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युद्धकाण्ड · सर्ग 28

शुक द्वारा वानर सेनापतियों का शेष परिचय

सर्ग 27सर्ग-सूचीसर्ग 29

श्लोक 1 (yuddha.28.1)

सारणस्य वचः श्रुत्वा रावणं राक्षसाधिपम् । बलमादिश्य तत्सर्वं शुको वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ६-२८-१ ॥

sāraṇasya vacaḥ śrutvā rāvaṇaṃ rākṣasādhipam | balam ādiśya tat sarvaṃ śuko vākyam athābravīt || 6-28-1 ||

सारण के वचन सुनकर, राक्षसाधिपति रावण को उस सम्पूर्ण वानर-सेना की ओर संकेत करते हुए शुक ने यह वचन कहा।

श्लोक 2 (yuddha.28.2)

स्थितान् पश्यसि यानेतान् मत्तानिव महाद्विपान् । न्यग्रोधानिव गाङ्गेयान् सालान् हैमवतानिव ॥ ६-२८-२ ॥

sthitān paśyasi yān etān mattān iva mahādvipān | nyagrodhān iva gāṅgeyān sālān haimavatān iva || 6-28-2 ||

जिन्हें तुम खड़ा देख रहे हो, वे मानो मतवाले महागज हैं, या गंगातट के न्यग्रोध वृक्ष, या हिमालय के साल वृक्ष हैं।

श्लोक 3 (yuddha.28.3)

एते दुष्प्रसहा राजन् बलिनः कामरूपिणः । दैत्यदानवसंकाशा युद्धे देवपराक्रमाः ॥ ६-२८-३ ॥

ete duṣprasahā rājan balinaḥ kāmarūpiṇaḥ | daityadānavasaṃkāśā yuddhe devaparākramāḥ || 6-28-3 ||

हे राजन्! ये बलवान् वानर असह्य हैं, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले हैं; दैत्य-दानवों के समान तेजस्वी हैं और युद्ध में देवताओं जैसे पराक्रमी हैं।

श्लोक 4 (yuddha.28.4)

एषां कोटिसहस्राणि नव पञ्च च सप्त च । तथा शङ्कुसहस्राणि तथा वृन्दशतानि च ॥ ६-२८-४ ॥

eṣāṃ koṭisahasrāṇi nava pañca ca sapta ca | tathā śaṅkusahasrāṇi tathā vṛndaśatāni ca || 6-28-4 ||

इनकी संख्या इक्कीस हजार करोड़, तथा एक हजार शंकु और सौ वृन्द है।

श्लोक 5 (yuddha.28.5)

एते सुग्रीवसचिवाः किष्किन्धानिलयाः सदा । हरयो देवगन्धर्वैरुत्पन्नाः कामरूपिणः ॥ ६-२८-५ ॥

ete sugrīvasacivāḥ kiṣkindhānilayāḥ sadā | harayo devagandharvair utpannāḥ kāmarūpiṇaḥ || 6-28-5 ||

ये सुग्रीव के मन्त्री वानर सदा किष्किन्धा में निवास करने वाले हैं, देव और गन्धर्वों से उत्पन्न तथा इच्छानुसार रूप धारण करने वाले हैं।

श्लोक 6 (yuddha.28.6)

यौ तौ पश्यसि तिष्ठन्तौ कुमारौ देवरूपिणौ । मैन्दश्च द्विविदश्चैव ताभ्यां नास्ति समो युधि ॥ ६-२८-६ ॥

yau tau paśyasi tiṣṭhantau kumārau devarūpiṇau | maindaś ca dvividaś caiva tābhyāṃ nāsti samo yudhi || 6-28-6 ||

जिन दोनों युवकों को तुम देव-रूपधारी खड़े देख रहे हो, वे मैन्द और द्विविद हैं; युद्ध में उनके समान कोई नहीं है।

श्लोक 7 (yuddha.28.7)

