किष्किन्धाकाण्ड · सर्ग 22
वालि का अन्तिम उपदेश और मृत्यु
श्लोक 1 (kishkindha.22.1)
वीक्षमाणस्तु मन्दासुः सर्वतो मन्दमुच्छ्वसन् । आदावेव तु सुग्रीवं ददर्शानुजमग्रतः ॥ 22.1 ॥
vīkṣamāṇastu mandāsuḥ sarvato mandamucchvasan | ādāveva tu sugrīvaṃ dadarśānujamagrataḥ || 22.1 ||
क्षीण होते प्राणों वाला वालि चारों ओर धीरे-धीरे दृष्टि डालता हुआ धीमी साँस ले रहा था; उसने सबसे पहले अपने सामने खड़े छोटे भाई सुग्रीव को देखा।
श्लोक 2 (kishkindha.22.2)
तं प्राप्तविजयं वाली सुग्रीवं प्लवगेश्वरम् । आभाष्य व्यक्तया वाचा सस्नेहमिदमब्रवीत् ॥ 22.2 ॥
taṃ prāptavijayaṃ vālī sugrīvaṃ plavageśvaram | ābhāṣya vyaktayā vācā sasnehamidamabravīt || 22.2 ||
विजय पाने वाले उस वानरराज सुग्रीव को सम्बोधित करते हुए वालि ने स्पष्ट वाणी में स्नेहपूर्वक यह कहा।
श्लोक 3 (kishkindha.22.3)
सुग्रीव दोषेण न मां गन्तुमर्हसि किल्बिषात् । कृष्यमाणं भविष्येण बुद्धिमोहेन मां बलात् ॥ 22.3 ॥
sugrīva doṣeṇa na māṃ gantumarhasi kilbiṣāt | kṛṣyamāṇaṃ bhaviṣyeṇa buddhimohena māṃ balāt || 22.3 ||
हे सुग्रीव, मुझे किसी दोष या पाप के कारण गया हुआ मत समझो; जानो कि मैं भावी विधान के द्वारा अपनी बुद्धि के मोह से बलपूर्वक खींचा गया हूँ।
श्लोक 4 (kishkindha.22.4)
युगपद् विहितं तात न मन्ये सुखमावयोः । सौहार्दं भ्रातृयुक्तं हि तदिदं जातमन्यथा ॥ 22.4 ॥
yugapad vihitaṃ tāta na manye sukhamāvayoḥ | sauhārdaṃ bhrātṛyuktaṃ hi tadidaṃ jātamanyathā || 22.4 ||
हे तात, मुझे नहीं लगता कि हम दोनों के लिए एक साथ सुख विधाता ने रचा था; इसीलिए भाइयों के बीच का यह सौहार्द अन्यथा ही परिणत हो गया।
श्लोक 5 (kishkindha.22.5)
प्रतिपद्य त्वमद्यैव राज्यमेषां वनौकसाम् । मामप्यद्यैव गच्छन्तं विद्धि वैवस्वतक्षयम् ॥ 22.5 ॥
pratipadya tvamadyaiva rājyameṣāṃ vanaukasām | māmapyadyaiva gacchantaṃ viddhi vaivasvatakṣayam || 22.5 ||
आज ही तुम इन वनवासियों के इस राज्य को स्वीकार कर लो, और यह भी जान लो कि मैं भी आज ही यमराज के धाम की ओर जा रहा हूँ।
श्लोक 6 (kishkindha.22.6)
जीवितं च हि राज्यं च श्रियं च विपुलां तथा । प्रजहाम्येष वै तूर्णमहं चागर्हितं यशः ॥ 22.6 ॥
jīvitaṃ ca hi rājyaṃ ca śriyaṃ ca vipulāṃ tathā | prajahāmyeṣa vai tūrṇamahaṃ cāgarhitaṃ yaśaḥ || 22.6 ||
मैं शीघ्र ही अपने जीवन, राज्य, इस विशाल ऐश्वर्य तथा अपनी निष्कलंक कीर्ति - सबका परित्याग कर रहा हूँ।
श्लोक 7 (kishkindha.22.7)
अस्यां त्वहमवस्थायां वीर वक्ष्यामि यद् वचः । यद्यप्यसुकरं राजन् कर्तुमेव त्वमर्हसि ॥ 22.7 ॥
asyāṃ tvahamavasthāyāṃ vīra vakṣyāmi yad vacaḥ | yadyapyasukaraṃ rājan kartumeva tvamarhasi || 22.7 ||
