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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 77

त्रयोदशाह-क्रिया एवं भरत-शत्रुघ्न का विलाप

सर्ग 76सर्ग-सूचीसर्ग 78

श्लोक 1 (ayodhya.77.1)

ततः दश अहे अतिगते कृत शौचो नृप आत्मजः। द्वादशे अहनि सम्प्राप्ते श्राद्ध कर्माणि अकारयत्॥ 77.1 ॥

tataḥ daśa ahe atigate kṛta śauco nṛpa ātmajaḥ| dvādaśe ahani samprāpte śrāddha karmāṇi akārayat

दस दिन बीत जाने पर, राजपुत्र भरत ने स्वयं को शुद्ध करके बारहवें दिन श्राद्ध-कर्म सम्पन्न किए।

श्लोक 2 (ayodhya.77.2)

ब्राह्मणेभ्यो ददौ रत्नम् धनम् अन्नम् च पुष्कलम्। वासांसि च महार्हाणि रत्नानि विविधानि च॥ 77.2 ॥

brāhmaṇebhyo dadau ratnam dhanam annam ca puṣkalam| vāsāṃsi ca mahārhāṇi ratnāni vividhāni ca

उन्होंने ब्राह्मणों को रत्न, धन, प्रचुर अन्न, बहुमूल्य वस्त्र और नाना प्रकार के बहुमूल्य उपहार प्रदान किए।

श्लोक 3 (ayodhya.77.3)

बास्तिकम् बहु शुक्लम् च गाः च अपि शतशः तथा। दासी दासम् च यानम् च वेश्मानि सुमहान्ति च॥ 77.3 ॥

bāstikam bahu śuklam ca gāḥ ca api śataśaḥ tathā| dāsī dāsam ca yānam ca veśmāni sumahānti ca

बहुत-सी श्वेत बकरियाँ और सैकड़ों गौएँ, दासियाँ और दास, वाहन तथा विशाल भवन—

श्लोक 4 (ayodhya.77.4)

ब्राह्मणेभ्यो ददौ पुत्रः राज्ञः तस्य और्ध्वदैहिकम्। ततः प्रभात समये दिवसे अथ त्रयोदशे॥ 77.4 ॥

brāhmaṇebhyo dadau putraḥ rājñaḥ tasya aurdhvadaihikam| tataḥ prabhāta samaye divase atha trayodaśe

—ये सब वस्तुएँ राजा के पुत्र ने पिता के और्ध्वदैहिक कर्म में ब्राह्मणों को अर्पित कीं। तत्पश्चात् तेरहवें दिन प्रातःकाल के समय,

श्लोक 5 (ayodhya.77.5)

विललाप महा बाहुर् भरतः शोक मूर्चितः। शब्द अपिहित कण्ठः च शोधन अर्थम् उपागतः॥ 77.5 ॥

vilalāpa mahā bāhur bharataḥ śoka mūrcitaḥ| śabda apihita kaṇṭhaḥ ca śodhana artham upāgataḥ

अस्थि-संचय हेतु वहाँ पहुँचे महाबाहु भरत, कंठ में स्वर अवरुद्ध होने के कारण, शोक-विह्वल होकर विलाप करने लगे।

श्लोक 6 (ayodhya.77.6)

चिता मूले पितुर् वाक्यम् इदम् आह सुदुह्खितः। तात यस्मिन् निषृष्टः अहम् त्वया भ्रातरि राघवे॥ 77.6 ॥

citā mūle pitur vākyam idam āha suduhkhitaḥ| tāta yasmin niṣṛṣṭaḥ aham tvayā bhrātari rāghave

पिता की चिता के समीप, अत्यंत दुःखी होकर उन्होंने यह वचन कहा: "हे तात! जिस भ्राता राघव के हाथों आपने मुझे सौंपा था—

श्लोक 7 (ayodhya.77.7)

तस्मिन् वनम् प्रव्रजिते शून्ये त्यक्तः अस्म्य् अहम् त्वया। यथा गतिर् अनाथायाः पुत्रः प्रव्राजितः वनम्॥ 77.7 ॥

tasmin vanam pravrajite śūnye tyaktaḥ asmy aham tvayā| yathā gatir anāthāyāḥ putraḥ pravrājitaḥ vanam

