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युद्धकाण्ड · सर्ग 67

कुम्भकर्ण-वध

सर्ग 66सर्ग-सूचीसर्ग 68

श्लोक 1 (yuddha.67.1)

ते निवृत्ता महाकायाः श्रुत्वाङ्गदवचस्तदा । नैष्ठिकीं बुद्धिमास्थाय सर्वे संग्रामकांक्षिणः ॥ 67.1 ॥

te nivṛttā mahākāyāḥ śrutvāṅgadavacastadā | naiṣṭhikīṃ buddhimāsthāya sarve saṃgrāmakāṃkṣiṇaḥ || 67.1 ||

अंगद के वचन सुनकर वे विशालकाय वानर लौट आए, और दृढ़ निश्चय करके सभी पुनः युद्ध की कामना करने लगे।

श्लोक 2 (yuddha.67.2)

समुदीरितवीर्यास्ते समारोपितविक्रमाः । पर्यवस्थापिता वाक्यैरङ्गदेन बलीयसा ॥ 67.2 ॥

samudīritavīryāste samāropitavikramāḥ | paryavasthāpitā vākyairaṅgadena balīyasā || 67.2 ||

उनका पराक्रम पुनः जाग्रत हो उठा, उनका साहस लौट आया, और बलशाली अंगद के वचनों से वे सुदृढ़ हो गए।

श्लोक 3 (yuddha.67.3)

प्रयाताश्च गता हर्षं मरणे कृतनिश्चयाः । चक्रुः सुतुमुलं युद्धं वानरास्त्यक्तजीविताः ॥ 67.3 ॥

prayātāśca gatā harṣaṃ maraṇe kṛtaniścayāḥ | cakruḥ sutumulaṃ yuddhaṃ vānarāstyaktajīvitāḥ || 67.3 ||

आगे बढ़ते हुए, हर्ष से भरकर, मृत्यु का भी निश्चय करके, वे वानर अपने प्राणों की चिन्ता त्यागकर घमासान युद्ध करने लगे।

श्लोक 4 (yuddha.67.4)

अथ वृक्षान् महाकायाः सानूनि सुमहान्ति च । वानरास्तूर्णमुद्यम्य कुम्भकर्णमभिद्रवन् ॥ 67.4 ॥

atha vṛkṣān mahākāyāḥ sānūni sumahānti ca | vānarāstūrṇamudyamya kumbhakarṇamabhidravan || 67.4 ||

तब वे विशालकाय वानर, वृक्षों और विशाल पर्वत-शिखरों को तुरन्त उठाकर, कुम्भकर्ण पर टूट पड़े।

श्लोक 5 (yuddha.67.5)

कुम्भकर्णः संक्रुद्धो गदामुद्यम्य वीर्यवान् । धर्षयन् स महाकायः समन्ताद्व्यक्षिपद्रिपून् ॥ 67.5 ॥

kumbhakarṇaḥ saṃkruddho gadāmudyamya vīryavān | dharṣayan sa mahākāyaḥ samantādvyakṣipadripūn || 67.5 ||

क्रुद्ध कुम्भकर्ण ने अपनी गदा उठाकर, उन्हें दबाते हुए, अपने उस विशालकाय बल से शत्रुओं को चारों ओर फेंक डाला।

श्लोक 6 (yuddha.67.6)

शतानि सप्त चाष्टौ च सहस्राणि च वानराः । प्रकीर्णाः शेरते भूमौ कुम्भकर्णेन ताडिताः ॥ 67.6 ॥

śatāni sapta cāṣṭau ca sahasrāṇi ca vānarāḥ | prakīrṇāḥ śerate bhūmau kumbhakarṇena tāḍitāḥ || 67.6 ||

सात सौ और आठ हजार वानर कुम्भकर्ण द्वारा आहत होकर भूमि पर बिखरे हुए पड़े थे।

श्लोक 7 (yuddha.67.7)

षोडशाष्टौ च दश च विंशत्त्रिंशत्तथैव च । परिक्षिप्य च बाहुभ्यां खादन्वि परिधावति ॥ 67.7 ॥

ṣoḍaśāṣṭau ca daśa ca viṃśattriṃśattathaiva ca | parikṣipya ca bāhubhyāṃ khādanvi paridhāvati || 67.7 ||

सोलह, आठ, दस, बीस और तीस वानरों को एक साथ अपनी भुजाओं में समेटकर, वह उन्हें खाते हुए इधर-उधर दौड़ने लगा।

श्लोक 8 (yuddha.67.8)

भक्षयन् भृशसंक्रुद्धो गरुडः पन्नगानिव । कृच्छ्रेण च समाश्वस्ताः संगम्य च ततस्ततः ॥ 67.8 ॥

bhakṣayan bhṛśasaṃkruddho garuḍaḥ pannagāniva | kṛcchreṇa ca samāśvastāḥ saṃgamya ca tatastataḥ || 67.8 ||

वह अत्यन्त क्रोध में उन्हें उसी प्रकार खा रहा था, जैसे गरुड़ सर्पों को खाते हैं; और बड़ी कठिनाई से धैर्य धारण कर, चारों ओर से एकत्र होकर,

श्लोक 9 (yuddha.67.9)

वृक्षाद्रिहस्ता हरयस्तस्थुः संग्राममूर्धनि । ततः पर्वतमुत्पाट्य द्विविदः प्लवगर्षभः ॥ 67.9 ॥

vṛkṣādrihastā harayastasthuḥ saṃgrāmamūrdhani | tataḥ parvatamutpāṭya dvividaḥ plavagarṣabhaḥ || 67.9 ||

-- वानर, वृक्ष और पर्वत-खण्ड हाथों में लिए, फिर युद्ध के अग्रभाग में जा डटे। तब वानरश्रेष्ठ द्विविद ने एक पर्वत उखाड़कर,

श्लोक 10 (yuddha.67.10)

दुद्राव गिरिशृङ्गाभम् विलम्ब इव तोयदः । तं समुत्पत्य चिक्षेप कुम्भकर्णाय वानरः ॥ 67.10 ॥

dudrāva giriśṛṅgābham vilamba iva toyadaḥ | taṃ samutpatya cikṣepa kumbhakarṇāya vānaraḥ || 67.10 ||

उस पर्वत-शिखर के समान भार को लिए, मानो मन्द गति से बढ़ता कोई मेघ हो, वह दौड़ा; और उछलकर उस वानर ने उसे कुम्भकर्ण पर फेंक दिया।

श्लोक 11 (yuddha.67.11)

तमप्राप्य महाकायं तस्य सैन्येऽपतत्ततः । ममर्दाश्वान् गजांश्चापि रथांश्चापि नगोत्तमः ॥ 67.11 ॥

tamaprāpya mahākāyaṃ tasya sainye'patattataḥ | mamardāśvān gajāṃścāpi rathāṃścāpi nagottamaḥ || 67.11 ||

वह उस विशालकाय कुम्भकर्ण तक नहीं पहुँच सका, और उसकी सेना में जा गिरा; और उस श्रेष्ठ पर्वत ने घोड़ों, हाथियों और रथों को कुचल डाला।

श्लोक 12 (yuddha.67.12)

तानि चान्यानि रक्षांसि एवं चान्यद्गिरेः शिरः । तच्छएलवेगाभिहतं हताश्वं हतसारथि ॥ 67.12 ॥

tāni cānyāni rakṣāṃsi evaṃ cānyadgireḥ śiraḥ | tacchaelavegābhihataṃ hatāśvaṃ hatasārathi || 67.12 ||

उस पर्वत के वेग से आहत होकर वे राक्षस और अन्य भी, घोड़े मारे गए, सारथि मारे गए --

श्लोक 13 (yuddha.67.13)

रक्षसां रुधिरक्लिन्नम् बभूवायोधनम् महत् । रथिनो वानरेन्द्राणां शरैः कालान्तकोपमैः ॥ 67.13 ॥

rakṣasāṃ rudhiraklinnam babhūvāyodhanam mahat | rathino vānarendrāṇāṃ śaraiḥ kālāntakopamaiḥ || 67.13 ||

-- वह विशाल रणभूमि राक्षसों के रक्त से भीग गई। उधर रथी राक्षस, कालान्तक यम के समान भयंकर बाणों से,

श्लोक 14 (yuddha.67.14)

शिरांसि नर्दतां जह्रुः सहसा भीमनिःस्वनाः । वानराश्च महात्मानः समुत्पाट्य महाद्रुमान् ॥ 67.14 ॥

śirāṃsi nardatāṃ jahruḥ sahasā bhīmaniḥsvanāḥ | vānarāśca mahātmānaḥ samutpāṭya mahādrumān || 67.14 ||

उन गरजते वानरों के सिर सहसा उन भयंकर-स्वर राक्षसों ने काट डाले। और वे महात्मा वानर विशाल वृक्षों को उखाड़कर,

श्लोक 15 (yuddha.67.15)

रथानश्वान् गजानुष्ट्रान्राक्षसानभ्यसूदयन् । हनूमान् शैलशृङ्गाणि वृक्षांश्च विविधान् ध्रुमान् ॥ 67.15 ॥

rathānaśvān gajānuṣṭrānrākṣasānabhyasūdayan | hanūmān śailaśṛṅgāṇi vṛkṣāṃśca vividhān dhrumān || 67.15 ||

उनके रथों, घोड़ों, हाथियों और ऊँटों को राक्षसों सहित नष्ट करने लगे। हनुमान् ने पर्वत-शिखरों और नाना प्रकार के वृक्षों की,

श्लोक 16 (yuddha.67.16)

ववर्ष कुम्भकर्णस्य शिरस्यम्बरमास्थितः । तानि पर्वतशृङ्गाणि शूलेन तु बिभेद ह ॥ 67.16 ॥

vavarṣa kumbhakarṇasya śirasyambaramāsthitaḥ | tāni parvataśṛṅgāṇi śūlena tu bibheda ha || 67.16 ||

आकाश में खड़े होकर कुम्भकर्ण के सिर पर वर्षा कर दी। किन्तु उसने अपने त्रिशूल से उन पर्वत-शिखरों को चूर-चूर कर डाला।

श्लोक 17 (yuddha.67.17)

बभञ्ज वृक्षवर्षं च कुम्भकर्णो महाबलः । ततो हरीणां तदनीकमुग्रं । दुद्राव शूलं निशितं प्रगृह्य । तस्थौ ततोऽस्यापततः पुरस्तान् । न्महीधराग्रं हनुमान् प्रगृह्य ॥ 67.17 ॥

babhañja vṛkṣavarṣaṃ ca kumbhakarṇo mahābalaḥ | tato harīṇāṃ tadanīkamugraṃ | dudrāva śūlaṃ niśitaṃ pragṛhya | tasthau tato'syāpatataḥ purastān | nmahīdharāgraṃ hanumān pragṛhya || 67.17 ||

महाबली कुम्भकर्ण ने उस वृक्ष-वर्षा को भी तोड़ डाला; फिर अपना तीक्ष्ण त्रिशूल थामे हुए वह वानरों की उस भीषण सेना पर झपटा। और हनुमान् एक पर्वत-शिखर को थामे हुए, उसके सामने आते ही डटकर खड़े हो गए।

श्लोक 18 (yuddha.67.18)

स कुम्भकर्णं कुपितो जघान । वेगेन शैलोत्तमभीमकायं । स चुक्षुभे तेन तदाभिबूतो । मेदार्द्रगात्रो रुधिरावसिक्तः ॥ 67.18 ॥

sa kumbhakarṇaṃ kupito jaghāna | vegena śailottamabhīmakāyaṃ | sa cukṣubhe tena tadābhibūto | medārdragātro rudhirāvasiktaḥ || 67.18 ||

क्रोध में भरकर उसने पर्वत के समान भीषण शरीर वाले कुम्भकर्ण पर वेगपूर्वक प्रहार किया। उस प्रहार से अभिभूत होकर वह डगमगा उठा, उसके अंग चर्बी से भीगे और रक्त से सने हुए थे।

श्लोक 19 (yuddha.67.19)

स शूलमाविध्य तडित्प्रकाशं । गिरिर्यथा प्रज्वलिताग्रशृङ्गम् । बाह्वन्तरे मारुति माजघान । गुहोऽचलं क्रौञ्चमिवोग्रशक्त्या ॥ 67.19 ॥

sa śūlamāvidhya taḍitprakāśaṃ | giriryathā prajvalitāgraśṛṅgam | bāhvantare māruti mājaghāna | guho'calaṃ krauñcamivograśaktyā || 67.19 ||

बिजली के समान चमकते, मानो प्रज्वलित शिखर वाला कोई पर्वत हो, ऐसे उस त्रिशूल को घुमाकर उसने हनुमान् की दोनों भुजाओं के बीच प्रहार किया, जैसे कार्तिकेय ने क्रौञ्च पर्वत पर अपनी उग्र शक्ति से प्रहार किया था।

श्लोक 20 (yuddha.67.20)

स शूलनिर्भिन्न महाभुजान्तरः । प्रविह्वलः शोणितमुद्वमन्मुखात् । ननाद भीमं हनुमान् महाहवे । युगान्तमेघस्तनितस्वनोपमम् ॥ 67.20 ॥

sa śūlanirbhinna mahābhujāntaraḥ | pravihvalaḥ śoṇitamudvamanmukhāt | nanāda bhīmaṃ hanumān mahāhave | yugāntameghastanitasvanopamam || 67.20 ||

उस त्रिशूल से अपनी विशाल छाती बिंधने पर, विह्वल होकर, मुख से रक्त वमन करते हुए, हनुमान् ने उस महासमर में प्रलयकालीन मेघ-गर्जन के समान भीषण गर्जना की।

श्लोक 21 (yuddha.67.21)

ततो विनेदुः सहसा प्रहृष्टा । रक्षोगणास्तं व्यथितं समीक्ष्य । प्लवंगमास्तु व्यथिता भयार्ताः । प्रदुद्रुवुः सम्यति कुम्भकर्णात् ॥ 67.21 ॥

tato vineduḥ sahasā prahṛṣṭā | rakṣogaṇāstaṃ vyathitaṃ samīkṣya | plavaṃgamāstu vyathitā bhayārtāḥ | pradudruvuḥ samyati kumbhakarṇāt || 67.21 ||

तब उसे इस प्रकार पीड़ित देखकर राक्षस-गण सहसा हर्ष से गरज उठे; जबकि वानर व्यथित और भयभीत होकर उस युद्ध में कुम्भकर्ण से भाग खड़े हुए।

श्लोक 22 (yuddha.67.22)

ततस्तु नीलो बलवान् पर्यवस्थापयन् बलम् । प्रविचिक्षेप शैलाग्रं कुम्भकर्णाय धीमते ॥ 67.22 ॥

tatastu nīlo balavān paryavasthāpayan balam | pravicikṣepa śailāgraṃ kumbhakarṇāya dhīmate || 67.22 ||

तब बलवान् नील ने सेना को सँभालते हुए, उस चतुर कुम्भकर्ण पर एक पर्वत-शिखर फेंका।

श्लोक 23 (yuddha.67.23)

तदापतन्तं सम्प्रेक्ष्ये मुष्टिनाभिजघान ह । मुष्टिप्रहाराभिहतं तच्छैलाग्रम् व्यशीर्यत ॥ 67.23 ॥

tadāpatantaṃ samprekṣye muṣṭinābhijaghāna ha | muṣṭiprahārābhihataṃ tacchailāgram vyaśīryata || 67.23 ||

