skanda.8.9.12)
तुष्टोस्म्यनेन वः सत्यन्तपसा ऋषिदेवताः । वरं ब्रूत प्रदास्यामि सुनिश्चित्य च उच्यताम्
tuṣṭosmyanena vaḥ satyantapasā ṛṣidevatāḥ | varaṁ brūta pradāsyāmi suniścitya ca ucyatām
हे ऋषि-देवगण! तुम्हारी इस सच्ची तपस्या से मैं प्रसन्न हूँ। वर मांगो, मैं दूँगा; भलीभांति निश्चय करके कहो।
श्लोक 13 (skanda.8.9.13)
सनत्कुमार उवाच। अथ सर्वानभिप्रेक्ष्य संतुष्टाः तपसैधितान् । दर्शनेनैव विप्रेन्द्र ब्रह्मा वचनमब्रवीत्
sanatkumāra uvāca| atha sarvānabhiprekṣya saṁtuṣṭāḥ tapasaidhitān | darśanenaiva viprendra brahmā vacanamabravīt
सनत्कुमार बोले — हे विप्रेन्द्र! तब तपस्या से पुष्ट और संतुष्ट हुए उन सभी को देखकर ब्रह्मा ने दर्शनमात्र से ही यह वचन कहा।
श्लोक 14 (skanda.8.9.14)
ब्रह्मोवाच। यदि तुष्टोसि देवेश यदि देयो वरश्च नः । तस्माच्छिवश्च सौम्यश्च संदृश्यश्च भवस्व नः
brahmovāca| yadi tuṣṭosi deveśa yadi deyo varaśca naḥ | tasmācchivaśca saumyaśca saṁdṛśyaśca bhavasva naḥ
ब्रह्मा बोले — हे देवेश! यदि आप संतुष्ट हैं और यदि हमें वर देना है, तो आप हमारे लिए शिव (कल्याणकारी), सौम्य और सदा दृश्यमान बनिए।
श्लोक 15 (skanda.8.9.15)
सुखसंव्यवहार्यश्च नित्यं तुष्टमनास्तथा । सर्वकार्येषु च सदा हितः पथ्यश्च शंकर
sukhasaṁvyavahāryaśca nityaṁ tuṣṭamanāstathā | sarvakāryeṣu ca sadā hitaḥ pathyaśca śaṁkara
और सदा प्रसन्नचित्त रहते हुए सुखपूर्वक व्यवहार करने योग्य बनिए; हे शंकर! सभी कार्यों में सदा हितकारी और हितकर बने रहिए।
श्लोक 16 (skanda.8.9.16)
सह देव्या ससूनुश्च सह देवगणैरपि । एष नो दीयतां देव वरो वरसहस्रद
saha devyā sasūnuśca saha devagaṇairapi | eṣa no dīyatāṁ deva varo varasahasrada
देवी सहित, पुत्र सहित तथा देवगणों सहित भी — हे देव! हमें यही वर दीजिए, हे सहस्रों वर देने वाले!
श्लोक 17 (skanda.8.9.17)
सनत्कुमार उवाच। एवमुक्तः स भगवान् ब्रह्मणा देवसत्तमः । स्वकं तेजो महद् दिव्यं व्यसृजत् सर्वयोगवित्
sanatkumāra uvāca| evamuktaḥ sa bhagavān brahmaṇā devasattamaḥ | svakaṁ tejo mahad divyaṁ vyasṛjat sarvayogavit
सनत्कुमार बोले — ब्रह्मा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर सर्वयोगवेत्ता, देवश्रेष्ठ भगवान् ने अपने महान् दिव्य तेज को छोड़ा।
श्लोक 18 (skanda.8.9.18)
अर्धेन तेजसस्तस्य मुखादुल्का ससर्ज ह । तामाह भव नारीति भगवान् विश्वरूपधृक्
ardhena tejasastasya mukhādulkā sasarja ha | tāmāha bhava nārīti bhagavān viśvarūpadhṛk
उस तेज के आधे भाग से उनके मुख से एक उल्का उत्पन्न हुई। विश्वरूपधारी भगवान् ने उससे कहा — "तुम स्त्री बन जाओ।"
श्लोक 19 (skanda.8.9.19)
साकाशं द्यां च भूमिञ्च महिम्ना व्याप्य धिष्ठिता । उपतस्थे च देवेशं दीप्यमाना यथा तडित्
sākāśaṁ dyāṁ ca bhūmiñca mahimnā vyāpya dhiṣṭhitā | upatasthe ca deveśaṁ dīpyamānā yathā taḍit
उसने अपने प्रभाव से आकाश, द्युलोक और पृथ्वी को व्याप्त कर वहीं स्थिति की, और बिजली के समान चमकती हुई देवेश के समीप उपस्थित हुई।
श्लोक 20 (skanda.8.9.20)
तामाह प्रहसन् देवो देवीं कमललोचनाम् । ब्रह्माणं देवि वरदमाराधय शुचिस्मिते
