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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 96

लक्ष्मण का क्रोध

सर्ग 95सर्ग-सूचीसर्ग 97

श्लोक 1 (ayodhya.96.1)

तां तथा दर्शयित्वा तु मैथिलीं गिरिनिम्नगाम्। निषसाद गिरिप्रस्थे सीतां मांसेन छन्दयन्॥ 96.1 ॥

tāṃ tathā darśayitvā tu maithilīṃ girinimnagām| niṣasāda giriprasthe sītāṃ māṃsena chandayan

इस प्रकार मैथिली सीता को पर्वत से निकलने वाली उस मन्दाकिनी नदी को दिखाकर, राम पर्वत की ढाल पर बैठ गए और मांस से सीता को तृप्त करने लगे।

श्लोक 2 (ayodhya.96.2)

इदं मेध्यमिदं स्वादु निष्टप्तमिदमग्निना। एवमास्ते स धर्मात्मा सीतया सह राघवः॥ 96.2 ॥

idaṃ medhyamidaṃ svādu niṣṭaptamidamagninā| evamāste sa dharmātmā sītayā saha rāghavaḥ

"यह पवित्र है, यह स्वादिष्ट है, यह अग्नि में भली-भाँति भुना हुआ है" - इस प्रकार कहते हुए धर्मात्मा राघव सीता के साथ वहाँ रहने लगे।

श्लोक 3 (ayodhya.96.3)

तथा तत्रासतस्तस्य भरतस्योपयायिनः। सैन्यरेणुश्च शब्दश्च प्रादुरास्तां नभस्स्पृशौ॥ 96.3 ॥

tathā tatrāsatastasya bharatasyopayāyinaḥ| sainyareṇuśca śabdaśca prādurāstāṃ nabhasspṛśau

जब वे वहाँ इस प्रकार बैठे थे, तब समीप आती हुई भरत की सेना की धूल और ध्वनि आकाश को छूती हुई प्रकट हुई।

श्लोक 4 (ayodhya.96.4)

एतस्मिन्नन्तरे त्रस्ताः शब्देन महता ततः। अर्दिता यूथपा मत्ताः सयूथा दुद्रुवुर्दिशः॥ 96.4 ॥

etasminnantare trastāḥ śabdena mahatā tataḥ| arditā yūthapā mattāḥ sayūthā dudruvurdiśaḥ

इसी बीच उस भारी शब्द से भयभीत, पीड़ित और मदमत्त पशु-यूथपति अपने-अपने झुंडों सहित चारों दिशाओं में भाग गए।

श्लोक 5 (ayodhya.96.5)

स तं सैन्यसमुद्धूतं शब्दं शुश्राव राघवः। तांश्च विप्रद्रुतान् सर्वान् यूथपानन्ववैक्षत॥ 96.5 ॥

sa taṃ sainyasamuddhūtaṃ śabdaṃ śuśrāva rāghavaḥ| tāṃśca vipradrutān sarvān yūthapānanvavaikṣata

राघव ने सेना से उत्पन्न उस शब्द को सुना और भागते हुए उन सभी यूथपतियों को देखा।

श्लोक 6 (ayodhya.96.6)

तांश्च विद्रवतो दृष्ट्वा तं च श्रुत्वा च निस्वनम्। उवाच रामः सौमित्रिं लक्ष्मणं दीप्ततेजसम्॥ 96.6 ॥

tāṃśca vidravato dṛṣṭvā taṃ ca śrutvā ca nisvanam| uvāca rāmaḥ saumitriṃ lakṣmaṇaṃ dīptatejasam

उन्हें भागते देखकर और वह ध्वनि सुनकर, राम ने तेजस्वी सुमित्रा-पुत्र लक्ष्मण से कहा।

श्लोक 7 (ayodhya.96.7)

हन्त लक्ष्मण पश्येह सुमित्रा सुप्रजास्त्वया। भीमस्तनितगम्भीरस्तुमुलः श्रूयते स्वनः॥ 96.7 ॥

hanta lakṣmaṇa paśyeha sumitrā suprajāstvayā| bhīmastanitagambhīrastumulaḥ śrūyate svanaḥ

"अरे लक्ष्मण! देखो, तुम्हारे कारण सुमित्रा सुपुत्रवती हुई हैं। यहाँ भयंकर गर्जन के समान गंभीर और कोलाहलपूर्ण ध्वनि सुनाई दे रही है।"

श्लोक 8 (ayodhya.96.8)

गजयूथानि वा ऽरण्ये महिषा वा महावने। वित्रासिता मृगाः सिंहैः सहसा प्रद्रुता दिशः॥ 96.8 ॥

gajayūthāni vā 'raṇye mahiṣā vā mahāvane| vitrāsitā mṛgāḥ siṃhaiḥ sahasā pradrutā diśaḥ

