अम्बिका खण्ड · अध्याय 10
दक्ष का शाप
श्लोक 1 (skanda.8.10.1)
सनत्कुमार उवाच। सा देवी त्र्यम्बकप्रोक्ता तताप सुचिरं तपः । निराहारा कदाचिच्च एकपर्ण्णाशना पुनः
sanatkumāra uvāca| sā devī tryambakaproktā tatāpa suciraṁ tapaḥ | nirāhārā kadācicca ekaparṇṇāśanā punaḥ
सनत्कुमार बोले — त्र्यम्बक द्वारा कही गई वह देवी दीर्घकाल तक तपस्या करती रहीं — कभी निराहार रहकर, तो कभी एक पत्ते का ही आहार लेकर।
श्लोक 2 (skanda.8.10.2)
वाय्वाहारा पुनश्चापि अब्भक्षा भूय एव हि । तां तपश्चरणे युक्तां ब्रह्मा ज्ञात्वातिभास्वराम्
vāyvāhārā punaścāpi abbhakṣā bhūya eva hi | tāṁ tapaścaraṇe yuktāṁ brahmā jñātvātibhāsvarām
फिर कभी वायु का आहार करके, तो कभी केवल जल का आहार लेकर — इस प्रकार तपस्या में लगी और अत्यन्त तेजस्विनी उस देवी को जानकर ब्रह्मा ने...
श्लोक 3 (skanda.8.10.3)
उवाच ब्रूहि तुष्टोस्मि देवि किं करवाणि ते । साब्रवीत् त्र्यम्बकं देवं पतिं प्राप्येन्दुवर्च्चसम् । विचरेयं सुखं देव सर्वांल्लोकान्नमस्तव
uvāca brūhi tuṣṭosmi devi kiṁ karavāṇi te | sābravīt tryambakaṁ devaṁ patiṁ prāpyenduvarccasam | vicareyaṁ sukhaṁ deva sarvāṁllokānnamastava
...कहा — "हे देवी! बोलो, मैं प्रसन्न हूँ, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?" उसने कहा — "हे देव! चन्द्रमा के समान कान्तिमान् त्र्यम्बक देव को पति रूप में पाकर मैं सुखपूर्वक समस्त लोकों में विचरण करूं — आपको नमस्कार है।"
श्लोक 4 (skanda.8.10.4)
ब्रह्मोवाच। नहि येन शरीरेण क्रियते परमं तपः । तेनैव परमेशोसौ पतिः शम्भुरवाप्यते
brahmovāca| nahi yena śarīreṇa kriyate paramaṁ tapaḥ | tenaiva parameśosau patiḥ śambhuravāpyate
ब्रह्मा बोले — "जिस शरीर से परम तप किया जाता है, उसी शरीर से वह परमेश्वर शम्भु पति के रूप में प्राप्त नहीं होते।"
श्लोक 5 (skanda.8.10.5)
तस्माद्धि योगाद्भवती दक्षस्येह प्रजापतेः । जायस्व दुहिता भूत्वा पतिं रुद्रमवाप्स्यसि
tasmāddhi yogādbhavatī dakṣasyeha prajāpateḥ | jāyasva duhitā bhūtvā patiṁ rudramavāpsyasi
"अतः हे भवति! योग के द्वारा तुम यहां प्रजापति दक्ष की पुत्री बनकर जन्म लो; पुत्री बनकर तुम रुद्र को पति रूप में प्राप्त करोगी।"
श्लोक 6 (skanda.8.10.6)
ततः सा तद्वचः श्रुत्वा योगाद्देवी मनस्विनी । दक्षस्य दुहिता जज्ञे सतीनामातियोगिनी
tataḥ sā tadvacaḥ śrutvā yogāddevī manasvinī | dakṣasya duhitā jajñe satīnāmātiyoginī
तब उस वचन को सुनकर वह मनस्विनी देवी योग के द्वारा दक्ष की पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई, जो सती नामक अतियोगिनी थी।
श्लोक 7 (skanda.8.10.7)
