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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 109

राम का सत्य-सम्बन्धी उपदेश

सर्ग 108सर्ग-सूचीसर्ग 110

श्लोक 1 (ayodhya.109.1)

जाबालेः तु वचः श्रुत्वा रामः सत्य आत्मनाम् वरः। उवाच परया युक्त्या स्व बुद्ध्या च अविपन्नया॥ 109.1 ॥

jābāleḥ tu vacaḥ śrutvā rāmaḥ satya ātmanām varaḥ| uvāca parayā yuktyā sva buddhyā ca avipannayā

जाबालि के वचन सुनकर, सत्यनिष्ठ पुरुषों में श्रेष्ठ राम ने अत्यंत उत्तम युक्ति और अपनी अविचलित बुद्धि से यह कहा।

श्लोक 2 (ayodhya.109.2)

भवान् मे प्रिय काम अर्थम् वचनम् यद् इह उक्तवान्। अकार्यम् कार्य सम्काशम् अपथ्यम् पथ्य सम्मितम्॥ 109.2 ॥

bhavān me priya kāma artham vacanam yad iha uktavān| akāryam kārya samkāśam apathyam pathya sammitam

"आपने मुझे प्रसन्न करने की इच्छा से यहाँ जो वचन कहे हैं, वे करने योग्य से दिखते हुए भी वास्तव में अकरणीय हैं — जैसे कोई अपथ्य भोजन पथ्य-सा प्रतीत होता है।

श्लोक 3 (ayodhya.109.3)

निर्मर्यादः तु पुरुषः पाप आचार समन्वितः। मानम् न लभते सत्सु भिन्न चारित्र दर्शनः॥ 109.3 ॥

nirmaryādaḥ tu puruṣaḥ pāpa ācāra samanvitaḥ| mānam na labhate satsu bhinna cāritra darśanaḥ

मर्यादाहीन, पापाचार से युक्त और भिन्न चरित्र दिखाने वाला पुरुष सज्जनों के बीच सम्मान नहीं पाता।

श्लोक 4 (ayodhya.109.4)

कुलीनम् अकुलीनम् वा वीरम् पुरुष मानिनम्। चारित्रम् एव व्याख्याति शुचिम् वा यदि वा अशुचिम्॥ 109.4 ॥

kulīnam akulīnam vā vīram puruṣa māninam| cāritram eva vyākhyāti śucim vā yadi vā aśucim

आचरण ही यह बताता है कि कोई पुरुष कुलीन है या अकुलीन, सच्चा वीर है या केवल घमंडी, पवित्र है या अपवित्र।

श्लोक 5 (ayodhya.109.5)

अनारयः तु आर्य सम्काशः शौचाद्द् हीनः तथा शुचिः। लक्षण्यवद् अलक्षण्यो दुह्शीलः शीलवान् इव॥ 109.5 ॥

anārayaḥ tu ārya samkāśaḥ śaucādd hīnaḥ tathā śuciḥ| lakṣaṇyavad alakṣaṇyo duhśīlaḥ śīlavān iva

यदि मैं अनार्य होते हुए भी आर्य के समान दिखूँ, शौच से हीन होते हुए भी शुचि प्रतीत होऊँ, शुभ लक्षणों से रहित होते हुए भी लक्षणसम्पन्न-सा जान पड़ूँ, दुःशील होते हुए भी शीलवान प्रतीत होऊँ —

श्लोक 6 (ayodhya.109.6)

अधर्मम् धर्म वेषेण यदि इमम् लोक सम्करम्। अभिपत्स्ये शुभम् हित्वा क्रिया विधि विवर्जितम्॥ 109.6 ॥

adharmam dharma veṣeṇa yadi imam loka samkaram| abhipatsye śubham hitvā kriyā vidhi vivarjitam

— और शुभ को त्यागकर, धर्म के वेश में अधर्म को अपना लूँ, जो लोक में संकर उत्पन्न करने वाला और आचार-विधि से रहित हो —

श्लोक 7 (ayodhya.109.7)

कः चेतयानः पुरुषः कार्य अकार्य विचक्षणः। बहु मंस्यति माम् लोके दुर्वृत्तम् लोक दूषणम्॥ 109.7 ॥

kaḥ cetayānaḥ puruṣaḥ kārya akārya vicakṣaṇaḥ| bahu maṃsyati mām loke durvṛttam loka dūṣaṇam

— तो भला संसार में कर्तव्य-अकर्तव्य को पहचानने वाला कौन बुद्धिमान पुरुष, दुराचारी और लोक को दूषित करने वाले मुझको आदर देगा?

