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युद्धकाण्ड · सर्ग 73

इन्द्रजित का यज्ञ और वानर-सेना का संहार

सर्ग 72सर्ग-सूचीसर्ग 74

श्लोक 1 (yuddha.73.1)

ततो हतान्राक्षसपुङ्गवांस्तान् । देवान्तकादित्रिशिरोऽतिकायान् । रक्षोगणास्तत्र हतावशिष्टास् । ते रावणाय त्वरितं शशंसुः ॥ 73.1 ॥

tato hatānrākṣasapuṅgavāṃstān | devāntakāditriśiro'tikāyān | rakṣogaṇāstatra hatāvaśiṣṭās | te rāvaṇāya tvaritaṃ śaśaṃsuḥ || 73.1 ||

तब वहाँ शेष बचे राक्षस-गण ने रावण को शीघ्र ही यह समाचार दिया कि देवान्तक, त्रिशिरा, अतिकाय आदि उन श्रेष्ठ राक्षसों का वध हो चुका है।

श्लोक 2 (yuddha.73.2)

ततो हतांस्तान्सहसा निशम्य । राजा मुमोहाश्रुपरिप्लुताक्षः । पुत्रक्षयं भ्रातृवधं च घोरं । विचिन्त्य राजा विपुलं प्रदध्यौ ॥ 73.2 ॥

tato hatāṃstānsahasā niśamya | rājā mumohāśrupariplutākṣaḥ | putrakṣayaṃ bhrātṛvadhaṃ ca ghoraṃ | vicintya rājā vipulaṃ pradadhyau || 73.2 ||

उनके वध का समाचार अचानक सुनकर राजा मूर्च्छित हो गए, उनके नेत्रों से अश्रु बह चले; अपने पुत्र की मृत्यु और भाइयों के भीषण वध का चिन्तन करते हुए राजा गहन विचार में डूब गए।

श्लोक 3 (yuddha.73.3)

ततस्तु राजानमुदीक्ष्य दीनं । शोकार्णवे सम्परिपुप्लुवानम् । अथर्षभो राक्षसराजसूनुर् । अथेन्द्रजिद्वाक्यमिदं बभाषे ॥ 73.3 ॥

tatastu rājānamudīkṣya dīnaṃ | śokārṇave samparipupluvānam | atharṣabho rākṣasarājasūnur | athendrajidvākyamidaṃ babhāṣe || 73.3 ||

तब राजा को दीन और शोक-सागर में पूर्णतः डूबा हुआ देखकर, राक्षसराज के श्रेष्ठ पुत्र इन्द्रजित ने यह वचन कहा।

श्लोक 4 (yuddha.73.4)

न तात मोहं प्रतिगन्तुमर्हसि । यत्रेन्द्रजिज्जीवति राक्षसेन्द्र । नेन्द्रारिबाणाभिहतो हि कश् चित् । प्राणान्समर्थः समरेऽभिधर्तुम् ॥ 73.4 ॥

na tāta mohaṃ pratigantumarhasi | yatrendrajijjīvati rākṣasendra | nendrāribāṇābhihato hi kaś cit | prāṇānsamarthaḥ samare'bhidhartum || 73.4 ||

'पिताजी, हे राक्षसराज! जब तक इन्द्रजित जीवित है, आपको मोहग्रस्त होने की आवश्यकता नहीं। इन्द्र के शत्रु के बाणों से आहत होकर कोई भी युद्ध में अपने प्राण नहीं बचा सकता।'

श्लोक 5 (yuddha.73.5)

पश्याद्य रामं सहलक्ष्मणेन । मद्बाणनिर्भिन्नविकीर्णदेहम् । गतायुषं भूमितले शयानं । शरैः शितैराचितसर्वगात्रम् ॥ 73.5 ॥

paśyādya rāmaṃ sahalakṣmaṇena | madbāṇanirbhinnavikīrṇadeham | gatāyuṣaṃ bhūmitale śayānaṃ | śaraiḥ śitairācitasarvagātram || 73.5 ||

'आज आप राम को लक्ष्मण सहित देखेंगे, मेरे बाणों से छिन्न-भिन्न शरीर वाले, प्राणहीन, भूमि पर पड़े हुए, तीखे बाणों से बिंधे हुए सर्वांग वाले।'

श्लोक 6 (yuddha.73.6)

इमां प्रतिज्ञां शृणु शक्रशत्रोः । सुनिश्चितां पौरुषदैवयुक्ताम् । अद्यैव रामं सहलक्ष्मणेन । सन्तापयिष्यामि शरैरमोघैः ॥ 73.6 ॥

imāṃ pratijñāṃ śṛṇu śakraśatroḥ | suniścitāṃ pauruṣadaivayuktām | adyaiva rāmaṃ sahalakṣmaṇena | santāpayiṣyāmi śarairamoghaiḥ || 73.6 ||

'इन्द्र के शत्रु की यह दृढ़ प्रतिज्ञा सुनिए, जो पौरुष और दैव दोनों से युक्त है: आज ही मैं राम को लक्ष्मण सहित अपने अमोघ बाणों से संतप्त कर दूँगा।'

श्लोक 7 (yuddha.73.7)

अद्येन्द्रवैवस्वतविष्णुमित्र । साध्याश्विवैश्वानरचन्द्रसूर्याः । द्रक्ष्यन्ति मे विक्रममप्रमेयं । विष्णोरिवोग्रं बलियज्ञवाटे ॥ 73.7 ॥

adyendravaivasvataviṣṇumitra | sādhyāśvivaiśvānaracandrasūryāḥ | drakṣyanti me vikramamaprameyaṃ | viṣṇorivograṃ baliyajñavāṭe || 73.7 ||

'आज इन्द्र, यम, विष्णु, मित्र, साध्यगण, अश्विनीकुमार, अग्नि, चन्द्र और सूर्य — सब मेरे अप्रमेय पराक्रम को देखेंगे, जैसे बलि के यज्ञ-मण्डप में विष्णु का उग्र पराक्रम देखा गया था।'

श्लोक 8 (yuddha.73.8)

स एवमुक्त्वा त्रिदशेन्द्रशत्रुर् । आपृच्छ्य राजानमदीनसत्त्वः । समारुरोहानिलतुल्यवेगं । रथं खरश्रेष्ठसमाधियुक्तम् ॥ 73.8 ॥

sa evamuktvā tridaśendraśatrur | āpṛcchya rājānamadīnasattvaḥ | samārurohānilatulyavegaṃ | rathaṃ kharaśreṣṭhasamādhiyuktam || 73.8 ||

