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अम्बिका खण्ड · अध्याय 13

उमा का विवाह

अध्याय 12अध्याय-सूचीअध्याय 14

श्लोक 1 (skanda.8.13.1)

सनत्कुमार उवाच। विस्तृते हिमवत्पृष्ठे विमानशतसंकुले । अभवत् स तु कालेन शैलपुत्र्याः स्वयंवरः

sanatkumāra uvāca| vistṛte himavatpṛṣṭhe vimānaśatasaṁkule | abhavat sa tu kālena śailaputryāḥ svayaṁvaraḥ

सनत्कुमार ने कहा — हिमालय के विस्तृत शिखर पर, जो सैकड़ों विमानों से भरा हुआ था, समय आने पर पर्वतपुत्री (पार्वती) का स्वयंवर हुआ।

श्लोक 2 (skanda.8.13.2)

अथ पर्वतराजोसौ हिमवान् ध्यानकोविदः । दुहितुर्देवदेवेन ज्ञात्वा तदभिमन्त्रितम्

atha parvatarājosau himavān dhyānakovidaḥ | duhiturdevadevena jñātvā tadabhimantritam

तदनन्तर ध्यान में निपुण पर्वतराज हिमवान ने यह जानकर कि देवों के देव (शिव) ने अपनी पुत्री को मन ही मन वर लिया है।

श्लोक 3 (skanda.8.13.3)

जानन्नपि महाशैलः समाचारक्रियेप्सया । स्वयंवरं ततो देव्याः सर्वलोकेष्वघोषयत्

jānannapi mahāśailaḥ samācārakriyepsayā | svayaṁvaraṁ tato devyāḥ sarvalokeṣvaghoṣayat

यह जानते हुए भी, उस महान पर्वत ने लोकाचार-विधि का पालन करने की इच्छा से देवी के स्वयंवर की घोषणा समस्त लोकों में करवा दी।

श्लोक 4 (skanda.8.13.4)

देवदानवसिद्धानां सर्वलोकनिवासिनाम् । वृणुयात् परमेशानं समक्षं येन मे सुता

devadānavasiddhānāṁ sarvalokanivāsinām | vṛṇuyāt parameśānaṁ samakṣaṁ yena me sutā

[उसने कहा] देवों, दानवों, सिद्धों और सभी लोकवासियों के समक्ष मेरी पुत्री परमेश्वर को ही वर के रूप में चुने।

श्लोक 5 (skanda.8.13.5)

तदेव सुकृतं श्लाघ्यं ममाभ्युदयसम्मतम् । इति संचिन्त्य शैलेन्द्रः कृत्वा हृदि महेश्वरम्

tadeva sukṛtaṁ ślāghyaṁ mamābhyudayasammatam | iti saṁcintya śailendraḥ kṛtvā hṛdi maheśvaram

यही मेरे लिए प्रशंसनीय पुण्यकर्म और अभ्युदय के अनुकूल होगा — ऐसा विचार कर पर्वतराज ने महेश्वर को हृदय में धारण किया।

श्लोक 6 (skanda.8.13.6)

आब्रह्मकेषु लोकेषु देव्याः शैलेन्द्रसत्तमः । कृत्वा रत्नाकुलं देशं स्वयंवरमचीकरत्

ābrahmakeṣu lokeṣu devyāḥ śailendrasattamaḥ | kṛtvā ratnākulaṁ deśaṁ svayaṁvaramacīkarat

उत्तम पर्वतराज ने ब्रह्मलोक तक के समस्त लोकों में देवी के स्वयंवर की व्यवस्था की और रत्नों से सुसज्जित स्थान में स्वयंवर सम्पन्न किया।

श्लोक 7 (skanda.8.13.7)

अथैवमाघोषितमात्र एव स्वयंवरे व्यास महीध्रपुत्र्याः । देवादयः सर्वजगन्निवासाः समाययुर्दिव्यगृहीतवेषाः

athaivamāghoṣitamātra eva svayaṁvare vyāsa mahīdhraputryāḥ | devādayaḥ sarvajagannivāsāḥ samāyayurdivyagṛhītaveṣāḥ

हे व्यास! ज्यों ही पर्वतपुत्री के स्वयंवर की घोषणा हुई, त्यों ही देवता आदि समस्त जगत्-निवासी दिव्य वेष धारण कर वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 8 (skanda.8.13.8)

प्रफुल्लपद्मासनसन्निविष्टः सिद्धैर्वृतो योगिभिरप्रमेयैः । विज्ञापितस्तेन महीध्रराजा पितामहस्तत्र समाजगाम

praphullapadmāsanasanniviṣṭaḥ siddhairvṛto yogibhiraprameyaiḥ | vijñāpitastena mahīdhrarājā pitāmahastatra samājagāma

खिले हुए कमलासन पर विराजमान, सिद्धों और अगणित योगियों से घिरे हुए पितामह ब्रह्मा, पर्वतराज द्वारा सूचित किए जाने पर वहाँ पधारे।

श्लोक 9 (skanda.8.13.9)

अक्ष्णां सहस्रं सुरराट् स बिभ्रद् दिव्याङ्गहारस्रगुदात्तरूपः । ऐरावतं सर्वगजेन्द्रमुख्यं स्रवन्मदासारकृतप्रवाहम्

akṣṇāṁ sahasraṁ surarāṭ sa bibhrad divyāṅgahārasragudāttarūpaḥ | airāvataṁ sarvagajendramukhyaṁ sravanmadāsārakṛtapravāham

सहस्र नेत्रों को धारण करने वाले, दिव्य अंगहार और मालाओं से सुशोभित, उदात्त रूपधारी देवराज इन्द्र, मद की धारा बहाते हुए गजेन्द्रश्रेष्ठ ऐरावत पर आरूढ़ होकर आए।

श्लोक 10 (skanda.8.13.10)

आरुह्य सर्वामरराट् स वज्रं बिभ्रत्समागात् पुरतः सुराणाम् । तेजः प्रतापाऽधिकदिव्यरूपः प्रोद्भासयन् सर्वदिशो विवस्वान्

āruhya sarvāmararāṭ sa vajraṁ bibhratsamāgāt purataḥ surāṇām | tejaḥ pratāpā'dhikadivyarūpaḥ prodbhāsayan sarvadiśo vivasvān

सभी देवताओं के राजा इन्द्र वज्र धारण किए हुए देवताओं के आगे-आगे आए, और तेजस्वी सूर्य अपने प्रताप से अधिक दिव्य रूप धारण कर समस्त दिशाओं को प्रकाशित करते हुए आए।

श्लोक 11 (skanda.8.13.11)

हैमं विमानं स चलत्पताकमारुह्य आगात् त्वरितं जवेन । मणिप्रदीप्तोज्ज्वलकुण्डलश्च वह्न्यर्कतेजःप्रतिमे विमाने

haimaṁ vimānaṁ sa calatpatākamāruhya āgāt tvaritaṁ javena | maṇipradīptojjvalakuṇḍalaśca vahnyarkatejaḥpratime vimāne

वह फहराती पताकाओं वाले स्वर्णिम विमान पर सवार होकर वेग से शीघ्र आया, मणियों से जगमगाते उज्ज्वल कुण्डल धारण किए, अग्नि और सूर्य के तेज के समान उस विमान में विराजमान होकर।

श्लोक 12 (skanda.8.13.12)

समभ्यगात् कश्यपविप्रसूनुरादित्य आराद् भगनामधारी । पीनाङ्गयष्टिः सुकृताङ्गहारस्तेजोबलाज्ञासदृशप्रभावः

samabhyagāt kaśyapaviprasūnurāditya ārād bhaganāmadhārī | pīnāṅgayaṣṭiḥ sukṛtāṅgahārastejobalājñāsadṛśaprabhāvaḥ

कश्यप ऋषि के पुत्र, भग नामधारी आदित्य, समीप ही पधारे — उनका शरीर पुष्ट था, अंगहार सुन्दर थे, और उनका प्रभाव तेज, बल तथा आज्ञा में अद्वितीय था।

श्लोक 13 (skanda.8.13.13)

दण्डं समादाय कृतान्त आगादारुह्य भीमं महिषं जवेन । महामहीध्रोच्छ्रय पीनगात्रः स्वर्णादिरत्नाचितचारुवेषः

daṇḍaṁ samādāya kṛtānta āgādāruhya bhīmaṁ mahiṣaṁ javena | mahāmahīdhrocchraya pīnagātraḥ svarṇādiratnācitacāruveṣaḥ

यमराज दण्ड धारण किए हुए, भयंकर महिष पर वेग से सवार होकर आए — उनका शरीर विशाल पर्वत के समान ऊँचा और पुष्ट था, और वे स्वर्ण तथा रत्नों से जड़ित सुन्दर वेष धारण किए हुए थे।

श्लोक 14 (skanda.8.13.14)

समीरणः सर्वजगद्विभर्त्ता विमानमारुह्य समभ्यगाद्धि । सन्तापयन्सर्वसुरासुरेशाँस्तेजोधिक स्तेजसि सन्निविश्य

samīraṇaḥ sarvajagadvibharttā vimānamāruhya samabhyagāddhi | santāpayansarvasurāsureśā~stejodhika stejasi sanniviśya

समस्त जगत् को धारण करने वाले वायुदेव भी विमान पर सवार होकर आए, और अपने अधिक तेज से समस्त देवासुर-स्वामियों को संतप्त करते हुए तेज में स्थित हुए।

श्लोक 15 (skanda.8.13.15)

वह्निः समभ्येत्य सुरेन्द्रमध्ये ज्वलन् प्रतस्थौ वरवेषधारी । नानामणिप्रज्वलिताङ्गयष्टिर्जगच्चरन्दिव्यविमानमग्र्यम्

vahniḥ samabhyetya surendramadhye jvalan pratasthau varaveṣadhārī | nānāmaṇiprajvalitāṅgayaṣṭirjagaccarandivyavimānamagryam

अग्निदेव भी उत्तम वेष धारण किए, जाज्वल्यमान होकर देवराजों के मध्य आकर खड़े हुए — उनका शरीर नाना मणियों से प्रज्वलित था, और वे जगत् में विचरण करने वाले सर्वोत्तम दिव्य विमान पर थे।

श्लोक 16 (skanda.8.13.16)

आरुह्य सर्वद्रविणाधिपेशः स राजराजस्त्वरितोभ्यगाच्च । आप्याययन् सर्वसुरासुरेशान् कान्त्या च वेषेण च चारुरूपः

āruhya sarvadraviṇādhipeśaḥ sa rājarājastvaritobhyagācca | āpyāyayan sarvasurāsureśān kāntyā ca veṣeṇa ca cārurūpaḥ

समस्त धन के अधिपति राजराज कुबेर भी सवार होकर वेगपूर्वक आए, और अपनी कान्ति, वेष तथा सुन्दर रूप से समस्त देवासुर-स्वामियों को आनन्दित करते हुए आए।

श्लोक 17 (skanda.8.13.17)

ज्वलन्महारत्नविचित्ररूपं विमानमारुह्य शशी समागात् । श्यामाङ्गयष्टिः सुविचित्रवेषः सर्व स्रगाबद्धसुगन्धिमालः

jvalanmahāratnavicitrarūpaṁ vimānamāruhya śaśī samāgāt | śyāmāṅgayaṣṭiḥ suvicitraveṣaḥ sarva sragābaddhasugandhimālaḥ

चन्द्रमा भी जाज्वल्यमान महारत्नों से विचित्र रूप वाले विमान पर सवार होकर आए — उनका शरीर श्याम वर्ण का था, वेष अत्यन्त विचित्र था, और वे सर्वत्र सुगन्धित मालाओं से आबद्ध थे।

श्लोक 18 (skanda.8.13.18)