तां दक्षस्त्र्यम्बकायैव ददौ भार्यामनिन्दिताम् । ब्रह्मणो वचनाद्यस्यां मानसानसृजत्सुतान्
tāṁ dakṣastryambakāyaiva dadau bhāryāmaninditām | brahmaṇo vacanādyasyāṁ mānasānasṛjatsutān
दक्ष ने उस निर्दोष कन्या को त्र्यम्बक को ही पत्नी रूप में दिया; और ब्रह्मा के वचन से उन्होंने (रुद्र ने) उसमें मानस पुत्रों को उत्पन्न किया।
श्लोक 8 (skanda.8.10.8)
आत्मतुल्यबलान्दीप्तान् जरामरणवर्जितान् । अनेकानि सहस्राणि रुद्राणाममितौजसाम्
ātmatulyabalāndīptān jarāmaraṇavarjitān | anekāni sahasrāṇi rudrāṇāmamitaujasām
अपने समान बल वाले, तेजस्वी, जरा-मृत्यु से रहित — अमित तेज वाले रुद्रों की अनेक सहस्रों संख्या उत्पन्न हुई।
श्लोक 9 (skanda.8.10.9)
तान्दृष्टा मृज्यमानाँश्च ब्रह्मा तं प्रत्यषेधयत् । मा स्राक्षीर्देवदेवेश प्रजा मृत्युविवर्जिताः
tāndṛṣṭā mṛjyamānā~śca brahmā taṁ pratyaṣedhayat | mā srākṣīrdevadeveśa prajā mṛtyuvivarjitāḥ
उन्हें बढ़ते हुए देखकर ब्रह्मा ने उन्हें (रुद्र को) रोका — "हे देवदेवेश! मृत्युरहित प्रजा को मत उत्पन्न करो।"
श्लोक 10 (skanda.8.10.10)
अन्याः सृजस्व भद्रन्ते प्रजा मृत्युसमन्विताः । तेन चोक्तं स्थितोस्मीति स्थाणुस्तेन ततः स्मृतः
anyāḥ sṛjasva bhadrante prajā mṛtyusamanvitāḥ | tena coktaṁ sthitosmīti sthāṇustena tataḥ smṛtaḥ
"हे भद्र! अन्य मृत्यु-सहित प्रजा को उत्पन्न करो।" तब उन्होंने कहा — "मैं स्थित हूँ (स्थितोऽस्मि)" — इसी कारण वे स्थाणु कहलाए।
श्लोक 11 (skanda.8.10.11)
देवदेव उवाच। न स्रक्ष्ये मृत्युसंयुक्ताः प्रजा ब्रह्मन् कथञ्चन । स्थितोस्मि वचनात्तेद्य वक्तव्यो नास्मि ते पुनः
devadeva uvāca| na srakṣye mṛtyusaṁyuktāḥ prajā brahman kathañcana | sthitosmi vacanāttedya vaktavyo nāsmi te punaḥ
देवदेव बोले — "हे ब्रह्मन्! मैं किसी भी प्रकार मृत्युयुक्त प्रजा को उत्पन्न नहीं करूँगा। आज तुम्हारे वचन से मैं स्थिर हूँ — तुम्हें मुझसे पुनः यह कहने की आवश्यकता नहीं।"
श्लोक 12 (skanda.8.10.12)
ये त्विमे मानसाः सृष्टा महात्मानो महाबलाः । चरिष्यन्ति मया सार्ध सर्व एते हि याज्ञिकाः
ye tvime mānasāḥ sṛṣṭā mahātmāno mahābalāḥ | cariṣyanti mayā sārdha sarva ete hi yājñikāḥ
"किन्तु ये जो मानस पुत्र पहले ही उत्पन्न किए जा चुके हैं, वे महात्मा, महाबली — ये सभी मेरे साथ विचरण करेंगे, क्योंकि ये सब याज्ञिक हैं।"
श्लोक 13 (skanda.8.10.13)
सनत्कुमार उवाच। अथ काले गते व्यास स दक्षः शापकारणात् । अन्यानाहूय जामातॄन्सदारानर्च्चयद् गृहे
sanatkumāra uvāca| atha kāle gate vyāsa sa dakṣaḥ śāpakāraṇāt | anyānāhūya jāmātṝnsadārānarccayad gṛhe