यह कहकर, अदीन-चित्त वह त्रिदशेन्द्र-शत्रु राजा से आज्ञा लेकर, वायु के समान वेगवान, श्रेष्ठ खच्चरों से युक्त अपने रथ पर आरूढ़ हुआ।

श्लोक 9 (yuddha.73.9)

समास्थाय महातेजा रथं हरिरथोपमम् । जगाम सहसा तत्र यत्र युद्धमरिन्दम ॥ 73.9 ॥

samāsthāya mahātejā rathaṃ harirathopamam | jagāma sahasā tatra yatra yuddhamarindama || 73.9 ||

सूर्य के रथ के समान उस रथ पर आरूढ़ होकर वह महातेजस्वी शत्रुदमन तुरन्त वहाँ पहुँचा जहाँ युद्ध चल रहा था।

श्लोक 10 (yuddha.73.10)

तं प्रस्थितं महात्मानमनुजग्मुर्महाबलाः । संहर्षमाणा बहवो धनुःप्रवरपाणयः ॥ 73.10 ॥

taṃ prasthitaṃ mahātmānamanujagmurmahābalāḥ | saṃharṣamāṇā bahavo dhanuḥpravarapāṇayaḥ || 73.10 ||

जब वह महात्मा आगे बढ़ा, तब हर्षित होते हुए अनेक महाबली राक्षस उत्तम धनुष हाथों में लिए उसके पीछे चल पड़े,

श्लोक 11 (yuddha.73.11)

गजस्कन्धगताः के चित्के चित्परमवाजिभिः । व्याघ्रवृश्चिकमार्जारखरोष्ट्ट्रैश्च भुजम्गमैः ॥ 73.11 ॥

gajaskandhagatāḥ ke citke citparamavājibhiḥ | vyāghravṛścikamārjārakharoṣṭṭraiśca bhujamgamaiḥ || 73.11 ||

कुछ हाथियों के कंधों पर सवार, कुछ उत्तम घोड़ों पर, और कुछ बाघों, बिच्छुओं, बिल्लियों, गधों, ऊँटों तथा सर्पों पर सवार थे,

श्लोक 12 (yuddha.73.12)

वराहैः श्वापदैः सिम्हैर्जम्बुकैः पर्वतोपमैः । काकहंसमयूरैश्च राक्षसा भीमविक्रमाः ॥ 73.12 ॥

varāhaiḥ śvāpadaiḥ simhairjambukaiḥ parvatopamaiḥ | kākahaṃsamayūraiśca rākṣasā bhīmavikramāḥ || 73.12 ||

वे भयंकर पराक्रम वाले राक्षस सूअरों, हिंसक पशुओं, सिंहों, पर्वत के समान विशाल गीदड़ों, तथा कौवों, हंसों और मोरों पर भी सवार थे,

श्लोक 13 (yuddha.73.13)

प्रासमुद्गरनिस्त्रिंश परश्वधगदाधराः । भुशुण्डिमुद्गरायष्टिशतग्नीपरिघायुधाः ॥ 73.13 ॥

prāsamudgaranistriṃśa paraśvadhagadādharāḥ | bhuśuṇḍimudgarāyaṣṭiśatagnīparighāyudhāḥ || 73.13 ||

वे भाले, हथौड़े, तलवार, कुल्हाड़ी और गदा धारण किए हुए थे, तथा भुशुण्डि, मुद्गर, लाठी, शतघ्नी और परिघ जैसे शस्त्रों से सुसज्जित थे।

श्लोक 14 (yuddha.73.14)

स शङ्खनिनदैर्भीमैर्भेरीणां च महास्वनैः । जगाम त्रिदशेन्द्रारिः स्तूयमानो निशाचरैः ॥ 73.14 ॥

sa śaṅkhaninadairbhīmairbherīṇāṃ ca mahāsvanaiḥ | jagāma tridaśendrāriḥ stūyamāno niśācaraiḥ || 73.14 ||

शंखों की भयंकर ध्वनि और नगाड़ों की महागर्जना के बीच, निशाचरों द्वारा स्तुति किया जाता हुआ वह इन्द्र-शत्रु आगे बढ़ा।

श्लोक 15 (yuddha.73.15)

स शङ्खशशिवर्णेन छत्रेण रिपुसादनः । रराज परिपूर्णेन नभश्चन्द्रमसा यथा ॥ 73.15 ॥

sa śaṅkhaśaśivarṇena chatreṇa ripusādanaḥ | rarāja paripūrṇena nabhaścandramasā yathā || 73.15 ||

शंख और चन्द्रमा के समान श्वेत छत्र से आच्छादित वह शत्रु-संतापक इस प्रकार सुशोभित हो रहा था जैसे पूर्ण चन्द्रमा से आकाश।

श्लोक 16 (yuddha.73.16)

अवीज्यत ततो वीरो हैमैर्हेमविभूषितैः । चारुचामरमुख्यैश्च मुख्यः सर्वधनुष्मताम् ॥ 73.16 ॥

avījyata tato vīro haimairhemavibhūṣitaiḥ | cārucāmaramukhyaiśca mukhyaḥ sarvadhanuṣmatām || 73.16 ||

सभी धनुर्धरों में श्रेष्ठ वह वीर सुन्दर, स्वर्ण से सुसज्जित प्रमुख चँवरों से पंखा किया जा रहा था।

श्लोक 17 (yuddha.73.17)

स तु दृष्ट्वा विनिर्यान्तम् बलेन महता वृतम् । राक्षसाधिपतिः श्रीमान् रावणः पुत्रमब्रवीत् ॥ 73.17 ॥

sa tu dṛṣṭvā viniryāntam balena mahatā vṛtam | rākṣasādhipatiḥ śrīmān rāvaṇaḥ putramabravīt || 73.17 ||

उसे विशाल सेना से घिरा हुआ प्रस्थान करते देखकर श्रीमान राक्षसराज रावण ने अपने पुत्र से कहा।

श्लोक 18 (yuddha.73.18)

त्वमप्रतिरथः पुत्र त्वया वै वासवो जितः । किम्पुनर्मानुषम् धृष्यम् निहनिष्यसि राघवम् ॥ तथोक्तो राक्षसेन्द्रेण प्रत्यगृह्णान्महाश्षः ॥ 73.18 ॥

tvamapratirathaḥ putra tvayā vai vāsavo jitaḥ | kimpunarmānuṣam dhṛṣyam nihaniṣyasi rāghavam || tathokto rākṣasendreṇa pratyagṛhṇānmahāśṣaḥ || 73.18 ||