तार्क्ष्यं समारुह्य महीध्रकल्पं गदाधरोसौ त्वरितं समेतः । तथाश्विनौ देवभिषग्वरौ तौ एकं विमानं त्वरयाभिरुह्य

tārkṣyaṁ samāruhya mahīdhrakalpaṁ gadādharosau tvaritaṁ sametaḥ | tathāśvinau devabhiṣagvarau tau ekaṁ vimānaṁ tvarayābhiruhya

गदाधर विष्णु पर्वत के समान विशाल गरुड़ पर सवार होकर वेगपूर्वक पधारे, और वैद्यों में श्रेष्ठ दोनों अश्विनीकुमार भी एक ही विमान पर शीघ्रता से सवार होकर आए।

श्लोक 19 (skanda.8.13.19)

मनोहरावुज्ज्वलचारुवेषावाजग्मतुर्देवसदः सुवीरौ । शेषः सहस्रं स्फुरदग्निवर्णं बिभ्रत् फटानां ज्वलनार्कतेजाः

manoharāvujjvalacāruveṣāvājagmaturdevasadaḥ suvīrau | śeṣaḥ sahasraṁ sphuradagnivarṇaṁ bibhrat phaṭānāṁ jvalanārkatejāḥ

वे मनोहर, उज्ज्वल और सुन्दर वेषधारी वीर दोनों देवसभा में आ पहुँचे; और शेषनाग भी अग्नि के समान चमकते हुए सहस्र फणों को धारण करते हुए, अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी होकर आए।

श्लोक 20 (skanda.8.13.20)

सार्धं स नागैरपरैर्महात्मा विमानमारुह्य समभ्यगाच्च । दितेः सुतानां च महासुराणां वह्न्यर्कशक्रानिलतुल्यभासाम्

sārdhaṁ sa nāgairaparairmahātmā vimānamāruhya samabhyagācca | diteḥ sutānāṁ ca mahāsurāṇāṁ vahnyarkaśakrānilatulyabhāsām

वह महात्मा शेषनाग अन्य नागों के साथ विमान पर सवार होकर आए, और दिति के पुत्रों — महान असुरों — के साथ, जिनकी कान्ति अग्नि, सूर्य, इन्द्र और वायु के समान थी।

श्लोक 21 (skanda.8.13.21)

वरानुरूपं प्रविधाय वेषं वृन्दं समागात् पुरतः सुराणाम् । गन्धर्वराजः स च चारुरूपी दिव्याङ्गनो दिव्यविमानचारी

varānurūpaṁ pravidhāya veṣaṁ vṛndaṁ samāgāt purataḥ surāṇām | gandharvarājaḥ sa ca cārurūpī divyāṅgano divyavimānacārī

सुन्दर रूपधारी, दिव्य स्त्रियों से युक्त, दिव्य विमान पर विचरण करने वाले गन्धर्वराज ने अवसर के अनुरूप वेष धारण कर देवताओं के आगे अपने समूह सहित प्रस्थान किया।

श्लोक 22 (skanda.8.13.22)

गन्धर्वसंघैः सहितोप्सरोभिः शक्राज्ञया तत्र समाजगाम । अन्ये च देवास्त्रिदिवौकसेशाः पृथक् पृथक् चारुगृहीतवेषाः

gandharvasaṁghaiḥ sahitopsarobhiḥ śakrājñayā tatra samājagāma | anye ca devāstridivaukaseśāḥ pṛthak pṛthak cārugṛhītaveṣāḥ

वे गन्धर्वों के समूहों और अप्सराओं के साथ इन्द्र की आज्ञा से वहाँ आए, और स्वर्गवासी अन्य देवता भी अपने-अपने सुन्दर वेष धारण कर पृथक्-पृथक् वहाँ पधारे।

श्लोक 23 (skanda.8.13.23)

आजग्मुरारुह्य विमानपृष्ठं गन्धर्वयक्षोरगकिन्नराश्च । शचीपतिस्तत्र सुरेन्द्रसंघे राजाधिकाराधिकलक्ष्यमूर्त्तिः

ājagmurāruhya vimānapṛṣṭhaṁ gandharvayakṣoragakinnarāśca | śacīpatistatra surendrasaṁghe rājādhikārādhikalakṣyamūrttiḥ

गन्धर्व, यक्ष, नाग और किन्नर भी विमानों पर सवार होकर आए; और वहाँ देवताओं की सभा में शचीपति इन्द्र अपने राजोचित अधिकार और तेजस्वी स्वरूप से विशेष रूप से पहचाने जा रहे थे।

श्लोक 24 (skanda.8.13.24)

राज्ञां बलैश्वर्यकृतप्रमोहो वृथाधिकं यत्नमुपाचकार । हेतुस्त्रिलोकस्य जगत्प्रसूतिर्माता च तेषां ससुरासुराणाम्

rājñāṁ balaiśvaryakṛtapramoho vṛthādhikaṁ yatnamupācakāra | hetustrilokasya jagatprasūtirmātā ca teṣāṁ sasurāsurāṇām

राजाओं की शक्ति और ऐश्वर्य से मोहित होकर उसने व्यर्थ ही अधिक प्रयत्न किया, किन्तु देवी तो त्रिलोक की मूल कारण, जगत् की जननी, और देवासुरों सहित सबकी माता हैं।

श्लोक 25 (skanda.8.13.25)

पत्नी च शंभोः पुरुषस्य धाम्नो गीता पुराणैः प्रकृतिः परार्था । दक्षस्य कोपाद् हिमवद्गृहं सा कार्यार्थमागात् परमेशपत्नी

patnī ca śaṁbhoḥ puruṣasya dhāmno gītā purāṇaiḥ prakṛtiḥ parārthā | dakṣasya kopād himavadgṛhaṁ sā kāryārthamāgāt parameśapatnī

वह शम्भु की पत्नी, परमपुरुष का तेज, पुराणों में वर्णित सर्वोत्कृष्ट प्रकृति हैं; दक्ष के कोप के कारण वही परमेश की पत्नी किसी प्रयोजनवश हिमालय के घर में आई थीं।

श्लोक 26 (skanda.8.13.26)

एवं यतस्तान्न विदुः सुरेशा मोहस्ततस्तान्पर आविवेश । वरार्थमाजग्मुरतो विमूढा ईशेन यस्माद् वृडिताः कृतास्ते

evaṁ yatastānna viduḥ sureśā mohastatastānpara āviveśa | varārthamājagmurato vimūḍhā īśena yasmād vṛḍitāḥ kṛtāste

चूँकि देवगण यह रहस्य नहीं जानते थे, अतः महामोह ने उन्हें घेर लिया; इसी मोह में विमूढ़ होकर वे वर पाने की आशा से आए, और इसी कारण ईश ने उन्हें लज्जित कर दिया।

श्लोक 27 (skanda.8.13.27)

ततः प्रनृत्ताभि रथाप्सरोभिर्गन्धर्वसंघैश्च सुगीतशब्दैः । स्थितैश्च नानाविधरूपवेषै देवासुरादित्रिदिवोकसंघैः

tataḥ pranṛttābhi rathāpsarobhirgandharvasaṁghaiśca sugītaśabdaiḥ | sthitaiśca nānāvidharūpaveṣai devāsurāditridivokasaṁghaiḥ

तत्पश्चात् नृत्य करती हुई अप्सराओं तथा मधुर गीत गाते गन्धर्वसमूहों के साथ, और नाना प्रकार के रूप-वेष धारण किए देवासुर आदि स्वर्गवासियों के समूहों के उपस्थित रहते।

श्लोक 28 (skanda.8.13.28)

विमानपृष्ठे मणिहेमचित्रे स्थिता चलच्चामरबीजिताङ्गी । सर्वर्तुपुष्पां सुसुगन्धमालां प्रगृह्य देवी प्रसभं प्रतस्थे

vimānapṛṣṭhe maṇihemacitre sthitā calaccāmarabījitāṅgī | sarvartupuṣpāṁ susugandhamālāṁ pragṛhya devī prasabhaṁ pratasthe

मणि और स्वर्ण से जड़ित विचित्र विमान पर विराजमान, चामरों से हवा की जाती हुई, सभी ऋतुओं के पुष्पों से बनी सुगन्धित माला हाथ में लिए, देवी बलपूर्वक आगे बढ़ीं।

श्लोक 29 (skanda.8.13.29)

सनत्कुमार उवाच। मालां प्रगृह्य देव्यान्तु स्थितायां देवसंसदि । शक्राद्यैरागतैर्देवैः स्वयंवर उपागतैः

sanatkumāra uvāca| mālāṁ pragṛhya devyāntu sthitāyāṁ devasaṁsadi | śakrādyairāgatairdevaiḥ svayaṁvara upāgataiḥ

सनत्कुमार ने कहा — जब देवी माला हाथ में लिए हुए देवसभा में खड़ी थीं, और इन्द्र आदि आगत देवगण स्वयंवर में उपस्थित थे।

श्लोक 30 (skanda.8.13.30)

देव्या जिज्ञासया शम्भुर्भूत्वा पञ्चशिखः शिशुः । उत्सङ्गतलसंसुप्तो बभूव सहसा विभुः

devyā jijñāsayā śambhurbhūtvā pañcaśikhaḥ śiśuḥ | utsaṅgatalasaṁsupto babhūva sahasā vibhuḥ

देवी की परीक्षा लेने की इच्छा से शम्भु सहसा पाँच शिखाओं वाले एक बालक का रूप धारण कर, प्रभु उनकी गोद में सोए हुए के समान हो गए।

श्लोक 31 (skanda.8.13.31)

अकस्मादथ तं देवी शिशुं पञ्चशिखं स्थितम् । ज्ञात्वा योगसमाधानाज्जहृषे प्रीतिसंयुता

akasmādatha taṁ devī śiśuṁ pañcaśikhaṁ sthitam | jñātvā yogasamādhānājjahṛṣe prītisaṁyutā

अचानक उस पाँच शिखाओं वाले बालक को अपनी गोद में देखकर, योगसामर्थ्य से उसे [शिव को] पहचान कर देवी प्रसन्नता और प्रेम से भर गईं।

श्लोक 32 (skanda.8.13.32)

अथ सा शुद्धसंकल्पा कांक्षितप्राप्तसत्फला । निर्वृतेव तदा तस्थौ कृत्वा हृदि तमेव तु

atha sā śuddhasaṁkalpā kāṁkṣitaprāptasatphalā | nirvṛteva tadā tasthau kṛtvā hṛdi tameva tu

शुद्ध संकल्प वाली, अपने वांछित फल को प्राप्त कर लेने वाली वह देवी उसी को हृदय में धारण किए हुए, मानो परम तृप्ति को प्राप्त होकर वहाँ स्थिर बैठी रहीं।

श्लोक 33 (skanda.8.13.33)

ततो दृष्टवा शिशुं देवा देव्या उत्सङ्गवर्त्तिनम् । कोयमत्रेति संमन्त्र्य चुक्रुधुर्भृशमर्दिताः

tato dṛṣṭavā śiśuṁ devā devyā utsaṅgavarttinam | koyamatreti saṁmantrya cukrudhurbhṛśamarditāḥ

तब देवी की गोद में बैठे उस बालक को देखकर देवगण परस्पर विचार करने लगे — यह कौन है? — और अत्यन्त क्षुब्ध होकर क्रुद्ध हो उठे।

श्लोक 34 (skanda.8.13.34)

वज्रमाकारयत्तस्य बाहुमुत्क्षिप्य वृत्रहा । स बाहुरुत्थितस्तस्य तथैव समतिष्ठन

vajramākārayattasya bāhumutkṣipya vṛtrahā | sa bāhurutthitastasya tathaiva samatiṣṭhana

