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सुन्दरकाण्ड · सर्ग 15

हनुमान द्वारा सीता-दर्शन

सर्ग 14सर्ग-सूचीसर्ग 16

श्लोक 1 (sundara.15.1)

स वीक्षमाणस्तत्रस्थो मार्गमाणश्च मैथिलीम् । अवेक्षमाणश्च महीं सर्वां तामन्ववैक्षत ॥ 15.1 ॥

sa vīkṣamāṇastatrastho mārgamāṇaśca maithilīm | avekṣamāṇaśca mahīṃ sarvāṃ tāmanvavaikṣata || 15.1 ||

वहीं बैठे हुए, मैथिली को खोजते हुए, देखते-भालते हुए, उन्होंने उस संपूर्ण भूमि का निरीक्षण किया।

श्लोक 2 (sundara.15.2)

संतानकलताभिश्च पादपैरुपशोभिताम् । दिव्यगन्धरसोपेतां सर्वतः समलंकृताम् ॥ 15.2 ॥

saṃtānakalatābhiśca pādapairupaśobhitām | divyagandharasopetāṃ sarvataḥ samalaṃkṛtām || 15.2 ||

संतानक लताओं और वृक्षों से सुशोभित, दिव्य सुगंधित रस से युक्त, चारों ओर से सुसज्जित उस वाटिका को —

श्लोक 3 (sundara.15.3)

तां स नन्दनसंकाशां मृगपक्षिभिरावृताम् । हर्म्यप्रासादसम्बाधां कोकिलाकुलनिःस्वनाम् ॥ 15.3 ॥

tāṃ sa nandanasaṃkāśāṃ mṛgapakṣibhirāvṛtām | harmyaprāsādasambādhāṃ kokilākulaniḥsvanām || 15.3 ||

जो नंदन वन के समान थी, मृगों और पक्षियों से भरी थी, अट्टालिकाओं और भवनों से सघन थी, तथा कोयलों के समूह की ध्वनि से गूँज रही थी,

श्लोक 4 (sundara.15.4)

काञ्चनोत्पलपद्माभिर्वापीभिरुपशोभिताम् । बह्वासनकुथोपेतां बहुभूमिगृहायुताम् ॥ 15.4 ॥

kāñcanotpalapadmābhirvāpībhirupaśobhitām | bahvāsanakuthopetāṃ bahubhūmigṛhāyutām || 15.4 ||

जो स्वर्ण-कमलों और उत्पलों की बावड़ियों से सुशोभित थी, अनेक आसनों और बिछौनों से युक्त थी, तथा अनेक भूमिगत गृहों वाली थी,

श्लोक 5 (sundara.15.5)

सर्वर्तुकुसुमै रम्यैः फलवद्भिश्च पादपैः । पुष्पितानामशोकानां श्रिया सूर्योदयप्रभाम् ॥ 15.5 ॥

sarvartukusumai ramyaiḥ phalavadbhiśca pādapaiḥ | puṣpitānāmaśokānāṃ śriyā sūryodayaprabhām || 15.5 ||

सभी ऋतुओं के मनोहर फूलों और फलों से लदे वृक्षों वाली उस वाटिका को — जो खिले हुए अशोक वृक्षों की शोभा से सूर्योदय की आभा के समान

श्लोक 6 (sundara.15.6)

प्रदीप्तामिव तत्रस्थो मारुतिः समुदैक्षत । निष्पत्रशाखां विहगैः क्रियमाणामिवासकृत् ॥ 15.6 ॥

pradīptāmiva tatrastho mārutiḥ samudaikṣata | niṣpatraśākhāṃ vihagaiḥ kriyamāṇāmivāsakṛt || 15.6 ||

मानो प्रज्वलित हो रही थी, वहाँ बैठे मारुति ने देखा; पत्तों से रहित उसकी शाखाओं को पक्षी मानो बार-बार अग्नि-शिखा में बदल दे रहे थे।

श्लोक 7 (sundara.15.7)

विनिष्पतद्भिः शतशश्चित्रैः पुष्पावतंसकैः । समूलपुष्परचितैरशोकैः शोकनाशनैः ॥ 15.7 ॥

viniṣpatadbhiḥ śataśaścitraiḥ puṣpāvataṃsakaiḥ | samūlapuṣparacitairaśokaiḥ śokanāśanaiḥ || 15.7 ||

