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युद्धकाण्ड · सर्ग 56

हनुमान द्वारा अकम्पन-वध

सर्ग 55सर्ग-सूचीसर्ग 57

श्लोक 1 (yuddha.56.1)

तद् दृष्ट्वा सुमहत् कर्म कृतं वानरसत्तमैः। क्रोधमाहारयामास युधि तीव्रमकम्पनः ॥ 56.1 ॥

tad dṛṣṭvā sumahat karma kṛtaṃ vānarasattamaiḥ| krodhamāhārayāmāsa yudhi tīvramakampanaḥ || 56.1 ||

उन वानरश्रेष्ठों द्वारा युद्ध में किया गया वह महान् कर्म देखकर अकम्पन को अत्यन्त क्रोध हुआ।

श्लोक 2 (yuddha.56.2)

क्रोधमूर्च्छितरूपस्तु धुन्वन् परमकार्मुकम्। दृष्ट्वा तु कर्म शत्रूणां सारथिं वाक्यमब्रवीत् ॥ 56.2 ॥

krodhamūrcchitarūpastu dhunvan paramakārmukam| dṛṣṭvā tu karma śatrūṇāṃ sārathiṃ vākyamabravīt || 56.2 ||

क्रोध से जिसका रूप विकृत हो गया था, वह अपने विशाल धनुष को हिलाते हुए और शत्रुओं का पराक्रम देखकर, अपने सारथी से यह वचन बोला।

श्लोक 3 (yuddha.56.3)

तत्रैव तावत् त्वरितो रथं प्रापय सारथे। एते च बलिनो घ्नन्ति सुबहून् राक्षसान् रणे ॥ 56.3 ॥

tatraiva tāvat tvarito rathaṃ prāpaya sārathe| ete ca balino ghnanti subahūn rākṣasān raṇe || 56.3 ||

"हे सारथे, शीघ्र ही रथ को वहीं ले चलो; ये बलवान् वानर युद्ध में अनेक राक्षसों का वध कर रहे हैं।

श्लोक 4 (yuddha.56.4)

एते च बलवन्तो वा भीमकोपाश्च वानराः। द्रुमशैलप्रहरणास्तिष्ठन्ति प्रमुखे मम ॥ 56.4 ॥

ete ca balavanto vā bhīmakopāśca vānarāḥ| drumaśailapraharaṇāstiṣṭhanti pramukhe mama || 56.4 ||

ये बलवान् और भयंकर क्रोध से भरे वानर, वृक्षों और पर्वत-शिलाओं को अस्त्र बनाकर मेरे सामने खड़े हैं।

श्लोक 5 (yuddha.56.5)

एतान् निहन्तुमिच्छामि समरश्लाघिनो ह्यहम्। एतैः प्रमथितं सर्वं रक्षसां दृश्यते बलम् ॥ 56.5 ॥

etān nihantumicchāmi samaraślāghino hyaham| etaiḥ pramathitaṃ sarvaṃ rakṣasāṃ dṛśyate balam || 56.5 ||

मैं, जो युद्ध में गर्व करता हूँ, इन्हें मार डालना चाहता हूँ; क्योंकि इन्हीं के द्वारा राक्षसों की सारी सेना कुचली हुई दिखाई देती है।"

श्लोक 6 (yuddha.56.6)

ततः प्रचलिताश्वेन रथेन रथिनां वरः। हरीनभ्यपतद् दूराच्छरजालैरकम्पनः ॥ 56.6 ॥

tataḥ pracalitāśvena rathena rathināṃ varaḥ| harīnabhyapatad dūrāccharajālairakampanaḥ || 56.6 ||

तब रथियों में श्रेष्ठ अकम्पन, वेगवान् अश्वों वाले रथ पर सवार होकर, दूर से ही बाणों के जाल से वानरों पर टूट पड़ा।

श्लोक 7 (yuddha.56.7)

न स्थातुं वानराः शेकुः किं पुनर्योद्धुमाहवे। अकम्पनशरैर्भग्नाः सर्व एवाभिदुद्रुवुः ॥ 56.7 ॥

na sthātuṃ vānarāḥ śekuḥ kiṃ punaryoda‍dhumāhave| akampanaśarairbhagnāḥ sarva evābhidudruvuḥ || 56.7 ||

