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युद्धकाण्ड · सर्ग 97

महोदर का वध

सर्ग 96सर्ग-सूचीसर्ग 98

श्लोक 1 (yuddha.97.1)

हन्यमाने बले तूर्णमन्योन्यं ते महामृधे। सरसीव महाघर्मे सूपक्षीणे बभूवतुः ॥ 97.1 ॥

hanyamāne bale tūrṇamanyonyaṃ te mahāmṛdhe| sarasīva mahāgharme sūpakṣīṇe babhūvatuḥ || 97.1 ||

उस महासंग्राम में परस्पर एक-दूसरे की सेना का शीघ्र संहार होते-होते, वे दोनों सेनाएँ ग्रीष्म ऋतु में सूखते हुए सरोवरों के समान क्षीण हो गईं।

श्लोक 2 (yuddha.97.2)

स्वबलस्य तु घातेन विरूपाक्षवधेन च। बभूव द्विगुणं क्रुद्धो रावणो राक्षसाधिपः ॥ 97.2 ॥

svabalasya tu ghātena virūpākṣavadhena ca| babhūva dviguṇaṃ kruddho rāvaṇo rākṣasādhipaḥ || 97.2 ||

अपनी सेना के संहार और विरूपाक्ष के वध से राक्षसाधिपति रावण का क्रोध दुगुना हो गया।

श्लोक 3 (yuddha.97.3)

प्रक्षीणं स्वबलं दृष्ट्वा वध्यमानं वलीमुखैः। बभूवास्य व्यथा युद्धे दृष्ट्वा दैवविपर्ययम् ॥ 97.3 ॥

prakṣīṇaṃ svabalaṃ dṛṣṭvā vadhyamānaṃ valīmukhaiḥ| babhūvāsya vyathā yuddhe dṛṣṭvā daivaviparyayam || 97.3 ||

अपनी सेना को वानरों द्वारा मारे जाते और क्षीण होते देखकर, तथा युद्ध में भाग्य के विपरीत होने को देखकर उसे व्यथा हुई।

श्लोक 4 (yuddha.97.4)

उवाच च समीपस्थं महोदरमनन्तरम्। अस्मिन् काले महाबाहो जयाशा त्वयि मे स्थिता ॥ 97.4 ॥

uvāca ca samīpasthaṃ mahodaramanantaram| asmin kāle mahābāho jayāśā tvayi me sthitā || 97.4 ||

उसने तुरंत पास खड़े महोदर से कहा, "हे महाबाहु! इस समय मेरी विजय की आशा तुम्हीं पर टिकी है।"

श्लोक 5 (yuddha.97.5)

जहि शत्रुचमूं वीर दर्शयाद्य पराक्रमम्। भर्तृपिण्डस्य कालोऽयं निर्वेष्टुं साधु युध्यताम् ॥ 97.5 ॥

jahi śatrucamūṃ vīra darśayādya parākramam| bhartṛpiṇḍasya kālo'yaṃ nirveṣṭuṃ sādhu yudhyatām || 97.5 ||

"हे वीर, शत्रु-सेना का वध करो, आज अपना पराक्रम दिखाओ। यही समय है स्वामी के अन्न का ऋण चुकाने का — भली भाँति युद्ध करो।"

श्लोक 6 (yuddha.97.6)

एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा राक्षसेन्द्रो महोदरः। प्रविवेशारिसेनां स पतङ्ग इव पावकम् ॥ 97.6 ॥

evamuktastathetyuktvā rākṣasendro mahodaraḥ| praviveśārisenāṃ sa pataṅga iva pāvakam || 97.6 ||

इस प्रकार कहे जाने पर "ऐसा ही होगा" कहकर राक्षसराज महोदर शत्रु-सेना में इस प्रकार घुस गया, जैसे पतंगा अग्नि में घुसता है।

श्लोक 7 (yuddha.97.7)

ततः स कदनं चक्रे वानराणां महाबलः। भर्तृवाक्येन तेजस्वी स्वेन वीर्येण चोदितः ॥ 97.7 ॥

tataḥ sa kadanaṃ cakre vānarāṇāṃ mahābalaḥ| bhartṛvākyena tejasvī svena vīryeṇa coditaḥ || 97.7 ||

