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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 44

सुमित्रा का सांत्वना-वचन

सर्ग 43सर्ग-सूचीसर्ग 45

श्लोक 1 (ayodhya.44.1)

विलपन्तीं तथा तां तु कौसल्यां प्रमदोत्तमाम्। इदं धर्मे स्थिता धर्म्यं सुमित्रा वाक्यमब्रवीत्॥ 44.1 ॥

vilapantīṃ tathā tāṃ tu kausalyāṃ pramadottamām| idaṃ dharme sthitā dharmyaṃ sumitrā vākyamabravīt

इस प्रकार विलाप करती हुई उस श्रेष्ठ नारी कौसल्या से, धर्म में स्थित सुमित्रा ने यह धर्मयुक्त वचन कहा।

श्लोक 2 (ayodhya.44.2)

तवार्ये सद्गुणैर्युक्तः स पुत्रः पुरुषोत्तमः। किं ते विलपितेनैवं कृपणं रुदितेन वा॥ 44.2 ॥

tavārye sadguṇairyuktaḥ sa putraḥ puruṣottamaḥ| kiṃ te vilapitenaivaṃ kṛpaṇaṃ ruditena vā

"हे आर्ये! तुम्हारा वह पुत्र सद्गुणों से युक्त और पुरुषों में श्रेष्ठ है। इस प्रकार दीनतापूर्वक विलाप करने या रोने से क्या लाभ?"

श्लोक 3 (ayodhya.44.3)

यस्तवार्ये गतः पुत्रस्त्यक्त्वा राज्यं महाबलः। साधु कुर्वन् महात्मानं पितरं सत्यवादिनम्॥ 44.3 ॥

yastavārye gataḥ putrastyaktvā rājyaṃ mahābalaḥ| sādhu kurvan mahātmānaṃ pitaraṃ satyavādinam

"हे आर्ये! तुम्हारा जो महाबली पुत्र राज्य त्यागकर गया है, उसने ऐसा करके अपने महात्मा और सत्यवादी पिता को सत्य पर स्थिर रखकर एक उत्तम कार्य किया है।"

श्लोक 4 (ayodhya.44.4)

शिष्टैराचरिते सम्यक् शश्वत् प्रेत्य फलोदये। रामो धर्मे स्थितः श्रेष्ठो न स शोच्यः कदाचन॥ 44.4 ॥

śiṣṭairācarite samyak śaśvat pretya phalodaye| rāmo dharme sthitaḥ śreṣṭho na sa śocyaḥ kadācana

"जिस धर्म का आचरण सज्जन सदैव भली-भाँति करते हैं, और जिसका फल मृत्यु के पश्चात भी प्राप्त होता है, उसी धर्म में स्थित श्रेष्ठ राम — वे कभी शोक करने योग्य नहीं हैं।"

श्लोक 5 (ayodhya.44.5)

वर्तते चोत्तमां वृत्तिं लक्ष्मणोऽस्मिन् सदानघः। दयावान् सर्वभूतेषु लाभस्तस्य महात्मनः॥ 44.5 ॥

vartate cottamāṃ vṛttiṃ lakṣmaṇo'smin sadānaghaḥ| dayāvān sarvabhūteṣu lābhastasya mahātmanaḥ

"और सर्वदा निष्पाप, सभी प्राणियों पर दयावान लक्ष्मण, राम के प्रति सदा उत्तम वृत्ति से बर्तते हैं — यही उस महात्मा का सच्चा लाभ है।"

श्लोक 6 (ayodhya.44.6)

अरण्यवासे यद् दुःखं जानन्त्येव सुखोचिता। अनुगच्छति वैदेही धर्मात्मानं तवात्मजम्॥ 44.6 ॥

araṇyavāse yad duḥkhaṃ jānantyeva sukhocitā| anugacchati vaidehī dharmātmānaṃ tavātmajam

"वन-वास के दुःख को भली-भाँति जानते हुए भी, सुख की अभ्यस्त वैदेही तुम्हारे उस धर्मात्मा पुत्र का अनुसरण कर रही हैं।"

श्लोक 7 (ayodhya.44.7)

कीर्तिभूतां पताकां यो लोके भ्रमयति प्रभुः। धर्मः सत्यव्रतपरः किं न प्राप्तस्तवात्मजः॥ 44.7 ॥

kīrtibhūtāṃ patākāṃ yo loke bhramayati prabhuḥ| dharmaḥ satyavrataparaḥ kiṃ na prāptastavātmajaḥ

"जो प्रभु संसार में कीर्ति की ध्वजा फहराते हैं, और जो धर्म तथा सत्य-व्रत में तत्पर रहते हैं — ऐसे तुम्हारे पुत्र ने क्या नहीं प्राप्त कर लिया है?"

