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सुन्दरकाण्ड · सर्ग 68

सीता की शंका और हनुमान का आश्वासन

सर्ग 67सर्ग-सूची

श्लोक 1 (sundara.68.1)

अथाहमुत्तरं देव्या पुनरुक्तः ससम्भ्रमम्। तव स्नेहान्नरव्याघ्र सौहार्दादनुमान्य च ॥ 68.1 ॥

athāhamuttaraṃ devyā punaruktaḥ sasambhramam| tava snehānnaravyāghra sauhārdādanumānya ca || 68.1 ||

तत्पश्चात्, हे नरव्याघ्र! तुम्हारे प्रति स्नेह और सौहार्दवश देवी ने मेरा सत्कार करते हुए, कुछ व्याकुल होकर, आगे क्या करना है, यह पुनः मुझसे कहा।

श्लोक 2 (sundara.68.2)

एवं बहुविधं वाच्यो रामो दाशरथिस्त्वया। यथा मां प्राप्नुयाच्छीघ्रं हत्वा रावणमाहवे ॥ 68.2 ॥

evaṃ bahuvidhaṃ vācyo rāmo dāśarathistvayā| yathā māṃ prāpnuyācchīghraṃ hatvā rāvaṇamāhave || 68.2 ||

"'दशरथनन्दन राम से तुम्हें इस प्रकार बहुत कुछ कहना चाहिए, जिससे वे युद्ध में रावण का वध करके शीघ्र मुझे प्राप्त कर सकें।'"

श्लोक 3 (sundara.68.3)

यदि वा मन्यसे वीर वसैकाहमरिंदम। कस्मिंश्चित् संवृते देशे विश्रान्तः श्वो गमिष्यसि ॥ 68.3 ॥

yadi vā manyase vīra vasaikāhamariṃdama| kasmiṃścit saṃvṛte deśe viśrāntaḥ śvo gamiṣyasi || 68.3 ||

"'अथवा, हे वीर अरिंदम! यदि तुम उचित समझो, तो किसी गुप्त स्थान में एक दिन विश्राम करके कल चले जाना।'"

श्लोक 4 (sundara.68.4)

मम चाप्यल्पभाग्यायाः सांनिध्यात् तव वानर। अस्य शोकविपाकस्य मुहूर्तं स्याद् विमोक्षणम् ॥ 68.4 ॥

mama cāpyalpabhāgyāyāḥ sāṃnidhyāt tava vānara| asya śokavipākasya muhūrtaṃ syād vimokṣaṇam || 68.4 ||

"'हे वानर! तुम्हारी उपस्थिति से मुझ अभागिनी को भी इस गहन शोक से क्षणभर की मुक्ति मिल जाएगी।'"

श्लोक 5 (sundara.68.5)

गते हि त्वयि विक्रान्ते पुनरागमनाय वै। प्राणानामपि संदेहो मम स्यान्नात्र संशयः ॥ 68.5 ॥

gate hi tvayi vikrānte punarāgamanāya vai| prāṇānāmapi saṃdeho mama syānnātra saṃśayaḥ || 68.5 ||

"'क्योंकि हे पराक्रमी! तुम्हारे लौटने के लिए चले जाने पर, इसमें कोई संदेह नहीं कि मेरे प्राणों पर भी संकट आ जाएगा।'"

श्लोक 6 (sundara.68.6)

तवादर्शनजः शोको भूयो मां परितापयेत्। दुखाद् दुःखपराभूतां दुर्गतां दुःखभागिनीम् ॥ 68.6 ॥

tavādarśanajaḥ śoko bhūyo māṃ paritāpayet| dukhād duḥkhaparābhūtāṃ durgatāṃ duḥkhabhāginīm || 68.6 ||

"'तुम्हारे न दिखने से उपजा शोक मुझे और भी संतप्त करेगा, जो दुःख पर दुःख से पराभूत, दुर्गत और दुःखभागिनी हूँ।'"

श्लोक 7 (sundara.68.7)

अयं च वीर संदेहस्तिष्ठतीव ममाग्रतः। सुमहांस्त्वत्सहायेषु हर्यृक्षेषु हरीश्वर ॥ 68.7 ॥

ayaṃ ca vīra saṃdehastiṣṭhatīva mamāgrataḥ| sumahāṃstvatsahāyeṣu haryṛkṣeṣu harīśvara || 68.7 ||

"'और, हे वीर! हे वानरेश्वर! तुम्हारे सहायक वानरों और भालुओं के विषय में यह बहुत बड़ा संदेह मानो मेरे सामने खड़ा है —'"

श्लोक 8 (sundara.68.8)

कथं नु खलु दुष्पारं तरिष्यन्ति महोदधिम्। तानि हर्यृक्षसैन्यानि तौ वा नरवरात्मजौ ॥ 68.8 ॥

kathaṃ nu khalu duṣpāraṃ tariṣyanti mahodadhim| tāni haryṛkṣasainyāni tau vā naravarātmajau || 68.8 ||

"'वे वानर-भालुओं की सेनाएँ, अथवा वे दोनों राजकुमार, उस दुष्पार महासागर को भला किस प्रकार पार करेंगे?'"

