युद्धकाण्ड · सर्ग 80
इन्द्रजित का अदृश्य आक्रमण
श्लोक 1 (yuddha.80.1)
मकराक्षं हतं श्रुत्वा रावणः समितिंजयः। रोषेण महताविष्टो दन्तान् कटकटाय्य च ॥ 80.1 ॥
makarākṣaṃ hataṃ śrutvā rāvaṇaḥ samitiṃjayaḥ| roṣeṇa mahatāviṣṭo dantān kaṭakaṭāyya ca || 80.1 ||
मकराक्ष के मारे जाने का समाचार सुनकर, युद्ध में सदा विजयी रहने वाला रावण अत्यंत क्रोध से भर गया और दाँत पीसने लगा,
श्लोक 2 (yuddha.80.2)
कुपितश्च तदा तत्र किं कार्यमिति चिन्तयन्। आदिदेशाथ संक्रुद्धो रणायेन्द्रजितं सुतम् ॥ 80.2 ॥
kupitaśca tadā tatra kiṃ kāryamiti cintayan| ādideśātha saṃkruddho raṇāyendrajitaṃ sutam || 80.2 ||
और क्रोधित होकर वहाँ यह विचार करते हुए कि अब क्या किया जाए, उस अत्यंत क्रुद्ध रावण ने अपने पुत्र इन्द्रजित को युद्ध के लिए आदेश दिया।
श्लोक 3 (yuddha.80.3)
जहि वीर महावीर्यौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ। अदृश्यो दृश्यमानो वा सर्वथा त्वं बलाधिकः ॥ 80.3 ॥
jahi vīra mahāvīryau bhrātarau rāmalakṣmaṇau| adṛśyo dṛśyamāno vā sarvathā tvaṃ balādhikaḥ || 80.3 ||
"हे वीर, उन महापराक्रमी भाइयों राम और लक्ष्मण का वध करो — चाहे अदृश्य रहो या दृश्य, तुम हर प्रकार से उनसे अधिक बलवान हो।"
श्लोक 4 (yuddha.80.4)
त्वमप्रतिमकर्माणमिन्द्रं जयसि संयुगे। किं पुनर्मानुषौ दृष्ट्वा न वधिष्यसि संयुगे ॥ 80.4 ॥
tvamapratimakarmāṇamindraṃ jayasi saṃyuge| kiṃ punarmānuṣau dṛṣṭvā na vadhiṣyasi saṃyuge || 80.4 ||
"तुमने युद्ध में अद्वितीय कर्मों वाले इन्द्र को भी जीत लिया था — फिर इन दो मनुष्यों को देखकर तुम युद्ध में उन्हें क्यों नहीं मार सकोगे?"
श्लोक 5 (yuddha.80.5)
तथोक्तो राक्षसेन्द्रेण प्रतिगृह्य पितुर्वचः। यज्ञभूमौ स विधिवत् पावकं जुहुवेन्द्रजित् ॥ 80.5 ॥
tathokto rākṣasendreṇa pratigṛhya piturvacaḥ| yajñabhūmau sa vidhivat pāvakaṃ juhuvendrajit || 80.5 ||
राक्षसराज द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, इन्द्रजित ने पिता के वचन को स्वीकार कर, यज्ञभूमि में विधिपूर्वक अग्नि में आहुति दी।
श्लोक 6 (yuddha.80.6)
जुह्वतश्चापि तत्राग्निं रक्तोष्णीषधराः स्त्रियः। आजग्मुस्तत्र सम्भ्रान्ता राक्षस्यो यत्र रावणिः ॥ 80.6 ॥
juhvataścāpi tatrāgniṃ raktoṣṇīṣadharāḥ striyaḥ| ājagmustatra sambhrāntā rākṣasyo yatra rāvaṇiḥ || 80.6 ||
जब वह वहाँ अग्नि में आहुति दे रहा था, तभी लाल पगड़ी धारण किए राक्षसियाँ शीघ्रता से उस स्थान पर आ पहुँचीं जहाँ रावणि (इन्द्रजित) था।