श्लोक 8 (ayodhya.44.8)

व्यक्तं रामस्य विज्ञाय शौचं माहात्म्यमुत्तमम्। न गात्रमंशुभिः सूर्यः संतापयितुमर्हति॥ 44.8 ॥

vyaktaṃ rāmasya vijñāya śaucaṃ māhātmyamuttamam| na gātramaṃśubhiḥ sūryaḥ saṃtāpayitumarhati

"राम की पवित्रता और उनके उत्तम माहात्म्य को भली-भाँति जानकर सूर्य भी अपनी किरणों से उनके शरीर को संतप्त करने का साहस नहीं करेगा।"

श्लोक 9 (ayodhya.44.9)

शिवः सर्वेषु कालेषु काननेभ्यो विनिःसृतः। राघवं युक्तशीतोष्णः सेविष्यति सुखोऽनिलः॥ 44.9 ॥

śivaḥ sarveṣu kāleṣu kānanebhyo viniḥsṛtaḥ| rāghavaṃ yuktaśītoṣṇaḥ seviṣyati sukho'nilaḥ

"वनों से निकलती हुई, सर्दी और गर्मी में समुचित रूप से समायोजित, सर्वदा शुभ और सुखद वायु राघव की सेवा करेगी।"

श्लोक 10 (ayodhya.44.10)

शयानमनघं रात्रौ पितेवाभिपरिष्वजन्। घर्मघ्नः संस्पृशन् शीतश्चन्द्रमा ह्लादयिष्यति॥ 44.10 ॥

śayānamanaghaṃ rātrau pitevābhipariṣvajan| gharmaghnaḥ saṃspṛśan śītaścandramā hlādayiṣyati

"रात्रि में शयन करते हुए उस निष्पाप राम को, ग्रीष्म का नाशक शीतल चंद्रमा, पिता के समान आलिंगन करते हुए और स्पर्श करते हुए, आनंदित करेगा।"

श्लोक 11 (ayodhya.44.11)

ददौ चास्त्राणि दिव्यानि यस्मै ब्रह्मा महौजसे। दानवेन्द्रं हतं दृष्ट्वा तिमिध्वजसुतं रणे॥ 44.11 ॥

dadau cāstrāṇi divyāni yasmai brahmā mahaujase| dānavendraṃ hataṃ dṛṣṭvā timidhvajasutaṃ raṇe

"जिसे ब्रह्मा ने रणभूमि में तिमिध्वज-पुत्र दानवेंद्र को मारा हुआ देखकर, उस महातेजस्वी को दिव्य अस्त्र प्रदान किए थे..."

श्लोक 12 (ayodhya.44.12)

स शूरः पुरुषव्याघ्रः स्वबाहुबलमाश्रितः। असंत्रस्तो ह्यरण्येऽसौ वेश्मनीव निवत्स्यते॥ 44.12 ॥

sa śūraḥ puruṣavyāghraḥ svabāhubalamāśritaḥ| asaṃtrasto hyaraṇye'sau veśmanīva nivatsyate

"...वही वह शूरवीर पुरुषव्याघ्र, अपनी भुजाओं के बल का आश्रय लेकर, वन में भी अपने घर के समान निर्भय होकर निवास करेंगे।"

श्लोक 13 (ayodhya.44.13)

यस्येषुपथमासाद्य विनाशं यान्ति शत्रवः। कथं न पृथिवी तस्य शासने स्थातुमर्हति॥ 44.13 ॥

yasyeṣupathamāsādya vināśaṃ yānti śatravaḥ| kathaṃ na pṛthivī tasya śāsane sthātumarhati

"जिसके बाणों की सीमा में आते ही शत्रु विनाश को प्राप्त हो जाते हैं, वह पृथ्वी उसके शासन में क्यों नहीं रहने योग्य होगी?"

