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किष्किन्धाकाण्ड · सर्ग 43

उत्तर दिशा की खोज का आदेश

सर्ग 42सर्ग-सूचीसर्ग 44

श्लोक 1 (kishkindha.43.1)

ततः संदिश्य सुग्रीवः श्वशुरं पश्चिमां दिशम् । वीरं शतबलिं नाम वानरं वानरेश्वरः ॥ 43.1 ॥

tataḥ saṃdiśya sugrīvaḥ śvaśuraṃ paścimāṃ diśam | vīraṃ śatabaliṃ nāma vānaraṃ vānareśvaraḥ || 43.1 ||

तत्पश्चात् अपने श्वसुर को पश्चिम दिशा भेजकर, वानरराज सुग्रीव ने शतबलि नामक वीर वानर से कहा।

श्लोक 2 (kishkindha.43.2)

उवाच राजा सर्वज्ञः सर्ववानरसत्तमः । वाक्यमात्महितं चैव रामस्य च हितं तदा ॥ 43.2 ॥

uvāca rājā sarvajñaḥ sarvavānarasattamaḥ | vākyamātmahitaṃ caiva rāmasya ca hitaṃ tadā || 43.2 ||

सर्वज्ञ राजा, सब वानरों में श्रेष्ठ सुग्रीव ने तब ऐसा वचन कहा जो अपने लिये भी हितकर था और राम के लिये भी हितकर था।

श्लोक 3 (kishkindha.43.3)

वृतः शतसहस्रेण त्वद्विधानां वनौकसाम् । वैवस्वतसुतैः सार्धं प्रविष्टः सर्वमन्त्रिभिः ॥ 43.3 ॥

vṛtaḥ śatasahasreṇa tvadvidhānāṃ vanaukasām | vaivasvatasutaiḥ sārdhaṃ praviṣṭaḥ sarvamantribhiḥ || 43.3 ||

"तुम्हारे समान वन-निवासी एक लाख वानरों से घिरे हुए, तथा यम के समस्त मन्त्री-पुत्रों सहित प्रवेश करते हुए,

श्लोक 4 (kishkindha.43.4)

दिशं ह्युदीचीं विक्रान्तां हिमशैलावतंसिकाम् । सर्वतः परिमार्गध्वं रामपत्नीं यशस्विनीम् ॥ 43.4 ॥

diśaṃ hyudīcīṃ vikrāntāṃ himaśailāvataṃsikām | sarvataḥ parimārgadhvaṃ rāmapatnīṃ yaśasvinīm || 43.4 ||

दुर्गम उत्तर दिशा में, जिसका आभूषण हिमालय पर्वत है, चारों ओर राम की यशस्विनी पत्नी की खोज करो।

श्लोक 5 (kishkindha.43.5)

अस्मिन् कार्ये विनिर्वृत्ते कृते दाशरथेः प्रिये । ऋणान्मुक्ता भविष्यामः कृतार्थार्थविदां वराः ॥ 43.5 ॥

asmin kārye vinirvṛtte kṛte dāśaratheḥ priye | ṛṇānmuktā bhaviṣyāmaḥ kṛtārthārthavidāṃ varāḥ || 43.5 ||

इस कार्य के पूर्ण होने पर, दशरथ-पुत्र राम का प्रिय कार्य सम्पन्न करने पर, हम ऋण-मुक्त हो जायेंगे, हम उपकार जानने वालों में श्रेष्ठ होंगे।

श्लोक 6 (kishkindha.43.6)

कृतं हि प्रियमस्माकं राघवेण महात्मना । तस्य चेत्प्रतिकारोऽस्ति सफलं जीवितं भवेत् ॥ 43.6 ॥

kṛtaṃ hi priyamasmākaṃ rāghaveṇa mahātmanā | tasya cetpratikāro'sti saphalaṃ jīvitaṃ bhavet || 43.6 ||

महात्मा राघव ने निश्चय ही हमारा प्रिय कार्य किया है; यदि उसका प्रत्युपकार हो सके तो हमारा जीवन सफल होगा।

श्लोक 7 (kishkindha.43.7)

अर्थिनः कार्यनिर्वृत्तिमकर्तुरपि यश्चरेत् । तस्य स्यात् सफलं जन्म किं पुनः पूर्वकारिणः ॥ 43.7 ॥

arthinaḥ kāryanirvṛttimakarturapi yaścaret | tasya syāt saphalaṃ janma kiṃ punaḥ pūrvakāriṇaḥ || 43.7 ||

जो कोई किसी याचक का कार्य पूर्ण करे, भले ही उसने पहले कोई उपकार न किया हो, उसका जन्म भी सफल होता है — फिर जिसने पहले ही उपकार किया हो, उसके लिये तो कहना ही क्या।

श्लोक 8 (kishkindha.43.8)

एतां बुद्धिं समास्थाय दृश्यते जानकी यथा । तथा भवद्भिः कर्तव्यमस्मत्प्रियहितैषिभिः ॥ 43.8 ॥

etāṃ buddhiṃ samāsthāya dṛśyate jānakī yathā | tathā bhavadbhiḥ kartavyamasmatpriyahitaiṣibhiḥ || 43.8 ||

