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अयोध्याकाण्ड · सर्ग 98

भरत की वन में खोज

सर्ग 97सर्ग-सूचीसर्ग 99

श्लोक 1 (ayodhya.98.1)

निवेश्य सेनां तु विभुः पद्भ्यां पादवतां वरः। अभिगन्तुं स काकुत्स्थमियेष गुरुवर्त्तकम्॥ 98.1 ॥

niveśya senāṃ tu vibhuḥ padbhyāṃ pādavatāṃ varaḥ| abhigantuṃ sa kākutsthamiyeṣa guruvarttakam

सेना को टिकाकर, पुरुषों में श्रेष्ठ प्रभावशाली भरत ने पैदल ही अपने पिता के आदेश का पालन कर रहे राम के पास जाने का निश्चय किया।

श्लोक 2 (ayodhya.98.2)

निविष्टमात्रे सैन्ये तु यथोद्देशं विनीतवत्। भरतो भ्रातरं वाक्यं शत्रुघ्नमिदमब्रवीत्॥ 98.2 ॥

niviṣṭamātre sainye tu yathoddeśaṃ vinītavat| bharato bhrātaraṃ vākyaṃ śatrughnamidamabravīt

सेना के ठहरते ही, विनम्रतापूर्वक और यथोचित रीति से, भरत ने अपने भाई शत्रुघ्न से यह वचन कहा।

श्लोक 3 (ayodhya.98.3)

क्षिप्रं वनमिदं सौम्य नरसङ्घैः समन्ततः। लुब्धैश्च सहितैरेभिस्त्वमन्वेषितुमर्हसि॥ 98.3 ॥

kṣipraṃ vanamidaṃ saumya narasaṅghaiḥ samantataḥ| lubdhaiśca sahitairebhistvamanveṣitumarhasi

"हे सौम्य! तुम शीघ्र ही शिकारियों सहित पुरुषों की टुकड़ियों के साथ इस वन को चारों ओर से खोजो।"

श्लोक 4 (ayodhya.98.4)

गुहो ज्ञातिसहस्रेण शरचापासिधारिणा। समन्वेषतु काकुत्स्थावस्मिन् परिवृतः स्वयम्॥ 98.4 ॥

guho jñātisahasreṇa śaracāpāsidhāriṇā| samanveṣatu kākutsthāvasmin parivṛtaḥ svayam

"धनुष, बाण और तलवार धारण करने वाला गुह अपने हज़ारों कुटुम्बियों से घिरा हुआ, स्वयं इस वन में राम-लक्ष्मण दोनों को खोजे।"

श्लोक 5 (ayodhya.98.5)

अमात्यैः सह पौरैश्च गुरुभिश्च द्विजातिभिः। वनं सर्वं चरिष्यामि पद्भ्यां परिवृतः स्वयम्॥ 98.5 ॥

amātyaiḥ saha pauraiśca gurubhiśca dvijātibhiḥ| vanaṃ sarvaṃ cariṣyāmi padbhyāṃ parivṛtaḥ svayam

"मैं भी मंत्रियों, नगरवासियों, गुरुओं और ब्राह्मणों के साथ स्वयं पैदल ही सम्पूर्ण वन में विचरण करूँगा।"

श्लोक 6 (ayodhya.98.6)

यावन्न रामं द्रक्ष्यामि लक्ष्मणं वा महाबलम्। वैदेहीं वा महाभागां न मे शान्तिर्भविष्यति॥ 98.6 ॥

yāvanna rāmaṃ drakṣyāmi lakṣmaṇaṃ vā mahābalam| vaidehīṃ vā mahābhāgāṃ na me śāntirbhaviṣyati

"जब तक मैं महाबली राम या लक्ष्मण को, अथवा महाभागा वैदेही को नहीं देख लेता, तब तक मुझे शान्ति नहीं मिलेगी।"

श्लोक 7 (ayodhya.98.7)

यावन्न चन्द्रसङ्काशं द्रक्ष्यामि शुभमाननम्। भ्रातुः पद्मपलाशाक्षं न मे शान्तिर्भविष्यति॥ 98.7 ॥

yāvanna candrasaṅkāśaṃ drakṣyāmi śubhamānanam| bhrātuḥ padmapalāśākṣaṃ na me śāntirbhaviṣyati

"जब तक मैं चन्द्रमा के समान कान्तिमान् और कमल-दल जैसे नेत्रों वाला अपने भाई का शुभ मुख नहीं देखता, तब तक मुझे शान्ति नहीं मिलेगी।"

श्लोक 8 (ayodhya.98.8)

यावन्न चरणौ भ्रातुः पार्थिवव्यञ्जनान्वितौ। शिरसा धारयिष्यामि न मे शान्तिर्भविष्यति॥ 98.8 ॥

yāvanna caraṇau bhrātuḥ pārthivavyañjanānvitau| śirasā dhārayiṣyāmi na me śāntirbhaviṣyati

"जब तक राजचिह्नों से युक्त अपने भाई के दोनों चरणों को मैं अपने शीश पर धारण नहीं कर लेता, तब तक मुझे शान्ति नहीं मिलेगी।"

श्लोक 9 (ayodhya.98.9)

यावन्न राज्ये राज्यार्हः पितृपैतामहे स्थितः। अभिषेकजलक्लिन्नो न मे शान्तिर्भविष्यति॥ 98.9 ॥

yāvanna rājye rājyārhaḥ pitṛpaitāmahe sthitaḥ| abhiṣekajalaklinno na me śāntirbhaviṣyati

"जब तक राज्य के योग्य वह अपने पिता-पितामह से प्राप्त राज्य में, राज्याभिषेक के जल से भीगकर स्थापित नहीं हो जाता, तब तक मुझे शान्ति नहीं मिलेगी।"

