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युद्धकाण्ड · सर्ग 71

अतिकाय-वध

सर्ग 70सर्ग-सूचीसर्ग 72

श्लोक 1 (yuddha.71.1)

स्वबलम् व्यथितम् दृष्ट्वा तुमुलं लोमहर्षणम् । भ्रातॄंश्च निहतान्दृष्ट्वा शक्रतुल्यपराक्रमान् ॥ 71.1 ॥

svabalam vyathitam dṛṣṭvā tumulaṃ lomaharṣaṇam | bhrātṝṃśca nihatāndṛṣṭvā śakratulyaparākramān || 71.1 ||

अपनी सेना को व्याकुल, कोलाहलपूर्ण और रोमांचित देखकर, तथा इन्द्र के समान पराक्रमी अपने भाइयों को मारा गया देखकर,

श्लोक 2 (yuddha.71.2)

पितृव्यौ चापि सन्दृश्य समरे संनिषूदितौ । युद्धोन्मत्तम् च मत्तम् च भ्रातरौ राक्षसर्षभौ ॥ 71.2 ॥

pitṛvyau cāpi sandṛśya samare saṃniṣūditau | yuddhonmattam ca mattam ca bhrātarau rākṣasarṣabhau || 71.2 ||

तथा युद्ध में मारे गए अपने दोनों चाचाओं — राक्षस-श्रेष्ठ युद्धोन्मत्त और मत्त — को देखकर,

श्लोक 3 (yuddha.71.3)

चुकोप च महातेजा ब्रह्मदत्तवरो युधि । अतिकायोऽद्रिसङ्काशो देवदानवदर्पहा ॥ 71.3 ॥

cukopa ca mahātejā brahmadattavaro yudhi | atikāyo'drisaṅkāśo devadānavadarpahā || 71.3 ||

ब्रह्मा के वरदान से युक्त, पर्वत के समान विशालकाय, देवों और दानवों का गर्व चूर करने वाले महातेजस्वी अतिकाय युद्ध में क्रोधित हो उठे।

श्लोक 4 (yuddha.71.4)

स भास्करसहस्रस्य सङ्घातमिव भास्वरम् । रथमास्थाय शक्रारिरभिदुद्राव वानरान् ॥ 71.4 ॥

sa bhāskarasahasrasya saṅghātamiva bhāsvaram | rathamāsthāya śakrārirabhidudrāva vānarān || 71.4 ||

सहस्र सूर्यों के समूह के समान देदीप्यमान रथ पर चढ़कर इन्द्र के उस शत्रु ने वानरों पर आक्रमण किया।

श्लोक 5 (yuddha.71.5)

स विस्फार्य तदा चापम् किरीटी मृष्टकुण्डलः । नाम संश्रावयामास ननाद च महास्वनम् ॥ 71.5 ॥

sa visphārya tadā cāpam kirīṭī mṛṣṭakuṇḍalaḥ | nāma saṃśrāvayāmāsa nanāda ca mahāsvanam || 71.5 ||

मुकुट और चमकते कुण्डल पहने हुए उसने अपना धनुष खींचा, अपना नाम गुँजा दिया और भीषण गर्जना की।

श्लोक 6 (yuddha.71.6)

तेन सिम्हप्रणादेन नामविश्रावणेन च । ज्याशब्देन च भीमेन त्रासयामास वानरान् ॥ 71.6 ॥

tena simhapraṇādena nāmaviśrāvaṇena ca | jyāśabdena ca bhīmena trāsayāmāsa vānarān || 71.6 ||

उस सिंह-गर्जना से, अपने नाम की घोषणा से और धनुष की भयंकर टंकार से उसने वानरों को भयभीत कर दिया।

श्लोक 7 (yuddha.71.7)

ते दृष्ट्वा देहमाहात्म्यम् कुम्भकर्णोऽयमुत्थितः । भयार्ता वानराः सर्वे संश्रयन्ते परस्परम् ॥ 71.7 ॥

te dṛṣṭvā dehamāhātmyam kumbhakarṇo'yamutthitaḥ | bhayārtā vānarāḥ sarve saṃśrayante parasparam || 71.7 ||

उसके विशाल शरीर की महिमा देखकर 'यह तो कुम्भकर्ण ही फिर उठ खड़ा हुआ है' यह सोचकर सभी वानर भयभीत होकर एक-दूसरे की शरण लेने लगे।

श्लोक 8 (yuddha.71.8)

ते तस्य रूपमालोक्य यथा विष्णोस्त्रिविक्रमे । भयाद्वानरयोधास्ते विद्रवन्ति ततस्ततः ॥ 71.8 ॥

te tasya rūpamālokya yathā viṣṇostrivikrame | bhayādvānarayodhāste vidravanti tatastataḥ || 71.8 ||

उसके रूप को त्रिविक्रम रूपी विष्णु के समान देखकर वे वानर-योद्धा भय से इधर-उधर भाग खड़े हुए।

श्लोक 9 (yuddha.71.9)

तेऽतिकायम् समासाद्य वानरा मूढचेतसः । शरण्यम् शरणम् जग्मुर्लक्ष्मणाग्रजमाहवे ॥ 71.9 ॥

te'tikāyam samāsādya vānarā mūḍhacetasaḥ | śaraṇyam śaraṇam jagmurlakṣmaṇāgrajamāhave || 71.9 ||

अतिकाय के सामने आकर व्याकुल-चित्त वानर उस युद्ध में शरण देने वाले लक्ष्मण के अग्रज राम की शरण में गए।

श्लोक 10 (yuddha.71.10)

ततोऽतिकायम् काकुत्स्थो रथस्थं पर्वतोपमम् । ददर्श धन्विनम् दूराद्गर्जन्तं कालमेघवत् ॥ 71.10 ॥

tato'tikāyam kākutstho rathasthaṃ parvatopamam | dadarśa dhanvinam dūrādgarjantaṃ kālameghavat || 71.10 ||

तब काकुत्स्थ राम ने दूर से ही पर्वत के समान, रथ पर खड़े, धनुषधारी, प्रलयकालीन मेघ के समान गरजते हुए अतिकाय को देखा।

श्लोक 11 (yuddha.71.11)

स तम् दृष्ट्वा महाकायम् राघवस्तु सुविस्मितः । वानरान्सान्त्वयित्वा च विभीषणमुवाच ह ॥ 71.11 ॥

sa tam dṛṣṭvā mahākāyam rāghavastu suvismitaḥ | vānarānsāntvayitvā ca vibhīṣaṇamuvāca ha || 71.11 ||

उस विशालकाय को देखकर राघव अत्यंत विस्मित हुए, और वानरों को सांत्वना देकर विभीषण से बोले।

श्लोक 12 (yuddha.71.12)

कोऽसौ पर्वतसङ्काशो धनुष्मान्हरिलोचनः । युक्ते हयसहस्रेण विशाले स्यन्दने स्थितः ॥ 71.12 ॥

ko'sau parvatasaṅkāśo dhanuṣmānharilocanaḥ | yukte hayasahasreṇa viśāle syandane sthitaḥ || 71.12 ||

'यह पर्वत के समान, धनुषधारी, सिंह-सी आँखों वाला, हज़ार घोड़ों से जुते हुए विशाल रथ पर खड़ा कौन है?

श्लोक 13 (yuddha.71.13)

य एष निशितैः शूलैः सुतीक्ष्णैः प्रासतोमरैः । अर्चिष्मद्भिर्वृतो भाति भूतैरिव महेश्वरः ॥ 71.13 ॥

ya eṣa niśitaiḥ śūlaiḥ sutīkṣṇaiḥ prāsatomaraiḥ | arciṣmadbhirvṛto bhāti bhūtairiva maheśvaraḥ || 71.13 ||

जो तीक्ष्ण त्रिशूलों, अत्यंत तीखे भालों और बरछों से घिरा हुआ, अपने गणों से घिरे महेश्वर के समान देदीप्यमान दिख रहा है,

श्लोक 14 (yuddha.71.14)

कालजिह्वाप्रकाशाभिर्य एषोऽभिविराजते । आवृतो रथशक्तीभिर्विद्युद्भिरिव तोयदः ॥ 71.14 ॥

kālajihvāprakāśābhirya eṣo'bhivirājate | āvṛto rathaśaktībhirvidyudbhiriva toyadaḥ || 71.14 ||

जो काल की जिह्वाओं के समान चमकती हुई रथ-शक्तियों से घिरा हुआ, बिजलियों से घिरे मेघ के समान सुशोभित हो रहा है —

श्लोक 15 (yuddha.71.15)

धनूंसि चास्य सज्यानि हेमपृष्ठानि सर्वशः । शोभयन्ति रथश्रेष्ठम् शक्रपातमिवाम्बरम् ॥ 71.15 ॥

dhanūṃsi cāsya sajyāni hemapṛṣṭhāni sarvaśaḥ | śobhayanti rathaśreṣṭham śakrapātamivāmbaram || 71.15 ||

उसके स्वर्ण-पृष्ठ प्रत्यंचित धनुष उस श्रेष्ठ रथ को इस तरह सुशोभित कर रहे हैं जैसे इन्द्रधनुष आकाश को।

