अम्बिका खण्ड · अध्याय 12
शिव का छद्मवेश में वरण
श्लोक 1 (skanda.8.12.1)
ततः स भगवान्देवो ब्रह्मा तामाह सुस्वरम् । देवि येनैव सृष्टासि न विना यस्त्वया शुभे
tataḥ sa bhagavāndevo brahmā tāmāha susvaram | devi yenaiva sṛṣṭāsi na vinā yastvayā śubhe
तब उन भगवान् देव ब्रह्मा ने मधुर स्वर में उससे कहा — हे शुभे देवी! जिसके द्वारा तुम्हारी सृष्टि हुई है, उसके बिना तुम नहीं हो।
श्लोक 2 (skanda.8.12.2)
स भर्ता तव देवेशो भविता मा तपः कृथाः । ततः प्रदक्षिणं कृत्वा ब्रह्मा व्यास गिरेः सुताम्
sa bhartā tava deveśo bhavitā mā tapaḥ kṛthāḥ | tataḥ pradakṣiṇaṁ kṛtvā brahmā vyāsa gireḥ sutām
देवेश ही तुम्हारा पति होगा, अब तप मत करो। हे व्यास! तदनन्तर ब्रह्मा गिरिसुता की प्रदक्षिणा करके चले गए।
श्लोक 3 (skanda.8.12.3)
जगामादर्शनं तस्याः सा चापि विरराम ह । सा देवी युक्तमित्येवमुक्त्वा स्वस्याश्रमस्य ह
jagāmādarśanaṁ tasyāḥ sā cāpi virarāma ha | sā devī yuktamityevamuktvā svasyāśramasya ha
वे उसकी दृष्टि से ओझल हो गए, और वह भी तप से निवृत्त हो गई। देवी ने 'यह उचित है' ऐसा कहकर अपने आश्रम की ओर प्रस्थान किया।
श्लोक 4 (skanda.8.12.4)
द्वारि जातमशोकं वै समुपाश्रित्य संस्थिता । अथागाच्चन्द्रतिलकस्त्रिदशार्तिहरो हरः
dvāri jātamaśokaṁ vai samupāśritya saṁsthitā | athāgāccandratilakastridaśārtiharo haraḥ
द्वार पर उगे अशोक वृक्ष का सहारा लेकर वह बैठ गई। तभी चन्द्रतिलक और त्रिदशों के कष्ट को हरने वाले हर वहाँ आए।
श्लोक 5 (skanda.8.12.5)
विकृतं रूपमास्थाय ह्रस्वो बाहुक एव च । विभुग्ननासिको भूत्वा कुब्जः केशान्तपिङ्गलः
vikṛtaṁ rūpamāsthāya hrasvo bāhuka eva ca | vibhugnanāsiko bhūtvā kubjaḥ keśāntapiṅgalaḥ
विकृत रूप धारण करके — नाटा, टेढ़ी भुजाओं वाला, टेढ़ी नाक वाला, कुबड़ा, तथा कनपटी पर भूरे बालों वाला।
श्लोक 6 (skanda.8.12.6)
उवाच विकृतास्यश्च देवि त्वां वरयाम्यहम् । अथोमा योगसंसिद्धा ज्ञात्वा शङ्करमागतम्
uvāca vikṛtāsyaśca devi tvāṁ varayāmyaham | athomā yogasaṁsiddhā jñātvā śaṅkaramāgatam
विकृत मुख वाले उसने कहा — 'हे देवी! मैं तुम्हें वरण करता हूँ।' तब योगसिद्धा उमा ने पहचान लिया कि आए हुए शंकर ही हैं।
श्लोक 7 (skanda.8.12.7)
अन्तर्भावविशुद्धात्मा क्रियानुष्ठानलिप्सया । तमुवाचार्घपाद्याभ्यां मधुपर्केण चैव हि । संपूज्य सुमनोनेत्रा ब्राह्मणं ब्राह्मणप्रिया
antarbhāvaviśuddhātmā kriyānuṣṭhānalipsayā | tamuvācārghapādyābhyāṁ madhuparkeṇa caiva hi | saṁpūjya sumanonetrā brāhmaṇaṁ brāhmaṇapriyā
अंतःकरण से शुद्ध, विधिपूर्वक पूजा करने की इच्छा से, सुंदर नेत्रों वाली तथा ब्राह्मणप्रिया उस देवी ने अर्घ्य, पाद्य और मधुपर्क से उस ब्राह्मण की पूजा करके उससे कहा।
श्लोक 8 (skanda.8.12.8)
देव्युवाच। भगवन्न स्वतन्त्रास्मि पिता मेस्त्यरणो तथा । तौ प्रभू मम दाने वै कन्याहं द्विजपुङ्गव
devyuvāca| bhagavanna svatantrāsmi pitā mestyaraṇo tathā | tau prabhū mama dāne vai kanyāhaṁ dvijapuṅgava