फिर स्वामी के वचन और अपने ही पराक्रम से प्रेरित होकर, वह तेजस्वी महाबली वानरों का संहार करने लगा।

श्लोक 8 (yuddha.97.8)

वानराश्च महासत्त्वाः प्रगृह्य विपुलाः शिलाः। प्रविश्यारिबलं भीमं जघ्नुस्ते सर्वराक्षसान् ॥ 97.8 ॥

vānarāśca mahāsattvāḥ pragṛhya vipulāḥ śilāḥ| praviśyāribalaṃ bhīmaṃ jaghnuste sarvarākṣasān || 97.8 ||

उधर महाबली वानर भी विशाल शिलाएँ उठाकर उस भयंकर शत्रु-सेना में घुस गए और समस्त राक्षसों का वध करने लगे।

श्लोक 9 (yuddha.97.9)

महोदरः सुसंक्रुद्धः शरैः काञ्चनभूषणैः। चिच्छेद पाणिपादोरु वानराणां महाहवे ॥ 97.9 ॥

mahodaraḥ susaṃkruddhaḥ śaraiḥ kāñcanabhūṣaṇaiḥ| ciccheda pāṇipādoru vānarāṇāṃ mahāhave || 97.9 ||

अत्यंत क्रुद्ध महोदर उस महासमर में सुवर्ण-भूषित बाणों से वानरों के हाथ, पैर और जाँघें काटने लगा।

श्लोक 10 (yuddha.97.10)

ततस्ते वानराः सर्वे राक्षसैरर्दिता भृशम्। दिशो दश द्रुताः केचित् केचित् सुग्रीवमाश्रिताः ॥ 97.10 ॥

tataste vānarāḥ sarve rākṣasairarditā bhṛśam| diśo daśa drutāḥ kecit kecit sugrīvamāśritāḥ || 97.10 ||

राक्षसों से अत्यंत पीड़ित होकर वे सभी वानर दसों दिशाओं में भाग गए, और कुछ सुग्रीव की शरण में चले गए।

श्लोक 11 (yuddha.97.11)

प्रभग्नं समरे दृष्ट्वा वानराणां महाबलम्। अभिदुद्राव सुग्रीवो महोदरमनन्तरम् ॥ 97.11 ॥

prabhagnaṃ samare dṛṣṭvā vānarāṇāṃ mahābalam| abhidudrāva sugrīvo mahodaramanantaram || 97.11 ||

युद्ध में वानरों की विशाल सेना को टूटते देखकर सुग्रीव तुरंत महोदर की ओर दौड़ पड़ा।

श्लोक 12 (yuddha.97.12)

प्रगृह्य विपुलां घोरां महीधरसमां शिलाम्। चिक्षेप च महातेजास्तद्वधाय हरीश्वरः ॥ 97.12 ॥

pragṛhya vipulāṃ ghorāṃ mahīdharasamāṃ śilām| cikṣepa ca mahātejāstadvadhāya harīśvaraḥ || 97.12 ||

पर्वत के समान विशाल और भयंकर शिला उठाकर, तेजस्वी वानरराज ने उसका वध करने के लिए उसे फेंका।

श्लोक 13 (yuddha.97.13)

तामापतन्तीं सहसा शिलां दृष्ट्वा महोदरः। असम्भ्रान्तस्ततो बाणैर्निर्बिभेद दुरासदाम् ॥ 97.13 ॥

tāmāpatantīṃ sahasā śilāṃ dṛṣṭvā mahodaraḥ| asambhrāntastato bāṇairnirbibheda durāsadām || 97.13 ||

उस अकस्मात् गिरती हुई शिला को देखकर महोदर विचलित नहीं हुआ, और अपने बाणों से उस दुर्धर्ष शिला को छिन्न-भिन्न कर दिया।

श्लोक 14 (yuddha.97.14)

