Skip to main content

सुन्दरकाण्ड · सर्ग 24

सीता की दृढ़ता और राक्षसियों की भक्षण-धमकी

सर्ग 23सर्ग-सूचीसर्ग 25

श्लोक 1 (sundara.24.1)

ततः सीतां समस्तास्ता राक्षस्यो विकृताननाः । परुषं परुषानर्हामूचुस्तद्वाक्यमप्रियम् ॥ १ ॥

tataḥ sītāṃ samastāstā rākṣasyo vikṛtānanāḥ | paruṣaṃ paruṣānarhāmūcustadvākyamapriyam || 1 ||

तब उन सभी विकृत मुख वाली राक्षसियों ने सीता को, जो इसकी पात्र नहीं थी, कठोर और अप्रिय वचन कहे।

श्लोक 2 (sundara.24.2)

किं त्वमन्तःपुरे सीते सर्वभूतमनोहरे । महार्हशयनोपेते न वासमनुमन्यसे ॥ २ ॥

kiṃ tvamantaḥpure sīte sarvabhūtamanohare | mahārhaśayanopete na vāsamanumanyase || 2 ||

हे सीते! सभी प्राणियों को प्रिय, उत्तम शय्याओं से युक्त उस अन्तःपुर में तू निवास करना क्यों स्वीकार नहीं करती?

श्लोक 3 (sundara.24.3)

मानुषी मानुषस्यैव भार्यात्वं बहु मन्यसे । प्रत्याहर मनो रामान्न त्वं जातु भविष्यसि ॥ ३ ॥

mānuṣī mānuṣasyaiva bhāryātvaṃ bahu manyase | pratyāhara mano rāmānna tvaṃ jātu bhaviṣyasi || 3 ||

मनुष्य होकर तू एक मनुष्य की पत्नी बनने को इतना महत्व देती है। राम से अपना मन हटा ले, अन्यथा तू जीवित नहीं रहेगी।

श्लोक 4 (sundara.24.4)

त्रैलोक्यवसुभोक्तारं रावणं राक्षसेश्वरम् । भर्तारमुपसंगम्य विहरस्व यथासुखम् ॥ ४ ॥

trailokyavasubhoktāraṃ rāvaṇaṃ rākṣaseśvaram | bhartāramupasaṃgamya viharasva yathāsukham || 4 ||

त्रिलोक के धन का भोग करने वाले राक्षसराज रावण को पति रूप में अपनाकर सुखपूर्वक विहार कर।

श्लोक 5 (sundara.24.5)

मानुषी मानुषं तं तु राममिच्छसि शोभने । राज्याद् भ्रष्टमसिद्धार्थं विक्लबं त्वमनिन्दिते ॥ ५ ॥

mānuṣī mānuṣaṃ taṃ tu rāmamicchasi śobhane | rājyād bhraṣṭamasiddhārthaṃ viklabaṃ tvamanindite || 5 ||

हे शोभने! तू मनुष्य होकर उस मनुष्य राम को चाहती है, जो राज्य से भ्रष्ट, असफल-मनोरथ और व्याकुल है, हे निर्दोष!

श्लोक 6 (sundara.24.6)

राक्षसीनां वचः श्रुत्वा सीता पद्मनिभेक्षणा । नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥

rākṣasīnāṃ vacaḥ śrutvā sītā padmanibhekṣaṇā | netrābhyāmaśrupūrṇābhyāmidaṃ vacanamabravīt || 6 ||

राक्षसियों के वचन सुनकर कमल के समान नेत्रों वाली सीता ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से यह वचन कहा -

श्लोक 7 (sundara.24.7)

यदिदं लोकविद्विष्टमुदाहरथ संगताः । नैतन्मनसि वाक्यं मे किल्बिषं प्रतिभाति वः ॥ ७ ॥

yadidaṃ lokavidviṣṭamudāharatha saṃgatāḥ | naitanmanasi vākyaṃ me kilbiṣaṃ pratibhāti vaḥ || 7 ||

तुम सब मिलकर जो यह लोकनिन्दित वचन कहती हो, वह मेरे मन में पाप के रूप में प्रतीत ही नहीं होता।

