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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 12

दशरथ का महाविलाप

सर्ग 11सर्ग-सूचीसर्ग 13

श्लोक 1 (ayodhya.12.1)

ततः श्रुत्वा महाराजः कैकेय्या दारुणं वचः । चिन्तामभिसमापेदे मुहूर्तं प्रतताप च ।। १२.१ ।।

tataḥ śrutvā mahārājaḥ kaikeyyā dāruṇaṃ vacaḥ | cintāmabhisamāpede muhūrtaṃ pratatāpa ca || 12.1 ||

तत्पश्चात कैकेयी के कठोर वचन सुनकर महाराज दशरथ चिंता में डूब गए और क्षणभर के लिए संतप्त हो उठे।

श्लोक 2 (ayodhya.12.2)

किं नु मेऽयं दिवास्वप्नश्चित्तमोहोऽपि वा मम । अनुभूतोपसर्गो वा मनसो वाप्युपद्रवः ।। १२.२ ।।

kiṃ nu me'yaṃ divāsvapnaścittamoho'pi vā mama | anubhūtopasargo vā manaso vāpyupadravaḥ || 12.2 ||

'क्या यह मेरा दिवास्वप्न है, या मेरे चित्त का कोई मोह, या फिर मन का कोई उपद्रव जो मैंने अनुभव किया है?'

श्लोक 3 (ayodhya.12.3)

इति संचिन्त्य तद्राजा नाध्यगच्छत्तदा सुखम् । प्रतिलभ्य ततः संज्ञां कैकेयीवाक्यतापितः ।। १२.३ ।।

iti saṃcintya tadrājā nādhyagacchattadā sukham | pratilabhya tataḥ saṃjñāṃ kaikeyīvākyatāpitaḥ || 12.3 ||

इस प्रकार सोचते हुए भी राजा को उस समय कोई सुख न मिला; कैकेयी के वचनों से संतप्त होकर बड़ी देर बाद उन्होंने चेतना पाई।

श्लोक 4 (ayodhya.12.4)

व्यथितो विक्लवश्चैव व्याघ्रीं दृष्ट्वा यथा मृगः । असंवृतायामासीनो जगत्यां दीर्घमुच्छ्वसन् ।। १२.४ ।।

vyathito viklavaścaiva vyāghrīṃ dṛṣṭvā yathā mṛgaḥ | asaṃvṛtāyāmāsīno jagatyāṃ dīrghamucchvasan || 12.4 ||

व्याकुल और विचलित, मानो व्याघ्री को देखकर हिरण हो, वे खुले आँगन में बैठे लंबी साँसें लेने लगे।

श्लोक 5 (ayodhya.12.5)

मण्डले पन्नगो रुद्धो मन्त्रैरिव महाविषः । अहो धिगिति सामर्षो वाचमुक्त्वा नराधिपः ।। १२.५ ।।

maṇḍale pannago ruddho mantrairiva mahāviṣaḥ | aho dhigiti sāmarṣo vācamuktvā narādhipaḥ || 12.5 ||

मंत्रों से बाँधे गए महाविषधर सर्प के समान, क्रोध से भरकर 'हाय, धिक्कार है!' कहकर वे राजा बोल उठे।

श्लोक 6 (ayodhya.12.6)

मोहमापेदिवान्भूयः शोकोपहतचेतनः । चिरेण तु नृपः संज्ञां प्रतिलभ्य सुदुःखितः ।। १२.६ ।।

mohamāpedivānbhūyaḥ śokopahatacetanaḥ | cireṇa tu nṛpaḥ saṃjñāṃ pratilabhya suduḥkhitaḥ || 12.6 ||

शोक से चेतना खोकर वे फिर मूर्च्छित हो गए; बड़ी देर बाद अत्यंत दुःखी राजा ने पुनः होश में आकर—

श्लोक 7 (ayodhya.12.7)

कैकेयीमब्रवीत्क्रुद्धो निर्दहन्निव तेजसा । नृशंसे दुष्टचारित्रे कुलस्यास्य विनाशिनि ।। १२.७ ।।

kaikeyīmabravītkruddho nirdahanniva tejasā | nṛśaṃse duṣṭacāritre kulasyāsya vināśini || 12.7 ||

—क्रोधित होकर, मानो तेज से जला देने वाली दृष्टि से कैकेयी को यह कहा—'हे क्रूर! हे दुराचारिणी! हे इस कुल की विनाशिनी!'

श्लोक 8 (ayodhya.12.8)

किं कृतं तव रामेण पापे पापं मयापि वा । सदा ते जननीतुल्यां वृत्तिं वहति राघवः ।। १२.८ ।।

kiṃ kṛtaṃ tava rāmeṇa pāpe pāpaṃ mayāpi vā | sadā te jananītulyāṃ vṛttiṃ vahati rāghavaḥ || 12.8 ||

'हे पापिनी! राम ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, या मैंने ही क्या पाप किया है? राघव तो सदा तुम्हारे साथ माता के समान ही व्यवहार करता है।'

श्लोक 9 (ayodhya.12.9)

तस्यैवं त्वमनर्थाय किंनिमित्तमिहोद्यता । त्वं मयाऽऽत्मविनाशाय भवनं स्वं निवेशिता ।। १२.९ ।।

tasyaivaṃ tvamanarthāya kiṃnimittamihodyatā | tvaṃ mayā''tmavināśāya bhavanaṃ svaṃ niveśitā || 12.9 ||

'फिर किस कारण से तुम उसी के अनिष्ट के लिए तैयार हुई हो? तुम तो मेरे ही विनाश के लिए इस भवन में लाई गई थीं, यह मुझे ज्ञात न था।'

श्लोक 10 (ayodhya.12.10)

अविज्ञानान्नृपसुता व्याला तीक्ष्णविषा यथा । जीवलोको यदा सर्वो रामस्याह गुणस्तवम् ।। १२.१० ।।

avijñānānnṛpasutā vyālā tīkṣṇaviṣā yathā | jīvaloko yadā sarvo rāmasyāha guṇastavam || 12.10 ||

'हे राजपुत्री! जैसे कोई तीक्ष्ण विषैली नागिन हो, वैसे ही अनजाने में तुम्हें मैंने अपने घर में बसाया। जब सारा संसार राम के गुणों की स्तुति करता है—'

श्लोक 11 (ayodhya.12.11)

अपराधं कमुद्दिश्य त्यक्ष्यामीष्टमहं सुतम् । कौसल्यां च सुमित्रां च त्यजेयमपि वा श्रियम् ।। १२.११ ।।

aparādhaṃ kamuddiśya tyakṣyāmīṣṭamahaṃ sutam | kausalyāṃ ca sumitrāṃ ca tyajeyamapi vā śriyam || 12.11 ||

'—तो किस अपराध का बहाना लेकर मैं अपने प्रिय पुत्र को त्याग दूँ? मैं तो कौसल्या, सुमित्रा और यहाँ तक कि अपनी सम्पदा तक त्याग सकता हूँ—'

श्लोक 12 (ayodhya.12.12)

जीवितं चात्मनो रामं न त्वेव पितृवत्सलम् । परा भवति मे प्रीतिर्दृष्ट्वा तनयमग्रजम् ।। १२.१२ ।।

jīvitaṃ cātmano rāmaṃ na tveva pitṛvatsalam | parā bhavati me prītirdṛṣṭvā tanayamagrajam || 12.12 ||

'—अपने प्राण और स्वयं राम को छोड़कर, किंतु उस पितृभक्त को कभी नहीं। अपने ज्येष्ठ पुत्र को देखकर ही मुझे परम प्रीति मिलती है।'

श्लोक 13 (ayodhya.12.13)

अपश्यतस्तु मे रामं नष्टं भवति चेतनम् । तिष्ठेल्लोको विना सूर्यं सस्यं वा सलिलं विना ।। १२.१३ ।।

apaśyatastu me rāmaṃ naṣṭaṃ bhavati cetanam | tiṣṭhelloko vinā sūryaṃ sasyaṃ vā salilaṃ vinā || 12.13 ||

'राम को न देखकर मेरी चेतना ही लुप्त हो जाती है। सूर्य के बिना संसार रह सकता है, जल के बिना फसल रह सकती है—'

श्लोक 14 (ayodhya.12.14)

न तु रामं विना देहे तिष्ठेत्तु मम जीवितम् । तदलं त्यज्यतामेष निश्चयः पापनिश्चये ।। १२.१४ ।।

na tu rāmaṃ vinā dehe tiṣṭhettu mama jīvitam | tadalaṃ tyajyatāmeṣa niścayaḥ pāpaniścaye || 12.14 ||

'—किंतु राम के बिना मेरे शरीर में जीवन नहीं टिक सकता। इसलिए बस करो, हे पापपूर्ण निश्चय करने वाली! यह संकल्प त्याग दो।'

श्लोक 15 (ayodhya.12.15)

अपि ते चरणौ मूर्ध्ना स्पृशाम्येष प्रसीद मे । किमर्थं चिन्तितं पापे त्वया परमदारुणम् ।। १२.१५ ।।

api te caraṇau mūrdhnā spṛśāmyeṣa prasīda me | kimarthaṃ cintitaṃ pāpe tvayā paramadāruṇam || 12.15 ||

'मैं तुम्हारे चरणों को अपने सिर से स्पर्श करता हूँ; मुझ पर प्रसन्न हो जाओ। हे पापिनी! तुमने यह अत्यंत भयंकर बात क्यों सोच ली?'