रक्षसा तेन बाणौघैर्निकृत्ता सा सहस्रधा। निपपात तदा भूमौ गृध्रचक्रमिवाकुलम् ॥ 97.14 ॥

rakṣasā tena bāṇaughairnikṛttā sā sahasradhā| nipapāta tadā bhūmau gṛdhracakramivākulam || 97.14 ||

उस राक्षस के बाण-समूहों से हजारों टुकड़ों में कट कर वह शिला भूमि पर इस प्रकार गिर पड़ी, मानो गिद्धों का व्याकुल झुंड गिर पड़ा हो।

श्लोक 15 (yuddha.97.15)

तां तु भिन्नां शिलां दृष्ट्वा सुग्रीवः क्रोधमूर्च्छितः। सालमुत्पाट्य चिक्षेप तं स चिच्छेद नैकधा ॥ 97.15 ॥

tāṃ tu bhinnāṃ śilāṃ dṛṣṭvā sugrīvaḥ krodhamūrcchitaḥ| sālamutpāṭya cikṣepa taṃ sa ciccheda naikadhā || 97.15 ||

उस टूटी हुई शिला को देखकर क्रोध से बेसुध सुग्रीव ने एक साल वृक्ष उखाड़कर फेंका, किन्तु उसने भी उसे अनेक टुकड़ों में काट डाला।

श्लोक 16 (yuddha.97.16)

शरैश्च विददारैनं शूरः परबलार्दनः। स ददर्श ततः क्रुद्धः परिघं पतितं भुवि ॥ 97.16 ॥

śaraiśca vidadārainaṃ śūraḥ parabalārdanaḥ| sa dadarśa tataḥ kruddhaḥ parighaṃ patitaṃ bhuvi || 97.16 ||

फिर उस शत्रु-सेना के संहारक शूरवीर महोदर ने बाणों से सुग्रीव को घायल कर दिया। तब क्रुद्ध सुग्रीव ने भूमि पर पड़ा एक लोहे का परिघ (गदा-दंड) देखा।

श्लोक 17 (yuddha.97.17)

आविध्य तु स तं दीप्तं परिघं तस्य दर्शयन्। परिघेणोग्रवेगेन जघानास्य हयोत्तमान् ॥ 97.17 ॥

āvidhya tu sa taṃ dīptaṃ parighaṃ tasya darśayan| parigheṇogravegena jaghānāsya hayottamān || 97.17 ||

उस चमकते हुए परिघ को घुमाकर और उसे दिखाते हुए, सुग्रीव ने भीषण वेग से उस परिघ द्वारा महोदर के उत्तम अश्वों का वध कर दिया।

श्लोक 18 (yuddha.97.18)

तस्माद्धतहयाद् वीरः सोऽवप्लुत्य महारथात्। गदां जग्राह संक्रुद्धो राक्षसोऽथ महोदरः ॥ 97.18 ॥

tasmāddhatahayād vīraḥ so'vaplutya mahārathāt| gadāṃ jagrāha saṃkruddho rākṣaso'tha mahodaraḥ || 97.18 ||

अपने अश्व मारे जाने पर उस महारथ से कूद पड़कर, वीर राक्षस महोदर ने क्रुद्ध होकर एक गदा उठा ली।

श्लोक 19 (yuddha.97.19)

गदापरिघहस्तौ तौ युधि वीरौ समीयतुः। नर्दन्तौ गोवृषप्रख्यौ घनाविव सविद्युतौ ॥ 97.19 ॥

gadāparighahastau tau yudhi vīrau samīyatuḥ| nardantau govṛṣaprakhyau ghanāviva savidyutau || 97.19 ||

गदा और परिघ हाथों में लिए वे दोनों वीर युद्ध में परस्पर भिड़ गए, गरजते हुए वे दो साँड़ों के समान थे, मानो बिजली सहित दो मेघ हों।

श्लोक 20 (yuddha.97.20)

ततः क्रुद्धो गदां तस्मै चिक्षेप रजनीचरः। ज्वलन्तीं भास्कराभासां सुग्रीवाय महोदरः ॥ 97.20 ॥

tataḥ kruddho gadāṃ tasmai cikṣepa rajanīcaraḥ| jvalantīṃ bhāskarābhāsāṃ sugrīvāya mahodaraḥ || 97.20 ||

