युद्धकाण्ड · सर्ग 128
राम-राज्याभिषेक और रामायण-माहात्म्य
श्लोक 1 (yuddha.128.1)
शिरस्यञ्जलिमादाय कैकेयीनन्दिवर्धनः। बभाषे भरतो ज्येष्ठन् रामं सत्यपराक्रमम् ॥ 128.1 ॥
śirasyañjalimādāya kaikeyīnandivardhanaḥ| babhāṣe bharato jyeṣṭhan rāmaṃ satyaparākramam || 128.1 ||
कैकेयी के आनन्द को बढ़ाने वाले भरत ने सिर पर अंजलि जोड़कर, सत्यपराक्रमी अपने ज्येष्ठ भ्राता राम से कहा —
श्लोक 2 (yuddha.128.2)
पूजिता मामिका माता दत्तन् राज्यमिदं मम। तद्ददामि पुनस्तुभ्यन् यथा त्वमददा मम ॥ 128.2 ॥
pūjitā māmikā mātā dattan rājyamidaṃ mama| taddadāmi punastubhyan yathā tvamadadā mama || 128.2 ||
"मेरी माता ने अपनी इच्छा पूर्ण कर ली, और यह राज्य मुझे दे दिया गया; अब वही मैं आपको लौटा रहा हूँ, जैसे आपने मुझे दिया था।
श्लोक 3 (yuddha.128.3)
धुरमेकाकिना न्यस्तामृषभेण बलीयसा। किशोरवद्गुरुं भारं न वोढुमहमुत्सहे ॥ 128.3 ॥
dhuramekākinā nyastāmṛṣabheṇa balīyasā| kiśoravadguruṃ bhāraṃ na voḍhumahamutsahe || 128.3 ||
बलवान् बैल पर अकेले रखा गया जुआ मैं वहन नहीं कर सकता; मैं एक बछड़े के समान इस भारी भार को ढोने में समर्थ नहीं हूँ।
श्लोक 4 (yuddha.128.4)
वारिवेगेन महता भिन्नः सेतुरिव क्षरन्। दुर्बन्धनमिदं मन्ये राज्यच्छिद्रमसन्वृतम् ॥ 128.4 ॥
vārivegena mahatā bhinnaḥ seturiva kṣaran| durbandhanamidaṃ manye rājyacchidramasanvṛtam || 128.4 ||
महान् जलधारा के वेग से टूटा हुआ बाँध जिस प्रकार बहता ही रहता है, उसी प्रकार यह राज्य का असुरक्षित छिद्र मुझे दुर्बन्धनीय ही जान पड़ता है।
श्लोक 5 (yuddha.128.5)
गतिं खर इवाश्वस्य हन्सस्येव च वायसः। नान्वेतुमुत्सहे देव तव मार्गमरिन्दम ॥ 128.5 ॥
gatiṃ khara ivāśvasya hansasyeva ca vāyasaḥ| nānvetumutsahe deva tava mārgamarindama || 128.5 ||
हे शत्रुदमन देव! जैसे गधा घोड़े की चाल का, या कौआ हंस की चाल का अनुसरण नहीं कर सकता, वैसे ही मैं आपके मार्ग का अनुसरण करने में समर्थ नहीं हूँ।
श्लोक 6 (yuddha.128.6)
यथा च रोपितो वृक्षो जातश्चान्तर्निवेशने। महांश्च सुदुरारोहो महास्कन्धः प्रशाखवान् ॥ 128.6 ॥
yathā ca ropito vṛkṣo jātaścāntarniveśane| mahāṃśca sudurāroho mahāskandhaḥ praśākhavān || 128.6 ||
और जैसे कोई वृक्ष घर के भीतरी आँगन में लगाया और उगाया जाए, विशाल हो, चढ़ने में अत्यन्त कठिन हो, बड़े स्कन्ध और शाखाओं वाला हो,
श्लोक 7 (yuddha.128.7)
शीर्येत पुष्पितो भूत्वा न फलानि प्रदर्शयेत्। तस्य नानुभवेदर्थन् यस्य हेतोः स रोप्यते ॥ 128.7 ॥
śīryeta puṣpito bhūtvā na phalāni pradarśayet| tasya nānubhavedarthan yasya hetoḥ sa ropyate || 128.7 ||
फिर फूलकर भी झड़ जाए और फल न दिखा पाए — तो जिसके उद्देश्य से वह लगाया गया, वह उसका प्रयोजन नहीं पा सकता।
श्लोक 8 (yuddha.128.8)
एषोपमा महाबाहो त्वमर्थन् वेत्तुमर्हसि। यद्यस्मान्मनुजेन्द्र त्वं भक्तान्भृत्यान्न शाधि हि ॥ 128.8 ॥
eṣopamā mahābāho tvamarthan vettumarhasi| yadyasmānmanujendra tvaṃ bhaktānbhṛtyānna śādhi hi || 128.8 ||
हे महाबाहो! आपको यही उपमा समझनी चाहिए। हे मनुजेन्द्र! यदि आप हम भक्त सेवकों पर शासन नहीं करेंगे,
श्लोक 9 (yuddha.128.9)
जगदद्याभिषिक्तन् त्वामनुपश्यतु सर्वतः। प्रतपन्तमिवादित्यं मध्याह्ने दीप्ततेजसं ॥ 128.9 ॥
jagadadyābhiṣiktan tvāmanupaśyatu sarvataḥ| pratapantamivādityaṃ madhyāhne dīptatejasaṃ || 128.9 ||
तो आज ही अभिषिक्त होकर, सम्पूर्ण जगत् आपको सब ओर से देखे — मध्याह्न के देदीप्यमान, तपते हुए सूर्य के समान।
श्लोक 10 (yuddha.128.10)
तूर्यसङ्घातनिर्घोषैः काञ्चीनूपुरनिस्वनैः। मधुरैर्गीतशब्दैश्च प्रतिबुध्यस्व शेष्व च ॥ 128.10 ॥
tūryasaṅghātanirghoṣaiḥ kāñcīnūpuranisvanaiḥ| madhurairgītaśabdaiśca pratibudhyasva śeṣva ca || 128.10 ||
वाद्यों के समूहों की गम्भीर ध्वनि से, करधनी और नूपुरों की मधुर झंकार से, तथा मधुर गीतों के स्वरों से जागिए, अब और मत सोइए —
श्लोक 11 (yuddha.128.11)
यावदावर्तते चक्रन् यावती च वसुन्धरा। तावत्त्वमिह सर्वस्य स्वामित्वमभिवर्तय ॥ 128.11 ॥
yāvadāvartate cakran yāvatī ca vasundharā| tāvattvamiha sarvasya svāmitvamabhivartaya || 128.11 ||
जब तक (काल-)चक्र घूमता रहे और जब तक यह पृथ्वी बनी रहे, तब तक आप ही यहाँ समस्त जगत् के स्वामित्व का पालन करें।"
श्लोक 12 (yuddha.128.12)
भरतस्य वचः श्रुत्वा रामः परपुरञ्जयः। तथेति प्रतिजग्राह निषसादासने शुभे ॥ 128.12 ॥
bharatasya vacaḥ śrutvā rāmaḥ parapurañjayaḥ| tatheti pratijagrāha niṣasādāsane śubhe || 128.12 ||
शत्रुओं के नगरों को जीतने वाले राम ने भरत का यह वचन सुनकर "ऐसा ही होगा" कहकर स्वीकार किया, और शुभ आसन पर विराजमान हो गए।
श्लोक 13 (yuddha.128.13)
ततः शत्रुघ्नवचनान्निपुणाः श्मश्रुवर्धकाः। सुखहस्ताः सुशीघ्राश्च राघवं पर्युपासत ॥ 128.13 ॥
tataḥ śatrughnavacanānnipuṇāḥ śmaśruvardhakāḥ| sukhahastāḥ suśīghrāśca rāghavaṃ paryupāsata || 128.13 ||
तब शत्रुघ्न के आदेश से निपुण, कुशल हाथों वाले और अत्यन्त शीघ्रगामी नाई राघव की सेवा में उपस्थित हुए।
श्लोक 14 (yuddha.128.14)
पूर्वन् तु भरते स्नाते लक्ष्मणे च महाबले। सुग्रीवे वानरेन्द्रे च राक्षसेन्द्रे विभीषणे ॥ 128.14 ॥
pūrvan tu bharate snāte lakṣmaṇe ca mahābale| sugrīve vānarendre ca rākṣasendre vibhīṣaṇe || 128.14 ||
भरत, महाबली लक्ष्मण, वानरेन्द्र सुग्रीव और राक्षसेन्द्र विभीषण के स्नान कर चुकने पर, सबसे पहले —
श्लोक 15 (yuddha.128.15)
विशोधितजटः स्नातश्चित्रमाल्यानुलेपनः। महार्हवसनोपेतस्तस्थौ तत्र श्रिया ज्वलन् ॥ 128.15 ॥
viśodhitajaṭaḥ snātaścitramālyānulepanaḥ| mahārhavasanopetastasthau tatra śriyā jvalan || 128.15 ||
जटाएँ सुलझाकर, स्नान कर, विचित्र मालाओं और अनुलेपन से सुसज्जित, बहुमूल्य वस्त्र धारण किए हुए राम, वहाँ अपनी कान्ति से देदीप्यमान होकर विराजमान हुए।
श्लोक 16 (yuddha.128.16)
प्रतिकर्म च रामस्य कारयामास वीर्यवान्। लक्ष्मणस्य च लक्ष्मीवानिक्ष्वाकुकुलवर्धनः ॥ 128.16 ॥
pratikarma ca rāmasya kārayāmāsa vīryavān| lakṣmaṇasya ca lakṣmīvānikṣvākukulavardhanaḥ || 128.16 ||
इक्ष्वाकुकुल को बढ़ाने वाले, तेजस्वी और शोभा-सम्पन्न भरत ने राम तथा लक्ष्मण दोनों का शृंगार स्वयं करवाया,
