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युद्धकाण्ड · सर्ग 59

रावण की पराजय

सर्ग 58सर्ग-सूचीसर्ग 60

श्लोक 1 (yuddha.59.1)

तस्मिन् हते राक्षससैन्यपाले प्लवंगमानामृषभेण युद्धे। भीमायुधं सागरवेगतुल्यं विदुद्रुवे राक्षसराजसैन्यम् ॥ 59.1 ॥

tasmin hate rākṣasasainyapāle plavaṃgamānāmṛṣabheṇa yuddhe| bhīmāyudhaṃ sāgaravegatulyaṃ vidudruve rākṣasarājasainyam || 59.1 ||

युद्ध में वानरश्रेष्ठ द्वारा उस राक्षस-सेनापति के मारे जाने पर, भयंकर अस्त्रों वाली और समुद्र के वेग के समान विशाल राक्षसराज की सेना भाग खड़ी हुई।

श्लोक 2 (yuddha.59.2)

गत्वा तु रक्षोधिपतेः शशंसुः सेनापतिं पावकसूनुशस्तम्। तच्चापि तेषां वचनं निशम्य रक्षोधिपः क्रोधवशं जगाम ॥ 59.2 ॥

gatvā tu rakṣodhipateḥ śaśaṃsuḥ senāpatiṃ pāvakasūnuśastam| taccāpi teṣāṃ vacanaṃ niśamya rakṣodhipaḥ krodhavaśaṃ jagāma || 59.2 ||

राक्षसराज के पास जाकर उन्होंने बताया कि उनका सेनापति अग्निपुत्र नील द्वारा मार डाला गया है। उनके वचन सुनकर राक्षसराज क्रोध के वशीभूत हो गया।

श्लोक 3 (yuddha.59.3)

संख्ये प्रहस्तं निहतं निशम्य क्रोधार्दितः शोकपरीतचेताः। उवाच तान् राक्षसयूथमुख्या- निन्द्रो यथा निर्जरयूथमुख्यान् ॥ 59.3 ॥

saṃkhye prahastaṃ nihataṃ niśamya krodhārditaḥ śokaparītacetāḥ| uvāca tān rākṣasayūthamukhyā- nindro yathā nirjarayūthamukhyān || 59.3 ||

युद्ध में प्रहस्त के मारे जाने का समाचार सुनकर, क्रोध और शोक से व्याकुल होकर, उसने राक्षस-सेनाध्यक्षों को उसी प्रकार सम्बोधित किया जैसे इन्द्र देवताओं के प्रमुखों को सम्बोधित करता है।

श्लोक 4 (yuddha.59.4)

नावज्ञा रिपवे कार्या यैरिन्द्रबलसादनः। सूदितः सैन्यपालो मे सानुयात्रः सकुञ्जरः ॥ 59.4 ॥

nāvajñā ripave kāryā yairindrabalasādanaḥ| sūditaḥ sainyapālo me sānuyātraḥ sakuñjaraḥ || 59.4 ||

"शत्रु का कभी तिरस्कार नहीं करना चाहिए -- उन्हीं वानरों ने मेरे उस सेनापति को, जो इन्द्र के बल को भी परास्त कर सकता था, उसके अनुचरों और हाथियों सहित मार डाला है।"

श्लोक 5 (yuddha.59.5)

सोऽहं रिपुविनाशाय विजयायाविचारयन्। स्वयमेव गमिष्यामि रणशीर्षं तदद्भुतम् ॥ 59.5 ॥

so'haṃ ripuvināśāya vijayāyāvicārayan| svayameva gamiṣyāmi raṇaśīrṣaṃ tadadbhutam || 59.5 ||

"इसलिए मैं स्वयं, बिना और विचार किए, शत्रु के विनाश और विजय के लिए उस अद्भुत रणभूमि के अग्रभाग में जाऊँगा।"

श्लोक 6 (yuddha.59.6)

अद्य तद् वानरानीकं रामं च सहलक्ष्मणम्। निर्दहिष्यामि बाणौघैर्वनं दीप्तैरिवाग्निभिः। अद्य संतर्पयिष्यामि पृथिवीं कपिशोणितैः ॥ 59.6 ॥

adya tad vānarānīkaṃ rāmaṃ ca sahalakṣmaṇam| nirdahiṣyāmi bāṇaughairvanaṃ dīptairivāgnibhiḥ| adya saṃtarpayiṣyāmi pṛthivīṃ kapiśoṇitaiḥ || 59.6 ||

"आज मैं उस वानर-सेना को, तथा लक्ष्मण सहित राम को, बाणों की बाढ़ से इस प्रकार भस्म कर दूँगा जैसे प्रज्वलित अग्नि वन को जला डालती है। आज मैं पृथ्वी को वानरों के रक्त से तृप्त करूँगा।"

श्लोक 7 (yuddha.59.7)

स एवमुक्त्वा ज्वलनप्रकाशं रथं तुरंगोत्तमराजियुक्तम्। प्रकाशमानं वपुषा ज्वलन्तं समारुरोहामरराजशत्रुः ॥ 59.7 ॥

sa evamuktvā jvalanaprakāśaṃ rathaṃ turaṃgottamarājiyuktam| prakāśamānaṃ vapuṣā jvalantaṃ samārurohāmararājaśatruḥ || 59.7 ||

यह कहकर देवराज के उस शत्रु ने अपने अग्नि के समान देदीप्यमान, उत्तम अश्वों की पंक्ति से युक्त, तेजस्वी और ज्वलंत रथ पर आरोहण किया।

श्लोक 8 (yuddha.59.8)

स शङ्खभेरीपणवप्रणादै- रास्फोटितक्ष्वेडितसिंहनादैः । पुण्यैः स्तवैश्चापि सुपूज्यमान- स्तदा ययौ राक्षसराजमुख्यः ॥ 59.8 ॥

sa śaṅkhabherīpaṇavapraṇādai- rāsphoṭitakṣveḍitasiṃhanādaiḥ | puṇyaiḥ stavaiścāpi supūjyamāna- stadā yayau rākṣasarājamukhyaḥ || 59.8 ||

तब वह राक्षसराज-श्रेष्ठ शंख, नगाड़ों और पणवों की ध्वनि से, भुजाओं की थपथपाहट और सिंह-गर्जनाओं से, तथा पवित्र स्तुतियों से सम्मानित होता हुआ आगे बढ़ा।

श्लोक 9 (yuddha.59.9)

स शैलजीमूतनिकाशरूपै- र्मांसाशनैः पावकदीप्तनेत्रैः। बभौ वृतो राक्षसराजमुख्यो भूतैर्वृतो रुद्र इवामरेशः ॥ 59.9 ॥

sa śailajīmūtanikāśarūpai- rmāṃsāśanaiḥ pāvakadīptanetraiḥ| babhau vṛto rākṣasarājamukhyo bhūtairvṛto rudra ivāmareśaḥ || 59.9 ||

पर्वतों और मेघों के समान आकार वाले, मांसभक्षी, अग्नि के समान प्रज्वलित नेत्रों वाले भूतों से घिरा हुआ वह राक्षसराज-श्रेष्ठ उसी प्रकार शोभित हो रहा था जैसे भूत-गणों से घिरे देवेश रुद्र।

श्लोक 10 (yuddha.59.10)

ततो नगर्याः सहसा महौजा निष्क्रम्य तद् वानरसैन्यमुग्रम्। महार्णवाभ्रस्तनितं ददर्श समुद्यतं पादपशैलहस्तम् ॥ 59.10 ॥

tato nagaryāḥ sahasā mahaujā niṣkramya tad vānarasainyamugram| mahārṇavābhrastanitaṃ dadarśa samudyataṃ pādapaśailahastam || 59.10 ||

तब वह महातेजस्वी राक्षस नगरी से अचानक निकलकर उस भयंकर वानर-सेना को देखने लगा, जो महासागर या मेघों के समान गर्जनशील थी और वृक्षों तथा शिलाओं को हाथों में लिए तैयार खड़ी थी।

श्लोक 11 (yuddha.59.11)

तद् राक्षसानीकमतिप्रचण्ड- मालोक्य रामो भुजगेन्द्रबाहुः। विभीषणं शस्त्रभृतां वरिष्ठ- मुवाच सेनानुगतः पृथुश्रीः ॥ 59.11 ॥

tad rākṣasānīkamatipracaṇḍa- mālokya rāmo bhujagendrabāhuḥ| vibhīṣaṇaṃ śastrabhṛtāṃ variṣṭha- muvāca senānugataḥ pṛthuśrīḥ || 59.11 ||

उस अत्यन्त प्रचण्ड राक्षस-सेना को देखकर, सर्पराज की भुजाओं के समान भुजाओं वाले, विशाल श्रीसम्पन्न और सेना से घिरे राम ने अस्त्रधारियों में श्रेष्ठ विभीषण से कहा।

श्लोक 12 (yuddha.59.12)

नानापताकाध्वजछत्रजुष्टं प्रासासिशूलायुधशस्त्रजुष्टम्। कस्येदमक्षोभ्यमभीरुजुष्टं सैन्यं महेन्द्रोपमनागजुष्टम् ॥ 59.12 ॥

nānāpatākādhvajachatrajuṣṭaṃ prāsāsiśūlāyudhaśastrajuṣṭam| kasyedamakṣobhyamabhīrujuṣṭaṃ sainyaṃ mahendropamanāgajuṣṭam || 59.12 ||

"यह अनेक पताकाओं, ध्वजाओं और छत्रों से युक्त, बरछों, तलवारों, त्रिशूलों और नाना अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित, निर्भीक योद्धाओं वाली और इन्द्र के गजराज के समान हाथियों से युक्त अडिग सेना किसकी है?"

श्लोक 13 (yuddha.59.13)

ततस्तु रामस्य निशम्य वाक्यं विभीषणः शक्रसमानवीर्यः। शशंस रामस्य बलप्रवेकं महात्मनां राक्षसपुंगवानाम् ॥ 59.13 ॥

tatastu rāmasya niśamya vākyaṃ vibhīṣaṇaḥ śakrasamānavīryaḥ| śaśaṃsa rāmasya balapravekaṃ mahātmanāṃ rākṣasapuṃgavānām || 59.13 ||

तब राम के वचन सुनकर, इन्द्र के समान पराक्रमी विभीषण ने राम को उन महात्मा राक्षसश्रेष्ठों तथा उस सेना के प्रमुख वीरों के विषय में बताया।

श्लोक 14 (yuddha.59.14)

योऽसौ गजस्कन्धगतो महात्मा नवोदितार्कोपमताम्रवक्त्रः। संकम्पयन्नागशिरोऽभ्युपैति ह्यकम्पनं त्वेनमवेहि राजन् ॥ 59.14 ॥

yo'sau gajaskandhagato mahātmā navoditārkopamatāmravaktraḥ| saṃkampayannāgaśiro'bhyupaiti hyakampanaṃ tvenamavehi rājan || 59.14 ||

"हाथी के कंधे पर बैठा हुआ, नवोदित सूर्य के समान ताम्रवर्ण मुख वाला, हाथी के सिर को कँपाते हुए आगे बढ़ने वाला वह महात्मा -- हे राजन्, उसे अकम्पन जानो।"

श्लोक 15 (yuddha.59.15)

योऽसौ रथस्थो मृगराजकेतु- र्धुन्वन् धनुः शक्रधनुःप्रकाशम्। करीव भात्युग्रविवृत्तदंष्ट्रः स इन्द्रजिन्नाम वरप्रधानः ॥ 59.15 ॥

yo'sau rathastho mṛgarājaketu- rdhunvan dhanuḥ śakradhanuḥprakāśam| karīva bhātyugravivṛttadaṃṣṭraḥ sa indrajinnāma varapradhānaḥ || 59.15 ||

"जो सिंह-ध्वज वाले रथ पर खड़ा, इन्द्रधनुष के समान चमकते धनुष को हिलाता हुआ, विकराल दाढ़ों वाले हाथी के समान शोभित हो रहा है -- वह वरों में श्रेष्ठ इन्द्रजित नाम का है।"

श्लोक 16 (yuddha.59.16)

यश्चैष विन्ध्यास्तमहेन्द्रकल्पो धन्वी रथस्थोऽतिरथोऽतिवीरः। विस्फारयंश्चापमतुल्यमानं नाम्नातिकायोऽतिविवृद्धकायः ॥ 59.16 ॥

yaścaiṣa vindhyāstamahendrakalpo dhanvī rathastho'tiratho'tivīraḥ| visphārayaṃścāpamatulyamānaṃ nāmnātikāyo'tivivṛddhakāyaḥ || 59.16 ||

"जो विंध्य या महेन्द्र पर्वत के समान, रथ पर धनुर्धर, अत्यन्त पराक्रमी महारथी, अपने अनुपम धनुष को झंकृत करता हुआ खड़ा है -- वह विशालकाय अतिकाय नाम का है।"

