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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 74

सुरभि के शोक की कथा

सर्ग 73सर्ग-सूचीसर्ग 75

श्लोक 1 (ayodhya.74.1)

तां तथा गर्हयित्वा तु मातरं भरतस्तदा। रोषेण महताविष्टः पुनरेवाब्रवीद्वचः॥ 74.1 ॥

tāṃ tathā garhayitvā tu mātaraṃ bharatas tadā| roṣeṇa mahatāviṣṭaḥ punar evābravīd vacaḥ

अपनी माता को इस प्रकार धिक्कारने के बाद, भरत ने महान क्रोध से भरकर फिर से यह वचन कहा।

श्लोक 2 (ayodhya.74.2)

राज्याद्भ्रंशस्व कैकेयि नृशंसे दुष्टचारिणि। परित्यक्ता च धर्मेण मां मृतं रुदती भव॥ 74.2 ॥

rājyād bhraṃśasva kaikeyi nṛśaṃse duṣṭacāriṇi| parityaktā ca dharmeṇa māṃ mṛtaṃ rudatī bhava

हे क्रूर और दुराचारिणी कैकेयी! तू इस राज्य से वंचित हो जा। धर्म से त्यागी हुई तू, मेरे मर जाने पर मेरे लिए रोती रहना।

श्लोक 3 (ayodhya.74.3)

किं नु तेऽदूषयद्राजा रामो वा भृशधार्मिकः। ययोर्मृत्युर्विवासश्च त्वत्कृते तुल्यमागतौ॥ 74.3 ॥

kiṃ nu te'dūṣayad rājā rāmo vā bhṛśadhārmikaḥ| yayor mṛtyur vivāsaś ca tvatkṛte tulyam āgatau

भला राजा ने या अत्यंत धार्मिक राम ने तेरा क्या बिगाड़ा था, कि तेरे ही कारण एक साथ मृत्यु और निर्वासन, दोनों आ पड़े?

श्लोक 4 (ayodhya.74.4)

भ्रूणहत्यामसि प्राप्ता कुलस्यास्य विनाशनात्। कैकेयि नरकं गच्छ मा च भर्तुः सलोकताम्॥ 74.4 ॥

bhrūṇahatyām asi prāptā kulasyāsya vināśanāt| kaikeyi narakaṃ gaccha mā ca bhartuḥ salokatām

इस कुल के विनाश के कारण तूने भ्रूणहत्या का पाप अर्जित किया है। हे कैकेयी, नरक को जा, और तुझे अपने पति के लोक में स्थान कभी न मिले।

श्लोक 5 (ayodhya.74.5)

यत्त्वया हीदृशं पापं कृतं घोरेण कर्मणा। सर्वलोकप्रियं हित्वा ममाप्यापादितं भयम्॥ 74.5 ॥

yat tvayā hīdṛśaṃ pāpaṃ kṛtaṃ ghoreṇa karmaṇā| sarvalokapriyaṃ hitvā mamāpy āpāditaṃ bhayam

इस भयंकर कृत्य से तूने ऐसा घोर पाप किया है कि, सबके प्रिय राम को त्यागकर, तूने मुझमें भी भय उत्पन्न कर दिया है।

श्लोक 6 (ayodhya.74.6)

त्वत्कृते मे पिता वृत्तो रामश्चारण्यमाश्रितः। अयशो जीवलोके च त्वयाहं प्रतिपादितः॥ 74.6 ॥

tvatkṛte me pitā vṛtto rāmaś cāraṇyam āśritaḥ| ayaśo jīvaloke ca tvayāhaṃ pratipāditaḥ

तेरे ही कारण मेरे पिता का निधन हुआ और राम वन में चले गए। तूने मुझे भी इस जगत में अपयश दिला दिया है।

श्लोक 7 (ayodhya.74.7)

मातृरूपे ममामित्रे नृशंसे राज्यकामुके। न तेऽहमभिभाष्योऽस्मि दुर्वृत्ते पतिघातिनि॥ 74.7 ॥

mātṛrūpe mamāmitre nṛśaṃse rājyakāmuke| na te'ham abhibhāṣyo'smi durvṛtte patighātini

हे मेरी माता के रूप में मेरी शत्रु, क्रूर और राज्य-लोभी! हे दुराचारिणी, पति-घातिनी! मुझे तुझसे कोई बात नहीं करनी चाहिए थी।

श्लोक 8 (ayodhya.74.8)

कौसल्या च सुमित्रा च याश्चान्या मम मातरः। दुःखेन महताविष्टास्त्वां प्राप्य कुलदूषिणीम्॥ 74.8 ॥

kausalyā ca sumitrā ca yāś cānyā mama mātaraḥ| duḥkhena mahatāviṣṭās tvāṃ prāpya kuladūṣiṇīm