सैकड़ों विचित्र पुष्प-मुकुटों के फूट पड़ने से, तथा जड़ों तक फूलों से सजे अशोक वृक्षों से, जो शोक का नाश करने वाले थे,

श्लोक 8 (sundara.15.8)

पुष्पभारातिभारैश्च स्पृशद्भिरिव मेदिनीम् । कर्णिकारैः कुसुमितैः किंशुकैश्च सुपुष्पितैः ॥ 15.8 ॥

puṣpabhārātibhāraiśca spṛśadbhiriva medinīm | karṇikāraiḥ kusumitaiḥ kiṃśukaiśca supuṣpitaiḥ || 15.8 ||

पुष्पों के अत्यधिक भार से मानो पृथ्वी को छूते हुए-से, तथा खिले हुए कर्णिकार और भली-भाँति फूले किंशुक वृक्षों से,

श्लोक 9 (sundara.15.9)

स देशः प्रभया तेषां प्रदीप्त इव सर्वतः । पुंनागाः सप्तपर्णाश्च चम्पकोद्दालकास्तथा ॥ 15.9 ॥

sa deśaḥ prabhayā teṣāṃ pradīpta iva sarvataḥ | puṃnāgāḥ saptaparṇāśca campakoddālakāstathā || 15.9 ||

वह संपूर्ण प्रदेश उनकी आभा से मानो चारों ओर से प्रज्वलित हो रहा था। पुंनाग, सप्तपर्ण, तथा चंपा और उद्दालक वृक्ष भी,

श्लोक 10 (sundara.15.10)

विवृद्धमूला बहवः शोभन्ते स्म सुपुष्पिताः । शातकुम्भनिभाः केचित् केचिदग्निशिखप्रभाः ॥ 15.10 ॥

vivṛddhamūlā bahavaḥ śobhante sma supuṣpitāḥ | śātakumbhanibhāḥ kecit kecidagniśikhaprabhāḥ || 15.10 ||

गहरी जड़ों वाले, भली-भाँति फूले हुए, अनेक वृक्ष वहाँ शोभायमान थे — कुछ शुद्ध स्वर्ण के समान, कुछ अग्नि-शिखा के समान तेजस्वी,

श्लोक 11 (sundara.15.11)

नीलाञ्जननिभाः केचित् तत्राशोकाः सहस्रशः । नन्दनं विबुधोद्यानं चित्रं चैत्ररथं यथा ॥ 15.11 ॥

nīlāñjananibhāḥ kecit tatrāśokāḥ sahasraśaḥ | nandanaṃ vibudhodyānaṃ citraṃ caitrarathaṃ yathā || 15.11 ||

और कुछ नील अंजन के समान श्याम — वहाँ सहस्रों अशोक वृक्ष थे, जो उस वाटिका को नंदन वन, या देवताओं के उद्यान, या विचित्र चैत्ररथ के समान बना रहे थे,

श्लोक 12 (sundara.15.12)

अतिवृत्तमिवाचिन्त्यं दिव्यं रम्यश्रियायुतम् । द्वितीयमिव चाकाशं पुष्पज्योतिर्गणायुतम् ॥ 15.12 ॥

ativṛttamivācintyaṃ divyaṃ ramyaśriyāyutam | dvitīyamiva cākāśaṃ puṣpajyotirgaṇāyutam || 15.12 ||

जो सीमाओं से परे, अचिंत्य, दिव्य, रमणीय शोभा से युक्त था — मानो कोई दूसरा आकाश हो, जो पुष्प-रूपी नक्षत्रों के समूह से भरा हो,

श्लोक 13 (sundara.15.13)

पुष्परत्नशतैश्चित्रं पञ्चमं सागरं यथा । सर्वर्तुपुष्पैर्निचितं पादपैर्मधुगन्धिभिः ॥ 15.13 ॥

puṣparatnaśataiścitraṃ pañcamaṃ sāgaraṃ yathā | sarvartupuṣpairnicitaṃ pādapairmadhugandhibhiḥ || 15.13 ||

सैकड़ों पुष्प-रत्नों से विचित्र, मानो कोई पाँचवाँ सागर हो, जो सभी ऋतुओं के फूलों वाले, मधु की सुगंध से युक्त वृक्षों से भरा हो,

श्लोक 14 (sundara.15.14)