श्लोक 17 (yuddha.128.17)
प्रतिकर्म च सीतायाः सर्वा दशरथस्त्रियः। आत्मनैव तदा चक्रुर्मनस्विन्यो मनोहरम् ॥ 128.17 ॥
pratikarma ca sītāyāḥ sarvā daśarathastriyaḥ| ātmanaiva tadā cakrurmanasvinyo manoharam || 128.17 ||
और दशरथ की सभी रानियों ने भी, मनस्विनी होकर, स्वयं ही सीता का मनोहर शृंगार सम्पन्न किया।
श्लोक 18 (yuddha.128.18)
ततो राघवपत्नीनान् सर्वासामेव शोभनम्। चकार यत्नात्कौसल्या प्रहृष्टा पुत्रवत्सला ॥ 128.18 ॥
tato rāghavapatnīnān sarvāsāmeva śobhanam| cakāra yatnātkausalyā prahṛṣṭā putravatsalā || 128.18 ||
तत्पश्चात् पुत्रवत्सला और अत्यन्त प्रसन्न कौसल्या ने राघव की सभी पत्नियों (वानर-पत्नियों) के लिए भी प्रयत्नपूर्वक सुन्दर शृंगार कराया।
श्लोक 19 (yuddha.128.19)
ततः शत्रुघ्नवचनात्सुमन्त्रो नाम सारथिः। योजयित्वाभिचक्राम रथन् सर्वाङ्गशोभनम् ॥ 128.19 ॥
tataḥ śatrughnavacanātsumantro nāma sārathiḥ| yojayitvābhicakrāma rathan sarvāṅgaśobhanam || 128.19 ||
तदनन्तर शत्रुघ्न के आदेश से सुमन्त्र नामक सारथी ने सर्वांग-सुन्दर रथ को जोतकर वहाँ ले आया।
श्लोक 20 (yuddha.128.20)
अर्कमण्डलसङ्काशन् दिव्यं दृष्ट्वा रथन् स्थितम्। आरुरोह महाबाहू रामः सत्यपराक्रमः ॥ 128.20 ॥
arkamaṇḍalasaṅkāśan divyaṃ dṛṣṭvā rathan sthitam| āruroha mahābāhū rāmaḥ satyaparākramaḥ || 128.20 ||
सूर्यमण्डल के समान दिव्य उस खड़े रथ को देखकर, सत्यपराक्रमी, महाबाहु राम उस पर आरूढ़ हुए।
श्लोक 21 (yuddha.128.21)
सुग्रीवो हनुमांश्चैव महेन्द्रसदृशद्युती। स्नातौ दिव्यनिभैर्वस्त्रैर्जग्मतुः शुभकुण्डलौ ॥ 128.21 ॥
sugrīvo hanumāṃścaiva mahendrasadṛśadyutī| snātau divyanibhairvastrairjagmatuḥ śubhakuṇḍalau || 128.21 ||
महेन्द्र के समान द्युतिमान् सुग्रीव और हनुमान भी स्नान कर, दिव्य के समान वस्त्र पहने, शुभ कुण्डल धारण किए हुए चल पड़े।
श्लोक 22 (yuddha.128.22)
सर्वाभरणजुष्टाश्च ययुस्ताः शुभकुण्डलाः। सुग्रीवपत्न्याः सीता च द्रष्टुं नगरमुत्सुकाः ॥ 128.22 ॥
sarvābharaṇajuṣṭāśca yayustāḥ śubhakuṇḍalāḥ| sugrīvapatnyāḥ sītā ca draṣṭuṃ nagaramutsukāḥ || 128.22 ||
सर्वाभूषणों से सुसज्जित, शुभ कुण्डल पहने सुग्रीव की पत्नियाँ और सीता भी नगर देखने को उत्सुक होकर चल पड़ीं।
श्लोक 23 (yuddha.128.23)
अयोध्यायान् तु सचिवा राज्ञो दशरथस्य च। पुरोहितं पुरस्कृत्य मन्त्रयामासुरर्थवत् ॥ 128.23 ॥
ayodhyāyān tu sacivā rājño daśarathasya ca| purohitaṃ puraskṛtya mantrayāmāsurarthavat || 128.23 ||
इधर अयोध्या में राजा दशरथ के मन्त्रीगण, पुरोहित को आगे रखकर, अर्थपूर्ण मन्त्रणा करने लगे।
श्लोक 24 (yuddha.128.24)
अशोको विजयश्चैव सिद्धार्थश्च समाहिताः। मन्त्रयन्रामवृद्ध्यर्थन् वृत्त्यर्थं नगरस्य च ॥ 128.24 ॥
aśoko vijayaścaiva siddhārthaśca samāhitāḥ| mantrayanrāmavṛddhyarthan vṛttyarthaṃ nagarasya ca || 128.24 ||
अशोक, विजय और सिद्धार्थ भी सावधानीपूर्वक विचार करते हुए, राम की समृद्धि और नगर की व्यवस्था के लिए मन्त्रणा करने लगे —
श्लोक 25 (yuddha.128.25)
सर्वमेवाभिषेकार्थन् जयार्हस्य महात्मनः। कर्तुमर्हथ रामस्य यद्यन्मङ्गलपूर्वकम् ॥ 128.25 ॥
sarvamevābhiṣekārthan jayārhasya mahātmanaḥ| kartumarhatha rāmasya yadyanmaṅgalapūrvakam || 128.25 ||
"आप सब उस विजय के योग्य महात्मा राम के अभिषेक हेतु, जो कुछ भी शुभ और मंगलकारी हो, वह सब सम्पन्न कीजिए।"
श्लोक 26 (yuddha.128.26)
इति ते मन्त्रिणः सर्वे सन्दिश्य तु पुरोहितम्। नगरान्निर्ययुस्तूर्णन् रामदर्शनबुद्धयः ॥ 128.26 ॥
iti te mantriṇaḥ sarve sandiśya tu purohitam| nagarānniryayustūrṇan rāmadarśanabuddhayaḥ || 128.26 ||
इस प्रकार वे सभी मन्त्री पुरोहित को आदेश देकर, राम के दर्शन की उत्कण्ठा से भरे हुए, तुरन्त नगर से बाहर निकल पड़े।
श्लोक 27 (yuddha.128.27)
हरियुक्तन् सहस्राक्षो रथमिन्द्र इवानघः। प्रययौ रथमास्थाय रामो नगरमुत्तमम् ॥ 128.27 ॥
hariyuktan sahasrākṣo rathamindra ivānaghaḥ| prayayau rathamāsthāya rāmo nagaramuttamam || 128.27 ||
जैसे निष्पाप सहस्राक्ष इन्द्र अपने रथ पर सवार होकर चलते हैं, वैसे ही घोड़ों से जुते हुए रथ पर आरूढ़ होकर राम श्रेष्ठ नगरी की ओर चल पड़े।
श्लोक 28 (yuddha.128.28)
जग्राह भरतो रश्मीञ्शत्रुघ्नश्छत्रमाददे। लक्ष्मणो व्यजनन् तस्य मूर्ध्नि सम्पर्यवीजयत् ॥ 128.28 ॥
jagrāha bharato raśmīñśatrughnaśchatramādade| lakṣmaṇo vyajanan tasya mūrdhni samparyavījayat || 128.28 ||
भरत ने लगाम पकड़ ली, शत्रुघ्न ने छत्र धारण किया, और लक्ष्मण ने उनके मस्तक पर चँवर डुलाना आरम्भ किया।
श्लोक 29 (yuddha.128.29)
श्वेतन् च वालव्यजनन् सुग्रीवो वानरेश्वरः। अपरन् चन्द्रसङ्काशन् राक्षसेन्द्रो विभीषणः ॥ 128.29 ॥
śvetan ca vālavyajanan sugrīvo vānareśvaraḥ| aparan candrasaṅkāśan rākṣasendro vibhīṣaṇaḥ || 128.29 ||
वानरेश्वर सुग्रीव ने श्वेत चँवर, और राक्षसेन्द्र विभीषण ने चन्द्रमा के समान दूसरा (श्वेत चँवर) धारण किया।
श्लोक 30 (yuddha.128.30)
ऋषिसङ्घैर्तदाकाशे देवैश्च समरुद्गणैः। स्तूयमानस्य रामस्य शुश्रुवे मधुरध्वनिः ॥ 128.30 ॥
ṛṣisaṅghairtadākāśe devaiśca samarudgaṇaiḥ| stūyamānasya rāmasya śuśruve madhuradhvaniḥ || 128.30 ||
आकाश में ऋषिगणों के समूहों, देवताओं और मरुद्गणों सहित, उस समय उपयुक्त, मधुर स्तुति-ध्वनि स्तुति किए जाते हुए राम की सुनाई देने लगी।
श्लोक 31 (yuddha.128.31)
ततः शत्रुञ्जयं नाम कुञ्जरं पर्वतोपमम्। आरुरोह महातेजाः सुग्रीवो वानरेश्वरः ॥ 128.31 ॥
tataḥ śatruñjayaṃ nāma kuñjaraṃ parvatopamam| āruroha mahātejāḥ sugrīvo vānareśvaraḥ || 128.31 ||
तब महातेजस्वी वानरेश्वर सुग्रीव पर्वत के समान विशाल शत्रुंजय नामक गजराज पर आरूढ़ हुए।
श्लोक 32 (yuddha.128.32)
नवनागसहस्राणि ययुरास्थाय वानराः। मानुषन् विग्रहन् कृत्वा सर्वाभरणभूषिताः ॥ 128.32 ॥
navanāgasahasrāṇi yayurāsthāya vānarāḥ| mānuṣan vigrahan kṛtvā sarvābharaṇabhūṣitāḥ || 128.32 ||
मनुष्य का रूप धारण कर, सर्वाभूषणों से विभूषित, नव सहस्र गजराजों पर चढ़कर वानर चलने लगे।
श्लोक 33 (yuddha.128.33)
शङ्खशब्दप्रणादैश्च दुन्दुभीनान् च निस्वनैः। प्रययू पुरुषव्याघ्रस्तां पुरीन् हर्म्यमालिनीम् ॥ 128.33 ॥