उसे आता देखकर उसने अपनी मुट्ठी से उस पर प्रहार किया; और उस मुक्के के प्रहार से आहत होकर वह पर्वत-शिखर चूर-चूर हो गया --

श्लोक 24 (yuddha.67.24)

सविस्फुलिंगं सज्वालं निपपात महीतले । ऋषभः शरभो नीलो गवाक्षो गन्धमादनः ॥ 67.24 ॥

savisphuliṃgaṃ sajvālaṃ nipapāta mahītale | ṛṣabhaḥ śarabho nīlo gavākṣo gandhamādanaḥ || 67.24 ||

-- और चिंगारियाँ तथा ज्वालाएँ बिखेरता हुआ वह धरती पर गिर पड़ा। तब ऋषभ, शरभ, नील, गवाक्ष और गन्धमादन --

श्लोक 25 (yuddha.67.25)

पञ्च वानर शार्दूलाः कुम्भकर्णमुपाद्रवन् । शैलैर्वृक्षैस्तलैः पादैर्मुष्टिभिश्च महाबलाः ॥ 67.25 ॥

pañca vānara śārdūlāḥ kumbhakarṇamupādravan | śailairvṛkṣaistalaiḥ pādairmuṣṭibhiśca mahābalāḥ || 67.25 ||

-- वे पाँचों वानरश्रेष्ठ, महाबली होकर, पर्वत-खण्डों, वृक्षों, हथेलियों, पैरों और मुक्कों से कुम्भकर्ण पर टूट पड़े।

श्लोक 26 (yuddha.67.26)

कुम्भकर्णं महाकां निजघ्नुः सर्वतो युधि । स्पर्शानिव प्रहारांस्तान्वेदयानो न विव्यथे ॥ 67.26 ॥

kumbhakarṇaṃ mahākāṃ nijaghnuḥ sarvato yudhi | sparśāniva prahārāṃstānvedayāno na vivyathe || 67.26 ||

उन्होंने युद्ध में चारों ओर से विशालकाय कुम्भकर्ण पर प्रहार किए; किन्तु वह उन प्रहारों को मात्र स्पर्श के समान अनुभव करता हुआ तनिक भी विचलित नहीं हुआ।

श्लोक 27 (yuddha.67.27)

ऋषभं तु महावेगं बाहुभ्यां परिषस्वजे । कुम्भकर्णभुजाभ्यां तु पीडितो वानरर्षभः ॥ 67.27 ॥

ṛṣabhaṃ tu mahāvegaṃ bāhubhyāṃ pariṣasvaje | kumbhakarṇabhujābhyāṃ tu pīḍito vānararṣabhaḥ || 67.27 ||

उसने महावेगवान् ऋषभ को अपनी दोनों भुजाओं में जकड़ लिया; और कुम्भकर्ण की भुजाओं से पीड़ित होकर वह वानरश्रेष्ठ --

श्लोक 28 (yuddha.67.28)

निपपातर्षभो भीमः प्रमुखागतशोणितः । मुष्टिना शरभं हत्वा जानुना नीलमाहवे ॥ 67.28 ॥

nipapātarṣabho bhīmaḥ pramukhāgataśoṇitaḥ | muṣṭinā śarabhaṃ hatvā jānunā nīlamāhave || 67.28 ||

-- वह भयंकर ऋषभ मुख से रक्त बहाता हुआ गिर पड़ा। तब उस युद्ध में शरभ को मुक्के से और नील को घुटने से मारकर,

श्लोक 29 (yuddha.67.29)

आजघान गवाक्षं च तलेनेन्द्ररिपुस्तदा । पादेनाभ्यहनत्क्रुद्धस्तरसा गन्धमादनम् ॥ 67.29 ॥

ājaghāna gavākṣaṃ ca talenendraripustadā | pādenābhyahanatkruddhastarasā gandhamādanam || 67.29 ||

उस इन्द्रशत्रु ने गवाक्ष को अपनी हथेली से मारा; और क्रुद्ध होकर पैर से वेगपूर्वक गन्धमादन को भी मार गिराया।

श्लोक 30 (yuddha.67.30)

दत्तप्रहरव्यथिता मुमुहुः शोणितोक्षिताः । निपेतुस्ते तु मेदिन्यां निकृत्ता इव किंशुकाः ॥ 67.30 ॥

dattapraharavyathitā mumuhuḥ śoṇitokṣitāḥ | nipetuste tu medinyāṃ nikṛttā iva kiṃśukāḥ || 67.30 ||

उन प्रहारों से व्यथित होकर, रक्त से भीगकर, वे मूर्च्छित हो गए; और कटे हुए पलाश के वृक्षों के समान धरती पर गिर पड़े।

श्लोक 31 (yuddha.67.31)

तेषु वानरमुख्येषु पतितेषु महात्मसु । वानराणां सहस्राणि कुम्भकर्णं प्रदुद्रुवुः ॥ 67.31 ॥

teṣu vānaramukhyeṣu patiteṣu mahātmasu | vānarāṇāṃ sahasrāṇi kumbhakarṇaṃ pradudruvuḥ || 67.31 ||

उन महान् वानरश्रेष्ठों के गिर जाने पर, वानरों के सहस्रों समूह कुम्भकर्ण पर टूट पड़े।

श्लोक 32 (yuddha.67.32)

तं शैलमिव शैलाभाः सर्वे तु प्लवगर्षभाः । समारुह्य समुत्पत्य ददंशुश्च महाबलाः ॥ 67.32 ॥

taṃ śailamiva śailābhāḥ sarve tu plavagarṣabhāḥ | samāruhya samutpatya dadaṃśuśca mahābalāḥ || 67.32 ||

पर्वत के समान विशालकाय वे सभी महाबली वानरश्रेष्ठ, मानो किसी पर्वत पर हों, उस पर चढ़कर और उछलकर उसे काटने लगे।

श्लोक 33 (yuddha.67.33)

तं नखैर्दशनैश्चापि मुष्टिभिर्जानुभिस्तथा । कुम्भकर्णं महाकायं ते जघ्नुः प्लवगर्षभाः ॥ 67.33 ॥

taṃ nakhairdaśanaiścāpi muṣṭibhirjānubhistathā | kumbhakarṇaṃ mahākāyaṃ te jaghnuḥ plavagarṣabhāḥ || 67.33 ||

नखों, दाँतों, मुक्कों और घुटनों से उन वानरश्रेष्ठों ने विशालकाय कुम्भकर्ण पर प्रहार किया।

श्लोक 34 (yuddha.67.34)

स वानरसहस्रैस्तु विचितः पर्वतोपमः । रराज राक्षसव्याघ्रो गिरिरात्मरुहैरिव ॥ 67.34 ॥

sa vānarasahasraistu vicitaḥ parvatopamaḥ | rarāja rākṣasavyāghro girirātmaruhairiva || 67.34 ||

उन सहस्रों वानरों से आच्छादित होकर, पर्वत के समान विशाल वह राक्षस-व्याघ्र उस प्रकार शोभायमान हुआ, जैसे अपने ही वृक्षों से ढका हुआ कोई पर्वत।

श्लोक 35 (yuddha.67.35)

बाहुभ्याम् वानरान् सर्वान् प्रगृह्य स महाबलः । भक्षयामास संक्रुद्धो गरुडः पन्नगानिव ॥ 67.35 ॥

bāhubhyām vānarān sarvān pragṛhya sa mahābalaḥ | bhakṣayāmāsa saṃkruddho garuḍaḥ pannagāniva || 67.35 ||

उन सभी वानरों को अपनी दोनों भुजाओं में समेटकर, वह महाबली क्रुद्ध होकर उन्हें उसी प्रकार खा गया, जैसे गरुड़ सर्पों को खा जाते हैं।

श्लोक 36 (yuddha.67.36)

प्रक्षिप्ताः कुम्भकर्णेन वक्त्रे पातालसंनिभे । नासापुटाभ्यां निर्जग्मुः कर्णाभ्यां चैव वानराः ॥ 67.36 ॥

prakṣiptāḥ kumbhakarṇena vaktre pātālasaṃnibhe | nāsāpuṭābhyāṃ nirjagmuḥ karṇābhyāṃ caiva vānarāḥ || 67.36 ||

कुम्भकर्ण द्वारा पाताल के समान गहरे उसके मुख में डाले जाने पर, वानर उसकी नासिका और कानों से बाहर निकल आते थे।

श्लोक 37 (yuddha.67.37)

भक्षयन् भृशसंक्रुद्धो हरीन् पर्वतसंनिभः । बभञ्ज वानरान् सर्वान् संक्रुद्धो राक्षसोत्तमः ॥ 67.37 ॥

bhakṣayan bhṛśasaṃkruddho harīn parvatasaṃnibhaḥ | babhañja vānarān sarvān saṃkruddho rākṣasottamaḥ || 67.37 ||

पर्वत के समान वह श्रेष्ठ राक्षस अत्यन्त क्रोध में वानरों को भक्षण करता हुआ, क्रुद्ध होकर उन सभी को कुचल डालता था।

श्लोक 38 (yuddha.67.38)

मांसशोणितसंक्लेदां कुर्वन् भूमिं स राक्षसः । चचार हरिसैन्येषु कालाग्निरिव मूर्छितः ॥ 67.38 ॥

māṃsaśoṇitasaṃkledāṃ kurvan bhūmiṃ sa rākṣasaḥ | cacāra harisainyeṣu kālāgniriva mūrchitaḥ || 67.38 ||

पृथ्वी को मांस और रक्त के कीचड़ से भर देता हुआ, वह राक्षस प्रलयाग्नि के समान उन्मत्त होकर वानर-सेना में विचरण करने लगा।

श्लोक 39 (yuddha.67.39)

वज्रहस्तो यथा शक्रः पाशहस्त इवान्तकः । शूलहस्तो बभौ कुम्भकर्णो महाबलः ॥ 67.39 ॥

vajrahasto yathā śakraḥ pāśahasta ivāntakaḥ | śūlahasto babhau kumbhakarṇo mahābalaḥ || 67.39 ||

वज्रधारी इन्द्र के समान, पाशधारी यमराज के समान, त्रिशूलधारी महाबली कुम्भकर्ण शोभायमान हुआ।

श्लोक 40 (yuddha.67.40)

यथा शुष्काण्यरण्यानि ग्रीष्मे दहति पावकः । तथा वानरसैन्यानि कुम्भकर्णो ददाह सः ॥ 67.40 ॥

yathā śuṣkāṇyaraṇyāni grīṣme dahati pāvakaḥ | tathā vānarasainyāni kumbhakarṇo dadāha saḥ || 67.40 ||

जैसे ग्रीष्म ऋतु में अग्नि सूखे वनों को जला डालती है, वैसे ही कुम्भकर्ण ने वानर-सेनाओं को भस्म कर डाला।

श्लोक 41 (yuddha.67.41)

ततस्ते वध्यमानास्तु हतयूथा विनायकाः । वानरा भयसंविग्ना विनेदुर्विस्वरं भृशम् ॥ 67.41 ॥

tataste vadhyamānāstu hatayūthā vināyakāḥ | vānarā bhayasaṃvignā vinedurvisvaraṃ bhṛśam || 67.41 ||

तब मारे जाते हुए, अपने दल और सेनापतियों के नष्ट होने पर, वे वानर भय से व्याकुल होकर तीव्र और कर्कश स्वर में चीत्कार करने लगे।

श्लोक 42 (yuddha.67.42)

अनेकशो वध्यमानाः कुम्भकर्णेन वानराः । राघवं शरणं जग्मुर्व्यथिताः खिन्नचेतसः ॥ 67.42 ॥

anekaśo vadhyamānāḥ kumbhakarṇena vānarāḥ | rāghavaṃ śaraṇaṃ jagmurvyathitāḥ khinnacetasaḥ || 67.42 ||

कुम्भकर्ण द्वारा बड़ी संख्या में मारे जाते हुए, व्यथित और खिन्न मन वाले वानर राघव की शरण में गए।

श्लोक 43 (yuddha.67.43)

प्रभग्नान् वानरान् दृष्ट्वा वज्रहस्तात्मजात्मजः । अभ्यधावत वेगेन कुम्भकर्णम् महाहवे ॥ 67.43 ॥

prabhagnān vānarān dṛṣṭvā vajrahastātmajātmajaḥ | abhyadhāvata vegena kumbhakarṇam mahāhave || 67.43 ||

वानरों को इस प्रकार भागते देखकर, इन्द्रपुत्र के पुत्र अंगद उस महासमर में वेगपूर्वक कुम्भकर्ण पर झपटे।

श्लोक 44 (yuddha.67.44)

शैलशृङ्गं महद्गृह्य विनदन् स मुहुर्मुहुः । त्रासयन् राक्षसान् सर्वान् कुम्भकर्णपदानुगान् ॥ 67.44 ॥

śailaśṛṅgaṃ mahadgṛhya vinadan sa muhurmuhuḥ | trāsayan rākṣasān sarvān kumbhakarṇapadānugān || 67.44 ||

एक विशाल पर्वत-शिखर उठाकर, बार-बार गर्जना करते हुए, कुम्भकर्ण के अनुगामी सभी राक्षसों को भयभीत करते हुए --

श्लोक 45 (yuddha.67.45)

चिक्षेप शैलशिखरं कुम्भकर्णस्य मूर्धनि । स तेनाभिहतो मूर्ध्नि शैलेनेन्द्ररिपुस्तदा ॥ 67.45 ॥

cikṣepa śailaśikharaṃ kumbhakarṇasya mūrdhani | sa tenābhihato mūrdhni śailenendraripustadā || 67.45 ||

-- उसने वह पर्वत-शिखर कुम्भकर्ण के सिर पर दे मारा; और उस पर्वत से सिर पर आहत होकर वह इन्द्रशत्रु --

श्लोक 46 (yuddha.67.46)

कुम्भकर्णः प्रजज्वाल क्रोधेन महता तदा । सोऽभ्यधावत वेगेन वालिपुत्रममर्षणम् ॥ 67.46 ॥

kumbhakarṇaḥ prajajvāla krodhena mahatā tadā | so'bhyadhāvata vegena vāliputramamarṣaṇam || 67.46 ||

-- कुम्भकर्ण उस समय महान् क्रोध से जल उठा। वह असहनशील होकर वेगपूर्वक वालिपुत्र अंगद पर झपटा।

श्लोक 47 (yuddha.67.47)

कुम्भकर्णो महानादस्त्रासयन् सर्ववानरान् । शूलं ससर्ज वै रोषादङ्गदे तु महाबलः ॥ 67.47 ॥

kumbhakarṇo mahānādastrāsayan sarvavānarān | śūlaṃ sasarja vai roṣādaṅgade tu mahābalaḥ || 67.47 ||

महानाद करते हुए सभी वानरों को भयभीत करता हुआ, वह महाबली कुम्भकर्ण क्रोध में अंगद पर अपना त्रिशूल छोड़ बैठा।

श्लोक 48 (yuddha.67.48)

तमापतन्तं बुद्ध्वा तु युद्धमार्गविशारदः । लाघवान्मोचयामास बलवान् वानरर्षभः ॥ 67.48 ॥

tamāpatantaṃ buddhvā tu yuddhamārgaviśāradaḥ | lāghavānmocayāmāsa balavān vānararṣabhaḥ || 67.48 ||