वानर वहाँ खड़े भी नहीं रह सके, युद्ध करने की तो बात ही क्या; अकम्पन के बाणों से टूटकर वे सभी भाग खड़े हुए।

श्लोक 8 (yuddha.56.8)

तान् मृत्युवशमापन्नानकम्पनशरानुगान्। समीक्ष्य हनुमान् ज्ञातीनुपतस्थे महाबलः ॥ 56.8 ॥

tān mṛtyuvaśamāpannānakampanaśarānugān| samīkṣya hanumān jñātīnupatasthe mahābalaḥ || 56.8 ||

अकम्पन के बाणों से पीछा किए जाते और मृत्यु के वशीभूत होते अपने बन्धुओं को देखकर, महाबली हनुमान उनकी सहायता के लिए आगे बढ़े।

श्लोक 9 (yuddha.56.9)

तं महाप्लवगं दृष्ट्वा सर्वे ते प्लवगर्षभाः। समेत्य समरे वीराः संहृष्टाः पर्यवारयन् ॥ 56.9 ॥

taṃ mahāplavagaṃ dṛṣṭvā sarve te plavagarṣabhāḥ| sametya samare vīrāḥ saṃhṛṣṭāḥ paryavārayan || 56.9 ||

उस महान् वानर को देखकर युद्ध में समस्त वीर वानर-सेनापति हर्षपूर्वक एकत्र होकर उसके चारों ओर आ खड़े हुए।

श्लोक 10 (yuddha.56.10)

व्यवस्थितं हनूमन्तं ते दृष्ट्वा प्लवगर्षभाः। बभूवुर्बलवन्तो हि बलवन्तमुपाश्रिताः ॥ 56.10 ॥

vyavasthitaṃ hanūmantaṃ te dṛṣṭvā plavagarṣabhāḥ| babhūvurbalavanto hi balavantamupāśritāḥ || 56.10 ||

हनुमान को दृढ़तापूर्वक खड़ा देखकर वे वानर-प्रमुख, उस बलवान् का आश्रय पाकर स्वयं भी बलवान् हो गए।

श्लोक 11 (yuddha.56.11)

अकम्पनस्तु शैलाभं हनूमन्तमवस्थितम्। महेन्द्र इव धाराभिः शरैरभिववर्ष ह ॥ 56.11 ॥

akampanastu śailābhaṃ hanūmantamavasthitam| mahendra iva dhārābhiḥ śarairabhivavarṣa ha || 56.11 ||

अकम्पन ने पर्वत के समान अडिग खड़े हनुमान पर, मानो इन्द्र वर्षा की धाराएँ बरसाता हो, उसी प्रकार बाणों की वर्षा कर दी।

श्लोक 12 (yuddha.56.12)

अचिन्तयित्वा बाणौघान् शरीरे पातितान् कपिः। अकम्पनवधार्थाय मनो दध्रे महाबलः ॥ 56.12 ॥

acintayitvā bāṇaughān śarīre pātitān kapiḥ| akampanavadhārthāya mano dadhre mahābalaḥ || 56.12 ||

अपने शरीर पर गिरते हुए तीक्ष्ण बाणों के समूह की परवाह न करते हुए, महाबली वानर हनुमान ने अकम्पन के वध का ही संकल्प किया।

श्लोक 13 (yuddha.56.13)

स प्रहस्य महातेजा हनूमान् मारुतात्मजः। अभिदुद्राव तद्रक्षः कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥ 56.13 ॥

sa prahasya mahātejā hanūmān mārutātmajaḥ| abhidudrāva tadrakṣaḥ kampayanniva medinīm || 56.13 ||

महातेजस्वी पवनपुत्र हनुमान ठठाकर हँसते हुए, मानो पृथ्वी को कँपाते हुए, उस राक्षस की ओर दौड़ पड़े।

श्लोक 14 (yuddha.56.14)