श्लोक 17 (yuddha.59.17)

योऽसौ नवार्कोदितताम्रचक्षु- रारुह्य घण्टानिनदप्रणादम्। गजं खरं गर्जति वै महात्मा महोदरो नाम स एष वीरः ॥ 59.17 ॥

yo'sau navārkoditatāmracakṣu- rāruhya ghaṇṭāninadapraṇādam| gajaṃ kharaṃ garjati vai mahātmā mahodaro nāma sa eṣa vīraḥ || 59.17 ||

"नवोदित सूर्य के समान ताम्रवर्ण नेत्रों वाला, घंटा-ध्वनि करते कर्कश हाथी पर सवार, गर्जना करता हुआ वह महात्मा वीर -- उसका नाम महोदर है।"

श्लोक 18 (yuddha.59.18)

योऽसौ हयं काञ्चनचित्रभाण्ड- मारुह्य संध्याभ्रगिरिप्रकाशम्। प्रासं समुद्यम्य मरीचिनद्धं पिशाच एषोऽशनितुल्यवेगः ॥ 59.18 ॥

yo'sau hayaṃ kāñcanacitrabhāṇḍa- māruhya saṃdhyābhragiriprakāśam| prāsaṃ samudyamya marīcinaddhaṃ piśāca eṣo'śanitulyavegaḥ || 59.18 ||

"स्वर्ण के चित्र-विचित्र साज-सामान से सुसज्जित, संध्या के मेघ-पर्वत के समान चमकते अश्व पर सवार, प्रकाश से दीप्त बरछे को उठाए हुए -- वह वज्र के समान वेगवान् पिशाच है।"

श्लोक 19 (yuddha.59.19)

यश्चैष शूलं निशितं प्रगृह्य विद्युत्प्रभं किंकरवज्रवेगम्। वृषेन्द्रमास्थाय शशिप्रकाश- मायाति योऽसौ त्रिशिरा यशस्वी ॥ 59.19 ॥

yaścaiṣa śūlaṃ niśitaṃ pragṛhya vidyutprabhaṃ kiṃkaravajravegam| vṛṣendramāsthāya śaśiprakāśa- māyāti yo'sau triśirā yaśasvī || 59.19 ||

"जो बिजली के समान चमकते, वज्र के दूत के समान वेगवान् तीक्ष्ण त्रिशूल को धारण किए, चन्द्रमा के समान श्वेत वृषभ पर बैठकर आगे बढ़ रहा है -- वह यशस्वी त्रिशिरा है।"

श्लोक 20 (yuddha.59.20)

असौ च जीमूतनिकाशरूपः कुम्भः पृथुव्यूढसुजातवक्षाः। समाहितः पन्नगराजकेतु- र्विस्फारयन् याति धनुर्विधुन्वन् ॥ 59.20 ॥

asau ca jīmūtanikāśarūpaḥ kumbhaḥ pṛthuvyūḍhasujātavakṣāḥ| samāhitaḥ pannagarājaketu- rvisphārayan yāti dhanurvidhunvan || 59.20 ||

"और वह मेघ के समान श्याम वर्ण, चौड़ी सुगठित छाती वाला, नागराज के चिह्न से युक्त ध्वजा वाला -- वह कुम्भ है, जो धीर-गम्भीर होकर अपने धनुष को झंकृत करता हुआ आगे बढ़ रहा है।"

श्लोक 21 (yuddha.59.21)

यश्चैष जाम्बूनदवज्रजुष्टं दीप्तं सधूमं परिघं प्रगृह्य। आयाति रक्षोबलकेतुभूतो योऽसौ निकुम्भोऽद्भुतघोरकर्मा ॥ 59.21 ॥

yaścaiṣa jāmbūnadavajrajuṣṭaṃ dīptaṃ sadhūmaṃ parighaṃ pragṛhya| āyāti rakṣobalaketubhūto yo'sau nikumbho'dbhutaghorakarmā || 59.21 ||

"जो स्वर्ण और वज्र-मणियों से जड़ित, धुआँ उगलते प्रज्वलित परिघ को उठाए, राक्षस-सेना के ध्वज-स्वरूप आगे बढ़ रहा है -- वह अद्भुत-घोर कर्मों वाला निकुम्भ है।"

श्लोक 22 (yuddha.59.22)

यश्चैष चापासिशरौघजुष्टं पताकिनं पावकदीप्तरूपम्। रथं समास्थाय विभात्युदग्रो नरान्तकोऽसौ नगशृङ्गयोधी ॥ 59.22 ॥

yaścaiṣa cāpāsiśaraughajuṣṭaṃ patākinaṃ pāvakadīptarūpam| rathaṃ samāsthāya vibhātyudagro narāntako'sau nagaśṛṅgayodhī || 59.22 ||

"जो धनुष, तलवार और बाणों की बाढ़ से युक्त, पताका-युक्त, अग्नि के समान देदीप्यमान रथ पर आरूढ़ होकर उन्नत भाव से शोभित हो रहा है -- वह पर्वत-शिखरों से युद्ध करने वाला नरान्तक है।"

श्लोक 23 (yuddha.59.23)

यश्चैष नानाविधघोररूपै- र्व्याघ्रोष्ट्रनागेन्द्रमृगाश्ववक्त्रैः । भूतैर्वृतो भाति विवृत्तनेत्रै- र्योऽसौ सुराणामपि दर्पहन्ता ॥ 59.23 ॥

yaścaiṣa nānāvidhaghorarūpai- rvyāghroṣṭranāgendramṛgāśvavaktraiḥ | bhūtairvṛto bhāti vivṛttanetrai- ryo'sau surāṇāmapi darpahantā || 59.23 ||

"जो व्याघ्र, ऊँट, गजराज, मृग और अश्व के मुख वाले, घूमती आँखों वाले, नाना भयंकर रूपधारी भूतों से घिरा हुआ शोभित हो रहा है -- वह देवताओं के अभिमान का भी नाशक है।"

श्लोक 24 (yuddha.59.24)

यत्रैतदिन्दुप्रतिमं विभाति छत्रं सितं सूक्ष्मशलाकमग्र्यम्। अत्रैष रक्षोधिपतिर्महात्मा भूतैर्वृतो रुद्र इवावभाति ॥ 59.24 ॥

yatraitadindupratimaṃ vibhāti chatraṃ sitaṃ sūkṣmaśalākamagryam| atraiṣa rakṣodhipatirmahātmā bhūtairvṛto rudra ivāvabhāti || 59.24 ||

"जहाँ वह चन्द्रमा के समान श्वेत, सूक्ष्म तीलियों वाला, अद्वितीय छत्र चमक रहा है -- वहाँ वह महात्मा राक्षसराज, अपने भूत-गणों से घिरा हुआ, रुद्र के समान शोभायमान हो रहा है।"

श्लोक 25 (yuddha.59.25)

असौ किरीटी चलकुण्डलास्यो नगेन्द्रविन्ध्योपमभीमकायः। महेन्द्रवैवस्वतदर्पहन्ता रक्षोधिपः सूर्य इवावभाति ॥ 59.25 ॥

asau kirīṭī calakuṇḍalāsyo nagendravindhyopamabhīmakāyaḥ| mahendravaivasvatadarpahantā rakṣodhipaḥ sūrya ivāvabhāti || 59.25 ||

"मुकुट धारण किए, हिलते हुए कुण्डलों से सुशोभित मुख वाला, विंध्य पर्वत के समान भयंकर शरीर वाला, इन्द्र और यम के अभिमान का नाशक -- वह राक्षसराज सूर्य के समान देदीप्यमान हो रहा है।"

श्लोक 26 (yuddha.59.26)

प्रत्युवाच ततो रामो विभीषणमरिंदमः। अहो दीप्तमहातेजा रावणो राक्षसेश्वरः ॥ 59.26 ॥

pratyuvāca tato rāmo vibhīṣaṇamariṃdamaḥ| aho dīptamahātejā rāvaṇo rākṣaseśvaraḥ || 59.26 ||

तब शत्रुदमन राम ने विभीषण को उत्तर दिया: "अहो, राक्षसराज रावण का तेज कितना प्रज्वलित और महान् है!"

श्लोक 27 (yuddha.59.27)

आदित्य इव दुष्प्रेक्ष्यो रश्मिभिर्भाति रावणः। न व्यक्तं लक्षये ह्यस्य रूपं तेजःसमावृतम् ॥ 59.27 ॥

āditya iva duṣprekṣyo raśmibhirbhāti rāvaṇaḥ| na vyaktaṃ lakṣaye hyasya rūpaṃ tejaḥsamāvṛtam || 59.27 ||

"सूर्य के समान अपनी किरणों से दुर्दर्श रावण चमक रहा है; मैं उसके तेज से आवृत रूप को स्पष्ट रूप से नहीं देख पा रहा हूँ।"

श्लोक 28 (yuddha.59.28)

देवदानववीराणां वपुर्नैवंविधं भवेत्। यादृशं राक्षसेन्द्रस्य वपुरेतद् विराजते ॥ 59.28 ॥

devadānavavīrāṇāṃ vapurnaivaṃvidhaṃ bhavet| yādṛśaṃ rākṣasendrasya vapuretad virājate || 59.28 ||

"देवताओं और दानवों के वीरों का भी ऐसा शरीर नहीं होता, जैसा यह राक्षसराज का शरीर सुशोभित हो रहा है।"

श्लोक 29 (yuddha.59.29)

सर्वे पर्वतसंकाशाः सर्वे पर्वतयोधिनः। सर्वे दीप्तायुधधरा योधास्तस्य महात्मनः ॥ 59.29 ॥

sarve parvatasaṃkāśāḥ sarve parvatayodhinaḥ| sarve dīptāyudhadharā yodhāstasya mahātmanaḥ || 59.29 ||

"उस महात्मा के सभी योद्धा पर्वतों के समान हैं, सभी पर्वतों से युद्ध करने वाले हैं, सभी दीप्त अस्त्रों को धारण किए हुए हैं।"

श्लोक 30 (yuddha.59.30)

विभाति रक्षोराजोऽसौ प्रदीप्तैर्भीमदर्शनैः। भूतैः परिवृतस्तीक्ष्णैर्देहवद्भिरिवान्तकः ॥ 59.30 ॥

vibhāti rakṣorājo'sau pradīptairbhīmadarśanaiḥ| bhūtaiḥ parivṛtastīkṣṇairdehavadbhirivāntakaḥ || 59.30 ||

"वह राक्षसराज, प्रज्वलित, भयंकर दिखने वाले तीक्ष्ण भूतों से घिरा हुआ, मानो देहधारी यमराज के समान शोभित हो रहा है।"

श्लोक 31 (yuddha.59.31)

दिष्ट्यायमद्य पापात्मा मम दृष्टिपथं गतः। अद्य क्रोधं विमोक्ष्यामि सीताहरणसम्भवम् ॥ 59.31 ॥

diṣṭyāyamadya pāpātmā mama dṛṣṭipathaṃ gataḥ| adya krodhaṃ vimokṣyāmi sītāharaṇasambhavam || 59.31 ||

"सौभाग्य से यह पापात्मा आज मेरी दृष्टि के सामने आ गया है। आज मैं सीता-हरण से उत्पन्न अपने क्रोध को उन्मुक्त करूँगा।"

श्लोक 32 (yuddha.59.32)

एवमुक्त्वा ततो रामो धनुरादाय वीर्यवान्। लक्ष्मणानुचरस्तस्थौ समुद्धृत्य शरोत्तमम् ॥ 59.32 ॥

evamuktvā tato rāmo dhanurādāya vīryavān| lakṣmaṇānucarastasthau samuda‍dhṛtya śarottamam || 59.32 ||

यह कहकर पराक्रमी राम ने धनुष उठाकर और अपना उत्तम बाण निकालकर, लक्ष्मण को साथ लिए हुए स्थिति ग्रहण की।

श्लोक 33 (yuddha.59.33)

ततः स रक्षोधिपतिर्महात्मा रक्षांसि तान्याह महाबलानि। द्वारेषु चर्यागृहगोपुरेषु सुनिर्वृतास्तिष्ठत निर्विशङ्काः ॥ 59.33 ॥

tataḥ sa rakṣodhipatirmahātmā rakṣāṃsi tānyāha mahābalāni| dvāreṣu caryāgṛhagopureṣu sunirvṛtāstiṣṭhata nirviśaṅkāḥ || 59.33 ||

तब उस महात्मा राक्षसराज ने उन महाबली राक्षसों से कहा: "तुम द्वारों, चौकियों, गृहों और गोपुरों पर निश्चिंत होकर, बिना किसी शंका के डटे रहो।"

श्लोक 34 (yuddha.59.34)