श्लोक 8 (ayodhya.109.8)

कस्य यास्याम्य् अहम् वृत्तम् केन वा स्वर्गम् आप्नुयाम्। अनया वर्तमानो अहम् वृत्त्या हीन प्रतिज्ञया॥ 109.8 ॥

kasya yāsyāmy aham vṛttam kena vā svargam āpnuyām| anayā vartamāno aham vṛttyā hīna pratijñayā

यदि मैं वचन से हीन ऐसे आचरण से जीऊँ, तो मैं किसके लिए आदर्श बनूँगा, और किस उपाय से स्वर्ग पाऊँगा?

श्लोक 9 (ayodhya.109.9)

काम वृत्तः तु अयम् लोकः कृत्स्नः समुपवर्तते। यद् वृत्ताः सन्ति राजानः तद् वृत्ताः सन्ति हि प्रजाः॥ 109.9 ॥

kāma vṛttaḥ tu ayam lokaḥ kṛtsnaḥ samupavartate| yad vṛttāḥ santi rājānaḥ tad vṛttāḥ santi hi prajāḥ

यह समस्त संसार तो इच्छानुसार ही चलता है; क्योंकि जैसा आचरण राजाओं का होता है, वैसा ही प्रजा का भी हो जाता है।

श्लोक 10 (ayodhya.109.10)

सत्यम् एव आनृशंस्यम् च राज वृत्तम् सनातनम्। तस्मात् सत्य आत्मकम् राज्यम् सत्ये लोकः प्रतिष्ठितः॥ 109.10 ॥

satyam eva ānṛśaṃsyam ca rāja vṛttam sanātanam| tasmāt satya ātmakam rājyam satye lokaḥ pratiṣṭhitaḥ

सत्य और अक्रूरता ही राजा का सनातन धर्म है; इसलिए राज्य का मूल स्वरूप सत्य ही है, और यह संसार सत्य पर ही प्रतिष्ठित है।

श्लोक 11 (ayodhya.109.11)

ऋषयः चैव देवाः च सत्यम् एव हि मेनिरे। सत्य वादी हि लोके अस्मिन् परमम् गच्छति क्षयम्॥ 109.11 ॥

ṛṣayaḥ caiva devāḥ ca satyam eva hi menire| satya vādī hi loke asmin paramam gacchati kṣayam

ऋषियों और देवताओं ने भी सत्य का ही सम्मान किया है; सत्यवादी पुरुष इस लोक में परम स्थिति को प्राप्त करता है।

श्लोक 12 (ayodhya.109.12)

उद्विजन्ते यथा सर्पान् नराद् अनृत वादिनः। धर्मः सत्यम् परो लोके मूलम् स्वर्गस्य च उच्यते॥ 109.12 ॥

udvijante yathā sarpān narād anṛta vādinaḥ| dharmaḥ satyam paro loke mūlam svargasya ca ucyate

लोग असत्यवादी पुरुष से वैसे ही डरते हैं जैसे सर्प से; सत्य ही इस लोक में परम धर्म कहा गया है और स्वर्ग का मूल भी।

श्लोक 13 (ayodhya.109.13)

सत्यम् एव ईश्वरो लोके सत्यम् पद्मा समाश्रिता। सत्य मूलानि सर्वाणि सत्यान् न अस्ति परम् पदम्॥ 109.13 ॥

satyam eva īśvaro loke satyam padmā samāśritā| satya mūlāni sarvāṇi satyān na asti param padam

सत्य ही इस लोक में ईश्वर के समान है; लक्ष्मी भी सत्य का ही आश्रय लेती हैं; सब कुछ सत्य में ही निहित है — सत्य से बढ़कर कोई पद नहीं है।

श्लोक 14 (ayodhya.109.14)

दत्तम् इष्टम् हुतम् चैव तप्तानि च तपांसि च। वेदाः सत्य प्रतिष्ठानाः तस्मात् सत्य परो भवेत्॥ 109.14 ॥

dattam iṣṭam hutam caiva taptāni ca tapāṃsi ca| vedāḥ satya pratiṣṭhānāḥ tasmāt satya paro bhavet

दिया हुआ दान, किया हुआ यज्ञ, दी गई आहुति, तपा हुआ तप, और वेद — ये सब सत्य पर ही प्रतिष्ठित हैं; इसलिए सत्य को ही सर्वोपरि मानना चाहिए।