तस्याथ नर्दमानस्य दीप्यमानस्य तेजसा। बभूव रूपं दुर्धर्षं दीप्तस्येव विभावसोः ॥ 56.14 ॥

tasyātha nardamānasya dīpyamānasya tejasā| babhūva rūpaṃ durdharṣaṃ dīptasyeva vibhāvasoḥ || 56.14 ||

गर्जते और तेज से प्रज्वलित होते हुए हनुमान का रूप, प्रज्वलित अग्नि के समान, दुर्धर्ष हो गया।

श्लोक 15 (yuddha.56.15)

आत्मानं त्वप्रहरणं ज्ञात्वा क्रोधसमन्वितः। शैलमुत्पाटयामास वेगेन हरिपुङ्गवः ॥ 56.15 ॥

ātmānaṃ tvapraharaṇaṃ jñātvā krodhasamanvitaḥ| śailamutpāṭayāmāsa vegena haripuṅgavaḥ || 56.15 ||

स्वयं को अस्त्र-रहित जानकर, क्रोध से भरे उस श्रेष्ठ वानर ने वेगपूर्वक एक पर्वत-शिखर उखाड़ लिया।

श्लोक 16 (yuddha.56.16)

गृहीत्वा सुमहाशैलं पाणिनैकेन मारुतिः। स विनद्य महानादं भ्रामयामास वीर्यवान् ॥ 56.16 ॥

gṛhītvā sumahāśailaṃ pāṇinaikena mārutiḥ| sa vinadya mahānādaṃ bhrāmayāmāsa vīryavān || 56.16 ||

उस विशाल शिला को एक ही हाथ से पकड़कर, पराक्रमी मारुतिनन्दन ने भारी गर्जना करते हुए उसे घुमाया।

श्लोक 17 (yuddha.56.17)

ततस्तमभिदुद्राव राक्षसेन्द्रमकम्पनम्। पुरा हि नमुचिं संख्ये वज्रेणेव पुरंदरः ॥ 56.17 ॥

tatastamabhidudrāva rākṣasendramakampanam| purā hi namuciṃ saṃkhye vajreṇeva puraṃdaraḥ || 56.17 ||

फिर वे राक्षसराज अकम्पन की ओर उसी प्रकार झपटे जैसे पूर्वकाल में इन्द्र ने वज्र लेकर युद्ध में नमुचि पर आक्रमण किया था।

श्लोक 18 (yuddha.56.18)

अकम्पनस्तु तद् दृष्ट्वा गिरिशृङ्गं समुद्यतम्। दूरादेव महाबाणैरर्धचन्द्रैर्व्यदारयत् ॥ 56.18 ॥

akampanastu tad dṛṣṭvā giriśṛṅgaṃ samudyatam| dūrādeva mahābāṇairardhacandrairvyadārayat || 56.18 ||

उस उठाए हुए पर्वत-शिखर को देखकर अकम्पन ने दूर से ही अपने विशाल अर्धचन्द्राकार बाणों से उसे चूर-चूर कर दिया।

श्लोक 19 (yuddha.56.19)

तं पर्वताग्रमाकाशे रक्षोबाणविदारितम्। विकीर्णं पतितं दृष्ट्वा हनूमान् क्रोधमूर्च्छितः ॥ 56.19 ॥

taṃ parvatāgramākāśe rakṣobāṇavidāritam| vikīrṇaṃ patitaṃ dṛṣṭvā hanūmān krodhamūrcchitaḥ || 56.19 ||

उस राक्षस के बाणों से आकाश में ही चूर होकर बिखरते और गिरते उस पर्वत-शिखर को देखकर हनुमान क्रोध से उन्मत्त हो गए।

श्लोक 20 (yuddha.56.20)

सोऽश्वकर्णं समासाद्य रोषदर्पान्वितो हरिः। तूर्णमुत्पाटयामास महागिरिमिवोच्छ्रितम् ॥ 56.20 ॥

so'śvakarṇaṃ samāsādya roṣadarpānvito hariḥ| tūrṇamutpāṭayāmāsa mahāgirimivocchritam || 56.20 ||