वृत्रहन्ता इन्द्र ने अपना वज्र उठाकर उस पर फेंकना चाहा, किन्तु उठा हुआ उनका वह बाहु उसी अवस्था में स्तम्भित होकर रह गया।

श्लोक 35 (skanda.8.13.35)

स्तम्भितः शिशुरूपेण देवदेवेन शम्भुना । वज्रं क्षेप्तुं नो शशाक बाहुञ्चालयितुं न च

stambhitaḥ śiśurūpeṇa devadevena śambhunā | vajraṁ kṣeptuṁ no śaśāka bāhuñcālayituṁ na ca

बालक रूप में उपस्थित देवदेव शम्भु द्वारा स्तम्भित होकर वे न तो वज्र फेंक सके और न ही अपनी भुजा हिला सके।

श्लोक 36 (skanda.8.13.36)

भगो नाम ततो देव आदित्यः काश्यपो बली । उत्क्षिप्य मुशलं दीप्तं क्षेप्तुमैच्छद्विमोहितः

bhago nāma tato deva ādityaḥ kāśyapo balī | utkṣipya muśalaṁ dīptaṁ kṣeptumaicchadvimohitaḥ

तब भग नामक बलवान् काश्यप आदित्य देवता ने भी, मोहग्रस्त होकर, अपना जाज्वल्यमान मुशल उठाकर उसे फेंकना चाहा।

श्लोक 37 (skanda.8.13.37)

तस्यापि भगवान् बाहुं तथैवास्तम्भयत्तदा । शिरः प्रकम्पयन् विष्णुः सकोपस्तमवैक्षत

tasyāpi bhagavān bāhuṁ tathaivāstambhayattadā | śiraḥ prakampayan viṣṇuḥ sakopastamavaikṣata

भगवान् ने उसकी भुजा को भी उसी प्रकार स्तम्भित कर दिया; तब विष्णु ने भी क्रोधपूर्वक सिर हिलाते हुए उसे [उस बालक को] देखा।

श्लोक 38 (skanda.8.13.38)

तस्यापि शिरसो देवः खालित्यं प्रचकार ह । पूषा दन्तान्दशन्दन्तैः शर्वमैक्षत मोहितः

tasyāpi śiraso devaḥ khālityaṁ pracakāra ha | pūṣā dantāndaśandantaiḥ śarvamaikṣata mohitaḥ

भगवान् ने विष्णु के सिर को भी गंजा कर दिया; और पूषा भी अपने दाँतों से दाँत पीसते हुए मोहग्रस्त होकर शर्व को देखने लगे।

श्लोक 39 (skanda.8.13.39)

तस्यापि दशनाः पेतुर्दृष्टमात्रस्य शम्भुना । यमस्य स्तम्भितो दण्डस्तेजो वह्नेः शशेः प्रभा

tasyāpi daśanāḥ peturdṛṣṭamātrasya śambhunā | yamasya stambhito daṇḍastejo vahneḥ śaśeḥ prabhā

शम्भु द्वारा देखते ही पूषा के भी दाँत झड़ गए; यम का दण्ड स्तम्भित हो गया, अग्नि का तेज और चन्द्रमा की प्रभा भी उसी प्रकार रुक गई।

श्लोक 40 (skanda.8.13.40)

बलं वायोस्तथान्येषां तस्मिन्सर्वदिवौकसाम् । बलन्तेजश्च योगञ्च तथैवास्तम्भयद्विभुः

balaṁ vāyostathānyeṣāṁ tasminsarvadivaukasām | balantejaśca yogañca tathaivāstambhayadvibhuḥ

वायुदेव का बल तथा वहाँ उपस्थित अन्य समस्त देवताओं का बल, तेज और योगसामर्थ्य — सबको प्रभु ने उसी प्रकार स्तम्भित कर दिया।

श्लोक 41 (skanda.8.13.41)

अथ तेषु स्थितेष्वेवं मन्युमत्सु सुरेषु तु । ब्रह्मा परमसंविग्नो ध्यानमास्थाय सादरम्

atha teṣu sthiteṣvevaṁ manyumatsu sureṣu tu | brahmā paramasaṁvigno dhyānamāsthāya sādaram

इस प्रकार जब वे देवगण क्रोधित अवस्था में खड़े रहे, तब अत्यन्त व्याकुल ब्रह्मा ने आदरपूर्वक ध्यान में मन लगाया।

श्लोक 42 (skanda.8.13.42)

बुबुधे देवदेवेशमुमोत्सङ्गसमास्थितम् । स बुद्ध्वा परमेशानं शीघ्रमुत्थाय सादरम्

bubudhe devadeveśamumotsaṅgasamāsthitam | sa buddhvā parameśānaṁ śīghramutthāya sādaram

उन्होंने उमा की गोद में विराजमान देवदेवेश को पहचान लिया; और उन्हें पहचान कर, परमेश्वर को जानकर, वे शीघ्र आदरपूर्वक उठ खड़े हुए।

श्लोक 43 (skanda.8.13.43)

ववन्दे चरणौ शम्भोरस्तुवच्च पितामहः। पौराणैः सामसंगीतैः पुण्याख्यैर्गुह्यनामभिः

vavande caraṇau śambhorastuvacca pitāmahaḥ| paurāṇaiḥ sāmasaṁgītaiḥ puṇyākhyairguhyanāmabhiḥ

पितामह ब्रह्मा ने शम्भु के चरणों में प्रणाम किया और पौराणिक साम-गीतों तथा पवित्र गुह्य नामों से उनकी स्तुति की।

श्लोक 44 (skanda.8.13.44)

अजस्त्वममरो देवः स्रष्टा हर्ता विभुः परः । प्रधानपुरुषस्तत्त्वं ब्रह्म ध्येयं तदक्षरम्

ajastvamamaro devaḥ sraṣṭā hartā vibhuḥ paraḥ | pradhānapuruṣastattvaṁ brahma dhyeyaṁ tadakṣaram

आप अजन्मा, अमर देव, सृष्टिकर्ता, संहारकर्ता, सर्वव्यापक और परम हैं; आप ही प्रधान और पुरुष तत्त्व हैं, आप ही ध्येय ब्रह्म और अक्षर हैं।

श्लोक 45 (skanda.8.13.45)

अमृतं परमात्मा च ईश्वरः कारणं महत् । ब्रह्मकृत् प्रकृतेः स्रष्टा सर्वसृक् परमेश्वरः

amṛtaṁ paramātmā ca īśvaraḥ kāraṇaṁ mahat | brahmakṛt prakṛteḥ sraṣṭā sarvasṛk parameśvaraḥ

आप ही अमृत, परमात्मा, ईश्वर, महत् के कारण हैं; आप ब्रह्मा के भी रचयिता, प्रकृति के स्रष्टा, सर्वसृष्टिकर्ता परमेश्वर हैं।

श्लोक 46 (skanda.8.13.46)

न त्वं वै देवदेवेश शक्यो ज्ञातुं दिवौकसैः । मुनिभिर्वापि योगज्ञैर्ज्ञातुं देव न शक्यते

na tvaṁ vai devadeveśa śakyo jñātuṁ divaukasaiḥ | munibhirvāpi yogajñairjñātuṁ deva na śakyate

हे देवदेवेश! आपको स्वर्गवासी देवता भी नहीं जान सकते; हे देव! योग के ज्ञाता मुनि भी आपको जानने में समर्थ नहीं हैं।

श्लोक 47 (skanda.8.13.47)

अप्रमेयो महादेव वर्तसे त्वं स्वलीलया । महासर्गे महाकल्पे त्वमेकस्तिष्ठसि प्रभो

aprameyo mahādeva vartase tvaṁ svalīlayā | mahāsarge mahākalpe tvamekastiṣṭhasi prabho

हे महादेव! आप अप्रमेय हैं, अपनी लीला से ही सर्वत्र विद्यमान रहते हैं; हे प्रभो! महासर्ग और महाकल्प में भी आप ही अकेले शेष रहते हैं।

श्लोक 48 (skanda.8.13.48)

अहमेव न जानामि चेष्टां तव महेश्वर । कथं विदन्ति त्रिदशा गंभीरं गहनात्मकम्

ahameva na jānāmi ceṣṭāṁ tava maheśvara | kathaṁ vidanti tridaśā gaṁbhīraṁ gahanātmakam

हे महेश्वर! मैं स्वयं भी आपकी लीला को नहीं जानता, फिर देवगण उस गम्भीर और रहस्यमय स्वरूप को कैसे जान सकते हैं?

श्लोक 49 (skanda.8.13.49)

इयञ्च प्रकृतिर्देव सदा ते सृष्टिकारणम् । पत्नीरूपं समास्थाय जगत्कारणमागता

iyañca prakṛtirdeva sadā te sṛṣṭikāraṇam | patnīrūpaṁ samāsthāya jagatkāraṇamāgatā

हे देव! यह जो प्रकृति सदा आपकी सृष्टि का कारण है, वही पत्नी का रूप धारण कर जगत्-कारण बनकर यहाँ आई है।

श्लोक 50 (skanda.8.13.50)

नमस्तुभ्यं सदेशान देव्याश्चैव सदा नमः । प्रसादात्तव देवेश नियोगाच्च मया प्रजाः

namastubhyaṁ sadeśāna devyāścaiva sadā namaḥ | prasādāttava deveśa niyogācca mayā prajāḥ

हे ईशान! आपको सदा नमस्कार है, और देवी को भी सदा नमस्कार है; हे देवेश! आपके प्रसाद और आदेश से ही मैंने प्रजाओं की रचना की है।

श्लोक 51 (skanda.8.13.51)

देवाद्यास्त इमे सृष्टा मूढास्त्वद्योगमोहिताः । कुरु प्रसादमेतेषां यथापूर्वं भवन्त्विमे

devādyāsta ime sṛṣṭā mūḍhāstvadyogamohitāḥ | kuru prasādameteṣāṁ yathāpūrvaṁ bhavantvime

ये देवता आदि सब मेरे द्वारा सृजित हैं, किन्तु आपकी योगमाया से मोहित होकर मूढ़ हो गए हैं; इन पर कृपा कीजिए, ताकि ये पूर्ववत् हो जाएँ।

श्लोक 52 (skanda.8.13.52)

तत एवं तदा ब्रह्मा विज्ञाप्य परमेश्वरम् । स्तम्भितान्सर्वदेवाँस्तानिदमाह महाद्युतिः

tata evaṁ tadā brahmā vijñāpya parameśvaram | stambhitānsarvadevā~stānidamāha mahādyutiḥ

इस प्रकार परमेश्वर से निवेदन करने के पश्चात्, महातेजस्वी ब्रह्मा ने उन सभी स्तम्भित देवताओं से यह कहा।

श्लोक 53 (skanda.8.13.53)

मूढाः स्थ देवताः सर्वे नैनं बुद्ध्यथ शंकरम् । देवदेवमिहायातं ममैवोत्पत्तिकारणम्

mūḍhāḥ stha devatāḥ sarve nainaṁ buddhyatha śaṁkaram | devadevamihāyātaṁ mamaivotpattikāraṇam

हे देवगण! तुम सब मोहित हो, यहाँ आए हुए इन शंकर देवाधिदेव को नहीं पहचानते, जो मेरी उत्पत्ति के भी कारण हैं।

श्लोक 54 (skanda.8.13.54)

अयं रुद्रो महादेवः शर्वो भीमः कपर्द्दवान् । उग्र ईशान आत्मा च अजः शंकर एव च

ayaṁ rudro mahādevaḥ śarvo bhīmaḥ kaparddavān | ugra īśāna ātmā ca ajaḥ śaṁkara eva ca

यही रुद्र, महादेव, शर्व, भीम, जटाधारी, उग्र, ईशान, आत्मस्वरूप, अजन्मा और शंकर हैं।

श्लोक 55 (skanda.8.13.55)