तब क्रुद्ध निशाचर महोदर ने सूर्य के समान चमकती हुई प्रज्वलित गदा सुग्रीव पर फेंकी।

श्लोक 21 (yuddha.97.21)

गदां तां सुमहाघोरामापतन्तीं महाबलः। सुग्रीवो रोषताम्राक्षः समुद्यम्य महाहवे ॥ 97.21 ॥

gadāṃ tāṃ sumahāghorāmāpatantīṃ mahābalaḥ| sugrīvo roṣatāmrākṣaḥ samudyamya mahāhave || 97.21 ||

उस महाभयंकर गदा को अपनी ओर आती देखकर, क्रोध से लाल आँखों वाले महाबली सुग्रीव ने उस महासमर में अपना परिघ उठाया,

श्लोक 22 (yuddha.97.22)

आजघान गदां तस्य परिघेण हरीश्वरः। पपात तरसा भिन्नः परिघस्तस्य भूतले ॥ 97.22 ॥

ājaghāna gadāṃ tasya parigheṇa harīśvaraḥ| papāta tarasā bhinnaḥ parighastasya bhūtale || 97.22 ||

और उस वानरराज ने उसकी गदा पर परिघ से प्रहार किया। उसका वह परिघ ही वेगपूर्वक टूटकर भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 23 (yuddha.97.23)

ततो जग्राह तेजस्वी सुग्रीवो वसुधातलात्। आयसं मुसलं घोरं सर्वतो हेमभूषितम् ॥ 97.23 ॥

tato jagrāha tejasvī sugrīvo vasudhātalāt| āyasaṃ musalaṃ ghoraṃ sarvato hemabhūṣitam || 97.23 ||

तब तेजस्वी सुग्रीव ने भूमि से सब ओर सोने से जड़ा एक भयंकर लौह मूसल उठा लिया।

श्लोक 24 (yuddha.97.24)

स तमुद्यम्य चिक्षेप सोऽप्यस्य प्राक्षिपद् गदाम्। भिन्नावन्योन्यमासाद्य पेततुस्तौ महीतले ॥ 97.24 ॥

sa tamudyamya cikṣepa so'pyasya prākṣipad gadām| bhinnāvanyonyamāsādya petatustau mahītale || 97.24 ||

उसे उठाकर उसने फेंका, और महोदर ने भी अपनी गदा फेंकी। दोनों शस्त्र आपस में टकराकर टूट गए और धरती पर गिर पड़े।

श्लोक 25 (yuddha.97.25)

ततो भिन्नप्रहरणौ मुष्टिभ्यां तौ समीयतुः। तेजोबलसमाविष्टौ दीप्ताविव हुताशनौ ॥ 97.25 ॥

tato bhinnapraharaṇau muṣṭibhyāṃ tau samīyatuḥ| tejobalasamāviṣṭau dīptāviva hutāśanau || 97.25 ||

अपने शस्त्र टूट जाने पर दोनों तेज और बल से भरपूर, दो प्रज्वलित अग्नियों के समान, मुट्ठियों से भिड़ गए।

श्लोक 26 (yuddha.97.26)

जघ्नतुस्तौ तदान्योन्यं नदन्तौ च पुनः पुनः। तलैश्चान्योन्यमासाद्य पेततुश्च महीतले ॥ 97.26 ॥

jaghnatustau tadānyonyaṃ nadantau ca punaḥ punaḥ| talaiścānyonyamāsādya petatuśca mahītale || 97.26 ||

बार-बार गरजते हुए वे परस्पर एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे, और थप्पड़ों से भिड़कर वे दोनों धरती पर गिर पड़े।

श्लोक 27 (yuddha.97.27)

उत्पेततुस्तदा तूर्णं जघ्नतुश्च परस्परम्। भुजैश्चिक्षिपतुर्वीरावन्योन्यमपराजितौ ॥ 97.27 ॥

utpetatustadā tūrṇaṃ jaghnatuśca parasparam| bhujaiścikṣipaturvīrāvanyonyamaparājitau || 97.27 ||