क्रोध और आवेश से भरे उस वानर ने एक विशाल अश्वकर्ण वृक्ष के पास जाकर, पर्वत के समान ऊँचे उस वृक्ष को तुरन्त उखाड़ लिया।

श्लोक 21 (yuddha.56.21)

तं गृहीत्वा महास्कन्धं सोऽश्वकर्णं महाद्युतिः। प्रगृह्य परया प्रीत्या भ्रामयामास संयुगे ॥ 56.21 ॥

taṃ gṛhītvā mahāskandhaṃ so'śvakarṇaṃ mahādyutiḥ| pragṛhya parayā prītyā bhrāmayāmāsa saṃyuge || 56.21 ||

विशाल तने वाले उस अश्वकर्ण वृक्ष को पकड़कर, महातेजस्वी हनुमान ने अत्यन्त प्रसन्नता से उसे धरती पर घुमाया।

श्लोक 22 (yuddha.56.22)

प्रधावन्नुरुवेगेन बभञ्ज तरसा द्रुमान्। हनूमान् परमक्रुद्धश्चरणैर्दारयन् महीम् ॥ 56.22 ॥

pradhāvannuruvegena babhañja tarasā drumān| hanūmān paramakruddhaścaraṇairdārayan mahīm || 56.22 ||

अत्यन्त वेग से दौड़ते हुए, अपने बल से वृक्षों को तोड़ते हुए, परम क्रुद्ध हनुमान अपने चरणों से धरती को विदीर्ण करने लगे।

श्लोक 23 (yuddha.56.23)

गजांश्च सगजारोहान् सरथान् रथिनस्तथा। जघान हनुमान् धीमान् राक्षसांश्च पदातिगान् ॥ 56.23 ॥

gajāṃśca sagajārohān sarathān rathinastathā| jaghāna hanumān dhīmān rākṣasāṃśca padātigān || 56.23 ||

बुद्धिमान् हनुमान ने हाथियों को उनके सवारों सहित, रथियों को उनके रथों सहित, तथा पैदल राक्षसों को भी मार गिराया।

श्लोक 24 (yuddha.56.24)

तमन्तकमिव क्रुद्धं सद्रुमं प्राणहारिणम्। हनूमन्तमभिप्रेक्ष्य राक्षसा विप्रदुद्रुवुः ॥ 56.24 ॥

tamantakamiva kruddhaṃ sadrumaṃ prāṇahāriṇam| hanūmantamabhiprekṣya rākṣasā vipradudruvuḥ || 56.24 ||

समर में प्राणहारी और क्रुद्ध यमराज के समान उस हनुमान को देखकर राक्षस भाग खड़े हुए।

श्लोक 25 (yuddha.56.25)

तमापतन्तं संक्रुद्धं राक्षसानां भयावहम्। ददर्शाकम्पनो वीरश्चुक्षोभ च ननाद च ॥ 56.25 ॥

tamāpatantaṃ saṃkruddhaṃ rākṣasānāṃ bhayāvaham| dadarśākampano vīraścukṣobha ca nanāda ca || 56.25 ||

राक्षसों में भय उत्पन्न करते हुए उस अत्यन्त क्रुद्ध वेग से आते हनुमान को देखकर वीर अकम्पन क्षुब्ध हुआ और गरज उठा।

श्लोक 26 (yuddha.56.26)

स चतुर्दशभिर्बाणैर्निशितैर्देहदारणैः। निर्बिभेद महावीर्यं हनूमन्तमकम्पनः ॥ 56.26 ॥

sa caturdaśabhirbāṇairniśitairdehadāraṇaiḥ| nirbibheda mahāvīryaṃ hanūmantamakampanaḥ || 56.26 ||

अकम्पन ने चौदह तीक्ष्ण, शरीर को विदीर्ण करने वाले बाणों से महापराक्रमी हनुमान को बींध दिया।

श्लोक 27 (yuddha.56.27)

स तथा विप्रकीर्णस्तु नाराचैः शितशक्तिभिः। हनूमान् ददृशे वीरः प्ररूढ इव सानुमान् ॥ 56.27 ॥

sa tathā viprakīrṇastu nārācaiḥ śitaśaktibhiḥ| hanūmān dadṛśe vīraḥ prarūḍha iva sānumān || 56.27 ||