श्लोक 14 (ayodhya.44.14)

या श्रीः शौर्यं च रामस्य या च कल्याणसत्त्वता। निवृत्तारण्यवासः स्वं क्षिप्रं राज्यमवाप्स्यति॥ 44.14 ॥

yā śrīḥ śauryaṃ ca rāmasya yā ca kalyāṇasattvatā| nivṛttāraṇyavāsaḥ svaṃ kṣipraṃ rājyamavāpsyati

"राम की जो श्री, जो शौर्य और जो कल्याणकारी सत्त्व है, उसी के बल पर वे वनवास समाप्त होते ही शीघ्र अपने राज्य को प्राप्त कर लेंगे।"

श्लोक 15 (ayodhya.44.15)

सूर्यस्यापि भवेत् सूर्यो ह्यग्नेरग्नः प्रभोः प्रभुः। श्रियाः श्रीश्च भवेदग्र्या कीर्त्याः कीर्तिः क्षमाक्षमा॥ 44.15 ॥

sūryasyāpi bhavet sūryo hyagneragnaḥ prabhoḥ prabhuḥ| śriyāḥ śrīśca bhavedagryā kīrtyāḥ kīrtiḥ kṣamākṣamā

"वे सूर्य के भी सूर्य, अग्नि के भी अग्नि, और स्वामियों के भी स्वामी हैं; वे श्री की भी श्री, कीर्ति की भी सर्वोत्तम कीर्ति, और क्षमा की भी क्षमा हैं।"

श्लोक 16 (ayodhya.44.16)

दैवतं देवतानां च भूतानां भूतसत्तमः। तस्य के ह्यगुणा देवि वने वाप्यथवा पुरे॥ 44.16 ॥

daivataṃ devatānāṃ ca bhūtānāṃ bhūtasattamaḥ| tasya ke hyaguṇā devi vane vāpyathavā pure

"वे देवताओं के भी देवता हैं, और प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ प्राणी हैं — हे देवी! वन में हो या नगर में, उनमें भला कौन-सा दोष हो सकता है?"

श्लोक 17 (ayodhya.44.17)

पृथिव्या सह वैदेह्या श्रिया च पुरुषर्षभः। क्षिप्रं तिसृभिरेताभिः सह रामोऽभिषेक्ष्यते॥ 44.17 ॥

pṛthivyā saha vaidehyā śriyā ca puruṣarṣabhaḥ| kṣipraṃ tisṛbhiretābhiḥ saha rāmo'bhiṣekṣyate

"वह पुरुषश्रेष्ठ राम शीघ्र ही पृथ्वी, वैदेही सीता और लक्ष्मी — इन तीनों के साथ राज्याभिषिक्त होंगे।"

श्लोक 18 (ayodhya.44.18)

दुःखजं विसृजत्यश्रु निष्क्रामन्तमुदीक्ष्य यम्। अयोध्यायां जनः सर्वः शोकवेगसमाहतः॥ 44.18 ॥

duḥkhajaṃ visṛjatyaśru niṣkrāmantamudīkṣya yam| ayodhyāyāṃ janaḥ sarvaḥ śokavegasamāhataḥ

"जिन्हें जाते हुए देखकर अयोध्या के समस्त लोग शोक के वेग से आहत होकर दुःख के आँसू बहाने लगे..."

श्लोक 19 (ayodhya.44.19)

कुशचीरधरं वीरं गच्छन्तमपराजितम्। सीतेवानुगता लक्ष्मीस्तस्य किं नाम दुर्लभम्॥ 44.19 ॥

kuśacīradharaṃ vīraṃ gacchantamaparājitam| sītevānugatā lakṣmīstasya kiṃ nāma durlabham

"...कुश और वल्कल धारण किए हुए, उस अपराजित वीर के साथ मानो लक्ष्मी ही सीता का रूप धरकर उनका अनुसरण कर रही हैं — फिर उनके लिए दुर्लभ ही क्या है?"

