Skip to main content

अयोध्याकाण्ड · सर्ग 83

गंगा-तट की ओर प्रस्थान

सर्ग 82सर्ग-सूचीसर्ग 84

श्लोक 1 (ayodhya.83.1)

ततः समुत्थितः काल्यम् आस्थाय स्यन्दन उत्तमम्। प्रययौ भरतः शीघ्रम् राम दर्शन कान्क्षया॥ 83.1 ॥

tataḥ samutthitaḥ kālyam āsthāya syandana uttamam| prayayau bharataḥ śīghram rāma darśana kāṅkṣayā

तब प्रातःकाल उठकर, उत्तम रथ पर आरूढ़ होकर, राम-दर्शन की आकांक्षा से भरत शीघ्रता से आगे बढ़े।

श्लोक 2 (ayodhya.83.2)

अग्रतः प्रययुस् तस्य सर्वे मन्त्रि पुरोधसः। अधिरुह्य हयैः युक्तान् रथान् सूर्य रथ उपमान्॥ 83.2 ॥

agrataḥ prayayus tasya sarve mantri purodhasaḥ| adhiruhya hayaiḥ yuktān rathān sūrya ratha upamān

उनके आगे-आगे सभी मंत्री और पुरोहित, सूर्य के रथ के समान अश्व-युक्त रथों पर सवार होकर चले।

श्लोक 3 (ayodhya.83.3)

नव नाग सहस्राणि कल्पितानि यथा विधि। अन्वयुर् भरतम् यान्तम् इक्ष्वाकु कुल नन्दनम्॥ 83.3 ॥

nava nāga sahasrāṇi kalpitāni yathā vidhi| anvayur bharatam yāntam ikṣvāku kula nandanam

विधिपूर्वक सुसज्जित नौ हजार हाथी, इक्ष्वाकु-कुल के आनन्दवर्धक भरत के साथ यात्रा करते हुए चले।

श्लोक 4 (ayodhya.83.4)

षष्ठी रथ सहस्राणि धन्विनो विविध आयुधाः। अन्वयुर् भरतम् यान्तम् राज पुत्रम् यशस्विनम्॥ 83.4 ॥

ṣaṣṭhī ratha sahasrāṇi dhanvino vividha āyudhāḥ| anvayur bharatam yāntam rāja putram yaśasvinam

धनुर्धारी और विविध शस्त्रों से सुसज्जित साठ हजार रथ, यशस्वी राजकुमार भरत के साथ यात्रा में चले।

श्लोक 5 (ayodhya.83.5)

शतम् सहस्राणि अश्वानाम् समारूढानि राघवम्। अन्वयुर् भरतम् यान्तम् राज पुत्रम् यशस्विनम्॥ 83.5 ॥

śatam sahasrāṇi aśvānām samārūḍhāni rāghavam| anvayur bharatam yāntam rāja putram yaśasvinam

एक लाख अश्वारोही सैनिक, यशस्वी राजकुमार राघव भरत के साथ यात्रा में चले।

श्लोक 6 (ayodhya.83.6)

कैकेयी च सुमित्रा च कौसल्या च यशस्विनी। राम आनयन सम्हृष्टा ययुर् यानेन भास्वता॥ 83.6 ॥

kaikeyī ca sumitrā ca kausalyā ca yaśasvinī| rāma ānayana saṃhṛṣṭā yayur yānena bhāsvatā

कैकेयी, सुमित्रा और यशस्विनी कौसल्या, राम को वापस लाने के विचार से हर्षित होकर, एक तेजोमय यान में सवार होकर चलीं।

श्लोक 7 (ayodhya.83.7)

प्रयाताः च आर्य सम्घाता रामम् द्रष्टुम् सलक्ष्मणम्। तस्य एव च कथाः चित्राः कुर्वाणा हृष्ट मानसाः॥ 83.7 ॥

prayātāḥ ca ārya saṃghātā rāmam draṣṭum salakṣmaṇam| tasya eva ca kathāḥ citrāḥ kurvāṇā hṛṣṭa mānasāḥ

