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युद्धकाण्ड · सर्ग 94

राक्षसियों का विलाप

सर्ग 93सर्ग-सूचीसर्ग 95

श्लोक 1 (yuddha.94.1)

तानि नागसहस्राणि सारोहाणि च वाजिनाम्। रथानां त्वग्निवर्णानां सध्वजानां सहस्रशः ॥ 94.1 ॥

tāni nāgasahasrāṇi sārohāṇi ca vājinām| rathānāṃ tvagnivarṇānāṃ sadhvajānāṃ sahasraśaḥ || 94.1 ||

वे हज़ारों हाथी, और सवारों सहित घोड़े; अग्नि-वर्ण के वे हज़ारों रथ, ध्वजाओं सहित;

श्लोक 2 (yuddha.94.2)

राक्षसानां सहस्राणि गदापरिघयोधिनाम्। काञ्चनध्वजचित्राणां शूराणां कामरूपिणाम् ॥ 94.2 ॥

rākṣasānāṃ sahasrāṇi gadāparighayodhinām| kāñcanadhvajacitrāṇāṃ śūrāṇāṃ kāmarūpiṇām || 94.2 ||

गदा और परिघ से युद्ध करने वाले, स्वर्णिम ध्वजाओं से सुशोभित, इच्छानुसार रूप धरने वाले वे हज़ारों शूरवीर राक्षस;

श्लोक 3 (yuddha.94.3)

निहतानि शरैर्दीप्तैस्तप्तकाञ्चनभूषणैः। रावणेन प्रयुक्तानि रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ 94.3 ॥

nihatāni śarairdīptaistaptakāñcanabhūṣaṇaiḥ| rāvaṇena prayuktāni rāmeṇākliṣṭakarmaṇā || 94.3 ||

रावण द्वारा भेजे गए वे सब, तप्त स्वर्ण से अलंकृत उन प्रज्वलित बाणों से अथक कर्म करने वाले राम के द्वारा मार डाले गए।

श्लोक 4 (yuddha.94.4)

दृष्ट्वा श्रुत्वा च सम्भ्रान्ता हतशेषा निशाचराः। राक्षस्यश्च समागम्य दीनाश्चिन्तापरिप्लुताः ॥ 94.4 ॥

dṛṣṭvā śrutvā ca sambhrāntā hataśeṣā niśācarāḥ| rākṣasyaśca samāgamya dīnāścintāpariplutāḥ || 94.4 ||

यह देखकर और सुनकर, बचे हुए निशाचर घबरा उठे; और राक्षसियाँ एकत्र होकर, दीन और चिन्ता में डूबी हुई,

श्लोक 5 (yuddha.94.5)

विधवा हतपुत्राश्च क्रोशन्त्यो हतबान्धवाः। राक्षस्यः सह संगम्य दुःखार्ताः पर्यदेवयन् ॥ 94.5 ॥

vidhavā hataputrāśca krośantyo hatabāndhavāḥ| rākṣasyaḥ saha saṃgamya duḥkhārtāḥ paryadevayan || 94.5 ||

विधवा हुई, पुत्र खो चुकी, बन्धु-बान्धव खो चुकी, चीखती हुई—वे राक्षसियाँ एक साथ इकट्ठी होकर दुःख से पीड़ित होकर विलाप करने लगीं।

श्लोक 6 (yuddha.94.6)

कथं शूर्पणखा वृद्धा कराला निर्णतोदरी। आससाद वने रामं कंदर्पसमरूपिणम् ॥ 94.6 ॥

kathaṃ śūrpaṇakhā vṛddhā karālā nirṇatodarī| āsasāda vane rāmaṃ kaṃdarpasamarūpiṇam || 94.6 ||

"वह वृद्धा, कुरूप और धँसे हुए पेट वाली शूर्पणखा वन में कामदेव के समान सुन्दर राम के पास कैसे जा पहुँची?"

श्लोक 7 (yuddha.94.7)

सुकुमारं महासत्त्वं सर्वभूतहिते रतम्। तं दृष्ट्वा लोकवध्या सा हीनरूपा प्रकामिता ॥ 94.7 ॥

sukumāraṃ mahāsattvaṃ sarvabhūtahite ratam| taṃ dṛṣṭvā lokavadhyā sā hīnarūpā prakāmitā || 94.7 ||

"उस सुकुमार, महाबली और समस्त प्राणियों के हित में रत राम को देखकर, लोक-निन्दित वह कुरूपा शूर्पणखा इतनी कामातुर कैसे हो गई?"