ब्रह्मणा समनुज्ञातावमृतप्राशिनावुभौ । आशंसेते यथा लङ्कामेतौ मर्दितुमोजसा ॥ ६-२८-७ ॥

brahmaṇā samanujñātāv amṛtaprāśināv ubhau | āśaṃsete yathā laṅkām etau marditum ojasā || 6-28-7 ||

ब्रह्मा की अनुमति से दोनों ने अमृत का पान किया है; ये दोनों अपने बल से लंका को रौंद डालने की आशा रखते हैं।

श्लोक 8 (yuddha.28.8)

यं तु पश्यसि तिष्ठन्तं प्रभिन्नमिव कुञ्जरम् । यो बलात् क्षोभयेत् क्रुद्धः समुद्रमपि वानरः ॥ ६-२८-८ ॥

yaṃ tu paśyasi tiṣṭhantaṃ prabhinnam iva kuñjaram | yo balāt kṣobhayet kruddhaḥ samudram api vānaraḥ || 6-28-8 ||

और जिस वानर को तुम मतवाले हाथी के समान खड़ा देख रहे हो, जो क्रुद्ध होकर अपने बल से समुद्र को भी क्षुब्ध कर सकता है,

श्लोक 9 (yuddha.28.9)

एषोऽभिगन्ता लङ्कायां वैदेह्यास्तव च प्रभो । एनं पश्य पुरा दृष्टं वानरं पुनरागतम् ॥ ६-२८-९ ॥

eṣo'bhigantā laṅkāyāṃ vaidehyās tava ca prabho | enaṃ paśya purā dṛṣṭaṃ vānaraṃ punar āgatam || 6-28-9 ||

हे प्रभो! यही वह है जो लंका में सीता को और तुम्हें ढूँढ़ने आया था; देखो, जिसे पहले देखा था, वही वानर फिर लौट आया है।

श्लोक 10 (yuddha.28.10)

ज्येष्ठः केसरिणः पुत्रो वातात्मज इति श्रुतः । हनूमानिति विख्यातो लङ्घितो येन सागरः ॥ ६-२८-१० ॥

jyeṣṭhaḥ kesariṇaḥ putro vātātmaja iti śrutaḥ | hanūmān iti vikhyāto laṅghito yena sāgaraḥ || 6-28-10 ||

यह केसरी का ज्येष्ठ पुत्र है, वायुपुत्र के नाम से प्रसिद्ध; हनुमान् नाम से विख्यात, जिसने समुद्र को लाँघा।

श्लोक 11 (yuddha.28.11)

कामरूपो हरिश्रेष्ठो बलरूपसमन्वितः । अनिवार्यगतिश्चैव यथा सततगः प्रभुः ॥ ६-२८-११ ॥

kāmarūpo hariśreṣṭho balarūpasamanvitaḥ | anivāryagatiś caiva yathā satatagaḥ prabhuḥ || 6-28-11 ||

यह श्रेष्ठ वानर इच्छानुसार रूप धारण करने वाला, बल और सौन्दर्य से युक्त है, और वायुदेव के समान अबाध गति वाला है।

श्लोक 12 (yuddha.28.12)

उद्यन्तं भास्करं दृष्ट्वा बालः किल बुभुक्षितः । त्रियोजनसहस्रं तु अध्वानमवतीर्य हि ॥ ६-२८-१२ ॥

udyantaṃ bhāskaraṃ dṛṣṭvā bālaḥ kila bubhukṣitaḥ | triyojanasahasraṃ tu adhvānam avatīrya hi || 6-28-12 ||

कहते हैं, बचपन में भूख से व्याकुल होकर, उदय होते सूर्य को देखकर, तीन हजार योजन की दूरी तय करता हुआ वह उड़ चला,

श्लोक 13 (yuddha.28.13)

आदित्यमाहरिष्यामि न मे क्षुत् प्रतियास्यति । इति निश्चित्य मनसा पुप्लुवे बलदर्पितः ॥ ६-२८-१३ ॥

