अयोध्याकाण्ड · सर्ग 87
गुह के शिविर में भरत का विषाद
श्लोक 1 (ayodhya.87.1)
गुहस्य वचनम् श्रुत्वा भरतो भृशम् अप्रियम् । ध्यानम् जगाम तत्रैव यत्र तत् श्रुतम् अप्रियम् ॥ 87.1 ॥
guhasya vacanam śrutvā bharato bhṛśam apriyam | dhyānam jagāma tatraiva yatra tat śrutam apriyam || 87.1 ||
गुह के अत्यन्त अप्रिय वचन सुनकर भरत उसी विषय के चिन्तन में डूब गए, जिसके विषय में वह अप्रिय बात सुनी गई थी।
श्लोक 2 (ayodhya.87.2)
सुकुमारो महासत्त्वः सिंहस्कन्धो महाभुजः । पुण्डरीक विशालाक्षः तरुणः प्रिय दर्शनः ॥ 87.2 ॥
sukumāro mahāsattvaḥ siṃhaskandho mahābhujaḥ | puṇḍarīka viśālākṣaḥ taruṇaḥ priya darśanaḥ || 87.2 ||
वह कोमल, महाबलशाली, सिंह के समान कंधों वाला, विशाल भुजाओं वाला, कमल के समान बड़ी आँखों वाला, तरुण और सुन्दर राजकुमार,
श्लोक 3 (ayodhya.87.3)
प्रत्याश्वस्य मुहूर्तम् तु कालम् परम दुर्मनाः । पपात सहसा तोत्रैर् हृदि विद्ध इव द्विपः ॥ 87.3 ॥
pratyāśvasya muhūrtam tu kālam parama durmanāḥ | papāta sahasā totrair hṛdi viddha iva dvipaḥ || 87.3 ||
—क्षणभर सचेत रहकर, अत्यन्त उदास हो, अचानक भूमि पर गिर पड़े, मानो अंकुशों से हृदय में बिंधा हुआ कोई गजराज हो।
श्लोक 4 (ayodhya.87.4)
भरतम् मूर्च्छितम् दृष्ट्वा विवर्णवदनो गुहः । बभूव व्यथितस् तत्र भूमिकम्पे यथा द्रुमः ॥ 87.4 ॥
bharatam mūrcchitam dṛṣṭvā vivarṇavadano guhaḥ | babhūva vyathitas tatra bhūmikampe yathā drumaḥ || 87.4 ||
भरत को मूर्च्छित देखकर गुह का मुख विवर्ण पड़ गया, और वह वहाँ भूकम्प में हिलते वृक्ष के समान व्यथित हो उठा।
श्लोक 5 (ayodhya.87.5)
तद् अवस्थम् तु भरतम् शत्रुघ्नो ऽनन्तर स्थितः । परिष्वज्य रुरोद उच्चैर् विसंज्ञः शोक कर्शितः ॥ 87.5 ॥
tad avastham tu bharatam śatrughno'nantara sthitaḥ | pariṣvajya ruroda uccair visaṃjñaḥ śoka karśitaḥ || 87.5 ||
उस अवस्था में पड़े भरत को, पास ही खड़े शत्रुघ्न ने बाँहों में भर लिया, और शोक से क्षीण, चेतनाशून्य-से होकर वे ज़ोर-ज़ोर से रो पड़े।
श्लोक 6 (ayodhya.87.6)
ततः सर्वाः समापेतुर् मातरो भरतस्य ताः । उपवास कृशा दीना भर्तृ व्यसन कर्शिताः ॥ 87.6 ॥
tataḥ sarvāḥ samāpetur mātaro bharatasya tāḥ | upavāsa kṛśā dīnā bhartṛ vyasana karśitāḥ || 87.6 ||