—वे वन को चले गए, और अब इस शून्यता में मुझे लगता है कि आपने भी मुझे त्याग दिया है, जैसे वह माता अनाथ हो गई हैं जिनका पुत्र, उनका एकमात्र सहारा, वन को भेज दिया गया।

श्लोक 8 (ayodhya.77.8)

ताम् अम्बाम् तात कौसल्याम् त्यक्त्वा त्वम् क्व गतः नृप। दृष्ट्वा भस्म अरुणम् तच् च दग्ध अस्थि स्थान मण्डलम्॥ 77.8 ॥

tām ambām tāta kausalyām tyaktvā tvam kva gataḥ nṛpa| dṛṣṭvā bhasma aruṇam tac ca dagdha asthi sthāna maṇḍalam

हे राजन्! हे तात! उस माता कौसल्या को त्यागकर आप कहाँ चले गए?" उस भस्म से रक्ताभ, दग्ध अस्थियों के उस स्थान-मण्डल को देखकर,

श्लोक 9 (ayodhya.77.9)

पितुः शरीर निर्वाणम् निष्टनन् विषसाद ह। स तु दृष्ट्वा रुदन् दीनः पपात धरणी तले॥ 77.9 ॥

pituḥ śarīra nirvāṇam niṣṭanan viṣasāda ha| sa tu dṛṣṭvā rudan dīnaḥ papāta dharaṇī tale

—जहाँ पिता का शरीर भस्म हो चुका था—भरत करुण क्रन्दन करते हुए विषाद में डूब गए, और उसे देखकर वे दीन होकर रोते हुए भूमि पर गिर पड़े,

श्लोक 10 (ayodhya.77.10)

उत्थाप्यमानः शक्रस्य यन्त्र ध्वजैव च्युतः। अभिपेतुस् ततः सर्वे तस्य अमात्याः शुचि व्रतम्॥ 77.10 ॥

utthāpyamānaḥ śakrasya yantra dhvajaiva cyutaḥ| abhipetus tataḥ sarve tasya amātyāḥ śuci vratam

जैसे इन्द्र-ध्वज को यंत्र द्वारा उठाते समय वह अकस्मात् गिर जाता है। तब उनके समस्त मंत्री, शुद्ध-व्रत भरत के पास तुरंत दौड़ पड़े,

श्लोक 11 (ayodhya.77.11)

अन्त काले निपतितम् ययातिम् ऋषयो यथा। शत्रुघ्नः च अपि भरतम् दृष्ट्वा शोक परिप्लुतम्॥ 77.11 ॥

anta kāle nipatitam yayātim ṛṣayo yathā| śatrughnaḥ ca api bharatam dṛṣṭvā śoka pariplutam

जैसे ऋषिगण अन्तकाल में गिरे हुए ययाति के पास दौड़े थे। शत्रुघ्न भी शोकमग्न भरत को देखकर,

श्लोक 12 (ayodhya.77.12)

विसम्ज्ञो न्यपतत् भूमौ भूमि पालम् अनुस्मरन्। उन्मत्तैव निश्चेता विललाप सुदुह्खितः॥ 77.12 ॥

visamjño nyapatat bhūmau bhūmi pālam anusmaran| unmattaiva niścetā vilalāpa suduhkhitaḥ

और अपने पिता, उस भूपाल का स्मरण करके, मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े; बेसुध, विवेकशून्य से होकर, अत्यंत दुःखी वे विलाप करने लगे,

श्लोक 13 (ayodhya.77.13)

स्मृत्वा पितुर् गुण अन्गानि तनि तानि तदा तदा। मन्थरा प्रभवः तीव्रः कैकेयी ग्राह सम्कुलः॥ 77.13 ॥

smṛtvā pitur guṇa angāni tani tāni tadā tadā| mantharā prabhavaḥ tīvraḥ kaikeyī grāha samkulaḥ

पिता के उन-उन गुणों और चेष्टाओं का बार-बार स्मरण करते हुए: "मन्थरा से उत्पन्न, कैकेयी रूपी ग्राह से भरा हुआ वह भीषण शोक-सागर,

श्लोक 14 (ayodhya.77.14)