इहागतं मां सहितं भवद्भि- र्वनौकसश्छिद्रमिदं विदित्वा। शून्यां पुरीं दुष्प्रसहां प्रमथ्य प्रधर्षयेयुः सहसा समेताः ॥ 59.34 ॥

ihāgataṃ māṃ sahitaṃ bhavadbhi- rvanaukasaśchidramidaṃ viditvā| śūnyāṃ purīṃ duṣprasahāṃ pramathya pradharṣayeyuḥ sahasā sametāḥ || 59.34 ||

"क्योंकि यदि वन-वासी वानरों को यह ज्ञात हो जाए कि मैं यहाँ तुम सबके साथ आया हूँ, तो वे इस अवसर को पाकर, एकत्र होकर, अचानक इस सूनी और अब तक अजेय नगरी पर आक्रमण कर सकते हैं।"

श्लोक 35 (yuddha.59.35)

विसर्जयित्वा सचिवांस्ततस्तान् गतेषु रक्षःसु यथानियोगम्। व्यदारयद् वानरसागरौघं महाझषः पूर्णमिवार्णवौघम् ॥ 59.35 ॥

visarjayitvā sacivāṃstatastān gateṣu rakṣaḥsu yathāniyogam| vyadārayad vānarasāgaraughaṃ mahājhaṣaḥ pūrṇamivārṇavaugham || 59.35 ||

उन मंत्रियों को इस प्रकार विदा करके, और राक्षसों के अपने-अपने स्थान पर चले जाने पर, उसने वानर-सागर की उस बाढ़ को इस प्रकार चीर डाला जैसे कोई विशाल जलजन्तु परिपूर्ण समुद्र की धारा को चीरता है।

श्लोक 36 (yuddha.59.36)

तमापतन्तं सहसा समीक्ष्य दीप्तेषुचापं युधि राक्षसेन्द्रम्। महत् समुत्पाट्य महीधराग्रं दुद्राव रक्षोधिपतिं हरीशः ॥ 59.36 ॥

tamāpatantaṃ sahasā samīkṣya dīpteṣucāpaṃ yudhi rākṣasendram| mahat samutpāṭya mahīdharāgraṃ dudrāva rakṣodhipatiṃ harīśaḥ || 59.36 ||

युद्ध में उस राक्षसराज को अपने धनुष-बाणों सहित प्रज्वलित होकर अचानक झपटते देख, वानरराज सुग्रीव ने एक विशाल पर्वत-शिखर उखाड़कर उस राक्षसराज पर आक्रमण किया।

श्लोक 37 (yuddha.59.37)

तच्छैलशृङ्गं बहुवृक्षसानुं प्रगृह्य चिक्षेप निशाचराय। तमापतन्तं सहसा समीक्ष्य चिच्छेद बाणैस्तपनीयपुङ्खैः ॥ 59.37 ॥

tacchailaśṛṅgaṃ bahuvṛkṣasānuṃ pragṛhya cikṣepa niśācarāya| tamāpatantaṃ sahasā samīkṣya ciccheda bāṇaistapanīyapuṅkhaiḥ || 59.37 ||

वृक्षों से आच्छादित उस पर्वत-शिखर को पकड़कर उसने उसे निशाचर पर फेंका। उसे अचानक अपनी ओर आते देख, रावण ने उसे स्वर्ण-पुंख वाले बाणों से चूर-चूर कर दिया।

श्लोक 38 (yuddha.59.38)

तस्मिन् प्रवृद्धोत्तमसानुवृक्षे शृङ्गे विदीर्णे पतिते पृथिव्याम्। महाहिकल्पं शरमन्तकाभं समादधे राक्षसलोकनाथः ॥ 59.38 ॥

tasmin pravṛddhottamasānuvṛkṣe śṛṅge vidīrṇe patite pṛthivyām| mahāhikalpaṃ śaramantakābhaṃ samādadhe rākṣasalokanāthaḥ || 59.38 ||

जब वह विशाल शिखर, अपने ऊँचे कगारों और वृक्षों सहित विदीर्ण होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, तब राक्षस-लोकनाथ रावण ने महासर्प के समान, यमराज-तुल्य एक बाण अपने धनुष पर चढ़ाया।

श्लोक 39 (yuddha.59.39)

स तं गृहीत्वानिलतुल्यवेगं सविस्फुलिङ्गज्वलनप्रकाशम्। बाणं महेन्द्राशनितुल्यवेगं चिक्षेप सुग्रीववधाय रुष्टः ॥ 59.39 ॥

sa taṃ gṛhītvānilatulyavegaṃ savisphuliṅgajvalanaprakāśam| bāṇaṃ mahendrāśanitulyavegaṃ cikṣepa sugrīvavadhāya ruṣṭaḥ || 59.39 ||

वायु के समान वेगवान्, चिनगारियों सहित अग्नि के समान प्रज्वलित, इन्द्र के वज्र के समान वेगवान् उस बाण को लेकर, क्रोधित रावण ने उसे सुग्रीव के वध के लिए छोड़ दिया।

श्लोक 40 (yuddha.59.40)

स सायको रावणबाहुमुक्तः शक्राशनिप्रख्यवपुःप्रकाशम्। सुग्रीवमासाद्य बिभेद वेगाद् गुहेरिता क्रौञ्चमिवोग्रशक्तिः ॥ 59.40 ॥

sa sāyako rāvaṇabāhumuktaḥ śakrāśaniprakhyavapuḥprakāśam| sugrīvamāsādya bibheda vegād guheritā krauñcamivograśaktiḥ || 59.40 ||

रावण की भुजा से छूटा हुआ, इन्द्र के वज्र के समान तेजस्वी वह बाण, सुग्रीव तक पहुँचकर उसे उसी वेग से बींध गया जैसे गुह (कार्तिकेय) द्वारा फेंकी गई भयंकर शक्ति ने क्रौंच पर्वत को बींध दिया था।

श्लोक 41 (yuddha.59.41)

स सायकार्तो विपरीतचेताः कूजन् पृथिव्यां निपपात वीरः। तं वीक्ष्य भूमौ पतितं विसंज्ञं नेदुः प्रहृष्टा युधि यातुधानाः ॥ 59.41 ॥

sa sāyakārto viparītacetāḥ kūjan pṛthivyāṃ nipapāta vīraḥ| taṃ vīkṣya bhūmau patitaṃ visaṃjñaṃ neduḥ prahṛṣṭā yudhi yātudhānāḥ || 59.41 ||

उस बाण से पीड़ित होकर, चेतना खोता हुआ वह वीर कराहते हुए भूमि पर गिर पड़ा। उसे भूमि पर मूर्च्छित गिरा देखकर युद्ध में राक्षस हर्षित होकर गरज उठे।

श्लोक 42 (yuddha.59.42)

ततो गवाक्षो गवयः सुषेण- स्त्वथर्षभो ज्योतिमुखो नलश्च। शैलान् समुत्पाट्य विवृद्धकायाः प्रदुद्रुवुस्तं प्रति राक्षसेन्द्रम् ॥ 59.42 ॥

tato gavākṣo gavayaḥ suṣeṇa- stvatharṣabho jyotimukho nalaśca| śailān samutpāṭya vivṛddhakāyāḥ pradudruvustaṃ prati rākṣasendram || 59.42 ||

तब गवाक्ष, गवय, सुषेण, ऋषभ, ज्योतिमुख और नल ने, अपने शरीरों को क्रोध से विशाल करते हुए, पर्वतों को उखाड़कर उस राक्षसराज पर आक्रमण किया।

श्लोक 43 (yuddha.59.43)

तेषां प्रहारान् स चकार मोघान् रक्षोधिपो बाणशतैः शिताग्रैः। तान् वानरेन्द्रानपि बाणजालै- र्बिभेद जाम्बूनदचित्रपुङ्खैः ॥ 59.43 ॥

teṣāṃ prahārān sa cakāra moghān rakṣodhipo bāṇaśataiḥ śitāgraiḥ| tān vānarendrānapi bāṇajālai- rbibheda jāmbūnadacitrapuṅkhaiḥ || 59.43 ||

उस राक्षसराज ने अपने सैकड़ों तीक्ष्ण बाणों से उनके प्रहारों को व्यर्थ कर दिया, और स्वर्ण-पुंख वाले बाण-जालों से उन वानर-प्रमुखों को भी बींध डाला।

श्लोक 44 (yuddha.59.44)

ते वानरेन्द्रास्त्रिदशारिबाणै- र्भिन्ना निपेतुर्भुवि भीमकायाः। ततस्तु तद् वानरसैन्यमुग्रं प्रच्छादयामास स बाणजालैः ॥ 59.44 ॥

te vānarendrāstridaśāribāṇai- rbhinnā nipeturbhuvi bhīmakāyāḥ| tatastu tad vānarasainyamugraṃ pracchādayāmāsa sa bāṇajālaiḥ || 59.44 ||

देवताओं के शत्रु रावण के बाणों से बिंधकर वे विशालकाय वानर-प्रमुख भूमि पर गिर पड़े। तब उसने उस भयंकर वानर-सेना को बाण-जालों से आच्छादित कर दिया।

श्लोक 45 (yuddha.59.45)

ते वध्यमानाः पतिताश्च वीरा नानद्यमाना भयशल्यविद्धाः। शाखामृगा रावणसायकार्ता जग्मुः शरण्यं शरणं स्म रामम् ॥ 59.45 ॥

te vadhyamānāḥ patitāśca vīrā nānadyamānā bhayaśalyaviddhāḥ| śākhāmṛgā rāvaṇasāyakārtā jagmuḥ śaraṇyaṃ śaraṇaṃ sma rāmam || 59.45 ||

मारे जाते और गिरते हुए, चीत्कार करते, भय के शल्य से बिंधे हुए, रावण के बाणों से पीड़ित वे वीर वानर शरण देने वाले राम की शरण में गए।

श्लोक 46 (yuddha.59.46)

ततो महात्मा स धनुर्धनुष्मा- नादाय रामः सहसा जगाम। तं लक्ष्मणः प्राञ्जलिरभ्युपेत्य उवाच रामं परमार्थयुक्तम् ॥ 59.46 ॥

tato mahātmā sa dhanurdhanuṣmā- nādāya rāmaḥ sahasā jagāma| taṃ lakṣmaṇaḥ prāñjalirabhyupetya uvāca rāmaṃ paramārthayuktam || 59.46 ||

तब वह महात्मा धनुर्धर राम धनुष उठाकर वेगपूर्वक आगे बढ़े। लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर उनके पास आकर राम से अत्यन्त सारगर्भित वचन कहे।

श्लोक 47 (yuddha.59.47)

काममार्य सुपर्याप्तो वधायास्य दुरात्मनः। विधमिष्याम्यहं चैतमनुजानीहि मां विभो ॥ 59.47 ॥

kāmamārya suparyāpto vadhāyāsya durātmanaḥ| vidhamiṣyāmyahaṃ caitamanujānīhi māṃ vibho || 59.47 ||

"हे आर्य, मैं इस दुरात्मा के वध के लिए पूर्णतः समर्थ हूँ; मैं इसे नष्ट कर दूँगा -- हे प्रभो, मुझे आज्ञा दीजिए।"

श्लोक 48 (yuddha.59.48)

तमब्रवीन्महातेजा रामः सत्यपराक्रमः। गच्छ यत्नपरश्चापि भव लक्ष्मण संयुगे ॥ 59.48 ॥

tamabravīnmahātejā rāmaḥ satyaparākramaḥ| gaccha yatnaparaścāpi bhava lakṣmaṇa saṃyuge || 59.48 ||

महातेजस्वी सत्यपराक्रमी राम ने उससे कहा: "जाओ, लक्ष्मण, परन्तु इस युद्ध में अत्यन्त सावधान रहना।"

श्लोक 49 (yuddha.59.49)

रावणो हि महावीर्यो रणेऽद्भुतपराक्रमः। त्रैलोक्येनापि संक्रुद्धो दुष्प्रसह्यो न संशयः ॥ 59.49 ॥

rāvaṇo hi mahāvīryo raṇe'dbhutaparākramaḥ| trailokyenāpi saṃkruddho duṣprasahyo na saṃśayaḥ || 59.49 ||

"क्योंकि रावण महापराक्रमी है, युद्ध में अद्भुत पराक्रम वाला है; क्रुद्ध होने पर वह तीनों लोकों के लिए भी असह्य है -- इसमें कोई संदेह नहीं।"

श्लोक 50 (yuddha.59.50)

तस्यच्छिद्राणि मार्गस्व स्वच्छिद्राणि च लक्षय। चक्षुषा धनुषाऽऽत्मानं गोपायस्व समाहितः ॥ 59.50 ॥

tasyacchidrāṇi mārgasva svacchidrāṇi ca lakṣaya| cakṣuṣā dhanuṣā''tmānaṃ gopāyasva samāhitaḥ || 59.50 ||

"उसके छिद्रों को खोजना, और अपने छिद्रों को भी पहचानना; अपनी आँख और धनुष से, सावधान होकर अपनी रक्षा करना।"

श्लोक 51 (yuddha.59.51)