तब उपवास से कृश, दीन, अपने स्वामी के दुर्भाग्य से पीड़ित भरत की वे सभी माताएँ वहाँ दौड़ी आईं।
श्लोक 7 (ayodhya.87.7)
ताश् च तम् पतितम् भूमौ रुदन्त्यः पर्यवारयन् । कौसल्या तु अनुसृत्य एनम् दुर्मनाः परिषस्वजे ॥ 87.7 ॥
tāś ca tam patitam bhūmau rudantyaḥ paryavārayan | kausalyā tu anusṛtya enam durmanāḥ pariṣasvaje || 87.7 ||
वे सब रोती हुई भूमि पर पड़े भरत को घेरकर खड़ी हो गईं। कौसल्या भारी मन से उनके पास जाकर उन्हें गले लगा लिया।
श्लोक 8 (ayodhya.87.8)
वत्सला स्वम् यथा वत्सम् उपगूह्य तपस्विनी । परिपप्रच्छ भरतम् रुदन्ती शोक लालसा ॥ 87.8 ॥
vatsalā svam yathā vatsam upagūhya tapasvinī | paripapraccha bharatam rudantī śoka lālasā || 87.8 ||
वह वत्सल, तपस्विनी कौसल्या, जैसे गाय अपने बछड़े को हृदय से लगाती है वैसे ही भरत को हृदय से लगाकर, शोक-विह्वल हो रोती हुई पूछने लगीं—
श्लोक 9 (ayodhya.87.9)
पुत्र व्याधिर् न ते कच्चित् शरीरम् परिबाधते । अद्य राज कुलस्य अस्य त्वद् अधीनम् हि जीवितम् ॥ 87.9 ॥
putra vyādhir na te kaccit śarīram paribādhate | adya rāja kulasya asya tvad adhīnam hi jīvitam || 87.9 ||
'हे पुत्र! आशा है कोई व्याधि तुम्हारे शरीर को कष्ट नहीं दे रही? अब तो इस राजकुल का जीवन तुम्हारे ही अधीन है।'
श्लोक 10 (ayodhya.87.10)
त्वाम् दृष्ट्वा पुत्र जीवामि रामे सभ्रातृके गते । वृत्ते दशरथे राज्ञि नाथ एकः त्वम् अद्य नः ॥ 87.10 ॥
tvām dṛṣṭvā putra jīvāmi rāme sabhrātṛke gate | vṛtte daśarathe rājñi nātha ekaḥ tvam adya naḥ || 87.10 ||
'हे पुत्र! तुम्हें देखकर ही मैं जीवित हूँ, क्योंकि राम अपने भाई सहित वन को चले गए और राजा दशरथ का देहान्त हो गया। अब तुम ही हम सबके एकमात्र आश्रय हो।'
श्लोक 11 (ayodhya.87.11)
कच्चिन् न लक्ष्मणे पुत्र श्रुतम् ते किंचिद् अप्रियम् । पुत्रे वा ह्य् एकपुत्रायाः सह भार्ये वनम् गते ॥ 87.11 ॥
kaccin na lakṣmaṇe putra śrutam te kiṃcid apriyam | putre vā hy ekaputrāyāḥ saha bhārye vanam gate || 87.11 ||
'हे पुत्र! आशा है तुमने लक्ष्मण के विषय में, अथवा वन गए अपनी पत्नी सहित मेरे एकमात्र पुत्र राम के विषय में, कोई अप्रिय समाचार नहीं सुना है?'