वर दानमयो अक्षोभ्यो अमज्जयत् शोक सागरः। सुकुमारम् च बालम् च सततम् लालितम् त्वया॥ 77.14 ॥

vara dānamayo akṣobhyo amajjayat śoka sāgaraḥ| sukumāram ca bālam ca satatam lālitam tvayā

वरदान के कारण अत्यंत क्षुब्ध हुआ, हमें डुबो गया है। हे तात, जिस सुकुमार बालक को आपने सदा दुलारा,

श्लोक 15 (ayodhya.77.15)

क्व तात भरतम् हित्वा विलपन्तम् गतः भवान्। ननु भोज्येषु पानेषु वस्त्रेष्व् आभरणेषु च॥ 77.15 ॥

kva tāta bharatam hitvā vilapantam gataḥ bhavān| nanu bhojyeṣu pāneṣu vastreṣv ābharaṇeṣu ca

उस भरत को इस प्रकार विलाप करता छोड़कर आप कहाँ चले गए? भोजन में, पेय में, वस्त्रों और आभूषणों में,

श्लोक 16 (ayodhya.77.16)

प्रवारयसि नः सर्वांस् तन् नः को अद्य करिष्यति। अवदारण काले तु पृथिवी न अवदीर्यते॥ 77.16 ॥

pravārayasi naḥ sarvāṃs tan naḥ ko adya kariṣyati| avadāraṇa kāle tu pṛthivī na avadīryate

आप हम सबकी इच्छाएँ पूर्ण किया करते थे—अब वह हमारे लिए कौन करेगा? यह पृथ्वी अभी, विदीर्ण होने के इस समय में भी, विदीर्ण नहीं होती,

श्लोक 17 (ayodhya.77.17)

विहीना या त्वया राज्ञा धर्मज्ञेन महात्मना। पितरि स्वर्गम् आपन्ने रामे च अरण्यम् आश्रिते॥ 77.17 ॥

vihīnā yā tvayā rājñā dharmajñena mahātmanā| pitari svargam āpanne rāme ca araṇyam āśrite

यद्यपि यह धर्मज्ञ महात्मा राजा आपसे रहित हो चुकी है। पिता के स्वर्गवासी होने और राम के वन में शरण लेने पर,

श्लोक 18 (ayodhya.77.18)

किम् मे जीवित सामर्थ्यम् प्रवेक्ष्यामि हुत अशनम्। हीनो भ्रात्रा च पित्रा च शून्याम् इक्ष्वाकु पालिताम्॥ 77.18 ॥

kim me jīvita sāmarthyam pravekṣyāmi huta aśanam| hīno bhrātrā ca pitrā ca śūnyām ikṣvāku pālitām

मेरे जीवित रहने का क्या प्रयोजन है? मैं अग्नि में प्रवेश करूँगा। भाई और पिता दोनों से रहित, इक्ष्वाकुओं द्वारा शासित उस शून्य अयोध्या में—

श्लोक 19 (ayodhya.77.19)

अयोध्याम् न प्रवेक्ष्यामि प्रवेक्ष्यामि तपो वनम्। तयोः विलपितम् श्रुत्वा व्यसनम् च अन्ववेक्ष्य तत्॥ 77.19 ॥

ayodhyām na pravekṣyāmi pravekṣyāmi tapo vanam| tayoḥ vilapitam śrutvā vyasanam ca anvavekṣya tat

—मैं उसमें प्रवेश नहीं करूँगा; मैं तपोवन में चला जाऊँगा।" उन दोनों के विलाप को सुनकर और उनकी उस विपत्ति को देखकर,

श्लोक 20 (ayodhya.77.20)

भृशम् आर्ततरा भूयः सर्वएव अनुगामिनः। ततः विषण्णौ श्रान्तौ च शत्रुघ्न भरताव् उभौ॥ 77.20 ॥

bhṛśam ārtatarā bhūyaḥ sarvaeva anugāminaḥ| tataḥ viṣaṇṇau śrāntau ca śatrughna bharatāv ubhau

समस्त अनुगामी जन पुनः अत्यंत व्याकुल हो उठे। तत्पश्चात् शत्रुघ्न और भरत दोनों, दुःख और थकान से युक्त होकर,

श्लोक 21 (ayodhya.77.21)

