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युद्धकाण्ड · सर्ग 72

रावण का शोक और लंका-रक्षा का आदेश

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श्लोक 1 (yuddha.72.1)

अतिकायं हतं श्रुत्वा लक्ष्मणेन महात्मना । उद्वेगमगमद्राजा वचनम् चेदमब्रवीत् ॥ 72.1 ॥

atikāyaṃ hataṃ śrutvā lakṣmaṇena mahātmanā | udvegamagamadrājā vacanam cedamabravīt || 72.1 ||

महात्मा लक्ष्मण के हाथों अतिकाय के मारे जाने का समाचार सुनकर राजा रावण व्याकुल हो उठे और यह वचन बोले।

श्लोक 2 (yuddha.72.2)

धूम्राक्षः परमामर्षी सर्वशस्त्रभृतां वरः । अकम्पनः प्रहस्तश्च कुम्भकर्णस्त्तथैव च ॥ 72.2 ॥

dhūmrākṣaḥ paramāmarṣī sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ | akampanaḥ prahastaśca kumbhakarṇasttathaiva ca || 72.2 ||

अत्यंत क्रोधी और समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ धूम्राक्ष; अकम्पन और प्रहस्त; तथा कुम्भकर्ण भी —

श्लोक 3 (yuddha.72.3)

एते महाबला वीरा राक्षसा युद्धकाङ्क्षिणः । जेतारः परसैन्यानां परैर्नित्यापराजिताः ॥ 72.3 ॥

ete mahābalā vīrā rākṣasā yuddhakāṅkṣiṇaḥ | jetāraḥ parasainyānāṃ parairnityāparājitāḥ || 72.3 ||

ये सभी महाबली और युद्ध के अभिलाषी वीर राक्षस, शत्रु-सेनाओं के विजेता, शत्रुओं से कभी पराजित न होने वाले —

श्लोक 4 (yuddha.72.4)

ससैन्यास्ते हता वीरा रामेणाक्लिष्टकर्मणा । राक्षसाः सुमहाकाया नानाशस्त्रविशारदाः ॥ अन्ये च बहवः शूरा महात्मानो निपातिताः ॥ 72.4 ॥

sasainyāste hatā vīrā rāmeṇākliṣṭakarmaṇā | rākṣasāḥ sumahākāyā nānāśastraviśāradāḥ || anye ca bahavaḥ śūrā mahātmāno nipātitāḥ || 72.4 ||

वे विशालकाय और नाना शस्त्रों में निपुण वीर राक्षस, अपनी सेनाओं सहित, अथक कर्मी राम के हाथों मारे गए; और अन्य भी अनेक शूरवीर महात्मा गिरा दिए गए।

श्लोक 5 (yuddha.72.5)

प्रख्यातबलवीर्येण पुत्रेणेन्द्रजिता मम ॥ तौ भ्रातरौ तदा बद्धौ घोरैर्दत्तवरैः शरैः ॥ 72.5 ॥

prakhyātabalavīryeṇa putreṇendrajitā mama || tau bhrātarau tadā baddhau ghorairdattavaraiḥ śaraiḥ || 72.5 ||

उस दिन बल और पराक्रम में विख्यात मेरे पुत्र इन्द्रजित ने वरदान-प्राप्त भयंकर बाणों से उन दोनों भाइयों को बाँध दिया था।

श्लोक 6 (yuddha.72.6)

यन्न शक्यम् सुरैः सर्वैरसुरैर्वा महाबलैः ॥ 72.6 ॥

yanna śakyam suraiḥ sarvairasurairvā mahābalaiḥ || 72.6 ||

वह भयंकर बन्धन, जिसे समस्त देवता या महाबली असुर भी नहीं छुड़ा सकते थे,

श्लोक 7 (yuddha.72.7)

मोक्तुम् तद् बन्धनम् घोरं यक्षगन्धर्वपन्नगैः । तन्न जाने प्रभावैर्वा मायया मोहनेन वा ॥ शरबन्धाद्विमुक्तौ तौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ 72.7 ॥

moktum tad bandhanam ghoraṃ yakṣagandharvapannagaiḥ | tanna jāne prabhāvairvā māyayā mohanena vā || śarabandhādvimuktau tau bhrātarau rāmalakṣmaṇau || 72.7 ||

न यक्ष, न गन्धर्व, न नाग ही उसे खोल सकते थे — उसी बाण-बन्धन से राम और लक्ष्मण, वे दोनों भाई, मुक्त हो गए; यह उनके स्वयं के प्रभाव से हुआ, माया से हुआ अथवा किसी मोहिनी शक्ति से — मैं नहीं जानता।

श्लोक 8 (yuddha.72.8)

ये योधा निर्गताः शूरा राक्षसा मम शासनात् । ते सर्वे निहता युद्धे वानरैः सुमहाबलैः ॥ 72.8 ॥

ye yodhā nirgatāḥ śūrā rākṣasā mama śāsanāt | te sarve nihatā yuddhe vānaraiḥ sumahābalaiḥ || 72.8 ||

मेरी आज्ञा से जो भी शूरवीर राक्षस योद्धा युद्ध के लिए निकले, वे सब महाबली वानरों द्वारा युद्ध में मारे गए।

श्लोक 9 (yuddha.72.9)

तं न पश्याम्यहम् युद्धे योऽद्य रामं सलक्ष्मणम् । नाशयेत्सबलम् वीरं ससुग्रीवविभीषणम् ॥ 72.9 ॥

taṃ na paśyāmyaham yuddhe yo'dya rāmaṃ salakṣmaṇam | nāśayetsabalam vīraṃ sasugrīvavibhīṣaṇam || 72.9 ||

आज मुझे युद्ध में ऐसा कोई नहीं दिखता जो लक्ष्मण, सुग्रीव और विभीषण सहित वीर राम को उनकी सेना समेत नष्ट कर सके।

श्लोक 10 (yuddha.72.10)

अहो सुबलवान् रामो महदस्त्रबलम् च वै ॥ यस्य विक्रममासाद्य राक्षसा निधनम् गताः ॥ 72.10 ॥

aho subalavān rāmo mahadastrabalam ca vai || yasya vikramamāsādya rākṣasā nidhanam gatāḥ || 72.10 ||

अहो! राम कितने बलवान हैं, और उनके अस्त्रों का बल कितना महान है — जिनके पराक्रम के सामने पड़कर राक्षस मृत्यु को प्राप्त हो गए!