नानानिनादैरुद्यानं रम्यं मृगगणद्विजैः । अनेकगन्धप्रवहं पुण्यगन्धं मनोहरम् ॥ 15.14 ॥

nānāninādairudyānaṃ ramyaṃ mṛgagaṇadvijaiḥ | anekagandhapravahaṃ puṇyagandhaṃ manoharam || 15.14 ||

मृग-समूहों और पक्षियों के नाना प्रकार के स्वरों से गूँजता वह मनोहर उद्यान, अनेक सुगंधों को बहाता हुआ, पवित्र और मन को हरने वाली गंध वाला —

श्लोक 15 (sundara.15.15)

शैलेन्द्रमिव गन्धाढ्यं द्वितीयं गन्धमादनम् । अशोकवनिकायां तु तस्यां वानरपुंगवः ॥ 15.15 ॥

śailendramiva gandhāḍhyaṃ dvitīyaṃ gandhamādanam | aśokavanikāyāṃ tu tasyāṃ vānarapuṃgavaḥ || 15.15 ||

पर्वतराज गंधमादन के समान सुगंध से भरा, मानो दूसरा गंधमादन ही हो। उस अशोक वाटिका में उस वानरश्रेष्ठ ने,

श्लोक 16 (sundara.15.16)

स ददर्शाविदूरस्थं चैत्यप्रासादमूर्जितम् । मध्ये स्तम्भसहस्रेण स्थितं कैलासपाण्डुरम् ॥ 15.16 ॥

sa dadarśāvidūrasthaṃ caityaprāsādamūrjitam | madhye stambhasahasreṇa sthitaṃ kailāsapāṇḍuram || 15.16 ||

कुछ ही दूरी पर, हजार खंभों पर खड़ा, कैलास के समान श्वेत, एक विशाल चैत्य-भवन देखा,

श्लोक 17 (sundara.15.17)

प्रवालकृतसोपानं तप्तकाञ्चनवेदिकम् । मुष्णन्तमिव चक्षूंषि द्योतमानमिव श्रिया ॥ 15.17 ॥

pravālakṛtasopānaṃ taptakāñcanavedikam | muṣṇantamiva cakṣūṃṣi dyotamānamiva śriyā || 15.17 ||

जिसकी सीढ़ियाँ मूँगे की बनी थीं, जिसकी वेदिकाएँ तपाए हुए स्वर्ण की थीं, जो अपनी चमक से नेत्रों को मानो चुरा लेता था, और शोभा से जगमगा रहा था,

श्लोक 18 (sundara.15.18)

निर्मलं प्रांशुभावत्वादुल्लिखन्तमिवाम्बरम् । ततो मलिनसंवीतां राक्षसीभिः समावृताम् ॥ 15.18 ॥

nirmalaṃ prāṃśubhāvatvādullikhantamivāmbaram | tato malinasaṃvītāṃ rākṣasībhiḥ samāvṛtām || 15.18 ||

जो निर्मल था और अपनी ऊँचाई के कारण मानो आकाश को छू रहा था। फिर उन्होंने मलिन वस्त्र पहने, राक्षसियों से घिरी हुई,

श्लोक 19 (sundara.15.19)

उपवासकृशां दीनां निःश्वसन्तीं पुनः पुनः । ददर्श शुक्लपक्षादौ चन्द्ररेखामिवामलाम् ॥ 15.19 ॥

upavāsakṛśāṃ dīnāṃ niḥśvasantīṃ punaḥ punaḥ | dadarśa śuklapakṣādau candrarekhāmivāmalām || 15.19 ||

उपवास से कृश, दीन, बार-बार दीर्घ श्वास लेती हुई एक स्त्री को देखा — मानो शुक्ल पक्ष के आरंभ की निर्मल चंद्र-रेखा हो,

श्लोक 20 (sundara.15.20)

मन्दप्रख्यायमानेन रूपेण रुचिरप्रभाम् । पिनद्धां धूमजालेन शिखामिव विभावसोः ॥ 15.20 ॥

mandaprakhyāyamānena rūpeṇa ruciraprabhām | pinaddhāṃ dhūmajālena śikhāmiva vibhāvasoḥ || 15.20 ||

जिसका मनोहर तेज अब केवल हल्के रूप में दिखाई दे रहा था — मानो धुएँ के जाल में लिपटी हुई अग्नि की शिखा हो;

श्लोक 21 (sundara.15.21)