हे वीर, इस अवस्था में भी मैं जो वचन कहूँगा, हे राजन्, वह चाहे करना कठिन ही क्यों न हो, तुम्हें अवश्य पूरा करना चाहिए।
श्लोक 8 (kishkindha.22.8)
सुखार्हं सुखसंवृद्धं बालमेनमबालिशम् । बाष्पपूर्णमुखं पश्य भूमौ पतितमङ्गदम् ॥ 22.8 ॥
sukhārhaṃ sukhasaṃvṛddhaṃ bālamenamabāliśam | bāṣpapūrṇamukhaṃ paśya bhūmau patitamaṅgadam || 22.8 ||
सुख के योग्य और सुख में ही पले इस बालक अंगद को देखो, जो अब बालबुद्धि नहीं रहा; आँसुओं से भरे मुख के साथ यह भूमि पर गिरा पड़ा है।
श्लोक 9 (kishkindha.22.9)
मम प्राणैः प्रियतरं पुत्रं पुत्रमिवौरसम् । मया हीनमहीनार्थं सर्वतः परिपालय ॥ 22.9 ॥
mama prāṇaiḥ priyataraṃ putraṃ putramivaurasam | mayā hīnamahīnārthaṃ sarvataḥ paripālaya || 22.9 ||
मेरे प्राणों से भी अधिक प्रिय इस पुत्र को, जो अब मुझसे रहित हो गया है, अपने ही औरस पुत्र के समान सब प्रकार से पूर्ण रूप से पालना।
श्लोक 10 (kishkindha.22.10)
त्वमप्यस्य पिता दाता परित्राता च सर्वशः । भयेष्वभयदश्चैव यथाहं प्लवगेश्वर ॥ 22.10 ॥
tvamapyasya pitā dātā paritrātā ca sarvaśaḥ | bhayeṣvabhayadaścaiva yathāhaṃ plavageśvara || 22.10 ||
हे वानरेश्वर, जिस प्रकार मैं इसके लिए था, उसी प्रकार अब तुम भी इसके पिता, दाता, सब प्रकार से रक्षक तथा भय के समय अभय देने वाले बनो।
श्लोक 11 (kishkindha.22.11)
एष तारात्मजः श्रीमांस्त्वया तुल्यपराक्रमः । रक्षसां च वधे तेषामग्रतस्ते भविष्यति ॥ 22.11 ॥
eṣa tārātmajaḥ śrīmāṃstvayā tulyaparākramaḥ | rakṣasāṃ ca vadhe teṣāmagrataste bhaviṣyati || 22.11 ||
तारा का यह तेजस्वी पुत्र तुम्हारे समान ही पराक्रमी है; उन राक्षसों के वध के समय यह तुम्हारे आगे रहकर तुम्हारा साथ देगा।
श्लोक 12 (kishkindha.22.12)
अनुरूपाणि कर्माणि विक्रम्य बलवान् रणे । करिष्यत्येष तारेयस्तेजस्वी तरुणोऽङ्गदः ॥ 22.12 ॥
anurūpāṇi karmāṇi vikramya balavān raṇe | kariṣyatyeṣa tāreyastejasvī taruṇo'ṅgadaḥ || 22.12 ||
बलवान् और तेजस्वी यह युवा अंगद, तारा का पुत्र, युद्ध में पराक्रम दिखाकर अपने कुल के अनुरूप ही कार्य सिद्ध करेगा।
श्लोक 13 (kishkindha.22.13)
सुषेणदुहिता चेयमर्थसूक्ष्मविनिश्चये । औत्पातिके च विविधे सर्वतः परिनिष्ठिता ॥ 22.13 ॥
suṣeṇaduhitā ceyamarthasūkṣmaviniścaye | autpātike ca vividhe sarvataḥ pariniṣṭhitā || 22.13 ||
सुषेण की यह पुत्री तारा सूक्ष्म अर्थों के निर्णय में तथा विविध प्रकार के अपशकुनों के ज्ञान में भी सब प्रकार से निपुण है।
श्लोक 14 (kishkindha.22.14)
यदेषा साध्विति ब्रूयात् कार्यं तन्मुक्तसंशयम् । नहि तारामतं किंचिदन्यथा परिवर्तते ॥ 22.14 ॥
