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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 45

तमसा-तट पर आगमन

सर्ग 44सर्ग-सूचीसर्ग 46

श्लोक 1 (ayodhya.45.1)

अनुरक्ता महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम्। अनुजग्मुः प्रयान्तं तं वनवासाय मानवाः॥ 45.1 ॥

anuraktā mahātmānaṃ rāmaṃ satyaparākramam| anujagmuḥ prayāntaṃ taṃ vanavāsāya mānavāḥ

महात्मा और सत्यपराक्रमी राम के प्रति अनुरक्त होकर, वन में निवास के लिए प्रस्थान करते हुए उनके पीछे-पीछे प्रजा चल पड़ी।

श्लोक 2 (ayodhya.45.2)

निवर्तितेऽतीव बलात् सुहृद्धर्मेण राजनि। नैव ते संन्यवर्तन्त रामस्यानुगता रथम्॥ 45.2 ॥

nivartite'tīva balāt suhṛddharmeṇa rājani| naiva te saṃnyavartanta rāmasyānugatā ratham

यद्यपि राजा को सुहृद-धर्म के कारण बलपूर्वक ही लौटाया गया, तथापि राम के रथ का अनुसरण करने वाले वे लोग कदापि नहीं लौटे।

श्लोक 3 (ayodhya.45.3)

अयोध्यानिलयानां हि पुरुषाणां महायशाः। बभूव गुणसम्पन्नः पूर्णचन्द्र इव प्रियः॥ 45.3 ॥

ayodhyānilayānāṃ hi puruṣāṇāṃ mahāyaśāḥ| babhūva guṇasampannaḥ pūrṇacandra iva priyaḥ

क्योंकि गुणसंपन्न और महायशस्वी वे राम अयोध्यावासी पुरुषों को पूर्णचंद्र के समान प्रिय हो गए थे।

श्लोक 4 (ayodhya.45.4)

स याच्यमानः काकुत्स्थस्ताभिः प्रकृतिभिस्तदा। कुर्वाणः पितरं सत्यं वनमेवान्वपद्यत॥ 45.4 ॥

sa yācyamānaḥ kākutsthastābhiḥ prakṛtibhistadā| kurvāṇaḥ pitaraṃ satyaṃ vanamevānvapadyata

उन प्रजाजनों द्वारा याचना किए जाने पर भी काकुत्स्थ राम, अपने पिता को सत्य में स्थिर रखते हुए, वन की ओर ही बढ़ते गए।

श्लोक 5 (ayodhya.45.5)

अवेक्षमाणः सस्नेहं चक्षुषा प्रपिबन्निव। उवाच रामः सस्नेहं ताः प्रजाः स्वाः प्रजा इव॥ 45.5 ॥

avekṣamāṇaḥ sasnehaṃ cakṣuṣā prapibanniva| uvāca rāmaḥ sasnehaṃ tāḥ prajāḥ svāḥ prajā iva

उन प्रजाजनों को स्नेहपूर्वक देखते हुए, मानो नेत्रों से ही उन्हें पी रहे हों, राम ने अपनी ही संतान के समान उन प्रजाओं से स्नेहपूर्वक यह कहा।

श्लोक 6 (ayodhya.45.6)

या प्रीतिर्बहुमानश्च मय्ययोध्यानिवासिनाम्। मत्प्रियार्थं विशेषेण भरते सा विधीयताम्॥ 45.6 ॥

yā prītirbahumānaśca mayyayodhyānivāsinām| matpriyārthaṃ viśeṣeṇa bharate sā vidhīyatām

"अयोध्यावासियों का जो प्रेम और सम्मान मेरे प्रति है, वह मेरी प्रसन्नता के लिए विशेष रूप से भरत के प्रति समर्पित किया जाए।"

श्लोक 7 (ayodhya.45.7)

स हि कल्याणचारित्रः कैकेय्यानन्दवर्धनः। करिष्यति यथावद् वः प्रियाणि च हितानि च॥ 45.7 ॥

sa hi kalyāṇacāritraḥ kaikeyyānandavardhanaḥ| kariṣyati yathāvad vaḥ priyāṇi ca hitāni ca