उन अनेक तीक्ष्ण शक्तियों से बिंधे हुए वीर हनुमान ऐसे दिखाई देने लगे जैसे अंकुरों से आच्छादित कोई पर्वत।

श्लोक 28 (yuddha.56.28)

विरराज महावीर्यो महाकायो महाबलः। पुष्पिताशोकसंकाशो विधूम इव पावकः ॥ 56.28 ॥

virarāja mahāvīryo mahākāyo mahābalaḥ| puṣpitāśokasaṃkāśo vidhūma iva pāvakaḥ || 56.28 ||

वे महापराक्रमी, विशालकाय, महाबली हनुमान खिले हुए अशोक वृक्ष के समान, अथवा धुआँरहित अग्नि के समान, शोभायमान हो रहे थे।

श्लोक 29 (yuddha.56.29)

ततोऽन्यं वृक्षमुत्पाट्य कृत्वा वेगमनुत्तमम्। शिरस्याभिजघानाशु राक्षसेन्द्रमकम्पनम् ॥ 56.29 ॥

tato'nyaṃ vṛkṣamutpāṭya kṛtvā vegamanuttamam| śirasyābhijaghānāśu rākṣasendramakampanam || 56.29 ||

फिर एक अन्य वृक्ष को उखाड़कर, अत्यन्त वेग से, हनुमान ने राक्षसराज अकम्पन के सिर पर शीघ्र आघात किया।

श्लोक 30 (yuddha.56.30)

स वृक्षेण हतस्तेन सक्रोधेन महात्मना। राक्षसो वानरेन्द्रेण पपात च ममार च ॥ 56.30 ॥

sa vṛkṣeṇa hatastena sakrodhena mahātmanā| rākṣaso vānarendreṇa papāta ca mamāra ca || 56.30 ||

उस क्रोधित महात्मा वानरश्रेष्ठ के वृक्ष-प्रहार से आहत होकर वह राक्षस गिर पड़ा और मर गया।

श्लोक 31 (yuddha.56.31)

तं दृष्ट्वा निहतं भूमौ राक्षसेन्द्रमकम्पनम्। व्यथिता राक्षसाः सर्वे क्षितिकम्प इव द्रुमाः ॥ 56.31 ॥

taṃ dṛṣṭvā nihataṃ bhūmau rākṣasendramakampanam| vyathitā rākṣasāḥ sarve kṣitikampa iva drumāḥ || 56.31 ||

राक्षसराज अकम्पन को भूमि पर मरा हुआ देखकर सभी राक्षस उसी प्रकार काँप उठे जैसे भूकम्प में वृक्ष काँपते हैं।

श्लोक 32 (yuddha.56.32)

त्यक्तप्रहरणाः सर्वे राक्षसास्ते पराजिताः। लङ्कामभिययुस्त्रासाद् वानरैस्तैरभिद्रुताः ॥ 56.32 ॥

tyaktapraharaṇāḥ sarve rākṣasāste parājitāḥ| laṅkāmabhiyayustrāsād vānaraistairabhidrutāḥ || 56.32 ||

पराजित हुए वे सभी राक्षस अपने अस्त्र-शस्त्र त्यागकर, भय से व्याकुल होकर तथा उन वानरों द्वारा खदेड़े जाते हुए, लंका की ओर भाग गए।

श्लोक 33 (yuddha.56.33)

ते मुक्तकेशाः सम्भ्रान्ता भग्नमानाः पराजिताः। भयाच्छ्रमजलैरङ्गैः प्रस्रवद्भिर्विदुद्रुवुः ॥ 56.33 ॥

te muktakeśāḥ sambhrāntā bhagnamānāḥ parājitāḥ| bhayācchramajalairaṅgaiḥ prasravadbhirvidudruvuḥ || 56.33 ||

बिखरे केशों वाले, घबराए हुए, पराजय से टूटे हुए अभिमान वाले वे राक्षस, भय के कारण पसीने से तर-बतर शरीर लिये हाँफते हुए भाग गए।

