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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 23

लक्ष्मण का शौर्य-संकल्प

सर्ग 22सर्ग-सूचीसर्ग 24

श्लोक 1 (ayodhya.23.1)

इति ब्रुवति रामे तु लक्ष्मणोऽवाक् शिरा इव । ध्यात्वा मध्यं जगामाशु सहसा दैन्यहर्षयोः ॥ 23.1 ॥

iti bruvati rāme tu lakṣmaṇo'vāk śirā iva | dhyātvā madhyaṃ jagāmāśu sahasā dainyaharṣayoḥ

राम के इस प्रकार कहने पर लक्ष्मण मानो वाणीहीन होकर सिर झुकाए विचारमग्न हो गए, और सहसा दीनता तथा उत्साह के बीच की स्थिति में पहुँच गए।

श्लोक 2 (ayodhya.23.2)

तदा तु बद्ध्वा भ्रुकुटीं भ्रुवोर्मध्ये नरर्षभः । निशश्वास महासर्पो बिलस्थ इव रोषितः ॥ 23.2 ॥

tadā tu bada‍dhvā bhrukuṭīṃ bhruvormadhye nararṣabhaḥ | niśaśvāsa mahāsarpo bilastha iva roṣitaḥ

तब उस नरश्रेष्ठ ने भौंहों के बीच त्योरी चढ़ाकर, बिल में बैठे कुपित महासर्प के समान, गहरी साँस ली।

श्लोक 3 (ayodhya.23.3)

तस्य दुष्प्रतिवीक्ष्यं तद् भ्रुकुटीसहितं तदा । बभौ क्रुद्धस्य सिंहस्य मुखस्य सदृशं मुखम् ॥ 23.3 ॥

tasya duṣprativīkṣyaṃ tad bhrukuṭīsahitaṃ tadā | babhau kruddhasya siṃhasya mukhasya sadṛśaṃ mukham

त्योरी चढ़ी हुई उनकी वह दुर्निरीक्ष्य मुखाकृति उस समय कुपित सिंह के मुख के समान भासित हो रही थी।

श्लोक 4 (ayodhya.23.4)

अग्रहस्तं विधुन्वंस्तु हस्ती हस्तमिवात्मनः । तिर्यगूर्ध्वं शरीरे च पातयित्वा शिरोधराम् ॥ 23.4 ॥

agrahastaṃ vidhunvaṃstu hastī hastamivātmanaḥ | tiryagūrdhvaṃ śarīre ca pātayitvā śirodharām

जैसे हाथी अपनी सूँड़ को हिलाता है, वैसे ही अपना हाथ हिलाते हुए, और अपने शरीर पर सिर को कभी तिरछा तो कभी सीधा झुकाते हुए,

श्लोक 5 (ayodhya.23.5)

अग्राक्ष्णा वीक्षमाणस्तु तिर्यग्भ्रातरमब्रवीत् । अस्थाने सम्भ्रमो यस्य जातो वै सुमहानयम् ॥ 23.5 ॥

agrākṣṇā vīkṣamāṇastu tiryagbhrātaramabravīt | asthāne sambhramo yasya jāto vai sumahānayam

— आँख के कोर से तिरछी दृष्टि से भाई की ओर देखते हुए उन्होंने कहा: 'तुम्हारे मन में जो यह इतना बड़ा विक्षोभ इस अनुचित अवसर पर उत्पन्न हुआ है —

श्लोक 6 (ayodhya.23.6)

धर्मदोषप्रसङ्गेन लोकस्यानतिशङ्कया । कथं ह्येतदसम्भ्रान्तस्त्वद्विधो वक्तुमर्हति ॥ 23.6 ॥

dharmadoṣaprasaṅgena lokasyānatiśaṅkayā | kathaṃ hyetadasambhrāntastvadvidho vaktumarhati

— जो धर्म के भ्रम में उलझने और संसार के प्रति संदेह न रखने के कारण उत्पन्न हुआ है — तुम्हारे जैसा अविचलित व्यक्ति भला ऐसा कैसे कह सकता है?