श्लोक 11 (yuddha.72.11)

अप्रमत्तेश्च सर्वत्रा गुल्मै रक्ष्या पुरी त्वियम् ॥ अशोकवनिका चैव यत्र सीताभिरक्ष्यते ॥ 72.11 ॥

apramatteśca sarvatrā gulmai rakṣyā purī tviyam || aśokavanikā caiva yatra sītābhirakṣyate || 72.11 ||

इस नगरी की रक्षा सब ओर से सतर्क सैन्य-दलों द्वारा की जानी चाहिए — और उस अशोक वाटिका की भी, जहाँ सीता को रखा गया है।

श्लोक 12 (yuddha.72.12)

निष्क्रमो वा प्रवेशो वा ज्ञात्व्यः सर्वदैव नः ॥ यत्र यत्र भवेद्गुल्मस्तत्र तत्र पुनः पुनः ॥ 72.12 ॥

niṣkramo vā praveśo vā jñātvyaḥ sarvadaiva naḥ || yatra yatra bhavedgulmastatra tatra punaḥ punaḥ || 72.12 ||

जहाँ-जहाँ भी हमारी सैन्य-चौकी हो, वहाँ बार-बार यह जान लेना चाहिए कि कौन बाहर जा रहा है और कौन भीतर आ रहा है।

श्लोक 13 (yuddha.72.13)

सर्वतश्चापि तिष्ठध्वम् स्वैः स्वैः परिवृता बलैः ॥ द्रष्टव्यम् च पदम् तेषाम् वानराणां निशाचराः ॥ 72.13 ॥

sarvataścāpi tiṣṭhadhvam svaiḥ svaiḥ parivṛtā balaiḥ || draṣṭavyam ca padam teṣām vānarāṇāṃ niśācarāḥ || 72.13 ||

हे राक्षसो! अपनी-अपनी सेनाओं से घिरे हुए सब ओर डटे रहो, और उन वानरों की गतिविधियों पर दृष्टि रखो।

श्लोक 14 (yuddha.72.14)

प्रदोषे वार्धरात्रे वा प्रत्यूषे वापि सर्वशः ॥ 72.14 ॥

pradoṣe vārdharātre vā pratyūṣe vāpi sarvaśaḥ || 72.14 ||

चाहे संध्या हो, आधी रात हो अथवा प्रातःकाल — हर समय —

श्लोक 15 (yuddha.72.15)

नावज्ञा तत्र कर्तव्या वानरेषु कदाचन । द्विषतां बलमुद्युक्तमापतत्किं स्थितं तथा ॥ 72.15 ॥

nāvajñā tatra kartavyā vānareṣu kadācana | dviṣatāṃ balamudyuktamāpatatkiṃ sthitaṃ tathā || 72.15 ||

वानरों के प्रति कभी असावधानी नहीं बरतनी चाहिए; यह देखते रहो कि शत्रु-सेना कहीं तैयार तो नहीं हो रही, आगे तो नहीं बढ़ रही, या कहीं स्थिर तो नहीं खड़ी है।

श्लोक 16 (yuddha.72.16)

ततस्ते राक्षसाः सर्वे श्रुत्वा लङ्काधिपस्य तत् । वचनं सर्वमातिष्ठन् यथावत्तु महाबलाः ॥ 72.16 ॥

tataste rākṣasāḥ sarve śrutvā laṅkādhipasya tat | vacanaṃ sarvamātiṣṭhan yathāvattu mahābalāḥ || 72.16 ||

तब लंकापति के उन वचनों को सुनकर वे सभी महाबली राक्षस यथावत उनका पालन करने लगे।

श्लोक 17 (yuddha.72.17)

स तान् सर्वान् हि संदिश्य रावणो राक्षसाधिपः । मन्युशल्यम् वहन् दीनः प्रविवेश स्वमालयम् ॥ 72.17 ॥

sa tān sarvān hi saṃdiśya rāvaṇo rākṣasādhipaḥ | manyuśalyam vahan dīnaḥ praviveśa svamālayam || 72.17 ||

उन सबको इस प्रकार आदेश देकर राक्षसराज रावण, शोक की चुभन को हृदय में लिए हुए दीन भाव से अपने महल में चले गए।

श्लोक 18 (yuddha.72.18)

ततः स संदीपितकोपपह्नि- र्निशाचराणामधिपो महाबलः । तदेव पुत्रव्यसनम् विचिन्तयन् मुहुर्मुहुश्चैव तदा व्यनिःश्वसत् ॥ 72.18 ॥

tataḥ sa saṃdīpitakopapahnir niśācarāṇāmadhipo mahābalaḥ | tadeva putravyasanam vicintayan muhurmuhuścaiva tadā vyaniḥśvasat || 72.18 ||

तब वह महाबली निशाचरराज क्रोध की प्रज्वलित अग्नि से जलते हुए, बार-बार अपने पुत्र की मृत्यु का ही चिन्तन करते हुए, बारम्बार गहरी साँसें भरने लगे।

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