श्लोक 12 (ayodhya.87.12)
स मुहूर्तम् समाश्वस्य रुदन्न् एव महायशाः । कौसल्याम् परिसान्त्व्य इदम् गुहम् वचनम् अब्रवीत् ॥ 87.12 ॥
sa muhūrtam samāśvasya rudann eva mahāyaśāḥ | kausalyām parisāntvya idam guham vacanam abravīt || 87.12 ||
महायशस्वी भरत क्षणभर धीरज बाँधकर, रोते-रोते ही कौसल्या को सान्त्वना देकर, गुह से इस प्रकार बोले—
श्लोक 13 (ayodhya.87.13)
भ्राता मे क्व अवसद् रात्रिम् क्व सीता क्व च लक्ष्मणः । अस्वपत् शयने कस्मिन् किम् भुक्त्वा गुह शंस मे ॥ 87.13 ॥
bhrātā me kva avasad rātrim kva sītā kva ca lakṣmaṇaḥ | asvapat śayane kasmin kim bhuktvā guha śaṃsa me || 87.13 ||
'हे गुह! मेरा भाई रात्रि में कहाँ ठहरा? सीता कहाँ रहीं, और लक्ष्मण कहाँ रहे? वे किस शय्या पर और क्या खाकर सोए—मुझे बताओ।'
श्लोक 14 (ayodhya.87.14)
सो ऽब्रवीद् भरतम् पृष्टो निषादाधिपतिर् गुहः । यद्विधम् प्रतिपेदे च रामे प्रिय हिते अतिथौ ॥ 87.14 ॥
so'bravīd bharatam pṛṣṭo niṣādādhipatir guhaḥ | yadvidham pratipede ca rāme priya hite atithau || 87.14 ||
भरत के पूछने पर निषादराज गुह ने बताया कि उन्होंने अपने प्रिय एवं हितैषी अतिथि राम का आतिथ्य किस प्रकार किया था।
श्लोक 15 (ayodhya.87.15)
अन्नम् उच्चावचम् भक्ष्याः फलानि विविधानि च । रामाय अभ्यवहार अर्थम् बहु च उपहृतम् मया ॥ 87.15 ॥
annam uccāvacam bhakṣyāḥ phalāni vividhāni ca | rāmāya abhyavahāra artham bahu ca upahṛtam mayā || 87.15 ||
'मैंने राम के भोजन के लिए विविध प्रकार के अन्न, खाद्य पदार्थ और नाना फल बार-बार भेंट किए।'
श्लोक 16 (ayodhya.87.16)
तत् सर्वम् प्रत्यनुज्ञासीद् रामः सत्य पराक्रमः । न हि तत् प्रत्यगृह्णात् स क्षत्र धर्मम् अनुस्मरन् ॥ 87.16 ॥
tat sarvam pratyanujñāsīd rāmaḥ satya parākramaḥ | na hi tat pratyagṛhṇāt sa kṣatra dharmam anusmaran || 87.16 ||
'किन्तु सत्यपराक्रमी राम ने वह सब लौटा दिया। अपने क्षत्रिय-धर्म का स्मरण करते हुए उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया।'
श्लोक 17 (ayodhya.87.17)
न ह्य् अस्माभिः प्रतिग्राह्यम् सखे देयम् तु सर्वदा । इति तेन वयम् राजन्न् अनुनीता महात्मना ॥ 87.17 ॥
na hy asmābhiḥ pratigrāhyam sakhe deyam tu sarvadā | iti tena vayam rājann anunītā mahātmanā || 87.17 ||
'उन महात्मा ने यह कहकर हमें समझा दिया - हे मित्र! हमें तो सदा देना ही है, ग्रहण करना हमारे लिए उचित नहीं।'
श्लोक 18 (ayodhya.87.18)
लक्ष्मणेन समानीतम् पीत्वा वारि महायशाः । औपवास्यम् तदा अकार्षीद् राघवः सह सीतया ॥ 87.18 ॥
lakṣmaṇena samānītam pītvā vāri mahāyaśāḥ | aupavāsyam tadā akārṣīd rāghavaḥ saha sītayā || 87.18 ||
महायशस्वी राम ने लक्ष्मण द्वारा लाए गए जल को पीकर सीता सहित उस दिन उपवास ही किया।