श्लोक 16 (yuddha.71.16)

य एष रक्षः शार्दूलो रणभूमिम् विराजयन् । अभ्येति रथिनाम् श्रेष्ठो रथेनादित्यतेजसा ॥ 71.16 ॥

ya eṣa rakṣaḥ śārdūlo raṇabhūmim virājayan | abhyeti rathinām śreṣṭho rathenādityatejasā || 71.16 ||

युद्धभूमि को सुशोभित करता हुआ वह राक्षस-शार्दूल, रथियों में श्रेष्ठ, सूर्य के तेज वाले रथ पर सवार होकर आ रहा है,

श्लोक 17 (yuddha.71.17)

ध्वजशृङ्गप्रतिष्ठेन राहुणाभिविराजते । सूर्यरश्मिप्रभैर्बाणैर्दिशो दश विराजयन् ॥ 71.17 ॥

dhvajaśṛṅgapratiṣṭhena rāhuṇābhivirājate | sūryaraśmiprabhairbāṇairdiśo daśa virājayan || 71.17 ||

जिसकी ध्वजा के शिखर पर राहु का चिह्न सुशोभित है, और जो सूर्य-किरणों के समान चमकते बाणों से दसों दिशाओं को आलोकित कर रहा है।'

श्लोक 18 (yuddha.71.18)

त्रिणतं मेघनिर्ह्रादम् हेमपृष्ठमलङ्कृतम् । शतक्रतुधनुःप्रख्यम् धनुश्चास्य विराजते ॥ 71.18 ॥

triṇataṃ meghanirhrādam hemapṛṣṭhamalaṅkṛtam | śatakratudhanuḥprakhyam dhanuścāsya virājate || 71.18 ||

उसका त्रिवक्र, मेघ के समान गर्जनशील, स्वर्ण-पृष्ठ से सुशोभित धनुष इन्द्र के धनुष के समान देदीप्यमान है।

श्लोक 19 (yuddha.71.19)

सध्वजः सपताकश्च सानुकर्षो महारथः । चतुःसादिसमायुक्तो मेघस्तनितनिस्वनः ॥ 71.19 ॥

sadhvajaḥ sapatākaśca sānukarṣo mahārathaḥ | catuḥsādisamāyukto meghastanitanisvanaḥ || 71.19 ||

ध्वजा और पताका सहित, धुरी-फलक से युक्त, चार सारथियों से सुसज्जित वह महारथ मेघ की गर्जना के समान गूँज रहा है।

श्लोक 20 (yuddha.71.20)

विंशतिर्दश चाष्टौ च तूणीररथमास्थिताः । कार्मुकाणि च भीमानि ज्याश्च काञ्चनपिङ्गलाः ॥ 71.20 ॥

viṃśatirdaśa cāṣṭau ca tūṇīrarathamāsthitāḥ | kārmukāṇi ca bhīmāni jyāśca kāñcanapiṅgalāḥ || 71.20 ||

उस रथ पर बीस तरकश, दस भयंकर धनुष, और सुनहरे-पिंगल रंग की आठ प्रत्यंचाएँ स्थित हैं।

श्लोक 21 (yuddha.71.21)

द्वौ च खड्गौ रथगतौ पार्श्वस्थौ पार्श्वशोभिनौ । चतुर्हस्तत्सरुचितौ व्यक्तहस्तदशायतौ ॥ 71.21 ॥

dvau ca khaḍgau rathagatau pārśvasthau pārśvaśobhinau | caturhastatsarucitau vyaktahastadaśāyatau || 71.21 ||

रथ पर दोनों ओर सुशोभित दो तलवारें भी हैं — जिनकी मूठें चार हाथ लंबी और फलक पूरे दस हाथ लंबे हैं।

श्लोक 22 (yuddha.71.22)

रक्तकण्ठगुणो धीरो महापर्वतसंनिभः । कालः कालमहावक्त्रो मेघस्थ इव भास्करः ॥ 71.22 ॥

raktakaṇṭhaguṇo dhīro mahāparvatasaṃnibhaḥ | kālaḥ kālamahāvaktro meghastha iva bhāskaraḥ || 71.22 ||

लाल माला से सुशोभित कण्ठ वाला वह धीर वीर, विशाल पर्वत के समान श्याम, काल के समान विकराल मुख वाला, मेघ में छिपे सूर्य के समान दीख रहा है।

श्लोक 23 (yuddha.71.23)

काञ्चनाङ्गदनद्धाभ्यां भुजाभ्यामेष शोभते । शृङ्गाभ्यामिव तुङ्गाभ्याम् हिमवान्पर्वतोत्तमः ॥ 71.23 ॥

kāñcanāṅgadanaddhābhyāṃ bhujābhyāmeṣa śobhate | śṛṅgābhyāmiva tuṅgābhyām himavānparvatottamaḥ || 71.23 ||

स्वर्ण के बाजूबंदों से बंधी अपनी दोनों भुजाओं से वह ऐसे सुशोभित है जैसे हिमालय अपने दो ऊँचे शिखरों से।

श्लोक 24 (yuddha.71.24)

कुण्डलाभ्याम् तु यस्यैतद्भाति वक्त्रम् शुभेक्षणम् । पुनर्वस्वन्तरगतं पूर्णबिम्बमिवैन्दवम् ॥ 71.24 ॥

kuṇḍalābhyām tu yasyaitadbhāti vaktram śubhekṣaṇam | punarvasvantaragataṃ pūrṇabimbamivaindavam || 71.24 ||

जिसका शुभ मुख दोनों कुण्डलों सहित, पुनर्वसु नक्षत्र के बीच स्थित पूर्ण चन्द्रबिम्ब के समान चमक रहा है।

श्लोक 25 (yuddha.71.25)

आचक्ष्व मे महाबाहो त्वमेनम् राक्षसोत्तमम् । यम् दृष्ट्वा वानराः सर्वे भयार्ता विद्रूता दिशः ॥ 71.25 ॥

ācakṣva me mahābāho tvamenam rākṣasottamam | yam dṛṣṭvā vānarāḥ sarve bhayārtā vidrūtā diśaḥ || 71.25 ||

'हे महाबाहो! मुझे बताओ, यह श्रेष्ठ राक्षस कौन है, जिसे देखकर सभी वानर भयभीत होकर दिशाओं में भाग गए हैं?'

श्लोक 26 (yuddha.71.26)

स पृष्ठो राजपुत्रेण रामेणामिततेजसा । आचचक्षे महातेजा राघवाय विभीषणः ॥ 71.26 ॥

sa pṛṣṭho rājaputreṇa rāmeṇāmitatejasā | ācacakṣe mahātejā rāghavāya vibhīṣaṇaḥ || 71.26 ||

अपार तेज वाले राजकुमार राम द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर महातेजस्वी विभीषण ने राघव को उत्तर दिया।

श्लोक 27 (yuddha.71.27)

दशग्रीवो महातेजा राजा वैश्रवणानुजः । भीमकर्मा महोत्साहो रावणो राक्षसाधिपः ॥ 71.27 ॥

daśagrīvo mahātejā rājā vaiśravaṇānujaḥ | bhīmakarmā mahotsāho rāvaṇo rākṣasādhipaḥ || 71.27 ||

'दस ग्रीवाओं वाला, महातेजस्वी, वैश्रवण का अनुज, भीषण कर्मों वाला और महान उत्साही राक्षसराज रावण ही राक्षसों का स्वामी है।

श्लोक 28 (yuddha.71.28)

तस्यासीद्वीर्यवान्पुत्रो रावणप्रतिमो रणे । वृद्धसेवी श्रुतधरः सर्वास्त्रविदुषाम् वरः ॥ 71.28 ॥

tasyāsīdvīryavānputro rāvaṇapratimo raṇe | vṛddhasevī śrutadharaḥ sarvāstraviduṣām varaḥ || 71.28 ||

उसका एक पराक्रमी पुत्र है, जो युद्ध में रावण के समान है, वृद्धों की सेवा करने वाला, सुनी हुई बातों को धारण करने वाला और सभी अस्त्रों के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ है,

श्लोक 29 (yuddha.71.29)

अश्वपृष्ठे रथे नागे खड्गे धनुषि कर्षणे । भेदे सान्त्वे च दाने च नये मन्त्रे च संमतः ॥ 71.29 ॥

aśvapṛṣṭhe rathe nāge khaḍge dhanuṣi karṣaṇe | bhede sāntve ca dāne ca naye mantre ca saṃmataḥ || 71.29 ||

अश्वारोहण, रथ-संचालन, गजारोहण, तलवार-चालन, धनुर्विद्या तथा भेद, साम, दान, नीति और मंत्र में भी वह प्रवीण माना जाता है।

श्लोक 30 (yuddha.71.30)

यस्य बाहुम् समाश्रित्य लङ्का भवति निर्भया । तनयम् धान्यमालिन्या अतिकायमिमम् विदुः ॥ 71.30 ॥

yasya bāhum samāśritya laṅkā bhavati nirbhayā | tanayam dhānyamālinyā atikāyamimam viduḥ || 71.30 ||

जिसकी भुजा का आश्रय लेकर लंका निर्भय हो जाती है — इसे धान्यमालिनी के पुत्र अतिकाय के रूप में जानो।