हमारे प्रिय और हितैषी तुम सबको इसी विचार को अपनाकर, जिस प्रकार जानकी मिल सकें, वैसा ही प्रयत्न करना चाहिये।

श्लोक 9 (kishkindha.43.9)

अयं हि सर्वभूतानां मान्यस्तु नरसत्तमः । अस्मासु च गतः प्रीतिं रामः परपुरंजयः ॥ 43.9 ॥

ayaṃ hi sarvabhūtānāṃ mānyastu narasattamaḥ | asmāsu ca gataḥ prītiṃ rāmaḥ parapuraṃjayaḥ || 43.9 ||

यह शत्रु-नगरों को जीतने वाले नरश्रेष्ठ राम सब प्राणियों के लिये आदरणीय हैं, और हम पर भी उनका स्नेह है।

श्लोक 10 (kishkindha.43.10)

इमानि बहुदुर्गाणि नद्यः शैलान्तराणि च । भवन्तः परिमार्गन्तु बुद्धिविक्रमसम्पदा ॥ 43.10 ॥

imāni bahudurgāṇi nadyaḥ śailāntarāṇi ca | bhavantaḥ parimārgantu buddhivikramasampadā || 43.10 ||

इन अनेक दुर्गम स्थानों, नदियों तथा पर्वतों के बीच के प्रदेशों में तुम सब अपनी बुद्धि और पराक्रम की सम्पत्ति से भलीभाँति खोज करो।

श्लोक 11 (kishkindha.43.11)

तत्र म्लेच्छान् पुलिन्दांश्च शूरसेनांस्तथैव च । प्रस्थलान् भरतांश्चैव कुरूंश्च सह मद्रकैः ॥ 43.11 ॥

tatra mlecchān pulindāṃśca śūrasenāṃstathaiva ca | prasthalān bharatāṃścaiva kurūṃśca saha madrakaiḥ || 43.11 ||

वहाँ म्लेच्छ, पुलिन्द तथा शूरसेन देशों में, और उसी प्रकार प्रस्थल, भरत, तथा मद्रकों सहित कुरु देश में,

श्लोक 12 (kishkindha.43.12)

काम्बोजयवनांश्चैव शकानां पत्तनानि च । अन्वीक्ष्य दरदांश्चैव हिमवन्तं विचिन्वथ ॥ 43.12 ॥

kāmbojayavanāṃścaiva śakānāṃ pattanāni ca | anvīkṣya daradāṃścaiva himavantaṃ vicinvatha || 43.12 ||

तथा कम्बोज और यवन देशों में, शकों के नगरों में भी देखकर, और दरद देश को देखकर, हिमालय पर्वत की भी खोज करो।

श्लोक 13 (kishkindha.43.13)

लोध्रपद्मकषण्डेषु देवदारुवनेषु च । रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ 43.13 ॥

lodhrapadmakaṣaṇḍeṣu devadāruvaneṣu ca | rāvaṇaḥ saha vaidehyā mārgitavyastatastataḥ || 43.13 ||

लोध्र और पद्मक वृक्षों के झुरमुटों में, तथा देवदारु के वनों में, स्थान-स्थान पर रावण की सीता सहित खोज करनी चाहिये।

श्लोक 14 (kishkindha.43.14)

ततः सोमाश्रमं गत्वा देवगन्धर्वसेवितम् । कालं नाम महासानुं पर्वतं तं गमिष्यथ ॥ 43.14 ॥

tataḥ somāśramaṃ gatvā devagandharvasevitam | kālaṃ nāma mahāsānuṃ parvataṃ taṃ gamiṣyatha || 43.14 ||

फिर देवों और गन्धर्वों द्वारा सेवित सोम के आश्रम पर जाकर, तुम विशाल चोटियों वाले काल नामक उस पर्वत पर जाओगे।

श्लोक 15 (kishkindha.43.15)

महत्सु तस्य शैलेषु पर्वतेषु गुहासु च । विचिन्वत महाभागां रामपत्नीमनिन्दिताम् ॥ 43.15 ॥

mahatsu tasya śaileṣu parvateṣu guhāsu ca | vicinvata mahābhāgāṃ rāmapatnīmaninditām || 43.15 ||

उसके विशाल पर्वत-शिखरों तथा गुफाओं में, राम की उस महाभागा, निर्दोष पत्नी की खोज करो।

श्लोक 16 (kishkindha.43.16)

तमतिक्रम्य शैलेन्द्रं हेमगर्भं महागिरिम् । ततः सुदर्शनं नाम पर्वतं गन्तुमर्हथ ॥ 43.16 ॥

tamatikramya śailendraṃ hemagarbhaṃ mahāgirim | tataḥ sudarśanaṃ nāma parvataṃ gantumarhatha || 43.16 ||