śaṅkhaśabdapraṇādaiśca dundubhīnān ca nisvanaiḥ| prayayū puruṣavyāghrastāṃ purīn harmyamālinīm || 128.33 ||
शंख के गम्भीर निनाद और दुन्दुभियों की ध्वनि के साथ, वे पुरुषश्रेष्ठ हर्म्यों की माला से सजी उस नगरी की ओर चल पड़े।
श्लोक 34 (yuddha.128.34)
ददृशुस्ते समायान्तन् राघवं सपुरःसरम्। विराजमानन् वपुषा रथेनातिरथन् तदा ॥ 128.34 ॥
dadṛśuste samāyāntan rāghavaṃ sapuraḥsaram| virājamānan vapuṣā rathenātirathan tadā || 128.34 ||
उन्होंने अग्रगामियों सहित आते हुए राघव को देखा — जो अपने रूप की कान्ति से देदीप्यमान, अन्य समस्त रथियों में श्रेष्ठ, रथ पर विराजमान थे।
श्लोक 35 (yuddha.128.35)
ते वर्धयित्वा काकुत्स्थन् रामेण प्रतिनन्दिताः। अनुजग्मुर्महात्मानं भ्रातृभिः परिवारितम् ॥ 128.35 ॥
te vardhayitvā kākutsthan rāmeṇa pratinanditāḥ| anujagmurmahātmānaṃ bhrātṛbhiḥ parivāritam || 128.35 ||
काकुत्स्थ का जयजयकार करते हुए वे प्रसन्नतापूर्वक राम द्वारा सम्मानित हुए, और अपने भाइयों से घिरे उस महात्मा के पीछे-पीछे चलने लगे।
श्लोक 36 (yuddha.128.36)
अमात्यैर्ब्राह्मणैश्चैव तथा प्रकृतिभिर्वृतः। श्रिया विरुरुचे रामो नक्षत्रैरिव चन्द्रमाः ॥ 128.36 ॥
amātyairbrāhmaṇaiścaiva tathā prakṛtibhirvṛtaḥ| śriyā viruruce rāmo nakṣatrairiva candramāḥ || 128.36 ||
मन्त्रियों, ब्राह्मणों और प्रजाजनों से घिरे हुए राम अपनी कान्ति से ऐसे सुशोभित हो रहे थे, जैसे नक्षत्रों से घिरा चन्द्रमा।
श्लोक 37 (yuddha.128.37)
स पुरोगामिभिस्तूर्यैस्तालस्वस्तिकपाणिभिः। प्रव्याहरद्भिर्मुदितैर्मङ्गलानि ययौ वृतः ॥ 128.37 ॥
sa purogāmibhistūryaistālasvastikapāṇibhiḥ| pravyāharadbhirmuditairmaṅgalāni yayau vṛtaḥ || 128.37 ||
अपने आगे चलते हुए वाद्य बजाने वालों, ताल और स्वस्तिक-चिह्न हाथों में लिए, मंगल-वचन बोलते हुए प्रसन्नजनों से घिरे हुए, वे आगे बढ़ने लगे।
श्लोक 38 (yuddha.128.38)
अक्षतन् जातरूपं च गावः कन्यास्तथा द्विजाः। नरा मोदकहस्ताश्च रामस्य पुरतो ययुः ॥ 128.38 ॥
akṣatan jātarūpaṃ ca gāvaḥ kanyāstathā dvijāḥ| narā modakahastāśca rāmasya purato yayuḥ || 128.38 ||
अक्षत, सुवर्ण, गौएँ, कन्याएँ, ब्राह्मण, तथा हाथों में मोदक लिए पुरुष — ये सब राम के आगे-आगे चलने लगे।
श्लोक 39 (yuddha.128.39)
सख्यन् च रामः सुग्रीवे प्रभावं चानिलात्मजे। वानराणान् च तत्कर्म व्याचचक्षेअथ मन्त्रिणाम् ॥ 128.39 ॥
sakhyan ca rāmaḥ sugrīve prabhāvaṃ cānilātmaje| vānarāṇān ca tatkarma vyācacakṣeatha mantriṇām || 128.39 ||
तब राम ने सुग्रीव के साथ अपनी मित्रता का, तथा वायुपुत्र (हनुमान) के प्रभाव का, और वानरों के उस पराक्रम-कर्म का वृत्तान्त मन्त्रियों को सुनाया।
श्लोक 40 (yuddha.128.40)
श्रुत्वा च विस्मयन् जग्मुरयोध्यापुरवासिनः। वानराणां च तत्कर्म राक्षसानां च तद्बलम् ॥ 128.40 ॥
śrutvā ca vismayan jagmurayodhyāpuravāsinaḥ| vānarāṇāṃ ca tatkarma rākṣasānāṃ ca tadbalam || 128.40 ||
यह सुनकर अयोध्यानगरी के निवासी विस्मित होकर चले, वानरों के उस पराक्रम और राक्षसों की उस विशाल सेना का वृत्तान्त सुनकर।
श्लोक 41 (yuddha.128.41)
विभीषणस्य संयोगमाचचक्षेऽथ मन्त्रिणाम्। द्युतिमानेतदाख्याय रामो वानरसन्वृतः ॥ 128.41 ॥
vibhīṣaṇasya saṃyogamācacakṣe'tha mantriṇām| dyutimānetadākhyāya rāmo vānarasanvṛtaḥ || 128.41 ||
तेजस्वी राम ने, वानरों से घिरे हुए, विभीषण के साथ अपने मिलन का वृत्तान्त भी मन्त्रियों को कह सुनाया,
श्लोक 42 (yuddha.128.42)
हृष्टपुष्टजनाकीर्णामयोध्यां प्रविवेश ह। ततो ह्यभ्युच्छ्रयन्पौराः पताकास्ते गृहे गृहे ॥ 128.42 ॥
hṛṣṭapuṣṭajanākīrṇāmayodhyāṃ praviveśa ha| tato hyabhyucchrayanpaurāḥ patākāste gṛhe gṛhe || 128.42 ||
और इस प्रकार कहते हुए, हर्षित तथा समृद्ध जनों से भरी अयोध्या में प्रविष्ट हुए। तब नगरवासियों ने घर-घर पर पताकाएँ फहरा दीं।
श्लोक 43 (yuddha.128.43)
ऐक्ष्वाकाध्युषितन् रम्यमाससाद पितुर्गृहम्। अथाब्रवीद्राजपुत्रो भरतं धर्मिणां वरम् ॥ 128.43 ॥
aikṣvākādhyuṣitan ramyamāsasāda piturgṛham| athābravīdrājaputro bharataṃ dharmiṇāṃ varam || 128.43 ||
इक्ष्वाकुओं के निवास वाले उस रमणीय पितृ-भवन में राम पहुँचे। तब उस राजकुमार ने धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भरत से कहा —
श्लोक 44 (yuddha.128.44)
अर्थोपहितया वाचा मधुरं रघुनन्दनः। पितुर्भवनमासाद्य प्रविश्य च महात्मनः ॥ 128.44 ॥
arthopahitayā vācā madhuraṃ raghunandanaḥ| piturbhavanamāsādya praviśya ca mahātmanaḥ || 128.44 ||
रघुनन्दन ने अर्थपूर्ण, मधुर वाणी में, पिता के उस महात्मा-भवन में पहुँचकर और प्रवेश करके,
श्लोक 45 (yuddha.128.45)
कौसल्यान् च सुमित्रां च कैकेयीं चाभ्यवादयत्। तच्च मद्भवनन् श्रेष्ठं साशोकवनिकं महत् ॥ 128.45 ॥
kausalyān ca sumitrāṃ ca kaikeyīṃ cābhyavādayat| tacca madbhavanan śreṣṭhaṃ sāśokavanikaṃ mahat || 128.45 ||
कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी को प्रणाम किया। फिर कहा — "मेरा वह श्रेष्ठ भवन, जो अशोक-वाटिका सहित विशाल है,
श्लोक 46 (yuddha.128.46)
मुक्तावैदूर्यसङ्कीर्णन् सुग्रीवस्य निवेदय। तस्य तद्वचनन् श्रुत्वा भरतः सत्यविक्रमः ॥ 128.46 ॥
muktāvaidūryasaṅkīrṇan sugrīvasya nivedaya| tasya tadvacanan śrutvā bharataḥ satyavikramaḥ || 128.46 ||
मोतियों और वैदूर्य मणियों से सुसज्जित है, वह सुग्रीव को निवास हेतु सौंप दो।" उसका यह वचन सुनकर, सत्यपराक्रमी भरत ने,
श्लोक 47 (yuddha.128.47)
हस्ते गृहीत्वा सुग्रीवं प्रविवेश तमालयम्। ततस्तैलप्रदीपांश्च पर्यङ्कास्तरणानि च ॥ 128.47 ॥
haste gṛhītvā sugrīvaṃ praviveśa tamālayam| tatastailapradīpāṃśca paryaṅkāstaraṇāni ca || 128.47 ||
सुग्रीव का हाथ थामकर उन्हें उसी भवन में ले गए। तब शत्रुघ्न की प्रेरणा से लोगों ने शीघ्रता से तेल के दीपक और शय्या-आस्तरण भी,
श्लोक 48 (yuddha.128.48)
गृहीत्वा विविशुः क्षिप्रं शत्रुघ्नेन प्रचोदिताः। उवाच च महातेजाः सुग्रीवन् राघवानुजः ॥ 128.48 ॥
gṛhītvā viviśuḥ kṣipraṃ śatrughnena pracoditāḥ| uvāca ca mahātejāḥ sugrīvan rāghavānujaḥ || 128.48 ||
वहाँ लाकर रख दिए। और तब महातेजस्वी राघवानुज (लक्ष्मण) ने सुग्रीव से कहा —