श्लोक 7 (yuddha.80.7)
शस्त्राणि शरपत्राणि समिधोऽथ बिभीतकाः। लोहितानि च वासांसि स्रुवं कार्ष्णायसं तथा ॥ 80.7 ॥
śastrāṇi śarapatrāṇi samidho'tha bibhītakāḥ| lohitāni ca vāsāṃsi sruvaṃ kārṣṇāyasaṃ tathā || 80.7 ||
वहाँ शस्त्र ही कुशा (दर्भ) के पत्तों के समान, विभीतक वृक्ष की लकड़ियाँ समिधा के समान काम में लाई गईं, तथा लाल वस्त्र और लोहे की स्रुवा (आहुति-चम्मच) भी थीं।
श्लोक 8 (yuddha.80.8)
सर्वतोऽग्निं समास्तीर्य शरपत्रैः सतोमरैः। छागस्य सर्वकृष्णस्य गलं जग्राह जीवतः ॥ 80.8 ॥
sarvato'gniṃ samāstīrya śarapatraiḥ satomaraiḥ| chāgasya sarvakṛṣṇasya galaṃ jagrāha jīvataḥ || 80.8 ||
कुशा और तोमरों (भालों) से अग्नि के चारों ओर वेदी बिछाकर, उसने एक जीवित, पूर्णतः काले बकरे को गले से पकड़ लिया।
श्लोक 9 (yuddha.80.9)
सकृद्धोमसमिद्धस्य विधूमस्य महार्चिषः। बभूवुस्तानि लिङ्गानि विजयं दर्शयन्ति च ॥ 80.9 ॥
sakṛddhomasamiddhasya vidhūmasya mahārciṣaḥ| babhūvustāni liṅgāni vijayaṃ darśayanti ca || 80.9 ||
उस एक ही आहुति से प्रज्वलित हो उठी, धुआँरहित और महान ज्वालाओं वाली उस अग्नि में विजय सूचित करने वाले वे शुभ चिह्न प्रकट हुए।
श्लोक 10 (yuddha.80.10)
प्रदक्षिणावर्तशिखस्तप्तहाटकसंनिभः। हविस्तत् प्रतिजग्राह पावकः स्वयमुत्थितः ॥ 80.10 ॥
pradakṣiṇāvartaśikhastaptahāṭakasaṃnibhaḥ| havistat pratijagrāha pāvakaḥ svayamutthitaḥ || 80.10 ||
अग्निदेव स्वयं प्रकट होकर उठे, उनकी शिखा दाहिनी ओर घूमती हुई तपे हुए सोने के समान चमक रही थी, और उन्होंने उस हवि को स्वीकार किया।
श्लोक 11 (yuddha.80.11)
हुत्वाग्निं तर्पयित्वाथ देवदानवराक्षसान्। आरुरोह रथश्रेष्ठमन्तर्धानगतं शुभम् ॥ 80.11 ॥
hutvāgniṃ tarpayitvātha devadānavarākṣasān| āruroha rathaśreṣṭhamantardhānagataṃ śubham || 80.11 ||
अग्नि में आहुति देकर और देवताओं, दानवों तथा राक्षसों को तृप्त करके, वह अन्तर्धान होने में समर्थ उस श्रेष्ठ और शुभ रथ पर सवार हो गया।
श्लोक 12 (yuddha.80.12)
स वाजिभिश्चतुर्भिस्तु बाणैस्तु निशितैर्युतः। आरोपितमहाचापः शुशुभे स्यन्दनोत्तमः ॥ 80.12 ॥
sa vājibhiścaturbhistu bāṇaistu niśitairyutaḥ| āropitamahācāpaḥ śuśubhe syandanottamaḥ || 80.12 ||
चार घोड़ों से युक्त, तीक्ष्ण बाणों और उस पर रखे विशाल धनुष से सुसज्जित, वह उत्तम रथ अत्यंत शोभायमान था।
श्लोक 13 (yuddha.80.13)
जाज्वल्यमानो वपुषा तपनीयपरिच्छदः। मृगैश्चन्द्रार्धचन्द्रैश्च स रथः समलंकृतः ॥ 80.13 ॥