देवदेवः परं धाम ईशः पशुपतिः पतिः । जगत्स्रष्टा जगद्धर्ता जगत्संस्थितिकारणम्

devadevaḥ paraṁ dhāma īśaḥ paśupatiḥ patiḥ | jagatsraṣṭā jagaddhartā jagatsaṁsthitikāraṇam

यही देवदेव, परम धाम, ईश, पशुपति, स्वामी, जगत् के स्रष्टा, जगत् के धारक और जगत् की स्थिति के कारण हैं।

श्लोक 56 (skanda.8.13.56)

गच्छध्वं शरणं शीघ्रमेत मेवामरेश्वराः । सार्ध मयैव देवेशं परमात्मान मव्ययम्

gacchadhvaṁ śaraṇaṁ śīghrameta mevāmareśvarāḥ | sārdha mayaiva deveśaṁ paramātmāna mavyayam

हे देवेश्वरो! शीघ्र ही मेरे साथ इसी देवेश, अविनाशी परमात्मा की शरण में चलो।

श्लोक 57 (skanda.8.13.57)

ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा देवो नारायणः प्रभुः । प्रहस्य विबुधान् सर्वान् बोधयामास लोकपाः

brahmaṇo vacanaṁ śrutvā devo nārāyaṇaḥ prabhuḥ | prahasya vibudhān sarvān bodhayāmāsa lokapāḥ

ब्रह्मा के वचन सुनकर प्रभु देव नारायण भी हँसकर समस्त देवताओं तथा लोकपालों को समझाने लगे।

श्लोक 58 (skanda.8.13.58)

एवमेव न सन्देहो यथाह पद्मसंभवः । पूर्वसर्गे नु विबुधा मया सार्धं महेश्वरः

evameva na sandeho yathāha padmasaṁbhavaḥ | pūrvasarge nu vibudhā mayā sārdhaṁ maheśvaraḥ

जैसा ब्रह्मा ने कहा है, वह बिल्कुल सत्य है, इसमें कोई सन्देह नहीं; हे देवगण! पूर्वकाल के सर्ग में महेश्वर मेरे साथ ही रहे हैं।

श्लोक 59 (skanda.8.13.59)

बहुरूपेण रूपेण जगद् व्याप्य व्यवस्थितः । तस्मात् सर्वात्मना भूत्वा गच्छध्वं शरणं हरम्

bahurūpeṇa rūpeṇa jagad vyāpya vyavasthitaḥ | tasmāt sarvātmanā bhūtvā gacchadhvaṁ śaraṇaṁ haram

वे अनेक रूपों में इस जगत् को व्याप्त कर स्थित हैं; इसलिए तुम सब सम्पूर्ण भाव से हर की शरण में जाओ।

श्लोक 60 (skanda.8.13.60)

ततस्ते स्तम्भिताः सर्वे तथैव त्रिदिवौकसः । प्रणेमुर्मनसा शर्वं भावशुद्धेन चेतसा

tataste stambhitāḥ sarve tathaiva tridivaukasaḥ | praṇemurmanasā śarvaṁ bhāvaśuddhena cetasā

तब उन सभी स्तम्भित स्वर्गवासी देवताओं ने शुद्ध भावयुक्त मन से शर्व को मानसिक रूप से प्रणाम किया।

श्लोक 61 (skanda.8.13.61)

अथ तेषां प्रसन्नोभूद् देवदेवो महेश्वरः । यथापूर्वं चकाराशु देवतानां तनूस्तदा

atha teṣāṁ prasannobhūd devadevo maheśvaraḥ | yathāpūrvaṁ cakārāśu devatānāṁ tanūstadā

तब उन पर देवदेव महेश्वर प्रसन्न हुए, और उन्होंने शीघ्र ही देवताओं के शरीरों को पूर्ववत् कर दिया।

श्लोक 62 (skanda.8.13.62)

तत एवं प्रवृत्ते तु सर्वदेवनिवारणे । वपुश्चकार देवेशस्त्र्यक्षं परममद्भुतम्

tata evaṁ pravṛtte tu sarvadevanivāraṇe | vapuścakāra deveśastryakṣaṁ paramamadbhutam

इस प्रकार जब समस्त देवताओं की उस अवस्था की निवृत्ति हो गई, तब देवेश ने अपना त्रिनेत्र और परम अद्भुत रूप प्रकट किया।

श्लोक 63 (skanda.8.13.63)

तेजसा यस्य देवास्ते चक्षुरभ्यर्थयन् विभुम् । तेभ्यः परमकं चक्षुः स्ववपुर्दृष्टिशक्तिमत्

tejasā yasya devāste cakṣurabhyarthayan vibhum | tebhyaḥ paramakaṁ cakṣuḥ svavapurdṛṣṭiśaktimat

उनके उस रूप के तेज से आकर्षित होकर उन देवताओं ने प्रभु से नेत्र-दर्शन की प्रार्थना की; तब प्रभु ने उन्हें अपने ही शरीर से उत्पन्न, दृष्टिशक्ति से सम्पन्न वह श्रेष्ठ तीसरा नेत्र प्रदान किया।

श्लोक 64 (skanda.8.13.64)

प्रादात् परमदेवेशः अपश्यंस्ते तदा प्रभुम् । ते दृष्टवा परमेशानं तृतीयेक्षणधारिणम्

prādāt paramadeveśaḥ apaśyaṁste tadā prabhum | te dṛṣṭavā parameśānaṁ tṛtīyekṣaṇadhāriṇam

परम देवेश ने वह प्रदान किया, और तब वे प्रभु को देख सके; उन्होंने तीसरा नेत्र धारण किए हुए परमेश्वर के दर्शन किए।

श्लोक 65 (skanda.8.13.65)

ब्रह्माद्या नेमिरे तूर्ण्णं सर्व एव सुरेश्वराः । तस्य देवी तदा हृष्टा समक्षं त्रिदिवौकसाम्

brahmādyā nemire tūrṇṇaṁ sarva eva sureśvarāḥ | tasya devī tadā hṛṣṭā samakṣaṁ tridivaukasām

ब्रह्मा आदि समस्त देवेश्वरों ने तुरन्त प्रणाम किया; और तब देवी हर्षित होकर समस्त स्वर्गवासियों के समक्ष उनके [शिव के] पास आईं।

श्लोक 66 (skanda.8.13.66)

पादयोः स्थापयामास स्रग्मालाममितद्युतेः । साधु साध्विति संप्रोच्य देवतास्ते पुनर्विभुम्

pādayoḥ sthāpayāmāsa sragmālāmamitadyuteḥ | sādhu sādhviti saṁprocya devatāste punarvibhum

उन्होंने असीम तेजस्वी प्रभु के चरणों में पुष्पमाला रख दी; तत्पश्चात् साधु, साधु कहते हुए देवगण पुनः प्रभु की ओर उन्मुख हुए।

श्लोक 67 (skanda.8.13.67)

सह देव्या नमश्चक्रुः शिरोभिर्भूतलाश्रितैः । अथास्मिन्नन्तरे व्यास ब्रह्मा लोकपितामहः

saha devyā namaścakruḥ śirobhirbhūtalāśritaiḥ | athāsminnantare vyāsa brahmā lokapitāmahaḥ

उन्होंने देवी के साथ पृथ्वी पर झुकाए हुए शीशों से प्रणाम किया। हे व्यास! इसी बीच लोकपितामह ब्रह्मा ने...

श्लोक 68 (skanda.8.13.68)

हिमवन्तं महाशैलमिदमाह महाद्युतिः । श्लाघ्यः पूज्यश्च वन्द्यश्च सर्वेषां नस्त्वमेव हि

himavantaṁ mahāśailamidamāha mahādyutiḥ | ślāghyaḥ pūjyaśca vandyaśca sarveṣāṁ nastvameva hi

उस महाद्युतिशाली ब्रह्मा ने महापर्वत हिमवान से यह कहा — हम सबके लिए तुम ही प्रशंसनीय, पूज्य और वन्दनीय हो।

श्लोक 69 (skanda.8.13.69)

शर्वेण सह संबन्धो यस्य ते भूदयं महान् । क्रियताञ्चाशु उद्वाहः किमर्थं स्थीयते परम्

śarveṇa saha saṁbandho yasya te bhūdayaṁ mahān | kriyatāñcāśu udvāhaḥ kimarthaṁ sthīyate param

तुम्हारा जो शर्व के साथ यह महान् सम्बन्ध हुआ है, अब शीघ्र विवाह सम्पन्न किया जाए; और अधिक विलम्ब क्यों किया जा रहा है?

श्लोक 70 (skanda.8.13.70)

ततः प्रणम्य हिमवान् तं देवं प्रत्यभाषत । त्वमेव कारणं देव येन शर्वोदयन्मम

tataḥ praṇamya himavān taṁ devaṁ pratyabhāṣata | tvameva kāraṇaṁ deva yena śarvodayanmama

तब हिमवान ने प्रणाम कर उन देव [ब्रह्मा] से कहा — हे देव! आप ही इसके कारण हैं कि शर्व मुझ पर प्रसन्न हुए।

श्लोक 71 (skanda.8.13.71)

प्रसादः सहसोत्पन्नो हेतुश्चापि त्वमेव हि । उद्वाहन्तु यथायोग्यं तद्विधत्स्व पितामह

prasādaḥ sahasotpanno hetuścāpi tvameva hi | udvāhantu yathāyogyaṁ tadvidhatsva pitāmaha

यह प्रसाद अचानक उत्पन्न हुआ है, और इसका कारण भी आप ही हैं; अतः हे पितामह! जैसा उचित हो वैसे ही विवाह की व्यवस्था कीजिए।

श्लोक 72 (skanda.8.13.72)

तत एवं वचः श्रुत्वा गिरिराजः पितामहः । उद्वाहः क्रियतां देव इति देवमुवाच ह

tata evaṁ vacaḥ śrutvā girirājaḥ pitāmahaḥ | udvāhaḥ kriyatāṁ deva iti devamuvāca ha

यह वचन सुनकर पितामह गिरिराज हिमवान ने देव [शिव] से कहा — हे देव! विवाह सम्पन्न किया जाए।

श्लोक 73 (skanda.8.13.73)

तमाह शङ्करो देवं यथेष्टमिति लोकपम् । तत्क्षणाच्च ततो व्यास ब्रह्मणा कल्पितं पुरम्

tamāha śaṅkaro devaṁ yatheṣṭamiti lokapam | tatkṣaṇācca tato vyāsa brahmaṇā kalpitaṁ puram

शंकर ने उस लोकपाल देव से कहा — जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा ही हो। हे व्यास! और उसी क्षण ब्रह्मा ने एक नगर की रचना की।

श्लोक 74 (skanda.8.13.74)

उद्वाहार्थं महेशस्य नानारत्नोपशोभितम् । रत्नानि मणयश्चित्रा हेम मौक्तिकमेव च

udvāhārthaṁ maheśasya nānāratnopaśobhitam | ratnāni maṇayaścitrā hema mauktikameva ca

महेश के विवाह के लिए नाना रत्नों से सुशोभित वह नगर बनाया; उसमें विचित्र रत्न, मणियाँ, स्वर्ण और मोती थे।

श्लोक 75 (skanda.8.13.75)

मूर्त्तिमन्त उपागम्य अलञ्चक्रुः पुरोत्तमम् । चित्रा मारकती भूमिः सौवर्णस्तम्भशोभिता

mūrttimanta upāgamya alañcakruḥ purottamam | citrā mārakatī bhūmiḥ sauvarṇastambhaśobhitā

ये सब मूर्तिमान होकर आए और उस उत्तम नगर को अलंकृत किया; उसकी भूमि विचित्र मरकत मणि की थी, जो स्वर्णिम स्तम्भों से सुशोभित थी।

श्लोक 76 (skanda.8.13.76)