श्लोक 49 (yuddha.128.49)
अभिषेकाय रामस्य दूतानाज्ञापय प्रभो। सौवर्णान्वानरेन्द्राणान् चतुर्णां चतुरो घटान् ॥ 128.49 ॥
abhiṣekāya rāmasya dūtānājñāpaya prabho| sauvarṇānvānarendrāṇān caturṇāṃ caturo ghaṭān || 128.49 ||
"हे प्रभु, राम के अभिषेक के लिए दूतों को आज्ञा दीजिए।" तब सुग्रीव ने चारों समुद्रों के जल हेतु सुवर्ण के चार घड़े,
श्लोक 50 (yuddha.128.50)
ददौ क्षिप्रन् स सुग्रीवः सर्वरत्नविभूषितान्। यथा प्रत्यूषसमये चतुर्णान् सागराम्भसाम् ॥ 128.50 ॥
dadau kṣipran sa sugrīvaḥ sarvaratnavibhūṣitān| yathā pratyūṣasamaye caturṇān sāgarāmbhasām || 128.50 ||
सर्वरत्नों से विभूषित, तुरन्त दे दिए, और कहा — "प्रातःकाल के समय चारों समुद्रों के जल को,
श्लोक 51 (yuddha.128.51)
पूर्णैर्घटैः प्रतीक्षध्वन् तथा कुरुत वानराः। एवमुक्ता महात्मानो वानरा वारणोपमाः ॥ 128.51 ॥
pūrṇairghaṭaiḥ pratīkṣadhvan tathā kuruta vānarāḥ| evamuktā mahātmāno vānarā vāraṇopamāḥ || 128.51 ||
भरे हुए घड़ों सहित प्रतीक्षा करो; हे वानरो, ऐसा ही करो।" इस प्रकार आदेश पाकर, हाथी के समान महाबली वे महात्मा वानर,
श्लोक 52 (yuddha.128.52)
उत्पेतुर्गगनन् शीघ्रन् गरुडा इव शीघ्रगाः। जाम्बवांश्च हनूमांश्च वेगदर्शी च वानरः ॥ 128.52 ॥
utpeturgaganan śīghran garuḍā iva śīghragāḥ| jāmbavāṃśca hanūmāṃśca vegadarśī ca vānaraḥ || 128.52 ||
शीघ्रगामी गरुड़ों के समान वेग से आकाश में उड़ चले। जाम्बवान्, हनुमान, वेगदर्शी नामक वानर,
श्लोक 53 (yuddha.128.53)
ऋषभश्चैव कलशाञ्जलपूर्णानथानयन्। नदीशतानां पञ्चानान् जले कुम्भैरुपाहरन् ॥ 128.53 ॥
ṛṣabhaścaiva kalaśāñjalapūrṇānathānayan| nadīśatānāṃ pañcānān jale kumbhairupāharan || 128.53 ||
और ऋषभ भी, जल से भरे कलश ले आए; उन्होंने पाँच सौ नदियों के जल को भी घड़ों में भरकर ला दिया।
श्लोक 54 (yuddha.128.54)
पूर्वात्समुद्रात्कलशन् जलपूर्णमथानयत्। सुषेणः सत्त्वसम्पन्नः सर्वरत्नविभूषितम् ॥ 128.54 ॥
pūrvātsamudrātkalaśan jalapūrṇamathānayat| suṣeṇaḥ sattvasampannaḥ sarvaratnavibhūṣitam || 128.54 ||
बलशाली सुषेण ने पूर्वी समुद्र से जल-भरा कलश, सर्वरत्नों से विभूषित, ला दिया।
श्लोक 55 (yuddha.128.55)
ऋषभो दक्षिणात्तूर्णन् समुद्राज्जलमाहरत्। रक्तचन्दनकर्पूरैः सन्वृतन् काञ्चनं घटम् ॥ 128.55 ॥
ṛṣabho dakṣiṇāttūrṇan samudrājjalamāharat| raktacandanakarpūraiḥ sanvṛtan kāñcanaṃ ghaṭam || 128.55 ||
ऋषभ ने दक्षिण समुद्र से शीघ्रता से जल लाया, लाल चन्दन और कर्पूर से सुसज्जित उस स्वर्ण-घट में।
श्लोक 56 (yuddha.128.56)
गवयः पश्चिमात्तोयमाजहार महार्णवात्। रत्नकुम्भेन महता शीतं मारुतविक्रमः ॥ 128.56 ॥
gavayaḥ paścimāttoyamājahāra mahārṇavāt| ratnakumbhena mahatā śītaṃ mārutavikramaḥ || 128.56 ||
वायु के समान पराक्रमी गवय ने पश्चिमी महासागर से, रत्नजड़ित विशाल कलश में शीतल जल लाया।
श्लोक 57 (yuddha.128.57)
उत्तराच्च जलन् शीघ्रन् गरुडानिलविक्रमः। आजहार स धर्मात्मा नलः सर्वगुणान्वितः ॥ 128.57 ॥
uttarācca jalan śīghran garuḍānilavikramaḥ| ājahāra sa dharmātmā nalaḥ sarvaguṇānvitaḥ || 128.57 ||
गरुड़ और वायु के समान पराक्रमी, सर्वगुणसम्पन्न धर्मात्मा नल उत्तर दिशा से शीघ्रता से जल ले आए।
श्लोक 58 (yuddha.128.58)
ततसैर्वानरश्रेष्ठैरानीतं प्रेक्ष्य तज्जलम्। अभिषेकाय रामस्य शत्रुघ्नः सचिवैः सह ॥ 128.58 ॥
tatasairvānaraśreṣṭhairānītaṃ prekṣya tajjalam| abhiṣekāya rāmasya śatrughnaḥ sacivaiḥ saha || 128.58 ||
उन श्रेष्ठ वानरों द्वारा लाए गए उस जल को देखकर, मन्त्रियों सहित शत्रुघ्न ने राम के अभिषेक के लिए,
श्लोक 59 (yuddha.128.59)
पुरोहिताय श्रेष्ठाय सुहृद्भ्यश् च न्यवेदयत्। ततः स प्रयतो वृद्धो वसिष्ठो ब्राह्मणैः सह ॥ 128.59 ॥
purohitāya śreṣṭhāya suhṛdbhyaś ca nyavedayat| tataḥ sa prayato vṛddho vasiṣṭho brāhmaṇaiḥ saha || 128.59 ||
उसे श्रेष्ठ पुरोहित और मित्रों को सौंप दिया। तब वह पवित्र, वृद्ध वसिष्ठ ब्राह्मणों सहित,
श्लोक 60 (yuddha.128.60)
रामन् रत्नमयो पीठे सहसीतं न्यवेशयत्। वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिरथ काश्यपः ॥ 128.60 ॥
rāman ratnamayo pīṭhe sahasītaṃ nyaveśayat| vasiṣṭho vāmadevaśca jābāliratha kāśyapaḥ || 128.60 ||
रत्नजड़ित सिंहासन पर राम को सीता सहित बिठाया। वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, काश्यप,
श्लोक 61 (yuddha.128.61)
कात्यायनः सुयज्ञश्च गौतमो विजयस्तथा। अभ्यषिञ्चन्नरव्याघ्रं प्रसन्नेन सुगन्धिना ॥ 128.61 ॥
kātyāyanaḥ suyajñaśca gautamo vijayastathā| abhyaṣiñcannaravyāghraṃ prasannena sugandhinā || 128.61 ||
कात्यायन, सुयज्ञ, गौतम और विजय भी — इन सबने उस नरश्रेष्ठ का अभिषेक स्वच्छ, सुगन्धित जल से किया,
श्लोक 62 (yuddha.128.62)
सलिलेन सहस्राक्षन् वसवो वासवं यथा। ऋत्विग्भिर्ब्राह्मणैः पूर्वन् कन्याभिर्मन्त्रिभिस्तथा ॥ 128.62 ॥
salilena sahasrākṣan vasavo vāsavaṃ yathā| ṛtvigbhirbrāhmaṇaiḥ pūrvan kanyābhirmantribhistathā || 128.62 ||
जैसे वसुगण सहस्राक्ष इन्द्र का अभिषेक करते हैं। पहले ऋत्विजों और ब्राह्मणों ने, फिर कन्याओं और मन्त्रियों ने भी,
श्लोक 63 (yuddha.128.63)
योधैश्चैवाभ्यषिञ्चन्स्ते सम्प्रहृष्टाः सनैगमैः। सर्वौषधिरसैश्चापि दैवतैर्नभसि स्थितैः ॥ 128.63 ॥
yodhaiścaivābhyaṣiñcanste samprahṛṣṭāḥ sanaigamaiḥ| sarvauṣadhirasaiścāpi daivatairnabhasi sthitaiḥ || 128.63 ||
और योद्धाओं ने भी, व्यापारियों सहित प्रसन्नतापूर्वक उनका अभिषेक किया — सभी औषधियों के रस से, और आकाश में स्थित देवताओं ने भी,
श्लोक 64 (yuddha.128.64)
चतुर्हिर्लोकपालैश्च सर्वैर्देवैश्च सङ्गतैः। ब्रह्मणा निर्मितं पूर्वं किरीटं रत्नशोभितम् ॥ 128.64 ॥
caturhirlokapālaiśca sarvairdevaiśca saṅgataiḥ| brahmaṇā nirmitaṃ pūrvaṃ kirīṭaṃ ratnaśobhitam || 128.64 ||
चारों लोकपालों और समस्त एकत्रित देवताओं ने भी। ब्रह्मा द्वारा पहले रचा गया, रत्नों से देदीप्यमान वह मुकुट,
श्लोक 65 (yuddha.128.65)
अभिषिक्तः पुरा येन मनुस्तं दीप्ततेजसम्। तस्यान्ववाये राजानः क्रमाद्येनाभिषेचिताः ॥ 128.65 ॥