पीतेनैकेन संवीतां क्लिष्टेनोत्तमवाससा । सपङ्कामनलंकारां विपद्मामिव पद्मिनीम् ॥ 15.21 ॥

pītenaikena saṃvītāṃ kliṣṭenottamavāsasā | sapaṅkāmanalaṃkārāṃ vipadmāmiva padminīm || 15.21 ||

जो एक ही पीले, म्लान, फिर भी उत्तम वस्त्र से ढकी हुई थी, बिना आभूषण के, कीचड़ से सनी हुई — मानो कमलों से रहित कोई सरोवर हो;

श्लोक 22 (sundara.15.22)

पीडितां दुःखसंतप्तां परिक्षीणां तपस्विनीम् । ग्रहेणांगारकेणेव पीडितामिव रोहिणीम् ॥ 15.22 ॥

pīḍitāṃ duḥkhasaṃtaptāṃ parikṣīṇāṃ tapasvinīm | graheṇāṃgārakeṇeva pīḍitāmiva rohiṇīm || 15.22 ||

जो पीड़ित थी, दुख से संतप्त थी, अत्यंत क्षीण हो चुकी थी, तपस्विनी जैसी थी — मानो मंगल ग्रह से पीड़ित रोहिणी हो;

श्लोक 23 (sundara.15.23)

अश्रुपूर्णमुखीं दीनां कृशामनशनेन च । शोकध्यानपरां दीनां नित्यं दुःखपरायणाम् ॥ 15.23 ॥

aśrupūrṇamukhīṃ dīnāṃ kṛśāmanaśanena ca | śokadhyānaparāṃ dīnāṃ nityaṃ duḥkhaparāyaṇām || 15.23 ||

जिसका मुख आँसुओं से भरा था, जो दीन थी, उपवास से कृश थी, शोक और ध्यान में लीन थी, दीन थी, सदा दुख में ही डूबी रहती थी;

श्लोक 24 (sundara.15.24)

प्रियं जनमपश्यन्तीं पश्यन्तीं राक्षसीगणम् । स्वगणेन मृगीं हीनां श्वगणेनावृतामिव ॥ 15.24 ॥

priyaṃ janamapaśyantīṃ paśyantīṃ rākṣasīgaṇam | svagaṇena mṛgīṃ hīnāṃ śvagaṇenāvṛtāmiva || 15.24 ||

जो अपने प्रियजनों को न देखकर केवल राक्षसियों के समूह को ही देखती रहती थी — मानो अपने ही झुंड से बिछुड़ी हुई मृगी कुत्तों के समूह से घिरी हो;

श्लोक 25 (sundara.15.25)

नीलनागाभया वेण्या जघनं गतयैकया । नीलया नीरदापाये वनराज्या महीमिव ॥ 15.25 ॥

nīlanāgābhayā veṇyā jaghanaṃ gatayaikayā | nīlayā nīradāpāye vanarājyā mahīmiva || 15.25 ||

जिसकी एक अकेली वेणी, बड़े सर्प के समान श्याम, कूल्हों तक लटक रही थी — मानो वर्षा के बाद पृथ्वी पर बचा हुआ एक अकेला श्याम वन-पंक्ति हो;

श्लोक 26 (sundara.15.26)

सुखार्हां दुःखसंतप्तां व्यसनानामकोविदाम् । तां विलोक्य विशालाक्षीमधिकं मलिनां कृशाम् ॥ 15.26 ॥

sukhārhāṃ duḥkhasaṃtaptāṃ vyasanānāmakovidām | tāṃ vilokya viśālākṣīmadhikaṃ malināṃ kṛśām || 15.26 ||

जो सुख की पात्र थी पर दुख से संतप्त थी, जो विपत्तियों में कुशल नहीं थी — उस विशाल-नेत्रा, अत्यंत मलिन और कृश स्त्री को देखकर,

श्लोक 27 (sundara.15.27)

तर्कयामास सीतेति कारणैरुपपादिभिः । ह्रियमाणा तदा तेन रक्षसा कामरूपिणा ॥ 15.27 ॥

tarkayāmāsa sīteti kāraṇairupapādibhiḥ | hriyamāṇā tadā tena rakṣasā kāmarūpiṇā || 15.27 ||

उन्होंने युक्तिसंगत कारणों से यह अनुमान लगाया कि यह अवश्य सीता ही हैं — वे जिन्हें उस रूप-बदलने वाले राक्षस ने हर लिया था;

