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किष्किन्धाकाण्ड · सर्ग 67

हनुमान् की प्रतिज्ञा और महेन्द्र-आरोहण

सर्ग 66सर्ग-सूची

श्लोक 1 (kishkindha.67.1)

तं दृष्ट्वा जृम्भमाणं ते क्रमितुं शतयोजनम् । वेगेनापूर्यमाणं च सहसा वानरोत्तमम् ॥ 67.1 ॥

taṃ dṛṣṭvā jṛmbhamāṇaṃ te kramituṃ śatayojanam | vegenāpūryamāṇaṃ ca sahasā vānarottamam || 67.1 ||

सौ योजन के मार्ग को पार करने के लिए बढ़ते हुए, वेग से आपूरित होते हुए उस वानरश्रेष्ठ को देखकर,

श्लोक 2 (kishkindha.67.2)

सहसा शोकमुत्सृज्य प्रहर्षेण समन्विताः । विनेदुस्तुष्टुवुश्चापि हनूमन्तं महाबलम् ॥ 67.2 ॥

sahasā śokamutsṛjya praharṣeṇa samanvitāḥ | vinedustuṣṭuvuścāpi hanūmantaṃ mahābalam || 67.2 ||

वानरों ने तुरंत अपना शोक त्यागकर अत्यंत हर्ष से भरकर गर्जना की और महाबली हनुमान् की स्तुति करने लगे।

श्लोक 3 (kishkindha.67.3)

प्रहृष्टा विस्मिताश्चापि ते वीक्षन्ते समन्ततः । त्रिविक्रमं कृतोत्साहं नारायणमिव प्रजाः ॥ 67.3 ॥

prahṛṣṭā vismitāścāpi te vīkṣante samantataḥ | trivikramaṃ kṛtotsāhaṃ nārāyaṇamiva prajāḥ || 67.3 ||

वे हर्षित और विस्मित होकर चारों ओर से उसे निहारने लगे, मानो प्रजाएँ त्रिविक्रम रूप धारण किए हुए नारायण को देख रही हों।

श्लोक 4 (kishkindha.67.4)

संस्तूयमानो हनुमान् व्यवर्धत महाबलः । समाविद्ध्य च लाङ्गूलं हर्षाद् बलमुपेयिवान् ॥ 67.4 ॥

saṃstūyamāno hanumān vyavardhata mahābalaḥ | samāviddhya ca lāṅgūlaṃ harṣād balamupeyivān || 67.4 ||

इस प्रकार स्तुति किए जाने पर महाबली हनुमान् और भी बढ़ने लगे; अपनी पूँछ फटकारते हुए वे हर्ष से बल प्राप्त करने लगे।

श्लोक 5 (kishkindha.67.5)

तस्य संस्तूयमानस्य वृद्धैर्वानरपुङ्गवैः । तेजसाऽऽपूर्यमाणस्य रूपमासीदनुत्तमम् ॥ 67.5 ॥

tasya saṃstūyamānasya vṛddhairvānarapuṅgavaiḥ | tejasā''pūryamāṇasya rūpamāsīdanuttamam || 67.5 ||

समस्त वानरश्रेष्ठों द्वारा इस प्रकार स्तुति किए जाने पर और तेज से आपूरित होने पर उनका रूप अनुपम हो गया।

श्लोक 6 (kishkindha.67.6)

यथा विजृम्भते सिंहो विवृते गिरिगह्वरे । मारुतस्यौरसः पुत्रस्तथा सम्प्रति जृम्भते ॥ 67.6 ॥

yathā vijṛmbhate siṃho vivṛte girigahvare | mārutasyaurasaḥ putrastathā samprati jṛmbhate || 67.6 ||

जैसे विशाल पर्वत-गुहा में सिंह गर्जना करता है, उसी प्रकार वायु के औरस पुत्र हनुमान् उस समय गर्जना करने लगे।

श्लोक 7 (kishkindha.67.7)

