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युद्धकाण्ड · सर्ग 70

रावण के कुटुम्बियों का वध

सर्ग 69सर्ग-सूचीसर्ग 71

श्लोक 1 (yuddha.70.1)

नरान्तकं हतं दृष्ट्वा चुक्रुशुर्नैर्ऋतर्षभाः । देवान्तकस्त्रिमूर्धा च पौलस्त्यश्च महोदरः ॥ 70.1 ॥

narāntakaṃ hataṃ dṛṣṭvā cukruśurnairṛtarṣabhāḥ | devāntakastrimūrdhā ca paulastyaśca mahodaraḥ || 70.1 ||

नरान्तक को मारा गया देखकर श्रेष्ठ राक्षस चिल्ला उठे -- देवान्तक, त्रिमूर्धा (त्रिशिरा) और पुलस्त्यवंशी महोदर।

श्लोक 2 (yuddha.70.2)

आरूढो मेघसंकाशं वारणेन्द्रं महोदरः । वालिपुत्रं महावीर्यमभिदुद्राव वेगवान् ॥ 70.2 ॥

ārūḍho meghasaṃkāśaṃ vāraṇendraṃ mahodaraḥ | vāliputraṃ mahāvīryamabhidudrāva vegavān || 70.2 ||

मेघ के समान श्यामवर्ण गजराज पर सवार होकर महोदर वेगपूर्वक महापराक्रमी वालिपुत्र अंगद पर झपटा।

श्लोक 3 (yuddha.70.3)

भ्रातृव्यसनसंतप्तस्तदा देवान्तको बली । आदाय परिघं घोरमङ्गदं समभिद्रवत् ॥ 70.3 ॥

bhrātṛvyasanasaṃtaptastadā devāntako balī | ādāya parighaṃ ghoramaṅgadaṃ samabhidravat || 70.3 ||

तब भाई के शोक से संतप्त बलवान् देवान्तक भयंकर परिघ लेकर अंगद पर टूट पड़ा।

श्लोक 4 (yuddha.70.4)

रथमादित्यसंकाशं युक्तं परमवाजिभिः । आस्थाय त्रिशिरा वीरो वालिपुत्रमथाभ्यगात् ॥ 70.4 ॥

rathamādityasaṃkāśaṃ yuktaṃ paramavājibhiḥ | āsthāya triśirā vīro vāliputramathābhyagāt || 70.4 ||

सूर्य के समान तेजस्वी और उत्तम अश्वों से युक्त रथ पर सवार होकर वीर त्रिशिरा भी वालिपुत्र की ओर बढ़ा।

श्लोक 5 (yuddha.70.5)

स त्रिभिर्देवदर्पघ्नै राक्षसेन्द्रैरभिद्रुतः । वृक्षमुत्पाटयामास महाविटपमङ्गदः ॥ 70.5 ॥

sa tribhirdevadarpaghnai rākṣasendrairabhidrutaḥ | vṛkṣamutpāṭayāmāsa mahāviṭapamaṅgadaḥ || 70.5 ||

देवों के गर्व को चूर करने वाले उन तीनों राक्षसराजों से एक साथ आक्रान्त होकर अंगद ने एक विशाल शाखाओं वाला वृक्ष उखाड़ लिया।

श्लोक 6 (yuddha.70.6)

देवान्तकाय तं वीरश्चिक्षेप सहसाङ्गदः । महावृक्षं महाशाखं शक्रो दीप्तामिवाशनिम् ॥ 70.6 ॥

devāntakāya taṃ vīraścikṣepa sahasāṅgadaḥ | mahāvṛkṣaṃ mahāśākhaṃ śakro dīptāmivāśanim || 70.6 ||

वीर अंगद ने तत्क्षण उस विशाल, बड़ी शाखाओं वाले वृक्ष को देवान्तक पर ऐसे फेंका जैसे इन्द्र अपना प्रज्वलित वज्र फेंकता है।

श्लोक 7 (yuddha.70.7)

त्रिशिरास्तं प्रचिच्छेद शरैराशीविषोपमैः । स वृक्षं कृत्तमालोक्य उत्पपात तदाङ्गदः ॥ 70.7 ॥

triśirāstaṃ praciccheda śarairāśīviṣopamaiḥ | sa vṛkṣaṃ kṛttamālokya utpapāta tadāṅgadaḥ || 70.7 ||

त्रिशिरा ने विष-सर्प के समान बाणों से उसे छिन्न-भिन्न कर दिया; वृक्ष को कटा देखकर अंगद तत्काल उछल पड़ा।

श्लोक 8 (yuddha.70.8)

स ववर्ष ततो वृक्षान् शिलाश्च कपिकुञ्जरः । तान् प्रचिच्छेद संक्रुद्धस्त्रिशिरा निशितैः शरैः ॥ 70.8 ॥

sa vavarṣa tato vṛkṣān śilāśca kapikuñjaraḥ | tān praciccheda saṃkruddhastriśirā niśitaiḥ śaraiḥ || 70.8 ||

उस कपिश्रेष्ठ ने फिर वृक्षों और शिलाओं की वर्षा की; क्रुद्ध त्रिशिरा ने अपने तीक्ष्ण बाणों से उन सबको काट डाला।

श्लोक 9 (yuddha.70.9)

परिघाग्रेण तान् वृक्षान् बभञ्ज स महोदरः । त्रिशिराश्चाङ्गदं वीरमभिदुद्राव सायकैः ॥ 70.9 ॥

parighāgreṇa tān vṛkṣān babhañja sa mahodaraḥ | triśirāścāṅgadaṃ vīramabhidudrāva sāyakaiḥ || 70.9 ||