श्लोक 7 (ayodhya.23.7)

यथा ह्येवमशौण्डीरं शौण्डीरः क्षत्रियर्षभः । किं नाम कृपणं दैवमशक्तमभिशंससि ॥ 23.7 ॥

yathā hyevamaśauṇḍīraṃ śauṇḍīraḥ kṣatriyarṣabhaḥ | kiṃ nāma kṛpaṇaṃ daivamaśaktamabhiśaṃsasi

हे क्षत्रियश्रेष्ठ! तुम, जो सदा इतने शूरवीर रहे हो, आज इस प्रकार अवीरतापूर्ण बात क्यों कह रहे हो — इस दीन और शक्तिहीन नियति को दोष क्यों दे रहे हो?

श्लोक 8 (ayodhya.23.8)

पापयोस्ते कथं नाम तयोः शङ्का न विद्यते । सन्ति धर्मोपधासक्ता धर्मात्मन् किं न बुध्यसे ॥ 23.8 ॥

pāpayoste kathaṃ nāma tayoḥ śaṅkā na vidyate | santi dharmopadhāsaktā dharmātman kiṃ na budhyase

उन दोनों पापियों पर तुम्हें किंचित् भी संदेह क्यों नहीं होता? वे धर्म की आड़ में छल करने में लगे हैं — हे धर्मात्मन्! तुम इसे क्यों नहीं समझते?

श्लोक 9 (ayodhya.23.9)

तयोः सुचरितं स्वार्थं शाठ्यात् परिजिहीर्षतोः । यदि नैवं व्यवसितं स्याद्धि प्रागेव राघव । तयोः प्रागेव दत्तश्च स्याद् वरः प्रकृतश्च सः ॥ 23.9 ॥

tayoḥ sucaritaṃ svārthaṃ śāṭhyāt parijihīrṣatoḥ | yadi naivaṃ vyavasitaṃ syāddhi prāgeva rāghava | tayoḥ prāgeva dattaśca syād varaḥ prakṛtaśca saḥ

छल से अपने स्वार्थ हेतु तुम्हारे सुचरित्र को नष्ट करने की इच्छा रखने वाले उन दोनों ने — हे राघव! यदि यह पहले से ही निश्चित न किया होता, तो यह वर तो कभी का दिया जा चुका होता और काम में भी लाया जा चुका होता।

श्लोक 10 (ayodhya.23.10)

लोकविद्विष्टमारब्धं त्वदन्यस्याभिषेचनम् । नोत्सहे सहितुं वीर तत्र मे क्षन्तुमर्हसि ॥ 23.10 ॥

lokavidviṣṭamārabdhaṃ tvadanyasyābhiṣecanam | notsahe sahituṃ vīra tatra me kṣantumarhasi

तुम्हारे अतिरिक्त किसी और का यह अभिषेक, जो प्रजा की इच्छा के विरुद्ध आरंभ किया गया है — हे वीर! मैं इसे सहन नहीं कर सकता; इस विषय में तुम मुझे क्षमा करना।

श्लोक 11 (ayodhya.23.11)

येनैवमागता द्वैधं तव बुद्धिर्महामते । सोऽपि धर्मो मम द्वेष्यो यत्प्रसङ्गाद् विमुह्यसि ॥ 23.11 ॥

yenaivamāgatā dvaidhaṃ tava buddhirmahāmate | so'pi dharmo mama dveṣyo yatprasaṅgād vimuhyasi

हे महामते! जिस धर्म के कारण तुम्हारी बुद्धि इस प्रकार द्विविधाग्रस्त हो गई है, और जिसके मोह में तुम इस तरह भ्रमित हो गए हो, वह धर्म भी मुझे द्वेष्य लगता है।

श्लोक 12 (ayodhya.23.12)

कथं त्वं कर्मणा शक्तः कैकेयीवशवर्तिनः । करिष्यसि पितुर्वाक्यमधर्मिष्ठं विगर्हितम् ॥ 23.12 ॥

kathaṃ tvaṃ karmaṇā śaktaḥ kaikeyīvaśavartinaḥ | kariṣyasi piturvākyamadharmiṣṭhaṃ vigarhitam

तुम, जो कर्म करने में समर्थ हो, कैकेयी के वश में पड़े हुए पिता की इस निंदनीय और अधर्मपूर्ण आज्ञा का पालन भला कैसे करोगे?

