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अम्बिका खण्ड · अध्याय 11

देवी को ब्रह्मा का वरदान

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

श्लोक 1 (skanda.8.11.1)

अपृच्छद्धिमवान् प्रश्नं लोके ख्यातिकरं नु किम्

apṛcchaddhimavān praśnaṁ loke khyātikaraṁ nu kim

हिमवान् ने प्रश्न पूछा — इस लोक में यश देने वाला वह क्या है?

श्लोक 2 (skanda.8.11.2)

केनाक्षयाश्च लोकाः स्युः ख्यातिश्च परमा मुने । तथैव चार्चनीयत्वं सत्सु तत् कथयस्व मे

kenākṣayāśca lokāḥ syuḥ khyātiśca paramā mune | tathaiva cārcanīyatvaṁ satsu tat kathayasva me

किस साधन से अक्षय लोक प्राप्त होते हैं और परम कीर्ति मिलती है, हे मुने? तथा सज्जनों में पूज्यता कैसे प्राप्त होती है — यह मुझे बताइए।

श्लोक 3 (skanda.8.11.3)

कश्यप उवाच। अपत्येन महाभाग सर्वमेतदवाप्यते । मम ख्यातिरपत्येन ब्रह्मणश्चर्षिभिः सह

kaśyapa uvāca| apatyena mahābhāga sarvametadavāpyate | mama khyātirapatyena brahmaṇaścarṣibhiḥ saha

कश्यप ने कहा — हे महाभाग! यह सब कुछ संतान के द्वारा ही प्राप्त होता है। ब्रह्मा तथा ऋषियों के साथ मेरी कीर्ति भी संतान के ही कारण है।

श्लोक 4 (skanda.8.11.4)

किन्न पश्यसि शैलेन्द्र यतो मां परिपृच्छसि । वर्त्तयिष्यामि तच्चापि यन्मे दृष्टं पुराचल

kinna paśyasi śailendra yato māṁ paripṛcchasi | varttayiṣyāmi taccāpi yanme dṛṣṭaṁ purācala

हे शैलेन्द्र! ऐसा क्या है जो तुम नहीं देखते कि मुझसे यह पूछ रहे हो? हे पर्वत! मैंने पहले जो देखा था, वह भी मैं बताऊँगा।

श्लोक 5 (skanda.8.11.5)

वाराणसीमहं गच्छन्नपश्यं संस्थितं दिवि । विमानं स्वनवद्दिव्यमनौपम्यमनिन्दितम्

vārāṇasīmahaṁ gacchannapaśyaṁ saṁsthitaṁ divi | vimānaṁ svanavaddivyamanaupamyamaninditam

वाराणसी जाते हुए मैंने आकाश में स्थित एक दिव्य, ध्वनियुक्त, अनुपम और निर्दोष विमान देखा।

श्लोक 6 (skanda.8.11.6)

तस्याधस्तादार्त्तनादं गर्भस्थाने शृणोम्यहम् । तानहं तपसा ज्ञात्वा तत्रैवान्तर्हितः स्थितः

tasyādhastādārttanādaṁ garbhasthāne śṛṇomyaham | tānahaṁ tapasā jñātvā tatraivāntarhitaḥ sthitaḥ

उसके नीचे, गर्तस्थान में, मुझे पीड़ा का करुण स्वर सुनाई दिया। तपोबल से उन्हें पहचानकर मैं वहीं अदृश्य होकर खड़ा रहा।

श्लोक 7 (skanda.8.11.7)

अथागात्तत्र शैलेन्द्र विप्रो नियमवान् शुचिः । तीर्थाभिषेकपूतात्मा परे तपसि संस्थितः

athāgāttatra śailendra vipro niyamavān śuciḥ | tīrthābhiṣekapūtātmā pare tapasi saṁsthitaḥ

हे शैलेन्द्र! तब वहाँ एक नियमपालक, पवित्र, तीर्थस्नान से शुद्धात्मा तथा परम तप में स्थित एक ब्राह्मण आया।

श्लोक 8 (skanda.8.11.8)

अथ स व्रजमानस्तु व्याघ्रेणाभीषितो द्विजः । विवेश तं तदा देशं सा गर्ता यत्र भूधर

atha sa vrajamānastu vyāghreṇābhīṣito dvijaḥ | viveśa taṁ tadā deśaṁ sā gartā yatra bhūdhara