सनत्कुमार बोले — हे व्यास! तत्पश्चात् समय बीतने पर शाप के कारणवश दक्ष ने अपने अन्य जामाताओं को पत्नियों सहित बुलाकर अपने घर में उनका सत्कार किया।
श्लोक 14 (skanda.8.10.14)
सतीं सह त्र्यम्बकेण नाजुहाव रुषान्वितः । सती ज्ञात्वा तु तत्सर्वं गत्वा पितरमब्रवीत्
satīṁ saha tryambakeṇa nājuhāva ruṣānvitaḥ | satī jñātvā tu tatsarvaṁ gatvā pitaramabravīt
क्रोधयुक्त होकर उसने त्र्यम्बक सहित सती को नहीं बुलाया। किन्तु सती यह सब जानकर अपने पिता के पास जाकर बोली —
श्लोक 15 (skanda.8.10.15)
अहं ज्येष्ठा वरिष्ठा च जामात्रा सह सुव्रत । मां हित्वा नार्हसि ह्येताः सह भर्तृभिरर्चितुम्
ahaṁ jyeṣṭhā variṣṭhā ca jāmātrā saha suvrata | māṁ hitvā nārhasi hyetāḥ saha bhartṛbhirarcitum
"हे सुव्रत! मैं अपने पति के साथ (आपकी पुत्रियों में) ज्येष्ठा और वरिष्ठा हूँ। मुझे छोड़कर आपको इन अन्य कन्याओं का उनके पतियों सहित सत्कार करना उचित नहीं है।"
श्लोक 16 (skanda.8.10.16)
क्रोधेनाथ समाविष्टः स क्रोधोपहतेन्द्रियः । निरीक्ष्य प्राब्रवीद् दक्षश्चक्षुषा निर्दहन्निव
krodhenātha samāviṣṭaḥ sa krodhopahatendriyaḥ | nirīkṣya prābravīd dakṣaścakṣuṣā nirdahanniva
तब क्रोध से आविष्ट होकर, क्रोध से आहत इन्द्रियों वाले दक्ष ने उसे देखकर, मानो अपनी दृष्टि से जलाते हुए, कहा —
श्लोक 17 (skanda.8.10.17)
मामेताः सति सस्नेहाः पूजयन्ति सभर्तृकाः । न त्वं तथा पूजयसे सह भर्त्रा महाव्रते
māmetāḥ sati sasnehāḥ pūjayanti sabhartṛkāḥ | na tvaṁ tathā pūjayase saha bhartrā mahāvrate
"हे सती! ये अन्य कन्याएँ अपने पतियों सहित स्नेहपूर्वक मेरी पूजा करती हैं; किन्तु हे महाव्रते! तुम अपने पति के साथ उस प्रकार मेरी पूजा नहीं करतीं।"
श्लोक 18 (skanda.8.10.18)
गृहांश्च मे सपत्नीकाः प्रविशन्ति तपोधनाः । श्रेष्ठस्तस्मात्सदा मन्ये ततस्तानर्चयाम्यहम्
gṛhāṁśca me sapatnīkāḥ praviśanti tapodhanāḥ | śreṣṭhastasmātsadā manye tatastānarcayāmyaham
"और तपोधन (जामाता) अपनी पत्नियों सहित मेरे घर में प्रवेश करते हैं; इसलिए मैं सदा उसे श्रेष्ठ मानता हूँ, और इसीलिए मैं उनका सत्कार करता हूँ।"
श्लोक 19 (skanda.8.10.19)
तस्माद् यां ते करोम्यद्य शुभां वा यदि वाशुभाम् । पूजां गृहाण तां पुत्रि गच्छ वा यत्र रोचते
tasmād yāṁ te karomyadya śubhāṁ vā yadi vāśubhām | pūjāṁ gṛhāṇa tāṁ putri gaccha vā yatra rocate
"अतः हे पुत्री! आज मैं तुम्हारा जो भी सत्कार करूँ, शुभ हो या अशुभ, उसे स्वीकार करो, अथवा जहां तुम्हें अच्छा लगे वहां चली जाओ।"
श्लोक 20 (skanda.8.10.20)
सनत्कुमार उवाच। ततः सा क्रोधदीप्तास्या न जग्राहातिकोपिता । पूजामसम्मतां हीनामिदं चोवाच तं शुभा