श्लोक 13 (ayodhya.23.13)

यदयं किल्बिषाद् भेदः कृतोऽप्येवं न गृह्यते । जायते तत्र मे दुःखं धर्मसङ्गश्च गर्हितः ॥ 23.13 ॥

yadayaṃ kilbiṣād bhedaḥ kṛto'pyevaṃ na gṛhyate | jāyate tatra me duḥkhaṃ dharmasaṅgaśca garhitaḥ

पाप से उत्पन्न यह भेद इतना स्पष्ट होने पर भी तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा — इसी बात से मुझे दुःख होता है, और तुम्हारा इस निंदनीय धर्म से चिपके रहना भी।

श्लोक 14 (ayodhya.23.14)

तवायं धर्मसंयोगो लोकस्यास्य विगर्हितः । मनसापि कथं कामं कुर्यात् त्वां कामवृत्तयोः । तयोस्त्वहितयोर्नित्यं शत्र्वोः पित्रभिधानयोः ॥ 23.14 ॥

tavāyaṃ dharmasaṃyogo lokasyāsya vigarhitaḥ | manasāpi kathaṃ kāmaṃ kuryāt tvāṃ kāmavṛttayoḥ | tayostvahitayornityaṃ śatrvoḥ pitrabhidhānayoḥ

तुम्हारा यह धर्म-आग्रह इस समस्त संसार द्वारा निंदित है। जो दोनों केवल अपनी इच्छा से चलते हैं, उनकी कामना को पूर्ण करने की बात तुम मन से भी कैसे सोच सकते हो — जबकि वे दोनों, पिता-माता के नाम पर होते हुए भी, वस्तुतः तुम्हारे नित्य अहितकारी शत्रु हैं?

श्लोक 15 (ayodhya.23.15)

यद्यपि प्रतिपत्तिस्ते दैवी चापि तयोर्मतम् । तथाप्युपेक्षणीयं ते न मे तदपि रोचते ॥ 23.15 ॥

yadyapi pratipattiste daivī cāpi tayormatam | tathāpyupekṣaṇīyaṃ te na me tadapi rocate

यद्यपि तुम्हारा यह विश्वास है कि उन दोनों का यह विचार भी दैव-प्रेरित है, तथापि मुझे यह भी उचित नहीं लगता कि तुम इसकी उपेक्षा कर दो।

श्लोक 16 (ayodhya.23.16)

विक्लवो वीर्यहीनो यः स दैवमनुवर्तते । वीराः सम्भावितात्मानो न दैवं पर्युपासते ॥ 23.16 ॥

viklavo vīryahīno yaḥ sa daivamanuvartate | vīrāḥ sambhāvitātmāno na daivaṃ paryupāsate

जो व्याकुल और पराक्रमहीन होता है, वही नियति के अधीन रहता है; आत्मसम्मानी वीर पुरुष नियति की उपासना नहीं करते।

श्लोक 17 (ayodhya.23.17)

दैवं पुरुषकारेण यः समर्थः प्रबाधितुम् । न दैवेन विपन्नार्थः पुरुषः सोऽवसीदति ॥ 23.17 ॥

daivaṃ puruṣakāreṇa yaḥ samarthaḥ prabādhitum | na daivena vipannārthaḥ puruṣaḥ so'vasīdati

जो पुरुष पुरुषार्थ से नियति को भी परास्त करने में समर्थ है, वह नियति द्वारा कार्य के बिगड़ जाने पर भी विषाद को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 18 (ayodhya.23.18)

