युद्धकाण्ड · सर्ग 36
रावण की माल्यवान् को फटकार
श्लोक 1 (yuddha.36.1)
तत् तु माल्यवतो वाक्यं हितमुक्तं दशाननः। न मर्षयति दुष्टात्मा कालस्य वशमागतः ॥ 36.1 ॥
tat tu mālyavato vākyaṃ hitamuktaṃ daśānanaḥ| na marṣayati duṣṭātmā kālasya vaśamāgataḥ || 36.1 ||
किन्तु दशानन रावण, जिसका मन दूषित हो चुका था और जो काल के वशीभूत हो चुका था, माल्यवान द्वारा कहे गए उस हितकारी वचन को सहन न कर सका।
श्लोक 2 (yuddha.36.2)
स बद्ध्वा भ्रुकुटिं वक्त्रे क्रोधस्य वशमागतः। अमर्षात् परिवृत्ताक्षो माल्यवन्तमथाब्रवीत् ॥ 36.2 ॥
sa baddhvā bhrukuṭiṃ vaktre krodhasya vaśamāgataḥ| amarṣāt parivṛttākṣo mālyavantamathābravīt || 36.2 ||
क्रोध के वशीभूत होकर, मुख पर भृकुटि चढ़ाए और असहनीय क्रोध से आँखें घुमाते हुए, उसने माल्यवान से कहा:
श्लोक 3 (yuddha.36.3)
हितबुद्ध्या यदहितं वचः परुषमुच्यते। परपक्षं प्रविश्यैव नैतच्छ्रोत्रगतं मम ॥ 36.3 ॥
hitabuddhyā yadahitaṃ vacaḥ paruṣamucyate| parapakṣaṃ praviśyaiva naitacchrotragataṃ mama || 36.3 ||
हितकारी समझकर तुमने जो यह अहितकर और कठोर वचन कहा है, मानो शत्रु-पक्ष में जा मिले हो, वह मेरे कानों तक पहुँचा ही नहीं।
श्लोक 4 (yuddha.36.4)
मानुषं कृपणं राममेकं शाखामृगाश्रयम्। समर्थं मन्यसे केन त्यक्तं पित्रा वनाश्रयम् ॥ 36.4 ॥
mānuṣaṃ kṛpaṇaṃ rāmamekaṃ śākhāmṛgāśrayam| samarthaṃ manyase kena tyaktaṃ pitrā vanāśrayam || 36.4 ||
तुम किस आधार पर उस दीन मनुष्य राम को, जो अकेला है, वानरों के सहारे खड़ा है, अपने ही पिता द्वारा त्यागा गया है और वन में शरण लिए हुए है, इतना समर्थ समझते हो?
श्लोक 5 (yuddha.36.5)
रक्षसामीश्वरं मां च देवानां च भयंकरम्। हीनं मां मन्यसे केन अहीनं सर्वविक्रमैः ॥ 36.5 ॥
rakṣasāmīśvaraṃ māṃ ca devānāṃ ca bhayaṃkaram| hīnaṃ māṃ manyase kena ahīnaṃ sarvavikramaiḥ || 36.5 ||
और मुझे, जो राक्षसों का स्वामी हूँ, देवताओं तक के लिए भयंकर हूँ और समस्त पराक्रमों से सम्पन्न हूँ, तुम किस कारण हीन मानते हो?
श्लोक 6 (yuddha.36.6)
वीरद्वेषेण वा शङ्के पक्षपातेन वा रिपोः। त्वयाहं परुषाण्युक्तो परप्रोत्साहनेन वा ॥ 36.6 ॥
vīradveṣeṇa vā śaṅke pakṣapātena vā ripoḥ| tvayāhaṃ paruṣāṇyukto paraprotsāhanena vā || 36.6 ||
मुझे शंका है कि तुमने ये कठोर वचन मुझसे या तो वीर के प्रति द्वेष के कारण कहे हैं, या शत्रु के प्रति पक्षपात के कारण, अथवा शत्रु द्वारा उकसाए जाने पर।
श्लोक 7 (yuddha.36.7)
प्रभवन्तं पदस्थं हि परुषं कोऽभिभाषते। पण्डितः शास्त्रतत्त्वज्ञो विना प्रोत्साहनेन वा ॥ 36.7 ॥
prabhavantaṃ padasthaṃ hi paruṣaṃ ko'bhibhāṣate| paṇḍitaḥ śāstratattvajño vinā protsāhanena vā || 36.7 ||
शास्त्रों के तत्त्व का ज्ञाता कोई भी विद्वान समर्थ और अपने पद पर प्रतिष्ठित पुरुष से बिना किसी उकसावे के इस प्रकार कठोर वचन क्यों कहेगा?
