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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 13

राजा की विलाप-रात्रि

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श्लोक 1 (ayodhya.13.1)

अतदर्हं महाराजं शयानमतथोचितम् । ययातिमिव पुण्यान्ते देवलोकात्परिच्युतम् ।। १३.१ ।।

atadarhaṃ mahārājaṃ śayānamatathocitam | yayātimiva puṇyānte devalokātparicyutam || 13.1 ||

उस महाराज को, जो इस अनुचित और अशोभनीय दशा में पड़े थे—मानो पुण्य क्षीण होने पर देवलोक से गिरे हुए ययाति के समान।

श्लोक 2 (ayodhya.13.2)

अनर्थरूपासिद्धार्था ह्यभीता भयदर्शिनी । पुनराकारयामास तमेव वरमङ्गना ।। १३.२ ।।

anartharūpāsiddhārthā hyabhītā bhayadarśinī | punarākārayāmāsa tameva varamaṅganā || 13.2 ||

अनर्थ का साक्षात रूप, अपने प्रयोजन में सिद्ध, निर्भय होते हुए भी सदा भय दिखाने वाली उस स्त्री ने राजा को फिर उसी वर के लिए पुकारा।

श्लोक 3 (ayodhya.13.3)

त्वं कत्थसे महाराज सत्यवादी दृढव्रतः । मम चेदं वरं कस्माद्विधारयितुमिच्छसि ।। १३.३ ।।

tvaṃ katthase mahārāja satyavādī dṛḍhavrataḥ | mama cedaṃ varaṃ kasmādvidhārayitumicchasi || 13.3 ||

'हे महाराज! आप स्वयं को सत्यवादी और दृढ़प्रतिज्ञ कहकर गर्व करते हैं। फिर मेरा यह वर देने में क्यों हिचकिचा रहे हैं?'

श्लोक 4 (ayodhya.13.4)

एवमुक्तस्तु कैकेय्या राजा दशरथस्तदा । प्रत्युवाच ततः क्रुद्धो मुहूर्तं विह्वलन्निव ।। १३.४ ।।

evamuktastu kaikeyyā rājā daśarathastadā | pratyuvāca tataḥ kruddho muhūrtaṃ vihvalanniva || 13.4 ||

कैकेयी के इस प्रकार कहने पर राजा दशरथ क्रोधित हो उठे, और क्षणभर मानो विह्वल-से होकर उन्होंने यह उत्तर दिया।

श्लोक 5 (ayodhya.13.5)

मृते मयि गते रामे वनं मनुजपुङ्गवे । हन्तानार्ये ममामित्रे सकामा सुखिनी भव ।। १३.५ ।।

mṛte mayi gate rāme vanaṃ manujapuṅgave | hantānārye mamāmitre sakāmā sukhinī bhava || 13.5 ||

'जब मैं मर जाऊँगा और नरश्रेष्ठ राम वन को चले जाएँगे, तब हे अनार्ये! हे मेरी शत्रु! तब तू अपनी इच्छा पूरी करके सुखी हो जाना!'

श्लोक 6 (ayodhya.13.6)

स्वर्गेऽपि खलु रामस्य कुशलं दैवतैरहम् । प्रत्यादेशादभिहितं धारयिष्ये कथं बत ।। १३.६ ।।

svarge'pi khalu rāmasya kuśalaṃ daivatairaham | pratyādeśādabhihitaṃ dhārayiṣye kathaṃ bata || 13.6 ||

'हाय! स्वर्ग में भी जब देवता राम की कुशलता की बात कहेंगे, तो उसे अस्वीकार कर चुका मैं यह बात कैसे सह सकूँगा?'

श्लोक 7 (ayodhya.13.7)

कैकेय्याः प्रियकामेन रामः प्रव्राजितो वनम् । यदि सत्यं ब्रवीम्येतत्तदसत्यं भविष्यति ।। १३.७ ।।

kaikeyyāḥ priyakāmena rāmaḥ pravrājito vanam | yadi satyaṃ bravīmyetattadasatyaṃ bhaviṣyati || 13.7 ||

'कैकेयी को प्रसन्न करने के लिए ही राम को वन भेजा गया—यह बात यदि मैं सच कहकर भी कहूँ, तो वह असत्य ही जान पड़ेगी!'