श्लोक 8 (sundara.24.8)

न मानुषी राक्षसस्य भार्या भवितुमर्हति । कामं खादत मां सर्वा न करिष्यामि वो वचः ॥ ८ ॥

na mānuṣī rākṣasasya bhāryā bhavitumarhati | kāmaṃ khādata māṃ sarvā na kariṣyāmi vo vacaḥ || 8 ||

मानुषी स्त्री का राक्षस की पत्नी बनना उचित नहीं है। तुम सब चाहे मुझे खा जाओ, मैं तुम्हारी बात नहीं मानूँगी।

श्लोक 9 (sundara.24.9)

दीनो वा राज्यहीनो वा यो मे भर्ता स मे गुरुः । तं नित्यमनुरक्तास्मि यथा सूर्यं सुवर्चला ॥ ९ ॥

dīno vā rājyahīno vā yo me bhartā sa me guruḥ | taṃ nityamanuraktāsmi yathā sūryaṃ suvarcalā || 9 ||

जो भी मेरा पति है, चाहे दीन हो या राज्यहीन, वही मेरा गुरु है; मैं उसी के प्रति सदा वैसे ही अनुरक्त हूँ जैसे सुवर्चला सूर्य के प्रति।

श्लोक 10 (sundara.24.10)

यथा शची महाभागा शक्रं समुपतिष्ठति । अरुन्धती वसिष्ठं च रोहिणी शशिनं यथा ॥ १० ॥

yathā śacī mahābhāgā śakraṃ samupatiṣṭhati | arundhatī vasiṣṭhaṃ ca rohiṇī śaśinaṃ yathā || 10 ||

जैसे महाभागा शची इन्द्र की सेवा में रहती है, जैसे अरुन्धती वसिष्ठ की और रोहिणी चन्द्रमा की,

श्लोक 11 (sundara.24.11)

लोपामुद्रा यथागस्त्यं सुकन्या च्यवनं यथा । सावित्री सत्यवन्तं च कपिलं श्रीमती यथा ॥ ११ ॥

lopāmudrā yathāgastyaṃ sukanyā cyavanaṃ yathā | sāvitrī satyavantaṃ ca kapilaṃ śrīmatī yathā || 11 ||

जैसे लोपामुद्रा अगस्त्य की, सुकन्या च्यवन ऋषि की, सावित्री सत्यवान की और श्रीमती कपिल मुनि की,

श्लोक 12 (sundara.24.12)

सौदासं मदयन्तीव केशिनी सगरं यथा । नैषधं दमयन्तीव भैमी पतिमनुव्रता । तथाहमिक्ष्वाकुवरं रामं पतिमनुव्रता ॥ १२ ॥

saudāsaṃ madayantīva keśinī sagaraṃ yathā | naiṣadhaṃ damayantīva bhaimī patimanuvratā | tathāhamikṣvākuvaraṃ rāmaṃ patimanuvratā || 12 ||

जैसे मदयन्ती सौदास की, केशिनी सगर की, और भीमकुमारी दमयन्ती अपने पति नल की अनुव्रता है -

श्लोक 13 (sundara.24.13)

सीताया वचनं श्रुत्वा राक्षस्यः क्रोधमूर्च्छिताः । भर्त्सयन्ति स्म परुषैर्वाक्यै रावणचोदिताः ॥ १३ ॥

sītāyā vacanaṃ śrutvā rākṣasyaḥ krodhamūrcchitāḥ | bhartsayanti sma paruṣairvākyai rāvaṇacoditāḥ || 13 ||

वैसे ही मैं इक्ष्वाकुश्रेष्ठ अपने पति राम की अनुव्रता हूँ। सीता के ये वचन सुनकर, रावण द्वारा उकसाई गई राक्षसियाँ क्रोध से विह्वल होकर कठोर वचनों से उसे धमकाने लगीं।

श्लोक 14 (sundara.24.14)

