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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 82

भरत की वन-यात्रा की आज्ञा

सर्ग 81सर्ग-सूचीसर्ग 83

श्लोक 1 (ayodhya.82.1)

ताम् आर्य गण सम्पूर्णाम् भरतः प्रग्रहाम् सभाम्। ददर्श बुद्धि सम्पन्नः पूर्ण चन्द्राम् निशाम् इव॥ 82.1 ॥

tām ārya gaṇa sampūrṇām bharataḥ pragrahām sabhām| dadarśa buddhi sampannaḥ pūrṇa candrām niśām iva

बुद्धिमान भरत ने आर्यजनों से परिपूर्ण, सुव्यवस्थित उस सभा को देखा, जो पूर्ण चन्द्रमा से युक्त रात्रि के समान शोभायमान थी।

श्लोक 2 (ayodhya.82.2)

आसनानि यथा न्यायम् आर्याणाम् विशताम् तदा। अदृश्यत घन अपाये पूर्ण चन्द्रा इव शर्वरी॥ 82.2 ॥

āsanāni yathā nyāyam āryāṇām viśatām tadā| adṛśyata ghana apāye pūrṇa candrā iva śarvarī

जब आर्यजन यथायोग्य अपने-अपने आसनों पर विराजमान हुए, तब वह सभा शरद्-ऋतु की मेघरहित पूर्णचन्द्र-युक्त रात्रि के समान दिखाई देने लगी।

श्लोक 3 (ayodhya.82.3)

सा विद्वज्जनसम्पूर्णा सभा सुरुचिरा तदा। अदृश्यत घनापाये पूर्णचन्द्रेव शर्वरी॥ 82.3 ॥

sā vidvajjanasampūrṇā sabhā surucirā tadā| adṛśyata ghanāpāye pūrṇacandreva śarvarī

विद्वानों से परिपूर्ण वह अत्यंत सुंदर सभा उस समय शरद्-ऋतु की मेघरहित पूर्णचन्द्रमा वाली रात्रि के समान प्रतीत हो रही थी।

श्लोक 4 (ayodhya.82.4)

राज्ञः तु प्रकृतीः सर्वाः समग्राः प्रेक्ष्य धर्मवित्। इदम् पुरोहितः वाक्यम् भरतम् मृदु च अब्रवीत्॥ 82.4 ॥

rājñaḥ tu prakṛtīḥ sarvāḥ samagrāḥ prekṣya dharmavit| idam purohitaḥ vākyam bharatam mṛdu ca abravīt

राजा की समस्त प्रजा को एकत्र देखकर, धर्मज्ञ पुरोहित वसिष्ठ ने भरत से कोमल वाणी में यह वचन कहा।

श्लोक 5 (ayodhya.82.5)

तात राजा दशरथः स्वर् गतः धर्मम् आचरन्। धन धान्यवतीम् स्फीताम् प्रदाय पृथिवीम् तव॥ 82.5 ॥

tāta rājā daśarathaḥ svar gataḥ dharmam ācaran| dhana dhānyavatīm sphītām pradāya pṛthivīm tava

"हे तात! धर्माचरण करते हुए राजा दशरथ, धन-धान्य से समृद्ध इस विशाल पृथ्वी को तुम्हें सौंपकर स्वर्ग सिधार गए।"

श्लोक 6 (ayodhya.82.6)

रामः तथा सत्य धृतिः सताम् धर्मम् अनुस्मरन्। न अजहात् पितुर् आदेशम् शशी ज्योत्स्नाम् इव उदितः॥ 82.6 ॥

rāmaḥ tathā satya dhṛtiḥ satām dharmam anusmaran| na ajahāt pituḥ ādeśam śaśī jyotsnām iva uditaḥ

"और सत्यनिष्ठ राम भी, सज्जनों के धर्म का स्मरण करते हुए, पिता की आज्ञा को उसी प्रकार नहीं त्याग सके जैसे उदित हुआ चन्द्रमा अपनी चाँदनी को नहीं त्यागता।"

श्लोक 7 (ayodhya.82.7)