ādityam āhariṣyāmi na me kṣut pratiyāsyati | iti niścitya manasā pupluve baladarpitaḥ || 6-28-13 ||

यह सोचकर कि "मैं सूर्य को ही पकड़ लूँगा, अन्यथा मेरी भूख नहीं मिटेगी" -- अपने बल के मद में वह उछल पड़ा।

श्लोक 14 (yuddha.28.14)

अनाधृष्यतमं देवमपि देवर्षिराक्षसैः । अनासाद्यैव पतितो भास्करोदयने गिरौ ॥ ६-२८-१४ ॥

anādhṛṣyatamaṃ devam api devarṣirākṣasaiḥ | anāsādyaiva patito bhāskarodayane girau || 6-28-14 ||

देवताओं, ऋषियों और राक्षसों के लिए भी अत्यन्त दुर्धर्ष उस सूर्यदेव तक पहुँचे बिना ही, वह उदयाचल पर्वत पर जा गिरा।

श्लोक 15 (yuddha.28.15)

पतितस्य कपेरस्य हनुरेका शिलातले । किंचिद् भिन्ना दृढहनुर्हनूमानेष तेन वै ॥ ६-२८-१५ ॥

patitasya kapeḥ asya hanur ekā śilātale | kiṃcid bhinnā dṛḍhahanur hanūmān eṣa tena vai || 6-28-15 ||

गिरते समय इस वानर की एक हनु (जबड़ा) चट्टान से टकराकर कुछ टूट गई; इसी कारण दृढ़ हनु वाला यह वानर हनुमान् कहलाया।

श्लोक 16 (yuddha.28.16)

सत्यमागमयोगेन ममैष विदितो हरिः । नास्य शक्यं बलं रूपं प्रभावो वानुभाषितुम् ॥ ६-२८-१६ ॥

satyam āgamayogena mamaiṣa vidito hariḥ | nāsya śakyaṃ balaṃ rūpaṃ prabhāvo vānubhāṣitum || 6-28-16 ||

यह वानर मुझे सचमुच केवल सुनी-सुनाई बातों से ही ज्ञात है; इसके बल, रूप या प्रभाव का वर्णन कर पाना सम्भव नहीं है।

श्लोक 17 (yuddha.28.17)

एष आशंसते लङ्कामेको मथितुमोजसा । येन जाज्वल्यतेऽसौ वै धूमकेतुस्तवाद्य वै । लङ्कायां निहितश्चापि कथं विस्मरसे कपिम् ॥ ६-२८-१७ ॥

eṣa āśaṃsate laṅkām eko mathitum ojasā | yena jājvalyate'sau vai dhūmaketus tavādya vai | laṅkāyāṃ nihitaś cāpi kathaṃ vismarase kapim || 6-28-17 ||

यह अकेला ही अपने बल से लंका को मथ डालने की आशा रखता है। जिसने आज तुम्हारी लंका में यह धूमकेतु (अग्नि) प्रज्वलित कर दिया और अब भी जल रहा है -- उस वानर को तुम कैसे भूल गए?

श्लोक 18 (yuddha.28.18)

यश्चैषोऽनन्तरः शूरः श्यामः पद्मनिभेक्षणः । इक्ष्वाकूणामतिरथो लोके विश्रुतपौरुषः ॥ ६-२८-१८ ॥

yaś caiṣo'nantaraḥ śūraḥ śyāmaḥ padmanibhekṣaṇaḥ | ikṣvākūṇām atiratho loke viśrutapauruṣaḥ || 6-28-18 ||

और यह जो पास ही खड़ा शूरवीर है, श्यामवर्ण, कमल-सदृश नेत्रों वाला -- इक्ष्वाकुवंश का महारथी, जिसका पौरुष जगत् में विख्यात है,

श्लोक 19 (yuddha.28.19)