श्लोक 16 (ayodhya.12.16)

अथ जिज्ञाससे मां त्वं भरतस्य प्रियाप्रिये । अस्तु यत्तत्त्वया पूर्वं व्याहृतं राघवं प्रति ।। १२.१६ ।।

atha jijñāsase māṃ tvaṃ bharatasya priyāpriye | astu yattattvayā pūrvaṃ vyāhṛtaṃ rāghavaṃ prati || 12.16 ||

'यदि तुम मुझसे भरत के प्रति मेरे स्नेह या अस्नेह की परीक्षा लेना चाहती थीं, तो ठीक है; इससे पहले तुमने राघव के विषय में जो कहा था—'

श्लोक 17 (ayodhya.12.17)

स मे ज्येष्ठसुतः श्रीमान्धर्मज्येष्ठ इतीव मे । तत्त्वया प्रियवादिन्या सेवार्थं कथितं भवेत् ।। १२.१७ ।।

sa me jyeṣṭhasutaḥ śrīmāndharmajyeṣṭha itīva me | tattvayā priyavādinyā sevārthaṃ kathitaṃ bhavet || 12.17 ||

'—कि श्रीमान राम मेरे ज्येष्ठ और धर्मश्रेष्ठ पुत्र हैं मानो मुझे स्मरण कराने के लिए—वह तुमने मीठी बातें बनाकर अपनी सेवा हेतु ही कहा होगा।'

श्लोक 18 (ayodhya.12.18)

तच्छ्रुत्वा शोकसंतप्ता संतापयसि मां भृशम् । आविष्टासि गृहे शून्ये सा त्वं परवशं गता ।। १२.१८ ।।

tacchrutvā śokasaṃtaptā saṃtāpayasi māṃ bhṛśam | āviṣṭāsi gṛhe śūnye sā tvaṃ paravaśaṃ gatā || 12.18 ||

'यह सुनकर, शोक से संतप्त होकर, तुम मुझे बुरी तरह पीड़ा दे रही हो। तुम मानो किसी सूने घर में प्रवेश कर गई हो और किसी और के वश में हो चली हो।'

श्लोक 19 (ayodhya.12.19)

इक्ष्वाकूणां कुले देवि सम्प्राप्तः सुमहानयम् । अनयो नयसम्पन्ने यत्र ते विकृता मतिः ।। १२.१९ ।।

ikṣvākūṇāṃ kule devi samprāptaḥ sumahānayam | anayo nayasampanne yatra te vikṛtā matiḥ || 12.19 ||

'हे देवी! इक्ष्वाकु वंश में, जो सदा सन्मार्ग पर रहा है, यह अत्यंत बड़ा अनर्थ आ पड़ा है, जिसके कारण तुम्हारी बुद्धि विकृत हो गई है।'

श्लोक 20 (ayodhya.12.20)

नहि किंचिदयुक्तं वा विप्रियं वा पुरा मम । अकरोस्त्वं विशालाक्षि तेन न श्रद्दधामि ते ।। १२.२० ।।

nahi kiṃcidayuktaṃ vā vipriyaṃ vā purā mama | akarostvaṃ viśālākṣi tena na śraddadhāmi te || 12.20 ||

'हे विशाललोचने! पहले तुमने मेरे साथ कभी कोई अनुचित या अप्रिय कार्य नहीं किया, इसीलिए मुझे यह विश्वास ही नहीं हो रहा।'

श्लोक 21 (ayodhya.12.21)

ननु ते राघवस्तुल्यो भरतेन महात्मना । बहुशो हि स्म बाले त्वं कथाः कथयसे मम ।। १२.२१ ।।

nanu te rāghavastulyo bharatena mahātmanā | bahuśo hi sma bāle tvaṃ kathāḥ kathayase mama || 12.21 ||

'तुम तो महात्मा भरत को राघव के समान ही मानती रही हो; हे बाले! तुमने स्वयं मुझे इस बारे में कई बार बताया था।'

श्लोक 22 (ayodhya.12.22)

तस्य धर्मात्मनो देवि वने वासं यशस्विनः । कथं रोचयसे भीरु नव वर्षाणि पञ्च च ।। १२.२२ ।।

tasya dharmātmano devi vane vāsaṃ yaśasvinaḥ | kathaṃ rocayase bhīru nava varṣāṇi pañca ca || 12.22 ||

'हे भीरु! तो फिर उस धर्मात्मा, यशस्वी राम के चौदह वर्षों तक वनवास में क्यों प्रसन्न हो रही हो?'

श्लोक 23 (ayodhya.12.23)

अत्यन्तसुकुमारस्य तस्य धर्मे कृतात्मनः । कथं रोचयसे वासमरण्ये भृशदारुणे ।। १२.२३ ।।

atyantasukumārasya tasya dharme kṛtātmanaḥ | kathaṃ rocayase vāsamaraṇye bhṛśadāruṇe || 12.23 ||

'जो अत्यंत सुकुमार हैं और सदा धर्म में स्थिर रहते हैं, उनके लिए इतने भयंकर वन में निवास में तुम्हें आनंद कैसे आ रहा है?'

श्लोक 24 (ayodhya.12.24)

रोचयस्यभिरामस्य रामस्य शुभलोचने । तव शुश्रूषमाणस्य किमर्थं विप्रवासनम् ।। १२.२४ ।।

rocayasyabhirāmasya rāmasya śubhalocane | tava śuśrūṣamāṇasya kimarthaṃ vipravāsanam || 12.24 ||

'हे सुनयने! जो राम तुम्हारी सेवा में सदा तत्पर और परम मनोहर हैं, उन्हीं के निर्वासन में तुम्हें प्रसन्नता क्यों हो रही है?'

श्लोक 25 (ayodhya.12.25)

रामो हि भरताद्भूयस्तव शुश्रूषते सदा । विशेषं त्वयि तस्मात्तु भरतस्य न लक्षये ।। १२.२५ ।।

rāmo hi bharatādbhūyastava śuśrūṣate sadā | viśeṣaṃ tvayi tasmāttu bharatasya na lakṣaye || 12.25 ||

'राम तो भरत से भी बढ़कर सदा तुम्हारी सेवा करते हैं; इसीलिए मुझे तुम्हारे मामले में भरत की कोई विशेष प्राथमिकता नहीं दिखती।'

श्लोक 26 (ayodhya.12.26)

शुश्रूषां गौरवं चैव प्रमाणं वचनक्रियाम् । कस्तु भूयस्तरं कुर्यादन्यत्र पुरुषर्षभात् ।। १२.२६ ।।

śuśrūṣāṃ gauravaṃ caiva pramāṇaṃ vacanakriyām | kastu bhūyastaraṃ kuryādanyatra puruṣarṣabhāt || 12.26 ||

'सेवा, आदर, विश्वासनीयता और आज्ञापालन में पुरुषश्रेष्ठ राम से बढ़कर तुम्हारे लिए और कौन कर सकता है?'

श्लोक 27 (ayodhya.12.27)

बहूनां स्त्रीसहस्राणां बहूनां चोपजीविनाम् । परिवादोऽपवादो वा राघवे नोपपद्यते ।। १२.२७ ।।

bahūnāṃ strīsahasrāṇāṃ bahūnāṃ copajīvinām | parivādo'pavādo vā rāghave nopapadyate || 12.27 ||

'हजारों स्त्रियों और अनेक आश्रितों के बीच भी राघव पर कभी कोई निंदा या दोषारोपण नहीं होता।'

श्लोक 28 (ayodhya.12.28)

सान्त्वयन्सर्वभूतानि रामः शुद्धेन चेतसा । गृह्णाति मनुजव्याघ्रः प्रियैर्विषयवासिनः ।। १२.२८ ।।

sāntvayansarvabhūtāni rāmaḥ śuddhena cetasā | gṛhṇāti manujavyāghraḥ priyairviṣayavāsinaḥ || 12.28 ||

'शुद्ध हृदय से सबको सांत्वना देते हुए, वह नरश्रेष्ठ राम अपने प्रिय कार्यों से ही प्रजाजनों का मन जीत लेते हैं।'

श्लोक 29 (ayodhya.12.29)

सत्येन लोकाञ्जयति द्विजान्दानेन राघवः । गुरूञ्छुश्रूषया वीरो धनुषा युधि शात्रवान् ।। १२.२९ ।।

satyena lokāñjayati dvijāndānena rāghavaḥ | gurūñchuśrūṣayā vīro dhanuṣā yudhi śātravān || 12.29 ||

'सत्य से लोगों को, दान से ब्राह्मणों को, सेवा से गुरुजनों को, और युद्ध में धनुष से शत्रुओं को राघव जीत लेते हैं।'

श्लोक 30 (ayodhya.12.30)

सत्यं दानं तपस्त्यागो मित्रता शौचमार्जवम् । विद्या च गुरुशुश्रूषा ध्रुवाण्येतानि राघवे ।। १२.३० ।।

satyaṃ dānaṃ tapastyāgo mitratā śaucamārjavam | vidyā ca guruśuśrūṣā dhruvāṇyetāni rāghave || 12.30 ||

'सत्य, दान, तप, त्याग, मित्रता, पवित्रता, सरलता, विद्या और गुरुसेवा—ये सब गुण राघव में सुदृढ़ प्रतिष्ठित हैं।'

श्लोक 31 (ayodhya.12.31)

तस्मिन्नार्जवसम्पन्ने देवि देवोपमे कथम् । पापमाशंससे रामे महर्षिसमतेजसि ।। १२.३१ ।।

tasminnārjavasampanne devi devopame katham | pāpamāśaṃsase rāme maharṣisamatejasi || 12.31 ||

'हे देवि! उस सरलतायुक्त, देवोपम, महर्षितुल्य तेजस्वी राम पर तुम पाप की आशंका कैसे कर रही हो?'

