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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 75

भरत का शाप और कौसल्या का शोक

सर्ग 74सर्ग-सूचीसर्ग 76

श्लोक 1 (ayodhya.75.1)

दीर्घकालात्समुत्थाय संज्ञां लब्ध्वा च वीर्यवान्। नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां दीनामुद्वीक्ष्य मातरम्॥ 75.1 ॥

dīrghakālāt samutthāya saṃjñāṃ labdhvā ca vīryavān| netrābhyām aśrupūrṇābhyāṃ dīnām udvīkṣya mātaram

बहुत देर बाद उठकर और होश में आकर, वीर्यवान भरत ने अपनी माता को अश्रुपूर्ण, दीन नेत्रों से देखा,

श्लोक 2 (ayodhya.75.2)

सोऽमात्यमध्ये भरतो जननीमभ्यकुत्सयत्। राज्यं न कामये जातु मन्त्रये नापि मातरम्॥ 75.2 ॥

so'mātyamadhye bharato jananīm abhyakutsayat| rājyaṃ na kāmaye jātu mantraye nāpi mātaram

भरत ने मंत्रियों के बीच अपनी माता को धिक्कारते हुए कहा, "मैंने कभी राज्य की कामना नहीं की, और न ही इस विषय में अपनी माता से कोई सलाह ली।

श्लोक 3 (ayodhya.75.3)

अभिषेकं न जानामि योऽभूद्राज्ञा समीक्षितः। विप्रकृष्टे ह्यहं देशे शत्रुघ्नसहितोऽवसम्॥ 75.3 ॥

abhiṣekaṃ na jānāmi yo'bhūd rājñā samīkṣitaḥ| viprakṛṣṭe hy ahaṃ deśe śatrughnasahito'vasam

मुझे उस अभिषेक का भी कुछ पता नहीं जिसकी योजना राजा ने बनाई थी, क्योंकि मैं तो शत्रुघ्न के साथ दूर देश में रह रहा था।

श्लोक 4 (ayodhya.75.4)

वनवासं न जानामि रामस्याहं महात्मनः। विवासनं वा सौमित्रेः सीतायाश्च यथाभवत्॥ 75.4 ॥

vanavāsaṃ na jānāmi rāmasyāhaṃ mahātmanaḥ| vivāsanaṃ vā saumitreḥ sītāyāś ca yathābhavat

मुझे यह भी नहीं पता था कि महात्मा राम को वनवास कैसे हुआ, और लक्ष्मण तथा सीता का निर्वासन किस प्रकार हुआ।"

श्लोक 5 (ayodhya.75.5)

तथैव क्रोशतस्तस्य भरतस्य महात्मनः। कौसल्या शब्दमाज्ञाय सुमित्रामिदमब्रवीत्॥ 75.5 ॥

tathaiva krośatas tasya bharatasya mahātmanaḥ| kausalyā śabdam ājñāya sumitrām idam abravīt

इस प्रकार पुकारते हुए उस महात्मा भरत का स्वर पहचानकर, कौसल्या ने सुमित्रा से यह कहा।

श्लोक 6 (ayodhya.75.6)

आगतः क्रूरकार्यायाः कैकेय्या भरतः सुतः। तमहं द्रष्टुमिच्छामि भरतं दीर्घदर्शिनम्॥ 75.6 ॥

āgataḥ krūrakāryāyāḥ kaikeyyā bharataḥ sutaḥ| tam ahaṃ draṣṭum icchāmi bharataṃ dīrghadarśinam

"उस क्रूर-कर्मा कैकेयी का पुत्र भरत आ पहुँचा है। मैं उस दूरदर्शी भरत को देखना चाहती हूँ।"

श्लोक 7 (ayodhya.75.7)

एवमुक्त्वा सुमित्रां सा विवर्णा मलिनांबरा। प्रतस्थे भरतो यत्र वेपमाना विचेतना॥ 75.7 ॥

evam uktvā sumitrāṃ sā vivarṇā malināṃbarā| pratasthe bharato yatra vepamānā vicetanā

सुमित्रा से यह कहकर, वर्णहीन और मलिन वस्त्रों वाली कौसल्या, कांपती और उद्विग्न होकर, वहाँ चल पड़ी जहाँ भरत था।

श्लोक 8 (ayodhya.75.8)

स तु रामानुजश्चापि शत्रुघ्नसहितस्तदा। प्रतस्थे भरतो यत्र कौसल्याया निवेशनम्॥ 75.8 ॥

sa tu rāmānujaś cāpi śatrughnasahitas tadā| pratasthe bharato yatra kausalyāyā niveśanam

