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युद्धकाण्ड · सर्ग 96

सुग्रीव द्वारा विरूपाक्ष का वध

सर्ग 95सर्ग-सूचीसर्ग 97

श्लोक 1 (yuddha.96.1)

तथा तैः कृत्तगात्रैस्तु दशग्रीवेण मार्गणैः। बभूव वसुधा तत्र प्रकीर्णा हरिभिस्तदा ॥ 96.1 ॥

tathā taiḥ kṛttagātraistu daśagrīveṇa mārgaṇaiḥ| babhūva vasudhā tatra prakīrṇā haribhistadā || 96.1 ||

इस प्रकार दशग्रीव (रावण) के बाणों से जिनके अंग कट चुके थे, उन वानरों से वह धरती वहाँ उस समय पट गई।

श्लोक 2 (yuddha.96.2)

रावणस्याप्रसह्यं तं शरसम्पातमेकतः। न शेकुः सहितुं दीप्तं पतङ्गा ज्वलनं यथा ॥ 96.2 ॥

rāvaṇasyāprasahyaṃ taṃ śarasampātamekataḥ| na śekuḥ sahituṃ dīptaṃ pataṅgā jvalanaṃ yathā || 96.2 ||

रावण के उस असह्य बाणों की वर्षा को वे वानर सहन नहीं कर सके, जैसे पतंगे जलती हुई अग्नि को सहन नहीं कर सकते।

श्लोक 3 (yuddha.96.3)

तेऽर्दिता निशितैर्बाणैः क्रोशन्तो विप्रदुद्रुवुः। पावकार्चिः समाविष्टा दह्यमाना यथा गजाः ॥ 96.3 ॥

te'rditā niśitairbāṇaiḥ krośanto vipradudruvuḥ| pāvakārciḥ samāviṣṭā dahyamānā yathā gajāḥ || 96.3 ||

तीक्ष्ण बाणों से पीड़ित होकर वे चिल्लाते हुए इधर-उधर भाग गए, जैसे अग्नि की ज्वालाओं से घिरे और जलते हुए हाथी भागते हैं।

श्लोक 4 (yuddha.96.4)

प्लवंगानामनीकानि महाभ्राणीव मारुतः। संययौ समरे तस्मिन् विधमन् रावणः शरैः ॥ 96.4 ॥

plavaṃgānāmanīkāni mahābhrāṇīva mārutaḥ| saṃyayau samare tasmin vidhaman rāvaṇaḥ śaraiḥ || 96.4 ||

रावण उस युद्धभूमि में वानरों की सेनाओं को अपने बाणों से इस प्रकार उड़ाता हुआ आगे बढ़ा, जैसे वायु विशाल मेघों को उड़ा देती है।

श्लोक 5 (yuddha.96.5)

कदनं तरसा कृत्वा राक्षसेन्द्रो वनौकसाम्। आससाद ततो युद्धे त्वरितं राघवं रणे ॥ 96.5 ॥

kadanaṃ tarasā kṛtvā rākṣasendro vanaukasām| āsasāda tato yuddhe tvaritaṃ rāghavaṃ raṇe || 96.5 ||

इस प्रकार अपने वेग से वन-निवासी वानरों का संहार करके, राक्षसराज रावण फिर उस युद्धभूमि में शीघ्रता से राघव (राम) के निकट जा पहुँचा।

श्लोक 6 (yuddha.96.6)

सुग्रीवस्तान् कपीन् दृष्ट्वा भग्नान् विद्रावितान् रणे। गुल्मे सुषेणं निक्षिप्य चक्रे युद्धे द्रुतं मनः ॥ 96.6 ॥

sugrīvastān kapīn dṛṣṭvā bhagnān vidrāvitān raṇe| gulme suṣeṇaṃ nikṣipya cakre yuddhe drutaṃ manaḥ || 96.6 ||

उन वानरों को युद्ध में टूटकर भागते देख सुग्रीव ने सुषेण को सेना की रक्षा के लिए नियुक्त कर, स्वयं शीघ्र ही युद्ध की ओर मन लगाया।

श्लोक 7 (yuddha.96.7)

आत्मनः सदृशं वीरं स तं निक्षिप्य वानरम्। सुग्रीवोऽभिमुखं शत्रुं प्रतस्थे पादपायुधः ॥ 96.7 ॥

ātmanaḥ sadṛśaṃ vīraṃ sa taṃ nikṣipya vānaram| sugrīvo'bhimukhaṃ śatruṃ pratasthe pādapāyudhaḥ || 96.7 ||

