युद्धकाण्ड · सर्ग 55
रावण द्वारा अकंपन को युद्धादेश
श्लोक 1 (yuddha.55.1)
वज्रदंष्ट्रं हतं श्रुत्वा वालिपुत्रेण रावणः। बलाध्यक्षमुवाचेदं कृताञ्जलिमुपस्थितम् ॥ 55.1 ॥
vajradaṃṣṭraṃ hataṃ śrutvā vāliputreṇa rāvaṇaḥ| balādhyakṣamuvācedaṃ kṛtāñjalimupasthitam || 55.1 ||
वालि-पुत्र द्वारा वज्रदंष्ट्र का वध सुनकर रावण ने हाथ जोड़े हुए समीप खड़े सेनापति से यह कहा।
श्लोक 2 (yuddha.55.2)
शीघ्रं निर्यान्तुदुर्धर्षा राक्षसा भीमविक्रमाः। अकम्पनं पुरस्कृत्य सर्वशस्त्रास्त्रकोविदम् ॥ 55.2 ॥
śīghraṃ niryāntudurdharṣā rākṣasā bhīmavikramāḥ| akampanaṃ puraskṛtya sarvaśastrāstrakovidam || 55.2 ||
"अजेय और भीमपराक्रमी राक्षस शीघ्र प्रस्थान करें, समस्त शस्त्रास्त्रों में निपुण अकंपन को आगे कर।
श्लोक 3 (yuddha.55.3)
एष शास्ता च गोप्ता च नेता च युधि सत्तमः। भूतिकामश्च मे नित्यं नित्यं च समरप्रियः ॥ 55.3 ॥
eṣa śāstā ca goptā ca netā ca yudhi sattamaḥ| bhūtikāmaśca me nityaṃ nityaṃ ca samarapriyaḥ || 55.3 ||
यह सर्वश्रेष्ठ राक्षस दंडदाता, रक्षक और युद्ध में नेता है; वह सदा मेरी भलाई चाहता है और सदा युद्धप्रिय है।
श्लोक 4 (yuddha.55.4)
एष जेष्यति काकुत्स्थौ सुग्रीवं च महाबलम्। वानरांश्चापरान् घोरान् हनिष्यति न संशयः ॥ 55.4 ॥
eṣa jeṣyati kākutsthau sugrīvaṃ ca mahābalam| vānarāṃścāparān ghorān haniṣyati na saṃśayaḥ || 55.4 ||
वह निश्चय ही काकुत्स्थ-द्वय और महाबली सुग्रीव को जीत लेगा; अन्य भयंकर वानरों का भी वध करेगा, इसमें कोई संदेह नहीं।"
श्लोक 5 (yuddha.55.5)
परिगृह्य स तामाज्ञां रावणस्य महाबलः। बलं सम्प्रेरयामास तदा लघुपराक्रमः ॥ 55.5 ॥
parigṛhya sa tāmājñāṃ rāvaṇasya mahābalaḥ| balaṃ samprerayāmāsa tadā laghuparākramaḥ || 55.5 ||
रावण की उस आज्ञा को स्वीकार कर वह महाबली और शीघ्रपराक्रमी अकंपन तब सेना को प्रेरित करने लगा।
श्लोक 6 (yuddha.55.6)
ततो नानाप्रहरणा भीमाक्षा भीमदर्शनाः। निष्पेतू राक्षसा मुख्या बलाध्यक्षप्रचोदिताः ॥ 55.6 ॥
tato nānāpraharaṇā bhīmākṣā bhīmadarśanāḥ| niṣpetū rākṣasā mukhyā balādhyakṣapracoditāḥ || 55.6 ||
तत्पश्चात् भीमनेत्र और भीमदर्शन, नाना प्रकार के शस्त्रों से युक्त वे मुख्य राक्षस सेनापति द्वारा प्रेरित होकर आगे बढ़े।
श्लोक 7 (yuddha.55.7)
रथमास्थाय विपुलं तप्तकाञ्चनभूषणम्। मेघाभो मेघवर्णश्च मेघस्वनमहास्वनः ॥ 55.7 ॥