चलते हुए वह द्विज एक व्याघ्र से भयभीत होकर, हे भूधर! उस स्थान में जा घुसा जहाँ वह गर्त था।

श्लोक 9 (skanda.8.11.9)

गर्त्तायां वीरणस्तम्बे लम्बमानांस्तदा मुनीन् । अपश्यदार्तो दुःखार्त्तानपृच्छत्तांश्च स द्विजः

garttāyāṁ vīraṇastambe lambamānāṁstadā munīn | apaśyadārto duḥkhārttānapṛcchattāṁśca sa dvijaḥ

गर्त में वीरण घास के झुरमुट से लटकते हुए मुनियों को उसने देखा। दुखी होकर उस द्विज ने दुःखार्त उन मुनियों से प्रश्न किया।

श्लोक 10 (skanda.8.11.10)

के यूयं वीरणस्तम्बे लम्बमाना ह्यधोमुखाः । दुःखिताः केन मोक्षश्च युष्माकं भवितानघाः

ke yūyaṁ vīraṇastambe lambamānā hyadhomukhāḥ | duḥkhitāḥ kena mokṣaśca yuṣmākaṁ bhavitānaghāḥ

'तुम कौन हो, जो वीरण के झुरमुट में औंधे मुख लटके हुए दुखी हो? हे निष्पाप! तुम्हारी मुक्ति किस उपाय से होगी?'

श्लोक 11 (skanda.8.11.11)

पितर ऊचुः। वयन्ते कृतपुण्यस्य पितरः सपितामहाः । प्रपितामहाश्च क्लिश्यामस्तव दुष्टेन कर्मणा

pitara ūcuḥ| vayante kṛtapuṇyasya pitaraḥ sapitāmahāḥ | prapitāmahāśca kliśyāmastava duṣṭena karmaṇā

पितरों ने कहा — हे पुण्यशाली! हम तुम्हारे पिता, पितामह तथा प्रपितामह हैं, जो दुष्कर्म के कारण यहाँ क्लेश भोग रहे हैं।

श्लोक 12 (skanda.8.11.12)

नरकोयं महाभाग गर्त्तारूपं समास्थितः । त्वञ्चापि वीरणस्तम्बस्त्वयि लम्बामहे वयम्

narakoyaṁ mahābhāga garttārūpaṁ samāsthitaḥ | tvañcāpi vīraṇastambastvayi lambāmahe vayam

हे महाभाग! यह गर्त के रूप में स्थित नरक है, और तुम ही वह वीरण-झुरमुट हो जिस पर हम लटके हुए हैं।

श्लोक 13 (skanda.8.11.13)

यावत्त्वं जीवसे विप्र तावदेव वयं स्थिताः । मृते त्वयि गमिष्यामो नरकं पापचेतसः

yāvattvaṁ jīvase vipra tāvadeva vayaṁ sthitāḥ | mṛte tvayi gamiṣyāmo narakaṁ pāpacetasaḥ

हे विप्र! जब तक तुम जीवित हो, तब तक हम इसी स्थिति में हैं; तुम्हारे मरने पर हम पापी-चित्त नरक में चले जाएँगे।

श्लोक 14 (skanda.8.11.14)

यदि त्वं दारसंयोगं कृत्वापत्यं गुणोत्तरम् । उत्पादयसि तेनास्मान्मुच्येम वयमेकशः

yadi tvaṁ dārasaṁyogaṁ kṛtvāpatyaṁ guṇottaram | utpādayasi tenāsmānmucyema vayamekaśaḥ

यदि तुम विवाह करके गुणों से युक्त संतान उत्पन्न करो, तो उससे हम सब एक साथ मुक्त हो जाएँगे।

श्लोक 15 (skanda.8.11.15)

नान्येन तपसा पुत्र न तीर्थानां फलेन च । तत् कुरुष्व महाबुद्धे तारयस्व पितॄन् भयात्

nānyena tapasā putra na tīrthānāṁ phalena ca | tat kuruṣva mahābuddhe tārayasva pitṝn bhayāt

हे पुत्र! न किसी अन्य तप से और न तीर्थों के फल से यह संभव है; हे महाबुद्धे! वही करो और पितरों को इस भय से तारो।

श्लोक 16 (skanda.8.11.16)

स तथेति प्रतिज्ञाय आराध्य च वृषध्वजम् । पितॄन् गर्त्तात्समुद्धृत्य गणपान् प्रचकार ह

sa tatheti pratijñāya ārādhya ca vṛṣadhvajam | pitṝn garttātsamuddhṛtya gaṇapān pracakāra ha