श्रेष्ठजनों का समूह भी, लक्ष्मण सहित राम को देखने के लिए, उन्हीं की अद्भुत कथाएँ कहते हुए हर्षित मन से चल पड़ा।

श्लोक 8 (ayodhya.83.8)

मेघ श्यामम् महा बाहुम् स्थिर सत्त्वम् दृढ व्रतम्। कदा द्रक्ष्यामहे रामम् जगतः शोक नाशनम्॥ 83.8 ॥

megha śyāmam mahā bāhum sthira sattvam dṛḍha vratam| kadā drakṣyāmahe rāmam jagataḥ śoka nāśanam

"मेघ के समान श्याम, महाबाहु, स्थिरचित्त, दृढ़व्रती, जगत के शोक का नाश करने वाले राम को हम कब देखेंगे?"

श्लोक 9 (ayodhya.83.9)

दृष्टएव हि नः शोकम् अपनेष्यति राघवः। तमः सर्वस्य लोकस्य समुद्यन्न् इव भास्करः॥ 83.9 ॥

dṛṣṭa eva hi naḥ śokam apaneṣyati rāghavaḥ| tamaḥ sarvasya lokasya samudyann iva bhāskaraḥ

"राघव के दर्शन मात्र से ही हमारा शोक उसी प्रकार दूर हो जाएगा जैसे उदय होता हुआ सूर्य सम्पूर्ण जगत के अंधकार को दूर कर देता है।"

श्लोक 10 (ayodhya.83.10)

इति एवम् कथयन्तः ते सम्प्रहृष्टाः कथाः शुभाः। परिष्वजानाः च अन्योन्यम् ययुर् नागरिकाः तदा॥ 83.10 ॥

iti evam kathayantaḥ te samprahṛṣṭāḥ kathāḥ śubhāḥ| pariṣvajānāḥ ca anyonyam yayur nāgarikāḥ tadā

इस प्रकार परस्पर शुभ और आनन्ददायक कथाएँ कहते और एक-दूसरे का आलिंगन करते हुए, नगरवासी उस समय चल रहे थे।

श्लोक 11 (ayodhya.83.11)

ये च तत्र अपरे सर्वे सम्मता ये च नैगमाः। रामम् प्रति ययुर् हृष्टाः सर्वाः प्रकृतयः तदा॥ 83.11 ॥

ye ca tatra apare sarve sammatā ye ca naigamāḥ| rāmam prati yayur hṛṣṭāḥ sarvāḥ prakṛtayaḥ tadā

वहाँ के अन्य सभी सम्मानित लोग, व्यापारीगण तथा सम्पूर्ण प्रजा भी उस समय हर्षपूर्वक राम की ओर चल पड़ी।

श्लोक 12 (ayodhya.83.12)

मणि काराः च ये केचित् कुम्भ काराः च शोभनाः। सूत्र कर्म कृतः चैव ये च शस्त्र उपजीविनः॥ 83.12 ॥

maṇi kārāḥ ca ye kecit kumbha kārāḥ ca śobhanāḥ| sūtra karma kṛtaḥ caiva ye ca śastra upajīvinaḥ

कुछ मणिकार, कुशल कुम्हार, बढ़ई, तथा शस्त्र बनाकर जीविका चलाने वाले लोग,

श्लोक 13 (ayodhya.83.13)

मायूरकाः क्राकचिका रोचका वेधकाः तथा। दन्त काराः सुधा काराः तथा गन्ध उपजीविनः॥ 83.13 ॥

māyūrakāḥ krākacikā rocakā vedhakāḥ tathā| danta kārāḥ sudhā kārāḥ tathā gandha upajīvinaḥ

मोरपंख से वस्तुएँ बनाने वाले, आरा चलाने वाले, आभूषण गढ़ने वाले, रत्न बेधने वाले, हाथी-दाँत का काम करने वाले, चूना बनाने वाले, तथा गंध-द्रव्य से जीविका चलाने वाले,

श्लोक 14 (ayodhya.83.14)