महोदर ने अपने परिघ के अग्रभाग से उन वृक्षों को तोड़ डाला, और त्रिशिरा ने वीर अंगद पर अपने बाणों से आक्रमण किया।

श्लोक 10 (yuddha.70.10)

गजेन समभिद्रुत्य वालिपुत्रं महोदरः । जघानोरसि संक्रुद्धस्तोमरैर्वज्रसंनिभैः ॥ 70.10 ॥

gajena samabhidrutya vāliputraṃ mahodaraḥ | jaghānorasi saṃkruddhastomarairvajrasaṃnibhaiḥ || 70.10 ||

अपने गजराज सहित वालिपुत्र पर झपटकर, क्रुद्ध महोदर ने वज्र के समान तोमरों से उसकी छाती पर प्रहार किया।

श्लोक 11 (yuddha.70.11)

देवान्तकश्च संक्रुद्धः परिघेण तदाङ्गदम् । उपगम्याभिहत्याशु व्यपचक्राम वेगवान् ॥ 70.11 ॥

devāntakaśca saṃkruddhaḥ parigheṇa tadāṅgadam | upagamyābhihatyāśu vyapacakrāma vegavān || 70.11 ||

क्रुद्ध देवान्तक ने भी परिघ से तुरन्त अंगद पर आघात करके, वेगपूर्वक वहाँ से हट गया।

श्लोक 12 (yuddha.70.12)

स त्रिभिर्नैर्ऋतश्रेष्ठैर्युगपत् समभिद्रुतः । न विव्यथे महातेजा वालिपुत्रः प्रतापवान् ॥ 70.12 ॥

sa tribhirnairṛtaśreṣṭhairyugapat samabhidrutaḥ | na vivyathe mahātejā vāliputraḥ pratāpavān || 70.12 ||

इन तीनों श्रेष्ठ राक्षसों द्वारा एक साथ आक्रान्त होने पर भी, महातेजस्वी और प्रतापी वालिपुत्र तनिक भी विचलित नहीं हुआ।

श्लोक 13 (yuddha.70.13)

स वेगवान् महावेगं कृत्वा परमदुर्जयः । तलेन समभिद्रुत्य जघानास्य महागजम् ॥ 70.13 ॥

sa vegavān mahāvegaṃ kṛtvā paramadurjayaḥ | talena samabhidrutya jaghānāsya mahāgajam || 70.13 ||

दुर्जय वेगवान् अंगद ने और भी अधिक वेग धारण कर, आगे बढ़कर अपनी हथेली से महोदर के विशाल गजराज पर प्रहार किया।

श्लोक 14 (yuddha.70.14)

तस्य तेन प्रहारेण नागराजस्य संयुगे । पेततुर्नयने तस्य विननाश स कुञ्जरः ॥ 70.14 ॥

tasya tena prahāreṇa nāgarājasya saṃyuge | petaturnayane tasya vinanāśa sa kuñjaraḥ || 70.14 ||

उस प्रहार से युद्ध में उस गजराज की दोनों आँखें गिर पड़ीं, और वह हाथी वहीं नष्ट हो गया।

श्लोक 15 (yuddha.70.15)

विषाणं चास्य निष्कृष्य वालिपुत्रो महाबलः । देवान्तकमभिद्रुत्य ताडयामास संयुगे ॥ 70.15 ॥

viṣāṇaṃ cāsya niṣkṛṣya vāliputro mahābalaḥ | devāntakamabhidrutya tāḍayāmāsa saṃyuge || 70.15 ||

तब महाबली वालिपुत्र ने उसका एक दाँत उखाड़कर देवान्तक पर झपटकर युद्ध में उससे प्रहार किया।

श्लोक 16 (yuddha.70.16)

स विह्वलस्तु तेजस्वी वातोद्धूत इव द्रुमः । लाक्षारससवर्णं च सुस्राव रुधिरं महत् ॥ 70.16 ॥

sa vihvalastu tejasvī vātod‍dhūta iva drumaḥ | lākṣārasasavarṇaṃ ca susrāva rudhiraṃ mahat || 70.16 ||

तेजस्वी होते हुए भी वायु से हिलते वृक्ष के समान विह्वल होकर, वह लाक्षारस के समान रक्त की धारा बहाने लगा।

श्लोक 17 (yuddha.70.17)

अथाश्वास्य महातेजाः कृच्छ्राद् देवान्तको बली । आविध्य परिघं वेगादाजघान तदाङ्गदम् ॥ 70.17 ॥

athāśvāsya mahātejāḥ kṛcchrād devāntako balī | āvidhya parighaṃ vegādājaghāna tadāṅgadam || 70.17 ||

तब महातेजस्वी बली देवान्तक बड़ी कठिनाई से सँभलकर, अपने परिघ को घुमाकर वेगपूर्वक अंगद पर प्रहार किया।

श्लोक 18 (yuddha.70.18)

परिघाभिहतश्चापि वानरेन्द्रात्मजस्तदा । जानुभ्यां पतितो भूमौ पुनरेवोत्पपात ह ॥ 70.18 ॥

parighābhihataścāpi vānarendrātmajastadā | jānubhyāṃ patito bhūmau punarevotpapāta ha || 70.18 ||

परिघ से आहत होकर वानरेन्द्रपुत्र अंगद घुटनों के बल भूमि पर गिर पड़ा, किन्तु तुरन्त ही पुनः उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 19 (yuddha.70.19)