yadeṣā sādhviti brūyāt kāryaṃ tanmuktasaṃśayam | nahi tārāmataṃ kiṃcidanyathā parivartate || 22.14 ||
यह जिस कार्य को उचित बता दे, उसे निःसंदेह कर लेना चाहिए; क्योंकि तारा का निश्चय कभी भी अन्यथा सिद्ध नहीं होता।
श्लोक 15 (kishkindha.22.15)
राघवस्य च ते कार्यं कर्तव्यमविशङ्कया । स्यादधर्मो ह्यकरणे त्वां च हिंस्यादमानितः ॥ 22.15 ॥
rāghavasya ca te kāryaṃ kartavyamaviśaṅkayā | syādadharmo hyakaraṇe tvāṃ ca hiṃsyādamānitaḥ || 22.15 ||
तथा राघव का कार्य तुम्हें बिना किसी शंका के अवश्य पूरा करना चाहिए; क्योंकि उसे पूरा न करने से अधर्म होगा और अपमानित राघव तुम्हें हानि भी पहुँचा सकते हैं।
श्लोक 16 (kishkindha.22.16)
इमां च मालामाधत्स्व दिव्यां सुग्रीव काञ्चनीम् । उदारा श्रीः स्थिता ह्यस्यां सम्प्रजह्यान्मृते मयि ॥ 22.16 ॥
imāṃ ca mālāmādhatsva divyāṃ sugrīva kāñcanīm | udārā śrīḥ sthitā hyasyāṃ samprajahyānmṛte mayi || 22.16 ||
और हे सुग्रीव, इस दिव्य स्वर्णमाला को तुम धारण करो; क्योंकि इसमें स्थित उदार लक्ष्मी मेरी मृत्यु होते ही इसे छोड़ देगी।
श्लोक 17 (kishkindha.22.17)
इत्येवमुक्तः सुग्रीवो वालिना भ्रातृसौहृदात् । हर्षं त्यक्त्वा पुनर्दीनो ग्रहग्रस्त इवोडुराट् ॥ 22.17 ॥
ityevamuktaḥ sugrīvo vālinā bhrātṛsauhṛdāt | harṣaṃ tyaktvā punardīno grahagrasta ivoḍurāṭ || 22.17 ||
भ्रातृ-स्नेह से युक्त वालि द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर सुग्रीव अपने हर्ष को त्यागकर पुनः उस चन्द्रमा के समान दीन हो गया जो किसी ग्रह से ग्रस्त हो गया हो।
श्लोक 18 (kishkindha.22.18)
तद्वालिवचनाच्छान्तः कुर्वन् युक्तमतन्द्रितः । जग्राह सोऽभ्यनुज्ञातो मालां तां चैव काञ्चनीम् ॥ 22.18 ॥
tadvālivacanācchāntaḥ kurvan yuktamatandritaḥ | jagrāha so'bhyanujñāto mālāṃ tāṃ caiva kāñcanīm || 22.18 ||
वालि के उन वचनों से शान्त होकर, यथोचित कार्य करते हुए तथा उनकी आज्ञा पाकर सुग्रीव ने बिना आलस्य किए उस स्वर्णमाला को ग्रहण कर लिया।
श्लोक 19 (kishkindha.22.19)
तां मालां काञ्चनीं दत्त्वा दृष्ट्वा चैवात्मजं स्थितम् । संसिद्धः प्रेत्यभावाय स्नेहादङ्गदमब्रवीत् ॥ 22.19 ॥
tāṃ mālāṃ kāñcanīṃ dattvā dṛṣṭvā caivātmajaṃ sthitam | saṃsiddhaḥ pretyabhāvāya snehādaṅgadamabravīt || 22.19 ||
उस स्वर्णमाला को देकर तथा अपने पास खड़े पुत्र को देखकर, परलोक जाने को उद्यत वालि ने स्नेहपूर्वक अंगद से यह कहा।
श्लोक 20 (kishkindha.22.20)
देशकालौ भजस्वाद्य क्षममाणः प्रियाप्रिये । सुखदुःखसहः काले सुग्रीववशगो भव ॥ 22.20 ॥
deśakālau bhajasvādya kṣamamāṇaḥ priyāpriye | sukhaduḥkhasahaḥ kāle sugrīvavaśago bhava || 22.20 ||