jājvalyamāno vapuṣā tapanīyaparicchadaḥ| mṛgaiścandrārdhacandraiśca sa rathaḥ samalaṃkṛtaḥ || 80.13 ||
अपने ढाँचे से ही चमकता हुआ, स्वर्ण-आभूषणों से सज्जित वह रथ मृगों, पूर्ण चन्द्रों और अर्ध-चन्द्रों की आकृतियों से अलंकृत था।
श्लोक 14 (yuddha.80.14)
जाम्बूनदमहाकम्बुर्दीप्तपावकसंनिभः। बभूवेन्द्रजितः केतुर्वैदूर्यसमलंकृतः ॥ 80.14 ॥
jāmbūnadamahākamburdīptapāvakasaṃnibhaḥ| babhūvendrajitaḥ keturvaidūryasamalaṃkṛtaḥ || 80.14 ||
बड़े-बड़े स्वर्ण-कड़ों से युक्त और वैदूर्यमणियों से अलंकृत इन्द्रजित की ध्वजा प्रज्वलित अग्नि के समान चमक रही थी।
श्लोक 15 (yuddha.80.15)
तेन चादित्यकल्पेन ब्रह्मास्त्रेण च पालितः। स बभूव दुराधर्षो रावणिः सुमहाबलः ॥ 80.15 ॥
tena cādityakalpena brahmāstreṇa ca pālitaḥ| sa babhūva durādharṣo rāvaṇiḥ sumahābalaḥ || 80.15 ||
उस सूर्य के समान तेजस्वी ब्रह्मास्त्र से सुरक्षित होकर, पहले से ही महाबली इन्द्रजित अब अजेय हो गया।
श्लोक 16 (yuddha.80.16)
सोऽभिनिर्याय नगरादिन्द्रजित् समितिंजयः। हुत्वाग्निं राक्षसैर्मन्त्रैरन्तर्धानगतोऽब्रवीत् ॥ 80.16 ॥
so'bhiniryāya nagarādindrajit samitiṃjayaḥ| hutvāgniṃ rākṣasairmantrairantardhānagato'bravīt || 80.16 ||
नगर से निकलकर, राक्षसी मंत्रों सहित अग्नि में आहुति देकर अदृश्य हो चुका, सदा विजयी इन्द्रजित इस प्रकार बोला:
श्लोक 17 (yuddha.80.17)
अद्य हत्वा रणे यौ तौ मिथ्या प्रव्रजितौ वने। जयं पित्रे प्रदास्यामि रावणाय रणेऽधिकम् ॥ 80.17 ॥
adya hatvā raṇe yau tau mithyā pravrajitau vane| jayaṃ pitre pradāsyāmi rāvaṇāya raṇe'dhikam || 80.17 ||
"आज उन दोनों को, जो झूठमूठ वनवासी तपस्वी बनकर वन में विचरण करते रहे हैं, युद्ध में मारकर, मैं अपने पिता रावण को युद्ध में अर्जित सर्वोत्तम विजय भेंट करूँगा।"
श्लोक 18 (yuddha.80.18)
अद्य निर्वानरामुर्वीं हत्वा रामं च लक्ष्मणम्। करिष्ये परमां प्रीतिमित्युक्त्वान्तरधीयत ॥ 80.18 ॥
adya nirvānarāmurvīṃ hatvā rāmaṃ ca lakṣmaṇam| kariṣye paramāṃ prītimityuktvāntaradhīyata || 80.18 ||
"आज राम और लक्ष्मण को मारकर तथा पृथ्वी को वानरों से रहित करके, मैं परम प्रसन्नता प्राप्त करूँगा।" ऐसा कहकर वह अन्तर्धान हो गया।
श्लोक 19 (yuddha.80.19)
आपपाताथ संक्रुद्धो दशग्रीवेण चोदितः। तीक्ष्णकार्मुकनाराचैस्तीक्ष्णस्त्विन्द्ररिपू रणे ॥ 80.19 ॥
āpapātātha saṃkruddho daśagrīveṇa coditaḥ| tīkṣṇakārmukanārācaistīkṣṇastvindraripū raṇe || 80.19 ||