राघवस्य वचः श्रुत्वा सम्परिष्वज्य पूज्य च। अभिवाद्य च रामाय ययौ सौमित्रिराहवे ॥ 59.51 ॥

rāghavasya vacaḥ śrutvā sampariṣvajya pūjya ca| abhivādya ca rāmāya yayau saumitrirāhave || 59.51 ||

राघव के वचन सुनकर, उन्हें आलिंगन और सम्मान देकर, तथा राम को प्रणाम करके, लक्ष्मण युद्ध में चले गए।

श्लोक 52 (yuddha.59.52)

स रावणं वारणहस्तबाहुं ददर्श भीमोद्यतदीप्तचापम्। प्रच्छादयन्तं शरवृष्टिजालै- स्तान् वानरान् भिन्नविकीर्णदेहान् ॥ 59.52 ॥

sa rāvaṇaṃ vāraṇahastabāhuṃ dadarśa bhīmodyatadīptacāpam| pracchādayantaṃ śaravṛṣṭijālai- stān vānarān bhinnavikīrṇadehān || 59.52 ||

उसने रावण को देखा, जिसकी भुजाएँ हाथी की सूँड़ के समान थीं, जिसका भयंकर धनुष उठा हुआ और चमक रहा था, और जो अपने बाणों की वर्षा के जाल से उन वानरों को, जिनके शरीर बिंधे और बिखरे हुए थे, आच्छादित कर रहा था।

श्लोक 53 (yuddha.59.53)

तमालोक्य महातेजा हनूमान् मारुतात्मजः। निवार्य शरजालानि विदुद्राव स रावणम् ॥ 59.53 ॥

tamālokya mahātejā hanūmān mārutātmajaḥ| nivārya śarajālāni vidudrāva sa rāvaṇam || 59.53 ||

उसे देखकर महातेजस्वी पवनपुत्र हनुमान ने बाणों के जाल को रोकते हुए रावण पर आक्रमण किया।

श्लोक 54 (yuddha.59.54)

रथं तस्य समासाद्य बाहुमुद्यम्य दक्षिणम्। त्रासयन् रावणं धीमान् हनूमान् वाक्यमब्रवीत् ॥ 59.54 ॥

rathaṃ tasya samāsādya bāhumudyamya dakṣiṇam| trāsayan rāvaṇaṃ dhīmān hanūmān vākyamabravīt || 59.54 ||

उसके रथ तक पहुँचकर और अपनी दाहिनी भुजा उठाकर, बुद्धिमान् हनुमान ने रावण को भयभीत करते हुए यह वचन कहा।

श्लोक 55 (yuddha.59.55)

देवदानवगन्धर्वैर्यक्षैश्च सह राक्षसैः। अवध्यत्वं त्वया प्राप्तं वानरेभ्यस्तु ते भयम् ॥ 59.55 ॥

devadānavagandharvairyakṣaiśca saha rākṣasaiḥ| avadhyatvaṃ tvayā prāptaṃ vānarebhyastu te bhayam || 59.55 ||

"तुमने देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, यक्षों और राक्षसों से अवध्यता प्राप्त की है; परन्तु वानरों से तुम्हें भय है।"

श्लोक 56 (yuddha.59.56)

एष मे दक्षिणो बाहुः पञ्चशाखः समुद्यतः। विधमिष्यति ते देहे भूतात्मानं चिरोषितम् ॥ 59.56 ॥

eṣa me dakṣiṇo bāhuḥ pañcaśākhaḥ samudyataḥ| vidhamiṣyati te dehe bhūtātmānaṃ ciroṣitam || 59.56 ||

"मेरी यह पाँच अंगुलियों वाली उठी हुई दाहिनी भुजा, तुम्हारे शरीर में चिरकाल से बसे प्राण को बाहर निकाल देगी।"

श्लोक 57 (yuddha.59.57)

श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं रावणो भीमविक्रमः। संरक्तनयनः क्रोधादिदं वचनमब्रवीत् ॥ 59.57 ॥

śrutvā hanūmato vākyaṃ rāvaṇo bhīmavikramaḥ| saṃraktanayanaḥ krodhādidaṃ vacanamabravīt || 59.57 ||

हनुमान के वचन सुनकर भयंकर पराक्रमी रावण ने क्रोध से लाल नेत्र करके यह वचन कहा।

श्लोक 58 (yuddha.59.58)

क्षिप्रं प्रहर निःशङ्कं स्थिरां कीर्तिमवाप्नुहि। ततस्त्वां ज्ञातविक्रान्तं नाशयिष्यामि वानर ॥ 59.58 ॥

kṣipraṃ prahara niḥśaṅkaṃ sthirāṃ kīrtimavāpnuhi| tatastvāṃ jñātavikrāntaṃ nāśayiṣyāmi vānara || 59.58 ||

"शीघ्र निःसंकोच प्रहार करो और स्थिर कीर्ति प्राप्त करो। फिर तुम्हारे पराक्रम को जान लेने के बाद, हे वानर, मैं तुम्हारा नाश कर दूँगा।"

श्लोक 59 (yuddha.59.59)

रावणस्य वचः श्रुत्वा वायुसूनुर्वचोऽब्रवीत्। प्रहतं हि मया पूर्वमक्षं तव सुतं स्मर ॥ 59.59 ॥

rāvaṇasya vacaḥ śrutvā vāyusūnurvaco'bravīt| prahataṃ hi mayā pūrvamakṣaṃ tava sutaṃ smara || 59.59 ||

रावण के वचन सुनकर पवनपुत्र ने कहा: "स्मरण करो, मैं इससे पहले ही तुम्हारे पुत्र अक्ष का वध कर चुका हूँ।"

श्लोक 60 (yuddha.59.60)

एवमुक्तो महातेजा रावणो राक्षसेश्वरः। आजघानानिलसुतं तलेनोरसि वीर्यवान् ॥ 59.60 ॥

evamukto mahātejā rāvaṇo rākṣaseśvaraḥ| ājaghānānilasutaṃ talenorasi vīryavān || 59.60 ||

यह सुनकर महातेजस्वी पराक्रमी राक्षसराज रावण ने पवनपुत्र की छाती पर अपनी हथेली से प्रहार किया।

श्लोक 61 (yuddha.59.61)

स तलाभिहतस्तेन चचाल च मुहुर्मुहुः। स्थितो मुहूर्तं तेजस्वी स्थैर्यं कृत्वा महामतिः ॥ 59.61 ॥

sa talābhihatastena cacāla ca muhurmuhuḥ| sthito muhūrtaṃ tejasvī sthairyaṃ kṛtvā mahāmatiḥ || 59.61 ||

उस थप्पड़ से आहत होकर वे बार-बार डगमगाए। फिर वे तेजस्वी महामति स्वयं को संभालकर क्षणभर के लिए स्थिर खड़े हो गए।

श्लोक 62 (yuddha.59.62)

आजघान च संक्रुद्धस्तलेनैवामरद्विषम्। ततः स तेनाभिहतो वानरेण महात्मना ॥ 59.62 ॥

ājaghāna ca saṃkruddhastalenaivāmaradviṣam| tataḥ sa tenābhihato vānareṇa mahātmanā || 59.62 ||

और अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन्होंने उस देव-शत्रु पर भी थप्पड़ से प्रहार किया। उस महात्मा वानर से आहत होकर --

श्लोक 63 (yuddha.59.63)

दशग्रीवः समाधूतो यथा भूमितलेऽचलः। संग्रामे तं तथा दृष्ट्वा रावणं तलताडितम् ॥ 59.63 ॥

daśagrīvaḥ samādhūto yathā bhūmitale'calaḥ| saṃgrāme taṃ tathā dṛṣṭvā rāvaṇaṃ talatāḍitam || 59.63 ||

-- दशग्रीव रावण उसी प्रकार डगमगा गया जैसे पृथ्वी पर कोई पर्वत हिल जाए। युद्ध में इस प्रकार थप्पड़ से आहत डगमगाते रावण को देखकर --

श्लोक 64 (yuddha.59.64)

ऋषयो वानराः सिद्धा नेदुर्देवाः सहासुरैः। अथाश्वस्य महातेजा रावणो वाक्यमब्रवीत् ॥ 59.64 ॥

ṛṣayo vānarāḥ siddhā nedurdevāḥ sahāsuraiḥ| athāśvasya mahātejā rāvaṇo vākyamabravīt || 59.64 ||

-- ऋषियों, वानरों, सिद्धों और देवताओं ने असुरों सहित हर्षध्वनि की। तब श्वास लेकर महातेजस्वी रावण ने यह वचन कहा।

श्लोक 65 (yuddha.59.65)

साधु वानर वीर्येण श्लाघनीयोऽसि मे रिपुः। रावणेनैवमुक्तस्तु मारुतिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ 59.65 ॥

sādhu vānara vīryeṇa ślāghanīyo'si me ripuḥ| rāvaṇenaivamuktastu mārutirvākyamabravīt || 59.65 ||

"साधु, हे वानर! अपने पराक्रम से तुम मेरे प्रशंसनीय शत्रु हो।" रावण द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर मारुति ने यह वचन कहा।

श्लोक 66 (yuddha.59.66)

धिगस्तु मम वीर्यस्य यत् त्वं जीवसि रावण। सकृत् तु प्रहरेदानीं दुर्बुद्धे किं विकत्थसे ॥ 59.66 ॥

dhigastu mama vīryasya yat tvaṃ jīvasi rāvaṇa| sakṛt tu praharedānīṃ durbuddhe kiṃ vikatthase || 59.66 ||

"धिक्कार है मेरे पराक्रम को, हे रावण, कि तुम अभी तक जीवित हो! अब पूरे बल से प्रहार करो -- हे दुर्बुद्धि, क्यों डींग हाँकते हो?"

श्लोक 67 (yuddha.59.67)

ततस्त्वां मामको मुष्टिर्नयिष्यति यमक्षयम्। ततो मारुतिवाक्येन कोपस्तस्य प्रजज्वले ॥ 59.67 ॥

tatastvāṃ māmako muṣṭirnayiṣyati yamakṣayam| tato mārutivākyena kopastasya prajajvale || 59.67 ||

"फिर मेरी यह मुट्ठी तुम्हें यमलोक पहुँचा देगी!" मारुति के इन वचनों से उसका क्रोध भड़क उठा।

श्लोक 68 (yuddha.59.68)

संरक्तनयनो यत्नान्मुष्टिमावृत्य दक्षिणम्। पातयामास वेगेन वानरोरसि वीर्यवान् ॥ 59.68 ॥

saṃraktanayano yatnānmuṣṭimāvṛtya dakṣiṇam| pātayāmāsa vegena vānarorasi vīryavān || 59.68 ||

लाल नेत्र किए, प्रयत्नपूर्वक अपनी दाहिनी मुट्ठी बाँधकर, उस पराक्रमी ने वेगपूर्वक वानर की छाती पर प्रहार किया।

श्लोक 69 (yuddha.59.69)

हनूमान् वक्षसि व्यूढे संचचाल पुनः पुनः। विह्वलं तु तदा दृष्ट्वा हनूमन्तं महाबलम् ॥ 59.69 ॥

hanūmān vakṣasi vyūḍhe saṃcacāla punaḥ punaḥ| vihvalaṃ tu tadā dṛṣṭvā hanūmantaṃ mahābalam || 59.69 ||

विशाल छाती पर आहत होकर हनुमान बार-बार डगमगा उठे। महाबली हनुमान को इस प्रकार विह्वल देखकर --

श्लोक 70 (yuddha.59.70)

रथेनातिरथः शीघ्रं नीलं प्रति समभ्यगात्। राक्षसानामधिपतिर्दशग्रीवः प्रतापवान् ॥ 59.70 ॥

rathenātirathaḥ śīghraṃ nīlaṃ prati samabhyagāt| rākṣasānāmadhipatirdaśagrīvaḥ pratāpavān || 59.70 ||

-- वह महारथी, पराक्रमी दशग्रीव राक्षसराज, शीघ्र ही अपने रथ को नील की ओर मोड़ लिया।

श्लोक 71 (yuddha.59.71)

पन्नगप्रतिमैर्भीमैः परमर्माभिभेदनैः। शरैरादीपयामास नीलं हरिचमूपतिम् ॥ 59.71 ॥

pannagapratimairbhīmaiḥ paramarmābhibhedanaiḥ| śarairādīpayāmāsa nīlaṃ haricamūpatim || 59.71 ||

सर्पों के समान भयंकर, मर्मभेदी बाणों से उसने वानर-सेनापति नील को प्रज्वलित कर दिया।

श्लोक 72 (yuddha.59.72)

स शरौघसमायस्तो नीलो हरिचमूपतिः। करेणैकेन शैलाग्रं रक्षोधिपतयेऽसृजत् ॥ 59.72 ॥

sa śaraughasamāyasto nīlo haricamūpatiḥ| kareṇaikena śailāgraṃ rakṣodhipataye'sṛjat || 59.72 ||