उसे आता जानकर, युद्ध-कला में निपुण और बलशाली वह वानरश्रेष्ठ, अपनी फुर्ती से उससे बच निकला।

श्लोक 49 (yuddha.67.49)

उत्पत्य चैनं तरसा तलेनोरस्यताडयत् । स तेनाभिहतः कोपात्प्रमुमोहाचलोपमः ॥ 67.49 ॥

utpatya cainaṃ tarasā talenorasyatāḍayat | sa tenābhihataḥ kopātpramumohācalopamaḥ || 67.49 ||

और उछलकर उसने वेगपूर्वक कुम्भकर्ण की छाती पर अपनी हथेली से प्रहार किया; उस प्रहार से आहत होकर पर्वत के समान वह क्रोध में मूर्च्छित हो गया।

श्लोक 50 (yuddha.67.50)

स लब्धसंज्ञोऽतिबलो मुष्टिं संगृइह्य राक्षसः । अपहासेन चिक्षेप विसंज्ञः स पपात ह ॥ 67.50 ॥

sa labdhasaṃjño'tibalo muṣṭiṃ saṃgṛihya rākṣasaḥ | apahāsena cikṣepa visaṃjñaḥ sa papāta ha || 67.50 ||

चेतना पाकर, वह अत्यन्त बलशाली राक्षस मुट्ठी बाँधकर, हाथ के पिछले भाग से प्रहार किया; जिससे अंगद बेसुध होकर गिर पड़े।

श्लोक 51 (yuddha.67.51)

तस्मिन् प्लवगशार्दूले विसंज्ञे पतिते भुवि । तचुछूलं समुपादाय सुग्रीवमभिदुद्रुवे ॥ 67.51 ॥

tasmin plavagaśārdūle visaṃjñe patite bhuvi | tacuchūlaṃ samupādāya sugrīvamabhidudruve || 67.51 ||

उस वानरश्रेष्ठ अंगद के बेसुध होकर भूमि पर गिर जाने पर, कुम्भकर्ण अपना वह त्रिशूल पुनः उठाकर सुग्रीव पर झपटा।

श्लोक 52 (yuddha.67.52)

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य कुम्भकर्णं महाबलम् । उत्पपात तदा वीरः सुग्रीवो वानराधिपः ॥ 67.52 ॥

tamāpatantaṃ samprekṣya kumbhakarṇaṃ mahābalam | utpapāta tadā vīraḥ sugrīvo vānarādhipaḥ || 67.52 ||

उस महाबली कुम्भकर्ण को इस प्रकार आते देखकर, वानराधिप वीर सुग्रीव भी उछल पड़े।

श्लोक 53 (yuddha.67.53)

स पर्वताग्रमुत्क्षिप्य समाविध्य महाकपिः । अभिदुद्राव वेगेन कुम्भकर्णं महाबलम् ॥ 67.53 ॥

sa parvatāgramutkṣipya samāvidhya mahākapiḥ | abhidudrāva vegena kumbhakarṇaṃ mahābalam || 67.53 ||

उस महाकपि सुग्रीव ने एक पर्वत-शिखर उठाकर और घुमाकर, वेगपूर्वक महाबली कुम्भकर्ण पर धावा बोला।

श्लोक 54 (yuddha.67.54)

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य कुम्भकर्णः प्लवंगमं । तस्थौ विवृतसर्वाङ्गो वानरेन्द्रस्य संमुखः ॥ 67.54 ॥

tamāpatantaṃ samprekṣya kumbhakarṇaḥ plavaṃgamaṃ | tasthau vivṛtasarvāṅgo vānarendrasya saṃmukhaḥ || 67.54 ||

उस वानर को इस प्रकार आते देखकर, कुम्भकर्ण अपना सम्पूर्ण शरीर खोलकर उस वानरराज के सम्मुख जा खड़ा हुआ।

श्लोक 55 (yuddha.67.55)

कपिशोणितदिग्धाङ्गं भक्षयन्तं महाकपीन् । कुम्भकर्णं स्थितं दृष्ट्वा सुग्रीवो वाक्यमब्रवीत् ॥ 67.55 ॥

kapiśoṇitadigdhāṅgaṃ bhakṣayantaṃ mahākapīn | kumbhakarṇaṃ sthitaṃ dṛṣṭvā sugrīvo vākyamabravīt || 67.55 ||

वानरों के रक्त से सने अंगों वाले, महाकपियों को खाते हुए कुम्भकर्ण को खड़ा देखकर, सुग्रीव ने यह कहा --

श्लोक 56 (yuddha.67.56)

पातिताश्च त्वया वीराः कृतं कर्म सुदुष्करम् । भक्षितानि च सैन्यानि प्राप्तं ते परमम् यशः ॥ 67.56 ॥

pātitāśca tvayā vīrāḥ kṛtaṃ karma suduṣkaram | bhakṣitāni ca sainyāni prāptaṃ te paramam yaśaḥ || 67.56 ||

"तुमने हमारे वीरों को गिरा दिया, अत्यन्त दुष्कर कर्म कर दिखाया; तुमने हमारी सेनाओं को खा लिया, और परम यश पा लिया।

श्लोक 57 (yuddha.67.57)

त्यज तद्वानरानीकं प्राकृतैः किं करिष्यसि । सहस्वैकं निपातं मे पर्वतस्यास्य राक्षस ॥ 67.57 ॥

tyaja tadvānarānīkaṃ prākṛtaiḥ kiṃ kariṣyasi | sahasvaikaṃ nipātaṃ me parvatasyāsya rākṣasa || 67.57 ||

अब उस साधारण वानर-सेना को छोड़ दो, उनसे तुम्हें क्या मिलेगा? हे राक्षस, मेरे इस पर्वत का यह एक प्रहार सह लो।"

श्लोक 58 (yuddha.67.58)

तद्वाक्यं हरिराजस्य सत्त्वधैर्यसमन्वितं । श्रुत्वा राक्षसशार्दूलः कुम्भकर्णोऽब्रवीद्वचः ॥ 67.58 ॥

tadvākyaṃ harirājasya sattvadhairyasamanvitaṃ | śrutvā rākṣasaśārdūlaḥ kumbhakarṇo'bravīdvacaḥ || 67.58 ||

वानरराज के साहस और धैर्य से भरे उन वचनों को सुनकर, राक्षस-व्याघ्र कुम्भकर्ण ने यह कहा --

श्लोक 59 (yuddha.67.59)

प्रजापतेस्तु पौत्रस्त्वं तथैवर्क्षरजःसुतः । धृतिपौरुषसम्पन्नः कस्माद्गर्जसि वानर ॥ 67.59 ॥

prajāpatestu pautrastvaṃ tathaivarkṣarajaḥsutaḥ | dhṛtipauruṣasampannaḥ kasmādgarjasi vānara || 67.59 ||

"तुम प्रजापति के पौत्र और ऋक्षराज के पुत्र हो, धैर्य और पुरुषार्थ से सम्पन्न हो -- फिर भी, हे वानर, तुम इस प्रकार क्यों गरज रहे हो?

श्लोक 60 (yuddha.67.60)

स कुम्भकर्णस्य वचो निशम्य । व्याविध्य शैलं सहसा मुमोच । तेनाजघानोरसि कुम्भकर्णं । शैलेन वज्राशनिसंनिभेन ॥ 67.60 ॥

sa kumbhakarṇasya vaco niśamya | vyāvidhya śailaṃ sahasā mumoca | tenājaghānorasi kumbhakarṇaṃ | śailena vajrāśanisaṃnibhena || 67.60 ||

कुम्भकर्ण के इन वचनों को सुनकर, सुग्रीव ने अपने पर्वत-खण्ड को घुमाकर सहसा छोड़ दिया; और उस वज्र के समान पर्वत से उन्होंने कुम्भकर्ण की छाती पर प्रहार किया।

श्लोक 61 (yuddha.67.61)

तच्छैलशृङ्गं सहसा विकीर्णं । भुजान्तरे तस्य तदा विशाले । ततो विषेदुः सहसा प्लवंगा । रक्षोगणाश्चापि मुदा विनेदुः ॥ 67.61 ॥

tacchailaśṛṅgaṃ sahasā vikīrṇaṃ | bhujāntare tasya tadā viśāle | tato viṣeduḥ sahasā plavaṃgā | rakṣogaṇāścāpi mudā vineduḥ || 67.61 ||

वह पर्वत-शिखर उसकी विशाल छाती पर लगते ही तुरन्त चूर-चूर हो गया; तब वानर सहसा उदास हो गए, जबकि राक्षस-गण हर्ष से गरज उठे।

श्लोक 62 (yuddha.67.62)

स शैलशृङ्गाभिहतश् चुकोप । ननाद कोपाच्च विवृत्य वक्त्रम् । व्याविध्य शूलं च तडित्प्रकाशं । चिक्षेप हर्यृक्षपतेर्वधाय ॥ 67.62 ॥

sa śailaśṛṅgābhihataś cukopa | nanāda kopācca vivṛtya vaktram | vyāvidhya śūlaṃ ca taḍitprakāśaṃ | cikṣepa haryṛkṣapatervadhāya || 67.62 ||

उस पर्वत-शिखर से आहत होकर वह क्रोध से जल उठा, और मुख विकृत करके गरजने लगा; फिर बिजली के समान चमकते अपने त्रिशूल को घुमाकर, उसने वानर-भालू-सेनापति सुग्रीव के वध के लिए उसे फेंक दिया।

श्लोक 63 (yuddha.67.63)

तत्कुम्भकर्णस्य भुजप्रविद्धं । शूलं शितं काञ्चन दामजुष्टं । क्षिप्रं समुत्पत्य निगृह्य दोर्भ्यां । बभञ्ज वेगेन सुतोऽनिलस्य ॥ 67.63 ॥

tatkumbhakarṇasya bhujapraviddhaṃ | śūlaṃ śitaṃ kāñcana dāmajuṣṭaṃ | kṣipraṃ samutpatya nigṛhya dorbhyāṃ | babhañja vegena suto'nilasya || 67.63 ||

कुम्भकर्ण की भुजा से छूटे उस तीक्ष्ण, स्वर्ण-पट्टिका से सुसज्जित त्रिशूल को, पवनपुत्र हनुमान् ने तुरन्त उछलकर अपनी दोनों भुजाओं में पकड़ लिया और वेगपूर्वक तोड़ डाला।

श्लोक 64 (yuddha.67.64)

कृतं भारसहस्रस्य शूलं कालायसं महत् । बभञ्ज जानुमारोप्य प्रहृष्टः प्लवगर्षभः ॥ 67.64 ॥

kṛtaṃ bhārasahasrasya śūlaṃ kālāyasaṃ mahat | babhañja jānumāropya prahṛṣṭaḥ plavagarṣabhaḥ || 67.64 ||

सहस्र भार वहन करने योग्य बनाए गए उस विशाल लौह त्रिशूल को, वह हर्षित वानरश्रेष्ठ हनुमान् अपने घुटने पर रखकर तोड़ डाला।

श्लोक 65 (yuddha.67.65)

शूलम् भग्नं हनुमता दृष्ट्वा वानरवाहिनी । हृष्टा ननाद बहुशः सर्वतश्चापि दुद्रुवे ॥ 67.65 ॥

śūlam bhagnaṃ hanumatā dṛṣṭvā vānaravāhinī | hṛṣṭā nanāda bahuśaḥ sarvataścāpi dudruve || 67.65 ||

हनुमान् द्वारा उस त्रिशूल को तोड़ा गया देखकर, वानर-सेना हर्षित होकर बार-बार गरज उठी, और चारों ओर से दौड़ पड़ी।

श्लोक 66 (yuddha.67.66)

बभूवाथ परित्रस्तो राक्षसो विमुखोऽभवत् । सिंहनादं च ते चक्रुः प्रहृष्टा वनगोचराः ॥ 67.66 ॥

babhūvātha paritrasto rākṣaso vimukho'bhavat | siṃhanādaṃ ca te cakruḥ prahṛṣṭā vanagocarāḥ || 67.66 ||

उधर वह राक्षस भयभीत होकर विमुख हो गया; और वनवासी वानर हर्षित होकर सिंह-गर्जना करने लगे।

श्लोक 67 (yuddha.67.67)

मारुतिं पूजयांचक्रुर्दृष्ट्वा शूलं तथागतं । स तत्तदा भग्नमवेक्ष्य शूलं । चुकोप रक्षोऽधिपतिर्महात्मा । उत्पाट्य लङ्कामलयात्स शृङ्गं । जघान सुग्रीवमुपेत्य तेन ॥ 67.67 ॥

mārutiṃ pūjayāṃcakrurdṛṣṭvā śūlaṃ tathāgataṃ | sa tattadā bhagnamavekṣya śūlaṃ | cukopa rakṣo'dhipatirmahātmā | utpāṭya laṅkāmalayātsa śṛṅgaṃ | jaghāna sugrīvamupetya tena || 67.67 ||

उस त्रिशूल को इस प्रकार नष्ट देखकर उन्होंने पवनपुत्र हनुमान् का सम्मान किया। और अपने उस त्रिशूल को टूटा देखकर, वह महात्मा राक्षसराज क्रोध से जल उठा; लंका के मलय-शिखर को उखाड़कर, उसने पास जाकर सुग्रीव पर उससे प्रहार किया।

श्लोक 68 (yuddha.67.68)

स शैलशृङ्गाभिहतो विसंज्ञः । पपात भूमौ युधि वानरेन्द्रः । तं प्रेक्ष्य भूमौ पतितम् विसंज्ञं । नेदुः प्रहृष्टा युधि यातुधानाः ॥ 67.68 ॥

sa śailaśṛṅgābhihato visaṃjñaḥ | papāta bhūmau yudhi vānarendraḥ | taṃ prekṣya bhūmau patitam visaṃjñaṃ | neduḥ prahṛṣṭā yudhi yātudhānāḥ || 67.68 ||

उस पर्वत-शिखर से आहत होकर, बेसुध होकर वानरेन्द्र सुग्रीव युद्ध में भूमि पर गिर पड़े; और उन्हें बेसुध होकर भूमि पर गिरा देखकर, राक्षस हर्षित होकर उस युद्ध में गरज उठे।

श्लोक 69 (yuddha.67.69)

तमभ्युपेत्याद्भुतघोरवीर्यं । स कुम्भकर्णो युधि वानरेन्द्रं । जहार सुग्रीवमभिप्रगृह्य । यथानिलो मेघमतिप्रचण्डः ॥ 67.69 ॥

tamabhyupetyādbhutaghoravīryaṃ | sa kumbhakarṇo yudhi vānarendraṃ | jahāra sugrīvamabhipragṛhya | yathānilo meghamatipracaṇḍaḥ || 67.69 ||

उस अद्भुत और भीषण पराक्रमी वानरेन्द्र सुग्रीव के पास जाकर, कुम्भकर्ण ने उन्हें उठाकर हर लिया, जैसे प्रचण्ड वायु किसी मेघ को उड़ा ले जाती है।

श्लोक 70 (yuddha.67.70)

स तं महामेघनिकाशरूपम् । उत्पाट्य गच्छन्युधि कुम्भकर्णः । रराज मेरुप्रतिमानरूपो । मेरुर्यथात्युच्छ्रितघोरशृङ्गः ॥ 67.70 ॥

sa taṃ mahāmeghanikāśarūpam | utpāṭya gacchanyudhi kumbhakarṇaḥ | rarāja merupratimānarūpo | meruryathātyucchritaghoraśṛṅgaḥ || 67.70 ||

