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अष्टाध्यायी

Aṣṭādhyāyī

रचयिता: Panini3997 श्लोक

इस अनुवाद के विषय में

Hindi and English translations were composed by unpacking each terse sutra's grammatical operation, informed by (but not copied from) the Hindi commentary edition's gloss and worked examples, in house style consistent with the site's other Vedanga texts.

7 श्लोकों पर टिप्पणी दी गई है, जहाँ पाठ विवादित है।

माहेश्वरसूत्राणि

श्लोक 1

अइउण्

a i u ṇ

परम्परा के अनुसार भगवान शिव के डमरू से चौदह बार निनादित इन 'माहेश्वर सूत्रों' को महर्षि पाणिनि ने प्राप्त किया; ये अष्टाध्यायी में प्रयुक्त होने वाले समस्त 'प्रत्याहारों' (वर्ण-समूहों) के निर्माण का आधार हैं। यह प्रथम सूत्र स्वर अ, इ, उ को गिनाकर उन्हें इत्-चिह्न ण् से सीमाबद्ध करता है।

श्लोक 2

ऋऌक्

ṛ ḷ k

ऋ और ऌ (स्वरित ऋकार-ऌकार) — इत्-चिह्न क्।

श्लोक 3

एओङ्

e o ṅ

ए और ओ — इत्-चिह्न ङ्।

श्लोक 4

ऐऔच्

ai au c

ऐ और औ — इत्-चिह्न च्। इसी सूत्र के इत् 'च्' तक पहुँचकर प्रथम सूत्र के आदि स्वर 'अ' से 'अच्' नामक सुप्रसिद्ध प्रत्याहार बनता है, जिसके अन्तर्गत संस्कृत के सभी नौ स्वर (अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ) समाहित हैं।

श्लोक 5

हयवरट्

ha ya va ra ṭ

ह, य, व, र — इत्-चिह्न ट्।

श्लोक 6

लण्

la ṇ

ल — इत्-चिह्न ण्।

श्लोक 7

ञमङणनम्

ña ma ṅa ṇa na m

ञ, म, ङ, ण, न — इत्-चिह्न म्। (ये पाँचों अनुनासिक व्यंजन हैं, देखें 1.1.8)।

श्लोक 8

झभञ्

jha bha ñ

झ, भ — इत्-चिह्न ञ्।

श्लोक 9

घढधष्

gha ḍha dha ṣ

घ, ढ, ध — इत्-चिह्न ष्।

श्लोक 10

जबगडदश्

ja ba ga ḍa da ś

ज, ब, ग, ड, द — इत्-चिह्न श्।

श्लोक 11

खफछठथचटतव्

kha pha cha ṭha tha ca ṭa ta v

ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त — इत्-चिह्न व्।

श्लोक 12

कपय्

ka pa y

क, प — इत्-चिह्न य्।

श्लोक 13

शषसर्

śa ṣa sa r

श, ष, स — इत्-चिह्न र्।

श्लोक 14

हल्

ha l

ह — इत्-चिह्न ल्। यह चौदहवाँ और अन्तिम माहेश्वर सूत्र है। इसके इत् 'ल्' तक पहुँचकर पाँचवें सूत्र के आदि व्यंजन 'ह' से 'हल्' नामक प्रत्याहार बनता है, जिसके अन्तर्गत संस्कृत के सभी तैंतीस व्यंजन समाहित हैं — इस प्रकार चौदह सूत्रों में सम्पूर्ण वर्णमाला (स्वर+व्यंजन) संगृहीत हो जाती है, जिस पर सम्पूर्ण अष्टाध्यायी की रचना खड़ी है।

प्रथमोऽध्यायः, प्रथमः पादः

श्लोक 1.1

वृद्धिरादैच्

vṛddhirādaic

आ" वर्ण तथा "ऐच्" प्रत्याहार (ऐ, औ) की — दोनों की — 'वृद्धि' संज्ञा निर्धारित की जाती है। अष्टाध्यायी की यह प्रथम पारिभाषिक संज्ञा है, जिसके आधार पर आगे गुण-वृद्धि सम्बन्धी असंख्य कार्य सिद्ध होते हैं।

श्लोक 1.2

अदेङ् गुणः

adeṅ guṇaḥ

ह्रस्व अ तथा एङ् प्रत्याहार (ए, ओ) की 'गुण' संज्ञा होती है। वृद्धि की भाँति गुण भी एक अत्यन्त बहुप्रयुक्त पारिभाषिक संज्ञा है, जो धातु और प्रत्यय के संयोग में स्वर-परिवर्तन को नियमित करती है।

श्लोक 1.3

इको गुणवृद्धी

iko guṇavṛddhī

जहाँ कहीं आगे केवल 'गुण हो' या 'वृद्धि हो' ऐसा निर्देश मिले, वहाँ वह गुण अथवा वृद्धि इक् प्रत्याहार (इ, उ, ऋ, ऌ) के ही स्थान पर समझी जाए। यह एक व्यापक अधिकार-सूत्र है जो आगे के अनेक सूत्रों में गुण-वृद्धि के प्रतिस्थाप्य वर्ण को सीमित करता है।

श्लोक 1.4

न धातुलोप आर्धधातुके

na dhātulopa ārdhadhātuke

यदि किसी आर्धधातुक प्रत्यय के कारण धातु के किसी अवयव का लोप होता हो, तो उसी आर्धधातुक-निमित्तक गुण अथवा वृद्धि का प्रतिषेध हो जाता है — अर्थात् उस अवस्था में गुण-वृद्धि नहीं होते। उदाहरण: लोलुवः, पोपुवः, मरीमृजः।

श्लोक 1.5

क्ङिति च

kṅiti ca

यह सूत्र 1.1.3-1.1.4 का ही विस्तार है: यदि आगे आने वाला प्रत्यय ककार अथवा ङकार को इत्-रूप में रखता हो (अर्थात् कित् या ङित् हो), तो भी इक् वर्ण का गुण अथवा वृद्धि नहीं होता। उदाहरणार्थ 'भूयात्' में आशीर्लिङ् का यासुट् कित्-संज्ञक होने से भू धातु के ऊकार को गुण न होकर 'भूयात्' रूप ही सिद्ध होता है। (टिप्पणी: स्रोत-पाठ में यहाँ भूलवश एक अतिरिक्त 'ग्' अक्षर जुड़ गया था; शुद्ध पाठ 'क्ङिति च' के अनुरूप सुधारा गया है — देखें review_note)।

टिप्पणी: Source page had 'ग्क्ङिति च' (an extra initial ग्); corrected to the standard, unambiguous reading 'क्ङिति च' (kṅiti ca) per the known transcription glitch flagged for this sutra.

श्लोक 1.6

दीधीवेवीटाम्

dīdhīvevīṭām

दीधीङ् (चमकना/सोचना) और वेवीङ् (जाना) नामक दो विशेष धातुओं तथा इट्-आगम के इक्-वर्ण को गुण-वृद्धि का निषेध होता है। उदाहरण: दीधीङ्+ऐ=दीध्यै, वेवीङ्+ऐ=वेव्यै।

श्लोक 1.7

हलोऽनन्तराः संयोगः

halo'nantarāḥ saṁyogaḥ

दो या अधिक व्यंजन यदि परस्पर बिना किसी स्वर के व्यवधान के सटे हों, तो उनकी 'संयोग' संज्ञा होती है। उदाहरण: अग्नि में 'ग्न्', इन्द्र में 'न्द्र्'।

श्लोक 1.8

मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः

mukhanāsikāvacano'nunāsikaḥ

जो वर्ण मुख और नाक — दोनों स्थानों से उच्चरित होता है, उसे 'अनुनासिक' कहा जाता है; ङ्, ञ्, ण्, न्, म् — ये पाँचों वर्गीय अनुनासिक व्यंजन हैं।

श्लोक 1.9

तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम्

tulyāsyaprayatnaṁ savarṇam

जिन वर्णों का उच्चारण-स्थान (कण्ठ, तालु आदि) और आभ्यन्तर प्रयत्न (स्पृष्ट, ईषत्स्पृष्ट आदि) दोनों समान हों, वे एक-दूसरे के 'सवर्ण' (समान वर्ण) कहलाते हैं — जैसे त और थ, दोनों का स्थान दन्त और प्रयत्न स्पृष्ट है।

श्लोक 1.10

नाज्झलौ

nājjhalau

यद्यपि उच्चारण-स्थान तथा आभ्यन्तर प्रयत्न की समानता ही सवर्णता का आधार है (1.1.9), तथापि कोई स्वर किसी व्यंजन का सवर्ण कभी नहीं होता, चाहे स्थान-प्रयत्न कितने ही मिलते क्यों न हों।

श्लोक 1.11

ईदूदेद्द्विवचनं प्रगृह्यम्

īdūdeddvivacanaṁ pragṛhyam

दो वस्तुओं के बोधक जो शब्द-रूप ई, ऊ अथवा ए में समाप्त होते हैं, उनकी 'प्रगृह्य' संज्ञा होती है (अर्थात् आगे स्वर आने पर भी उनकी सन्धि नहीं होती)। उदाहरण: अग्नी इति, वायू इति, माले इति।

श्लोक 1.12

अदसो मात्

adaso māt

सर्वनाम 'अदस्' (वह) के म्-अक्षर से परवर्ती ईकार और ऊकार की भी प्रगृह्य संज्ञा होती है। उदाहरण: अमी अत्र, अमू अत्र — यहाँ भी सन्धि नहीं होती।

श्लोक 1.13

शे

śe

लोट् लकार के 'शे' नामक आदेश-प्रत्यय की भी 'प्रगृह्य' संज्ञा होती है। उदाहरण: अस्मे इति, युष्मे इति।

श्लोक 1.14

निपात एकाजनाङ्

nipāta ekājanāṅ

आङ् (आ) को छोड़कर शेष एक-स्वर वाले निपात (अव्यय) प्रगृह्य-संज्ञक होते हैं। उदाहरण: अ अपेहि, इ इन्द्रं पश्य, उ उत्तिष्ठ — इनकी भी सन्धि नहीं होती।

श्लोक 1.15

ओत्

ot

ओकार में समाप्त होने वाले निपात की भी प्रगृह्य संज्ञा होती है। उदाहरण: अथो इति, अहो अधुना।

श्लोक 1.16

सम्बुद्धौ शाकल्यस्येतावनार्षे

sambuddhau śākalyasyetāvanārṣe

लौकिक (अवैदिक) भाषा में सम्बोधन-सूचक ओकार के बाद 'इति' आने पर, आचार्य शाकल्य के मत से विकल्प से प्रगृह्य संज्ञा होती है। उदाहरण: वायो+इति — शाकल्य-मत में 'वायो इति', अन्य मत में सन्धि करके 'वायविति'।

श्लोक 1.17

उञः

uñaḥ

शाकल्य के मत में अवैदिक 'इति' शब्द से पूर्व 'उञ्' (उ) प्रत्याहार की भी प्रगृह्य संज्ञा होती है। उदाहरण: उ इति।

श्लोक 1.18

ऊँ

ūm̐

शाकल्य के मत से, अवैदिक 'इति' से पूर्व 'उञ्' के स्थान पर दीर्घ अनुनासिक ऊँ (ॐ) का आदेश होता है, और वह भी प्रगृह्य ही रहता है।

श्लोक 1.19

ईदूतौ च सप्तम्यर्थे

īdūtau ca saptamyarthe

जब ईकारान्त या ऊकारान्त शब्द-रूप सप्तमी विभक्ति (अर्थात् 'में/पर') के अर्थ में प्रयुक्त हों, तो उनकी भी प्रगृह्य संज्ञा होती है — यह 1.1.11 से आरम्भ प्रगृह्य-प्रकरण की समाप्ति है।

श्लोक 1.20

दाधा घ्वदाप्

dādhā ghvadāp

'दा' के रूप में प्रतिपन्न चार धातुओं तथा 'धा' के रूप में प्रतिपन्न दो धातुओं की — दाप्, दैप् (जो मान/शोधनार्थक हैं) को छोड़कर — 'घु' संज्ञा होती है। यह संज्ञा आगे अनेक स्वर-कार्यों (जैसे लोट् के 'देहि' रूप में) का आधार बनती है।

श्लोक 1.21

आद्यन्तवदेकस्मिन्

ādyantavadekasmin

यदि कोई एक ही अंश उभयतः आदि तथा अन्त दोनों की भूमिका निभाता हो, तो जो कार्य आदि के लिए विहित है और जो अन्त के लिए विहित है, दोनों ही उस एक अंश पर लागू हो जाते हैं। उदाहरण: कुमारीतरा, कुमारीतमा।

श्लोक 1.22

तरप्तमपौ घः

taraptamapau ghaḥ

तुलनावाचक तरप् (तर) और तमप् (तम) प्रत्ययों की 'घ' संज्ञा होती है, जो आगे कई स्वर-कार्यों को नियंत्रित करती है। उदाहरण: गुरुतरः, गुरुतमः, लघुतरः, लघुतमः।

श्लोक 1.23

बहुगणवतुडति संख्या

bahugaṇavatuḍati saṁkhyā

'बहु' शब्द, 'गण'-गणपठित शब्द, वतुप्रत्ययान्त (जैसे यावत्, तावत्) तथा डतिप्रत्ययान्त (जैसे कति) शब्दों की 'संख्या' संज्ञा होती है। यह संज्ञा इन्हें संख्यावाचक शब्दों जैसा व्यवहार देती है।

श्लोक 1.24

ष्णान्ता षट्

ṣṇāntā ṣaṭ

षकारान्त तथा नकारान्त संख्यावाचक शब्दों (जैसे षष्, पञ्चन्) की 'षट्' संज्ञा होती है, जो इनके विभक्ति-कार्यों को नियमित करती है।

श्लोक 1.25

डति च

ḍati ca

डति-प्रत्ययान्त शब्दों (जैसे कति) की भी 'षट्' संज्ञा होती है।

श्लोक 1.26

क्तक्तवतू निष्ठा

ktaktavatū niṣṭhā

भूतकालवाचक क्त (जैसे 'गतः') और क्तवतु (जैसे 'गतवान्') प्रत्ययों की 'निष्ठा' संज्ञा होती है, जो इन कृदन्त रूपों से सम्बद्ध अनेक कार्यों का आधार बनती है।

श्लोक 1.27

सर्वादीनि सर्वनामानि

sarvādīni sarvanāmāni

'सर्व' से आरम्भ होने वाले गण-पठित शब्दों (सर्व, विश्व, उभय आदि) की 'सर्वनाम' संज्ञा होती है, बशर्ते वे अपने सामान्य, सर्वग्राही अर्थ में ही प्रयुक्त हों।

श्लोक 1.28

विभाषा दिक्समासे बहुव्रीहौ

vibhāṣā diksamāse bahuvrīhau

जब दिशा के अर्थ वाला बहुव्रीहि समास बने, तो उसमें प्रयुक्त सर्वादि-गण के शब्दों की सर्वनाम संज्ञा विकल्प से (अर्थात् कभी होती है, कभी नहीं) होती है।

श्लोक 1.29

न बहुव्रीहौ

na bahuvrīhau

सामान्य बहुव्रीहि समास में प्रयुक्त सर्वादि-गण शब्दों की सर्वनाम संज्ञा नहीं होती (1.1.28 का अपवाद-प्रसंग छोड़कर)।

श्लोक 1.30

तृतीयासमासे

tṛtīyāsamāse

तृतीया तत्पुरुष समास के प्रसंग में भी सर्वादि शब्दों की सर्वनाम संज्ञा नहीं होती।

श्लोक 1.31

द्वन्द्वे च

dvandve ca

द्वन्द्व समास में भी सर्वादि शब्दों की सर्वनाम संज्ञा नहीं होती है।

श्लोक 1.32

विभाषा जसि

vibhāṣā jasi

द्वन्द्व समास में, यदि जस् (नाम. बहुवचन) प्रत्यय से सम्बन्धित कार्य करना हो, तो 1.1.31 के निषेध के बावजूद सर्वादि की सर्वनाम संज्ञा विकल्प से हो जाती है।

श्लोक 1.33

प्रथमचरमतयाल्पार्धकतिपयनेमाश्च

prathamacaramatayālpārdhakatipayanemāśca

'प्रथम', 'चरम', तयप्-प्रत्ययान्त शब्द, 'अल्प', 'अर्ध', 'कतिपय' तथा 'नेम' — इन सात शब्दों की भी, जस् प्रत्यय परे रहते, विकल्प से सर्वनाम संज्ञा होती है। उदाहरण: पूर्वे/पूर्वाः, अल्पे/अल्पाः।

श्लोक 1.34

पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायामसंज्ञायाम्

pūrvaparāvaradakṣiṇottarāparādharāṇi vyavasthāyāmasaṁjñāyām

जब पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर और अधर शब्द किसी व्यवस्था (क्रम/स्थिति) के अर्थ में प्रयुक्त हों — न कि किसी विशेष नाम के रूप में — तब जस् परे रहते इनकी सर्वनाम संज्ञा विकल्प से होती है।

श्लोक 1.35

स्वमज्ञातिधनाख्यायाम्

svamajñātidhanākhyāyām

'स्व' (अपना) शब्द की — जब वह न तो कुटुम्ब-वाचक हो और न धन-वाचक — जस् परे रहते विकल्प से सर्वनाम संज्ञा होती है।

श्लोक 1.36

अन्तरं बहिर्योगोपसंव्यानयोः

antaraṁ bahiryogopasaṁvyānayoḥ

'अन्तर' शब्द की — जब वह बाह्य सम्बन्ध या आवरण (ढकने के वस्त्र) के अर्थ में हो — जस् परे रहते विकल्प से सर्वनाम संज्ञा होती है। उदाहरण: अन्तरे गृहाः/अन्तरा गृहाः।

श्लोक 1.37

स्वरादिनिपातमव्ययम्

svarādinipātamavyayam

'स्वर्' आदि गण में पठित शब्द तथा समस्त निपात (जैसे च, वा, ह) — दोनों की 'अव्यय' संज्ञा होती है, अर्थात् इनके रूप विभक्ति के अनुसार नहीं बदलते।

श्लोक 1.38

तद्धितश्चासर्वविभक्तिः

taddhitaścāsarvavibhaktiḥ

ऐसा तद्धित-प्रत्ययान्त शब्द जिसके रूप सभी विभक्तियों में नहीं बनते (अर्थात् जो सीमित रूपों में ही प्रयुक्त होता है), वह भी 'अव्यय' संज्ञक हो जाता है। उदाहरण: 'अतः' (तसिल्-प्रत्ययान्त)।

श्लोक 1.39

कृन्मेजन्तः

kṛnmejantaḥ

जिस कृत्-प्रत्ययान्त शब्द का अन्त मकार में हो, अथवा जो एजन्त (ए/ओ/ऐ/औ में समाप्त) हो, उसकी भी 'अव्यय' संज्ञा होती है। उदाहरण: स्मारं स्मारम्, जीवसे। (टिप्पणी: दोनों स्रोत-प्रतियों में इस सूत्र का पाठ भिन्न-भिन्न ढंग से त्रुटिपूर्ण मिला; यहाँ सुस्थापित शास्त्रीय पाठ के आधार पर पुनर्निर्मित किया गया है — देखें review_note)।

टिप्पणी: Both source witnesses garbled this sutra differently (bare edition: 'कृत्मेजन्तः'; commentary edition: 'कृमेजन्तः'). Corrected to the well-established standard reading 'कृन्मेजन्तः' (kṛnmejantaḥ).