उधर राम का वह अनुज भरत भी, शत्रुघ्न सहित, कौसल्या के भवन की ओर चल पड़ा।

श्लोक 9 (ayodhya.75.9)

ततः शत्रुघ्नभरतौ कौसल्यां प्रेक्ष्य दुःखितौ। पर्यष्वजेतां दुःखार्तां पतितां नष्टचेतनाम्॥ 75.9 ॥

tataḥ śatrughnabharatau kausalyāṃ prekṣya duḥkhitau| paryaṣvajetāṃ duḥkhārtāṃ patitāṃ naṣṭacetanām

तब कौसल्या को इस प्रकार देखकर शत्रुघ्न और भरत दोनों दुःखी हो उठे, और दुःख से पीड़ित, गिर पड़ी, चेतना खो चुकी उस कौसल्या को आकर आलिंगन में ले लिया।

श्लोक 10 (ayodhya.75.10)

रुदन्तौ रुदतीं दुःखात्समेत्यार्यां मनस्विनीम्। भरतं प्रत्युवाचेदं कौसल्या भृशदुःखिता॥ 75.10 ॥

rudantau rudatīṃ duḥkhāt sametyāryāṃ manasvinīm| bharataṃ pratyuvācedaṃ kausalyā bhṛśaduḥkhitā

स्वयं रोते हुए उन दोनों ने, दुःख से रोती हुई उस श्रेष्ठ और उदार-हृदया कौसल्या को गले लगाया। अत्यंत दुःखित कौसल्या ने भरत से यह कहा।

श्लोक 11 (ayodhya.75.11)

इदं ते राज्यकामस्य राज्यं प्राप्तमकण्टकम्। संप्राप्तं बत कैकेय्याः शीघ्रं क्रूरेण कर्मणा॥ 75.11 ॥

idaṃ te rājyakāmasya rājyaṃ prāptam akaṇṭakam| saṃprāptaṃ bata kaikeyyāḥ śīghraṃ krūreṇa karmaṇā

"तुझे, जो राज्य का इच्छुक था, यह निष्कंटक राज्य मिल गया! हाय, यह कैकेयी के क्रूर कृत्य से इतनी शीघ्रता से तुझे प्राप्त हो गया!

श्लोक 12 (ayodhya.75.12)

प्रस्थाप्य चीरवसनं पुत्रं मे वनवासिनम्। कैकेयी कं गुणं तत्र पश्यति क्रूरदर्शिनी॥ 75.12 ॥

prasthāpya cīravasanaṃ putraṃ me vanavāsinam| kaikeyī kaṃ guṇaṃ tatra paśyati krūradarśinī

मेरे पुत्र को वल्कल पहनाकर वन में भेजकर, वह क्रूर-दृष्टि कैकेयी उसमें भला क्या लाभ देखती है?

श्लोक 13 (ayodhya.75.13)

क्षिप्रं मामपि कैकेयी प्रस्थापयितुमर्हति। हिरण्यनाभो यत्रास्ते सुतो मे सुमहायशाः॥ 75.13 ॥

kṣipraṃ mām api kaikeyī prasthāpayitum arhati| hiraṇyanābho yatrāste suto me sumahāyaśāḥ

कैकेयी को चाहिए कि वह मुझे भी शीघ्र वहाँ भेज दे, जहाँ स्वर्ण-नाभि, अत्यंत यशस्वी मेरा पुत्र निवास कर रहा है।

श्लोक 14 (ayodhya.75.14)

अथवा स्वयमेवाहं सुमित्रानुचरा सुखम्। अग्निहोत्रं पुरस्कृत्य प्रस्थास्ये यत्र राघवः॥ 75.14 ॥

athavā svayam evāhaṃ sumitrānucarā sukham| agnihotraṃ puraskṛtya prasthāsye yatra rāghavaḥ

अथवा मैं स्वयं ही, सुमित्रा को साथ लेकर, अग्निहोत्र को आगे रखकर, सुखपूर्वक वहीं चली जाऊँगी जहाँ राघव हैं।

श्लोक 15 (ayodhya.75.15)

कामं वा स्वयमेवाद्य तत्र मां नेतुमर्हसि। यत्रासौ पुरुषव्याघ्रस्तप्यते मे तपः सुतः॥ 75.15 ॥

kāmaṃ vā svayam evādya tatra māṃ netum arhasi| yatrāsau puruṣavyāghras tapyate me tapaḥ sutaḥ

अथवा यदि तू चाहे, तो स्वयं ही मुझे आज उस स्थान पर ले चल, जहाँ मेरा वह पुरुषसिंह पुत्र तपस्या कर रहा है।