"वह कल्याणचरित्र और कैकेयी के आनंद को बढ़ाने वाला भरत तुम्हारे लिए यथोचित रूप से प्रिय और हितकारी कार्य करेगा।"

श्लोक 8 (ayodhya.45.8)

ज्ञानवृद्धो वयोबालो मृदुर्वीर्यगुणान्वितः। अनुरूपः स वो भर्ता भविष्यति भयापहः॥ 45.8 ॥

jñānavṛddho vayobālo mṛdurvīryaguṇānvitaḥ| anurūpaḥ sa vo bhartā bhaviṣyati bhayāpahaḥ

"ज्ञान में वृद्ध किंतु वय में बालक, कोमल स्वभाव किंतु वीर्य-गुण से संपन्न, वह भरत तुम्हारे लिए उपयुक्त और भय दूर करने वाला स्वामी सिद्ध होगा।"

श्लोक 9 (ayodhya.45.9)

स हि राजगुणैर्युक्तो युवराजः समीक्षितः। अपि चापि मया शिष्टैः कार्यं वो भर्तृशासनम्॥ 45.9 ॥

sa hi rājaguṇairyukto yuvarājaḥ samīkṣitaḥ| api cāpi mayā śiṣṭaiḥ kāryaṃ vo bhartṛśāsanam

"राजोचित गुणों से संपन्न वह भरत युवराज नियुक्त किया गया है; तथा मैं भी तुम सबको, शिष्ट जनों के साथ, अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करने का निर्देश देता हूँ।"

श्लोक 10 (ayodhya.45.10)

न संतप्येद् यथा चासौ वनवासं गते मयि। महाराजस्तथा कार्यो मम प्रियचिकीर्षया॥ 45.10 ॥

na saṃtapyed yathā cāsau vanavāsaṃ gate mayi| mahārājastathā kāryo mama priyacikīrṣayā

"मेरी प्रसन्नता की इच्छा से ऐसा प्रयत्न करना कि मेरे वनवास चले जाने पर महाराज को कोई संताप न हो।"

श्लोक 11 (ayodhya.45.11)

यथा यथा दाशरथिर्धर्ममेवाश्रितो भवेत्। तथा तथा प्रकृतयो रामं पतिमकामयन्॥ 45.11 ॥

yathā yathā dāśarathirdharmamevāśrito bhavet| tathā tathā prakṛtayo rāmaṃ patimakāmayan

दाशरथि राम जैसे-जैसे धर्म का ही आश्रय लेते गए, वैसे-वैसे प्रजाजन उन्हें अपना स्वामी बनाने की कामना करते गए।

श्लोक 12 (ayodhya.45.12)

बाष्पेण पिहितं दीनं रामः सौमित्रिणा सह। चकर्षेव गुणैर्बद्धं जनं पुरनिवासिनम्॥ 45.12 ॥

bāṣpeṇa pihitaṃ dīnaṃ rāmaḥ saumitriṇā saha| cakarṣeva guṇairbaddhaṃ janaṃ puranivāsinam

राम, सौमित्रि लक्ष्मण के सहित, अश्रुओं से आच्छादित उन दीन नगरवासी जनों को इस प्रकार खींचते चले जा रहे थे, मानो वे अपने गुणों की डोरी से ही बंधे हुए हों।

श्लोक 13 (ayodhya.45.13)

ते द्विजास्त्रिविधं वृद्धा ज्ञानेन वयसौजसा। वयःप्रकम्पशिरसो दूरादूचुरिदं वचः॥ 45.13 ॥

te dvijāstrividhaṃ vṛddhā jñānena vayasaujasā| vayaḥprakampaśiraso dūrādūcuridaṃ vacaḥ

ज्ञान, वय और तेज — इन तीनों प्रकार से वृद्ध वे ब्राह्मण, जिनके शीश वृद्धावस्था से कांप रहे थे, दूर से ही यह वचन बोल उठे।

श्लोक 14 (ayodhya.45.14)

वहन्तो जवना रामं भो भो जात्यास्तुरंगमाः। निवर्तध्वं न गन्तव्यं हिता भवत भर्तरि॥ 45.14 ॥

vahanto javanā rāmaṃ bho bho jātyāsturaṃgamāḥ| nivartadhvaṃ na gantavyaṃ hitā bhavata bhartari

"अरे शीघ्रगामी और उत्तम जाति के अश्वों! जो तुम राम को ले जा रहे हो, लौट जाओ! आगे मत बढ़ो! अपने स्वामी के हितैषी बनो!"