abhiṣiktaḥ purā yena manustaṃ dīptatejasam| tasyānvavāye rājānaḥ kramādyenābhiṣecitāḥ || 128.65 ||
जिससे प्राचीन काल में मनु का अभिषेक हुआ था, वही देदीप्यमान मुकुट राम को पहनाया गया; उसी वंश-परम्परा में राजा लोग क्रमशः अभिषिक्त होते आए हैं।
श्लोक 66 (yuddha.128.66)
सभायां हेमक्लुप्तायां शोभितायां महाधनैः। रत्नैर्नानाविधैश्चैव चित्रितायां सुशोभनैः ॥ 128.66 ॥
sabhāyāṃ hemakluptāyāṃ śobhitāyāṃ mahādhanaiḥ| ratnairnānāvidhaiścaiva citritāyāṃ suśobhanaiḥ || 128.66 ||
स्वर्ण से रचित, महान् धन और विविध रत्नों से सुशोभित, अत्यन्त सुन्दर चित्रों से अलंकृत उस सभा-भवन में,
श्लोक 67 (yuddha.128.67)
नानारत्नमये पीठे कल्पयित्वा यथाविधि। किरीटेन ततः पश्चाद्वसिष्ठेन महात्मना ॥ 128.67 ॥
nānāratnamaye pīṭhe kalpayitvā yathāvidhi| kirīṭena tataḥ paścādvasiṣṭhena mahātmanā || 128.67 ||
नाना रत्नों से जड़े सिंहासन पर विधिपूर्वक बिठाकर, तत्पश्चात् महात्मा वसिष्ठ ने,
श्लोक 68 (yuddha.128.68)
ऋत्विग्भिर्भूषणैश्चैव समयोक्ष्यत राघवः। छत्रं तस्य च जग्राह शत्रुघ्नः पाण्डुरन् शुभम् ॥ 128.68 ॥
ṛtvigbhirbhūṣaṇaiścaiva samayokṣyata rāghavaḥ| chatraṃ tasya ca jagrāha śatrughnaḥ pāṇḍuran śubham || 128.68 ||
राघव को मुकुट, ऋत्विजों द्वारा दिए गए आभूषणों सहित सुसज्जित किया। शत्रुघ्न ने उनका श्वेत, शुभ छत्र धारण किया,
श्लोक 69 (yuddha.128.69)
श्वेतन् च वालव्यजनन् सुग्रीवो वानरेश्वरः। अपरन् चन्द्रसङ्काशन् राक्षसेन्द्रो विभीषणः ॥ 128.69 ॥
śvetan ca vālavyajanan sugrīvo vānareśvaraḥ| aparan candrasaṅkāśan rākṣasendro vibhīṣaṇaḥ || 128.69 ||
वानरेश्वर सुग्रीव ने श्वेत चँवर, और राक्षसेन्द्र विभीषण ने चन्द्रमा के समान दूसरा चँवर धारण किया।
श्लोक 70 (yuddha.128.70)
मालान् ज्वलन्तीन् वपुषा काञ्चनीं शतपुष्कराम्। राघवाय ददौ वायुर्वासवेन प्रचोदितः ॥ 128.70 ॥
mālān jvalantīn vapuṣā kāñcanīṃ śatapuṣkarām| rāghavāya dadau vāyurvāsavena pracoditaḥ || 128.70 ||
इन्द्र द्वारा प्रेरित होकर वायुदेव ने, स्वयं अपनी कान्ति से देदीप्यमान, सौ पंखुड़ियों वाली सुवर्ण-माला राघव को अर्पित की।
श्लोक 71 (yuddha.128.71)
सर्वरत्नसमायुक्तं मणिरत्नविभूषितम्। मुक्ताहारं नरेन्द्राय ददौ शक्रप्रचोदितः ॥ 128.71 ॥
sarvaratnasamāyuktaṃ maṇiratnavibhūṣitam| muktāhāraṃ narendrāya dadau śakrapracoditaḥ || 128.71 ||
इन्द्र से प्रेरित होकर उसने ही सर्वरत्न-संयुक्त, मणि-रत्नों से विभूषित एक मुक्ता-हार भी उस नरेन्द्र को अर्पित किया।
श्लोक 72 (yuddha.128.72)
प्रजगुर्देवगन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरो गणाः। अभिषेके तदर्हस्य तदा रामस्य धीमतः ॥ 128.72 ॥
prajagurdevagandharvā nanṛtuścāpsaro gaṇāḥ| abhiṣeke tadarhasya tadā rāmasya dhīmataḥ || 128.72 ||
उस योग्य, बुद्धिमान् राम के अभिषेक के अवसर पर देवगन्धर्वों ने गीत गाए और अप्सराओं के समूहों ने नृत्य किया।
श्लोक 73 (yuddha.128.73)
भूमिः सस्यवती चैव फलवन्तश्च पादपाः। गन्धवन्ति च पुष्पाणि बभूवू राघवोत्सवे ॥ 128.73 ॥
bhūmiḥ sasyavatī caiva phalavantaśca pādapāḥ| gandhavanti ca puṣpāṇi babhūvū rāghavotsave || 128.73 ||
राघव के उस उत्सव में पृथ्वी शस्य-सम्पन्न हो उठी, वृक्ष फलों से लद गए, और पुष्प सुगन्ध से भर उठे।
श्लोक 74 (yuddha.128.74)
सहस्रशतमश्वानान् धेनूनां च गवां तथा। ददौ शतन् वृषान्पूर्वन् द्विजेभ्यो मनुजर्षभः ॥ 128.74 ॥
sahasraśatamaśvānān dhenūnāṃ ca gavāṃ tathā| dadau śatan vṛṣānpūrvan dvijebhyo manujarṣabhaḥ || 128.74 ||
नरश्रेष्ठ राम ने ब्राह्मणों को एक लाख घोड़े, उतनी ही गौएँ, और सौ श्रेष्ठ बैल भी दान में दिए।
श्लोक 75 (yuddha.128.75)
त्रिंशत्कोटीर्हिरण्यस्य ब्राह्मणेभ्यो ददौ पुनः। नानाभरणवस्त्राणि महार्हाणि च राघवः ॥ 128.75 ॥
triṃśatkoṭīrhiraṇyasya brāhmaṇebhyo dadau punaḥ| nānābharaṇavastrāṇi mahārhāṇi ca rāghavaḥ || 128.75 ||
राघव ने ब्राह्मणों को तीस करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ भी पुनः दान कीं, और नाना प्रकार के बहुमूल्य आभूषण तथा वस्त्र भी।
श्लोक 76 (yuddha.128.76)
अर्करश्मिप्रतीकाशान् काञ्चनीं मणिविग्रहाम्। सुग्रीवाय स्रजन् दिव्यां प्रायच्छन्मनुजर्षभः ॥ 128.76 ॥
arkaraśmipratīkāśān kāñcanīṃ maṇivigrahām| sugrīvāya srajan divyāṃ prāyacchanmanujarṣabhaḥ || 128.76 ||
नरश्रेष्ठ राम ने सुग्रीव को सूर्यकिरणों के समान चमकती हुई, सुवर्ण और मणियों से रचित एक दिव्य माला भेंट की।
श्लोक 77 (yuddha.128.77)
वैदूर्यमणिचित्रे च वज्ररत्नविभूषिते। वालिपुत्राय धृतिमानङ्गदायाङ्गदे ददौ ॥ 128.77 ॥
vaidūryamaṇicitre ca vajraratnavibhūṣite| vāliputrāya dhṛtimānaṅgadāyāṅgade dadau || 128.77 ||
और धैर्यवान् वालिपुत्र अंगद को उन्होंने वैदूर्य मणियों से चित्रित, वज्र-रत्नों से विभूषित एक बाजूबन्द भेंट किया।
श्लोक 78 (yuddha.128.78)
मणिप्रवरजुष्टन् च मुक्ताहारमनुत्तमम्। सीतायै प्रददौ रामश्चन्द्ररश्मिसमप्रभम् ॥ 128.78 ॥
maṇipravarajuṣṭan ca muktāhāramanuttamam| sītāyai pradadau rāmaścandraraśmisamaprabham || 128.78 ||
और राम ने सीता को श्रेष्ठ मणियों से युक्त, चन्द्रकिरणों के समान कान्तिमान्, अनुपम मुक्ता-हार भेंट किया।
श्लोक 79 (yuddha.128.79)
अरजे वाससी दिव्ये शुभान्याभरणानि च। अवेक्षमाणा वैदेही प्रददौ वायुसूनवे ॥ 128.79 ॥
araje vāsasī divye śubhānyābharaṇāni ca| avekṣamāṇā vaidehī pradadau vāyusūnave || 128.79 ||
वैदेही ने भी, चारों ओर सबको निहारते हुए, उज्ज्वल दिव्य वस्त्र और शुभ आभूषण वायुपुत्र (हनुमान) को अर्पित किए।
श्लोक 80 (yuddha.128.80)
अवमुच्यात्मनः कण्ठाद्धारन् जनकनन्दिनी। अवैक्षत हरीन्सर्वान्भर्तारन् च मुहुर्मुहुः ॥ 128.80 ॥
avamucyātmanaḥ kaṇṭhāddhāran janakanandinī| avaikṣata harīnsarvānbhartāran ca muhurmuhuḥ || 128.80 ||
जनकनन्दिनी ने अपने ही कण्ठ से वह हार उतार लिया, और बार-बार समस्त वानरों को तथा अपने पति को निहारने लगीं।
श्लोक 81 (yuddha.128.81)
तामिङ्गितज्ञः सम्प्रेक्ष्य बभाषे जनकात्मजाम्। प्रदेहि सुभगे हारन् यस्य तुष्टासि भामिनि ॥ 128.81 ॥
tāmiṅgitajñaḥ samprekṣya babhāṣe janakātmajām| pradehi subhage hāran yasya tuṣṭāsi bhāmini || 128.81 ||