देवी ने कहा — हे भगवन्! मैं स्वतंत्र नहीं हूँ। मेरे पिता हैं, और उसी प्रकार एक अन्य संरक्षक भी; हे द्विजश्रेष्ठ! मेरे विवाह में वे ही दोनों समर्थ हैं, क्योंकि मैं एक कन्या हूँ।
श्लोक 9 (skanda.8.12.9)
गत्वा याचस्व पितरं मम शैलेन्द्रमव्ययम् । स चेद्ददाति मां विप्र तुभ्यं तद्रुचितं मम
gatvā yācasva pitaraṁ mama śailendramavyayam | sa ceddadāti māṁ vipra tubhyaṁ tadrucitaṁ mama
जाकर मेरे अविनाशी पिता शैलेन्द्र से याचना कीजिए; यदि वे मुझे आपको दे दें, हे विप्र! तो वह मुझे भी अभीष्ट होगा।
श्लोक 10 (skanda.8.12.10)
सनत्कुमार उवाच। ततः स भगवान् देवस्तथैव विकृतः प्रभुः । उवाच शैलराजं तमुमा मे यच्छ शैलप
sanatkumāra uvāca| tataḥ sa bhagavān devastathaiva vikṛtaḥ prabhuḥ | uvāca śailarājaṁ tamumā me yaccha śailapa
सनत्कुमार ने कहा — तब वे भगवान् देव उसी विकृत रूप में शैलराज से बोले — 'हे शैलप! मुझे उमा दे दीजिए।'
श्लोक 11 (skanda.8.12.11)
स तं विकृतरूपेण ज्ञात्वा रुद्रमथाव्ययम् । भीतः शापाच्च विमना इदं वचनमब्रवीत्
sa taṁ vikṛtarūpeṇa jñātvā rudramathāvyayam | bhītaḥ śāpācca vimanā idaṁ vacanamabravīt
उसे विकृत रूप में भी अविनाशी रुद्र जानकर, शाप के भय से खिन्न मन से उसने यह वचन कहा।
श्लोक 12 (skanda.8.12.12)
भगवन्नावमन्यामि ब्राह्मणान् भूमिदैवतान् । मनीषितं तु यत् पूर्वं तच्छृणुष्व महातपः
bhagavannāvamanyāmi brāhmaṇān bhūmidaivatān | manīṣitaṁ tu yat pūrvaṁ tacchṛṇuṣva mahātapaḥ
'हे भगवन्! मैं भूदेव ब्राह्मणों का अनादर नहीं करता; परन्तु हे महातपस्वी! जो पूर्व में मैंने निश्चय किया था, वह सुनिए।'
श्लोक 13 (skanda.8.12.13)
स्वयंवरो मे दुहितुर्भविता विप्र पूजितः । वरयेद्यं स्वयं तत्र स भर्त्तास्या भवेदिति
svayaṁvaro me duhiturbhavitā vipra pūjitaḥ | varayedyaṁ svayaṁ tatra sa bharttāsyā bhavediti
'हे पूजित विप्र! मेरी पुत्री का स्वयंवर होगा, वहाँ वह जिसे स्वयं वरण करेगी, वही उसका पति होगा।'
श्लोक 14 (skanda.8.12.14)
सनत्कुमार उवाच। तच्छ्रुत्वा शैलवचनं भगवान् गोवृषध्वजः । देव्याः समीपमागत्य इदमाह महामनाः
sanatkumāra uvāca| tacchrutvā śailavacanaṁ bhagavān govṛṣadhvajaḥ | devyāḥ samīpamāgatya idamāha mahāmanāḥ
सनत्कुमार ने कहा — पर्वतराज के वचन सुनकर, महामना गोवृषध्वज भगवान् देवी के समीप जाकर यह बोले।
श्लोक 15 (skanda.8.12.15)
देवि पित्रा तवाज्ञप्तः स्वयंवर इति श्रुतम् । तत्र त्वं वरयित्री यं स ते भर्त्ता किलानघे
devi pitrā tavājñaptaḥ svayaṁvara iti śrutam | tatra tvaṁ varayitrī yaṁ sa te bharttā kilānaghe
'हे देवी! मैंने सुना है कि तुम्हारे पिता ने स्वयंवर की आज्ञा दी है; हे अनघे! वहाँ जिसे तुम वरण करोगी, वही तुम्हारा पति होगा।'
श्लोक 16 (skanda.8.12.16)
तदापृच्छे गमिष्यामि दुर्ल्लभा त्वं वरानने । रूपवन्तं समुत्सृज्य वृणाथा मादृशं कथम्
tadāpṛcche gamiṣyāmi durllabhā tvaṁ varānane | rūpavantaṁ samutsṛjya vṛṇāthā mādṛśaṁ katham
'तो मैं आज्ञा लेकर जाता हूँ, हे वरानने! तुम दुर्लभ हो — कोई सुंदर पुरुष छोड़कर मेरे जैसे को तुम कैसे वरण करोगी?'