श्लोक 15 (ayodhya.109.15)

एकः पालयते लोकम् एकः पालयते कुलम्। मज्जत्य् एको हि निरयः एकः स्वर्गे महीयते॥ 109.15 ॥

ekaḥ pālayate lokam ekaḥ pālayate kulam| majjaty eko hi nirayaḥ ekaḥ svarge mahīyate

सत्य से ही एक व्यक्ति संसार का पालन करता है, सत्य से ही एक कुल की रक्षा होती है; इसके अभाव में एक नरक में डूबता है, और इसकी रक्षा से एक स्वर्ग में प्रतिष्ठित होता है।

श्लोक 16 (ayodhya.109.16)

सो अहम् पितुर् निदेशम् तु किम् अर्थम् न अनुपालये। सत्य प्रतिश्रवः सत्यम् सत्येन समयी कृतः॥ 109.16 ॥

so aham pitur nideśam tu kim artham na anupālaye| satya pratiśravaḥ satyam satyena samayī kṛtaḥ

ऐसा होते हुए मैं भला अपने पिता के आदेश का पालन क्यों न करूँ? मैं सत्यप्रतिज्ञ हूँ और सत्य से ही अपनी प्रतिज्ञा में बँधा हुआ हूँ।

श्लोक 17 (ayodhya.109.17)

न एव लोभान् न मोहाद् वा न च अज्ञानात् तमो अन्वितः। सेतुम् सत्यस्य भेत्स्यामि गुरोः सत्य प्रतिश्रवः॥ 109.17 ॥

na eva lobhān na mohād vā na ca ajñānāt tamo anvitaḥ| setum satyasya bhetsyāmi guroḥ satya pratiśravaḥ

न तो लोभ से, न मोह से, न अज्ञान के अंधकार में पड़कर, मैं अपने गुरु को दिए हुए सत्य के सेतु को — अपनी प्रतिज्ञा को — तोड़ूँगा।

श्लोक 18 (ayodhya.109.18)

असत्य संधस्य सतः चलस्य अस्थिर चेतसः। न एव देवा न पितरः प्रतीच्छन्ति इति नः श्रुतम्॥ 109.18 ॥

asatya saṃdhasya sataḥ calasya asthira cetasaḥ| na eva devā na pitaraḥ pratīcchanti iti naḥ śrutam

हमने यह सुना है कि जिसका वचन असत्य है, जो चंचल और अस्थिरचित्त है, उसकी भेंट न तो देवता स्वीकार करते हैं और न पितर।

श्लोक 19 (ayodhya.109.19)

प्रत्यग् आत्मम् इमम् धर्मम् सत्यम् पश्याम्य् अहम् स्वयम्। भारः सत् पुरुष आचीर्णः तद् अर्थम् अभिनन्द्यते॥ 109.19 ॥

pratyag ātmam imam dharmam satyam paśyāmy aham svayam| bhāraḥ sat puruṣa ācīrṇaḥ tad artham abhinandyate

मैं स्वयं इस सत्यरूपी धर्म को अपनी अंतरात्मा से जुड़ा हुआ देखता हूँ; इसीलिए सत्पुरुषों ने इसे भार के रूप में स्वीकार किया है और यह सम्मानित होता है।

श्लोक 20 (ayodhya.109.20)

क्षात्रम् धर्मम् अहम् त्यक्ष्ये ह्य् अधर्मम् धर्म सम्हितम्। क्षुद्रौर् नृशंसैर् लुब्धैः च सेवितम् पाप कर्मभिः॥ 109.20 ॥

kṣātram dharmam aham tyakṣye hy adharmam dharma samhitam| kṣudraur nṛśaṃsair lubdhaiḥ ca sevitam pāpa karmabhiḥ

मैं ऐसे क्षत्रिय-धर्म को त्याग दूँगा जो धर्म के रूप में अधर्म ही है और जिसका आचरण क्षुद्र, क्रूर, लोभी और पापकर्मी लोग करते हैं।

श्लोक 21 (ayodhya.109.21)

कायेन कुरुते पापम् मनसा सम्प्रधार्य च। अनृतम् जिह्वया च आह त्रिविधम् कर्म पातकम्॥ 109.21 ॥

kāyena kurute pāpam manasā sampradhārya ca| anṛtam jihvayā ca āha trividham karma pātakam

शरीर से किया गया पाप, मन में पहले से निश्चित किया गया, और जिह्वा से बोला गया असत्य — पापकर्म इस प्रकार तीन प्रकार का होता है।