यस्मिन् न चलते धर्मो यो धर्मं नातिवर्तते । यो ब्राह्ममस्त्रं वेदांश्च वेद वेदविदां वरः ॥ ६-२८-१९ ॥

yasmin na calate dharmo yo dharmaṃ nātivartate | yo brāhmam astraṃ vedāṃś ca veda vedavidāṃ varaḥ || 6-28-19 ||

जिसमें धर्म कभी डिगता नहीं और जो स्वयं भी धर्म का अतिक्रमण नहीं करता; जो ब्रह्मास्त्र और वेदों को जानता है, वेदज्ञों में श्रेष्ठ है,

श्लोक 20 (yuddha.28.20)

यो भिन्द्याद् गगनं बाणैर्मेदिनीं वापि दारयेत् । यस्य मृत्योरिव क्रोधः शक्रस्येव पराक्रमः ॥ ६-२८-२० ॥

yo bhindyād gaganaṃ bāṇair medinīṃ vāpi dārayet | yasya mṛtyor iva krodhaḥ śakrasyeva parākramaḥ || 6-28-20 ||

जो अपने बाणों से आकाश को चीर सकता है और पृथ्वी को भी विदीर्ण कर सकता है; जिसका क्रोध मृत्यु के समान और पराक्रम इन्द्र के समान है,

श्लोक 21 (yuddha.28.21)

यस्य भार्या जनस्थानात् सीता चापि हृता त्वया । स एष रामस्त्वां राजन् योद्धुं समभिवर्तते ॥ ६-२८-२१ ॥

yasya bhāryā janasthānāt sītā cāpi hṛtā tvayā | sa eṣa rāmas tvāṃ rājan yoddhuṃ samabhivartate || 6-28-21 ||

जिसकी पत्नी सीता को तुमने जनस्थान से हर लिया था -- हे राजन्! वही यह राम तुझसे युद्ध करने आ रहा है।

श्लोक 22 (yuddha.28.22)

यस्यैष दक्षिणे पार्श्वे शुद्धजाम्बूनदप्रभः । विशालवक्षास्ताम्राक्षो नीलकुञ्चितमूर्धजः ॥ ६-२८-२२ ॥

yasyaiṣa dakṣiṇe pārśve śuddhajāmbūnadaprabhaḥ | viśālavakṣās tāmrākṣo nīlakuñcitamūrdhajaḥ || 6-28-22 ||

जिसके दाहिने ओर, शुद्ध स्वर्ण के समान कान्तिमान्, विशाल वक्षस्थल वाला, ताम्र-नेत्र और काले घुँघराले केशों वाला यह खड़ा है,

श्लोक 23 (yuddha.28.23)

एषो हि लक्ष्मणो नाम भ्रातुः प्रियहिते रतः । नये युद्धे च कुशलः सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ ६-२८-२३ ॥

eṣo hi lakṣmaṇo nāma bhrātuḥ priyahite rataḥ | naye yuddhe ca kuśalaḥ sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ || 6-28-23 ||

यही लक्ष्मण नामक है, जो अपने भ्राता के प्रिय और हित में सदा रत रहता है; नीति और युद्ध दोनों में कुशल, समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ है।

श्लोक 24 (yuddha.28.24)

अमर्षी दुर्जयो जेता विक्रान्तश्च जयी बली । रामस्य दक्षिणो बाहुर्नित्यं प्राणो बहिश्चरः ॥ ६-२८-२४ ॥

amarṣī durjayo jetā vikrāntaś ca jayī balī | rāmasya dakṣiṇo bāhur nityaṃ prāṇo bahiścaraḥ || 6-28-24 ||

यह अत्यन्त क्रोधी, अजेय, विजयी, पराक्रमी और बलवान् है; सदा राम की दाहिनी भुजा और मानो उनका बाहर विचरण करता प्राण है।

श्लोक 25 (yuddha.28.25)