उनके भावों को समझने वाले राम ने जनकात्मजा को देखकर कहा — "हे शुभे, हे भामिनी! जिससे तुम प्रसन्न हो, उसी को यह हार दे दो —
श्लोक 82 (yuddha.128.82)
तेजो धृतिर्यशो दाक्ष्यं सामर्थ्यं विनयो नयः। पौरुषन् विक्रमो बुद्धिर्यस्मिन्नेतानि नित्यदा ॥ 128.82 ॥
tejo dhṛtiryaśo dākṣyaṃ sāmarthyaṃ vinayo nayaḥ| pauruṣan vikramo buddhiryasminnetāni nityadā || 128.82 ||
तेज, धैर्य, यश, दक्षता, सामर्थ्य, विनय, नीति, पुरुषार्थ, पराक्रम और बुद्धि — जिसमें ये सब गुण सदा विद्यमान हों, उसी को दो।"
श्लोक 83 (yuddha.128.83)
ददौ सा वायुपुत्राय तन् हारमसितेक्षणा। हनूमान्स्तेन हारेण शुशुभे वानरर्षभः ॥ 128.83 ॥
dadau sā vāyuputrāya tan hāramasitekṣaṇā| hanūmānstena hāreṇa śuśubhe vānararṣabhaḥ || 128.83 ||
काली आँखों वाली सीता ने वह हार वायुपुत्र (हनुमान) को ही दे दिया। उस हार से वानरश्रेष्ठ हनुमान अत्यन्त सुशोभित हुए,
श्लोक 84 (yuddha.128.84)
चन्द्रांशुचयगौरेण श्वेताभ्रेण यथाचलः। सर्वे वानरवृद्धाश्च ये चान्ये वानरोत्तमाः ॥ 128.84 ॥
candrāṃśucayagaureṇa śvetābhreṇa yathācalaḥ| sarve vānaravṛddhāśca ye cānye vānarottamāḥ || 128.84 ||
जैसे चन्द्रमा की किरणों के समूह से श्वेत बादल से आच्छादित कोई पर्वत। समस्त वृद्ध वानर और अन्य श्रेष्ठ वानर भी,
श्लोक 85 (yuddha.128.85)
वासोभिर्भूषणैश्चैव यथार्हं प्रतिपूजिताः। ततो द्विविद मैन्दाभ्यां नीलाय च परन्तपः ॥ 128.85 ॥
vāsobhirbhūṣaṇaiścaiva yathārhaṃ pratipūjitāḥ| tato dvivida maindābhyāṃ nīlāya ca parantapaḥ || 128.85 ||
वस्त्रों और आभूषणों से यथोचित सम्मानित हुए। तत्पश्चात् शत्रुतापन राम ने द्विविद और मैन्द को, तथा नील को भी,
श्लोक 86 (yuddha.128.86)
सर्वान्कामगुणान्वीक्ष्य प्रददौ वसुधाधिपः। विभीषणोऽथ सुग्रीवो हनुमान् जाम्बवांस्तथा ॥ 128.86 ॥
sarvānkāmaguṇānvīkṣya pradadau vasudhādhipaḥ| vibhīṣaṇo'tha sugrīvo hanumān jāmbavāṃstathā || 128.86 ||
उनकी सभी अभिलषित विशेषताएँ देखकर, उस भूपति ने उन्हें भी दान दिया। विभीषण, सुग्रीव, हनुमान, जाम्बवान् भी,
श्लोक 87 (yuddha.128.87)
सर्ववानरवृद्धाश्च रामेणाक्लिष्टकर्मणा। यथार्हं पूजिताः सर्वे कामै रत्नैश्च पुष्कलैर् ॥ 128.87 ॥
sarvavānaravṛddhāśca rāmeṇākliṣṭakarmaṇā| yathārhaṃ pūjitāḥ sarve kāmai ratnaiśca puṣkalair || 128.87 ||
और समस्त वृद्ध वानर भी, अथक कर्मी राम द्वारा यथायोग्य, इच्छित वस्तुओं और प्रचुर रत्नों से सम्मानित हुए।
श्लोक 88 (yuddha.128.88)
प्रहृष्टमनसः सर्वे जग्मुरेव यथागतम्। नत्वा सर्वे महात्मानस्ततस्ते वानरर्षभाः ॥ 128.88 ॥
prahṛṣṭamanasaḥ sarve jagmureva yathāgatam| natvā sarve mahātmānastataste vānararṣabhāḥ || 128.88 ||
प्रसन्न मन से वे सब जिस मार्ग से आए थे उसी मार्ग से लौट गए। तत्पश्चात् वे समस्त महात्मा वानरश्रेष्ठ, राम को प्रणाम कर,
श्लोक 89 (yuddha.128.89)
विसृष्टाः पार्थिवेन्द्रेण किष्किन्धां समुपागमन्। सुग्रीवो वानरश्रेष्ठो दृष्ट्वा रामाभिषेचनम् ॥ 128.89 ॥
visṛṣṭāḥ pārthivendreṇa kiṣkindhāṃ samupāgaman| sugrīvo vānaraśreṣṭho dṛṣṭvā rāmābhiṣecanam || 128.89 ||
उस भूपति द्वारा विदा किए गए, किष्किन्धा पहुँच गए। वानरश्रेष्ठ सुग्रीव ने राम का वह अभिषेक देखकर,
श्लोक 90 (yuddha.128.90)
पूजितश्चैव रामेण किष्किन्धां प्राविशत्पुरीम्। विभीषणोऽपि ध्र्मात्मा सह रैर्नैरृतर्षभैः ॥ 128.90 ॥
pūjitaścaiva rāmeṇa kiṣkindhāṃ prāviśatpurīm| vibhīṣaṇo'pi dhrmātmā saha rairnairṛtarṣabhaiḥ || 128.90 ||
राम द्वारा सम्मानित होकर, किष्किन्धा नगरी में प्रवेश किया। धर्मात्मा विभीषण भी अपने श्रेष्ठ राक्षस-सैनिकों सहित,
श्लोक 91 (yuddha.128.91)
लब्ध्वा कुलधनं राजा लङ्कां प्रायान् महायशाः। स राज्यमखिलं शासन्निहतारिर्महायशाः ॥ 128.91 ॥
labdhvā kuladhanaṃ rājā laṅkāṃ prāyān mahāyaśāḥ| sa rājyamakhilaṃ śāsannihatārirmahāyaśāḥ || 128.91 ||
अपने कुल-धन को पुनः प्राप्त कर, महायशस्वी राजा लंका की ओर चल पड़े। शत्रुओं को मारकर, महायशस्वी राघव,
श्लोक 92 (yuddha.128.92)
राघवः परमोदारः शशास परया मुदा। उवाच लक्ष्मणं रामो धर्मज्ञं धर्मवत्सलः ॥ 128.92 ॥
rāghavaḥ paramodāraḥ śaśāsa parayā mudā| uvāca lakṣmaṇaṃ rāmo dharmajñaṃ dharmavatsalaḥ || 128.92 ||
अत्यन्त उदार, समस्त राज्य का शासन परम आनन्द के साथ करने लगे। तब धर्मज्ञ, धर्मवत्सल राम ने लक्ष्मण से कहा —
श्लोक 93 (yuddha.128.93)
आतिष्ठ धर्मज्ञ मया सहेमां। गां पूर्वराजाध्युषितां बलेन। तुल्यं मया त्वं पितृभिर्धृता या। तां यौवराज्ये धुरमुद्वहस्व ॥ 128.93 ॥
ātiṣṭha dharmajña mayā sahemāṃ| gāṃ pūrvarājādhyuṣitāṃ balena| tulyaṃ mayā tvaṃ pitṛbhirdhṛtā yā| tāṃ yauvarājye dhuramudvahasva || 128.93 ||
"हे धर्मज्ञ, आप मेरे साथ ही इस पृथ्वी पर शासन करें, जो हमारे पूर्वज राजाओं के बल से बसाई गई है; मेरे पूर्वजों द्वारा जिस प्रकार वह धारण की गई, उसी प्रकार आप भी युवराज-पद का यह भार वहन करें।"
श्लोक 94 (yuddha.128.94)
सर्वात्मना पर्यनुनीयमानो। यदा न सौमित्रिरुपैति योगम्। नियुज्यमानोऽ पि च यावराज्ये। ततोऽभ्यषिञ्चद्भरतं महात्मा ॥ 128.94 ॥
sarvātmanā paryanunīyamāno| yadā na saumitrirupaiti yogam| niyujyamāno' pi ca yāvarājye| tato'bhyaṣiñcadbharataṃ mahātmā || 128.94 ||
किन्तु जब सौमित्रि (लक्ष्मण) ने, हर प्रकार से मनाए जाने पर भी, युवराज-पद स्वीकार करने के लिए सहमति नहीं दी, तब महात्मा राम ने भरत का ही अभिषेक युवराज-पद पर कर दिया।
श्लोक 95 (yuddha.128.95)
पौण्डरीकाश्वमेधाभ्यान् वाजपेयेन चासकृत्। अन्यैश्च विविधैर्यज्ञैरयजत्पार्थिवर्षभः ॥ 128.95 ॥
pauṇḍarīkāśvamedhābhyān vājapeyena cāsakṛt| anyaiśca vividhairyajñairayajatpārthivarṣabhaḥ || 128.95 ||
पुण्डरीक यज्ञ, अश्वमेध यज्ञ, तथा बारंबार वाजपेय यज्ञ और अन्य नाना प्रकार के यज्ञों द्वारा भी उस श्रेष्ठ भूपति ने यजन किया।
श्लोक 96 (yuddha.128.96)
राज्यन् दशसहस्राणि प्राप्य वर्षाणि राघवः। शताश्वमेधानाजह्रे सदश्वान्भूरिदक्षिणान् ॥ 128.96 ॥
rājyan daśasahasrāṇi prāpya varṣāṇi rāghavaḥ| śatāśvamedhānājahre sadaśvānbhūridakṣiṇān || 128.96 ||
दस सहस्र वर्षों तक राज्य करते हुए, राघव ने सौ अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न किए, जिनमें उत्तम अश्व और प्रचुर दक्षिणा दी गई।
