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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 97

राम द्वारा लक्ष्मण का समाधान

सर्ग 96सर्ग-सूचीसर्ग 98

श्लोक 1 (ayodhya.97.1)

सुसंरब्धं तु सौमित्रिं लक्ष्मणं क्रोधमूर्च्छितम्। रामस्तु परिसान्त्व्याथ वचनं चेदमब्रवीत्॥ 97.1 ॥

susaṃrabdhaṃ tu saumitriṃ lakṣmaṇaṃ krodhamūrcchitam| rāmastu parisāntvyātha vacanaṃ cedamabravīt

किन्तु राम ने अत्यन्त क्रोधित और क्रोध से मूर्च्छित हुए-से सौमित्र लक्ष्मण को शान्त करते हुए यह वचन कहा।

श्लोक 2 (ayodhya.97.2)

किमत्र धनुषा कार्यमसिना वा सचर्मणा। महेष्वासे महाप्राज्ञे भरते स्वयमागते॥ 97.2 ॥

kimatra dhanuṣā kāryamasinā vā sacarmaṇā| maheṣvāse mahāprājñe bharate svayamāgate

"जब महाधनुर्धर और महाबुद्धिमान् भरत स्वयं यहाँ आ चुके हैं, तब यहाँ धनुष से अथवा ढाल-तलवार से क्या प्रयोजन है?"

श्लोक 3 (ayodhya.97.3)

पितुः सत्यं प्रतिश्रुत्य हत्वा भरतमागतम्। किं करिष्यामि राज्येन सापवादेन लक्ष्मण॥ 97.3 ॥

pituḥ satyaṃ pratiśrutya hatvā bharatamāgatam| kiṃ kariṣyāmi rājyena sāpavādena lakṣmaṇa

"पिता को सत्य वचन देकर, यदि आये हुए भरत को मारकर राज्य पाऊँ, तो हे लक्ष्मण, उस निन्दा-सहित राज्य से मुझे क्या लाभ?"

श्लोक 4 (ayodhya.97.4)

यद्द्रव्यं बान्धवानां वा मित्राणां वा क्षये भवेत्। नाहं तत्प्रतिगृह्णीयां भक्षान् विषकृतानिव॥ 97.4 ॥

yaddravyaṃ bāndhavānāṃ vā mitrāṇāṃ vā kṣaye bhavet| nāhaṃ tatpratigṛhṇīyāṃ bhakṣān viṣakṛtāniva

"जो धन बन्धुओं या मित्रों के नाश से प्राप्त हो, उसे मैं उसी प्रकार ग्रहण नहीं करूँगा जैसे कोई विष मिला हुआ भोजन नहीं करता।"

श्लोक 5 (ayodhya.97.5)

धर्ममर्थं च कामं च पृथिवीं चापि लक्ष्मण। इच्छामि भवतामर्थे एतत्प्रतिश्रृणोमि ते॥ 97.5 ॥

dharmamarthaṃ ca kāmaṃ ca pṛthivīṃ cāpi lakṣmaṇa| icchāmi bhavatāmarthe etatpratiśrṛṇomi te

"हे लक्ष्मण! धर्म, अर्थ, काम और यह सम्पूर्ण पृथ्वी भी, मैं तुम सबके ही हित के लिए चाहता हूँ - यह मैं तुमसे प्रतिज्ञा करता हूँ।"

श्लोक 6 (ayodhya.97.6)

भ्रातॄणां सङ्ग्रहार्थं च सुखार्थं चापि लक्ष्मण। राज्यमप्यहमिच्छामि सत्येनायुधमालभे॥ 97.6 ॥

bhrātṝṇāṃ saṅgrahārthaṃ ca sukhārthaṃ cāpi lakṣmaṇa| rājyamapyahamicchāmi satyenāyudhamālabhe

"हे लक्ष्मण! भाइयों के पालन-पोषण और सुख के लिए ही मैं राज्य भी चाहता हूँ; मैं अपने अस्त्र को छूकर सत्य की शपथ लेता हूँ।"