श्लोक 15 (ayodhya.45.15)

कर्णवन्ति हि भूतानि विशेषेण तुरङ्गमाः। यूयं तस्मान्निवर्तध्वं याचनां प्रतिवेदिताः॥ 45.15 ॥

karṇavanti hi bhūtāni viśeṣeṇa turaṅgamāḥ| yūyaṃ tasmānnivartadhvaṃ yācanāṃ prativeditāḥ

"समस्त प्राणी कान वाले होते हैं, और अश्व तो विशेष रूप से; अतः हमारी इस याचना को सुनकर तुम भी लौट जाओ।"

श्लोक 16 (ayodhya.45.16)

धर्मतः स विशुद्धात्मा वीरः शुभदृढव्रतः। उपवाह्यस्तु वो भर्ता नापवाह्यः पुराद् वनम्॥ 45.16 ॥

dharmataḥ sa viśuddhātmā vīraḥ śubhadṛḍhavrataḥ| upavāhyastu vo bhartā nāpavāhyaḥ purād vanam

"धर्म से विशुद्धात्मा, शुभ और दृढ़ व्रत वाला वह वीर तुम्हारा स्वामी नगर की ओर ही ले जाने योग्य है, वन की ओर ले जाने योग्य नहीं।"

श्लोक 17 (ayodhya.45.17)

एवमार्तप्रलापांस्तान् वृद्धान् प्रलपतो द्विजान्। अवेक्ष्य सहसा रामो रथादवततार ह॥ 45.17 ॥

evamārtapralāpāṃstān vṛddhān pralapato dvijān| avekṣya sahasā rāmo rathādavatatāra ha

इस प्रकार व्याकुल होकर विलाप करते हुए उन वृद्ध ब्राह्मणों को देखकर, राम तत्काल रथ से नीचे उतर आए।

श्लोक 18 (ayodhya.45.18)

पद्भ्यामेव जगामाथ ससीतः सहलक्ष्मणः। संनिकृष्टपदन्यासो रामो वनपरायणः॥ 45.18 ॥

padbhyāmeva jagāmātha sasītaḥ sahalakṣmaṇaḥ| saṃnikṛṣṭapadanyāso rāmo vanaparāyaṇaḥ

तब सीता और लक्ष्मण सहित, वन की ओर उन्मुख राम पैदल ही चलने लगे, और अपने पग उनके समान संकुचित कर लिए।

श्लोक 19 (ayodhya.45.19)

द्विजातीन् हि पदातींस्तान् रामश्चारित्रवत्सलः। न शशाक घृणाचक्षुः परिमोक्तुं रथेन सः॥ 45.19 ॥

dvijātīn hi padātīṃstān rāmaścāritravatsalaḥ| na śaśāka ghṛṇācakṣuḥ parimoktuṃ rathena saḥ

क्योंकि चरित्र-वत्सल और करुणादृष्टि वाले राम उन पैदल चलते हुए ब्राह्मणों को रथ पर आगे बढ़कर छोड़ जाने में समर्थ न हो सके।

श्लोक 20 (ayodhya.45.20)

गच्छन्तमेव तं दृष्ट्वा रामं सम्भ्रान्तमानसाः। ऊचुः परमसंतप्ता रामं वाक्यमिदं द्विजाः॥ 45.20 ॥

gacchantameva taṃ dṛṣṭvā rāmaṃ sambhrāntamānasāḥ| ūcuḥ paramasaṃtaptā rāmaṃ vākyamidaṃ dvijāḥ

राम को इस प्रकार आगे बढ़ते हुए देखकर, व्याकुलचित्त और अत्यंत संतप्त हुए वे ब्राह्मण राम से यह वचन बोले।

श्लोक 21 (ayodhya.45.21)