महामेघ के समान उस सुग्रीव को उठाकर युद्धभूमि से जाते हुए कुम्भकर्ण, मेरु पर्वत के समान अपने रूप से उस प्रकार शोभायमान हुआ, जैसे स्वयं मेरु अपने ऊँचे और भीषण शिखरों सहित।

श्लोक 71 (yuddha.67.71)

ततः समुत्पाट्य जगाम वीरः । संस्तूयमानो युधि राक्षसेन्द्रैः । शृण्वन्निनादं त्रिदशालयानां । प्लवंगराजग्रहविस्मितानाम् ॥ 67.71 ॥

tataḥ samutpāṭya jagāma vīraḥ | saṃstūyamāno yudhi rākṣasendraiḥ | śṛṇvanninādaṃ tridaśālayānāṃ | plavaṃgarājagrahavismitānām || 67.71 ||

उसे उठाकर वह वीर कुम्भकर्ण उस युद्ध में राक्षसराजों द्वारा स्तुति किया जाता हुआ चल पड़ा, और वानरराज के इस प्रकार पकड़े जाने से चकित देवलोक-वासियों की ध्वनि सुनता हुआ।

श्लोक 72 (yuddha.67.72)

ततस्तमादाय तदा स मेने । हरीन्द्रमिन्द्रोपममिन्द्रवीर्यः । अस्मिन्हृते सर्वमिदं हृतं स्यात् । सराघवं सैन्यमितीन्द्रशत्रुः ॥ 67.72 ॥

tatastamādāya tadā sa mene | harīndramindropamamindravīryaḥ | asminhṛte sarvamidaṃ hṛtaṃ syāt | sarāghavaṃ sainyamitīndraśatruḥ || 67.72 ||

उस इन्द्र-तुल्य वानरेन्द्र सुग्रीव को हरकर, इन्द्र के समान पराक्रमी वह इन्द्रशत्रु कुम्भकर्ण यह सोचने लगा -- "इसके हर लिए जाने से मानो राघव सहित यह सम्पूर्ण सेना ही हर ली गई।"

श्लोक 73 (yuddha.67.73)

विद्रुताम् वाहिनीं दृष्ट्वा वानराणां ततस्ततः । कुम्भकर्णेन सुग्रीवं गृहीतं चापि वानरम् ॥ 67.73 ॥

vidrutām vāhinīṃ dṛṣṭvā vānarāṇāṃ tatastataḥ | kumbhakarṇena sugrīvaṃ gṛhītaṃ cāpi vānaram || 67.73 ||

वानर-सेना को चारों ओर भागती हुई देखकर, और वानर सुग्रीव को कुम्भकर्ण द्वारा पकड़ा गया देखकर,

श्लोक 74 (yuddha.67.74)

हनूमांश्चिन्तयामास मतिमान् मारुतात्मजः । एवं गृहीते सुग्रीवे किं कर्तव्यं मया भवेत् ॥ 67.74 ॥

hanūmāṃścintayāmāsa matimān mārutātmajaḥ | evaṃ gṛhīte sugrīve kiṃ kartavyaṃ mayā bhavet || 67.74 ||

बुद्धिमान् पवनपुत्र हनुमान् ने सोचा -- "सुग्रीव के इस प्रकार पकड़े जाने पर मुझे क्या करना चाहिए?

श्लोक 75 (yuddha.67.75)

यद्वै न्याय्यं मया कर्तुं तत्करिष्यामि सर्वथा । भूत्वा पर्वतसंकाशो नाशयिष्यामि राक्षसं ॥ 67.75 ॥

yadvai nyāyyaṃ mayā kartuṃ tatkariṣyāmi sarvathā | bhūtvā parvatasaṃkāśo nāśayiṣyāmi rākṣasaṃ || 67.75 ||

जो भी उचित कर्तव्य होगा, मैं उसे अवश्य ही करूँगा; पर्वत के समान विशाल रूप धारण कर मैं इस राक्षस का विनाश कर दूँगा।

श्लोक 76 (yuddha.67.76)

मया हते सम्यति कुम्भकर्णे । महाबले मुष्टिविशीर्णदेहे । विमोचिते वानरपार्थिवे च । भवन्तु हृष्टाः प्रवगाः समग्राः ॥ 67.76 ॥

mayā hate samyati kumbhakarṇe | mahābale muṣṭiviśīrṇadehe | vimocite vānarapārthive ca | bhavantu hṛṣṭāḥ pravagāḥ samagrāḥ || 67.76 ||

इस युद्ध में मेरे द्वारा महाबली कुम्भकर्ण के मारे जाने पर, उसका शरीर मेरी मुट्ठी से चूर-चूर होने पर, और वानरराज सुग्रीव के मुक्त होने पर, समस्त वानर हर्षित हो उठें।

श्लोक 77 (yuddha.67.77)

अथ वा स्वयमप्येष मोक्षं प्राप्स्यति पार्थिवः । गृहीतोऽयम् यदि भवेत्त्रिदशैः सासुरोरगैः ॥ 67.77 ॥

atha vā svayamapyeṣa mokṣaṃ prāpsyati pārthivaḥ | gṛhīto'yam yadi bhavettridaśaiḥ sāsuroragaiḥ || 67.77 ||

अथवा यह राजा सुग्रीव स्वयं ही मुक्ति पा लेगा, भले ही असुरों और नागों सहित देवताओं द्वारा ही क्यों न पकड़ा गया हो।

श्लोक 78 (yuddha.67.78)

मन्ये न तावदात्मानं बुध्यते वानराधिपः । शैलप्रहाराभिहतः कुम्भकर्णेन सम्युगे ॥ 67.78 ॥

manye na tāvadātmānaṃ budhyate vānarādhipaḥ | śailaprahārābhihataḥ kumbhakarṇena samyuge || 67.78 ||

मेरा विचार है कि वानराधिप सुग्रीव अभी तक होश में नहीं आए हैं, क्योंकि युद्ध में कुम्भकर्ण के पर्वत-प्रहार से वे आहत हुए थे।

श्लोक 79 (yuddha.67.79)

अयं मुहूर्तात्सुग्रीवो लब्धसंज्ञो महाहवे । आत्मनो वानराणां च यत्पथ्यं तत्करिष्यति ॥ 67.79 ॥

ayaṃ muhūrtātsugrīvo labdhasaṃjño mahāhave | ātmano vānarāṇāṃ ca yatpathyaṃ tatkariṣyati || 67.79 ||

यह सुग्रीव क्षणभर में ही इस महासमर में चेतना पाकर, अपने और वानरों के लिए जो उचित होगा, वही करेंगे।

श्लोक 80 (yuddha.67.80)

मया तु मोक्षितस्यास्य सुग्रीवस्य महात्मनः । अप्रीतश्च भवेत्कष्टा कीर्तिनाशश्च शाश्वतः ॥ 67.80 ॥

mayā tu mokṣitasyāsya sugrīvasya mahātmanaḥ | aprītaśca bhavetkaṣṭā kīrtināśaśca śāśvataḥ || 67.80 ||

परन्तु यदि मैं ही स्वयं महात्मा सुग्रीव को मुक्त करा दूँ, तो उन्हें बड़ा कष्टकर असन्तोष होगा, और उनके यश की सदा के लिए हानि होगी।

श्लोक 81 (yuddha.67.81)

तस्मान्मुहूर्तं कांक्षिष्ये विक्रमं पार्थिवस्य नः । भिन्नं च वानरानीकं तावदाश्वासयाम्यहम् ॥ 67.81 ॥

tasmānmuhūrtaṃ kāṃkṣiṣye vikramaṃ pārthivasya naḥ | bhinnaṃ ca vānarānīkaṃ tāvadāśvāsayāmyaham || 67.81 ||

इसलिए मैं क्षणभर हमारे राजा सुग्रीव के पराक्रम की प्रतीक्षा करूँगा; और तब तक बिखरी हुई वानर-सेना को सँभालता हूँ।"

श्लोक 82 (yuddha.67.82)

इत्येवं चिन्तयित्वा तु हनूमान्मारुतात्मजः । भूयः संस्तम्भयामास वानराणां महाचमूम् ॥ 67.82 ॥

ityevaṃ cintayitvā tu hanūmānmārutātmajaḥ | bhūyaḥ saṃstambhayāmāsa vānarāṇāṃ mahācamūm || 67.82 ||

इस प्रकार विचार करके पवनपुत्र हनुमान् ने वानरों की उस विशाल सेना को पुनः सँभाल लिया।

श्लोक 83 (yuddha.67.83)

स कुम्भकर्णोऽथ विवेश लङ्कां । स्फुरन्तमादाय महाहरिं तम् । विमानचर्यागृहगोपुरस्थैः पुष्पाग्र्यवर्षैरवकीर्यमाणः ॥ 67.83 ॥

sa kumbhakarṇo'tha viveśa laṅkāṃ | sphurantamādāya mahāhariṃ tam | vimānacaryāgṛhagopurasthaiḥ puṣpāgryavarṣairavakīryamāṇaḥ || 67.83 ||

तब कुम्भकर्ण उस छटपटाते हुए महाकपि सुग्रीव को लेकर लंका में प्रविष्ट हुआ, विमानों, अटारियों, गृहों और नगर-द्वारों पर खड़े लोगों द्वारा उत्तम पुष्पों की वर्षा से आच्छादित होते हुए।

श्लोक 84 (yuddha.67.84)

लाजगन्धोदवर्षैस्तु सेव्यमानः शनैः शनैः । राजवीथ्यास्तु शीतत्वात्संज्ञाम् प्राप महाबलः ॥ 67.84 ॥

lājagandhodavarṣaistu sevyamānaḥ śanaiḥ śanaiḥ | rājavīthyāstu śītatvātsaṃjñām prāpa mahābalaḥ || 67.84 ||

भुने हुए धान और सुगन्धित जल की वर्षा से धीरे-धीरे सिंचित होते हुए, राजमार्ग की उस शीतलता से वह महाबली कुम्भकर्ण धीरे-धीरे चेतना पाने लगा।

श्लोक 85 (yuddha.67.85)

ततः स संज्ञामुपलभ्य कृच्छ्रा । द्बलीयसस्तस्य भुजान्तरस्थः । अवेक्षमाणः पुरराजमार्गं । विचिन्तयामास मुहुर्महात्मा ॥ 67.85 ॥

tataḥ sa saṃjñāmupalabhya kṛcchrā | dbalīyasastasya bhujāntarasthaḥ | avekṣamāṇaḥ purarājamārgaṃ | vicintayāmāsa muhurmahātmā || 67.85 ||

तब उस बलशाली राक्षस की भुजाओं में पड़े हुए सुग्रीव ने बड़ी कठिनाई से चेतना पाई, और नगर के राजमार्ग को देखते हुए वह महात्मा बार-बार यह सोचने लगे --

श्लोक 86 (yuddha.67.86)

एवं गृहीतेन कथं नु नाम । शक्यं मया सम्प्रति कर्तुमद्य । तथा करिष्यामि यथा हरीणां । भविष्यतीष्टं च हितं च कार्यम् ॥ 67.86 ॥

evaṃ gṛhītena kathaṃ nu nāma | śakyaṃ mayā samprati kartumadya | tathā kariṣyāmi yathā harīṇāṃ | bhaviṣyatīṣṭaṃ ca hitaṃ ca kāryam || 67.86 ||

"इस प्रकार पकड़े जाने पर अब मैं क्या कर सकता हूँ? मैं ऐसा करूँगा, जिससे वानरों का हित और मनोरथ दोनों सिद्ध हों।"

श्लोक 87 (yuddha.67.87)

ततः कराग्रैः सहसा समेत्य । राजा हरीणा ममरेन्द्रशत्रोः । नखैश्च कर्णौ दशनैश्च नासां । ददंश पादैर्विददार पर्श्वौ ॥ 67.87 ॥

tataḥ karāgraiḥ sahasā sametya | rājā harīṇā mamarendraśatroḥ | nakhaiśca karṇau daśanaiśca nāsāṃ | dadaṃśa pādairvidadāra parśvau || 67.87 ||

तब तुरन्त अपने हाथों की उँगलियों से आक्रमण करके, वानरराज सुग्रीव ने उस इन्द्रशत्रु के कानों को नखों से और नाक को दाँतों से काट डाला, और पैरों से उसकी दोनों बगलें चीर डालीं।

श्लोक 88 (yuddha.67.88)

स कुम्भकर्णौ हृतकर्णनासो । विदारितस्तेन रदैर्नखैश्च । रोषाभिभूतः क्षतजार्द्रगारः । सुग्रीवमाविध्य पिपेष भूमौ ॥ 67.88 ॥

sa kumbhakarṇau hṛtakarṇanāso | vidāritastena radairnakhaiśca | roṣābhibhūtaḥ kṣatajārdragāraḥ | sugrīvamāvidhya pipeṣa bhūmau || 67.88 ||

कान और नाक कटने पर, दाँतों और नखों से विदीर्ण होकर, क्रोध से अभिभूत और रक्त से सने अंगों वाला कुम्भकर्ण, सुग्रीव को पटककर धरती पर रगड़ने लगा।

श्लोक 89 (yuddha.67.89)

स भूतले भीमबलाभिपिष्टः । सुरारिभिस्तैरभिहन्यमानः । जगाम खं कन्दुकवज्जवेन । पुनश्च रामेण समाजगाम ॥ 67.89 ॥

sa bhūtale bhīmabalābhipiṣṭaḥ | surāribhistairabhihanyamānaḥ | jagāma khaṃ kandukavajjavena | punaśca rāmeṇa samājagāma || 67.89 ||

उस भीषण बलशाली देवशत्रु द्वारा धरती पर रगड़े और बार-बार आहत किए जाने पर, वह गेंद के समान वेग से आकाश में उछल पड़े, और पुनः राम के पास आ पहुँचे।

श्लोक 90 (yuddha.67.90)

कर्णनासाविहीनस्य कुम्भकर्णो महाबलः । रराज शोणितोत्सिक्तो गिरिः प्रस्रवणैरिव ॥ 67.90 ॥

karṇanāsāvihīnasya kumbhakarṇo mahābalaḥ | rarāja śoṇitotsikto giriḥ prasravaṇairiva || 67.90 ||

कान और नाक से रहित हुआ महाबली कुम्भकर्ण, रक्त से लथपथ, झरनों से बहते पर्वत के समान शोभायमान हुआ।

श्लोक 91 (yuddha.67.91)

शोणितार्द्रो महाकायो राक्षसो भीमदर्शनः । अमर्षाच्छोणितोद्गारी शुशुभे रावणानुजः ॥ 67.91 ॥

śoṇitārdro mahākāyo rākṣaso bhīmadarśanaḥ | amarṣācchoṇitodgārī śuśubhe rāvaṇānujaḥ || 67.91 ||

रक्त से भीगा हुआ, विशालकाय और भयंकर दिखने वाला वह राक्षस, क्रोध में रक्त उगलता हुआ रावण का वह अनुज, फिर भी शोभायमान हो रहा था।

श्लोक 92 (yuddha.67.92)