श्लोक 7 (ayodhya.97.7)

नेयं मम मही सौम्य दुर्लभा सागराम्बरा। नहीच्छेयमधर्मेण शक्रत्वमपि लक्ष्मण॥ 97.7 ॥

neyaṃ mama mahī saumya durlabhā sāgarāmbarā| nahīccheyamadharmeṇa śakratvamapi lakṣmaṇa

"हे सौम्य! समुद्र-वेष्टित यह पृथ्वी मेरे लिए दुर्लभ नहीं है, फिर भी हे लक्ष्मण, मैं अधर्म द्वारा इन्द्र-पद भी नहीं चाहूँगा।"

श्लोक 8 (ayodhya.97.8)

यद्विना भरतं त्वां च शत्रुघ्नं चापि मानद। भवेन्मम सुखं किञ्चिद्भस्म तत्कुरुतां शिखी॥ 97.8 ॥

yadvinā bharataṃ tvāṃ ca śatrughnaṃ cāpi mānada| bhavenmama sukhaṃ kiñcidbhasma tatkurutāṃ śikhī

"हे मानद! भरत, तुम और शत्रुघ्न के बिना मुझे जो भी थोड़ा-सा सुख मिले, उसे अग्नि भस्म कर दे!"

श्लोक 9 (ayodhya.97.9)

मन्येऽहमागतोऽयोध्यां भरतो भ्रातृवत्सलः। मम प्राणात्प्रियतरः कुलधर्ममनुस्मरन्॥ 97.9 ॥

manye'hamāgato'yodhyāṃ bharato bhrātṛvatsalaḥ| mama prāṇātpriyataraḥ kuladharmamanusmaran

"मुझे लगता है कि भाई के प्रति स्नेहवान् और कुल-धर्म का स्मरण करने वाला भरत, जो मुझे प्राणों से भी प्रिय है, अयोध्या से यहाँ आया है।"

श्लोक 10 (ayodhya.97.10)

श्रुत्वा प्रव्राजितं मां हि जटावल्कलधारिणम्। जानक्या सहितं वीर त्वया च पुरुषर्षभ॥ 97.10 ॥

śrutvā pravrājitaṃ māṃ hi jaṭāvalkaladhāriṇam| jānakyā sahitaṃ vīra tvayā ca puruṣarṣabha

"यह सुनकर कि मैं जटा-वल्कल धारण किये हुए, जानकी और तुम्हारे साथ वनवासी बना दिया गया हूँ, हे वीर, हे पुरुषश्रेष्ठ,"

श्लोक 11 (ayodhya.97.11)

स्नेहेनाक्रान्तहृदयः शोकेनाकुलितेन्द्रियः। द्रष्टुमभ्यागतो ह्येष भरतो नान्यथा गतः॥ 97.11 ॥

snehenākrāntahṛdayaḥ śokenākulitendriyaḥ| draṣṭumabhyāgato hyeṣa bharato nānyathā gataḥ

"स्नेह से आक्रान्त हृदय और शोक से व्याकुल इन्द्रियों वाला यह भरत निश्चय ही हमें देखने के लिए आया है, अन्य किसी कारण से नहीं।"

श्लोक 12 (ayodhya.97.12)

अम्बां च कैकयीं रुष्य परुषं चाप्रियं वदन्। प्रसाद्य पितरं श्रीमान् राज्यं मे दातुमागतः॥ 97.12 ॥

ambāṃ ca kaikayīṃ ruṣya paruṣaṃ cāpriyaṃ vadan| prasādya pitaraṃ śrīmān rājyaṃ me dātumāgataḥ

"माता कैकेयी पर क्रुद्ध होकर, उनसे कठोर और अप्रिय वचन कहकर, तथा पिता को मनाकर, वह श्रीमान् मुझे राज्य देने के लिए आया है।"

श्लोक 13 (ayodhya.97.13)