'हे पुत्र! तुम्हारे समान कोई रथी नहीं है, तुमने तो इन्द्र तक को जीत लिया। फिर इस मानव राघव को, जो सहज ही वध्य है, मारने में क्या कठिनाई है?' राक्षसराज के इन वचनों को सुनकर उस महाधनुर्धर ने उनका आशीर्वाद ग्रहण किया।

श्लोक 19 (yuddha.73.19)

ततस्त्विन्द्रजिता लङ्का सूर्यप्रतिमतेजसा ॥ रराजाप्रतिवीर्येण द्यौरिवार्केण भास्वता ॥ 73.19 ॥

tatastvindrajitā laṅkā sūryapratimatejasā || rarājāprativīryeṇa dyaurivārkeṇa bhāsvatā || 73.19 ||

तब सूर्य के समान तेजस्वी और अद्वितीय पराक्रमी इन्द्रजित से लंका इस प्रकार सुशोभित हुई जैसे देदीप्यमान सूर्य से आकाश।

श्लोक 20 (yuddha.73.20)

स सम्प्राप्य महातेजा युद्धभूमिमरिन्दमः ॥ स्थापयामास रक्षांसि रथं प्रति समन्ततः ॥ 73.20 ॥

sa samprāpya mahātejā yuddhabhūmimarindamaḥ || sthāpayāmāsa rakṣāṃsi rathaṃ prati samantataḥ || 73.20 ||

युद्धभूमि में पहुँचकर उस महातेजस्वी शत्रुदमन ने अपने रथ के चारों ओर राक्षसों को खड़ा कर दिया।

श्लोक 21 (yuddha.73.21)

ततस्तु हुतभोक्तारं हुतभुक्सदृशप्रभः ॥ जुहुवे राक्षसश्रेष्ठो मन्त्रवद्विधिवत्तदा ॥ 73.21 ॥

tatastu hutabhoktāraṃ hutabhuksadṛśaprabhaḥ || juhuve rākṣasaśreṣṭho mantravadvidhivattadā || 73.21 ||

तब अग्नि के समान तेजस्वी वह राक्षसश्रेष्ठ मंत्रोच्चार सहित विधिपूर्वक हवि-भोक्ता अग्नि को हवन करने लगा।

श्लोक 22 (yuddha.73.22)

स हविर्जालसंस्कारैर्माल्यगन्धपुरस्कृतैः ॥ जुहुवे पावकं तत्र राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ॥ 73.22 ॥

sa havirjālasaṃskārairmālyagandhapuraskṛtaiḥ || juhuve pāvakaṃ tatra rākṣasendraḥ pratāpavān || 73.22 ||

उस पराक्रमी राक्षसराज ने माला और सुगन्ध से सुसज्जित हवि-सामग्री से वहाँ अग्नि में आहुति दी।

श्लोक 23 (yuddha.73.23)

शस्त्राणि शरपत्राणि समिधोऽथ विभीतकः ॥ लोहितानि च वासांसि स्रुवं कार्ष्णायसं तथा ॥ 73.23 ॥

śastrāṇi śarapatrāṇi samidho'tha vibhītakaḥ || lohitāni ca vāsāṃsi sruvaṃ kārṣṇāyasaṃ tathā || 73.23 ||

उसके शस्त्र ही समिधा-रूप शर-पत्र बने, विभीतक की लकड़ी ईंधन बनी, लाल वस्त्र अर्पित किए गए, और स्रुवा लौह की बनी थी।

श्लोक 24 (yuddha.73.24)

स तत्राग्निं समास्तीर्य शरपत्रैः सतोमरैः ॥ छागस्य सर्वकृष्णस्य गलं जग्राह जीवतः ॥ 73.24 ॥

sa tatrāgniṃ samāstīrya śarapatraiḥ satomaraiḥ || chāgasya sarvakṛṣṇasya galaṃ jagrāha jīvataḥ || 73.24 ||

वहाँ शर-पत्रों और भालों सहित अग्नि को फैलाकर उसने एक जीवित, सर्वांग काले बकरे के गले को पकड़ लिया।

श्लोक 25 (yuddha.73.25)

सकृदेव समिद्धस्य विधूमस्य महार्चिषः ॥ बभूवुस्तानि लिङ्गानि विजयं यान्यदर्शयन् ॥ 73.25 ॥

sakṛdeva samiddhasya vidhūmasya mahārciṣaḥ || babhūvustāni liṅgāni vijayaṃ yānyadarśayan || 73.25 ||

जैसे ही वह विशाल ज्वाला धुआँरहित होकर प्रज्वलित हुई, वैसे ही विजय के सूचक वे शुभ चिह्न प्रकट हुए।

श्लोक 26 (yuddha.73.26)

प्रदक्षिणावर्तशिखस्तप्तकाञ्चनसंनिभः ॥ हविस्तत्प्रतिजग्राह पावकः स्वयमुत्थितः ॥ 73.26 ॥

pradakṣiṇāvartaśikhastaptakāñcanasaṃnibhaḥ || havistatpratijagrāha pāvakaḥ svayamutthitaḥ || 73.26 ||

तपे हुए स्वर्ण के समान वह अग्नि, अपनी लपटों को दाहिनी ओर घुमाते हुए, स्वयं उठकर उस आहुति को ग्रहण करने लगी।

श्लोक 27 (yuddha.73.27)

सोऽस्त्रमाहारयामास ब्राह्ममस्त्रविदां वरः ॥ धनुश्चात्मरथं चैव सर्वं तत्राभ्यमन्त्रयत् ॥ 73.27 ॥

so'stramāhārayāmāsa brāhmamastravidāṃ varaḥ || dhanuścātmarathaṃ caiva sarvaṃ tatrābhyamantrayat || 73.27 ||

अस्त्रविद्या में श्रेष्ठ उसने ब्रह्मास्त्र का आवाहन किया और अपने धनुष, रथ तथा समस्त साधनों को उससे अभिमंत्रित किया।

श्लोक 28 (yuddha.73.28)

तस्मिन्नाहूयमानेऽस्त्रे हूयमाने च पावके ॥ सार्कग्रहेन्दु नक्षत्रं वितत्रास नभस्तलम् ॥ 73.28 ॥

tasminnāhūyamāne'stre hūyamāne ca pāvake || sārkagrahendu nakṣatraṃ vitatrāsa nabhastalam || 73.28 ||