फिर तुरंत उठकर वे एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे; दोनों अपराजित वीर अपनी भुजाओं से एक-दूसरे को पटकने लगे।

श्लोक 28 (yuddha.97.28)

जग्मतुस्तौ श्रमं वीरौ बाहुयुद्धे परंतपौ। आजहार तदा खड्गमदूरपरिवर्तिनम् ॥ 97.28 ॥

jagmatustau śramaṃ vīrau bāhuyuddhe paraṃtapau| ājahāra tadā khaḍgamadūraparivartinam || 97.28 ||

शत्रु-तापक वे दोनों वीर बाहु-युद्ध से थक गए। तब महोदर ने पास ही पड़े एक खड्ग को ढाल सहित उठा लिया।

श्लोक 29 (yuddha.97.29)

राक्षसश्चर्मणा सार्धं महावेगो महोदरः। तथैव च महाखड्गं चर्मणा पतितं सह। जग्राह वानरश्रेष्ठः सुग्रीवो वेगवत्तरः ॥ 97.29 ॥

rākṣasaścarmaṇā sārdhaṃ mahāvego mahodaraḥ| tathaiva ca mahākhaḍgaṃ carmaṇā patitaṃ saha| jagrāha vānaraśreṣṭhaḥ sugrīvo vegavattaraḥ || 97.29 ||

उस अत्यंत वेगवान राक्षस महोदर ने ढाल सहित खड्ग उठाया, और उससे भी अधिक वेगवान वानरश्रेष्ठ सुग्रीव ने भी वहीं पड़े एक बड़े खड्ग को ढाल सहित उठा लिया।

श्लोक 30 (yuddha.97.30)

ततो रोषपरीताङ्गौ नदन्तावभ्यधावताम्। उद्यतासी रणे हृष्टौ युधि शस्त्रविशारदौ ॥ 97.30 ॥

tato roṣaparītāṅgau nadantāvabhyadhāvatām| udyatāsī raṇe hṛṣṭau yudhi śastraviśāradau || 97.30 ||

तब क्रोध से आविष्ट अंगों वाले, शस्त्र-विद्या में निपुण वे दोनों गरजते हुए और तलवारें उठाए हर्षपूर्वक युद्धभूमि में एक-दूसरे की ओर दौड़ पड़े।

श्लोक 31 (yuddha.97.31)

दक्षिणं मण्डलं चोभौ सुतूर्णं सम्परीयतुः। अन्योन्यमभिसंक्रुद्धौ जये प्रणिहितावुभौ ॥ 97.31 ॥

dakṣiṇaṃ maṇḍalaṃ cobhau sutūrṇaṃ samparīyatuḥ| anyonyamabhisaṃkruddhau jaye praṇihitāvubhau || 97.31 ||

दोनों एक-दूसरे पर क्रुद्ध होकर और विजय पर ही मन लगाए, अत्यंत तीव्रता से दाहिनी ओर घूमते हुए एक-दूसरे की परिक्रमा करने लगे।

श्लोक 32 (yuddha.97.32)

स तु शूरो महावेगो वीर्यश्लाघी महोदरः। महावर्मणि तं खड्गं पातयामास दुर्मतिः ॥ 97.32 ॥

sa tu śūro mahāvego vīryaślāghī mahodaraḥ| mahāvarmaṇi taṃ khaḍgaṃ pātayāmāsa durmatiḥ || 97.32 ||

अपने पराक्रम पर गर्व करने वाले उस शूर, अत्यंत वेगवान, किन्तु दुर्बुद्धि महोदर ने वह खड्ग सुग्रीव की विशाल ढाल पर दे मारा।

श्लोक 33 (yuddha.97.33)

लग्नमुत्कर्षतः खड्गं खड्गेन कपिकुञ्जरः। जहार सशिरस्त्राणं कुण्डलोपगतं शिरः ॥ 97.33 ॥

lagnamutkarṣataḥ khaḍgaṃ khaḍgena kapikuñjaraḥ| jahāra saśirastrāṇaṃ kuṇḍalopagataṃ śiraḥ || 97.33 ||