तमुत्पतन्तं त्रिशिरास्त्रिभिर्बाणैरजिह्मगैः । घोरैर्हरिपतेः पुत्रं ललाटेऽभिजघान ह ॥ 70.19 ॥

tamutpatantaṃ triśirāstribhirbāṇairajihmagaiḥ | ghorairharipateḥ putraṃ lalāṭe'bhijaghāna ha || 70.19 ||

उछलते हुए उस अंगद पर त्रिशिरा ने सीधे जाने वाले तीन भयंकर बाणों से ललाट पर प्रहार किया।

श्लोक 20 (yuddha.70.20)

ततोऽङ्गदं परिक्षिप्तं त्रिभिर्नैर्ऋतपुङ्गवैः । हनूमानथ विज्ञाय नीलश्चापि प्रतस्थतुः ॥ 70.20 ॥

tato'ṅgadaṃ parikṣiptaṃ tribhirnairṛtapuṅgavaiḥ | hanūmānatha vijñāya nīlaścāpi pratasthatuḥ || 70.20 ||

तब तीनों श्रेष्ठ राक्षसों से घिरे अंगद को जानकर, हनुमान् और नील दोनों वहाँ के लिए चल पड़े।

श्लोक 21 (yuddha.70.21)

ततश्चिक्षेप शैलाग्रं नीलस्त्रिशिरसे तदा । तद् रावणसुतो धीमान् बिभेद निशितैः शरैः ॥ 70.21 ॥

tataścikṣepa śailāgraṃ nīlastriśirase tadā | tad rāvaṇasuto dhīmān bibheda niśitaiḥ śaraiḥ || 70.21 ||

तब नील ने त्रिशिरा पर पर्वत-शिखर फेंका; और उस बुद्धिमान् रावण-पुत्र ने उसे अपने तीक्ष्ण बाणों से बींध डाला।

श्लोक 22 (yuddha.70.22)

तद्बाणशतनिर्भिन्नं विदारितशिलातलम् । सविस्फुलिङ्गं सज्वालं निपपात गिरेः शिरः ॥ 70.22 ॥

tada‍bāṇaśatanirbhinnaṃ vidāritaśilātalam | savisphuliṅgaṃ sajvālaṃ nipapāta gireḥ śiraḥ || 70.22 ||

सैकड़ों बाणों से बिंधा हुआ, चट्टान का तल विदीर्ण हुआ वह पर्वत-शिखर चिंगारियाँ और ज्वालाएँ छोड़ता हुआ गिर पड़ा।

श्लोक 23 (yuddha.70.23)

स विजृम्भितमालोक्य हर्षाद् देवान्तको बली । परिघेणाभिदुद्राव मारुतात्मजमाहवे ॥ 70.23 ॥

sa vijṛmbhitamālokya harṣād devāntako balī | parigheṇābhidudrāva mārutātmajamāhave || 70.23 ||

यह पराक्रम देखकर हर्षित बलवान् देवान्तक ने परिघ लेकर उस युद्ध में पवनपुत्र हनुमान् पर धावा बोला।

श्लोक 24 (yuddha.70.24)

तमापतन्तमुत्पत्य हनूमान् कपिकुञ्जरः । आजघान तदा मूर्ध्नि वज्रकल्पेन मुष्टिना ॥ 70.24 ॥

tamāpatantamutpatya hanūmān kapikuñjaraḥ | ājaghāna tadā mūrdhni vajrakalpena muṣṭinā || 70.24 ||

आते हुए उस देवान्तक पर उछलकर कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने वज्र के समान अपनी मुट्ठी से उसके सिर पर प्रहार किया।

श्लोक 25 (yuddha.70.25)

शिरसि प्राहरद् वीरस्तदा वायुसुतो बली । नादेनाकम्पयच्चैव राक्षसान् स महाकपिः ॥ 70.25 ॥

śirasi prāharad vīrastadā vāyusuto balī | nādenākampayaccaiva rākṣasān sa mahākapiḥ || 70.25 ||

वीर वायुपुत्र बली हनुमान् ने उसके सिर पर प्रहार किया, और उस महाकपि ने अपनी गर्जना से राक्षसों को थर्रा दिया।

श्लोक 26 (yuddha.70.26)

स मुष्टिनिष्पिष्टविभिन्नमूर्धा निर्वान्तदन्ताक्षिविलम्बिजिह्वः । देवान्तको राक्षसराजसूनुः गतासुरुर्व्यां सहसा पपात ॥ 70.26 ॥

sa muṣṭiniṣpiṣṭavibhinnamūrdhā nirvāntadantākṣivilambijihvaḥ | devāntako rākṣasarājasūnuḥ gatāsururvyāṃ sahasā papāta || 70.26 ||

मुट्ठी से चूर्ण होकर उसका सिर फट गया, दाँत और आँखें बाहर निकल आईं, जीभ लटक गई -- राक्षसराज का वह पुत्र देवान्तक प्राणहीन होकर तत्क्षण पृथ्वी पर गिर पड़ा।

श्लोक 27 (yuddha.70.27)

तस्मिन् हते राक्षसयोधमुख्ये महाबले संयति देवशत्रौ । क्रुद्धस्त्रिशीर्षा निशितास्त्रमुग्रं ववर्ष नीलोरसि बाणवर्षम् ॥ 70.27 ॥

tasmin hate rākṣasayodhamukhye mahābale saṃyati devaśatrau | kruddhastriśīrṣā niśitāstramugraṃ vavarṣa nīlorasi bāṇavarṣam || 70.27 ||