जब वह अस्त्र आवाहित हो रहा था और अग्नि में आहुति दी जा रही थी, तब सूर्य, ग्रह, चन्द्र और नक्षत्रों सहित समस्त आकाश-मण्डल भयभीत होकर काँप उठा।

श्लोक 29 (yuddha.73.29)

स पावकं पावकदीप्ततेजा । हुत्वा महेन्द्रप्रतिमप्रभावः । स चापबाणासिरथाश्वसूतः । खेऽन्तर्दध आत्मानमचिन्त्यरूपः ॥ 73.29 ॥

sa pāvakaṃ pāvakadīptatejā | hutvā mahendrapratimaprabhāvaḥ | sa cāpabāṇāsirathāśvasūtaḥ | khe'ntardadha ātmānamacintyarūpaḥ || 73.29 ||

अग्नि के समान तेजस्वी और महेन्द्र के समान पराक्रमी उसने अग्नि में आहुति देकर, अचिन्त्य रूप धारण किए हुए, अपने धनुष, बाण, तलवार, रथ, अश्व और सारथी सहित स्वयं को आकाश में अदृश्य कर लिया।

श्लोक 30 (yuddha.73.30)

ततो हयरथाकीर्णं पताकाध्वजशोभितम् । निर्ययौ राक्षसबलम् नर्दमानम् युयुत्सया ॥ 73.30 ॥

tato hayarathākīrṇaṃ patākādhvajaśobhitam | niryayau rākṣasabalam nardamānam yuyutsayā || 73.30 ||

तब अश्वों और रथों से भरी, ध्वजा-पताकाओं से सुशोभित वह राक्षस-सेना गर्जना करती हुई युद्धेच्छा से आगे बढ़ी।

श्लोक 31 (yuddha.73.31)

ते शरैर्बहुभिश्चित्रैस्तीक्षणवेगैरलङ्कृतैः । तोमरैरङ्कुशश्चापि वानरान् जघ्नुराहवे ॥ 73.31 ॥

te śarairbahubhiścitraistīkṣaṇavegairalaṅkṛtaiḥ | tomarairaṅkuśaścāpi vānarān jaghnurāhave || 73.31 ||

अनेक विचित्र, तीक्ष्ण और वेगवान बाणों से तथा भालों और अंकुशों से भी उन्होंने युद्ध में वानरों पर प्रहार किया।

श्लोक 32 (yuddha.73.32)

रावणिस्तु सुसम्क्रुद्धस्तान्निरीक्ष्य निशाचरान् । हृष्टा भवन्तो युध्यन्तु वानराणां जिघांसया ॥ 73.32 ॥

rāvaṇistu susamkruddhastānnirīkṣya niśācarān | hṛṣṭā bhavanto yudhyantu vānarāṇāṃ jighāṃsayā || 73.32 ||

अत्यंत क्रुद्ध रावण-पुत्र ने उन निशाचरों की ओर देखकर कहा: 'हर्षपूर्वक वानरों के वध की इच्छा से युद्ध करो।'

श्लोक 33 (yuddha.73.33)

ततस्ते राक्षसाः सर्वे गर्जन्तो जयकाङिक्षिणः । अभ्यवर्षंस्ततो घोरं वानरान् शरवृष्टिभिः ॥ 73.33 ॥

tataste rākṣasāḥ sarve garjanto jayakāṅikṣiṇaḥ | abhyavarṣaṃstato ghoraṃ vānarān śaravṛṣṭibhiḥ || 73.33 ||

तब विजय की कामना से गर्जना करते हुए वे सभी राक्षस वानरों पर भयंकर बाण-वर्षा करने लगे।

श्लोक 34 (yuddha.73.34)

स तु नालीकनाराचैर्गदाभिर्मुसलैरपि । रक्षोभिः संवृतः संख्ये वानरान् विचकर्त ह ॥ 73.34 ॥

sa tu nālīkanārācairgadābhirmusalairapi | rakṣobhiḥ saṃvṛtaḥ saṃkhye vānarān vicakarta ha || 73.34 ||

अपने राक्षसों से घिरा हुआ वह नालीक और नाराच बाणों से, गदाओं और मूसलों से भी युद्ध में वानरों को घायल करने लगा।

श्लोक 35 (yuddha.73.35)

ते वध्यमानाः समरे वानराः पादपायुधाः । अभ्यवर्षन्त सहसा रावणिं शैलपादपैः ॥ 73.35 ॥

te vadhyamānāḥ samare vānarāḥ pādapāyudhāḥ | abhyavarṣanta sahasā rāvaṇiṃ śailapādapaiḥ || 73.35 ||

युद्ध में मारे जाते हुए वे वृक्ष-शस्त्रधारी वानर सहसा रावण-पुत्र पर पर्वतों और वृक्षों की वर्षा करने लगे।

श्लोक 36 (yuddha.73.36)

इन्द्रजित्तु तदा क्रुद्धो महातेजा महाबलः । वानराणां शरीराणि व्यधमद्रावणात्मजः ॥ 73.36 ॥

indrajittu tadā kruddho mahātejā mahābalaḥ | vānarāṇāṃ śarīrāṇi vyadhamadrāvaṇātmajaḥ || 73.36 ||

तब महातेजस्वी और महाबली रावण-पुत्र इन्द्रजित क्रुद्ध होकर वानरों के शरीरों को विदीर्ण करने लगा।

श्लोक 37 (yuddha.73.37)

शरेणैकेन च हरीन्नव पञ्च च सप्त च । बिभेद समरे क्रुद्धो राक्षसान् संप्रहर्षयन् ॥ 73.37 ॥

śareṇaikena ca harīnnava pañca ca sapta ca | bibheda samare kruddho rākṣasān saṃpraharṣayan || 73.37 ||

क्रुद्ध होकर वह एक ही बाण से नौ, पाँच अथवा सात वानरों को एक साथ बींध देता, जिससे राक्षस अत्यंत हर्षित होते।

श्लोक 38 (yuddha.73.38)

स शरैः सूर्यसम्काशैः शातकुम्भविभूषणैः । वानरान् समरे वीरः प्रममाथ सुदुर्जयः ॥ 73.38 ॥

sa śaraiḥ sūryasamkāśaiḥ śātakumbhavibhūṣaṇaiḥ | vānarān samare vīraḥ pramamātha sudurjayaḥ || 73.38 ||