sanatkumāra uvāca| tataḥ sā krodhadīptāsyā na jagrāhātikopitā | pūjāmasammatāṁ hīnāmidaṁ covāca taṁ śubhā
सनत्कुमार बोले — तब क्रोध से उसका मुख दीप्त हो उठा, वह अत्यन्त कुपित हुई और उसने उस अपमानजनक तथा हीन पूजा को स्वीकार नहीं किया; और उस शुभा (सती) ने उससे यह कहा —
श्लोक 21 (skanda.8.10.21)
यस्मादसम्मतामेनां पूजां त्वं कुरुषे मयि । श्लाघ्यां चैवाप्यदुष्टाञ्च श्रेष्ठां मां गर्हसे पितः
yasmādasammatāmenāṁ pūjāṁ tvaṁ kuruṣe mayi | ślāghyāṁ caivāpyaduṣṭāñca śreṣṭhāṁ māṁ garhase pitaḥ
"हे पिता! चूंकि तुम मुझे यह अपमानजनक पूजा देते हो, और मैं प्रशंसनीय, निर्दोष तथा श्रेष्ठ होते हुए भी तुम मेरी निन्दा करते हो —"
श्लोक 22 (skanda.8.10.22)
तस्मादियं स्वकं देहं त्यजाम्येषा तवात्मजा । असत्कृतायाः किं मेद्य जीवितेनाशुभेन ह
tasmādiyaṁ svakaṁ dehaṁ tyajāmyeṣā tavātmajā | asatkṛtāyāḥ kiṁ medya jīvitenāśubhena ha
"— इसलिए मैं, तुम्हारी यह पुत्री, आज अपने इस शरीर को त्याग देती हूँ। अपमानित हुई मुझे इस अशुभ जीवन से क्या लाभ है?"
श्लोक 23 (skanda.8.10.23)
सनत्कुमार उवाच। ततः कृत्वा नमस्कारं मनसा त्र्यम्बकाय ह । उवाचेदं सुसंरब्धा वचनं वचनारणिः
sanatkumāra uvāca| tataḥ kṛtvā namaskāraṁ manasā tryambakāya ha | uvācedaṁ susaṁrabdhā vacanaṁ vacanāraṇiḥ
सनत्कुमार बोले — तब मन से त्र्यम्बक को प्रणाम करके, अत्यन्त क्षुब्ध हुई वाक्-निपुणा सती ने यह वचन कहा —
श्लोक 24 (skanda.8.10.24)
यत्राहमुपपद्येयं पुनर्देहे स्वयेच्छया । देव तत्राप्यसंमूढा संभूता धार्मिका सती
yatrāhamupapadyeyaṁ punardehe svayecchayā | deva tatrāpyasaṁmūḍhā saṁbhūtā dhārmikā satī
"हे देव! जिस देह में मैं पुनः अपनी इच्छा से जन्म लूं, वहां भी मैं मोहरहित होकर, धर्मपरायणा और सती के रूप में उत्पन्न होऊं।"
श्लोक 25 (skanda.8.10.25)
गच्छेयं धर्मपत्नीत्वं त्र्यम्बकस्यैव धीमतः । ततः सा धारणां कृत्वा देव्याग्नेयीं समाधिना
gaccheyaṁ dharmapatnītvaṁ tryambakasyaiva dhīmataḥ | tataḥ sā dhāraṇāṁ kṛtvā devyāgneyīṁ samādhinā
"मैं बुद्धिमान् त्र्यम्बक की ही धर्मपत्नी बनूं।" तत्पश्चात् उसने समाधि द्वारा देवी की आग्नेयी धारणा को धारण किया।
श्लोक 26 (skanda.8.10.26)
ददाह वै स्वकं देहं स्वसमुत्थेन वह्निना । तां ज्ञात्वा त्र्यम्बको देवीं तथाभूतां महायशाः
dadāha vai svakaṁ dehaṁ svasamutthena vahninā | tāṁ jñātvā tryambako devīṁ tathābhūtāṁ mahāyaśāḥ
उसने अपने शरीर को अपने भीतर से उत्पन्न अग्नि से जला दिया। देवी को उस अवस्था में जानकर महायशस्वी त्र्यम्बक ने...