श्लोक 1.40

क्त्वातोसुन्कसुनः

ktvātosunkasunaḥ

क्त्वा (जैसे 'पठित्वा'), तोसुन् (जैसे 'उदेतोः') और कसुन् (जैसे 'विसृपः') प्रत्ययान्त शब्द भी अव्यय-संज्ञक होते हैं।

श्लोक 1.41

अव्ययीभावश्च

avyayībhāvaśca

अव्ययीभाव नामक समास भी अव्यय-संज्ञक होता है। उदाहरण: यथाशक्ति।

श्लोक 1.42

शि सर्वनामस्थानम्

śi sarvanāmasthānam

जस् के स्थान पर होने वाले 'शि' आदेश के शेष इकार की 'सर्वनामस्थान' संज्ञा होती है — यह नकारान्त शब्दों में विशेष रूपान्तरण (जैसे राजानः) का आधार बनती है।

श्लोक 1.43

सुडनपुंसकस्य

suḍanapuṁsakasya

नपुंसकलिंग के अतिरिक्त शेष लिंगों में सु, औ, जस्, अम्, औट् प्रत्ययों की भी सर्वनामस्थान संज्ञा होती है।

श्लोक 1.44

न वेति विभाषा

na veti vibhāṣā

शास्त्र में जहाँ कहीं 'विभाषा' पद आए, वह निषेध और विकल्प दोनों का बोधक होता है — अर्थात् कोई कार्य 'हो भी सकता है, न भी हो' ऐसा वैकल्पिक निर्देश। उदाहरण: उक्तः/उक्तवान्।

श्लोक 1.45

इग्यणः सम्प्रसारणम्

igyaṇaḥ samprasāraṇam

जहाँ यण् (य्, व्, र्, ल्) के स्थान पर उसके सजातीय इक्-स्वर (क्रमशः इ, उ, ऋ, ऌ) का विधान हो, उस आदेश की 'सम्प्रसारण' संज्ञा होती है।

श्लोक 1.46

आद्यन्तौ टकितौ

ādyantau ṭakitau

जब किसी प्रत्यय के अवयव का कहीं विधान करना हो, तो टित् (टकारेत्) प्रत्यय का वह अवयव अंग के आदि में, और कित् (ककारेत्) प्रत्यय का अवयव अंग के अन्त में जोड़ा जाता है।

श्लोक 1.47

मिदचोऽन्त्यात्परः

midaco'ntyātparaḥ

मित् (मकारेत्) संज्ञक आगम अथवा प्रत्यय, अंग के अन्तिम स्वर (अच्) के ठीक बाद जोड़ा जाता है। उदाहरण: मुच्+नुम्=मुञ्च्।

श्लोक 1.48

एच इग्घ्रस्वादेशे

eca igghrasvādeśe

जब किसी नियम से एच् (ए, ऐ, ओ, औ) के स्थान पर इक् (इ/उ) का ह्रस्व आदेश करना अभीष्ट हो, तो ए/ऐ के स्थान पर इ, तथा ओ/औ के स्थान पर उ होता है। उदाहरण: भविता (भू+इता)।

श्लोक 1.49

षष्ठी स्थानेयोगा

ṣaṣṭhī sthāneyogā

यदि किसी सूत्र में प्रयुक्त षष्ठी विभक्ति का किसी पद से समुचित सम्बन्ध न बैठे, तो उसे 'स्थाने' (के स्थान पर) अर्थ में समझा जाता है — आदेश-सूत्रों की सामान्य संरचना यहीं से चलती है।

श्लोक 1.50

स्थानेऽन्तरतमः

sthāne'ntaratamaḥ

यदि किसी स्थानी के लिए एक से अधिक सम्भावित आदेश उपलब्ध हों, तो उनमें से वही आदेश चुना जाता है जो स्थानी के सबसे निकट (सादृश्य में) हो — जैसे इक् के स्थान पर यण् आदेश।

श्लोक 1.51

उरण् रपरः

uraṇ raparaḥ

ऋ (या ॠ) के स्थान पर जब अ, इ, उ में से कोई अण्-आदेश हो, तो वह आदेश अपने बाद एक अप्रकट र्-सहित माना जाता है (और ऌ के स्थान पर होने वाला आदेश ल्-सहित)। उदाहरण: कृ+त=कर्त।

श्लोक 1.52

अलोऽन्त्यस्य

alo'ntyasya

जब किसी षष्ठ्यन्त (सम्बन्ध-कारक) पद के लिए आदेश विहित हो, तो वह आदेश उस पूरे पद के स्थान पर नहीं, अपितु उसके केवल अन्तिम वर्ण के स्थान पर होता है — जब तक अन्यथा न कहा जाए।

श्लोक 1.53

ङिच्च

ṅicca

1.1.52 की भाँति ही, ङित्-संज्ञक (ङकारेत्) आदेश भी षष्ठ्यन्त पद के केवल अन्तिम वर्ण के स्थान पर होता है। उदाहरण: सखि+अनङ्=सखा।

श्लोक 1.54

आदेः परस्य

ādeḥ parasya

जब कोई कार्य 'पर' (अगले/परवर्ती) पद के लिए विहित हो, तो वह कार्य उस पद के केवल आदि वर्ण के स्थान पर होता है, सम्पूर्ण पद के स्थान पर नहीं।

श्लोक 1.55

अनेकाल्शित्सर्वस्य

anekālśitsarvasya

1.1.52 के सामान्य नियम का अपवाद यह है कि यदि आदेश स्वयं अनेक वर्णों वाला हो, अथवा शित्-संज्ञक हो, तो वह षष्ठी-निर्दिष्ट सम्पूर्ण पद के स्थान पर होता है, केवल अन्तिम वर्ण के स्थान पर नहीं। उदाहरण: भिस् के स्थान पर ऐस् होने से सम्पूर्ण भिस् बदलता है — रामैः।

श्लोक 1.56

स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ

sthānivadādeśo'nalvidhau

अल्-विधि (किसी वर्ण-विशेष से सम्बन्धित विधि) को छोड़कर, शेष सभी कार्यों में जो आदेश किसी स्थानी के स्थान पर हुआ हो, वह स्थानी के ही समान (स्थानिवत्) व्यवहृत होता है — अर्थात् स्थानी के गुण-धर्म आदेश में भी बने रहते हैं।

श्लोक 1.57

अचः परस्मिन् पूर्वविधौ

acaḥ parasmin pūrvavidhau

जब कोई कार्य किसी पूर्ववर्ती अंश की दृष्टि से (पूर्वविधि रूप में) किया जाना हो, तो उसमें परवर्ती अच् के स्थान पर हुआ आदेश भी अपने मूल स्थानी अच् के समान (स्थानिवत्) माना जाता है।

श्लोक 1.58

न पदान्तद्विर्वचनवरेयलोपस्वरसवर्णानुस्वारदीर्घजश्चर्विधिषु

na padāntadvirvacanavareyalopasvarasavarṇānusvāradīrghajaścarvidhiṣu

पदान्त, द्विर्वचन, यलोप, स्वर, सवर्ण, अनुस्वार, दीर्घ, जश्त्व तथा चर्त्व — इन नौ प्रकार के कार्यों के प्रसंग में, पर-निमित्तक स्वर-आदेश को 'स्थानिवत्' नहीं माना जाता — अर्थात् 1.1.56-57 की स्थानिवद्भावना यहाँ रुक जाती है। उदाहरण: पपतुः, पपुः।

श्लोक 1.59

द्विर्वचनेऽचि

dvirvacane'ci

यदि किसी धातु का द्वित्व (पुनरावृत्ति) करना हो, तो जो अजादि (स्वर से आरम्भ होने वाला) प्रत्यय द्वित्व का निमित्त बना है, उसके स्थान पर तब तक कोई आदेश नहीं होता, जब तक द्वित्व सम्पन्न न हो जाए।

श्लोक 1.60

अदर्शनं लोपः

adarśanaṁ lopaḥ

व्याकरण-शास्त्र में जहाँ किसी वर्ण या प्रत्यय का पूर्ण रूप से अश्रवण (अनुपस्थिति) हो, उसे 'लोप' कहा जाता है — इत्संज्ञक अंश सदैव इसी प्रकार लुप्त होते हैं। उदाहरण: लुक्=विशाखः, श्लु=जुहोति, लुप्=वरणाः।

श्लोक 1.61

प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः

pratyayasya lukślulupaḥ

प्रत्यय के जिस लोप में कोई शेष चिह्न न रहे, उसे क्रमानुसार लुक्, श्लु और लुप् कहा जाता है — ये तीनों संज्ञाएँ 1.1.60 के 'लोप' की ही विशेष उपश्रेणियाँ हैं।

श्लोक 1.62

प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम्

pratyayalope pratyayalakṣaṇam

यद्यपि कोई प्रत्यय लुप्त हो चुका हो, तथापि उस लुप्त प्रत्यय के निमित्त से होने वाले कार्य ज्यों के त्यों होते रहते हैं, मानो प्रत्यय अब भी विद्यमान हो। उदाहरण: गर्गाः, मृष्टः।

श्लोक 1.63

न लुमताऽङ्गस्य

na lumatā'ṅgasya

1.1.62 का अपवाद यह है कि यदि प्रत्यय 'लु' के अन्तर्गत आने वाले किसी रूप (लुक्, श्लु, लुप्) से लुप्त हुआ हो, तो उस प्रत्यय पर आश्रित अंग-सम्बन्धी कार्य नहीं होते।

श्लोक 1.64

अचोऽन्त्यादि टि

aco'ntyādi ṭi

किसी शब्द के अन्तिम स्वर (अच्) से आरम्भ होकर शब्द के अन्त तक जो अंश फैला हो, उसकी 'टि' संज्ञा होती है। उदाहरण: 'राम' में 'अ', 'हरि' में 'इ' — ये टि हैं।

श्लोक 1.65

अलोऽन्त्यात् पूर्व उपधा

alo'ntyāt pūrva upadhā

शब्द के अन्तिम वर्ण (अल्) से ठीक पहले जो वर्ण आता है — स्वर हो या व्यंजन — उसकी 'उपधा' संज्ञा होती है। उदाहरण: 'रावण' में अन्तिम 'अ' से पहले वाला 'ण्' उपधा है।

श्लोक 1.66

तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य

tasminniti nirdiṣṭe pūrvasya

जब कोई नियम सप्तमी विभक्ति (–में) में किसी वर्ण/प्रत्यय का निर्देश करता हो, तो विहित कार्य उस निर्दिष्ट वर्ण से ठीक पहले वाले वर्ण के स्थान पर होता है। उदाहरण: 'इको यणचि' में 'अचि' सप्तम्यन्त है, अतः यण्-आदेश इक् के (उससे ठीक पहले) स्थान पर होता है।

श्लोक 1.67

तस्मादित्युत्तरस्य

tasmādityuttarasya

जब कोई नियम पंचमी विभक्ति (–से) में किसी वर्ण/प्रत्यय का निर्देश करता हो, तो विहित कार्य उस निर्दिष्ट वर्ण से ठीक बाद वाले वर्ण के स्थान पर होता है।

श्लोक 1.68

स्वं रूपं शब्दस्याशब्दसंज्ञा

svaṁ rūpaṁ śabdasyāśabdasaṁjñā

व्याकरण-शास्त्र में, जहाँ किसी शब्द की उपधा आदि जैसी विशेष तकनीकी संज्ञा न हो, वहाँ उस शब्द का अपना ही स्वरूप (शब्द-रूप) ग्राह्य माना जाता है, भले ही वह अन्यत्र किसी अन्य अर्थ का भी बोधक क्यों न हो। उदाहरण: रमा+ईश्वरः=रमेश्वरः — यहाँ 'रमा' अपने ही रूप में गृहीत है।

श्लोक 1.69

अणुदित् सवर्णस्य चाप्रत्ययः

aṇudit savarṇasya cāpratyayaḥ

जब अण् (अ, इ, उ, ऋ, ऌ आदि) अथवा उदित्-संज्ञक (कु, चु, टु, तु, पु आदि) वर्ण किसी सूत्र में स्वयं विधेय न हों, तो वे अपने सवर्णों (ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत सब) के भी बोधक बन जाते हैं — किन्तु प्रत्यय के रूप में नहीं।

श्लोक 1.70

तपरस्तत्कालस्य

taparastatkālasya

1.1.69 का परिष्कार यह है — यदि किसी अण्/उदित् वर्ण से ठीक पहले या बाद तकार जुड़ा हो, तो वह वर्ण केवल अपने ही उच्चारण-काल (ह्रस्व/दीर्घ/प्लुत) के सवर्णों का सूचक रह जाता है। उदाहरण: 'आत्'=केवल दीर्घ आ, 'इत्'=केवल ह्रस्व इ।

श्लोक 1.71

आदिरन्त्येन सहेता

ādirantyena sahetā

किसी सूत्र-समूह के आदि वर्ण के साथ यदि किसी अन्तिम सूत्र का इत्-वर्ण मिला दिया जाए, तो वह संयुक्त रूप (प्रत्याहार) उन दोनों के बीच के समस्त वर्णों का भी बोधक बन जाता है। यही सिद्धान्त माहेश्वर सूत्रों से समस्त प्रत्याहारों (जैसे 'अच्', 'हल्') के निर्माण का आधार है।

श्लोक 1.72

येन विधिस्तदन्तस्य

yena vidhistadantasya

यदि किसी विशेषण (उपाधि, जैसे किसी विशेष प्रत्यय का नाम) के द्वारा कोई कार्य बताया गया हो, तो वह विशेषण उस उपाधि में अन्त होने वाले सम्पूर्ण शब्द-समुदाय (तदन्त) का बोधक बन जाता है, केवल उस अकेले उपाधि का नहीं। उदाहरण: शालायां भवः=शालीयः।

श्लोक 1.73

वृद्धिर्यस्याचामादिस्तद् वृद्धम्

vṛddhiryasyācāmādistad vṛddham

किसी शब्द में जितने भी अच् (स्वर) हों, उनमें से यदि आदि (पहला) स्वर वृद्धि-रूप (आ/ऐ/औ) हो, तो सम्पूर्ण शब्द की 'वृद्ध' संज्ञा होती है। उदाहरण: 'शाला' शब्द में आदि अच् 'आ' वृद्धि-रूप है, अतः 'शाला' वृद्ध-संज्ञक है।

श्लोक 1.74

त्यदादीनि च

tyadādīni ca

त्यद्, तद्, एतद्, इदम्, अदस्, युष्मद्, अस्मद्, त्वत्, भवत्, किम् — इस गण में पठित सर्वनाम-शब्द भी 1.1.73 के मापदण्ड से स्वतंत्र होकर 'वृद्ध' संज्ञक मान लिए जाते हैं।

श्लोक 1.75

एङ् प्राचां देशे

eṅ prācāṁ deśe

पूर्वी देशों (प्राच्य जनपदों) के नामों में जिनका आदि स्वर एङ्-प्रत्याहार (ए अथवा ओ) का हो, उन शब्दों की भी 'वृद्ध' संज्ञा होती है (आचार्य-विशेष के मत में)। उदाहरण: गोनर्द+छ=गोनर्दीयः। यहीं इस प्रकरण की संज्ञा-सूत्रावली पूर्ण होती है।

प्रथमोऽध्यायः, द्वितीयः पादः

श्लोक 2.1

गाङ्कुटादिभ्योऽञ्णिन्ङित्

gāṅkuṭādibhyo'ñṇinṅit

'गाङ्' आदेश तथा कुटादिगण (कुट् से लेकर कुङ् तक की लगभग चालीस धातुएँ) से विहित प्रत्यय — यदि वे ञित् या णित् न हों — तो 'ङित्' के समान व्यवहृत होते हैं, जिससे उन पर गुण-निषेध जैसे कार्य लागू होते हैं।

श्लोक 2.2

विज इट्

vija iṭ

भय पाने अथवा चलने के अर्थ वाली 'विज्' धातु से विहित इट्-आगमयुक्त प्रत्यय विकल्प से ङित्-संज्ञक होते हैं। उदाहरण: उद्विजिता, उद्विजितुम्।

श्लोक 2.3

विभाषोर्णोः

vibhāṣorṇoḥ

'ऊर्णु' (ढकना) धातु से विहित इडागमयुक्त प्रत्यय भी विकल्प से ङित्-संज्ञक होते हैं, जिससे उपधा के गुण में विकल्प उत्पन्न होता है। उदाहरण: ऊर्णुनुविथ/ऊर्णुनविथ।

श्लोक 2.4

सार्वधातुकमपित्

sārvadhātukamapit

तिप्, सिप् और मिप् — इन तीन प्रत्ययों को छोड़कर शेष सभी सार्वधातुक प्रत्यय स्वभावतः ङित्-संज्ञक माने जाते हैं, जिससे उनसे पूर्व गुण नहीं होता। उदाहरण: शृणुतस् (गुण-निषेध)।

श्लोक 2.5

असंयोगाल्लिट्कित

asaṁyogālliṭkita

जब अंग संयोगान्त (व्यंजन-समूहान्त) न हो, तब उससे विहित 'अपित्' (जिसमें प का इत्-चिह्न न हो) लिट्-प्रत्यय — जैसे अतुस् — कित्-संज्ञक हो जाते हैं, जिससे गुण-निषेध होता है। उदाहरण: सिषिधतुः।

श्लोक 2.6

इन्धिभवतिभ्यांच्

indhibhavatibhyāṁc

'इन्ध्' (जलना) और 'भू' (होना) धातुओं से विहित लिट्-प्रत्यय भी कित्-संज्ञक होता है। उदाहरण: ईन्ध+ए=ईधे।

श्लोक 2.7

मृडमृदगुधकुषक्लिशवदवसःक्त्वा

mṛḍamṛdagudhakuṣakliśavadavasaḥktvā

मृड् (सुख देना), मृद् (मसलना), गुध् (लपेटना), कुष् (खींचना), क्लिश् (कष्ट पाना), वद् (बोलना), वस् (रहना) — इन सात धातुओं से विहित क्त्वा-प्रत्यय कित्-संज्ञक होता है। उदाहरण: मृडित्वा, क्लिशित्वा।

श्लोक 2.8

रुदविदमुषग्रहिस्वपिप्रच्छःसंश्र्च्

rudavidamuṣagrahisvapipracchaḥsaṁśrc

रुद् (रोना), विद् (जानना), मुष् (चुराना), ग्रह् (पकड़ना), स्वप् (सोना), प्रच्छ् (पूछना) — इन धातुओं से विहित क्त्वा एवं सन् (इच्छार्थक) दोनों प्रत्यय कित्-संज्ञक होते हैं। उदाहरण: रुदित्वा/रुरुदिषति; गृहीत्वा/जिघृक्षति।

श्लोक 2.9

इकोझल्

ikojhal

जिस धातु का अन्त इक्-स्वर (इ, उ, ऋ, ऌ) में हो, उसके बाद झल्-वर्ण से आरम्भ होने वाला सन्-प्रत्यय कित्-संज्ञक होता है, जिससे गुण-निषेध होकर द्वित्व से चिकीर्षति जैसे रूप बनते हैं।