आज से देश और काल का ध्यान रखते हुए, प्रिय और अप्रिय दोनों को सहते हुए, तथा समय आने पर सुख-दुःख को भी सहन करते हुए तुम सुग्रीव के अधीन रहना।
श्लोक 21 (kishkindha.22.21)
यथा हि त्वं महाबाहो लालितः सततं मया । न तथा वर्तमानं त्वां सुग्रीवो बहु मन्यते ॥ 22.21 ॥
yathā hi tvaṃ mahābāho lālitaḥ satataṃ mayā | na tathā vartamānaṃ tvāṃ sugrīvo bahu manyate || 22.21 ||
हे महाबाहो, जिस प्रकार मैंने सदा तुम्हें दुलारा है, यदि तुम उसी प्रकार का आचरण करते रहोगे तो सुग्रीव तुम्हें उतना आदर नहीं देगा।
श्लोक 22 (kishkindha.22.22)
नास्यामित्रैर्गतं गच्छेर्मा शत्रुभिररिंदम । भर्तुरर्थपरो दान्तः सुग्रीववशगो भव ॥ 22.22 ॥
nāsyāmitrairgataṃ gacchermā śatrubhirariṃdama | bharturarthaparo dāntaḥ sugrīvavaśago bhava || 22.22 ||
हे शत्रुदमन, उसके अमित्रों के पास मत जाना, न ही शत्रुओं के निकट जाना; अपने स्वामी के हित में तत्पर और संयमी होकर सुग्रीव के अधीन रहना।
श्लोक 23 (kishkindha.22.23)
न चातिप्रणयः कार्यः कर्तव्योऽप्रणयश्च ते । उभयं हि महादोषं तस्मादन्तरदृग् भव ॥ 22.23 ॥
na cātipraṇayaḥ kāryaḥ kartavyo'praṇayaśca te | ubhayaṃ hi mahādoṣaṃ tasmādantaradṛg bhava || 22.23 ||
तुम्हें न तो अत्यधिक घनिष्ठता दिखानी चाहिए और न ही अत्यधिक विमुखता; दोनों ही बड़े दोष हैं, इसलिए मध्यम दृष्टि अपनाना।
श्लोक 24 (kishkindha.22.24)
इत्युक्त्वाथ विवृत्ताक्षः शरसम्पीडितो भृशम् । विवृतैर्दशनैर्भीमैर्बभूवोत्क्रान्तजीवितः ॥ 22.24 ॥
ityuktvātha vivṛttākṣaḥ śarasampīḍito bhṛśam | vivṛtairdaśanairbhīmairbabhūvotkrāntajīvitaḥ || 22.24 ||
यह कहकर, बाण से अत्यन्त पीड़ित वालि की आँखें ऊपर को घूम गईं, भयंकर दाँत खुल गए, और वह प्राणहीन हो गया।
श्लोक 25 (kishkindha.22.25)
ततो विचुक्रुशुस्तत्र वानरा हतयूथपाः । परिदेवयमानास्ते सर्वे प्लवगसत्तमाः ॥ 22.25 ॥
tato vicukruśustatra vānarā hatayūthapāḥ | paridevayamānāste sarve plavagasattamāḥ || 22.25 ||
तत्पश्चात् अपने यूथपति के मारे जाने पर वे वानर वहाँ ऊँचे स्वर में क्रन्दन करने लगे, और वे सभी श्रेष्ठ वानर विलाप करने लगे।
श्लोक 26 (kishkindha.22.26)
किष्किन्धा ह्यद्य शून्या च स्वर्गते वानरेश्वरे । उद्यानानि च शून्यानि पर्वताः काननानि च ॥ 22.26 ॥
kiṣkindhā hyadya śūnyā ca svargate vānareśvare | udyānāni ca śūnyāni parvatāḥ kānanāni ca || 22.26 ||
आज वानरेश्वर के स्वर्गवासी हो जाने से किष्किन्धा वास्तव में सूनी हो गई है, उद्यान सूने पड़ गए हैं, तथा पर्वत और वन भी शून्य हो गए हैं।
श्लोक 27 (kishkindha.22.27)
हते प्लवगशार्दूले निष्प्रभा वानराः कृताः । यस्य वेगेन महता काननानि वनानि च ॥ 22.27 ॥