श्लोक 8 (yuddha.94.8)

कथं सर्वगुणैर्हीना गुणवन्तं महौजसम्। सुमुखं दुर्मुखी रामं कामयामास राक्षसी ॥ 94.8 ॥

kathaṃ sarvaguṇairhīnā guṇavantaṃ mahaujasam| sumukhaṃ durmukhī rāmaṃ kāmayāmāsa rākṣasī || 94.8 ||

"सभी सद्गुणों से रहित उस कुरूपमुखी राक्षसी ने गुणवान, महातेजस्वी और सुन्दरमुख राम की कामना कैसे कर डाली?"

श्लोक 9 (yuddha.94.9)

जनस्यास्याल्पभाग्यत्वाद् वलिनी श्वेतमूर्धजा। अकार्यमपहास्यं च सर्वलोकविगर्हितम् ॥ 94.9 ॥

janasyāsyālpabhāgyatvād valinī śvetamūrdhajā| akāryamapahāsyaṃ ca sarvalokavigarhitam || 94.9 ||

"हम सबके दुर्भाग्य से ही वह झुर्रीदार, श्वेतकेशी बुढ़िया ने वह अकरणीय, हास्यास्पद और सर्वलोक-निन्दित कृत्य किया,"

श्लोक 10 (yuddha.94.10)

राक्षसानां विनाशाय दूषणस्य खरस्य च। चकाराप्रतिरूपा सा राघवस्य प्रधर्षणम् ॥ 94.10 ॥

rākṣasānāṃ vināśāya dūṣaṇasya kharasya ca| cakārāpratirūpā sā rāghavasya pradharṣaṇam || 94.10 ||

"उस कुरूपा ने राघव के प्रति वह अपराध किया—जिसके फलस्वरूप राक्षसों का, और दूषण तथा खर का विनाश हो गया।"

श्लोक 11 (yuddha.94.11)

तन्निमित्तमिदं वैरं रावणेन कृतं महत्। वधाय सीता साऽऽनीता दशग्रीवेण रक्षसा ॥ 94.11 ॥

tannimittamidaṃ vairaṃ rāvaṇena kṛtaṃ mahat| vadhāya sītā sā''nītā daśagrīveṇa rakṣasā || 94.11 ||

"उसी के कारण रावण ने यह महान वैर मोल लिया; और अपने ही विनाश के लिए उस राक्षस दशग्रीव ने सीता को यहाँ ला दिया।"

श्लोक 12 (yuddha.94.12)

न च सीतां दशग्रीवः प्राप्नोति जनकात्मजाम्। बद्धं बलवता वैरमक्षयं राघवेण च ॥ 94.12 ॥

na ca sītāṃ daśagrīvaḥ prāpnoti janakātmajām| baddhaṃ balavatā vairamakṣayaṃ rāghaveṇa ca || 94.12 ||

"फिर भी दशग्रीव जनकनन्दिनी सीता को पा नहीं सका—उसने तो केवल बलशाली राघव से एक अक्षय वैर बाँध लिया।"

श्लोक 13 (yuddha.94.13)

वैदेहीं प्रार्थयानं तं विराधं प्रेक्ष्य राक्षसम्। हतमेकेन रामेण पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥ 94.13 ॥

vaidehīṃ prārthayānaṃ taṃ virādhaṃ prekṣya rākṣasam| hatamekena rāmeṇa paryāptaṃ tannidarśanam || 94.13 ||

"वैदेही की कामना करने वाले उस राक्षस विराध का अकेले राम द्वारा वध देख लेना ही पर्याप्त प्रमाण था।"

श्लोक 14 (yuddha.94.14)

चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम्। निहतानि जनस्थाने शरैरग्निशिखोपमैः ॥ 94.14 ॥

caturdaśa sahasrāṇi rakṣasāṃ bhīmakarmaṇām| nihatāni janasthāne śarairagniśikhopamaiḥ || 94.14 ||

"जनस्थान में भीषण कर्म करने वाले चौदह हज़ार राक्षस उसके अग्नि-शिखा समान बाणों से मार डाले गए।"