श्लोक 17 (skanda.8.12.17)
सनत्कुमार उवाच। तेनोक्ता सा तदा तत्र भावतो यत्तदीरितम् । भावञ्च रुद्रनिहितं प्रसादं मनसस्तथा
sanatkumāra uvāca| tenoktā sā tadā tatra bhāvato yattadīritam | bhāvañca rudranihitaṁ prasādaṁ manasastathā
सनत्कुमार ने कहा — उसके द्वारा ऐसा कहे जाने पर, उसने रुद्र के भीतर छिपे भाव तथा मन की प्रसन्नता को यथार्थतः समझ लिया।
श्लोक 18 (skanda.8.12.18)
संप्राप्योवाच देवेशं मा तेभूद् बुद्धिरन्यथा । अहं त्वां वरयिष्यामि नान्यद्भूतं कथञ्चन
saṁprāpyovāca deveśaṁ mā tebhūd buddhiranyathā | ahaṁ tvāṁ varayiṣyāmi nānyadbhūtaṁ kathañcana
उसके पास जाकर उसने देवेश से कहा — 'तुम्हारे मन में अन्यथा भाव न हो; मैं तुम्हें ही वरण करूँगी, अन्य किसी को कदापि नहीं।'
श्लोक 19 (skanda.8.12.19)
अथवा तेस्ति सन्देहो मयि विप्र कथञ्चन । इहैव त्वां महाभाग वरयामि मनोरथे
athavā testi sandeho mayi vipra kathañcana | ihaiva tvāṁ mahābhāga varayāmi manorathe
'अथवा हे विप्र! यदि तुम्हें मेरे विषय में कुछ भी संदेह है, तो हे महाभाग! मैं यहीं मनोरथ से तुम्हें वरण करती हूँ।'
श्लोक 20 (skanda.8.12.20)
सनत्कुमार उवाच। गृहीत्वा स्तबकं सा तु हस्ताभ्यां तत्र संस्थितम् । स्कन्धे शम्भोः समाधाय देवी प्राह वृतोसि मे
sanatkumāra uvāca| gṛhītvā stabakaṁ sā tu hastābhyāṁ tatra saṁsthitam | skandhe śambhoḥ samādhāya devī prāha vṛtosi me
सनत्कुमार ने कहा — वहाँ रखे हुए पुष्प-गुच्छ को दोनों हाथों से उठाकर, शम्भु के कंधे पर रखते हुए देवी ने कहा — 'तुम मेरे द्वारा वरण किए गए हो।'
श्लोक 21 (skanda.8.12.21)
ततः स भगवान् देवस्तथा देव्या वृतस्तदा । उवाच तमशोकं वै वाचा संजीवयन्निव
tataḥ sa bhagavān devastathā devyā vṛtastadā | uvāca tamaśokaṁ vai vācā saṁjīvayanniva
तब देवी द्वारा इस प्रकार वरण किए गए भगवान् ने उस अशोक वृक्ष से मानो अपनी वाणी से उसे पुनर्जीवित करते हुए कहा।
श्लोक 22 (skanda.8.12.22)
यस्मात्तव सुपुष्पेण स्तबकेन वृतो ह्यहम् । तस्मात्त्वं जरया त्यक्तोऽमरः संभविष्यसि
yasmāttava supuṣpeṇa stabakena vṛto hyaham | tasmāttvaṁ jarayā tyakto'maraḥ saṁbhaviṣyasi
'चूँकि तुम्हारे सुंदर पुष्प-गुच्छ द्वारा मैं वरण किया गया हूँ, इसलिए तुम बुढ़ापे से रहित और अमर हो जाओगे।'
श्लोक 23 (skanda.8.12.23)
कामरूपः कामपुष्पः कामगो दयितो मम । सर्वाभरणपुष्पाढ्यः सर्ववृक्षफलोपगः
kāmarūpaḥ kāmapuṣpaḥ kāmago dayito mama | sarvābharaṇapuṣpāḍhyaḥ sarvavṛkṣaphalopagaḥ
'तुम इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, इच्छानुसार पुष्प देने वाले, इच्छानुसार गमन करने वाले, मुझे प्रिय, सभी प्रकार के पुष्पाभूषणों से समृद्ध तथा सभी वृक्षों के फलों से युक्त हो जाओगे।'
श्लोक 24 (skanda.8.12.24)
सर्वान्नभक्षदश्चैव अमृतस्रव एव च । सर्वगन्धश्च देव्यास्त्वं भविष्यसि दृढं प्रियः
sarvānnabhakṣadaścaiva amṛtasrava eva ca | sarvagandhaśca devyāstvaṁ bhaviṣyasi dṛḍhaṁ priyaḥ
'तुम सभी प्रकार के अन्न देने वाले, अमृत का स्राव करने वाले, सभी सुगंधों से युक्त तथा देवी के दृढ़ प्रिय होगे।'
श्लोक 25 (skanda.8.12.25)
निर्भयः सर्वलोकेषु चरिष्यसि सुनिर्वृतः । आश्रमं चैनमत्यर्थं चित्रकूटेति विश्रुतम्
nirbhayaḥ sarvalokeṣu cariṣyasi sunirvṛtaḥ | āśramaṁ cainamatyarthaṁ citrakūṭeti viśrutam