नीलाञ्जनचयप्रख्याः ससंध्य इव तोयदः । युद्धायाभिमुखो भीमो मनश्चक्रे निशाचरः ॥ 67.92 ॥

nīlāñjanacayaprakhyāḥ sasaṃdhya iva toyadaḥ | yuddhāyābhimukho bhīmo manaścakre niśācaraḥ || 67.92 ||

काजल के ढेर के समान श्याम, सन्ध्या से रँगे हुए मेघ के समान, वह भयंकर निशाचर पुनः युद्ध की ओर मन लगाने लगा।

श्लोक 93 (yuddha.67.93)

गते च तस्मिन् सुरराजशत्रुः । क्रोधात्प्रदुद्राव रणाय भूयः । अनायुधोऽस्मीति विचिन्त्य रौद्रो । घोरं तदा मुद्गरमाससाद ॥ 67.93 ॥

gate ca tasmin surarājaśatruḥ | krodhātpradudrāva raṇāya bhūyaḥ | anāyudho'smīti vicintya raudro | ghoraṃ tadā mudgaramāsasāda || 67.93 ||

सुग्रीव के इस प्रकार चले जाने पर, वह देवराज का शत्रु क्रोध में पुनः युद्ध की ओर दौड़ा; और "मैं अब निःशस्त्र हूँ" यह सोचकर, उस भयंकर राक्षस ने एक घोर मुद्गर धारण कर लिया।

श्लोक 94 (yuddha.67.94)

ततः स पुर्याः सहसा महात्मा । निष्क्रम्य तद्वानरसैन्यमुग्रम् । बभक्ष रक्षो युधि कुम्भकर्णः । प्रजा युगान्ताग्निरिव प्रदीप्तः ॥ 67.94 ॥

tataḥ sa puryāḥ sahasā mahātmā | niṣkramya tadvānarasainyamugram | babhakṣa rakṣo yudhi kumbhakarṇaḥ | prajā yugāntāgniriva pradīptaḥ || 67.94 ||

तब वह महाकाय राक्षस सहसा नगर से निकलकर, उस भीषण वानर-सेना पर टूट पड़ा; कुम्भकर्ण युद्ध में उसके योद्धाओं को उसी प्रकार भक्षण करने लगा, जैसे प्रलयाग्नि प्रज्वलित होकर समस्त प्रजा को भस्म कर देती है।

श्लोक 95 (yuddha.67.95)

बुभुक्षितः शोणितमांसगृध्नुः । प्रविश्य तद्वानरसैन्यमुग्रं । चखाद रक्षांसि हरीन्पिशाचान् । ऋक्षांश्च मोहाद्युधि कुम्भकर्णः । यथैव मृत्युर्हरते युगान्ते । स भक्षयामास हरींश्च मुख्यान् ॥ 67.95 ॥

bubhukṣitaḥ śoṇitamāṃsagṛdhnuḥ | praviśya tadvānarasainyamugraṃ | cakhāda rakṣāṃsi harīnpiśācān | ṛkṣāṃśca mohādyudhi kumbhakarṇaḥ | yathaiva mṛtyurharate yugānte | sa bhakṣayāmāsa harīṃśca mukhyān || 67.95 ||

भूखा और रक्त-मांस का लोलुप वह कुम्भकर्ण उस भीषण वानर-सेना में घुसकर, मोहवश युद्ध में राक्षसों, वानरों, पिशाचों और भालुओं को भी बिना भेदभाव के खा जाने लगा; जैसे प्रलयकाल में मृत्यु सबको हर लेती है, वैसे ही उसने वानरश्रेष्ठों को भी भक्षण कर डाला।

श्लोक 96 (yuddha.67.96)

एकं द्वौ त्रीन् बहून् क्रुद्धो वानरान् सह राक्षसैः । समादायैकहस्तेन प्रचिक्षेप त्वरन्मुखे ॥ 67.96 ॥

ekaṃ dvau trīn bahūn kruddho vānarān saha rākṣasaiḥ | samādāyaikahastena pracikṣepa tvaranmukhe || 67.96 ||

क्रोध में भरकर वह एक, दो, तीन या अनेक वानरों को राक्षसों सहित एक ही हाथ से पकड़कर शीघ्रता से अपने मुख में डाल लेता था।

श्लोक 97 (yuddha.67.97)

सम्प्रस्रवंस्तदा मेदः शोणित च महाबलः । वध्यमानो नगेन्द्राग्रैर्भक्षयामास वानरान् ॥ 67.97 ॥

samprasravaṃstadā medaḥ śoṇita ca mahābalaḥ | vadhyamāno nagendrāgrairbhakṣayāmāsa vānarān || 67.97 ||

चर्बी और रक्त बहाते हुए भी, पर्वत-शिखरों से आहत होते हुए भी, वह महाबली वानरों को भक्षण करता ही रहा।

श्लोक 98 (yuddha.67.98)

ते भक्ष्यमाणा हरयो रामं जग्मुस्तदा गतिं । कुम्भकर्णो भृशं क्रुद्धः कपीन् खादन् प्रधावति ॥ 67.98 ॥

te bhakṣyamāṇā harayo rāmaṃ jagmustadā gatiṃ | kumbhakarṇo bhṛśaṃ kruddhaḥ kapīn khādan pradhāvati || 67.98 ||

भक्षण किए जाते हुए वे वानर तब राम की शरण में गए; जबकि कुम्भकर्ण अत्यन्त क्रुद्ध होकर वानरों को खाता हुआ दौड़ता रहा।

श्लोक 99 (yuddha.67.99)

शतानि सप्त चाष्टौ च विंशत्त्रिंशत्तथैव च । सम्परिष्वज्य बहुभ्यां खादन्विपरिधावति ॥ 67.99 ॥

śatāni sapta cāṣṭau ca viṃśattriṃśattathaiva ca | sampariṣvajya bahubhyāṃ khādanviparidhāvati || 67.99 ||

सात सौ, आठ, बीस और तीस वानरों को अपनी दोनों भुजाओं में समेटकर, वह उन्हें खाता हुआ इधर-उधर दौड़ता रहा।

श्लोक 100 (yuddha.67.100)

मेदोवसाशोणितदिग्धगात्रः । कर्णावसक्तग्रथितान्त्रमालः । ववर्षशूलानि सुतीक्षणदंष्ट्रः । कालो युगान्तस्थ इव प्रवृद्धः ॥ 67.100 ॥

medovasāśoṇitadigdhagātraḥ | karṇāvasaktagrathitāntramālaḥ | vavarṣaśūlāni sutīkṣaṇadaṃṣṭraḥ | kālo yugāntastha iva pravṛddhaḥ || 67.100 ||

चर्बी, वसा और रक्त से लथपथ अंगों वाला, कानों में उलझी हुई आँतों की माला पहने हुए, तीक्ष्ण दाढ़ों वाला वह कुम्भकर्ण, प्रलयकाल के विशाल यमराज के समान भीषण हो उठा।

श्लोक 101 (yuddha.67.101)

तस्मिन् काले सुमित्रायाः पुत्रः परबलार्दनः । चकार लक्ष्मणः क्रुद्धो युद्धम् परपुरंजयः ॥ 67.101 ॥

tasmin kāle sumitrāyāḥ putraḥ parabalārdanaḥ | cakāra lakṣmaṇaḥ kruddho yuddham parapuraṃjayaḥ || 67.101 ||

उसी समय सुमित्रा-पुत्र, शत्रु-सेनाओं का मर्दन करने वाले और शत्रु-नगरों के विजेता लक्ष्मण, क्रुद्ध होकर युद्ध में जुट गए।

श्लोक 102 (yuddha.67.102)

स कुम्भकर्णस्य शराञ्शरीरे सप्त वीर्यवान् । निचखानाददे चान्यान्विससर्ज च लक्ष्मणः ॥ 67.102 ॥

sa kumbhakarṇasya śarāñśarīre sapta vīryavān | nicakhānādade cānyānvisasarja ca lakṣmaṇaḥ || 67.102 ||

उस पराक्रमी लक्ष्मण ने कुम्भकर्ण के शरीर में सात बाण गाड़ दिए, फिर और भी बाण उठाकर उन्हें भी छोड़ा।

श्लोक 103 (yuddha.67.103)

पीड्यमानस्तदस्त्रं तु विशेषं ततः स राक्षसः । ततश्चुकोप बलवान् सुमित्रानंदवर्धनः ॥ 67.103 ॥

pīḍyamānastadastraṃ tu viśeṣaṃ tataḥ sa rākṣasaḥ | tataścukopa balavān sumitrānaṃdavardhanaḥ || 67.103 ||

उस विशेष अस्त्र से पीड़ित होकर वह राक्षस क्रुद्ध हो उठा; और उधर बलशाली सुमित्रानन्दवर्धन लक्ष्मण भी क्रोध से भर उठे।

श्लोक 104 (yuddha.67.104)

अथस्य कवचं शुभ्रं जाम्बूनदमयं शुभम् । प्रच्छादयामास शरैः संध्याभ्रमिव मारुतः ॥ 67.104 ॥

athasya kavacaṃ śubhraṃ jāmbūnadamayaṃ śubham | pracchādayāmāsa śaraiḥ saṃdhyābhramiva mārutaḥ || 67.104 ||

तब उन्होंने उस राक्षस के उज्ज्वल और शुभ स्वर्ण-कवच को अपने बाणों से इस प्रकार ढँक दिया, जैसे वायु सन्ध्याकालीन मेघ को ढँक देती है।

श्लोक 105 (yuddha.67.105)

नीलाञ्जनचयप्रख्याः शरैः काञ्चनभूषणैः । आपीड्यमानः शुशुभे मेघैः सूर्य इवांशुमान् ॥ 67.105 ॥

nīlāñjanacayaprakhyāḥ śaraiḥ kāñcanabhūṣaṇaiḥ | āpīḍyamānaḥ śuśubhe meghaiḥ sūrya ivāṃśumān || 67.105 ||

काजल के ढेर के समान श्याम वह राक्षस, उन स्वर्ण-भूषित बाणों से पीड़ित होकर भी उस प्रकार शोभायमान हुआ, जैसे मेघों के बीच से तेजस्वी सूर्य।

श्लोक 106 (yuddha.67.106)

ततः स राक्षसो भीमः सुमित्रानन्दवर्धनं । सावज्ञमेव प्रोवाच वाक्यम् मेघौघनिःस्वनः ॥ 67.106 ॥

tataḥ sa rākṣaso bhīmaḥ sumitrānandavardhanaṃ | sāvajñameva provāca vākyam meghaughaniḥsvanaḥ || 67.106 ||

तब उस भयंकर राक्षस ने, मेघ-समूह की गर्जना के समान गम्भीर स्वर में, सुमित्रानन्दवर्धन लक्ष्मण से उपेक्षापूर्वक यह कहा --

श्लोक 107 (yuddha.67.107)

अन्तकस्याप्यकष्टेन युधि जेतारमाहवे । युध्यता मामभीतेन ख्यापिता वीरता त्वया ॥ 67.107 ॥

antakasyāpyakaṣṭena yudhi jetāramāhave | yudhyatā māmabhītena khyāpitā vīratā tvayā || 67.107 ||

"युद्ध में यम को भी बिना कठिनाई के जीत सकने वाले तुमने, निर्भय होकर मुझसे युद्ध करते हुए अपनी वीरता प्रकट कर दी है।

श्लोक 108 (yuddha.67.108)

प्रगृहीतायुधस्येह मृत्योरिव महामृधे । तिष्ठन्नप्रग्रतः पूज्यः किमु युद्धप्रदायकः ॥ 67.108 ॥

pragṛhītāyudhasyeha mṛtyoriva mahāmṛdhe | tiṣṭhannapragrataḥ pūjyaḥ kimu yuddhapradāyakaḥ || 67.108 ||

इस महासमर में यमराज के समान शस्त्र उठाए हुए मेरे सामने केवल खड़े रहना भी पूजनीय है, फिर युद्ध देने वाले की तो बात ही क्या!

श्लोक 109 (yuddha.67.109)

ऐरावतं समारूढो वृतः सर्वामरैः प्रभुः । नैव शक्रोऽपि समरे स्थित पूर्वः कदाचन ॥ 67.109 ॥

airāvataṃ samārūḍho vṛtaḥ sarvāmaraiḥ prabhuḥ | naiva śakro'pi samare sthita pūrvaḥ kadācana || 67.109 ||

ऐरावत पर सवार, समस्त देवताओं से घिरे हुए प्रभु इन्द्र भी कभी युद्ध में मेरे सामने खड़े नहीं रह सके।

श्लोक 110 (yuddha.67.110)

अद्य त्वयाहं सौमित्रे बलेनापि पराक्रमैः । तोषितो गन्तुमिच्छामि त्यामनुज्ञाप्य राघवम् ॥ 67.110 ॥

adya tvayāhaṃ saumitre balenāpi parākramaiḥ | toṣito gantumicchāmi tyāmanujñāpya rāghavam || 67.110 ||

हे सौमित्रे! आज तुम्हारे द्वारा, यद्यपि तुम अभी युवा हो, अपने पराक्रम से मुझे सन्तोष हुआ है; अब तुमसे विदा लेकर मैं राघव के पास जाना चाहता हूँ।

श्लोक 111 (yuddha.67.111)

यत्तु वीर्यबलोत्साहैस्तोषितोऽहं रणे त्वया । राममेवैकमिच्छमि हन्तुम् यस्मिन् हते हतम् ॥ 67.111 ॥

yattu vīryabalotsāhaistoṣito'haṃ raṇe tvayā | rāmamevaikamicchami hantum yasmin hate hatam || 67.111 ||

यद्यपि युद्ध में तुम्हारे पराक्रम, बल और उत्साह से मैं सन्तुष्ट हूँ, तथापि मैं केवल राम को ही मारना चाहता हूँ, क्योंकि उनके मारे जाने पर सब कुछ मारा हुआ ही समझो।

श्लोक 112 (yuddha.67.112)

रामे मयात्र निहते येऽन्ये स्थास्यन्ति संयुगे । तानहं योधयिष्यामि स्वबलेन प्रमाथिना ॥ 67.112 ॥

rāme mayātra nihate ye'nye sthāsyanti saṃyuge | tānahaṃ yodhayiṣyāmi svabalena pramāthinā || 67.112 ||

यहाँ राम के मेरे द्वारा मारे जाने पर, इस युद्ध में जो अन्य भी खड़े रहेंगे, उन्हें भी मैं अपने प्रचण्ड बल से युद्ध में परास्त करूँगा।"

श्लोक 113 (yuddha.67.113)

इत्युक्तवाक्यं तद्रक्षः प्रोवाच स्तुतिसंहितम् । मृधे घोरतरं वाक्यं सौमित्रिः प्रहसन्निव ॥ 67.113 ॥

ityuktavākyaṃ tadrakṣaḥ provāca stutisaṃhitam | mṛdhe ghorataraṃ vākyaṃ saumitriḥ prahasanniva || 67.113 ||

उस राक्षस के इस प्रकार स्तुतिपूर्ण वचन कहने पर, सौमित्रि लक्ष्मण ने मानो हँसते हुए, उस संग्राम में उससे भी अधिक कठोर वचन कहे --

श्लोक 114 (yuddha.67.114)

यस्त्वं शक्रादिभिर्वीरैरसह्यः प्राप्य पौरुषं । तत्सत्यं नान्यथा वीर दृष्टस्तेऽद्य पराक्रमः ॥ 67.114 ॥

yastvaṃ śakrādibhirvīrairasahyaḥ prāpya pauruṣaṃ | tatsatyaṃ nānyathā vīra dṛṣṭaste'dya parākramaḥ || 67.114 ||