अशोभत मुखं तस्य जृम्भमाणस्य धीमतः । अम्बरीषोपमं दीप्तं विधूम इव पावकः ॥ 67.7 ॥

aśobhata mukhaṃ tasya jṛmbhamāṇasya dhīmataḥ | ambarīṣopamaṃ dīptaṃ vidhūma iva pāvakaḥ || 67.7 ||

इस प्रकार बढ़ते हुए उस बुद्धिमान् का मुख अंगीठी के समान प्रज्वलित हो उठा, मानो धूमरहित अग्नि हो।

श्लोक 8 (kishkindha.67.8)

हरीणामुत्थितो मध्यात् सम्प्रहृष्टतनूरुहः । अभिवाद्य हरीन् वृद्धान् हनूमानिदमब्रवीत् ॥ 67.8 ॥

harīṇāmutthito madhyāt samprahṛṣṭatanūruhaḥ | abhivādya harīn vṛddhān hanūmānidamabravīt || 67.8 ||

वानरों के बीच से उठकर, हर्ष से रोमांचित होकर, वृद्ध वानरों को प्रणाम करके हनुमान् ने यह कहा।

श्लोक 9 (kishkindha.67.9)

आरुजन् पर्वताग्राणि हुताशनसखोऽनिलः । बलवानप्रमेयश्च वायुराकाशगोचरः ॥ 67.9 ॥

ārujan parvatāgrāṇi hutāśanasakho'nilaḥ | balavānaprameyaśca vāyurākāśagocaraḥ || 67.9 ||

'अग्नि का सखा वायु पर्वत-शिखरों को तोड़ता हुआ, बलवान् और अप्रमेय, आकाश में विचरण करता है।'

श्लोक 10 (kishkindha.67.10)

तस्याहं शीघ्रवेगस्य शीघ्रगस्य महात्मनः । मारुतस्यौरसः पुत्रः प्लवनेनास्मि तत्समः ॥ 67.10 ॥

tasyāhaṃ śīghravegasya śīghragasya mahātmanaḥ | mārutasyaurasaḥ putraḥ plavanenāsmi tatsamaḥ || 67.10 ||

'मैं उस शीघ्रगामी, वेगवान्, महात्मा वायुदेव का औरस पुत्र हूँ; उड़ान में मैं उन्हीं के समान हूँ।'

श्लोक 11 (kishkindha.67.11)

उत्सहेयं हि विस्तीर्णमालिखन्तमिवाम्बरम् । मेरुं गिरिमसङ्गेन परिगन्तुं सहस्रशः ॥ 67.11 ॥

utsaheyaṃ hi vistīrṇamālikhantamivāmbaram | meruṃ girimasaṅgena parigantuṃ sahasraśaḥ || 67.11 ||

'मैं आकाश को छूते हुए-से विशाल मेरु पर्वत की हजारों बार निरंतर परिक्रमा करने का साहस रखता हूँ।'

श्लोक 12 (kishkindha.67.12)

बाहुवेगप्रणुन्नेन सागरेणाहमुत्सहे । समाप्लावयितुं लोकं सपर्वतनदीह्रदम् ॥ 67.12 ॥

bāhuvegapraṇunnena sāgareṇāhamutsahe | samāplāvayituṃ lokaṃ saparvatanadīhradam || 67.12 ||

'मैं अपनी भुजाओं के वेग से समुद्र को उलीचकर पर्वत, नदी और सरोवरों सहित सम्पूर्ण जगत् को जलमग्न करने का साहस रखता हूँ।'

श्लोक 13 (kishkindha.67.13)

ममोरुजङ्घावेगेन भविष्यति समुत्थितः । समुत्थितमहाग्राहः समुद्रो वरुणालयः ॥ 67.13 ॥

mamorujaṅghāvegena bhaviṣyati samutthitaḥ | samutthitamahāgrāhaḥ samudro varuṇālayaḥ || 67.13 ||