अवलीनः स निर्वाक्यो हनुमान् शिंशुपाद्रुमे । सीतां संतर्जयन्तीस्ता राक्षसीरशृणोत् कपिः ॥ १४ ॥

avalīnaḥ sa nirvākyo hanumān śiṃśupādrume | sītāṃ saṃtarjayantīstā rākṣasīraśṛṇot kapiḥ || 14 ||

शिंशुपा वृक्ष पर छिपा, चुपचाप बैठा हनुमान उन राक्षसियों को सीता को डराते हुए सुनता रहा।

श्लोक 15 (sundara.24.15)

तामभिक्रम्य संक्रुद्धा वेपमानां समन्ततः । भृशं संलिलिहुर्दीप्तान् प्रलम्बान् दशनच्छदान् ॥ १५ ॥

tāmabhikramya saṃkruddhā vepamānāṃ samantataḥ | bhṛśaṃ saṃlilihurdīptān pralambān daśanacchadān || 15 ||

चारों ओर से कांपती हुई सीता को घेरकर, वे अत्यन्त क्रुद्ध राक्षसियाँ बार-बार अपने चमकते हुए लटकते होठों को चाटने लगीं।

श्लोक 16 (sundara.24.16)

ऊचुश्च परमक्रुद्धाः प्रगृह्याशु परश्वधान् । नेयमर्हति भर्तारं रावणं राक्षसाधिपम् ॥ १६ ॥

ūcuśca paramakruddhāḥ pragṛhyāśu paraśvadhān | neyamarhati bhartāraṃ rāvaṇaṃ rākṣasādhipam || 16 ||

और अत्यन्त क्रुद्ध होकर, फरसे उठाकर उन्होंने कहा - यह स्त्री राक्षसराज रावण को पति रूप में पाने योग्य नहीं है।

श्लोक 17 (sundara.24.17)

सा भर्त्स्यमाना भीमाभी राक्षसीभिर्वरानना । सबाष्पमपसर्पन्ती शिंशुपां तामुपागमत् ॥ १७ ॥

sā bhartsyamānā bhīmābhī rākṣasībhirvarānanā | sabāṣpamapasarpantī śiṃśupāṃ tāmupāgamat || 17 ||

उन भयंकर राक्षसियों से धमकाई गई वह सुमुखी सीता आँसू पोंछते हुए वहाँ से हटकर उसी शिंशुपा वृक्ष के पास पहुँची।

श्लोक 18 (sundara.24.18)

ततस्तां शिंशुपां सीता राक्षसीभिः समावृता । अभिगम्य विशालाक्षी तस्थौ शोकपरिप्लुता ॥ १८ ॥

tatastāṃ śiṃśupāṃ sītā rākṣasībhiḥ samāvṛtā | abhigamya viśālākṣī tasthau śokapariplutā || 18 ||

तब राक्षसियों से घिरी विशाल नेत्रों वाली सीता उस शिंशुपा वृक्ष के पास जाकर शोक में डूबी हुई वहीं ठहर गई।

श्लोक 19 (sundara.24.19)

तां कृशां दीनवदनां मलिनाम्बरधारिणीम् । भर्त्सयांचक्रिरे सीतां राक्षस्यस्तां समन्ततः ॥ १९ ॥

tāṃ kṛśāṃ dīnavadanāṃ malināmbaradhāriṇīm | bhartsayāṃcakrire sītāṃ rākṣasyastāṃ samantataḥ || 19 ||

दुर्बल, दीन मुख वाली, मलिन वस्त्र धारण किए हुए उस सीता को वे भयंकर राक्षसियाँ चारों ओर से घेरकर धमकाने लगीं।

श्लोक 20 (sundara.24.20)

ततस्तां विनता नाम राक्षसी भीमदर्शना । अब्रवीत्कुपिताकारा कराळा निर्णतोदरी ॥ २० ॥

tatastāṃ vinatā nāma rākṣasī bhīmadarśanā | abravītkupitākārā karāḻā nirṇatodarī || 20 ||

तब विनता नामक राक्षसी, जो भयंकर रूप वाली, क्रोध से विकृत आकार वाली, विकराल और झुके हुए उदर वाली थी, यह बोली -