श्लोक 2.10

हलन्ताच्च्

halantācc

उपर्युक्त नियम (2.9) का विस्तार — जब इक्-स्वर के निकट कोई व्यंजन (हल्) हो, उसके बाद झलादि सन्-प्रत्यय भी कित्-संज्ञक होता है। उदाहरण: निविक्षते (नि+विश्+सन्)।

श्लोक 2.11

लिङ् सिचावात्मनेपदेषु

liṅ sicāvātmanepadeṣu

उपर्युक्त परिस्थिति में (इक्-समीपवर्ती हल् से परे) आत्मनेपद का झलादि लिङ् (आशीर्लिङ्) और आत्मनेपदी सिच्-प्रत्यय भी कित्-संज्ञक होते हैं। उदाहरण: धुक्षीष्ट (दुह्+यासुट्+त)।

श्लोक 2.12

उश्र्च

uśrca

ऋकारान्त धातु से परे, आत्मनेपद के झलादि लिङ् और सिच् प्रत्यय भी कित्-संज्ञक होते हैं, जिससे गुण-वृद्धि का निषेध होता है। उदाहरण: भृषीष्ट (भृ+सीयुट्+त)।

श्लोक 2.13

वागमः

vāgamaḥ

'गम्' (जाना) धातु से विहित झलादि आत्मनेपदी लिङ् तथा सिच् प्रत्यय विकल्प से कित्-संज्ञक होते हैं। उदाहरण: संगसीष्ट/संगंसीष्ट।

श्लोक 2.14

हनःसिच्

hanaḥsic

'हन्' (मारना) धातु से विहित सिच्-प्रत्यय कित्-संज्ञक होता है। उदाहरण: आहत।

श्लोक 2.15

यमोअगन्धने

yamoagandhane

जब 'यम्' धातु 'दोष प्रकट करने' के विशेष अर्थ में प्रयुक्त हो, तब उससे विहित आत्मनेपदी सिच् कित्-संज्ञक होता है। उदाहरण: उदायत।

श्लोक 2.16

विभाषोपयमने

vibhāṣopayamane

'यम्' धातु के विवाह (वधू-ग्रहण) के अर्थ में प्रयुक्त होने पर, उससे विहित आत्मनेपदी सिच् विकल्प से कित्-संज्ञक होता है। उदाहरण: उपायत कन्याम्/उपायंस्त कन्याम्।

श्लोक 2.17

स्थाध्वोरिच्च्

sthādhvoricc

आत्मनेपद प्रत्यय परे रहते 'स्था' (ठहरना) और घु-संज्ञक (1.1.20) धातुओं के अन्त्य स्वर के स्थान पर इकार होता है, तथा उनका सिच्-प्रत्यय भी कित्-संज्ञक होता है। उदाहरण: अदित (दा धातु से)।

श्लोक 2.18

नक्त्वासेट्

naktvāseṭ

यदि क्त्वा-प्रत्यय इट्-आगम सहित हो, तो वह कित्-संज्ञक नहीं होता — यह पूर्ववर्ती कित्-विधायक सूत्रों (2.7 आदि) का व्यापक अपवाद है। उदाहरण: शयित्वा (गुण होकर)।

श्लोक 2.19

निष्ठाशीङ्ग् स्विअदिमिदिक्ष्विदिधृषः

niṣṭhāśīṅg sviadimidikṣvididhṛṣaḥ

शीङ् (सोना), स्विद् (पसीजना), मिद् (स्नेह करना), क्ष्विद् (चिकना होना), धृष् (साहस करना) — इन पाँच धातुओं से विहित इट्-सहित निष्ठा-प्रत्यय (क्त/क्तवतु) कित्-संज्ञक नहीं होता। उदाहरण: शयितः, प्रस्वेदितः।

श्लोक 2.20

मृषस्तितिक्षायाम्

mṛṣastitikṣāyām

'मृष्' धातु जब 'सहन करना/क्षमा करना' के अर्थ में हो, तब उससे विहित इट्-सहित निष्ठा-प्रत्यय भी कित्-संज्ञक नहीं होता, जिससे गुण होता है। उदाहरण: मर्षितः।

श्लोक 2.21

उदुपधाद्भावादिकर्मणोरन्यतरस्याम्

udupadhādbhāvādikarmaṇoranyatarasyām

जिस धातु की उपधा में उकार हो, उससे भाव-वाच्य तथा अकर्मक-कर्म-वाच्य में विहित इट्-सहित निष्ठा-प्रत्यय विकल्प से कित्-संज्ञा का निषेध पाता है, जिससे दो रूप बनते हैं। उदाहरण: द्योतितम्/द्युतितम्।

श्लोक 2.22

पूङः क्त्वाच

pūṅaḥ ktvāca

'पूङ्' (पवित्र करना) धातु से विहित इट्-सहित क्त्वा तथा निष्ठा-प्रत्यय दोनों कित्-संज्ञक नहीं होते। उदाहरण: पवितः, पवित्वा।

श्लोक 2.23

नोपधात्थफान्ताद्वा

nopadhātthaphāntādvā

जिस धातु की उपधा में नकार हो, अथवा जो थकारान्त या फकारान्त हो, उससे विहित इट्-सहित क्त्वा-प्रत्यय विकल्प से कित्-संज्ञा से मुक्त रहता है। उदाहरण: ग्रथित्वा/ग्रन्थित्वा।

श्लोक 2.24

वञ्चिलुञ्च्यृतश्र्च्

vañciluñcyṛtaśrc

वञ्च् (ठगना), लुञ्च् (उखाड़ना) और ऋत् (घृणा करना) धातुओं से विहित इट्-सहित क्त्वा भी विकल्प से कित्-संज्ञा से मुक्त होता है। उदाहरण: वचित्वा/वञ्चित्वा।

श्लोक 2.25

तृषिमृषिकृशेःकाश्यपस्य

tṛṣimṛṣikṛśeḥkāśyapasya

तृष् (प्यासा होना), मृष् (सहना) और कृश् (दुबला होना) धातुओं से विहित इट्-सहित क्त्वा-प्रत्यय, आचार्य काश्यप के मत में, विकल्प से कित्-संज्ञा से मुक्त होता है। उदाहरण: तृषित्वा/तर्षित्वा।

श्लोक 2.26

रलोव्युपधाद्धलादेःसंश्र्च्

ralovyupadhāddhalādeḥsaṁśrc

जिस धातु की उपधा में इ/उ हो और जो हल्-आदि तथा रल्-अन्त हो, उससे विहित इट्-सहित क्त्वा तथा सन्-प्रत्यय विकल्प से कित्-संज्ञक होते हैं।

श्लोक 2.27

ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः

ūkālo'jjhrasvadīrghaplutaḥ

एक मात्रा वाला स्वर 'ह्रस्व', दो मात्रा वाला 'दीर्घ' तथा तीन मात्रा वाला 'प्लुत' संज्ञक होता है (उकार के उदाहरण से नामित यह सूत्र वस्तुतः समस्त स्वरों के कालमान की परिभाषा देता है)। उदाहरण: कुमारी (दीर्घ), देवदत्त३अत्र (प्लुत)।

श्लोक 2.28

अचश्र्च

acaśrca

2.27 में उकार के उदाहरण से जो कालमान-संज्ञाएँ (ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत) बताई गईं, वे वस्तुतः सभी स्वरों पर लागू होती हैं।

श्लोक 2.29

उच्चैरुदात्तः

uccairudāttaḥ

जिस स्वर के उच्चारण में स्वर-तन्त्रियों का ऊपरी भाग विशेष रूप से सक्रिय हो (अर्थात् जो ऊँचे स्वर में उच्चरित हो), वह 'उदात्त' कहलाता है — यह तीन वैदिक स्वरों में से पहला है।

श्लोक 2.30

नीचैरनुदात्तः

nīcairanudāttaḥ

जो स्वर नीचे (मन्द) पिच में उच्चरित हो, वह 'अनुदात्त' कहलाता है — उदात्त का प्रतिलोम।

श्लोक 2.31

समाहारःस्वरितः

samāhāraḥsvaritaḥ

जो स्वर उदात्त और अनुदात्त — दोनों के संयोजन (समाहार) से बनता है, वह 'स्वरित' कहलाता है — यह तीसरा वैदिक पिच-स्वर है।

श्लोक 2.32

तस्यादित उदात्तमर्धह्रस्वम्

tasyādita udāttamardhahrasvam

स्वरित स्वर के प्रारम्भ की आधी मात्रा (एक ह्रस्व-कालमान के बराबर) उदात्त होती है, शेष अनुदात्त — इस प्रकार स्वरित के भीतर ही उदात्त-अनुदात्त का समाहार साकार होता है।

श्लोक 2.33

एकश्रुतिदूरात्संबुद्धौ

ekaśrutidūrātsaṁbuddhau

जब किसी को दूर से पुकारा जाए, तो उस वाक्य के सभी स्वर एकश्रुति (समान, अविभेदित उच्चारण-स्तर) में बोले जाते हैं — उदात्त-अनुदात्त-स्वरित का भेद वहाँ लुप्त हो जाता है। उदाहरण: आगच्छ भो माणवक देवदत्त।

श्लोक 2.34

यज्ञकर्मण्यजपन्यूंखसामसु

yajñakarmaṇyajapanyūṁkhasāmasu

वैदिक यज्ञ-कर्म में — जप, न्यूंख (एक विशेष स्वराघात-शैली) तथा साम-गान को छोड़कर — शेष पाठ में भी स्वरों की एकश्रुति होती है।

श्लोक 2.35

उच्चैस्तरांवावषट्कारः

uccaistarāṁvāvaṣaṭkāraḥ

यज्ञ में बोला जाने वाला 'वषट्'-शब्द विकल्प से सामान्य उदात्त से भी ऊँचे स्वर (उच्चैस्तराम्) में बोला जाता है, अन्यथा एकश्रुति के सामान्य नियम से भी बोला जा सकता है।

श्लोक 2.36

विभाषाछन्दसि

vibhāṣāchandasi

वेद के पाठ में सर्वत्र ही स्वरों की एकश्रुति अथवा उदात्त-अनुदात्त-स्वरित का सामान्य त्रैस्वर्य — दोनों में से किसी का भी विकल्प से प्रयोग हो सकता है।

श्लोक 2.37

नसुब्रह्मण्यायांस्वरितस्यतूदात्तः

nasubrahmaṇyāyāṁsvaritasyatūdāttaḥ

'सुब्रह्मण्या' नामक विशेष वैदिक निगद (आह्वान-पाठ) में सामान्य एकश्रुति का नियम लागू नहीं होता; इसके बजाय उसमें आने वाले स्वरित स्वर के स्थान पर उदात्त हो जाता है।

श्लोक 2.38

देवब्रह्मणोरनुदात्तः

devabrahmaṇoranudāttaḥ

उसी सुब्रह्मण्या-निगद में, किन्तु विशेष रूप से 'देव' और 'ब्रह्मन्' शब्दों में, स्वरित के स्थान पर उदात्त नहीं अपितु अनुदात्त आदेश होता है।

श्लोक 2.39

स्वरितात्संहितायामनुदात्तानाम्

svaritātsaṁhitāyāmanudāttānām

जब पद निकट सम्बन्ध (संहिता) में उच्चरित हों, तो स्वरित स्वर के ठीक बाद आने वाले लगातार अनेक अनुदात्त स्वरों की एकश्रुति हो जाती है — वे सब समान स्तर पर बोले जाते हैं।

श्लोक 2.40

उदात्तस्वरितपरस्यसन्नतरः

udāttasvaritaparasyasannataraḥ

जो अनुदात्त स्वर किसी उदात्त अथवा स्वरित स्वर से ठीक पहले आता है, वह सामान्य अनुदात्त से भी अधिक नीचे (सन्नतर) उच्चरित होता है।

श्लोक 2.41

अपृक्तएकालप्रत्ययः

apṛktaekālapratyayaḥ

जो प्रत्यय एक ही वर्ण (एक अल्) से बना हो — जैसे रमा+स् में 'स्' — उसकी 'अपृक्त' संज्ञा होती है। यह संज्ञा आगे कुछ विशेष लोप-नियमों का आधार बनती है।

श्लोक 2.42

तत्पुरुषःसमानाधिकरणःकर्मधारयः

tatpuruṣaḥsamānādhikaraṇaḥkarmadhārayaḥ

जिस तत्पुरुष समास में विशेषण और विशेष्य दोनों पद एक ही वस्तु के बोधक हों (समानाधिकरण), उस समास की 'कर्मधारय' संज्ञा होती है। उदाहरण: नीलोत्पलम् (नीला कमल)।

श्लोक 2.43

प्रथमानिर्दिष्टंसमास उपसर्जनम्

prathamānirdiṣṭaṁsamāsa upasarjanam

जिस समास-विधायक सूत्र में कोई पद प्रथमा विभक्ति में निर्दिष्ट किया गया हो, वह पद उस समास में 'उपसर्जन' (गौण) संज्ञक होता है — यह संज्ञा समास के पदक्रम व लिंग-निर्धारण में महत्वपूर्ण होती है।

श्लोक 2.44

एकविभक्तिचापूर्वनिपाते

ekavibhakticāpūrvanipāte

यदि 'उपसर्जनं पूर्वम्' के अनुसार उपसर्जन को समास में पहले न रखा गया हो, तो समास-विग्रह में जिस पद की एक ही विभक्ति स्थिर रहती हो, वह भी 'उपसर्जन' संज्ञक मान लिया जाता है।

श्लोक 2.45

अर्थवदधातुरप्रत्ययःप्रातिपदिकम्

arthavadadhāturapratyayaḥprātipadikam

जो शब्द-रूप अर्थवान् (सार्थक) हो, किन्तु न तो धातु हो और न ही प्रत्यय, उसे 'प्रातिपदिक' (नाम-शब्द) कहा जाता है। उदाहरण: राम, वृक्ष, बालक (जबकि 'भू' जैसी धातु प्रातिपदिक नहीं है)।

श्लोक 2.46

कृत्तद्धितसमासाश्र्च

kṛttaddhitasamāsāśrca

कृत्-प्रत्ययान्त, तद्धित-प्रत्ययान्त तथा समस्त (समास-निष्पन्न) शब्द भी 2.45 की परिभाषा से स्वतंत्र होकर 'प्रातिपदिक' संज्ञा पाते हैं। उदाहरण: कृष्ण (कृष्+न)।

श्लोक 2.47

ह्रस्वोनपुंसकेप्रातिपदिकस्य

hrasvonapuṁsakeprātipadikasya

स्वरान्त नपुंसकलिंग प्रातिपदिक के अन्तिम स्वर का ह्रस्व आदेश हो जाता है। उदाहरण: अतिरि कुलम् (दीर्घ ई का ह्रस्व इ)।

श्लोक 2.48

गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य

gostriyorupasarjanasya

यदि समास में उपसर्जन-संज्ञक अंश 'गो' शब्द हो अथवा स्त्री-प्रत्ययान्त शब्द हो, तो उसका अन्त्य स्वर ह्रस्व हो जाता है। उदाहरण: अतिमाला में 'माला'।

श्लोक 2.49

लुक्तद्धितलुकि

luktaddhitaluki

यदि किसी तद्धित प्रत्यय का लुक् (सर्वथा अदर्शन) हो जाए, तो उसके साथ जुड़ा स्त्री-प्रत्यय भी लुक्-हत हो जाता है। उदाहरण: पञ्चेन्द्रः।

श्लोक 2.50

इद्गोण्याः

idgoṇyāḥ

'गोणी' शब्द से विहित तद्धित प्रत्यय के लुक् होने पर, उसके स्त्री-प्रत्यय के स्थान पर र्-कार का आदेश होता है। उदाहरण: पञ्चगोणिः।

श्लोक 2.51

लुपियुक्तवद्वयक्तिवचने

lupiyuktavadvayaktivacane

यदि किसी शब्द से कोई प्रत्यय 'लुप्' (अदृश्य होकर भी व्याकरणिक प्रभाव बनाए रखने वाला लोप) हो चुका हो, तो लिंग और वचन का निर्धारण उस मूल प्रकृति के अनुसार ही होता है। उदाहरण: पञ्चाल शब्द।

श्लोक 2.52

विशेषणानांचाजातेः

viśeṣaṇānāṁcājāteḥ

यदि कोई विशेषण किसी जाति (वर्ग) का वाचक न हो, तो उस तद्धितान्त शब्द के साथ आने वाले विशेषणों का लिंग-वचन भी उसकी मूल प्रकृति के अनुसार ही रहता है। उदाहरण: पञ्चालाः रमणीयाः।

श्लोक 2.53

तदशिष्यंसंज्ञाप्रमाणत्वात्

tadaśiṣyaṁsaṁjñāpramāṇatvāt

2.51-52 के नियम पूर्णतः शास्त्र द्वारा निर्धारित नहीं किए जा सकते, क्योंकि जनपद आदि की संज्ञाओं का लिंग-वचन अन्ततः लोक-प्रचलित व्यवहार से ही तय होता है, नियम से नहीं।

श्लोक 2.54

लुब्योगाप्रख्यानात्

lubyogāprakhyānāt

'जनपदे लुप्' आदि सूत्रों से जो प्रत्यय-लोप विहित किया गया है, वह भी वस्तुतः आवश्यक नहीं, क्योंकि मूल शब्द और तद्धितान्त शब्द के बीच का सम्बन्ध सुस्पष्ट रूप से प्रतीत नहीं होता।

श्लोक 2.55

योगप्रमाणेचतदभावेऽदर्शनंस्यात्

yogapramāṇecatadabhāve'darśanaṁsyāt

यदि व्याकरणिक सम्बन्ध की स्पष्ट प्रतीति को ही शब्द-प्रयोग का प्रमाण माना जाए, तो जहाँ वह सम्बन्ध प्रतीत न हो, वहाँ 'पञ्चाल' जैसे शब्दों का प्रयोग ही असम्भव हो जाएगा — यह इस प्रकरण की एक स्वयं-आलोचनात्मक टिप्पणी है।

श्लोक 2.56

प्रधानप्रत्ययार्थवचनस्यान्यप्रमाणत्वात्

pradhānapratyayārthavacanasyānyapramāṇatvāt

समास में कौन-सा पद प्रधान है, और प्रत्यय का अर्थ क्या है — इसका भी शास्त्रीय उपदेश देना अनावश्यक है, क्योंकि यह व्यवस्था अन्ततः लोक-प्रयोग से ही प्रमाणित होती है।

श्लोक 2.57

कालोपसर्जनेचतुल्यम्

kālopasarjanecatulyam

काल (समय-निर्धारण) तथा उपसर्जन (गौणता) का निर्धारण भी इसी सिद्धान्त के अनुरूप है — ये भी अन्ततः लोक-प्रचलित प्रयोग से ही स्थिर होते हैं। इसी के साथ यह आत्म-समीक्षात्मक उपप्रकरण समाप्त होता है।

श्लोक 2.58

जात्याख्यायामेकस्मिन्बहुवचनमन्यतरस्याम्

jātyākhyāyāmekasminbahuvacanamanyatarasyām

जब किसी शब्द से एक सम्पूर्ण जाति (वर्ग) का बोध कराना अभीष्ट हो, तो वहाँ एकवचन के स्थान पर विकल्प से बहुवचन का भी प्रयोग हो सकता है। उदाहरण: सम्पन्ना यवाः/सम्पन्नो यवः।