श्लोक 32 (ayodhya.12.32)

न स्मराम्यप्रियं वाक्यं लोकस्य प्रियवादिनः । स कथं त्वत्कृते रामं वक्ष्यामि प्रियमप्रियम् ।। १२.३२ ।।

na smarāmyapriyaṃ vākyaṃ lokasya priyavādinaḥ | sa kathaṃ tvatkṛte rāmaṃ vakṣyāmi priyamapriyam || 12.32 ||

'सबसे मधुर बोलने वाले उस राम का कोई अप्रिय वचन मुझे स्मरण ही नहीं आता; फिर तुम्हारे लिए मैं उन्हें कैसे अप्रिय बात कहूँ?'

श्लोक 33 (ayodhya.12.33)

क्षमा यस्मिंस्तपस्त्यागः सत्यं धर्मः कृतज्ञता । अप्यहिंसा च भूतानां तमृते का गतिर्मम ।। १२.३३ ।।

kṣamā yasmiṃstapastyāgaḥ satyaṃ dharmaḥ kṛtajñatā | apyahiṃsā ca bhūtānāṃ tamṛte kā gatirmama || 12.33 ||

'क्षमा, तप, त्याग, सत्य, धर्म, कृतज्ञता, और सभी प्राणियों के प्रति अहिंसा—जिनमें ये सब हैं, उन्हीं के बिना मेरी क्या गति होगी?'

श्लोक 34 (ayodhya.12.34)

मम वृद्धस्य कैकेयि गतान्तस्य तपस्विनः । दीनं लालप्यमानस्य कारुण्यं कर्तुमर्हसि ।। १२.३४ ।।

mama vṛddhasya kaikeyi gatāntasya tapasvinaḥ | dīnaṃ lālapyamānasya kāruṇyaṃ kartumarhasi || 12.34 ||

'हे कैकेयी! अपने अंत के निकट पहुँचे, तपस्वी जैसे इस वृद्ध पर, जो दीनतापूर्वक विलाप कर रहा है, तुम्हें दया करनी चाहिए।'

श्लोक 35 (ayodhya.12.35)

पृथिव्यां सागरान्तायां यत्किंचिदधिगम्यते । तत्सर्वं तव दास्यामि मा च त्वं मन्युमाविश ।। १२.३५ ।।

pṛthivyāṃ sāgarāntāyāṃ yatkiṃcidadhigamyate | tatsarvaṃ tava dāsyāmi mā ca tvaṃ manyumāviśa || 12.35 ||

'इस समुद्रांत पृथ्वी पर जो कुछ भी प्राप्य है, वह सब मैं तुम्हें दूँगा; बस क्रोध को अपने भीतर न आने दो।'

श्लोक 36 (ayodhya.12.36)

अञ्जलिं कुर्मि कैकेयि पादौ चापि स्पृशामि ते । शरणं भव रामस्य माधर्मो मामिह स्पृशेत् ।। १२.३६ ।।

añjaliṃ kurmi kaikeyi pādau cāpi spṛśāmi te | śaraṇaṃ bhava rāmasya mādharmo māmiha spṛśet || 12.36 ||

'हे कैकेयी! मैं तुम्हारे प्रति हाथ जोड़ता हूँ, यहाँ तक कि तुम्हारे चरण भी स्पर्श करता हूँ। राम की शरण बनो, कहीं यह अधर्म मुझे न छू जाए।'

श्लोक 37 (ayodhya.12.37)

इति दुःखाभिसंतप्तं विलपन्तमचेतनम् । घूर्णमानं महाराजं शोकेन समभिप्लुतम् ।। १२.३७ ।।

iti duḥkhābhisaṃtaptaṃ vilapantamacetanam | ghūrṇamānaṃ mahārājaṃ śokena samabhiplutam || 12.37 ||

इस प्रकार दुःख से संतप्त, विलाप करते, चेतनाहीन, शोक में डूबे, चक्कर खाते हुए उस महाराज को—

श्लोक 38 (ayodhya.12.38)

पारं शोकार्णवस्याशु प्रार्थयन्तं पुनः पुनः । प्रत्युवाचाथ कैकेयी रौद्रा रौद्रतरं वचः ।। १२.३८ ।।

pāraṃ śokārṇavasyāśu prārthayantaṃ punaḥ punaḥ | pratyuvācātha kaikeyī raudrā raudrataraṃ vacaḥ || 12.38 ||

—जो बार-बार शोक-सागर के उस पार जाने की प्रार्थना कर रहे थे, कैकेयी ने उससे भी अधिक क्रूर और भयंकर वचन कहे।

श्लोक 39 (ayodhya.12.39)

यदि दत्त्वा वरौ राजन्पुनः प्रत्यनुतप्यसे । धार्मिकत्वं कथं वीर पृथिव्यां कथयिष्यसि ।। १२.३९ ।।

yadi dattvā varau rājanpunaḥ pratyanutapyase | dhārmikatvaṃ kathaṃ vīra pṛthivyāṃ kathayiṣyasi || 12.39 ||

'हे राजन्! यदि वर देकर भी तुम अब पछता रहे हो, तो हे वीर! पृथ्वी पर अपनी धार्मिकता का दावा तुम कैसे करोगे?'

श्लोक 40 (ayodhya.12.40)

यदा समेता बहवस्त्वया राजर्षयः सह । कथयिष्यन्ति धर्मज्ञ तत्र किं प्रतिवक्ष्यसि ।। १२.४० ।।

yadā sametā bahavastvayā rājarṣayaḥ saha | kathayiṣyanti dharmajña tatra kiṃ prativakṣyasi || 12.40 ||

'जब अनेक राजर्षि एकत्र होकर तुमसे इस विषय में बात करेंगे, हे धर्मज्ञ! तब तुम उन्हें क्या उत्तर दोगे?'

श्लोक 41 (ayodhya.12.41)

यस्याः प्रसादे जीवामि या च मामभ्यपालयत् । तस्याः कृता मया मिथ्या कैकेय्या इति वक्ष्यसि ।। १२.४१ ।।

yasyāḥ prasāde jīvāmi yā ca māmabhyapālayat | tasyāḥ kṛtā mayā mithyā kaikeyyā iti vakṣyasi || 12.41 ||

'जिसकी कृपा से मैं जीवित हूँ और जिसने मेरी रक्षा की, उसी कैकेयी के प्रति मैंने असत्य आचरण किया—क्या यही तुम कहोगे?'

श्लोक 42 (ayodhya.12.42)

किल्बिषं त्वं नरेन्द्राणां करिष्यसि नराधिप । यो दत्त्वा वरमद्यैव पुनरन्यानि भाषसे ।। १२.४२ ।।

kilbiṣaṃ tvaṃ narendrāṇāṃ kariṣyasi narādhipa | yo dattvā varamadyaiva punaranyāni bhāṣase || 12.42 ||

'हे नराधिप! जो आज ही वर देकर फिर दूसरी बात करता है, वह राजाओं में कलंक ही उत्पन्न करेगा।'

श्लोक 43 (ayodhya.12.43)

शैब्यः श्येनकपोतीये स्वमांसं पक्षिणे ददौ । अलर्कश्चक्षुषी दत्त्वा जगाम गतिमुत्तमाम् ।। १२.४३ ।।

śaibyaḥ śyenakapotīye svamāṃsaṃ pakṣiṇe dadau | alarkaścakṣuṣī dattvā jagāma gatimuttamām || 12.43 ||

'राजा शैब्य ने बाज़ के लिए अपना मांस उसी पक्षी को दे दिया था; अलर्क ने अपने नेत्र देकर परम गति पाई।'

श्लोक 44 (ayodhya.12.44)

सागरः समयं कृत्वा न वेलामतिवर्तते । समयं मानृतं कार्षीः पूर्ववृत्तमनुस्मरन् ।। १२.४४ ।।

sāgaraḥ samayaṃ kṛtvā na velāmativartate | samayaṃ mānṛtaṃ kārṣīḥ pūrvavṛttamanusmaran || 12.44 ||

'समुद्र भी अपनी प्रतिज्ञा करके कभी अपनी सीमा नहीं लाँघता; इसलिए पूर्व की घटनाओं का स्मरण करते हुए अपनी प्रतिज्ञा को असत्य मत बनाओ।'

श्लोक 45 (ayodhya.12.45)

स त्वं धर्मं परित्यज्य रामं राज्येऽभिषिच्य च । सह कौसल्यया नित्यं रन्तुमिच्छसि दुर्मते ।। १२.४५ ।।

sa tvaṃ dharmaṃ parityajya rāmaṃ rājye'bhiṣicya ca | saha kausalyayā nityaṃ rantumicchasi durmate || 12.45 ||

'हे दुर्बुद्धे! तुम धर्म को त्यागकर, राम को राज्य दिलाकर, कौसल्या के साथ सदा सुख भोगना चाहते हो!'