श्लोक 9 (sundara.68.9)

त्रयाणामेव भूतानां सागरस्यास्य लङ्घने। शक्तिः स्याद् वैनतेयस्य वायोर्वा तव चानघ ॥ 68.9 ॥

trayāṇāmeva bhūtānāṃ sāgarasyāsya laṅghane| śaktiḥ syād vainateyasya vāyorvā tava cānagha || 68.9 ||

"'हे निष्पाप! इस सागर को लाँघने की शक्ति केवल तीन प्राणियों में है — वैनतेय गरुड़ में, वायु में, अथवा स्वयं तुममें।'"

श्लोक 10 (sundara.68.10)

तदस्मिन् कार्यनिर्योगे वीरैवं दुरतिक्रमे। किं पश्यसि समाधानं ब्रूहि कार्यविदां वर ॥ 68.10 ॥

tadasmin kāryaniryoge vīraivaṃ duratikrame| kiṃ paśyasi samādhānaṃ brūhi kāryavidāṃ vara || 68.10 ||

"'तो, हे वीर! इस अत्यन्त दुष्कर कार्य में तुम्हें क्या उपाय दिखाई देता है? हे कार्यकुशलों में श्रेष्ठ, मुझे बताओ।'"

श्लोक 11 (sundara.68.11)

काममस्य त्वमेवैकः कार्यस्य परिसाधने। पर्याप्तः परवीरघ्न यशस्यस्ते बलोदयः ॥ 68.11 ॥

kāmamasya tvamevaikaḥ kāryasya parisādhane| paryāptaḥ paravīraghna yaśasyaste balodayaḥ || 68.11 ||

"'हे परवीरघ्न! निःसंदेह इस कार्य को पूरा करने में तुम अकेले ही समर्थ हो; तुम्हारे बल का उदय स्वयं यशस्वी है।'"

श्लोक 12 (sundara.68.12)

बलैः समग्रैर्यदि मां हत्वा रावणमाहवे। विजयी स्वपुरीं रामो नयेत् तत् स्याद् यशस्करम् ॥ 68.12 ॥

balaiḥ samagrairyadi māṃ hatvā rāvaṇamāhave| vijayī svapurīṃ rāmo nayet tat syād yaśaskaram || 68.12 ||

"'तथापि यदि राम अपनी समस्त सेना सहित रावण को युद्ध में मारकर, विजयी होकर, मुझे अपनी नगरी ले जाएँ — तो यही उनके लिए यशकारक होगा।'"

श्लोक 13 (sundara.68.13)

यथाहं तस्य वीरस्य वनादुपधिना हृता। रक्षसा तद्भयादेव तथा नार्हति राघवः ॥ 68.13 ॥

yathāhaṃ tasya vīrasya vanādupadhinā hṛtā| rakṣasā tadbhayādeva tathā nārhati rāghavaḥ || 68.13 ||

"'जैसे मुझे उस वीर के वन से उस राक्षस ने उन्हीं के भय से छल द्वारा हर लिया, वैसे ही राघव को भी उसी भय के कारण मुझे वापस नहीं ले जाना चाहिए।'"

श्लोक 14 (sundara.68.14)

बलैस्तु संकुलां कृत्वा लङ्कां परबलार्दनः। मां नयेद् यदि काकुत्स्थस्तत् तस्य सदृशं भवेत् ॥ 68.14 ॥

balaistu saṃkulāṃ kṛtvā laṅkāṃ parabalārdanaḥ| māṃ nayed yadi kākutsthastat tasya sadṛśaṃ bhavet || 68.14 ||

"'किन्तु यदि शत्रुसेना का नाशक काकुत्स्थ अपनी सेनाओं से लंका को भरकर मुझे ले जाएँ, तो यही उनके योग्य होगा।'"

श्लोक 15 (sundara.68.15)

तद् यथा तस्य विक्रान्तमनुरूपं महात्मनः। भवत्याहवशूरस्य तथा त्वमुपपादय ॥ 68.15 ॥

tad yathā tasya vikrāntamanurūpaṃ mahātmanaḥ| bhavatyāhavaśūrasya tathā tvamupapādaya || 68.15 ||

"'अतः तुम ऐसा प्रयत्न करो कि उस महात्मा, युद्ध में शूरवीर का पराक्रम उनके अनुरूप ही प्रकट हो।'"