भास्वत्स्फाटिकाभित्तिर्मुक्ताहारप्रलम्बिता । तस्मिन् शिवपुरे रम्ये उद्वाहार्थं विनिर्मिते

bhāsvatsphāṭikābhittirmuktāhārapralambitā | tasmin śivapure ramye udvāhārthaṁ vinirmite

उसकी दीवारें चमचमाते स्फटिक की थीं, जिन पर मोतियों की मालाएँ लटक रही थीं — यह सब उस रमणीय शिवपुर में था, जो विवाह के लिए बनाया गया था।

श्लोक 77 (skanda.8.13.77)

शुशुभे देवदेवस्य महेशस्य महात्मनः । सोमादित्यौ समं तत्रा भासयेतां महामहीम्

śuśubhe devadevasya maheśasya mahātmanaḥ | somādityau samaṁ tatrā bhāsayetāṁ mahāmahīm

वह देवदेव महात्मा महेश की शोभा बढ़ा रहा था; वहाँ सूर्य और चन्द्रमा दोनों साथ मिलकर उस महान् भूमि को प्रकाशित कर रहे थे।

श्लोक 78 (skanda.8.13.78)

सौरभेयं मनोरम्यं गन्धमादाय मारुतः । प्रववौ सुखसंस्पर्श ईशे भक्तिं प्रदर्शयन्

saurabheyaṁ manoramyaṁ gandhamādāya mārutaḥ | pravavau sukhasaṁsparśa īśe bhaktiṁ pradarśayan

वायु सुखद स्पर्श के साथ मनोहर सुगन्ध लेकर बहने लगा, मानो ईश के प्रति अपनी भक्ति प्रदर्शित कर रहा हो।

श्लोक 79 (skanda.8.13.79)

समुद्रास्तत्र चत्वारः शक्राद्याश्च सुरोत्तमाः । देवनद्यो महानद्यः सिद्धा मुनय एव च

samudrāstatra catvāraḥ śakrādyāśca surottamāḥ | devanadyo mahānadyaḥ siddhā munaya eva ca

वहाँ चारों समुद्र, इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवगण, देवनदियाँ, महानदियाँ, सिद्ध और मुनि भी उपस्थित थे।

श्लोक 80 (skanda.8.13.80)

गन्धर्वाप्सरसः सर्वे नागा यक्षाः सराक्षसाः । गुह्यकाः खेचराश्चान्ये किन्नरा देवचारणाः

gandharvāpsarasaḥ sarve nāgā yakṣāḥ sarākṣasāḥ | guhyakāḥ khecarāścānye kinnarā devacāraṇāḥ

समस्त गन्धर्व, अप्सराएँ, नाग, यक्ष, राक्षस, गुह्यक, आकाशचारी, किन्नर और देवचारण भी वहाँ उपस्थित थे।

श्लोक 81 (skanda.8.13.81)

तुम्बुरुर्नारदो हाहा हूहूश्चैव तु सामगाः । रत्नान्यादाय वाद्यांश्च तत्राजग्मुर्मुदा युताः

tumbururnārado hāhā hūhūścaiva tu sāmagāḥ | ratnānyādāya vādyāṁśca tatrājagmurmudā yutāḥ

तुम्बुरु, नारद, हाहा और हूहू — ये सामगायक भी रत्न और वाद्य लेकर आनन्दपूर्वक वहाँ आए।

श्लोक 82 (skanda.8.13.82)

ऋषयः कृत्स्नशस्तत्र वेदगीतान् तपोधनाः । पुण्यान् वैवाहिकान् मन्त्रान् जेपुः संहृष्टमानसाः

ṛṣayaḥ kṛtsnaśastatra vedagītān tapodhanāḥ | puṇyān vaivāhikān mantrān jepuḥ saṁhṛṣṭamānasāḥ

तपोधन ऋषिगण सब वहाँ उपस्थित होकर वेदों में गाए गए पवित्र विवाह-मन्त्रों का प्रसन्नचित्त होकर जप करने लगे।

श्लोक 83 (skanda.8.13.83)

जगतो मातरः सर्वा देवकन्याश्च कृत्स्नशः । गायन्ति हृषिताः सर्वा उद्वाहे परमेष्ठिनः

jagato mātaraḥ sarvā devakanyāśca kṛtsnaśaḥ | gāyanti hṛṣitāḥ sarvā udvāhe parameṣṭhinaḥ

जगत् की समस्त माताएँ और सभी देवकन्याएँ हर्षित होकर परमेष्ठी [शिव] के विवाहोत्सव में गीत गा रही थीं।

श्लोक 84 (skanda.8.13.84)

ऋतवः षट् समं तत्र नानागन्धसुखावहाः । उद्वाहः शङ्करस्येति मूर्त्तिमन्त उपस्थिताः

ṛtavaḥ ṣaṭ samaṁ tatra nānāgandhasukhāvahāḥ | udvāhaḥ śaṅkarasyeti mūrttimanta upasthitāḥ

वहाँ नाना सुगन्धों से सुख देने वाली सभी छहों ऋतुएँ भी, यह शंकर का विवाह है यह जानकर मूर्तिमान होकर उपस्थित हुईं।

श्लोक 85 (skanda.8.13.85)

नीलजीमूतसंधातमन्द्रध्वानप्रहर्षितैः । केकायमानैः शिखिभिर्नृत्यमानैश्च सर्वशः

nīlajīmūtasaṁdhātamandradhvānapraharṣitaiḥ | kekāyamānaiḥ śikhibhirnṛtyamānaiśca sarvaśaḥ

नीले मेघों के समूहों की गम्भीर ध्वनि से प्रसन्न होकर, सर्वत्र मयूर केका करते हुए और नाचते हुए उपस्थित थे।

श्लोक 86 (skanda.8.13.86)

विलोलपिङ्गलस्पष्टविद्युल्लेखावभासिता । कुमुदापीतशुक्लाभिर्बलाकाभिश्च शोभिता

vilolapiṅgalaspaṣṭavidyullekhāvabhāsitā | kumudāpītaśuklābhirbalākābhiśca śobhitā

वह [वर्षा ऋतु] चंचल और स्पष्ट पीतवर्णी बिजली की रेखाओं से चमक रही थी, और कुमुद के समान श्वेत-पीली बगुलों की पंक्तियों से सुशोभित थी।

श्लोक 87 (skanda.8.13.87)

प्रत्यग्रसंजातशिलीन्ध्रकन्दला लता द्रुमाभ्युद्गतचारुपल्लवा । शुभाम्बुधाराप्रणयप्रबोधितैर्मदालसैर्भेकगणैश्च नादिता

pratyagrasaṁjātaśilīndhrakandalā latā drumābhyudgatacārupallavā | śubhāmbudhārāpraṇayaprabodhitairmadālasairbhekagaṇaiśca nāditā

नए-नए उगे हुए कुकुरमुत्तों और कन्दलों से युक्त, लताओं और वृक्षों पर उगे सुन्दर नए पल्लवों से युक्त वह ऋतु शुभ जलधाराओं के स्पर्श से जागृत हुए मदमस्त मेंढकों के शब्दों से गुंजित थी।

श्लोक 88 (skanda.8.13.88)

प्रियेषु मानोन्नतमानसानां सुनिश्चितानामपि कामिनीनाम् । मयूरकेकाभिरुतैः क्षणेन मनोहरैर्मानविभङ्गकर्त्री

priyeṣu mānonnatamānasānāṁ suniścitānāmapi kāminīnām | mayūrakekābhirutaiḥ kṣaṇena manoharairmānavibhaṅgakartrī

अपने प्रियों के प्रति मानपूर्ण और दृढ़ हृदय वाली कामिनियों के भी मान को, मयूरों के मनोहर केका-शब्दों से क्षणभर में तोड़ने वाली थी वह ऋतु।

श्लोक 89 (skanda.8.13.89)

तथा त्रिवर्णोज्ज्वलचारुमूर्तिना शशाङ्कलेखाकुटिलेन सर्वतः । पयोदसंघातसमीपवर्त्तिना महेन्द्रचापेन भृशं विराजिता

tathā trivarṇojjvalacārumūrtinā śaśāṅkalekhākuṭilena sarvataḥ | payodasaṁghātasamīpavarttinā mahendracāpena bhṛśaṁ virājitā

तीन रंगों से उज्ज्वल सुन्दर आकृति वाले, चन्द्ररेखा के समान वक्र, मेघसमूहों के समीप स्थित इन्द्रधनुष से वह अत्यन्त सुशोभित हो रही थी।

श्लोक 90 (skanda.8.13.90)

विचित्रपुष्पस्पर्शात् सुगन्धिभिर्घनाम्बुसंपृक्ततया सुशीतलैः । विकम्पयन्ती पवनैर्मनोहरैः सुराङ्गनानामलकावलीः शुभाः

vicitrapuṣpasparśāt sugandhibhirghanāmbusaṁpṛktatayā suśītalaiḥ | vikampayantī pavanairmanoharaiḥ surāṅganānāmalakāvalīḥ śubhāḥ

विचित्र पुष्पों के स्पर्श से सुगन्धित और मेघजल के मिश्रण से अत्यन्त शीतल मनोहर हवाओं से वह देवांगनाओं की सुन्दर अलकावलियों को कम्पित कर रही थी।

श्लोक 91 (skanda.8.13.91)

गर्जत्पयोदस्थगितेन्दुबिम्बा नवाम्बुसेकोद्गतचारुदूर्वा । निरीक्षिता सादरमुत्सुकाभिर्निःश्वासधूम्रं पथिकाङ्गनाभिः

garjatpayodasthagitendubimbā navāmbusekodgatacārudūrvā | nirīkṣitā sādaramutsukābhirniḥśvāsadhūmraṁ pathikāṅganābhiḥ

गरजते हुए मेघों से चन्द्रबिम्ब आच्छादित था, नई वर्षा से सुन्दर दूब उग आई थी; उत्सुक पथिक-पत्नियाँ आदरपूर्वक उसे निहार रही थीं, अपनी धूम्र-सी दीर्घ निःश्वासें छोड़ते हुए।

श्लोक 92 (skanda.8.13.92)

हंसनूपुरशब्दाढ्या समुन्नतपयोधरा । चलद्विद्युल्लताकाञ्ची स्पष्टपद्मविलोचना

haṁsanūpuraśabdāḍhyā samunnatapayodharā | caladvidyullatākāñcī spaṣṭapadmavilocanā

हंसों के नूपुर जैसे शब्दों से समृद्ध, उन्नत पयोधरों वाली, चंचल बिजली-रूपी करधनी पहने और स्पष्ट कमल-सी आँखों वाली...

श्लोक 93 (skanda.8.13.93)

असितजलदवृन्दध्वानवित्रस्तहंसा विमलसलिलधारापातताम्रोत्पलाग्रा । सुरभिकुसुमरेणुक्लृप्तसर्वाङ्गशोभा गिरिदुहितृविवाहे प्रावृडागाद्विभूत्यै

asitajaladavṛndadhvānavitrastahaṁsā vimalasaliladhārāpātatāmrotpalāgrā | surabhikusumareṇuklṛptasarvāṅgaśobhā giriduhitṛvivāhe prāvṛḍāgādvibhūtyai

काले मेघसमूहों की गर्जना से भयभीत हंसों वाली, निर्मल जलधाराओं की बूंदों से लाल हुए उत्पल-अग्रों वाली, सुगन्धित पुष्परज से समस्त अंगों की शोभा धारण करने वाली वर्षा ऋतु पर्वतपुत्री के विवाह में समृद्धि के लिए आई।

श्लोक 94 (skanda.8.13.94)

मेघकञ्चुकनिर्मुक्ता पद्मकोशोद्गतस्तनी । हंसनूपुरनिर्ह्रादा सर्वरम्यदिगन्तरा

meghakañcukanirmuktā padmakośodgatastanī | haṁsanūpuranirhrādā sarvaramyadigantarā

मेघरूपी वस्त्र से मुक्त, कमलकोशों के समान उभरे हुए स्तनों वाली, हंसों के नूपुर-सी ध्वनि करने वाली, सभी दिशाओं को रमणीय बना देने वाली वह [शरद्-ऋतु]...