rathamāsthāya vipulaṃ taptakāñcanabhūṣaṇam| meghābho meghavarṇaśca meghasvanamahāsvanaḥ || 55.7 ||
तप्त स्वर्ण से विभूषित उस विशाल रथ पर आरूढ़ होकर, मेघ के समान वर्ण और मेघ-गर्जन के समान महास्वर वाला अकंपन,
श्लोक 8 (yuddha.55.8)
राक्षसैः संवृतो घोरैस्तदा निर्यात्यकम्पनः। नहि कम्पयितुं शक्यः सुरैरपि महामृधे ॥ 55.8 ॥
rākṣasaiḥ saṃvṛto ghoraistadā niryātyakampanaḥ| nahi kampayituṃ śakyaḥ surairapi mahāmṛdhe || 55.8 ||
भयंकर राक्षसों से घिरा हुआ निकला; क्योंकि महासमर में देवता भी अकंपन को विचलित नहीं कर सकते थे।
श्लोक 9 (yuddha.55.9)
अकम्पनस्ततस्तेषामादित्य इव तेजसा। तस्य निर्धावमानस्य संरब्धस्य युयुत्सया ॥ 55.9 ॥
akampanastatasteṣāmāditya iva tejasā| tasya nirdhāvamānasya saṃrabdhasya yuyutsayā || 55.9 ||
वेगपूर्वक आगे बढ़ते हुए, युद्ध की इच्छा से आकुल उस अकंपन के रथ को खींचने वाले घोड़े अकस्मात् दीनता को प्राप्त हो गए।
श्लोक 10 (yuddha.55.10)
अकस्माद् दैन्यमागच्छद्धयानां रथवाहिनाम्। व्यस्फुरन्नयनं चास्य सव्यं युद्धाभिनन्दिनः ॥ 55.10 ॥
akasmād dainyamāgacchaddhayānāṃ rathavāhinām| vyasphurannayanaṃ cāsya savyaṃ yuddhābhinandinaḥ || 55.10 ||
युद्धाभिनन्दी उस अकंपन का बायाँ नेत्र फड़कने लगा;
श्लोक 11 (yuddha.55.11)
विवर्णो मुखवर्णश्च गद्गदश्चाभवत् स्वनः। अभवत् सुदिने काले दुर्दिनं रूक्षमारुतम् ॥ 55.11 ॥
vivarṇo mukhavarṇaśca gadagadaścābhavat svanaḥ| abhavat sudine kāle durdinaṃ rūkṣamārutam || 55.11 ||
उसके मुख का रंग विवर्ण हो गया और स्वर गद्गद हो उठा; शुभ दिन अकस्मात् दुर्दिन में बदल गया और रूक्ष वायु बहने लगी।
श्लोक 12 (yuddha.55.12)
ऊचुः खगमृगाः सर्वे वाचः क्रूरा भयावहाः। स सिंहोपचितस्कन्धः शार्दूलसमविक्रमः ॥ 55.12 ॥
ūcuḥ khagamṛgāḥ sarve vācaḥ krūrā bhayāvahāḥ| sa siṃhopacitaskandhaḥ śārdūlasamavikramaḥ || 55.12 ||
पक्षी और पशु सभी क्रूर और भयोत्पादक वाणी बोलने लगे।
श्लोक 13 (yuddha.55.13)
तानुत्पातानचिन्त्यैव निर्जगाम रणाजिरम्। तथा निर्गच्छतस्तस्य रक्षसः सह राक्षसैः ॥ 55.13 ॥
tānutpātānacintyaiva nirjagāma raṇājiram| tathā nirgacchatastasya rakṣasaḥ saha rākṣasaiḥ || 55.13 ||
सिंह के समान कंधों वाला और व्याघ्र के समान पराक्रमी वह राक्षस, उन अपशकुनों की चिंता किये बिना, रणभूमि की ओर चल पड़ा।