श्लोक 16 (ayodhya.75.16)

इदं हि तव विस्तीर्णं धनधान्यसमाचितम्। हस्त्यश्वरथसंपूर्णं राज्यं निर्यातितं तया॥ 75.16 ॥

idaṃ hi tava vistīrṇaṃ dhanadhānyasamācitam| hastyaśvarathasampūrṇaṃ rājyaṃ niryātitaṃ tayā

इस प्रकार यह विस्तृत राज्य, धन-धान्य से भरा हुआ, हाथी-घोड़े-रथों से परिपूर्ण, तेरे लिए ही उसने प्राप्त कर दिया है।"

श्लोक 17 (ayodhya.75.17)

इत्यादिबहुभिर्वाक्यैः क्रूरैः संभर्त्सितोऽनघः। विव्यथे भरतस्तीव्रं व्रणे तुद्येव सूचिना॥ 75.17 ॥

ity ādibahubhir vākyaiḥ krūrair saṃbhartsito'naghaḥ| vivyathe bharatas tīvraṃ vraṇe tudyeva sūcinā

इन और ऐसे ही अनेक कठोर वचनों से धिक्कारे जाने पर, निष्पाप भरत को अत्यंत पीड़ा हुई, मानो किसी घाव में सुई चुभो दी गई हो।

श्लोक 18 (ayodhya.75.18)

पपात चरणौ तस्यास्तदा संभ्रान्तचेतनः। विलप्य बहुधासंज्ञो लब्धसंज्ञस्ततः स्थितः॥ 75.18 ॥

papāta caraṇau tasyās tadā saṃbhrāntacetanaḥ| vilapya bahudhāsaṃjño labdhasaṃjñas tataḥ sthitaḥ

मन भ्रमित होकर वह उसके चरणों पर गिर पड़ा, बहुत विलाप करते हुए चेतनाशून्य हो गया, और फिर होश में आकर खड़ा हुआ।

श्लोक 19 (ayodhya.75.19)

एवं विलपमानां तां भरतः प्राञ्जलिस्तदा। कौसल्यां प्रत्युवाचेदं शोकैर्बहुभिरावृताम्॥ 75.19 ॥

evaṃ vilapamānāṃ tāṃ bharataḥ prāñjalis tadā| kausalyāṃ pratyuvācedaṃ śokair bahubhir āvṛtām

इस प्रकार विलाप करती हुई, अनेक शोकों से घिरी उस कौसल्या से, भरत ने हाथ जोड़कर यह कहा।

श्लोक 20 (ayodhya.75.20)

आर्ये कस्मादजानन्तं गर्हसे मामकिल्बिषम्। विपुलां च मम प्रीतिं स्थिरां जानासि राघवे॥ 75.20 ॥

ārye kasmād ajānantaṃ garhase mām akilbiṣam| vipulāṃ ca mama prītiṃ sthirāṃ jānāsi rāghave

"हे आर्या! अनजान और निर्दोष मुझे आप क्यों धिक्कार रही हैं? आप तो जानती ही हैं कि राघव के प्रति मेरा प्रेम कितना गहरा और अटल है।

श्लोक 21 (ayodhya.75.21)

कृता शास्त्रानुगा बुद्धिर्मा भूत्तस्य कदाचन। सत्यसन्धः सतां श्रेष्ठो यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.21 ॥

kṛtā śāstrānugā buddhir mā bhūt tasya kadācana| satyasandhaḥ satāṃ śreṣṭho yasyāryo'numate gataḥ

जिसकी सलाह पर मेरे सत्यप्रतिज्ञ और सज्जनों में श्रेष्ठ आर्य भाई राम वन गए, उसकी बुद्धि शास्त्रों का अनुसरण करने वाली कभी न बने।

श्लोक 22 (ayodhya.75.22)

प्रैष्यं पापीयसां यातु सूर्यं च प्रति मेहतु। हन्तु पादेन गां सुप्तां यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.22 ॥

praiṣyaṃ pāpīyasāṃ yātu sūryaṃ ca prati mehatu| hantu pādena gāṃ suptāṃ yasyāryo'numate gataḥ

वह अधम पुरुषों का दास बने, सूर्य के सामने मूत्र-त्याग करे, और सोई हुई गाय को पैर से मारे — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 23 (ayodhya.75.23)

कारयित्वा महत्कर्म भर्ता भृत्यमनर्थकम्। अधर्मो योऽस्य सोऽस्यास्तु यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.23 ॥

kārayitvā mahat karma bhartā bhṛtyam anarthakam| adharmo yo'sya so'syāstu yasyāryo'numate gataḥ