श्लोक 31 (yuddha.71.31)

एतेनाराधितो ब्रह्मा तपसा भावितात्मना । अस्त्राणि चाप्यवाप्तानि रिपवश्च पराजिताः ॥ 71.31 ॥

etenārādhito brahmā tapasā bhāvitātmanā | astrāṇi cāpyavāptāni ripavaśca parājitāḥ || 71.31 ||

तप से पवित्र आत्मा वाले इसने ब्रह्मा को प्रसन्न किया, दिव्य अस्त्र प्राप्त किए और शत्रुओं को पराजित किया।

श्लोक 32 (yuddha.71.32)

सुरासुरैरवध्यत्वम् दत्तमस्मै स्वयम्भुवा । एतच्च कवचम् दिव्यम् रथश्चैषोऽर्कभास्करः ॥ 71.32 ॥

surāsurairavadhyatvam dattamasmai svayambhuvā | etacca kavacam divyam rathaścaiṣo'rkabhāskaraḥ || 71.32 ||

स्वयम्भू ब्रह्मा ने इसे देवों और असुरों से अवध्यता का वरदान दिया, और यह दिव्य कवच तथा सूर्य के समान चमकता यह रथ भी दिया।

श्लोक 33 (yuddha.71.33)

एतेन शतशो देवा दानवाश्च पराजिताः । रक्षितानि च रक्षामि यक्षाश्चापि निषूदिताः ॥ 71.33 ॥

etena śataśo devā dānavāśca parājitāḥ | rakṣitāni ca rakṣāmi yakṣāścāpi niṣūditāḥ || 71.33 ||

इसने सैकड़ों देवताओं और दानवों को पराजित किया है, राक्षसों की रक्षा की है और यक्षों का भी संहार किया है।

श्लोक 34 (yuddha.71.34)

वज्रम् विष्टम्भितं येन बाणैरिन्द्रस्य धीमतः । पाशः सलिलराजस्य युद्धे प्रतिहतस्तथा ॥ 71.34 ॥

vajram viṣṭambhitaṃ yena bāṇairindrasya dhīmataḥ | pāśaḥ salilarājasya yuddhe pratihatastathā || 71.34 ||

जिसके बाणों से बुद्धिमान इन्द्र का वज्र रोक दिया गया, और युद्ध में जलराज वरुण का पाश भी टूट गया —

श्लोक 35 (yuddha.71.35)

एषोऽतिकायो बलवान् राक्षसानामथर्षभः । स रावणस्य सुतो धीमान् देवदानव दर्पहा ॥ 71.35 ॥

eṣo'tikāyo balavān rākṣasānāmatharṣabhaḥ | sa rāvaṇasya suto dhīmān devadānava darpahā || 71.35 ||

यही है बलवान अतिकाय, राक्षसों में श्रेष्ठ, रावण का बुद्धिमान पुत्र, देवों और दानवों का गर्व चूर करने वाला।

श्लोक 36 (yuddha.71.36)

तदस्मिन् क्रियताम् यत्नः क्षिप्रं पुरुषपुङ्गव । पुरा वानरसैन्यानि क्षयं नयति सायकैः ॥ 71.36 ॥

tadasmin kriyatām yatnaḥ kṣipraṃ puruṣapuṅgava | purā vānarasainyāni kṣayaṃ nayati sāyakaiḥ || 71.36 ||

'अतः हे पुरुषश्रेष्ठ, शीघ्र ही इस पर प्रयत्न करो, इससे पहले कि यह अपने बाणों से हमारी वानर-सेना का विनाश कर दे।'

श्लोक 37 (yuddha.71.37)

ततोऽतिकायो बलवान्प्रविश्य हरिवाहिनीम् । विस्फारयामास धनुर्ननाद च पुनः पुनः ॥ 71.37 ॥

tato'tikāyo balavānpraviśya harivāhinīm | visphārayāmāsa dhanurnanāda ca punaḥ punaḥ || 71.37 ||

तब बलवान अतिकाय वानर-सेना में प्रवेश करके अपना धनुष खींचने लगा और बार-बार गरजने लगा।

श्लोक 38 (yuddha.71.38)

तं भीमवपुषम् दृष्ट्वा रथस्थम् रथिनां वरम् । अभिपेतुर्महात्मानो ये प्रधानाः ये वनौकसः ॥ 71.38 ॥

taṃ bhīmavapuṣam dṛṣṭvā rathastham rathināṃ varam | abhipeturmahātmāno ye pradhānāḥ ye vanaukasaḥ || 71.38 ||

रथ पर खड़े, रथियों में श्रेष्ठ, भयंकर शरीर वाले उसे देखकर वानरों के प्रमुख महात्मा उस पर टूट पड़े।

श्लोक 39 (yuddha.71.39)

कुमुदो द्विविदो मैन्दो नीलः शरभ एव च । पादपैर्गिरिशृङ्गैश् च युगपत्समभिद्रवन् ॥ 71.39 ॥

kumudo dvivido maindo nīlaḥ śarabha eva ca | pādapairgiriśṛṅgaiś ca yugapatsamabhidravan || 71.39 ||

कुमुद, द्विविद, मैन्द, नील और शरभ — ये सब एक साथ वृक्षों और पर्वत-शिखरों को लेकर उस पर टूट पड़े।

श्लोक 40 (yuddha.71.40)

तेषाम् वृक्षांश्च शैलांश्च शरैः काञ्चनभूषणैः । अतिकायो महातेजाश्चिच्छेदास्त्रविदाम् वरः ॥ 71.40 ॥

teṣām vṛkṣāṃśca śailāṃśca śaraiḥ kāñcanabhūṣaṇaiḥ | atikāyo mahātejāścicchedāstravidām varaḥ || 71.40 ||

महातेजस्वी और अस्त्रविद्या में श्रेष्ठ अतिकाय ने उनके वृक्षों और पर्वत-खण्डों को अपने स्वर्ण-भूषित बाणों से काट डाला।

श्लोक 41 (yuddha.71.41)

तांश्चैव सरान्स हरीञ्शरैः सर्वायसैर्बली । विव्याधाभिमुखः सङ्ख्ये भीमकायो निशाचरः ॥ 71.41 ॥

tāṃścaiva sarānsa harīñśaraiḥ sarvāyasairbalī | vivyādhābhimukhaḥ saṅkhye bhīmakāyo niśācaraḥ || 71.41 ||

उस बलवान, भीषणकाय राक्षस ने युद्ध में सामने आए उन्हीं वानरों को समस्त लौह-निर्मित बाणों से बींध डाला।

श्लोक 42 (yuddha.71.42)

तेऽर्दिता बाणबर्षेण भिन्नगात्राः प्लवङ्गमाः । न शेकुरतिकायस्य प्रतिकर्तुं महारणे ॥ 71.42 ॥

te'rditā bāṇabarṣeṇa bhinnagātrāḥ plavaṅgamāḥ | na śekuratikāyasya pratikartuṃ mahāraṇe || 71.42 ||

बाणों की वर्षा से पीड़ित और घायल शरीर वाले वे वानर उस महासमर में अतिकाय का प्रतिकार नहीं कर सके।

श्लोक 43 (yuddha.71.43)

तत्सैन्यम् हरिवीराणाम् त्रासयामास राक्षसः । मृगयूथमिव क्रुद्धो हरिर्यौवनमास्थितः ॥ 71.43 ॥

tatsainyam harivīrāṇām trāsayāmāsa rākṣasaḥ | mṛgayūthamiva kruddho hariryauvanamāsthitaḥ || 71.43 ||

उस राक्षस ने वानर-वीरों की सेना को उसी प्रकार भयभीत कर दिया जैसे यौवन-मद से भरा क्रुद्ध सिंह मृगों के झुंड को।

श्लोक 44 (yuddha.71.44)

स राषसेन्द्रो हरिसैन्यमध्ये । नायुध्यमानं निजघान कम् चित् । उपेत्य रामम् सधनुः कलापी । सगर्वितम् वाक्यमिदं बभाषे ॥ 71.44 ॥

sa rāṣasendro harisainyamadhye | nāyudhyamānaṃ nijaghāna kam cit | upetya rāmam sadhanuḥ kalāpī | sagarvitam vākyamidaṃ babhāṣe || 71.44 ||

वह राक्षसराज वानर-सेना के बीच किसी भी न लड़ते हुए योद्धा को नहीं मारता था; फिर धनुष और तरकश लिए हुए राम के पास जाकर उसने ये गर्वीले वचन कहे।

श्लोक 45 (yuddha.71.45)

रथे स्थितोऽहम् शरचापपाणि । न प्राकृतम् कं चन योधयामि । यस्यास्ति शक्तिर्व्यवसाय युक्ता । ददातुं मे क्षिप्रमिहाद्य युद्धम् ॥ 71.45 ॥

rathe sthito'ham śaracāpapāṇi | na prākṛtam kaṃ cana yodhayāmi | yasyāsti śaktirvyavasāya yuktā | dadātuṃ me kṣipramihādya yuddham || 71.45 ||