सूर्य के समान चमकते और स्वर्ण से सुसज्जित बाणों से वह दुर्जय वीर युद्ध में वानरों को कुचलने लगा।

श्लोक 39 (yuddha.73.39)

ते भिन्नगात्राः समरे वानराः शरपीडिताः । पेतुर्मथितसंकल्पाः सुरैरिव महासुराः ॥ 73.39 ॥

te bhinnagātrāḥ samare vānarāḥ śarapīḍitāḥ | peturmathitasaṃkalpāḥ surairiva mahāsurāḥ || 73.39 ||

बाणों से पीड़ित, अंग-भंग हुए वे वानर उसी प्रकार धराशायी हो गए, संकल्प टूट गया, जैसे देवताओं के सामने महासुर गिरे थे।

श्लोक 40 (yuddha.73.40)

ते तपन्तमिवादित्यं घोरैर्बाणगभस्तिभिः । अभ्याधावन्त सम्क्रुद्धाः सम्युगे वानरर्षभाः ॥ 73.40 ॥

te tapantamivādityaṃ ghorairbāṇagabhastibhiḥ | abhyādhāvanta samkruddhāḥ samyuge vānararṣabhāḥ || 73.40 ||

अपने भयंकर बाण-रूपी किरणों से तपाने वाले उस सूर्य के समान उसके ऊपर क्रुद्ध होकर वे श्रेष्ठ वानर युद्ध में टूट पड़े।

श्लोक 41 (yuddha.73.41)

ततस्तु वानराः सर्वे भिन्नदेहा विचेतसः । व्यथिता विद्रवन्ति स्म रुधिरेण समुक्षिताः ॥ 73.41 ॥

tatastu vānarāḥ sarve bhinnadehā vicetasaḥ | vyathitā vidravanti sma rudhireṇa samukṣitāḥ || 73.41 ||

तब समस्त वानर, अंग-भंग हुए, चेतनाशून्य, व्यथित और रक्त से लथपथ होकर भाग खड़े हुए।

श्लोक 42 (yuddha.73.42)

तामस्यार्थे पराक्रम्य वानरास्त्यक्तजीविताः । नर्दन्तस्तेऽनिवृत्तास्तु समरे सशिलायुधाः ॥ 73.42 ॥

tāmasyārthe parākramya vānarāstyaktajīvitāḥ | nardantaste'nivṛttāstu samare saśilāyudhāḥ || 73.42 ||

फिर भी राम के हित पराक्रम दिखाते हुए, प्राणों की चिन्ता छोड़कर, गर्जना करते हुए वे वानर पत्थरों को शस्त्र बनाए युद्धभूमि से पीछे नहीं हटे।

श्लोक 43 (yuddha.73.43)

ते द्रुमैः पर्वताग्रैश्च शिलाभिश्च प्लवंगमाः । अभ्यवर्षन्त समरे रावणिं समवस्थिताः ॥ 73.43 ॥

te drumaiḥ parvatāgraiśca śilābhiśca plavaṃgamāḥ | abhyavarṣanta samare rāvaṇiṃ samavasthitāḥ || 73.43 ||

युद्धभूमि में डटे हुए वे वानर रावण-पुत्र पर वृक्षों, पर्वत-शिखरों और शिलाओं की वर्षा करने लगे।

श्लोक 44 (yuddha.73.44)

तं द्रुमाणाम् शिलानां च वर्षं प्राणहरं महत् । व्यपोहत महातेजा रावणिः समितिंजयः ॥ 73.44 ॥

taṃ drumāṇām śilānāṃ ca varṣaṃ prāṇaharaṃ mahat | vyapohata mahātejā rāvaṇiḥ samitiṃjayaḥ || 73.44 ||

उस महातेजस्वी और युद्ध-विजेता रावण-पुत्र ने वृक्षों और शिलाओं की उस विशाल, प्राणघातक वर्षा को निवारित कर दिया।

श्लोक 45 (yuddha.73.45)

ततः पावकसंकाशैः शरैराशीविषोपमैः । वानराणामनीकानि बिभेद समरे प्रभुः ॥ 73.45 ॥

tataḥ pāvakasaṃkāśaiḥ śarairāśīviṣopamaiḥ | vānarāṇāmanīkāni bibheda samare prabhuḥ || 73.45 ||

तब उस समर्थ स्वामी ने अग्नि के समान चमकते और सर्प के समान विषैले बाणों से युद्ध में वानरों की सेनाओं को छिन्न-भिन्न कर दिया।

श्लोक 46 (yuddha.73.46)

अष्टादशशरैस्तीक्षणैः स विद्ध्वा गन्धमादनम् । विव्याध नवभिश्चैव नलं दूरादवस्थितम् ॥ 73.46 ॥

aṣṭādaśaśaraistīkṣaṇaiḥ sa viddhvā gandhamādanam | vivyādha navabhiścaiva nalaṃ dūrādavasthitam || 73.46 ||

गन्धमादन को अठारह तीक्ष्ण बाणों से बींधकर उसने दूर खड़े नल को भी नौ बाणों से बींध दिया।

श्लोक 47 (yuddha.73.47)

सप्तभिस्तु महावीर्यो मैन्दं मर्मविदारणैः । पञ्चभिर्विशिखैश्चैव गजम् विव्याध संयुगे ॥ 73.47 ॥

saptabhistu mahāvīryo maindaṃ marmavidāraṇaiḥ | pañcabhirviśikhaiścaiva gajam vivyādha saṃyuge || 73.47 ||

उस महापराक्रमी ने मर्मभेदी सात बाणों से मैन्द को और पाँच बाणों से गज को भी युद्ध में बींध डाला।

श्लोक 48 (yuddha.73.48)

जाम्बवन्तं तु दशभिर्नीलं त्रिंशद्भिरेव च । सुग्रीवमृषभं चैव सोऽङ्गदम् द्विविदं तथा ॥ घोरैर्दत्तवरैस्तीक्षणैर्निष्प्राणानकरोत्तदा ॥ 73.48 ॥

jāmbavantaṃ tu daśabhirnīlaṃ triṃśadbhireva ca | sugrīvamṛṣabhaṃ caiva so'ṅgadam dvividaṃ tathā || ghorairdattavaraistīkṣaṇairniṣprāṇānakarottadā || 73.48 ||