पित्रा भ्रात्रा च ते दत्तम् राज्यम् निहत कण्टकम्। तत् भुन्क्ष्व मुदित अमात्यः क्षिप्रम् एव अभिषेचय॥ 82.7 ॥

pitrā bhrātrā ca te dattam rājyam nihata kaṇṭakam| tat bhunkṣva mudita amātyaḥ kṣipram eva abhiṣecaya

"तुम्हारे पिता और भ्राता द्वारा कण्टकरहित किया गया यह राज्य तुम्हें दिया गया है। हर्षित मंत्रियों सहित इसका उपभोग करो और शीघ्र ही राज्याभिषेक कराओ।"

श्लोक 8 (ayodhya.82.8)

उदीच्याः च प्रतीच्याः च दाक्षिणात्याः च केवलाः। कोट्या अपर अन्ताः सामुद्रा रत्नानि अभिहरन्तु ते॥ 82.8 ॥

udīcyāḥ ca pratīcyāḥ ca dākṣiṇātyāḥ ca kevalāḥ| koṭyā apara antāḥ sāmudrā ratnāni abhiharantu te

"उत्तर, पश्चिम और सम्पूर्ण दक्षिण के लोग, पश्चिमी सीमा-प्रान्तों के तथा समुद्र-यात्री व्यापारी भी तुम्हारे लिए करोड़ों रत्न भेंट में लाएँ।"

श्लोक 9 (ayodhya.82.9)

तत् श्रुत्वा भरतः वाक्यम् शोकेन अभिपरिप्लुतः। जगाम मनसा रामम् धर्मज्ञो धर्म कान्क्षया॥ 82.9 ॥

tat śrutvā bharataḥ vākyam śokena abhipariplutaḥ| jagāma manasā rāmam dharmajño dharma kāṅkṣayā

वह वचन सुनकर, शोक से अभिभूत धर्मज्ञ भरत का मन धर्म की चाह से राम की ओर ही चला गया।

श्लोक 10 (ayodhya.82.10)

स बाष्प कलया वाचा कल हंस स्वरः युवा। विललाप सभा मध्ये जगर्हे च पुरोहितम्॥ 82.10 ॥

sa bāṣpa kalayā vācā kala haṃsa svaraḥ yuvā| vilalāpa sabhā madhye jagarhe ca purohitam

अश्रुओं से गद्गद वाणी में, हंस-सी मधुर ध्वनि वाले उस युवक भरत ने सभा के मध्य विलाप किया और पुरोहित को भी उलाहना दिया।

श्लोक 11 (ayodhya.82.11)

चरित ब्रह्मचर्यस्य विद्या स्नातस्य धीमतः। धर्मे प्रयतमानस्य को राज्यम् मद्विधो हरेत्॥ 82.11 ॥

carita brahmacaryasya vidyā snātasya dhīmataḥ| dharme prayatamānasya ko rājyam madvidho haret

"जिसने ब्रह्मचर्य का पालन किया है, जो विद्या में स्नातक हो चुका है, बुद्धिमान् है और धर्म में सदा प्रयत्नशील है, उससे मेरे जैसा व्यक्ति भला राज्य कैसे छीन सकता है?"

श्लोक 12 (ayodhya.82.12)

कथम् दशरथाज् जातः भवेद् राज्य अपहारकः। राज्यम् च अहम् च रामस्य धर्मम् वक्तुम् इह अर्हसि॥ 82.12 ॥

katham daśarathāj jātaḥ bhaved rājya apahārakaḥ| rājyam ca aham ca rāmasya dharmam vaktum iha arhasi

"दशरथ से उत्पन्न पुत्र राज्य का अपहरणकर्ता कैसे हो सकता है? यह राज्य और मैं—दोनों ही राम के हैं। आपको इस विषय में धर्म बताना चाहिए।"

श्लोक 13 (ayodhya.82.13)

ज्येष्ठः श्रेष्ठः च धर्म आत्मा दिलीप नहुष उपमः। लब्धुम् अर्हति काकुत्स्थो राज्यम् दशरथो यथा॥ 82.13 ॥

jyeṣṭhaḥ śreṣṭhaḥ ca dharma ātmā dilīpa nahuṣa upamaḥ| labdhum arhati kākutstho rājyam daśaratho yathā

"ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, धर्मात्मा तथा दिलीप और नहुष के समान वे काकुत्स्थ राम ही, दशरथ के समान, इस राज्य को पाने के अधिकारी हैं।"