'मेरी जाँघों और पिंडलियों के वेग से वरुण का आवास वह समुद्र उमड़ पड़ेगा, और उसके विशाल जलजंतु भी उसके साथ उछल पड़ेंगे।'

श्लोक 14 (kishkindha.67.14)

पन्नगाशनमाकाशे पतन्तं पक्षिसेवितम् । वैनतेयमहं शक्तः परिगन्तुं सहस्रशः ॥ 67.14 ॥

pannagāśanamākāśe patantaṃ pakṣisevitam | vainateyamahaṃ śaktaḥ parigantuṃ sahasraśaḥ || 67.14 ||

'मैं सर्पभक्षी, समस्त पक्षियों द्वारा सेवित गरुड़ की, जब वे आकाश में उड़ रहे हों, हजारों बार परिक्रमा करने में समर्थ हूँ।'

श्लोक 15 (kishkindha.67.15)

उदयात् प्रस्थितं वापि ज्वलन्तं रश्मिमालिनम् । अनस्तमितमादित्यमहं गन्तुं समुत्सहे ॥ 67.15 ॥

udayāt prasthitaṃ vāpi jvalantaṃ raśmimālinam | anastamitamādityamahaṃ gantuṃ samutsahe || 67.15 ||

'मैं उदित होते हुए अथवा अभी अस्त न हुए, किरणों की माला धारण किए, प्रज्वलित सूर्य के पास जाने का साहस रखता हूँ,'

श्लोक 16 (kishkindha.67.16)

ततो भूमिमसंस्पृष्ट्वा पुनरागन्तुमुत्सहे । प्रवेगेनैव महता भीमेन प्लवगर्षभाः ॥ 67.16 ॥

tato bhūmimasaṃspṛṣṭvā punarāgantumutsahe | pravegenaiva mahatā bhīmena plavagarṣabhāḥ || 67.16 ||

'और, हे वानरश्रेष्ठो, पृथ्वी को स्पर्श किए बिना ही उसी भीषण और महान् वेग से पुनः लौट आने का साहस रखता हूँ।'

श्लोक 17 (kishkindha.67.17)

उत्सहेयमतिक्रान्तुं सर्वानाकाशगोचरान् । सागरान् शोषयिष्यामि दारयिष्यामि मेदिनीम् ॥ 67.17 ॥

utsaheyamatikrāntuṃ sarvānākāśagocarān | sāgarān śoṣayiṣyāmi dārayiṣyāmi medinīm || 67.17 ||

'मैं आकाशचारी समस्त प्राणियों को पीछे छोड़ने का साहस रखता हूँ; मैं समुद्रों को सुखा सकता हूँ, पृथ्वी को विदीर्ण कर सकता हूँ।'

श्लोक 18 (kishkindha.67.18)

पर्वतांश्चूर्णयिष्यामि प्लवमानः प्लवङ्गमः । हरिष्याम्युरुवेगेन प्लवमानो महार्णवम् ॥ 67.18 ॥

parvatāṃścūrṇayiṣyāmi plavamānaḥ plavaṅgamaḥ | hariṣyāmyuruvegena plavamāno mahārṇavam || 67.18 ||

'हे वानरो, मैं उछलते हुए पर्वतों को चूर्ण-चूर्ण कर सकता हूँ, और उछलते हुए ही जाँघों के वेग से महासागर को बहा ले जा सकता हूँ।'

श्लोक 19 (kishkindha.67.19)

लतानां विविधं पुष्पं पादपानां च सर्वशः । अनुयास्यति मामद्य प्लवमानं विहायसा ॥ 67.19 ॥

latānāṃ vividhaṃ puṣpaṃ pādapānāṃ ca sarvaśaḥ | anuyāsyati māmadya plavamānaṃ vihāyasā || 67.19 ||

'लताओं और वृक्षों के नाना प्रकार के पुष्प आज आकाश में उड़ते हुए मेरा सर्वत्र अनुसरण करेंगे।'

श्लोक 20 (kishkindha.67.20)