अपने ही समान उस वीर वानर (सुषेण) को वहाँ नियुक्त करके, वृक्ष को अस्त्र बनाए हुए सुग्रीव शत्रु के सम्मुख चल पड़ा।

श्लोक 8 (yuddha.96.8)

पार्श्वतः पृष्ठतश्चास्य सर्वे वानरयूथपाः। अनुजग्मुर्महाशैलान् विविधांश्च वनस्पतीन् ॥ 96.8 ॥

pārśvataḥ pṛṣṭhataścāsya sarve vānarayūthapāḥ| anujagmurmahāśailān vividhāṃśca vanaspatīn || 96.8 ||

उसके पार्श्व और पीछे-पीछे समस्त वानर-सेनापति बड़ी-बड़ी शिलाओं और नाना प्रकार के वृक्षों को लेकर चल पड़े।

श्लोक 9 (yuddha.96.9)

ननर्द युधि सुग्रीवः स्वरेण महता महान्। पोथयन् विविधांश्चान्यान् ममन्थोत्तमराक्षसान् ॥ 96.9 ॥

nanarda yudhi sugrīvaḥ svareṇa mahatā mahān| pothayan vividhāṃścānyān mamanthottamarākṣasān || 96.9 ||

महाकाय सुग्रीव युद्ध में ऊँचे स्वर में गरजा, और प्रहार करते हुए उसने अनेक अन्य श्रेष्ठ राक्षसों को कुचल डाला।

श्लोक 10 (yuddha.96.10)

ममर्द च महाकायो राक्षसान् वानरेश्वरः। युगान्तसमये वायुः प्रवृद्धानगमानिव ॥ 96.10 ॥

mamarda ca mahākāyo rākṣasān vānareśvaraḥ| yugāntasamaye vāyuḥ pravṛddhānagamāniva || 96.10 ||

विशाल शरीर वाला वह वानरेश्वर राक्षसों को इस प्रकार रौंदने लगा, जैसे प्रलयकाल में वायु विशाल वृक्षों को रौंद डालती है।

श्लोक 11 (yuddha.96.11)

राक्षसानामनीकेषु शैलवर्षं ववर्ष ह। अश्मवर्षं यथा मेघः पक्षिसङ्घेषु कानने ॥ 96.11 ॥

rākṣasānāmanīkeṣu śailavarṣaṃ vavarṣa ha| aśmavarṣaṃ yathā meghaḥ pakṣisaṅgheṣu kānane || 96.11 ||

उसने राक्षसों की सेनाओं पर शिलाओं की वर्षा कर दी, जैसे वन में मेघ पक्षियों के झुंडों पर पत्थरों की वर्षा करता है।

श्लोक 12 (yuddha.96.12)

कपिराजविमुक्तैस्तैः शैलवर्षैस्तु राक्षसाः। विकीर्णशिरसः पेतुर्विकीर्णा इव पर्वताः ॥ 96.12 ॥

kapirājavimuktaistaiḥ śailavarṣaistu rākṣasāḥ| vikīrṇaśirasaḥ peturvikīrṇā iva parvatāḥ || 96.12 ||

वानरराज द्वारा छोड़ी गई उन शिलाओं की वर्षा से राक्षस सिर फटकर, मानो टूटे हुए पर्वतों के समान, गिर पड़े।

श्लोक 13 (yuddha.96.13)

अथ संक्षीयमाणेषु राक्षसेषु समन्ततः। सुग्रीवेण प्रभग्नेषु नदत्सु च पतत्सु च ॥ 96.13 ॥

atha saṃkṣīyamāṇeṣu rākṣaseṣu samantataḥ| sugrīveṇa prabhagneṣu nadatsu ca patatsu ca || 96.13 ||

इस प्रकार जब सुग्रीव द्वारा तितर-बितर किए गए राक्षस चारों ओर घटते जा रहे थे, चीत्कार करते हुए गिरते जा रहे थे,

श्लोक 14 (yuddha.96.14)

विरूपाक्षः स्वकं नाम धन्वी विश्राव्य राक्षसः। रथादाप्लुत्य दुर्धर्षो गजस्कन्धमुपारुहत् ॥ 96.14 ॥

virūpākṣaḥ svakaṃ nāma dhanvī viśrāvya rākṣasaḥ| rathādāplutya durdharṣo gajaskandhamupāruhat || 96.14 ||

तभी धनुर्धारी और दुर्जय राक्षस विरूपाक्ष अपना नाम ऊँचे स्वर में घोषित करके रथ से कूद पड़ा और एक हाथी की पीठ पर सवार हो गया।

श्लोक 15 (yuddha.96.15)