जो अधर्म एक स्वामी को लगता है जो अपने सेवक से बड़ा काम करवाकर उसे कुछ न दे, वही अधर्म उसे लगे, जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 24 (ayodhya.75.24)

परिपालयमानस्य राज्ञो भूतानि पुत्रवत्। ततस्तु द्रुह्यतां पापं यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.24 ॥

paripālayamānasya rājño bhūtāni putravat| tatas tu druhyatāṃ pāpaṃ yasyāryo'numate gataḥ

जो पाप उस राजा से द्रोह करने वाले को लगता है, जो अपनी प्रजा का पुत्रवत् पालन करता है, वही पाप उसे लगे, जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 25 (ayodhya.75.25)

बलिषड्भागमुद्धृत्य नृपस्यारक्षतः प्रजाः। अधर्मो योऽस्य सोऽस्यास्तु यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.25 ॥

baliṣaḍbhāgam uddhṛtya nṛpasyārakṣataḥ prajāḥ| adharmo yo'sya so'syāstu yasyāryo'numate gataḥ

जो अधर्म उस राजा को लगता है, जो कर का छठा भाग लेकर भी अपनी प्रजा की रक्षा नहीं करता, वही अधर्म उसे लगे, जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 26 (ayodhya.75.26)

संश्रुत्य च तपस्विभ्यः सत्रे वै यज्ञदक्षिणाम्। तां विप्रलपतां पापं यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.26 ॥

saṃśrutya ca tapasvibhyaḥ satre vai yajñadakṣiṇām| tāṃ vipralapatāṃ pāpaṃ yasyāryo'numate gataḥ

जो पाप उस व्यक्ति को लगता है, जो यज्ञ में तपस्वियों को दक्षिणा देने का वचन देकर भी उसे नहीं निभाता, वही पाप उसे लगे, जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 27 (ayodhya.75.27)

हस्त्यश्वरथसंबाधे युद्धे शस्त्रसमाकुले। मा स्म कार्षीत्सतां धर्मं यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.27 ॥

hastyaśvarathasaṃbādhe yuddhe śastrasamākule| mā sma kārṣīt satāṃ dharmaṃ yasyāryo'numate gataḥ

हाथी, घोड़े, रथों और शस्त्रों से भरे युद्ध में जो सज्जनों का धर्म नहीं निभाता, वैसा ही हो वह, जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 28 (ayodhya.75.28)

उपदिष्टं सुसूक्ष्मार्थं शास्त्रं यत्नेन धीमता। स नाशयतु दुष्टात्मा यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.28 ॥

upadiṣṭaṃ susūkṣmārthaṃ śāstraṃ yatnena dhīmatā| sa nāśayatu duṣṭātmā yasyāryo'numate gataḥ

उस दुष्टात्मा को चाहिए कि वह, किसी बुद्धिमान गुरु द्वारा परिश्रमपूर्वक सिखाए गए सूक्ष्मार्थ शास्त्र को भूल जाए — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 29 (ayodhya.75.29)

मा च तं व्यूढबाह्वंसं चन्द्रार्कसंतेजसम्। द्राक्षीद्राज्यस्थमासीनं यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.29 ॥

mā ca taṃ vyūḍhabāhvaṃsaṃ candrārkasaṃtejasam| drākṣīd rājyastham āsīnaṃ yasyāryo'numate gataḥ

वह कभी न देख पाए राम को — विशाल भुजाओं और कंधों वाले, चंद्र-सूर्य समान तेजस्वी, राजसिंहासन पर विराजमान — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 30 (ayodhya.75.30)

पायसं कृसरं छागं वृथा सोऽश्नातु निर्घृणः। गुरूंश्चाप्यवजानातु यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.30 ॥

pāyasaṃ kṛsaraṃ chāgaṃ vṛthā so'śnātu nirghṛṇaḥ| agurūṃś cāpy avajānātu yasyāryo'numate gataḥ

वह निर्दयी खीर, खिचड़ी और बकरे का मांस बिना अर्पण किए ही खा जाए, और अपने गुरुओं का अनादर करे — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 31 (ayodhya.75.31)

गाश्च स्पृशतु पादेन गुरून्परिवदेत्स्वयम्। मित्रे द्रुह्येत सोऽत्यन्तं यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.31 ॥

gāś ca spṛśatu pādena gurūn parivadet svayam| mitre druhyeta so'tyantaṃ yasyāryo'numate gataḥ

वह पैर से गायों को स्पर्श करे, स्वयं ही अपने गुरुजनों की निंदा करे, और अपने मित्र के साथ भारी छल करे — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 32 (ayodhya.75.32)