श्लोक 28 (sundara.15.28)

यथारूपा हि दृष्टा सा तथारूपेयमंगना । पूर्णचन्द्राननां सुभ्रूं चारुवृत्तपयोधराम् ॥ 15.28 ॥

yathārūpā hi dṛṣṭā sā tathārūpeyamaṃganā | pūrṇacandrānanāṃ subhrūṃ cāruvṛttapayodharām || 15.28 ||

"क्योंकि जैसा रूप मुझे बताया गया था, ठीक वैसा ही रूप इस स्त्री का है" — पूर्णचंद्र जैसे मुख वाली, सुंदर भौंहों वाली, गोल और सुंदर स्तनों वाली,

श्लोक 29 (sundara.15.29)

कुर्वतीं प्रभया देवीं सर्वा वितिमिरा दिशः । तां नीलकण्ठीं बिम्बोष्ठीं सुमध्यां सुप्रतिष्ठिताम् ॥ 15.29 ॥

kurvatīṃ prabhayā devīṃ sarvā vitimirā diśaḥ | tāṃ nīlakaṇṭhīṃ bimboṣṭhīṃ sumadhyāṃ supratiṣṭhitām || 15.29 ||

अपने तेज से सभी दिशाओं का अंधकार मिटाने वाली उस देवी को — जिसका कंठ श्याम और सुंदर था, ओंठ बिंब-फल जैसे लाल थे, कमर पतली थी, अंग सुडौल थे,

श्लोक 30 (sundara.15.30)

सीतां पद्मपलाशाक्षीं मन्मथस्य रतिं यथा । इष्टां सर्वस्य जगतः पूर्णचन्द्रप्रभामिव ॥ 15.30 ॥

sītāṃ padmapalāśākṣīṃ manmathasya ratiṃ yathā | iṣṭāṃ sarvasya jagataḥ pūrṇacandraprabhāmiva || 15.30 ||

उस सीता को, जिनके नेत्र कमल-दल जैसे थे, मानो कामदेव की रति हों, समस्त जगत को प्रिय, पूर्णचंद्र की आभा के समान —

श्लोक 31 (sundara.15.31)

भूमौ सुतनुमासीनां नियतामिव तापसीम् । निःश्वासबहुलां भीरुं भुजगेन्द्रवधूमिव ॥ 15.31 ॥

bhūmau sutanumāsīnāṃ niyatāmiva tāpasīm | niḥśvāsabahulāṃ bhīruṃ bhujagendravadhūmiva || 15.31 ||

भूमि पर बैठी उस सुंदरांगी को, मानो कोई संयमी तपस्विनी हों, जो बार-बार लंबी साँसें ले रही थीं, भयभीत-सी, मानो नागराज की वधू हों;

श्लोक 32 (sundara.15.32)

शोकजालेन महता विततेन न राजतीम् । संसक्तां धूमजालेन शिखामिव विभावसोः ॥ 15.32 ॥

śokajālena mahatā vitatena na rājatīm | saṃsaktāṃ dhūmajālena śikhāmiva vibhāvasoḥ || 15.32 ||

शोक के विशाल, फैले हुए जाल से घिरी होने के कारण जो चमक नहीं रही थीं — मानो धुएँ के जाल से लिपटी अग्नि-शिखा हों;

श्लोक 33 (sundara.15.33)

तां स्मृतीमिव संदिग्धामृद्धिं निपतितामिव । विहतामिव च श्रद्धामाशां प्रतिहतामिव ॥ 15.33 ॥

tāṃ smṛtīmiva saṃdigdhāmṛddhiṃ nipatitāmiva | vihatāmiva ca śraddhāmāśāṃ pratihatāmiva || 15.33 ||

मानो कोई धुँधली स्मृति हों, मानो कोई गिरी हुई समृद्धि हों, मानो कोई नष्ट हुई श्रद्धा हों, मानो कोई कुचली हुई आशा हों;

श्लोक 34 (sundara.15.34)

सोपसर्गां यथा सिद्धिं बुद्धिं सकलुषामिव । अभूतेनापवादेन कीर्तिं निपतितामिव ॥ 15.34 ॥

sopasargāṃ yathā siddhiṃ buddhiṃ sakaluṣāmiva | abhūtenāpavādena kīrtiṃ nipatitāmiva || 15.34 ||