द्रक्ष्यन्ति त्वद्य दैवस्य पौरुषं पुरुषस्य च । दैवमानुषयोरद्य व्यक्ता व्यक्तिर्भविष्यति ॥ 23.18 ॥

drakṣyanti tvadya daivasya pauruṣaṃ puruṣasya ca | daivamānuṣayoradya vyaktā vyaktirbhaviṣyati

आज सब लोग नियति के बल और पुरुष के बल को देखेंगे; आज दैव और पुरुष के बीच का भेद स्पष्ट रूप से प्रकट हो जाएगा।

श्लोक 19 (ayodhya.23.19)

अद्य मे पौरुषहतं दैवं द्रक्ष्यन्ति वै जनाः । यैर्दैवादाहतं तेऽद्य दृष्टं राज्याभिषेचनम् ॥ 23.19 ॥

adya me pauruṣahataṃ daivaṃ drakṣyanti vai janāḥ | yairdaivādāhataṃ te'dya dṛṣṭaṃ rājyābhiṣecanam

आज लोग मेरे पराक्रम से नियति को पराजित होते देखेंगे — वही लोग, जिन्होंने आज तुम्हारे राज्याभिषेक को नियति के आघात से बाधित होते देखा है।

श्लोक 20 (ayodhya.23.20)

अत्यङ्कुशमिवोद्दामं गजं मदजलोद्धतम् । प्रधावितमहं दैवं पौरुषेण निवर्तये ॥ 23.20 ॥

atyaṅkuśamivoddāmaṃ gajaṃ madajaloddhatam | pradhāvitamahaṃ daivaṃ pauruṣeṇa nivartaye

जैसे मद से उन्मत्त होकर अंकुश की परवाह न करते हुए दौड़ते हुए हाथी को बलपूर्वक रोका जाता है, वैसे ही मैं इस दौड़ती हुई नियति को अपने पराक्रम से पीछे लौटा दूँगा।

श्लोक 21 (ayodhya.23.21)

लोकपालाः समस्तास्ते नाद्य रामाभिषेचनम् । न च कृत्स्नास्त्रयो लोका विहन्युः किं पुनः पिता ॥ 23.21 ॥

lokapālāḥ samastāste nādya rāmābhiṣecanam | na ca kṛtsnāstrayo lokā vihanyuḥ kiṃ punaḥ pitā

आज समस्त लोकपाल मिलकर भी राम के अभिषेक को नहीं रोक सकते, और न ही तीनों लोक मिलकर रोक सकते हैं — फिर पिता की तो बात ही क्या!

श्लोक 22 (ayodhya.23.22)

यैर्विवासस्तवारण्ये मिथो राजन् समर्थितः । अरण्ये ते विवत्स्यन्ति चतुर्दश समास्तथा ॥ 23.22 ॥

yairvivāsastavāraṇye mitho rājan samarthitaḥ | araṇye te vivatsyanti caturdaśa samāstathā

हे राजन्! जिन्होंने आपसी सहमति से तुम्हारे लिए वन-निर्वासन का यह प्रबंध किया है, वे स्वयं ही उन्हीं चौदह वर्षों तक वन में निवास करेंगे।

श्लोक 23 (ayodhya.23.23)

अहं तदाशां धक्ष्यामि पितुस्तस्याश्च या तव । अभिषेकविघातेन पुत्रराज्याय वर्तते ॥ 23.23 ॥

ahaṃ tadāśāṃ dhakṣyāmi pitustasyāśca yā tava | abhiṣekavighātena putrarājyāya vartate

पिता की और उस कैकेयी की, जो तुम्हारे अभिषेक में बाधा डालकर अपने पुत्र के राज्य के लिए प्रयत्नशील है, उस आशा को मैं भस्म कर दूँगा।

श्लोक 24 (ayodhya.23.24)