tāmāha prahasan devo devīṁ kamalalocanām | brahmāṇaṁ devi varadamārādhaya śucismite
लोटस-नयनी उस देवी से मुस्कराते हुए देव ने कहा — "हे शुचिस्मिते! तुम वरदाता ब्रह्मा की आराधना करो।"
श्लोक 21 (skanda.8.9.21)
सा तथेति प्रतिज्ञाय तपस्तप्तुं प्रचक्रमे । रुद्रश्च तानृषीनाह शृणुध्वं मम तोषणे
sā tatheti pratijñāya tapastaptuṁ pracakrame | rudraśca tānṛṣīnāha śṛṇudhvaṁ mama toṣaṇe
वह "ऐसा ही हो" कहकर प्रतिज्ञा करके तपस्या करने लगी। और रुद्र ने उन ऋषियों से कहा — "मेरी प्रसन्नता के लिए सुनो।"
श्लोक 22 (skanda.8.9.22)
फलं फलवतां श्रेष्ठा यद् ब्रवीमि तपोधनाः । अमरा जरया त्यक्ता अरोगा जन्मवर्जिताः
phalaṁ phalavatāṁ śreṣṭhā yad bravīmi tapodhanāḥ | amarā jarayā tyaktā arogā janmavarjitāḥ
हे तपोधनो! फलवानों में श्रेष्ठ जो मैं कहता हूँ, उसका फल सुनो — तुम अमर, जरारहित, रोगरहित तथा जन्म से मुक्त हो जाओगे।
श्लोक 23 (skanda.8.9.23)
मद्भक्तास्तपसा युक्ता इहैव च निवत्स्यथ । अयं चैवाश्रमः श्रेष्ठः स्वर्णशृङ्गोचलोत्तमः
madbhaktāstapasā yuktā ihaiva ca nivatsyatha | ayaṁ caivāśramaḥ śreṣṭhaḥ svarṇaśṛṅgocalottamaḥ
मेरे भक्त तपस्या से युक्त होकर यहीं निवास करोगे; और यह आश्रम — स्वर्णशृंग नामक उत्तम पर्वत — अत्यन्त श्रेष्ठ होगा।
श्लोक 24 (skanda.8.9.24)
पुण्यं पवित्रं स्थानं वै भविष्यति न संशयः । मैनाके पर्वते ह्यस्मिन् स्वर्णाक्षोहं यतः स्थितः
puṇyaṁ pavitraṁ sthānaṁ vai bhaviṣyati na saṁśayaḥ | maināke parvate hyasmin svarṇākṣohaṁ yataḥ sthitaḥ
निःसंदेह यह स्थान पुण्य और पवित्र होगा; क्योंकि इस मैनाक पर्वत पर मैं स्वर्णाक्ष के रूप में स्थित हूँ।
श्लोक 25 (skanda.8.9.25)
स्वर्णाक्षीं चासृजं देवीं स्वर्णाक्षं तेन तत्स्मृतम् । स्वर्णाक्ष ऋषयो यूयं षट्कुलीयास्तपोधनाः
svarṇākṣīṁ cāsṛjaṁ devīṁ svarṇākṣaṁ tena tatsmṛtam | svarṇākṣa ṛṣayo yūyaṁ ṣaṭkulīyāstapodhanāḥ
और मैंने स्वर्णाक्षी देवी को उत्पन्न किया, इसीलिए यह स्वर्णाक्ष के नाम से प्रसिद्ध हुआ। हे षट्कुलीय तपोधन ऋषियो! तुम स्वर्णाक्ष के हो।
श्लोक 26 (skanda.8.9.26)
निवत्स्यथ मयाज्ञप्ताः स्वर्णाक्षं वै ततश्च ह । समन्ताद्योजनं क्षेत्रं पवित्रं तन्न संशयः
nivatsyatha mayājñaptāḥ svarṇākṣaṁ vai tataśca ha | samantādyojanaṁ kṣetraṁ pavitraṁ tanna saṁśayaḥ
मेरी आज्ञा से तुम स्वर्णाक्ष में निवास करोगे; और चारों ओर एक योजन तक का यह क्षेत्र पवित्र होगा, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 27 (skanda.8.9.27)
देवगन्धर्वचरितमप्सरोगणसेवितम् । सिंहेभशरभाकीर्णं शार्दूलर्क्षमृगाकुलम्
devagandharvacaritamapsarogaṇasevitam | siṁhebhaśarabhākīrṇaṁ śārdūlarkṣamṛgākulam
यह गन्धर्वों और देवताओं द्वारा विचरण किया हुआ, अप्सराओं के समूह से सेवित, सिंह-गज-शरभों से भरा तथा व्याघ्र-रीछ-मृगों से व्याप्त होगा।
श्लोक 28 (skanda.8.9.28)
अनेकविहगाकीर्णं लतावृक्षक्षुपाकुलम् । ब्रह्मचारी नियमवान् जितक्रोधो जितात्मवान्
anekavihagākīrṇaṁ latāvṛkṣakṣupākulam | brahmacārī niyamavān jitakrodho jitātmavān
अनेक पक्षियों से भरा, लताओं-वृक्षों-झाड़ियों से व्याप्त होगा। जो ब्रह्मचारी, नियमवान्, जितक्रोध और जितात्मा होकर —
श्लोक 29 (skanda.8.9.29)