श्लोक 46 (ayodhya.12.46)

भवत्वधर्मो धर्मो वा सत्यं वा यदि वानृतम् । यत्त्वया संश्रुतं मह्यं तस्य नास्ति व्यतिक्रमः ।। १२.४६ ।।

bhavatvadharmo dharmo vā satyaṃ vā yadi vānṛtam | yattvayā saṃśrutaṃ mahyaṃ tasya nāsti vyatikramaḥ || 12.46 ||

'चाहे यह अधर्म हो या धर्म, सत्य हो या असत्य, जो वचन तुमने मुझे दिया है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं होगा।'

श्लोक 47 (ayodhya.12.47)

अहं हि विषमद्यैव पीत्वा बहु तवाग्रतः । पश्यतस्ते मरिष्यामि रामो यद्यभिषिच्यते ।। १२.४७ ।।

ahaṃ hi viṣamadyaiva pītvā bahu tavāgrataḥ | paśyataste mariṣyāmi rāmo yadyabhiṣicyate || 12.47 ||

'यदि राम का अभिषेक हुआ, तो मैं अभी बहुत सा विष पीकर तुम्हारे सामने ही, तुम्हारे देखते-देखते मर जाऊँगी।'

श्लोक 48 (ayodhya.12.48)

एकाहमपि पश्येयं यद्यहं राममातरम् । अञ्जलिं प्रतिगृह्णन्तीं श्रेयो ननु मृतिर्मम ।। १२.४८ ।।

ekāhamapi paśyeyaṃ yadyahaṃ rāmamātaram | añjaliṃ pratigṛhṇantīṃ śreyo nanu mṛtirmama || 12.48 ||

'यदि मुझे एक दिन भी राम की माता कौसल्या को अंजलि स्वीकार करते देखना पड़े, तो मेरे लिए मृत्यु ही श्रेयस्कर होगी।'

श्लोक 49 (ayodhya.12.49)

भरतेनात्मना चाहं शपे ते मनुजाधिप । यथा नान्येन तुष्येयमृते रामविवासनात् ।। १२.४९ ।।

bharatenātmanā cāhaṃ śape te manujādhipa | yathā nānyena tuṣyeyamṛte rāmavivāsanāt || 12.49 ||

'हे नराधिप! मैं भरत की और अपनी सौगंध खाकर कहती हूँ—राम के वनवास के बिना मुझे और किसी बात से संतोष नहीं होगा।'

श्लोक 50 (ayodhya.12.50)

एतावदुक्त्वा वचनं कैकेयी विरराम ह । विलपन्तं च राजानं न प्रतिव्याजहार सा ।। १२.५० ।।

etāvaduktvā vacanaṃ kaikeyī virarāma ha | vilapantaṃ ca rājānaṃ na prativyājahāra sā || 12.50 ||

इतना कहकर कैकेयी चुप हो गई; और विलाप करते हुए राजा को उसने फिर कोई उत्तर नहीं दिया।

श्लोक 51 (ayodhya.12.51)

श्रुत्वा तु राजा कैकेय्या वाक्यं परमशोभनम् । रामस्य च वने वासमैश्वर्यं भरतस्य च ।। १२.५१ ।।

śrutvā tu rājā kaikeyyā vākyaṃ paramaśobhanam | rāmasya ca vane vāsamaiśvaryaṃ bharatasya ca || 12.51 ||

कैकेयी द्वारा माँगे गए इस अत्यंत अशुभ वर—राम का वनवास और भरत का राज्याभिषेक—को सुनकर,

श्लोक 52 (ayodhya.12.52)

नाभ्यभाषत कैकेयीं मुहूर्तं व्याकुलेन्द्रियः । प्रैक्षतानिमिषो देवीं प्रियामप्रियवादिनीम् ।। १२.५२ ।।

nābhyabhāṣata kaikeyīṃ muhūrtaṃ vyākulendriyaḥ | praikṣatānimiṣo devīṃ priyāmapriyavādinīm || 12.52 ||

—व्याकुल इंद्रियों वाले राजा एक क्षण के लिए कैकेयी से कुछ न बोल सके; वे केवल अपनी प्रिय किंतु कठोर बोलने वाली उस देवी को अपलक निहारते रहे।

श्लोक 53 (ayodhya.12.53)

तां हि वज्रसमां वाचमाकर्ण्य हृदयाप्रियाम् । दुःखशोकमयीं श्रुत्वा राजा न सुखितोऽभवत् ।। १२.५३ ।।

tāṃ hi vajrasamāṃ vācamākarṇya hṛdayāpriyām | duḥkhaśokamayīṃ śrutvā rājā na sukhito'bhavat || 12.53 ||

उस वज्र के समान कठोर, हृदय को अप्रिय लगने वाली, दुःख और शोक से भरी वाणी को सुनकर, राजा किंचित भी सुखी नहीं हो सके।

श्लोक 54 (ayodhya.12.54)

स देव्या व्यवसायं च घोरं च शपथं कृतम् । ध्यात्वा रामेति निःश्वस्य च्छिन्नस्तरुरिवापतत् ।। १२.५४ ।।

sa devyā vyavasāyaṃ ca ghoraṃ ca śapathaṃ kṛtam | dhyātvā rāmeti niḥśvasya cchinnastarurivāpatat || 12.54 ||

देवी के उस भयंकर निश्चय और घोर शपथ का स्मरण करते हुए, 'राम' का नाम लेकर लंबी साँस भरकर, वे कटे हुए वृक्ष के समान गिर पड़े।

श्लोक 55 (ayodhya.12.55)

नष्टचित्तो यथोन्मत्तो विपरीतो यथातुरः । हृततेजा यथा सर्पो बभूव जगतीपतिः ।। १२.५५ ।।

naṣṭacitto yathonmatto viparīto yathāturaḥ | hṛtatejā yathā sarpo babhūva jagatīpatiḥ || 12.55 ||

वे राजा उस उन्मत्त पुरुष के समान चेतनाशून्य, रोगी के समान विपरीत, और विषहीन हुए सर्प के समान तेजहीन हो गए।

श्लोक 56 (ayodhya.12.56)

दीनयाऽऽतुरया वाचा इति होवाच कैकयीम् । अनर्थमिममर्थाभं केन त्वमुपदेशिता ।। १२.५६ ।।

dīnayā''turayā vācā iti hovāca kaikayīm | anarthamimamarthābhaṃ kena tvamupadeśitā || 12.56 ||

दीन और व्याकुल वाणी में उन्होंने कैकेयी से कहा—'यह अनर्थ, जो लाभ जैसा प्रतीत होता है, तुम्हें किसने सिखाया है?'

श्लोक 57 (ayodhya.12.57)

भूतोपहतचित्तेव ब्रुवन्ती मां न लज्जसे । शीलव्यसनमेतत्ते नाभिजानाम्यहं पुरा ।। १२.५७ ।।

bhūtopahatacitteva bruvantī māṃ na lajjase | śīlavyasanametatte nābhijānāmyahaṃ purā || 12.57 ||

'किसी भूत-प्रेत से ग्रस्त स्त्री की भाँति बोलते हुए भी तुम्हें लज्जा नहीं आती। तुम्हारा यह स्वभाव-दोष मैं पहले कभी नहीं जान सका था।'

श्लोक 58 (ayodhya.12.58)

बालायास्तत्त्विदानीं ते लक्षये विपरीतवत् । कुतो वा ते भयं जातं या त्वमेवंविधं वरम् ।। १२.५८ ।।

bālāyāstattvidānīṃ te lakṣaye viparītavat | kuto vā te bhayaṃ jātaṃ yā tvamevaṃvidhaṃ varam || 12.58 ||

'तुम्हारी वह बाल-सुलभ मति अब मुझे इस प्रकार पूर्णतया विपरीत हो चुकी दिखाई देती है। आखिर तुम्हें ऐसा वर माँगने का यह भय कहाँ से जन्मा?'