'तुम सभी लोकों में निर्भय और पूर्णतः सुखी होकर विचरण करोगे, और यह आश्रम अत्यंत विख्यात होकर चित्रकूट नाम से प्रसिद्ध होगा।'
श्लोक 26 (skanda.8.12.26)
योभियास्यति पुण्यार्थी सोश्वमेधमवाप्स्यति । यत्र तत्र मृतश्चापि ब्रह्मलोकं गमिष्यति
yobhiyāsyati puṇyārthī sośvamedhamavāpsyati | yatra tatra mṛtaścāpi brahmalokaṁ gamiṣyati
'जो भी पुण्यार्थी यहाँ आएगा, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाएगा; और जो भी यहाँ कहीं भी मरेगा, वह ब्रह्मलोक को जाएगा।'
श्लोक 27 (skanda.8.12.27)
यश्चात्र नियमैर्युक्तः प्राणान् सम्यक् परित्यजेत् । स देव्यास्तपसा युक्तो महागणपतिर्भवेत्
yaścātra niyamairyuktaḥ prāṇān samyak parityajet | sa devyāstapasā yukto mahāgaṇapatirbhavet
'और जो भी यहाँ नियमों का पालन करते हुए विधिपूर्वक प्राण त्यागेगा, वह देवी के तप से युक्त होकर महागणपति बनेगा।'
श्लोक 28 (skanda.8.12.28)
सनत्कुमार उवाच। एवमुक्त्वा ततो देव आपृच्छ्य हिमवत्सुताम् । अन्तर्दधे जगत्स्रष्टा सर्वभूतपः ईश्वरः
sanatkumāra uvāca| evamuktvā tato deva āpṛcchya himavatsutām | antardadhe jagatsraṣṭā sarvabhūtapaḥ īśvaraḥ
सनत्कुमार ने कहा — ऐसा कहकर उन देव ने हिमवत्सुता से विदा लेकर, जगत्स्रष्टा और सर्वभूतों के स्वामी होने के कारण, अंतर्धान हो गए।
श्लोक 29 (skanda.8.12.29)
सापि देवी गते तस्मिन् भगवत्यमितात्मनि । तत एवोन्मुखी स्थित्वा शिलायां संविवेश ह
sāpi devī gate tasmin bhagavatyamitātmani | tata evonmukhī sthitvā śilāyāṁ saṁviveśa ha
वह देवी भी, अमितात्मा भगवान् के चले जाने पर, वहीं ऊर्ध्वमुखी होकर खड़ी रही और फिर शिला पर बैठ गई।
श्लोक 30 (skanda.8.12.30)
उन्मुखी सा गते तस्मिन्महेष्वासे प्रजापतौ । निशेव चन्द्ररहिता बभूव विमनास्तदा
unmukhī sā gate tasminmaheṣvāse prajāpatau | niśeva candrarahitā babhūva vimanāstadā
उस महाधनुर्धर प्रजापति के चले जाने पर ऊर्ध्वमुखी वह, चन्द्ररहित रात्रि के समान, तब विषण्ण हो गई।
श्लोक 31 (skanda.8.12.31)
अथ शुश्राव सा शब्दं बालस्यार्त्तस्य शैलजा । सरस्युदकसंपूर्णे समीपे स्वाश्रमस्य ह
atha śuśrāva sā śabdaṁ bālasyārttasya śailajā | sarasyudakasaṁpūrṇe samīpe svāśramasya ha
तभी शैलजा ने अपने आश्रम के निकट, जल से भरे सरोवर के पास, किसी संकटग्रस्त बालक की चीत्कार सुनी।
श्लोक 32 (skanda.8.12.32)
स कृत्वा बालरूपं तु देवदेवः स्वयं शिवः । क्रीडाहेतोः सरोमध्ये ग्राहग्रस्तोभवत्तदा
sa kṛtvā bālarūpaṁ tu devadevaḥ svayaṁ śivaḥ | krīḍāhetoḥ saromadhye grāhagrastobhavattadā
देवाधिदेव शिव स्वयं बालरूप धारण करके, क्रीड़ा के हेतु, सरोवर के मध्य में एक मगर द्वारा ग्रसित हो गए।
श्लोक 33 (skanda.8.12.33)
योगमायामथास्थाथ प्रपञ्चोद्भवकारणः । तद्रूपं सरसो मध्ये कृत्वेदं समभाषत
yogamāyāmathāsthātha prapañcodbhavakāraṇaḥ | tadrūpaṁ saraso madhye kṛtvedaṁ samabhāṣata
तब सृष्टि की उत्पत्ति के कारणभूत उन्होंने योगमाया का आश्रय लेकर सरोवर के मध्य में वही रूप धारण किए हुए यह कहा।
श्लोक 34 (skanda.8.12.34)
त्रातु मां कश्चिदेत्येह ग्राहेण हृतचेतसम् । धिक्कष्टं बाल एवाहमप्राप्तोथ मनोरथम्
trātu māṁ kaścidetyeha grāheṇa hṛtacetasam | dhikkaṣṭaṁ bāla evāhamaprāptotha manoratham
'कोई यहाँ आकर मुझे बचाए, मगर द्वारा मेरी चेतना हरी जा रही है! हाय, कैसा कष्ट है — मैं तो अभी बालक ही हूँ, अपने मनोरथ को भी प्राप्त नहीं कर सका!'