मद्बलेन विरुद्धाय न स्याद् दैवबलं तथा । प्रभविष्यति दुःखाय यथोग्रं पौरुषं मम ॥ 23.24 ॥

mada‍balena viruddhāya na syād daivabalaṃ tathā | prabhaviṣyati duḥkhāya yathograṃ pauruṣaṃ mama

मेरे बल के विरुद्ध खड़ी होकर नियति की शक्ति उतना दुःख उत्पन्न नहीं कर पाएगी, जितना मेरा उग्र पराक्रम कर सकता है।

श्लोक 25 (ayodhya.23.25)

ऊर्ध्वं वर्षसहस्रान्ते प्रजापाल्यमनन्तरम् । आर्यपुत्राः करिष्यन्ति वनवासं गते त्वयि ॥ 23.25 ॥

ūrdhvaṃ varṣasahasrānte prajāpālyamanantaram | āryaputrāḥ kariṣyanti vanavāsaṃ gate tvayi

एक सहस्र वर्षों तक प्रजा का पालन करने के पश्चात, जब तुम स्वयं वन को जाओगे, तब तुम्हारे कुलीन पुत्र प्रजा का पालन करेंगे।

श्लोक 26 (ayodhya.23.26)

पूर्वराजर्षिवृत्त्या हि वनवासोऽभिधीयते । प्रजा निक्षिप्य पुत्रेषु पुत्रवत् परिपालने ॥ 23.26 ॥

pūrvarājarṣivṛttyā hi vanavāso'bhidhīyate | prajā nikṣipya putreṣu putravat paripālane

प्राचीन राजर्षियों की यह परंपरा रही है कि वे प्रजा को, संतान के समान पालने हेतु, अपने पुत्रों को सौंपकर ही वन में निवास करने जाते हैं।

श्लोक 27 (ayodhya.23.27)

स चेद् राजन्यनेकाग्रे राज्यविभ्रमशङ्कया । नैवमिच्छसि धर्मात्मन् राज्यं राम त्वमात्मनि ॥ 23.27 ॥

sa ced rājanyanekāgre rājyavibhramaśaṅkayā | naivamicchasi dharmātman rājyaṃ rāma tvamātmani

किंतु, हे धर्मात्मन् राजन् राम! यदि तुम इस आशंका से कि अस्थिर राजा के अधीन राज्य में अव्यवस्था फैल जाएगी, इस प्रकार राज्य को अपने लिए नहीं चाहते,

श्लोक 28 (ayodhya.23.28)

प्रतिजाने च ते वीर मा भूवं वीरलोकभाक् । राज्यं च तव रक्षेयमहं वेलेव सागरम् ॥ 23.28 ॥

pratijāne ca te vīra mā bhūvaṃ vīralokabhāk | rājyaṃ ca tava rakṣeyamahaṃ veleva sāgaram

— तो हे वीर! मैं तुमसे प्रतिज्ञा करता हूँ: यदि मैं तुम्हारे राज्य की रक्षा वैसे न करूँ जैसे तट सागर की रक्षा करता है, तो मुझे वीरलोक की प्राप्ति न हो।

श्लोक 29 (ayodhya.23.29)

मङ्गलैरभिषिञ्चस्व तत्र त्वं व्यापृतो भव । अहमेको महीपालानलं वारयितुं बलात् ॥ 23.29 ॥

maṅgalairabhiṣiñcasva tatra tvaṃ vyāpṛto bhava | ahameko mahīpālānalaṃ vārayituṃ balāt

तुम केवल मंगल विधियों के साथ अभिषिक्त होने में लगे रहो; समस्त भूपतियों को बलपूर्वक रोकने में मैं अकेला ही समर्थ हूँ।

श्लोक 30 (ayodhya.23.30)

न शोभार्थाविमौ बाहू न धनुर्भूषणाय मे । नासिराबन्धनार्थाय न शराः स्तम्भहेतवः ॥ 23.30 ॥

na śobhārthāvimau bāhū na dhanurbhūṣaṇāya me | nāsirābandhanārthāya na śarāḥ stambhahetavaḥ