नह्येष राघवस्यार्थे जीवितं परिरक्षति । एषैवाशंसते युद्धे निहन्तुं सर्वराक्षसान् ॥ ६-२८-२५ ॥

nahy eṣa rāghavasyārthe jīvitaṃ parirakṣati | eṣaivāśaṃsate yuddhe nihantuṃ sarvarākṣasān || 6-28-25 ||

यह राघव के लिए अपने प्राणों की भी रक्षा नहीं करता; यही युद्ध में समस्त राक्षसों का वध कर डालने की आशा रखता है।

श्लोक 26 (yuddha.28.26)

यस्तु सव्यमसौ पक्षं रामस्याश्रित्य तिष्ठति । रक्षोगणपरिक्षिप्तो राजा ह्येष विभीषणः ॥ ६-२८-२६ ॥

yas tu savyam asau pakṣaṃ rāmasyāśritya tiṣṭhati | rakṣogaṇaparikṣipto rājā hy eṣa vibhīṣaṇaḥ || 6-28-26 ||

और जो राम के बायीं ओर, राक्षस-समूह से घिरा हुआ खड़ा है -- वह राजा विभीषण है।

श्लोक 27 (yuddha.28.27)

श्रीमता राजराजेन लङ्कायामभिषेचितः । त्वामसौ प्रतिसंरब्धो युद्धायैषोऽभिवर्तते ॥ ६-२८-२७ ॥

śrīmatā rājarājena laṅkāyām abhiṣecitaḥ | tvām asau pratisaṃrabdho yuddhāyaiṣo'bhivartate || 6-28-27 ||

श्रीमान् राजाधिराज राम ने ही उसे लंका के राजपद पर अभिषिक्त किया है; क्रोध से भरा हुआ वह तुम्हारे विरुद्ध युद्ध के लिए आगे बढ़ रहा है।

श्लोक 28 (yuddha.28.28)

यं तु पश्यसि तिष्ठन्तं मध्ये गिरिमिवाचलम् । सर्वशाखामृगेन्द्राणां भर्तारममितौजसम् ॥ ६-२८-२८ ॥

yaṃ tu paśyasi tiṣṭhantaṃ madhye girim ivācalam | sarvaśākhāmṛgendrāṇāṃ bhartāram amitaujasam || 6-28-28 ||

और जिसे तुम बीच में अचल पर्वत के समान खड़ा देख रहे हो, समस्त वानर-राजाओं का स्वामी, असीम तेजस्वी,

श्लोक 29 (yuddha.28.29)

तेजसा यशसा बुद्ध्या बलेनाभिजनेन च । यः कपीनतिबभ्राज हिमवानिव पर्वतः ॥ ६-२८-२९ ॥

tejasā yaśasā buddhyā balenābhijanena ca | yaḥ kapīn atibabhrāja himavān iva parvataḥ || 6-28-29 ||

जो तेज, यश, बुद्धि, बल और कुलीनता से, हिमालय पर्वत के समान अन्य वानरों को अतिशय प्रकाशित करता है,

श्लोक 30 (yuddha.28.30)

किष्किन्धां यः समध्यास्ते गुहां सगहनद्रुमाम् । दुर्गां पर्वतदुर्गम्यां प्रधानैः सह यूथपैः ॥ ६-२८-३० ॥

kiṣkindhāṃ yaḥ samadhyāste guhāṃ sagahanadrumām | durgāṃ parvatadurgamyāṃ pradhānaiḥ saha yūthapaiḥ || 6-28-30 ||

जो प्रमुख सेनापतियों सहित सघन वृक्षों से युक्त और पर्वतों से दुर्गम, गुहा-सदृश किष्किन्धा में निवास करता है,

श्लोक 31 (yuddha.28.31)

यस्यैषा काञ्चनी माला शोभते शतपुष्करा । कान्ता देवमनुष्याणां यस्यां लक्ष्मीः प्रतिष्ठिता ॥ ६-२८-३१ ॥

yasyaiṣā kāñcanī mālā śobhate śatapuṣkarā | kāntā devamanuṣyāṇāṃ yasyāṃ lakṣmīḥ pratiṣṭhitā || 6-28-31 ||