श्लोक 2.59

अस्मदोद्वयोश्र्च

asmadodvayośrca

प्रथम-पुरुष सर्वनाम 'अस्मद्' (मैं/हम) के एकवचन तथा द्विवचन दोनों के स्थान पर भी विकल्प से बहुवचन का प्रयोग हो सकता है। उदाहरण: 'अहं ब्रवीमि' के स्थान पर 'वयं ब्रूमः' भी, चाहे वक्ता एक ही क्यों न हो।

श्लोक 2.60

फल्गुनीप्रोष्ठपदानांचनक्षत्रे

phalgunīproṣṭhapadānāṁcanakṣatre

फल्गुनी और प्रोष्ठपद — इन जुड़वाँ नक्षत्र-युग्मों के नामों में द्विवचन के स्थान पर विकल्प से बहुवचन भी प्रयुक्त होता है। उदाहरण: उदिताः पूर्वाः फल्गुन्यः/उदिते पूर्वे फल्गुन्यौ।

श्लोक 2.61

छन्दसिपुनर्वस्वोरेकवचनम्

chandasipunarvasvorekavacanam

वेद में 'पुनर्वसु' नक्षत्र (जो द्विवचन में सामान्यतः प्रयुक्त होता है) के स्थान पर विकल्प से एकवचन का प्रयोग भी मिलता है। उदाहरण: पुनर्वसुर्नक्षत्रम्/पुनर्वसू नक्षत्रे।

श्लोक 2.62

विशाखयोश्र्च

viśākhayośrca

इसी प्रकार वैदिक प्रयोग में विशाखा नक्षत्र (द्विवचन) के स्थान पर भी विकल्प से एकवचन प्रयुक्त होता है। उदाहरण: विशाखा नक्षत्रम्/विशाखे नक्षत्रे।

श्लोक 2.63

तिष्यपुनर्वस्वोर्नक्षत्रद्वन्देबहुवचनस्यद्विवचनंनित्यम्

tiṣyapunarvasvornakṣatradvandebahuvacanasyadvivacanaṁnityam

जब 'तिष्य' और 'पुनर्वसु' नक्षत्रों का द्वन्द्व समास नक्षत्र के ही अर्थ में बने, तो वहाँ अपेक्षित बहुवचन के स्थान पर सदैव (नित्यम्) द्विवचन ही होता है, विकल्प नहीं। उदाहरण: उदितौ तिष्यपुनर्वसू।

श्लोक 2.64

सरुपाणामेकशेषएकविभक्तौ

sarupāṇāmekaśeṣaekavibhaktau

यदि दो या अधिक शब्द रूप में परस्पर समान हों और उन पर एक ही विभक्ति लगनी हो, तो उन सबके स्थान पर एक ही रूप शेष रह जाता है (एकशेष) — शेष सबका लोप हो जाता है, यद्यपि अर्थ बहुवचन का ही रहता है। उदाहरण: वृक्षश्च वृक्षश्च=वृक्षौ।

श्लोक 2.65

वृद्धोयूनातल्लक्षणश्र्चेदेवविशेषः

vṛddhoyūnātallakṣaṇaśrcedevaviśeṣaḥ

जब कोई वृद्ध-गोत्रवाचक (दादा की सन्तान का वाचक) शब्द और उसी मूल से बना युवा-वाचक (पौत्र-पीढ़ी का) शब्द साथ आएँ, और उनका भेद केवल इसी वृद्ध/युव प्रत्यय तक सीमित हो, तो एकशेष में वृद्ध-रूप ही बचता है।

श्लोक 2.66

स्त्रीपुंवच्च

strīpuṁvacca

जब गोत्रवाचक स्त्रीलिंग शब्द और युवप्रत्ययान्त शब्द साथ प्रयुक्त हों, तो एकशेष में स्त्रीलिंग रूप ही अवशिष्ट रहता है, और वह आगे पुल्लिंग शब्द के समान व्यवहार भी पाता है।

श्लोक 2.67

पुमान्स्त्रिया

pumānstriyā

जब एक स्त्रीलिंग और एक पुल्लिंग शब्द साथ प्रयुक्त हों, और उन दोनों में लिंग-भेद के अतिरिक्त कोई अन्य वैरूप्य न हो, तो एकशेष में पुल्लिंग रूप ही शेष रहता है। उदाहरण: ब्राह्मणश्च ब्राह्मणी च=ब्राह्मणौ।

श्लोक 2.68

भ्रातृपुत्रौस्वसृदुहितृभ्याम्

bhrātṛputrausvasṛduhitṛbhyām

'भ्राता' और 'बहन' (स्वसृ) साथ प्रयुक्त हों तो 'भ्रातृ' शब्द, तथा 'पुत्र' और 'पुत्री' (दुहितृ) साथ प्रयुक्त हों तो 'पुत्र' शब्द — इन नातेदारी-युग्मों में एकशेष के रूप में शेष रहते हैं। उदाहरण: भ्राता च स्वसा च=भ्रातरौ।

श्लोक 2.69

नपुंसकमनपुंसकेनैकवच्चास्यान्यतरस्याम्

napuṁsakamanapuṁsakenaikavaccāsyānyatarasyām

यदि नपुंसकलिंग शब्द तथा पुं/स्त्रीलिंग (अनपुंसक) शब्द साथ प्रयुक्त हों — और उनमें लिंग-भेद के अतिरिक्त कोई अन्य वैरूप्य न हो — तो विकल्प से नपुंसक-रूप ही एकशेष में शेष रहता है, और वह विकल्प से एकवचन-जैसा व्यवहार भी पाता है।

श्लोक 2.70

पितामात्रा

pitāmātrā

'माता' और 'पिता' साथ प्रयुक्त हों, तो एकशेष में विकल्प से 'पिता' शब्द ही शेष रहता है (अर्थात् 'पितरौ' रूप भी 'माता-पिता दोनों' के अर्थ में चल सकता है)।

श्लोक 2.71

श्र्वशुरःश्र्वश्र्वा

śrvaśuraḥśrvaśrvā

'सास' (श्वश्रू) और 'ससुर' (श्वशुर) साथ प्रयुक्त हों, तो एकशेष में विकल्प से 'श्वशुर' शब्द ही शेष रह सकता है। उदाहरण: श्वशुरौ (=सास और ससुर दोनों, विकल्प में)।

श्लोक 2.72

त्यदादीनिसर्वैर्नित्यम्

tyadādīnisarvairnityam

त्यद्-आदि गण (1.1.74 में गिनाया गया) के शब्द किसी भी अन्य शब्द के साथ आने पर, एकशेष में सदा (वैकल्पिक नहीं) शेष रहते हैं। उदाहरण: स च देवदत्तश्च=तौ।

श्लोक 2.73

ग्राम्यपशुसंघेष्वतरुणेषुस्त्री

grāmyapaśusaṁgheṣvataruṇeṣustrī

यदि पालतू पशुओं का समूह वयस्क (अतरुण) हो, तो नर-मादा दोनों वाचक शब्दों के सहप्रयोग में एकशेष के रूप में स्त्रीलिंग-वाचक शब्द ही शेष रहता है। उदाहरण: गावश्च वृषभाश्च=गावः। इसी के साथ पाद 1.2 पूर्ण होता है।

प्रथमोऽध्यायः, तृतीयः पादः

श्लोक 3.1

भूवादयोधातवः

bhūvādayodhātavaḥ

'भू' (होना) धातु से आरम्भ होकर धातुपाठ में गिनाई गई समस्त क्रियावाचक मूल-शब्दों की 'धातु' संज्ञा होती है। यह अष्टाध्यायी के आख्यातिक (धातु-सम्बन्धी) खण्ड का प्रारम्भिक सूत्र है। उदाहरण: भवति, पठति, वाति।

श्लोक 3.2

उपदेशेऽजनुनासिक इत्

upadeśe'janunāsika it

धातुपाठ अथवा गणपाठ में जब कोई अनुनासिक (नासिक्य) स्वर पढ़ाया जाए, तो वह स्वर 'इत्' (उच्चारण-सहायक, स्वयं लुप्त होने वाला चिह्न) संज्ञक माना जाता है।

श्लोक 3.3

हलन्तयम्

halantayam

उपदेश अवस्था में यदि किसी प्रत्यय अथवा धातु का अन्तिम वर्ण व्यंजन (हल्) हो, तो उस अन्तिम व्यंजन की भी 'इत्' संज्ञा होती है। उदाहरण: 'अनीयर्' में 'र्', 'ल्यप्' में 'प्', 'तृच्' में 'च्'।

श्लोक 3.4

नविभक्तौतुस्माः

navibhaktautusmāḥ

3.3 का अपवाद — यदि कोई तकार-वर्गीय वर्ण, सकार अथवा मकार किसी विभक्ति-प्रत्यय के अन्त में स्थित हो, तो वह इत्-संज्ञक नहीं होता। उदाहरण: बालक+अस् में 'स्' इत् नहीं, अतः 'बालकाः' रूप बनता है।

श्लोक 3.5

आदिर्ञिटुडवः

ādirñiṭuḍavaḥ

प्रत्ययों के अथवा धातुओं के आरम्भ में यदि 'ञि', 'टु' अथवा 'डु' जैसा अंश जुड़ा हो, तो वह पूरा प्रारम्भिक अंश इत्-संज्ञक होकर लुप्त हो जाता है। उदाहरण: ञिमिदा→मिद्; डुकृञ्→कृ।

श्लोक 3.6

षःप्रत्ययस्य

ṣaḥpratyayasya

प्रत्ययों के आरम्भ में आने वाले षकार की भी इत्-संज्ञा होती है। उदाहरण: ष्यञ्→य।

श्लोक 3.7

चुटू

cuṭū

प्रत्यय के आरम्भ में स्थित चवर्गीय (च्,छ्,ज्,झ्,ञ्) तथा टवर्गीय (ट्,ठ्,ड्,ढ्,ण्) वर्ण भी इत्-संज्ञक होते हैं। उदाहरण: जस्→अस्।

श्लोक 3.8

लशक्वतद्धिते

laśakvataddhite

तद्धित प्रत्ययों को छोड़कर बाकी सभी प्रत्ययों के आरम्भ में यदि लकार, शकार अथवा कवर्गीय (क्,ख्,ग्,घ्,ङ्) वर्ण आए, तो वह इत्-संज्ञक होता है। उदाहरण: शस्→अस्।

श्लोक 3.9

तस्यलोपः

tasyalopaḥ

3.2 से 3.8 तक जो-जो वर्ण इत्-संज्ञक ठहराए गए, उन सबका लोप (पूर्ण अदर्शन) हो जाता है — यही समस्त 'इत्'-प्रकरण का प्रयोजन है। उदाहरण: वुक् में केवल व् शेष रहता है; सु में केवल स्।

श्लोक 3.10

यथासंख्यमनुदेशःसमानाम्

yathāsaṁkhyamanudeśaḥsamānām

जब किसी सूत्र में स्थानियों और आदेशों की संख्या बराबर हो, तो उनका सम्बन्ध क्रमशः (पहले का पहले से, दूसरे का दूसरे से) माना जाता है, न कि यादृच्छिक रूप से। उदाहरण: तौदेयः, शालातुरीयः।

श्लोक 3.11

स्वरितेनाधिकारः

svaritenādhikāraḥ

सूत्र में जो पद स्वरित उच्चारण से चिह्नित किया गया हो, वह 'अधिकार' का बोधक होता है — अर्थात् वह पद, जब तक कोई विरोधी संकेत न मिले, आगे के अनेक सूत्रों में अनुवृत्त होकर लागू होता रहता है। उदाहरण: 'प्रत्ययः', 'परश्च', 'धातोः', 'अङ्गस्य'।

श्लोक 3.12

अनुदात्तङित आत्मनेपदम्

anudāttaṅita ātmanepadam

जिस धातु का इत्-स्वर अनुदात्त हो, अथवा जो ङित्-संज्ञक हो, उससे आत्मनेपद-प्रत्यय (तङ्, तथा शानच्/कानच् कृदन्त-प्रत्यय) विहित होते हैं — यह आत्मनेपद-निर्धारण के दीर्घ प्रकरण का प्रारम्भिक सामान्य नियम है। उदाहरण: एध् (अनुदात्तेत्) से एधते।

श्लोक 3.13

भावकर्मणोः

bhāvakarmaṇoḥ

जब कर्तरि-भिन्न, अर्थात् भाववाच्य अथवा कर्मवाच्य में कोई लकार विहित हो, तो धातु से आत्मनेपद प्रत्यय ही होता है, चाहे वह धातु स्वयं परस्मैपदी ही क्यों न हो। उदाहरण: आस्यते देवदत्तेन; देवदत्तेन वेदः पठ्यते।

श्लोक 3.14

कर्तरिकर्मव्यतिहारे

kartarikarmavyatihāre

जब क्रिया दो या अधिक कर्ताओं के बीच परस्पर आदान-प्रदान (व्यतिहार) को व्यक्त करे — प्रायः 'वि' या 'अति' उपसर्ग के साथ — तो कर्तृवाच्य में भी धातु से आत्मनेपद होता है।

श्लोक 3.15

नगतिहिंसार्थेभ्यः

nagatihiṁsārthebhyaḥ

3.14 का अपवाद — यदि क्रिया-विनिमय अर्थ में प्रयुक्त धातु का मूल अर्थ 'गति' (चलना) या 'हिंसा' (मारना) हो, तो वहाँ आत्मनेपद नहीं होता, प्रत्युत सामान्य परस्मैपद ही रहता है।

श्लोक 3.16

इतरेतरान्योन्योपपदाच्च

itaretarānyonyopapadācca

जब धातु के साथ 'इतरेतर' (एक-दूसरा) या 'अन्योन्य' (परस्पर) जैसा उपपद जुड़ा हो और कर्म का परस्पर विनिमय व्यक्त हो, तो भी आत्मनेपद होता है। उदाहरण: इतरेतरस्य व्यतिलुनन्ति।

श्लोक 3.17

नेर्विशः

nerviśaḥ

उपसर्ग 'नि' के साथ प्रयुक्त 'विश्' (प्रवेश करना) धातु से सदैव आत्मनेपद होता है। उदाहरण: निविशते।

श्लोक 3.18

परिव्यवेभ्यःक्रियः

parivyavebhyaḥkriyaḥ

परि, वि अथवा अव — इनमें से किसी भी उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'क्री' (मोल लेना) धातु से आत्मनेपद होता है।

श्लोक 3.19

विपराभ्यांजेः

viparābhyāṁjeḥ

वि अथवा परा उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'जि' (जीतना) धातु से आत्मनेपद होता है। उदाहरण: विजयते।

श्लोक 3.20

आङ्गोदोऽनास्यविहरणे

āṅgodo'nāsyaviharaṇe

आङ् (आ) उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'दा' (देना/ग्रहण करना) धातु से आत्मनेपद होता है, किन्तु 'मुँह खोलना' के विशिष्ट अर्थ में नहीं (वहाँ केवल परस्मैपद होता है)। उदाहरण: विद्यामादत्ते।

श्लोक 3.21

क्रीडोऽनुसंपरिभ्यश्र्च्

krīḍo'nusaṁparibhyaśrc

अनु, सम् अथवा परि — इनमें से किसी उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'क्रीड्' (खेलना) धातु से आत्मनेपद होता है। उदाहरण: अनुक्रीडते, संक्रीडते, परिक्रीडते।

श्लोक 3.22

समवप्रविभ्यःस्थः

samavapravibhyaḥsthaḥ

सम्, अव, प्र अथवा वि — इनमें से किसी उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'स्था' (खड़ा होना) धातु से आत्मनेपद होता है। उदाहरण: संतिष्ठते।

श्लोक 3.23

प्रकाशनस्थेयाख्ययोश्च

prakāśanastheyākhyayośca

जब 'स्था' धातु अपने मत/स्वरूप को व्यक्त करने, अथवा किसी विवाद का निर्णय बताने के अर्थ में प्रयुक्त हो, तो (उपसर्ग-रहित होने पर भी) आत्मनेपद होता है। उदाहरण: विद्या तिष्ठते छात्राय।

श्लोक 3.24

उदोऽनूध्र्वकर्मणि

udo'nūdhrvakarmaṇi

उत्-उपसर्गपूर्वक 'स्था' धातु से, जब उसका अर्थ शारीरिक रूप से ऊपर उठना न हो (अपितु उन्नति जैसा लाक्षणिक अर्थ हो), तब आत्मनेपद होता है। उदाहरण: गेहे उत्तिष्ठते।

श्लोक 3.25

उपान्मन्त्रकरणे

upānmantrakaraṇe

उप-उपसर्गपूर्वक 'स्था' धातु से, जब वह किसी मन्त्र का पाठ करते हुए समीप जाने के अर्थ में हो, तब आत्मनेपद होता है। उदाहरण: ऐन्द्र्या गार्हपत्यम् उपतिष्ठते।

श्लोक 3.26

अकर्मकाच्च्

akarmakācc

उप-उपसर्गपूर्वक 'स्था' धातु से, जब वह अकर्मक (कर्म-रहित) रूप में प्रयुक्त हो, तब भी आत्मनेपद होता है। उदाहरण: यावद्भुक्तम् उपतिष्ठते।

श्लोक 3.27

उद्विभ्यांतपः

udvibhyāṁtapaḥ

उत् अथवा वि उपसर्ग के साथ अकर्मक रूप में प्रयुक्त 'तप्' (तपना) धातु से आत्मनेपद होता है। उदाहरण: उत्तपते, वितपते।

श्लोक 3.28

आङ्गोयमहनः

āṅgoyamahanaḥ

आङ् उपसर्ग के साथ अकर्मक रूप में प्रयुक्त 'यम्' (रोकना) तथा 'हन्' (मारना) धातुओं से आत्मनेपद होता है। उदाहरण: आयच्छते, आहते।

श्लोक 3.29

समोगम्यृच्छिप्रच्छिस्वरत्यर्तिश्रुविदिभ्यः

samogamyṛcchipracchisvaratyartiśruvidibhyaḥ

सम्-उपसर्ग के साथ अकर्मक रूप में प्रयुक्त गम् (जाना), ऋच्छ् (प्राप्त होना), प्रच्छ् (पूछना), स्वृ (शब्द करना), ऋ (गति), श्रु (सुनना), विद् (जानना) — इन सात धातुओं से आत्मनेपद होता है। उदाहरण: सङ्गच्छते, समृच्छते।

श्लोक 3.30

निसमुपविभ्योह्वः

nisamupavibhyohvaḥ

नि, सम्, उप अथवा वि — इनमें से किसी उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'ह्वे' (पुकारना) धातु से आत्मनेपद होता है। उदाहरण: निह्वयते, संह्वयते, उपह्वयते।

श्लोक 3.31

स्पर्धायामाडः

spardhāyāmāḍaḥ

आङ् उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'ह्वे' धातु से, जब वह प्रतिस्पर्धा में ललकारने के अर्थ में हो, तब आत्मनेपद होता है। उदाहरण: मल्लो मल्लम् आह्वयते।

श्लोक 3.32

गन्धनावक्षेपणसेवनसाहसिक्यप्रतियत्नप्रकथनोपयोगेषुकृञः

gandhanāvakṣepaṇasevanasāhasikyapratiyatnaprakathanopayogeṣukṛñaḥ

'कृ' (करना) धातु से — जब वह सूचन/शिकायत करने, भर्त्सना करने, सेवा करने, दुस्साहसपूर्वक कार्य करने, किसी के गुणों का अनुकरण करने, विस्तार से कहने, अथवा उपयोग में लाने के विशेष अर्थों में प्रयुक्त हो — तब आत्मनेपद होता है।