श्लोक 95 (skanda.8.13.95)

विस्तीर्णपुलिनश्रोणी कूजत्सारसमेखला । प्रफुल्लेन्दीवराभोगविलोचनमनोहरा

vistīrṇapulinaśroṇī kūjatsārasamekhalā | praphullendīvarābhogavilocanamanoharā

विस्तृत बालूचरों जैसी नितम्बों वाली, बोलते हुए सारसों की सी करधनी वाली, खिले हुए नीलकमलों के समान सुन्दर नेत्रों वाली...

श्लोक 96 (skanda.8.13.96)

पक्वबिम्बाधरपुटा कुन्ददन्तप्रहासिनी । नवश्यामालताश्यामरोमराजि परिष्कृता

pakvabimbādharapuṭā kundadantaprahāsinī | navaśyāmālatāśyāmaromarāji pariṣkṛtā

पके बिम्बाफल-सी अधरोंवाली, कुन्द-पुष्प के समान दाँतों से मुस्कुराती हुई, नई श्यामलताओं के समान श्याम रोमराजि से सुसज्जित...

श्लोक 97 (skanda.8.13.97)

चन्द्रांशुहारवर्येण सौधोरःस्थलसर्पिणा । प्रह्लादयन्ती चेतांसि सर्वेषां त्रिदिवौकसाम्

candrāṁśuhāravaryeṇa saudhoraḥsthalasarpiṇā | prahlādayantī cetāṁsi sarveṣāṁ tridivaukasām

चन्द्रकिरणों की सी उत्तम मालाएँ, जो श्वेत भवन के वक्षस्थल पर लहरा रही थीं, से सुशोभित होकर वह [शरद्] समस्त स्वर्गवासियों के हृदयों को आनन्दित कर रही थी।

श्लोक 98 (skanda.8.13.98)

प्रमदालिकुलोद्गीतमधुरस्वनभाषिणी । चलत्कुमुदसंघातचारुकुण्डलशोभिनी

pramadālikulodgītamadhurasvanabhāṣiṇī | calatkumudasaṁghātacārukuṇḍalaśobhinī

प्रमत्त भ्रमरसमूहों के गुंजार जैसी मधुर वाणी बोलने वाली, हिलते हुए कुमुद-समूहों रूपी सुन्दर कुण्डलों से सुशोभित वह [शरद्-ऋतु]...

श्लोक 99 (skanda.8.13.99)

रक्ताशोकाग्रशाखोत्थपल्लवाङ्गुलिधारिणी । तत्पुष्पसंचयमयैर्वासोभिः समलंकृता

raktāśokāgraśākhotthapallavāṅgulidhāriṇī | tatpuṣpasaṁcayamayairvāsobhiḥ samalaṁkṛtā

लाल अशोक वृक्ष की शाखाओं की नोकों पर उगे कोंपलों-रूपी अंगुलियाँ धारण करने वाली, उन्हीं फूलों के समूह से बने वस्त्रों से अलंकृत वह [शरद्-ऋतु]...

श्लोक 100 (skanda.8.13.100)

रक्तोत्पलाग्रचरणा जातीपुष्पनखावली । कदलीस्तम्भचारूरुः शशाङ्कवदना शुभा

raktotpalāgracaraṇā jātīpuṣpanakhāvalī | kadalīstambhacārūruḥ śaśāṅkavadanā śubhā

लाल उत्पल के समान चरणों वाली, चमेली के फूलों के समान नखों वाली, केले के स्तम्भ के समान सुन्दर जंघाओं वाली, चन्द्रमुखी शुभ [शरद्-ऋतु]...

श्लोक 101 (skanda.8.13.101)

पद्मकिञ्जल्कसंपृक्तपवनप्रकरैः सुरान् । प्रेम्णा स्पृशन्ती कान्तेव शरदागान्मनोरमा

padmakiñjalkasaṁpṛktapavanaprakaraiḥ surān | premṇā spṛśantī kānteva śaradāgānmanoramā

कमल के पराग से युक्त वायु के झोंकों से देवताओं को प्रेमपूर्वक स्पर्श करती हुई, मानो कोई प्रियतमा हो, वह मनोहर शरद् ऋतु आई।

श्लोक 102 (skanda.8.13.102)

निर्मुक्ता सितमेघकञ्चुकपुटा पूर्णेन्दुबिम्बानना । नीलाम्भोजविलोचनाब्जमुकुलप्रोद्भिन्नचारुस्तनो । नानापुष्परजःसुगन्धिपवना प्रह्लादनी चेतसाम् । तत्रागात् कलहंसनूपुररवा देव्या विवाहे शरत्

nirmuktā sitameghakañcukapuṭā pūrṇendubimbānanā | nīlāmbhojavilocanābjamukulaprodbhinnacārustano | nānāpuṣparajaḥsugandhipavanā prahlādanī cetasām | tatrāgāt kalahaṁsanūpuraravā devyā vivāhe śarat

सफेद मेघ-रूपी वस्त्र से मुक्त, पूर्ण चन्द्रबिम्ब जैसे मुख वाली, नील कमल जैसे नेत्रों वाली, कमलकोरकों के समान खिले हुए सुन्दर स्तनों वाली, नाना पुष्पों की सुगन्ध से युक्त पवन वाली, हृदयों को आनन्दित करने वाली, कलहंसों की नूपुर-ध्वनि से युक्त शरद् ऋतु देवी के विवाह में आई।

श्लोक 103 (skanda.8.13.103)

अत्यर्थशीतलांभोभिः प्लावयन्तौ गिरेः शिलाः । ऋतू हेमन्तशिशिरौ वाजग्मतुरभिद्युती

atyarthaśītalāṁbhobhiḥ plāvayantau gireḥ śilāḥ | ṛtū hemantaśiśirau vājagmaturabhidyutī

अत्यन्त शीतल जलों से पर्वत की शिलाओं को भिगोते हुए, तेजस्वी हेमन्त और शिशिर — दोनों ऋतुएँ भी आ पहुँचीं।

श्लोक 104 (skanda.8.13.104)

ताभ्यामृतुभ्यां प्राप्ताभ्यां हिमवान् स नगोत्तमः । प्रालेयचूर्णवर्षिभ्यां क्षिप्रं रौप्य इवाबभौ

tābhyāmṛtubhyāṁ prāptābhyāṁ himavān sa nagottamaḥ | prāleyacūrṇavarṣibhyāṁ kṣipraṁ raupya ivābabhau

उन दोनों ऋतुओं के आगमन से, तुषार-चूर्ण बरसाती हुई उन ऋतुओं द्वारा, वह नगश्रेष्ठ हिमालय शीघ्र ही चाँदी के समान चमकने लगा।

श्लोक 105 (skanda.8.13.105)

तेन प्रालेयवर्षेण घनेन स हिमाचलः । शोभनेन तदा रेजे क्षीरोद इव सागरः

tena prāleyavarṣeṇa ghanena sa himācalaḥ | śobhanena tadā reje kṣīroda iva sāgaraḥ

उस घनी हिमवर्षा से वह हिमालय पर्वत उसी प्रकार शोभित हो उठा जैसे क्षीरसागर शोभित होता है।

श्लोक 106 (skanda.8.13.106)

हिमस्थानेषु हेमन्तोऽत्र नाशयामास पादपान् । साधूपचारान् सहसाकृतार्थ इव दुर्जनः

himasthāneṣu hemanto'tra nāśayāmāsa pādapān | sādhūpacārān sahasākṛtārtha iva durjanaḥ

वहाँ हिम-प्रदेशों में हेमन्त ऋतु ने वृक्षों को उसी प्रकार नष्ट कर दिया, जैसे कोई दुर्जन, उपकार पाकर स्वार्थ सिद्ध हो जाने पर, सहसा भले उपकारों को ही नष्ट कर देता है।

श्लोक 107 (skanda.8.13.107)

प्रालेयपटलच्छन्नैः शृङ्गैः स शुशुभे नगः । छत्रैरिव महाभोगैः पाण्डरैः पृथिवीपतिः

prāleyapaṭalacchannaiḥ śṛṅgaiḥ sa śuśubhe nagaḥ | chatrairiva mahābhogaiḥ pāṇḍaraiḥ pṛthivīpatiḥ

तुषार की परत से ढके शिखरों से वह पर्वत ऐसे शोभित हो रहा था मानो कोई राजा विशाल श्वेत छत्रों से सुशोभित हो।

श्लोक 108 (skanda.8.13.108)

पाण्डराणि विशालानि श्रीमन्ति सुभगानि च । अद्रिशृङ्गाणि तुङ्गानि सौधानीव चकाशिरे

pāṇḍarāṇi viśālāni śrīmanti subhagāni ca | adriśṛṅgāṇi tuṅgāni saudhānīva cakāśire

उस पर्वत के श्वेत, विशाल, श्रीसम्पन्न, सुन्दर और ऊँचे शिखर मानो श्वेत राजभवनों के समान चमक रहे थे।

श्लोक 109 (skanda.8.13.109)

तस्याचलेन्द्रस्य दरीष्वतीव विचित्रसारङ्गकुलाकुलासु । प्रालेयधाराः शशिपादगौरा गोक्षीरधारा इव सन्निपेतुः

tasyācalendrasya darīṣvatīva vicitrasāraṅgakulākulāsu | prāleyadhārāḥ śaśipādagaurā gokṣīradhārā iva sannipetuḥ

उस पर्वतराज की गुफाओं में, जो नाना प्रकार के मृगसमूहों से अत्यन्त व्याप्त थीं, चन्द्रकिरणों-सी श्वेत तुषार-धाराएँ गाय के दूध की धाराओं के समान गिर रही थीं।

श्लोक 110 (skanda.8.13.110)

बहुकुसुमरजोभिरुत्कराङ्गा हिमकणसङ्गसु शीतलाः समीराः । ववुरमरगणेश्वराम्बराणि प्रतनुतमानि शनैर्विकम्पयन्तः

bahukusumarajobhirutkarāṅgā himakaṇasaṅgasu śītalāḥ samīrāḥ | vavuramaragaṇeśvarāmbarāṇi pratanutamāni śanairvikampayantaḥ

नाना पुष्पों की रज से युक्त, हिमकणों के स्पर्श से शीतल हवाएँ बहने लगीं, जो देवगणों के अत्यन्त पतले वस्त्रों को धीरे-धीरे कम्पित करती थीं।

श्लोक 111 (skanda.8.13.111)

विधूतरूक्षानीलवीतदोषः प्रोद्भिन्नचूताङ्कुरकर्णपूरः । वसन्तकालश्च तमद्रिपुत्रीसेवार्थमागाद्धिमवन्तमाशु

vidhūtarūkṣānīlavītadoṣaḥ prodbhinnacūtāṅkurakarṇapūraḥ | vasantakālaśca tamadriputrīsevārthamāgāddhimavantamāśu

रूक्ष और नीले दोषों से रहित, आम के नए अंकुरों के कर्णफूल धारण किए हुए वसन्त ऋतु भी पर्वतपुत्री की सेवा के लिए शीघ्र ही उस हिमालय में आई।

श्लोक 112 (skanda.8.13.112)