श्लोक 97 (yuddha.128.97)
आजानुलम्बिबाहुश्च महास्कन्धः प्रतापवान्। लक्ष्मणानुचरो रामः पृथिवीमन्वपालयत् ॥ 128.97 ॥
ājānulambibāhuśca mahāskandhaḥ pratāpavān| lakṣmaṇānucaro rāmaḥ pṛthivīmanvapālayat || 128.97 ||
घुटनों तक लम्बी भुजाओं वाले, विशाल कन्धों वाले, प्रतापी राम, लक्ष्मण के सहचर होकर पृथ्वी का पालन करने लगे।
श्लोक 98 (yuddha.128.98)
राघवश्चापि धर्मात्मा प्राप्य राज्यमनुत्तमम्। ईजे बहुविधैर्यज्ञैः ससुतभ्रातृबान्धवः ॥ 128.98 ॥
rāghavaścāpi dharmātmā prāpya rājyamanuttamam| īje bahuvidhairyajñaiḥ sasutabhrātṛbāndhavaḥ || 128.98 ||
धर्मात्मा राघव ने भी, अनुपम राज्य को पाकर, अपने पुत्रों, भाइयों और बन्धुजनों सहित बहुविध यज्ञों से यजन किया।
श्लोक 99 (yuddha.128.99)
न पर्यदेवन्विधवा न च व्यालकृतं भयम्। न व्याधिजं भयन् वापि रामे राज्यं प्रशासति ॥ 128.99 ॥
na paryadevanvidhavā na ca vyālakṛtaṃ bhayam| na vyādhijaṃ bhayan vāpi rāme rājyaṃ praśāsati || 128.99 ||
जब राम राज्य का शासन करते थे, तब न कोई विधवा विलाप करती थी, न सर्पों का भय था, और न रोग का भय ही था।
श्लोक 100 (yuddha.128.100)
निर्दस्युरभवल्लोको नानर्थः कन् चिदस्पृशत्। न च स्म वृद्धा बालानां प्रेतकार्याणि कुर्वते ॥ 128.100 ॥
nirdasyurabhavalloko nānarthaḥ kan cidaspṛśat| na ca sma vṛddhā bālānāṃ pretakāryāṇi kurvate || 128.100 ||
संसार डाकुओं से रहित हो गया, कोई अनर्थ किसी को छू भी नहीं पाता था, और वृद्धजनों को बालकों के अन्त्येष्टि-कर्म कभी नहीं करने पड़ते थे।
श्लोक 101 (yuddha.128.101)
सर्वं मुदितमेवासीत्सर्वो धर्मपरोअभवत्। राममेवानुपश्यन्तो नाभ्यहिन्सन्परस्परम् ॥ 128.101 ॥
sarvaṃ muditamevāsītsarvo dharmaparoabhavat| rāmamevānupaśyanto nābhyahinsanparasparam || 128.101 ||
सब कुछ आनन्दमय ही था, सभी धर्मपरायण हो गए थे; सब सदा राम की ओर ही देखते हुए, परस्पर एक-दूसरे को कभी हानि नहीं पहुँचाते थे।
श्लोक 102 (yuddha.128.102)
आसन्वर्षसहस्राणि तथा पुत्रसहस्रिणः। निरामया विशोकाश्च रामे राज्यं प्रशासति ॥ 128.102 ॥
āsanvarṣasahasrāṇi tathā putrasahasriṇaḥ| nirāmayā viśokāśca rāme rājyaṃ praśāsati || 128.102 ||
जब राम राज्य का शासन करते थे, तब लोग हज़ारों वर्षों तक जीवित रहते थे, सहस्रों पुत्रों वाले होते थे, रोगरहित और शोकरहित रहते थे।
श्लोक 103 (yuddha.128.103)
रामो रामो राम इति प्रजानामभवन् कथाः। रामभूतं जगाभूद्रामे राज्यं प्रशासति ॥ 128.103 ॥
rāmo rāmo rāma iti prajānāmabhavan kathāḥ| rāmabhūtaṃ jagābhūdrāme rājyaṃ praśāsati || 128.103 ||
"राम! राम!! राम!!!" — यही प्रजा की कथाओं का विषय बन गया था। जब राम राज्य का शासन करते थे, तब सारा जगत् ही मानो राममय हो उठा था।
श्लोक 104 (yuddha.128.104)
नित्यपुष्पा नित्यफलास्तरवः स्कन्धविस्तृताः। कालवर्षी च पर्जन्यः सुखस्पर्शश्च मारुतः ॥ 128.104 ॥
nityapuṣpā nityaphalāstaravaḥ skandhavistṛtāḥ| kālavarṣī ca parjanyaḥ sukhasparśaśca mārutaḥ || 128.104 ||
वृक्ष सदा पुष्पित और सदा फलदार रहते थे, अपने विशाल स्कन्धों सहित; बादल समय पर ही वर्षा करते थे, और वायु सुखद स्पर्श वाली बहती थी।
श्लोक 105 (yuddha.128.105)
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा लोभविवर्जिताः। स्वकर्मसु प्रवर्तन्ते तुष्ठाः स्वैरेव कर्मभिः ॥ 128.105 ॥
brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śūdrā lobhavivarjitāḥ| svakarmasu pravartante tuṣṭhāḥ svaireva karmabhiḥ || 128.105 ||
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, सभी लोभ से रहित होकर, अपने-अपने कर्मों में प्रवृत्त रहते थे, अपने ही कर्मों से संतुष्ट।
श्लोक 106 (yuddha.128.106)
आसन् प्रजा धर्मपरा रामे शासति नानृताः। सर्वे लक्षणसम्पन्नाः सर्वे धर्मपरायणाः ॥ 128.106 ॥
āsan prajā dharmaparā rāme śāsati nānṛtāḥ| sarve lakṣaṇasampannāḥ sarve dharmaparāyaṇāḥ || 128.106 ||
राम के शासन में प्रजा धर्मपरायण ही रहती थी, कोई असत्य नहीं बोलता था; सभी शुभ लक्षणों से सम्पन्न, सभी धर्म में तत्पर थे।
श्लोक 107 (yuddha.128.107)
दशवर्षसहस्राणि रामो राज्यमकारयत्। धर्मयं यशस्यमायुष्यं राज्ञां च विजाअवहम् ॥ 128.107 ॥
daśavarṣasahasrāṇi rāmo rājyamakārayat| dharmayaṃ yaśasyamāyuṣyaṃ rājñāṃ ca vijāavaham || 128.107 ||
राम ने दस सहस्र वर्षों तक राज्य किया — एक धर्मपूर्ण, यशस्वी, दीर्घायु देने वाला, और राजाओं के लिए विजयदायक राज्य।
श्लोक 108 (yuddha.128.108)
आदिकाव्यमिदं चार्षं पुरा वाल्मीकिना कृतम्। पठेद्यः शृणुयाल्लोके नरः पापात्प्रमुच्यते ॥ 128.108 ॥
ādikāvyamidaṃ cārṣaṃ purā vālmīkinā kṛtam| paṭhedyaḥ śṛṇuyālloke naraḥ pāpātpramucyate || 128.108 ||
इस पवित्र आदिकाव्य को, जो प्राचीन काल में वाल्मीकि द्वारा रचा गया, जो भी मनुष्य संसार में पढ़ता या सुनता है, वह पाप से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 109 (yuddha.128.109)
पुत्रकामश्च पुत्रान्वै धनकामो धनानि च। लभते मनुजो लोके श्रुत्वा रामाभिषेचनम् ॥ 128.109 ॥
putrakāmaśca putrānvai dhanakāmo dhanāni ca| labhate manujo loke śrutvā rāmābhiṣecanam || 128.109 ||
राम के अभिषेक-प्रसंग को सुनकर, पुत्र चाहने वाला मनुष्य पुत्र पाता है, और धन चाहने वाला मनुष्य इस संसार में धन पाता है।
श्लोक 110 (yuddha.128.110)
महीं विजयते राजा रिपूंश्चाप्यधितिष्ठति। राघवेण यथा माता सुमित्रा लक्ष्मणेन च ॥ 128.110 ॥
mahīṃ vijayate rājā ripūṃścāpyadhitiṣṭhati| rāghaveṇa yathā mātā sumitrā lakṣmaṇena ca || 128.110 ||
राजा पृथ्वी पर विजय पाता है और शत्रुओं पर आधिपत्य करता है — जैसे राघव के कारण उनकी माता को, सुमित्रा को लक्ष्मण के कारण,
श्लोक 111 (yuddha.128.111)
भरतेन च कैकेयी जिवपुत्रास्तथा स्त्रियः। भविष्यन्ति सदानन्दाः पुत्रपौत्रसमन्विताः ॥ 128.111 ॥
bharatena ca kaikeyī jivaputrāstathā striyaḥ| bhaviṣyanti sadānandāḥ putrapautrasamanvitāḥ || 128.111 ||
और भरत के कारण कैकेयी को — प्रसन्नता प्राप्त हुई; वैसे ही उनकी स्त्रियाँ भी अपने जीवित पुत्रों सहित, पुत्र-पौत्रों से युक्त होकर सदा आनन्दित रहेंगी।