धरण्याम् सम्व्यचेष्टेताम् भग्न शृन्गाव् इव ऋषभौ। ततः प्रकृतिमान् वैद्यः पितुर् एषाम् पुरोहितः॥ 77.21 ॥

dharaṇyām samvyaceṣṭetām bhagna śṛngāv iva ṛṣabhau| tataḥ prakṛtimān vaidyaḥ pitur eṣām purohitaḥ

टूटे हुए सींगों वाले दो बैलों की भाँति भूमि पर तड़पने लगे। तब उनके पिता के पुरोहित, संयत स्वभाव वाले विद्वान् वसिष्ठ ने,

श्लोक 22 (ayodhya.77.22)

वसिष्ठो भरतम् वाक्यम् उत्थाप्य तम् उवाच ह। त्रयोदशोऽयम् दिवसः पितुर्वृत्तस्य ते विभो॥ 77.22 ॥

vasiṣṭho bharatam vākyam utthāpya tam uvāca ha| trayodaśo'yam divasaḥ piturvṛttasya te vibho

भरत को उठाकर उनसे यह वचन कहा: "हे विभो! आपके पिता की मृत्यु को आज तेरहवाँ दिन हो चुका है;

श्लोक 23 (ayodhya.77.23)

सावशेषास्थिनिचये किमिह त्वम् विलम्बसे। त्रीणि द्वन्द्वानि भूतेषु प्रवृत्तानि अविशेषतः॥ 77.23 ॥

sāvaśeṣāsthinicaye kimiha tvam vilambase| trīṇi dvandvāni bhūteṣu pravṛttāni aviśeṣataḥ

अस्थि-संचय का कार्य अभी शेष है, फिर आप यहाँ क्यों विलम्ब कर रहे हैं? समस्त प्राणियों में बिना भेदभाव के तीन द्वंद्व प्रवृत्त होते हैं—

श्लोक 24 (ayodhya.77.24)

तेषु च अपरिहार्येषु न एवम् भवितुम् अर्हति। सुमन्त्रः च अपि शत्रुघ्नम् उत्थाप्य अभिप्रसाद्य च॥ 77.24 ॥

teṣu ca aparihāryeṣu na evam bhavitum arhati| sumantraḥ ca api śatrughnam utthāpya abhiprasādya ca

और चूँकि ये अपरिहार्य हैं, आपको इस प्रकार विचलित नहीं होना चाहिए।" सुमन्त्र ने भी शत्रुघ्न को उठाकर और सांत्वना देकर,

श्लोक 25 (ayodhya.77.25)

श्रावयाम् आस तत्त्वज्ञः सर्व भूत भव अभवौ। उत्थितौ तौ नर व्याघ्रौ प्रकाशेते यशस्विनौ॥ 77.25 ॥

śrāvayām āsa tattvajñaḥ sarva bhūta bhava abhavau| utthitau tau nara vyāghrau prakāśete yaśasvinau

उन तत्त्वज्ञ ने उन्हें समस्त प्राणियों के उत्पत्ति और विनाश का उपदेश सुनाया। उठे हुए वे दोनों यशस्वी नरश्रेष्ठ ऐसे शोभायमान हो रहे थे—

श्लोक 26 (ayodhya.77.26)

वर्ष आतप परिक्लिन्नौ पृथग् इन्द्र ध्वजाव् इव। अश्रूणि परिमृद्नन्तौ रक्त अक्षौ दीन भाषिणौ॥ 77.26 ॥

varṣa ātapa pariklinnau pṛthag indra dhvajāv iva| aśrūṇi parimṛdnantau rakta akṣau dīna bhāṣiṇau

मानो वर्षा और धूप से मलिन हुए दो पृथक् इन्द्र-ध्वज हों, अश्रु पोंछते हुए, लाल नेत्रों वाले, दीनतापूर्वक बोलते हुए।

श्लोक 27 (ayodhya.77.27)

अमात्याः त्वरयन्ति स्म तनयौ च अपराः क्रियाः॥ 77.27 ॥

amātyāḥ tvarayanti sma tanayau ca aparāḥ kriyāḥ

तब मंत्रियों ने उन दोनों राजकुमारों को शेष कार्यों के लिए शीघ्रता करने हेतु प्रेरित किया।

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