'रथ पर खड़ा, हाथों में धनुष-बाण लिए, मैं किसी सामान्य योद्धा से युद्ध नहीं करता। जिसमें शक्ति और साहस हो, वह आज यहीं शीघ्र मुझे युद्ध दे।'

श्लोक 46 (yuddha.71.46)

तत्तस्य वाक्यं ब्रुवतो निशम्य । चुकोप सौमित्रिरमित्रहन्ता । अमृष्यमाणश्च समुत्पपात । जग्राह चापम् च ततः स्मयित्वा ॥ 71.46 ॥

tattasya vākyaṃ bruvato niśamya | cukopa saumitriramitrahantā | amṛṣyamāṇaśca samutpapāta | jagrāha cāpam ca tataḥ smayitvā || 71.46 ||

उसके ये वचन सुनकर शत्रुहन्ता लक्ष्मण क्रोधित हो उठे; असहनीय क्रोध से उछल पड़े और मुस्कुराते हुए अपना धनुष उठा लिया।

श्लोक 47 (yuddha.71.47)

क्रुद्धः सौमित्रिरुत्पत्य तूणादाक्षिप्य सायकम् । पुरस्तादतिकायस्य विचकर्ष महद्धनुः ॥ 71.47 ॥

kruddhaḥ saumitrirutpatya tūṇādākṣipya sāyakam | purastādatikāyasya vicakarṣa mahaddhanuḥ || 71.47 ||

क्रोधित लक्ष्मण उछलकर, तरकश से बाण निकालकर, अतिकाय के सामने अपना विशाल धनुष खींचने लगे।

श्लोक 48 (yuddha.71.48)

पूरयन्स महीम् शैलानाकाशं सागरम् दिशः । ज्याशब्दो लक्ष्मणस्योग्रस्त्रासयन्रजनीचरान् ॥ 71.48 ॥

pūrayansa mahīm śailānākāśaṃ sāgaram diśaḥ | jyāśabdo lakṣmaṇasyograstrāsayanrajanīcarān || 71.48 ||

लक्ष्मण की प्रत्यंचा की उग्र टंकार पृथ्वी, पर्वतों, आकाश, सागर और समस्त दिशाओं को भरती हुई निशाचरों को भयभीत करने लगी।

श्लोक 49 (yuddha.71.49)

सौमित्रेश्चापनिर्घोषम् श्रुत्वा प्रतिभयम् तदा । विसिष्मिये महातेजा राक्षसेन्द्रात्मजो बली ॥ 71.49 ॥

saumitreścāpanirghoṣam śrutvā pratibhayam tadā | visiṣmiye mahātejā rākṣasendrātmajo balī || 71.49 ||

लक्ष्मण के धनुष की उस भयंकर ध्वनि को सुनकर राक्षसराज का वह बलवान और तेजस्वी पुत्र चकित रह गया।

श्लोक 50 (yuddha.71.50)

तदातिकायः कुपितो दृष्ट्वा लक्ष्मणमुत्थितम् । आदाय निशितं बाणमिदम् वचनमब्रवीत् ॥ 71.50 ॥

tadātikāyaḥ kupito dṛṣṭvā lakṣmaṇamutthitam | ādāya niśitaṃ bāṇamidam vacanamabravīt || 71.50 ||

तब लक्ष्मण को युद्ध के लिए उठा हुआ देखकर क्रुद्ध अतिकाय ने एक तीखा बाण उठाकर यह वचन कहा।

श्लोक 51 (yuddha.71.51)

बालस्त्वमसि सौमित्रे विक्रमेष्वविचक्षणः । गच्छ किम् कालसदृशं माम् योधयितुमिच्छसि ॥ 71.51 ॥

bālastvamasi saumitre vikrameṣvavicakṣaṇaḥ | gaccha kim kālasadṛśaṃ mām yodhayitumicchasi || 71.51 ||

'हे सौमित्रे! तुम अभी बालक हो, पराक्रम में अनजान। जाओ भी — काल के समान मुझसे तुम क्यों युद्ध करना चाहते हो?'

श्लोक 52 (yuddha.71.52)

न हि मद्बाहुसृष्टानामस्त्राणाम् हिमवानपि । सोढुमुत्सहते वेगमन्तरिक्षमथो मही ॥ 71.52 ॥

na hi madbāhusṛṣṭānāmastrāṇām himavānapi | soḍhumutsahate vegamantarikṣamatho mahī || 71.52 ||

'मेरी भुजाओं से छोड़े गए अस्त्रों का वेग तो हिमालय भी नहीं सह सकता, न आकाश और न पृथ्वी।'

श्लोक 53 (yuddha.71.53)

सुखप्रसुप्तम् कालाग्निं प्रबोधयितुमिच्छसि । न्यस्य चापं निवर्तस्व मा प्राणाञ्जहि मद्गतः ॥ 71.53 ॥

sukhaprasuptam kālāgniṃ prabodhayitumicchasi | nyasya cāpaṃ nivartasva mā prāṇāñjahi madgataḥ || 71.53 ||

'तुम सुखपूर्वक सोई हुई प्रलयाग्नि को जगाना चाहते हो। धनुष रखकर लौट जाओ — मेरे सामने आकर अपने प्राण मत गँवाओ।'

श्लोक 54 (yuddha.71.54)

अथ वा त्वं प्रतिष्टब्धो न निवर्तितुमिच्छसि । तिष्ठ प्राणान्परित्यज्य गमिष्यसि यमक्षयम् ॥ 71.54 ॥

atha vā tvaṃ pratiṣṭabdho na nivartitumicchasi | tiṣṭha prāṇānparityajya gamiṣyasi yamakṣayam || 71.54 ||

'अथवा यदि हठपूर्वक लौटना ही नहीं चाहते, तो खड़े रहो — प्राण त्यागकर तुम यमलोक चले जाओगे।'

श्लोक 55 (yuddha.71.55)

पश्य मे निशितान् बाणान रिदर्पनिषूदनान् । ईश्वरायुधसङ्काशांस्तप्तकाञ्चनभूषणान् ॥ 71.55 ॥

paśya me niśitān bāṇāna ridarpaniṣūdanān | īśvarāyudhasaṅkāśāṃstaptakāñcanabhūṣaṇān || 71.55 ||

'देखो मेरे तीखे बाणों को, जो शत्रु के गर्व को चूर करने वाले हैं, ईश्वर के अस्त्रों के समान और तपे हुए स्वर्ण से भूषित हैं।'

श्लोक 56 (yuddha.71.56)

एष ते सर्पसङ्काशो बाणः पास्यति शोणितम् । मृगराज इव क्रुद्धो नागराजस्य शोणितम् ॥ 71.56 ॥

eṣa te sarpasaṅkāśo bāṇaḥ pāsyati śoṇitam | mṛgarāja iva kruddho nāgarājasya śoṇitam || 71.56 ||

'यह सर्प के समान मेरा बाण तुम्हारा रक्त इस प्रकार पिएगा जैसे क्रुद्ध सिंह गजराज का रक्त पीता है।'

श्लोक 57 (yuddha.71.57)

श्रुत्वातिकायस्य वचः सरोषं । सगर्वितम् सम्यति राजपुत्रः । स सञ्चुकोपातिबलो मस्वी । उवाच वाक्यम् च ततो महार्थम् ॥ 71.57 ॥

śrutvātikāyasya vacaḥ saroṣaṃ | sagarvitam samyati rājaputraḥ | sa sañcukopātibalo masvī | uvāca vākyam ca tato mahārtham || 71.57 ||

युद्धभूमि में अतिकाय के क्रोधपूर्ण और गर्वीले वचन सुनकर वह अत्यंत बलवान और बुद्धिमान राजकुमार क्रुद्ध हो उठे, और फिर गंभीर अर्थ वाले वचन बोले।

श्लोक 58 (yuddha.71.58)

न वाक्यमात्रेण भवान्प्रधानो । न कत्थनात्सत्पुरुषा भवन्ति । मयि स्थिते धन्विनि बाणपाणौ । विदर्शयस्वात्मबलम् दुरात्मन् ॥ 71.58 ॥

na vākyamātreṇa bhavānpradhāno | na katthanātsatpuruṣā bhavanti | mayi sthite dhanvini bāṇapāṇau | vidarśayasvātmabalam durātman || 71.58 ||

'केवल कहने मात्र से कोई श्रेष्ठ नहीं बन जाता, न ही डींग हाँकने से कोई सज्जन कहलाता है। हे दुरात्मन्! धनुष और बाण लिए मेरे सामने खड़े होकर अपना बल दिखाओ।'

श्लोक 59 (yuddha.71.59)

कर्मणा सूचयात्मानं न विकत्थितुमर्हसि । पौरुषेण तु यो युक्तः स तु शूर इति स्मृतः ॥ 71.59 ॥

karmaṇā sūcayātmānaṃ na vikatthitumarhasi | pauruṣeṇa tu yo yuktaḥ sa tu śūra iti smṛtaḥ || 71.59 ||

'अपने कर्मों से अपने को सिद्ध करो, डींग मारने का तुम्हें अधिकार नहीं। जो पौरुष से युक्त है, वही शूर कहलाता है।'

श्लोक 60 (yuddha.71.60)