श्लोक 3.33

अधेःप्रसहने

adheḥprasahane

अधि-उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'कृ' धातु से, जब वह किसी को दबाने/पराभूत करने के अर्थ में हो, तब आत्मनेपद होता है। उदाहरण: शत्रुम् अधिकुरुते।

श्लोक 3.34

वेःशब्दकर्मणः

veḥśabdakarmaṇaḥ

वि-उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'कृ' धातु से, जब उसका कर्म 'शब्द' (ध्वनि/स्वर) हो, तब आत्मनेपद होता है। उदाहरण: क्रोष्टा विकुरुते स्वरान्।

श्लोक 3.35

अकर्मकाच्च

akarmakācca

वि-उपसर्ग के साथ अकर्मक रूप में प्रयुक्त 'कृ' धातु से भी आत्मनेपद होता है। उदाहरण: विकुर्वते सैन्धवाः।

श्लोक 3.36

संमाननोत्संजनाचार्यकरणज्ञानभृतिविगणनव्ययेषुनियः

saṁmānanotsaṁjanācāryakaraṇajñānabhṛtivigaṇanavyayeṣuniyaḥ

'नी' (ले जाना) धातु से — पूजा करने, ऊपर उठाने, किसी को गुरु के रूप में स्वीकार करने, जानने, वेतन/भाड़ा देने, ऋण चुकाने, अथवा धर्मार्थ व्यय करने के अर्थों में — आत्मनेपद होता है।

श्लोक 3.37

कतृस्थे चाशरीरे कर्मणि

katṛsthe cāśarīre karmaṇi

जब 'नी' धातु का कर्म कर्ता में ही स्थित हो, किन्तु वह कर्म कर्ता के अपने शरीर से भिन्न कोई (मानसिक/भावनात्मक) तत्त्व हो, तब कर्तृवाच्य में भी आत्मनेपद होता है। उदाहरण: क्रोधं विनयते।

श्लोक 3.38

वृत्तिसर्गतायनेषुक्रमः

vṛttisargatāyaneṣukramaḥ

'क्रम्' (चलना) धातु से — जब वह निर्बाध प्रवाह, उत्साहपूर्ण प्रवृत्ति, अथवा विस्तार के अर्थ में हो — आत्मनेपद होता है। उदाहरण: मन्त्रेषु अस्य क्रमते बुद्धिः।

श्लोक 3.39

उपपराभ्याम्

upaparābhyām

3.38 के ही अर्थों में, उप अथवा परा उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'क्रम्' धातु से भी आत्मनेपद होता है। उदाहरण: उपक्रमते, पराक्रमते।

श्लोक 3.40

आङ्ग् उद्गमने

āṅg udgamane

आङ् उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'क्रम्' धातु से, जब वह उदय होने (सूर्योदय आदि) के अर्थ में हो, तब आत्मनेपद होता है। उदाहरण: आदित्य आक्रमते।

श्लोक 3.41

वेःपादविहरणे

veḥpādaviharaṇe

वि-उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'क्रम्' धातु से, जब वह पैर बढ़ाकर चलने के अर्थ में हो, तब आत्मनेपद होता है। उदाहरण: विक्रमते वाजी।

श्लोक 3.42

प्रोपाभ्यांसमर्थाभ्याम्

propābhyāṁsamarthābhyām

प्र और उप — जब ये दोनों उपसर्ग समान अर्थ (जैसे भोजन आरम्भ करना) में प्रयुक्त हों, तो उनसे युक्त 'क्रम्' धातु से आत्मनेपद होता है। उदाहरण: प्रक्रमते भुक्तुम्, उपक्रमते भोक्तुम्।

श्लोक 3.43

अनुपसर्गाद्वा

anupasargādvā

यदि 'क्रम्' धातु के साथ कोई उपसर्ग न हो, तो भी आत्मनेपद विकल्प से हो सकता है। उदाहरण: क्रमते/क्रामति।

श्लोक 3.44

अपह्नवेज्ञः

apahnavejñaḥ

'ज्ञा' (जानना) धातु से, जब वह किसी बात को छिपाने/इनकार करने के अर्थ में हो, तब आत्मनेपद होता है। उदाहरण: अपजानीते।

श्लोक 3.45

अकर्मकाच्च

akarmakācca

'ज्ञा' धातु से, जब वह अकर्मक रूप में प्रयुक्त हो, तब भी आत्मनेपद होता है। उदाहरण: सर्पिषो जानीते।

श्लोक 3.46

संप्रतिभ्यामनाध्याने

saṁpratibhyāmanādhyāne

सम् अथवा प्रति उपसर्ग से युक्त सकर्मक 'ज्ञा' धातु से आत्मनेपद होता है, बशर्ते उसका अर्थ 'व्यग्रतापूर्वक याद करना' न हो। उदाहरण: शतं संजानीते/प्रतिजानीते।

श्लोक 3.47

भासनोपसंभाषाज्ञानयत्नविमत्युपमन्त्रणेषुवदः

bhāsanopasaṁbhāṣājñānayatnavimatyupamantraṇeṣuvadaḥ

'वद्' (बोलना) धातु से — प्रकाशित/प्रतिबिम्बित होने, समझाने-बुझाने, जानने, प्रयत्न करने, मतभेद प्रकट करने, अथवा आमन्त्रित करने के अर्थों में — आत्मनेपद होता है। उदाहरण: शास्त्रे वदते।

श्लोक 3.48

व्यक्तवाचांसमुच्चारणे

vyaktavācāṁsamuccāraṇe

जब स्पष्ट भाषा बोलने वाले एक साथ बोलें, तो उस सहोच्चारण के अर्थ में 'वद्' धातु से आत्मनेपद होता है। उदाहरण: सम्प्रवदन्ते ब्राह्मणाः।

श्लोक 3.49

अनोरकर्मकात्

anorakarmakāt

उसी सहोच्चारण के अर्थ में, अनु-उपसर्ग के साथ अकर्मक रूप में प्रयुक्त 'वद्' धातु से भी आत्मनेपद होता है। उदाहरण: अनुवदते कठः कलापस्य।

श्लोक 3.50

विभाषाविप्रलापे

vibhāṣāvipralāpe

जब सहोच्चारण असहमति अथवा परस्पर-विरोधी कथन (विप्रलाप) का बोधक हो, तब 'वद्' धातु से विकल्प से आत्मनेपद होता है। उदाहरण: विप्रवदन्ते/विप्रवदन्ति सांवत्सराः।

श्लोक 3.51

अवाद् ग्रः

avād graḥ

अव-उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'गृ' (निगलना) धातु से आत्मनेपद होता है। उदाहरण: अवगिरते।

श्लोक 3.52

समःप्रतिज्ञाने

samaḥpratijñāne

सम्-उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'गृ' धातु से, जब वह किसी बात को स्वीकार करने/मान लेने के अर्थ में हो, तब आत्मनेपद होता है। उदाहरण: शब्दं संगिरते।

श्लोक 3.53

उदश्र्चरःसकर्मकात्

udaśrcaraḥsakarmakāt

उत्-उपसर्ग के साथ सकर्मक रूप में प्रयुक्त 'चर्' (आचरण करना) धातु से आत्मनेपद होता है। उदाहरण: धर्मम् उच्चरते।

श्लोक 3.54

समस्तृतीयायुक्तात्

samastṛtīyāyuktāt

सम्-उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'चर्' धातु से, जब उसका कोई तृतीया-विभक्त्यन्त सहचारी पद हो, तब आत्मनेपद होता है। उदाहरण: रथेन संचरते।

श्लोक 3.55

दाणश्र्चसाचेच्चतुथ्र्यर्थे

dāṇaśrcasāceccatuthryarthe

यदि उक्त तृतीयान्त पद वस्तुतः चतुर्थी (सम्प्रदान) के अर्थ में प्रयुक्त हो, तो सम्-उपसर्गपूर्वक 'दा' (सामान्यतः परस्मैपदी) धातु से भी आत्मनेपद हो जाता है।

श्लोक 3.56

उपाद्यमःस्वकरणे

upādyamaḥsvakaraṇe

उप-उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'यम्' धातु से, जब वह विवाह में वधू का हाथ ग्रहण करने के अर्थ में हो, तब आत्मनेपद होता है। उदाहरण: कन्यामुपयच्छते।

श्लोक 3.57

ज्ञाश्रुस्मृदृशांसनः

jñāśrusmṛdṛśāṁsanaḥ

सन्-प्रत्यय (इच्छार्थक) लगे हुए ज्ञा (जानना), श्रु (सुनना), स्मृ (याद रखना) तथा दृश् (देखना) — इन चार धातुओं से आत्मनेपद होता है। उदाहरण: जिज्ञासते, शुश्रूषते।

श्लोक 3.58

नानोर्ज्ञः

nānorjñaḥ

3.57 का अपवाद — यदि 'ज्ञा' धातु के सन्नन्त रूप के साथ अनु-उपसर्ग जुड़ा हो, तो आत्मनेपद नहीं होता। उदाहरण: पुत्रम् अनुजिज्ञासति।

श्लोक 3.59

प्रत्याङ्ग्भ्वांश्रुवः

pratyāṅgbhvāṁśruvaḥ

प्रति अथवा आङ् उपसर्ग से युक्त सन्नन्त 'श्रु' धातु से भी 3.57 वाला आत्मनेपद नहीं होता। उदाहरण: प्रतिशुश्रूषति, आशुश्रूषति।

श्लोक 3.60

शदेः शितः

śadeḥ śitaḥ

जब 'शद्' (क्षीण/नष्ट होना) धातु के साथ कोई शित्-संज्ञक प्रत्यय हो, तब आत्मनेपद होता है। उदाहरण: शीयते।

श्लोक 3.61

म्रियतेर्लुङ् लिङोश्र्च

mriyaterluṅ liṅośrca

'मृ' (मरना) धातु से, विशेषतः लुङ् और लिङ् लकारों में तथा शित् प्रत्यय के प्रसंग में, आत्मनेपद होता है। उदाहरण: म्रियते; लुङ् में अमृत; लिङ् में म्रियेत।

श्लोक 3.62

पूर्ववत्सनः

pūrvavatsanaḥ

सन्-प्रत्ययान्त रूप में, आत्मनेपद अथवा परस्मैपद का निर्धारण मूल धातु के अपने वाच्य के अनुरूप ही होता है। उदाहरण: एधितुमिच्छति (एध् परस्मैपदी होने से)।

श्लोक 3.63

आम्प्रत्ययवत्कृञोऽनुप्रयोगस्य

āmpratyayavatkṛño'nuprayogasya

पेरिफ्रेस्टिक रचनाओं में, जब मुख्य धातु से 'आम्' प्रत्यय बनकर सहायक-क्रिया के रूप में 'कृ' प्रयुक्त हो, तो 'कृ' का वाच्य मूल धातु के ही वाच्य के अनुरूप रहता है। उदाहरण: एधाम्चक्रे।

श्लोक 3.64

प्रोपाभ्यांयुजेरयज्ञपात्रेषु

propābhyāṁyujerayajñapātreṣu

प्र अथवा उप उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'युज्' (जोड़ना/नियुक्त करना) धातु से, जब विषय यज्ञ-पात्र न हो, तब आत्मनेपद होता है। उदाहरण: प्रयुङ्क्ते, उपयुङ्क्ते।

श्लोक 3.65

समः क्ष्णुवः

samaḥ kṣṇuvaḥ

सम्-उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'क्ष्णु' (तेज़/तीक्ष्ण करना) धातु से आत्मनेपद होता है। उदाहरण: संक्ष्णुते।

श्लोक 3.66

भुजोऽनवने

bhujo'navane

'भुज्' धातु से, जब उसका अर्थ 'पालन करना' (रक्षा करना) न हो (अपितु भोगना/खाना हो), तब आत्मनेपद होता है। उदाहरण: भुङ्क्ते — जबकि 'नृपः राज्यं भुनक्ति' में परस्मैपद है।

श्लोक 3.67

णेरणौयत्कर्मणौचेत्सकर्तानाध्याने

ṇeraṇauyatkarmaṇaucetsakartānādhyāne

प्रयोजक (णिजन्त) क्रिया से, यदि मूल क्रिया का ही स्वरूप बना रहे और मूल कर्म ही प्रयोजक-रचना में कर्ता बन जाए, तो आत्मनेपद होता है — बशर्ते अर्थ उत्कण्ठापूर्वक स्मरण का न हो। उदाहरण: हस्तिपा हस्तिनम् आरोहयते।

श्लोक 3.68

भीस्म्योर्हेतुभये

bhīsmyorhetubhaye

प्रयोजक (णिजन्त) 'भी' (डरना) तथा 'स्मि' (मुस्कुराना/आश्चर्य) धातुओं से, जब भय अथवा आश्चर्य का कारण बनने का बोध हो, तब आत्मनेपद होता है। उदाहरण: मुण्डो भीष्यते, जटिलो विस्मापयते।

श्लोक 3.69

गृधि-वञ्च्योः प्रलम्भने

gṛdhi-vañcyoḥ pralambhane

प्रयोजक (णिजन्त) 'गृध्' (लालच करना) तथा 'वञ्च्' (ठगना) धातुओं से, जब वे मिथ्या-फल कहकर धोखा देने के अर्थ में हों, तब आत्मनेपद होता है। उदाहरण: माणवकं गर्धयते, माणवकं वञ्चयते।

श्लोक 3.70

लियःसंमाननशालीनीकरणयोश्र्च्

liyaḥsaṁmānanaśālīnīkaraṇayośrc

प्रयोजक (णिजन्त) 'ली' (लीन होना) धातु से — सम्मान करने अथवा किसी को धोखे में डालने के अर्थ में — आत्मनेपद होता है। उदाहरण: जटाभिः आलापयते।

श्लोक 3.71

मिथ्योपपदात्कृञोऽभ्यासे

mithyopapadātkṛño'bhyāse

'मिथ्या' (गलत ढंग से) शब्द के उपपद होने पर, बार-बार दोहराए जाने के अर्थ में प्रयोजक 'कृ' धातु से आत्मनेपद होता है। उदाहरण: पदं मिथ्या कारयते।

श्लोक 3.72

स्वरितञितःकर्त्रभिप्रायेक्रियाफले

svaritañitaḥkartrabhiprāyekriyāphale

जिस धातु का इत्-स्वर स्वरित हो, अथवा जो ञित्-संज्ञक हो, उससे — यदि क्रिया का फल कर्ता को ही अभीष्ट हो — आत्मनेपद होता है (यहाँ भी तङ्, शानच्, कानच् का ही विधान अभिप्रेत है)।

श्लोक 3.73

अपाद्वदः

apādvadaḥ

अप-उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'वद्' धातु से, जब क्रिया का फल कर्ता को ही मिलता हो, तब आत्मनेपद होता है। उदाहरण: धनकामो न्यायम् अपवदते।

श्लोक 3.74

णिचश्र्च

ṇicaśrca

प्रयोजक (णिजन्त) धातुओं से भी, यदि क्रिया का फल कर्ता (प्रयोजक-कर्ता) को ही मिलता हो, तो आत्मनेपद होता है।

श्लोक 3.75

समुदाङ्ग्भ्योयमोऽग्रन्थे

samudāṅgbhyoyamo'granthe

सम्, उत् अथवा आङ् उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'यम्' (रोकना) धातु से — यदि क्रिया का फल कर्ता को ही मिले और अर्थ ग्रन्थ-रचना का न हो — तब आत्मनेपद होता है। उदाहरण: व्रीहीन् संयच्छते।

श्लोक 3.76

अनुपसर्गाज्ज्ञः

anupasargājjñaḥ

'ज्ञा' (जानना) धातु से, जब वह किसी उपसर्ग के बिना प्रयुक्त हो और फल कर्ता को ही मिले, तब आत्मनेपद होता है। उदाहरण: गां जानीते।

श्लोक 3.77

विभाषोपपदेनप्रतीयमाने

vibhāṣopapadenapratīyamāne

यदि क्रिया का फल कर्ता को ही अभीष्ट है — यह बात वाक्य में प्रयुक्त किसी अन्य (उपपद) शब्द से स्पष्ट हो जाती हो, तो 3.72-3.76 का आत्मनेपद विकल्प से ही होता है। उदाहरण: स्वयं यज्ञं यजते/यजति।

श्लोक 3.78

शेषात्कर्तरिपरस्मैपदम्

śeṣātkartariparasmaipadam

पूर्वोक्त सभी विशेष आत्मनेपद-विधायक नियमों से बाहर शेष रहने वाले सामान्य प्रसंगों में, कर्तृवाच्य में सदा परस्मैपद ही होता है — यह आत्मनेपद-प्रकरण का सामान्य समापन-नियम है। उदाहरण: याति, वाति।

श्लोक 3.79

अनुपराभ्यां कृञः

anuparābhyāṁ kṛñaḥ

अनु अथवा परा उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'कृ' धातु से, भले ही फल कर्ता को मिलता हो और अर्थ सूचन-आदि (3.32) का ही क्यों न हो, परस्मैपद ही होता है — यह 3.32 का एक अपवाद है।

टिप्पणी: Both sources garbled the sandhi here (bare: 'पराभ्तां'; commentary matches structurally but with typos); corrected to the standard reading 'अनुपराभ्यां कृञः'.

श्लोक 3.80

अभिप्रत्यतिभ्यःक्षिपः

abhipratyatibhyaḥkṣipaḥ

अभि, प्रति अथवा अति उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'क्षिप्' (फेंकना) धातु से परस्मैपद होता है। उदाहरण: अभिक्षिपति।

श्लोक 3.81

प्राद्वहः

prādvahaḥ

प्र-उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'वह्' (ढोना/ले जाना) धातु से परस्मैपद होता है। उदाहरण: प्रवहति।

श्लोक 3.82

परेर्मृषः

parermṛṣaḥ

परि-उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'मृष्' (सहन करना) धातु से परस्मैपद होता है। उदाहरण: परिमृष्यति।

श्लोक 3.83

व्याङ्ग्परिभ्योरमः

vyāṅgparibhyoramaḥ

वि, आङ् अथवा परि — इनमें से किसी उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'रम्' (आनन्द लेना/खेलना) धातु से परस्मैपद होता है। उदाहरण: विरमति, आरमति, परिरमति।

श्लोक 3.84

उपाच्च्

upācc

उप-उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'रम्' धातु से भी परस्मैपद होता है। उदाहरण: उपरमति।

श्लोक 3.85

विभाषाकर्मकात्

vibhāṣākarmakāt

उप-उपसर्ग के साथ अकर्मक रूप में प्रयुक्त 'रम्' धातु से विकल्प से परस्मैपद होता है। उदाहरण: यावद्भुक्तमुपरमति/उपरमते।

श्लोक 3.86

बुधयुधनशजनेङ्प्रुद्रुस्रुभ्यो णेः

budhayudhanaśajaneṅprudrusrubhyo ṇeḥ

बुध् (जानना), युध् (लड़ना), नश् (नष्ट होना), जन् (जन्म लेना), इ (जाना), प्रु (कूदना), द्रु (दौड़ना) तथा स्रु (बहना) — इन आठ धातुओं के प्रयोजक रूप से परस्मैपद होता है। उदाहरण: बोधयति, योधयति, नाशयति, जनयति।

टिप्पणी: Commentary edition read 'स्त्रभ्यो' (garbled) and omitted the final visarga; corrected to the standard reading 'बुधयुधनशजनेङ्प्रुद्रुस्रुभ्यो णेः' using the bare edition's word list.