श्लोक 112 (yuddha.128.112)
श्रुत्वा रामायणमिदं दीर्घमायिश्च विन्दति। रामस्य विजयं चैव सर्वमक्लिष्ठकर्मणः ॥ 128.112 ॥
śrutvā rāmāyaṇamidaṃ dīrghamāyiśca vindati| rāmasya vijayaṃ caiva sarvamakliṣṭhakarmaṇaḥ || 128.112 ||
इस दीर्घ रामायण को सुनकर मनुष्य दीर्घायु भी पाता है, और अथक कर्मी राम की उस विजय को भी सुनकर वह उसे प्राप्त करता है।
श्लोक 113 (yuddha.128.113)
शृणोति य इत्दं काव्यं पुरा वाल्मीकिना कृतम्। श्रद्दधानो जितक्रोधो दुर्गाण्यतितरत्यसौ ॥ 128.113 ॥
śṛṇoti ya itdaṃ kāvyaṃ purā vālmīkinā kṛtam| śraddadhāno jitakrodho durgāṇyatitaratyasau || 128.113 ||
जो कोई श्रद्धावान् और क्रोध पर विजय पाया हुआ मनुष्य, प्राचीन काल में वाल्मीकि द्वारा रचित इस काव्य को सुनता है, वह हर विपत्ति को पार कर जाता है।
श्लोक 114 (yuddha.128.114)
समागम्य प्रवासान्ते रमन्ते सह बान्धवैः। शृण्वन्ति य इदं काव्यं पुरा वाल्मीकिना कृतम् ॥ 128.114 ॥
samāgamya pravāsānte ramante saha bāndhavaiḥ| śṛṇvanti ya idaṃ kāvyaṃ purā vālmīkinā kṛtam || 128.114 ||
प्रवास के अन्त में अपने बन्धुजनों से मिलकर, जो लोग प्राचीन काल में वाल्मीकि द्वारा रचित इस काव्य को सुनते हैं, वे सब आनन्दपूर्वक रमण करते हैं।
श्लोक 115 (yuddha.128.115)
ते प्रार्थितान् वरान् सर्वान् प्राप्नुवन्तीह राघवात्। श्रवणेन सुराः सर्वे प्रीयन्ते संप्रशृण्वताम् ॥ 128.115 ॥
te prārthitān varān sarvān prāpnuvantīha rāghavāt| śravaṇena surāḥ sarve prīyante saṃpraśṛṇvatām || 128.115 ||
वे राघव से अपने समस्त इच्छित वरदान इसी लोक में प्राप्त कर लेते हैं। इसे सुनने वालों को श्रवण मात्र से समस्त देवगण भी प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 116 (yuddha.128.116)
विनायकाश्च शाम्यन्ति गृहे तिष्ठन्ति यस्य वै। विजयेत महीं राजा प्रवासि स्वस्तिमान् भवेत् ॥ 128.116 ॥
vināyakāśca śāmyanti gṛhe tiṣṭhanti yasya vai| vijayeta mahīṃ rājā pravāsi svastimān bhavet || 128.116 ||
जिसके घर में यह काव्य रहता है, वहाँ विघ्न शान्त हो जाते हैं; राजा पृथ्वी पर विजय पाता है, और प्रवासी सकुशल रहता है।
श्लोक 117 (yuddha.128.117)
स्त्रियो रजस्वलाः श्रुत्वा पुत्रान् सूयुरनुत्तमान्। पूजयंश्च पठंश्चनमितिहासं पुरातनम् ॥ 128.117 ॥
striyo rajasvalāḥ śrutvā putrān sūyuranuttamān| pūjayaṃśca paṭhaṃścanamitihāsaṃ purātanam || 128.117 ||
रजस्वला स्त्रियाँ भी इसे सुनकर उत्तम पुत्रों को जन्म देती हैं; इस प्राचीन इतिहास का आदरपूर्वक पाठ और श्रवण करते हुए —
श्लोक 118 (yuddha.128.118)
प्रणम्य शिरसा नित्यं श्रोतव्यं क्षत्रियैर्द्विजात् ॥ 128.118 ॥
praṇamya śirasā nityaṃ śrotavyaṃ kṣatriyairdvijāt || 128.118 ||
इसे सिर झुकाकर सदा प्रणाम कर, क्षत्रियों को द्विज (ब्राह्मण) के मुख से इसे श्रवण करना चाहिए।
श्लोक 119 (yuddha.128.119)
ऐश्वर्यं पुत्रलाभश्च भविष्यति न संशयः। रामायणमिदं कृत्स्नं शृण्वतः पठतः सदा ॥ 128.119 ॥
aiśvaryaṃ putralābhaśca bhaviṣyati na saṃśayaḥ| rāmāyaṇamidaṃ kṛtsnaṃ śṛṇvataḥ paṭhataḥ sadā || 128.119 ||
इससे उन्हें ऐश्वर्य और पुत्र-प्राप्ति होगी, इसमें कोई संशय नहीं। इस सम्पूर्ण रामायण को जो सदा सुनता और पढ़ता है,
श्लोक 120 (yuddha.128.120)
प्रीयते सततं रामः सहि मिष्णुः सनातनः। आदिदेवो महाबाहुर्हरिर्नारायणः प्रभुः ॥ 128.120 ॥
prīyate satataṃ rāmaḥ sahi miṣṇuḥ sanātanaḥ| ādidevo mahābāhurharirnārāyaṇaḥ prabhuḥ || 128.120 ||
उस पर विष्णु, सनातन, आदिदेव, महाबाहु, हरि, नारायण प्रभु — वे सदा प्रसन्न रहते हैं।
श्लोक 121 (yuddha.128.121)
साक्षाद्रामो रघुश्रेष्ठः शेषो लक्ष्मण उच्यते। एवमेतत्पुरावृत्तमाख्यानं भद्रमस्तु वः ॥ 128.121 ॥
sākṣādrāmo raghuśreṣṭhaḥ śeṣo lakṣmaṇa ucyate| evametatpurāvṛttamākhyānaṃ bhadramastu vaḥ || 128.121 ||
साक्षात् राम ही रघुकुल में श्रेष्ठ हैं, और शेषनाग को ही लक्ष्मण कहा जाता है। यह प्राचीन आख्यान इस प्रकार है — आप सबका कल्याण हो।
श्लोक 122 (yuddha.128.122)
प्रव्याहरत विस्रब्धं बलं विष्णोः प्रवर्धताम्। देवाश्च सर्वे तुष्यन्ति ग्रहणाच्छ्रवणात्तथा ॥ 128.122 ॥
pravyāharata visrabdhaṃ balaṃ viṣṇoḥ pravardhatām| devāśca sarve tuṣyanti grahaṇācchravaṇāttathā || 128.122 ||
निःसंकोच होकर इसका पाठ करें, विष्णु की शक्ति इससे बढ़े; और इसके ग्रहण तथा श्रवण से समस्त देवगण भी प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 123 (yuddha.128.123)
रामायणस्य श्रवणे तुष्यन्ति पितरः सदा। भक्त्या रामस्य ये चेमां संहितामृषिणा कृताम् ॥ 128.123 ॥
rāmāyaṇasya śravaṇe tuṣyanti pitaraḥ sadā| bhaktyā rāmasya ye cemāṃ saṃhitāmṛṣiṇā kṛtām || 128.123 ||
रामायण के श्रवण से पितृगण सदा प्रसन्न होते हैं। जो भक्तिपूर्वक ऋषि (वाल्मीकि) द्वारा रचित इस संहिता को —
श्लोक 124 (yuddha.128.124)
ये लिखन्तीह च नरास्तेषां वासस्त्रिविष्टपे। कुटुम्बवृद्धिं धनधान्यवृद्धिं। स्त्रियश्च मुख्याः सुखमुत्तमं च। श्रुत्वा शुभं काव्यमिदं महार्थं। प्राप्नोति सर्वां भुवि चार्थसिद्धिम् ॥ 128.124 ॥
ye likhantīha ca narāsteṣāṃ vāsastriviṣṭape| kuṭumbavṛddhiṃ dhanadhānyavṛddhiṃ| striyaśca mukhyāḥ sukhamuttamaṃ ca| śrutvā śubhaṃ kāvyamidaṃ mahārthaṃ| prāpnoti sarvāṃ bhuvi cārthasiddhim || 128.124 ||
यहाँ जो मनुष्य इसे लिख भी लेते हैं, उनका निवास स्वर्गलोक में होता है। परिवार की वृद्धि, धन-धान्य की वृद्धि, और श्रेष्ठ स्त्रियाँ तथा परम सुख — यह महान् अर्थपूर्ण शुभ काव्य सुनकर, मनुष्य पृथ्वी पर समस्त अर्थ-सिद्धि प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 125 (yuddha.128.125)
आयुष्यमारोग्यकरं यशस्यं। सौभ्रातृकं बुद्धिकरं शुभं च। श्रोतव्यमेतन्नियमेन सद्भि। राख्यानमोजस्करमृद्धिकामैः ॥ 128.125 ॥
āyuṣyamārogyakaraṃ yaśasyaṃ| saubhrātṛkaṃ buddhikaraṃ śubhaṃ ca| śrotavyametanniyamena sadbhi| rākhyānamojaskaramṛddhikāmaiḥ || 128.125 ||
यह आयु, आरोग्य और यश प्रदान करने वाला है, भ्रातृ-प्रेम बढ़ाने वाला, बुद्धि देने वाला और कल्याणकारी है; यह वृद्धिकामी सज्जनों द्वारा सदा नियमपूर्वक सुना जाने योग्य है — यह ओजस्वी आख्यान, समृद्धि की इच्छा रखने वालों के लिए।