जाम्बवान को दस बाणों से और नील को तीस बाणों से बींधा; तथा सुग्रीव, ऋषभ, अंगद और द्विविद को भी अपने भयंकर, वरदान-प्राप्त तीक्ष्ण बाणों से प्राणहीन-सा कर दिया।

श्लोक 49 (yuddha.73.49)

अन्यानपि तदा मुख्यान्वानरान् बहुभिः शरैः ॥ अर्दयामास सम्क्रुद्धः कालाग्निरिव मूर्च्छितः ॥ 73.49 ॥

anyānapi tadā mukhyānvānarān bahubhiḥ śaraiḥ || ardayāmāsa samkruddhaḥ kālāgniriva mūrcchitaḥ || 73.49 ||

क्रुद्ध और प्रलयाग्नि के समान प्रज्वलित वह तब अन्य प्रमुख वानरों को भी अनेक बाणों से पीड़ित करने लगा।

श्लोक 50 (yuddha.73.50)

स शरैः सूर्यसम्काशैः सुमुखैः शीग्रगामिभिः ॥ वानराणामनीकानि निर्ममन्थ महारणे ॥ 73.50 ॥

sa śaraiḥ sūryasamkāśaiḥ sumukhaiḥ śīgragāmibhiḥ || vānarāṇāmanīkāni nirmamantha mahāraṇe || 73.50 ||

सूर्य के समान चमकते, सुमुख और शीघ्रगामी बाणों से उसने उस महासमर में वानरों की सेनाओं को कुचल डाला।

श्लोक 51 (yuddha.73.51)

आकुलां वानरीम् सेनां शरजालेन पीडिताम् ॥ हृष्टः स परया प्रीत्या ददर्श क्षतजोक्षिताम् ॥ 73.51 ॥

ākulāṃ vānarīm senāṃ śarajālena pīḍitām || hṛṣṭaḥ sa parayā prītyā dadarśa kṣatajokṣitām || 73.51 ||

व्याकुल, बाण-जाल से पीड़ित और रक्त से सिंचित उस वानर-सेना को वह अत्यंत प्रसन्नता से देखने लगा।

श्लोक 52 (yuddha.73.52)

पुनरेव महातेजा राक्षसेन्द्रात्मजो बली ॥ 73.52 ॥

punareva mahātejā rākṣasendrātmajo balī || 73.52 ||

तब पुनः वह महातेजस्वी और बलवान राक्षसराज-पुत्र,

श्लोक 53 (yuddha.73.53)

संसृज्य बाणवर्षं च शस्त्रवर्षं च दारुणम् । ममर्द वानरानीकं परितस्त्विन्द्रजिद्बली ॥ 73.53 ॥

saṃsṛjya bāṇavarṣaṃ ca śastravarṣaṃ ca dāruṇam | mamarda vānarānīkaṃ paritastvindrajidbalī || 73.53 ||

बाणों और भयंकर शस्त्रों की वर्षा एक साथ करते हुए, उस बलवान इन्द्रजित ने वानर-सेना को चारों ओर से रौंद डाला।

श्लोक 54 (yuddha.73.54)

स सैन्यमुत्सृज्य समेत्य तूर्णं । महारणे वानरवाहिनीषु । अदृश्यमानः शरजालमुग्रं । ववर्ष नीलाम्बुधरो यथाम्बु ॥ 73.54 ॥

sa sainyamutsṛjya sametya tūrṇaṃ | mahāraṇe vānaravāhinīṣu | adṛśyamānaḥ śarajālamugraṃ | vavarṣa nīlāmbudharo yathāmbu || 73.54 ||

अपनी सेना को छोड़कर, उस महासमर में वानर-सेनाओं के निकट शीघ्र पहुँचकर, अदृश्य होकर उसने बाणों का भीषण जाल इस प्रकार बरसाया जैसे काला मेघ जल बरसाता है।

श्लोक 55 (yuddha.73.55)

ते शक्रजिद्बाणविशीर्णदेहा । मायाहता विस्वरमुन्नदन्तः । रणे निपेतुर्हरयोऽद्रिकल्पा । यथेन्द्रवज्राभिहता नगेन्द्राः ॥ 73.55 ॥

te śakrajidbāṇaviśīrṇadehā | māyāhatā visvaramunnadantaḥ | raṇe nipeturharayo'drikalpā | yathendravajrābhihatā nagendrāḥ || 73.55 ||

इन्द्रजित के बाणों से शरीर छिन्न-भिन्न हो जाने पर, माया से आहत, बेसुरे स्वर में चिल्लाते हुए, पर्वत के समान विशाल वे वानर युद्ध में उसी प्रकार गिर पड़े जैसे इन्द्र के वज्र से आहत पर्वत गिरते हैं।

श्लोक 56 (yuddha.73.56)

ते केवलं सन्ददृशुः शिताग्रान् । बाणान्रणे वानरवाहिनीषु । माया निगूढं च सुरेन्द्रशत्रुं । न चात्र तं राक्षसमभ्यपश्यन् ॥ 73.56 ॥

te kevalaṃ sandadṛśuḥ śitāgrān | bāṇānraṇe vānaravāhinīṣu | māyā nigūḍhaṃ ca surendraśatruṃ | na cātra taṃ rākṣasamabhyapaśyan || 73.56 ||

युद्ध में वानर-सेनाओं पर गिरते हुए वे केवल तीक्ष्ण बाणों को ही देख पाते थे; माया से छिपे उस इन्द्र-शत्रु राक्षस को वे कहीं देख नहीं पाते थे।

श्लोक 57 (yuddha.73.57)

ततः स रक्षोऽधिपतिर्महात्मा । सर्वा दिशो बाणगणैः शिताग्रैः । प्रच्छादयामास रविप्रकाशैर् । विषादयामास च वानरेन्द्रान् ॥ 73.57 ॥

tataḥ sa rakṣo'dhipatirmahātmā | sarvā diśo bāṇagaṇaiḥ śitāgraiḥ | pracchādayāmāsa raviprakāśair | viṣādayāmāsa ca vānarendrān || 73.57 ||

तब उस महात्मा राक्षसाधिपति ने सूर्य के समान चमकते तीक्ष्ण बाण-समूहों से सभी दिशाओं को आच्छादित कर दिया और वानर-प्रमुखों को विषाद में डाल दिया।

श्लोक 58 (yuddha.73.58)