श्लोक 59 (ayodhya.12.59)

राष्ट्रे भरतमासीनं वृणीषे राघवं वने । विरमैतेन भावेन त्वमेतेनानृतेन च ।। १२.५९ ।।

rāṣṭre bharatamāsīnaṃ vṛṇīṣe rāghavaṃ vane | viramaitena bhāvena tvametenānṛtena ca || 12.59 ||

'कि तुम भरत को राज्य में स्थापित और राघव को वन में चाहती हो—इस भाव और इस असत्य दोनों से अब निवृत्त हो जाओ।'

श्लोक 60 (ayodhya.12.60)

यदि भर्तुः प्रियं कार्यं लोकस्य भरतस्य च । नृशंसे पापसंकल्पे क्षुद्रे दुष्कृतकारिणि ।। १२.६० ।।

yadi bhartuḥ priyaṃ kāryaṃ lokasya bharatasya ca | nṛśaṃse pāpasaṃkalpe kṣudre duṣkṛtakāriṇi || 12.60 ||

'यदि तुम अपने पति का, समस्त प्रजा का, और स्वयं भरत का भी हित चाहती हो, तो हे क्रूर, पापसंकल्पिनी, नीच, दुष्कर्मिणी!—'

श्लोक 61 (ayodhya.12.61)

किं नु दुःखमलीकं वा मयि रामे च पश्यसि । न कथंचिदृते रामाद्भरतो राज्यमावसेत् ।। १२.६१ ।।

kiṃ nu duḥkhamalīkaṃ vā mayi rāme ca paśyasi | na kathaṃcidṛte rāmādbharato rājyamāvaset || 12.61 ||

'—मुझमें या राम में तुम्हें कौन सा दुःख या दोष दिखाई देता है? भरत राम के बिना किसी भी दशा में इस राज्य में नहीं बस सकते।'

श्लोक 62 (ayodhya.12.62)

रामादपि हि तं मन्ये धर्मतो बलवत्तरम् । कथं द्रक्ष्यामि रामस्य वनं गच्छेति भाषिते ।। १२.६२ ।।

rāmādapi hi taṃ manye dharmato balavattaram | kathaṃ drakṣyāmi rāmasya vanaṃ gaccheti bhāṣite || 12.62 ||

'मैं तो उन्हें धर्म में राम से भी अधिक दृढ़ मानता हूँ। यह सुनकर कि 'राम वन जाओ' कहा गया है, मैं उनका पीला पड़ा मुख कैसे देख सकूँगा?'

श्लोक 63 (ayodhya.12.63)

मुखवर्णं विवर्णं तु यथैवेन्दुमुपप्लुतम् । तां तु मे सुकृतां बुद्धिं सुहृद्भिः सह निश्चिताम् ।। १२.६३ ।।

mukhavarṇaṃ vivarṇaṃ tu yathaivendumupaplutam | tāṃ tu me sukṛtāṃ buddhiṃ suhṛdbhiḥ saha niścitām || 12.63 ||

'—जैसे ग्रहणग्रस्त चंद्रमा हो। मित्रों के साथ मिलकर सुनिश्चित की गई मेरी वह सुविचारित नीति—'

श्लोक 64 (ayodhya.12.64)

कथं द्रक्ष्याम्यपावृत्तां परैरिव हतां चमूम् । किं मां वक्ष्यन्ति राजानो नानादिग्भ्यः समागताः ।। १२.६४ ।।

kathaṃ drakṣyāmyapāvṛttāṃ parairiva hatāṃ camūm | kiṃ māṃ vakṣyanti rājāno nānādigbhyaḥ samāgatāḥ || 12.64 ||

'—को शत्रुओं द्वारा नष्ट की गई सेना के समान बिखरा हुआ मैं कैसे देखूँगा? नाना दिशाओं से आए राजा मेरे विषय में क्या कहेंगे?'

श्लोक 65 (ayodhya.12.65)

बालो बतायमैक्ष्वाकश्चिरं राज्यमकारयत् । यदा हि बहवो वृद्धा गुणवन्तो बहुश्रुताः ।। १२.६५ ।।

bālo batāyamaikṣvākaściraṃ rājyamakārayat | yadā hi bahavo vṛddhā guṇavanto bahuśrutāḥ || 12.65 ||

'वे कहेंगे—अफसोस, यह इक्ष्वाकुवंशी राजा कैसा बालक निकला, जो इतने लंबे समय तक राज्य करता रहा! जब बहुत से वृद्ध, गुणवान, बहुश्रुत जन—'

श्लोक 66 (ayodhya.12.66)

परिप्रक्ष्यन्ति काकुत्स्थं वक्ष्यामीह कथं तदा । कैकेय्या क्लिश्यमानेन पुत्रः प्रव्राजितो मया ।। १२.६६ ।।

pariprakṣyanti kākutsthaṃ vakṣyāmīha kathaṃ tadā | kaikeyyā kliśyamānena putraḥ pravrājito mayā || 12.66 ||

'—काकुत्स्थ राम के विषय में मुझसे पूछेंगे, तब मैं क्या कहूँगा? कि कैकेयी द्वारा सताए जाने के कारण मैंने अपने पुत्र को वनवास दिया?'

श्लोक 67 (ayodhya.12.67)

यदि सत्यं ब्रवीम्येतत्तदसत्यं भविष्यति । किं मां वक्ष्यति कौसल्या राघवे वनमास्थिते ।। १२.६७ ।।

yadi satyaṃ bravīmyetattadasatyaṃ bhaviṣyati | kiṃ māṃ vakṣyati kausalyā rāghave vanamāsthite || 12.67 ||

'यदि मैं यह सच कह भी दूँ, तो वह भी असत्य ही प्रतीत होगा। और राघव के वन चले जाने पर कौसल्या मुझसे क्या कहेगी?'

श्लोक 68 (ayodhya.12.68)

किं चैनां प्रतिवक्ष्यामि कृत्वा विप्रियमीदृशम् । यदा यदा च कौसल्या दासीव च सखीव च ।। १२.६८ ।।

kiṃ caināṃ prativakṣyāmi kṛtvā vipriyamīdṛśam | yadā yadā ca kausalyā dāsīva ca sakhīva ca || 12.68 ||

'ऐसा अप्रिय कार्य करके मैं उसे क्या उत्तर दूँगा? जो कौसल्या सदा दासी की भाँति, सखी की भाँति—'

श्लोक 69 (ayodhya.12.69)

भार्यावद्भगिनीवच्च मातृवच्चोपतिष्ठति । सततं प्रियकामा मे प्रियपुत्रा प्रियंवदा ।। १२.६९ ।।

bhāryāvadbhaginīvacca mātṛvaccopatiṣṭhati | satataṃ priyakāmā me priyaputrā priyaṃvadā || 12.69 ||

'—पत्नी की भाँति, बहन की भाँति, और माता की भाँति मेरी सेवा करती रही है; जो सदा मेरा प्रिय चाहने वाली, प्रिय-पुत्रा और मृदुभाषिणी है—'

श्लोक 70 (ayodhya.12.70)

न मया सत्कृता देवी सत्कारार्हा कृते तव । इदानीं तत्तपति मां यन्मया सुकृतं त्वयि ।। १२.७० ।।

na mayā satkṛtā devī satkārārhā kṛte tava | idānīṃ tattapati māṃ yanmayā sukṛtaṃ tvayi || 12.70 ||

'—उस देवी का जो सम्मान होना चाहिए था, वह मैंने तुम्हारे कारण कभी नहीं किया। अब वही बात मुझे संतप्त कर रही है, जो कभी मैंने तुम्हारे लिए भला किया था।'

श्लोक 71 (ayodhya.12.71)

अपथ्यव्यञ्जनोपेतं भुक्तमन्नमिवातुरम् । विप्रकारं च रामस्य सम्प्रयाणं वनस्य च ।। १२.७१ ।।

apathyavyañjanopetaṃ bhuktamannamivāturam | viprakāraṃ ca rāmasya samprayāṇaṃ vanasya ca || 12.71 ||

जैसे कोई रोगी हानिकारक व्यंजनों से युक्त भोजन खाकर पीड़ित होता है, वैसे ही राम का यह अनुचित व्यवहार और वन-गमन मुझे व्यथित कर रहा है।

श्लोक 72 (ayodhya.12.72)

सुमित्रा प्रेक्ष्य वै भीता कथं मे विश्वसिष्यति । कृपणं बत वैदेही श्रोष्यति द्वयमप्रियम् ।। १२.७२ ।।

sumitrā prekṣya vai bhītā kathaṃ me viśvasiṣyati | kṛpaṇaṃ bata vaidehī śroṣyati dvayamapriyam || 12.72 ||

यह देखकर भयभीत सुमित्रा मुझ पर कैसे विश्वास कर पाएगी? और बेचारी वैदेही तो दो अप्रिय समाचार एक साथ सुनेगी—

श्लोक 73 (ayodhya.12.73)

मां च पञ्चत्वमापन्नं रामं च वनमाश्रितम् । वैदेही बत मे प्राणान्शोचन्ती क्षपयिष्यति ।। १२.७३ ।।

māṃ ca pañcatvamāpannaṃ rāmaṃ ca vanamāśritam | vaidehī bata me prāṇānśocantī kṣapayiṣyati || 12.73 ||

—मेरा प्राणांत होना, और राम का वन का आश्रय लेना। शोकसंतप्त वैदेही मेरे ही प्राणों को क्षीण करती चली जाएगी।

श्लोक 74 (ayodhya.12.74)

हीना हिमवतः पार्श्वे किंनरेणेव किंनरी । नहि राममहं दृष्ट्वा प्रवसन्तं महावने ।। १२.७४ ।।

hīnā himavataḥ pārśve kiṃnareṇeva kiṃnarī | nahi rāmamahaṃ dṛṣṭvā pravasantaṃ mahāvane || 12.74 ||