ब्राह्मण्यं कृत्स्नमेतत् त्वां ब्रह्मण्यमनुगच्छति। द्विजस्कन्धाधिरूढास्त्वामग्नयोऽप्यनुयान्त्वमी॥ 45.21 ॥

brāhmaṇyaṃ kṛtsnametat tvāṃ brahmaṇyamanugacchati| dvijaskandhādhirūḍhāstvāmagnayo'pyanuyāntvamī

"यह समस्त ब्राह्मण-समुदाय तुम्हारा अनुसरण कर रहा है, हे ब्रह्मण्यदेव! और द्विजों के कंधों पर आरूढ़ ये अग्नियाँ भी तुम्हारे पीछे-पीछे चल रही हैं।"

श्लोक 22 (ayodhya.45.22)

वाजपेयसमुत्थानि च्छत्राण्येतानि पश्य नः। पृष्ठतोऽनुप्रयातानि मेघानिव जलात्यये॥ 45.22 ॥

vājapeyasamutthāni cchatrāṇyetāni paśya naḥ| pṛṣṭhato'nuprayātāni meghāniva jalātyaye

"देखो, वाजपेय यज्ञ से प्राप्त हमारे ये छत्र, वर्षा ऋतु के अंत में मेघों के समान हमारे पीछे-पीछे चल रहे हैं।"

श्लोक 23 (ayodhya.45.23)

अनवाप्तातपत्रस्य रश्मिसंतापितस्य ते। एभिश्छायां करिष्यामः स्वैश्छत्रैर्वाजपेयकैः॥ 45.23 ॥

anavāptātapatrasya raśmisaṃtāpitasya te| ebhiśchāyāṃ kariṣyāmaḥ svaiśchatrairvājapeyakaiḥ

"जिसे कोई छत्र प्राप्त नहीं है और जो सूर्य की किरणों से संतप्त हो रहा है, ऐसे तुम्हें हम अपने इन वाजपेय-छत्रों से छाया प्रदान करेंगे।"

श्लोक 24 (ayodhya.45.24)

या हि नः सततं बुद्धिर्वेदमन्त्रानुसारिणी। त्वत्कृते सा कृता वत्स वनवासानुसारिणी॥ 45.24 ॥

yā hi naḥ satataṃ buddhirvedamantrānusāriṇī| tvatkṛte sā kṛtā vatsa vanavāsānusāriṇī

"हे वत्स! जो हमारी बुद्धि सदा वेदमंत्रों का अनुसरण करती थी, वह अब तुम्हारे लिए वनवास का ही अनुसरण करने लगी है।"

श्लोक 25 (ayodhya.45.25)

हृदयेष्ववतिष्ठन्ते वेदा ये नः परं धनम्। वत्स्यन्त्यपि गृहेष्वेव दाराश्चारित्ररक्षिताः॥ 45.25 ॥

hṛdayeṣvavatiṣṭhante vedā ye naḥ paraṃ dhanam| vatsyantyapi gṛheṣveva dārāścāritrarakṣitāḥ

"हमारा परम धन वेद तो हमारे हृदयों में ही निवास करता है, और हमारी पत्नियाँ भी अपने चरित्र से सुरक्षित होकर घर में ही रह सकेंगी।"

श्लोक 26 (ayodhya.45.26)

पुनर्न निश्चयः कार्यस्त्वद्गतौ सुकृता मतिः। त्वयि धर्मव्यपेक्षे तु किं स्याद् धर्मपथे स्थितम्॥ 45.26 ॥

punarna niścayaḥ kāryastvadgatau sukṛtā matiḥ| tvayi dharmavyapekṣe tu kiṃ syād dharmapathe sthitam

"तुम्हारे साथ चलने का यह हमारा सुदृढ़ निश्चय अब पुनर्विचार योग्य नहीं है। किंतु यदि तुम धर्म का ही आग्रह रखते हो, तो फिर धर्मपथ पर स्थित क्या रह जाएगा?"