स तं द्विपमथारुह्य विरूपाक्षो महाबलः। ननर्द भीमनिर्ह्रादं वानरानभ्यधावत ॥ 96.15 ॥

sa taṃ dvipamathāruhya virūpākṣo mahābalaḥ| nanarda bhīmanirhrādaṃ vānarānabhyadhāvata || 96.15 ||

उस हाथी पर सवार होकर महाबली विरूपाक्ष भयंकर गर्जना करते हुए वानरों की ओर दौड़ पड़ा।

श्लोक 16 (yuddha.96.16)

सुग्रीवे स शरान् घोरान् विससर्ज चमूमुखे। स्थापयामास चोद्विग्नान् राक्षसान् सम्प्रहर्षयन् ॥ 96.16 ॥

sugrīve sa śarān ghorān visasarja camūmukhe| sthāpayāmāsa codvignān rākṣasān sampraharṣayan || 96.16 ||

उसने सेना के अग्रभाग में खड़े सुग्रीव पर भयंकर बाण छोड़े, और घबराए हुए राक्षसों को उत्साहित करके फिर से स्थिर कर दिया।

श्लोक 17 (yuddha.96.17)

सोऽतिविद्धः शितैर्बाणैः कपीन्द्रस्तेन रक्षसा। चुक्रोश च महाक्रोधो वधे चास्य मनो दधे ॥ 96.17 ॥

so'tividdhaḥ śitairbāṇaiḥ kapīndrastena rakṣasā| cukrośa ca mahākrodho vadhe cāsya mano dadhe || 96.17 ||

उस राक्षस के तीक्ष्ण बाणों से गहरा घायल होकर वानरेन्द्र सुग्रीव चीत्कार कर उठा, और अत्यंत क्रुद्ध होकर उसने उसके वध का ही संकल्प कर लिया।

श्लोक 18 (yuddha.96.18)

ततः पादपमुद्धृत्य शूरः सम्प्रधनो हरिः। अभिपत्य जघानास्य प्रमुखे तं महागजम् ॥ 96.18 ॥

tataḥ pādapamuddhṛtya śūraḥ sampradhano hariḥ| abhipatya jaghānāsya pramukhe taṃ mahāgajam || 96.18 ||

तब उस शूरवीर और युद्धकुशल वानर ने एक वृक्ष उखाड़कर, आगे बढ़कर उस विशाल हाथी के मुख पर प्रहार किया।

श्लोक 19 (yuddha.96.19)

स तु प्रहाराभिहतः सुग्रीवेण महागजः। अपासर्पद् धनुर्मात्रं निषसाद ननाद च ॥ 96.19 ॥

sa tu prahārābhihataḥ sugrīveṇa mahāgajaḥ| apāsarpad dhanurmātraṃ niṣasāda nanāda ca || 96.19 ||

सुग्रीव के प्रहार से आहत होकर वह विशाल हाथी एक धनुष-भर पीछे हट गया, बैठ गया और चीत्कार कर उठा।

श्लोक 20 (yuddha.96.20)

गजात् तु मथितात् तूर्णमपक्रम्य स वीर्यवान्। राक्षसोऽभिमुखः शत्रुं प्रत्युद्गम्य ततः कपिम् ॥ 96.20 ॥

gajāt tu mathitāt tūrṇamapakramya sa vīryavān| rākṣaso'bhimukhaḥ śatruṃ pratyudgamya tataḥ kapim || 96.20 ||

उस मथित हाथी से शीघ्र उतरकर वह बलवान राक्षस अपने शत्रु उस वानर के सम्मुख आगे बढ़ा,

श्लोक 21 (yuddha.96.21)

आर्षभं चर्म खड्गं च प्रगृह्य लघुविक्रमः। भर्त्सयन्निव सुग्रीवमाससाद व्यवस्थितम् ॥ 96.21 ॥

ārṣabhaṃ carma khaḍgaṃ ca pragṛhya laghuvikramaḥ| bhartsayanniva sugrīvamāsasāda vyavasthitam || 96.21 ||

और बैल के चमड़े की ढाल तथा खड्ग हाथ में लेकर, फुर्ती से बढ़ते हुए, मानो धमकाता हुआ वह स्थिर खड़े सुग्रीव के निकट जा पहुँचा।

श्लोक 22 (yuddha.96.22)

स हि तस्याभिसंक्रुद्धः प्रगृह्य विपुलां शिलाम्। विरूपाक्षस्य चिक्षेप सुग्रीवो जलदोपमाम् ॥ 96.22 ॥

sa hi tasyābhisaṃkruddhaḥ pragṛhya vipulāṃ śilām| virūpākṣasya cikṣepa sugrīvo jaladopamām || 96.22 ||