सर्वायुधसमायुक्तो धन्वी त्वम् रथमास्थितः । शरैर्वा यदि वाप्यस्त्रैर्दर्शयस्व पराक्रमम् ॥ 71.60 ॥

sarvāyudhasamāyukto dhanvī tvam rathamāsthitaḥ | śarairvā yadi vāpyastrairdarśayasva parākramam || 71.60 ||

'तुम सभी शस्त्रों से युक्त और रथ पर धनुष धारण किए खड़े हो — बाणों से हो या अस्त्रों से, अपना पराक्रम दिखाओ।'

श्लोक 61 (yuddha.71.61)

ततः शिरस्ते निशितैः पातयिष्याम्यहम् शरैः । मारुतः कालसम्पक्वम् वृन्तात्तालफलं यथा ॥ 71.61 ॥

tataḥ śiraste niśitaiḥ pātayiṣyāmyaham śaraiḥ | mārutaḥ kālasampakvam vṛntāttālaphalaṃ yathā || 71.61 ||

'तब मैं अपने तीखे बाणों से तुम्हारा सिर वैसे ही गिरा दूँगा जैसे हवा पके हुए ताड़-फल को उसके वृन्त से गिरा देती है।'

श्लोक 62 (yuddha.71.62)

अद्य ते मामका बाणास्तप्तकाञ्चनभूषणाः । पास्यन्ति रुधिरम् गात्राद्बाणशल्यान्तरोत्थितम् ॥ 71.62 ॥

adya te māmakā bāṇāstaptakāñcanabhūṣaṇāḥ | pāsyanti rudhiram gātrādbāṇaśalyāntarotthitam || 71.62 ||

'आज तपे हुए स्वर्ण से भूषित मेरे बाण तुम्हारे शरीर में बने घावों से बहते रक्त को पीएँगे।'

श्लोक 63 (yuddha.71.63)

बालोऽयमिति विज्ञाय न मावज्ञातुमर्हसि । बालो वा यदि वा वृद्धो मृत्युम् जानीहि सम्युगे ॥ बालेन विष्णुना लोकास्त्रयः क्रान्तास्त्रिविक्रमैः ॥ 71.63 ॥

bālo'yamiti vijñāya na māvajñātumarhasi | bālo vā yadi vā vṛddho mṛtyum jānīhi samyuge || bālena viṣṇunā lokāstrayaḥ krāntāstrivikramaiḥ || 71.63 ||

'मुझे बालक जानकर मेरा अनादर मत करो। बालक हो या वृद्ध, युद्ध में मुझे काल ही समझो। क्या विष्णु ने बालक रूप में ही अपने तीन डगों से तीनों लोकों को नाप नहीं लिया था?'

श्लोक 64 (yuddha.71.64)

लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा हेतुमत्परमार्थवत् ॥ अतिकायः प्रचुक्रोध बाणम् चोत्तममाददे ॥ 71.64 ॥

lakṣmaṇasya vacaḥ śrutvā hetumatparamārthavat || atikāyaḥ pracukrodha bāṇam cottamamādade || 71.64 ||

लक्ष्मण के तर्कसंगत और गूढ़ार्थयुक्त वचन सुनकर अतिकाय अत्यंत क्रुद्ध हो उठा और एक उत्तम बाण उठा लिया।

श्लोक 65 (yuddha.71.65)

ततो विद्याधरा भूता देवा दैत्या महर्षयः ॥ गुह्यकाश्च महात्मानस्तद्युद्धम् ददृशुस्तदा ॥ 71.65 ॥

tato vidyādharā bhūtā devā daityā maharṣayaḥ || guhyakāśca mahātmānastadyuddham dadṛśustadā || 71.65 ||

तब विद्याधर, भूत, देवता, दैत्य, महर्षि और महात्मा गुह्यक — सभी उस युद्ध को देखने लगे।

श्लोक 66 (yuddha.71.66)

ततोऽतिकायः कुपितश्चापमारोप्य सायकम् ॥ लक्ष्मणस्य प्रचिक्षेप सङ्क्षिपन्निव चाम्बरम् ॥ 71.66 ॥

tato'tikāyaḥ kupitaścāpamāropya sāyakam || lakṣmaṇasya pracikṣepa saṅkṣipanniva cāmbaram || 71.66 ||

तब क्रुद्ध अतिकाय ने धनुष पर बाण चढ़ाकर, मानो आकाश को समेटता हुआ, लक्ष्मण पर छोड़ दिया।

श्लोक 67 (yuddha.71.67)

तमापतन्तं निशितम् शरमाशीविषोपमम् ॥ अर्धचन्द्रेण चिच्छेद लक्ष्मणः परवीरहा ॥ 71.67 ॥

tamāpatantaṃ niśitam śaramāśīviṣopamam || ardhacandreṇa ciccheda lakṣmaṇaḥ paravīrahā || 71.67 ||

उस विषधर सर्प के समान तीखे उड़ते हुए बाण को शत्रुवीरों के संहारक लक्ष्मण ने अर्धचन्द्र बाण से काट डाला।

श्लोक 68 (yuddha.71.68)

तं निकृत्तम् शरम् दृष्ट्वा कृत्तभोगमिवोरगम् ॥ अतिकायो भृशम् क्रुद्धः पञ्चबाणान्समाददे ॥ 71.68 ॥

taṃ nikṛttam śaram dṛṣṭvā kṛttabhogamivoragam || atikāyo bhṛśam kruddhaḥ pañcabāṇānsamādade || 71.68 ||

फन कटे सर्प के समान उस कटे हुए बाण को देखकर अतिकाय अत्यंत क्रुद्ध होकर पाँच बाण उठा बैठा।

श्लोक 69 (yuddha.71.69)

ताञ्शरान्सम्प्रचिक्षेप लक्ष्मणाय निशाचरः ॥ तानप्राप्ताञ्शरैस्तीक्ष्णैश्चिच्छेद भरतानुजः ॥ 71.69 ॥

tāñśarānsampracikṣepa lakṣmaṇāya niśācaraḥ || tānaprāptāñśaraistīkṣṇaiściccheda bharatānujaḥ || 71.69 ||

उस निशाचर ने वे बाण लक्ष्मण पर छोड़े; उनके पहुँचने से पहले ही भरत के अनुज ने उन्हें अपने तीखे बाणों से काट डाला।

श्लोक 70 (yuddha.71.70)

स तांश्छित्त्वा शरैस्तीक्ष्णैर्लक्ष्मणः परवीरहा ॥ आददे निशितं बाणम् ज्वलन्तमिव तेजसा ॥ 71.70 ॥

sa tāṃśchittvā śaraistīkṣṇairlakṣmaṇaḥ paravīrahā || ādade niśitaṃ bāṇam jvalantamiva tejasā || 71.70 ||

उन्हें अपने तीखे बाणों से काटकर शत्रुवीर-संहारक लक्ष्मण ने तेज से मानो जलता हुआ एक तीखा बाण उठाया।

श्लोक 71 (yuddha.71.71)

तमादाय धनुः श्रेष्ठे योजयामास लक्ष्मणः ॥ विचकर्ष च वेगेन विससर्ज च सायकम् ॥ 71.71 ॥

tamādāya dhanuḥ śreṣṭhe yojayāmāsa lakṣmaṇaḥ || vicakarṣa ca vegena visasarja ca sāyakam || 71.71 ||

उसे लेकर लक्ष्मण ने अपने श्रेष्ठ धनुष पर चढ़ाया, वेग से खींचा और बाण छोड़ दिया।

श्लोक 72 (yuddha.71.72)

पूर्णायतविसृष्टेन शरेणानत पर्वणा ॥ ललाटे राक्षसश्रेष्ठमाजघान स वीर्यवान् ॥ 71.72 ॥

pūrṇāyatavisṛṣṭena śareṇānata parvaṇā || lalāṭe rākṣasaśreṣṭhamājaghāna sa vīryavān || 71.72 ||

पूरी तरह खींचकर छोड़े गए, झुके हुए पर्वों वाले उस बाण से पराक्रमी लक्ष्मण ने उस श्रेष्ठ राक्षस को ललाट पर मारा।

श्लोक 73 (yuddha.71.73)

स ललाटे शरो मग्नस्तस्य भीमस्य रक्षसः ॥ ददृशे शोणितेनाक्तः पन्नगेन्द्र इवाहवे ॥ 71.73 ॥

sa lalāṭe śaro magnastasya bhīmasya rakṣasaḥ || dadṛśe śoṇitenāktaḥ pannagendra ivāhave || 71.73 ||

उस भीषण राक्षस के ललाट में धँसा हुआ, रक्त से रँगा वह बाण युद्धभूमि में मानो नागराज के समान दिखाई दे रहा था।

श्लोक 74 (yuddha.71.74)

राक्षसः प्रचकम्पे च लक्ष्मणेषु प्रकम्पितः ॥ रुद्रबाणहतं भीमम् यथा त्रिपुरगोपुरम् ॥ 71.74 ॥

rākṣasaḥ pracakampe ca lakṣmaṇeṣu prakampitaḥ || rudrabāṇahataṃ bhīmam yathā tripuragopuram || 71.74 ||

लक्ष्मण के बाण से आहत राक्षस उसी प्रकार काँप उठा जैसे रुद्र के बाण से आहत त्रिपुर का भीषण गोपुर काँप उठा था।