श्लोक 8 (yuddha.36.8)
आनीय च वनात् सीतां पद्महीनामिव श्रियम्। किमर्थं प्रतिदास्यामि राघवस्य भयादहम् ॥ 36.8 ॥
ānīya ca vanāt sītāṃ padmahīnāmiva śriyam| kimarthaṃ pratidāsyāmi rāghavasya bhayādaham || 36.8 ||
वन से सीता को हर लाकर, जो मानो कमल-रहित लक्ष्मी के समान हैं, मैं राघव के भय से उन्हें क्यों लौटाऊँ?
श्लोक 9 (yuddha.36.9)
वृतं वानरकोटीभिः ससुग्रीवं सलक्ष्मणम्। पश्य कैश्चिदहोभिश्च राघवं निहतं मया ॥ 36.9 ॥
vṛtaṃ vānarakoṭībhiḥ sasugrīvaṃ salakṣmaṇam| paśya kaiścidahobhiśca rāghavaṃ nihataṃ mayā || 36.9 ||
कुछ ही दिनों में तुम देखोगे कि करोड़ों वानरों से घिरे, सुग्रीव और लक्ष्मण सहित, राघव को मैंने स्वयं मार गिराया है।
श्लोक 10 (yuddha.36.10)
द्वन्द्वे यस्य न तिष्ठन्ति दैवतान्यपि संयुगे। स कस्माद् रावणो युद्धे भयमाहारयिष्यति ॥ 36.10 ॥
dvandve yasya na tiṣṭhanti daivatānyapi saṃyuge| sa kasmād rāvaṇo yuddhe bhayamāhārayiṣyati || 36.10 ||
जिसके सम्मुख युद्ध में देवता तक टिक नहीं पाते, वह रावण भला युद्ध में भय क्यों मानेगा?
श्लोक 11 (yuddha.36.11)
द्विधा भज्येयमप्येवं न नमेयं तु कस्यचित्। एष मे सहजो दोषः स्वभावो दुरतिक्रमः ॥ 36.11 ॥
dvidhā bhajyeyamapyevaṃ na nameyaṃ tu kasyacit| eṣa me sahajo doṣaḥ svabhāvo duratikramaḥ || 36.11 ||
मैं चाहे दो टुकड़ों में बँट जाऊँ, पर किसी के आगे झुकूँगा नहीं। इसे मेरा जन्मजात दोष कहो या स्वभाव, यह टाला नहीं जा सकता।
श्लोक 12 (yuddha.36.12)
यदि तावत् समुद्रे तु सेतुर्बद्धो यदृच्छया। रामेण विस्मयः कोऽत्र येन ते भयमागतम् ॥ 36.12 ॥
yadi tāvat samudre tu seturbaddho yadṛcchayā| rāmeṇa vismayaḥ ko'tra yena te bhayamāgatam || 36.12 ||
यदि संयोगवश राम ने समुद्र पर सेतु बाँध ही लिया है, तो इसमें आश्चर्य ही क्या है, जिसके कारण तुम्हें भय हो गया?
श्लोक 13 (yuddha.36.13)
स तु तीर्त्वार्णवं रामः सह वानरसेनया। प्रतिजानामि ते सत्यं न जीवन् प्रतियास्यति ॥ 36.13 ॥
sa tu tīrtvārṇavaṃ rāmaḥ saha vānarasenayā| pratijānāmi te satyaṃ na jīvan pratiyāsyati || 36.13 ||
मैं तुम्हें सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ कि वह राम अपनी वानर-सेना सहित समुद्र पार कर ले, तो भी जीवित लौट न सकेगा।
श्लोक 14 (yuddha.36.14)
एवं ब्रुवाणं संरब्धं रुष्टं विज्ञाय रावणम्। व्रीडितो माल्यवान् वाक्यं नोत्तरं प्रत्यपद्यत ॥ 36.14 ॥
evaṃ bruvāṇaṃ saṃrabdhaṃ ruṣṭaṃ vijñāya rāvaṇam| vrīḍito mālyavān vākyaṃ nottaraṃ pratyapadyata || 36.14 ||
इस प्रकार क्रोधित एवं आवेशित रावण के वचन सुनकर संकुचित हुए माल्यवान ने कोई उत्तर नहीं दिया।
श्लोक 15 (yuddha.36.15)
जयाशिषा तु राजानं वर्धयित्वा यथोचितम्। माल्यवानभ्यनुज्ञातो जगाम स्वं निवेशनम् ॥ 36.15 ॥
jayāśiṣā tu rājānaṃ vardhayitvā yathocitam| mālyavānabhyanujñāto jagāma svaṃ niveśanam || 36.15 ||