मानो विघ्नों से घिरी कोई सिद्धि हों, मानो कोई मलिन हुई बुद्धि हों, मानो झूठे लांछन से गिरी हुई कीर्ति हों;

श्लोक 35 (sundara.15.35)

रामोपरोधव्यथितां रक्षोगणनिपीडिताम् । अबलां मृगशावाक्षीं वीक्षमाणां ततस्ततः ॥ 15.35 ॥

rāmoparodhavyathitāṃ rakṣogaṇanipīḍitām | abalāṃ mṛgaśāvākṣīṃ vīkṣamāṇāṃ tatastataḥ || 15.35 ||

राम से बिछड़ने के दुख से व्यथित, राक्षसियों के समूह से पीड़ित, उस असहाय, मृगशावा-नेत्रा को, जो इधर-उधर देख रही थीं,

श्लोक 36 (sundara.15.36)

बाष्पाम्बुपरिपूर्णेन कृष्णवक्राक्षिपक्ष्मणा । वदनेनाप्रसन्नेन निःश्वसन्तीं पुनः पुनः ॥ 15.36 ॥

bāṣpāmbuparipūrṇena kṛṣṇavakrākṣipakṣmaṇā | vadanenāprasannena niḥśvasantīṃ punaḥ punaḥ || 15.36 ||

जिनका मुख आँसुओं से भरा था, जिनकी काली, घुमावदार पलकें भीगी थीं, जिनका चेहरा उदास था, जो बार-बार लंबी साँसें ले रही थीं;

श्लोक 37 (sundara.15.37)

मलपङ्कधरां दीनां मण्डनार्हाममण्डिताम् । प्रभां नक्षत्रराजस्य कालमेघैरिवावृताम् ॥ 15.37 ॥

malapaṅkadharāṃ dīnāṃ maṇḍanārhāmamaṇḍitām | prabhāṃ nakṣatrarājasya kālameghairivāvṛtām || 15.37 ||

जो मैल और कीचड़ से लिपटी, दीन, आभूषणों की पात्र होते हुए भी अनाभूषित थीं — मानो नक्षत्रराज चंद्रमा की आभा घने काले बादलों से ढकी हो।

श्लोक 38 (sundara.15.38)

तस्य संदिदिहे बुद्धिस्तथा सीतां निरीक्ष्य च । आम्नायानामयोगेन विद्यां प्रशिथिलामिव ॥ 15.38 ॥

tasya saṃdidihe buddhistathā sītāṃ nirīkṣya ca | āmnāyānāmayogena vidyāṃ praśithilāmiva || 15.38 ||

सीता को इस दशा में देखकर उनकी बुद्धि संदेह में पड़ गई — जैसे विधिवत पाठ न होने से कोई विद्या धुँधली और अनिश्चित हो जाती है;

श्लोक 39 (sundara.15.39)

दुःखेन बुबुधे सीतां हनुमाननलंकृताम् । संस्कारेण यथा हीनां वाचमर्थान्तरं गताम् ॥ 15.39 ॥

duḥkhena bubudhe sītāṃ hanumānanalaṃkṛtām | saṃskāreṇa yathā hīnāṃ vācamarthāntaraṃ gatām || 15.39 ||

बड़ी कठिनाई से हनुमान ने इस अनाभूषित सीता को पहचाना — जैसे व्याकरण-संस्कार से रहित हो जाने पर कोई शब्द अपना अर्थ बदल दे, तो उसे पहचानना कठिन हो जाता है।

श्लोक 40 (sundara.15.40)

तां समीक्ष्य विशालाक्षीं राजपुत्रीमनिन्दिताम् । तर्कयामास सीतेति कारणैरुपपादयन् ॥ 15.40 ॥

tāṃ samīkṣya viśālākṣīṃ rājaputrīmaninditām | tarkayāmāsa sīteti kāraṇairupapādayan || 15.40 ||

उस विशाल-नेत्रा, निर्दोष राजपुत्री को देखकर, उन्होंने युक्तियों से सिद्ध करते हुए यह निश्चय किया — "यह सीता ही हैं।"

श्लोक 41 (sundara.15.41)