प्राप्तकालं यदेषोऽस्मान् भरतो द्रष्टुमिच्छति। अस्मासु मनसाप्येष नाप्रियं किञ्चिदाचरेत्॥ 97.13 ॥

prāptakālaṃ yadeṣo'smān bharato draṣṭumicchati| asmāsu manasāpyeṣa nāpriyaṃ kiñcidācaret

"यह उचित ही समय है कि भरत हमें देखना चाहता है; वह मन से भी हमारे प्रति कोई अप्रिय आचरण नहीं करेगा।"

श्लोक 14 (ayodhya.97.14)

विप्रियं कृतपूर्वं ते भरतेन कदा नु किम्। ईदृशं वा भयं तेऽद्य भरतं योऽत्र शङ्कसे॥ 97.14 ॥

vipriyaṃ kṛtapūrvaṃ te bharatena kadā nu kim| īdṛśaṃ vā bhayaṃ te'dya bharataṃ yo'tra śaṅkase

"भरत ने तुम्हारे साथ पहले कभी कौन-सा अप्रिय व्यवहार किया है? आज भरत के विषय में तुम्हें ऐसी शंका और भय क्यों हो रहा है?"

श्लोक 15 (ayodhya.97.15)

नहि ते निष्ठुरं वाच्यो भरतो नाप्रियं वचः। अहं ह्यप्रियमुक्तः स्यां भरतस्याप्रिये कृते॥ 97.15 ॥

nahi te niṣṭhuraṃ vācyo bharato nāpriyaṃ vacaḥ| ahaṃ hyapriyamuktaḥ syāṃ bharatasyāpriye kṛte

"तुम्हें भरत से कठोर या अप्रिय वचन नहीं कहना चाहिए; क्योंकि भरत के प्रति कुछ भी अप्रिय किये जाने पर मुझे ही अप्रिय-भाषी माना जाएगा।"

श्लोक 16 (ayodhya.97.16)

कथं नु पुत्राः पितरं हन्युः कस्याञ्चिदापदि। भ्राता वा भ्रातरं हन्यात् सौमित्रे प्राणमात्मनः॥ 97.16 ॥

kathaṃ nu putrāḥ pitaraṃ hanyuḥ kasyāñcidāpadi| bhrātā vā bhrātaraṃ hanyāt saumitre prāṇamātmanaḥ

"हे सौमित्रे! किसी भी विपत्ति में पुत्र पिता को कैसे मार सकते हैं, या भाई अपने प्राण-तुल्य भाई को कैसे मार सकता है?"

श्लोक 17 (ayodhya.97.17)

यदि राज्यस्य हेतोस्त्वमिमां वाचं प्रभाषसे। वक्ष्यामि भरतं दृष्ट्वा राज्यमस्मै प्रदीयताम्॥ 97.17 ॥

yadi rājyasya hetostvamimāṃ vācaṃ prabhāṣase| vakṣyāmi bharataṃ dṛṣṭvā rājyamasmai pradīyatām

"यदि तुम राज्य के कारण ही ऐसी बात कह रहे हो, तो भरत को देखकर मैं स्वयं कहूँगा कि यह राज्य इन्हें (तुम्हें) दे दिया जाए।"

श्लोक 18 (ayodhya.97.18)

उच्यमानोऽपि भरतो मया लक्ष्मण तत्त्वतः। राज्यमस्मै प्रयच्छेति बाढमित्येव वक्ष्यति॥ 97.18 ॥

ucyamāno'pi bharato mayā lakṣmaṇa tattvataḥ| rājyamasmai prayaccheti bāḍhamityeva vakṣyati

"हे लक्ष्मण! सच तो यह है कि मेरे ऐसा कहने पर भी भरत यही कहेगा - 'राज्य इन्हीं को दिया जाए' - और वह सहर्ष स्वीकार कर लेगा।"

श्लोक 19 (ayodhya.97.19)