भविष्यति हि मे पन्थाः स्वातेः पन्था इवाम्बरे । चरन्तं घोरमाकाशमुत्पतिष्यन्तमेव च ॥ 67.20 ॥

bhaviṣyati hi me panthāḥ svāteḥ panthā ivāmbare | carantaṃ ghoramākāśamutpatiṣyantameva ca || 67.20 ||

'आकाश में मेरा मार्ग स्वाति नक्षत्र के पथ के समान हो जाएगा; वानर मुझे उस भयंकर आकाश में विचरण करते और ऊपर उठते हुए देखेंगे,'

श्लोक 21 (kishkindha.67.21)

द्रक्ष्यन्ति निपतन्तं च सर्वभूतानि वानराः । महामेरुप्रतीकाशं मां द्रक्ष्यध्वं प्लवङ्गमाः ॥ 67.21 ॥

drakṣyanti nipatantaṃ ca sarvabhūtāni vānarāḥ | mahāmerupratīkāśaṃ māṃ drakṣyadhvaṃ plavaṅgamāḥ || 67.21 ||

'और नीचे गिरते हुए भी; हे वानरो, समस्त प्राणी मुझे महामेरु के समान देखेंगे।'

श्लोक 22 (kishkindha.67.22)

दिवमावृत्य गच्छन्तं ग्रसमानमिवाम्बरम् । विधमिष्यामि जीमूतान् कम्पयिष्यामि पर्वतान् । सागरं शोषयिष्यामि प्लवमानः समाहितः ॥ 67.22 ॥

divamāvṛtya gacchantaṃ grasamānamivāmbaram | vidhamiṣyāmi jīmūtān kampayiṣyāmi parvatān | sāgaraṃ śoṣayiṣyāmi plavamānaḥ samāhitaḥ || 67.22 ||

'आकाश को घेरते हुए मानो अंतरिक्ष को निगलता हुआ मैं मेघों को छिन्न-भिन्न कर दूँगा, पर्वतों को कँपा दूँगा, और उछलते हुए स्थिरचित्त होकर समुद्र को सुखा दूँगा।'

श्लोक 23 (kishkindha.67.23)

वैनतेयस्य वा शक्तिर्मम वा मारुतस्य वा । ऋते सुपर्णराजानं मारुतं वा महाबलम् । न तद् भूतं प्रपश्यामि यन्मां प्लुतमनुव्रजेत् ॥ 67.23 ॥

vainateyasya vā śaktirmama vā mārutasya vā | ṛte suparṇarājānaṃ mārutaṃ vā mahābalam | na tad bhūtaṃ prapaśyāmi yanmāṃ plutamanuvrajet || 67.23 ||

'गरुड़ अथवा वायुदेव में जो शक्ति है, वही शक्ति मुझमें भी है; पक्षिराज गरुड़ और महाबली वायुदेव के अतिरिक्त मैं ऐसा कोई प्राणी नहीं देखता जो उछलते हुए मेरा अनुसरण कर सके।'

श्लोक 24 (kishkindha.67.24)

निमेषान्तरमात्रेण निरालम्बनमम्बरम् । सहसा निपतिष्यामि घनाद् विद्युदिवोत्थिता ॥ 67.24 ॥

nimeṣāntaramātreṇa nirālambanamambaram | sahasā nipatiṣyāmi ghanād vidyudivotthitā || 67.24 ||

'पलक झपकते ही मैं उस निराधार आकाश में, मेघ से उठी हुई बिजली के समान, सहसा कूद पड़ूँगा।'

श्लोक 25 (kishkindha.67.25)

भविष्यति हि मे रूपं प्लवमानस्य सागरम् । विष्णोः प्रक्रममाणस्य तदा त्रीन् विक्रमानिव ॥ 67.25 ॥

bhaviṣyati hi me rūpaṃ plavamānasya sāgaram | viṣṇoḥ prakramamāṇasya tadā trīn vikramāniva || 67.25 ||