ये मेरी दोनों भुजाएँ केवल शोभा के लिए नहीं हैं, न ही मेरा धनुष अलंकार के लिए है; न मेरी तलवार कमर में बाँधे रखने भर के लिए है, और न मेरे बाण निष्क्रिय पड़े रहने के लिए हैं।

श्लोक 31 (ayodhya.23.31)

अमित्रमथनार्थाय सर्वमेतच्चतुष्टयम् । न चाहं कामयेऽत्यर्थं यः स्याच्छत्रुर्मतो मम ॥ 23.31 ॥

amitramathanārthāya sarvametaccatuṣṭayam | na cāhaṃ kāmaye'tyarthaṃ yaḥ syācchatrurmato mama

ये चारों ही शत्रुओं के विनाश के लिए हैं; और जिसे मैं अपना शत्रु मान लूँ, उसे मैं तनिक भी बख्शना नहीं चाहता।

श्लोक 32 (ayodhya.23.32)

असिना तीक्ष्णधारेण विद्युच्चलितवर्चसा । प्रगृहीतेन वै शत्रुं वज्रिणं वा न कल्पये ॥ 23.32 ॥

asinā tīkṣṇadhāreṇa vidyuccalitavarcasā | pragṛhītena vai śatruṃ vajriṇaṃ vā na kalpaye

इस तीक्ष्णधार, बिजली के समान चमकती हुई तलवार को हाथ में लिए, मैं वज्रधारी इंद्र को भी शत्रु के रूप में गिनने योग्य नहीं मानता।

श्लोक 33 (ayodhya.23.33)

खड्गनिष्पेषनिष्पिष्टैर्गहना दुश्चरा च मे । हस्त्यश्वरथिहस्तोरुशिरोभिर्भविता मही ॥ 23.33 ॥

khaḍganiṣpeṣaniṣpiṣṭairgahanā duścarā ca me | hastyaśvarathihastoruśirobhirbhavitā mahī

मेरी इस तलवार की चोट से कुचले गए हाथियों, घोड़ों और रथियों के सिरों, हाथों और जंघाओं से यह पृथ्वी सघन और दुर्गम हो जाएगी।

श्लोक 34 (ayodhya.23.34)

खड्गधाराहता मेऽद्य दीप्यमाना इवाग्नयः । पतिष्यन्ति द्विषो भूमौ मेघा इव सविद्युतः ॥ 23.34 ॥

khaḍgadhārāhatā me'dya dīpyamānā ivāgnayaḥ | patiṣyanti dviṣo bhūmau meghā iva savidyutaḥ

आज मेरी तलवार की धार से आहत होकर मेरे शत्रु, प्रज्वलित अग्नि के समान अथवा बिजली सहित बादलों के समान, भूमि पर गिर पड़ेंगे।

श्लोक 35 (ayodhya.23.35)

बद्धगोधाङ्गुलित्राणे प्रगृहीतशरासने । कथं पुरुषमानी स्यात् पुरुषाणां मयि स्थिते ॥ 23.35 ॥

baddhagodhāṅgulitrāṇe pragṛhītaśarāsane | kathaṃ puruṣamānī syāt puruṣāṇāṃ mayi sthite

गोधा-चर्म का अँगुलित्राण बाँधकर और धनुष हाथ में उठाए हुए, जब तक मैं यहाँ खड़ा हूँ, तब तक कोई पुरुष स्वयं को शूरवीर मानने का साहस भला कैसे कर सकता है?