"वन में हाथियों के झुंड होंगे, या महावन में भैंसे, अथवा सिंहों से डरकर सहसा दिशाओं में भागते हुए मृग होंगे।"

श्लोक 9 (ayodhya.96.9)

राजा वा राजमात्रो वा मृगयामटते वने। अन्यद्वा श्वापदं किञ्चित् सौमित्रे ज्ञातुमर्हसि॥ 96.9 ॥

rājā vā rājamātro vā mṛgayāmaṭate vane| anyadvā śvāpadaṃ kiñcit saumitre jñātumarhasi

"अथवा कोई राजा या राजकुमार वन में शिकार खेल रहा हो, या कोई अन्य हिंसक पशु हो - हे सौमित्रे, तुम्हें यह जानना चाहिए।"

श्लोक 10 (ayodhya.96.10)

सुदुश्चरो गिरिश्चायं पक्षिणामपि लक्ष्मण। सर्वमेतद्यथातत्त्वमचिराज्ज्ञातुमर्हसि॥ 96.10 ॥

suduścaro giriścāyaṃ pakṣiṇāmapi lakṣmaṇa| sarvametadyathātattvamacirājjñātumarhasi

"हे लक्ष्मण! यह पर्वत तो पक्षियों के लिए भी दुर्गम है। तुम शीघ्र ही इस सबका यथार्थ पता लगाओ।"

श्लोक 11 (ayodhya.96.11)

स लक्ष्मणः संत्वरितः सालमारुह्य पुष्पितम्। प्रेक्षमाणो दिशः सर्वाः पूर्वां दिशमुदैक्षत॥ 96.11 ॥

sa lakṣmaṇaḥ saṃtvaritaḥ sālamāruhya puṣpitam| prekṣamāṇo diśaḥ sarvāḥ pūrvāṃ diśamudaikṣata

लक्ष्मण शीघ्रता से एक पुष्पित शाल वृक्ष पर चढ़ गए और सभी दिशाओं में देखते हुए पूर्व दिशा की ओर निहारा।

श्लोक 12 (ayodhya.96.12)

उदङ्मुखः प्रेक्षमाणो ददर्श महतीं चमूम्। रथाश्वगजसम्बाधां यत्तैर्युक्तां पदातिभिः॥ 96.12 ॥

udaṅmukhaḥ prekṣamāṇo dadarśa mahatīṃ camūm| rathāśvagajasambādhāṃ yattairyuktāṃ padātibhiḥ

उत्तर की ओर मुख करके देखते हुए उन्होंने रथों, घोड़ों और हाथियों से भरी हुई तथा सावधान पैदल सैनिकों से युक्त एक विशाल सेना देखी।

श्लोक 13 (ayodhya.96.13)

तामश्वगजसम्पूर्णां रथध्वजविभूषिताम्। शशंस सेनां रामाय वचनं चेदमब्रवीत्॥ 96.13 ॥

tāmaśvagajasampūrṇāṃ rathadhvajavibhūṣitām| śaśaṃsa senāṃ rāmāya vacanaṃ cedamabravīt

घोड़ों और हाथियों से परिपूर्ण, रथों और ध्वजाओं से सुशोभित उस सेना के विषय में उन्होंने राम को बताया और यह वचन कहा।

श्लोक 14 (ayodhya.96.14)

अग्निं संशमयत्वार्यः सीता च भजतां गुहाम्। सज्यं कुरुष्व चापं च शरांश्च कवचं तथा॥ 96.14 ॥

agniṃ saṃśamayatvāryaḥ sītā ca bhajatāṃ guhām| sajyaṃ kuruṣva cāpaṃ ca śarāṃśca kavacaṃ tathā

"आर्य अग्नि को शान्त कर दें और सीता किसी गुफा में आश्रय लें। आप धनुष को डोरी से युक्त करें तथा बाण और कवच तैयार करें।"

श्लोक 15 (ayodhya.96.15)

तं रामः पुरुषव्याघ्रो लक्ष्मणं प्रत्युवाच ह। अङ्गावेक्षस्व सौमित्रे कस्येमां मन्यसे चमूम्॥ 96.15 ॥

taṃ rāmaḥ puruṣavyāghro lakṣmaṇaṃ pratyuvāca ha| aṅgāvekṣasva saumitre kasyemāṃ manyase camūm

पुरुषों में श्रेष्ठ राम ने लक्ष्मण को उत्तर दिया - "हे सौमित्रे! अच्छी तरह देखो, तुम इस सेना को किसकी समझते हो?"