उस देवशत्रु, महाबली और श्रेष्ठ राक्षस-योद्धा के मारे जाने पर, क्रुद्ध त्रिशिरा ने नील की छाती पर तीक्ष्ण और भयंकर बाणों की वर्षा कर दी।

श्लोक 28 (yuddha.70.28)

महोदरस्तु संक्रुद्धः कुञ्जरं पर्वतोपमम् । भूयः समधिरुह्याशु मन्दरं रश्मिवानिव ॥ 70.28 ॥

mahodarastu saṃkruddhaḥ kuñjaraṃ parvatopamam | bhūyaḥ samadhiruhyāśu mandaraṃ raśmivāniva || 70.28 ||

महोदर भी क्रुद्ध होकर पुनः पर्वत के समान अपने गजराज पर चढ़ गया, जैसे सूर्य मन्दराचल पर चढ़ जाता है।

श्लोक 29 (yuddha.70.29)

ततो बाणमयं वर्षं नीलस्योपर्यपातयत् । गिरौ वर्षं तडिच्चक्रचापवानिव तोयदः ॥ 70.29 ॥

tato bāṇamayaṃ varṣaṃ nīlasyoparyapātayat | girau varṣaṃ taḍiccakracāpavāniva toyadaḥ || 70.29 ||

फिर उसने नील पर बाणों की वर्षा की, जैसे बिजली और इन्द्रधनुष से सुशोभित मेघ पर्वत पर जल-वर्षा करता है।

श्लोक 30 (yuddha.70.30)

ततः शरौघैरभिवृष्यमाणो विभिन्नगात्रः कपिसैन्यपालः । नीलो बभूवाथ विसृष्टगात्रो विष्टम्भितस्तेन महाबलेन ॥ 70.30 ॥

tataḥ śaraughairabhivṛṣyamāṇo vibhinnagātraḥ kapisainyapālaḥ | nīlo babhūvātha visṛṣṭagātro viṣṭambhitastena mahābalena || 70.30 ||

उस बाण-वर्षा से घायल होकर, वानर-सेनापति नील का शरीर छिन्न-भिन्न हो गया, और वह उस महाबली से अवरुद्ध होकर शिथिल पड़ गया।

श्लोक 31 (yuddha.70.31)

ततस्तु नीलः प्रतिलब्धसंज्ञः शैलं समुत्पाट्य सवृक्षखण्डम् । ततः समुत्पत्य महोग्रवेगो महोदरं तेन जघान मूर्ध्नि ॥ 70.31 ॥

tatastu nīlaḥ pratilabdhasaṃjñaḥ śailaṃ samutpāṭya savṛkṣakhaṇḍam | tataḥ samutpatya mahogravego mahodaraṃ tena jaghāna mūrdhni || 70.31 ||

किन्तु नील ने पुनः चेतना पाकर, वृक्षों सहित एक पर्वत-खण्ड उखाड़ा, और अत्यन्त वेग से उछलकर उससे महोदर के सिर पर प्रहार किया।

श्लोक 32 (yuddha.70.32)

ततः स शैलाभिनिपातभग्नो महोदरस्तेन महाद्विपेन । व्यामोहितो भूमितले गतासुः पपात वज्राभिहतो यथाद्रिः ॥ 70.32 ॥

tataḥ sa śailābhinipātabhagno mahodarastena mahādvipena | vyāmohito bhūmitale gatāsuḥ papāta vajrābhihato yathādriḥ || 70.32 ||

तब पर्वत के प्रहार से चूर होकर, महोदर उस महागज सहित मूर्च्छित होकर प्राणहीन भूमि पर गिर पड़ा, मानो वज्र से आहत कोई पर्वत हो।

श्लोक 33 (yuddha.70.33)

पितृव्यं निहतं दृष्ट्वा त्रिशिराश्चापमाददे । हनूमन्तं च संक्रुद्धो विव्याध निशितैः शरैः ॥ 70.33 ॥

pitṛvyaṃ nihataṃ dṛṣṭvā triśirāścāpamādade | hanūmantaṃ ca saṃkruddho vivyādha niśitaiḥ śaraiḥ || 70.33 ||

अपने चाचा को मारा गया देखकर त्रिशिरा ने धनुष उठाया, और क्रुद्ध होकर हनुमान् को तीक्ष्ण बाणों से बींध डाला।

श्लोक 34 (yuddha.70.34)

स वायुसूनुः कुपितश्चिक्षेप शिखरं गिरेः । त्रिशिरास्तच्छरैस्तीक्ष्णैर्बिभेद बहुधा बली ॥ 70.34 ॥

sa vāyusūnuḥ kupitaścikṣepa śikharaṃ gireḥ | triśirāstaccharaistīkṣṇairbibheda bahudhā balī || 70.34 ||

क्रुद्ध वायुपुत्र ने एक पर्वत-शिखर फेंका, किन्तु बलवान् त्रिशिरा ने उसे अपने तीक्ष्ण बाणों से अनेक टुकड़ों में तोड़ डाला।

श्लोक 35 (yuddha.70.35)

तद् व्यर्थं शिखरं दृष्ट्वा द्रुमवर्षं तदा कपिः । विससर्ज रणे तस्मिन् रावणस्य सुतं प्रति ॥ 70.35 ॥

tad vyarthaṃ śikharaṃ dṛṣṭvā drumavarṣaṃ tadā kapiḥ | visasarja raṇe tasmin rāvaṇasya sutaṃ prati || 70.35 ||