श्लोक 8 (ayodhya.13.8)

अपुत्रेण मया पुत्रः श्रमेण महता महान् । रामो लब्धो महाबाहुः स कथं त्यज्यते मया ।। १३.८ ।।

aputreṇa mayā putraḥ śrameṇa mahatā mahān | rāmo labdho mahābāhuḥ sa kathaṃ tyajyate mayā || 13.8 ||

'पुत्रहीन मुझे अत्यंत परिश्रम से यह महान, महाबाहु पुत्र राम प्राप्त हुआ था—फिर उन्हें मैं कैसे त्याग सकता हूँ?'

श्लोक 9 (ayodhya.13.9)

शूरश्च कृतविद्यश्च जितक्रोधः क्षमापरः । कथं कमलपत्राक्षो मया रामो विवास्यते ।। १३.९ ।।

śūraśca kṛtavidyaśca jitakrodhaḥ kṣamāparaḥ | kathaṃ kamalapatrākṣo mayā rāmo vivāsyate || 13.9 ||

'वे शूरवीर, विद्यावान, क्रोध पर विजयी और क्षमाशील हैं—फिर उस कमलनयन राम को मैं कैसे देश-निकाला दूँ?'

श्लोक 10 (ayodhya.13.10)

कथमिन्दीवरश्यामं दीर्घबाहुं महाबलम् । अभिराममहं रामं प्रेषयिष्यामि दण्डकान् ।। १३.१० ।।

kathamindīvaraśyāmaṃ dīrghabāhuṃ mahābalam | abhirāmamahaṃ rāmaṃ preṣayiṣyāmi daṇḍakān || 13.10 ||

'नीलकमल के समान श्याम वर्ण, दीर्घबाहु, महाबली और परम सुंदर उस राम को मैं दंडकवन कैसे भेज दूँगा?'

श्लोक 11 (ayodhya.13.11)

सुखानामुचितस्यैव दुःखैरनुचितस्य च । दुःखं नामानुपश्येयं कथं रामस्य धीमतः ।। १३.११ ।।

sukhānāmucitasyaiva duḥkhairanucitasya ca | duḥkhaṃ nāmānupaśyeyaṃ kathaṃ rāmasya dhīmataḥ || 13.11 ||

'जो सुख के ही योग्य हैं और दुःख के सर्वथा अयोग्य हैं, उन बुद्धिमान राम का दुःख मैं कैसे देख सकूँगा?'

श्लोक 12 (ayodhya.13.12)

यदि दुःखमकृत्वाद्य मम संक्रमणं भवेत् । अदुःखार्हस्य रामस्य ततः सुखमवाप्नुयाम् ।। १३.१२ ।।

yadi duḥkhamakṛtvādya mama saṃkramaṇaṃ bhavet | aduḥkhārhasya rāmasya tataḥ sukhamavāpnuyām || 13.12 ||

'यदि आज बिना दुःख दिए ही मेरा देहांत हो जाए, तो दुःख के अयोग्य राम को कष्ट न देकर ही मुझे सुख मिलेगा।'

श्लोक 13 (ayodhya.13.13)

नृशंसे पापसंकल्पे रामं सत्यपराक्रमम् । किं विप्रियेण कैकेयि प्रियं योजयसे मम ।। १३.१३ ।।

nṛśaṃse pāpasaṃkalpe rāmaṃ satyaparākramam | kiṃ vipriyeṇa kaikeyi priyaṃ yojayase mama || 13.13 ||

'हे क्रूर! हे पापसंकल्पिनी! सत्यपराक्रमी राम का अहित करके तू मेरे प्रिय को अप्रिय से क्यों जोड़ रही है, हे कैकेयी?'