श्लोक 35 (skanda.8.12.35)
यास्यामि निधनं वक्त्रे ग्राहस्यास्य दुरात्मनः । शोचामि न स्वकं देहं ग्राहग्रस्तोपि दुःखितः
yāsyāmi nidhanaṁ vaktre grāhasyāsya durātmanaḥ | śocāmi na svakaṁ dehaṁ grāhagrastopi duḥkhitaḥ
'मैं इस दुरात्मा मगर के मुख में मृत्यु को प्राप्त होऊँगा। मगर द्वारा ग्रसित और दुखी होते हुए भी मुझे अपने शरीर का शोक नहीं है।'
श्लोक 36 (skanda.8.12.36)
यथा शोचामि पितरं मातरञ्च तपस्विनीम् । मां श्रुत्वा ग्राहवदने प्राप्तं निधनमुत्सुकौ
yathā śocāmi pitaraṁ mātarañca tapasvinīm | māṁ śrutvā grāhavadane prāptaṁ nidhanamutsukau
'मुझे तो अपने पिता और तपस्विनी माता का शोक है, जो यह सुनकर कि मैं मगर के मुख में मृत्यु को प्राप्त हुआ, अत्यंत व्याकुल हो उठेंगे!'
श्लोक 37 (skanda.8.12.37)
प्रियपुत्रावेकपुत्रौ प्राणान्नूनं विहास्यतः । अहो बत महत् कष्टं योहं बालोकृतव्रतः । अतप्त्वा तप एवायं यास्यामि निधनं हतः
priyaputrāvekaputrau prāṇānnūnaṁ vihāsyataḥ | aho bata mahat kaṣṭaṁ yohaṁ bālokṛtavrataḥ | ataptvā tapa evāyaṁ yāsyāmi nidhanaṁ hataḥ
'अपने प्रिय एकमात्र पुत्र के शोक में वे निश्चय ही प्राण त्याग देंगे। हाय, कैसा बड़ा कष्ट है कि मैं, एक व्रतहीन बालक, बिना कोई तप किए ही मारा जाकर मृत्यु को प्राप्त होऊँगा!'
श्लोक 38 (skanda.8.12.38)
सनत्कुमार उवाच। श्रुत्वा तु देवी तन्नादं विप्रस्यार्त्तस्य शोभना । उत्थाय प्रद्रुता तत्र यत्र तिष्ठत्यसौ द्विजः
sanatkumāra uvāca| śrutvā tu devī tannādaṁ viprasyārttasya śobhanā | utthāya pradrutā tatra yatra tiṣṭhatyasau dvijaḥ
सनत्कुमार ने कहा — उस पीड़ित ब्राह्मण-बालक की चीत्कार सुनकर, सुंदरी देवी उठकर वहाँ दौड़ पड़ीं, जहाँ वह द्विज खड़ा था।
श्लोक 39 (skanda.8.12.39)
सापश्यदिन्दुवदना बालकञ्चारुरूपिणम् । ग्राहेण ग्रस्यमानं तं वेपमानमवस्थितम्
sāpaśyadinduvadanā bālakañcārurūpiṇam | grāheṇa grasyamānaṁ taṁ vepamānamavasthitam
चन्द्रमुखी उस देवी ने उस सुंदर रूपवाले बालक को मगर द्वारा ग्रसे जाते हुए, काँपते हुए खड़े देखा।
श्लोक 40 (skanda.8.12.40)
सोपि ग्राहवरः श्रीमान् दृष्ट्वा देवीमुपागताम् । तं गृहीत्वा द्रुतं यातो मध्यं सरस एव हि
sopi grāhavaraḥ śrīmān dṛṣṭvā devīmupāgatām | taṁ gṛhītvā drutaṁ yāto madhyaṁ sarasa eva hi
वह श्रीमान् ग्राहराज भी देवी को आती देखकर, उसे पकड़कर शीघ्र ही सरोवर के मध्य में चला गया।
श्लोक 41 (skanda.8.12.41)
स कृष्यमाणस्तेजस्वी नादमार्त्तन्तदा करोत् । अथाह देवी दुःखार्त्ता बालं दृष्ट्वा महाव्रता
sa kṛṣyamāṇastejasvī nādamārttantadā karot | athāha devī duḥkhārttā bālaṁ dṛṣṭvā mahāvratā
खींचे जाते हुए उस तेजस्वी बालक ने तब पीड़ा का स्वर निकाला। तब दुःखी देवी ने, बालक को देखकर, यह कहा।
श्लोक 42 (skanda.8.12.42)
ग्राहराज महासत्व बालकं ह्येकपुत्रकम् । विसृजैनं महादंष्ट्र क्षिप्रं भीमपराक्रम
grāharāja mahāsatva bālakaṁ hyekaputrakam | visṛjainaṁ mahādaṁṣṭra kṣipraṁ bhīmaparākrama
'हे ग्राहराज! हे महासत्व! यह बालक अपने माता-पिता का एकमात्र पुत्र है। हे महादंष्ट्र, भीमपराक्रम! इसे शीघ्र छोड़ दो।'