उसने 'ऐसा ही हो' कहकर प्रतिज्ञा की और वृषध्वज (शिव) की आराधना करके पितरों को गर्त से उद्धार किया और उन्हें गणपति बना दिया।

श्लोक 17 (skanda.8.11.17)

स्वयञ्च रुद्रदयितः सुकेशो नाम नामतः । संमतो बलवांश्चैव रुद्रस्य च गणपोभवत्

svayañca rudradayitaḥ sukeśo nāma nāmataḥ | saṁmato balavāṁścaiva rudrasya ca gaṇapobhavat

वह स्वयं रुद्र का प्रिय, सुकेश नाम से प्रसिद्ध, सम्मानित और बलशाली हो गया तथा रुद्र का गणपति बना।

श्लोक 18 (skanda.8.11.18)

तस्मात् कृत्वा तपो घोरमपत्यं गुणवद् भृशम् । उत्पादयस्व शैलेन्द्र ततः कीर्तिमवाप्स्यसि

tasmāt kṛtvā tapo ghoramapatyaṁ guṇavad bhṛśam | utpādayasva śailendra tataḥ kīrtimavāpsyasi

अतः घोर तप करके अत्यंत गुणवान संतान उत्पन्न करो, हे शैलेन्द्र! उससे तुम्हें कीर्ति प्राप्त होगी।

श्लोक 19 (skanda.8.11.19)

सनत्कुमार उवाच। स एवमुक्तो ऋषिणा शैलेन्द्रो नियमे स्थितः । तपश्चकार विपुलं येन ब्रह्मा तुतोष ह

sanatkumāra uvāca| sa evamukto ṛṣiṇā śailendro niyame sthitaḥ | tapaścakāra vipulaṁ yena brahmā tutoṣa ha

सनत्कुमार ने कहा — इस प्रकार ऋषि द्वारा कहे जाने पर, नियमपूर्वक स्थित शैलेन्द्र ने विपुल तप किया, जिससे ब्रह्मा संतुष्ट हुए।

श्लोक 20 (skanda.8.11.20)

तमागत्य ततो ब्रह्मा वरदोस्मीत्यभाषत । ब्रूहि तुष्टोस्मि ते शैल तपसानेन सुव्रत

tamāgatya tato brahmā varadosmītyabhāṣata | brūhi tuṣṭosmi te śaila tapasānena suvrata

तब ब्रह्मा उसके पास आकर बोले — 'मैं वरदाता हूँ, कहो! हे सुव्रत पर्वत! मैं तुम्हारे इस तप से संतुष्ट हूँ।'

श्लोक 21 (skanda.8.11.21)

हिमवानुवाच। भगवन् पुत्रमिच्छामि गुणैः सर्वैरलंकृतम् । एतद्वरं प्रयच्छस्व यदि तुष्टोसि नः प्रभो

himavānuvāca| bhagavan putramicchāmi guṇaiḥ sarvairalaṁkṛtam | etadvaraṁ prayacchasva yadi tuṣṭosi naḥ prabho

हिमवान् ने कहा — हे भगवन्! मैं सभी गुणों से युक्त पुत्र चाहता हूँ। हे प्रभो! यदि आप हम पर प्रसन्न हैं तो यही वर दीजिए।

श्लोक 22 (skanda.8.11.22)

ब्रह्मोवाच। कन्या भवित्री शैलेन्द्र सुता ते वरवर्णिनी । यस्याः प्रभावात् सर्वत्र कीर्त्तिमाप्स्यसि पुष्कलाम्

brahmovāca| kanyā bhavitrī śailendra sutā te varavarṇinī | yasyāḥ prabhāvāt sarvatra kīrttimāpsyasi puṣkalām

ब्रह्मा ने कहा — हे शैलेन्द्र! तुम्हारी एक वरवर्णिनी कन्या होगी, जिसके प्रभाव से तुम सर्वत्र प्रचुर कीर्ति प्राप्त करोगे।

श्लोक 23 (skanda.8.11.23)

अर्चितः सर्वदेवानां तीर्थकोटीसमावृतः । पावनश्चैव पुण्यश्च देवानामपि सर्वतः । ज्येष्ठा च सा भवित्री ते अन्ये चानु ततः शुभे

arcitaḥ sarvadevānāṁ tīrthakoṭīsamāvṛtaḥ | pāvanaścaiva puṇyaśca devānāmapi sarvataḥ | jyeṣṭhā ca sā bhavitrī te anye cānu tataḥ śubhe