स शूलनिस्त्रिंश परश्वधानि । व्याविध्य दीप्तानलसंनिभानि । सविस्फुलिङ्गोज्ज्वलपावकानि । ववर्ष तीव्रं प्लवगेन्द्रसैन्ये ॥ 73.58 ॥

sa śūlanistriṃśa paraśvadhāni | vyāvidhya dīptānalasaṃnibhāni | savisphuliṅgojjvalapāvakāni | vavarṣa tīvraṃ plavagendrasainye || 73.58 ||

अग्नि के समान प्रज्वलित, चिंगारियों से युक्त त्रिशूल, तलवार और कुल्हाड़ियाँ घुमाकर उसने वानरराज की सेना पर तीव्र वर्षा कर दी।

श्लोक 59 (yuddha.73.59)

ततो ज्वलनसङ्काशैः शितैर्वानरयूथपाः । ताडिताः शक्रजिद्बाणैः प्रफुल्ला इव किंशुकाः ॥ 73.59 ॥

tato jvalanasaṅkāśaiḥ śitairvānarayūthapāḥ | tāḍitāḥ śakrajidbāṇaiḥ praphullā iva kiṃśukāḥ || 73.59 ||

तब अग्नि के समान चमकते इन्द्रजित के तीक्ष्ण बाणों से आहत वानर-सेनापति खिले हुए किंशुक वृक्षों के समान दिखाई देने लगे।

श्लोक 60 (yuddha.73.60)

तेऽन्योन्यमभिसर्पन्तो निनदन्तश् च विस्वरम् । राक्षसेन्द्रास्त्रनिर्भिन्ना निपेतुर्वानरर्षभाः ॥ 73.60 ॥

te'nyonyamabhisarpanto ninadantaś ca visvaram | rākṣasendrāstranirbhinnā nipeturvānararṣabhāḥ || 73.60 ||

उस राक्षसराज के अस्त्रों से बिंधे हुए वे श्रेष्ठ वानर एक-दूसरे की ओर रेंगते हुए, बेसुरे स्वर में चीखते हुए, धराशायी हो गए।

श्लोक 61 (yuddha.73.61)

उदीक्षमाणा गगनं के चिन्नेत्रेषु ताडिताः । शरैर्विविशुरन्योन्यं पेतुश्च जगतीतले ॥ 73.61 ॥

udīkṣamāṇā gaganaṃ ke cinnetreṣu tāḍitāḥ | śarairviviśuranyonyaṃ petuśca jagatītale || 73.61 ||

कुछ आकाश की ओर देखते हुए, नेत्रों में बाणों से आहत होकर, एक-दूसरे में जा घुसे और पृथ्वी पर गिर पड़े।

श्लोक 62 (yuddha.73.62)

हनूमन्तं च सुग्रीवमङ्गदं गन्धमादनम् । जाम्बवन्तं सुषेणं च वेगदर्शिनमेव च ॥ 73.62 ॥

hanūmantaṃ ca sugrīvamaṅgadaṃ gandhamādanam | jāmbavantaṃ suṣeṇaṃ ca vegadarśinameva ca || 73.62 ||

हनुमान, सुग्रीव, अंगद, गन्धमादन, जाम्बवान, सुषेण और वेगदर्शी —

श्लोक 63 (yuddha.73.63)

मैन्दं च द्विविदं नीलं गवाक्षं गजगोमुखौ । केसरिं हरिलोमानं विद्युद्दंष्ट्रं च वानरम् ॥ 73.63 ॥

maindaṃ ca dvividaṃ nīlaṃ gavākṣaṃ gajagomukhau | kesariṃ harilomānaṃ vidyuddaṃṣṭraṃ ca vānaram || 73.63 ||

मैन्द, द्विविद, नील, गवाक्ष, गज और गोमुख, केसरी, हरिलोमा, तथा वानर विद्युद्दंष्ट्र —

श्लोक 64 (yuddha.73.64)

सूर्याननं ज्योतिमुखं तथा दधिमुखं हरिम् । पावकाक्षं नलं चैव कुमुदं चैव वानरम् ॥ 73.64 ॥

sūryānanaṃ jyotimukhaṃ tathā dadhimukhaṃ harim | pāvakākṣaṃ nalaṃ caiva kumudaṃ caiva vānaram || 73.64 ||

सूर्यानन, ज्योतिमुख, तथा वानर दधिमुख, पावकाक्ष, नल, और वानर कुमुद —

श्लोक 65 (yuddha.73.65)

प्रासैः शूलैः शितैर्बाणैरिन्द्रजिन्मन्त्रसंहितैः । विव्याध हरिशार्दूलान्सर्वांस्तान्राक्षसोत्तमः ॥ 73.65 ॥

prāsaiḥ śūlaiḥ śitairbāṇairindrajinmantrasaṃhitaiḥ | vivyādha hariśārdūlānsarvāṃstānrākṣasottamaḥ || 73.65 ||

भालों, त्रिशूलों और मंत्र से अभिमंत्रित तीक्ष्ण बाणों से उस राक्षसश्रेष्ठ इन्द्रजित ने उन सभी वानर-शार्दूलों को बींध डाला।

श्लोक 66 (yuddha.73.66)

स वै गदाभिर्हरियूथमुख्यान् । निर्भिद्य बाणैस्तपनीयपुङ्खैः । ववर्ष रामं शरवृष्टिजालैः । सलक्ष्मणं भास्कररश्मिकल्पैः ॥ 73.66 ॥

sa vai gadābhirhariyūthamukhyān | nirbhidya bāṇaistapanīyapuṅkhaiḥ | vavarṣa rāmaṃ śaravṛṣṭijālaiḥ | salakṣmaṇaṃ bhāskararaśmikalpaiḥ || 73.66 ||

गदाओं और स्वर्ण-पंख वाले बाणों से वानर-सेनापतियों को विदीर्ण करते हुए उसने सूर्य-किरणों के समान बाणों की वर्षा राम और लक्ष्मण पर करनी शुरू कर दी।

श्लोक 67 (yuddha.73.67)

स बाणवर्षैरभिवर्ष्यमाणो । धारानिपातानिव तान्विचिन्त्य । समीक्षमाणः परमाद्भुतश्री । रामस्तदा लक्ष्मणमित्युवाच ॥ 73.67 ॥

sa bāṇavarṣairabhivarṣyamāṇo | dhārānipātāniva tānvicintya | samīkṣamāṇaḥ paramādbhutaśrī | rāmastadā lakṣmaṇamityuvāca || 73.67 ||

उस बाण-वर्षा से आच्छादित होते हुए भी, उन्हें जल की बूँदों के समान मानते हुए, अद्भुत शोभा वाले राम ने चारों ओर देखकर तब लक्ष्मण से यह कहा।