बाणों की उस बाढ़ से अभिभूत होकर वानर-सेनापति नील ने एक हाथ से एक पर्वत-शिखर उस राक्षसराज पर फेंक दिया।

श्लोक 73 (yuddha.59.73)

हनूमानपि तेजस्वी समाश्वस्तो महामनाः। विप्रेक्षमाणो युद्धेप्सुः सरोषमिदमब्रवीत् ॥ 59.73 ॥

hanūmānapi tejasvī samāśvasto mahāmanāḥ| viprekṣamāṇo yuddhepsuḥ saroṣamidamabravīt || 59.73 ||

तेजस्वी और महामना हनुमान भी स्वस्थ होकर, ध्यानपूर्वक देखते हुए और युद्ध के इच्छुक होकर, क्रोधपूर्वक यह वचन बोले।

श्लोक 74 (yuddha.59.74)

नीलेन सह संयुक्तं रावणं राक्षसेश्वरम्। अन्येन युध्यमानस्य न युक्तमभिधावनम् ॥ 59.74 ॥

nīlena saha saṃyuktaṃ rāvaṇaṃ rākṣaseśvaram| anyena yudhyamānasya na yuktamabhidhāvanam || 59.74 ||

"जब राक्षसराज रावण नील से पहले ही युद्धरत है, तब किसी अन्य का उस पर आक्रमण करना उचित नहीं है।"

श्लोक 75 (yuddha.59.75)

रावणोऽथ महातेजास्तं शृङ्गं सप्तभिः शरैः। आजघान सुतीक्ष्णाग्रैस्तद् विकीर्णं पपात ह ॥ 59.75 ॥

rāvaṇo'tha mahātejāstaṃ śṛṅgaṃ saptabhiḥ śaraiḥ| ājaghāna sutīkṣṇāgraistad vikīrṇaṃ papāta ha || 59.75 ||

तब महातेजस्वी रावण ने उस पर्वत-शिखर पर सात अत्यन्त तीक्ष्ण बाणों से प्रहार किया, जिससे वह चूर-चूर होकर गिर पड़ा।

श्लोक 76 (yuddha.59.76)

तद् विकीर्णं गिरेः शृङ्गं दृष्ट्वा हरिचमूपतिः। कालाग्निरिव जज्वाल कोपेन परवीरहा ॥ 59.76 ॥

tad vikīrṇaṃ gireḥ śṛṅgaṃ dṛṣṭvā haricamūpatiḥ| kālāgniriva jajvāla kopena paravīrahā || 59.76 ||

उस पर्वत-शिखर को चूर-चूर देखकर, शत्रु-वीरों का संहारक वानर-सेनापति नील क्रोध से प्रलयाग्नि के समान भड़क उठा।

श्लोक 77 (yuddha.59.77)

सोऽश्वकर्णद्रुमान् शालांश्चूतांश्चापि सुपुष्पितान्। अन्यांश्च विविधान् वृक्षान् नीलश्चिक्षेप संयुगे ॥ 59.77 ॥

so'śvakarṇadrumān śālāṃścūtāṃścāpi supuṣpitān| anyāṃśca vividhān vṛkṣān nīlaścikṣepa saṃyuge || 59.77 ||

नील ने युद्ध में अश्वकर्ण वृक्षों, साल वृक्षों, सुपुष्पित आम्र वृक्षों तथा अन्य नाना प्रकार के वृक्षों को फेंकना आरम्भ किया।

श्लोक 78 (yuddha.59.78)

स तान् वृक्षान् समासाद्य प्रतिचिच्छेद रावणः। अभ्यवर्षच्च घोरेण शरवर्षेण पावकिम् ॥ 59.78 ॥

sa tān vṛkṣān samāsādya praticiccheda rāvaṇaḥ| abhyavarṣacca ghoreṇa śaravarṣeṇa pāvakim || 59.78 ||

रावण ने उन वृक्षों के पास पहुँचने पर उन्हें काट डाला, और अग्निपुत्र नील पर बाणों की भयंकर वर्षा कर दी।

श्लोक 79 (yuddha.59.79)

अभिवृष्टः शरौघेण मेघेनेव महाचलः। ह्रस्वं कृत्वा ततो रूपं ध्वजाग्रे निपपात ह ॥ 59.79 ॥

abhivṛṣṭaḥ śaraugheṇa megheneva mahācalaḥ| hrasvaṃ kṛtvā tato rūpaṃ dhvajāgre nipapāta ha || 59.79 ||

बाणों की उस बाढ़ से, मानो किसी बादल से आच्छादित विशाल पर्वत की भाँति, आवृत होकर, उसने अपने रूप को छोटा कर लिया और ध्वजा के अग्रभाग पर जा बैठा।

श्लोक 80 (yuddha.59.80)

पावकात्मजमालोक्य ध्वजाग्रे समवस्थितम्। जज्वाल रावणः क्रोधात् ततो नीलो ननाद च ॥ 59.80 ॥

pāvakātmajamālokya dhvajāgre samavasthitam| jajvāla rāvaṇaḥ krodhāt tato nīlo nanāda ca || 59.80 ||

अग्निपुत्र नील को अपनी ध्वजा के अग्रभाग पर बैठा देखकर रावण क्रोध से भड़क उठा, और तब नील ने गर्जना की।

श्लोक 81 (yuddha.59.81)

ध्वजाग्रे धनुषश्चाग्रे किरीटाग्रे च तं हरिम्। लक्ष्मणोऽथ हनूमांश्च रामश्चापि सुविस्मिताः ॥ 59.81 ॥

dhvajāgre dhanuṣaścāgre kirīṭāgre ca taṃ harim| lakṣmaṇo'tha hanūmāṃśca rāmaścāpi suvismitāḥ || 59.81 ||

उस वानर को कभी ध्वजा के अग्रभाग पर, कभी धनुष के अग्रभाग पर, तो कभी मुकुट के अग्रभाग पर देखकर लक्ष्मण, हनुमान और राम तीनों अत्यन्त विस्मित हो गए।

श्लोक 82 (yuddha.59.82)

रावणोऽपि महातेजाः कपिलाघवविस्मितः। अस्त्रमाहारयामास दीप्तमाग्नेयमद्भुतम् ॥ 59.82 ॥

rāvaṇo'pi mahātejāḥ kapilāghavavismitaḥ| astramāhārayāmāsa dīptamāgneyamadbhutam || 59.82 ||

महातेजस्वी रावण भी उस वानर की फुर्ती से चकित होकर, प्रज्वलित एवं अद्भुत आग्नेय अस्त्र का आवाहन करने लगा।

श्लोक 83 (yuddha.59.83)

ततस्ते चुक्रुशुर्हृष्टा लब्धलक्षाः प्लवंगमाः। नीललाघवसम्भ्रान्तं दृष्ट्वा रावणमाहवे ॥ 59.83 ॥

tataste cukruśurhṛṣṭā labdhalakṣāḥ plavaṃgamāḥ| nīlalāghavasambhrāntaṃ dṛṣṭvā rāvaṇamāhave || 59.83 ||

तब युद्ध में नील की फुर्ती से भ्रमित रावण को देखकर, अवसर पाकर हर्षित वानर हर्षनाद करने लगे।

श्लोक 84 (yuddha.59.84)

वानराणां च नादेन संरब्धो रावणस्तदा। सम्भ्रमाविष्टहृदयो न किंचित् प्रत्यपद्यत ॥ 59.84 ॥

vānarāṇāṃ ca nādena saṃrabdho rāvaṇastadā| sambhramāviṣṭahṛdayo na kiṃcit pratyapadyata || 59.84 ||

वानरों की उस गर्जना से क्रुद्ध होकर, भ्रम से आविष्ट हृदय वाला रावण उस समय कोई निश्चय नहीं कर सका।

श्लोक 85 (yuddha.59.85)

आग्नेयेनापि संयुक्तं गृहीत्वा रावणः शरम्। ध्वजशीर्षस्थितं नीलमुदैक्षत निशाचरः ॥ 59.85 ॥

āgneyenāpi saṃyuktaṃ gṛhītvā rāvaṇaḥ śaram| dhvajaśīrṣasthitaṃ nīlamudaikṣata niśācaraḥ || 59.85 ||

आग्नेय अस्त्र से युक्त बाण को लेकर, निशाचर रावण ने ध्वजा के शीर्ष पर बैठे नील की ओर देखा।

श्लोक 86 (yuddha.59.86)

ततोऽब्रवीन्महातेजा रावणो राक्षसेश्वरः। कपे लाघवयुक्तोऽसि मायया परया सह ॥ 59.86 ॥

tato'bravīnmahātejā rāvaṇo rākṣaseśvaraḥ| kape lāghavayukto'si māyayā parayā saha || 59.86 ||

तब महातेजस्वी राक्षसराज रावण ने कहा: "हे वानर, तुम फुर्ती में तथा उत्कृष्ट माया में भी निपुण हो।"

श्लोक 87 (yuddha.59.87)

जीवितं खलु रक्षस्व यदि शक्तोऽसि वानर। तानि तान्यात्मरूपाणि सृजसि त्वमनेकशः ॥ 59.87 ॥

jīvitaṃ khalu rakṣasva yadi śakto'si vānara| tāni tānyātmarūpāṇi sṛjasi tvamanekaśaḥ || 59.87 ||

"यदि समर्थ हो तो अपना जीवन बचाओ, हे वानर, चाहे तुम अपने ही अनेक रूप क्यों न रच लो।"

श्लोक 88 (yuddha.59.88)

तथापि त्वां मया मुक्तः सायकोऽस्त्रप्रयोजितः। जीवितं परिरक्षन्तं जीविताद् भ्रंशयिष्यति ॥ 59.88 ॥

tathāpi tvāṃ mayā muktaḥ sāyako'straprayojitaḥ| jīvitaṃ parirakṣantaṃ jīvitād bhraṃśayiṣyati || 59.88 ||

"फिर भी अस्त्र से युक्त होकर मेरे द्वारा छोड़ा गया यह बाण, अपने जीवन की रक्षा करते हुए भी, तुम्हें जीवन से वंचित कर देगा।"

श्लोक 89 (yuddha.59.89)

एवमुक्त्वा महाबाहू रावणो राक्षसेश्वरः। संधाय बाणमस्त्रेण चमूपतिमताडयत् ॥ 59.89 ॥

evamuktvā mahābāhū rāvaṇo rākṣaseśvaraḥ| saṃdhāya bāṇamastreṇa camūpatimatāḍayat || 59.89 ||

यह कहकर महाबाहु राक्षसराज रावण ने अस्त्र-युक्त बाण को संधानकर सेनापति नील पर प्रहार किया।

श्लोक 90 (yuddha.59.90)

सोऽस्त्रमुक्तेन बाणेन नीलो वक्षसि ताडितः। निर्दह्यमानः सहसा स पपात महीतले ॥ 59.90 ॥

so'stramuktena bāṇena nīlo vakṣasi tāḍitaḥ| nirdahyamānaḥ sahasā sa papāta mahītale || 59.90 ||

उस अस्त्र-प्रयुक्त बाण से छाती पर आहत होकर नील अचानक जलते हुए भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 91 (yuddha.59.91)

पितृमाहात्म्यसंयोगादात्मनश्चापि तेजसा। जानुभ्यामपतद् भूमौ न तु प्राणैर्वियुज्यत ॥ 59.91 ॥

pitṛmāhātmyasaṃyogādātmanaścāpi tejasā| jānubhyāmapatad bhūmau na tu prāṇairviyujyata || 59.91 ||

अपने पिता (अग्नि) की महिमा के संयोग से तथा अपने स्वयं के तेज से, वह घुटनों के बल भूमि पर गिरा, परन्तु प्राणों से वियुक्त नहीं हुआ।

श्लोक 92 (yuddha.59.92)

विसंज्ञं वानरं दृष्ट्वा दशग्रीवो रणोत्सुकः। रथेनाम्बुदनादेन सौमित्रिमभिदुद्रुवे ॥ 59.92 ॥

visaṃjñaṃ vānaraṃ dṛṣṭvā daśagrīvo raṇotsukaḥ| rathenāmbudanādena saumitrimabhidudruve || 59.92 ||

वानर को मूर्च्छित देखकर, युद्ध का उत्सुक दशग्रीव अपने मेघ-गर्जन जैसे रथ से लक्ष्मण पर झपटा।

श्लोक 93 (yuddha.59.93)

आसाद्य रणमध्ये तं वारयित्वा स्थितो ज्वलन्। धनुर्विस्फारयामास राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ॥ 59.93 ॥

āsādya raṇamadhye taṃ vārayitvā sthito jvalan| dhanurvisphārayāmāsa rākṣasendraḥ pratāpavān || 59.93 ||

युद्धभूमि के मध्य उसके पास पहुँचकर, वहीं रुककर, क्रोध से प्रज्वलित उस प्रतापी राक्षसराज ने अपना धनुष झंकृत किया।