विश्वासात्कथितं किंचित्परिवादं मिथः क्वचित्। विवृणोतु स दुष्टात्मा यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.32 ॥

viśvāsāt kathitaṃ kiṃcit parivādaṃ mithaḥ kvacit| vivṛṇotu sa duṣṭātmā yasyāryo'numate gataḥ

जो कुछ भी विश्वास में कभी गुप्त रूप से कहा गया हो, उस निंदा को वह दुष्टात्मा उजागर कर दे — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 33 (ayodhya.75.33)

अकर्ता ह्यकृतज्ञश्च त्यक्तात्मा निरपत्रपः। लोके भवतु विद्वेष्यो यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.33 ॥

akartā hy akṛtajñaś ca tyaktātmā nirapatrapaḥ| loke bhavatu vidveṣyo yasyāryo'numate gataḥ

वह अकर्मण्य, कृतघ्न, आत्मत्यागी, निर्लज्ज बने, और इस संसार में सबका द्वेष्य बन जाए — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 34 (ayodhya.75.34)

पुत्रैर्दारैश्च भृत्यैश्च स्वगृहे परिवारितः। स एको मृष्टमश्नातु यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.34 ॥

putrair dāraiś ca bhṛtyaiś ca svagṛhe parivāritaḥ| sa eko mṛṣṭam aśnātu yasyāryo'numate gataḥ

अपने घर में पुत्रों, पत्नी और सेवकों से घिरा होकर भी वह अकेला ही स्वादिष्ट भोजन करे — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 35 (ayodhya.75.35)

अप्राप्य सदृशान्दारानपत्यः प्रमीयताम्। अनवाप्य क्रियां धर्म्यां यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.35 ॥

aprāpya sadṛśān dārān anapatyaḥ pramīyatām| anavāpya kriyāṃ dharmyāṃ yasyāryo'numate gataḥ

वह उपयुक्त पत्नी न पाकर, संतानहीन ही मर जाए, अपने धार्मिक कर्तव्यों को पूरा किए बिना ही — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 36 (ayodhya.75.36)

मात्मनः संततिं द्राक्षीत्स्वेषु दारेषु दुःखितः। आयुः समग्रमप्राप्य यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.36 ॥

mātmanaḥ saṃtatiṃ drākṣīt sveṣu dāreṣu duḥkhitaḥ| āyuḥ samagram aprāpya yasyāryo'numate gataḥ

वह अपनी ही पत्नी से अपनी संतान न देख पाए, दुःखी रहे, और पूर्ण आयु भी प्राप्त न करे — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 37 (ayodhya.75.37)

राजस्त्रीबालवृद्धानां वधे यत्पापमुच्यते। भृत्यत्यागे च यत्पापं तत्पापं प्रतिपद्यताम्॥ 75.37 ॥

rājastrībālavṛddhānāṃ vadhe yat pāpam ucyate| bhṛtyatyāge ca yat pāpaṃ tat pāpaṃ pratipadyatām

जो पाप एक राजा, स्त्री, बालक या वृद्ध की हत्या में कहा गया है, और जो पाप सेवकों को त्यागने में कहा गया है, वही पाप उसे प्राप्त हो।

श्लोक 38 (ayodhya.75.38)

लाक्षया मधुमांसेन लोहेन च विषेण च। सदैव बिभृयाद्भृत्यान् यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.38 ॥

lākṣayā madhumāṃsena lohena ca viṣeṇa ca| sadaiva bibhṛyād bhṛtyān yasyāryo'numate gataḥ

वह लाख, मदिरा-मांस, लोहा और विष बेचकर ही सदा अपने आश्रितों का पालन करे — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 39 (ayodhya.75.39)

संग्रामे समुपोढे स शत्रुपक्षभयंकरे। पलायमानो वध्येत यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.39 ॥

saṃgrāme samupoḍhe sa śatrupakṣabhayaṃkare| palāyamāno vadhyeta yasyāryo'numate gataḥ

जब युद्ध छिड़े जो शत्रुपक्ष के लिए भयंकर हो, तब वह भागते हुए ही मारा जाए — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 40 (ayodhya.75.40)

कपालपाणिः पृथिवीमटतां चीरसंवृतः। भिक्षमाणो यथोन्मत्तो यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.40 ॥

kapālapāṇiḥ pṛthivīm aṭatāṃ cīrasaṃvṛtaḥ| bhikṣamāṇo yathonmatto yasyāryo'numate gataḥ

वह हाथ में खप्पर लिए, चिथड़े पहने, पागल की भाँति भीख माँगते हुए इस पृथ्वी पर भटकता फिरे — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 41 (ayodhya.75.41)