श्लोक 19 (ayodhya.87.19)
ततस् तु जल शेषेण लक्ष्मणो ऽप्य् अकरोत् तदा । वाग्यताः ते त्रयः संध्याम् उपासत समाहिताः ॥ 87.19 ॥
tatas tu jala śeṣeṇa lakṣmaṇo'py akarot tadā | vāgyatāḥ te trayaḥ saṃdhyām upāsata samāhitāḥ || 87.19 ||
फिर उसी बचे हुए जल से लक्ष्मण ने भी वैसा ही किया, और वे तीनों मौन होकर एकाग्रचित्त से सन्ध्या-वन्दन करने लगे।
श्लोक 20 (ayodhya.87.20)
सौमित्रिः तु ततः पश्चाद् अकरोत् स्वास्तरम् शुभम् । स्वयम् आनीय बर्हींषि क्षिप्रम् राघव कारणात् ॥ 87.20 ॥
saumitriḥ tu tataḥ paścād akarot svāstaram śubham | svayam ānīya barhīṃṣi kṣipram rāghava kāraṇāt || 87.20 ||
तत्पश्चात् सौमित्र (लक्ष्मण) ने स्वयं कुशाएँ ला-लाकर राम के लिए शीघ्र ही एक सुन्दर शय्या बना दी।
श्लोक 21 (ayodhya.87.21)
तस्मिन् समाविशद् रामः स्वास्तरे सह सीतया । प्रक्षाल्य च तयोः पादौ अपचक्राम लक्ष्मणः ॥ 87.21 ॥
tasmin samāviśad rāmaḥ svāstare saha sītayā | prakṣālya ca tayoḥ pādau apacakrāma lakṣmaṇaḥ || 87.21 ||
राम सीता सहित उस शय्या पर लेट गए। दोनों के चरण धोकर लक्ष्मण कुछ दूर हट गए।
श्लोक 22 (ayodhya.87.22)
एतत् तद् इङ्गुदी मूलम् इदम् एव च तत् तृणम् । यस्मिन् रामश् च सीता च रात्रिम् ताम् शयितौ उभौ ॥ 87.22 ॥
etat tad iṅgudī mūlam idam eva ca tat tṛṇam | yasmin rāmaś ca sītā ca rātrim tām śayitau ubhau || 87.22 ||
'यही वह इंगुदी वृक्ष का मूल है, और यही वह तृण-शय्या है, जिस पर राम और सीता दोनों ने वह रात्रि बिताई थी।'
श्लोक 23 (ayodhya.87.23)
नियम्य पृष्ठे तु तलाङ्गुलित्रवान् । शरैः सुपूर्णौ इषुधी परन्तपः । महद्धनुः सज्यम् उपोह्य लक्ष्मणो । निशाम् अतिष्ठत् परितो ऽस्य केवलम् ॥ 87.23 ॥
niyamya pṛṣṭhe tu talāṅgulitravān | śaraiḥ supūrṇau iṣudhī parantapaḥ | mahaddhanuḥ sajyam upohya lakṣmaṇo | niśām atiṣṭhat parito'sya kevalam || 87.23 ||
उस शत्रु-सन्तापक लक्ष्मण ने हाथों में तर्जनी-रक्षक दस्ताने बाँधकर, पीठ पर बाणों से भरे दो तरकश धारण किए, और प्रत्यंचा-सज्जित महान धनुष लेकर, अकेले ही सारी रात राम के चारों ओर पहरा दिया।
श्लोक 24 (ayodhya.87.24)
ततस् तु अहम् च उत्तम बाण चापधृक् । स्थितो ऽभवम् तत्र स यत्र लक्ष्मणः । अतन्द्रिभिर् ज्ञातिभिर् आत्त कार्मुकैर् । महेन्द्र कल्पम् परिपालयन् तदा ॥ 87.24 ॥
tatas tu aham ca uttama bāṇa cāpadhṛk | sthito'bhavam tatra sa yatra lakṣmaṇaḥ | atandribhir jñātibhir ātta kārmukair | mahendra kalpam paripālayan tadā || 87.24 ||
उस समय मैं भी उत्तम बाण-धनुष धारण किए, अपने सजग, धनुर्धारी बन्धुजनों सहित, वहीं जाकर खड़ा हो गया, जहाँ लक्ष्मण इन्द्र-तुल्य राम की रखवाली कर रहे थे।