श्लोक 16 (sundara.68.16)

तदर्थोपहितं वाक्यं प्रश्रितं हेतुसंहितम्। निशम्याहं ततः शेषं वाक्यमुत्तरमब्रवम् ॥ 68.16 ॥

tadarthopahitaṃ vākyaṃ praśritaṃ hetusaṃhitam| niśamyāhaṃ tataḥ śeṣaṃ vākyamuttaramabravam || 68.16 ||

उनकी उस सारगर्भित, विनम्र और युक्तियुक्त बात को सुनकर, मैंने तब उन्हें अपना शेष उत्तर इस प्रकार दिया —

श्लोक 17 (sundara.68.17)

देवि हर्यृक्षसैन्यानामीश्वरः प्लवतां वरः। सुग्रीवः सत्त्वसम्पन्नस्त्वदर्थे कृतनिश्चयः ॥ 68.17 ॥

devi haryṛkṣasainyānāmīśvaraḥ plavatāṃ varaḥ| sugrīvaḥ sattvasampannastvadarthe kṛtaniścayaḥ || 68.17 ||

"'हे देवि! वानर-भालुओं की सेनाओं के स्वामी, कूदने वालों में श्रेष्ठ, बलसम्पन्न सुग्रीव ने तुम्हारे लिए दृढ़ निश्चय कर लिया है।'"

श्लोक 18 (sundara.68.18)

तस्य विक्रमसम्पन्नाः सत्त्ववन्तो महाबलाः। मनःसंकल्पसदृशा निदेशे हरयः स्थिताः ॥ 68.18 ॥

tasya vikramasampannāḥ sattvavanto mahābalāḥ| manaḥsaṃkalpasadṛśā nideśe harayaḥ sthitāḥ || 68.18 ||

"'उनके पराक्रमी, बलवान और महाशक्तिशाली वानर, जो संकल्पमात्र के समान वेगवान हैं, उनकी आज्ञा में तत्पर खड़े हैं।'"

श्लोक 19 (sundara.68.19)

येषां नोपरि नाधस्तान्न तिर्यक् सज्जते गतिः। न च कर्मसु सीदन्ति महत्स्वमिततेजसः ॥ 68.19 ॥

yeṣāṃ nopari nādhastānna tiryak sajjate gatiḥ| na ca karmasu sīdanti mahatsvamitatejasaḥ || 68.19 ||

"'न ऊपर, न नीचे, न आड़े — कहीं भी उनकी गति में बाधा नहीं आती; और वे अमित तेजस्वी वानर बड़े-से-बड़े कार्यों में भी कभी विचलित नहीं होते।'"

श्लोक 20 (sundara.68.20)

असकृत् तैर्महाभागैर्वानरैर्बलसंयुतैः। प्रदक्षिणीकृता भूमिर्वायुमार्गानुसारिभिः ॥ 68.20 ॥

asakṛt tairmahābhāgairvānarairbalasaṃyutaiḥ| pradakṣiṇīkṛtā bhūmirvāyumārgānusāribhiḥ || 68.20 ||

"'उन महाभाग्यशाली, बलशाली वानरों ने वायु-मार्ग का अनुसरण करते हुए इस पृथ्वी की अनेक बार परिक्रमा की है।'"

श्लोक 21 (sundara.68.21)

मद्विशिष्टाश्च तुल्याश्च सन्ति तत्र वनौकसः। मत्तः प्रत्यवरः कश्चिन्नास्ति सुग्रीवसंनिधौ ॥ 68.21 ॥

madviśiṣṭāśca tulyāśca santi tatra vanaukasaḥ| mattaḥ pratyavaraḥ kaścinnāsti sugrīvasaṃnidhau || 68.21 ||

"'उनमें मुझसे श्रेष्ठ और मेरे समान वनवासी वानर भी हैं; सुग्रीव के समीप मुझसे न्यून कोई भी नहीं है।'"

श्लोक 22 (sundara.68.22)

अहं तावदिह प्राप्तः किं पुनस्ते महाबलाः। नहि प्रकृष्टाः प्रेष्यन्ते प्रेष्यन्ते हीतरे जनाः ॥ 68.22 ॥

ahaṃ tāvadiha prāptaḥ kiṃ punaste mahābalāḥ| nahi prakṛṣṭāḥ preṣyante preṣyante hītare janāḥ || 68.22 ||

"'जब मुझ जैसा भी यहाँ तक पहुँच गया, तो उन महाबली वानरों की तो बात ही क्या! क्योंकि श्रेष्ठजन दूत बनाकर नहीं भेजे जाते, दूसरे ही भेजे जाते हैं।'"

श्लोक 23 (sundara.68.23)