श्लोक 43 (skanda.8.12.43)
ग्राह उवाच। यो देवि दिवसे षष्ठे प्रथमे समुपैति माम् । स आहारो मम पुरा विहितो लोककर्तृभिः
grāha uvāca| yo devi divase ṣaṣṭhe prathame samupaiti mām | sa āhāro mama purā vihito lokakartṛbhiḥ
मगर ने कहा — 'हे देवी! जो भी छठे दिन सबसे पहले मेरे पास आ जाता है, वही मेरा आहार होने के लिए लोक-निर्माताओं द्वारा पूर्वकाल में विहित किया गया है।'
श्लोक 44 (skanda.8.12.44)
सोयं मम महाभागे षष्ठेहनि गिरीन्द्रजे । ब्रह्मणा प्रहितो नूनं नैनं मोक्ष्ये कथञ्चन
soyaṁ mama mahābhāge ṣaṣṭhehani girīndraje | brahmaṇā prahito nūnaṁ nainaṁ mokṣye kathañcana
'हे महाभागे गिरीन्द्रजे! यह छठे दिन आया है, निश्चय ही ब्रह्मा द्वारा भेजा गया है; मैं इसे किसी भी प्रकार नहीं छोड़ूँगा।'
श्लोक 45 (skanda.8.12.45)
देव्युवाच। यन्मया हिमवच्छृङ्गे चरितं तप उत्तमम् । तेन बालमिमं मुञ्च ग्राहराज नमोस्तु ते
devyuvāca| yanmayā himavacchṛṅge caritaṁ tapa uttamam | tena bālamimaṁ muñca grāharāja namostu te
देवी ने कहा — 'हिमालय के शिखर पर मैंने जो उत्तम तप किया है, उसके प्रभाव से, हे ग्राहराज, इस बालक को छोड़ दो — तुम्हें नमस्कार है।'
श्लोक 46 (skanda.8.12.46)
ग्राह उवाच। मा व्ययं तपसो देवि कार्षीः शैलेन्द्रनन्दने । नैनं मोचयितुं शक्तो देवराजोपि यः स्वयम्
grāha uvāca| mā vyayaṁ tapaso devi kārṣīḥ śailendranandane | nainaṁ mocayituṁ śakto devarājopi yaḥ svayam
मगर ने कहा — 'हे शैलेन्द्रनन्दिनी देवी! अपने तप को व्यर्थ मत करो; इसे छुड़ाने में तो स्वयं देवराज भी समर्थ नहीं है।'
श्लोक 47 (skanda.8.12.47)
मह्यमीशेन तुष्टेन शर्वेणोग्रेण शूलिना । अमरत्वमवध्यत्वमक्षयं बलमेव च
mahyamīśena tuṣṭena śarveṇogreṇa śūlinā | amaratvamavadhyatvamakṣayaṁ balameva ca
'मुझे प्रसन्न होकर उग्र, शूलधारी शर्व ने अमरत्व, अवध्यत्व तथा अक्षय बल प्रदान किया है।'
श्लोक 48 (skanda.8.12.48)
स्वयं ग्रहणमोक्षश्च ज्ञानञ्चैवाव्ययं पुनः । दत्तं ततो ब्रवीमि त्वां नायं मोक्षमवाप्स्यति
svayaṁ grahaṇamokṣaśca jñānañcaivāvyayaṁ punaḥ | dattaṁ tato bravīmi tvāṁ nāyaṁ mokṣamavāpsyati
'तथा स्वयं ग्रहण करने और छोड़ने की शक्ति, तथा अविनाशी ज्ञान भी मुझे प्रदान किया गया है; अतः मैं तुमसे कहता हूँ, यह मोक्ष नहीं पा सकेगा।'
श्लोक 49 (skanda.8.12.49)
अथवा ते कृपा देवि भृशं बाले शुभानने । ब्रवीमि यत् कुरु तथा ततो मोक्षमवाप्स्यति
athavā te kṛpā devi bhṛśaṁ bāle śubhānane | bravīmi yat kuru tathā tato mokṣamavāpsyati
'अथवा हे शुभानने देवी! चूँकि इस बालक के प्रति तुम्हारी अत्यधिक करुणा है, मैं तुमसे कुछ कहता हूँ; जैसा कहता हूँ वैसा करो, तब यह मुक्त हो सकेगा।'
श्लोक 50 (skanda.8.12.50)
देव्युवाच। ग्राहाधिप वदस्वाशु यत् सतामविगर्हितम् । तत् कृतं नात्र सन्देहो मान्या मे ब्राह्मणा दृढम्
devyuvāca| grāhādhipa vadasvāśu yat satāmavigarhitam | tat kṛtaṁ nātra sandeho mānyā me brāhmaṇā dṛḍham
देवी ने कहा — 'हे ग्राहाधिप! जो सज्जनों द्वारा निंदित न हो, वह शीघ्र कहो; वह अवश्य किया जाएगा, इसमें संदेह नहीं — ब्राह्मण मेरे लिए दृढ़तापूर्वक माननीय हैं।'