श्लोक 21 (sundara.24.21)

सीते पर्याप्तमेतावद् भर्तुः स्नेहो निदर्शितः । सर्वत्रातिकृतं भद्रे व्यसनायोपकल्पते ॥ २१ ॥

sīte paryāptametāvad bhartuḥ sneho nidarśitaḥ | sarvatrātikṛtaṃ bhadre vyasanāyopakalpate || 21 ||

हे सीते! तूने अपने पति के प्रति इतना स्नेह प्रकट कर दिया, यह पर्याप्त है। हे भद्रे! हर बात में अति करना विपत्ति का कारण बनता है।

श्लोक 22 (sundara.24.22)

परितुष्टास्मि भद्रं ते मानुषस्ते कृतो विधिः । ममापि तु वचः पथ्यं ब्रुवन्त्याः कुरु मैथिलि ॥ २२ ॥

parituṣṭāsmi bhadraṃ te mānuṣaste kṛto vidhiḥ | mamāpi tu vacaḥ pathyaṃ bruvantyāḥ kuru maithili || 22 ||

मैं संतुष्ट हूँ, तेरा कल्याण हो, तूने मानव-धर्म निभा लिया। हे मैथिली! अब मेरे हितकर वचन के अनुसार भी कुछ कर।

श्लोक 23 (sundara.24.23)

रावणं भज भर्तारं भर्तारं सर्वरक्षसाम् ॥ २३ ॥

rāvaṇaṃ bhaja bhartāraṃ bhartāraṃ sarvarakṣasām || 23 ||

सभी राक्षसों के स्वामी रावण को पति रूप में स्वीकार कर -

श्लोक 24 (sundara.24.24)

विक्रान्तं रूपवन्तं च सुरेशमिव वासवम् । दक्षिणं त्यागशीलं च सर्वस्य प्रियदर्शनम् ॥ २४ ॥

vikrāntaṃ rūpavantaṃ ca sureśamiva vāsavam | dakṣiṇaṃ tyāgaśīlaṃ ca sarvasya priyadarśanam || 24 ||

जो पराक्रमी, सुरूप, इन्द्र के समान तेजस्वी, दक्ष, त्यागशील और सबको प्रिय दिखने वाला है।

श्लोक 25 (sundara.24.25)

मानुषं कृपणं रामं त्यक्त्वा रावणमाश्रय । दिव्याङ्गरागा वैदेहि दिव्याभरणभूषिता । अद्यप्रभृति सर्वेषां लोकानामीश्वरी भव ॥ २५ ॥

mānuṣaṃ kṛpaṇaṃ rāmaṃ tyaktvā rāvaṇamāśraya | divyāṅgarāgā vaidehi divyābharaṇabhūṣitā | adyaprabhṛti sarveṣāṃ lokānāmīśvarī bhava || 25 ||

दीन मनुष्य राम को त्यागकर रावण की शरण ले। हे वैदेही! दिव्य अंगराग और दिव्य आभूषणों से सुशोभित होकर आज से सम्पूर्ण लोकों की स्वामिनी बन जा।

श्लोक 26 (sundara.24.26)

अग्नेः स्वाहा यथा देवी शची वेन्द्रस्य शोभने । किं ते रामेण वैदेहि कृपणेन गतायुषा ॥ २६ ॥

agneḥ svāhā yathā devī śacī vendrasya śobhane | kiṃ te rāmeṇa vaidehi kṛpaṇena gatāyuṣā || 26 ||

जैसे स्वाहा अग्निदेव की और शची इन्द्र की देवी हैं, हे शोभने! उस दीन और आयुहीन राम से तुझे क्या प्रयोजन, हे वैदेही?