श्लोक 75 (yuddha.71.75)

चिन्तयामास चाश्वस्य विमृश्य च महाबलः ॥ साधु बाणनिपातेन श्वाघनीयोऽसि मे रिपुः ॥ 71.75 ॥

cintayāmāsa cāśvasya vimṛśya ca mahābalaḥ || sādhu bāṇanipātena śvāghanīyo'si me ripuḥ || 71.75 ||

साँस लेकर उस महाबली ने सोचा और मन में विचार किया: 'साधु! इस बाण-प्रहार से तुम मेरे प्रशंसनीय शत्रु बन गए हो।'

श्लोक 76 (yuddha.71.76)

विचार्यैवम् विनम्यास्यं विनम्य च भुजावुभौ ॥ स रथोपस्थमास्थाय रथेन प्रचचार ह ॥ 71.76 ॥

vicāryaivam vinamyāsyaṃ vinamya ca bhujāvubhau || sa rathopasthamāsthāya rathena pracacāra ha || 71.76 ||

यह विचारकर, मुख झुकाकर और दोनों भुजाओं को झुकाकर, वह अपने रथ के मंच पर स्थित होकर रथ को इधर-उधर चलाने लगा।

श्लोक 77 (yuddha.71.77)

एकम् त्रीन्पञ्च सप्तेति सायकान्राक्षसर्षभः ॥ आददे सन्दधे चापि विचकर्षोत्ससर्ज च ॥ 71.77 ॥

ekam trīnpañca sapteti sāyakānrākṣasarṣabhaḥ || ādade sandadhe cāpi vicakarṣotsasarja ca || 71.77 ||

उस राक्षस-श्रेष्ठ ने बाण उठाए — कभी एक, कभी तीन, कभी पाँच, कभी सात — उन्हें चढ़ाया, खींचा और छोड़ा।

श्लोक 78 (yuddha.71.78)

ते बाणाः कालसङ्काशा राक्षसेन्द्रधनुश्च्युताः ॥ हेमपुङ्खा रविप्रख्याश्चक्रुर्दीप्तमिवाम्बरम् ॥ 71.78 ॥

te bāṇāḥ kālasaṅkāśā rākṣasendradhanuścyutāḥ || hemapuṅkhā raviprakhyāścakrurdīptamivāmbaram || 71.78 ||

काल के समान वे बाण राक्षसराज के धनुष से छूटकर, स्वर्ण-पंख वाले और सूर्य के समान चमकते हुए, आकाश को मानो प्रज्वलित कर रहे थे।

श्लोक 79 (yuddha.71.79)

ततस्तान्राक्षसोत्सृष्टाञ्शरौघान्राघवानुजः ॥ असम्भ्रान्तः प्रचिच्छेद निशितैर्बहुभिः शरैः ॥ 71.79 ॥

tatastānrākṣasotsṛṣṭāñśaraughānrāghavānujaḥ || asambhrāntaḥ praciccheda niśitairbahubhiḥ śaraiḥ || 71.79 ||

तब निर्विचलित होकर राघव के अनुज [लक्ष्मण] ने राक्षस द्वारा छोड़े गए उस बाण-प्रवाह को अपने अनेक तीखे बाणों से काट डाला।

श्लोक 80 (yuddha.71.80)

ताञ्शरान्युधि सम्प्रेक्ष्य निकृत्तान्रावणात्मजः ॥ चुकोप त्रिदशेन्द्रारिर्जग्राह निशितम् शरम् ॥ 71.80 ॥

tāñśarānyudhi samprekṣya nikṛttānrāvaṇātmajaḥ || cukopa tridaśendrārirjagrāha niśitam śaram || 71.80 ||

युद्ध में अपने बाणों को कटा हुआ देखकर रावण-पुत्र, त्रिदशेन्द्र इन्द्र के उस शत्रु ने क्रोधित होकर एक तीखा बाण उठाया।

श्लोक 81 (yuddha.71.81)

स सन्धाय महातेजास्तं बाणम् सहसोत्सृजत् ॥ ततः सौमित्रिमायान्तमाजघान स्तनान्तरे ॥ 71.81 ॥

sa sandhāya mahātejāstaṃ bāṇam sahasotsṛjat || tataḥ saumitrimāyāntamājaghāna stanāntare || 71.81 ||

उस महातेजस्वी ने बाण चढ़ाकर उसे तुरन्त छोड़ दिया; तब वह आगे बढ़ते हुए सुमित्रा-पुत्र लक्ष्मण की छाती में जा लगा।

श्लोक 82 (yuddha.71.82)

अतिकायेन सौमित्रिस्ताडितो युधि वक्षसि ॥ सुस्राव रुधिरम् तीव्रं मदं मत्त इव द्विपः ॥ 71.82 ॥

atikāyena saumitristāḍito yudhi vakṣasi || susrāva rudhiram tīvraṃ madaṃ matta iva dvipaḥ || 71.82 ||

युद्ध में अतिकाय द्वारा छाती पर आहत लक्ष्मण उसी प्रकार तीव्र रक्त बहाने लगे जैसे मदमस्त हाथी मद बहाता है।

श्लोक 83 (yuddha.71.83)

स चकार तदात्मानम् विशल्यं सहसा विभुः ॥ जग्राह च शरम् तीष्णमस्त्रेणापि समादधे ॥ 71.83 ॥

sa cakāra tadātmānam viśalyaṃ sahasā vibhuḥ || jagrāha ca śaram tīṣṇamastreṇāpi samādadhe || 71.83 ||

उस प्रभावशाली वीर ने तत्काल अपने को शल्यरहित किया, एक तीखा बाण उठाया और उसे अस्त्र से युक्त किया।

श्लोक 84 (yuddha.71.84)

आग्नेयेन तदास्त्रेण योजयामास सायकम् ॥ स जज्वाल तदा बाणो धनुश्चास्य महात्मनः ॥ 71.84 ॥

āgneyena tadāstreṇa yojayāmāsa sāyakam || sa jajvāla tadā bāṇo dhanuścāsya mahātmanaḥ || 71.84 ||

उसने उस बाण को अग्नि-अस्त्र से युक्त किया; तब उस महात्मा का वह बाण और धनुष दोनों प्रज्वलित हो उठे।

श्लोक 85 (yuddha.71.85)

अतिकायोऽतितेजस्वी सौरमस्त्रम् समाददे ॥ तेन बाणं भुजङ्गाभम् हेमपुङ्खमयोजयत् ॥ 71.85 ॥

atikāyo'titejasvī sauramastram samādade || tena bāṇaṃ bhujaṅgābham hemapuṅkhamayojayat || 71.85 ||

अत्यंत तेजस्वी अतिकाय ने सूर्य-अस्त्र धारण किया और उससे सर्प के समान चमकते, स्वर्ण-पंख वाले बाण को युक्त किया।

श्लोक 86 (yuddha.71.86)

ततस्तम् ज्वलितं घोरम् लक्ष्मणः शरमाहितम् ॥ अतिकायाय चिक्षेप कालदण्डमिवान्तकः ॥ 71.86 ॥

tatastam jvalitaṃ ghoram lakṣmaṇaḥ śaramāhitam || atikāyāya cikṣepa kāladaṇḍamivāntakaḥ || 71.86 ||

तब लक्ष्मण ने उस प्रज्वलित, भयंकर और अस्त्र-युक्त बाण को अतिकाय पर उसी प्रकार फेंका जैसे यमराज अपना कालदण्ड फेंकते हैं।

श्लोक 87 (yuddha.71.87)

आग्नेयेनाभिसम्युक्तम् दृष्ट्वा बाणं निशाचरः ॥ उत्ससर्ज तदा बाणम् दीप्तम् सूर्यास्त्रयोजितम् ॥ 71.87 ॥

āgneyenābhisamyuktam dṛṣṭvā bāṇaṃ niśācaraḥ || utsasarja tadā bāṇam dīptam sūryāstrayojitam || 71.87 ||

अग्नि-अस्त्र से युक्त उस बाण को देखकर निशाचर ने तब सूर्य-अस्त्र से युक्त अपना प्रज्वलित बाण छोड़ दिया।

श्लोक 88 (yuddha.71.88)

तावुभावम्बरे बाणावन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥ तेजसा सम्प्रदीप्ताग्रौ क्रुद्धाविव भुजम् गमौ ॥ 71.88 ॥

tāvubhāvambare bāṇāvanyonyamabhijaghnatuḥ || tejasā sampradīptāgrau kruddhāviva bhujam gamau || 71.88 ||

अपने तेज से प्रज्वलित अग्रभाग वाले वे दोनों बाण आकाश में एक-दूसरे से इस प्रकार टकराए जैसे दो क्रुद्ध सर्प।

श्लोक 89 (yuddha.71.89)

तावन्योन्यम् विनिर्दह्य पेततुर्धरणीतले ॥ 71.89 ॥

tāvanyonyam vinirdahya petaturdharaṇītale || 71.89 ||

एक-दूसरे को भस्म करते हुए वे दोनों पृथ्वी पर गिर पड़े,

श्लोक 90 (yuddha.71.90)