तुम सभी देवों द्वारा पूजित होगे, करोड़ों तीर्थों से घिरे, देवताओं के लिए भी सर्वथा पावन और पुण्यमय बनोगे। हे शुभे! वह तुम्हारी ज्येष्ठा कन्या होगी और उसके बाद अन्य भी होंगी।

श्लोक 24 (skanda.8.11.24)

सनत्कुमार उवाच। एवमुक्त्वा ततो ब्रह्मा तत्रैवान्तरधीयत । सोपि कालेन शैलेन्द्रो मेनायामुदपादयत्

sanatkumāra uvāca| evamuktvā tato brahmā tatraivāntaradhīyata | sopi kālena śailendro menāyāmudapādayat

सनत्कुमार ने कहा — ऐसा कहकर ब्रह्मा वहीं अंतर्धान हो गए। समय आने पर शैलेन्द्र ने मेना के गर्भ से संतानें उत्पन्न कीं।

श्लोक 25 (skanda.8.11.25)

अपर्णामेकपर्णां च तथा चाप्येकपाटलाम् । न्यग्रोधमेकपर्णा तु पाटलं चैकपाटला

aparṇāmekaparṇāṁ ca tathā cāpyekapāṭalām | nyagrodhamekaparṇā tu pāṭalaṁ caikapāṭalā

अपर्णा, एकपर्णा और एकपाटला — इस प्रकार तीन कन्याएँ हुईं। एकपर्णा न्यग्रोध (वट वृक्ष) से और एकपाटला पाटल वृक्ष से संबद्ध थी।

श्लोक 26 (skanda.8.11.26)

आश्रिते द्वे ह्यपर्णा तु अनिकेता तपोचरत् । शतं वर्षसहस्राणां दुश्चरं देवदानवैः

āśrite dve hyaparṇā tu aniketā tapocarat | śataṁ varṣasahasrāṇāṁ duścaraṁ devadānavaiḥ

दोनों बहनें वृक्षों का आश्रय लेकर रहीं, किन्तु अपर्णा बिना किसी आश्रय के एक लाख वर्षों तक ऐसा तप करती रही जो देवों और दानवों के लिए भी दुष्कर था।

श्लोक 27 (skanda.8.11.27)

आहारमेकपर्णेन सैकपर्णा समाचरत् । पाटलेन तथैकेन व्यदधाच्चैकपाटला

āhāramekaparṇena saikaparṇā samācarat | pāṭalena tathaikena vyadadhāccaikapāṭalā

एकपर्णा एक ही पत्ते के आहार पर रहती थी, और एकपाटला एक ही पाटल-पुष्प पर निर्वाह करती थी।

श्लोक 28 (skanda.8.11.28)

पूर्णे पूर्णे सहस्रे तु आहारं ते च चक्रतुः । अपर्णा तु निराहारा तां माता प्रत्यभाषत

pūrṇe pūrṇe sahasre tu āhāraṁ te ca cakratuḥ | aparṇā tu nirāhārā tāṁ mātā pratyabhāṣata

प्रत्येक हज़ार वर्ष पूर्ण होने पर वे दोनों आहार लेती थीं, परन्तु अपर्णा सर्वथा निराहार रही; तब उसकी माता ने उससे कहा।

श्लोक 29 (skanda.8.11.29)

निषेधयन्तीत्युमेति मातृस्नेहेन दुःखिता । सा तथोक्ता तदा मात्रा देवी दुश्चरचारिणी । तेनैव नाम्ना लोकेषु विख्याता सुरपूजिता

niṣedhayantītyumeti mātṛsnehena duḥkhitā | sā tathoktā tadā mātrā devī duścaracāriṇī | tenaiva nāmnā lokeṣu vikhyātā surapūjitā

मातृ-स्नेह से दुखी होकर माता ने उसे रोकते हुए कहा 'उ मा' (मत करो!)। इस प्रकार माता द्वारा कहे जाने पर वह दुष्करचारिणी देवी उसी नाम — उमा — से लोकों में विख्यात और देवपूजित हुई।

श्लोक 30 (skanda.8.11.30)