कौसल्या, सुमित्रा और मेरी अन्य सभी माताएँ, तुझ कुल-कलंकिनी को पाकर, महान दुःख में डूब गई हैं।

श्लोक 9 (ayodhya.74.9)

न त्वमश्वपतेः कन्या धर्मराजस्य धीमतः। राक्षसी तत्र जातासि कुलप्रध्वंसिनी पितुः॥ 74.9 ॥

na tvam aśvapateḥ kanyā dharmarājasya dhīmataḥ| rākṣasī tatra jātāsi kulapradhvaṃsinī pituḥ

तू उस बुद्धिमान धर्मराज अश्वपति की पुत्री नहीं हो सकती। तू वहाँ मेरे पिता के कुल का विनाश करने के लिए एक राक्षसी के रूप में जन्मी है।

श्लोक 10 (ayodhya.74.10)

यत्त्वया धार्मिको रामो नित्यं सत्यपरायणः। वनं प्रस्थापितो दुःखात्पिता च त्रिदिवं गतः॥ 74.10 ॥

yat tvayā dhārmiko rāmo nityaṃ satyaparāyaṇaḥ| vanaṃ prasthāpito duḥkhāt pitā ca tridivaṃ gataḥ

क्योंकि तूने ही धर्मात्मा और सदा सत्यनिष्ठ राम को वन में भेजा, और उसी दुःख से मेरे पिता स्वर्गलोक चले गए।

श्लोक 11 (ayodhya.74.11)

यत्प्रधानासि तत्पापं मयि पित्रा विना कृते। भ्रातृभ्यां च परित्यक्ते सर्वलोकस्य चाप्रिये॥ 74.11 ॥

yat pradhānāsi tat pāpaṃ mayi pitrā vinā kṛte| bhrātṛbhyāṃ ca parityakte sarvalokasya cāpriye

उस पाप का मूल कारण तू ही है, जिसने मुझे पिता से वंचित कर दिया, अपने दोनों भाइयों से बिछोड़ दिया, और सारी प्रजा की दृष्टि में अप्रिय बना दिया।

श्लोक 12 (ayodhya.74.12)

कौसल्यां धर्मसंयुक्तां वियुक्तां पापनिश्चये। कृत्वा कं प्राप्स्यसे त्वद्य लोकं निरयगामिनि॥ 74.12 ॥

kausalyāṃ dharmasaṃyuktāṃ viyuktāṃ pāpaniścaye| kṛtvā kaṃ prāpsyase tvadya lokaṃ nirayagāmini

हे पापनिश्चया! धर्मपरायण कौसल्या को उनके पुत्र से वंचित करके, तू अब कौन-सा लोक पाएगी, हे नरकगामिनी?

श्लोक 13 (ayodhya.74.13)

किं नावबुध्यसे क्रूरे नियतं बन्धुसंश्रयम्। ज्येष्ठं पितृसमं रामं कौसल्यायात्मसंभवम्॥ 74.13 ॥

kiṃ nāvabudhyase krūre niyataṃ bandhusaṃśrayam| jyeṣṭhaṃ pitṛsamaṃ rāmaṃ kausalyāyātmasaṃbhavam

हे क्रूर! क्या तुझे यह ज्ञात नहीं कि कौसल्या से उत्पन्न, आत्मसंयमी, ज्येष्ठ और पिता-तुल्य राम अपने बंधुओं के लिए सदा आश्रयदाता रहे हैं?

श्लोक 14 (ayodhya.74.14)

अङ्गप्रत्यङ्गजः पुत्रो हृदयाच्चापि जायते। तस्मात्प्रियतरो मातुः प्रियत्वान्न तु बान्धवः॥ 74.14 ॥

aṅgapratyaṅgajaḥ putro hṛdayāc cāpi jāyate| tasmāt priyataro mātuḥ priyatvān na tu bāndhavaḥ

पुत्र माँ के अंग-प्रत्यंग से ही नहीं, उसके हृदय से भी जन्म लेता है; इसीलिए वह माँ को सबसे अधिक प्रिय होता है, अन्य बंधु उतने प्रिय नहीं होते।

श्लोक 15 (ayodhya.74.15)

अन्यदा किल धर्मज्ञा सुरभिः सुरसम्मता। वहमानौ ददर्शोर्व्यां पुत्रौ विगतचेतसौ॥ 74.15 ॥

anyadā kila dharmajñā surabhiḥ surasammatā| vahamānau dadarśorvyāṃ putrau vigatacetasau