तब दशग्रीव द्वारा प्रेरित होकर, इन्द्र का शत्रु वह उग्र इन्द्रजित अपने तीक्ष्ण धनुष और नाराचों (लौह बाणों) सहित क्रोधपूर्वक युद्धभूमि में टूट पड़ा।
श्लोक 20 (yuddha.80.20)
स ददर्श महावीर्यौ नागौ त्रिशिरसाविव। सृजन्ताविषुजालानि वीरौ वानरमध्यगौ ॥ 80.20 ॥
sa dadarśa mahāvīryau nāgau triśirasāviva| sṛjantāviṣujālāni vīrau vānaramadhyagau || 80.20 ||
उसने वानरों के बीच खड़े और बाणों के जाल छोड़ते हुए उन दोनों महापराक्रमी वीरों को त्रिशिरा सर्पों के समान देखा।
श्लोक 21 (yuddha.80.21)
इमौ ताविति संचिन्त्य सज्यं कृत्वा च कार्मुकम्। संततानेषुधाराभिः पर्जन्य इव वृष्टिमान् ॥ 80.21 ॥
imau tāviti saṃcintya sajyaṃ kṛtvā ca kārmukam| saṃtatāneṣudhārābhiḥ parjanya iva vṛṣṭimān || 80.21 ||
"ये दोनों वही हैं" ऐसा जानकर और अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर, उसने वर्षा करते मेघ के समान बाणों की धाराओं से उन्हें ढँक दिया।
श्लोक 22 (yuddha.80.22)
स तु वैहायसरथो युधि तौ रामलक्ष्मणौ। अचक्षुर्विषये तिष्ठन् विव्याध निशितैः शरैः ॥ 80.22 ॥
sa tu vaihāyasaratho yudhi tau rāmalakṣmaṇau| acakṣurviṣaye tiṣṭhan vivyādha niśitaiḥ śaraiḥ || 80.22 ||
आकाश में विचरते अपने रथ पर, दृष्टि की सीमा से परे रहकर, उसने युद्ध में राम और लक्ष्मण को तीक्ष्ण बाणों से बींध डाला।
श्लोक 23 (yuddha.80.23)
तौ तस्य शरवेगेन परीतौ रामलक्ष्मणौ। धनुषी सशरे कृत्वा दिव्यमस्त्रं प्रचक्रतुः ॥ 80.23 ॥
tau tasya śaravegena parītau rāmalakṣmaṇau| dhanuṣī saśare kṛtvā divyamastraṃ pracakratuḥ || 80.23 ||
उसके बाणों के वेग से घिरे हुए राम और लक्ष्मण ने अपने धनुषों पर बाण चढ़ाकर दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया।
श्लोक 24 (yuddha.80.24)
प्रच्छादयन्तौ गगनं शरजालैर्महाबलौ। तमस्त्रैः सूर्यसंकाशैर्नैव पस्पर्शतुः शरैः ॥ 80.24 ॥
pracchādayantau gaganaṃ śarajālairmahābalau| tamastraiḥ sūryasaṃkāśairnaiva pasparśatuḥ śaraiḥ || 80.24 ||
यद्यपि उन दोनों महाबली राजकुमारों ने आकाश को बाणों के जाल से ढँक दिया, सूर्य के समान तेजस्वी उन अस्त्र-युक्त बाणों से भी वे उसे छू तक नहीं सके।
श्लोक 25 (yuddha.80.25)
स हि धूमान्धकारं च चक्रे प्रच्छादयन्नभः। दिशश्चान्तर्दधे श्रीमान् नीहारतमसा वृताः ॥ 80.25 ॥
sa hi dhūmāndhakāraṃ ca cakre pracchādayannabhaḥ| diśaścāntardadhe śrīmān nīhāratamasā vṛtāḥ || 80.25 ||
क्योंकि उस तेजस्वी इन्द्रजित ने आकाश को ढँककर धुएँ जैसा अंधकार फैला दिया और दिशाओं को भी कुहासे जैसे तम से घेरकर छिपा दिया।