एतत् तत्त्रिकुमारीकं जगत् स्थावरजङ्गमम् । एतासां तपसा लोकान् यावद् भूमिर्धरिष्यति

etat tattrikumārīkaṁ jagat sthāvarajaṅgamam | etāsāṁ tapasā lokān yāvad bhūmirdhariṣyati

यह चराचर जगत् इन तीनों कुमारियों से सुरक्षित है; इनके तप के प्रभाव से लोक तब तक स्थिर रहेंगे जब तक पृथ्वी उन्हें धारण करेगी।

श्लोक 31 (skanda.8.11.31)

तपःशरीरास्ताः सर्वास्तिस्रो योगबलान्विताः । सर्वाश्चैव महायोगाः सर्वाश्च स्थिरयौवनाः

tapaḥśarīrāstāḥ sarvāstisro yogabalānvitāḥ | sarvāścaiva mahāyogāḥ sarvāśca sthirayauvanāḥ

तीनों ही तपोमय शरीर वाली, योगबल से संपन्न, महायोगिनी तथा सदा स्थिर यौवन वाली थीं।

श्लोक 32 (skanda.8.11.32)

लोकानां मातरश्चैव ब्रह्मचारिण्य एव च । अनुगृह्णन्ति लोकांश्च तपसा स्वेन सर्वदा

lokānāṁ mātaraścaiva brahmacāriṇya eva ca | anugṛhṇanti lokāṁśca tapasā svena sarvadā

वे लोकों की माताएँ हैं और साथ ही ब्रह्मचारिणी भी; अपने तप से वे सदा लोकों पर अनुग्रह करती हैं।

श्लोक 33 (skanda.8.11.33)

उमा तासां वरिष्ठा च श्रेष्ठा च वरवर्णिनी । महायोगबलोपेता महादेवमुपस्थिता

umā tāsāṁ variṣṭhā ca śreṣṭhā ca varavarṇinī | mahāyogabalopetā mahādevamupasthitā

उनमें उमा सबसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ, वरवर्णिनी, महायोगबल से युक्त तथा महादेव के प्रति समर्पित थी।

श्लोक 34 (skanda.8.11.34)

दत्तकश्चोशनास्तस्याः पुत्रः स भृगुनन्दनः । असितस्यैकवर्णा तु देवलं सुषुवे सुतम्

dattakaścośanāstasyāḥ putraḥ sa bhṛgunandanaḥ | asitasyaikavarṇā tu devalaṁ suṣuve sutam

दत्त और उशना उसके पुत्र थे, वह भृगुनन्दन थीं; तथा असित की एकवर्णा नामक पत्नी ने देवल नामक पुत्र को जन्म दिया।

श्लोक 35 (skanda.8.11.35)

या तु तासां कुमारीणां तृतीया ह्येकपाटला । पुत्रं शतशलाकस्य जैगीषव्यमुपस्थिता

yā tu tāsāṁ kumārīṇāṁ tṛtīyā hyekapāṭalā | putraṁ śataśalākasya jaigīṣavyamupasthitā

उन कन्याओं में जो तीसरी थी, एकपाटला, उसने शतशलाक से जैगीषव्य नामक पुत्र प्राप्त किया।

श्लोक 36 (skanda.8.11.36)

तस्यापि शंखलिखितौ स्मृतौ पुत्रावयोनिजौ । उमा तु या मया तुभ्यं कीर्तिता वरवर्णिनी

tasyāpi śaṁkhalikhitau smṛtau putrāvayonijau | umā tu yā mayā tubhyaṁ kīrtitā varavarṇinī

उसके भी शंख और लिखित नामक दो पुत्र अयोनिज माने जाते हैं। और उमा, जिसका वर्णन मैंने तुमसे किया, वह वरवर्णिनी थी।

श्लोक 37 (skanda.8.11.37)

अथ तस्यास्तपोयोगात् त्रैलोक्यमखिलं तदा । प्रधूपितं समालक्ष्य ब्रह्मा वचनमब्रवीत्

atha tasyāstapoyogāt trailokyamakhilaṁ tadā | pradhūpitaṁ samālakṣya brahmā vacanamabravīt

फिर उसके तप और योग के प्रभाव से समस्त त्रैलोक्य को धूमायमान देखकर ब्रह्मा ने यह वचन कहा।

श्लोक 38 (skanda.8.11.38)