श्लोक 22 (ayodhya.109.22)

भूमिः कीर्तिर् यशो लक्ष्मीः पुरुषम् प्रार्थयन्ति हि। स्वर्गस्थम् च अनुबध्नन्ति सत्यम् एव भजेत तत्॥ 109.22 ॥

bhūmiḥ kīrtir yaśo lakṣmīḥ puruṣam prārthayanti hi| svargastham ca anubadhnanti satyam eva bhajeta tat

पृथ्वी, कीर्ति, यश और लक्ष्मी — ये सब सत्यवादी पुरुष की ही कामना करते हैं और स्वर्गस्थ होने पर भी उसका अनुसरण करते हैं; इसलिए सत्य का ही आश्रय लेना चाहिए।

श्लोक 23 (ayodhya.109.23)

श्रेष्ठम् ह्य् अनार्यम् एव स्याद् यद् भवान् अवधार्य माम्। आह युक्ति करैर् वाक्यैर् इदम् भद्रम् कुरुष्व ह॥ 109.23 ॥

śreṣṭham hy anāryam eva syād yad bhavān avadhārya mām| āha yukti karair vākyair idam bhadram kuruṣva ha

जो आपने मुझे ऐसा समझकर, युक्तिपूर्ण प्रतीत होने वाले वचनों से "यह शुभ कार्य करो" कहा है, वह श्रेष्ठ दिखते हुए भी वास्तव में अनार्य कर्म ही है।

श्लोक 24 (ayodhya.109.24)

कथम् ह्य् अहम् प्रतिज्ञाय वन वासम् इमम् गुरोः। भरतस्य करिष्यामि वचो हित्वा गुरोर् वचः॥ 109.24 ॥

katham hy aham pratijñāya vana vāsam imam guroḥ| bharatasya kariṣyāmi vaco hitvā guror vacaḥ

पिता से यह वनवास स्वीकार करने की प्रतिज्ञा करके, मैं पिता के वचन को त्यागकर भरत के वचन का पालन भला कैसे कर सकता हूँ?

श्लोक 25 (ayodhya.109.25)

स्थिरा मया प्रतिज्ञाता प्रतिज्ञा गुरु सम्निधौ। प्रहृष्ट मानसा देवी कैकेयी च अभवत् तदा॥ 109.25 ॥

sthirā mayā pratijñātā pratijñā guru samnidhau| prahṛṣṭa mānasā devī kaikeyī ca abhavat tadā

मैंने पिता की उपस्थिति में यह दृढ़ प्रतिज्ञा की थी, और उसी समय देवी कैकेयी का मन हर्ष से भर गया था।

श्लोक 26 (ayodhya.109.26)

वन वासम् वसन्न् एवम् शुचिर् नियत भोजनः। मूलैः पुष्पैः फलैः पुण्यैः पितृऋन् देवान् च तर्पयन्॥ 109.26 ॥

vana vāsam vasann evam śucir niyata bhojanaḥ| mūlaiḥ puṣpaiḥ phalaiḥ puṇyaiḥ pitṛṛn devān ca tarpayan

इस प्रकार वन में निवास करते हुए, पवित्र और नियमित आहार वाला होकर, पवित्र मूल, फल और फूलों से पितरों और देवताओं को तृप्त करते हुए —

श्लोक 27 (ayodhya.109.27)

सम्तुष्ट पन्च वर्गो अहम् लोक यात्राम् प्रवर्तये। अकुहः श्रद्दधानः सन् कार्य अकार्य विचक्षणः॥ 109.27 ॥

samtuṣṭa panca vargo aham loka yātrām pravartaye| akuhaḥ śraddadhānaḥ san kārya akārya vicakṣaṇaḥ

— अपनी पाँचों इंद्रियों को संतुष्ट रखते हुए, निष्कपट, श्रद्धावान् और कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेक रखते हुए, मैं इसी प्रकार अपनी जीवन-यात्रा को आगे बढ़ाऊँगा।

श्लोक 28 (ayodhya.109.28)

कर्म भूमिम् इमाम् प्राप्य कर्तव्यम् कर्म यत् शुभम्। अग्निर् वायुः च सोमः च कर्मणाम् फल भागिनः॥ 109.28 ॥

karma bhūmim imām prāpya kartavyam karma yat śubham| agnir vāyuḥ ca somaḥ ca karmaṇām phala bhāginaḥ

इस कर्मभूमि को पाकर वही कर्म करना चाहिए जो शुभ हो; अग्नि, वायु और सोम भी तो अपने-अपने कर्मों के फल के ही भागी हैं।