वह शिखर व्यर्थ गया देखकर, उस कपि ने युद्ध में रावण-पुत्र पर वृक्षों की वर्षा कर दी।

श्लोक 36 (yuddha.70.36)

तमापतन्तमाकाशे द्रुमवर्षं प्रतापवान् । त्रिशिरा निशितैर्बाणैश्चिच्छेद च ननाद च ॥ 70.36 ॥

tamāpatantamākāśe drumavarṣaṃ pratāpavān | triśirā niśitairbāṇaiściccheda ca nanāda ca || 70.36 ||

आकाश में आती हुई उस वृक्ष-वर्षा को प्रतापी त्रिशिरा ने अपने तीक्ष्ण बाणों से काट डाला और गर्जना की।

श्लोक 37 (yuddha.70.37)

हनूमांस्तु समुत्पत्य हयं त्रिशिरसस्तदा । विददार नखैः क्रुद्धो नागेन्द्रं मृगराडिव ॥ 70.37 ॥

hanūmāṃstu samutpatya hayaṃ triśirasastadā | vidadāra nakhaiḥ kruddho nāgendraṃ mṛgarāḍiva || 70.37 ||

तब हनुमान् ने उछलकर त्रिशिरा के अश्व को अपने नखों से विदीर्ण कर दिया, जैसे सिंह किसी गजराज को फाड़ डालता है।

श्लोक 38 (yuddha.70.38)

अथ शक्तिं समासाद्य कालरात्रिमिवान्तकः । चिक्षेपानिलपुत्राय त्रिशिरा रावणात्मजः ॥ 70.38 ॥

atha śaktiṃ samāsādya kālarātrimivāntakaḥ | cikṣepānilaputrāya triśirā rāvaṇātmajaḥ || 70.38 ||

तब रावण-पुत्र त्रिशिरा ने कालरात्रि के समान एक शक्ति उठाकर, यमराज के समान वायुपुत्र पर फेंकी।

श्लोक 39 (yuddha.70.39)

दिवः क्षिप्तामिवोल्कां तां शक्तिं क्षिप्तामसङ्गताम् । गृहीत्वा हरिशार्दूलो बभञ्ज च ननाद च ॥ 70.39 ॥

divaḥ kṣiptāmivolkāṃ tāṃ śaktiṃ kṣiptāmasaṅgatām | gṛhītvā hariśārdūlo babhañja ca nanāda ca || 70.39 ||

आकाश से गिरती उल्का के समान बिना किसी आधार के आती हुई उस शक्ति को कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने पकड़कर तोड़ डाला, और गर्जना की।

श्लोक 40 (yuddha.70.40)

तां दृष्ट्वा घोरसंकाशां शक्तिं भग्नां हनूमता । प्रहृष्टा वानरगणा विनेदुर्जलदा यथा ॥ 70.40 ॥

tāṃ dṛṣṭvā ghorasaṃkāśāṃ śaktiṃ bhagnāṃ hanūmatā | prahṛṣṭā vānaragaṇā vinedurjaladā yathā || 70.40 ||

भयंकर उस शक्ति को हनुमान् द्वारा टूटा देखकर, वानर-समूह हर्षित होकर मेघों के समान गरज उठे।

श्लोक 41 (yuddha.70.41)

ततः खड्गं समुद्यम्य त्रिशिरा राक्षसोत्तमः । निचखान तदा खड्गं वानरेन्द्रस्य वक्षसि ॥ 70.41 ॥

tataḥ khaḍgaṃ samudyamya triśirā rākṣasottamaḥ | nicakhāna tadā khaḍgaṃ vānarendrasya vakṣasi || 70.41 ||

तब श्रेष्ठ राक्षस त्रिशिरा ने खड्ग उठाकर उस खड्ग को वानरराज हनुमान् की छाती में घोंप दिया।

श्लोक 42 (yuddha.70.42)

खड्गप्रहाराभिहतो हनूमान् मारुतात्मजः । आजघान त्रिमूर्धानं तलेनोरसि वीर्यवान् ॥ 70.42 ॥

khaḍgaprahārābhihato hanūmān mārutātmajaḥ | ājaghāna trimūrdhānaṃ talenorasi vīryavān || 70.42 ||

खड्ग के प्रहार से आहत होकर भी, बलशाली वायुपुत्र हनुमान् ने अपनी हथेली से त्रिशिरा की छाती पर प्रहार किया।

श्लोक 43 (yuddha.70.43)

स तलाभिहतस्तेन स्रस्तहस्तायुधो भुवि । निपपात महातेजास्त्रिशिरास्त्यक्तचेतनः ॥ 70.43 ॥

sa talābhihatastena srastahastāyudho bhuvi | nipapāta mahātejāstriśirāstyaktacetanaḥ || 70.43 ||

उस हथेली के प्रहार से आहत होकर, हाथ से शस्त्र गिरा और महातेजस्वी त्रिशिरा चेतनाहीन होकर भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 44 (yuddha.70.44)

स तस्य पततः खड्गं तमाच्छिद्य महाकपिः । ननाद गिरिसंकाशस्त्रासयन् सर्वराक्षसान् ॥ 70.44 ॥

sa tasya patataḥ khaḍgaṃ tamācchidya mahākapiḥ | nanāda girisaṃkāśastrāsayan sarvarākṣasān || 70.44 ||