श्लोक 26 (yuddha.80.26)
नैव ज्यातलनिर्घोषो न च नेमिखुरस्वनः। शुश्रुवे चरतस्तस्य न च रूपं प्रकाशते ॥ 80.26 ॥
naiva jyātalanirghoṣo na ca nemikhurasvanaḥ| śuśruve caratastasya na ca rūpaṃ prakāśate || 80.26 ||
उसके विचरण करते समय न तो धनुष की टंकार सुनाई देती थी, न ही पहियों और खुरों की ध्वनि, और न ही उसका रूप कहीं दिखाई पड़ता था।
श्लोक 27 (yuddha.80.27)
घनान्धकारे तिमिरे शिलावर्षमिवाद्भुतम्। स ववर्ष महाबाहुर्नाराचशरवृष्टिभिः ॥ 80.27 ॥
ghanāndhakāre timire śilāvarṣamivādbhutam| sa vavarṣa mahābāhurnārācaśaravṛṣṭibhiḥ || 80.27 ||
उस घने और गहन अंधकार में, वह महाबाहु इन्द्रजित नाराचों की वर्षा करने लगा, मानो पत्थरों की कोई अद्भुत वृष्टि हो रही हो।
श्लोक 28 (yuddha.80.28)
स रामं सूर्यसंकाशैः शरैर्दत्तवरैर्भृशम्। विव्याध समरे क्रुद्धः सर्वगात्रेषु रावणिः ॥ 80.28 ॥
sa rāmaṃ sūryasaṃkāśaiḥ śarairdattavarairbhṛśam| vivyādha samare kruddhaḥ sarvagātreṣu rāvaṇiḥ || 80.28 ||
उस क्रुद्ध रावणि (इन्द्रजित) ने युद्ध में वरदान से प्राप्त सूर्य के समान तेजस्वी बाणों से राम के समस्त अंगों को अत्यंत पीड़ा पहुँचाई।
श्लोक 29 (yuddha.80.29)
तौ हन्यमानौ नाराचैर्धाराभिरिव पर्वतौ। हेमपुङ्खान् नरव्याघ्रौ तिग्मान् मुमुचतुः शरान् ॥ 80.29 ॥
tau hanyamānau nārācairdhārābhiriva parvatau| hemapuṅkhān naravyāghrau tigmān mumucatuḥ śarān || 80.29 ||
नाराचों से आहत होते हुए, मानो वर्षा-धाराओं से आहत पर्वत हों, उन दोनों नरश्रेष्ठों ने भी स्वर्ण-पंख वाले तीक्ष्ण बाण छोड़े।
श्लोक 30 (yuddha.80.30)
अन्तरिक्षे समासाद्य रावणिं कङ्कपत्रिणः। निकृत्य पतगा भूमौ पेतुस्ते शोणिताप्लुताः ॥ 80.30 ॥
antarikṣe samāsādya rāvaṇiṃ kaṅkapatriṇaḥ| nikṛtya patagā bhūmau petuste śoṇitāplutāḥ || 80.30 ||
कंक-पंख वाले वे बाण आकाश में रावणि (इन्द्रजित) तक पहुँचकर उसे घायल करने के बाद रक्त से लथपथ होकर भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 31 (yuddha.80.31)
अतिमात्रं शरौघेण दीप्यमानौ नरोत्तमौ। तानिषून् पततो भल्लैरनेकैर्विचकर्ततुः ॥ 80.31 ॥
atimātraṃ śaraugheṇa dīpyamānau narottamau| tāniṣūn patato bhallairanekairvicakartatuḥ || 80.31 ||
अपने बाणों के समूह से अत्यधिक दीप्तिमान वे दोनों नरश्रेष्ठ, अनेक भल्ल बाणों से उन गिरते हुए बाणों को काट डालते थे।
श्लोक 32 (yuddha.80.32)
यतो हि ददृशाते तौ शरान् निपतिताञ्छितान्। ततस्तु तौ दाशरथी ससृजातेऽस्त्रमुत्तमम् ॥ 80.32 ॥