तस्मिन्नृतावद्रिसुताविवाहसिषेवया तं गिरिमभ्युपेते । प्रादुर्बभूवुः कुसुमावतंसाः समन्ततः पादपगुल्मषण्डाः

tasminnṛtāvadrisutāvivāhasiṣevayā taṁ girimabhyupete | prādurbabhūvuḥ kusumāvataṁsāḥ samantataḥ pādapagulmaṣaṇḍāḥ

उस ऋतु के, पर्वतपुत्री के विवाह की सेवा के लिए, उस पर्वत पर आ जाने पर, चारों ओर वृक्ष और झाड़ियों के समूह पुष्पों के आभूषण धारण किए हुए प्रकट हो गए।

श्लोक 113 (skanda.8.13.113)

ववुः सुगन्धाः सुभगाः सुशीता विचित्रपुष्पाग्ररजोत्कराङ्गाः । मनोभवोद्रेककराः सुराणां सुरङ्गनानाञ्च मुहुः समीराः

vavuḥ sugandhāḥ subhagāḥ suśītā vicitrapuṣpāgrarajotkarāṅgāḥ | manobhavodrekakarāḥ surāṇāṁ suraṅganānāñca muhuḥ samīrāḥ

सुगन्धित, सुखद और शीतल, विचित्र पुष्पों के अग्रभाग की रज से युक्त हवाएँ बार-बार बहने लगीं, जो देवताओं और देवांगनाओं में काम-भाव को उद्दीप्त करने वाली थीं।

श्लोक 114 (skanda.8.13.114)

स्वच्छाम्बुपूर्णाश्च तथा नलिन्यः पद्मोत्पलानां कुसुमैरुपेताः । ईषत्समुद्भिन्नपयोधराग्रा नार्यो यथा रम्यतमा बभूवुः

svacchāmbupūrṇāśca tathā nalinyaḥ padmotpalānāṁ kusumairupetāḥ | īṣatsamudbhinnapayodharāgrā nāryo yathā ramyatamā babhūvuḥ

स्वच्छ जल से भरी हुई और कमल-उत्पल के फूलों से युक्त वे पद्मिनियाँ, हल्के-हल्के उभरे हुए स्तनाग्रों वाली स्त्रियों के समान अत्यन्त रमणीय हो गईं।

श्लोक 115 (skanda.8.13.115)

ऋतोः स्वभावाच्च मदोद्भवाच्च फुल्लासु शाखासु निलीनपक्षाः । श्रोत्राभिरामं त्रिदशाङ्गनानां पुंस्कोकिलाश्चाविकलं विनेदुः

ṛtoḥ svabhāvācca madodbhavācca phullāsu śākhāsu nilīnapakṣāḥ | śrotrābhirāmaṁ tridaśāṅganānāṁ puṁskokilāścāvikalaṁ vineduḥ

उस ऋतु के स्वभाव से और मद के उदय से, खिली हुई शाखाओं में छिपे हुए नर कोकिल भी देवांगनाओं के कानों को सुखद लगने वाली अविरल कूक करने लगे।

श्लोक 116 (skanda.8.13.116)

नात्युष्णशीतानि सरःपयांसि किञ्जल्कचूर्णैः कपिलीकृतानि । चक्राह्वयुग्मैरुपनादितानि पपुः प्रहृष्टाः सुरदन्तिमुख्याः

nātyuṣṇaśītāni saraḥpayāṁsi kiñjalkacūrṇaiḥ kapilīkṛtāni | cakrāhvayugmairupanāditāni papuḥ prahṛṣṭāḥ suradantimukhyāḥ

न अधिक गरम न अधिक ठंडे, पराग-चूर्ण से पीले हुए, चक्रवाक युगलों की ध्वनि से गुंजित तालाबों का जल श्रेष्ठ देव-हाथी हर्षपूर्वक पीने लगे।

श्लोक 117 (skanda.8.13.117)

प्रियङ्गुसंवृतवराः वृताश्चापि प्रियङ्गवः । तर्जयन्त इवान्योन्यं मञ्जरीभिश्चकाशिरे

priyaṅgusaṁvṛtavarāḥ vṛtāścāpi priyaṅgavaḥ | tarjayanta ivānyonyaṁ mañjarībhiścakāśire

प्रियंगु लताओं से घिरे हुए श्रेष्ठ वृक्ष और उन्हीं से घिरी हुई प्रियंगु-लताएँ स्वयं भी, मानो अपने मंजरियों से एक-दूसरे को चुनौती देती हुई-सी शोभायमान हो रही थीं।

श्लोक 118 (skanda.8.13.118)

हिमशुक्लेषु शृङ्गेषु तिलकाः कुसुमोत्कराः । शुशुभुः कार्यमुद्दिश्य वृद्धा इव समागताः

himaśukleṣu śṛṅgeṣu tilakāḥ kusumotkarāḥ | śuśubhuḥ kāryamuddiśya vṛddhā iva samāgatāḥ

हिम से श्वेत शिखरों पर तिलक वृक्ष पुष्पों के समूह से लदे हुए, मानो किसी प्रयोजन से एकत्र हुए वृद्धजनों के समान शोभित हो रहे थे।

श्लोक 119 (skanda.8.13.119)

फुल्लाशोकलतास्तत्र रेजिरे शालसंश्रिताः । कामिन्य इव कान्तानां कण्ठालम्बितमूर्त्तयः

phullāśokalatāstatra rejire śālasaṁśritāḥ | kāminya iva kāntānāṁ kaṇṭhālambitamūrttayaḥ

वहाँ शाल वृक्षों का सहारा लिए हुए खिली हुई अशोक-लताएँ ऐसे शोभित हो रही थीं मानो अपने प्रियतमों के कण्ठ से लिपटी हुई कामिनियाँ हों।

श्लोक 120 (skanda.8.13.120)

समदालिकुलोद्गीतलताकुसुमसंचयाः । परस्परं हि मालत्यो भाषन्त्य इव रेजिरे

samadālikulodgītalatākusumasaṁcayāḥ | parasparaṁ hi mālatyo bhāṣantya iva rejire

मत्त भ्रमरसमूहों द्वारा गुंजित लताओं के पुष्पसमूह — वे मालतियाँ आपस में मानो बातें करती हुई-सी शोभित हो रही थीं।

श्लोक 121 (skanda.8.13.121)

नीलानि नीलाम्बुरुहैः पयांसि गौराणि गौरैश्च मृणालदण्डैः । तथैव चित्राणि भृशं कृतानि मत्तद्विरेफार्धविदष्टपत्रैः

nīlāni nīlāmburuhaiḥ payāṁsi gaurāṇi gauraiśca mṛṇāladaṇḍaiḥ | tathaiva citrāṇi bhṛśaṁ kṛtāni mattadvirephārdhavidaṣṭapatraiḥ

नीले कमलों से जल नीला हो गया था, श्वेत मृणालदण्डों से श्वेत हो गया था, और मतवाले भ्रमरों द्वारा आधे कुतरे हुए पत्तों से वह अत्यन्त विचित्र बन गया था।

श्लोक 122 (skanda.8.13.122)

हैमानि विस्तीर्णजलेषु केषुचिन्निरन्तरं मारकतानि केषुचित् । वैदूर्यनालानि सरस्सु केषुचित् प्रजज्ञिरे पद्मवनानि सर्वतः

haimāni vistīrṇajaleṣu keṣucinnirantaraṁ mārakatāni keṣucit | vaidūryanālāni sarassu keṣucit prajajñire padmavanāni sarvataḥ

विस्तृत जलाशयों में कहीं स्वर्णिम, कहीं निरन्तर मरकतमणि-सदृश, कहीं वैदूर्यमणि-सी नालों वाले कमलवन सर्वत्र उत्पन्न हो गए।

श्लोक 123 (skanda.8.13.123)

वाप्यस्तत्राभवन् रम्याः कमलोत्पलभूषिताः । नानाविहङ्गसंघुष्टा हेमसोपानपंक्तयः

vāpyastatrābhavan ramyāḥ kamalotpalabhūṣitāḥ | nānāvihaṅgasaṁghuṣṭā hemasopānapaṁktayaḥ

वहाँ कमल-उत्पलों से सुशोभित, नाना पक्षियों की ध्वनि से गुंजित, स्वर्णिम सीढ़ियों की पंक्तियों वाली रमणीय बावड़ियाँ भी थीं।

श्लोक 124 (skanda.8.13.124)

शृङ्गाणि तस्य तु गिरेः कर्णिकारैः सुपुष्पितैः । समुच्छ्रितान्यविरलैर्हैमानीव बभुर्मुने

śṛṅgāṇi tasya tu gireḥ karṇikāraiḥ supuṣpitaiḥ | samucchritānyaviralairhaimānīva babhurmune

हे मुनि! उस पर्वत के शिखर, घने और भली प्रकार खिले हुए कर्णिकार वृक्षों से आच्छादित होकर मानो स्वर्ण के बने हुए-से शोभित हो रहे थे।

श्लोक 125 (skanda.8.13.125)

ईषदुद्भिन्नकुसुमैः पाटलैश्चापि पाटला । संबभूवुर्दिशः सर्वाः पवनाकम्पिमूर्त्तिभिः

īṣadudbhinnakusumaiḥ pāṭalaiścāpi pāṭalā | saṁbabhūvurdiśaḥ sarvāḥ pavanākampimūrttibhiḥ

हल्के खिले हुए, हवा से हिलते हुए पाटल-पुष्पों से समस्त दिशाएँ ही मानो पाटल-वर्ण (गुलाबी) हो गईं।

श्लोक 126 (skanda.8.13.126)

कृष्णाञ्जनाद्रिशृङ्गाभा नीलाशोकमहीरुहाः । गिरौ ववृधिरे फुल्लाः स्पर्धयेव परस्परम्

kṛṣṇāñjanādriśṛṅgābhā nīlāśokamahīruhāḥ | girau vavṛdhire phullāḥ spardhayeva parasparam

काले अंजन पर्वत के शिखर के समान कान्तिमान नील अशोक वृक्ष उस पर्वत पर मानो परस्पर होड़ करते हुए खिलकर बढ़ने लगे।

श्लोक 127 (skanda.8.13.127)

चञ्चरीकविघुष्टानि किंशुकानां वनानि च । पर्वतस्य नितम्बेषु सर्वेष्वेवाभिजज्ञिरे

cañcarīkavighuṣṭāni kiṁśukānāṁ vanāni ca | parvatasya nitambeṣu sarveṣvevābhijajñire

भ्रमरों से गुंजित किंशुक-वनों ने भी उस पर्वत के समस्त ढालों पर जन्म ले लिया।

श्लोक 128 (skanda.8.13.128)

तमालगुल्मैस्तस्यासीच्छोभा हिमवतस्तदा । नीलजीमूतसंघातैर्निलीनैरिव सन्धिषु

tamālagulmaistasyāsīcchobhā himavatastadā | nīlajīmūtasaṁghātairnilīnairiva sandhiṣu

तमाल के झुरमुटों से हिमालय की शोभा उस समय ऐसी हो गई मानो उसके सन्धिस्थलों में नील मेघसमूह ही छिपे हुए हों।

श्लोक 129 (skanda.8.13.129)

निकामपुष्पैः सुविशालशाखैः समुच्छ्रितैश्चम्पकपादपैश्च । प्रमत्तपुंस्कोकिलसंप्रलापैर्हिमाचलोतीव तदा रराज

nikāmapuṣpaiḥ suviśālaśākhaiḥ samucchritaiścampakapādapaiśca | pramattapuṁskokilasaṁpralāpairhimācalotīva tadā rarāja

पूर्ण रूप से खिले हुए पुष्पों वाले, अत्यन्त विशाल शाखाओं वाले, ऊँचे उठे हुए चम्पक वृक्षों से, और मतवाले नर कोकिलों के कलरव से, उस समय हिमालय अत्यन्त शोभायमान हो उठा।

श्लोक 130 (skanda.8.13.130)