श्लोक 14 (ayodhya.13.14)

अकीर्तिरतुला लोके ध्रुवं परिभविष्यति । तथा विलपतस्तस्य परिभ्रमितचेतसः ।। १३.१४ ।।

akīrtiratulā loke dhruvaṃ paribhaviṣyati | tathā vilapatastasya paribhramitacetasaḥ || 13.14 ||

'संसार में मुझ पर निश्चय ही अतुलनीय अपयश आ पड़ेगा'—इस प्रकार विलाप करते हुए उनका चित्त भ्रमित हो उठा।

श्लोक 15 (ayodhya.13.15)

अस्तमभ्यागमत्सूर्यो रजनी चाभ्यवर्तत । सा त्रियामा तथार्तस्य चन्द्रमण्डलमण्डिता ।। १३.१५ ।।

astamabhyāgamatsūryo rajanī cābhyavartata | sā triyāmā tathārtasya candramaṇḍalamaṇḍitā || 13.15 ||

सूर्य अस्त हो गया और रात्रि आ गई—उस दुःखी राजा के लिए वह तीन प्रहर की रात्रि, चंद्रमंडल से सुशोभित।

श्लोक 16 (ayodhya.13.16)

राज्ञो विलपमानस्य न व्यभासत शर्वरी । तथैवोष्णं विनिःश्वस्य वृद्धो दशरथो नृपः ।। १३.१६ ।।

rājño vilapamānasya na vyabhāsata śarvarī | tathaivoṣṇaṃ viniḥśvasya vṛddho daśaratho nṛpaḥ || 13.16 ||

विलाप करते हुए राजा को वह रात्रि जैसे चमकती ही न थी; इसी प्रकार उष्ण दीर्घ श्वास लेते हुए वृद्ध राजा दशरथ पड़े रहे।

श्लोक 17 (ayodhya.13.17)

विललापार्तवद्दुःखं गगनासक्तलोचनः । न प्रभातं त्वयेच्छामि निशे नक्षत्रभूषिते ।। १३.१७ ।।

vilalāpārtavadduḥkhaṃ gaganāsaktalocanaḥ | na prabhātaṃ tvayecchāmi niśe nakṣatrabhūṣite || 13.17 ||

आकाश की ओर आँखें गड़ाए वे पीड़ित की भाँति दुःखपूर्वक विलाप करने लगे—'हे नक्षत्रों से सुशोभित रात्रि! मैं नहीं चाहता कि तू प्रभात बने!'

श्लोक 18 (ayodhya.13.18)

क्रियतां मे दया भद्रे मयायं रचितोऽञ्जलिः । अथवा गम्यतां शीघ्रं नाहमिच्छामि निर्घृणाम् ।। १३.१८ ।।

kriyatāṃ me dayā bhadre mayāyaṃ racito'ñjaliḥ | athavā gamyatāṃ śīghraṃ nāhamicchāmi nirghṛṇām || 13.18 ||

'हे कल्याणी रात्रि! मुझ पर दया कर, देख मैं तेरे प्रति हाथ जोड़े खड़ा हूँ। अथवा शीघ्र बीत जा; मैं उस निर्दय स्त्री को [दिन में] देखना नहीं चाहता—'

श्लोक 19 (ayodhya.13.19)

नृशंसां कैकेयीं द्रष्टुं यत्कृते व्यसनं महत् । एवमुक्त्वा ततो राजा कैकेयीं संयताञ्जलिः ।। १३.१९ ।।

nṛśaṃsāṃ kaikeyīṃ draṣṭuṃ yatkṛte vyasanaṃ mahat | evamuktvā tato rājā kaikeyīṃ saṃyatāñjaliḥ || 13.19 ||

'—उस क्रूर कैकेयी को, जिसके कारण यह महान संकट आया है।' ऐसा कहकर राजा ने फिर हाथ जोड़कर कैकेयी की ओर देखा।

श्लोक 20 (ayodhya.13.20)

प्रसादयामास पुनः कैकेयीं चेदमब्रवीत् । साधुवृत्तस्य दीनस्य त्वद्गतस्य गतायुषः ।। १३.२० ।।

prasādayāmāsa punaḥ kaikeyīṃ cedamabravīt | sādhuvṛttasya dīnasya tvadgatasya gatāyuṣaḥ || 13.20 ||

उन्होंने फिर से कैकेयी को मनाने का प्रयत्न किया और यह कहा—'सदाचारी, अब दीन हो चुके, तेरे अधीन और जीवन के अंत पर पहुँचे इस वृद्ध की—'

श्लोक 21 (ayodhya.13.21)

प्रसादः क्रियतां देवि भद्रे राज्ञो विशेषतः । शून्ये न खलु सुश्रोणि मयेदं समुदाहृतम् ।। १३.२१ ।।

prasādaḥ kriyatāṃ devi bhadre rājño viśeṣataḥ | śūnye na khalu suśroṇi mayedaṃ samudāhṛtam || 13.21 ||