श्लोक 27 (sundara.24.27)

एतदुक्तं च मे वाक्यं यदि त्वं न करिष्यसि । अस्मिन्मुहूर्ते सर्वास्त्वां भक्षयिष्यामहे वयम् ॥ २७ ॥

etaduktaṃ ca me vākyaṃ yadi tvaṃ na kariṣyasi | asminmuhūrte sarvāstvāṃ bhakṣayiṣyāmahe vayam || 27 ||

यदि तू मेरे इस कहे वचन के अनुसार नहीं करेगी, तो इसी क्षण हम सब मिलकर तुझे खा जाएँगी।

श्लोक 28 (sundara.24.28)

अन्या तु विकटा नाम लम्बमानपयोधरा । अब्रवीत्कुपिता सीतां मुष्टिमुद्यम्य गर्जती ॥ २८ ॥

anyā tu vikaṭā nāma lambamānapayodharā | abravītkupitā sītāṃ muṣṭimudyamya garjatī || 28 ||

तब लटकते हुए स्तनों वाली विकटा नामक एक अन्य राक्षसी क्रोध से मुट्ठी ताने, गरजते हुए सीता से बोली -

श्लोक 29 (sundara.24.29)

बहून्यप्रियरूपाणि वचनानि सुदुर्मते । अनुक्रोशान्मृदुत्वाच्च सोढानि तव मैथिलि ॥ २९ ॥

bahūnyapriyarūpāṇi vacanāni sudurmate | anukrośānmṛdutvācca soḍhāni tava maithili || 29 ||

हे दुर्बुद्धि! हमने अब तक तेरे बहुत से अप्रिय वचन केवल दया और कोमलता के कारण सह लिए हैं, हे मैथिली!

श्लोक 30 (sundara.24.30)

न च नः कुरुषे वाक्यं हितं कालपुरस्कृतम् ॥ ३० ॥

na ca naḥ kuruṣe vākyaṃ hitaṃ kālapuraskṛtam || 30 ||

फिर भी तू समय पर दिए गए हमारे हितकर वचन को नहीं मानती।

श्लोक 31 (sundara.24.31)

अनीतासि समुद्रस्य पारमन्यैर्दुरासदम् । रावणान्तःपुरं घोरं प्रविष्टा चासि मैथिलि ॥ ३१ ॥

anītāsi samudrasya pāramanyairdurāsadam | rāvaṇāntaḥpuraṃ ghoraṃ praviṣṭā cāsi maithili || 31 ||

तुझे दूसरों के लिए दुर्लभ इस समुद्र के पार लाया गया है, हे मैथिली, और तू रावण के इस भयंकर अन्तःपुर में प्रविष्ट हो चुकी है।

श्लोक 32 (sundara.24.32)

रावणस्य गृहे रुद्धामस्माभिस्तु सुरक्षिताम् । न त्वां शक्तः परित्रातुमपि साक्षात्पुरन्दरः ॥ ३२ ॥

rāvaṇasya gṛhe ruddhāmasmābhistu surakṣitām | na tvāṃ śaktaḥ paritrātumapi sākṣātpurandaraḥ || 32 ||

रावण के घर में बंदी बनाकर हमने ही तेरी भली-भाँति रक्षा की है; साक्षात् इन्द्र भी तुझे यहाँ से नहीं बचा सकता।

श्लोक 33 (sundara.24.33)

कुरुष्व हितवादिन्या वचनं मम मैथिलि । अलमश्रुप्रपातेन त्यज शोकमनर्थकम् ॥ ३३ ॥

kuruṣva hitavādinyā vacanaṃ mama maithili | alamaśruprapātena tyaja śokamanarthakam || 33 ||

हे मैथिली! मेरे हितकारी वचन को मान ले; आँसू बहाना अब बंद कर, इस व्यर्थ शोक को त्याग दे।

श्लोक 34 (sundara.24.34)

भज प्रीतिं च हर्षं च त्यजैतां नित्यदैन्यताम् । सीते राक्षसराजेन सह क्रीड यथासुखम् ॥ ३४ ॥

bhaja prītiṃ ca harṣaṃ ca tyajaitāṃ nityadainyatām | sīte rākṣasarājena saha krīḍa yathāsukham || 34 ||

प्रेम और हर्ष को अपना, इस निरंतर दीनता को त्याग दे। हे सीते! राक्षसराज के साथ सुखपूर्वक क्रीड़ा कर।

श्लोक 35 (sundara.24.35)