"तुम इन्द्र जैसे वीरों के लिए भी असह्य हो, यह पौरुष तुमने प्राप्त किया है -- यह सत्य है, अन्यथा नहीं, हे वीर; आज तुम्हारा पराक्रम भलीभाँति देख लिया गया।

श्लोक 115 (yuddha.67.115)

एष दाशरथी रामस्तिष्ठत्यद्रिरिवाचलः । इति श्रुत्वा ह्यनादृत्य लक्ष्मणं स निशाचरः ॥ 67.115 ॥

eṣa dāśarathī rāmastiṣṭhatyadririvācalaḥ | iti śrutvā hyanādṛtya lakṣmaṇaṃ sa niśācaraḥ || 67.115 ||

यह दशरथ-पुत्र राम पर्वत के समान अचल खड़े हैं।" यह सुनकर, वह निशाचर लक्ष्मण की उपेक्षा करके,

श्लोक 116 (yuddha.67.116)

अतिक्रम्य च सौमित्रिं कुम्भकर्णो महाबलः । राममेवाभिदुद्राव दारयन्निव मेदिनीम् ॥ 67.116 ॥

atikramya ca saumitriṃ kumbhakarṇo mahābalaḥ | rāmamevābhidudrāva dārayanniva medinīm || 67.116 ||

-- सौमित्रि लक्ष्मण को पार करके, महाबली कुम्भकर्ण मानो पृथ्वी को विदीर्ण करता हुआ सीधे राम की ओर झपटा।

श्लोक 117 (yuddha.67.117)

अथ दाशरथी रामो रौद्रमस्त्रं प्रयोजयन् । कुम्भकर्णस्य हृदये ससर्ज निशितान् शरान् ॥ 67.117 ॥

atha dāśarathī rāmo raudramastraṃ prayojayan | kumbhakarṇasya hṛdaye sasarja niśitān śarān || 67.117 ||

तब दशरथ-पुत्र राम ने रौद्र अस्त्र का प्रयोग करते हुए, कुम्भकर्ण के हृदय में तीक्ष्ण बाण छोड़े।

श्लोक 118 (yuddha.67.118)

तस्य रामेण विद्धस्य सहसाभिप्रधावतः । अङ्गारमिश्राः क्रुद्धस्य मुखान्निश्चेरुरर्चिषः ॥ 67.118 ॥

tasya rāmeṇa viddhasya sahasābhipradhāvataḥ | aṅgāramiśrāḥ kruddhasya mukhānniścerurarciṣaḥ || 67.118 ||

राम द्वारा बींधे जाने पर, सहसा आगे बढ़ते हुए उस क्रुद्ध कुम्भकर्ण के मुख से चिंगारियों सहित ज्वालाएँ निकलने लगीं।

श्लोक 119 (yuddha.67.119)

रामस्त्रविद्धो घोरम् वै नर्दन् राक्षसपुङ्गवः । अभ्यधावत तं क्रुद्धो हरीन् विद्रावयन् रणे ॥ 67.119 ॥

rāmastraviddho ghoram vai nardan rākṣasapuṅgavaḥ | abhyadhāvata taṃ kruddho harīn vidrāvayan raṇe || 67.119 ||

राम के अस्त्र से बिंधकर वह श्रेष्ठ राक्षस भयंकर गर्जना करते हुए, क्रुद्ध होकर उस युद्ध में वानरों को तितर-बितर करता हुआ आगे बढ़ा।

श्लोक 120 (yuddha.67.120)

तस्योरसि निमग्नाश्च शरा बर्हिणवाससः । हस्ताच्चास्य परिभ्रष्टा गदा चोर्व्याम् पपात ह ॥ 67.120 ॥

tasyorasi nimagnāśca śarā barhiṇavāsasaḥ | hastāccāsya paribhraṣṭā gadā corvyām papāta ha || 67.120 ||

मयूर-पंख वाले वे बाण उसकी छाती में गहरे धँस गए; और उसके हाथ से छूटकर गदा भी धरती पर जा गिरी।

श्लोक 121 (yuddha.67.121)

आयुधानि च सर्वाणि समकीर्यन्त भूतले । स निरायुधमात्मानम् यदा मेने महाबलः ॥ 67.121 ॥

āyudhāni ca sarvāṇi samakīryanta bhūtale | sa nirāyudhamātmānam yadā mene mahābalaḥ || 67.121 ||

उसके सभी शस्त्र भूमि पर बिखर गए; और जब उस महाबली ने स्वयं को निःशस्त्र पाया,

श्लोक 122 (yuddha.67.122)

मुष्टिभ्यां च कराभ्यां च चकार कदनम् महत् । स बाणैरतिविद्धाङ्गः क्षतजेन समुक्षितः ॥ 67.122 ॥

muṣṭibhyāṃ ca karābhyāṃ ca cakāra kadanam mahat | sa bāṇairatividdhāṅgaḥ kṣatajena samukṣitaḥ || 67.122 ||

तो उसने अपनी मुट्ठियों और हाथों से ही भारी संहार किया; बाणों से उसका शरीर बुरी तरह बिंध चुका था, वह रक्त से लथपथ था,

श्लोक 123 (yuddha.67.123)

रुधिरम् परिसुस्राव गिरिः प्रस्रावणम् यथा । स तीव्रेण च कोपेन रुधिरेण च मूर्छितः । वानरान्राक्षसानृक्षान् खादन् स परिधावति ॥ 67.123 ॥

rudhiram parisusrāva giriḥ prasrāvaṇam yathā | sa tīvreṇa ca kopena rudhireṇa ca mūrchitaḥ | vānarānrākṣasānṛkṣān khādan sa paridhāvati || 67.123 ||

पर्वत जैसे झरने बहाता है वैसे ही वह रक्त बहा रहा था; और तीव्र क्रोध तथा रक्त-स्राव से अर्धमूर्च्छित होकर भी वह वानरों, राक्षसों और भालुओं को खाता हुआ इधर-उधर दौड़ता रहा।

श्लोक 124 (yuddha.67.124)

अथ शृङ्गं समाविध्य भीमम् भीमपराक्रमः । चिक्षेप राममुद्दिश्य बलवानन्तकोपमः ॥ 67.124 ॥

atha śṛṅgaṃ samāvidhya bhīmam bhīmaparākramaḥ | cikṣepa rāmamuddiśya balavānantakopamaḥ || 67.124 ||

तब उस भीषण पराक्रमी, यमराज के समान बलशाली कुम्भकर्ण ने एक भयंकर पर्वत-शिखर घुमाकर, राम को लक्ष्य करके फेंक दिया।

श्लोक 125 (yuddha.67.125)

अप्राप्तमन्तरा रामः सप्तभीस्तमजिह्मगैः । चिच्छेद गिरिशृङ्गं तम् पुनः संधाय कार्मुकम् ॥ 67.125 ॥

aprāptamantarā rāmaḥ saptabhīstamajihmagaiḥ | ciccheda giriśṛṅgaṃ tam punaḥ saṃdhāya kārmukam || 67.125 ||

उसके पहुँचने से पहले ही राम ने अपने सात सीधे बाणों से उस पर्वत-शिखर को बीच में ही काट डाला, और पुनः अपना धनुष चढ़ाया।

श्लोक 126 (yuddha.67.126)

ततस्तु रामो धर्मात्मा तस्य शृङ्गम् महत्तदा ॥ 67.126 ॥

tatastu rāmo dharmātmā tasya śṛṅgam mahattadā || 67.126 ||

तब धर्मात्मा राम ने -- उसके उस विशाल शिखर को, उसी क्षण --

श्लोक 127 (yuddha.67.127)

शरैः काञ्चनचित्राङ्गै श्चिच्छेद भरतग्रज । तन्मेरुशिखराकारं द्योतमानमिव श्रिया ॥ 67.127 ॥

śaraiḥ kāñcanacitrāṅgai ściccheda bharatagraja | tanmeruśikharākāraṃ dyotamānamiva śriyā || 67.127 ||

-- स्वर्ण-चित्रित बाणों से काट डाला, वह भरताग्रज राम। मेरु के शिखर के समान वह देदीप्यमान शिखर गिरते हुए दो सौ वानरों को कुचलता हुआ धराशायी हो गया।

श्लोक 128 (yuddha.67.128)

द्वे शते वानराणां च पतमानमपातयत् । तस्मिन् काले स धर्मात्मा लक्ष्मणो राममब्रवीत् ॥ 67.128 ॥

dve śate vānarāṇāṃ ca patamānamapātayat | tasmin kāle sa dharmātmā lakṣmaṇo rāmamabravīt || 67.128 ||

उसी समय धर्मात्मा लक्ष्मण ने, कुम्भकर्ण के वध में तत्पर होकर अनेक उपायों पर विचार करते हुए, राम से यह कहा --

श्लोक 129 (yuddha.67.129)

कुम्भकर्णवधे युक्तो योगान्परिमृशन्बहून् । नैवायम् वानरान्राजन्न विजानाति राक्षसान् ॥ 67.129 ॥

kumbhakarṇavadhe yukto yogānparimṛśanbahūn | naivāyam vānarānrājanna vijānāti rākṣasān || 67.129 ||

"हे राजन्! अब यह न वानरों को पहचानता है, न राक्षसों को; रक्त की गन्ध से उन्मत्त होकर यह अपनों और परायों दोनों को खा रहा है।

श्लोक 130 (yuddha.67.130)

मत्तः शोणितगन्धेन स्वान् परांश्चैव खादति । साध्वेनमधिरोहन्तु सर्वतो वानरर्षभाः ॥ 67.130 ॥

mattaḥ śoṇitagandhena svān parāṃścaiva khādati | sādhvenamadhirohantu sarvato vānararṣabhāḥ || 67.130 ||

श्रेष्ठ वानर भलीभाँति उसके चारों ओर से उस पर चढ़ जाएँ; और मुख्य सेनापति उसके चारों ओर डट जाएँ।

श्लोक 131 (yuddha.67.131)

यूथपाश्च यथामुख्यास्तिष्ठन्त्वस्य समन्ततः । अद्ययं दुर्मतिः काले गुरुभारप्रपीडितः ॥ 67.131 ॥

yūthapāśca yathāmukhyāstiṣṭhantvasya samantataḥ | adyayaṃ durmatiḥ kāle gurubhāraprapīḍitaḥ || 67.131 ||

यह दुर्बुद्धि राक्षस, इस समय भारी बोझ से दबकर, यदि भूमि पर गिर पड़े, तो फिर किसी अन्य वानर को नहीं मार सकेगा।"

श्लोक 132 (yuddha.67.132)

प्रपतन्राक्षसो भूमौ नान्यान्हन्यात्प्लवङ्गमान् । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राजपुत्रस्य धीमतः ॥ 67.132 ॥

prapatanrākṣaso bhūmau nānyānhanyātplavaṅgamān | tasya tadvacanaṃ śrutvā rājaputrasya dhīmataḥ || 67.132 ||

उस बुद्धिमान् राजकुमार लक्ष्मण के वचन सुनकर, वानर हर्षित होकर कुम्भकर्ण पर चढ़ बैठे।

श्लोक 133 (yuddha.67.133)

ते समारुरुहुर्हृष्टाः कुम्भकर्णं प्लवंगमाः । कुम्भकर्णस्तु संक्रुद्धः समारूढः प्लवंगमैः ॥ 67.133 ॥

te samāruruhurhṛṣṭāḥ kumbhakarṇaṃ plavaṃgamāḥ | kumbhakarṇastu saṃkruddhaḥ samārūḍhaḥ plavaṃgamaiḥ || 67.133 ||

वानर हर्षित होकर कुम्भकर्ण पर चढ़ बैठे; किन्तु वानरों के इस प्रकार चढ़ जाने पर क्रुद्ध कुम्भकर्ण,

श्लोक 134 (yuddha.67.134)

व्यधूनयत्तान्वेगेन दुष्टहस्तीव हस्तिपान् । तान्दृष्ट्वा निर्धूतान्रामो रुष्टोऽयमिति राक्षसः ॥ 67.134 ॥

vyadhūnayattānvegena duṣṭahastīva hastipān | tāndṛṣṭvā nirdhūtānrāmo ruṣṭo'yamiti rākṣasaḥ || 67.134 ||

उन्हें वेगपूर्वक इस प्रकार झटक दिया, जैसे कोई उन्मत्त हाथी अपने महावतों को झटक देता है। उन्हें इस प्रकार झटका गया देखकर, "यह राक्षस क्रुद्ध हो गया है" यह सोचकर राम,

श्लोक 135 (yuddha.67.135)

समुत्पपात वेगेन धनुरुत्तममाददे । क्रोधरक्तेक्षणो वीरो निर्दहन्निव चक्षुषा ॥ 67.135 ॥

samutpapāta vegena dhanuruttamamādade | krodharaktekṣaṇo vīro nirdahanniva cakṣuṣā || 67.135 ||

वेगपूर्वक उठकर अपना उत्तम धनुष उठा लिया; क्रोध से लाल नेत्रों वाला वह वीर, मानो अपनी दृष्टि से ही सबको भस्म कर देता हुआ --

श्लोक 136 (yuddha.67.136)

राघवो राक्षसं रोषादभिदुद्राव वेगितः । यूथपान् हर्षयन् सर्वान् कुम्भकर्णभयार्दितान् ॥ 67.136 ॥

rāghavo rākṣasaṃ roṣādabhidudrāva vegitaḥ | yūthapān harṣayan sarvān kumbhakarṇabhayārditān || 67.136 ||

-- राघव क्रोधपूर्वक वेगपूर्वक उस राक्षस पर झपटे, और कुम्भकर्ण के भय से पीड़ित उन समस्त सेनापतियों को हर्षित कर दिया।

श्लोक 137 (yuddha.67.137)

स चापमादाय भुजङ्गकल्पं । दृढज्यमुग्रं तपनीयचित्रं । हरीन्समाश्वास्य समुत्पपात । रामो निबद्धोत्तमतूणबाणः ॥ 67.137 ॥

sa cāpamādāya bhujaṅgakalpaṃ | dṛḍhajyamugraṃ tapanīyacitraṃ | harīnsamāśvāsya samutpapāta | rāmo nibaddhottamatūṇabāṇaḥ || 67.137 ||

सर्प के समान उस दृढ़-ज्या, भयंकर और स्वर्ण-चित्रित धनुष को धारण कर, वानरों को आश्वस्त करते हुए राम उछल पड़े, अपनी उत्तम तरकश बाँधे हुए।

श्लोक 138 (yuddha.67.138)

स वानरगणैस्तैस्तु वृतः परमदुर्जयः । लक्ष्मणानुचरो रामः सम्प्रतस्थे महाबलः ॥ 67.138 ॥

sa vānaragaṇaistaistu vṛtaḥ paramadurjayaḥ | lakṣmaṇānucaro rāmaḥ sampratasthe mahābalaḥ || 67.138 ||

उन वानर-समूहों से घिरे हुए, सर्वथा अजेय, लक्ष्मण को साथ लिए हुए महाबली राम आगे बढ़े।

श्लोक 139 (yuddha.67.139)