श्लोक 27 (skanda.8.10.27)
उवाच दक्षं संगम्य इदं वचनकोविदः । यस्मात्ते निन्दितश्चाहं प्रशस्ताश्चेतरे पृथक्
uvāca dakṣaṁ saṁgamya idaṁ vacanakovidaḥ | yasmātte ninditaścāhaṁ praśastāścetare pṛthak
...दक्ष से मिलकर, वचन में कुशल त्र्यम्बक ने यह कहा — "चूंकि तुमने मेरी निन्दा की है और अन्य (जामाताओं) को अलग से सम्मानित किया है —"
श्लोक 28 (skanda.8.10.28)
जामातरः सपत्नीकास्तस्माद्वैवस्वतेन्तरे । उत्पत्स्यन्ते पुनर्यज्ञे तव जामातरस्त्विमे
jāmātaraḥ sapatnīkāstasmādvaivasvatentare | utpatsyante punaryajñe tava jāmātarastvime
"— इसलिए वैवस्वत मन्वन्तर में तुम्हारे ये जामाता पत्नियों सहित पुनः तुम्हारे यज्ञ में उत्पन्न होंगे।"
श्लोक 29 (skanda.8.10.29)
त्वं चैव मम शापेन क्षत्रियो भविता नृप । प्रचेतसां सुतश्चैव कन्यायां शाखिनां पुनः । धर्मविघ्नञ्च ते तत्र करिष्ये क्रूरकर्मणः
tvaṁ caiva mama śāpena kṣatriyo bhavitā nṛpa | pracetasāṁ sutaścaiva kanyāyāṁ śākhināṁ punaḥ | dharmavighnañca te tatra kariṣye krūrakarmaṇaḥ
"और हे राजन्! मेरे शाप से तुम स्वयं क्षत्रिय बनोगे — प्रचेताओं के पुत्र, पुनः वृक्षों की कन्या से उत्पन्न होकर; और हे क्रूरकर्मा! मैं वहां तुम्हारे धर्म में विघ्न उत्पन्न करूंगा।"
श्लोक 30 (skanda.8.10.30)
सनत्कुमार उवाच। तमुवाच तदा दक्षो दूयता हृदयेन वै । मया यदि सुता स्वा वै प्रोक्ता त्यक्तापि वा पुनः
sanatkumāra uvāca| tamuvāca tadā dakṣo dūyatā hṛdayena vai | mayā yadi sutā svā vai proktā tyaktāpi vā punaḥ
सनत्कुमार बोले — तब दुःखित हृदय से दक्ष ने उससे कहा — "चाहे मैंने उसे अपनी पुत्री कहा हो या पुनः त्याग दिया हो —"
श्लोक 31 (skanda.8.10.31)
किं तवात्र कृतं देव अहं तस्याः प्रभुः सदा । यस्मात्त्वं मामभ्यशपस्तस्मात्त्वमपि शङ्कर । भुव्येव वत्स्यसे नित्यं नान्तरिक्षे कदाचन
kiṁ tavātra kṛtaṁ deva ahaṁ tasyāḥ prabhuḥ sadā | yasmāttvaṁ māmabhyaśapastasmāttvamapi śaṅkara | bhuvyeva vatsyase nityaṁ nāntarikṣe kadācana
"— हे देव! इसमें तुम्हारा क्या किया-धरा है? मैं सदा उसका स्वामी (पिता) हूं। चूंकि तुमने मुझे शाप दिया है, इसलिए हे शंकर! तुम भी सदा केवल पृथ्वी पर ही निवास करोगे, कभी अन्तरिक्ष में नहीं।"
श्लोक 32 (skanda.8.10.32)
भागं च तव यज्ञेषु दत्त्वा सर्वे द्विजातयः । अपस्प्रक्ष्यन्ति सर्वत्र महादेव महाद्युते
bhāgaṁ ca tava yajñeṣu dattvā sarve dvijātayaḥ | apasprakṣyanti sarvatra mahādeva mahādyute