श्लोक 94 (yuddha.59.94)

तमाह सौमित्रिरदीनसत्त्वो विस्फारयन्तं धनुरप्रमेयम्। अवेहि मामद्य निशाचरेन्द्र न वानरांस्त्वं प्रतियोद्धुमर्हसि ॥ 59.94 ॥

tamāha saumitriradīnasattvo visphārayantaṃ dhanuraprameyam| avehi māmadya niśācarendra na vānarāṃstvaṃ pratiyoddhumarhasi || 59.94 ||

अपने अतुलनीय धनुष को झंकृत करते हुए उस रावण से अदीन सत्त्व वाले लक्ष्मण ने कहा: "हे निशाचरेन्द्र, अब मुझे जानो; तुम्हें वानरों से युद्ध करना शोभा नहीं देता।"

श्लोक 95 (yuddha.59.95)

स तस्य वाक्यं प्रतिपूर्णघोषं ज्याशब्दमुग्रं च निशम्य राजा। आसाद्य सौमित्रिमुपस्थितं तं रोषान्वितं वाचमुवाच रक्षः ॥ 59.95 ॥

sa tasya vākyaṃ pratipūrṇaghoṣaṃ jyāśabdamugraṃ ca niśamya rājā| āsādya saumitrimupasthitaṃ taṃ roṣānvitaṃ vācamuvāca rakṣaḥ || 59.95 ||

उसके पूर्णघोष वचन तथा प्रत्यंचा की भीषण टंकार सुनकर, वह राक्षसराज सामने खड़े लक्ष्मण के पास पहुँचकर क्रोधपूर्वक यह वचन बोला।

श्लोक 96 (yuddha.59.96)

दिष्ट्यासि मे राघव दृष्टिमार्गं प्राप्तोऽन्तगामी विपरीतबुद्धिः। अस्मिन् क्षणे यास्यसि मृत्युलोकं संसाद्यमानो मम बाणजालैः ॥ 59.96 ॥

diṣṭyāsi me rāghava dṛṣṭimārgaṃ prāpto'ntagāmī viparītabuddhiḥ| asmin kṣaṇe yāsyasi mṛtyulokaṃ saṃsādyamāno mama bāṇajālaiḥ || 59.96 ||

"सौभाग्य से, हे राघव, विपरीत बुद्धि वाले, अपने अन्त की ओर बढ़ते हुए तुम मेरी दृष्टि के सामने आ गए हो। इसी क्षण मेरे बाण-जालों से कुचले जाकर तुम मृत्युलोक को जाओगे।"

श्लोक 97 (yuddha.59.97)

तमाह सौमित्रिरविस्मयानो गर्जन्तमुद्वृत्तशिताग्रदंष्ट्रम्। राजन् न गर्जन्ति महाप्रभावा विकत्थसे पापकृतां वरिष्ठ ॥ 59.97 ॥

tamāha saumitriravismayāno garjantamuda‍vṛttaśitāgradaṃṣṭram| rājan na garjanti mahāprabhāvā vikatthase pāpakṛtāṃ variṣṭha || 59.97 ||

गरजते हुए, तीक्ष्ण दाढ़ें निकाले हुए उस रावण से अविचलित लक्ष्मण ने कहा: "हे राजन्, महाप्रभावशाली पुरुष गरजा नहीं करते; तुम तो केवल डींग हाँक रहे हो, हे पापियों में श्रेष्ठ।"

श्लोक 98 (yuddha.59.98)

जानामि वीर्यं तव राक्षसेन्द्र बलं प्रतापं च पराक्रमं च। अवस्थितोऽहं शरचापपाणि- रागच्छ किं मोघविकत्थनेन ॥ 59.98 ॥

jānāmi vīryaṃ tava rākṣasendra balaṃ pratāpaṃ ca parākramaṃ ca| avasthito'haṃ śaracāpapāṇi- rāgaccha kiṃ moghavikatthanena || 59.98 ||

"मैं तुम्हारे पराक्रम को जानता हूँ, हे राक्षसराज, तुम्हारे बल, प्रताप और पौरुष को भी। मैं धनुष-बाण लिए यहीं खड़ा हूँ -- आओ! इस व्यर्थ डींग से क्या लाभ?"

श्लोक 99 (yuddha.59.99)

स एवमुक्तः कुपितः ससर्ज रक्षोधिपः सप्त शरान् सुपुङ्खान्। ताँल्लक्ष्मणः काञ्चनचित्रपुङ्खै- श्चिच्छेद बाणैर्निशिताग्रधारैः ॥ 59.99 ॥

sa evamuktaḥ kupitaḥ sasarja rakṣodhipaḥ sapta śarān supuṅkhān| tā~llakṣmaṇaḥ kāñcanacitrapuṅkhai- ściccheda bāṇairniśitāgradhāraiḥ || 59.99 ||

यह सुनकर क्रुद्ध हुए राक्षसराज ने सात सुपंख बाण छोड़े। लक्ष्मण ने स्वर्ण-चित्रित पंखों वाले तथा तीक्ष्ण धार वाले बाणों से उन सबको काट डाला।

श्लोक 100 (yuddha.59.100)

तान् प्रेक्षमाणः सहसा निकृत्तान् निकृत्तभोगानिव पन्नगेन्द्रान्। लङ्केश्वरः क्रोधवशं जगाम ससर्ज चान्यान् निशितान् पृषत्कान् ॥ 59.100 ॥

tān prekṣamāṇaḥ sahasā nikṛttān nikṛttabhogāniva pannagendrān| laṅkeśvaraḥ krodhavaśaṃ jagāma sasarja cānyān niśitān pṛṣatkān || 59.100 ||

उन बाणों को इस प्रकार अचानक कटा हुआ देखकर, मानो कटे हुए महासर्पों के फण हों, लंकेश्वर क्रोध के वशीभूत हो गया और उसने और अधिक तीक्ष्ण बाण छोड़े।

श्लोक 101 (yuddha.59.101)

स बाणवर्षं तु ववर्ष तीव्रं रामानुजः कार्मुकसम्प्रयुक्तम्। क्षुरार्धचन्द्रोत्तमकर्णिभल्लैः शरांश्च चिच्छेद न चुक्षुभे च ॥ 59.101 ॥

sa bāṇavarṣaṃ tu vavarṣa tīvraṃ rāmānujaḥ kārmukasamprayuktam| kṣurārdhacandrottamakarṇibhallaiḥ śarāṃśca ciccheda na cukṣubhe ca || 59.101 ||

राम के अनुज ने अपने धनुष से तीव्र बाण-वर्षा की, और क्षुरमुख, अर्धचन्द्र तथा भल्ल बाणों से उन बाणों को काट डाला, फिर भी अविचलित रहे।

श्लोक 102 (yuddha.59.102)

स बाणजालान्यपि तानि तानि मोघानि पश्यंस्त्रिदशारिराजः। विसिस्मिये लक्ष्मणलाघवेन पुनश्च बाणान् निशितान् मुमोच ॥ 59.102 ॥

sa bāṇajālānyapi tāni tāni moghāni paśyaṃstridaśārirājaḥ| visismiye lakṣmaṇalāghavena punaśca bāṇān niśitān mumoca || 59.102 ||

उन बाण-जालों को इस प्रकार व्यर्थ होते देखकर वह देव-शत्रु राजा लक्ष्मण की फुर्ती से चकित हो गया, और उसने फिर से तीक्ष्ण बाण छोड़े।

श्लोक 103 (yuddha.59.103)

स लक्ष्मणश्चापि शिताञ् शिताग्रान् महेन्द्रतुल्योऽशनिभीमवेगान्। संधाय चापे ज्वलनप्रकाशान् ससर्ज रक्षोधिपतेर्वधाय ॥ 59.103 ॥

sa lakṣmaṇaścāpi śitāñ śitāgrān mahendratulyo'śanibhīmavegān| saṃdhāya cāpe jvalanaprakāśān sasarja rakṣodhipatervadhāya || 59.103 ||

महेन्द्र के समान लक्ष्मण ने भी अपने धनुष पर तीक्ष्ण, वज्र के समान भीषण वेग वाले, अग्नि के समान चमकते बाणों को संधानकर राक्षसराज के वध के लिए छोड़ दिया।

श्लोक 104 (yuddha.59.104)

स तान् प्रचिच्छेद हि राक्षसेन्द्रः शिताञ् शराल्ँ लक्ष्मणमाजघान। शरेण कालाग्निसमप्रभेण स्वयंभुदत्तेन ललाटदेशे ॥ 59.104 ॥

sa tān praciccheda hi rākṣasendraḥ śitāñ śarāl~ lakṣmaṇamājaghāna| śareṇa kālāgnisamaprabheṇa svayaṃbhudattena lalāṭadeśe || 59.104 ||

उस राक्षसराज ने उन तीक्ष्ण बाणों को काट डाला, और स्वयं ब्रह्मा द्वारा प्रदत्त, प्रलयाग्नि के समान तेजस्वी बाण से लक्ष्मण के ललाट पर प्रहार किया।

श्लोक 105 (yuddha.59.105)

स लक्ष्मणो रावणसायकार्त- श्चचाल चापं शिथिलं प्रगृह्य। पुनश्च संज्ञां प्रतिलभ्य कृच्छ्रा- च्चिच्छेद चापं त्रिदशेन्द्रशत्रोः ॥ 59.105 ॥

sa lakṣmaṇo rāvaṇasāyakārta- ścacāla cāpaṃ śithilaṃ pragṛhya| punaśca saṃjñāṃ pratilabhya kṛcchrā- cciccheda cāpaṃ tridaśendraśatroḥ || 59.105 ||

रावण के उस बाण से पीड़ित लक्ष्मण डगमगा गए, उनका धनुष शिथिल हो गया। फिर कठिनाई से चेतना प्राप्त कर उन्होंने देवराज के उस शत्रु का धनुष काट डाला।

श्लोक 106 (yuddha.59.106)

निकृत्तचापं त्रिभिराजघान बाणैस्तदा दाशरथिः शिताग्रैः। स सायकार्तो विचचाल राजा कृच्छ्राच्च संज्ञां पुनराससाद ॥ 59.106 ॥

nikṛttacāpaṃ tribhirājaghāna bāṇaistadā dāśarathiḥ śitāgraiḥ| sa sāyakārto vicacāla rājā kṛcchrācca saṃjñāṃ punarāsasāda || 59.106 ||

तब दाशरथि (लक्ष्मण) ने धनुष कट जाने पर भी तीन तीक्ष्ण बाणों से उस पर प्रहार किया। उन बाणों से पीड़ित राजा डगमगा गया, और कठिनाई से पुनः चेतना प्राप्त की।

श्लोक 107 (yuddha.59.107)

स कृत्तचापः शरताडितश्च मेदार्द्रगात्रो रुधिरावसिक्तः। जग्राह शक्तिं स्वयमुग्रशक्तिः स्वयंभुदत्तां युधि देवशत्रुः ॥ 59.107 ॥

sa kṛttacāpaḥ śaratāḍitaśca medārdragātro rudhirāvasiktaḥ| jagrāha śaktiṃ svayamugraśaktiḥ svayaṃbhudattāṃ yudhi devaśatruḥ || 59.107 ||

धनुष कट जाने पर, बाणों से आहत, चर्बी से भीगे और रक्त से सने अंगों वाले उस देव-शत्रु ने युद्ध में स्वयं ब्रह्मा द्वारा प्रदत्त उस भयंकर शक्ति को उठा लिया।

श्लोक 108 (yuddha.59.108)

स तां सधूमानलसंनिकाशां वित्रासनां संयति वानराणाम्। चिक्षेप शक्तिं तरसा ज्वलन्तीं सौमित्रये राक्षसराष्ट्रनाथः ॥ 59.108 ॥

sa tāṃ sadhūmānalasaṃnikāśāṃ vitrāsanāṃ saṃyati vānarāṇām| cikṣepa śaktiṃ tarasā jvalantīṃ saumitraye rākṣasarāṣṭranāthaḥ || 59.108 ||

उस राक्षस-राष्ट्रनाथ ने धुँआती अग्नि के समान, युद्ध में वानरों को त्रस्त करने वाली, प्रज्वलित उस शक्ति को वेगपूर्वक लक्ष्मण पर फेंक दिया।

श्लोक 109 (yuddha.59.109)

तामापतन्तीं भरतानुजोऽस्त्रै- र्जघान बाणैश्च हुताग्निकल्पैः। तथापि सा तस्य विवेश शक्ति- र्भुजान्तरं दाशरथेर्विशालम् ॥ 59.109 ॥

tāmāpatantīṃ bharatānujo'strai- rjaghāna bāṇaiśca hutāgnikalpaiḥ| tathāpi sā tasya viveśa śakti- rbhujāntaraṃ dāśaratherviśālam || 59.109 ||