श्लोक 20 (ayodhya.44.20)

धनुर्ग्रहवरो यस्य बाणखड्गास्त्रभृत् स्वयम्। लक्ष्मणो व्रजति ह्यग्रे तस्य किं नाम दुर्लभम्॥ 44.20 ॥

dhanurgrahavaro yasya bāṇakhaḍgāstrabhṛt svayam| lakṣmaṇo vrajati hyagre tasya kiṃ nāma durlabham

"जिनके आगे-आगे स्वयं धनुर्धरों में श्रेष्ठ, बाण, खड्ग और अस्त्र धारण किए हुए लक्ष्मण चल रहे हैं — उनके लिए दुर्लभ ही क्या है?"

श्लोक 21 (ayodhya.44.21)

निवृत्तवनवासं तं द्रष्टासि पुनरागतम्। जहि शोकं च मोहं च देवि सत्यं ब्रवीमि ते॥ 44.21 ॥

nivṛttavanavāsaṃ taṃ draṣṭāsi punarāgatam| jahi śokaṃ ca mohaṃ ca devi satyaṃ bravīmi te

"तुम उन्हें वनवास समाप्त कर पुनः लौटा हुआ देखोगी। हे देवि! अपना शोक और मोह त्याग दो — मैं तुमसे सत्य कह रही हूँ।"

श्लोक 22 (ayodhya.44.22)

शिरसा चरणावेतौ वन्दमानमनिन्दिते। पुनर्द्रक्ष्यसि कल्याणि पुत्रं चन्द्रमिवोदितम्॥ 44.22 ॥

śirasā caraṇāvetau vandamānamanindite| punardrakṣyasi kalyāṇi putraṃ candramivoditam

"हे अनिंदिते! हे कल्याणि! तुम अपने उस पुत्र को, जो चंद्रमा के समान उदित होकर तुम्हारे चरणों में सिर झुकाकर वंदना करेगा, पुनः देखोगी।"

श्लोक 23 (ayodhya.44.23)

पुनः प्रविष्टं दृष्ट्वा तमभिषिक्तं महाश्रियम्। समुत्स्रक्ष्यसि नेत्राभ्यां शीघ्रमानन्दजं जलम्॥ 44.23 ॥

punaḥ praviṣṭaṃ dṛṣṭvā tamabhiṣiktaṃ mahāśriyam| samutsrakṣyasi netrābhyāṃ śīghramānandajaṃ jalam

"उन्हें अभिषिक्त और महान श्री से युक्त होकर पुनः लौटा हुआ देखकर, तुम्हारी दोनों आँखों से शीघ्र ही आनंद के अश्रु बह निकलेंगे।"

श्लोक 24 (ayodhya.44.24)

मा शोको देवि दुःखं वा न रामे दृष्यतेऽशिवम्। क्षिप्रं द्रक्ष्यसि पुत्रं त्वं ससीतं सहलक्ष्मणम्॥ 44.24 ॥

mā śoko devi duḥkhaṃ vā na rāme dṛṣyate'śivam| kṣipraṃ drakṣyasi putraṃ tvaṃ sasītaṃ sahalakṣmaṇam

"हे देवि! न शोक करो, न दुःख करो; राम के विषय में कोई अशुभ लक्षण नहीं दिखता। तुम शीघ्र ही अपने पुत्र को सीता और लक्ष्मण सहित देखोगी।"

श्लोक 25 (ayodhya.44.25)

त्वयाऽशेषो जनश्चायं समाश्वास्यो यतोऽनघे। कमिदानीमिदं देवि करोषि हृदि विक्लवम्॥ 44.25 ॥

tvayā'śeṣo janaścāyaṃ samāśvāsyo yato'naghe| kamidānīmidaṃ devi karoṣi hṛdi viklavam

"हे अनघे! तुम्हें तो इस समय समस्त प्रजा को सांत्वना देनी चाहिए — फिर हे देवि! तुम अपने हृदय में यह व्याकुलता क्यों धारण किए हुए हो?"