श्लोक 51 (skanda.8.12.51)
ग्राह उवाच। यत् कृतं वै तपः किञ्चिद्भवत्या स्वल्पमन्ततः । तत् सर्वं मे प्रयच्छस्व ततो मोक्षमवाप्स्यति
grāha uvāca| yat kṛtaṁ vai tapaḥ kiñcidbhavatyā svalpamantataḥ | tat sarvaṁ me prayacchasva tato mokṣamavāpsyati
मगर ने कहा — 'तुमने अंततः जो भी तप किया है, चाहे थोड़ा ही क्यों न हो, वह सब मुझे दे दो; तभी यह मुक्त हो सकेगा।'
श्लोक 52 (skanda.8.12.52)
देव्युवाच। जन्मप्रभृति यत् पुण्यं महाग्राह कृतं मया । तत्ते सर्व मया दत्तं बालं मुञ्च ममाग्रतः
devyuvāca| janmaprabhṛti yat puṇyaṁ mahāgrāha kṛtaṁ mayā | tatte sarva mayā dattaṁ bālaṁ muñca mamāgrataḥ
देवी ने कहा — 'हे महाग्राह! जन्म से लेकर मैंने जो भी पुण्य अर्जित किया है, वह सब मैं तुम्हें देती हूँ; बालक को मेरे सामने छोड़ दो।'
श्लोक 53 (skanda.8.12.53)
सनत्कुमार उवाच। प्रजज्वाल ततो ग्राहस्तपसा तेन बृंहितः । आदित्य इव मध्याह्ने दुर्निरीक्ष्यस्तदाभवत्
sanatkumāra uvāca| prajajvāla tato grāhastapasā tena bṛṁhitaḥ | āditya iva madhyāhne durnirīkṣyastadābhavat
सनत्कुमार ने कहा — तब उस तप से बढ़कर मगर प्रज्वलित हो उठा और मध्याह्न के सूर्य के समान देखे न जाने योग्य हो गया।
श्लोक 54 (skanda.8.12.54)
उवाच चेदं हृष्टात्मा देवीं लोकस्य धारिणीम् । देवि किं कृतमेतत्ते अनिश्चित्य महाव्रते
uvāca cedaṁ hṛṣṭātmā devīṁ lokasya dhāriṇīm | devi kiṁ kṛtametatte aniścitya mahāvrate
और प्रसन्न होकर उसने लोकधारिणी देवी से यह कहा — 'हे महाव्रते देवी! बिना सोचे-समझे तुमने यह क्या किया?'
श्लोक 55 (skanda.8.12.55)
तपसो ह्यर्जनं दुःखं तस्य त्यागो न शस्यते । गृहाण तप एतच्च बालं चेमं शुचिस्मिते
tapaso hyarjanaṁ duḥkhaṁ tasya tyāgo na śasyate | gṛhāṇa tapa etacca bālaṁ cemaṁ śucismite
'तप का अर्जन तो दुष्कर है, उसका त्याग उचित नहीं माना जाता। हे शुचिस्मिते! अपना यह तप और यह बालक दोनों वापस ले लो।'
श्लोक 56 (skanda.8.12.56)
तुष्टोस्मि ते विप्रभक्त्या वरं तस्माद्ददामि ते । सा त्वेवमुक्ता ग्राहेण उवाचेदं महाव्रता
tuṣṭosmi te viprabhaktyā varaṁ tasmāddadāmi te | sā tvevamuktā grāheṇa uvācedaṁ mahāvratā
'मैं तुम्हारी ब्राह्मण-भक्ति से प्रसन्न हूँ, इसलिए तुम्हें वर देता हूँ।' मगर द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, महाव्रता देवी ने यह कहा।
श्लोक 57 (skanda.8.12.57)
सुविचिन्त्य महाग्राह कृतं बालस्य मोक्षणम् । न विप्रेभ्यस्तपः श्रेष्ठं श्रेष्ठा मे ब्राह्मणा मताः
suvicintya mahāgrāha kṛtaṁ bālasya mokṣaṇam | na viprebhyastapaḥ śreṣṭhaṁ śreṣṭhā me brāhmaṇā matāḥ
'हे महाग्राह! भलीभाँति विचार करने पर, बालक की मुक्ति हो चुकी है। तप ब्राह्मणों से श्रेष्ठ नहीं है — मेरे लिए ब्राह्मण ही सर्वश्रेष्ठ माने गए हैं।'
श्लोक 58 (skanda.8.12.58)
दत्त्वा चाहं न गृह्णामि ग्राहेन्द्र विदितं हि ते । न हि कश्चिन्नरो ग्राह प्रदत्तं पुनराहरेत्
dattvā cāhaṁ na gṛhṇāmi grāhendra viditaṁ hi te | na hi kaścinnaro grāha pradattaṁ punarāharet