कहते हैं, एक समय धर्म को जानने वाली और देवताओं द्वारा पूजित सुरभि गौ ने पृथ्वी पर अपने दोनों पुत्रों को भार ढोते हुए, चेतनाशून्य-से देखा था।

श्लोक 16 (ayodhya.74.16)

तावर्धदिवसे श्रान्तौ दृष्ट्वा पुत्रौ महीतले। रुरोद पुत्रशोकेन बाष्पपर्याकुलीक्षणा॥ 74.16 ॥

tāv ardhadivase śrāntau dṛṣṭvā putrau mahītale| ruroda putraśokena bāṣpaparyākulīkṣaṇā

दिन के आधे भाग में ही थके हुए अपने दोनों पुत्रों को धरती पर देखकर, पुत्र-शोक से व्याकुल और अश्रुपूर्ण नेत्रों वाली वह गौ रो पड़ी।

श्लोक 17 (ayodhya.74.17)

अधस्ताद्व्रजतस्तस्याः सुरराज्ञो महात्मनः। बिन्दवः पतिता गात्रे सूक्ष्माः सुरभिगन्धिनः॥ 74.17 ॥

adhastād vrajatas tasyāḥ surarājño mahātmanaḥ| bindavaḥ patitā gātre sūkṣmāḥ surabhigandhinaḥ

नीचे की ओर विचरण करते हुए उन महात्मा देवराज इंद्र के शरीर पर उस सुरभि की सूक्ष्म, सुगंधित अश्रु-बूँदें जा गिरीं।

श्लोक 18 (ayodhya.74.18)

इन्द्रोऽप्यश्रुनिपातं तं स्वगात्रे पुण्यगन्धिनम्। सुरभिं मन्यते दृष्ट्वा भूयसीं तां सुरेश्वरः॥ 74.18 ॥

indro'py aśrunipātaṃ taṃ svagātre puṇyagandhinam| surabhiṃ manyate dṛṣṭvā bhūyasīṃ tāṃ sureśvaraḥ

अपने शरीर पर गिरी उन पवित्र-सुगंध वाली अश्रु-बूँदों को देखकर, देवेश्वर इंद्र ने समझा कि यह उस महान सुरभि गौ की वर्षा है।

श्लोक 19 (ayodhya.74.19)

निरीक्षमाणः शक्रस्तां ददर्श सुरभिं स्थिताम्। आकाशे विष्ठितां दीनां रुदतीं भृशदुःखिताम्॥ 74.19 ॥

nirīkṣamāṇaḥ śakras tāṃ dadarśa surabhiṃ sthitām| ākāśe viṣṭhitāṃ dīnāṃ rudatīṃ bhṛśaduḥkhitām

ऊपर देखने पर शक्र को आकाश में खड़ी वह सुरभि दिखाई दी — दीन, अत्यंत दुःखी और रोती हुई।

श्लोक 20 (ayodhya.74.20)

तां दृष्ट्वा शोकसंतप्तां वज्रपाणिर्यशस्विनीम्। इन्द्रः प्राञ्जलिरुद्विग्नः सुरराजोऽब्रवीद्वचः॥ 74.20 ॥

tāṃ dṛṣṭvā śokasaṃtaptāṃ vajrapāṇir yaśasvinīm| indraḥ prāñjalir udvignaḥ surarājo'bravīd vacaḥ

शोक से संतप्त उस यशस्विनी सुरभि को देखकर, वज्रधारी देवराज इंद्र व्याकुल होकर हाथ जोड़कर यह वचन बोले।

श्लोक 21 (ayodhya.74.21)

भयं कच्चिन्न चास्मासु कुतश्चिद्विद्यते महत्। कुतोनिमित्तः शोकस्ते ब्रूहि सर्वहितैषिणि॥ 74.21 ॥

bhayaṃ kaccin na cāsmāsu kutaścid vidyate mahat| kutonimittaḥ śokas te brūhi sarvahitaiṣiṇi

"हे सर्वहितैषिणी! आशा है हम पर किसी ओर से कोई बड़ा संकट नहीं है? बताओ, तुम्हारे इस शोक का कारण क्या है?"