श्लोक 29 (ayodhya.109.29)

शतम् क्रतूनाम् आहृत्य देव राट् त्रिदिवम् गतः। तपांस्य् उग्राणि च आस्थाय दिवम् याता महर्षयः॥ 109.29 ॥

śatam kratūnām āhṛtya deva rāṭ tridivam gataḥ| tapāṃsy ugrāṇi ca āsthāya divam yātā maharṣayaḥ

सौ यज्ञ करके ही देवराज इंद्र स्वर्ग को गए थे, और घोर तप करके ही महर्षिगण स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं।

श्लोक 30 (ayodhya.109.30)

अमृष्यमाणः पुनरुग्रतेजा। निशम्य तं नास्तिकवाक्यहेतुम्। अथाब्रवीत्तं नृपतेस्तनूजो। विगर्हमाणो वचानानि तस्य॥ 109.30 ॥

amṛṣyamāṇaḥ punarugratejā| niśamya taṃ nāstikavākyahetum| athābravīttaṃ nṛpatestanūjo| vigarhamāṇo vacānāni tasya

तब उस अत्यंत तेजस्वी राजकुमार ने, जाबालि के नास्तिकतापूर्ण तर्क को सुनकर उसे सहन न करते हुए, उनके वचनों की निंदा करते हुए फिर से यह कहा।

श्लोक 31 (ayodhya.109.31)

सत्यं च धर्मं च पराक्रमं च। भूतानुकम्पां प्रियवादिताम् च। द्विजातिदेवातिथिपूजनं च। पन्थानमाहुस्त्रिदिवस्य सन्तः॥ 109.31 ॥

satyaṃ ca dharmaṃ ca parākramaṃ ca| bhūtānukampāṃ priyavāditām ca| dvijātidevātithipūjanaṃ ca| panthānamāhustridivasya santaḥ

सत्य, धर्म, पराक्रम, प्राणिमात्र पर दया, मधुर वाणी, और ब्राह्मणों, देवताओं तथा अतिथियों का पूजन — इन्हें ही सत्पुरुष स्वर्ग के मार्ग कहते हैं।

श्लोक 32 (ayodhya.109.32)

तेनैवमाज्ञाय यथावदर्थ। मेकोदयं सम्प्रतिपद्य विप्राः। धर्मं चरन्तः सकलं यथाव। त्काज़्^ख़्षन्ति लोकागममप्रमत्ताः॥ 109.32 ॥

tenaivamājñāya yathāvadartha| mekodayaṃ sampratipadya viprāḥ| dharmaṃ carantaḥ sakalaṃ yathāva| tkāज़्^ख़्ṣanti lokāgamamapramattāḥ

इसे भली-भाँति जानकर ही विद्वज्जन एकनिष्ठ होकर धर्म का सम्पूर्ण आचरण करते हुए, सावधान रहकर उत्तम लोकों की प्राप्ति की कामना करते हैं।

श्लोक 33 (ayodhya.109.33)

निन्दाम्यहं कर्म पितुः कृतं त। द्यस्त्वामगृह्णाद्विषमस्थबुद्धिम्। बुद्ध्यानयैवंविधया चरन्तं। सुनास्तिकं धर्मपथादपेतम्॥ 109.33 ॥

nindāmyahaṃ karma pituḥ kṛtaṃ ta| dyastvāmagṛhṇādviṣamasthabuddhim| buddhyānayaivaṃvidhayā carantaṃ| sunāstikaṃ dharmapathādapetam

मैं अपने पिता के उस कार्य की निंदा करता हूँ, जिसमें उन्होंने विषम बुद्धि वाले तुम्हें अपने पास रखा — तुम, जो इसी प्रकार की बुद्धि से आचरण करते हुए, धर्मपथ से भ्रष्ट पक्के नास्तिक हो।

श्लोक 34 (ayodhya.109.34)

यथा हि चोरः स तथा हि बुद्ध। स्तथागतं नास्तिकमत्र विध्हि। तस्माद्धि यः शङ्क्यतमः प्रजानाम्। न नास्ति केनाभिमुखो बुधः स्यात्॥ 109.34 ॥

yathā hi coraḥ sa tathā hi buddha| stathāgataṃ nāstikamatra vidhhi| tasmāddhi yaḥ śaṅkyatamaḥ prajānām| na nāsti kenābhimukho budhaḥ syāt