जब वह उस ढाल में धँसे खड्ग को खींच रहा था, तभी उस कपिश्रेष्ठ सुग्रीव ने अपने खड्ग से कुंडलों और शिरस्त्राण सहित उसका सिर काट डाला।

श्लोक 34 (yuddha.97.34)

निकृत्तशिरसस्तस्य पतितस्य महीतले। तद् बलं राक्षसेन्द्रस्य दृष्ट्वा तत्र न दृश्यते ॥ 97.34 ॥

nikṛttaśirasastasya patitasya mahītale| tad balaṃ rākṣasendrasya dṛṣṭvā tatra na dṛśyate || 97.34 ||

उसका कटा हुआ सिर भूमि पर गिरते ही, यह देखकर राक्षसराज की वह सेना वहाँ कहीं दिखाई नहीं दी (अर्थात भाग खड़ी हुई)।

श्लोक 35 (yuddha.97.35)

हत्वा तं वानरैः सार्धं ननाद मुदितो हरिः। चुक्रोध च दशग्रीवो बभौ हृष्टश्च राघवः ॥ 97.35 ॥

hatvā taṃ vānaraiḥ sārdhaṃ nanāda mudito hariḥ| cukrodha ca daśagrīvo babhau hṛṣṭaśca rāghavaḥ || 97.35 ||

उसे मारकर सुग्रीव ने वानरों के साथ हर्षपूर्वक गर्जना की। दशग्रीव क्रोधित हो उठा, और राघव प्रसन्नता से दमक उठे।

श्लोक 36 (yuddha.97.36)

विषण्णवदनाः सर्वे राक्षसा दीनचेतसः। विद्रवन्ति ततः सर्वे भयवित्रस्तचेतसः ॥ 97.36 ॥

viṣaṇṇavadanāḥ sarve rākṣasā dīnacetasaḥ| vidravanti tataḥ sarve bhayavitrastacetasaḥ || 97.36 ||

उदास मुख और दीन मन वाले सभी राक्षस भय से व्याकुल हृदय होकर वहाँ से भाग खड़े हुए।

श्लोक 37 (yuddha.97.37)

महोदरं तं विनिपात्य भूमौ महागिरेः कीर्णमिवैकदेशम्। सूर्यात्मजस्तत्र रराज लक्ष्म्या सूर्यः स्वतेजोभिरिवाप्रधृष्यः ॥ 97.37 ॥

mahodaraṃ taṃ vinipātya bhūmau mahāgireḥ kīrṇamivaikadeśam| sūryātmajastatra rarāja lakṣmyā sūryaḥ svatejobhirivāpradhṛṣyaḥ || 97.37 ||

महोदर को भूमि पर इस प्रकार गिराकर, मानो किसी विशाल पर्वत का एक भाग बिखर गया हो, सूर्यपुत्र सुग्रीव वहाँ अपनी शोभा से इस प्रकार सुशोभित हुए, जैसे सूर्य अपने ही तेज से अजेय होकर सुशोभित होता है।

श्लोक 38 (yuddha.97.38)

अथ विजयमवाप्य वानरेन्द्रः समरमुखे सुरसिद्धयक्षसङ्घैः। अवनितलगतैश्च भूतसङ्घै- र्हरुषसमाकुलितैर्निरीक्ष्यमाणः ॥ 97.38 ॥

atha vijayamavāpya vānarendraḥ samaramukhe surasiddhayakṣasaṅghaiḥ| avanitalagataiśca bhūtasaṅghai- rharuṣasamākulitairnirīkṣyamāṇaḥ || 97.38 ||

इस प्रकार युद्ध के मोर्चे पर विजय प्राप्त कर, वानरेन्द्र सुग्रीव को देवताओं, सिद्धों और यक्षों के समूहों ने, तथा धरती पर खड़े हर्ष से भरे हुए भूत-गणों ने बड़े हर्ष से निहारा।

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