श्लोक 14 (yuddha.55.14)
बभूव सुमहान् नादः क्षोभयन्निव सागरम्। तेन शब्देन वित्रस्ता वानराणां महाचमूः ॥ 55.14 ॥
babhūva sumahān nādaḥ kṣobhayanniva sāgaram| tena śabdena vitrastā vānarāṇāṃ mahācamūḥ || 55.14 ||
इस प्रकार अन्य राक्षसों सहित निकलते हुए उस राक्षस का, मानो सागर को क्षुब्ध करने वाला, अत्यंत महान् घोष उत्पन्न हुआ।
श्लोक 15 (yuddha.55.15)
द्रुमशैलप्रहाराणां योद्धुं समुपतिष्ठताम्। तेषां युद्धं महारौद्रं संजज्ञे कपिरक्षसाम् ॥ 55.15 ॥
drumaśailaprahārāṇāṃ yoddhuṃ samupatiṣṭhatām| teṣāṃ yuddhaṃ mahāraudraṃ saṃjajñe kapirakṣasām || 55.15 ||
उस शब्द से वृक्षों और शिलाओं के प्रहारों के लिये तत्पर वानरों की विशाल सेना भयभीत हो उठी।
श्लोक 16 (yuddha.55.16)
रामरावणयोरर्थे समभित्यक्तदेहिनः। सर्वे ह्यतिबलाः शूराः सर्वे पर्वतसंनिभाः ॥ 55.16 ॥
rāmarāvaṇayorarthe samabhityaktadehinaḥ| sarve hyatibalāḥ śūrāḥ sarve parvatasaṃnibhāḥ || 55.16 ||
तत्पश्चात् राम और रावण के लिये अपना शरीर त्याग चुके उन वानरों और राक्षसों के बीच वह अत्यंत भयंकर युद्ध छिड़ गया।
श्लोक 17 (yuddha.55.17)
हरयो राक्षसाश्चैव परस्परजिघांसया। तेषां विनर्दतां शब्दः संयुगेऽतितरस्विनाम् ॥ 55.17 ॥
harayo rākṣasāścaiva parasparajighāṃsayā| teṣāṃ vinardatāṃ śabdaḥ saṃyuge'titarasvinām || 55.17 ||
सभी अत्यंत बलशाली और शूरवीर थे, सभी पर्वतों के समान प्रतीत होते थे - वानर और राक्षस दोनों ही परस्पर वध की इच्छा रखते थे।
श्लोक 18 (yuddha.55.18)
शुश्रुवे सुमहान् कोपादन्योन्यमभिगर्जताम्। रजश्चारुणवर्णाभं सुभीममभवद् भृशम् ॥ 55.18 ॥
śuśruve sumahān kopādanyonyamabhigarjatām| rajaścāruṇavarṇābhaṃ subhīmamabhavad bhṛśam || 55.18 ||
उस युद्ध में परस्पर गर्जना करते हुए उन अत्यंत वेगवान् योद्धाओं का घोष सुनाई देने लगा।
श्लोक 19 (yuddha.55.19)
उद्धृतं हरिरक्षोभिः संरुरोध दिशो दश। अन्योन्यं रजसा तेन कौशेयोद्धतपाण्डुना ॥ 55.19 ॥
udadhṛtaṃ harirakṣobhiḥ saṃrurodha diśo daśa| anyonyaṃ rajasā tena kauśeyoddhatapāṇḍunā || 55.19 ||
अत्यंत भयंकर और अरुण वर्ण की धूल क्रोधपूर्वक उठकर समस्त दसों दिशाओं को घेर गई।
श्लोक 20 (yuddha.55.20)
संवृतानि च भूतानि ददृशुर्न रणाजिरे। न ध्वजो न पताका वा चर्म वा तुरगोऽपि वा ॥ 55.20 ॥
saṃvṛtāni ca bhūtāni dadṛśurna raṇājire| na dhvajo na patākā vā carma vā turago'pi vā || 55.20 ||