श्लोक 15 (yuddha.94.15)

खरश्च निहतः संख्ये दूषणस्त्रिशिरास्तथा। शरैरादित्यसंकाशैः पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥ 94.15 ॥

kharaśca nihataḥ saṃkhye dūṣaṇastriśirāstathā| śarairādityasaṃkāśaiḥ paryāptaṃ tannidarśanam || 94.15 ||

"उस युद्ध में खर, दूषण और त्रिशिरा भी सूर्य-सम तेजस्वी बाणों से मारे गए—यह भी पर्याप्त प्रमाण था।"

श्लोक 16 (yuddha.94.16)

हतो योजनबाहुश्च कबन्धो रुधिराशनः। क्रोधान्नादं नदन् सोऽथ पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥ 94.16 ॥

hato yojanabāhuśca kabandho rudhirāśanaḥ| krodhānnādaṃ nadan so'tha paryāptaṃ tannidarśanam || 94.16 ||

"योजन-भर लम्बी भुजाओं वाला, रक्त-भक्षी और क्रोध से गरजने वाला कबन्ध भी मार डाला गया—यह भी पर्याप्त प्रमाण था।"

श्लोक 17 (yuddha.94.17)

जघान बलिनं रामः सहस्रनयनात्मजम्। वालिनं मेरुसंकाशं पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥ 94.17 ॥

jaghāna balinaṃ rāmaḥ sahasranayanātmajam| vālinaṃ merusaṃkāśaṃ paryāptaṃ tannidarśanam || 94.17 ||

"राम ने सहस्रनेत्रधारी इन्द्र के पुत्र, मेरु-पर्वत के समान विशाल उस बलशाली वालि का वध कर दिया—यह भी पर्याप्त प्रमाण था।"

श्लोक 18 (yuddha.94.18)

ऋष्यमूके वसंश्चैव दीनो भग्नमनोरथः। सुग्रीवः प्रापितो राज्यं पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥ 94.18 ॥

ṛṣyamūke vasaṃścaiva dīno bhagnamanorathaḥ| sugrīvaḥ prāpito rājyaṃ paryāptaṃ tannidarśanam || 94.18 ||

"ऋष्यमूक पर्वत पर दीन और टूटे मनोरथ से रहने वाले सुग्रीव को राम ने पुनः राज्य दिलाया—यह भी पर्याप्त प्रमाण था।"

श्लोक 19 (yuddha.94.19)

धर्मार्थसहितं वाक्यं सर्वेषां रक्षसां हितम्। युक्तं विभीषणेनोक्तं मोहात् तस्य न रोचते ॥ 94.19 ॥

dharmārthasahitaṃ vākyaṃ sarveṣāṃ rakṣasāṃ hitam| yuktaṃ vibhīṣaṇenoktaṃ mohāt tasya na rocate || 94.19 ||

"विभीषण द्वारा कहे गए, धर्म और अर्थ से युक्त, समस्त राक्षसों के हितकारी वे उचित वचन, मोहवश रावण को अच्छे नहीं लगे।"

श्लोक 20 (yuddha.94.20)

विभीषणवचः कुर्याद् यदि स्म धनदानुजः। श्मशानभूता दुःखार्ता नेयं लङ्का भविष्यति ॥ 94.20 ॥

vibhīṣaṇavacaḥ kuryād yadi sma dhanadānujaḥ| śmaśānabhūtā duḥkhārtā neyaṃ laṅkā bhaviṣyati || 94.20 ||

"यदि कुबेर के अनुज ने विभीषण की बात मान ली होती, तो यह लंका दुःख से पीड़ित श्मशान-भूमि न बनती।"

श्लोक 21 (yuddha.94.21)

कुम्भकर्णं हतं श्रुत्वा राघवेण महाबलम्। अतिकायं च दुर्मर्षं लक्ष्मणेन हतं तदा। प्रियं चेन्द्रजितं पुत्रं रावणो नावबुध्यते ॥ 94.21 ॥

kumbhakarṇaṃ hataṃ śrutvā rāghaveṇa mahābalam| atikāyaṃ ca durmarṣaṃ lakṣmaṇena hataṃ tadā| priyaṃ cendrajitaṃ putraṃ rāvaṇo nāvabudhyate || 94.21 ||