जिसकी सौ कमलों वाली स्वर्ण-माला सुशोभित होती है -- देवताओं और मनुष्यों को प्रिय, जिसमें लक्ष्मी सदा प्रतिष्ठित रहती है,

श्लोक 32 (yuddha.28.32)

एतां मालां च तारां च कपिराज्यं च शाश्वतम् । सुग्रीवो वालिनं हत्वा रामेण प्रतिपादितः ॥ ६-२८-३२ ॥

etāṃ mālāṃ ca tārāṃ ca kapirājyaṃ ca śāśvatam | sugrīvo vālinaṃ hatvā rāmeṇa pratipāditaḥ || 6-28-32 ||

यह सुग्रीव है, जिसे यह माला, तारा और वानरों का स्थायी राज्य -- वालि का वध करके राम ने ही प्रदान किया।

श्लोक 33 (yuddha.28.33)

शतं शतसहस्राणां कोटिमाहुर्मनीषिणः । शतं कोटिसहस्राणां शङ्कुरित्यभिधीयते ॥ ६-२८-३३ ॥

śataṃ śatasahasrāṇāṃ koṭim āhur manīṣiṇaḥ | śataṃ koṭisahasrāṇāṃ śaṅkur ity abhidhīyate || 6-28-33 ||

बुद्धिमान् पुरुष सौ लाख को एक करोड़ कहते हैं, और सौ हजार करोड़ को शंकु कहा जाता है।

श्लोक 34 (yuddha.28.34)

शतं शङ्कुसहस्राणां महाशङ्कुरिति स्मृतः । महाशङ्कुसहस्राणां शतं वृन्दमिहोच्यते ॥ ६-२८-३४ ॥

śataṃ śaṅkusahasrāṇāṃ mahāśaṅkur iti smṛtaḥ | mahāśaṅkusahasrāṇāṃ śataṃ vṛndam ihocyate || 6-28-34 ||

सौ हजार शंकुओं को महाशंकु कहा जाता है, और सौ हजार महाशंकुओं को यहाँ वृन्द कहते हैं।

श्लोक 35 (yuddha.28.35)

शतं वृन्दसहस्राणां महावृन्दमिति स्मृतम् । महावृन्दसहस्राणां शतं पद्ममिहोच्यते ॥ ६-२८-३५ ॥

śataṃ vṛndasahasrāṇāṃ mahāvṛndam iti smṛtam | mahāvṛndasahasrāṇāṃ śataṃ padmam ihocyate || 6-28-35 ||

सौ हजार वृन्दों को महावृन्द कहा जाता है, और सौ हजार महावृन्दों को यहाँ पद्म कहते हैं।

श्लोक 36 (yuddha.28.36)

शतं पद्मसहस्राणां महापद्ममिति स्मृतम् । महापद्मसहस्राणां शतं खर्वमिहोच्यते ॥ ६-२८-३६ ॥

śataṃ padmasahasrāṇāṃ mahāpadmam iti smṛtam | mahāpadmasahasrāṇāṃ śataṃ kharvam ihocyate || 6-28-36 ||

सौ हजार पद्मों को महापद्म कहा जाता है, और सौ हजार महापद्मों को यहाँ खर्व कहते हैं।

श्लोक 37 (yuddha.28.37)

शतं खर्वसहस्राणां महाखर्वमिति स्मृतम् । महाखर्वसहस्राणां समुद्रमभिधीयते ॥ ६-२८-३७ ॥

śataṃ kharvasahasrāṇāṃ mahākharvam iti smṛtam | mahākharvasahasrāṇāṃ samudram abhidhīyate || 6-28-37 ||

सौ हजार खर्वों को महाखर्व कहा जाता है, और सौ हजार महाखर्वों को समुद्र कहते हैं।

श्लोक 38 (yuddha.28.38)