तत्पश्चात् माल्यवान ने यथोचित रूप से राजा को जय-आशीर्वाद देकर, अनुमति लेकर, अपने निवास को प्रस्थान किया।
श्लोक 16 (yuddha.36.16)
रावणस्तु सहामात्यो मन्त्रयित्वा विमृश्य च। लङ्कायास्तु तदा गुप्तिं कारयामास राक्षसः ॥ 36.16 ॥
rāvaṇastu sahāmātyo mantrayitvā vimṛśya ca| laṅkāyāstu tadā guptiṃ kārayāmāsa rākṣasaḥ || 36.16 ||
तदनन्तर रावण ने अपने मन्त्रियों के साथ विचार-विमर्श करके लंका की सुरक्षा का प्रबन्ध करवाया।
श्लोक 17 (yuddha.36.17)
व्यादिदेश च पूर्वस्यां प्रहस्तं द्वारि राक्षसम्। दक्षिणस्यां महावीर्यौ महापार्श्वमहोदरौ ॥ 36.17 ॥
vyādideśa ca pūrvasyāṃ prahastaṃ dvāri rākṣasam| dakṣiṇasyāṃ mahāvīryau mahāpārśvamahodarau || 36.17 ||
उसने पूर्वी द्वार पर राक्षस प्रहस्त को और दक्षिणी द्वार पर महापराक्रमी महापार्श्व और महोदर को नियुक्त किया।
श्लोक 18 (yuddha.36.18)
पश्चिमायामथ द्वारि पुत्रमिन्द्रजितं तदा। व्यादिदेश महामायं राक्षसैर्बहुभिर्वृतम् ॥ 36.18 ॥
paścimāyāmatha dvāri putramindrajitaṃ tadā| vyādideśa mahāmāyaṃ rākṣasairbahubhirvṛtam || 36.18 ||
फिर पश्चिमी द्वार पर उसने अपने पुत्र महामायावी इन्द्रजित को अनेक राक्षसों के साथ नियुक्त किया।
श्लोक 19 (yuddha.36.19)
उत्तरस्यां पुरद्वारि व्यादिश्य शुकसारणौ। स्वयं चात्र गमिष्यामि मन्त्रिणस्तानुवाच ह ॥ 36.19 ॥
uttarasyāṃ puradvāri vyādiśya śukasāraṇau| svayaṃ cātra gamiṣyāmi mantriṇastānuvāca ha || 36.19 ||
उत्तरी नगर-द्वार पर शुक और सारण को नियुक्त कर, उसने अपने मन्त्रियों से कहा कि वह स्वयं वहाँ जाएगा।
श्लोक 20 (yuddha.36.20)
राक्षसं तु विरूपाक्षं महावीर्यपराक्रमम्। मध्यमेऽस्थापयद् गुल्मे बहुभिः सह राक्षसैः ॥ 36.20 ॥
rākṣasaṃ tu virūpākṣaṃ mahāvīryaparākramam| madhyame'sthāpayad gulme bahubhiḥ saha rākṣasaiḥ || 36.20 ||
महापराक्रमी राक्षस विरूपाक्ष को उसने बहुत-से राक्षसों के साथ मध्य के सैन्य-शिविर में नियुक्त किया।
श्लोक 21 (yuddha.36.21)
एवं विधानं लङ्कायां कृत्वा राक्षसपुंगवः। कृतकृत्यमिवात्मानं मन्यते कालचोदितः ॥ 36.21 ॥
evaṃ vidhānaṃ laṅkāyāṃ kṛtvā rākṣasapuṃgavaḥ| kṛtakṛtyamivātmānaṃ manyate kālacoditaḥ || 36.21 ||
इस प्रकार लंका में प्रबन्ध करके, काल से प्रेरित वह राक्षसश्रेष्ठ स्वयं को मानो कृतकृत्य-सा मानने लगा।
श्लोक 22 (yuddha.36.22)
विसर्जयामास ततः स मन्त्रिणो विधानमाज्ञाप्य पुरस्य पुष्कलम्। जयाशिषा मन्त्रिगणेन पूजितो विवेश सोऽन्तःपुरमृद्धिमन्महत् ॥ 36.22 ॥
visarjayāmāsa tataḥ sa mantriṇo vidhānamājñāpya purasya puṣkalam| jayāśiṣā mantrigaṇena pūjito viveśa so'ntaḥpuramṛddhimanmahat || 36.22 ||
तत्पश्चात् नगर की समुचित व्यवस्था का आदेश देकर उसने मन्त्रियों को विदा किया; मन्त्रिगण द्वारा जय-आशीष से सम्मानित होकर वह अपने विशाल एवं समृद्ध अन्तःपुर में प्रविष्ट हुआ।