हिमालय के पार्श्व में अपने साथी से बिछड़ी किन्नरी के समान, महावन में भटकते राम को देखे बिना—

श्लोक 75 (ayodhya.12.75)

चिरं जीवितुमाशंसे रुदन्तीं चापि मैथिलीम् । सा नूनं विधवा राज्यं सपुत्रा कारयिष्यसि ।। १२.७५ ।।

ciraṃ jīvitumāśaṃse rudantīṃ cāpi maithilīm | sā nūnaṃ vidhavā rājyaṃ saputrā kārayiṣyasi || 12.75 ||

—मैं अधिक दिन जीने की इच्छा नहीं करता, न ही रोती हुई मैथिली को देखने की। तुम तो निश्चय ही उसे और अपने पुत्र सहित इस राज्य को विधवा-सा बना दोगी।

श्लोक 76 (ayodhya.12.76)

सतीं त्वामहमत्यन्तं व्यवस्याम्यसतीं सतीम् । रूपिणीं विषसंयुक्तां पीत्वेव मदिरां नरः ।। १२.७६ ।।

satīṃ tvāmahamatyantaṃ vyavasyāmyasatīṃ satīm | rūpiṇīṃ viṣasaṃyuktāṃ pītveva madirāṃ naraḥ || 12.76 ||

'यदि राम का निर्वासन ही होना है, तो हे देवी! मुझे जीने की इच्छा नहीं रहेगी। तुम, जिसे मैं सदा सती मानता आया, अब मैं तुम्हें पूर्णतः असती ही मानता हूँ—'

श्लोक 77 (ayodhya.12.77)

अनृतैर्बत मां सान्त्वैः सान्त्वयन्ती स्म भाषसे । गीतशब्देन संरुध्य लुब्धो मृगमिवावधीः ।। १२.७७ ।।

anṛtairbata māṃ sāntvaiḥ sāntvayantī sma bhāṣase | gītaśabdena saṃrudhya lubdho mṛgamivāvadhīḥ || 12.77 ||

'—मानो कोई पुरुष सुंदर दिखने वाली किंतु विष मिली मदिरा को पीकर धोखा खाए। मीठे किंतु झूठे सांत्वना भरे शब्दों से तुमने मुझे बहलाया है—'

श्लोक 78 (ayodhya.12.78)

अनार्य इति मामार्याः पुत्रविक्रायकं ध्रुवम् । विकरिष्यन्ति रथ्यासु सुरापं ब्राह्मणं यथा ।। १२.७८ ।।

anārya iti māmāryāḥ putravikrāyakaṃ dhruvam | vikariṣyanti rathyāsu surāpaṃ brāhmaṇaṃ yathā || 12.78 ||

'—मानो गीत के स्वर से मोहित करके शिकारी किसी मृग का वध कर दे। अब निश्चय ही श्रेष्ठजन मुझे अनार्य, अपने पुत्र को बेचने वाला—'

श्लोक 79 (ayodhya.12.79)

अहो दुःखमहो कृच्छ्रं यत्र वाचः क्षमे तव । दुःखमेवंविधं प्राप्तं पुरा कृतमिवाशुभम् ।। १२.७९ ।।

aho duḥkhamaho kṛcchraṃ yatra vācaḥ kṣame tava | duḥkhamevaṃvidhaṃ prāptaṃ purā kṛtamivāśubham || 12.79 ||

'—कहकर, सड़कों पर उसी तरह निंदा करेंगे जैसे मदिरापान करने वाले ब्राह्मण की करते हैं। हाय, यह कैसा दुःख, कैसी विपत्ति है, कि तुम्हारे वचन मुझे सहने ही होंगे!'

श्लोक 80 (ayodhya.12.80)

चिरं खलु मया पापे त्वं पापेनाभिरक्षिता । अज्ञानादुपसम्पन्ना रज्जुरुद्बन्धनी यथा ।। १२.८० ।।

ciraṃ khalu mayā pāpe tvaṃ pāpenābhirakṣitā | ajñānādupasampannā rajjurudbandhanī yathā || 12.80 ||

'ऐसा दुःख मुझे प्राप्त हुआ है, मानो पूर्वजन्म में किए गए किसी अशुभ कर्म का फल हो। हे पापिनी! बहुत लंबे समय तक तुम्हारी रक्षा मैंने, स्वयं पापी होकर की है—'

श्लोक 81 (ayodhya.12.81)

रममाणस्त्वया सार्धं मृत्युं त्वां नाभिलक्षये । बालो रहसि हस्तेन कृष्णसर्पमिवास्पृशम् ।। १२.८१ ।।

ramamāṇastvayā sārdhaṃ mṛtyuṃ tvāṃ nābhilakṣaye | bālo rahasi hastena kṛṣṇasarpamivāspṛśam || 12.81 ||

'—मानो अनजाने में ही गले में डालने वाली फाँसी की रस्सी को अपनाया हो। तुम्हारे साथ रमण करते हुए मैंने तुम्हें मृत्यु के रूप में कभी नहीं पहचाना—'

श्लोक 82 (ayodhya.12.82)

तं तु मां जीवलोकोऽयं नूनमाक्रोष्टुमर्हति । मया ह्यपितृकः पुत्रः स महात्मा दुरात्मना ।। १२.८२ ।।

taṃ tu māṃ jīvaloko'yaṃ nūnamākroṣṭumarhati | mayā hyapitṛkaḥ putraḥ sa mahātmā durātmanā || 12.82 ||

'—मानो कोई बालक एकांत में हाथ से काले सर्प को छू ले। संभवतः यह समस्त संसार मुझे धिक्कारने का ही अधिकार रखता है—'

श्लोक 83 (ayodhya.12.83)

बालिशो बत कामात्मा राजा दशरथो भृशम् । स्त्रीकृते यः प्रियं पुत्रं वनं प्रस्थापयिष्यति ।। १२.८३ ।।

bāliśo bata kāmātmā rājā daśaratho bhṛśam | strīkṛte yaḥ priyaṃ putraṃ vanaṃ prasthāpayiṣyati || 12.83 ||

'—यह कहकर कि उस दुरात्मा ने अपने ही महात्मा पुत्र को पिता के संरक्षण से वंचित कर दिया। धिक्कार है इस अत्यंत मूर्ख, कामासक्त राजा दशरथ को—'

श्लोक 84 (ayodhya.12.84)

वेदैश्च ब्रह्मचर्यैश्च गुरुभिश्चोपकर्शितः । भोगकाले महत्कृच्छ्रं पुनरेव प्रपत्स्यते ।। १२.८४ ।।

vedaiśca brahmacaryaiśca gurubhiścopakarśitaḥ | bhogakāle mahatkṛcchraṃ punareva prapatsyate || 12.84 ||

'—जो एक स्त्री के कारण अपने प्रिय पुत्र को वन भेज रहा है। जो व्रतों से, ब्रह्मचर्य से, और गुरुजनों की सेवा से क्षीण हो चुका है—'

श्लोक 85 (ayodhya.12.85)

नालं द्वितीयं वचनं पुत्रो मां प्रतिभाषितुम् । स वनं प्रव्रजेत्युक्तो बाढमित्येव वक्ष्यति ।। १२.८५ ।।

nālaṃ dvitīyaṃ vacanaṃ putro māṃ pratibhāṣitum | sa vanaṃ pravrajetyukto bāḍhamityeva vakṣyati || 12.85 ||

'—उसे अब, भोग के अवसर पर ही, फिर से एक बड़ा कष्ट सहना पड़ेगा। मेरा पुत्र मुझे दूसरा शब्द कहने में असमर्थ है—'

श्लोक 86 (ayodhya.12.86)

यदि मे राघवः कुर्याद्वनं गच्छेति चोदितः । प्रतिकूलं प्रियं मे स्यान्न तु वत्सः करिष्यति ।। १२.८६ ।।

yadi me rāghavaḥ kuryādvanaṃ gaccheti coditaḥ | pratikūlaṃ priyaṃ me syānna tu vatsaḥ kariṣyati || 12.86 ||

'—'वन जाओ' कहे जाने पर वह केवल 'बहुत अच्छा' कहकर मान लेगा। यदि राघव मेरी आज्ञा के विपरीत आचरण करे और वन न जाए—'

श्लोक 87 (ayodhya.12.87)

राघवे हि वनं प्राप्ते सर्वलोकस्य धिक्कृतम् । मृत्युरक्षमणीयं मां नयिष्यति यमक्षयम् ।। १२.८७ ।।

rāghave hi vanaṃ prāpte sarvalokasya dhikkṛtam | mṛtyurakṣamaṇīyaṃ māṃ nayiṣyati yamakṣayam || 12.87 ||

'—तो वह मुझे प्रतिकूल होते हुए भी अत्यंत प्रिय लगेगा; किंतु मेरा वत्स कभी ऐसा नहीं करेगा। जब राघव सचमुच वन को प्राप्त हो जाएँगे, तब सारा संसार इसे धिक्कारेगा—'

श्लोक 88 (ayodhya.12.88)

मृते मयि गते रामे वनं मनुजपुङ्गवे । इष्टे मम जने शेषे किं पापं प्रतिपत्स्यसे ।। १२.८८ ।।

mṛte mayi gate rāme vanaṃ manujapuṅgave | iṣṭe mama jane śeṣe kiṃ pāpaṃ pratipatsyase || 12.88 ||