yato hi dadṛśāte tau śarān nipatitāñchitān| tatastu tau dāśarathī sasṛjāte'stramuttamam || 80.32 ||
जिस दिशा से भी वे तीक्ष्ण बाण गिरते हुए दिखाई देते, उसी दिशा में दोनों दाशरथि (राम-लक्ष्मण) अपने उत्तम अस्त्रों का प्रयोग करते।
श्लोक 33 (yuddha.80.33)
रावणिस्तु दिशः सर्वा रथेनातिरथोऽपतत्। विव्याध तौ दाशरथी लघ्वस्त्रो निशितैः शरैः ॥ 80.33 ॥
rāvaṇistu diśaḥ sarvā rathenātiratho'patat| vivyādha tau dāśarathī laghvastro niśitaiḥ śaraiḥ || 80.33 ||
किन्तु अतिरथी और अस्त्र-प्रयोग में शीघ्रगामी रावणि (इन्द्रजित) अपने रथ से सभी दिशाओं में विचरण करते हुए तीक्ष्ण बाणों से दोनों दाशरथियों को बींधता रहा।
श्लोक 34 (yuddha.80.34)
तेनातिविद्धौ तौ वीरौ रुक्मपुङ्खैः सुसंहतैः। बभूवतुर्दाशरथी पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ 80.34 ॥
tenātividdhau tau vīrau rukmapuṅkhaiḥ susaṃhataiḥ| babhūvaturdāśarathī puṣpitāviva kiṃśukau || 80.34 ||
उसके सुदृढ़ स्वर्ण-पंख वाले बाणों से गहरा बिंधकर, वे दोनों वीर दाशरथि मानो फूले हुए किंशुक (पलाश) वृक्षों के समान दिखाई देने लगे।
श्लोक 35 (yuddha.80.35)
नास्य वेगगतिं कश्चिन्न च रूपं धनुः शरान्। न चास्य विदितं किंचित् सूर्यस्येवाभ्रसम्प्लवे ॥ 80.35 ॥
nāsya vegagatiṃ kaścinna ca rūpaṃ dhanuḥ śarān| na cāsya viditaṃ kiṃcit sūryasyevābhrasamplave || 80.35 ||
जिस प्रकार बादलों के समूह में सूर्य का पता नहीं चलता, उसी प्रकार न तो कोई उसकी गति के वेग को जान पाता था, न उसके रूप को, न धनुष-बाणों को, और न ही उसके विषय में कुछ भी जाना जा सकता था।
श्लोक 36 (yuddha.80.36)
तेन विद्धाश्च हरयो निहताश्च गतासवः। बभूवुः शतशस्तत्र पतिता धरणीतले ॥ 80.36 ॥
tena viddhāśca harayo nihatāśca gatāsavaḥ| babhūvuḥ śataśastatra patitā dharaṇītale || 80.36 ||
उसके द्वारा बींधे गए वानर मारे गए; सैकड़ों वानर वहाँ प्राणहीन होकर धरती पर गिर पड़े।
श्लोक 37 (yuddha.80.37)
लक्ष्मणस्तु ततः क्रुद्धो भ्रातरं वाक्यमब्रवीत्। ब्राह्ममस्त्रं प्रयोक्ष्यामि वधार्थं सर्वरक्षसाम् ॥ 80.37 ॥
lakṣmaṇastu tataḥ kruddho bhrātaraṃ vākyamabravīt| brāhmamastraṃ prayokṣyāmi vadhārthaṃ sarvarakṣasām || 80.37 ||
तब क्रुद्ध होकर लक्ष्मण ने अपने भाई से कहा, "मैं समस्त राक्षसों के वध के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करूँगा।"
श्लोक 38 (yuddha.80.38)
तमुवाच ततो रामो लक्ष्मणं शुभलक्षणम्। नैकस्य हेतो रक्षांसि पृथिव्यां हन्तुमर्हसि ॥ 80.38 ॥