सुवर्ण-गर्भ वाले उस पर्वतराज महागिरि को पार करके, फिर तुम्हें सुदर्शन नामक पर्वत पर जाना चाहिये।

श्लोक 17 (kishkindha.43.17)

ततो देवसखो नाम पर्वतः पतगालयः । नानापक्षिसमाकीर्णो विविधद्रुमभूषितः ॥ 43.17 ॥

tato devasakho nāma parvataḥ patagālayaḥ | nānāpakṣisamākīrṇo vividhadrumabhūṣitaḥ || 43.17 ||

फिर देवसख नामक पर्वत है, जो पक्षियों का निवास-स्थान है, नाना प्रकार के पक्षियों से भरा तथा विविध वृक्षों से सुशोभित है।

श्लोक 18 (kishkindha.43.18)

तस्य काननषण्डेषु निर्झरेषु गुहासु च । रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ 43.18 ॥

tasya kānanaṣaṇḍeṣu nirjhareṣu guhāsu ca | rāvaṇaḥ saha vaidehyā mārgitavyastatastataḥ || 43.18 ||

उसके वन-खण्डों में, झरनों में तथा गुफाओं में, स्थान-स्थान पर रावण की सीता सहित खोज करनी चाहिये।

श्लोक 19 (kishkindha.43.19)

तमतिक्रम्य चाकाशं सर्वतः शतयोजनम् । अपर्वतनदीवृक्षं सर्वसत्त्वविवर्जितम् ॥ 43.19 ॥

tamatikramya cākāśaṃ sarvataḥ śatayojanam | aparvatanadīvṛkṣaṃ sarvasattvavivarjitam || 43.19 ||

उसे पार करने पर सौ योजन तक चारों ओर आकाश ही आकाश है, जो पर्वत, नदी तथा वृक्षों से रहित, और सब प्राणियों से रहित है।

श्लोक 20 (kishkindha.43.20)

तत्तु शीघ्रमतिक्रम्य कान्तारं रोमहर्षणम् । कैलासं पाण्डुरं प्राप्य हृष्टा यूयं भविष्यथ ॥ 43.20 ॥

tattu śīghramatikramya kāntāraṃ romaharṣaṇam | kailāsaṃ pāṇḍuraṃ prāpya hṛṣṭā yūyaṃ bhaviṣyatha || 43.20 ||

उस रोमांचकारी दुर्गम प्रदेश को शीघ्रता से पार करके, श्वेत कैलास पर्वत पर पहुँचकर तुम सब हर्षित हो जाओगे।

श्लोक 21 (kishkindha.43.21)

तत्र पाण्डुरमेघाभं जाम्बूनदपरिष्कृतम् । कुबेरभवनं रम्यं निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ 43.21 ॥

tatra pāṇḍurameghābhaṃ jāmbūnadapariṣkṛtam | kuberabhavanaṃ ramyaṃ nirmitaṃ viśvakarmaṇā || 43.21 ||

वहाँ श्वेत मेघ के समान, स्वर्ण से सुशोभित, कुबेर का रमणीय भवन है, जो विश्वकर्मा द्वारा निर्मित है।

श्लोक 22 (kishkindha.43.22)

विशाला नलिनी यत्र प्रभूतकमलोत्पला । हंसकारण्डवाकीर्णा अप्सरोगणसेविता ॥ 43.22 ॥

viśālā nalinī yatra prabhūtakamalotpalā | haṃsakāraṇḍavākīrṇā apsarogaṇasevitā || 43.22 ||

जहाँ कमलों और नील-कमलों से भरा एक विशाल सरोवर है, जो हंसों और कारण्डव पक्षियों से भरा तथा अप्सराओं के समूहों द्वारा सेवित है।

श्लोक 23 (kishkindha.43.23)

तत्र वैश्रवणो राजा सर्वलोकनमस्कृतः । धनदो रमते श्रीमान् गुह्यकैः सह यक्षराट् ॥ 43.23 ॥

tatra vaiśravaṇo rājā sarvalokanamaskṛtaḥ | dhanado ramate śrīmān guhyakaiḥ saha yakṣarāṭ || 43.23 ||

वहाँ सब लोकों द्वारा वन्दित, धन देने वाले, शोभायुक्त यक्षराज कुबेर गुह्यकों के साथ विहार करते हैं।

श्लोक 24 (kishkindha.43.24)

तस्य चन्द्रनिकाशेषु पर्वतेषु गुहासु च । रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ 43.24 ॥

tasya candranikāśeṣu parvateṣu guhāsu ca | rāvaṇaḥ saha vaidehyā mārgitavyastatastataḥ || 43.24 ||

उसके चन्द्रमा के समान श्वेत पर्वतों में तथा गुफाओं में, स्थान-स्थान पर रावण की सीता सहित खोज करनी चाहिये।

श्लोक 25 (kishkindha.43.25)