गिरते हुए उससे उसका खड्ग छीनकर, महाकपि हनुमान् पर्वत के समान गर्जना करने लगा, जिससे समस्त राक्षस भयभीत हो उठे।

श्लोक 45 (yuddha.70.45)

अमृष्यमाणस्तं घोषमुत्पपात निशाचरः । उत्पत्य च हनूमन्तं ताडयामास मुष्टिना ॥ 70.45 ॥

amṛṣyamāṇastaṃ ghoṣamutpapāta niśācaraḥ | utpatya ca hanūmantaṃ tāḍayāmāsa muṣṭinā || 70.45 ||

वह गर्जना सहन न कर सकने के कारण वह राक्षस उछल पड़ा, और उछलकर उसने हनुमान् को अपनी मुट्ठी से प्रहार किया।

श्लोक 46 (yuddha.70.46)

तेन मुष्टिप्रहारेण संचुकोप महाकपिः । कुपितश्च निजग्राह किरीटे राक्षसर्षभम् ॥ 70.46 ॥

tena muṣṭiprahāreṇa saṃcukopa mahākapiḥ | kupitaśca nijagrāha kirīṭe rākṣasarṣabham || 70.46 ||

उस मुष्टि-प्रहार से महाकपि अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा, और क्रोध में उसने उस श्रेष्ठ राक्षस के मुकुट को पकड़ लिया।

श्लोक 47 (yuddha.70.47)

स तस्य शीर्षाण्यसिना शितेन किरीटजुष्टानि सकुण्डलानि । क्रुद्धः प्रचिच्छेद सुतोऽनिलस्य त्वष्टुः सुतस्येव शिरांसि शक्रः ॥ 70.47 ॥

sa tasya śīrṣāṇyasinā śitena kirīṭajuṣṭāni sakuṇḍalāni | kruddhaḥ praciccheda suto'nilasya tvaṣṭuḥ sutasyeva śirāṃsi śakraḥ || 70.47 ||

क्रुद्ध वायुपुत्र ने उसी तीक्ष्ण खड्ग से उसके मुकुट और कुण्डलों सहित सिरों को इस प्रकार काट डाला, जैसे इन्द्र ने त्वष्टा के पुत्र वृत्रासुर के सिर काटे थे।

श्लोक 48 (yuddha.70.48)

तान्यायताक्षाण्यगसंनिभानि प्रदीप्तवैश्वानरलोचनानि । पेतुः शिरांसीन्द्ररिपोः पृथिव्यां ज्योतींषि मुक्तानि यथार्कमार्गात् ॥ 70.48 ॥

tānyāyatākṣāṇyagasaṃnibhāni pradīptavaiśvānaralocanāni | petuḥ śirāṃsīndraripoḥ pṛthivyāṃ jyotīṃṣi muktāni yathārkamārgāt || 70.48 ||

पर्वत के समान विशाल, विशाल नेत्रों वाले और अग्नि के समान प्रज्वलित नेत्रों वाले वे सिर, इन्द्रशत्रु त्रिशिरा के, पृथ्वी पर इस प्रकार गिरे जैसे सूर्य-मार्ग से छूटी हुई ज्योतियाँ गिरती हैं।

श्लोक 49 (yuddha.70.49)

तस्मिन् हते देवरिपौ त्रिशीर्षे हनूमता शक्रपराक्रमेण । नेदुः प्लवंगाः प्रचचाल भूमी रक्षांस्यथो दुद्रुविरे समन्तात् ॥ 70.49 ॥

tasmin hate devaripau triśīrṣe hanūmatā śakraparākrameṇa | neduḥ plavaṃgāḥ pracacāla bhūmī rakṣāṃsyatho dudruvire samantāt || 70.49 ||

इन्द्र के समान पराक्रमी हनुमान् द्वारा उस देवशत्रु त्रिशिरा के मारे जाने पर, वानर गर्जना करने लगे, पृथ्वी काँप उठी, और राक्षस चारों ओर भाग खड़े हुए।

श्लोक 50 (yuddha.70.50)

हतं त्रिशिरसं दृष्ट्वा तथैव च महोदरम् । हतौ प्रेक्ष्य दुराधर्षौ देवान्तकनरान्तकौ ॥ 70.50 ॥

hataṃ triśirasaṃ dṛṣṭvā tathaiva ca mahodaram | hatau prekṣya durādharṣau devāntakanarāntakau || 70.50 ||

त्रिशिरा को और साथ ही महोदर को मारा गया देखकर, और दुर्दम्य देवान्तक तथा नरान्तक को भी मृत देखकर --

श्लोक 51 (yuddha.70.51)

चुकोप परमामर्षी मत्तो राक्षसपुङ्गवः । जग्राहार्चिष्मतीं चापि गदां सर्वायसीं तदा ॥ 70.51 ॥

cukopa paramāmarṣī matto rākṣasapuṅgavaḥ | jagrāhārciṣmatīṃ cāpi gadāṃ sarvāyasīṃ tadā || 70.51 ||

-- अत्यन्त क्रोधी और उन्मत्त श्रेष्ठ राक्षस महापार्श्व क्रोध से जल उठा, और उसने अपनी वह प्रज्वलित, पूर्णतः लोहे की, शुभ गदा उठा ली,

श्लोक 52 (yuddha.70.52)

हेमपट्टपरिक्षिप्तां मांसशोणितफेनिलाम् । विराजमानां विपुलां शत्रुशोणिततर्पिताम् ॥ 70.52 ॥

hemapaṭṭaparikṣiptāṃ māṃsaśoṇitaphenilām | virājamānāṃ vipulāṃ śatruśoṇitatarpitām || 70.52 ||