'समुद्र को लाँघते समय मेरा रूप उस समय विष्णु के त्रिविक्रम के समान हो जाएगा।'

श्लोक 26 (kishkindha.67.26)

बुद्ध्या चाहं प्रपश्यामि मनश्चेष्टा च मे तथा । अहं द्रक्ष्यामि वैदेहीं प्रमोदध्वं प्लवङ्गमाः ॥ 67.26 ॥

bud‍dhyā cāhaṃ prapaśyāmi manaśceṣṭā ca me tathā | ahaṃ drakṣyāmi vaidehīṃ pramodadhvaṃ plavaṅgamāḥ || 67.26 ||

'मैं अपनी बुद्धि से स्पष्ट देख रहा हूँ, और मेरे मन के संकेत भी वैसे ही हैं: मैं विदेहकुमारी को अवश्य देखूँगा — हे वानरो, प्रसन्न हो जाओ!'

श्लोक 27 (kishkindha.67.27)

मारुतस्य समो वेगे गरुडस्य समो जवे । अयुतं योजनानां तु गमिष्यामीति मे मतिः ॥ 67.27 ॥

mārutasya samo vege garuḍasya samo jave | ayutaṃ yojanānāṃ tu gamiṣyāmīti me matiḥ || 67.27 ||

'वेग में वायु के समान, वेग में गरुड़ के समान, मैं दस हजार योजन तक जाऊँगा — यही मेरा दृढ़ निश्चय है।'

श्लोक 28 (kishkindha.67.28)

वासवस्य सवज्रस्य ब्रह्मणो वा स्वयम्भुवः । विक्रम्य सहसा हस्तादमृतं तदिहानये ॥ 67.28 ॥

vāsavasya savajrasya brahmaṇo vā svayambhuvaḥ | vikramya sahasā hastādamṛtaṃ tadihānaye || 67.28 ||

'उछलकर मैं वज्रधारी इन्द्र अथवा स्वयंभू ब्रह्मा के हाथ से भी वह अमृत यहाँ ले आ सकता हूँ,'

श्लोक 29 (kishkindha.67.29)

लङ्कां वापि समुत्क्षिप्य गच्छेयमिति मे मतिः । तमेवं वानरश्रेष्ठं गर्जन्तममितप्रभम् ॥ 67.29 ॥

laṅkāṃ vāpi samutkṣipya gaccheyamiti me matiḥ | tamevaṃ vānaraśreṣṭhaṃ garjantamamitaprabham || 67.29 ||

'अथवा लंका को ही उखाड़कर मैं उसे ले जा सकता हूँ — यही मेरा दृढ़ निश्चय है।' इस प्रकार गर्जना करते हुए उस अपार तेजस्वी वानरश्रेष्ठ को,

श्लोक 30 (kishkindha.67.30)

प्रहृष्टा हरयस्तत्र समुदैक्षन्त विस्मिताः । तच्चास्य वचनं श्रुत्वा ज्ञातीनां शोकनाशनम् ॥ 67.30 ॥

prahṛṣṭā harayastatra samudaikṣanta vismitāḥ | taccāsya vacanaṃ śrutvā jñātīnāṃ śokanāśanam || 67.30 ||

वहाँ वानर हर्षित और विस्मित होकर देखने लगे; और उसका वह वचन सुनकर, जो अपने बंधुओं के शोक का नाश करने वाला था,

श्लोक 31 (kishkindha.67.31)

उवाच परिसंहृष्टो जाम्बवान् प्लवगेश्वरः । वीर केसरिणः पुत्र वेगवन् मारुतात्मज ॥ 67.31 ॥

uvāca parisaṃhṛṣṭo jāmbavān plavageśvaraḥ | vīra kesariṇaḥ putra vegavan mārutātmaja || 67.31 ||

वानरों के स्वामी जाम्बवान् ने अत्यंत हर्षित होकर कहा: 'हे वीर केसरीनन्दन, हे वेगवान् मारुतात्मज,