क्रौञ्चं तु गिरिमासाद्य बिलं तस्य सुदुर्गमम् । अप्रमत्तैः प्रवेष्टव्यं दुष्प्रवेशं हि तत् स्मृतम् ॥ 43.25 ॥

krauñcaṃ tu girimāsādya bilaṃ tasya sudurgamam | apramattaiḥ praveṣṭavyaṃ duṣpraveśaṃ hi tat smṛtam || 43.25 ||

क्रौञ्च पर्वत पर पहुँचकर, उसकी अत्यन्त दुर्गम गुफा में सावधान होकर प्रवेश करना चाहिये, क्योंकि वह अत्यन्त दुष्प्रवेश्य कही जाती है।

श्लोक 26 (kishkindha.43.26)

वसन्ति हि महात्मानस्तत्र सूर्यसमप्रभाः । देवैरभ्यर्थिताः सम्यग् देवरूपा महर्षयः ॥ 43.26 ॥

vasanti hi mahātmānastatra sūryasamaprabhāḥ | devairabhyarthitāḥ samyag devarūpā maharṣayaḥ || 43.26 ||

वहाँ सूर्य के समान तेजस्वी, देवताओं द्वारा भलीभाँति प्रार्थित, देवरूपधारी महर्षि निवास करते हैं।

श्लोक 27 (kishkindha.43.27)

क्रौञ्चस्य तु गुहाश्चान्याः सानूनि शिखराणि च । निर्दराश्च नितम्बाश्च विचेतव्यास्ततस्ततः ॥ 43.27 ॥

krauñcasya tu guhāścānyāḥ sānūni śikharāṇi ca | nirdarāśca nitambāśca vicetavyāstatastataḥ || 43.27 ||

क्रौञ्च पर्वत की अन्य गुफाओं, चोटियों तथा शिखरों को, और उसके कन्दराओं और ढलानों को भी स्थान-स्थान पर खोजना चाहिये।

श्लोक 28 (kishkindha.43.28)

अवृक्षं कामशैलं च मानसं विहगालयम् । न गतिस्तत्र भूतानां देवानां न च रक्षसाम् ॥ 43.28 ॥

avṛkṣaṃ kāmaśailaṃ ca mānasaṃ vihagālayam | na gatistatra bhūtānāṃ devānāṃ na ca rakṣasām || 43.28 ||

वृक्ष-रहित कामशैल पर्वत को, और पक्षियों के निवास-स्थान मानस सरोवर को भी खोजो; वहाँ न प्राणियों का, न देवताओं का और न ही राक्षसों का प्रवेश है।

श्लोक 29 (kishkindha.43.29)

स च सर्वैर्विचेतव्यः ससानुप्रस्थभूधरः । क्रौञ्चं गिरिमतिक्रम्य मैनाको नाम पर्वतः ॥ 43.29 ॥

sa ca sarvairvicetavyaḥ sasānuprasthabhūdharaḥ | krauñcaṃ girimatikramya maināko nāma parvataḥ || 43.29 ||

उस समस्त पर्वत को, उसकी चोटियों तथा पठारों सहित, तुम सबको खोजना चाहिये। क्रौञ्च पर्वत को पार करने पर मैनाक नामक पर्वत है।

श्लोक 30 (kishkindha.43.30)

मयस्य भवनं तत्र दानवस्य स्वयंकृतम् । मैनाकस्तु विचेतव्यः ससानुप्रस्थकन्दरः ॥ 43.30 ॥

mayasya bhavanaṃ tatra dānavasya svayaṃkṛtam | mainākastu vicetavyaḥ sasānuprasthakandaraḥ || 43.30 ||

वहाँ दानव मय का स्वयं बनाया हुआ भवन है। मैनाक पर्वत की, उसकी चोटियों, पठारों तथा गुफाओं सहित, खोज करनी चाहिये।

श्लोक 31 (kishkindha.43.31)

स्त्रीणामश्वमुखीनां तु निकेतस्तत्र तत्र तु । तं देशं समतिक्रम्य आश्रमं सिद्धसेवितम् ॥ 43.31 ॥

strīṇāmaśvamukhīnāṃ tu niketastatra tatra tu | taṃ deśaṃ samatikramya āśramaṃ siddhasevitam || 43.31 ||

वहाँ-वहाँ अश्वमुखी स्त्रियों के निवास-स्थान भी हैं। उस प्रदेश को पार करने पर, सिद्धों द्वारा सेवित एक आश्रम है,

श्लोक 32 (kishkindha.43.32)

सिद्धा वैखानसा यत्र वालखिल्याश्च तापसाः । वन्दितव्यास्ततः सिद्धास्तपसा वीतकल्मषाः ॥ 43.32 ॥

siddhā vaikhānasā yatra vālakhilyāśca tāpasāḥ | vanditavyāstataḥ siddhāstapasā vītakalmaṣāḥ || 43.32 ||

जहाँ सिद्ध, वैखानस तथा वालखिल्य तपस्वी रहते हैं। तत्पश्चात् तपस्या से निष्पाप हो चुके उन सिद्धों की वन्दना करनी चाहिये,

श्लोक 33 (kishkindha.43.33)