श्लोक 26 (ayodhya.44.26)

नार्हा त्वं शोचितुं देवि यस्यास्ते राघवः सुतः। नहि रामात् परो लोके विद्यते सत्पथे स्थितः॥ 44.26 ॥

nārhā tvaṃ śocituṃ devi yasyāste rāghavaḥ sutaḥ| nahi rāmāt paro loke vidyate satpathe sthitaḥ

"हे देवि! जिसका पुत्र राघव हो, उसे शोक करने का कोई अधिकार नहीं है; क्योंकि संसार में राम से बढ़कर सत्पथ में स्थित कोई नहीं है।"

श्लोक 27 (ayodhya.44.27)

अभिवादयमानं तं दृष्ट्वा ससुहृदं सुतम्। मुदाश्रु मोक्ष्यसे क्षिप्रं मेघरेखेव वार्षिकी॥ 44.27 ॥

abhivādayamānaṃ taṃ dṛṣṭvā sasuhṛdaṃ sutam| mudāśru mokṣyase kṣipraṃ megharekheva vārṣikī

"अपने पुत्र को उसके सुहृदों सहित तुम्हें अभिवादन करते हुए देखकर, तुम शीघ्र ही वर्षा ऋतु की मेघपंक्ति के समान आनंद के अश्रु बहाओगी।"

श्लोक 28 (ayodhya.44.28)

पुत्रस्ते वरदः क्षिप्रमयोध्यां पुनरागतः। कराभ्यां मृदुपीनाभ्यां चरणौ पीडयिष्यति॥ 44.28 ॥

putraste varadaḥ kṣipramayodhyāṃ punarāgataḥ| karābhyāṃ mṛdupīnābhyāṃ caraṇau pīḍayiṣyati

"वरदाता तुम्हारा वह पुत्र शीघ्र ही अयोध्या में लौटकर अपने कोमल और पुष्ट हाथों से तुम्हारे चरण दबाएगा।"

श्लोक 29 (ayodhya.44.29)

अभिवाद्य नमस्यन्तं शूरं ससुहृदं सुतम्। मुदास्रैः प्रोक्षसे पुत्रं मेघराजिरिवाचलम्॥ 44.29 ॥

abhivādya namasyantaṃ śūraṃ sasuhṛdaṃ sutam| mudāsraiḥ prokṣase putraṃ megharājirivācalam

"अभिवादन कर प्रणाम करते हुए उस शूरवीर पुत्र को उसके मित्रों सहित देखकर, तुम उसे आनंद के अश्रुओं से इस प्रकार सींचोगी, जैसे मेघपंक्ति किसी पर्वत को सींचती है।"

श्लोक 30 (ayodhya.44.30)

आश्वासयन्ती विविधैश्च वाक्यैर्वाक्योपचारे कुशलानवद्या। रामस्य तां मातरमेवमुक्त्वा देवी सुमित्रा विरराम रामा॥ 44.30 ॥

āśvāsayantī vividhaiśca vākyairvākyopacāre kuśalānavadyā| rāmasya tāṃ mātaramevamuktvā devī sumitrā virarāma rāmā

इस प्रकार विविध वचनों से सांत्वना देती हुई, वाक्य-कौशल में निपुण और निर्दोष वह सुंदर देवी सुमित्रा, राम की माता कौसल्या से यह कहकर मौन हो गईं।

श्लोक 31 (ayodhya.44.31)

निशम्य तल्लक्ष्मणमातृवाक्यं रामस्य मातुर्नरदेवपत्न्याः। सद्यः शरीरे विननाश शोकः शरद्गतो मेघ इवाल्पतोयः॥ 44.31 ॥

niśamya tallakṣmaṇamātṛvākyaṃ rāmasya māturnaradevapatnyāḥ| sadyaḥ śarīre vinanāśa śokaḥ śaradgato megha ivālpatoyaḥ

लक्ष्मण की माता सुमित्रा के उन वचनों को सुनकर, राम की माता और नरदेव की पत्नी कौसल्या के शरीर से वह शोक उसी क्षण इस प्रकार विलीन हो गया, जैसे शरद ऋतु का अल्पजल मेघ शीघ्र ही विलीन हो जाता है।

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