तदलं परितापेन देवि मन्युरपैतु ते। एकोत्पातेन ते लङ्कामेष्यन्ति हरियूथपाः ॥ 68.23 ॥

tadalaṃ paritāpena devi manyurapaitu te| ekotpātena te laṅkāmeṣyanti hariyūthapāḥ || 68.23 ||

"'अतः, हे देवि! अब संताप छोड़ो, तुम्हारा शोक दूर हो जाए। वे वानरसेना के प्रमुख एक ही छलांग में लंका आ पहुँचेंगे।'"

श्लोक 24 (sundara.68.24)

मम पृष्ठगतौ तौ च चन्द्रसूर्याविवोदितौ। त्वत्सकाशं महाभागे नृसिंहावागमिष्यतः ॥ 68.24 ॥

mama pṛṣṭhagatau tau ca candrasūryāvivoditau| tvatsakāśaṃ mahābhāge nṛsiṃhāvāgamiṣyataḥ || 68.24 ||

"'और वे दोनों नरसिंह मेरे कंधों पर बैठकर, हे महाभागे! उदित हुए सूर्य और चन्द्रमा के समान तुम्हारे पास आ पहुँचेंगे।'"

श्लोक 25 (sundara.68.25)

अरिघ्नं सिंहसंकाशं क्षिप्रं द्रक्ष्यसि राघवम्। लक्ष्मणं च धनुष्मन्तं लङ्काद्वारमुपागतम् ॥ 68.25 ॥

arighnaṃ siṃhasaṃkāśaṃ kṣipraṃ drakṣyasi rāghavam| lakṣmaṇaṃ ca dhanuṣmantaṃ laṅkādvāramupāgatam || 68.25 ||

"'तुम बहुत शीघ्र सिंह के समान शत्रुनाशक राघव को, और धनुर्धारी लक्ष्मण को, लंका के द्वार पर पहुँचा हुआ देखोगी।'"

श्लोक 26 (sundara.68.26)

नखदंष्ट्रायुधान् वीरान् सिंहशार्दूलविक्रमान्। वानरान् वारणेन्द्राभान् क्षिप्रं द्रक्ष्यसि संगतान् ॥ 68.26 ॥

nakhadaṃṣṭrāyudhān vīrān siṃhaśārdūlavikramān| vānarān vāraṇendrābhān kṣipraṃ drakṣyasi saṃgatān || 68.26 ||

"'शीघ्र ही तुम नख और दाँतों को अस्त्र बनाए, सिंह-व्याघ्र के समान पराक्रमी, गजराज के समान दिखने वाले वीर वानरों को एकत्र देखोगी।'"

श्लोक 27 (sundara.68.27)

शैलाम्बुदनिकाशानां लङ्कामलयसानुषु। नर्दतां कपिमुख्यानां नचिराच्छ्रोष्यसे स्वनम् ॥ 68.27 ॥

śailāmbudanikāśānāṃ laṅkāmalayasānuṣu| nardatāṃ kapimukhyānāṃ nacirācchroṣyase svanam || 68.27 ||

"'शीघ्र ही तुम लंका के मलयगिरि की चोटियों पर, पर्वत और मेघों के समान दिखने वाले श्रेष्ठ वानरों की गर्जना सुनोगी।'"

श्लोक 28 (sundara.68.28)

निवृत्तवनवासं च त्वया सार्धमरिंदमम्। अभिषिक्तमयोध्यायां क्षिप्रं द्रक्ष्यसि राघवम् ॥ 68.28 ॥

nivṛttavanavāsaṃ ca tvayā sārdhamariṃdamam| abhiṣiktamayodhyāyāṃ kṣipraṃ drakṣyasi rāghavam || 68.28 ||

"'और शीघ्र ही तुम शत्रुनाशक राघव को, वनवास समाप्त कर, तुम्हारे साथ अयोध्या में राज्याभिषिक्त होते देखोगी।'"

श्लोक 29 (sundara.68.29)

ततो मया वाग्भिरदीनभाषिणी शिवाभिरिष्टाभिरभिप्रसादिता। उवाह शान्तिं मम मैथिलात्मजा तवातिशोकेन तथातिपीडिता ॥ 68.29 ॥

tato mayā vāgbhiradīnabhāṣiṇī śivābhiriṣṭābhirabhiprasāditā| uvāha śāntiṃ mama maithilātmajā tavātiśokena tathātipīḍitā || 68.29 ||

इस प्रकार मेरे शुभ, प्रिय और साहसपूर्ण वचनों से सांत्वना पाकर, मिथिलेशकुमारी सीता, तुम्हारे विषय में अत्यन्त शोकाकुल होते हुए भी, शान्ति को प्राप्त हुईं।

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