श्लोक 16 (ayodhya.96.16)

एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्। दिधक्षन्निव तां सेनां रुषितः पावको यथा॥ 96.16 ॥

evamuktastu rāmeṇa lakṣmaṇo vākyamabravīt| didhakṣanniva tāṃ senāṃ ruṣitaḥ pāvako yathā

राम के इस प्रकार कहने पर लक्ष्मण ने, मानो उस सेना को भस्म कर देने की इच्छा से क्रुद्ध अग्नि के समान, यह वचन कहा।

श्लोक 17 (ayodhya.96.17)

सम्पन्नं राज्यमिच्छंस्तु व्यक्तं प्राप्याभिषेचनम्। आवां हन्तुं समभ्येति कैकेय्या भरतः सुतः॥ 96.17 ॥

sampannaṃ rājyamicchaṃstu vyaktaṃ prāpyābhiṣecanam| āvāṃ hantuṃ samabhyeti kaikeyyā bharataḥ sutaḥ

"स्पष्ट है कि राज्याभिषेक पाकर और राज्य को निष्कण्टक बनाने की इच्छा से कैकेयी-पुत्र भरत हम दोनों को मारने के लिए आ रहा है।"

श्लोक 18 (ayodhya.96.18)

एष वै सुमहान् श्रीमान् विटपी सम्प्रकाशते। विराजत्युद्गतस्कन्धः कोविदारध्वजो रथे॥ 96.18 ॥

eṣa vai sumahān śrīmān viṭapī samprakāśate| virājatyudgataskandhaḥ kovidāradhvajo rathe

"देखो, वह अत्यन्त विशाल और शोभायमान वृक्ष-चिह्न दिखाई दे रहा है - ऊँचे स्कन्ध वाला कोविदार-ध्वज रथ पर सुशोभित हो रहा है।"

श्लोक 19 (ayodhya.96.19)

भजन्त्येते यथा काममश्वानारुह्य शीघ्रगान्। एते भ्राजन्ति संहृष्टा गजानारुह्य सादिनः॥ 96.19 ॥

bhajantyete yathā kāmamaśvānāruhya śīghragān| ete bhrājanti saṃhṛṣṭā gajānāruhya sādinaḥ

"ये लोग अपनी इच्छानुसार वेगवान घोड़ों पर सवार होकर विचरण कर रहे हैं, और ये प्रसन्न सवार हाथियों पर चढ़कर शोभायमान हो रहे हैं।"

श्लोक 20 (ayodhya.96.20)

गृहीतधनुषौ चावां गिरिं वीरश्रयावहै। अथवेहैव तिष्ठावः सन्नद्धावुद्यतायुधौ॥ 96.20 ॥

gṛhītadhanuṣau cāvāṃ giriṃ vīraśrayāvahai| athavehaiva tiṣṭhāvaḥ sannaddhāvudyatāyudhau

"हे वीर! हम दोनों धनुष उठाकर पर्वत की शरण लें, अथवा यहीं शस्त्र-सज्जित होकर हथियार उठाए खड़े रहें।"

श्लोक 21 (ayodhya.96.21)

अपि नौ वशमागच्छेत् कोविदारध्वजो रणे। अपि द्रक्ष्यामि भरतं यत्कृते व्यसनं महत्। त्वया राघव सम्प्राप्तं सीतया च मया तथा॥ 96.21 ॥

api nau vaśamāgacchet kovidāradhvajo raṇe| api drakṣyāmi bharataṃ yatkṛte vyasanaṃ mahat| tvayā rāghava samprāptaṃ sītayā ca mayā tathā

"क्या युद्ध में वह कोविदार-ध्वज हमारे वश में आएगा? क्या मैं भरत को देख पाऊँगा, जिसके कारण हे राघव, आपको, सीता को और मुझे भी यह महान दुःख प्राप्त हुआ है?"

श्लोक 22 (ayodhya.96.22)

यन्निमित्तं भवान् राज्याच्च्युतो राघव शाश्वतात्। सम्प्राप्तो ऽयमरिर्वीर भरतो वध्य एव मे॥ 96.22 ॥

yannimittaṃ bhavān rājyāccyuto rāghava śāśvatāt| samprāpto 'yamarirvīra bharato vadhya eva me

"हे राघव! जिसके कारण आप अपने शाश्वत राज्य से च्युत हुए, हे वीर, वह शत्रु भरत जो यहाँ आया है, मेरे द्वारा वध्य ही है।"

श्लोक 23 (ayodhya.96.23)

भरतस्य वधे दोषं नाहं पश्यामि राघव। पूर्वापकारिणां त्यागे न ह्यधर्मो विधीयते॥ 96.23 ॥

bharatasya vadhe doṣaṃ nāhaṃ paśyāmi rāghava| pūrvāpakāriṇāṃ tyāge na hyadharmo vidhīyate