श्लोक 14 (ayodhya.82.14)

अनार्य जुष्टम् अस्वर्ग्यम् कुर्याम् पापम् अहम् यदि। इक्ष्वाकूणाम् अहम् लोके भवेयम् कुल पांसनः॥ 82.14 ॥

anārya juṣṭam asvargyam kuryām pāpam aham yadi| ikṣvākūṇām aham loke bhaveyam kula pāṃsanaḥ

"यदि मैं यह अनार्यों द्वारा किया जाने वाला, स्वर्ग से वंचित करने वाला पाप करूँ, तो इस लोक में इक्ष्वाकु-कुल को कलंकित करने वाला बन जाऊँगा।"

श्लोक 15 (ayodhya.82.15)

यद्द् हि मात्रा कृतम् पापम् न अहम् तत् अभिरोचये। इहस्थो वन दुर्गस्थम् नमस्यामि कृत अन्जलिः॥ 82.15 ॥

yad dhi mātrā kṛtam pāpam na aham tat abhirocaye| ihastho vana durgastham namasyāmi kṛta añjaliḥ

"मेरी माता द्वारा किए गए उस पाप का मैं तनिक भी समर्थन नहीं करता। यहीं खड़े होकर, दुर्गम वन में रहने वाले राम को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।"

श्लोक 16 (ayodhya.82.16)

रामम् एव अनुगच्चामि स राजा द्विपदाम् वरः। त्रयाणाम् अपि लोकानाम् राघवो राज्यम् अर्हति॥ 82.16 ॥

rāmam eva anugacchāmi sa rājā dvipadām varaḥ| trayāṇām api lokānām rāghavo rājyam arhati

"मैं तो केवल राम का ही अनुसरण करूँगा। मनुष्यों में श्रेष्ठ वे ही राजा हैं। राघव तो तीनों लोकों के राज्य के भी अधिकारी हैं।"

श्लोक 17 (ayodhya.82.17)

तत् वाक्यम् धर्म सम्युक्तम् श्रुत्वा सर्वे सभासदः। हर्षान् मुमुचुर् अश्रूणि रामे निहित चेतसः॥ 82.17 ॥

tat vākyam dharma saṃyuktam śrutvā sarve sabhāsadaḥ| harṣān mumucur aśrūṇi rāme nihita cetasaḥ

उन धर्मयुक्त वचनों को सुनकर, सभा में उपस्थित सभी लोग, जिनका मन राम में लगा हुआ था, हर्ष के आँसू बहाने लगे।

श्लोक 18 (ayodhya.82.18)

यदि तु आर्यम् न शक्ष्यामि विनिवर्तयितुम् वनात्। वने तत्र एव वत्स्यामि यथा आर्यो लक्ष्मणः तथा॥ 82.18 ॥

yadi tu āryam na śakṣyāmi vinivartayitum vanāt| vane tatra eva vatsyāmi yathā āryo lakṣmaṇaḥ tathā

"किन्तु यदि मैं आर्य को वन से लौटा न सका, तो मैं भी उसी वन में उसी प्रकार रहूँगा जैसे आर्य लक्ष्मण रह रहे हैं।"

श्लोक 19 (ayodhya.82.19)

सर्व उपायम् तु वर्तिष्ये विनिवर्तयितुम् बलात्। समक्षम् आर्य मिश्राणाम् साधूनाम् गुण वर्तिनाम्॥ 82.19 ॥

sarva upāyam tu vartiṣye vinivartayitum balāt| samakṣam ārya miśrāṇām sādhūnām guṇa vartinām

"किन्तु इन आर्यजनों, सज्जनों और गुणवानों के समक्ष, मैं हर उपाय का प्रयोग करके, आवश्यक होने पर बलपूर्वक भी, उन्हें लौटाने का प्रयत्न करूँगा।"

श्लोक 20 (ayodhya.82.20)

विष्टिकर्मान्तिकाः सर्वे मार्गशोधनरक्षकाः। प्रस्थापिता मया पूर्वम् यात्रापि मम रोचते॥ 82.20 ॥

viṣṭikarmāntikāḥ sarve mārgaśodhanarakṣakāḥ| prasthāpitā mayā pūrvam yātrāpi mama rocate