सुवर्ण काराः प्रख्याताः तथा कम्बल धावकाः। स्नापक आच्चादका वैद्या धूपकाः शौण्डिकाः तथा॥ 83.14 ॥

suvarṇa kārāḥ prakhyātāḥ tathā kambala dhāvakāḥ| snāpaka ācchādakā vaidyā dhūpakāḥ śauṇḍikāḥ tathā

प्रसिद्ध सुनार, ऊनी कम्बलों को धोने वाले, स्नान कराने और वस्त्राच्छादन करने वाले, वैद्य, धूप जलाने वाले, तथा मदिरा बेचने वाले,

श्लोक 15 (ayodhya.83.15)

रजकाः तुन्न वायाः च ग्राम घोष महत्तराः। शैलूषाः च सह स्त्रीभिर् यान्ति कैवर्तकाः तथा॥ 83.15 ॥

rajakāḥ tunna vāyāḥ ca grāma ghoṣa mahattarāḥ| śailūṣāḥ ca saha strībhir yānti kaivartakāḥ tathā

धोबी, दर्जी, गाँव और बस्तियों के मुखिया, अपनी स्त्रियों सहित नर्तक, तथा मछुआरे—ये सब भी उस यात्रा में चल पड़े।

श्लोक 16 (ayodhya.83.16)

समाहिता वेदविदो ब्राह्मणा वृत्त सम्मताः। गो रथैः भरतम् यान्तम् अनुजग्मुः सहस्रशः॥ 83.16 ॥

samāhitā vedavido brāhmaṇā vṛtta sammatāḥ| go rathaiḥ bharatam yāntam anujagmuḥ sahasraśaḥ

वेदों में पारंगत, सुशील एवं संयमित हजारों ब्राह्मण, बैलगाड़ियों पर सवार होकर, यात्रा करते हुए भरत के पीछे-पीछे चले।

श्लोक 17 (ayodhya.83.17)

सुवेषाः शुद्ध वसनाः ताम्र मृष्ट अनुलेपनाः। सर्वे ते विविधैः यानैः शनैः भरतम् अन्वयुः॥ 83.17 ॥

suveṣāḥ śuddha vasanāḥ tāmra mṛṣṭa anulepanāḥ| sarve te vividhaiḥ yānaiḥ śanaiḥ bharatam anvayuḥ

सुसज्जित, स्वच्छ वस्त्र पहने, ताम्रवर्णी उबटन से अनुलिप्त वे सभी लोग नाना प्रकार के वाहनों पर सवार होकर, धीरे-धीरे भरत के पीछे चले।

श्लोक 18 (ayodhya.83.18)

प्रहृष्ट मुदिता सेना सान्वयात् कैकयी सुतम्। भ्रातुरानयने यान्तम् भरतम् भ्रातृवत्सलम्॥ 83.18 ॥

prahṛṣṭa muditā senā sānvayāt kaikayī sutam| bhrāturānayane yāntam bharatam bhrātṛvatsalam

वह हर्षित और आनन्दित सेना, अपने भाई को वापस लाने के लिए परिवार सहित चल पड़े हुए, भ्रातृ-वत्सल कैकेयी-पुत्र भरत के साथ-साथ चल रही थी।

श्लोक 19 (ayodhya.83.19)

ते गत्वा दूरमध्वानम् रथम् यानाश्वकुञ्जरैः। समासेदुस्ततो गङ्गाम् शृङ्गिबेरपुरम् प्रति॥ 83.19 ॥

te gatvā dūramadhvānam ratham yānāśvakuñjaraiḥ| samāsedustato gaṅgām śṛṅgiberapuram prati

रथों, वाहनों, अश्वों और गजों पर बहुत दूर तक यात्रा करके, वे लोग तत्पश्चात् गंगा के तट पर, शृंगिबेरपुर के निकट, जा पहुँचे।

श्लोक 20 (ayodhya.83.20)

यत्र रामसखो वीरो गुहो ज्ञातिगणैर्वृतः। निवसत्यप्रमादेन देशम् तम् परिपालयन्॥ 83.20 ॥

yatra rāmasakho vīro guho jñātigaṇairvṛtaḥ| nivasatyapramādena deśam tam paripālayan