श्लोक 22 (ayodhya.74.22)

एवमुक्ता तु सुरभिः सुरराजेन धीमता। प्रत्युवाच ततो धीरा वाक्यं वाक्यविशारदा॥ 74.22 ॥

evam uktā tu surabhiḥ surarājena dhīmatā| pratyuvāca tato dhīrā vākyaṃ vākyaviśāradā

बुद्धिमान देवराज इंद्र द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर, वाणी-कुशल और धीर सुरभि ने यह उत्तर दिया।

श्लोक 23 (ayodhya.74.23)

शान्तं पापं न वः किंचित्कुतश्चिदमराधिप। अहं तु मग्ना शोचामि स्वपुत्रौ विषमे स्थितौ॥ 74.23 ॥

śāntaṃ pāpaṃ na vaḥ kiṃcit kutaścid amarādhipa| ahaṃ tu magnā śocāmi svaputrau viṣame sthitau

"हे अमराधिप! शांति हो, आप पर किसी प्रकार का कोई संकट नहीं है। मैं तो अपने ही दोनों पुत्रों को कष्ट में देखकर शोकमग्न होकर रो रही हूँ,

श्लोक 24 (ayodhya.74.24)

एतौ दृष्ट्वा कृशौ दीनौ सूर्यरश्मिप्रतापितौ। अर्द्यमानौ बलीवर्दौ कर्षकेण सुराधिप॥ 74.24 ॥

etau dṛṣṭvā kṛśau dīnau sūryaraśmipratāpitau| ardyamānau balīvardau karṣakeṇa surādhipa

इन दोनों दुर्बल और दीन बैलों को देखकर, जो सूर्य की किरणों से झुलस रहे हैं और हलवाहे द्वारा पीड़ित किए जा रहे हैं, हे देवाधिप!

श्लोक 25 (ayodhya.74.25)

मम कायात्प्रसूतौ हि दुःखितौ भारपीडितौ। यौ दृष्ट्वा परितप्येऽहं नास्ति पुत्रसमः प्रियः॥ 74.25 ॥

mama kāyāt prasūtau hi duḥkhitau bhārapīḍitau| yau dṛṣṭvā paritapye'haṃ nāsti putrasamaḥ priyaḥ

वे मेरे ही शरीर से जन्मे हैं, भार से पीड़ित और दुःखी हैं; उन्हें देखकर मैं संतप्त हो उठती हूँ — पुत्र के समान प्रिय और कोई नहीं होता।"

श्लोक 26 (ayodhya.74.26)

यस्याः पुत्रसहस्त्रैस्तु कृत्स्नं व्याप्तमिदं जगत्। तां दृष्ट्वा रुदतीं शक्रो न सुतान्मन्यते परम्॥ 74.26 ॥

yasyāḥ putrasahastrais tu kṛtsnaṃ vyāptam idaṃ jagat| tāṃ dṛṣṭvā rudatīṃ śakro na sutān manyate param

जिस सुरभि के हज़ारों पुत्रों से यह संपूर्ण जगत व्याप्त है, उसी को रोते देखकर इंद्र को यह समझ आया कि पुत्र से बढ़कर कुछ भी नहीं होता।

श्लोक 27 (ayodhya.74.27)

सदाऽप्रतिमवृत्ताया लोकधारणकाम्यया। श्रीमत्या गुणनित्यायाः स्वभावपरिचेष्टया॥ 74.27 ॥

sadā'pratimavṛttāyā lokadhāraṇakāmyayā| śrīmatyā guṇanityāyāḥ svabhāvapariceṣṭayā

सदा अद्वितीय आचरण वाली, लोक-धारण की इच्छा रखने वाली, श्रीसंपन्न, सद्गुणों में सदा स्थित और अपने स्वभाव से ही ऐसा करने वाली उस सुरभि को,

श्लोक 28 (ayodhya.74.28)

यस्याः पुत्रसहस्राणि सापि शोचति कामधुक्। किं पुनर्या विना रामं कौसल्या वर्तयिष्यति॥ 74.28 ॥

yasyāḥ putrasahasrāṇi sāpi śocati kāmadhuk| kiṃ punar yā vinā rāmaṃ kausalyā vartayiṣyati

जिसके सहस्रों पुत्र हैं, वह कामधेनु भी इतना शोक करती है — तो फिर कौसल्या, जिनका एकमात्र पुत्र राम ही है, उसके बिना कैसे जीवित रहेंगी?