जो सोने के पत्तरों से बँधी थी, मांस और रक्त के फेन से लथपथ थी, विशाल और शोभायमान थी, शत्रुओं के रक्त से तृप्त थी,

श्लोक 53 (yuddha.70.53)

तेजसा सम्प्रदीप्ताग्रां रक्तमाल्यविभूषिताम् । ऐरावतमहापद्मसार्वभौमभयावहाम् ॥ 70.53 ॥

tejasā sampradīptāgrāṃ raktamālyavibhūṣitām | airāvatamahāpadmasārvabhaumabhayāvahām || 70.53 ||

जिसका अग्रभाग तेज से प्रज्वलित था, जो लाल पुष्पमालाओं से सुशोभित थी, और जो ऐरावत, महापद्म तथा सार्वभौम जैसे दिक्पाल-गजों को भी भयभीत कर देती थी।

श्लोक 54 (yuddha.70.54)

गदामादाय संक्रुद्धो मत्तो राक्षसपुङ्गवः । हरीन् समभिदुद्राव युगान्ताग्निरिव ज्वलन् ॥ 70.54 ॥

gadāmādāya saṃkruddho matto rākṣasapuṅgavaḥ | harīn samabhidudrāva yugāntāgniriva jvalan || 70.54 ||

उस गदा को लेकर क्रुद्ध और उन्मत्त श्रेष्ठ राक्षस महापार्श्व वानरों पर टूट पड़ा, मानो प्रलयकाल की अग्नि प्रज्वलित हो उठी हो।

श्लोक 55 (yuddha.70.55)

अथर्षभः समुत्पत्य वानरो रावणानुजम् । मत्तानीकमुपागम्य तस्थौ तस्याग्रतो बली ॥ 70.55 ॥

atharṣabhaḥ samutpatya vānaro rāvaṇānujam | mattānīkamupāgamya tasthau tasyāgrato balī || 70.55 ||

तब वानर-वीर ऋषभ उछलकर, उस उन्मत्त सेनानायक रावण-अनुज महापार्श्व के सामने जाकर खड़ा हो गया।

श्लोक 56 (yuddha.70.56)

तं पुरस्तात् स्थितं दृष्ट्वा वानरं पर्वतोपमम् । आजघानोरसि क्रुद्धो गदया वज्रकल्पया ॥ 70.56 ॥

taṃ purastāt sthitaṃ dṛṣṭvā vānaraṃ parvatopamam | ājaghānorasi kruddho gadayā vajrakalpayā || 70.56 ||

सामने खड़े पर्वत के समान उस वानर को देखकर, क्रुद्ध महापार्श्व ने वज्र के समान गदा से उसकी छाती पर प्रहार किया।

श्लोक 57 (yuddha.70.57)

स तयाभिहतस्तेन गदया वानरर्षभः । भिन्नवक्षाः समाधूतः सुस्राव रुधिरं बहु ॥ 70.57 ॥

sa tayābhihatastena gadayā vānararṣabhaḥ | bhinnavakṣāḥ samādhūtaḥ susrāva rudhiraṃ bahu || 70.57 ||

उस गदा के प्रहार से आहत होकर, वानरश्रेष्ठ ऋषभ की छाती फट गई, वह डगमगा गया और उसने बहुत रक्त बहाया।

श्लोक 58 (yuddha.70.58)

स सम्प्राप्य चिरात् संज्ञामृषभो वानरेश्वरः । क्रुद्धो विस्फुरमाणौष्ठो महापार्श्वमुदैक्षत ॥ 70.58 ॥

sa samprāpya cirāt saṃjñāmṛṣabho vānareśvaraḥ | kruddho visphuramāṇauṣṭho mahāpārśvamudaikṣata || 70.58 ||

बहुत देर बाद चेतना पाकर वानरराज ऋषभ क्रुद्ध होकर, अपने होंठ फड़फड़ाते हुए महापार्श्व की ओर देखने लगा।

श्लोक 59 (yuddha.70.59)

स वेगवान् वेगवदभ्युपेत्य तं राक्षसं वानरवीरमुख्यः । संवर्त्य मुष्टिं सहसा जघान बाह्वन्तरे शैलनिकाशरूपः ॥ 70.59 ॥

sa vegavān vegavadabhyupetya taṃ rākṣasaṃ vānaravīramukhyaḥ | saṃvartya muṣṭiṃ sahasā jaghāna bāhvantare śailanikāśarūpaḥ || 70.59 ||

पर्वत के समान वेगवान् वह वानर-वीरश्रेष्ठ, समान वेग से उस राक्षस के सामने आकर, अपनी मुट्ठी बाँधकर सहसा उसकी दोनों भुजाओं के बीच प्रहार किया।

श्लोक 60 (yuddha.70.60)

स कृत्तमूलः सहसेव वृक्षः क्षितौ पपात क्षतजोक्षिताङ्गः । तां चास्य घोरां यमदण्डकल्पां गदां प्रगृह्याशु तदा ननाद ॥ 70.60 ॥

sa kṛttamūlaḥ sahaseva vṛkṣaḥ kṣitau papāta kṣatajokṣitāṅgaḥ | tāṃ cāsya ghorāṃ yamadaṇḍakalpāṃ gadāṃ pragṛhyāśu tadā nanāda || 70.60 ||