जहाँ राम के मित्र वीर गुह, अपने बन्धु-बान्धवों से घिरे हुए, उस प्रदेश की सावधानीपूर्वक रक्षा करते हुए निवास करते थे।

श्लोक 21 (ayodhya.83.21)

उपेत्य तीरम् गङ्गायाश्चक्रमाकैरलङ्कतम्। व्यवतिष्ठत सा सेना भरतस्य अनुयायिनी॥ 83.21 ॥

upetya tīram gaṅgāyāścakramākairalaṅkatam| vyavatiṣṭhata sā senā bharatasya anuyāyinī

चक्रवाक पक्षियों से सुशोभित गंगा के तट पर पहुँचकर, भरत का अनुसरण करने वाली वह सेना वहीं ठहर गई।

श्लोक 22 (ayodhya.83.22)

निरीक्ष्य अनुगताम् सेनाम् ताम् च गन्गाम् शिव उदकाम्। भरतः सचिवान् सर्वान् अब्रवीद् वाक्य कोविदः॥ 83.22 ॥

nirīkṣya anugatām senām tām ca gaṅgām śiva udakām| bharataḥ sacivān sarvān abravīd vākya kovidaḥ

अपने पीछे आई हुई सेना को और शुभ जल वाली उस गंगा को देखकर, वाणी में निपुण भरत ने अपने सभी मंत्रियों से यह कहा।

श्लोक 23 (ayodhya.83.23)

निवेशयत मे सैन्यम् अभिप्रायेण सर्वशः। विश्रान्तः प्रतरिष्यामः श्वैदानीम् महा नदीम्॥ 83.23 ॥

niveśayata me sainyam abhiprāyeṇa sarvaśaḥ| viśrāntaḥ pratariṣyāmaḥ śvaidānīm mahā nadīm

"मेरी इच्छा है कि मेरी सेना पूरी तरह विश्राम करे; विश्राम कर लेने के पश्चात् हम कल इस महानदी को पार करेंगे।"

श्लोक 24 (ayodhya.83.24)

दातुम् च तावद् इच्चामि स्वर् गतस्य मही पतेः। और्ध्वदेह निमित्त अर्थम् अवतीर्य उदकम् नदीम्॥ 83.24 ॥

dātum ca tāvad icchāmi svar gatasya mahī pateḥ| aurdhvadeha nimitta artham avatīrya udakam nadīm

"साथ ही, नदी में उतरकर, स्वर्गवासी हुए महाराज दशरथ के लिए, उनकी उत्तर-क्रिया के निमित्त, मैं जल-तर्पण करना चाहता हूँ।"

श्लोक 25 (ayodhya.83.25)

तस्य एवम् ब्रुवतः अमात्याः तथा इति उक्त्वा समाहिताः। न्यवेशयंस् तामः छन्देन स्वेन स्वेन पृथक् पृथक्॥ 83.25 ॥

tasya evam bruvataḥ amātyāḥ tathā iti uktvā samāhitāḥ| nyaveśayaṃs tāmaḥ chandena svena svena pṛthak pṛthak

उनके ऐसा कहने पर, मंत्रियों ने सावधानीपूर्वक "ऐसा ही हो" कहकर, उस सेना को अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार पृथक्-पृथक् स्थानों में बसा दिया।

श्लोक 26 (ayodhya.83.26)

निवेश्य गन्गाम् अनु ताम् महा नदीम्। चमूम् विधानैः परिबर्ह शोभिनीम्। उवास रामस्य तदा महात्मनो। विचिन्तयानो भरतः निवर्तनम्॥ 83.26 ॥

niveśya gaṅgām anu tām mahā nadīm| camūm vidhānaiḥ paribarha śobhinīm| uvāsa rāmasya tadā mahātmano| vicintayāno bharataḥ nivartanam

उस महानदी गंगा के तट पर, अपने साज-सज्जा से सुशोभित उस सेना को विधिपूर्वक बसाकर, भरत वहीं ठहर गए और महात्मा राम को वापस लाने का उपाय सोचने लगे।

सर्ग 82सर्ग-सूचीसर्ग 84