श्लोक 3.87

निगरणचलनार्थेभ्यश्र्च्

nigaraṇacalanārthebhyaśrc

निगलने (निगरण) अथवा हिलने-डुलने (चलन) के अर्थ वाली धातुओं के प्रयोजक रूप से भी परस्मैपद होता है। उदाहरण: निगारयति, चालयति।

श्लोक 3.88

अणावकर्मकाच्चित्तवत्कर्तृकात्

aṇāvakarmakāccittavatkartṛkāt

जो धातु प्रयोजक-रहित (अण्यन्त) रूप में अकर्मक हो और जिसका कर्ता चेतन (सजीव) हो, उसके प्रयोजक (ण्यन्त) रूप से परस्मैपद होता है। उदाहरण: आस्ते देवदत्तः→आसयति।

श्लोक 3.89

नपादभ्याङ्गयमाङ्गयसपरिमुहरुचिनृतिवदवसः

napādabhyāṅgayamāṅgayasaparimuharucinṛtivadavasaḥ

3.88 का अपवाद — पा (पीना), दम् (दमन करना), आङ्-पूर्वक यम्, यस्, परि-पूर्वक मुह्, रुच् (अच्छा लगना), नृत् (नाचना), वद् (बोलना), वस् (रहना) — इन धातुओं के प्रयोजक रूप में परस्मैपद नहीं, अपितु आत्मनेपद ही रहता है। उदाहरण: पाययते, दमयते।

श्लोक 3.90

वाक्यषः

vākyaṣaḥ

क्यष्-प्रत्यय (भाव-सूचक नामधातु) से बने धातुओं के प्रयोजक रूप से विकल्प से परस्मैपद होता है। उदाहरण: लोहितायति/लोहितायते।

श्लोक 3.91

द्यद्भयोलुङि

dyadbhayoluṅi

'द्युत्' आदि गण की धातुओं से, लुङ् (सामान्य भूतकाल) लकार में, विकल्प से परस्मैपद होता है। उदाहरण: अद्युतत्/अद्योतिष्ट।

श्लोक 3.92

वृद्भयःस्यसनोः

vṛdbhayaḥsyasanoḥ

वृत् (होना), वृध् (बढ़ना), शृध् (साहस करना), स्यन्द् (बहना), कृप् (समर्थ होना) — इन धातुओं से, भविष्यत्-प्रत्यय 'स्य' तथा इच्छार्थक 'सन्' परे रहते, विकल्प से परस्मैपद होता है। उदाहरण: वर्त्स्यति/वर्तिष्यते।

श्लोक 3.93

लुटिचकॢपः

luṭicakḷpaḥ

'कॢप्' (समर्थ होना) धातु से, लुट् (सामान्य भविष्यत्) लकार में तथा स्य/सन् प्रत्ययों में भी, विकल्प से परस्मैपद होता है। उदाहरण: कल्प्ता/कल्प्स्यति, चिकॢप्सति। इसी के साथ पाद 1.3 की दीर्घ आख्यातिक चर्चा पूर्ण होती है।

प्रथमोऽध्यायः, चतुर्थः पादः

श्लोक 4.1

आकडारादेकासंज्ञा

ākaḍārādekāsaṁjñā

'कडार' शब्द (1.4.61 में प्रयुक्त) तक फैले हुए आगामी संज्ञा-प्रकरण में यह नियम लागू रहता है कि किसी भी शब्द की एक ही संज्ञा होगी — भ-संज्ञा तथा पद-संज्ञा का विभाजन भी इसी सूत्र से नियंत्रित होता है।

श्लोक 4.2

विप्रतिषेधेपरंकार्यम्

vipratiṣedheparaṁkāryam

यदि दो अलग-अलग सूत्र एक ही स्थान पर परस्पर विरोधी कार्य बताएँ, तो अष्टाध्यायी में जो सूत्र क्रम-संख्या में बाद में आता है, वही प्रवृत्त होता है — यह अष्टाध्यायी का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण व्याख्या-सिद्धान्त है, जिसका प्रयोग सम्पूर्ण ग्रन्थ में हज़ारों बार होता है।

श्लोक 4.3

यूस्त्र्याख्यौनदी

yūstryākhyaunadī

दीर्घ ईकार अथवा ऊकार में समाप्त होने वाले, तथा केवल स्त्रीलिंग में ही प्रयुक्त होने वाले शब्दों की 'नदी' संज्ञा होती है — यह संज्ञा आगे इनकी विभक्ति-रचना को नियमित करती है।

श्लोक 4.4

नेयङ्गुवङ्ग्स्थानावस्त्री

neyaṅguvaṅgsthānāvastrī

यदि दीर्घ ईकार अथवा ऊकार, इयङ् अथवा उवङ् आदेश के स्थानी हों, तो — 'स्त्री' शब्द को छोड़कर — उनकी नदी संज्ञा नहीं होती। उदाहरण: हे श्रीः, हे भ्रूः।

श्लोक 4.5

वाऽऽमि

vā''mi

4.4 का अपवाद — आम्-प्रत्यय (षष्ठी बहुवचन) परे रहते, इयङ्/उवङ् के स्थानी दीर्घ ई/ऊ की विकल्प से नदी संज्ञा हो जाती है। उदाहरण: श्रियाम्/श्रीणाम्, भ्रुवाम्/भ्रूणाम्।

श्लोक 4.6

ङिति ह्रस्वश्च

ṅiti hrasvaśca

ङित्-संज्ञक प्रत्यय परे रहते — इयङ्/उवङ् के स्थानी दीर्घ स्वर, तथा नित्यस्त्रीलिंग ह्रस्व इ/उ भी — विकल्प से नदी-संज्ञक हो सकते हैं।

श्लोक 4.7

शेषोध्यसखि

śeṣodhyasakhi

'सखि' शब्द के अतिरिक्त, बाकी सभी ह्रस्व इकारान्त तथा उकारान्त शब्द (किसी भी लिंग के) 'घि' संज्ञक होते हैं। उदाहरण: रवि, कवि, वारि, शम्भु, गुरु।

श्लोक 4.8

पतिःसमासएव्

patiḥsamāsaev

'पति' शब्द की 'घि' संज्ञा केवल समास (सामासिक प्रयोग) में ही होती है, स्वतंत्र प्रयोग में नहीं। उदाहरण: प्रजापतिना, प्रजापतये।

श्लोक 4.9

षष्ठीयुक्तश्छन्दसिवा

ṣaṣṭhīyuktaśchandasivā

वेद में, यदि 'पति' शब्द किसी षष्ठ्यन्त पद से सम्बद्ध हो, तो वहाँ भी विकल्प से उसकी घि-संज्ञा हो सकती है, समास के बिना भी। उदाहरण: कुलुञ्चानां पतये/पत्ये नमः।

श्लोक 4.10

ह्रस्वंलघु

hrasvaṁlaghu

एक मात्रा (कालमान) वाला ह्रस्व स्वर (अ, इ, उ, ऋ, ऌ) 'लघु' (हल्का) संज्ञक होता है — यह छन्द तथा गुण-वृद्धि सम्बन्धी अनेक नियमों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

श्लोक 4.11

संयोगेगुरु

saṁyogeguru

यदि किसी ह्रस्व स्वर के ठीक बाद कोई व्यंजन-समूह (संयोग) आए, तो वह स्वर भी — अपनी मूल ह्रस्वता के बावजूद — 'गुरु' (भारी) संज्ञक मान लिया जाता है। उदाहरण: हट्ट में 'अ' गुरु है।

श्लोक 4.12

दीर्घं च

dīrghaṁ ca

सभी दीर्घ स्वर (आ, ई, ऊ आदि) भी, संयोग की अपेक्षा के बिना ही, स्वतः 'गुरु' संज्ञक होते हैं। उदाहरण: ईहाञ्चक्रे।

श्लोक 4.13

यस्मात्प्रत्ययविधिस्तदादिप्रत्ययेऽङ्गम्

yasmātpratyayavidhistadādipratyaye'ṅgam

जिस शब्द-रूप से किसी प्रत्यय का विधान किया गया हो, वह रूप — उस प्रत्यय तथा उसके बाद आने वाले किसी भी अन्य प्रत्यय के परे रहते — 'अङ्ग' (आधार) संज्ञक होता है। उदाहरण: भवति=भू+शप्+ति।

श्लोक 4.14

सुप्तिङन्तं पदम्

suptiṅantaṁ padam

जिस शब्द-रूप का अन्त सुप्-प्रत्यय (सुबन्त) अथवा तिङ्-प्रत्यय (तिङन्त) में हो, उसकी 'पद' संज्ञा होती है — यह संज्ञा आगे वाक्य-स्तरीय अनेक नियमों (जैसे सन्धि, स्वर) का आधार बनती है। उदाहरण: बालः, पठति।

श्लोक 4.15

नःक्ये

naḥkye

यदि नकारान्त सुबन्त शब्द के बाद क्यच्, क्यङ् अथवा क्यष् प्रत्यय आए, तो वह नकारान्त शब्द भी 'पद' संज्ञक मान लिया जाता है। उदाहरण: वाच्यति।

श्लोक 4.16

सितिच्

sitic

जिस प्रत्यय का सकार इत्-संज्ञक हो (सित्), उसके परे रहते पूर्ववर्ती शब्द-रूप की भी 'पद' संज्ञा होती है। उदाहरण: भवदीयः, ऊर्णायुः।

श्लोक 4.17

स्वादिष्वसर्वनामस्थाने

svādiṣvasarvanāmasthāne

सर्वनामस्थान-संज्ञक (सुट्) प्रत्ययों को छोड़कर, 'सु' से 'कप्' तक के शेष सुबन्त प्रत्ययों के परे रहते, पूर्ववर्ती अंग की भी 'पद' संज्ञा होती है। उदाहरण: विश्वपा+अस् में 'विश्वपा' पद-संज्ञक है।

श्लोक 4.18

यचिभम्

yacibham

'सुट्' प्रत्ययों को छोड़कर, शेष यकार-आदि अथवा अच्-आदि प्रत्ययों के परे रहते, पूर्ववर्ती अंग की 'भ' संज्ञा होती है — यह 4.1 में प्रस्तावित द्विविध विभाजन (पद/भ) का दूसरा पक्ष है। उदाहरण: गार्ग्यः, वात्स्यः।

श्लोक 4.19

तसौमत्वर्थे

tasaumatvarthe

मतुप् जैसे स्वामित्व-सूचक अर्थ वाले प्रत्ययों के परे रहते, तकारान्त तथा सकारान्त अंग की भी 'भ' संज्ञा होती है।

श्लोक 4.20

अयस्मयादीनि छन्दसि

ayasmayādīni chandasi

वैदिक प्रयोगों में 'अयस्मय' (लोहे का बना) आदि कुछ विशेष शब्द-रूप, यद्यपि नियमित व्याकरण-विधि से न बने हों, फिर भी साधु (शुद्ध) माने जाते हैं। उदाहरण: अयस्मयं वर्म, अयस्मयानि पात्राणि।

श्लोक 4.21

बहुषुबहुवचनम्

bahuṣubahuvacanam

जब वक्ता का अभिप्राय दो से अधिक वस्तुओं का हो, तब बहुवचन-प्रत्ययों का प्रयोग होता है — यह वचन-निर्धारण के प्रकरण का प्रारम्भिक सूत्र है। उदाहरण: ब्राह्मणाः पठन्ति।

श्लोक 4.22

द्वयेकयोर्द्विवचनैकवचने

dvayekayordvivacanaikavacane

दो वस्तुओं के अभिप्राय में द्विवचन-प्रत्यय, तथा एक वस्तु के अभिप्राय में एकवचन-प्रत्यय का प्रयोग होता है। उदाहरण: ब्राह्मणौ पठतः; ब्राह्मणः पठति। इसी के साथ 1.4 के लघु-संज्ञा-प्रकरण पूर्ण होते हैं, और आगे विशाल कारक-प्रकरण आरम्भ होता है।

श्लोक 4.23

कारके

kārake

यह सूत्र केवल एक शब्द 'कारके' से बना है और आगामी अनेक सूत्रों में 'कारक' पद का अधिकार (निरन्तर अनुवृत्ति) स्थापित करता है। यहीं से पाणिनि की प्रसिद्ध कारक-मीमांसा (व्याकरणिक कारक-सिद्धान्त) आरम्भ होती है — भाषाविज्ञान के इतिहास की एक अत्यन्त मौलिक उपलब्धि।

श्लोक 4.24

ध्रुवमपायेऽपादानम्

dhruvamapāye'pādānam

जब कोई वस्तु किसी दूसरी वस्तु से अलग हो रही हो, तो उस दूसरी, स्थिर रहने वाली वस्तु की 'अपादान' कारक-संज्ञा होती है। उदाहरण: ग्रामाद् आयाति — यहाँ 'ग्राम' अपादान है, क्योंकि वह अपने स्थान पर स्थिर रहता है।

श्लोक 4.25

भीत्रार्थानांभयहेतुः

bhītrārthānāṁbhayahetuḥ

'डरना' अथवा 'रक्षा करना' के अर्थ वाली धातुओं के साथ, जिससे भय उत्पन्न होता है, उस कारक की भी अपादान संज्ञा होती है। उदाहरण: चौरेभ्यो बिभेति (चोरों से डरता है)।

श्लोक 4.26

पराजेरसोढः

parājerasoḍhaḥ

परा-उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'जि' (हारना) धातु के प्रयोग में, जिसके सामने पराजय असह्य हो, उस कारक की अपादान संज्ञा होती है। उदाहरण: अध्ययनात् पराजयते (अध्ययन में हार मान लेता है)।

श्लोक 4.27

वारणार्थानामीप्सितः

vāraṇārthānāmīpsitaḥ

'रोकना/बचाना' के अर्थ वाली धातुओं के प्रयोग में, जिस अवांछित वस्तु से बचाया जा रहा हो, उसकी अपादान संज्ञा होती है। उदाहरण: यवेभ्यो गां वारयति (जौ के खेत से गाय को रोकता है)।

श्लोक 4.28

अन्तधौयेनादर्शनमिच्छति

antadhauyenādarśanamicchati

जब कोई किसी विशिष्ट व्यक्ति से छिपना/स्वयं को अदृश्य करना चाहे, तो जिससे छिपा जा रहा है, उसकी अपादान संज्ञा होती है। उदाहरण: उपाध्यायाद् अन्तर्धत्ते (गुरु से छिपता है)।

श्लोक 4.29

आख्यातोपयोगे

ākhyātopayoge

किसी से व्यवस्थित रूप से विद्या ग्रहण करने के अर्थ में, जिस शिक्षक/स्रोत से सीखा जा रहा हो, उसकी अपादान संज्ञा होती है। उदाहरण: उपाध्यायाद् अधीते (गुरु से पढ़ता है)।

श्लोक 4.30

जनिकर्तुः प्रकृतिः

janikartuḥ prakṛtiḥ

'जन्' (उत्पन्न होना) धातु के कर्ता का जो मूल उपादान-कारण हो, उसकी अपादान संज्ञा होती है। उदाहरण: शृङ्गात् शरो जायते (सींग से बाण बनता है)।

श्लोक 4.31

भुवःप्रभवः

bhuvaḥprabhavaḥ

'भू' (होना/उत्पन्न होना) धातु के कर्ता का जो उद्गम-स्थान हो, उसकी अपादान संज्ञा होती है। उदाहरण: हिमवतो गङ्गा प्रभवति (गंगा हिमालय से निकलती है)।

श्लोक 4.32

कर्मणायमभिप्रैतिससंप्रदानम्

karmaṇāyamabhipraitisasaṁpradānam

जब कोई (दान-क्रिया के कर्म के माध्यम से) किसी अन्य व्यक्ति के साथ सम्बन्ध स्थापित करने का अभिप्राय रखे, तो उस अभिप्रेत व्यक्ति की 'सम्प्रदान' (चतुर्थी विभक्ति का आधार) संज्ञा होती है। उदाहरण: विप्राय गां ददाति।

श्लोक 4.33

रुच्यर्थानांप्रीयमाणः

rucyarthānāṁprīyamāṇaḥ

'पसंद आना/अच्छा लगना' के अर्थ वाली धातुओं में, जिसे वस्तु पसंद आ रही हो, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है। उदाहरण: देवदत्ताय रोचते मोदकः।

श्लोक 4.34

श्लाघ ह्नुङ् स्था-शपां ज्ञीप्स्यमानः

ślāgha hnuṅ sthā-śapāṁ jñīpsyamānaḥ

श्लाघ् (प्रशंसा करना), ह्नु (छिपाना), स्था (कथन को दृढ़ करना), शप् (शपथ खाना) — इन धातुओं के प्रयोग में, जिसे कुछ समझाना/सूचित करना अभीष्ट हो, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है। उदाहरण: देवदत्ताय श्लाघते।

श्लोक 4.35

धारेरुत्तमर्णः

dhāreruttamarṇaḥ

'धृ' (धारण करना/उधार रखना) धातु के प्रयोग में, जो ऋण देता है (उत्तमर्ण), उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है। उदाहरण: देवदत्ताय शतं धारयति यज्ञदत्तः।

श्लोक 4.36

स्पृहे रीप्सितः

spṛhe rīpsitaḥ

'स्पृह्' (चाहना/लालसा करना) धातु के प्रयोग में, जिस वस्तु की चाह हो, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है। उदाहरण: पुष्पेभ्यः स्पृहयति।

श्लोक 4.37

क्रुधद्रुहेर्ष्यासूयार्थानां यं प्रति कोपः

krudhadruherṣyāsūyārthānāṁ yaṁ prati kopaḥ

क्रोध करने, द्वेष रखने, ईर्ष्या करने तथा असूया करने के अर्थ वाली धातुओं के प्रयोग में, जिसके प्रति यह भाव व्यक्त हो, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है। उदाहरण: देवदत्ताय क्रुध्यति।

श्लोक 4.38

क्रुधद्रुहोरुपसृष्टयोःकर्मः

krudhadruhorupasṛṣṭayoḥkarmaḥ

4.37 का अपवाद — यदि 'क्रुध्' तथा 'द्रुह्' धातुओं के साथ कोई उपसर्ग जुड़ा हो, तो जिसके प्रति क्रोध हो, वह अब सम्प्रदान नहीं बल्कि 'कर्म' संज्ञक हो जाता है। उदाहरण: देवदत्तमभिक्रुध्यति।

श्लोक 4.39

राधीक्ष्योर्यस्यविप्रश्र्न

rādhīkṣyoryasyavipraśrna

'राध्' (सफल होना) तथा 'ईक्ष्' (देखना/जाँचना) धातुओं के प्रयोग में, जिसके बारे में तरह-तरह के प्रश्न पूछे जाएँ, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है। उदाहरण: देवदत्ताय राध्यति।