जानासि हि यथा भीरु स्त्रीणां यौवनमध्रुवम् । यावन्न ते व्यतिक्रामेत्तावत्सुखमवाप्नुहि ॥ ३५ ॥

jānāsi hi yathā bhīru strīṇāṃ yauvanamadhruvam | yāvanna te vyatikrāmettāvatsukhamavāpnuhi || 35 ||

हे भीरु! तू जानती ही है कि स्त्रियों का यौवन कितना अस्थिर है; जब तक वह बीत नहीं जाता, तब तक सुख प्राप्त कर ले।

श्लोक 36 (sundara.24.36)

उद्यानानि च रम्याणि पर्वतोपवनानि च । सह राक्षसराजेन चर त्वं मदिरेक्षणे ॥ ३६ ॥

udyānāni ca ramyāṇi parvatopavanāni ca | saha rākṣasarājena cara tvaṃ madirekṣaṇe || 36 ||

हे मदिर नेत्रों वाली! राक्षसराज के साथ रमणीय उद्यानों और पर्वतीय उपवनों में विचरण कर।

श्लोक 37 (sundara.24.37)

स्त्रीसहस्राणि ते सप्त वशे स्थास्यन्ति सुन्दरि । रावणं भज भर्तारं भर्तारं सर्वरक्षसाम् ॥ ३७ ॥

strīsahasrāṇi te sapta vaśe sthāsyanti sundari | rāvaṇaṃ bhaja bhartāraṃ bhartāraṃ sarvarakṣasām || 37 ||

हे सुन्दरी! सात हजार स्त्रियाँ तेरे वश में हो जाएँगी; सभी राक्षसों के स्वामी रावण को पति रूप में स्वीकार कर।

श्लोक 38 (sundara.24.38)

उत्पाट्य वा ते हृदयं भक्षयिष्यामि मैथिलि । यदि मे व्याहृतं वाक्यं न यथावत्करिष्यसि ॥ ३८ ॥

utpāṭya vā te hṛdayaṃ bhakṣayiṣyāmi maithili | yadi me vyāhṛtaṃ vākyaṃ na yathāvatkariṣyasi || 38 ||

अन्यथा, हे मैथिली, यदि तू मेरे कहे अनुसार ठीक-ठीक नहीं करेगी, तो मैं तेरा हृदय निकालकर खा जाऊँगी।

श्लोक 39 (sundara.24.39)

ततश्चण्डोदरी नाम राक्षसी क्रोधमूर्छिता । भ्रामयन्ती महच्छूलमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ३९ ॥

tataścaṇḍodarī nāma rākṣasī krodhamūrchitā | bhrāmayantī mahacchūlamidaṃ vacanamabravīt || 39 ||

तब चण्डोदरी नामक राक्षसी क्रोध से विह्वल होकर, बड़ा त्रिशूल घुमाते हुए यह वचन बोली -

श्लोक 40 (sundara.24.40)

इमां हरिणलोलाक्षीं त्रासोत्कम्पितपयोधराम् । रावणेन हृतां दृष्ट्वा दौहृदो मे महानभूत् ॥ ४० ॥

imāṃ hariṇalolākṣīṃ trāsotkampitapayodharām | rāvaṇena hṛtāṃ dṛṣṭvā dauhṛdo me mahānabhūt || 40 ||

मृग जैसे चंचल नेत्रों वाली, भय से कांपते स्तनों वाली इस स्त्री को रावण द्वारा हरी गई देखकर मेरे मन में यह बड़ी लालसा उत्पन्न हुई है -

श्लोक 41 (sundara.24.41)

यकृत्प्लीहमथोत्पीडं हृदयं च सबन्धनम् । अन्त्राण्यपि तथा शीर्षं खादेयमिति मे मतिः ॥ ४१ ॥

yakṛtplīhamathotpīḍaṃ hṛdayaṃ ca sabandhanam | antrāṇyapi tathā śīrṣaṃ khādeyamiti me matiḥ || 41 ||

कि इसका यकृत, प्लीहा, हृदय के ऊपर का मांस, नसों सहित हृदय, आंतें और सिर भी खा जाऊँ, ऐसा मेरा विचार है।

श्लोक 42 (sundara.24.42)

ततस्तु प्रघसा नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत् । कण्ठमस्या नृशंसायाः पीडयाम किमास्यते ॥ ४२ ॥

tatastu praghasā nāma rākṣasī vākyamabravīt | kaṇṭhamasyā nṛśaṃsāyāḥ pīḍayāma kimāsyate || 42 ||

तब प्रघसा नामक राक्षसी ने यह वचन कहा - इस निर्दयी स्त्री का गला दबाने में अब देर क्यों की जा रही है?