प्रष्टव्या चापि सीतायाः प्रवृत्तिर्विनयान्वितैः । हेमपुष्करसंछन्नं तत्र वैखानसं सरः ॥ 43.33 ॥

praṣṭavyā cāpi sītāyāḥ pravṛttirvinayānvitaiḥ | hemapuṣkarasaṃchannaṃ tatra vaikhānasaṃ saraḥ || 43.33 ||

तथा विनयपूर्वक उनसे सीता का समाचार भी पूछना चाहिये। वहाँ स्वर्णमय कमलों से आच्छादित वैखानस सरोवर है,

श्लोक 34 (kishkindha.43.34)

तरुणादित्यसंकाशैर्हंसैर्विचरितं शुभैः । औपवाह्यः कुबेरस्य सार्वभौम इति स्मृतः ॥ 43.34 ॥

taruṇādityasaṃkāśairhaṃsairvicaritaṃ śubhaiḥ | aupavāhyaḥ kuberasya sārvabhauma iti smṛtaḥ || 43.34 ||

जो उगते सूर्य के समान शुभ हंसों से विचरित है। कुबेर का वाहन सार्वभौम नामक हाथी वहाँ रहता है,

श्लोक 35 (kishkindha.43.35)

गजः पर्येति तं देशं सदा सह करेणुभिः । तत् सरः समतिक्रम्य नष्टचन्द्रदिवाकरम् । अनक्षत्रगणं व्योम निष्पयोदमनादितम् ॥ 43.35 ॥

gajaḥ paryeti taṃ deśaṃ sadā saha kareṇubhiḥ | tat saraḥ samatikramya naṣṭacandradivākaram | anakṣatragaṇaṃ vyoma niṣpayodamanāditam || 43.35 ||

उस हाथी को अपनी हथिनियों के साथ सदा उस प्रदेश में विचरते देखा जाता है। उस सरोवर को पार करने पर, ऐसा आकाश है जहाँ न चन्द्रमा है, न सूर्य, न नक्षत्रसमूह, न मेघ तथा न कोई ध्वनि,

श्लोक 36 (kishkindha.43.36)

गभस्तिभिरिवार्कस्य स तु देशः प्रकाश्यते । विश्राम्यद्भिस्तपःसिद्धैर्देवकल्पैः स्वयंप्रभैः ॥ 43.36 ॥

gabhastibhirivārkasya sa tu deśaḥ prakāśyate | viśrāmyadbhistapaḥsiddhairdevakalpaiḥ svayaṃprabhaiḥ || 43.36 ||

फिर भी वह प्रदेश, मानो सूर्य की किरणों से ही, तप-सिद्ध, देवतुल्य, स्वयं-प्रकाशमान महर्षियों के तेज से आलोकित रहता है, जो वहाँ विश्राम करते हैं।

श्लोक 37 (kishkindha.43.37)

तं तु देशमतिक्रम्य शैलोदा नाम निम्नगा । उभयोस्तीरयोस्तस्याः कीचका नाम वेणवः ॥ 43.37 ॥

taṃ tu deśamatikramya śailodā nāma nimnagā | ubhayostīrayostasyāḥ kīcakā nāma veṇavaḥ || 43.37 ||

उस प्रदेश को पार करने पर शैलोदा नामक नदी है। उसके दोनों तटों पर कीचक नामक बाँस हैं,

श्लोक 38 (kishkindha.43.38)

ते नयन्ति परं तीरं सिद्धान् प्रत्यानयन्ति च । उत्तराः कुरवस्तत्र कृतपुण्यप्रतिश्रयाः ॥ 43.38 ॥

te nayanti paraṃ tīraṃ siddhān pratyānayanti ca | uttarāḥ kuravastatra kṛtapuṇyapratiśrayāḥ || 43.38 ||

जो सिद्धों को उस पार ले जाते हैं और वापस भी ले आते हैं। वहाँ उत्तर-कुरु देश है, जो पूर्वजन्म के पुण्य का आश्रय-स्थान है।

श्लोक 39 (kishkindha.43.39)

ततः काञ्चनपद्माभिः पद्मिनीभिः कृतोदकाः । नीलवैदूर्यपत्राढ्या नद्यस्तत्र सहस्रशः ॥ 43.39 ॥

tataḥ kāñcanapadmābhiḥ padminībhiḥ kṛtodakāḥ | nīlavaidūryapatrāḍhyā nadyastatra sahasraśaḥ || 43.39 ||

वहाँ स्वर्णमय कमलों वाली कमलिनियों से भरे जल वाली, तथा नीले वैदूर्यमणि के समान पत्तों से युक्त हज़ारों नदियाँ हैं,

श्लोक 40 (kishkindha.43.40)

रक्तोत्पलवनैश्चात्र मण्डिताश्च हिरण्मयैः । तरुणादित्यसंकाशा भान्ति तत्र जलाशयाः ॥ 43.40 ॥

raktotpalavanaiścātra maṇḍitāśca hiraṇmayaiḥ | taruṇādityasaṃkāśā bhānti tatra jalāśayāḥ || 43.40 ||