श्लोक 36 (ayodhya.23.36)

बहुभिश्चैकमत्यस्यन्नेकेन च बहूञ्जनान् । विनियोक्ष्याम्यहं बाणान्नृवाजिगजमर्मसु ॥ 23.36 ॥

bahubhiścaikamatyasyannekena ca bahūñjanān | viniyokṣyāmyahaṃ bāṇānnṛvājigajamarmasu

एक व्यक्ति को अनेक बाणों से और अनेक व्यक्तियों को एक ही बाण से भेदते हुए, मैं मनुष्यों, अश्वों और हाथियों के मर्मस्थलों में अपने बाणों का प्रयोग करूँगा।

श्लोक 37 (ayodhya.23.37)

अद्य मेऽस्त्रप्रभावस्य प्रभावः प्रभविष्यति । राज्ञश्चाप्रभुतां कर्तुं प्रभुत्वं च तव प्रभो ॥ 23.37 ॥

adya me'straprabhāvasya prabhāvaḥ prabhaviṣyati | rājñaścāprabhutāṃ kartuṃ prabhutvaṃ ca tava prabho

हे प्रभो! आज मेरे अस्त्रों के प्रभाव का यह सामर्थ्य प्रकट होगा — पिता को उनके प्रभुत्व से रहित करने और तुम्हें प्रभुत्व प्रदान करने का।

श्लोक 38 (ayodhya.23.38)

अद्य चन्दनसारस्य केयूरामोक्षणस्य च । वसूनां च विमोक्षस्य सुहृदां पालनस्य च ॥ 23.38 ॥

adya candanasārasya keyūrāmokṣaṇasya ca | vasūnāṃ ca vimokṣasya suhṛdāṃ pālanasya ca

आज चंदन के सार को, बाजूबंदों को उपहार में देने के लिए, धन को उदारतापूर्वक बाँटने के लिए, और मित्रों की रक्षा के लिए —

श्लोक 39 (ayodhya.23.39)

अनुरूपाविमौ बाहू राम कर्म करिष्यतः । अभिषेचनविघ्नस्य कर्तॄणां ते निवारणे ॥ 23.39 ॥

anurūpāvimau bāhū rāma karma kariṣyataḥ | abhiṣecanavighnasya kartṝṇāṃ te nivāraṇe

— हे राम! मेरी ये दोनों भुजाएँ अब उपयुक्त कार्य करेंगी: वे तुम्हारे अभिषेक में विघ्न डालने वाले सभी लोगों को रोकेंगी और परास्त करेंगी।

श्लोक 40 (ayodhya.23.40)

ब्रवीहि कोऽद्यैव मया वियुज्यतां तवासुहृत् प्राणयशःसुहृज्जनैः । यथा तवेयं वसुधा वशा भवेत् तथैव मां शाधि तवास्मि किंकरः ॥ 23.40 ॥

bravīhi ko'dyaiva mayā viyujyatāṃ tavāsuhṛt prāṇayaśaḥsuhṛjjanaiḥ | yathā taveyaṃ vasudhā vaśā bhavet tathaiva māṃ śādhi tavāsmi kiṃkaraḥ

"बताओ — आज ही किसे मैं जीवन, यश और मित्रों से वंचित करूँ, जो तुम्हारा सच्चा हितैषी नहीं है? बस मुझे यह आज्ञा दो कि यह पृथ्वी तुम्हारे वश में कैसे हो; मैं तुम्हारा सेवक हूँ।

श्लोक 41 (ayodhya.23.41)

विमृज्य बाष्पं परिसान्त्व्य चासकृत् स लक्ष्मणं राघववंशवर्धनः । उवाच पित्रोर्वचने व्यवस्थितं निबोध मामेष हि सौम्य सत्पथः ॥ 23.41 ॥

vimṛjya bāṣpaṃ parisāntvya cāsakṛt sa lakṣmaṇaṃ rāghavavaṃśavardhanaḥ | uvāca pitrorvacane vyavasthitaṃ nibodha māmeṣa hi saumya satpathaḥ

लक्ष्मण के आँसू पोंछते हुए और बार-बार उन्हें सांत्वना देते हुए, रघुकुल की वृद्धि करने वाले राम ने कहा: 'मुझे माता-पिता के वचन के पालन में दृढ़ जानो; हे सौम्य! यही सच्चा सत्पथ है।'

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