वैदेह्या यानि चांगेषु तदा रामोऽन्वकीर्तयत् । तान्याभरणजालानि गात्रशोभीन्यलक्षयत् ॥ 15.41 ॥

vaidehyā yāni cāṃgeṣu tadā rāmo'nvakīrtayat | tānyābharaṇajālāni gātraśobhīnyalakṣayat || 15.41 ||

वैदेही के जिन आभूषणों का वर्णन राम ने उस समय किया था, उन्हीं आभूषणों को उनके अंगों की शोभा बढ़ाते हुए उन्होंने पहचान लिया।

श्लोक 42 (sundara.15.42)

सुकृतौ कर्णवेष्टौ च श्वदंष्ट्रौ च सुसंस्थितौ । मणिविद्रुमचित्राणि हस्तेष्वाभरणानि च ॥ 15.42 ॥

sukṛtau karṇaveṣṭau ca śvadaṃṣṭrau ca susaṃsthitau | maṇividrumacitrāṇi hasteṣvābharaṇāni ca || 15.42 ||

सुंदर बने हुए दोनों कर्णाभूषण, भली-भाँति बने हुए दोनों श्वदंष्ट्र-आभूषण, तथा रत्न और मूँगों से चित्रित हाथों के आभूषण भी —

श्लोक 43 (sundara.15.43)

श्यामानि चिरयुक्तत्वात् तथा संस्थानवन्ति च । तान्येवैतानि मन्येऽहं यानि रामोऽन्वकीर्तयत् ॥ 15.43 ॥

śyāmāni cirayuktatvāt tathā saṃsthānavanti ca | tānyevaitāni manye'haṃ yāni rāmo'nvakīrtayat || 15.43 ||

लंबे समय पहने रहने के कारण कुछ श्याम पड़ गए थे, फिर भी अपने ही रूप में थे — "ये वही आभूषण हैं जिनका राम ने वर्णन किया था" — ऐसा मैं मानता हूँ।

श्लोक 44 (sundara.15.44)

तत्र यान्यवहीनानि तान्यहं नोपलक्षये । यान्यस्या नावहीनानि तानीमानि न संशयः ॥ 15.44 ॥

tatra yānyavahīnāni tānyahaṃ nopalakṣaye | yānyasyā nāvahīnāni tānīmāni na saṃśayaḥ || 15.44 ||

वहाँ जो आभूषण अनुपस्थित हैं, वे मुझे यहाँ नहीं दिखते; और जो अनुपस्थित नहीं हैं, वे यहाँ निश्चय ही उपस्थित हैं।

श्लोक 45 (sundara.15.45)

पीतं कनकपट्टाभं स्रस्तं तद्वसनं शुभम् । उत्तरीयं नगासक्तं तदा दृष्टं प्लवंगमैः ॥ 15.45 ॥

pītaṃ kanakapaṭṭābhaṃ srastaṃ tadvasanaṃ śubham | uttarīyaṃ nagāsaktaṃ tadā dṛṣṭaṃ plavaṃgamaiḥ || 15.45 ||

स्वर्ण-पट्ट जैसा चमकता वह पीला, शुभ, ढीला वस्त्र — वह उत्तरीय, जो एक वृक्ष में अटका हुआ था, उस समय वानरों ने देखा था।

श्लोक 46 (sundara.15.46)

भूषणानि च मुख्यानि दृष्टानि धरणीतले । अनयैवापविद्धानि स्वनवन्ति महान्ति च ॥ 15.46 ॥

bhūṣaṇāni ca mukhyāni dṛṣṭāni dharaṇītale | anayaivāpaviddhāni svanavanti mahānti ca || 15.46 ||

और मुख्य आभूषण भी धरती पर पड़े हुए देखे गए थे — बड़े, झंकार करते हुए वे आभूषण, उन्हीं के द्वारा फेंके गए थे।

श्लोक 47 (sundara.15.47)

इदं चिरगृहीतत्वाद् वसनं क्लिष्टवत्तरम् । तथाप्यनूनं तद्वर्णं तथा श्रीमद्यथेतरत् ॥ 15.47 ॥

idaṃ ciragṛhītatvād vasanaṃ kliṣṭavattaram | tathāpyanūnaṃ tadvarṇaṃ tathā śrīmadyathetarat || 15.47 ||

यह वस्त्र, लंबे समय से पहना होने के कारण अधिक मलिन हो गया है, फिर भी इसका रंग किसी भी अन्य श्रेष्ठ वस्त्र से कम शोभायमान नहीं है।