तथा लाल कमलों के स्वर्णमय वनों से सुशोभित हैं। वहाँ के जलाशय उगते सूर्य के समान चमकते हैं।

श्लोक 41 (kishkindha.43.41)

महार्हमणिपत्रैश्च काञ्चनप्रभकेसरैः । नीलोत्पलवनैश्चित्रैः स देशः सर्वतो वृतः ॥ 43.41 ॥

mahārhamaṇipatraiśca kāñcanaprabhakesaraiḥ | nīlotpalavanaiścitraiḥ sa deśaḥ sarvato vṛtaḥ || 43.41 ||

वह प्रदेश चारों ओर से अनमोल मणियों जैसी पंखुड़ियों वाले तथा सुवर्ण के समान चमकते पुंकेसरों वाले, विचित्र नील-कमलों के वनों से घिरा है।

श्लोक 42 (kishkindha.43.42)

निस्तुलाभिश्च मुक्ताभिर्मणिभिश्च महाधनैः । उद्धूतपुलिनास्तत्र जातरूपैश्च निम्नगाः ॥ 43.42 ॥

nistulābhiśca muktābhirmaṇibhiśca mahādhanaiḥ | uddhūtapulināstatra jātarūpaiśca nimnagāḥ || 43.42 ||

वहाँ की नदियों के तटों पर बेजोड़ मोतियों, अनमोल मणियों तथा स्वर्ण के ढेर बिखरे पड़े हैं।

श्लोक 43 (kishkindha.43.43)

सर्वरत्नमयैश्चित्रैरवगाढा नगोत्तमैः । जातरूपमयैश्चापि हुताशनसमप्रभैः ॥ 43.43 ॥

sarvaratnamayaiścitrairavagāḍhā nagottamaiḥ | jātarūpamayaiścāpi hutāśanasamaprabhaiḥ || 43.43 ||

वह प्रदेश सब प्रकार के रत्नों से बने विचित्र, तथा अग्नि के समान तेजस्वी सुवर्णमय उत्तम पर्वतों से घिरा हुआ है।

श्लोक 44 (kishkindha.43.44)

नित्यपुष्पफलास्तत्र नगाः पत्ररथाकुलाः । दिव्यगन्धरसस्पर्शाः सर्वकामान् स्रवन्ति च ॥ 43.44 ॥

nityapuṣpaphalāstatra nagāḥ patrarathākulāḥ | divyagandharasasparśāḥ sarvakāmān sravanti ca || 43.44 ||

वहाँ के वृक्ष सदा फूलों और फलों से लदे रहते हैं तथा पक्षियों से भरे रहते हैं। वे दिव्य गन्ध, रस और स्पर्श वाले होकर सभी कामनाओं को पूर्ण करते हुए झरते हैं।

श्लोक 45 (kishkindha.43.45)

नानाकाराणि वासांसि फलन्त्यन्ये नगोत्तमाः । मुक्तावैदूर्यचित्राणि भूषणानि तथैव च । स्त्रीणां यान्यनुरूपाणि पुरुषाणां तथैव च ॥ 43.45 ॥

nānākārāṇi vāsāṃsi phalantyanye nagottamāḥ | muktāvaidūryacitrāṇi bhūṣaṇāni tathaiva ca | strīṇāṃ yānyanurūpāṇi puruṣāṇāṃ tathaiva ca || 43.45 ||

कुछ अन्य उत्तम वृक्ष नाना प्रकार के वस्त्रों को फल के रूप में उत्पन्न करते हैं, तथा मोतियों और वैदूर्यमणियों से जड़े हुए आभूषणों को भी, जो स्त्रियों तथा पुरुषों दोनों के अनुरूप होते हैं।

श्लोक 46 (kishkindha.43.46)

सर्वर्तुसुखसेव्यानि फलन्त्यन्ये नगोत्तमाः । महार्हमणिचित्राणि फलन्त्यन्ये नगोत्तमाः ॥ 43.46 ॥

sarvartusukhasevyāni phalantyanye nagottamāḥ | mahārhamaṇicitrāṇi phalantyanye nagottamāḥ || 43.46 ||

कुछ अन्य उत्तम वृक्ष सब ऋतुओं में सुखपूर्वक उपयोग किये जाने वाले फल देते हैं, और कुछ अन्य उत्तम वृक्ष अनमोल मणियों से जड़ित वस्तुओं को फल के रूप में देते हैं।

श्लोक 47 (kishkindha.43.47)

शयनानि प्रसूयन्ते चित्रास्तरणवन्ति च । मनःकान्तानि माल्यानि फलन्त्यत्रापरे द्रुमाः ॥ 43.47 ॥

śayanāni prasūyante citrāstaraṇavanti ca | manaḥkāntāni mālyāni phalantyatrāpare drumāḥ || 43.47 ||

कुछ वृक्ष विचित्र बिछौनों वाली शय्याओं को जन्म देते हैं, और वहाँ अन्य वृक्ष मन को भाने वाली मालाओं को फल के रूप में देते हैं।