उपोष्य त्रिगुणां रात्रिं चरुं कृत्वा निवेद्य च । यत्र तत्र मृतः सोपि ब्रह्मलोके निवत्स्यति
upoṣya triguṇāṁ rātriṁ caruṁ kṛtvā nivedya ca | yatra tatra mṛtaḥ sopi brahmaloke nivatsyati
तीन रात्रि उपवास करके, चरु बनाकर तथा उसे अर्पित करके, वह जहां कहीं भी मरे, वह भी ब्रह्मलोक में निवास करेगा।
श्लोक 30 (skanda.8.9.30)
योप्येवमेवाकामान्मां पश्येदत्र वृषध्वजम् । गोसहस्रफलं सोपि मत्प्रसादादवाप्स्यति
yopyevamevākāmānmāṁ paśyedatra vṛṣadhvajam | gosahasraphalaṁ sopi matprasādādavāpsyati
और जो भी निष्काम भाव से यहां वृषध्वज मुझे देखेगा, वह भी मेरी कृपा से सहस्र गोदान के फल को प्राप्त करेगा।
श्लोक 31 (skanda.8.9.31)
नियमेन मृतश्चात्र मया सह चरिष्यति । यावत् स्थास्यन्ति लोकाश्च मैनाकश्चाप्ययं गिरिः
niyamena mṛtaścātra mayā saha cariṣyati | yāvat sthāsyanti lokāśca mainākaścāpyayaṁ giriḥ
जो यहां नियमपूर्वक मरेगा, वह मेरे साथ विचरण करेगा — जब तक लोक स्थित रहेंगे और जब तक यह मैनाक पर्वत बना रहेगा।
श्लोक 32 (skanda.8.9.32)
तावत् सह मया देवा मत्प्रसादाच्चरिष्यथ । एवं स तानृषीनुक्त्वा दृष्टवा सौम्येन चक्षुषा । पश्यतामेव सर्वेषां तत्रैवान्तरधीयत
tāvat saha mayā devā matprasādāccariṣyatha | evaṁ sa tānṛṣīnuktvā dṛṣṭavā saumyena cakṣuṣā | paśyatāmeva sarveṣāṁ tatraivāntaradhīyata
"उतने समय तक, हे देवगण! तुम मेरी कृपा से मेरे साथ विचरोगे।" ऐसा उन ऋषियों से कहकर तथा सौम्य दृष्टि से देखकर, वह सबके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 33 (skanda.8.9.33)
सनत्कुमार उवाच। य इमां शृणुयान्मर्त्यो द्विजातीञ्छ्रावयीत वा । सोपि तत्फलमासाद्य चरेन्मृत्युविवर्जितः
sanatkumāra uvāca| ya imāṁ śṛṇuyānmartyo dvijātīñchrāvayīta vā | sopi tatphalamāsādya carenmṛtyuvivarjitaḥ
सनत्कुमार बोले — जो भी मनुष्य इसे सुने अथवा द्विजों को सुनाए, वह भी इसका फल पाकर मृत्युरहित होकर विचरेगा।
श्लोक 34 (skanda.8.9.34)
जयति जलदवाहः सर्वभूतान्तकालः । शमदमनिरतानां क्लेशहर्ता यतीनाम् । जननमरणहर्ता चेष्टतां धार्मिकाणाम् । विविधकरणयुक्तः खेचरः पादचारी
jayati jaladavāhaḥ sarvabhūtāntakālaḥ | śamadamaniratānāṁ kleśahartā yatīnām | jananamaraṇahartā ceṣṭatāṁ dhārmikāṇām | vividhakaraṇayuktaḥ khecaraḥ pādacārī
जलदवाहन (मेघों पर सवार), समस्त प्राणियों के अन्तकाल-स्वरूप वे जयशील हैं; शम-दम में रत यतियों के क्लेश को हरने वाले हैं; धर्मपरायण साधकों के जन्म-मृत्यु को हरने वाले हैं; विविध शक्तियों से युक्त, आकाशचारी और पादचारी दोनों हैं।
श्लोक 35 (skanda.8.9.35)
मदनपुरविदारी नेत्रदन्तापहारी । विगतभयविषादः सर्वभूतप्रणेता । सततमभिदधानश्चेकितानात्मचितः । करचरणललामः सर्वदृग् देवदेवः
madanapuravidārī netradantāpahārī | vigatabhayaviṣādaḥ sarvabhūtapraṇetā | satatamabhidadhānaścekitānātmacitaḥ | karacaraṇalalāmaḥ sarvadṛg devadevaḥ
मदन के नगर को नष्ट करने वाले, (यज्ञ के) नेत्र और दांत का हरण करने वाले हैं; भय-विषाद से रहित, सभी प्राणियों के मार्गदर्शक हैं; सदा सचेत और सजग मन वाले, सतत उपदेश देने वाले हैं; हाथ-पैरों से सुशोभित, सर्वदृष्टा देवाधिदेव हैं।