उस पर अत्यंत क्रुद्ध होकर सुग्रीव ने मेघ के समान विशाल एक शिला उठाकर विरूपाक्ष पर फेंकी।

श्लोक 23 (yuddha.96.23)

स तां शिलामापतन्तीं दृष्ट्वा राक्षसपुंगवः। अपक्रम्य सुविक्रान्तः खड्गेन प्राहरत् तदा ॥ 96.23 ॥

sa tāṃ śilāmāpatantīṃ dṛṣṭvā rākṣasapuṃgavaḥ| apakramya suvikrāntaḥ khaḍgena prāharat tadā || 96.23 ||

उस गिरती हुई शिला को देखकर वह अत्यंत पराक्रमी राक्षसश्रेष्ठ हट गया और तब उसने खड्ग से प्रहार किया।

श्लोक 24 (yuddha.96.24)

तेन खड्गप्रहारेण रक्षसा बलिना हतः। मुहूर्तमभवद् भूमौ विसंज्ञ इव वानरः ॥ 96.24 ॥

tena khaḍgaprahāreṇa rakṣasā balinā hataḥ| muhūrtamabhavad bhūmau visaṃjña iva vānaraḥ || 96.24 ||

उस बलवान राक्षस के खड्ग-प्रहार से आहत होकर वह वानर एक क्षण के लिए भूमि पर मानो मूर्च्छित-सा हो गया।

श्लोक 25 (yuddha.96.25)

सहसा स तदोत्पत्य राक्षसस्य महाहवे। मुष्टिं संवर्त्य वेगेन पातयामास वक्षसि ॥ 96.25 ॥

sahasā sa tadotpatya rākṣasasya mahāhave| muṣṭiṃ saṃvartya vegena pātayāmāsa vakṣasi || 96.25 ||

फिर सहसा उठकर, उस महासमर में उसने अपनी मुट्ठी बाँधकर वेगपूर्वक उस राक्षस की छाती पर प्रहार किया।

श्लोक 26 (yuddha.96.26)

मुष्टिप्रहाराभिहतो विरूपाक्षो निशाचरः। तेन खड्गेन संक्रुद्धः सुग्रीवस्य चमूमुखे ॥ 96.26 ॥

muṣṭiprahārābhihato virūpākṣo niśācaraḥ| tena khaḍgena saṃkruddhaḥ sugrīvasya camūmukhe || 96.26 ||

मुष्टि के प्रहार से आहत होकर क्रुद्ध निशाचर विरूपाक्ष ने सेना के अग्रभाग में उसी खड्ग से सुग्रीव पर वार किया,

श्लोक 27 (yuddha.96.27)

कवचं पातयामास पद्भ्यामभिहतोऽपतत्। स समुत्थाय पतितः कपिस्तस्य व्यसर्जयत् ॥ 96.27 ॥

kavacaṃ pātayāmāsa padbhyāmabhihato'patat| sa samutthāya patitaḥ kapistasya vyasarjayat || 96.27 ||

और उसका कवच काट गिराया; प्रहार से वह वानर अपने पैरों से गिर पड़ा। किन्तु गिरकर तुरंत उठ खड़े हुए उस वानर ने उस पर एक तड़ाका जमाया,

श्लोक 28 (yuddha.96.28)

तलप्रहारमशनेः समानं भीमनिःस्वनम्। तलप्रहारं तद् रक्षः सुग्रीवेण समुद्यतम् ॥ 96.28 ॥

talaprahāramaśaneḥ samānaṃ bhīmaniḥsvanam| talaprahāraṃ tad rakṣaḥ sugrīveṇa samudyatam || 96.28 ||

जिसकी भयंकर ध्वनि वज्रपात के समान थी। किन्तु सुग्रीव द्वारा उठाए गए उस तमाचे को उस राक्षस ने,

श्लोक 29 (yuddha.96.29)

नैपुण्यान्मोचयित्वैनं मुष्टिनोरसि ताडयत्। ततस्तु संक्रुद्धतरः सुग्रीवो वानरेश्वरः ॥ 96.29 ॥

naipuṇyānmocayitvainaṃ muṣṭinorasi tāḍayat| tatastu saṃkruddhataraḥ sugrīvo vānareśvaraḥ || 96.29 ||

अपने कौशल से बचकर उससे मुक्त हो गया, और अपनी मुट्ठी से उसकी छाती पर प्रहार किया। तब वानरराज सुग्रीव और भी अधिक क्रुद्ध हो उठा,

श्लोक 30 (yuddha.96.30)