"राघव के हाथों महाबली कुम्भकर्ण का, और लक्ष्मण के हाथों दुर्धर्ष अतिकाय का वध सुनकर भी, तथा अपने प्रिय पुत्र इन्द्रजित के वध पर भी रावण अब तक नहीं समझ पा रहा है।"

श्लोक 22 (yuddha.94.22)

मम पुत्रो मम भ्राता मम भर्ता रणे हतः। इत्येष श्रूयते शब्दो राक्षसीनां कुले कुले ॥ 94.22 ॥

mama putro mama bhrātā mama bhartā raṇe hataḥ| ityeṣa śrūyate śabdo rākṣasīnāṃ kule kule || 94.22 ||

"'मेरा पुत्र, मेरा भाई, मेरा पति युद्ध में मारा गया'—यही करुण पुकार अब हर राक्षस-घर में सुनाई देती है।"

श्लोक 23 (yuddha.94.23)

रथाश्वनागाश्च हतास्तत्र तत्र सहस्रशः। रणे रामेण शूरेण हताश्चापि पदातयः ॥ 94.23 ॥

rathāśvanāgāśca hatāstatra tatra sahasraśaḥ| raṇe rāmeṇa śūreṇa hatāścāpi padātayaḥ || 94.23 ||

"रथ, घोड़े और हाथी हज़ारों की संख्या में जहाँ-तहाँ मारे पड़े हैं; और पैदल सैनिक भी वीर राम द्वारा युद्ध में मार डाले गए हैं।"

श्लोक 24 (yuddha.94.24)

रुद्रो वा यदि वा विष्णुर्महेन्द्रो वा शतक्रतुः। हन्ति नो रामरूपेण यदि वा स्वयमन्तकः ॥ 94.24 ॥

rudro vā yadi vā viṣṇurmahendro vā śatakratuḥ| hanti no rāmarūpeṇa yadi vā svayamantakaḥ || 94.24 ||

"निश्चय ही यह साक्षात् रुद्र, विष्णु, शतयज्ञकर्ता महेन्द्र, अथवा स्वयं यम ही, राम का रूप धारण कर हमें मार रहे हैं।"

श्लोक 25 (yuddha.94.25)

हतप्रवीरा रामेण निराशा जीविते वयम्। अपश्यन्त्यो भयस्यान्तमनाथा विलपामहे ॥ 94.25 ॥

hatapravīrā rāmeṇa nirāśā jīvite vayam| apaśyantyo bhayasyāntamanāthā vilapāmahe || 94.25 ||

"राम द्वारा हमारे श्रेष्ठ वीर मारे जाने पर, हमने जीवन की आशा खो दी है; भय का अन्त न देखते हुए, अनाथ होकर हम विलाप कर रही हैं।"

श्लोक 26 (yuddha.94.26)

रामहस्ताद् दशग्रीवः शूरो दत्तमहावरः। इदं भयं महाघोरं समुत्पन्नं न बुद्ध्यते ॥ 94.26 ॥

rāmahastād daśagrīvaḥ śūro dattamahāvaraḥ| idaṃ bhayaṃ mahāghoraṃ samutpannaṃ na buddhyate || 94.26 ||

"महान वरदान प्राप्त वह शूरवीर दशग्रीव, राम के हाथों उत्पन्न इस अत्यंत भयंकर संकट को अब तक नहीं समझ पा रहा है।"

श्लोक 27 (yuddha.94.27)

तं न देवा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः। उपसृष्टं परित्रातुं शक्ता रामेण संयुगे ॥ 94.27 ॥

taṃ na devā na gandharvā na piśācā na rākṣasāḥ| upasṛṣṭaṃ paritrātuṃ śaktā rāmeṇa saṃyuge || 94.27 ||

"न देवता, न गन्धर्व, न पिशाच, न राक्षस—कोई भी युद्ध में राम द्वारा घेरे गए उसे बचा नहीं सकेगा।"

श्लोक 28 (yuddha.94.28)

उत्पाताश्चापि दृश्यन्ते रावणस्य रणे रणे। कथयन्ति हि रामेण रावणस्य निबर्हणम् ॥ 94.28 ॥

utpātāścāpi dṛśyante rāvaṇasya raṇe raṇe| kathayanti hi rāmeṇa rāvaṇasya nibarhaṇam || 94.28 ||