वानरों और राक्षसों दोनों द्वारा उठाई गई वह धूल दसों दिशाओं को अवरुद्ध कर गई; वायु से उड़े हुए रेशम के समान पांडु वर्ण उस धूल से एक-दूसरे को कोई देख न सका।
श्लोक 21 (yuddha.55.21)
आयुधं स्यन्दनो वापि ददृशे तेन रेणुना। शब्दश्च सुमहांस्तेषां नर्दतामभिधावताम् ॥ 55.21 ॥
āyudhaṃ syandano vāpi dadṛśe tena reṇunā| śabdaśca sumahāṃsteṣāṃ nardatāmabhidhāvatām || 55.21 ||
रणभूमि में एक-दूसरे को छिपाए हुए प्राणी दिखाई न देते थे; न ध्वजा, न पताका, न ढाल, न घोड़ा,
श्लोक 22 (yuddha.55.22)
श्रूयते तुमुलो युद्धे न रूपाणि चकाशिरे। हरीनेव सुसंरुष्टा हरयो जघ्नुराहवे ॥ 55.22 ॥
śrūyate tumulo yuddhe na rūpāṇi cakāśire| harīneva susaṃruṣṭā harayo jaghnurāhave || 55.22 ||
न आयुध, न रथ ही उस धूल में दिखाई देता था; केवल गरजते और एक-दूसरे पर टूट पड़ते हुए योद्धाओं का अत्यंत महान् कोलाहल ही सुनाई पड़ता था।
श्लोक 23 (yuddha.55.23)
राक्षसा राक्षसांश्चापि निजघ्नुस्तिमिरे तदा। ते परांश्च विनिघ्नन्तः स्वांश्च वानरराक्षसाः ॥ 55.23 ॥
rākṣasā rākṣasāṃścāpi nijaghnustimire tadā| te parāṃśca vinighnantaḥ svāṃśca vānararākṣasāḥ || 55.23 ||
उस युद्ध में किसी का भी रूप दिखाई नहीं देता था; अत्यंत क्रुद्ध वानरों ने वानरों को और राक्षसों ने राक्षसों को ही मार डाला।
श्लोक 24 (yuddha.55.24)
रुधिरार्द्रां तदा चक्रुर्महीं पङ्कानुलेपनाम्। ततस्तु रुधिरौघेण सिक्तं ह्यपगतं रजः ॥ 55.24 ॥
rudhirārdrāṃ tadā cakrurmahīṃ paṅkānulepanām| tatastu rudhiraugheṇa siktaṃ hyapagataṃ rajaḥ || 55.24 ||
उस अंधकार में वानरों और राक्षसों ने पराए और अपने, दोनों को मारते हुए, पृथ्वी को रक्त से सिक्त और कीचड़ से लिप्त कर दिया।
श्लोक 25 (yuddha.55.25)
शरीरशवसंकीर्णा बभूव च वसुंधरा। द्रुमशक्तिगदाप्रासैः शिलापरिघतोमरैः ॥ 55.25 ॥
śarīraśavasaṃkīrṇā babhūva ca vasuṃdharā| drumaśaktigadāprāsaiḥ śilāparighatomaraiḥ || 55.25 ||
तत्पश्चात् रक्त की धारा से धूल शांत हो गई और पृथ्वी शरीरों और शवों से पट गई।
श्लोक 26 (yuddha.55.26)
राक्षसा हरयस्तूर्णं जघ्नुरन्योन्यमोजसा। बाहुभिः परिघाकारैर्युध्यन्तः पर्वतोपमान् ॥ 55.26 ॥
rākṣasā harayastūrṇaṃ jaghnuranyonyamojasā| bāhubhiḥ parighākārairyudhyantaḥ parvatopamān || 55.26 ||