tamuvāca tato rāmo lakṣmaṇaṃ śubhalakṣaṇam| naikasya heto rakṣāṃsi pṛthivyāṃ hantumarhasi || 80.38 ||
तब राम ने शुभ लक्षणों वाले उस लक्ष्मण से कहा, "एक ही राक्षस के कारण तुम्हें पृथ्वी के समस्त राक्षसों का वध नहीं करना चाहिए।"
श्लोक 39 (yuddha.80.39)
अयुध्यमानं प्रच्छन्नं प्राञ्जलिं शरणागतम्। पलायमानं मत्तं वा न हन्तुं त्वमिहार्हसि ॥ 80.39 ॥
ayudhyamānaṃ pracchannaṃ prāñjaliṃ śaraṇāgatam| palāyamānaṃ mattaṃ vā na hantuṃ tvamihārhasi || 80.39 ||
"जो युद्ध नहीं कर रहा हो, जो छिपा हुआ हो, जो हाथ जोड़कर शरण में आया हो, जो भाग रहा हो, अथवा जो मदमत्त हो — इनका वध तुम्हें यहाँ नहीं करना चाहिए।"
श्लोक 40 (yuddha.80.40)
तस्यैव तु वधे यत्नं करिष्यामि महाभुज। आदेक्ष्यावो महावेगानस्त्रानाशीविषोपमान् ॥ 80.40 ॥
tasyaiva tu vadhe yatnaṃ kariṣyāmi mahābhuja| ādekṣyāvo mahāvegānastrānāśīviṣopamān || 80.40 ||
"हे महाबाहु, मैं उसी इन्द्रजित के वध का प्रयत्न करूँगा। हम दोनों विषधर सर्पों के समान महावेगवान अस्त्रों का संधान करेंगे।"
श्लोक 41 (yuddha.80.41)
तमेनं मायिनं क्षुद्रमन्तर्हितरथं बलात्। राक्षसं निहनिष्यन्ति दृष्ट्वा वानरयूथपाः ॥ 80.41 ॥
tamenaṃ māyinaṃ kṣudramantarhitarathaṃ balāt| rākṣasaṃ nihaniṣyanti dṛṣṭvā vānarayūthapāḥ || 80.41 ||
"इस मायावी, तुच्छ, अदृश्य रथ वाले राक्षस को देखकर वानर-सेनापति इसे बलपूर्वक मार डालेंगे।"
श्लोक 42 (yuddha.80.42)
यद्येष भूमिं विशते दिवं वा रसातलं वापि नभस्तलं वा। एवं विगूढोऽपि ममास्त्रदग्धः पतिष्यते भूमितले गतासुः ॥ 80.42 ॥
yadyeṣa bhūmiṃ viśate divaṃ vā rasātalaṃ vāpi nabhastalaṃ vā| evaṃ vigūḍho'pi mamāstradagdhaḥ patiṣyate bhūmitale gatāsuḥ || 80.42 ||
"चाहे वह पृथ्वी में समा जाए, स्वर्ग में चला जाए, पाताल में उतर जाए अथवा आकाश में छिप जाए — इस प्रकार छिपा होने पर भी, मेरे अस्त्र से दग्ध होकर वह प्राणहीन होकर धरती पर गिरेगा।"
श्लोक 43 (yuddha.80.43)
इत्येवमुक्त्वा वचनं महार्थं रघुप्रवीरः प्लवगर्षभैर्वृतः। वधाय रौद्रस्य नृशंसकर्मण- स्तदा महात्मा त्वरितं निरीक्षते ॥ 80.43 ॥
ityevamuktvā vacanaṃ mahārthaṃ raghupravīraḥ plavagarṣabhairvṛtaḥ| vadhāya raudrasya nṛśaṃsakarmaṇa- stadā mahātmā tvaritaṃ nirīkṣate || 80.43 ||
इन गंभीर वचनों को कहकर, वानरश्रेष्ठों से घिरे हुए रघुकुल के उस महान वीर राम, उस भयंकर और क्रूरकर्मा इन्द्रजित के शीघ्र वध का उपाय खोजने लगे।