"रावण के लिए युद्ध-युद्ध में अपशकुन भी दिखाई दे रहे हैं—वे निश्चय ही राम के हाथों उसके विनाश की सूचना दे रहे हैं।"

श्लोक 29 (yuddha.94.29)

पितामहेन प्रीतेन देवदानवराक्षसैः। रावणस्याभयं दत्तं मनुष्येभ्यो न याचितम् ॥ 94.29 ॥

pitāmahena prītena devadānavarākṣasaiḥ| rāvaṇasyābhayaṃ dattaṃ manuṣyebhyo na yācitam || 94.29 ||

"प्रसन्न होकर पितामह ब्रह्मा ने रावण को देवताओं, दानवों और राक्षसों से अभय दिया था—किन्तु मनुष्यों से अभय उसने कभी माँगा ही नहीं।"

श्लोक 30 (yuddha.94.30)

तदिदं मानुषं मन्ये प्राप्तं निःसंशयं भयम्। जीवितान्तकरं घोरं रक्षसां रावणस्य च ॥ 94.30 ॥

tadidaṃ mānuṣaṃ manye prāptaṃ niḥsaṃśayaṃ bhayam| jīvitāntakaraṃ ghoraṃ rakṣasāṃ rāvaṇasya ca || 94.30 ||

"तो यह निश्चय ही वही मनुष्य-जनित भय है जो अब हमारे ऊपर आ पड़ा है—भयंकर, राक्षसों और रावण दोनों के जीवन का अन्त करने वाला।"

श्लोक 31 (yuddha.94.31)

पीड्यमानास्तु बलिना वरदानेन रक्षसा। दीप्तैस्तपोभिर्विबुधाः पितामहमपूजयन् ॥ 94.31 ॥

pīḍyamānāstu balinā varadānena rakṣasā| dīptaistapobhirvibudhāḥ pitāmahamapūjayan || 94.31 ||

"उस वरदान-प्राप्त बलशाली राक्षस से पीड़ित होकर देवताओं ने तेजस्वी तपों से पितामह ब्रह्मा की आराधना की थी।"

श्लोक 32 (yuddha.94.32)

देवतानां हितार्थाय महात्मा वै पितामहः। उवाच देवतास्तुष्ट इदं सर्वा महद्वचः ॥ 94.32 ॥

devatānāṃ hitārthāya mahātmā vai pitāmahaḥ| uvāca devatāstuṣṭa idaṃ sarvā mahadvacaḥ || 94.32 ||

"देवताओं के हित के लिए, प्रसन्न होकर महात्मा पितामह ने समस्त देवताओं से यह गम्भीर वचन कहा।"

श्लोक 33 (yuddha.94.33)

अद्यप्रभृति लोकांस्त्रीन् सर्वे दानवराक्षसाः। भयेन प्रभृता नित्यं विचरिष्यन्ति शाश्वतम् ॥ 94.33 ॥

adyaprabhṛti lokāṃstrīn sarve dānavarākṣasāḥ| bhayena prabhṛtā nityaṃ vicariṣyanti śāśvatam || 94.33 ||

"'आज से समस्त दानव और राक्षस सदा-सर्वदा तीनों लोकों में निरन्तर भय से घिरे हुए ही विचरण करेंगे।'"

श्लोक 34 (yuddha.94.34)

दैवतैस्तु समागम्य सर्वैश्चेन्द्रपुरोगमैः। वृषध्वजस्त्रिपुरहा महादेवः प्रतोषितः ॥ 94.34 ॥

daivataistu samāgamya sarvaiścendrapurogamaiḥ| vṛṣadhvajastripurahā mahādevaḥ pratoṣitaḥ || 94.34 ||

"एक बार इन्द्र के नेतृत्व में एकत्र हुए समस्त देवताओं ने वृषभ-ध्वज त्रिपुरारि महादेव को प्रसन्न किया।"

श्लोक 35 (yuddha.94.35)

प्रसन्नस्तु महादेवो देवानेतद् वचोऽब्रवीत्। उत्पत्स्यति हितार्थं वो नारी रक्षःक्षयावहा ॥ 94.35 ॥

prasannastu mahādevo devānetad vaco'bravīt| utpatsyati hitārthaṃ vo nārī rakṣaḥkṣayāvahā || 94.35 ||