'—और असहनीय मृत्यु मुझे यमलोक की ओर ले जाएगी। मेरे मरने और राम के वन चले जाने पर, हे नरश्रेष्ठ के प्रति ऐसा करने वाली!—'

श्लोक 89 (ayodhya.12.89)

कौसल्या मां च रामं च पुत्रौ च यदि हास्यति । दुःखान्यसहती देवी मामेवानुगमिष्यति ।। १२.८९ ।।

kausalyā māṃ ca rāmaṃ ca putrau ca yadi hāsyati | duḥkhānyasahatī devī māmevānugamiṣyati || 12.89 ||

'—मेरे शेष प्रियजनों के प्रति भी तुम कौन-सा पाप करने को शेष रखोगी? यदि कौसल्या, मुझे और राम को तथा अपने दोनों पुत्रों को भी छोड़कर—'

श्लोक 90 (ayodhya.12.90)

कौसल्यां च सुमित्रां च मां च पुत्रैस्त्रिभिः सह । प्रक्षिप्य नरके सा त्वं कैकेयि सुखिता भव ।। १२.९० ।।

kausalyāṃ ca sumitrāṃ ca māṃ ca putraistribhiḥ saha | prakṣipya narake sā tvaṃ kaikeyi sukhitā bhava || 12.90 ||

'—इन दुःखों को सहन न कर पाकर मेरे ही पीछे चली आए, तो हे कैकेयी! कौसल्या, सुमित्रा और मुझे तीनों पुत्रों सहित—'

श्लोक 91 (ayodhya.12.91)

मया रामेण च त्यक्तं शाश्वतं सत्कृतं गुणैः । इक्ष्वाकुकुलमक्षोभ्यमाकुलं पालयिष्यसि ।। १२.९१ ।।

mayā rāmeṇa ca tyaktaṃ śāśvataṃ satkṛtaṃ guṇaiḥ | ikṣvākukulamakṣobhyamākulaṃ pālayiṣyasi || 12.91 ||

'—नरक में डालकर तुम सुखी रहना! मैंने और राम ने जिस सनातन, गुणों से सुशोभित, अविचलित इक्ष्वाकु वंश को त्याग दिया होगा—'

श्लोक 92 (ayodhya.12.92)

प्रियं चेद्भरतस्यैतद्रामप्रव्राजनं भवेत् । मा स्म मे भरतः कार्षीत्प्रेतकृत्यं गतायुषः ।। १२.९२ ।।

priyaṃ cedbharatasyaitadrāmapravrājanaṃ bhavet | mā sma me bharataḥ kārṣītpretakṛtyaṃ gatāyuṣaḥ || 12.92 ||

'—उसे तुम इस उथल-पुथल में कैसे पालोगी? यदि राम का यह वनवास सचमुच भरत को प्रिय हो, तो जीवन बीत जाने पर भरत मेरा प्रेतकर्म न करे—'

श्लोक 93 (ayodhya.12.93)

मृते मयि गते रामे वनं पुरुषपुङ्गवे । सेदानीं विधवा राज्यं सपुत्रा कारयिष्यसि ।। १२.९३ ।।

mṛte mayi gate rāme vanaṃ puruṣapuṅgave | sedānīṃ vidhavā rājyaṃ saputrā kārayiṣyasi || 12.93 ||

'—मेरे मरने पर और राम के वन चले जाने पर, हे पुरुषश्रेष्ठ के प्रति ऐसा करने वाली, अब तुम निश्चय ही अपने पुत्र सहित इस विधवा राज्य को चलाओगी।'

श्लोक 94 (ayodhya.12.94)

त्वं राजपुत्रि दैवेन न्यवसो मम वेश्मनि । अकीर्तिश्चातुला लोके ध्रुवः परिभवश्च मे । सर्वभूतेषु चावज्ञा यथा पापकृतस्तथा ।। १२.९४ ।।

tvaṃ rājaputri daivena nyavaso mama veśmani | akīrtiścātulā loke dhruvaḥ paribhavaśca me | sarvabhūteṣu cāvajñā yathā pāpakṛtastathā || 12.94 ||

'हे राजपुत्री! तुम भाग्यवश ही मेरे घर में आ बसीं। संसार में अतुल अपयश और निश्चित अपमान अब मुझे ही मिलेगा, और समस्त प्राणियों के बीच वैसी ही अवमानना, मानो मैंने ही कोई पाप किया हो।'

श्लोक 95 (ayodhya.12.95)

कथं रथैर्विभुर्यात्वा गजाश्वैश्च मुहुर्मुहुः । पद्भ्यां रामो महारण्ये वत्सो मे विचरिष्यति ।। १२.९५ ।।

kathaṃ rathairvibhuryātvā gajāśvaiśca muhurmuhuḥ | padbhyāṃ rāmo mahāraṇye vatso me vicariṣyati || 12.95 ||

'रथों, हाथियों और घोड़ों से बार-बार यात्रा करने वाला वह प्रभु राम, मेरा वह वत्स, अब उस विशाल वन में पैरों से कैसे चलेगा?'

श्लोक 96 (ayodhya.12.96)

यस्य चाहारसमये सूदाः कुण्डलधारिणः । अहंपूर्वाः पचन्ति स्म प्रसन्नाः पानभोजनम् ।। १२.९६ ।।

yasya cāhārasamaye sūdāḥ kuṇḍaladhāriṇaḥ | ahaṃpūrvāḥ pacanti sma prasannāḥ pānabhojanam || 12.96 ||

'जिसके भोजन के समय कुंडलधारी रसोइये एक-दूसरे से पहले उसे सुस्वादु अन्न-पान परोसने की होड़ किया करते थे—'

श्लोक 97 (ayodhya.12.97)

स कथं नु कषायाणि तिक्तानि कटुकानि च । भक्षयन्वन्यमाहारं सुतो मे वर्तयिष्यति ।। १२.९७ ।।

sa kathaṃ nu kaṣāyāṇi tiktāni kaṭukāni ca | bhakṣayanvanyamāhāraṃ suto me vartayiṣyati || 12.97 ||

'—वह अब कैसे कसैला, कड़वा और तीखा वनवासी भोजन खाकर जीवन बिताएगा?'

श्लोक 98 (ayodhya.12.98)

महार्हवस्त्रसम्बद्धो भूत्वा चिरसुखोचितः । काषायपरिधानस्तु कथं रामो भविष्यति ।। १२.९८ ।।

mahārhavastrasambaddho bhūtvā cirasukhocitaḥ | kāṣāyaparidhānastu kathaṃ rāmo bhaviṣyati || 12.98 ||

'बहुमूल्य वस्त्र पहनने का अभ्यस्त, दीर्घकाल से सुख भोगने वाला मेरा पुत्र, भला भूमि पर गेरुए वस्त्र पहनकर कैसे रहेगा?'

श्लोक 99 (ayodhya.12.99)

कस्येदं दारुणं वाक्यमेवंविधमपीरितम् । रामस्यारण्यगमनं भरतस्याभिषेचनम् ।। १२.९९ ।।

kasyedaṃ dāruṇaṃ vākyamevaṃvidhamapīritam | rāmasyāraṇyagamanaṃ bharatasyābhiṣecanam || 12.99 ||

'यह कैसा भयंकर और अविचारित वचन है, और वह किसका है, जिसमें एक साथ राम का वनगमन और भरत का राज्याभिषेक बताया गया हो?'

श्लोक 100 (ayodhya.12.100)

धिगस्तु योषितो नाम शठाः स्वार्थपरायणाः । न ब्रवीमि स्त्रियः सर्वा भरतस्यैव मातरम् ।। १२.१०० ।।

dhigastu yoṣito nāma śaṭhāḥ svārthaparāyaṇāḥ | na bravīmi striyaḥ sarvā bharatasyaiva mātaram || 12.100 ||

'धिक्कार है इन स्त्रियों को, जो सदा स्वार्थपरायण और कपटी होती हैं! मैं यह सब स्त्रियों के लिए नहीं, केवल भरत की माता के लिए कह रहा हूँ।'

श्लोक 101 (ayodhya.12.101)

अनर्थभावेऽर्थपरे नृशंसे ममानुतापाय निवेशितासि । किमप्रियं पश्यसि मन्निमित्तं हितानुकारिण्यथवापि रामे ।। १२.१०१ ।।

anarthabhāve'rthapare nṛśaṃse mamānutāpāya niveśitāsi | kimapriyaṃ paśyasi mannimittaṃ hitānukāriṇyathavāpi rāme || 12.101 ||

'हे क्रूरे! स्वार्थपरायणा! जो मेरे संताप के लिए ही मानो नियुक्त की गई हो! मुझमें या फिर सदा हितकारी उस राम में तुम्हें ऐसा कौन-सा अप्रिय दिखाई देता है?'