स ददर्श महात्मानं किरीटिनमरिन्दमं । शोणितावृतरक्ताक्षं कुम्भकर्णं महाबलम् ॥ 67.139 ॥

sa dadarśa mahātmānaṃ kirīṭinamarindamaṃ | śoṇitāvṛtaraktākṣaṃ kumbhakarṇaṃ mahābalam || 67.139 ||

उन्होंने उस महाकाय, मुकुटधारी और शत्रुदमन कुम्भकर्ण को देखा, जिसकी आँखें लाल थीं और जो रक्त से सना हुआ था,

श्लोक 140 (yuddha.67.140)

सर्वान् समभिधावन्तम् यथा रुष्टं दिशागजम् । मार्गमाणं हरीन् क्रुद्धं राक्षसैः परिवारितम् ॥ 67.140 ॥

sarvān samabhidhāvantam yathā ruṣṭaṃ diśāgajam | mārgamāṇaṃ harīn kruddhaṃ rākṣasaiḥ parivāritam || 67.140 ||

वह सबकी ओर उस प्रकार दौड़ रहा था जैसे कोई क्रुद्ध दिग्गज हाथी; क्रोध में वानरों को खोजता हुआ, राक्षसों से घिरा हुआ,

श्लोक 141 (yuddha.67.141)

विन्ध्यमन्दरसंकाशं काञ्चनाङ्गदभूषणं । स्रवन्तं रुधिरं वक्त्राद्वर्षमेघमिवोत्थितम् ॥ 67.141 ॥

vindhyamandarasaṃkāśaṃ kāñcanāṅgadabhūṣaṇaṃ | sravantaṃ rudhiraṃ vaktrādvarṣameghamivotthitam || 67.141 ||

विन्ध्य या मन्दराचल के समान विशाल, स्वर्ण-बाजूबन्दों से सुशोभित, मुख से रक्त बहाता हुआ मानो उठा हुआ कोई वर्षा-मेघ हो,

श्लोक 142 (yuddha.67.142)

जिह्वया परिलिह्यन्तं सृक्किणी शोणितोक्षितम् । मृद्नन्तम् वानरानीकं कालान्तकयमोपमम् ॥ 67.142 ॥

jihvayā parilihyantaṃ sṛkkiṇī śoṇitokṣitam | mṛdnantam vānarānīkaṃ kālāntakayamopamam || 67.142 ||

अपनी रक्त से सनी हुई दोनों ओठों की कोरों को जीभ से चाटते हुए, वानर-सेना को कुचलते हुए, प्रलयकालीन यमराज के समान वह भयंकर था।

श्लोक 143 (yuddha.67.143)

तं दृष्ट्वा राक्षसश्रेष्ठं प्रदीप्तानलवर्चसं । विस्फारयामास तदा कार्मुकं पुरुषर्षभः ॥ 67.143 ॥

taṃ dṛṣṭvā rākṣasaśreṣṭhaṃ pradīptānalavarcasaṃ | visphārayāmāsa tadā kārmukaṃ puruṣarṣabhaḥ || 67.143 ||

अग्नि के समान तेजस्वी उस श्रेष्ठ राक्षस को देखकर, उस पुरुषश्रेष्ठ राम ने तब अपना धनुष टंकृत किया।

श्लोक 144 (yuddha.67.144)

स तस्य चापनिर्घोषात्कुपितो नैरृतर्षभः । अमृष्यमाणस्तं घोषमभिदुद्राव राघवम् ॥ 67.144 ॥

sa tasya cāpanirghoṣātkupito nairṛtarṣabhaḥ | amṛṣyamāṇastaṃ ghoṣamabhidudrāva rāghavam || 67.144 ||

उस धनुष की टंकार सुनकर वह श्रेष्ठ राक्षस क्रुद्ध हो उठा, और उस ध्वनि को सहन न कर सकने के कारण राघव पर झपटा।

श्लोक 145 (yuddha.67.145)

ततस्तु वातोद्धतमेघकल्पं । भुजंगराजोत्तमभोगबाहुं । तमापतन्तं धरणीधराभम् । उवाच रामो युधि कुम्भकर्णम् ॥ 67.145 ॥

tatastu vātoddhatameghakalpaṃ | bhujaṃgarājottamabhogabāhuṃ | tamāpatantaṃ dharaṇīdharābham | uvāca rāmo yudhi kumbhakarṇam || 67.145 ||

तब आँधी से उठे मेघ के समान, नागराज के फणों जैसी भुजाओं वाले, पर्वत के समान उस आते हुए कुम्भकर्ण से राम ने युद्ध में यह कहा --

श्लोक 146 (yuddha.67.146)

आगच्छ रक्षोऽधिप मा विषादम् । अवस्थितोऽहं प्रगृहीतचापः । अवेहि मां राक्षसवंशनाशनम् । अयं मुहूर्ताद्भविता विचेताः ॥ 67.146 ॥

āgaccha rakṣo'dhipa mā viṣādam | avasthito'haṃ pragṛhītacāpaḥ | avehi māṃ rākṣasavaṃśanāśanam | ayaṃ muhūrtādbhavitā vicetāḥ || 67.146 ||

"आओ, हे राक्षसराज, विषाद मत करो। मैं यहाँ अपना धनुष उठाए खड़ा हूँ। मुझे राक्षस-वंश का विनाशक जानो; अभी क्षणभर में ही तुम बेसुध हो जाओगे।"

श्लोक 147 (yuddha.67.147)

रामोऽयमिति विज्ञाय जहास विकृतस्वनम् । अभ्यधावत संक्रुद्धो हरीन्विद्रावयन् रणे ॥ 67.147 ॥

rāmo'yamiti vijñāya jahāsa vikṛtasvanam | abhyadhāvata saṃkruddho harīnvidrāvayan raṇe || 67.147 ||

"यह राम है" यह जानकर उसने विकृत स्वर में अट्टहास किया, और क्रुद्ध होकर उस युद्ध में वानरों को तितर-बितर करता हुआ आगे बढ़ा।

श्लोक 148 (yuddha.67.148)

दारयन्निव सर्वेषां हृदयानि वनौकसाम् । प्रहस्य विकृतं भीमं स मेघस्वनितोपमम् ॥ 67.148 ॥

dārayanniva sarveṣāṃ hṛdayāni vanaukasām | prahasya vikṛtaṃ bhīmaṃ sa meghasvanitopamam || 67.148 ||

उस विकृत, भीषण और मेघ-गर्जन के समान अट्टहास से मानो समस्त वनवासियों के हृदय विदीर्ण करते हुए,

श्लोक 149 (yuddha.67.149)

कुम्भकर्णो महातेजा राघवं वाक्यमब्रवीत् । नाहं विराधो विज्ञेयो न कबन्धः खरो न च । न वाली न च मारीचः कुम्भकर्णोऽहमागतः ॥ 67.149 ॥

kumbhakarṇo mahātejā rāghavaṃ vākyamabravīt | nāhaṃ virādho vijñeyo na kabandhaḥ kharo na ca | na vālī na ca mārīcaḥ kumbhakarṇo'hamāgataḥ || 67.149 ||

-- महातेजस्वी कुम्भकर्ण ने राघव से यह कहा -- "मुझे विराध, कबन्ध या खर मत समझो; न मैं वाली हूँ, न मारीच -- मैं तो कुम्भकर्ण स्वयं आया हूँ।

श्लोक 150 (yuddha.67.150)

पश्य मे मुद्गरम् भीमं सर्वकालायसं महत् । अनेन निर्जिता देवा दानवाश्च मया पुरा ॥ 67.150 ॥

paśya me mudgaram bhīmaṃ sarvakālāyasaṃ mahat | anena nirjitā devā dānavāśca mayā purā || 67.150 ||

मेरे इस भीषण, विशाल और सर्वथा लौह-निर्मित मुद्गर को देखो; इसी से मैंने पूर्वकाल में देवताओं और दानवों को भी जीत लिया था।

श्लोक 151 (yuddha.67.151)

विकर्णनास इति मां नावज्ञातुं त्वमर्हसि । स्वल्पापि हि न मे पीडा कर्णनासाविनाशनात् ॥ 67.151 ॥

vikarṇanāsa iti māṃ nāvajñātuṃ tvamarhasi | svalpāpi hi na me pīḍā karṇanāsāvināśanāt || 67.151 ||

मेरे कान और नाक कट जाने से तुम्हें मुझे तुच्छ नहीं समझना चाहिए; कान-नाक के नष्ट होने से मुझे तनिक भी पीड़ा नहीं हुई।

श्लोक 152 (yuddha.67.152)

दर्शयेक्ष्वाकुशार्दूल वीर्यं गात्रेषु मे लघु । ततस्त्वां भक्षयिष्यामि दृष्टपौरुषविक्रमम् ॥ 67.152 ॥

darśayekṣvākuśārdūla vīryaṃ gātreṣu me laghu | tatastvāṃ bhakṣayiṣyāmi dṛṣṭapauruṣavikramam || 67.152 ||

हे इक्ष्वाकुश्रेष्ठ! शीघ्र ही अपने अंगों का बल दिखाओ; तत्पश्चात् तुम्हारा पौरुष और पराक्रम देखकर मैं तुम्हें खा जाऊँगा।"

श्लोक 153 (yuddha.67.153)

स कुम्भकर्णस्य वचो निशम्य । रामः सुपुङ्खान्विससर्ज बाणान् । तैराहतो वज्रसमप्रवेगैर् । न चुक्षुभे न व्यथते सुराइः ॥ 67.153 ॥

sa kumbhakarṇasya vaco niśamya | rāmaḥ supuṅkhānvisasarja bāṇān | tairāhato vajrasamapravegair | na cukṣubhe na vyathate surāiḥ || 67.153 ||

कुम्भकर्ण के इन वचनों को सुनकर राम ने सुपंख बाण छोड़े; वज्र के समान वेगवान् उन बाणों से आहत होकर भी वह देवशत्रु न विचलित हुआ, न व्यथित हुआ।

श्लोक 154 (yuddha.67.154)

यैः सायकैः सालवरा निकृत्ता । वाली हतो वानरपुङ्गवश् च । ते कुम्भकर्णस्य तदा शरीरं । वज्रोपमा न व्यथयां प्रचक्रुः ॥ 67.154 ॥

yaiḥ sāyakaiḥ sālavarā nikṛttā | vālī hato vānarapuṅgavaś ca | te kumbhakarṇasya tadā śarīraṃ | vajropamā na vyathayāṃ pracakruḥ || 67.154 ||

जिन बाणों ने पहले उत्तम साल वृक्षों को काट डाला था और वानरश्रेष्ठ वाली का वध किया था, वज्र के समान वे ही बाण अब कुम्भकर्ण के शरीर को तनिक भी व्यथित नहीं कर सके।

श्लोक 155 (yuddha.67.155)

स वारिधारा इव सायकांस्तान् । पिबन् शरीरेण महेन्द्रशत्रुः । जघान रामस्य शरप्रवेगं । व्याविध्य तं मुद्गरमुग्रवेगम् ॥ 67.155 ॥

sa vāridhārā iva sāyakāṃstān | piban śarīreṇa mahendraśatruḥ | jaghāna rāmasya śarapravegaṃ | vyāvidhya taṃ mudgaramugravegam || 67.155 ||

उस महान् इन्द्रशत्रु ने उन बाणों को मानो जल-धाराओं के समान अपने शरीर में पी लिया, और अपने भीषण वेगवान् मुद्गर को घुमाकर राम के बाणों के वेग पर ही प्रहार किया।

श्लोक 156 (yuddha.67.156)

ततस्तु रक्षः क्षतजानुलिप्तं । वित्रासनं देवमहाचमूनाम् । व्याविध्य तं मुद्गरमुग्रवेगं । विद्रावयामास चमूं हरीणाम् ॥ 67.156 ॥

tatastu rakṣaḥ kṣatajānuliptaṃ | vitrāsanaṃ devamahācamūnām | vyāvidhya taṃ mudgaramugravegaṃ | vidrāvayāmāsa camūṃ harīṇām || 67.156 ||

तब रक्त से सना हुआ वह राक्षस, जो देवताओं की महासेनाओं का भी त्रास था, उस भीषण वेगवान् मुद्गर को घुमाकर वानर-सेना को तितर-बितर करने लगा।

श्लोक 157 (yuddha.67.157)

वायव्यमादाय ततो वरास्त्रं । रामः प्रचिक्षेप निशाचराय । समुद्गरं तेन जहार बाहुं । स कृत्तबाहुस्तुमुलं ननाद ॥ 67.157 ॥

vāyavyamādāya tato varāstraṃ | rāmaḥ pracikṣepa niśācarāya | samudgaraṃ tena jahāra bāhuṃ | sa kṛttabāhustumulaṃ nanāda || 67.157 ||

तब राम ने उत्तम वायव्य अस्त्र उठाकर उस निशाचर पर छोड़ा; उससे उन्होंने उसकी मुद्गर सहित भुजा काट डाली; और भुजा कटने पर वह भयंकर स्वर में चीत्कार कर उठा।

श्लोक 158 (yuddha.67.158)

स तस्य बाहुर्गिरिशृङ्गकल्पः । समुद्गरो राघवबाणकृत्तः । पपात तस्मिन् हरिराजसैन्ये । जघान ताम् वानरवाहिनीं च ॥ 67.158 ॥

sa tasya bāhurgiriśṛṅgakalpaḥ | samudgaro rāghavabāṇakṛttaḥ | papāta tasmin harirājasainye | jaghāna tām vānaravāhinīṃ ca || 67.158 ||

पर्वत-शिखर के समान उसकी वह भुजा, मुद्गर सहित, राघव के बाण से कटकर, उस वानरराज की सेना पर जा गिरी, और गिरते ही वानर-सेना को भी कुचल डाला।

श्लोक 159 (yuddha.67.159)

ते वानरा भग्नहतावशेषाः । पर्यन्तमाश्रित्य तदा विषण्णाः । प्रपिडिताङ्गा ददृशुः सुघोरं । नरेन्द्ररक्षोऽधिपसंनिपातम् ॥ 67.159 ॥

te vānarā bhagnahatāvaśeṣāḥ | paryantamāśritya tadā viṣaṇṇāḥ | prapiḍitāṅgā dadṛśuḥ sughoraṃ | narendrarakṣo'dhipasaṃnipātam || 67.159 ||

टूटी हुई और आहत बची हुई वे वानर-सेनाएँ, रणभूमि के किनारे शरण लेकर, दुःखी और पीड़ित अंगों वाली होकर, उस नरेन्द्र और राक्षसाधिप के अत्यन्त भीषण संघर्ष को देखने लगीं।

श्लोक 160 (yuddha.67.160)

स कुम्भकर्णोऽस्त्रनिकृत्तबाहुर् । महासिकृत्ताग्र इवाचलेन्द्रः । उत्पाटयामास करेण वृक्षं । ततोऽभिदुद्राव रणे नरेन्द्रम् ॥ 67.160 ॥

sa kumbhakarṇo'stranikṛttabāhur | mahāsikṛttāgra ivācalendraḥ | utpāṭayāmāsa kareṇa vṛkṣaṃ | tato'bhidudrāva raṇe narendram || 67.160 ||

वह कुम्भकर्ण, जिसकी भुजा उस अस्त्र से कट चुकी थी, मानो किसी विशाल तलवार से जिसका शिखर कट गया हो ऐसे पर्वतराज के समान, अपने शेष हाथ से एक वृक्ष उखाड़कर, उस युद्ध में पुनः नरेन्द्र राम पर झपटा।