श्लोक 68 (yuddha.73.68)

असौ पुनर्लक्ष्मण राक्षसेन्द्रो । ब्रह्मास्त्रमाश्रित्य सुरेन्द्रशत्रुः । निपातयित्वा हरिसैन्यमुग्रम् । अस्माञ्शरैरर्दयति प्रसक्तम् ॥ 73.68 ॥

asau punarlakṣmaṇa rākṣasendro | brahmāstramāśritya surendraśatruḥ | nipātayitvā harisainyamugram | asmāñśarairardayati prasaktam || 73.68 ||

'हे लक्ष्मण! यह राक्षसराज, इन्द्र का शत्रु, ब्रह्मास्त्र का आश्रय लेकर, भयंकर वानर-सेना को गिराकर, अब निरन्तर अपने बाणों से हमें भी संतप्त कर रहा है।'

श्लोक 69 (yuddha.73.69)

स्वयम्भुवा दत्तवरो महात्मा । खमास्थितोऽन्तर्हितभीमकायः । कथं नु शक्यो युधि नष्टदेहो । निहन्तुमद्येन्द्रजिदुद्यतास्त्रः ॥ 73.69 ॥

svayambhuvā dattavaro mahātmā | khamāsthito'ntarhitabhīmakāyaḥ | kathaṃ nu śakyo yudhi naṣṭadeho | nihantumadyendrajidudyatāstraḥ || 73.69 ||

'स्वयम्भू ब्रह्मा द्वारा वरदान प्राप्त वह महात्मा आकाश में स्थित होकर अपना भयंकर शरीर छिपाए हुए है — आज अस्त्र उठाए, शरीर अदृश्य किए हुए इन्द्रजित को युद्ध में मारना कैसे संभव है?'

श्लोक 70 (yuddha.73.70)

मन्ये स्वयम्भूर्भगवानचिन्त्यो । यस्यैतदस्त्रं प्रभवश् च योऽस्य । बाणावपातांस्त्वमिहाद्य धीमन् । मया सहाव्यग्रमनाः सहस्व ॥ 73.70 ॥

manye svayambhūrbhagavānacintyo | yasyaitadastraṃ prabhavaś ca yo'sya | bāṇāvapātāṃstvamihādya dhīman | mayā sahāvyagramanāḥ sahasva || 73.70 ||

'मुझे लगता है कि यह अस्त्र स्वयम्भू भगवान ब्रह्मा से ही उत्पन्न और उन्हीं के अधीन है। हे बुद्धिमान! आज यहाँ अविचलित मन से मेरे साथ इन बाणों के प्रहार को सहन करो।'

श्लोक 71 (yuddha.73.71)

प्रच्छादयत्येष हि राक्षसेन्द्रः । सर्वा दिशः सायकवृष्टिजालैः । एतच्च सर्वं पतिताग्र्यवीरं । न भ्राजते वानरराजसैन्यम् ॥ 73.71 ॥

pracchādayatyeṣa hi rākṣasendraḥ | sarvā diśaḥ sāyakavṛṣṭijālaiḥ | etacca sarvaṃ patitāgryavīraṃ | na bhrājate vānararājasainyam || 73.71 ||

'यह राक्षसराज तीक्ष्ण बाण-समूहों से सभी दिशाओं को आच्छादित कर रहा है; और वानरराज की यह समस्त सेना, जिसके श्रेष्ठ वीर गिर चुके हैं, अब पहले जैसी शोभा नहीं दे रही।'

श्लोक 72 (yuddha.73.72)

आवां तु दृष्ट्वा पतितौ विसंज्ञौ । निवृत्तयुद्धौ हतरोषहर्षौ । ध्रुवं प्रवेक्ष्यत्यमरारिवासं । असौ समादाय रणाग्रलक्ष्मीम् ॥ 73.72 ॥

āvāṃ tu dṛṣṭvā patitau visaṃjñau | nivṛttayuddhau hataroṣaharṣau | dhruvaṃ pravekṣyatyamarārivāsaṃ | asau samādāya raṇāgralakṣmīm || 73.72 ||

'हमें दोनों को गिरा हुआ, मूर्च्छित, युद्ध से विरत, क्रोध और हर्ष रहित देखकर, यह निश्चय ही रणभूमि का श्रेय लेकर देवताओं के शत्रु के निवास में लौट जाएगा।'

श्लोक 73 (yuddha.73.73)

ततस्तु ताविन्द्रजिदस्त्रजालैर् । बभूवतुस्तत्र तदा विशस्तौ । स चापि तौ तत्र विषादयित्वा । ननाद हर्षाद्युधि राक्षसेन्द्रः ॥ 73.73 ॥

tatastu tāvindrajidastrajālair | babhūvatustatra tadā viśastau | sa cāpi tau tatra viṣādayitvā | nanāda harṣādyudhi rākṣasendraḥ || 73.73 ||

तब वे दोनों वहाँ इन्द्रजित के अस्त्र-जाल से आहत हो गए; और उस राक्षसराज ने भी उन्हें वहाँ विषादग्रस्त करके युद्ध में हर्षपूर्वक गर्जना की।

श्लोक 74 (yuddha.73.74)

ततस्तदा वानरराजसैन्यं । रामं च सङ्ख्ये सहलक्ष्मणेन । विषादयित्वा सहसा विवेश । पुरीं दशग्रीवभुजाभिगुप्ताम् ॥ 73.74 ॥

tatastadā vānararājasainyaṃ | rāmaṃ ca saṅkhye sahalakṣmaṇena | viṣādayitvā sahasā viveśa | purīṃ daśagrīvabhujābhiguptām || 73.74 ||

तब वानरराज की सेना को और लक्ष्मण सहित राम को भी युद्ध में विषादग्रस्त करके, वह तुरन्त दशग्रीव की भुजाओं से रक्षित उस नगरी में प्रवेश कर गया।

श्लोक 75 (yuddha.73.75)

संस्तूयमानः स तु यातुधानैः । पित्रे च सर्वं हृषितोऽभ्युवाच ॥ 73.75 ॥

saṃstūyamānaḥ sa tu yātudhānaiḥ | pitre ca sarvaṃ hṛṣito'bhyuvāca || 73.75 ||

राक्षसों द्वारा स्तुति किया जाता हुआ वह हर्षित होकर अपने पिता से सब कुछ कह सुनाने लगा।

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