hate plavagaśārdūle niṣprabhā vānarāḥ kṛtāḥ | yasya vegena mahatā kānanāni vanāni ca || 22.27 ||
उस वानर-सिंह के मारे जाने पर वानरों की सारी कान्ति फीकी पड़ गई है; जिसके महान् वेग से वन और कानन -
श्लोक 28 (kishkindha.22.28)
पुष्पौघेणानुबद्ध्यन्ते करिष्यति तदद्य कः । येन दत्तं महद् युद्धं गन्धर्वस्य महात्मनः ॥ 22.28 ॥
puṣpaugheṇānubaddhyante kariṣyati tadadya kaḥ | yena dattaṃ mahad yuddhaṃ gandharvasya mahātmanaḥ || 22.28 ||
- फूलों के समूह से आच्छादित हो जाया करते थे, वह कार्य अब कौन कर सकेगा? जिसने उस महात्मा गन्धर्व के साथ वह महान् युद्ध किया था -
श्लोक 29 (kishkindha.22.29)
गोलभस्य महाबाहोर्दश वर्षाणि पञ्च च । नैव रात्रौ न दिवसे तद् युद्धमुपशाम्यति ॥ 22.29 ॥
golabhasya mahābāhordaśa varṣāṇi pañca ca | naiva rātrau na divase tad yuddhamupaśāmyati || 22.29 ||
- अर्थात् महाबाहु गोलभ के साथ; वह युद्ध पन्द्रह वर्षों तक न रात्रि में और न दिन में कभी शान्त हुआ।
श्लोक 30 (kishkindha.22.30)
ततः षोडशमे वर्षे गोलभो विनिपातितः । तं हत्वा दुर्विनीतं तु वाली दंष्ट्राकरालवान् । सर्वाभयंकरोऽस्माकं कथमेष निपातितः ॥ 22.30 ॥
tataḥ ṣoḍaśame varṣe golabho vinipātitaḥ | taṃ hatvā durvinītaṃ tu vālī daṃṣṭrākarālavān | sarvābhayaṃkaro'smākaṃ kathameṣa nipātitaḥ || 22.30 ||
तत्पश्चात् सोलहवें वर्ष में गोलभ मार गिराया गया; उस दुर्विनीत को मारकर, भयंकर दाढ़ों वाले वालि ने हम सबको अभय प्रदान किया था - फिर यह वालि आज कैसे गिर पड़ा?
श्लोक 31 (kishkindha.22.31)
हते तु वीरे प्लवगाधिपे तदा प्लवङ्गमास्तत्र न शर्म लेभिरे । वनेचराः सिंहयुते महावने यथा हि गावो निहते गवां पतौ ॥ 22.31 ॥
hate tu vīre plavagādhipe tadā plavaṅgamāstatra na śarma lebhire | vanecarāḥ siṃhayute mahāvane yathā hi gāvo nihate gavāṃ patau || 22.31 ||
उस वीर वानराधिपति के मारे जाने पर वे वानर वहाँ किंचित् भी सुख न पा सके, जैसे सिंहयुक्त महावन में विचरण करने वाली गौएँ अपने स्वामी बैल के मारे जाने पर सुखी नहीं रहतीं।
श्लोक 32 (kishkindha.22.32)
ततस्तु तारा व्यसनार्णवप्लुता मृतस्य भर्तुर्वदनं समीक्ष्य सा । जगाम भूमिं परिरभ्य वालिनं महाद्रुमं छिन्नमिवाश्रिता लता ॥ 22.32 ॥
tatastu tārā vyasanārṇavaplutā mṛtasya bharturvadanaṃ samīkṣya sā | jagāma bhūmiṃ parirabhya vālinaṃ mahādrumaṃ chinnamivāśritā latā || 22.32 ||
तब विपत्ति के सागर में डूबी हुई तारा अपने मृत पति के मुख को देखकर, वालि का आलिंगन करती हुई भूमि पर गिर पड़ी, जैसे कोई लता किसी कटे हुए विशाल वृक्ष के साथ लिपटकर गिर जाती है।