श्लोक 10 (ayodhya.98.10)

सिद्धार्थः खलु सौमित्रिर्यश्चन्द्रविमलोपमम्। मुखं पश्यति रामस्य राजीवाक्षं महाद्युति॥ 98.10 ॥

siddhārthaḥ khalu saumitriryaścandravimalopamam| mukhaṃ paśyati rāmasya rājīvākṣaṃ mahādyuti

निश्चय ही सौमित्र लक्ष्मण कृतार्थ हैं, जो निर्मल चन्द्रमा के समान महातेजस्वी और कमल-नेत्र वाले राम का मुख नित्य देखते रहते हैं।

श्लोक 11 (ayodhya.98.11)

कृतकृत्या महाभागा वैदेही जनकात्मजा। भर्तारं सागरान्तायाः पृथिव्या याऽनुगच्छति॥ 98.11 ॥

kṛtakṛtyā mahābhāgā vaidehī janakātmajā| bhartāraṃ sāgarāntāyāḥ pṛthivyā yā'nugacchati

महाभागा जनकात्मजा वैदेही ने भी अपना जीवन सफल कर लिया है, जो समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी के स्वामी अपने पति का अनुसरण कर रही हैं।

श्लोक 12 (ayodhya.98.12)

सुभगश्चित्रकूटोऽसौ गिरिराजोपमो गिरिः। यस्मिन् वसति काकुत्स्थः कुबेर इव नन्दने॥ 98.12 ॥

subhagaścitrakūṭo'sau girirājopamo giriḥ| yasmin vasati kākutsthaḥ kubera iva nandane

पर्वतों के राजा हिमालय के समान वह सुन्दर चित्रकूट पर्वत धन्य है, जिस पर नन्दन वन में कुबेर के समान राम निवास कर रहे हैं।

श्लोक 13 (ayodhya.98.13)

कृतकार्यमिदं दुर्गं वनं व्यालनिषेवितम्। यदध्यास्ते महातेजा रामः शस्त्रभृतां वरः॥ 98.13 ॥

kṛtakāryamidaṃ durgaṃ vanaṃ vyālaniṣevitam| yadadhyāste mahātejā rāmaḥ śastrabhṛtāṃ varaḥ

यह दुर्गम, हिंसक पशुओं से भरा वन भी सफल हो गया है, जहाँ शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ महातेजस्वी राम निवास कर रहे हैं।

श्लोक 14 (ayodhya.98.14)

एवमुक्त्वा महातेजा भरतः पुरुषर्षभः। पद्भ्यामेव महाबाहुः प्रविवेश महद्वनम्॥ 98.14 ॥

evamuktvā mahātejā bharataḥ puruṣarṣabhaḥ| padbhyāmeva mahābāhuḥ praviveśa mahadvanam

यह कहकर महातेजस्वी, महाबाहु भरत पुरुषों में श्रेष्ठ, पैदल ही उस विशाल वन में प्रविष्ट हो गये।

श्लोक 15 (ayodhya.98.15)

स तानि द्रुमजालानि जातानि गिरिसानुषु। पुष्पिताग्राणि मध्येन जगाम वदतां वरः॥ 98.15 ॥

sa tāni drumajālāni jātāni girisānuṣu| puṣpitāgrāṇi madhyena jagāma vadatāṃ varaḥ

श्रेष्ठ वक्ता भरत पर्वत की चोटियों पर उगे हुए, पुष्पित शिखरों वाले उन वृक्ष-समूहों के बीच से होकर आगे बढ़े।

श्लोक 16 (ayodhya.98.16)

स गिरेश्चित्रकूटस्य सालमारुह्य सत्वरम्। रामाश्रमगतस्याग्नेर्ददर्श ध्वजमुच्छ्रितम्॥ 98.16 ॥

sa gireścitrakūṭasya sālamāruhya satvaram| rāmāśramagatasyāgnerdadarśa dhvajamucchritam

फिर चित्रकूट पर्वत पर एक शाल वृक्ष पर शीघ्रता से चढ़कर, उन्होंने राम के आश्रम की अग्नि से उठता हुआ धुएँ का ऊँचा स्तम्भ देखा।

श्लोक 17 (ayodhya.98.17)

तं दृष्ट्वा भरतः श्रीमान् मुमोह सहबान्धवः। अत्र राम इति ज्ञात्वा गतः पारमिवाम्भसः॥ 98.17 ॥

taṃ dṛṣṭvā bharataḥ śrīmān mumoha sahabāndhavaḥ| atra rāma iti jñātvā gataḥ pāramivāmbhasaḥ

उसे देखकर श्रीमान् भरत अपने बन्धुओं सहित हर्ष-विह्वल हो गये; "यहीं राम हैं" यह जानकर वे मानो किसी सागर के पार पहुँच गये हों।

श्लोक 18 (ayodhya.98.18)

स चित्रकूटे तु गिरौ निशम्य रामाश्रमं पुण्यजनोपपन्नम्। गुहेन सार्द्धं त्वरितो जगाम पुनर्निवेश्यैव चमूं महात्मा॥ 98.18 ॥

sa citrakūṭe tu girau niśamya rāmāśramaṃ puṇyajanopapannam| guhena sārddhaṃ tvarito jagāma punarniveśyaiva camūṃ mahātmā

इस प्रकार चित्रकूट पर्वत पर पुण्यजनों से युक्त राम के आश्रम के विषय में सुनकर, वह महात्मा सेना को पुनः वहीं ठहराकर गुह के साथ शीघ्रतापूर्वक चल पड़े।

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