श्लोक 43 (sundara.24.43)

निवेद्यतां ततो राज्ञे मानुषी सा मृतेति ह । नात्र कश्चन संदेहः खादतेति स वक्ष्यति ॥ ४३ ॥

nivedyatāṃ tato rājñe mānuṣī sā mṛteti ha | nātra kaścana saṃdehaḥ khādateti sa vakṣyati || 43 ||

राजा को यह सूचित कर दिया जाए कि यह मानुषी मर गई; इसमें कोई संदेह नहीं कि वे कहेंगे - इसे खा डालो।

श्लोक 44 (sundara.24.44)

ततस्त्वजामुखी नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत् । विशस्येमां ततः सर्वाः समान् कुरुत पीलुकान् ॥ ४४ ॥

tatastvajāmukhī nāma rākṣasī vākyamabravīt | viśasyemāṃ tataḥ sarvāḥ samān kuruta pīlukān || 44 ||

तब अजामुखी नामक राक्षसी ने यह वचन कहा - इसे मारकर हम सब इसके समान टुकड़े कर लें।

श्लोक 45 (sundara.24.45)

विभजाम ततः सर्वा विवादो मे न रोचते । पेयमानीयतां क्षिप्रं लेह्यमुच्चावचं बहु ॥ ४५ ॥

vibhajāma tataḥ sarvā vivādo me na rocate | peyamānīyatāṃ kṣipraṃ lehyamuccāvacaṃ bahu || 45 ||

फिर हम सब आपस में बाँट लेंगे, विवाद मुझे पसंद नहीं। शीघ्र मदिरा और नाना प्रकार के चटपटे व्यंजन लाए जाएँ।

श्लोक 46 (sundara.24.46)

ततः शूर्पणखा नाम राक्षसी वाक्यमब्रवीत् । अजामुख्या यदुक्तं हि तदेव मम रोचते ॥ ४६ ॥

tataḥ śūrpaṇakhā nāma rākṣasī vākyamabravīt | ajāmukhyā yaduktaṃ hi tadeva mama rocate || 46 ||

तब शूर्पणखा नामक राक्षसी ने यह वचन कहा - अजामुखी ने जो कहा है, वही मुझे भी पसंद है।

श्लोक 47 (sundara.24.47)

सुरा चानीयतां क्षिप्रं सर्वशोकविनाशिनी । मानुषं मां समास्वाद्य नृत्यामोऽथ निकुम्भिलाम् ॥ ४७ ॥

surā cānīyatāṃ kṣipraṃ sarvaśokavināśinī | mānuṣaṃ māṃ samāsvādya nṛtyāmo'tha nikumbhilām || 47 ||

सारे शोक का नाश करने वाली मदिरा शीघ्र लाई जाए; मानव-मांस का स्वाद लेकर फिर हम निकुम्भिला के लिए नृत्य करेंगी।

श्लोक 48 (sundara.24.48)

एवं संभर्त्स्यमाना सा सीता सुरसुतोपमा । राक्षसीभिः सुघोराभिर्धैर्यमुत्सृज्य रोदिति ॥ ४८ ॥

evaṃ saṃbhartsyamānā sā sītā surasutopamā | rākṣasībhiḥ sughorābhirdhairyamutsṛjya roditi || 48 ||

इस प्रकार अत्यन्त भयंकर राक्षसियों द्वारा धमकाई जाती हुई, देवकन्या के समान वह सीता धैर्य त्यागकर रोने लगी।

सर्ग 23सर्ग-सूचीसर्ग 25