श्लोक 32 (kishkindha.67.32)

ज्ञातीनां विपुलः शोकस्त्वया तात प्रणाशितः । तव कल्याणरुचयः कपिमुख्याः समागताः ॥ 67.32 ॥

jñātīnāṃ vipulaḥ śokastvayā tāta praṇāśitaḥ | tava kalyāṇarucayaḥ kapimukhyāḥ samāgatāḥ || 67.32 ||

'हे तात, तुमने अपने बंधुओं के विशाल शोक का नाश कर दिया है। यहाँ एकत्र हुए वानरमुख्य, तुम्हारे कल्याण की कामना करते हुए,'

श्लोक 33 (kishkindha.67.33)

मङ्गलान्यर्थसिद्ध्यर्थं करिष्यन्ति समाहिताः । ऋषीणां च प्रसादेन कपिवृद्धमतेन च ॥ 67.33 ॥

maṅgalānyarthasiddhyarthaṃ kariṣyanti samāhitāḥ | ṛṣīṇāṃ ca prasādena kapivṛddhamatena ca || 67.33 ||

'तुम्हारे कार्य की सिद्धि के लिए मनोयोगपूर्वक मंगल-कार्य करेंगे। और ऋषियों की कृपा से तथा वानर-वृद्धों के मत से,'

श्लोक 34 (kishkindha.67.34)

गुरूणां च प्रसादेन सम्प्लव त्वं महार्णवम् । स्थास्यामश्चैकपादेन यावदागमनं तव ॥ 67.34 ॥

gurūṇāṃ ca prasādena samplava tvaṃ mahārṇavam | sthāsyāmaścaikapādena yāvadāgamanaṃ tava || 67.34 ||

'तथा गुरुजनों की कृपा से, अब तुम इस महासागर को पार करो; हम तुम्हारे लौटने तक यहीं एक पैर पर खड़े रहेंगे।'

श्लोक 35 (kishkindha.67.35)

त्वद्गतानि च सर्वेषां जीवनानि वनौकसाम् । ततश्च हरिशार्दूलस्तानुवाच वनौकसः ॥ 67.35 ॥

tvada‍gatāni ca sarveṣāṃ jīvanāni vanaukasām | tataśca hariśārdūlastānuvāca vanaukasaḥ || 67.35 ||

'इन समस्त वनवासी वानरों के प्राण तुम्हारे ही ऊपर टिके हैं।' तब उस वानरशार्दूल ने उन वनवासियों से कहा:

श्लोक 36 (kishkindha.67.36)

कोऽपि लोके न मे वेगं प्लवने धारयिष्यति । एतानीह नगस्यास्य शिलासंकटशालिनः ॥ 67.36 ॥

ko'pi loke na me vegaṃ plavane dhārayiṣyati | etānīha nagasyāsya śilāsaṃkaṭaśālinaḥ || 67.36 ||

'इस लोक में मेरे लंघन के वेग को कोई भी सहन नहीं कर सकता। इस पर्वत की ये चट्टानों और खड्डों से भरी हुई,'

श्लोक 37 (kishkindha.67.37)

शिखराणि महेन्द्रस्य स्थिराणि च महान्ति च । येषु वेगं गमिष्यामि महेन्द्रशिखरेष्वहम् ॥ 67.37 ॥

śikharāṇi mahendrasya sthirāṇi ca mahānti ca | yeṣu vegaṃ gamiṣyāmi mahendraśikhareṣvaham || 67.37 ||

'महेन्द्र की ये स्थिर और विशाल चोटियाँ हैं — इन्हीं महेन्द्र-शिखरों से मैं अपने वेग हेतु दौड़ लगाऊँगा।'

श्लोक 38 (kishkindha.67.38)

नानाद्रुमविकीर्णेषु धातुनिष्पन्दशोभिषु । एतानि मम वेगं हि शिखराणि महान्ति च ॥ 67.38 ॥

nānādrumavikīrṇeṣu dhātuniṣpandaśobhiṣu | etāni mama vegaṃ hi śikharāṇi mahānti ca || 67.38 ||