श्लोक 48 (kishkindha.43.48)

पानानि च महार्हाणि भक्ष्याणि विविधानि च । स्त्रियश्च गुणसम्पन्ना रूपयौवनलक्षिताः ॥ 43.48 ॥

pānāni ca mahārhāṇi bhakṣyāṇi vividhāni ca | striyaśca guṇasampannā rūpayauvanalakṣitāḥ || 43.48 ||

वहाँ बहुमूल्य पेय तथा विविध खाद्य पदार्थ भी हैं, और गुणसम्पन्न, रूप-यौवन से युक्त स्त्रियाँ भी हैं।

श्लोक 49 (kishkindha.43.49)

गन्धर्वाः किन्नराः सिद्धा नागा विद्याधरास्तथा । रमन्ते सततं तत्र नारीभिर्भास्वरप्रभाः ॥ 43.49 ॥

gandharvāḥ kinnarāḥ siddhā nāgā vidyādharāstathā | ramante satataṃ tatra nārībhirbhāsvaraprabhāḥ || 43.49 ||

गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध, नाग तथा विद्याधर, जिनकी कान्ति देदीप्यमान है, वहाँ अपनी स्त्रियों के साथ निरन्तर विहार करते हैं।

श्लोक 50 (kishkindha.43.50)

सर्वे सुकृतकर्माणः सर्वे रतिपरायणाः । सर्वे कामार्थसहिता वसन्ति सह योषितः ॥ 43.50 ॥

sarve sukṛtakarmāṇaḥ sarve ratiparāyaṇāḥ | sarve kāmārthasahitā vasanti saha yoṣitaḥ || 43.50 ||

वे सब पुण्यकर्मा हैं, सब रति में तत्पर हैं, तथा सब काम और अर्थ से युक्त होकर अपनी स्त्रियों के साथ निवास करते हैं।

श्लोक 51 (kishkindha.43.51)

गीतवादित्रनिर्घोषः सोत्कृष्टहसितस्वनः । श्रूयते सततं तत्र सर्वभूतमनोरमः ॥ 43.51 ॥

gītavāditranirghoṣaḥ sotkṛṣṭahasitasvanaḥ | śrūyate satataṃ tatra sarvabhūtamanoramaḥ || 43.51 ||

वहाँ निरन्तर गीत और वाद्य की ध्वनि, उन्मुक्त हास्य की आवाज़ के साथ, सुनायी देती है, जो सब प्राणियों के मन को हरने वाली है।

श्लोक 52 (kishkindha.43.52)

तत्र नामुदितः कश्चिन्नात्र कश्चिदसत्प्रियः । अहन्यहनि वर्धन्ते गुणास्तत्र मनोरमाः ॥ 43.52 ॥

tatra nāmuditaḥ kaścinnātra kaścidasatpriyaḥ | ahanyahani vardhante guṇāstatra manoramāḥ || 43.52 ||

वहाँ कोई भी दुःखी नहीं है, और न ही कोई असत्य-प्रिय है; वहाँ के मनोहर गुण दिन-प्रतिदिन बढ़ते ही रहते हैं।

श्लोक 53 (kishkindha.43.53)

समतिक्रम्य तं देशमुत्तरः पयसां निधिः । तत्र सोमगिरिर्नाम मध्ये हेममयो महान् ॥ 43.53 ॥

samatikramya taṃ deśamuttaraḥ payasāṃ nidhiḥ | tatra somagirirnāma madhye hemamayo mahān || 43.53 ||

उस प्रदेश को पार करने पर उत्तर दिशा का समुद्र है। उसके मध्य में सोमगिरि नामक विशाल स्वर्णमय पर्वत है।

श्लोक 54 (kishkindha.43.54)

इन्द्रलोकगता ये च ब्रह्मलोकगताश्च ये । देवास्तं समवेक्षन्ते गिरिराजं दिवं गताः ॥ 43.54 ॥

indralokagatā ye ca brahmalokagatāśca ye | devāstaṃ samavekṣante girirājaṃ divaṃ gatāḥ || 43.54 ||

जो देवता इन्द्रलोक को प्राप्त हुए हैं और जो ब्रह्मलोक को प्राप्त हुए हैं, वे स्वर्ग में रहते हुए उस पर्वतराज को देखते हैं।

श्लोक 55 (kishkindha.43.55)

स तु देशो विसूर्योऽपि तस्य भासा प्रकाशते । सूर्यलक्ष्म्याभिविज्ञेयस्तपतेव विवस्वता ॥ 43.55 ॥

sa tu deśo visūryo'pi tasya bhāsā prakāśate | sūryalakṣmyābhivijñeyastapateva vivasvatā || 43.55 ||

वह प्रदेश, सूर्य-रहित होते हुए भी, उसी पर्वत की कान्ति से प्रकाशित रहता है, और सूर्य के तेज के समान पहचाना जाता है, मानो सूर्य ही वहाँ तप रहा हो।