"और हे महाद्युते महादेव! सभी द्विजगण यज्ञों में तुम्हारा भाग देकर सर्वत्र पश्चात् जल का स्पर्श करेंगे (शुद्धि हेतु)।"
श्लोक 33 (skanda.8.10.33)
सनत्कुमार उवाच। ततः स देवः प्रहसन् तमुवाच त्रिलोचनः । सर्वेषामेव लोकानां मूलं भूर्लोक उच्यते
sanatkumāra uvāca| tataḥ sa devaḥ prahasan tamuvāca trilocanaḥ | sarveṣāmeva lokānāṁ mūlaṁ bhūrloka ucyate
सनत्कुमार बोले — तब उस त्रिलोचन देव ने हंसते हुए उससे कहा — "समस्त लोकों का मूल भूर्लोक ही कहा जाता है।"
श्लोक 34 (skanda.8.10.34)
तमहं धारयाम्येको लोकानां हितकाम्यया । एतस्मिन् हि धृते लोकाः सर्वे तिष्ठन्ति शाश्वताः
tamahaṁ dhārayāmyeko lokānāṁ hitakāmyayā | etasmin hi dhṛte lokāḥ sarve tiṣṭhanti śāśvatāḥ
"मैं ही अकेला उसे लोकों के हित की कामना से धारण करता हूं; क्योंकि इसके धारण किए जाने पर ही सभी लोक शाश्वत रूप से स्थिर रहते हैं।"
श्लोक 35 (skanda.8.10.35)
तस्मात्तिष्ठाम्यहं नित्यमिहैव न तवेच्छया । भागान्दत्त्वा तथान्येभ्यो दित्सवो मे द्विजातयः
tasmāttiṣṭhāmyahaṁ nityamihaiva na tavecchayā | bhāgāndattvā tathānyebhyo ditsavo me dvijātayaḥ
"इसलिए मैं सदा यहीं रहता हूं — तुम्हारी इच्छा से नहीं; द्विजगण अन्य देवताओं के समान मुझे भी भाग देने की इच्छा रखते हैं।"
श्लोक 36 (skanda.8.10.36)
अपः स्पृशन्ति शुद्ध्यर्थं भागं यच्छन्ति मे ततः । दत्त्वा स्पृशन्ति भूयश्च धर्मस्यैवाभिवृद्ध्ये
apaḥ spṛśanti śuddhyarthaṁ bhāgaṁ yacchanti me tataḥ | dattvā spṛśanti bhūyaśca dharmasyaivābhivṛddhye
"वे शुद्धि के लिए जल का स्पर्श करते हैं, तत्पश्चात् मुझे भाग अर्पित करते हैं; और अर्पित करने के बाद पुनः धर्म की वृद्धि के लिए जल का स्पर्श करते हैं।"
श्लोक 37 (skanda.8.10.37)
यथा हि देवनिर्माल्यं शुचयो धारयन्त्युत । अशुचिं स्प्रष्टुकामाश्च त्यक्त्वापः संस्पृशन्ति च
yathā hi devanirmālyaṁ śucayo dhārayantyuta | aśuciṁ spraṣṭukāmāśca tyaktvāpaḥ saṁspṛśanti ca
"जैसे शुद्ध लोग देवता के निर्माल्य (उतारे हुए पुष्प आदि) को धारण करते हैं, और अशुद्ध वस्तु का स्पर्श करने की इच्छा वाले उसे त्यागकर पुनः जल का स्पर्श करते हैं —"
श्लोक 38 (skanda.8.10.38)
यथा ममैव मन्येषां दित्सवो ब्राह्मणर्षभाः । भागानपः स्पृशन्ति स्म तत्र का परिदेवना
yathā mamaiva manyeṣāṁ ditsavo brāhmaṇarṣabhāḥ | bhāgānapaḥ spṛśanti sma tatra kā paridevanā
"— उसी प्रकार, हे ब्राह्मणश्रेष्ठो! मुझे अथवा अन्य देवताओं को भाग देने की इच्छा रखने वाले जल का स्पर्श करते हैं; इसमें विलाप करने योग्य क्या है?"