'नाना प्रकार के वृक्षों से व्याप्त, स्थिर धातुओं से सुशोभित — ये विशाल शिखर मेरे वेग को सहन करेंगे'

श्लोक 39 (kishkindha.67.39)

प्लवतो धारयिष्यन्ति योजनानामितः शतम् । ततस्तु मारुतप्रख्यः स हरिर्मारुतात्मजः । आरुरोह नगश्रेष्ठं महेन्द्रमरिमर्दनः ॥ 67.39 ॥

plavato dhārayiṣyanti yojanānāmitaḥ śatam | tatastu mārutaprakhyaḥ sa harirmārutātmajaḥ | āruroha nagaśreṣṭhaṃ mahendramarimardanaḥ || 67.39 ||

'जब मैं यहाँ से सौ योजन की छलांग लगाऊँगा।' तब वायुदेव के समान विख्यात, वायुपुत्र, शत्रुमर्दन वह वानर उस पर्वतश्रेष्ठ महेन्द्र पर चढ़ गया —

श्लोक 40 (kishkindha.67.40)

वृतं नानाविधैः पुष्पैर्मृगसेवितशाद्वलम् । लताकुसुमसम्बाधं नित्यपुष्पफलद्रुमम् ॥ 67.40 ॥

vṛtaṃ nānāvidhaiḥ puṣpairmṛgasevitaśādvalam | latākusumasambādhaṃ nityapuṣpaphaladrumam || 67.40 ||

— जो नाना प्रकार के पुष्पों से आच्छादित था, जिसकी घास-भूमियाँ मृगों से सेवित थीं, जो लताओं के पुष्पों से सघन था, सदा फूलने-फलने वाले वृक्षों से युक्त,

श्लोक 41 (kishkindha.67.41)

सिंहशार्दूलसहितं मत्तमातङ्गसेवितम् । मत्तद्विजगणोद्घुष्टं सलिलोत्पीडसंकुलम् ॥ 67.41 ॥

siṃhaśārdūlasahitaṃ mattamātaṅgasevitam | mattadvijagaṇoda‍ghuṣṭaṃ salilotpīḍasaṃkulam || 67.41 ||

सिंहों और व्याघ्रों से विचरित, मदमत्त हाथियों से सेवित, उन्मत्त पक्षियों के समूहों से गुंजायमान, तथा उमड़ते हुए जलस्रोतों से भरा हुआ था।

श्लोक 42 (kishkindha.67.42)

महद्भिरुच्छ्रितं शृङ्गैर्महेन्द्रं स महाबलः । विचचार हरिश्रेष्ठो महेन्द्रसमविक्रमः ॥ 67.42 ॥

mahadbhirucchritaṃ śṛṅgairmahendraṃ sa mahābalaḥ | vicacāra hariśreṣṭho mahendrasamavikramaḥ || 67.42 ||

उस महाबली, वानरश्रेष्ठ ने, जो पराक्रम में महेन्द्र पर्वत के ही समान था, ऊँची चोटियों वाले उस महेन्द्र पर्वत पर विचरण किया।

श्लोक 43 (kishkindha.67.43)

पादाभ्यां पीडितस्तेन महाशैलो महात्मना । ररास सिंहाभिहतो महान् मत्त इव द्विपः ॥ 67.43 ॥

pādābhyāṃ pīḍitastena mahāśailo mahātmanā | rarāsa siṃhābhihato mahān matta iva dvipaḥ || 67.43 ||

उस महात्मा के चरणों से दबकर वह विशाल पर्वत उसी प्रकार गरज उठा जैसे सिंह द्वारा आहत कोई विशाल मदमत्त गजराज गरजता है।

श्लोक 44 (kishkindha.67.44)