निरर्चिषौ भस्मकृतौ न भ्राजेते शरोत्तमौ । तावुभरु दीप्यमानौ स्म न भ्राजेते महीतले ॥ 71.90 ॥

nirarciṣau bhasmakṛtau na bhrājete śarottamau | tāvubharu dīpyamānau sma na bhrājete mahītale || 71.90 ||

वे दोनों उत्तम बाण, अब निर्ज्वाल और भस्म हो चुके, चमक खो बैठे थे; जो पहले दीप्तिमान थे, वे अब पृथ्वी पर चमकहीन पड़े थे।

श्लोक 91 (yuddha.71.91)

ततोऽतिकायः सङ्क्रुद्धस्त्वस्त्रमैषीकमुत्सृजत् । तत्प्रचिच्छेद सौमित्रिरस्त्रमैन्द्रेण वीर्यवान् ॥ 71.91 ॥

tato'tikāyaḥ saṅkruddhastvastramaiṣīkamutsṛjat | tatpraciccheda saumitrirastramaindreṇa vīryavān || 71.91 ||

तब क्रुद्ध अतिकाय ने ऐषीक अस्त्र छोड़ा; पराक्रमी लक्ष्मण ने उसे ऐन्द्र अस्त्र से काट डाला।

श्लोक 92 (yuddha.71.92)

ऐषीकं निहतम् दृष्ट्वा कुमारो रावणात्मजः । याम्येनास्त्रेण सङ्क्रुद्धो योजयामास सायकम् ॥ 71.92 ॥

aiṣīkaṃ nihatam dṛṣṭvā kumāro rāvaṇātmajaḥ | yāmyenāstreṇa saṅkruddho yojayāmāsa sāyakam || 71.92 ||

ऐषीक अस्त्र को नष्ट हुआ देखकर रावण-पुत्र वह कुमार क्रुद्ध होकर याम्य अस्त्र से बाण को युक्त करने लगा।

श्लोक 93 (yuddha.71.93)

ततस्तदस्त्रम् चिक्षेप लक्ष्मणाय निशाचरः । वायव्येन तदस्त्रम् तु निजघान स लक्ष्मणः ॥ 71.93 ॥

tatastadastram cikṣepa lakṣmaṇāya niśācaraḥ | vāyavyena tadastram tu nijaghāna sa lakṣmaṇaḥ || 71.93 ||

तब निशाचर ने वह अस्त्र लक्ष्मण पर छोड़ा; परन्तु लक्ष्मण ने उसे वायव्य अस्त्र से नष्ट कर दिया।

श्लोक 94 (yuddha.71.94)

अथैनम् शरधाराभिर्धाराभिरिव तोयदः । अभ्यवर्षत सङ्क्रुद्धो लक्ष्मणो रावणात्मजम् ॥ 71.94 ॥

athainam śaradhārābhirdhārābhiriva toyadaḥ | abhyavarṣata saṅkruddho lakṣmaṇo rāvaṇātmajam || 71.94 ||

तब क्रुद्ध लक्ष्मण ने मेघ के समान बाणों की धाराओं से रावण-पुत्र पर वर्षा करनी शुरू कर दी।

श्लोक 95 (yuddha.71.95)

तेऽतिकायम् समासाद्य कवचे वज्रभूषिते । भग्नाग्रशल्याः सहसा पेतुर्बाणा महीतले ॥ 71.95 ॥

te'tikāyam samāsādya kavace vajrabhūṣite | bhagnāgraśalyāḥ sahasā peturbāṇā mahītale || 71.95 ||

वे बाण अतिकाय तक पहुँचकर उसके वज्र-भूषित कवच पर अपने अग्रभाग तोड़कर तत्काल पृथ्वी पर गिर पड़े।

श्लोक 96 (yuddha.71.96)

तान्मोघानभिसम्प्रेक्ष्य लक्ष्मणः परवीरहा । अभ्यवर्षत बाणानाम् सहस्रेण महायशाः ॥ 71.96 ॥

tānmoghānabhisamprekṣya lakṣmaṇaḥ paravīrahā | abhyavarṣata bāṇānām sahasreṇa mahāyaśāḥ || 71.96 ||

उन बाणों को व्यर्थ जाता देखकर, महायशस्वी शत्रुवीर-संहारक लक्ष्मण ने हज़ारों बाणों की वर्षा कर दी।

श्लोक 97 (yuddha.71.97)

स वर्ष्यमाणो बाणौघैरतिकायो महाबलः । अवध्यकवचः सङ्ख्ये राक्षसो नैव विव्यथे ॥ 71.97 ॥

sa varṣyamāṇo bāṇaughairatikāyo mahābalaḥ | avadhyakavacaḥ saṅkhye rākṣaso naiva vivyathe || 71.97 ||

उस बाण-प्रवाह से आप्लावित होते हुए भी, अवध्य कवच वाला महाबली अतिकाय युद्ध में तनिक भी विचलित नहीं हुआ।

श्लोक 98 (yuddha.71.98)

शरं चाशीविषाकारं लक्ष्मणाय व्यपासृजत् । स तेन विद्धः सौमित्रिर्मर्मदेशे शरेण ह ॥ मुहूर्तमात्रं निःसंज्ञो ह्यभवच्छत्रुतापनः ॥ 71.98 ॥

śaraṃ cāśīviṣākāraṃ lakṣmaṇāya vyapāsṛjat | sa tena viddhaḥ saumitrirmarmadeśe śareṇa ha || muhūrtamātraṃ niḥsaṃjño hyabhavacchatrutāpanaḥ || 71.98 ||

उसने लक्ष्मण पर विषधर सर्प के समान एक बाण छोड़ा; उस बाण से मर्मस्थल पर आहत होकर शत्रु-संतापक लक्ष्मण क्षणभर के लिए मूर्च्छित हो गए।

श्लोक 99 (yuddha.71.99)

ततः सम्ज्ञामुपालभ्य चतुर्भिः सायकोत्तमैः ॥ 71.99 ॥

tataḥ samjñāmupālabhya caturbhiḥ sāyakottamaiḥ || 71.99 ||

तब पुनः चेतना पाकर, चार उत्तम बाणों से

श्लोक 100 (yuddha.71.100)

निजघान हयान् संख्ये सारथिम् च महाबलः । ध्वजस्योन्मथनम् कृत्वा शरवर्षै ररिंदमः ॥ 71.100 ॥

nijaghāna hayān saṃkhye sārathim ca mahābalaḥ | dhvajasyonmathanam kṛtvā śaravarṣai rariṃdamaḥ || 71.100 ||

उस महाबली शत्रुदमन ने युद्ध में घोड़ों और सारथी को मार गिराया, और बाणों की वर्षा से ध्वज को भी उखाड़ फेंका।

श्लोक 101 (yuddha.71.101)

असंभ्रान्तः स सौमित्रिस्तान् शरानभिलक्षितान् । मुमोच लक्ष्मणो बाणान् वधार्थं तस्य रक्षसः ॥ 71.101 ॥

asaṃbhrāntaḥ sa saumitristān śarānabhilakṣitān | mumoca lakṣmaṇo bāṇān vadhārthaṃ tasya rakṣasaḥ || 71.101 ||

अविचलित सुमित्रा-पुत्र लक्ष्मण ने उस राक्षस के वध के लिए सुनिशाना बाण छोड़े।

श्लोक 102 (yuddha.71.102)

न शशाक रुजम् कर्तुम् युधि तस्य नरोत्तमः । अथैनमभ्युपागम्य वायुर्वाक्यमुवाच ह ॥ 71.102 ॥

na śaśāka rujam kartum yudhi tasya narottamaḥ | athainamabhyupāgamya vāyurvākyamuvāca ha || 71.102 ||

फिर भी वह नरश्रेष्ठ युद्ध में उसे घायल नहीं कर सका। तब वायुदेव उसके पास आकर यह वचन बोले।

श्लोक 103 (yuddha.71.103)

ब्रह्मदत्तवरो ह्येष अवध्य कवचावृतः । ब्राह्मेणास्त्रेण भिन्ध्येनमेष वध्यो हि नान्यथा ॥ अवध्य एष ह्यन्येषामस्त्राणाम् कवची बली ॥ 71.103 ॥

brahmadattavaro hyeṣa avadhya kavacāvṛtaḥ | brāhmeṇāstreṇa bhindhyenameṣa vadhyo hi nānyathā || avadhya eṣa hyanyeṣāmastrāṇām kavacī balī || 71.103 ||

'इसे ब्रह्मा का वरदान प्राप्त है और यह अभेद्य कवच से आवृत है। इसे ब्रह्म-अस्त्र से ही भेदो, अन्यथा यह वध्य नहीं है। यह बलवान कवचधारी अन्य किसी अस्त्र से मारा नहीं जा सकता।'

श्लोक 104 (yuddha.71.104)

ततः स वायोर्वचनं निशम्य । सौमित्रिरिन्द्रप्रतिमानवीर्यः । समाददे बाणममोघवेगं । तद्ब्राह्ममस्त्रम् सहसा नियोज्य ॥ 71.104 ॥

tataḥ sa vāyorvacanaṃ niśamya | saumitririndrapratimānavīryaḥ | samādade bāṇamamoghavegaṃ | tadbrāhmamastram sahasā niyojya || 71.104 ||