'—हे देवी! हे भद्रे! विशेष रूप से इस राजा पर कृपा कर। हे सुन्दरी! मैंने यह बात व्यर्थ में नहीं कही है।'

श्लोक 22 (ayodhya.13.22)

कुरु साधु प्रसादं मे बाले सहृदया ह्यसि । प्रसीद देवि रामो मे त्वद्दत्तं राज्यमव्ययम् ।। १३.२२ ।।

kuru sādhu prasādaṃ me bāle sahṛdayā hyasi | prasīda devi rāmo me tvaddattaṃ rājyamavyayam || 13.22 ||

'हे बाले! मुझ पर भली प्रकार कृपा कर, तू तो सहृदया है। हे देवी! प्रसन्न हो जा—मेरे राम का यह अक्षय राज्य मानो तेरा ही दिया हुआ होगा।'

श्लोक 23 (ayodhya.13.23)

लभतामसितापाङ्गे यशः परमवाप्नुहि । मम रामस्य लोकस्य गुरूणां भरतस्य च ।। १३.२३ ।।

labhatāmasitāpāṅge yaśaḥ paramavāpnuhi | mama rāmasya lokasya gurūṇāṃ bharatasya ca || 13.23 ||

'हे असितापांगी! राम इसे प्राप्त करें, और तू मेरे, राम के, संसार के, गुरुजनों के तथा भरत के समक्ष परम यश प्राप्त कर।'

श्लोक 24 (ayodhya.13.24)

प्रियमेतद्गुरुश्रोणि कुरु चारुमुखेक्षणे । विशुद्धभावस्य हि दुष्टभावा दीनस्य ताम्राश्रुकलस्य राज्ञः । श्रुत्वा विचित्रं करुणं विलापं भर्तुर्नृशंसा न चकार वाक्यम् ।। १३.२४ ।।

priyametadguruśroṇi kuru cārumukhekṣaṇe | viśuddhabhāvasya hi duṣṭabhāvā dīnasya tāmrāśrukalasya rājñaḥ | śrutvā vicitraṃ karuṇaṃ vilāpaṃ bharturnṛśaṃsā na cakāra vākyam || 13.24 ||

'हे सुंदर मुख और नेत्रों वाली! मुझ पर यह कृपा कर।' किंतु शुद्ध हृदय वाले, अब दीन हो चुके, ताम्रवर्ण आँसुओं वाले राजा के इस विचित्र और करुण विलाप को सुनकर भी, दुष्ट भाव वाली वह क्रूर स्त्री कुछ न बोली।

श्लोक 25 (ayodhya.13.25)

ततः स राजा पुनरेव मूर्च्छितः प्रियामतुष्टां प्रतिकूलभाषिणीम् । समीक्ष्य पुत्रस्य विवासनं प्रति क्षितौ विसंज्ञो निपपात दुःखितः ।। १३.२५ ।।

tataḥ sa rājā punareva mūrcchitaḥ priyāmatuṣṭāṃ pratikūlabhāṣiṇīm | samīkṣya putrasya vivāsanaṃ prati kṣitau visaṃjño nipapāta duḥkhitaḥ || 13.25 ||

तब अपने पुत्र के वनवास के विषय में असंतुष्ट और विपरीत बोलती हुई अपनी प्रिय पत्नी को देखकर राजा पुनः मूर्छित हो गए, और दुःख से विह्वल होकर संज्ञाशून्य होकर भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 26 (ayodhya.13.26)

इतीव राज्ञो व्यथितस्य सा निशा जगाम घोरं श्वसतो मनस्विनः । विबोध्यमानः प्रतिबोधनं तदा निवारयामास स राजसत्तमः ।। १३.२६ ।।

itīva rājño vyathitasya sā niśā jagāma ghoraṃ śvasato manasvinaḥ | vibodhyamānaḥ pratibodhanaṃ tadā nivārayāmāsa sa rājasattamaḥ || 13.26 ||

इस प्रकार उस व्यथित, दीर्घ श्वास लेते मनस्वी राजा की वह भयंकर रात्रि बीत गई; और जब कोई उन्हें जगाने आया, तब उस राजश्रेष्ठ ने जागने से ही इनकार कर दिया।

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