मुमोच सलिलोत्पीडान् विप्रकीर्णशिलोच्चयः । वित्रस्तमृगमातङ्गः प्रकम्पितमहाद्रुमः ॥ 67.44 ॥

mumoca salilotpīḍān viprakīrṇaśiloccayaḥ | vitrastamṛgamātaṅgaḥ prakampitamahādrumaḥ || 67.44 ||

उसकी शिलाओं के ढेर चारों ओर बिखर गए, उसने जल की उमड़ती धाराएँ छोड़ दीं; उसके पशु और हाथी भयभीत हो उठे, उसके विशाल वृक्ष काँप उठे।

श्लोक 45 (kishkindha.67.45)

नानागन्धर्वमिथुनैः पानसंसर्गकर्कशैः । उत्पतद्भिर्विहंगैश्च विद्याधरगणैरपि ॥ 67.45 ॥

nānāgandharvamithunaiḥ pānasaṃsargakarkaśaiḥ | utpatadbhirvihaṃgaiśca vidyādharagaṇairapi || 67.45 ||

मदिरापान में लीन गंधर्वयुगलों के भयभीत होकर उड़ जाने से, तथा पक्षियों के झुंडों और विद्याधरों के समूहों के भी उड़ जाने से,

श्लोक 46 (kishkindha.67.46)

त्यज्यमानमहासानुः संनिलीनमहोरगः । शैलशृङ्गशिलोत्पातस्तदाभूत् स महागिरिः ॥ 67.46 ॥

tyajyamānamahāsānuḥ saṃnilīnamahoragaḥ | śailaśṛṅgaśilotpātastadābhūt sa mahāgiriḥ || 67.46 ||

उसकी विशाल कटकों के त्याग दिए जाने पर, उसके बड़े-बड़े सर्पों के पूर्णतः छिप जाने पर, वह महापर्वत उस समय गिरते हुए शिखरों और शिलाओं का स्थान बन गया।

श्लोक 47 (kishkindha.67.47)

निःश्वसद्भिस्तदा तैस्तु भुजगैरर्धनिःसृतैः । सपताक इवाभाति स तदा धरणीधरः ॥ 67.47 ॥

niḥśvasadbhistadā taistu bhujagairardhaniḥsṛtaiḥ | sapatāka ivābhāti sa tadā dharaṇīdharaḥ || 67.47 ||

उस समय अपने बिलों से आधे बाहर निकले, फुफकारते हुए सर्पों से युक्त वह पृथ्वीधर पर्वत मानो पताकाओं से सुशोभित होकर चमक रहा था।

श्लोक 48 (kishkindha.67.48)

ऋषिभिस्त्राससम्भ्रान्तैस्त्यज्यमानः शिलोच्चयः । सीदन् महति कान्तारे सार्थहीन इवाध्वगः ॥ 67.48 ॥

ṛṣibhistrāsasambhrāntaistyajyamānaḥ śiloccayaḥ | sīdan mahati kāntāre sārthahīna ivādhvagaḥ || 67.48 ||

भय से व्याकुल ऋषियों द्वारा त्यागा गया वह ऊँचा पर्वत उस विशाल वन में मानो साथियों से बिछुड़े हुए किसी पथिक के समान अवसन्न होकर पड़ गया।

श्लोक 49 (kishkindha.67.49)

स वेगवान् वेगसमाहितात्मा हरिप्रवीरः परवीरहन्ता । मनः समाधाय महानुभावो जगाम लङ्कां मनसा मनस्वी ॥ 67.49 ॥

sa vegavān vegasamāhitātmā haripravīraḥ paravīrahantā | manaḥ samādhāya mahānubhāvo jagāma laṅkāṃ manasā manasvī || 67.49 ||

वह वेगवान्, अपने वेग में ही स्थिरचित्त, वानरवीरों में श्रेष्ठ, शत्रुवीरों का संहारक, वह महानुभाव, अपने मन को स्थिर करके, मनस्वी होकर मन ही मन लंका की ओर चल पड़ा।

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