पाने प्रसक्तो भवतु स्त्रीष्वक्षेषु च नित्यशः। कामक्रोधाभिभूतस्तु यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.41 ॥

pāne prasakto bhavatu strīṣv akṣeṣu ca nityaśaḥ| kāmakrodhābhibhūtas tu yasyāryo'numate gataḥ

वह सदा मदिरा, स्त्रियों और जुए में आसक्त रहे, काम और क्रोध से अभिभूत रहे — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 42 (ayodhya.75.42)

यस्य धर्मे मनो भूयादधर्मं स निषेवताम्। अपात्रवर्षी भवतु यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.42 ॥

yasya dharme mano bhūyād adharmaṃ sa niṣevatām| apātravarṣī bhavatu yasyāryo'numate gataḥ

जिसका मन कभी धर्म में न लगे, वह सदा अधर्म का ही सेवन करे, और अपात्रों को ही दान देने वाला बने — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 43 (ayodhya.75.43)

संचितान्यस्य वित्तानि विविधानि सहस्रशः। दस्युभिर्विप्रलुप्यन्तां यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.43 ॥

saṃcitāny asya vittāni vividhāni sahasraśaḥ| dasyubhir vipralupyantāṃ yasyāryo'numate gataḥ

उसका सहस्रों प्रकार से एकत्र किया गया धन डाकुओं द्वारा लूट लिया जाए — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 44 (ayodhya.75.44)

उभे संध्ये शयानस्य यत्पापं परिकल्प्यते। तच्च पापं भवेत्तस्य यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.44 ॥

ubhe saṃdhye śayānasya yat pāpaṃ parikalpyate| tac ca pāpaṃ bhavet tasya yasyāryo'numate gataḥ

जो पाप उस व्यक्ति को माना जाता है, जो दोनों संध्याओं में सोया रहता है, वही पाप उसे प्राप्त हो — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 45 (ayodhya.75.45)

यदग्निदायके पापं यत्पापं गुरुतल्पगे। मित्रद्रोहे च यत्पापं तत्पापं प्रतिपद्यताम्॥ 75.45 ॥

yad agnidāyake pāpaṃ yat pāpaṃ gurutalpage| mitradrohe ca yat pāpaṃ tat pāpaṃ pratipadyatām

जो पाप आग लगाने वाले को, जो पाप गुरु की शय्या भंग करने वाले को, और जो पाप मित्र-द्रोह करने वाले को होता है, वही पाप उसे प्राप्त हो।

श्लोक 46 (ayodhya.75.46)

देवतानां पितॄणां च मातापित्रोस्तथैव च। मा स्म कार्षीत्स शुश्रूषां यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.46 ॥

devatānāṃ pitṝṇāṃ ca mātāpitros tathaiva ca| mā sma kārṣīt sa śuśrūṣāṃ yasyāryo'numate gataḥ

वह देवताओं की, पितरों की, और अपने माता-पिता की सेवा कभी न कर सके — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 47 (ayodhya.75.47)

सतां लोकात्सतां कीर्त्याः सज्जुष्टात्कर्मणस्तथा। भ्रश्यतु क्षिप्रमद्यैव यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.47 ॥

satāṃ lokāt satāṃ kīrtyāḥ sajjuṣṭāt karmaṇas tathā| bhraśyatu kṣipram adyaiva yasyāryo'numate gataḥ

वह सज्जनों के लोक से, सज्जनों की कीर्ति से, और सज्जनों द्वारा सम्मानित कर्म से आज ही और शीघ्र च्युत हो जाए — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 48 (ayodhya.75.48)

अपास्य मातृशुश्रूषामनर्थे सोऽवतिष्ठताम्। दीर्घबाहुर्महावक्षा यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.48 ॥

apāsya mātṛśuśrūṣām anarthe so'vatiṣṭhatām| dīrghabāhur mahāvakṣā yasyāryo'numate gataḥ

मेरे उस दीर्घबाहु, विशाल-वक्ष वाले आर्य भाई की माता की सेवा को छोड़कर, वह निरर्थकता में ही डूबा रहे — जिसकी सलाह पर वे वन गए।

श्लोक 49 (ayodhya.75.49)

बहुपुत्रो दरिद्रश्च ज्वररोगसमन्वितः। स भूयात्सततक्लेशी यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.49 ॥

bahuputro daridraś ca jvararogasamanvitaḥ| sa bhūyāt satatakleśī yasyāryo'numate gataḥ

वह अनेक पुत्रों वाला किंतु निर्धन बने, ज्वर और रोगों से ग्रस्त रहे, और सदा क्लेश में ही जिए — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 50 (ayodhya.75.50)