श्लोक 34 (yuddha.56.34)

अन्योन्यं ये प्रमथ्नन्तो विविशुर्नगरं भयात्। पृष्ठतस्ते तु सम्मूढाः प्रेक्षमाणा मुहुर्मुहुः ॥ 56.34 ॥

anyonyaṃ ye pramathnanto viviśurnagaraṃ bhayāt| pṛṣṭhataste tu sammūḍhāḥ prekṣamāṇā muhurmuhuḥ || 56.34 ||

एक-दूसरे को रौंदते हुए वे भय से नगर में घुस गए, और बार-बार पीछे मुड़कर देखते हुए अत्यन्त व्याकुल हो रहे थे।

श्लोक 35 (yuddha.56.35)

तेषु लङ्कां प्रविष्टेषु राक्षसेषु महाबलाः। समेत्य हरयः सर्वे हनूमन्तमपूजयन् ॥ 56.35 ॥

teṣu laṅkāṃ praviṣṭeṣu rākṣaseṣu mahābalāḥ| sametya harayaḥ sarve hanūmantamapūjayan || 56.35 ||

जब वे राक्षस लंका में प्रवेश कर गए, तब सभी महाबली वानर एकत्र होकर हनुमान का सम्मान करने लगे।

श्लोक 36 (yuddha.56.36)

सोऽपि प्रवृद्धस्तान् सर्वान् हरीन् सम्प्रत्यपूजयत्। हनूमान् सत्त्वसम्पन्नो यथार्हमनुकूलतः ॥ 56.36 ॥

so'pi pravṛddhastān sarvān harīn sampratyapūjayat| hanūmān sattvasampanno yathārhamanukūlataḥ || 56.36 ||

सत्त्वसम्पन्न हनुमान ने भी प्रसन्न होकर उन सब वानरों का यथोचित एवं अनुकूल सम्मान किया।

श्लोक 37 (yuddha.56.37)

विनेदुश्च यथाप्राणं हरयो जितकाशिनः। चकृषुश्च पुनस्तत्र सप्राणानेव राक्षसान् ॥ 56.37 ॥

vineduśca yathāprāṇaṃ harayo jitakāśinaḥ| cakṛṣuśca punastatra saprāṇāneva rākṣasān || 56.37 ||

विजयी वानरों ने प्राणपण से गर्जना की और वहाँ जीवित बचे राक्षसों को फिर से घसीटा।

श्लोक 38 (yuddha.56.38)

स वीरशोभामभजन्महाकपिः समेत्य रक्षांसि निहत्य मारुतिः। महासुरं भीमममित्रनाशनं विष्णुर्यथैवोरुबलं चमूमुखे ॥ 56.38 ॥

sa vīraśobhāmabhajanmahākapiḥ sametya rakṣāṃsi nihatya mārutiḥ| mahāsuraṃ bhīmamamitranāśanaṃ viṣṇuryathaivorubalaṃ camūmukhe || 56.38 ||

उस महाकपि पवनपुत्र ने राक्षसों का सामना कर उन्हें मारकर वैसी ही वीर-शोभा प्राप्त की, जैसे विष्णु ने सेना के अग्रभाग में शत्रुनाशक विशाल बलशाली महाअसुर को मारकर प्राप्त की थी।

श्लोक 39 (yuddha.56.39)

अपूजयन् देवगणास्तदाकपिं स्वयं च रामोऽतिबलश्च लक्ष्मणः। तथैव सुग्रीवमुखाः प्लवंगमा विभीषणश्चैव महाबलस्तदा ॥ 56.39 ॥

apūjayan devagaṇāstadākapiṃ svayaṃ ca rāmo'tibalaśca lakṣmaṇaḥ| tathaiva sugrīvamukhāḥ plavaṃgamā vibhīṣaṇaścaiva mahābalastadā || 56.39 ||

तब देवताओं के समूहों ने, स्वयं राम ने, अत्यन्त बलशाली लक्ष्मण ने, सुग्रीव आदि वानरों ने और महाबली विभीषण ने भी उस वानर हनुमान का सम्मान किया।

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