ब्रह्मोवाच। देवि किं तपसा लोकान् तापयिष्यसि शोभने । त्वया सृष्टमिदं विश्वं मा कृत्वैतद्विनाशय

brahmovāca| devi kiṁ tapasā lokān tāpayiṣyasi śobhane | tvayā sṛṣṭamidaṁ viśvaṁ mā kṛtvaitadvināśaya

ब्रह्मा ने कहा — हे शोभने देवी! तुम तप से लोकों को क्यों संतप्त कर रही हो? यह विश्व तुम्हारे द्वारा ही रचा गया है, अपनी ही रचना का विनाश मत करो।

श्लोक 39 (skanda.8.11.39)

त्वं हि धारयसे लोकानिमान् सर्वान् स्वतेजसा । ब्रूहि किन्ते जगन्मातः प्रार्थितं संप्रसीद नः

tvaṁ hi dhārayase lokānimān sarvān svatejasā | brūhi kinte jaganmātaḥ prārthitaṁ saṁprasīda naḥ

तुम ही अपने तेज से इन सब लोकों को धारण करती हो। हे जगन्मातः! बताओ तुम्हारी क्या प्रार्थना है, हम पर प्रसन्न होओ।

श्लोक 40 (skanda.8.11.40)

देव्युवाच। यदर्थन्तपसो ह्यस्य चरणं मे पितामह । जानीषे तत्त्वतस्तन्मे ततः पृच्छसि किं पुनः

devyuvāca| yadarthantapaso hyasya caraṇaṁ me pitāmaha | jānīṣe tattvatastanme tataḥ pṛcchasi kiṁ punaḥ

देवी ने कहा — हे पितामह! जिस प्रयोजन से मैं यह तप कर रही हूँ, उसे आप तत्त्वतः जानते ही हैं; फिर मुझसे पुनः क्यों पूछ रहे हैं?

श्लोक 41 (skanda.8.11.41)

ब्रह्मोवाच। यदर्थ देवि तपसा श्राम्यसे लोकभावनि । स त्वां स्वयं समागम्य इहैव वरयिष्यति

brahmovāca| yadartha devi tapasā śrāmyase lokabhāvani | sa tvāṁ svayaṁ samāgamya ihaiva varayiṣyati

ब्रह्मा ने कहा — हे लोकभाविनी देवी! जिसके लिए तुम तप से स्वयं को थका रही हो, वही स्वयं यहाँ आकर तुम्हें वरण करेगा।

श्लोक 42 (skanda.8.11.42)

सर्वदेवपतिः श्रेष्ठः सर्वलोकेश्वरेश्वरः । वयं सदेवा यस्येशे वश्याः किङ्करवादिनः

sarvadevapatiḥ śreṣṭhaḥ sarvalokeśvareśvaraḥ | vayaṁ sadevā yasyeśe vaśyāḥ kiṅkaravādinaḥ

वह सब देवों का श्रेष्ठ स्वामी, सर्वलोकेश्वरों का भी ईश्वर है; हम देवताओं सहित उसके अधीन, सेवकों के समान आज्ञाकारी हैं।

श्लोक 43 (skanda.8.11.43)

सदेवदेवः परमेश्वरेश्वरः स्वयं तवायास्यति लोकपोन्तिकम् । उदाररूपो विकृतोभिरूपवान् समानरूपो हि नरस्य कस्यचित्

sadevadevaḥ parameśvareśvaraḥ svayaṁ tavāyāsyati lokapontikam | udārarūpo vikṛtobhirūpavān samānarūpo hi narasya kasyacit

वह देवाधिदेव, परमेश्वर के भी ईश्वर, हे लोकपालिनी! स्वयं तुम्हारे निकट आएँगे — उदार रूपवाले, किंतु विकृत भी और सुंदर भी, मानो किसी साधारण मनुष्य के समान रूप में।

श्लोक 44 (skanda.8.11.44)

महेश्वरः पर्वतलोकवासी चराचरेशः प्रथमो प्रमेयः । विनेन्दुनापीन्दुसमानवक्त्रो विभीषणं रूपमिहास्थितोग्र्यम्

maheśvaraḥ parvatalokavāsī carācareśaḥ prathamo prameyaḥ | vinendunāpīndusamānavaktro vibhīṣaṇaṁ rūpamihāsthitogryam

महेश्वर, पर्वतलोकवासी, चराचर के स्वामी, आदि और अगम्य, जिनका मुख बिना चंद्रमा के भी चंद्रमा-सम है, यहाँ एक भयंकर, अद्भुत रूप धारण करेंगे।

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