मोक्षितं चात्मनो दृष्ट्वा प्रहारं तेन रक्षसा। स ददर्शान्तरं तस्य विरूपाक्षस्य वानरः ॥ 96.30 ॥

mokṣitaṃ cātmano dṛṣṭvā prahāraṃ tena rakṣasā| sa dadarśāntaraṃ tasya virūpākṣasya vānaraḥ || 96.30 ||

यह देखकर कि उस राक्षस ने अपने प्रहार से स्वयं को बचा लिया है, उस वानर ने विरूपाक्ष का एक छिद्र (कमजोर अंग) देख लिया।

श्लोक 31 (yuddha.96.31)

ततोऽन्यं पातयत् क्रोधाच्छङ्खदेशे महातलम्। महेन्द्राशनिकल्पेन तलेनाभिहतः क्षितौ ॥ 96.31 ॥

tato'nyaṃ pātayat krodhācchaṅkhadeśe mahātalam| mahendrāśanikalpena talenābhihataḥ kṣitau || 96.31 ||

तब क्रोधवश उसने उसके कनपटी पर एक और भारी थप्पड़ जड़ दिया। इन्द्र के वज्र समान उस थप्पड़ से आहत होकर वह धरती पर,

श्लोक 32 (yuddha.96.32)

पपात रुधिरक्लिन्नः शोणितं हि समुद्गिरन्। स्रोतोभ्यस्तु विरूपाक्षो जलं प्रस्रवणादिव ॥ 96.32 ॥

papāta rudhiraklinnaḥ śoṇitaṃ hi samudgiran| srotobhyastu virūpākṣo jalaṃ prasravaṇādiva || 96.32 ||

रक्त में भीगकर गिर पड़ा, और विरूपाक्ष अपने सब छिद्रों से इस प्रकार रक्त उगलने लगा जैसे पर्वत के झरने से जल बहता है।

श्लोक 33 (yuddha.96.33)

विवृत्तनयनं क्रोधात् सफेनं रुधिराप्लुतम्। ददृशुस्ते विरूपाक्षं विरूपाक्षतरं कृतम् ॥ 96.33 ॥

vivṛttanayanaṃ krodhāt saphenaṃ rudhirāplutam| dadṛśuste virūpākṣaṃ virūpākṣataraṃ kṛtam || 96.33 ||

उन वानरों ने विरूपाक्ष को क्रोध से आँखें उलटता, झागयुक्त रक्त में डूबा और और भी अधिक विकृत-नेत्र हुआ देखा।

श्लोक 34 (yuddha.96.34)

स्फुरन्तं परिवर्तन्तं पार्श्वेन रुधिरोक्षितम्। करुणं च विनर्दन्तं ददृशुः कपयो रिपुम् ॥ 96.34 ॥

sphurantaṃ parivartantaṃ pārśvena rudhirokṣitam| karuṇaṃ ca vinardantaṃ dadṛśuḥ kapayo ripum || 96.34 ||

उन वानरों ने अपने रक्त से लथपथ उस शत्रु को तड़पते, करवटें बदलते और करुण स्वर में चीत्कार करते देखा।

श्लोक 35 (yuddha.96.35)

तथा तु तौ संयति सम्प्रयुक्तौ तरस्विनौ वानरराक्षसानाम्। बलार्णवौ सस्वनतुश्च भीमौ महार्णवौ द्वाविव भिन्नसेतू ॥ 96.35 ॥

tathā tu tau saṃyati samprayuktau tarasvinau vānararākṣasānām| balārṇavau sasvanatuśca bhīmau mahārṇavau dvāviva bhinnasetū || 96.35 ||

इस प्रकार युद्ध में परस्पर भिड़े हुए वानरों और राक्षसों की वे दोनों वेगवान्, समुद्र-सी विशाल सेनाएँ भयंकर गर्जना कर उठीं, मानो दो महासागर अपने बाँधों को तोड़कर एक-दूसरे से टकरा रहे हों।

श्लोक 36 (yuddha.96.36)

विनाशितं प्रेक्ष्य विरूपनेत्रं महाबलं तं हरिपार्थिवेन। बलं समेतं कपिराक्षसाना- मुद्वृत्तगङ्गाप्रतिमं बभूव ॥ 96.36 ॥

vināśitaṃ prekṣya virūpanetraṃ mahābalaṃ taṃ haripārthivena| balaṃ sametaṃ kapirākṣasānā- mudvṛttagaṅgāpratimaṃ babhūva || 96.36 ||

मिथ्या-नेत्र (विकृत-नेत्र) महाबली विरूपाक्ष को वानरराज सुग्रीव के हाथों नष्ट होते देखकर, वानरों और राक्षसों की मिली-जुली वह सेना उमड़ती हुई गंगा के समान हो गई।

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