"मार्ग को साफ करने और उसकी रक्षा करने वाले सभी कर्मी मैं पहले ही आगे भेज चुका हूँ; और यह यात्रा मुझे भी भाती है।"

श्लोक 21 (ayodhya.82.21)

एवम् उक्त्वा तु धर्म आत्मा भरतः भ्रातृ वत्सलः। समीपस्थम् उवाच इदम् सुमन्त्रम् मन्त्र कोविदम्॥ 82.21 ॥

evam uktvā tu dharma ātmā bharataḥ bhrātṛ vatsalaḥ| samīpastham uvāca idam sumantram mantra kovidam

ऐसा कहकर, भ्रातृ-वत्सल धर्मात्मा भरत ने समीप खड़े मन्त्र-निपुण सुमन्त्र से यह कहा।

श्लोक 22 (ayodhya.82.22)

तूर्णम् उत्थाय गच्च त्वम् सुमन्त्र मम शासनात्। यात्राम् आज्ञापय क्षिप्रम् बलम् चैव समानय॥ 82.22 ॥

tūrṇam utthāya gaccha tvam sumantra mama śāsanāt| yātrām ājñāpaya kṣipram balam caiva samānaya

"हे सुमन्त्र! शीघ्र उठो और मेरी आज्ञा से जाओ; यात्रा की व्यवस्था तुरन्त कराओ और सेना को भी इकट्ठा करो।"

श्लोक 23 (ayodhya.82.23)

एवम् उक्तः सुमन्त्रः तु भरतेन महात्मना। हृष्टः सो अदिशत् सर्वम् यथा सम्दिष्टम् इष्टवत्॥ 82.23 ॥

evam uktaḥ sumantraḥ tu bharatena mahātmanā| hṛṣṭaḥ so adiśat sarvam yathā saṃdiṣṭam iṣṭavat

महात्मा भरत द्वारा इस प्रकार आज्ञप्त होकर, हर्षित सुमन्त्र ने सब कुछ यथा-आदेश एवं इच्छानुसार व्यवस्थित कर दिया।

श्लोक 24 (ayodhya.82.24)

ताः प्रहृष्टाः प्रकृतयो बल अध्यक्षा बलस्य च। श्रुत्वा यात्राम् समाज्ञप्ताम् राघवस्य निवर्तने॥ 82.24 ॥

tāḥ prahṛṣṭāḥ prakṛtayo bala adhyakṣā balasya ca| śrutvā yātrām samājñaptām rāghavasya nivartane

राघव को लौटा लाने के लिए यात्रा की आज्ञा दिए जाने का समाचार सुनकर, वे मंत्रीगण और सेनापतिगण अत्यंत हर्षित हो उठे।

श्लोक 25 (ayodhya.82.25)

ततः योध अन्गनाः सर्वा भर्तॄन् सर्वान् गृहे गृहे। यात्रा गमनम् आज्ञाय त्वरयन्ति स्म हर्षिताः॥ 82.25 ॥

tataḥ yodha aṅganāḥ sarvā bhartṝn sarvān gṛhe gṛhe| yātrā gamanam ājñāya tvarayanti sma harṣitāḥ

तब यात्रा प्रारम्भ होने का समाचार पाकर, घर-घर में योद्धाओं की पत्नियाँ हर्षित होकर अपने-अपने पतियों को शीघ्रता कराने लगीं।

श्लोक 26 (ayodhya.82.26)

ते हयैः गो रथैः शीघ्रैः स्यन्दनैः च मनो जवैः। सह योधैः बल अध्यक्षा बलम् सर्वम् अचोदयन्॥ 82.26 ॥

te hayaiḥ go rathaiḥ śīghraiḥ syandanaiḥ ca mano javaiḥ| saha yodhaiḥ bala adhyakṣā balam sarvam acodayan

सेनापतियों ने योद्धाओं सहित, तीव्रगामी घोड़ों, बैलगाड़ियों और मनोवेगी रथों से सुसज्जित समस्त सेना को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

श्लोक 27 (ayodhya.82.27)