आशामाशंसमानानां दीनानामूर्ध्वचक्षुषाम्। अर्थिनां वितथां कुर्याद्यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.50 ॥

āśām āśaṃsamānānāṃ dīnānām ūrdhvacakṣuṣām| arthināṃ vitathāṃ kuryād yasyāryo'numate gataḥ

वह उन दीन याचकों की आशा को व्यर्थ कर दे, जो ऊपर की ओर आँखें उठाकर आशा भरी दृष्टि से याचना करते हैं — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 51 (ayodhya.75.51)

मायया रमतां नित्यं परुषः पिशुनोऽशुचिः। राज्ञो भीतस्त्वधर्मात्मा यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.51 ॥

māyayā ramatāṃ nityaṃ paruṣaḥ piśuno'śuciḥ| rājño bhītas tv adharmātmā yasyāryo'numate gataḥ

वह कठोर, चुगलखोर, अशुद्ध, अधर्मी-चित्त सदा छल-कपट में ही रमा रहे, और राजा से सदा डरता रहे — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 52 (ayodhya.75.52)

ऋतुस्नातां सतीं भार्यामृतुकालानुरोधिनीम्। अतिवर्तेत दुष्टात्मा यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.52 ॥

ṛtusnātāṃ satīṃ bhāryām ṛtukālānurodhinīm| ativarteta duṣṭātmā yasyāryo'numate gataḥ

वह दुष्टात्मा अपनी सती पत्नी की, जो ऋतुस्नात होकर उपयुक्त समय पर उसकी प्रतीक्षा करती है, उपेक्षा करे — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 53 (ayodhya.75.53)

धर्मदारान्परित्यज्य परदारान्निषेवताम्। त्यक्तधर्मरतिर्मूढो यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.53 ॥

dharmadārān parityajya paradārān niṣevatām| tyaktadharmaratir mūḍho yasyāryo'numate gataḥ

वह मूढ़, धर्म-प्रेम को त्यागकर, अपनी विवाहिता पत्नी को छोड़कर पराई स्त्री का सेवन करे — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 54 (ayodhya.75.54)

विप्रलुप्तप्रजातस्य दुष्कृतं ब्राह्मणस्य यत्। तदेव प्रतिपद्येत यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.54 ॥

vipraluptaprajātasya duṣkṛtaṃ brāhmaṇasya yat| tad eva pratipadyeta yasyāryo'numate gataḥ

जो पाप उस ब्राह्मण को होता है जिसकी संतान-परंपरा नष्ट हो जाती है, वही पाप उसे प्राप्त हो — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 55 (ayodhya.75.55)

पानीयदूषके पापं तथैव विषदायके। यत्तदेकः स लभतां यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.55 ॥

pānīyadūṣake pāpaṃ tathaiva viṣadāyake| yat tad ekaḥ sa labhatāṃ yasyāryo'numate gataḥ

जो पाप पीने के जल को दूषित करने वाले को होता है, और जो पाप विष देने वाले को होता है, वह पाप वह अकेला ही पाए — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 56 (ayodhya.75.56)

ब्राह्मणायोद्यतां पूजां विहन्तु कलुषेन्द्रियः। बालवत्सां च गां दोग्धुं यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.56 ॥

brāhmaṇāyodyatāṃ pūjāṃ vihantu kaluṣendriyaḥ| bālavatsāṃ ca gāṃ dogdhuṃ yasyāryo'numate gataḥ

वह दूषित-इंद्रियों वाला किसी ब्राह्मण के लिए तैयार की गई पूजा को भंग करे, और उस गाय को दुहे जिसका बछड़ा अभी छोटा हो — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 57 (ayodhya.75.57)

तृष्णार्तं सति पानीये विप्रलम्भेन योजयेत्। लभेत तस्य यत्पापं यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.57 ॥

tṛṣṇārtaṃ sati pānīye vipralambhena yojayet| labheta tasya yat pāpaṃ yasyāryo'numate gataḥ

जो व्यक्ति जल उपलब्ध होते हुए भी किसी प्यासे को छलकर निराश कर दे, उसका जो पाप होता है, वही पाप उसे मिले — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 58 (ayodhya.75.58)

भक्त्या विवदमानेषु मार्गमाश्रित्य पश्यतः। तस्य पापेन युज्येत यस्यार्योऽनुमते गतः॥ 75.58 ॥

bhaktyā vivadamāneṣu mārgam āśritya paśyataḥ| tasya pāpena yujyeta yasyāryo'numate gataḥ