श्लोक 39 (skanda.8.10.39)
त्वन्तु मच्छापनिर्दग्धो विपरीतो नराधमः । स्वस्यां सुतायां मूढात्मा पुत्रमुत्पादयिष्यसि
tvantu macchāpanirdagdho viparīto narādhamaḥ | svasyāṁ sutāyāṁ mūḍhātmā putramutpādayiṣyasi
"किन्तु तुम मेरे शाप से जले हुए, विपरीत बुद्धि, नराधम और मूढ़ात्मा होकर अपनी ही पुत्री में पुत्र उत्पन्न करोगे।"
श्लोक 40 (skanda.8.10.40)
सनत्कुमार उवाच। एवं स भगवाञ्छप्त्वा दक्षं देवो जगत्पतिः । विरराम महातेजा जगाम च यथागतम्
sanatkumāra uvāca| evaṁ sa bhagavāñchaptvā dakṣaṁ devo jagatpatiḥ | virarāma mahātejā jagāma ca yathāgatam
सनत्कुमार बोले — इस प्रकार दक्ष को शाप देकर वह भगवान् जगत्पति महातेजस्वी देव मौन हो गए और जैसे आए थे वैसे ही चले गए।
श्लोक 41 (skanda.8.10.41)
सोमदिवाकरवह्निसमाक्षं चन्द्रनिभाननपद्मदलाक्षम् । गोवृषवाहममेय गुणौघं शाश्वतमिन्दुवह प्रणताः स्मः
somadivākaravahnisamākṣaṁ candranibhānanapadmadalākṣam | govṛṣavāhamameya guṇaughaṁ śāśvataminduvaha praṇatāḥ smaḥ
जिनके नेत्र चन्द्र-सूर्य-अग्नि के समान हैं, जिनका मुख चन्द्रमा के सदृश और नेत्र कमलदल के समान हैं, जो वृषभवाहन हैं, जिनके गुणसमूह अपरिमेय हैं, उन शाश्वत चन्द्रधारी को हम प्रणाम करते हैं।
श्लोक 42 (skanda.8.10.42)
य इमं दक्षशापाङ्क देव्याश्चैवाशरीरताम् । शृणुयाद् वाथ विप्रान् वा श्रावयीत यतव्रतः । स सर्वपापनिर्मुक्तो रुद्रलोकमवाप्नुयात्
ya imaṁ dakṣaśāpāṅka devyāścaivāśarīratām | śṛṇuyād vātha viprān vā śrāvayīta yatavrataḥ | sa sarvapāpanirmukto rudralokamavāpnuyāt
जो भी संयमित व्रत वाला इस दक्ष-शाप और देवी की देहत्याग की कथा को सुने अथवा ब्राह्मणों को सुनाए, वह सभी पापों से मुक्त होकर रुद्रलोक को प्राप्त करेगा।