"हे राघव! मुझे भरत के वध में कोई दोष नहीं दिखता। पहले अपकार करने वाले को दण्ड देने में अधर्म नहीं होता।"

श्लोक 24 (ayodhya.96.24)

पूर्वापकारी भरतस्त्यक्तधर्मश्च राघव। एतस्मिन्निहते कृत्स्नामनुशाधि वसुन्धराम्॥ 96.24 ॥

pūrvāpakārī bharatastyaktadharmaśca rāghava| etasminnihate kṛtsnāmanuśādhi vasundharām

"हे राघव! भरत ही पहले अपकार करने वाला है और उसने धर्म त्याग दिया है। उसके मारे जाने पर आप सम्पूर्ण पृथ्वी का शासन करें।"

श्लोक 25 (ayodhya.96.25)

अद्य पुत्रं हतं सङ्ख्ये कैकेयी राज्यकामुका। मया पश्येत् सुदुःखार्त्ता हस्तिभग्नमिव द्रुमम्॥ 96.25 ॥

adya putraṃ hataṃ saṅkhye kaikeyī rājyakāmukā| mayā paśyet suduḥkhārttā hastibhagnamiva drumam

"आज राज्य की लोभी कैकेयी अपने पुत्र को युद्ध में मेरे द्वारा मारा हुआ देखे, अत्यन्त दुःख से व्याकुल होकर, जैसे हाथी द्वारा तोड़ा गया वृक्ष हो।"

श्लोक 26 (ayodhya.96.26)

कैकेयीं च वधिष्यामि सानुबन्धां सबान्धवाम्। कलुषेणाद्य महता मेदिनी परिमुच्यताम्॥ 96.26 ॥

kaikeyīṃ ca vadhiṣyāmi sānubandhāṃ sabāndhavām| kaluṣeṇādya mahatā medinī parimucyatām

"मैं कैकेयी को भी उसके अनुचरों और बन्धु-बान्धवों सहित मार डालूँगा। आज पृथ्वी इस महान पापिनी से मुक्त हो जाए।"

श्लोक 27 (ayodhya.96.27)

अद्येमं संयतं क्रोधमसत्कारं च मानद। मोक्ष्यामि शत्रुसैन्येषु कक्षेष्विव हुताशनम्॥ 96.27 ॥

adyemaṃ saṃyataṃ krodhamasatkāraṃ ca mānada| mokṣyāmi śatrusainyeṣu kakṣeṣviva hutāśanam

"हे मानद! आज मैं इस संचित क्रोध और अपमान को शत्रु-सेनाओं पर उसी प्रकार छोड़ दूँगा, जैसे सूखी झाड़ियों पर अग्नि छोड़ी जाती है।"

श्लोक 28 (ayodhya.96.28)

अद्यैतच्चित्रकूटस्य काननं निशितैः शरैः। भिन्दन् शत्रुशरीराणि करिष्ये शोणितोक्षितम्॥ 96.28 ॥

adyaitaccitrakūṭasya kānanaṃ niśitaiḥ śaraiḥ| bhindan śatruśarīrāṇi kariṣye śoṇitokṣitam

"आज मैं तीक्ष्ण बाणों से शत्रुओं के शरीरों को बींधते हुए चित्रकूट के इस वन को रक्त से भिगो दूँगा।"

श्लोक 29 (ayodhya.96.29)

शरैर्निर्भिन्नहृदयान् कुञ्जरांस्तुरगांस्तथा। श्वापदाः परिकर्षन्तु नरांश्च निहतान् मया॥ 96.29 ॥

śarairnirbhinnahṛdayān kuñjarāṃsturagāṃstathā| śvāpadāḥ parikarṣantu narāṃśca nihatān mayā

"मेरे बाणों से हृदय बिंधे हुए हाथियों और घोड़ों को, तथा मेरे द्वारा मारे गए मनुष्यों को हिंसक पशु घसीट ले जाएँ।"

श्लोक 30 (ayodhya.96.30)

शराणां धनुषश्चाहमनृणो ऽस्मि महामृधे। ससैन्यं भरतं हत्वा भविष्यामि न संशयः॥ 96.30 ॥

śarāṇāṃ dhanuṣaścāhamanṛṇo 'smi mahāmṛdhe| sasainyaṃ bharataṃ hatvā bhaviṣyāmi na saṃśayaḥ

"इस महासमर में सेना सहित भरत को मारकर मैं निश्चय ही अपने बाणों और धनुष के ऋण से उऋण हो जाऊँगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।"

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