वृक्षों, शक्तियों, गदाओं, प्रासों, शिलाओं, परिघों और तोमरों से राक्षस और वानर वेगपूर्वक और अत्यंत बल से एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे।
श्लोक 27 (yuddha.55.27)
हरयो भीमकर्माणो राक्षसाञ्जघ्नुराहवे। राक्षसास्त्वभिसंक्रुद्धाः प्रासतोमरपाणयः ॥ 55.27 ॥
harayo bhīmakarmāṇo rākṣasāñjaghnurāhave| rākṣasāstvabhisaṃkruddhāḥ prāsatomarapāṇayaḥ || 55.27 ||
पर्वत के समान शत्रुओं से लोहे के परिघ के समान भुजाओं से युद्ध करते हुए वानरों ने युद्ध में राक्षसों का संहार किया।
श्लोक 28 (yuddha.55.28)
कपीन् निजघ्निरे तत्र शस्त्रैः परमदारुणैः। अकम्पनः सुसंक्रुद्धो राक्षसानां चमूपतिः ॥ 55.28 ॥
kapīn nijaghnire tatra śastraiḥ paramadāruṇaiḥ| akampanaḥ susaṃkruddho rākṣasānāṃ camūpatiḥ || 55.28 ||
भीमकर्मा वानरों ने संघर्ष में राक्षसों का वध किया; और क्रुद्ध राक्षस, हाथों में प्रास और तोमर लिये,
श्लोक 29 (yuddha.55.29)
संहर्षयति तान् सर्वान् राक्षसान् भीमविक्रमान्। हरयस्त्वपि रक्षांसि महाद्रुममहाश्मभिः ॥ 55.29 ॥
saṃharṣayati tān sarvān rākṣasān bhīmavikramān| harayastvapi rakṣāṃsi mahādrumamahāśmabhiḥ || 55.29 ||
वहाँ अत्यंत क्रूर शस्त्रों से वानरों पर प्रहार करने लगे। राक्षसों का सेनापति अत्यंत क्रुद्ध अकंपन,
श्लोक 30 (yuddha.55.30)
विदारयन्त्यभिक्रम्य शस्त्राण्याच्छिद्य वीर्यतः। एतस्मिन्नन्तरे वीरा हरयः कुमुदो नलः ॥ 55.30 ॥
vidārayantyabhikramya śastrāṇyācchidya vīryataḥ| etasminnantare vīrā harayaḥ kumudo nalaḥ || 55.30 ||
उन समस्त भीमपराक्रमी राक्षसों में नया उत्साह भरने लगा; वानर भी बड़े-बड़े वृक्षों और विशाल पत्थरों से,
श्लोक 31 (yuddha.55.31)
मैन्दश्च द्विविदः क्रुद्धाश्चक्रुर्वेगमनुत्तमम्। ते तु वृक्षैर्महावीरा राक्षसानां चमूमुखे ॥ 55.31 ॥
maindaśca dvividaḥ kruddhāścakrurvegamanuttamam| te tu vṛkṣairmahāvīrā rākṣasānāṃ camūmukhe || 55.31 ||
उन पर टूट पड़े, पराक्रम से उनके शस्त्र छीनकर उन्हें विदीर्ण करने लगे। इसी बीच वीर वानर कुमुद और नल,
श्लोक 32 (yuddha.55.32)
कदनं सुमहच्चक्रुर्लीलया हरिपुंगवाः। ममन्थू राक्षसान् सर्वे नानाप्रहरणैर्भृशम् ॥ 55.32 ॥
kadanaṃ sumahaccakrurlīlayā haripuṃgavāḥ| mamanthū rākṣasān sarve nānāpraharaṇairbhṛśam || 55.32 ||
तथा मैंद और द्विविद क्रुद्ध होकर अनुपम वेग दिखाने लगे; वे महावीर राक्षस-सेना के अग्रभाग में वृक्षों के साथ जा पहुँचे।