श्लोक 4.40

प्रत्याङ्ग्भ्यांश्रुवःपूर्वस्यकर्ता

pratyāṅgbhyāṁśruvaḥpūrvasyakartā

प्रति अथवा आङ् उपसर्ग के साथ, प्रतिज्ञा-अर्थ में प्रयुक्त 'श्रु' धातु के प्रयोग में, जिसने पहले कोई वचन दिया था, उस पूर्व-वक्ता की सम्प्रदान संज्ञा होती है। उदाहरण: यज्ञदत्तः देवदत्ताय प्रतिशृणोति।

श्लोक 4.41

अनुप्रतिगृणश्र्च

anupratigṛṇaśrca

अनु अथवा प्रति उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'गृ' (स्वीकार करना) धातु में भी, पूर्व-कर्ता की सम्प्रदान संज्ञा होती है। उदाहरण: होत्रेऽनुगृणाति।

श्लोक 4.42

साधकतमंकरणम्

sādhakatamaṁkaraṇam

क्रिया की सफलता में जो कारक सबसे अधिक सहायक हो, वह 'करण' (साधन-कारक, तृतीया-विभक्ति का आधार) कहलाता है। उदाहरण: रामेण बाणेन हतो वाली — यहाँ 'बाण' करण है।

श्लोक 4.43

दिवःकर्मच

divaḥkarmaca

'दिव्' (जुआ खेलना) धातु के प्रयोग में, साधकतम कारक की एक साथ कर्म और करण — दोनों संज्ञाएँ हो सकती हैं। उदाहरण: अक्षान् दीव्यति (कर्म)/अक्षैर्दीव्यति (करण)।

श्लोक 4.44

परिक्रयणेसंप्रदानमन्यतरस्याम्

parikrayaṇesaṁpradānamanyatarasyām

क्रय-विक्रय के मूल्य-सम्बन्धी प्रसंग में, साधकतम कारक की विकल्प से सम्प्रदान संज्ञा भी हो सकती है। उदाहरण: शताय परिक्रीतोऽनुब्रूहि/शतेन परिक्रीतोऽनुब्रूहि।

श्लोक 4.45

आधारोऽधिकरणम्

ādhāro'dhikaraṇam

जिस कारक में क्रिया घटित होती है (आधार-स्थान), उसकी 'अधिकरण' (स्थान-कारक, सप्तमी-विभक्ति का आधार) संज्ञा होती है। उदाहरण: कटे आस्ते।

श्लोक 4.46

अधिशीङ्ग्स्थाऽऽसांकर्म

adhiśīṅgsthā''sāṁkarma

अधि-उपसर्ग के साथ प्रयुक्त शीङ् (सोना), स्था (खड़ा होना), आस् (बैठना) धातुओं में, आधार-स्थान की — अपवाद-स्वरूप — अधिकरण नहीं अपितु 'कर्म' संज्ञा होती है। उदाहरण: ग्राममधिशेते, पर्वतमध्यास्ते।

श्लोक 4.47

अभिनिविशश्र्च

abhiniviśaśrca

अभि अथवा नि उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'विश्' (प्रवेश करना) धातु में भी, आधार की कर्म संज्ञा होती है। उदाहरण: ग्राममभिनिविशते।

श्लोक 4.48

उपान्वध्याङ्ग्वसः

upānvadhyāṅgvasaḥ

उप, अनु, अधि अथवा आङ् उपसर्ग के साथ प्रयुक्त 'वस्' (रहना) धातु में भी, आधार की कर्म संज्ञा होती है। उदाहरण: ग्राममुपवसति, ग्राममनुवसति।

श्लोक 4.49

कर्तुरीप्सिततमं कर्म

karturīpsitatamaṁ karma

कर्ता जिस वस्तु को क्रिया के द्वारा सबसे अधिक प्राप्त करना चाहता हो, वही 'कर्म' (द्वितीया-विभक्ति का आधार) कहलाता है। उदाहरण: देवदत्तः ओदनं पचति।

श्लोक 4.50

तथायुक्तंचानीप्सितम्

tathāyuktaṁcānīpsitam

4.49 का विस्तार — कर्ता की क्रिया द्वारा जो कारक उसी प्रकार प्रभावित होता है, भले ही वह अवांछित हो, वह भी 'कर्म' संज्ञक होता है। उदाहरण: विषं भक्षयति।

श्लोक 4.51

अकथितं च

akathitaṁ ca

कोई कारक, जो अपादान, सम्प्रदान आदि किसी विशेष संज्ञा से स्पष्ट रूप से निरूपित न हो, फिर भी वह भी 'कर्म' संज्ञक मान लिया जाता है — विशेषतः द्विकर्मक क्रियाओं में। उदाहरण: गां दोग्धि पयः।

श्लोक 4.52

गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थशब्दकर्माकर्मकाणामणिकर्तासणौ

gatibuddhipratyavasānārthaśabdakarmākarmakāṇāmaṇikartāsaṇau

गमनार्थक, ज्ञानार्थक, भक्षणार्थक, शब्द-प्रयोगार्थक तथा अकर्मक धातुओं में — जो कर्ता उनके मूल रूप में कर्ता होता है, वही प्रयोजक (ण्यन्त) रूप बनने पर 'कर्म' संज्ञक हो जाता है। उदाहरण: गच्छति माणवकः→गमयति माणवकम्।

श्लोक 4.53

ह्रक्रोरन्यतरस्याम्

hrakroranyatarasyām

'हृ' (ले जाना) तथा 'कृ' (करना) धातुओं में, 4.52 वाला नियम विकल्प से ही लागू होता है। उदाहरण: हारयति माणवकं भारम्/हारयति भारं माणवकेन।

श्लोक 4.54

स्वतन्त्रःकर्ता

svatantraḥkartā

क्रिया के सम्पादन में जो कारक स्वतंत्र (सर्वाधिक प्रधान) हो, उसकी 'कर्ता' संज्ञा होती है — यह कारक-प्रकरण के इस उपखण्ड का प्रारम्भिक नियम है। उदाहरण: देवदत्तो गच्छति।

श्लोक 4.55

तत्प्रयोजकोहेतुश्र्च

tatprayojakohetuśrca

जो किसी अन्य कर्ता को प्रेरित करके क्रिया करवाए, उसे 'हेतु' (प्रयोजक-कर्ता) कहा जाता है, और व्याकरणिक दृष्टि से वह भी 'कर्ता' ही माना जाता है — यह प्रयोजक (णिजन्त) क्रियाओं की व्याकरणिक नींव है। उदाहरण: देवदत्तः यज्ञदत्तेन ओदनं पाचयति।

श्लोक 4.56

प्रागैश्वरान्निपाताः

prāgaiśvarānnipātāḥ

यहाँ से लेकर 1.4.97 के 'अधिरीश्वरे' सूत्र तक जिन शब्दों की गणना की जाने वाली है, उन सबकी 'निपात' संज्ञा होती है — यह कारक-प्रकरण से आगे बढ़कर उपसर्ग/निपात-सम्बन्धी नए उपखण्ड का प्रारम्भिक सूत्र है। उदाहरण: च, वा, ह, अह। (टिप्पणी: दोनों स्रोत-प्रतियों में इस सूत्र का पाठ भिन्न-भिन्न ढंग से त्रुटिपूर्ण मिला; मानक सन्धि-रूप यहाँ प्रयुक्त है — देखें review_note।)

टिप्पणी: Bare edition had 'प्राक्=इश्वरात्=निपा तः' and commentary had 'प्राग्ग्रीश्र्वरान्निपाताः' (both garbled); corrected via the standard sandhi derivation prāk + aiśvarāt + nipātāḥ (k+ai -> gai) to 'प्रागैश्वरान्निपाताः', matching the boundary marker referenced by this sutra and confirmed by 1.4.97 containing īśvare.

श्लोक 4.57

चादयोऽसत्त्वे

cādayo'sattve

'च' आदि गण में पठित शब्द — जब वे किसी मूर्त वस्तु (द्रव्य) के वाचक न होकर अव्यय-भाव में प्रयुक्त हों — 'निपात' संज्ञक होते हैं।

श्लोक 4.58

प्रादयः

prādayaḥ

प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निस्, निर्, दुस्, दुर्, वि, आङ्, नि, अधि, अपि, अति, सु, उत्, अभि, प्रति, परि, उप — ये बाईस शब्द भी, द्रव्य-अर्थ के अभाव में, 'निपात' संज्ञक होते हैं।

श्लोक 4.59

उपसर्गाःक्रियायोगे

upasargāḥkriyāyoge

यही बाईस प्रादि शब्द, जब किसी क्रिया (धातु) के साथ संयुक्त होकर प्रयुक्त हों, तो 'उपसर्ग' संज्ञक होते हैं — यह उपसर्ग की औपचारिक परिभाषा है।

श्लोक 4.60

गतिश्र्च

gatiśrca

यही प्रादि शब्द, क्रिया के योग में, 'गति' संज्ञा भी पाते हैं — यह संज्ञा समास तथा स्वर-सम्बन्धी अनेक कार्यों का आधार बनती है।

श्लोक 4.61

ऊर्यादिच्विडाचश्र्च्

ūryādicviḍācaśrc

'ऊरी' (स्वीकृति-सूचक) आदि कुछ विशेष शब्द, तथा च्वि एवं डाच् प्रत्ययों से बने शब्द भी, क्रिया के योग में 'गति' संज्ञक होते हैं। उदाहरण: ऊरीकृत्य (स्वीकार करके)।

श्लोक 4.62

अनुकरणंचानितिपरम्

anukaraṇaṁcānitiparam

ध्वनि-अनुकरणात्मक शब्द — जब उनके बाद 'इति' न आए — क्रिया के योग में 'गति' संज्ञक होते हैं।

श्लोक 4.63

आदरानादरयोःसदसती

ādarānādarayoḥsadasatī

सम्मान (आदर) के अर्थ में 'सत्' तथा अनादर के अर्थ में 'असत्' शब्द, क्रिया के योग में, 'गति' संज्ञक होते हैं।

श्लोक 4.64

भूषणेऽलम्

bhūṣaṇe'lam

'अलम्' शब्द, जब वह शोभा/अलंकार के अर्थ में हो, क्रिया के योग में 'गति' संज्ञक होता है।

श्लोक 4.65

अन्तरपरिग्रहे

antaraparigrahe

'अन्तः' शब्द, जब वह किसी वस्तु को स्वीकार न करने (अपरिग्रह) के अर्थ में हो, क्रिया के योग में 'गति' संज्ञक होता है।

श्लोक 4.66

कणेमनसीश्रद्धाप्रतीघाते

kaṇemanasīśraddhāpratīghāte

'कणे' तथा 'मनसि' शब्द, जब वे श्रद्धा भंग होने के अर्थ में हों, क्रिया के योग में 'गति' संज्ञक होते हैं।

श्लोक 4.67

पुरोऽव्ययम्

puro'vyayam

अव्यय-रूप 'पुरस्' (आगे) शब्द की, क्रिया के योग में, 'गति' संज्ञा होती है।

श्लोक 4.68

अस्तंच

astaṁca

अव्यय 'अस्तम्' (अस्त होना) शब्द की भी, क्रिया के योग में, 'गति' संज्ञा होती है। उदाहरण: अस्तंगतानि धनानि।

श्लोक 4.69

अच्छगत्यर्थवदेषु

acchagatyarthavadeṣu

गमनार्थक धातुओं तथा 'वद्' (बोलना) धातु के साथ पूर्व-प्रयुक्त 'अच्छ' (की ओर) शब्द की 'गति' संज्ञा होती है।

श्लोक 4.70

अदोऽनुपदेशे

ado'nupadeśe

'अदस्' (वह) शब्द, जब वह किसी विशेष शिक्षा-सम्बन्धी अर्थ से भिन्न हो, क्रिया के योग में 'गति' संज्ञक होता है।

श्लोक 4.71

तिरोऽन्तधौ

tiro'ntadhau

'तिरस्' (आड़ में/छिपकर) शब्द, जब वह व्यवधान/छिपाव के अर्थ में हो, क्रिया के योग में 'गति' संज्ञक होता है। उदाहरण: तिरस्कृत्य/तिरःकृत्य।

श्लोक 4.72

विभाषाकृञि

vibhāṣākṛñi

'तिरस्' शब्द से युक्त होकर 'कृ' धातु प्रयुक्त हो, तो वहाँ 'गति' संज्ञा विकल्प से ही होती है। उदाहरण: उपाजेकृत्य/उपाजे कृत्वा।

श्लोक 4.73

उपाजेऽन्वाजे

upāje'nvāje

'कृ' धातु के परे रहते, 'उपाजे' तथा 'अन्वाजे' शब्दों की 'गति' संज्ञा होती है।

श्लोक 4.74

साक्षात्प्रभृतीनि च

sākṣātprabhṛtīni ca

'कृ' धातु के परे रहते, 'साक्षात्' (प्रत्यक्ष) आदि कुछ अन्य शब्दों की भी विकल्प से 'गति' संज्ञा होती है।

श्लोक 4.75

अनत्याधानौरसिमनसी

anatyādhānaurasimanasī

जहाँ कोई विशेष (अत्याधान-रूप) प्रयोजन न हो, वहाँ 'कृ' धातु के परे रहते 'उरसि' (छाती में) तथा 'मनसि' (मन में) शब्दों की 'गति' संज्ञा होती है।

श्लोक 4.76

मध्येपदेनिवचनेच

madhyepadenivacaneca

उसी शर्त पर, 'मध्ये' (बीच में), 'पदे' (पद में) तथा 'निवचने' शब्दों की भी 'कृ' धातु के परे 'गति' संज्ञा होती है।

श्लोक 4.77

नित्यंहस्तेपाणावुपयमने

nityaṁhastepāṇāvupayamane

विवाह (पाणिग्रहण) के अर्थ में, 'हस्ते' तथा 'पाणौ' शब्दों की, 'कृ' धातु के परे रहते, सदैव (नित्य) 'गति' संज्ञा होती है।

श्लोक 4.78

प्राध्वंबन्धने

prādhvaṁbandhane

बन्धन-हेतुक अनुकूलता के अर्थ में, 'प्राध्वम्' शब्द की 'कृ' धातु के परे 'गति' संज्ञा होती है।

श्लोक 4.79

जीविकोपनिषदावौपम्ये

jīvikopaniṣadāvaupamye

सादृश्य (उपमा) के अर्थ में, 'जीविका' तथा 'उपनिषद्' शब्दों की, 'कृ' धातु के परे, 'गति' संज्ञा होती है। उदाहरण: जीविकाकृत्य, उपनिषत्कृत्य। इसी सूत्र के साथ 4.61 से चली आ रही विस्तृत 'गति'-संज्ञा-सूची पूर्ण होती है।

श्लोक 4.80

तेप्राग्धातोः

teprāgdhātoḥ

उपसर्ग तथा गति-संज्ञक शब्द — नियमतः — धातु से पहले ही रखे जाते हैं। उदाहरण: प्रभवति, अनुभवति।

श्लोक 4.81

छन्दसिपरेऽपि

chandasipare'pi

वैदिक प्रयोग में, उपसर्ग/गति शब्द धातु के तुरन्त बाद में भी प्रयुक्त हो सकते हैं (4.80 का अपवाद)।

श्लोक 4.82

व्यवहिताश्र्च

vyavahitāśrca

वेद में गति और उपसर्ग शब्दों का धातु से दूर, अन्य शब्दों द्वारा व्यवहित (अलग) प्रयोग भी देखा जाता है — यह 4.80 का एक और वैदिक अपवाद है।

श्लोक 4.83

कर्मप्रवचनीयाः

karmapravacanīyāḥ

यह सूत्र आगामी कई सूत्रों में 'कर्मप्रवचनीय' (एक विशेष निपात-वर्ग) संज्ञा का अधिकार स्थापित करता है।

श्लोक 4.84

अनुर्लक्षणे

anurlakṣaṇe

'अनु' शब्द, जब वह किसी संकेत/चिह्न के अर्थ में प्रयुक्त हो, 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञक होता है। उदाहरण: नदीमन्ववसिता सेना।

श्लोक 4.85

तृतीयार्थे

tṛtīyārthe

'अनु' शब्द, जब वह तृतीया-विभक्ति (के समान अर्थ) में हो, 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञक होता है। उदाहरण: अनुशाकटायनं वैयाकरणाः।

श्लोक 4.86

हीने

hīne

'अनु' शब्द, जब वह किसी कमी/न्यूनता के अर्थ में हो, 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञक होता है। उदाहरण: उपशाकटायनं वैयाकरणाः।

श्लोक 4.87

उपोऽधिकेच

upo'dhikeca

'उप' शब्द, जब वह हीनता अथवा अधिकता — दोनों में से किसी एक के अर्थ में हो, 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञक होता है।

श्लोक 4.88

अपपरीवर्जने

apaparīvarjane

'अप' तथा 'परि' शब्द, जब वे किसी वस्तु को छोड़ने/निकाल देने (वर्जन) के अर्थ में हों, 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञक होते हैं।

श्लोक 4.89

आङ्ग्मर्यादावचने

āṅgmaryādāvacane

'आङ्' (आ) शब्द, जब वह किसी सीमा अथवा पूर्ण-व्याप्ति के अर्थ में हो, 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञक होता है। उदाहरण: आ पाटलिपुत्राद् वृष्टो देवः (सीमा); आ कुमारेभ्यो यशः पाणिनेः (व्याप्ति)।

श्लोक 4.90

लक्षणेत्थंभूताख्यानभागवीप्सासुप्रतिपर्यनवः

lakṣaṇetthaṁbhūtākhyānabhāgavīpsāsupratiparyanavaḥ

संकेत/चिह्न, किसी की स्थिति का विशेष वर्णन, हिस्सा, तथा बारंबारता — इन चार अर्थों में — 'प्रति', 'परि' तथा 'अनु' की 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञा होती है।

श्लोक 4.91

अभिरभागे

abhirabhāge

'अभि' शब्द भी — भाग के अतिरिक्त शेष तीन अर्थों (लक्षण, इत्थम्भूताख्यान, वीप्सा) में — 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञक होता है।

श्लोक 4.92

प्रतिःप्रतिनिधिप्रतिदानयोः

pratiḥpratinidhipratidānayoḥ

'प्रति' शब्द, जब वह प्रतिनिधित्व अथवा बदले में कुछ देने के अर्थ में हो, 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञक होता है।

श्लोक 4.93

अधिपरि अनर्थकौ

adhipari anarthakau

'अधि' तथा 'परि' शब्द, जब वे किसी विशेष अर्थ के बोधक न होकर मात्र भाषा-शैली में प्रयुक्त हों (अनर्थक), तब भी 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञक होते हैं।

श्लोक 4.94

सुःपूजायाम्

suḥpūjāyām

'सु' शब्द, जब वह प्रशंसा/सम्मान के अर्थ में हो, 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञक होता है।

श्लोक 4.95

अतिरतिक्रमणेच

atiratikramaṇeca

'अति' शब्द, जब वह अतिक्रमण (सीमा लाँघने) अथवा प्रशंसा के अर्थ में हो, 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञक होता है।

श्लोक 4.96

अपिः पदार्थसम्भावनान्ववसर्गगर्हासमुच्चेषु

apiḥ padārthasambhāvanānvavasargagarhāsamucceṣu

'अपि' शब्द — सम्भावना व्यक्त करने, अनुमति/समर्पण, निन्दा अथवा समुच्चय (और भी) के अर्थों में — 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञक होता है।

श्लोक 4.97

अधिरीश्वरे

adhirīśvare

'अधि' शब्द, जब वह स्वामित्व/आधिपत्य (ईश्वर-भाव) के अर्थ में हो, 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञक होता है — यही वह सूत्र है जिसे 4.56 में 'ऐश्वर' कहकर निपात-गण की सीमा बताई गई थी।

टिप्पणी: Commentary edition had an extra inserted syllable ('अधिरीश्र्वरे'); corrected to the standard reading 'अधिरीश्वरे' matching the boundary this sutra marks (referenced in 4.56).