भरत के अनुज ने उस आती हुई शक्ति पर हवन-अग्नि के समान बाणों और अस्त्रों से प्रहार किया; फिर भी वह शक्ति दाशरथि की विशाल छाती में जा घुसी।

श्लोक 110 (yuddha.59.110)

स शक्तिमाञ् शक्तिसमाहतः सन् जज्वाल भूमौ स रघुप्रवीरः। तं विह्वलन्तं सहसाभ्युपेत्य जग्राह राजा तरसा भुजाभ्याम् ॥ 59.110 ॥

sa śaktimāñ śaktisamāhataḥ san jajvāla bhūmau sa raghupravīraḥ| taṃ vihvalantaṃ sahasābhyupetya jagrāha rājā tarasā bhujābhyām || 59.110 ||

शक्ति से आहत होकर, स्वयं शक्तिशाली होते हुए भी, वह रघुवीर जलते हुए भूमि पर गिर पड़ा। उस विह्वल पड़े लक्ष्मण के पास अचानक पहुँचकर राजा रावण ने बलपूर्वक उन्हें दोनों भुजाओं से पकड़ लिया।

श्लोक 111 (yuddha.59.111)

हिमवान् मन्दरो मेरुस्त्रैलोक्यं वा सहामरैः। शक्यं भुजाभ्यामुद्धर्तुं न शक्यो भरतानुजः ॥ 59.111 ॥

himavān mandaro merustrailokyaṃ vā sahāmaraiḥ| śakyaṃ bhujābhyāmuddhartuṃ na śakyo bharatānujaḥ || 59.111 ||

हिमालय, मन्दराचल, मेरु, अथवा देवताओं सहित तीनों लोकों को भी वह अपनी भुजाओं से उठा सकता था -- परन्तु भरत के अनुज को वह नहीं उठा सका।

श्लोक 112 (yuddha.59.112)

शक्त्या ब्राह्म्या तु सौमित्रिस्ताडितोऽपि स्तनान्तरे। विष्णोरमीमांस्यभागमात्मानं प्रत्यनुस्मरत् ॥ 59.112 ॥

śaktyā brāhmyā tu saumitristāḍito'pi stanāntare| viṣṇoramīmāṃsyabhāgamātmānaṃ pratyanusmarat || 59.112 ||

ब्रह्मा-प्रदत्त उस शक्ति से छाती पर आहत होते हुए भी, लक्ष्मण ने स्वयं को विष्णु के अगम्य अंश के रूप में स्मरण किया।

श्लोक 113 (yuddha.59.113)

ततो दानवदर्पघ्नं सौमित्रिं देवकण्टकः। तं पीडयित्वा बाहुभ्यां न प्रभुर्लङ्घनेऽभवत् ॥ 59.113 ॥

tato dānavadarpaghnaṃ saumitriṃ devakaṇṭakaḥ| taṃ pīḍayitvā bāhubhyāṃ na prabhurlaṅghane'bhavat || 59.113 ||

तब देवताओं का वह कंटक रावण, दानवों के अभिमान को नष्ट करने वाले लक्ष्मण को अपनी भुजाओं से दबाकर भी, उन्हें उठाने में समर्थ न हो सका।

श्लोक 114 (yuddha.59.114)

ततः क्रुद्धो वायुसुतो रावणं समभिद्रवत्। आजघानोरसि क्रुद्धो वज्रकल्पेन मुष्टिना ॥ 59.114 ॥

tataḥ kruddho vāyusuto rāvaṇaṃ samabhidravat| ājaghānorasi kruddho vajrakalpena muṣṭinā || 59.114 ||

तब क्रुद्ध पवनपुत्र रावण पर झपटा, और क्रोधपूर्वक वज्र के समान मुट्ठी से उसकी छाती पर प्रहार किया।

श्लोक 115 (yuddha.59.115)

तेन मुष्टिप्रहारेण रावणो राक्षसेश्वरः। जानुभ्यामगमद् भूमौ चचाल च पपात च ॥ 59.115 ॥

tena muṣṭiprahāreṇa rāvaṇo rākṣaseśvaraḥ| jānubhyāmagamad bhūmau cacāla ca papāta ca || 59.115 ||

उस मुष्टि-प्रहार से राक्षसराज रावण घुटनों के बल भूमि पर आ गिरा, डगमगाया और गिर पड़ा।

श्लोक 116 (yuddha.59.116)

आस्यैश्च नेत्रैः श्रवणैः पपात रुधिरं बहु। विघूर्णमानो निश्चेष्टो रथोपस्थ उपाविशत् ॥ 59.116 ॥

āsyaiśca netraiḥ śravaṇaiḥ papāta rudhiraṃ bahu| vighūrṇamāno niśceṣṭo rathopastha upāviśat || 59.116 ||

उसके मुख, नेत्रों और कानों से बहुत सा रक्त बह निकला; चक्कर खाता, निश्चेष्ट, वह अपने रथ के आसन पर बैठ गया।

श्लोक 117 (yuddha.59.117)

विसंज्ञो मूर्च्छितश्चासीन्न च स्थानं समालभत्। विसंज्ञं रावणं दृष्ट्वा समरे भीमविक्रमम् ॥ 59.117 ॥

visaṃjño mūrcchitaścāsīnna ca sthānaṃ samālabhat| visaṃjñaṃ rāvaṇaṃ dṛṣṭvā samare bhīmavikramam || 59.117 ||

वह मूर्च्छित और चेतनाशून्य हो गया, अपना स्थान भी संभाल न सका।

श्लोक 118 (yuddha.59.118)

ऋषयो वानराश्चैव नेदुर्देवाश्च सासुराः। हनूमानथ तेजस्वी लक्ष्मणं रावणार्दितम् ॥ 59.118 ॥

ṛṣayo vānarāścaiva nedurdevāśca sāsurāḥ| hanūmānatha tejasvī lakṣmaṇaṃ rāvaṇārditam || 59.118 ||

भयंकर पराक्रमी रावण को युद्ध में मूर्च्छित देखकर ऋषियों, वानरों और असुरों सहित देवताओं ने हर्षनाद किया।

श्लोक 119 (yuddha.59.119)

आनयद् राघवाभ्याशं बाहुभ्यां परिगृह्य तम्। वायुसूनोः सुहृत्त्वेन भक्त्या परमया च सः। शत्रूणामप्यकम्प्योऽपि लघुत्वमगमत् कपेः ॥ 59.119 ॥

ānayad rāghavābhyāśaṃ bāhubhyāṃ parigṛhya tam| vāyusūnoḥ suhṛttvena bhaktyā paramayā ca saḥ| śatrūṇāmapyakampyo'pi laghutvamagamat kapeḥ || 59.119 ||

तब तेजस्वी हनुमान ने रावण से पीड़ित लक्ष्मण को दोनों भुजाओं में उठाकर राघव के समीप ले गए। पवनपुत्र के प्रति सौहार्द और परम भक्ति के कारण, शत्रुओं के लिए भी अकम्प्य लक्ष्मण उस वानर के हाथों में सहज ही वशीभूत हो गए।

श्लोक 120 (yuddha.59.120)

तं समुत्सृज्य सा शक्तिः सौमित्रिं युधि निर्जितम्। रावणस्य रथे तस्मिन् स्थानं पुनरुपागमत् ॥ 59.120 ॥

taṃ samutsṛjya sā śaktiḥ saumitriṃ yudhi nirjitam| rāvaṇasya rathe tasmin sthānaṃ punarupāgamat || 59.120 ||

वह शक्ति, युद्ध में पराभूत हुए लक्ष्मण को छोड़कर, पुनः रावण के उसी रथ में अपने स्थान पर लौट गई।

श्लोक 121 (yuddha.59.121)

रावणोऽपि महातेजाः प्राप्य संज्ञां महाहवे। आददे निशितान् बाणाञ्जग्राह च महद्धनुः ॥ 59.121 ॥

rāvaṇo'pi mahātejāḥ prāpya saṃjñāṃ mahāhave| ādade niśitān bāṇāñjagrāha ca mahaddhanuḥ || 59.121 ||

महातेजस्वी रावण ने भी उस महासमर में चेतना प्राप्त कर तीक्ष्ण बाणों को उठाया और अपना विशाल धनुष ग्रहण किया।

श्लोक 122 (yuddha.59.122)

आश्वस्तश्च विशल्यश्च लक्ष्मणः शत्रुसूदनः। विष्णोर्भागममीमांस्यमात्मानं प्रत्यनुस्मरन् ॥ 59.122 ॥

āśvastaśca viśalyaśca lakṣmaṇaḥ śatrusūdanaḥ| viṣṇorbhāgamamīmāṃsyamātmānaṃ pratyanusmaran || 59.122 ||

शत्रुसूदन लक्ष्मण, अब स्वस्थ और शल्यरहित होकर, स्वयं को विष्णु के उस अगम्य अंश के रूप में स्मरण करते हुए --

श्लोक 123 (yuddha.59.123)

निपातितमहावीरां वानराणां महाचमूम्। राघवस्तु रणे दृष्ट्वा रावणं समभिद्रवत् ॥ 59.123 ॥

nipātitamahāvīrāṃ vānarāṇāṃ mahācamūm| rāghavastu raṇe dṛṣṭvā rāvaṇaṃ samabhidravat || 59.123 ||

-- वानरों की उस महासेना को, जिसके महावीर युद्ध में गिर चुके थे, देखकर राघव रावण की ओर झपटे।

श्लोक 124 (yuddha.59.124)

अथैनमनुसंक्रम्य हनूमान् वाक्यमब्रवीत्। मम पृष्ठं समारुह्य राक्षसं शास्तुमर्हसि ॥ 59.124 ॥

athainamanusaṃkramya hanūmān vākyamabravīt| mama pṛṣṭhaṃ samāruhya rākṣasaṃ śāstumarhasi || 59.124 ||

तब हनुमान ने उनके पास आकर कहा: "मेरी पीठ पर सवार होकर आप इस राक्षस को दण्ड दें --

श्लोक 125 (yuddha.59.125)

विष्णुर्यथा गरुत्मन्तमारुह्यामरवैरिणम्। तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यं वायुपुत्रेण भाषितम् ॥ 59.125 ॥

viṣṇuryathā garutmantamāruhyāmaravairiṇam| tacchrutvā rāghavo vākyaṃ vāyuputreṇa bhāṣitam || 59.125 ||

-- जैसे विष्णु गरुड़ पर सवार होकर देवताओं के शत्रुओं को दण्डित करते हैं।" पवनपुत्र के इन वचनों को सुनकर राघव --

श्लोक 126 (yuddha.59.126)

अथारुरोह सहसा हनूमन्तं महाकपिम्। रथस्थं रावणं संख्ये ददर्श मनुजाधिपः ॥ 59.126 ॥

athāruroha sahasā hanūmantaṃ mahākapim| rathasthaṃ rāvaṇaṃ saṃkhye dadarśa manujādhipaḥ || 59.126 ||

-- तुरन्त महाकपि हनुमान पर सवार हो गए; और उस मनुजाधिपति ने रथ पर खड़े रावण को युद्ध में देखा।

श्लोक 127 (yuddha.59.127)

तमालोक्य महातेजाः प्रदुद्राव स रावणम्। वैरोचनमिव क्रुद्धो विष्णुरभ्युद्यतायुधः ॥ 59.127 ॥

tamālokya mahātejāḥ pradudrāva sa rāvaṇam| vairocanamiva kruddho viṣṇurabhyudyatāyudhaḥ || 59.127 ||

उसे देखकर वह महातेजस्वी राम, अस्त्र उठाए हुए, वैरोचन (बलि) पर आक्रमण करते क्रुद्ध विष्णु के समान रावण पर झपटे।

श्लोक 128 (yuddha.59.128)

ज्याशब्दमकरोत् तीव्रं वज्रनिष्पेषनिष्ठुरम्। गिरा गम्भीरया रामो राक्षसेन्द्रमुवाच ह ॥ 59.128 ॥

jyāśabdamakarot tīvraṃ vajraniṣpeṣaniṣṭhuram| girā gambhīrayā rāmo rākṣasendramuvāca ha || 59.128 ||

उन्होंने अपनी प्रत्यंचा को वज्र के घर्षण के समान कर्कशता से झंकृत किया, और गम्भीर स्वर में राम ने राक्षसराज से कहा:

श्लोक 129 (yuddha.59.129)

तिष्ठ तिष्ठ मम त्वं हि कृत्वा विप्रियमीदृशम्। क्व नु राक्षसशार्दूल गत्वा मोक्षमवाप्स्यसि ॥ 59.129 ॥

tiṣṭha tiṣṭha mama tvaṃ hi kṛtvā vipriyamīdṛśam| kva nu rākṣasaśārdūla gatvā mokṣamavāpsyasi || 59.129 ||

"रुको, रुको! मुझे ऐसा अपकार करके, हे राक्षसों में श्रेष्ठ, अब कहाँ जाकर तुम मुक्ति पाओगे?"