जड़ से कटे वृक्ष के समान वह रक्त से लथपथ अंगों सहित भूमि पर गिर पड़ा; तब ऋषभ ने उसकी वह यमदण्ड के समान भयंकर गदा उठाकर गर्जना की।

श्लोक 61 (yuddha.70.61)

मुहूर्तमासीत् स गतासुकल्पः प्रत्यागतात्मा सहसा सुरारिः । उत्पत्य सन्ध्याभ्रसमानवर्णः तं वारिराजात्मजमाजघान ॥ 70.61 ॥

muhūrtamāsīt sa gatāsukalpaḥ pratyāgatātmā sahasā surāriḥ | utpatya sandhyābhrasamānavarṇaḥ taṃ vārirājātmajamājaghāna || 70.61 ||

वह देवशत्रु क्षणभर के लिए मानो प्राणहीन-सा पड़ा रहा, फिर सहसा चेतना लौट आने पर, सन्ध्याकालीन मेघ के समान वर्ण वाला वह उठकर जलराज-पुत्र ऋषभ पर टूट पड़ा।

श्लोक 62 (yuddha.70.62)

स मूर्च्छितो भूमितले पपात मुहूर्तमुत्पत्य पुनः ससंज्ञः । तामेव तस्याद्रिवराद्रिकल्पां गदां समाविध्य जघान संख्ये ॥ 70.62 ॥

sa mūrcchito bhūmitale papāta muhūrtamutpatya punaḥ sasaṃjñaḥ | tāmeva tasyādrivarādrikalpāṃ gadāṃ samāvidhya jaghāna saṃkhye || 70.62 ||

ऋषभ मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा; क्षणभर बाद पुनः चेतना पाकर, उसने उसी श्रेष्ठ पर्वत के समान गदा को घुमाकर युद्ध में उस पर प्रहार किया।

श्लोक 63 (yuddha.70.63)

सा तस्य रौद्रा समुपेत्य देहं रौद्रस्य देवाध्वरविप्रशत्रोः । बिभेद वक्षः क्षतजं च भूरि सुस्राव धात्वम्भ इवाद्रिराजः ॥ 70.63 ॥

sā tasya raudrā samupetya dehaṃ raudrasya devādhvaravipraśatroḥ | bibheda vakṣaḥ kṣatajaṃ ca bhūri susrāva dhātvambha ivādrirājaḥ || 70.63 ||

उस भयंकर गदा ने देवताओं, यज्ञों और ब्राह्मणों के उस भयंकर शत्रु के शरीर तक पहुँचकर उसकी छाती चीर डाली, और उसमें से पर्वतराज से बहते धातु-जल के समान प्रचुर रक्त बहने लगा।

श्लोक 64 (yuddha.70.64)

अभिदुद्राव वेगेन गदां तस्य महात्मनः । तां गृहीत्वा गदां भीमामाविध्य च पुनः पुनः ॥ 70.64 ॥

abhidudrāva vegena gadāṃ tasya mahātmanaḥ | tāṃ gṛhītvā gadāṃ bhīmāmāvidhya ca punaḥ punaḥ || 70.64 ||

वह वेगपूर्वक उस महात्मा राक्षस की गदा की ओर झपटा, और उस भयंकर गदा को पकड़कर बार-बार घुमाया,

श्लोक 65 (yuddha.70.65)

मत्तानीकं महात्मा स जघान रणमूर्धनि । स स्वया गदया भग्नो विशीर्णदशनेक्षणः ॥ 70.65 ॥

mattānīkaṃ mahātmā sa jaghāna raṇamūrdhani | sa svayā gadayā bhagno viśīrṇadaśanekṣaṇaḥ || 70.65 ||

और उस महात्मा वानर ने युद्ध के अग्रभाग में उस उन्मत्त राक्षस पर प्रहार किया; वह अपनी ही गदा से चूर्ण होकर, दाँत और आँखें बिखर गईं,

श्लोक 66 (yuddha.70.66)

निपपात तदा मत्तो वज्राहत इवाचलः । विशीर्णनयने भूमौ गतसत्त्वे गतायुषि । पतिते राक्षसे तस्मिन् विद्रुतं राक्षसं बलम् ॥ 70.66 ॥

nipapāta tadā matto vajrāhata ivācalaḥ | viśīrṇanayane bhūmau gatasattve gatāyuṣi | patite rākṣase tasmin vidrutaṃ rākṣasaṃ balam || 70.66 ||

और वह उन्मत्त राक्षस वज्र से आहत पर्वत के समान गिर पड़ा -- नेत्र नष्ट, भूमि पर पड़ा, शक्तिहीन और प्राणहीन। उस राक्षस के गिरते ही राक्षस-सेना भाग खड़ी हुई।

श्लोक 67 (yuddha.70.67)

तस्मिन् हते भ्रातरि रावणस्य तन्नैर्ऋतानां बलमर्णवाभम् । त्यक्तायुधं केवलजीवितार्थं दुद्राव भिन्नार्णवसंनिकाशम् ॥ 70.67 ॥

tasmin hate bhrātari rāvaṇasya tannairṛtānāṃ balamarṇavābham | tyaktāyudhaṃ kevalajīvitārthaṃ dudrāva bhinnārṇavasaṃnikāśam || 70.67 ||

रावण के उस भाई के मारे जाने पर, समुद्र के समान विशाल वह राक्षस-सेना, अपने शस्त्र त्यागकर केवल प्राण बचाने के लिए, टूटे हुए समुद्र के समान इधर-उधर भाग खड़ी हुई।

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