श्रुत्वा शब्दान् ऋतुमदकलान् सर्वतः कोकिलानाम् चञ्चत्पक्षाः सुमधुररुतं नीलकण्ठा विनेदुः । तेषां शब्दैरुपचितबलः पुष्पचापेषुहस्तः सज्जीभूतस्त्रिदशवनिता वेद्धुमङ्गेष्वनङ्गः

śrutvā śabdān ṛtumadakalān sarvataḥ kokilānām cañcatpakṣāḥ sumadhurarutaṁ nīlakaṇṭhā vineduḥ | teṣāṁ śabdairupacitabalaḥ puṣpacāpeṣuhastaḥ sajjībhūtastridaśavanitā veddhumaṅgeṣvanaṅgaḥ

चारों ओर कोकिलों की ऋतु से मदमस्त मधुर बोली सुनकर, पंख फड़फड़ाते मोर भी मधुर स्वर में बोल उठे; उनकी ध्वनियों से बलवान हुआ, फूलों के धनुष और बाण हाथ में लिए हुए कामदेव देवांगनाओं के अंगों को बींधने के लिए सज्जित हो गया।

श्लोक 131 (skanda.8.13.131)

पटुसूर्यातपश्चापि प्रायः सोष्णजलाशयः । देवीविवाहसेवार्थं ग्रीष्म आगाद्धिमाचलम्

paṭusūryātapaścāpi prāyaḥ soṣṇajalāśayaḥ | devīvivāhasevārthaṁ grīṣma āgāddhimācalam

तीव्र सूर्यातप वाली, प्रायः गरम जलाशयों वाली ग्रीष्म ऋतु भी देवी के विवाह की सेवा के लिए हिमालय में आई।

श्लोक 132 (skanda.8.13.132)

स चापि तरुभिस्तत्र बहुभिः कुसुमोत्करैः । शोभयामास शृङ्गाणि प्रालेयाद्रेः समन्ततः

sa cāpi tarubhistatra bahubhiḥ kusumotkaraiḥ | śobhayāmāsa śṛṅgāṇi prāleyādreḥ samantataḥ

उसने भी वहाँ अनेक वृक्षों के पुष्पसमूहों से हिमालय के शिखरों को चारों ओर से सुशोभित किया।

श्लोक 133 (skanda.8.13.133)

तस्यापि च ऋतोस्तत्र वायवः सुमनोहराः । ववुः पाटलविस्तीर्णकदम्बार्जुनगन्धिनः

tasyāpi ca ṛtostatra vāyavaḥ sumanoharāḥ | vavuḥ pāṭalavistīrṇakadambārjunagandhinaḥ

उस ऋतु में भी वहाँ पाटल, कदम्ब और अर्जुन वृक्षों की सुगन्ध से युक्त अत्यन्त मनोहर हवाएँ बहने लगीं।

श्लोक 134 (skanda.8.13.134)

वाप्यः प्रफुल्लपद्मौघाः केसरारुणमूर्त्तयः । अभवन् तटसंघुष्टकलहंसकदम्बकाः

vāpyaḥ praphullapadmaughāḥ kesarāruṇamūrttayaḥ | abhavan taṭasaṁghuṣṭakalahaṁsakadambakāḥ

खिले हुए कमलसमूहों वाली, पराग से लाल हुई, तटों पर कलहंसों के समूहों की ध्वनि से गुंजित बावड़ियाँ हो गईं।

श्लोक 135 (skanda.8.13.135)

तथा कुरबकाश्चापि कुसुमापाण्डुमूर्तयः । सर्वेषु जज्ञुः शृङ्गेषु भ्रमरावलिसेविताः

tathā kurabakāścāpi kusumāpāṇḍumūrtayaḥ | sarveṣu jajñuḥ śṛṅgeṣu bhramarāvalisevitāḥ

कुरबक वृक्ष भी अपने पुष्पों से हल्के श्वेत रूप धारण किए हुए भ्रमरपंक्तियों से सेवित होकर समस्त शिखरों पर उग आए।

श्लोक 136 (skanda.8.13.136)

बकुलाश्च नितम्बेषु विशालेषु महीभृतः । उत्ससर्जुर्मनोज्ञानि कुसुमानि समन्ततः

bakulāśca nitambeṣu viśāleṣu mahībhṛtaḥ | utsasarjurmanojñāni kusumāni samantataḥ

उस पर्वत के विशाल ढालों पर बकुल वृक्षों ने भी चारों ओर मनोहर पुष्पों की वर्षा कर दी।

श्लोक 137 (skanda.8.13.137)

इति कुसुमविचित्रसर्ववेषा विविधविहङ्गमनादरम्यदेशाः । हिमगिरितनयाविवाहभूत्यै षडुपययुर्ऋतवो मुनिप्रवीर

iti kusumavicitrasarvaveṣā vividhavihaṅgamanādaramyadeśāḥ | himagiritanayāvivāhabhūtyai ṣaḍupayayurṛtavo munipravīra

हे मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार पुष्पों से विचित्र वेष धारण किए हुए, नाना पक्षियों की ध्वनि से रमणीय बने हुए प्रदेशों वाली छहों ऋतुएँ हिमगिरि-पुत्री के विवाह की समृद्धि के लिए एक साथ वहाँ आ पहुँचीं।

श्लोक 138 (skanda.8.13.138)

तत एवं प्रवृत्ते तु सर्वभूतसमागमे । नानावाद्यसमाकीर्णे ब्रह्मा मम पिता स्वयम्

tata evaṁ pravṛtte tu sarvabhūtasamāgame | nānāvādyasamākīrṇe brahmā mama pitā svayam

इस प्रकार जब समस्त प्राणियों का समागम, नाना वाद्यों की ध्वनि से भरपूर, सम्पन्न हो चुका, तब मेरे पिता ब्रह्मा स्वयं...

श्लोक 139 (skanda.8.13.139)

शैलपुत्रीमलंकृत्य योगाभरणसंपदा । पुरं प्रवेशयामास तामादाय लोकवित्

śailaputrīmalaṁkṛtya yogābharaṇasaṁpadā | puraṁ praveśayāmāsa tāmādāya lokavit

...उस लोकज्ञ ब्रह्मा ने पर्वतपुत्री को योग्य आभूषणों की सम्पदा से अलंकृत कर, उसे साथ लेकर नगर में प्रवेश कराया।

श्लोक 140 (skanda.8.13.140)

ततस्तु पुनरेवेशं ब्रह्मा व्यज्ञापयद्विभुम् । हविर्जुहोमि वह्नौ तु उपाध्यायपदे स्थितः

tatastu punareveśaṁ brahmā vyajñāpayadvibhum | havirjuhomi vahnau tu upādhyāyapade sthitaḥ

तत्पश्चात् ब्रह्मा ने पुनः प्रभु ईश से निवेदन किया — उपाध्याय के पद पर स्थित होकर मैं अग्नि में हवि की आहुति दूँगा।

श्लोक 141 (skanda.8.13.141)

ददासि मह्यं यद्याज्ञां कर्तव्योयं क्रियाविधिः । तमाह शङ्करो देवं देवदेवो जगत्पतिः

dadāsi mahyaṁ yadyājñāṁ kartavyoyaṁ kriyāvidhiḥ | tamāha śaṅkaro devaṁ devadevo jagatpatiḥ

यदि आप मुझे आज्ञा दें तो यह क्रियाविधि सम्पन्न की जाए। तब जगत्पति देवदेव शंकर ने उस देव [ब्रह्मा] से कहा।

श्लोक 142 (skanda.8.13.142)

यत्त्वदिष्टं सुरेशान तत्कुरुष्व यथेप्सितम् । कर्तास्मि वचनं सर्वं ब्रह्मँस्तव जगद्विभोः

yattvadiṣṭaṁ sureśāna tatkuruṣva yathepsitam | kartāsmi vacanaṁ sarvaṁ brahma~stava jagadvibhoḥ

हे देवेश! जो तुम्हें अभीष्ट हो, वही यथेच्छ करो; हे ब्रह्मन्! हे जगद्विभो! मैं तुम्हारा सारा वचन पूर्ण करूँगा।

श्लोक 143 (skanda.8.13.143)

ततः प्रणम्य हृष्टात्मा ब्रह्मा लोकपितामहः । हस्तं देवस्य देव्याश्च योगबन्धे युयोज ह

tataḥ praṇamya hṛṣṭātmā brahmā lokapitāmahaḥ | hastaṁ devasya devyāśca yogabandhe yuyoja ha

तब प्रणाम कर प्रसन्नचित्त लोकपितामह ब्रह्मा ने देव और देवी के हाथों को विधिपूर्वक बाँध दिया।

श्लोक 144 (skanda.8.13.144)

ज्वलनश्च स्वयं तत्र कृताञ्जलिरुपस्थितः । श्रुतिगीतैर्महामन्त्रैर्मूर्तिमद्भिरुपस्थितैः

jvalanaśca svayaṁ tatra kṛtāñjalirupasthitaḥ | śrutigītairmahāmantrairmūrtimadbhirupasthitaiḥ

और अग्निदेव भी वहाँ स्वयं हाथ जोड़े उपस्थित थे, श्रुतियों में गाए गए महामन्त्रों के मूर्तिमान होकर उपस्थित होने के साथ।

श्लोक 145 (skanda.8.13.145)

यथोक्तविधिना हुत्वा सर्पिस्तदमृत च हि । त्रिश्च तं ज्वलनं देवं कारयित्वा प्रदक्षिणम्

yathoktavidhinā hutvā sarpistadamṛta ca hi | triśca taṁ jvalanaṁ devaṁ kārayitvā pradakṣiṇam

विधिपूर्वक घृत और अमृत की आहुति देकर, और उस अग्निदेव की तीन बार प्रदक्षिणा कराकर।

श्लोक 146 (skanda.8.13.146)

मुक्त्वा हस्तसमायोगं सहितः सर्वदेवतैः । सुतैश्च मानसैः सर्वैः प्रहृष्टेनान्तरात्मना

muktvā hastasamāyogaṁ sahitaḥ sarvadevataiḥ | sutaiśca mānasaiḥ sarvaiḥ prahṛṣṭenāntarātmanā

हाथों के बन्धन को छोड़कर, समस्त देवताओं और अपने समस्त मानसपुत्रों सहित, अत्यन्त प्रसन्न अन्तरात्मा से।

श्लोक 147 (skanda.8.13.147)

वृत्ते उद्वाहकार्ये तु प्रणनाम वृषध्वजम् । योगेनैव तयोर्व्यास तदोमापरमेशयोः

vṛtte udvāhakārye tu praṇanāma vṛṣadhvajam | yogenaiva tayorvyāsa tadomāparameśayoḥ

विवाह कार्य सम्पन्न हो जाने पर ब्रह्मा ने वृषभध्वज शिव को प्रणाम किया। हे व्यास! तब उमा और परमेश दोनों का यह विवाह योगमात्र से ही सम्पन्न हुआ।

श्लोक 148 (skanda.8.13.148)

उद्वाहः स परो वृत्तो यं देवा न विदुः क्वचित् । इति ते सर्वमाख्यातं स्वयंवरमिदं शुभम् । उद्वाहश्चैव देवस्य शृण्वतः परमाद्भुतम्

udvāhaḥ sa paro vṛtto yaṁ devā na viduḥ kvacit | iti te sarvamākhyātaṁ svayaṁvaramidaṁ śubham | udvāhaścaiva devasya śṛṇvataḥ paramādbhutam

वह परम विवाह इस प्रकार सम्पन्न हुआ, जिसे देवता भी कभी नहीं जान पाए। इस प्रकार यह शुभ स्वयंवर और देव का यह परम अद्भुत विवाह, हे श्रोता, मैंने तुम्हें सम्पूर्ण रूप से कह सुनाया।

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