श्लोक 48 (sundara.15.48)

इयं कनकवर्णांगी रामस्य महिषी प्रिया । प्रणष्टापि सती यस्य मनसो न प्रणश्यति ॥ 15.48 ॥

iyaṃ kanakavarṇāṃgī rāmasya mahiṣī priyā | praṇaṣṭāpi satī yasya manaso na praṇaśyati || 15.48 ||

यही वह स्वर्ण-वर्ण अंगों वाली स्त्री है, राम की प्रिय महारानी — जो लुप्त हो जाने पर भी उनके मन से कभी लुप्त नहीं होतीं।

श्लोक 49 (sundara.15.49)

इयं सा यत्कृते रामश्चतुर्भिरिह तप्यते । कारुण्येनानृशंस्येन शोकेन मदनेन च ॥ 15.49 ॥

iyaṃ sā yatkṛte rāmaścaturbhiriha tapyate | kāruṇyenānṛśaṃsyena śokena madanena ca || 15.49 ||

यही वह है, जिसके कारण राम यहाँ चार भावों से संतप्त हो रहे हैं — करुणा से, स्नेह से, शोक से, और प्रेम से —

श्लोक 50 (sundara.15.50)

स्त्री प्रणष्टेति कारुण्यादाश्रितेत्यानृशंस्यतः । पत्नी नष्टेति शोकेन प्रियेति मदनेन च ॥ 15.50 ॥

strī praṇaṣṭeti kāruṇyādāśritetyānṛśaṃsyataḥ | patnī naṣṭeti śokena priyeti madanena ca || 15.50 ||

करुणा से यह सोचकर कि "एक स्त्री खो गई है"; स्नेह से यह सोचकर कि "जो मुझ पर आश्रित थी वह खो गई"; शोक से यह सोचकर कि "मेरी पत्नी खो गई"; और प्रेम से यह सोचकर कि "मेरी प्रिया खो गई"।

श्लोक 51 (sundara.15.51)

अस्या देव्या यथारूपमंगप्रत्यंगसौष्ठवम् । रामस्य च यथारूपं तस्येयमसितेक्षणा ॥ 15.51 ॥

asyā devyā yathārūpamaṃgapratyaṃgasauṣṭhavam | rāmasya ca yathārūpaṃ tasyeyamasitekṣaṇā || 15.51 ||

जैसा इस देवी के अंग-प्रत्यंग का सौष्ठव है, वैसा ही राम का भी रूप है — यह श्यामनेत्रा उन्हीं के योग्य है।

श्लोक 52 (sundara.15.52)

अस्या देव्या मनस्तस्मिंस्तस्य चास्यां प्रतिष्ठितम् । तेनेयं स च धर्मात्मा मुहूर्तमपि जीवति ॥ 15.52 ॥

asyā devyā manastasmiṃstasya cāsyāṃ pratiṣṭhitam | teneyaṃ sa ca dharmātmā muhūrtamapi jīvati || 15.52 ||

इस देवी का मन उन्हीं में स्थिर है, और उनका मन इन्हीं में स्थिर है — इसीलिए यह और वे धर्मात्मा दोनों ही क्षण भर भी जीवित रह पा रहे हैं।

श्लोक 53 (sundara.15.53)

दुष्करं कुरुते रामो इमां मत्तकाशिनीम् । सीतां विना महाबाहुर्मुहूर्तमपि यो जीवति ॥ 15.53 ॥

duṣkaraṃ kurute rāmo imāṃ mattakāśinīm | sītāṃ vinā mahābāhurmuhūrtamapi yo jīvati || 15.53 ||

राम एक दुष्कर कार्य कर रहे हैं — वे महाबाहु, इस मदमाती-सी सुंदर सीता के बिना भी, एक क्षण भी जीवित हैं।

श्लोक 54 (sundara.15.54)

एवं सीतां तथा दृष्ट्वा हृष्टः पवनसम्भवः । जगाम मनसा रामं प्रशशंस च तं प्रभुम् ॥ 15.54 ॥

evaṃ sītāṃ tathā dṛṣṭvā hṛṣṭaḥ pavanasambhavaḥ | jagāma manasā rāmaṃ praśaśaṃsa ca taṃ prabhum || 15.54 ||

इस प्रकार सीता को देखकर, हर्षित वायुपुत्र मन ही मन राम की ओर गए, और उन प्रभु की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

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