श्लोक 27 (ayodhya.45.27)

याचितो नो निवर्तस्व हंसशुक्लशिरोरुहैः। शिरोभिर्निभृताचार महीपतनपांसुलैः॥ 45.27 ॥

yācito no nivartasva haṃsaśuklaśiroruhaiḥ| śirobhirnibhṛtācāra mahīpatanapāṃsulaiḥ

"हे स्थिरचरित्र! हंस के समान श्वेत केशों वाले और पृथ्वी पर गिरने से धूलि-धूसरित हुए हमारे इन शीशों की शपथ देकर हम याचना करते हैं — तुम लौट आओ।"

श्लोक 28 (ayodhya.45.28)

बहूनां वितता यज्ञा द्विजानां य इहागताः। तेषां समाप्तिरायत्ता तव वत्स निवर्तने॥ 45.28 ॥

bahūnāṃ vitatā yajñā dvijānāṃ ya ihāgatāḥ| teṣāṃ samāptirāyattā tava vatsa nivartane

"यहाँ आए हुए बहुत से ब्राह्मणों के आरंभ किए गए यज्ञ अभी अधूरे पड़े हैं; हे वत्स! उनकी समाप्ति तुम्हारे लौट आने पर ही निर्भर है।"

श्लोक 29 (ayodhya.45.29)

भक्तिमन्तीह भूतानि जङ्गमाजङ्गमानि च। याचमानेषु तेषु त्वं भक्तिं भक्तेषु दर्शय॥ 45.29 ॥

bhaktimantīha bhūtāni jaṅgamājaṅgamāni ca| yācamāneṣu teṣu tvaṃ bhaktiṃ bhakteṣu darśaya

"यहाँ के चराचर समस्त प्राणी तुम्हारे भक्त हैं; याचना करते हुए इन भक्तों के प्रति तुम भी अपनी भक्ति दर्शाओ।"

श्लोक 30 (ayodhya.45.30)

अनुगन्तुमशक्तास्त्वां मूलैरुद्धतवेगिनः। उन्नता वायुवेगेन विक्रोशन्तीव पादपाः॥ 45.30 ॥

anugantumaśaktāstvāṃ mūlairuddhataveginaḥ| unnatā vāyuvegena vikrośantīva pādapāḥ

"अपनी जड़ों से बंधे होने के कारण तुम्हारा अनुसरण करने में असमर्थ वे वृक्ष, प्रचंड वायु के वेग से झुककर मानो चीत्कार कर रहे हों।"

श्लोक 31 (ayodhya.45.31)

निश्चेष्टाहारसंचारा वृक्षैकस्थाननिश्चिताः। पक्षिणोऽपि प्रयाचन्ते सर्वभूतानुकम्पिनम्॥ 45.31 ॥

niśceṣṭāhārasaṃcārā vṛkṣaikasthānaniścitāḥ| pakṣiṇo'pi prayācante sarvabhūtānukampinam

"अपने आहार-संचार से रहित होकर वृक्षों पर एक ही स्थान में स्थिर बैठे हुए पक्षी भी, हे सर्वभूतानुकंपी! तुमसे प्रार्थना कर रहे हैं।"

श्लोक 32 (ayodhya.45.32)

एवं विक्रोशतां तेषां द्विजातीनां निवर्तने। ददृशे तमसा तत्र वारयन्तीव राघवम्॥ 45.32 ॥

evaṃ vikrośatāṃ teṣāṃ dvijātīnāṃ nivartane| dadṛśe tamasā tatra vārayantīva rāghavam

इस प्रकार उन ब्राह्मणों के लौट आने के लिए चिल्लाते रहने पर भी, वहाँ तमसा नदी प्रकट हुई, मानो वह स्वयं राघव को रोक रही हो।

श्लोक 33 (ayodhya.45.33)

ततः सुमन्त्रोऽपि रथाद् विमुच्य श्रान्तान् हयान् सम्परिवर्त्य शीघ्रम्। पीतोदकांस्तोयपरिप्लुताङ्गानचारयद् वै तमसाविदूरे॥ 45.33 ॥

tataḥ sumantro'pi rathād vimucya śrāntān hayān samparivartya śīghram| pītodakāṃstoyapariplutāṅgānacārayad vai tamasāvidūre

तत्पश्चात् सुमंत्र ने भी थके हुए घोड़ों को रथ से मुक्त कर, उन्हें शीघ्र ही लोटनी करवाकर, जल पिलाकर और उनके अंगों को स्नान कराकर, तमसा के निकट ही चरने के लिए छोड़ दिया।

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