शतं समुद्रसाहस्रमोघ इत्यभिधीयते । शतमोघसहस्राणां महौघ इति विश्रुतः ॥ ६-२८-३८ ॥

śataṃ samudrasāhasram ogha ity abhidhīyate | śatam oghasahasrāṇāṃ mahaugha iti viśrutaḥ || 6-28-38 ||

सौ हजार समुद्रों को ओघ कहते हैं, और सौ हजार ओघों को महौघ कहा जाता है।

श्लोक 39 (yuddha.28.39)

एवं कोटिसहस्रेण शङ्कूनां च शतेन च । महाशङ्कुसहस्रेण तथा वृन्दशतेन च ॥ ६-२८-३९ ॥

evaṃ koṭisahasreṇa śaṅkūnāṃ ca śatena ca | mahāśaṅkusahasreṇa tathā vṛndaśatena ca || 6-28-39 ||

इस प्रकार एक हजार करोड़, सौ शंकु, एक हजार महाशंकु और सौ वृन्दों के हिसाब से,

श्लोक 40 (yuddha.28.40)

महावृन्दसहस्रेण तथा पद्मशतेन च । महापद्मसहस्रेण तथा खर्वशतेन च ॥ ६-२८-४० ॥

mahāvṛndasahasreṇa tathā padmaśatena ca | mahāpadmasahasreṇa tathā kharvaśatena ca || 6-28-40 ||

एक हजार महावृन्द, सौ पद्म, एक हजार महापद्म और सौ खर्वों के हिसाब से,

श्लोक 41 (yuddha.28.41)

समुद्रेण च तेनैव महौघेन तथैव च । एष कोटिमहौघेन समुद्रसदृशेन च ॥ ६-२८-४१ ॥

samudreṇa ca tenaiva mahaughena tathaiva ca | eṣa koṭimahaughena samudrasadṛśena ca || 6-28-41 ||

उतने ही समुद्रों और महौघों के हिसाब से, तथा एक करोड़ महौघों से -- समुद्र के समान विशाल इस सेना के साथ,

श्लोक 42 (yuddha.28.42)

विभीषणेन वीरेण सचिवैः परिवारितः । सुग्रीवो वानरेन्द्रस्त्वां युद्धार्थमभिवर्तते ॥ ६-२८-४२ ॥

vibhīṣaṇena vīreṇa sacivaiḥ parivāritaḥ | sugrīvo vānarendras tvāṃ yuddhārtham abhivartate || 6-28-42 ||

वीर विभीषण और अपने मन्त्रियों से घिरा हुआ, वानरराज सुग्रीव तुझसे युद्ध के लिए बढ़ रहा है,

श्लोक 43 (yuddha.28.43)

महाबलवृतो नित्यं महाबलपराक्रमः ॥ ६-२८-४३ ॥

mahābalavṛto nityaṃ mahābalaparākramaḥ || 6-28-43 ||

सर्वदा महाबल से घिरा हुआ, स्वयं महान् बल और पराक्रम से सम्पन्न।

श्लोक 44 (yuddha.28.44)

इमां महाराज समीक्ष्य वाहिनी- मुपस्थितां प्रज्वलितग्रहोपमाम् । ततः प्रयत्नः परमो विधीयतां यथा जयः स्यान्न परैः पराभवः ॥ ६-२८-४४ ॥

imāṃ mahārāja samīkṣya vāhinīm upasthitāṃ prajvalitagrahopamām | tataḥ prayatnaḥ paramo vidhīyatāṃ yathā jayaḥ syān na paraiḥ parābhavaḥ || 6-28-44 ||

हे महाराज! इस आ पहुँची हुई सेना को, जो मानो एक प्रज्वलित ग्रह के समान है, भलीभाँति देखकर, अब सर्वोत्तम प्रयत्न करो, जिससे विजय प्राप्त हो और शत्रुओं से पराजय न हो।

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