श्लोक 102 (ayodhya.12.102)

परित्यजेयुः पितरोऽपि पुत्रान्भार्याः पतींश्चापि कृतानुरागाः । कृत्स्नं हि सर्वं कुपितं जगत्स्याद्दृष्ट्वैव रामं व्यसने निमग्नम् ।। १२.१०२ ।।

parityajeyuḥ pitaro'pi putrānbhāryāḥ patīṃścāpi kṛtānurāgāḥ | kṛtsnaṃ hi sarvaṃ kupitaṃ jagatsyāddṛṣṭvaiva rāmaṃ vyasane nimagnam || 12.102 ||

'पिता भी अपने पुत्रों को, अनुरागी पत्नियाँ भी अपने पतियों को त्याग सकती हैं; और यदि राम को इस विपत्ति में देखा जाए, तो सारा जगत ही क्रुद्ध हो उठेगा।'

श्लोक 103 (ayodhya.12.103)

अहं पुनर्देवकुमाररूपमलंकृतं तं सुतमाव्रजन्तम् । नन्दामि पश्यन्निव दर्शनेन भवामि दृष्ट्वैव पुनर्युवेव ।। १२.१०३ ।।

ahaṃ punardevakumārarūpamalaṃkṛtaṃ taṃ sutamāvrajantam | nandāmi paśyanniva darśanena bhavāmi dṛṣṭvaiva punaryuveva || 12.103 ||

'देवकुमार के समान अलंकृत उस पुत्र को मेरे पास आते देखकर ही मुझे आनंद मिलता है; उसे बार-बार देखकर मानो मैं फिर से युवा हो उठता हूँ।'

श्लोक 104 (ayodhya.12.104)

विना हि सूर्येण भवेत्प्रवृत्तिरवर्षता वज्रधरेण वापि । रामं तु गच्छन्तमितः समीक्ष्य जीवेन्न कश्चित्त्विति चेतना मे ।। १२.१०४ ।।

vinā hi sūryeṇa bhavetpravṛttiravarṣatā vajradhareṇa vāpi | rāmaṃ tu gacchantamitaḥ samīkṣya jīvenna kaścittviti cetanā me || 12.104 ||

'सूर्य के बिना, या इंद्र के वर्षा न करने पर भी, संसार की गतिविधि शायद चल सकती है; किंतु राम को यहाँ से जाते देखकर, मेरा मन कहता है कि कोई भी जीवित नहीं रह सकेगा।'

श्लोक 105 (ayodhya.12.105)

विनाशकामामहिताममित्रामावासयं मृत्युमिवात्मनस्त्वाम् । चिरं बताङ्केन धृतासि सर्पी महाविषा तेन हतोऽस्मि मोहात् ।। १२.१०५ ।।

vināśakāmāmahitāmamitrāmāvāsayaṃ mṛtyumivātmanastvām | ciraṃ batāṅkena dhṛtāsi sarpī mahāviṣā tena hato'smi mohāt || 12.105 ||

'मुझे नष्ट करने की कामना करने वाली, अहितकारी, शत्रु-सी तुम्हें मैंने अपनी ही मृत्यु के समान अपने घर में पाला। हाय! बहुत काल तक गोद में महाविषधारिणी सर्पिणी को पालकर मैं मोहवश नष्ट हो गया।'

श्लोक 106 (ayodhya.12.106)

मया च रामेण सलक्ष्मणेन प्रशास्तु हीनो भरतस्त्वया सह । पुरं च राष्ट्रं च निहत्य बान्धवान्ममाहितानां च भवाभिहर्षिणी ।। १२.१०६ ।।

mayā ca rāmeṇa salakṣmaṇena praśāstu hīno bharatastvayā saha | puraṃ ca rāṣṭraṃ ca nihatya bāndhavānmamāhitānāṃ ca bhavābhiharṣiṇī || 12.106 ||

'मुझसे और लक्ष्मण-सहित राम से रहित भरत तुम्हारे साथ अकेला ही शासन करे—नगर, राज्य और बंधुजनों का नाश करके, मेरे शत्रुओं को प्रसन्न करने वाली बनकर!'

श्लोक 107 (ayodhya.12.107)

नृशंसवृत्ते व्यसनप्रहारिणि प्रसह्य वाक्यं यदिहाद्य भाषसे । न नाम ते तेन मुखात्पतन्त्यधो विशीर्यमाणा दशनाः सहस्रधा ।। १२.१०७ ।।

nṛśaṃsavṛtte vyasanaprahāriṇi prasahya vākyaṃ yadihādya bhāṣase | na nāma te tena mukhātpatantyadho viśīryamāṇā daśanāḥ sahasradhā || 12.107 ||

'हे क्रूरस्वभाव वाली, विपत्ति में प्रहार करने वाली! जब तुम आज इतना कठोर वचन बलपूर्वक बोल रही हो, तो तुम्हारे मुख से दाँत हजार टुकड़ों में बिखरकर नीचे क्यों नहीं गिर पड़ते?'

श्लोक 108 (ayodhya.12.108)

न किंचिदाहाहितमप्रियं वचो न वेत्ति रामः परुषाणि भाषितुम् । कथं तु रामे ह्यभिरामवादिनि ब्रवीषि दोषान्गुणनित्यसम्मते ।। १२.१०८ ।।

na kiṃcidāhāhitamapriyaṃ vaco na vetti rāmaḥ paruṣāṇi bhāṣitum | kathaṃ tu rāme hyabhirāmavādini bravīṣi doṣānguṇanityasammate || 12.108 ||

'राम तो कभी थोड़ा भी अप्रिय वचन नहीं कहता, उसे कठोर बोलना आता ही नहीं। फिर उस मधुरभाषी, सद्गुणों के लिए सदा प्रशंसित राम के दोष तुम कैसे गिना रही हो?'

श्लोक 109 (ayodhya.12.109)

प्रताम्य वा प्रज्वल वा प्रणश्य वा सहस्रशो वा स्फुटितां महीं व्रज । न ते करिष्यामि वचः सुदारुणं ममाहितं केकयराजपांसने ।। १२.१०९ ।।

pratāmya vā prajvala vā praṇaśya vā sahasraśo vā sphuṭitāṃ mahīṃ vraja | na te kariṣyāmi vacaḥ sudāruṇaṃ mamāhitaṃ kekayarājapāṃsane || 12.109 ||

'चाहे तुम मूर्च्छित हो जाओ, या जल उठो, या नष्ट हो जाओ, या हज़ार टुकड़ों में फटी हुई पृथ्वी में समा जाओ—हे केकयवंश की कलंकिनी! तुम्हारा यह अत्यंत क्रूर, मेरे लिए अहितकारी वचन मैं कभी पूरा नहीं करूँगा।'

श्लोक 110 (ayodhya.12.110)

क्षुरोपमां नित्यमसत्प्रियंवदां प्रदुष्टभावां स्वकुलोपघातिनीम् । न जीवितुं त्वां विषहेऽमनोरमां दिधक्षमाणां हृदयं सबन्धनम् ।। १२.११० ।।

kṣuropamāṃ nityamasatpriyaṃvadāṃ praduṣṭabhāvāṃ svakulopaghātinīm | na jīvituṃ tvāṃ viṣahe'manoramāṃ didhakṣamāṇāṃ hṛdayaṃ sabandhanam || 12.110 ||

'छुरे के समान तीक्ष्ण, सदा झूठी मिठास से बोलने वाली, दूषित स्वभाव वाली, अपने ही कुल का घात करने वाली तुम्हें—जो मेरे हृदय को उसके बंधनों सहित जलाने पर तुली हो—मैं जीवित रहते देखना नहीं चाहता, हे अप्रिय!'

श्लोक 111 (ayodhya.12.111)

न जीवितं मेऽस्ति कुतः पुनः सुखं विनात्मजेनात्मवतां कुतो रतिः । ममाहितं देवि न कर्तुमर्हसि स्पृशामि पादावपि ते प्रसीद मे ।। १२.१११ ।।

na jīvitaṃ me'sti kutaḥ punaḥ sukhaṃ vinātmajenātmavatāṃ kuto ratiḥ | mamāhitaṃ devi na kartumarhasi spṛśāmi pādāvapi te prasīda me || 12.111 ||

'अब मेरा जीवन ही शेष नहीं, तो फिर सुख कहाँ? पुत्र के बिना विवेकी मनुष्य को आनंद कहाँ मिलेगा? हे देवी! तुम्हें मेरा यह अहित नहीं करना चाहिए। मैं तुम्हारे चरण भी स्पर्श करता हूँ—मुझ पर प्रसन्न हो जाओ।'

श्लोक 112 (ayodhya.12.112)

स भूमिपालो विलपन्ननाथवत्स्त्रिया गृहीतो हृदयेऽतिमात्रया । पपात देव्याश्चरणौ प्रसारितावुभावसम्प्राप्य यथाऽऽतुरस्तथा ।। १२.११२ ।।

sa bhūmipālo vilapannanāthavatstriyā gṛhīto hṛdaye'timātrayā | papāta devyāścaraṇau prasāritāvubhāvasamprāpya yathā''turastathā || 12.112 ||

वह भूमिपाल राजा, अनाथ के समान विलाप करते हुए, उस स्त्री द्वारा हृदय में सर्वथा जकड़े जाकर, फैले हुए देवी के दोनों चरणों तक पहुँचकर, दोनों ही मानो रोगग्रस्त हों, वहीं गिर पड़ा।

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