जैसे चोर चोर होता है, वैसे ही यहाँ "बुद्ध" को भी नास्तिक के ही समान जानो, जो उसी मार्ग पर गया है; क्योंकि वह प्रजा में सबसे अधिक संदेह के योग्य है — इसीलिए बुद्धिमान पुरुष को कभी नास्तिक की ओर उन्मुख नहीं होना चाहिए।

श्लोक 35 (ayodhya.109.35)

त्वत्तो जनाः पूर्वतरे वराश्च। शुभानि कर्माणि बहूनि चक्रुः। चित्वा सदेमं च परम् च लौकं। तस्माद्द्विजाः स्वस्ति हुतं कृतं च॥ 109.35 ॥

tvatto janāḥ pūrvatare varāśca| śubhāni karmāṇi bahūni cakruḥ| citvā sademaṃ ca param ca laukaṃ| tasmāddvijāḥ svasti hutaṃ kṛtaṃ ca

तुमसे पहले के श्रेष्ठ पुरुषों ने इस लोक और परलोक दोनों पर भली-भाँति विचार करके अनेक शुभ कर्म किए हैं; इसीलिए ब्राह्मण लोग कल्याण के लिए हवन और सत्कर्म करते हैं।

श्लोक 36 (ayodhya.109.36)

धर्मे रताः सत् पुरुषैः समेताः। तेजस्विनो दान गुण प्रधानाः। अहिंसका वीत मलाः च लोके। भवन्ति पूज्या मुनयः प्रधानाः॥ 109.36 ॥

dharme ratāḥ sat puruṣaiḥ sametāḥ| tejasvino dāna guṇa pradhānāḥ| ahiṃsakā vīta malāḥ ca loke| bhavanti pūjyā munayaḥ pradhānāḥ

धर्म में रत, सत्पुरुषों के साथ रहने वाले, तेजस्वी, दानशील, अहिंसक और निर्मल मुनि ही संसार में सर्वाधिक पूज्य होते हैं।

श्लोक 37 (ayodhya.109.37)

इति ब्रुवन्तं वचनं सरोषं। रामं महात्मानमदीनसत्त्वम्। उवाच पथ्यं पुनरास्तिकं च। सत्यं वचः सानुनयं च विप्रः॥ 109.37 ॥

iti bruvantaṃ vacanaṃ saroṣaṃ| rāmaṃ mahātmānamadīnasattvam| uvāca pathyaṃ punarāstikaṃ ca| satyaṃ vacaḥ sānunayaṃ ca vipraḥ

इस प्रकार क्रोधपूर्वक बोलते हुए, कभी हतोत्साह न होने वाले महात्मा राम से, ब्राह्मण जाबालि ने पुनः हितकर, आस्तिकतापूर्ण, सत्य और सांत्वनायुक्त वचन कहे।

श्लोक 38 (ayodhya.109.38)

न नास्तिकानां वचनम् ब्रवीम्यहं। न नास्तिकोऽहं न च नास्ति किंचन। समीक्ष्य कालं पुनरास्तिकोऽभवं। भवेय काले पुनरेव नास्तिकः॥ 109.38 ॥

na nāstikānāṃ vacanam bravīmyahaṃ| na nāstiko'haṃ na ca nāsti kiṃcana| samīkṣya kālaṃ punarāstiko'bhavaṃ| bhaveya kāle punareva nāstikaḥ

"मैं वास्तव में नास्तिकों जैसे वचन नहीं बोलता; न मैं नास्तिक हूँ, न ही ऐसा है कि कुछ भी नहीं है। अवसर को देखकर ही मैं फिर से आस्तिक हो गया; और यदि अवसर आए तो मैं पुनः नास्तिक भी बन सकता हूँ।

श्लोक 39 (ayodhya.109.39)

स चापि कालोऽय मुपागतः शनैः। यथा मया नास्तिकवागुदीरिता। निवर्तनार्थं तव राम कारणात्। प्रसादनार्थं च मयैतदीरितम् ॥॥ 109.39 ॥

sa cāpi kālo'ya mupāgataḥ śanaiḥ| yathā mayā nāstikavāgudīritā| nivartanārthaṃ tava rāma kāraṇāt| prasādanārthaṃ ca mayaitadīritam

हे राम! वही अवसर अब धीरे-धीरे आ पहुँचा है, जिस कारण मैंने नास्तिकतापूर्ण वचन कहे थे — वह तुम्हें ही लौटाने के लिए और तुम्हें प्रसन्न करने के लिए ही मैंने कहा था।"

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