सज्जम् तु तत् बलम् दृष्ट्वा भरतः गुरु सम्निधौ। रथम् मे त्वरयस्व इति सुमन्त्रम् पार्श्वतः अब्रवीत्॥ 82.27 ॥

sajjam tu tat balam dṛṣṭvā bharataḥ guru sannidhau| ratham me tvarayasva iti sumantram pārśvataḥ abravīt

सेना को तैयार देखकर, भरत ने गुरु वसिष्ठ की उपस्थिति में, पास खड़े सुमन्त्र से कहा, "मेरा रथ शीघ्र तैयार करो।"

श्लोक 28 (ayodhya.82.28)

भरतस्य तु तस्य आज्ञाम् प्रतिगृह्य प्रहर्षितः। रथम् गृहीत्वा प्रययौ युक्तम् परम वाजिभिः॥ 82.28 ॥

bharatasya tu tasya ājñām pratigṛhya praharṣitaḥ| ratham gṛhītvā prayayau yuktam parama vājibhiḥ

भरत की आज्ञा को हर्षपूर्वक स्वीकार कर, सुमन्त्र उत्तम अश्वों से युक्त रथ लेकर आगे बढ़े।

श्लोक 29 (ayodhya.82.29)

स राघवः सत्य धृतिः प्रतापवान्। ब्रुवन् सुयुक्तम् दृढ सत्य विक्रमः। गुरुम् महा अरण्य गतम् यशस्विनम्। प्रसादयिष्यन् भरतः अब्रवीत् तदा॥ 82.29 ॥

sa rāghavaḥ satya dhṛtiḥ pratāpavān| bruvan suyuktam dṛḍha satya vikramaḥ| gurum mahā araṇya gatam yaśasvinam| prasādayiṣyan bharataḥ abravīt tadā

तब सत्यनिष्ठ, प्रतापी, दृढ़ और सत्य-पराक्रमी राघव भरत ने, महावन में गए हुए यशस्वी बड़े भाई को मनाने की इच्छा से, अत्यंत उपयुक्त वाणी में यह कहा।

श्लोक 30 (ayodhya.82.30)

तूर्णम् समुत्थाय सुमन्त्र गच्च। बलस्य योगाय बल प्रधानान्। आनेतुम् इच्चामि हि तम् वनस्थम्। प्रसाद्य रामम् जगतः हिताय॥ 82.30 ॥

tūrṇam samutthāya sumantra gaccha| balasya yogāya bala pradhānān| ānetum icchāmi hi tam vanastham| prasādya rāmam jagataḥ hitāya

"हे सुमन्त्र! शीघ्र उठकर सेना के प्रधानों के पास जाओ, सेना को संगठित करने के लिए। मैं वन में रहने वाले राम को मनाकर, जगत के हित के लिए, वापस लाना चाहता हूँ।"

श्लोक 31 (ayodhya.82.31)

स सूत पुत्रः भरतेन सम्यग्। आज्ञापितः सम्परिपूर्ण कामः। शशास सर्वान् प्रकृति प्रधानान्। बलस्य मुख्यामः च सुहृज् जनम् च॥ 82.31 ॥

sa sūta putraḥ bharatena samyag| ājñāpitaḥ samparipūrṇa kāmaḥ| śaśāsa sarvān prakṛti pradhānān| balasya mukhyāmaḥ ca suhṛj janam ca

सूतपुत्र सुमन्त्र, भरत की इस समुचित आज्ञा से अपनी सारी अभिलाषा पूर्ण होते देख, समस्त प्रमुख मंत्रियों, सेना के प्रधानों और मित्रजनों को आदेश देने लगे।

श्लोक 32 (ayodhya.82.32)

ततः समुत्थाय कुले कुले ते। राजन्य वैश्या वृषलाः च विप्राः। अयूयुजन्न् उष्ट्र रथान् खरामः च। नागान् हयामः चैव कुल प्रसूतान्॥ 82.32 ॥

tataḥ samutthāya kule kule te| rājanya vaiśyā vṛṣalāḥ ca viprāḥ| ayūyujann uṣṭra rathān kharāmaḥ ca| nāgān hayāmaḥ caiva kula prasūtān

तब घर-घर में उठकर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और ब्राह्मण, ऊँटों, खच्चरों तथा कुलीन हाथियों और घोड़ों से रथों को जोतने लगे।

सर्ग 81सर्ग-सूचीसर्ग 83