"तब प्रसन्न महादेव ने देवताओं से यह वचन कहा: 'तुम्हारे हित के लिए एक स्त्री जन्म लेगी, जो राक्षसों का विनाश करने वाली होगी।'"

श्लोक 36 (yuddha.94.36)

एषा देवैः प्रयुक्ता तु क्षुद् यथा दानवान् पुरा। भक्षयिष्यति नः सर्वान् राक्षसघ्नी सरावणान् ॥ 94.36 ॥

eṣā devaiḥ prayuktā tu kṣud yathā dānavān purā| bhakṣayiṣyati naḥ sarvān rākṣasaghnī sarāvaṇān || 94.36 ||

"देवताओं द्वारा प्रेरित वही सीता, राक्षसों का नाश करने वाली होकर, हम सबको रावण सहित वैसे ही निगल जाएगी जैसे प्राचीनकाल में भूख ने दानवों को निगल लिया था।"

श्लोक 37 (yuddha.94.37)

रावणस्यापनीतेन दुर्विनीतस्य दुर्मतेः। अयं निष्टानको घोरः शोकेन समभिप्लुतः ॥ 94.37 ॥

rāvaṇasyāpanītena durvinītasya durmateḥ| ayaṃ niṣṭānako ghoraḥ śokena samabhiplutaḥ || 94.37 ||

"उस दुर्विनीत और दुर्बुद्धि रावण के दुराचरण के कारण ही यह भयंकर, शोक में डूबा हुआ विनाश हम पर आ पड़ा है।"

श्लोक 38 (yuddha.94.38)

तं न पश्यामहे लोके यो नः शरणदो भवेत्। राघवेणोपसृष्टानां कालेनेव युगक्षये ॥ 94.38 ॥

taṃ na paśyāmahe loke yo naḥ śaraṇado bhavet| rāghaveṇopasṛṣṭānāṃ kāleneva yugakṣaye || 94.38 ||

"राघव द्वारा घेरी गई हम पर, मानो युगान्त में साक्षात् काल के समान, ऐसा कोई संसार में दिखाई नहीं देता जो हमें शरण दे सके।"

श्लोक 39 (yuddha.94.39)

नास्ति नः शरणं किंचिद् भये महति तिष्ठताम्। दावाग्निवेष्टितानां हि करेणूनां यथा वने ॥ 94.39 ॥

nāsti naḥ śaraṇaṃ kiṃcid bhaye mahati tiṣṭhatām| dāvāgniveṣṭitānāṃ hi kareṇūnāṃ yathā vane || 94.39 ||

"इस महाभय में खड़ी हम सबके लिए कहीं कोई शरण नहीं है—जैसे वन में दावाग्नि से घिरी हथिनियों के लिए कोई शरण नहीं होती।"

श्लोक 40 (yuddha.94.40)

प्राप्तकालं कृतं तेन पौलस्त्येन महात्मना। यत एव भयं दृष्टं तमेव शरणं गतः ॥ 94.40 ॥

prāptakālaṃ kṛtaṃ tena paulastyena mahātmanā| yata eva bhayaṃ dṛṣṭaṃ tameva śaraṇaṃ gataḥ || 94.40 ||

"उस महात्मा वैश्रवण-पुत्र विभीषण ने समयोचित कार्य ही किया—जिससे यह भय उत्पन्न हुआ देखा, उसी की शरण में वह चला गया।"

श्लोक 41 (yuddha.94.41)

इतीव सर्वा रजनीचरस्त्रियः परस्परं सम्परिरभ्य बाहुभिः। विषेदुरार्तातिभयाभिपीडिता विनेदुरुच्चैश्च तदा सुदारुणम् ॥ 94.41 ॥

itīva sarvā rajanīcarastriyaḥ parasparaṃ samparirabhya bāhubhiḥ| viṣedurārtātibhayābhipīḍitā vineduruccaiśca tadā sudāruṇam || 94.41 ||

इस प्रकार विलाप करती हुई वे सभी राक्षसियाँ, एक-दूसरे को बाहों में भरकर, अत्यंत पीड़ा और भय से व्याकुल होकर विषाद में डूब गईं और ऊँचे स्वर में करुण क्रन्दन करने लगीं।

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