श्लोक 29 (ayodhya.74.29)

एकपुत्रा च साध्वी च विवत्सेयं त्वया कृता। तस्मात्त्वं सततं दुःखं प्रेत्य चेह च लप्स्यसे॥ 74.29 ॥

ekaputrā ca sādhvī ca vivatseyaṃ tvayā kṛtā| tasmāt tvaṃ satataṃ duḥkhaṃ pretya ceha ca lapsyase

एक ही पुत्र वाली उस साध्वी कौसल्या को तूने पुत्रहीन बना दिया है। इसलिए तुझे इस लोक में और परलोक में भी सदा दुःख ही मिलेगा।

श्लोक 30 (ayodhya.74.30)

अहं ह्यपचितिं भ्रातुः पितुश्च सकलामिमाम्। वर्धनं यशसश्चापि करिष्यामि न संशयः॥ 74.30 ॥

ahaṃ hy apacitiṃ bhrātuḥ pituś ca sakalām imām| vardhanaṃ yaśasaś cāpi kariṣyāmi na saṃśayaḥ

निःसंदेह, मैं ही अपने भाई और पिता का यह संपूर्ण ऋण चुकाऊँगा और उनके यश की वृद्धि करूँगा।

श्लोक 31 (ayodhya.74.31)

आनाययित्वा तनयं कौसल्याया महाद्युतिम्। स्वयमेव प्रवेक्ष्यामि वनं मुनिनिषेवितम्॥ 74.31 ॥

ānāyayitvā tanayaṃ kausalyāyā mahādyutim| svayam eva pravekṣyāmi vanaṃ muniniṣevitam

कौसल्या के महातेजस्वी पुत्र को वापस लाकर, मैं स्वयं ही मुनियों से सेवित उस वन में प्रवेश करूँगा।

श्लोक 32 (ayodhya.74.32)

न ह्यहं पापसंकल्पे पापे पापं त्वया कृतम्। शक्तो धारयितुं पौरैरश्रुकण्ठैर्निरीक्षितः॥ 74.32 ॥

na hy ahaṃ pāpasaṃkalpe pāpe pāpaṃ tvayā kṛtam| śakto dhārayituṃ paurair aśrukaṇṭhair nirīkṣitaḥ

हे पापिनी, पाप-संकल्प वाली! जब नगरवासी अश्रुपूर्ण कंठ से मुझे देखते हैं, तब मैं तेरे किए इस पाप को सहन करने में समर्थ नहीं हूँ।

श्लोक 33 (ayodhya.74.33)

सा त्वमग्निं प्रविश वा स्वयं वा दण्डकान्विश। रज्जुं बधान वा कण्ठे न हि तेऽन्यत्परायणम्॥ 74.33 ॥

sā tvam agniṃ praviśa vā svayaṃ vā daṇḍakān viśa| rajjuṃ badhāna vā kaṇṭhe na hi te'nyat parāyaṇam

अतः तू या तो अग्नि में प्रवेश कर, या स्वयं दण्डकवन में चली जा, या अपने गले में रस्सी बाँध ले — इसके सिवा तेरे लिए और कोई मार्ग नहीं है।

श्लोक 34 (ayodhya.74.34)

अहमप्यवनिं प्राप्ते रामे सत्यपराक्रमे। कृतकृत्यो भविष्यामि विप्रवासितकल्मषः॥ 74.34 ॥

aham apy avaniṃ prāpte rāme satyaparākrame| kṛtakṛtyo bhaviṣyāmi vipravāsitakalmaṣaḥ

जब सत्यपराक्रमी राम इस राज्य को पुनः प्राप्त कर लेंगे, तब मैं भी अपने पापों से मुक्त होकर कृतकृत्य हो जाऊँगा।

श्लोक 35 (ayodhya.74.35)

इति नाग इवारण्ये तोमराङ्कुशचोदितः। पपात भुवि संक्रुद्धो निःश्वसन्निव पन्नगः॥ 74.35 ॥

iti nāga ivāraṇye tomarāṅkuśacoditaḥ| papāta bhuvi saṃkruddho niḥśvasann iva pannagaḥ

इतना कहकर, वन में भाले और अंकुश से घायल किए गए हाथी के समान, वह क्रोध से भरा हुआ भरत, फुफकारते हुए सर्प की भाँति धरती पर गिर पड़ा।

श्लोक 36 (ayodhya.74.36)

संरक्तनेत्रः शिथिलाम्बरस्तदा विधूतसर्वाभरणः परंतपः। बभूव भूमौ पतितो नृपात्मजः शचीपतेः केतुरिवोत्सवक्षये॥ 74.36 ॥

saṃraktanetraḥ śithilāmbaras tadā vidhūtasarvābharaṇaḥ paraṃtapaḥ| babhūva bhūmau patito nṛpātmajaḥ śacīpateḥ ketur ivotsavakṣaye

उसकी आँखें लाल हो गईं, वस्त्र ढीले पड़ गए, सारे आभूषण बिखर गए — वह शत्रुतापन भरत, धरती पर गिरा हुआ, ऐसा प्रतीत हुआ मानो उत्सव समाप्त होने पर उतारा गया इंद्र-ध्वज हो।

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