श्लोक 130 (yuddha.59.130)

यदीन्द्रवैवस्वतभास्करान् वा स्वयंभुवैश्वानरशंकरान् वा। गमिष्यसि त्वं दशधा दिशो वा तथापि मे नाद्य गतो विमोक्ष्यसे ॥ 59.130 ॥

yadīndravaivasvatabhāskarān vā svayaṃbhuvaiśvānaraśaṃkarān vā| gamiṣyasi tvaṃ daśadhā diśo vā tathāpi me nādya gato vimokṣyase || 59.130 ||

"चाहे तुम इन्द्र, यम, सूर्य, ब्रह्मा, अग्नि अथवा शंकर के पास जाओ, या दसों दिशाओं में भाग जाओ, फिर भी आज तुम मुझसे बचकर नहीं जा सकोगे।"

श्लोक 131 (yuddha.59.131)

यश्चैष शक्त्या निहतस्त्वयाद्य गच्छन् विषादं सहसाभ्युपेत्य। स एष रक्षोगणराज मृत्युः सपुत्रपौत्रस्य तवाद्य युद्धे ॥ 59.131 ॥

yaścaiṣa śaktyā nihatastvayādya gacchan viṣādaṃ sahasābhyupetya| sa eṣa rakṣogaṇarāja mṛtyuḥ saputrapautrasya tavādya yuddhe || 59.131 ||

"जिसे तुमने आज शक्ति से आहत कर विषाद में डाल दिया, हे राक्षसगणराज, वही आज युद्ध में तुम्हारे तथा तुम्हारे पुत्र-पौत्रों के लिए मृत्यु-स्वरूप होगा।"

श्लोक 132 (yuddha.59.132)

एतेन चात्यद्भुतदर्शनानि शरैर्जनस्थानकृतालयानि। चतुर्दशान्यात्तवरायुधानि रक्षःसहस्राणि निषूदितानि ॥ 59.132 ॥

etena cātyadbhutadarśanāni śarairjanasthānakṛtālayāni| caturdaśānyāttavarāyudhāni rakṣaḥsahasrāṇi niṣūditāni || 59.132 ||

"उसी ने जनस्थान में निवास करने वाले, उत्तम अस्त्रों से सुसज्जित, अद्भुत एवं भयंकर रूप वाले चौदह हजार राक्षसों को भी अपने बाणों से मार डाला था।"

श्लोक 133 (yuddha.59.133)

राघवस्य वचः श्रुत्वा राक्षसेन्द्रो महाबलः। वायुपुत्रं महावेगं वहन्तं राघवं रणे ॥ 59.133 ॥

rāghavasya vacaḥ śrutvā rākṣasendro mahābalaḥ| vāyuputraṃ mahāvegaṃ vahantaṃ rāghavaṃ raṇe || 59.133 ||

राघव के वचन सुनकर वह महाबली राक्षसराज अत्यन्त क्रोध से भरकर --

श्लोक 134 (yuddha.59.134)

रोषेण महताऽऽविष्टः पूर्ववैरमनुस्मरन्। आजघान शरैर्दीप्तैः कालानलशिखोपमैः ॥ 59.134 ॥

roṣeṇa mahatā''viṣṭaḥ pūrvavairamanusmaran| ājaghāna śarairdīptaiḥ kālānalaśikhopamaiḥ || 59.134 ||

-- और पुरानी शत्रुता का स्मरण करते हुए, युद्ध में राघव को धारण किए हुए महावेगशाली पवनपुत्र पर प्रलयाग्नि की ज्वालाओं के समान प्रज्वलित बाणों से प्रहार करने लगा।

श्लोक 135 (yuddha.59.135)

राक्षसेनाहवे तस्य ताडितस्यापि सायकैः। स्वभावतेजोयुक्तस्य भूयस्तेजोऽभ्यवर्धत ॥ 59.135 ॥

rākṣasenāhave tasya tāḍitasyāpi sāyakaiḥ| svabhāvatejoyuktasya bhūyastejo'bhyavardhata || 59.135 ||

परन्तु उन बाणों से आहत होने पर भी, स्वभाव से तेजस्वी हनुमान का तेज और भी बढ़ गया।

श्लोक 136 (yuddha.59.136)

ततो रामो महातेजा रावणेन कृतव्रणम्। दृष्ट्वा प्लवगशार्दूलं क्रोधस्य वशमेयिवान् ॥ 59.136 ॥

tato rāmo mahātejā rāvaṇena kṛtavraṇam| dṛṣṭvā plavagaśārdūlaṃ krodhasya vaśameyivān || 59.136 ||

तब महातेजस्वी राम ने रावण द्वारा घायल किए गए उस वानरश्रेष्ठ को देखकर क्रोध के वशीभूत हो गए।

श्लोक 137 (yuddha.59.137)

तस्याभिसंक्रम्य रथं सचक्रं साश्वध्वजच्छत्रमहापताकम्। ससारथिं साशनिशूलखड्गं रामः प्रचिच्छेद शितैः शराग्रैः ॥ 59.137 ॥

tasyābhisaṃkramya rathaṃ sacakraṃ sāśvadhvajacchatramahāpatākam| sasārathiṃ sāśaniśūlakhaḍgaṃ rāmaḥ praciccheda śitaiḥ śarāgraiḥ || 59.137 ||

उसके रथ के पास पहुँचकर राम ने अपने तीक्ष्ण बाणों की नोकों से उसके पहियों, अश्वों, ध्वजा, छत्र और विशाल पताका को, सारथी सहित, तथा उसके वज्र, त्रिशूल और खड्ग सहित काट डाला।

श्लोक 138 (yuddha.59.138)

अथेन्द्रशत्रुं तरसा जघान बाणेन वज्राशनिसंनिभेन। भुजान्तरे व्यूढसुजातरूपे वज्रेण मेरुं भगवानिवेन्द्रः ॥ 59.138 ॥

athendraśatruṃ tarasā jaghāna bāṇena vajrāśanisaṃnibhena| bhujāntare vyūḍhasujātarūpe vajreṇa meruṃ bhagavānivendraḥ || 59.138 ||

फिर उन्होंने उस इन्द्र-शत्रु पर वज्र के समान बाण से, उसकी विशाल एवं सुगठित छाती पर, उसी प्रकार प्रहार किया जैसे भगवान् इन्द्र मेरु पर्वत पर वज्र से प्रहार करते हैं।

श्लोक 139 (yuddha.59.139)

यो वज्रपाताशनिसंनिपाता- न्न चुक्षुभे नापि चचाल राजा। स रामबाणाभिहतो भृशार्त- श्चचाल चापं च मुमोच वीरः ॥ 59.139 ॥

yo vajrapātāśanisaṃnipātā- nna cukṣubhe nāpi cacāla rājā| sa rāmabāṇābhihato bhṛśārta- ścacāla cāpaṃ ca mumoca vīraḥ || 59.139 ||

जो राजा वज्रपात से भी कभी विचलित या क्षुब्ध नहीं हुआ था, वह राम के बाण से आहत होकर अत्यन्त पीड़ित हो गया; वह वीर डगमगाया और उसका धनुष उसके हाथ से छूट गया।

श्लोक 140 (yuddha.59.140)

तं विह्वलन्तं प्रसमीक्ष्य रामः समाददे दीप्तमथार्धचन्द्रम्। तेनार्कवर्णं सहसा किरीटं चिच्छेद रक्षोधिपतेर्महात्मा ॥ 59.140 ॥

taṃ vihvalantaṃ prasamīkṣya rāmaḥ samādade dīptamathārdhacandram| tenārkavarṇaṃ sahasā kirīṭaṃ ciccheda rakṣodhipatermahātmā || 59.140 ||

उसे इस प्रकार डगमगाता देखकर राम ने एक प्रज्वलित अर्धचन्द्र बाण उठाया, और उससे उस महात्मा ने राक्षसराज के सूर्य के समान चमकते मुकुट को तत्काल काट डाला।

श्लोक 141 (yuddha.59.141)

तं निर्विषाशीविषसंनिकाशं शान्तार्चिषं सूर्यमिवाप्रकाशम्। गतश्रियं कृत्तकिरीटकूट- मुवाच रामो युधि राक्षसेन्द्रम् ॥ 59.141 ॥

taṃ nirviṣāśīviṣasaṃnikāśaṃ śāntārciṣaṃ sūryamivāprakāśam| gataśriyaṃ kṛttakirīṭakūṭa- muvāca rāmo yudhi rākṣasendram || 59.141 ||

उस राक्षसराज से, जो अब विषरहित सर्प के समान, प्रकाशरहित सूर्य के समान, शान्त ज्वाला वाला, श्रीहीन तथा कटे हुए मुकुट-शिखर वाला हो चुका था, राम ने युद्ध में यह कहा।

श्लोक 142 (yuddha.59.142)

कृतं त्वया कर्म महत् सुभीमं हतप्रवीरश्च कृतस्त्वयाहम्। तस्मात् परिश्रान्त इति व्यवस्य न त्वां शरैर्मृत्युवशं नयामि ॥ 59.142 ॥

kṛtaṃ tvayā karma mahat subhīmaṃ hatapravīraśca kṛtastvayāham| tasmāt pariśrānta iti vyavasya na tvāṃ śarairmṛtyuvaśaṃ nayāmi || 59.142 ||

"तुमने एक महान् एवं अत्यन्त भयंकर कर्म किया है, और तुमने मुझे मेरे श्रेष्ठ वीरों से वंचित कर दिया है; फिर भी यह जानकर कि तुम अब थक चुके हो, मैं तुम्हें अपने बाणों से मृत्यु के वश में नहीं भेज रहा।"

श्लोक 143 (yuddha.59.143)

प्रयाहि जानामि रणार्दितस्त्वं प्रविश्य रात्रिंचरराज लङ्काम्। आश्वस्य निर्याहि रथी च धन्वी तदा बलं प्रेक्ष्यसि मे रथस्थः ॥ 59.143 ॥

prayāhi jānāmi raṇārditastvaṃ praviśya rātriṃcararāja laṅkām| āśvasya niryāhi rathī ca dhanvī tadā balaṃ prekṣyasi me rathasthaḥ || 59.143 ||

"अब जाओ; मैं जानता हूँ कि तुम युद्ध से पीड़ित हो। हे निशाचरराज, लंका में प्रवेश करो; फिर स्वस्थ होकर, रथ और धनुष सहित पुनः आना, तब रथ पर बैठे-बैठे ही तुम मेरा बल देख सकोगे।"

श्लोक 144 (yuddha.59.144)

स एवमुक्तो हतदर्पहर्षो निकृत्तचापः स हताश्वसूतः। शरार्दितो भग्नमहाकिरीटो विवेश लङ्कां सहसा स्म राजा ॥ 59.144 ॥

sa evamukto hatadarpaharṣo nikṛttacāpaḥ sa hatāśvasūtaḥ| śarārdito bhagnamahākirīṭo viveśa laṅkāṃ sahasā sma rājā || 59.144 ||

यह सुनकर, अपने अभिमान और हर्ष से रहित, धनुष कट जाने से, अश्व और सारथी के मारे जाने से, बाणों से पीड़ित तथा अपने विशाल मुकुट के टूट जाने से, वह राजा तुरन्त लंका में प्रविष्ट हो गया।

श्लोक 145 (yuddha.59.145)

तस्मिन् प्रविष्टे रजनीचरेन्द्रे महाबले दानवदेवशत्रौ। हरीन् विशल्यान् सह लक्ष्मणेन चकार रामः परमाहवाग्रे ॥ 59.145 ॥

tasmin praviṣṭe rajanīcarendre mahābale dānavadevaśatrau| harīn viśalyān saha lakṣmaṇena cakāra rāmaḥ paramāhavāgre || 59.145 ||

उस महाबली दानव-देव-शत्रु निशाचरराज के नगर में प्रवेश करने पर, राम ने उस महासमर के अग्रभाग में ही, लक्ष्मण सहित, वानरों को शल्यरहित (घाव-मुक्त) कर दिया।

श्लोक 146 (yuddha.59.146)

तस्मिन् प्रभग्ने त्रिदशेन्द्रशत्रौ सुरासुरा भूतगणा दिशश्च। ससागराः सर्षिमहोरगाश्च तथैव भूम्यम्बुचराः प्रहृष्टाः ॥ 59.146 ॥

tasmin prabhagne tridaśendraśatrau surāsurā bhūtagaṇā diśaśca| sasāgarāḥ sarṣimahoragāśca tathaiva bhūmyambucarāḥ prahṛṣṭāḥ || 59.146 ||

देवराज के उस शत्रु के इस प्रकार पराजित होने पर, देवता और असुर, भूत-गण, दिशाएँ, सागर, ऋषि, महानाग तथा पृथ्वी और जल में विचरने वाले सभी प्राणी हर्षित हो उठे।

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