तथोक्तो धर्मशीलेन भ्रात्रा तस्य हिते रतः। लक्ष्मणः प्रविवेशेव स्वानि गात्राणि लज्जया॥ 97.19 ॥

tathokto dharmaśīlena bhrātrā tasya hite rataḥ| lakṣmaṇaḥ praviveśeva svāni gātrāṇi lajjayā

अपने हित में तत्पर धर्मशील भाई द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, लक्ष्मण लज्जा से मानो अपने ही अंगों में सिमट गए।

श्लोक 20 (ayodhya.97.20)

तद्वाक्यं लक्ष्मणः श्रुत्वा व्रीडितः प्रत्युवाच ह। त्वां मन्ये द्रष्टुमायातः पिता दशरथः स्वयम्॥ 97.20 ॥

tadvākyaṃ lakṣmaṇaḥ śrutvā vrīḍitaḥ pratyuvāca ha| tvāṃ manye draṣṭumāyātaḥ pitā daśarathaḥ svayam

लक्ष्मण उस वचन को सुनकर लज्जित होकर बोले - "मुझे लगता है कि पिता दशरथ स्वयं ही आपको देखने आये हैं।"

श्लोक 21 (ayodhya.97.21)

व्रीडितं लक्ष्मणं दृष्ट्वा राघवः प्रत्युवाच ह। एष मन्ये महाबाहुरिहास्मान् द्रष्टुमागतः॥ 97.21 ॥

vrīḍitaṃ lakṣmaṇaṃ dṛṣṭvā rāghavaḥ pratyuvāca ha| eṣa manye mahābāhurihāsmān draṣṭumāgataḥ

लज्जित लक्ष्मण को देखकर राघव ने उत्तर दिया - "मुझे लगता है, यह महाबाहु (भरत) ही हमें देखने आया है।"

श्लोक 22 (ayodhya.97.22)

अथवा नौ ध्रुवं मन्ये मन्यमानः सुखोचितौ। वनवासमनुध्याय गृहाय प्रतिनेष्यति॥ 97.22 ॥

athavā nau dhruvaṃ manye manyamānaḥ sukhocitau| vanavāsamanudhyāya gṛhāya pratineṣyati

"अथवा मुझे निश्चय है कि वे हम दोनों को सुख के योग्य मानकर, हमारे वनवास पर विचार करके, हमें घर वापस ले चलेंगे।"

श्लोक 23 (ayodhya.97.23)

इमां वाप्येष वैदेहीमत्यन्तसुखसेविनीम्। पिता मे राघवः श्रीमान् वनादादाय यास्यति॥ 97.23 ॥

imāṃ vāpyeṣa vaidehīmatyantasukhasevinīm| pitā me rāghavaḥ śrīmān vanādādāya yāsyati

"तथा अत्यन्त सुखभोग की अभ्यस्त इस वैदेही को भी, मेरे श्रीमान् पिता वन से लेकर ले जाएँगे।"

श्लोक 24 (ayodhya.97.24)

एतौ तौ सम्प्रकाशेते गोत्रवन्तौ मनोरमौ। वायुवेगसमौ वीर जवनौ तुरगोत्तमौ॥ 97.24 ॥

etau tau samprakāśete gotravantau manoramau| vāyuvegasamau vīra javanau turagottamau

"हे वीर! ये दोनों उत्तम कुल के सुन्दर घोड़े, वायु के समान वेगवान् और तीव्रगामी, वहाँ शोभायमान दिखाई देते हैं।"

श्लोक 25 (ayodhya.97.25)

स एष सुमहाकायः कम्पते वाहिनीमुखे। नागः शत्रुञ्जयो नाम वृद्धस्तातस्य धीमतः॥ 97.25 ॥

sa eṣa sumahākāyaḥ kampate vāhinīmukhe| nāgaḥ śatruñjayo nāma vṛddhastātasya dhīmataḥ