श्लोक 161 (yuddha.67.161)

स तस्य बाहुं सह सालवृक्षं । समुद्यतं पन्नगभोगकल्पम् । ऐन्द्रास्त्रयुक्तेन जहार रामो । बाणेन जाम्बूनदचित्रितेन ॥ 67.161 ॥

sa tasya bāhuṃ saha sālavṛkṣaṃ | samudyataṃ pannagabhogakalpam | aindrāstrayuktena jahāra rāmo | bāṇena jāmbūnadacitritena || 67.161 ||

उसकी उस दूसरी भुजा को भी, जो साल वृक्ष सहित उठी हुई थी और सर्पराज के फणों के समान जान पड़ती थी, राम ने ऐन्द्रास्त्र से युक्त स्वर्ण-चित्रित बाण से काट डाला।

श्लोक 162 (yuddha.67.162)

स कुम्भकर्णस्य भुजो निकृत्तः । पपात भूमौ गिरिसंनिकाशः । विवेष्टमानो निजघान वृक्षान् । शैलाञ्शिलावानरराक्षसांश् च ॥ 67.162 ॥

sa kumbhakarṇasya bhujo nikṛttaḥ | papāta bhūmau girisaṃnikāśaḥ | viveṣṭamāno nijaghāna vṛkṣān | śailāñśilāvānararākṣasāṃś ca || 67.162 ||

कुम्भकर्ण की वह कटी हुई भुजा, पर्वत के समान विशाल, धरती पर गिर पड़ी, और छटपटाते हुए वृक्षों, पर्वत-खण्डों, शिलाओं, वानरों और राक्षसों को कुचल डाला।

श्लोक 163 (yuddha.67.163)

तं छिन्नबाहुं समवेक्ष्य रामः । समापतन्तं सहसा नदन्तं । द्वावर्धचन्द्रौ निशितौ प्रगृह्य । चिच्छेद पादौ युधि राक्षसस्य ॥ 67.163 ॥

taṃ chinnabāhuṃ samavekṣya rāmaḥ | samāpatantaṃ sahasā nadantaṃ | dvāvardhacandrau niśitau pragṛhya | ciccheda pādau yudhi rākṣasasya || 67.163 ||

उस दोनों भुजाओं से रहित कुम्भकर्ण को सहसा गरजते हुए आगे बढ़ता देखकर, राम ने दो तीक्ष्ण अर्धचन्द्र बाण लेकर उस युद्ध में राक्षस के दोनों पैर काट डाले।

श्लोक 164 (yuddha.67.164)

तौ तस्य पादौ प्रदिशो दिशश्च । गिरेर्गुहाश्चैव महार्णवं च । लङ्कां च सेनां कपिराक्षसानां । विनादयन्तौ विनिपेततुश्च ॥ 67.164 ॥

tau tasya pādau pradiśo diśaśca | girerguhāścaiva mahārṇavaṃ ca | laṅkāṃ ca senāṃ kapirākṣasānāṃ | vinādayantau vinipetatuśca || 67.164 ||

उसके वे दोनों पैर, दिशाओं-विदिशाओं, पर्वत-गुफाओं, महासागर, लंका और वानर-राक्षस दोनों की सेनाओं को गुँजाते हुए धराशायी हो गए।

श्लोक 165 (yuddha.67.165)

निकृत्तबाहुर्विनिकृत्तपादो । विदार्य वक्त्रं वडवामुखाभं । दुद्राव रामं सहसाभिगर्जन् । राहुर्यथा चन्द्रमिवान्तरिक्षे ॥ 67.165 ॥

nikṛttabāhurvinikṛttapādo | vidārya vaktraṃ vaḍavāmukhābhaṃ | dudrāva rāmaṃ sahasābhigarjan | rāhuryathā candramivāntarikṣe || 67.165 ||

भुजाओं और पैरों से रहित होकर भी, वडवाग्नि के समान अपना मुख फैलाए हुए, वह सहसा गरजता हुआ राम पर टूट पड़ा, जैसे राहु आकाश में चन्द्रमा पर झपटता है।

श्लोक 166 (yuddha.67.166)

अपूरयत्तस्य मुखं शिताग्रै । रामः शरैर्हेमपिनद्धपुङ्खैः । स पूर्णवक्त्रो न शशाक वक्तुं । चुकूज कृच्छ्रेण मुमोह चापि ॥ 67.166 ॥

apūrayattasya mukhaṃ śitāgrai | rāmaḥ śarairhemapinaddhapuṅkhaiḥ | sa pūrṇavaktro na śaśāka vaktuṃ | cukūja kṛcchreṇa mumoha cāpi || 67.166 ||

राम ने उसके उस मुख को तीक्ष्ण अग्रभाग और स्वर्ण-पंखयुक्त बाणों से भर दिया; मुख भर जाने से वह कुछ बोल नहीं सका, केवल कठिनाई से कराहने लगा और मूर्च्छित भी हो गया।

श्लोक 167 (yuddha.67.167)

अथाददे सूर्यमरीचिकल्पं । स ब्रह्मदण्डान्तककालकल्पम् । अरिष्टमैन्द्रं निशितं सुपुङ्खं । रामः शरं मारुततुल्यवेगम् ॥ 67.167 ॥

athādade sūryamarīcikalpaṃ | sa brahmadaṇḍāntakakālakalpam | ariṣṭamaindraṃ niśitaṃ supuṅkhaṃ | rāmaḥ śaraṃ mārutatulyavegam || 67.167 ||

तब राम ने सूर्य की किरणों के समान, ब्रह्मदण्ड या कालरूपी यमराज के समान, अमोघ, ऐन्द्र, तीक्ष्ण, सुपंख और वायु के समान वेगवान् एक बाण उठाया।

श्लोक 168 (yuddha.67.168)

तम् वज्रजाम्बूनदचारुपुङ्खं । प्रदीप्तसूर्यज्वलनप्रकाशम् । महेन्द्रवज्राशनितुल्यवेगं । रामः प्रचिक्षेप निशाचराय ॥ 67.168 ॥

tam vajrajāmbūnadacārupuṅkhaṃ | pradīptasūryajvalanaprakāśam | mahendravajrāśanitulyavegaṃ | rāmaḥ pracikṣepa niśācarāya || 67.168 ||

वज्र और स्वर्ण से सुशोभित पंखों वाले, प्रज्वलित सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी, महेन्द्र के वज्र के समान वेगवान् उस बाण को राम ने उस निशाचर पर छोड़ दिया।

श्लोक 169 (yuddha.67.169)

स सायको राघवबाहुचोदितो । दिशः स्वभासा दश सम्प्रकाशयन् । विधूमवैश्वानरदीप्तदर्शनो । जगाम शक्राशनितुल्यविक्रमः ॥ 67.169 ॥

sa sāyako rāghavabāhucodito | diśaḥ svabhāsā daśa samprakāśayan | vidhūmavaiśvānaradīptadarśano | jagāma śakrāśanitulyavikramaḥ || 67.169 ||

राघव की भुजा से छूटा हुआ वह बाण, अपनी आभा से दसों दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ, धूमरहित अग्नि के समान देदीप्यमान, इन्द्र के वज्र के समान पराक्रम से आगे बढ़ा।

श्लोक 170 (yuddha.67.170)

स तन्महापर्वतकूटसंनिभं । सुवृत्तदंष्ट्रं चलचारुकुण्डलं । चकर्त रक्षोऽधिपतेः शिरस्तदा । यथैव वृत्रस्य पुरा पुरन्दरः ॥ 67.170 ॥

sa tanmahāparvatakūṭasaṃnibhaṃ | suvṛttadaṃṣṭraṃ calacārukuṇḍalaṃ | cakarta rakṣo'dhipateḥ śirastadā | yathaiva vṛtrasya purā purandaraḥ || 67.170 ||

उस बाण ने उस समय राक्षसराज के उस सिर को काट डाला, जो महापर्वत-शिखर के समान विशाल था, जिसकी दाढ़ें गोलाकार थीं और जिसमें सुन्दर कुण्डल हिल रहे थे, ठीक वैसे ही जैसे पूर्वकाल में पुरन्दर इन्द्र ने वृत्रासुर का सिर काटा था।

श्लोक 171 (yuddha.67.171)

कुम्भकर्णशिरो भाति कुण्डलालंकृतं महत् । आदित्येऽभ्युदिते रात्रौ मध्यस्थ इव चन्द्रमाः ॥ 67.171 ॥

kumbhakarṇaśiro bhāti kuṇḍalālaṃkṛtaṃ mahat | āditye'bhyudite rātrau madhyastha iva candramāḥ || 67.171 ||

कुण्डलों से सुशोभित कुम्भकर्ण का वह विशाल सिर उस प्रकार चमक रहा था, जैसे सूर्योदय होते ही आधी रात में चन्द्रमा शोभायमान हो।

श्लोक 172 (yuddha.67.172)

तद्रामबाणाभिहतं पपात । रक्षःशिरः पर्वतसंनिकाशम् । बभञ्ज चर्यागृहगोपुराणि । प्राकारमुच्चं तमपातयच्च ॥ 67.172 ॥

tadrāmabāṇābhihataṃ papāta | rakṣaḥśiraḥ parvatasaṃnikāśam | babhañja caryāgṛhagopurāṇi | prākāramuccaṃ tamapātayacca || 67.172 ||

राम के बाण से आहत होकर, पर्वत के समान वह विशाल राक्षस-मस्तक गिर पड़ा; उसने विहार-गृहों और नगर-द्वारों को तोड़ डाला, और उस ऊँचे परकोटे को भी ढहा दिया।

श्लोक 173 (yuddha.67.173)

तच्चातिकायं हिमवत्प्रकाशं । रक्षस्तदा तोयनिधौ पपात । ग्राहान् परान् मीनचयान्भुजंगमान् । ममर्द भूमिं च तथा विवेश ॥ 67.173 ॥

taccātikāyaṃ himavatprakāśaṃ | rakṣastadā toyanidhau papāta | grāhān parān mīnacayānbhujaṃgamān | mamarda bhūmiṃ ca tathā viveśa || 67.173 ||

और वह विशालकाय राक्षस-शरीर, हिमालय के समान श्वेत, तब समुद्र में जा गिरा; उसने बड़े-बड़े मगरमच्छों, मछलियों के समूहों और सर्पों को कुचल डाला, और धरती में भी धँस गया।

श्लोक 174 (yuddha.67.174)

तस्मिर्हते ब्राह्मणदेवशत्रौ । महाबले सम्यति कुम्भकर्णे । चचाल भूर्भूमिधराश् च सर्वे । हर्षाच्च देवास्तुमुलं प्रणेदुः ॥ 67.174 ॥

tasmirhate brāhmaṇadevaśatrau | mahābale samyati kumbhakarṇe | cacāla bhūrbhūmidharāś ca sarve | harṣācca devāstumulaṃ praṇeduḥ || 67.174 ||

ब्राह्मणों और देवताओं के उस महाबली शत्रु कुम्भकर्ण के इस युद्ध में मारे जाने पर, पृथ्वी काँप उठी, समस्त पर्वत हिल गए, और देवगण हर्ष से महाध्वनि में गरज उठे।

श्लोक 175 (yuddha.67.175)

ततस्तु देवर्षिमहर्षिपन्नगाः । सुराश्च भूतानि सुपर्णगुह्यकाः । सयक्षगन्धर्वगणा नभोगताः । प्रहर्षिता राम पराक्रमेण ॥ 67.175 ॥

tatastu devarṣimaharṣipannagāḥ | surāśca bhūtāni suparṇaguhyakāḥ | sayakṣagandharvagaṇā nabhogatāḥ | praharṣitā rāma parākrameṇa || 67.175 ||

तब देवर्षि, महर्षि, नाग, देवता, समस्त भूत-गण, गरुड़, गुह्यक, यक्ष और गन्धर्व-गण, आकाश में स्थित होकर, राम के इस पराक्रम से अत्यन्त हर्षित हुए।

श्लोक 176 (yuddha.67.176)

ततस्तु ते तस्य वधेन भूरिणा । मनस्विनो नैरृतराजबान्धवाः । विनेदुरुच्छैर्व्यथिता रघूत्तमं । हरिं समीक्ष्यैव यथा मतङ्गजाः ॥ 67.176 ॥

tatastu te tasya vadhena bhūriṇā | manasvino nairṛtarājabāndhavāḥ | vinedurucchairvyathitā raghūttamaṃ | hariṃ samīkṣyaiva yathā mataṅgajāḥ || 67.176 ||

तब उसके इस भीषण वध से व्यथित होकर, राक्षसराज के वे उदार-हृदय बन्धुजन उस रघुश्रेष्ठ को और वानरों को देखकर उसी प्रकार ऊँचे स्वर में चीत्कार करने लगे, जैसे सिंह को देखकर हाथी चीत्कार करते हैं।

श्लोक 177 (yuddha.67.177)

स देवलोकस्य तमो निहत्य । सूर्यो यथा राहुमुखाद्विमुक्तः । तथा व्यभासीद्धरिसैन्यमध्ये । निहत्य रामो यधि कुम्भकर्णम् ॥ 67.177 ॥

sa devalokasya tamo nihatya | sūryo yathā rāhumukhādvimuktaḥ | tathā vyabhāsīddharisainyamadhye | nihatya rāmo yadhi kumbhakarṇam || 67.177 ||

जैसे राहु के मुख से मुक्त होकर सूर्य देवलोक के अन्धकार को नष्ट करके पुनः चमक उठता है, वैसे ही युद्ध में कुम्भकर्ण का वध करके राम वानर-सेना के बीच उसी प्रकार देदीप्यमान हो उठे।

श्लोक 178 (yuddha.67.178)

प्रहर्षमीयुर्बहवस्तु वानराः । प्रबुद्धपद्मप्रतिमैरिवाननैः । अपूजयन् राघवमिष्टभागिनं । हते रिपौ भीमबले दुरासदे ॥ 67.178 ॥

praharṣamīyurbahavastu vānarāḥ | prabuddhapadmapratimairivānanaiḥ | apūjayan rāghavamiṣṭabhāginaṃ | hate ripau bhīmabale durāsade || 67.178 ||

अनेक वानर, खिले हुए कमलों के समान मुखों वाले होकर, अत्यन्त हर्षित हो उठे; उस भीषण और दुर्धर्ष शत्रु के मारे जाने पर, उन्होंने अपने मनोरथ को प्राप्त राघव का पूजन किया।

श्लोक 179 (yuddha.67.179)

स कुम्भकर्णं सुरसैन्यमर्दनं । महत्सु युद्धेष्वपराजितश्रमं । ननन्द हत्वा भरताग्रजो रणे । महासुरं वृत्रमिवामराधिपः ॥ 67.179 ॥

sa kumbhakarṇaṃ surasainyamardanaṃ | mahatsu yuddheṣvaparājitaśramaṃ | nananda hatvā bharatāgrajo raṇe | mahāsuraṃ vṛtramivāmarādhipaḥ || 67.179 ||

देवताओं की सेनाओं का मर्दन करने वाले और महासमरों में जिसका पराक्रम कभी पराजित नहीं हुआ था, उस कुम्भकर्ण का वध करके, भरताग्रज राम युद्ध में उसी प्रकार आनन्दित हुए, जैसे महासुर वृत्र का वध करके देवराज इन्द्र आनन्दित हुए थे।

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