'हे ग्राहेन्द्र! दे चुकने के बाद मैं वापस नहीं लेती, यह तुम जानते ही हो। हे ग्राह! कोई भी व्यक्ति दिया हुआ पुनः वापस नहीं लेता।'
श्लोक 59 (skanda.8.12.59)
दत्तमेतन्मया तुभ्यं नाददामि हि तत्पुनः । त्वय्येव रमतामेतद् बालश्चायं विमुच्यताम्
dattametanmayā tubhyaṁ nādadāmi hi tatpunaḥ | tvayyeva ramatāmetad bālaścāyaṁ vimucyatām
'यह मेरे द्वारा तुम्हें दिया जा चुका है, मैं इसे पुनः वापस नहीं लूँगी। यह तुम्हीं में रमण करे, और यह बालक मुक्त किया जाए।'
श्लोक 60 (skanda.8.12.60)
तथोक्तस्तां प्रशस्याथ मुक्त्वा बालं नमस्य च । देवीमादित्यसद्भासं तत्रैवान्तरधीयत
tathoktastāṁ praśasyātha muktvā bālaṁ namasya ca | devīmādityasadbhāsaṁ tatraivāntaradhīyata
इस प्रकार कहे जाने पर मगर ने उसकी प्रशंसा की, बालक को छोड़ दिया, तथा सूर्य के समान तेजयुक्त उस देवी को प्रणाम कर वहीं अंतर्धान हो गया।
श्लोक 61 (skanda.8.12.61)
बालोपि सरसस्तीरे मुक्तो ग्राहेण वै तदा । स्वप्नलब्ध इवार्थो यस्तत्रैवान्तरधीयत
bālopi sarasastīre mukto grāheṇa vai tadā | svapnalabdha ivārtho yastatraivāntaradhīyata
मगर द्वारा छोड़ा गया वह बालक भी सरोवर के तट पर, स्वप्न में प्राप्त वस्तु के समान, वहीं अंतर्धान हो गया।
श्लोक 62 (skanda.8.12.62)
तपसोथ व्ययं मत्वा देवी हिमगिरीन्द्रजा । भूय एव तपः कर्तुमारेभे यत्नमास्थिता
tapasotha vyayaṁ matvā devī himagirīndrajā | bhūya eva tapaḥ kartumārebhe yatnamāsthitā
तब अपने तप के व्यय हो जाने की सोचकर, हिमगिरीन्द्रजा देवी ने पुनः तप करने का प्रयत्न आरम्भ किया।
श्लोक 63 (skanda.8.12.63)
कर्तुकामां तपो भूयो ज्ञात्वा तां शंकरः स्वयम् । प्रोवाच वचनं व्यास मा कृथास्तप इत्युत
kartukāmāṁ tapo bhūyo jñātvā tāṁ śaṁkaraḥ svayam | provāca vacanaṁ vyāsa mā kṛthāstapa ityuta
उसे पुनः तप करने की इच्छुक जानकर शंकर स्वयं उससे यह वचन बोले, हे व्यास — 'ऐसा तप मत करो।'
श्लोक 64 (skanda.8.12.64)
मह्यमेतत्तपो देवि त्वया दत्तं महाव्रते । तेनैतदक्षयं तुभ्यं भविष्यति सहस्रधा
mahyametattapo devi tvayā dattaṁ mahāvrate | tenaitadakṣayaṁ tubhyaṁ bhaviṣyati sahasradhā
'हे महाव्रते देवी! यह तप तुमने मुझे दे ही दिया है; अतः यह तुम्हारे लिए सहस्रगुना अक्षय हो जाएगा।'
श्लोक 65 (skanda.8.12.65)
इति लब्ध्वा वरं देवी तपसोक्षय्यमुत्तमम् । स्वयंवरमुदीक्षन्ती तस्थौ प्रीतियुता सती
iti labdhvā varaṁ devī tapasokṣayyamuttamam | svayaṁvaramudīkṣantī tasthau prītiyutā satī
इस प्रकार तप का यह उत्तम और अक्षय वरदान पाकर, वह सती देवी प्रसन्नतापूर्वक अपने स्वयंवर की प्रतीक्षा करती रहीं।
श्लोक 66 (skanda.8.12.66)
इदं पठेद्यो हि नरः सदैव बालानुभावाचरणं हि शम्भोः । स देहभेदं समवाप्य पूतो भवेद् गणस्तस्य कुमारतुल्यः
idaṁ paṭhedyo hi naraḥ sadaiva bālānubhāvācaraṇaṁ hi śambhoḥ | sa dehabhedaṁ samavāpya pūto bhaved gaṇastasya kumāratulyaḥ
जो भी मनुष्य शम्भु के इस बाल-रूप के प्रभाव और चरित्र को सदा पढ़ता है, वह देहत्याग के पश्चात् पवित्र होकर कुमार के समान गण बन जाता है।