"सेना के अग्रभाग में विचरण करता वह अत्यन्त विशालकाय गजराज हमारे बुद्धिमान् पिता का वृद्ध हाथी 'शत्रुंजय' ही है।"

श्लोक 26 (ayodhya.97.26)

न तु पश्यामि तच्छत्रं पाण्डरं लोकसत्कृतम्। पितुर्दिव्यं महाबाहो संशयो भवतीह मे॥ 97.26 ॥

na tu paśyāmi tacchatraṃ pāṇḍaraṃ lokasatkṛtam| piturdivyaṃ mahābāho saṃśayo bhavatīha me

"किन्तु हे महाबाहो! मुझे पिता का वह जगत्-पूजित श्वेत छत्र यहाँ दिखाई नहीं देता; इस विषय में मुझे संशय हो रहा है।"

श्लोक 27 (ayodhya.97.27)

वृक्षाग्रादवरोह त्वं कुरु लक्ष्मण मद्वचः। इतीव रामो धर्मात्मा सौमित्रिं तमुवाच ह॥ 97.27 ॥

vṛkṣāgrādavaroha tvaṃ kuru lakṣmaṇa madvacaḥ| itīva rāmo dharmātmā saumitriṃ tamuvāca ha

"तुम वृक्ष के शिखर से नीचे उतर आओ, लक्ष्मण, और मेरी बात मानो" - धर्मात्मा राम ने सौमित्र से इस प्रकार कहा।

श्लोक 28 (ayodhya.97.28)

अवतीर्य्य तु सालाग्रात्तस्मात्स समितिञ्जयः। लक्ष्मणः प्राञ्जलिर्भूत्वा तस्थौ रामस्य पार्श्वतः॥ 97.28 ॥

avatīryya tu sālāgrāttasmātsa samitiñjayaḥ| lakṣmaṇaḥ prāñjalirbhūtvā tasthau rāmasya pārśvataḥ

तब युद्ध-विजयी लक्ष्मण उस शाल वृक्ष के शिखर से उतरकर, हाथ जोड़कर राम के पास जाकर खड़े हो गये।

श्लोक 29 (ayodhya.97.29)

भरतेनापि सन्दिष्टा सम्मर्दो न भवेदिति। समन्तात्तस्य शैलस्य सेना वासमकल्पयत्॥ 97.29 ॥

bharatenāpi sandiṣṭā sammardo na bhavediti| samantāttasya śailasya senā vāsamakalpayat

भरत के भी यह आदेश दिया जाने पर कि भीड़-भाड़ न हो, सेना ने उस पर्वत के चारों ओर अपना पड़ाव डाला।

श्लोक 30 (ayodhya.97.30)

अध्यर्द्धमिक्ष्वाकुचमूर्योजनं पर्वतस्य सा। पार्श्वे न्यविशदावृत्य गजवाजिरथाकुला॥ 97.30 ॥

adhyarddhamikṣvākucamūryojanaṃ parvatasya sā| pārśve nyaviśadāvṛtya gajavājirathākulā

इक्ष्वाकुओं की वह सेना, हाथी-घोड़े-रथों से भरी हुई, उस पर्वत के डेढ़ योजन क्षेत्र में चारों ओर फैलकर बस गयी।

श्लोक 31 (ayodhya.97.31)

सा चित्रकूटे भरतेन सेना धर्मं पुरस्कृत्य विधूय दर्प्पम्। प्रसादनार्थं रघुनन्दनस्य विराजते नीतिमता प्रणीता॥ 97.31 ॥

sā citrakūṭe bharatena senā dharmaṃ puraskṛtya vidhūya darppam| prasādanārthaṃ raghunandanasya virājate nītimatā praṇītā

इस प्रकार चित्रकूट में भरत की वह सेना, धर्म को आगे रखकर और अभिमान त्यागकर, नीतिमान् भरत द्वारा रघुनन्दन राम को प्रसन्न करने के उद्देश्य से लायी गयी, अत्यन्त शोभायमान हो रही थी।

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