तब वायुदेव के वचन सुनकर, इन्द्र के समान पराक्रमी लक्ष्मण ने अमोघ वेग वाला एक बाण उठाया और तुरन्त उसे ब्रह्म-अस्त्र से युक्त किया।

श्लोक 105 (yuddha.71.105)

तस्मिन्वरास्त्रे तु नियुज्यमाने । सौमित्रिणा बाणवरे शिताग्रे । दिशः सचन्द्रार्कमहाग्रहाश् च । नभश्च तत्रास ररास चोर्वी ॥ 71.105 ॥

tasminvarāstre tu niyujyamāne | saumitriṇā bāṇavare śitāgre | diśaḥ sacandrārkamahāgrahāś ca | nabhaśca tatrāsa rarāsa corvī || 71.105 ||

जब लक्ष्मण उस श्रेष्ठ अस्त्र को तीखे अग्रभाग वाले उस उत्तम बाण में युक्त कर रहे थे, तब दिशाएँ, चन्द्र, सूर्य और महाग्रह, तथा आकाश भी काँप उठे और पृथ्वी गूँज उठी।

श्लोक 106 (yuddha.71.106)

तं ब्रह्मणोऽस्त्रेण नियुज्य चापे । शरम् सुपुङ्खं यमदूतकल्पम् । सौमित्रिरिन्द्रारिसुतस्य तस्य । ससर्ज बाणम् युधि वज्रकल्पम् ॥ 71.106 ॥

taṃ brahmaṇo'streṇa niyujya cāpe | śaram supuṅkhaṃ yamadūtakalpam | saumitririndrārisutasya tasya | sasarja bāṇam yudhi vajrakalpam || 71.106 ||

ब्रह्मास्त्र से युक्त, सुन्दर पंखों वाले, यमदूत के समान उस बाण को धनुष पर चढ़ाकर लक्ष्मण ने इन्द्र-शत्रु के उस पुत्र पर युद्ध में वज्र के समान बाण छोड़ दिया।

श्लोक 107 (yuddha.71.107)

तम् लक्ष्मणोत्सृष्टममोघवेगं । समापतन्तम् ज्वलनप्रकाशम् । सुवर्णवज्रोत्तमचित्रपुङ्खं । तदातिकायः समरे ददर्श ॥ 71.107 ॥

tam lakṣmaṇotsṛṣṭamamoghavegaṃ | samāpatantam jvalanaprakāśam | suvarṇavajrottamacitrapuṅkhaṃ | tadātikāyaḥ samare dadarśa || 71.107 ||

तब अतिकाय ने युद्ध में लक्ष्मण द्वारा छोड़े गए, अमोघ वेग वाले, अग्नि के समान चमकते, स्वर्ण-वज्र से सज्जित उस अद्भुत बाण को अपनी ओर आते देखा।

श्लोक 108 (yuddha.71.108)

तं प्रेक्षमाणः सहसातिकायो । जघान बाणैर्निशितैरनेकैः । स सायकस्तस्य सुपर्णवेगस् । तदातिवेगेन जगाम पार्श्वम् ॥ 71.108 ॥

taṃ prekṣamāṇaḥ sahasātikāyo | jaghāna bāṇairniśitairanekaiḥ | sa sāyakastasya suparṇavegas | tadātivegena jagāma pārśvam || 71.108 ||

उसे देखकर अतिकाय ने तुरन्त अनेक तीखे बाणों से उस पर प्रहार किया; परन्तु गरुड़ के समान वेगवान वह बाण अत्यंत वेग से उसके निकट जा पहुँचा।

श्लोक 109 (yuddha.71.109)

तमागतं प्रेक्ष्य तदातिकायो बाणं प्रदीप्तान्तककालकल्पम् । जघान शक्त्यृष्टिगदाकुठारैः शूलैर्हलैश्चाप्यविपन्नचेष्टः ॥ 71.109 ॥

tamāgataṃ prekṣya tadātikāyo bāṇaṃ pradīptāntakakālakalpam | jaghāna śaktyṛṣṭigadākuṭhāraiḥ śūlairhalaiścāpyavipannaceṣṭaḥ || 71.109 ||

प्रलयकालीन काल के समान प्रज्वलित उस आते हुए बाण को देखकर अतिकाय ने अविचलित होकर शक्ति, ऋष्टि, गदा, कुठार, शूल और हल से उस पर प्रहार किया।

श्लोक 110 (yuddha.71.110)

तान्यायुधान्यद्भुतविग्रहाणि । मोघानि कृत्वा स शरोऽग्निदीप्तः । प्रसह्य तस्यैव किरीटजुष्टं । तदातिकायस्य शिरो जहार ॥ 71.110 ॥

tānyāyudhānyadbhutavigrahāṇi | moghāni kṛtvā sa śaro'gnidīptaḥ | prasahya tasyaiva kirīṭajuṣṭaṃ | tadātikāyasya śiro jahāra || 71.110 ||

उन विचित्र आकार वाले अस्त्रों को व्यर्थ करते हुए अग्नि के समान प्रज्वलित उस बाण ने बलपूर्वक अतिकाय के मुकुट-सहित सिर को उड़ा दिया।

श्लोक 111 (yuddha.71.111)

तच्छिरः सशिरस्त्राणम् लक्ष्मणेषुप्रपीडितम् । पपात सहसा भूमौ शृङ्गम् हिमवतो यथा ॥ 71.111 ॥

tacchiraḥ saśirastrāṇam lakṣmaṇeṣuprapīḍitam | papāta sahasā bhūmau śṛṅgam himavato yathā || 71.111 ||

लक्ष्मण के बाण से आहत, शिरस्त्राण-सहित वह सिर हिमालय के शिखर के समान सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ा।

श्लोक 112 (yuddha.71.112)

तं भूमौ पतितं दृष्ट्वा विक्षिप्ताम्बरभूषणम् । बभूवुर्व्यथिताः सर्वे हरशेषा निशाचराः ॥ 71.112 ॥

taṃ bhūmau patitaṃ dṛṣṭvā vikṣiptāmbarabhūṣaṇam | babhūvurvyathitāḥ sarve haraśeṣā niśācarāḥ || 71.112 ||

उसे भूमि पर गिरा हुआ, वस्त्र-आभूषण बिखरे हुए देखकर शेष बचे सभी निशाचर व्याकुल हो उठे।

श्लोक 113 (yuddha.71.113)

ते विषण्णमुखा दीनाः प्रहारजनितश्रमाः । विनेदुरुच्चैर्बहवः सहसा विस्वरैः स्वरैः ॥ 71.113 ॥

te viṣaṇṇamukhā dīnāḥ prahārajanitaśramāḥ | vineduruccairbahavaḥ sahasā visvaraiḥ svaraiḥ || 71.113 ||

उदास मुख, दीन और युद्ध-श्रम से थके हुए उनमें से अनेक सहसा ऊँचे और बेसुरे स्वरों में चिल्ला उठे।

श्लोक 114 (yuddha.71.114)

ततस्तत्परितो याता निरपेक्षा निशाचराः । पुरीमभिमुखा भीता द्रवन्तो नायके हते ॥ 71.114 ॥

tatastatparito yātā nirapekṣā niśācarāḥ | purīmabhimukhā bhītā dravanto nāyake hate || 71.114 ||

तब अपने नायक के मारे जाने पर निशाचर सब कुछ छोड़कर भयभीत होकर सब ओर से नगरी की ओर भागने लगे।

श्लोक 115 (yuddha.71.115)

प्रहर्षयुक्ता बहवस्तु वानरा । प्रबुद्धपद्मप्रतिमाननास्तदा । अपूजयम्ल्लक्ष्मणमिष्टभागिनं । हते रिपौ भीमबले दुरासदे ॥ 71.115 ॥

praharṣayuktā bahavastu vānarā | prabuddhapadmapratimānanāstadā | apūjayamllakṣmaṇamiṣṭabhāginaṃ | hate ripau bhīmabale durāsade || 71.115 ||

तब उस भीषण और दुर्धर्ष शत्रु के मारे जाने पर अनेक वानर हर्ष से भर उठे, उनके मुख खिले हुए कमल के समान हो गए, और उन्होंने अपनी इच्छा पूर्ण करने वाले लक्ष्मण का सम्मान किया।

श्लोक 116 (yuddha.71.116)

अतिबल मतिकायमभ्रकल्पं । युधि विनिपात्य स लक्ष्मणः प्रहृष्टः । त्वरितमथ तदा स रामपार्श्वं । कपिनिवहैश्च सुपूजितो जगाम ॥ 71.116 ॥

atibala matikāyamabhrakalpaṃ | yudhi vinipātya sa lakṣmaṇaḥ prahṛṣṭaḥ | tvaritamatha tadā sa rāmapārśvaṃ | kapinivahaiśca supūjito jagāma || 71.116 ||

युद्ध में मेघ के समान विशालकाय, अत्यंत बलवान अतिकाय को मार गिराकर हर्षित लक्ष्मण तब शीघ्र ही वानरों के समूह द्वारा सम्मानित होते हुए राम के पास पहुँचे।

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