जो मार्ग पर खड़ा होकर विवाद करने वालों को देखता ही रहता है, बिना निष्ठा से हस्तक्षेप किए, उसके पाप से वह भी युक्त हो — जिसकी सलाह पर मेरा आर्य भाई गया।

श्लोक 59 (ayodhya.75.59)

विहीनां पतिपुत्राभ्यां कौसल्यां पार्थिवात्मजः। एवमाश्वासयन्नेव दुःखार्तो निपपात ह॥ 75.59 ॥

vihīnāṃ patiputrābhyāṃ kausalyāṃ pārthivātmajaḥ| evam āśvāsayann eva duḥkhārto nipapāta ha

इस प्रकार, पति और पुत्र दोनों से वंचित कौसल्या को सांत्वना देते हुए ही, वह राजकुमार भरत दुःख से पीड़ित होकर गिर पड़ा।

श्लोक 60 (ayodhya.75.60)

तथा तु शपथैः कष्टैः शपमानमचेतनम्। भरतं शोकसंतप्तं कौसल्या वाक्यमब्रवीत्॥ 75.60 ॥

tathā tu śapathaiḥ kaṣṭaiḥ śapamānam acetanam| bharataṃ śokasaṃtaptaṃ kausalyā vākyam abravīt

इस प्रकार कठोर शापों का उच्चारण करते हुए, चेतनाशून्य और शोक-संतप्त भरत से कौसल्या ने यह वचन कहा।

श्लोक 61 (ayodhya.75.61)

मम दुःखमिदं पुत्र भूयः समुपजायते। शपथैः शपमानो हि प्राणानुपरुणत्सि मे॥ 75.61 ॥

mama duḥkham idaṃ putra bhūyaḥ samupajāyate| śapathaiḥ śapamāno hi prāṇān uparuṇatsi me

"हे पुत्र, इससे तो मेरा दुःख और भी बढ़ रहा है। इन शापों का उच्चारण करके तू मेरे प्राणों को ही कष्ट पहुँचा रहा है।

श्लोक 62 (ayodhya.75.62)

दिष्ट्या न चलितो धर्मादात्मा ते सह लक्ष्मणः। वत्स सत्यप्रतिज्ञो मे सतां लोकानवाप्स्यसि॥ 75.62 ॥

diṣṭyā na calito dharmād ātmā te saha lakṣmaṇaḥ| vatsa satyapratijño me satāṃ lokān avāpsyasi

सौभाग्य से तेरा और लक्ष्मण का मन धर्म से कभी विचलित नहीं हुआ। हे वत्स, तू सत्यप्रतिज्ञ होकर लक्ष्मण सहित सज्जनों के लोक को प्राप्त करेगा।"

श्लोक 63 (ayodhya.75.63)

इत्युक्त्वा चाङ्कमानीय भरतं भ्रातृवत्सलम्। परिष्वज्य महाबाहुं रुरोद भृशदुःखिता॥ 75.63 ॥

ity uktvā cāṅkam ānīya bharataṃ bhrātṛvatsalam| pariṣvajya mahābāhuṃ ruroda bhṛśaduḥkhitā

यह कहकर, अपने भाई के प्रति स्नेह रखने वाले उस महाबाहु भरत को गोद में लेकर, आलिंगन करके, अत्यंत दुःखित कौसल्या फूट-फूटकर रो पड़ीं।

श्लोक 64 (ayodhya.75.64)

एवं विलपमानस्य दुःखार्तस्य महात्मनः। मोहाच्च शोकसंरोधाद्बभूव लुलितं मनः॥ 75.64 ॥

evaṃ vilapamānasya duḥkhārtasya mahātmanaḥ| mohāc ca śokasaṃrodhād babhūva lulitaṃ manaḥ

इस प्रकार विलाप करते हुए, दुःख से पीड़ित उस महात्मा भरत का मन, मोह और शोक के दबाव से विचलित हो उठा।

श्लोक 65 (ayodhya.75.65)

लालप्यमानस्य विचेतनस्य प्रनष्टबुद्धेः पतितस्य भूमौ। मुहुर्मुहुर्निःश्वसतश्च दीर्घं सा तस्य शोकेन जगाम रात्रिः॥ 75.65 ॥

lālapyamānasya vicetanasya pranaṣṭabuddheḥ patitasya bhūmau| muhur muhur niḥśvasataś ca dīrghaṃ sā tasya śokena jagāma rātriḥ

इस प्रकार विलाप करते हुए, चेतनाशून्य, विवेकहीन, धरती पर गिरे हुए, और बार-बार दीर्घ श्वास लेते हुए भरत की वह रात्रि, शोक में ही बीत गई।

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