श्लोक 56 (kishkindha.43.56)

भगवांस्तत्र विश्वात्मा शम्भुरेकादशात्मकः । ब्रह्मा वसति देवेशो ब्रह्मर्षिपरिवारितः ॥ 43.56 ॥

bhagavāṃstatra viśvātmā śambhurekādaśātmakaḥ | brahmā vasati deveśo brahmarṣiparivāritaḥ || 43.56 ||

वहाँ विश्वात्मा भगवान् विष्णु, ग्यारह रुद्रों के रूप वाले शम्भु, तथा ब्रह्मर्षियों से घिरे देवेश्वर ब्रह्मा निवास करते हैं।

श्लोक 57 (kishkindha.43.57)

न कथंचन गन्तव्यं कुरूणामुत्तरेण वः । अन्येषामपि भूतानां नानुक्रामति वै गतिः ॥ 43.57 ॥

na kathaṃcana gantavyaṃ kurūṇāmuttareṇa vaḥ | anyeṣāmapi bhūtānāṃ nānukrāmati vai gatiḥ || 43.57 ||

तुम्हें उत्तर-कुरु से आगे उत्तर दिशा में किसी भी प्रकार नहीं जाना चाहिये; अन्य प्राणियों की भी वहाँ पहुँच नहीं है।

श्लोक 58 (kishkindha.43.58)

स हि सोमगिरिर्नाम देवानामपि दुर्गमः । तमालोक्य ततः क्षिप्रमुपावर्तितुमर्हथ ॥ 43.58 ॥

sa hi somagirirnāma devānāmapi durgamaḥ | tamālokya tataḥ kṣipramupāvartitumarhatha || 43.58 ||

वह सोमगिरि नामक पर्वत देवताओं के लिये भी दुर्गम है; उसे देखकर ही तुम्हें शीघ्र लौट आना चाहिये।

श्लोक 59 (kishkindha.43.59)

एतावद् वानरैः शक्यं गन्तुं वानरपुंगवाः । अभास्करममर्यादं न जानीमस्ततः परम् ॥ 43.59 ॥

etāvad vānaraiḥ śakyaṃ gantuṃ vānarapuṃgavāḥ | abhāskaramamaryādaṃ na jānīmastataḥ param || 43.59 ||

हे वानरश्रेष्ठो! वानरों के लिये केवल यहाँ तक ही जाना सम्भव है; उससे आगे सूर्य-रहित, सीमा-रहित प्रदेश है, जिसे हम नहीं जानते।

श्लोक 60 (kishkindha.43.60)

सर्वमेतद् विचेतव्यं यन्मया परिकीर्तितम् । यदन्यदपि नोक्तं च तत्रापि क्रियतां मतिः ॥ 43.60 ॥

sarvametad vicetavyaṃ yanmayā parikīrtitam | yadanyadapi noktaṃ ca tatrāpi kriyatāṃ matiḥ || 43.60 ||

यह सब, जो मैंने बताया है, भलीभाँति खोजा जाना चाहिये; तथा जो कुछ मैंने नहीं बताया, वहाँ भी अपनी बुद्धि से प्रयत्न करना चाहिये।

श्लोक 61 (kishkindha.43.61)

ततः कृतं दाशरथेर्महत्प्रियं महत्प्रियं चापि ततो मम प्रियम् । कृतं भविष्यत्यनिलानलोपमा विदेहजादर्शनजेन कर्मणा ॥ 43.61 ॥

tataḥ kṛtaṃ dāśarathermahatpriyaṃ mahatpriyaṃ cāpi tato mama priyam | kṛtaṃ bhaviṣyatyanilānalopamā videhajādarśanajena karmaṇā || 43.61 ||

हे पवन और अग्नि के समान वेगवान् वानरो! विदेहनन्दिनी सीता के दर्शन-रूपी उस कार्य के सम्पन्न होने से दशरथ-पुत्र राम का महान् उपकार हो जायेगा, और उससे मेरा भी महान् उपकार हो जायेगा।

श्लोक 62 (kishkindha.43.62)

ततः कृतार्थाः सहिताः सबान्धवा मयार्चिताः सर्वगुणैर्मनोरमैः । चरिष्यथोर्वीं प्रति शान्तशत्रवः सहप्रिया भूतधराः प्लवंगमाः ॥ 43.62 ॥

tataḥ kṛtārthāḥ sahitāḥ sabāndhavā mayārcitāḥ sarvaguṇairmanoramaiḥ | cariṣyathorvīṃ prati śāntaśatravaḥ sahapriyā bhūtadharāḥ plavaṃgamāḥ || 43.62 ||

हे वानरो! तत्पश्चात्, अपना उद्देश्य पूर्ण करके, बन्धुओं सहित, मेरे द्वारा समस्त मनोहर गुणों से सम्मानित होकर, शत्रु-रहित होकर, अपनी प्रियाओं और सन्तानों सहित, तुम पृथ्वी पर स्वच्छन्द विचरण करोगे।"

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