श्लोक 4.98

विभाषाकृञि

vibhāṣākṛñi

'कृ' धातु के परे रहते, 'अधि' शब्द की 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञा विकल्प से ही होती है।

श्लोक 4.99

लःपरस्मैपदम्

laḥparasmaipadam

लकार के स्थान पर विहित होने वाले प्रत्ययों में से नौ (तिप्, तस्, झि, सिप्, थस्, थ, मिप्, वस्, मस्) तथा शतृ/क्वसु — इन सबकी 'परस्मैपद' संज्ञा होती है — यहाँ से पुरुष-वचन-सम्बन्धी संज्ञा-प्रकरण आरम्भ होता है।

श्लोक 4.100

तङामावात्मनेपदम्

taṅāmāvātmanepadam

तङ्-प्रत्याहार (त से महिङ् तक के नौ आत्मनेपदी प्रत्यय) तथा आम्-सम्बन्धी (शानच्, कानच् कृदन्त) रूपों की 'आत्मनेपद' संज्ञा होती है — यह 4.99 का सन्तुलक सूत्र है। (टिप्पणी: स्रोत-पाठ में ओसीआर-त्रुटि थी; शुद्ध सन्धि के आधार पर पुनर्निर्मित — देखें review_note।)

टिप्पणी: Both sources show OCR corruption of the nasal (commentary: 'तड़ानावात्मनेपदम्' with an incorrect nukta consonant in place of ṅ). Corrected via the standard sandhi taṅ + āmau + ātmanepadam -> 'तङामावात्मनेपदम्' (ṅ+ā->ṅā; au+ā->āv, per 6.1.78 eco'yavāyāvaḥ).

श्लोक 4.101

तिङस्त्रीणि त्रीणि प्रथममध्यमोत्तमाः

tiṅastrīṇi trīṇi prathamamadhyamottamāḥ

परस्मैपद तथा आत्मनेपद, दोनों में से प्रत्येक के नौ-नौ प्रत्ययों को तीन-तीन के तीन समूहों में बाँटकर, उन्हें क्रमशः 'प्रथम पुरुष', 'मध्यम पुरुष' तथा 'उत्तम पुरुष' संज्ञा दी जाती है। उदाहरण: प्रथम: तिप्,तस्,झि; मध्यम: सिप्,थस्,थ; उत्तम: मिप्,वस्,मस्।

श्लोक 4.102

तान्येकवचनद्विवचनबहुवचनान्येकशः

tānyekavacanadvivacanabahuvacanānyekaśaḥ

प्रत्येक त्रिक (प्रथम/मध्यम/उत्तम) के भीतर के तीन प्रत्ययों की भी क्रमशः 'एकवचन', 'द्विवचन' तथा 'बहुवचन' संज्ञा होती है। उदाहरण: प्रथम-त्रिक में तिप् एकवचन, तस् द्विवचन, झि बहुवचन।

श्लोक 4.103

सुपः

supaḥ

नाम-रूप के सुप्-प्रत्यय भी, इसी प्रकार, तीन-तीन के समूहों में एकवचन, द्विवचन तथा बहुवचन संज्ञक होते हैं। उदाहरण: पठतः, पुरुषान्।

श्लोक 4.104

विभक्तिश्र्च

vibhaktiśrca

सुप् (नाम-प्रत्यय) तथा तिङ् (क्रिया-प्रत्यय) — दोनों की सामूहिक रूप से 'विभक्ति' (कारक-चिह्न) संज्ञा होती है।

श्लोक 4.105

युष्मद्युपपदे समानाधिकरणे स्थानिन्यपि मध्यमः

yuṣmadyupapade samānādhikaraṇe sthāninyapi madhyamaḥ

यदि क्रिया का कारक 'युष्मद्' (तुम) हो — भले ही 'युष्मद्' शब्द वाक्य में स्पष्ट रूप से प्रयुक्त न भी हुआ हो — तो मध्यम-पुरुषीय प्रत्यय ही प्रयुक्त होता है। उदाहरण: त्वं गच्छसि।

श्लोक 4.106

प्रहासेचमन्योपपदेमन्यतेरुत्तमएकवच्च्

prahāsecamanyopapademanyateruttamaekavacc

जब परिहास (मज़ाक) का भाव हो, तो 'मन्यते' (सोचता है) उपपद के साथ, मुख्य धातु मध्यमपुरुष में तथा 'मन्' धातु स्वयं उत्तमपुरुष एकवचन में — यह एक विशेष मुहावरेदार संरचना है।

श्लोक 4.107

अस्मद्युत्तमः

asmadyuttamaḥ

यदि क्रिया का कारक 'अस्मद्' (मैं/हम) हो — भले ही 'अस्मद्' शब्द प्रयुक्त न भी हो — तो उत्तमपुरुषीय प्रत्यय ही प्रयुक्त होता है। उदाहरण: अहं गच्छामि।

श्लोक 4.108

शेषेप्रथमः

śeṣeprathamaḥ

4.105 तथा 4.107 से बाहर शेष रहने वाले सभी सामान्य स्थलों में, प्रथमपुरुषीय प्रत्यय प्रयुक्त होता है। उदाहरण: सः गच्छति, रामः पठति।

श्लोक 4.109

परःसंनिकर्षःसंहिता

paraḥsaṁnikarṣaḥsaṁhitā

दो वर्णों के बीच की अधिकतम सन्निकटता (जब वे लगभग जुड़े हुए-से उच्चरित हों) की 'संहिता' संज्ञा होती है — यह सन्धि-सम्बन्धी नियमों की एक आधारभूत परिभाषा है, जो अगले अध्यायों में निरन्तर प्रयुक्त होती है। उदाहरण: वृक्षः, दधिँ।

श्लोक 4.110

विरामोऽवसानम्

virāmo'vasānam

वाक्य अथवा उच्चारण के अन्त में जो पूर्ण विश्राम (मौन) होता है, उसकी 'अवसान' संज्ञा होती है — यह अष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय का समापन-सूत्र है, जो सन्धि-कार्यों की सीमा को चिह्नित करता है। इसी के साथ अध्याय 1, जिसमें माहेश्वर सूत्र तथा 351 पारिभाषिक/कारक-सम्बन्धी सूत्र समाहित हैं, पूर्ण होता है।

द्वितीयोऽध्यायः, प्रथमः पादः

श्लोक 1.1

समर्थः पदविधिः

samarthaḥ padavidhiḥ

समर्थ (परस्पर अन्वित अर्थ वाले) पदों में ही पद-सम्बन्धी विधान होता है। जैसे 'राज्ञः पुरुषः' में राजन् और पुरुष का पारस्परिक अन्वय (सामर्थ्य) है, इसी सामर्थ्य के आधार पर आगे समास आदि पद-कार्य होते हैं।

श्लोक 1.2

सुबामन्त्रिते पराङ्गवत्स्वरे

subāmantrite parāṅgavatsvare

जब स्वर (उदात्तादि स्वर-विधान) का प्रश्न हो, तब आमन्त्रित (सम्बोधन) पद से पूर्व आया हुआ सुबन्त पद उस आमन्त्रित पद के अङ्ग के समान व्यवहृत होता है। जैसे 'कुण्डेन अटन्' में कुण्डेन अपने बाद के आमन्त्रित पद के अङ्गवत् बर्ताव करता है।

श्लोक 1.3

प्राक्कडारात्समासः

prākkaḍārātsamāsaḥ

इस सूत्र से लेकर 'कडारा कर्मधारये' (2.2.38) तक के सभी सूत्र समास (compound) के विधान करने वाले माने जाते हैं — अर्थात् यह एक अधिकार-सूत्र है।

श्लोक 1.4

सह सुपा

saha supā

यहाँ से आगे 'सह' और 'सुपा' दोनों पदों का अधिकार चलता है — अर्थात् आगे के समास-सूत्रों में एक सुबन्त पद का दूसरे सुबन्त पद के साथ ('सह') मेल कराया जाता है। जैसे 'राज्ञः' सुबन्त का 'पुरुषः' सुबन्त के साथ समास होकर 'राजपुरुषः' रूप बनता है।

श्लोक 1.5

अव्ययीभावः

avyayībhāvaḥ

इस सूत्र से लेकर 'तत्पुरुषः' (2.1.22) के ठीक पहले के सूत्र तक अव्ययीभाव समास का अधिकार चलता है — अर्थात् आगे बताए गए सभी समास अव्ययीभाव नामक समास कहलाएँगे।

श्लोक 1.6

अव्ययं विभक्तिसमीपसमृद्धिव्यृद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रतिशब्दप्रादुर्भावपश्चाद्यथानुपूर्व्ययौगपद्यसादृश्यसम्पत्तिसाकल्यान्तवचनेषु

avyayaṁ vibhaktisamīpasamṛddhivyṛddhyarthābhāvātyayāsampratiśabdaprādurbhāvapaścādyathānupūrvyayaugapadyasādṛśyasampattisākalyāntavacaneṣu

विभक्ति (कारक), समीप, समृद्धि, व्यृद्धि, अभाव, अत्यय, असम्प्रति (अनुचित काल), आदुर्भाव (प्रकट होना), पश्चात्, यथा-क्रम (आनुपूर्व्य), यौगपद्य (एक साथ होना), सादृश्य, सम्पत्ति और साकल्य — इन अर्थों में वर्तमान अव्यय शब्द का सुबन्त पद के साथ अव्ययीभाव समास होता है। जैसे 'हरौ अधि' में 'अधि' सप्तमी विभक्ति के अर्थ में सुबन्त 'हरि' के साथ समास पाता है।

श्लोक 1.7

यथाऽसादृश्ये

yathā'sādṛśye

असादृश्य (भेद, विविधता) के अर्थ में वर्तमान 'यथा' अव्यय का सुबन्त पद के साथ अव्ययीभाव समास होता है। जैसे 'ये ये वृद्धाः' के अर्थ में 'यथावृद्धम्' (जैसा-जैसा बड़ा हो वैसे-वैसे) रूप बनता है।

श्लोक 1.8

यावदवधारणे

yāvadavadhāraṇe

अवधारण (सीमा-निश्चय, 'जितना-उतना') के अर्थ में वर्तमान 'यावत्' अव्यय का सुबन्त के साथ अव्ययीभाव समास होता है। जैसे 'यावन्ति अमत्राणि' के स्थान पर 'यावदमत्रम्' (जितने बर्तन हों उतने) रूप बनता है।

श्लोक 1.9

सुप्प्रतिना मात्रार्थे

suppratinā mātrārthe

अल्प-मात्रा ('थोड़ा-सा') के अर्थ में वर्तमान सुबन्त 'प्रति' शब्द का दूसरे सुबन्त के साथ अव्ययीभाव समास होता है। जैसे 'अस्ति अत्र किञ्चित् शाकम्' के स्थान पर 'शाकप्रति' (थोड़ी-सी साग-भाजी) रूप बनता है।

श्लोक 1.10

अक्षशलाकासंख्याः परिणा

akṣaśalākāsaṁkhyāḥ pariṇā

'अक्ष' (पासा), 'शलाका' (सींक) तथा संख्यावाचक शब्दों का 'परि' अव्यय के साथ अव्ययीभाव समास होता है। जैसे 'अक्षेण इदं न तथा वृत्तम् यथा जये' के भाव में 'अक्षपरि' (पासे की गिनती के इर्द-गिर्द) रूप बनता है।

श्लोक 1.11

विभाषा

vibhāṣā

यहाँ से आगे 'विभाषा' (विकल्प, अर्थात् कार्य हो भी सकता है और न भी हो) का अधिकार चलता है। जैसे 'अपत्रिगर्तम्' और 'अपत्रिगर्तेभ्यः' दोनों ही रूप वैकल्पिक रूप से सिद्ध होते हैं।

श्लोक 1.12

अपपरिबहिरञ्चवः पञ्चम्या

apaparibahirañcavaḥ pañcamyā

'अप', 'परि', 'बहिस्' तथा 'अञ्चु' शब्दों का पञ्चम्यन्त (पाँचवीं विभक्ति वाले) शब्द के साथ विकल्प से अव्ययीभाव समास होता है। जैसे 'आपाटलिपुत्रं वृष्टो देवः' के स्थान पर विकल्प से 'आ पाटलिपुत्रात् वृष्टो देवः' भी रहता है।

श्लोक 1.13

आङ्मर्यादाभिविध्योः

āṅmaryādābhividhyoḥ

मर्यादा (सीमा) तथा अभिविधि (व्याप्ति, 'तक फैलना') के अर्थ में वर्तमान 'आङ्' (आ) का पञ्चम्यन्त शब्द के साथ विकल्प से अव्ययीभाव समास होता है। जैसे 'अभि अग्निम् शलभाः पतन्ति' के स्थान पर 'अग्निम् आभि' भाव में समास होता है।

श्लोक 1.14

लक्षणेनाभिप्रती आभिमुख्ये

lakṣaṇenābhipratī ābhimukhye

'अभिमुख्य' (सामने होना, ओर होना) के अर्थ में वर्तमान चिह्नवाचक सुबन्त के साथ 'अभि' और 'प्रति' का विकल्प से अव्ययीभाव समास होता है। जैसे 'वनस्य अनु' के अर्थ में 'अनुवनम्' (वन की ओर) रूप बनता है।

श्लोक 1.15

अनुर्यत्समया

anuryatsamayā

जिस लक्षक (चिह्नरूप) सुबन्त का सामीप्य 'अनु' अव्यय से सूचित हो, उसके साथ 'अनु' का विकल्प से अव्ययीभाव समास होता है। जैसे 'गङ्गायाः अनु' के अर्थ में 'अनुगङ्गम्' (गङ्गा के सहारे-सहारे) रूप बनता है — जैसे वाराणसी गङ्गा-तट के अनुदिशा बसी है।

श्लोक 1.16

यस्य चायामः

yasya cāyāmaḥ

जिसके आयाम (लम्बाई-विस्तार) का द्योतक 'अनु' हो, उस लक्षणवाची सुबन्त के साथ भी 'अनु' का विकल्प से अव्ययीभाव समास होता है। जैसे 'तिष्ठन्ति गावः यस्मिन् काले' के भाव में 'तिष्ठद्गु कालः' (गौओं के खड़े रहने का समय) जैसे प्रयोग बनते हैं।

श्लोक 1.17

तिष्ठद्गुप्रभृतीनि च

tiṣṭhadguprabhṛtīni ca

'तिष्ठद्गु' आदि शब्दों का निपातन (विशेष, नियम-बाह्य सिद्धि) किया जाता है, और ये शब्द अव्ययीभाव-संज्ञक मान लिए जाते हैं। जैसे 'पारेङ्गम्' (गङ्गा के पार) और 'मध्येगङ्गम्' (गङ्गा के बीच) — ये रूप सीधे निपातन से सिद्ध होते हैं।

श्लोक 1.18

पारे मध्ये षष्ठ्या वा

pāre madhye ṣaṣṭhyā vā

षष्ठ्यन्त (छठी विभक्ति वाले) शब्द के साथ 'पारे' और 'मध्ये' शब्दों का विकल्प से अव्ययीभाव समास होता है। जैसे 'गङ्गायाः पारम्' के स्थान पर विकल्प से 'गङ्गापारम्' रूप भी बनता है।

श्लोक 1.19

संख्या वंश्येन

saṁkhyā vaṁśyena

विद्या अथवा जन्म से सम्बन्धित वंश ('कुल-परम्परा') में उत्पन्न पुरुषों के अर्थ में वर्तमान सुबन्त के साथ संख्यावाचक शब्द का विकल्प से अव्ययीभाव समास होता है। जैसे 'सप्तानां गङ्गानां समाहारः' के अर्थ में 'सप्तगङ्गम्' (सात गुरुओं की परम्परा) रूप बनता है।

श्लोक 1.20

नदीभिश्च

nadībhiśca

नदी-विशेषवाचक शब्दों के साथ भी संख्यावाचक शब्द का समास होता है, और वह समास अव्ययीभाव ही संज्ञित होता है। जैसे 'पञ्चानां गङ्गानां समाहारः' के अर्थ में 'पञ्चगङ्गम्' (पाँच गङ्गाओं का समवाय) रूप बनता है।

श्लोक 1.21

अन्यपदार्थे च संज्ञायाम्

anyapadārthe ca saṁjñāyām

अन्यपदार्थ (समास से किसी तीसरी, बाहरी वस्तु का बोध) के गम्यमान होने पर भी, यदि समस्त पद किसी संज्ञा (नाम) का वाचक बन जाए, तो नदीवाचक शब्दों के साथ सुबन्त का विकल्प से अव्ययीभाव समास होता है। जैसे 'पूर्वा च इषुकामशमी च' से 'पूर्वेषुकामशमी' — एक ग्राम-विशेष का नाम — बनता है।

श्लोक 1.22

तत्पुरुषः

tatpuruṣaḥ

इस सूत्र से लेकर 'क्त्वा च' (2.2.22) तक जितने समास बताए जाते हैं, उन सबकी संज्ञा 'तत्पुरुष' होती है। जैसे 'पञ्चराजम्' (पाँच राजाओं का समूह) और 'द्व्यहः' (दो दिन) आदि रूप तत्पुरुष कहलाते हैं।

श्लोक 1.23

द्विगुश्च

dviguśca

'द्विगु' नामक समास भी तत्पुरुष ही संज्ञित होता है। जैसे 'कष्टं श्रितः' से 'कष्टश्रितः', 'अरण्यम् अतीतः' से 'अरण्यातीतः' आदि रूप — ये भी तत्पुरुष के अन्तर्गत ही गिने जाते हैं।

श्लोक 1.24

द्वितीयाश्रितातीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापन्नैः

dvitīyāśritātītapatitagatātyastaprāptāpannaiḥ

द्वितीयान्त (दूसरी विभक्ति वाले) सुबन्त का 'श्रित', 'अतीत', 'पतित', 'गत', 'अत्यस्त' (फेंका हुआ), 'प्राप्त' और 'आपन्न' (पड़ा हुआ) — इन सात शब्दों के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'कृष्णं श्रितः' से 'कृष्णश्रितः' (कृष्ण की शरण में गया हुआ) रूप बनता है।

श्लोक 1.25

स्वयं क्तेन

svayaṁ ktena

'स्वयम्' शब्द का क्त-प्रत्ययान्त शब्द के साथ विकल्प से तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'स्वयं आरूढः' के स्थान पर 'खट्वारूढः' या 'खट्वाप्लुतः' जैसे रूप उदाहृत होते हैं।

श्लोक 1.26

खट्वा क्षेपे

khaṭvā kṣepe

निन्दा (व्यङ्ग्य, ताना) के गम्यमान होने पर द्वितीयान्त 'खट्वा' शब्द का क्त-प्रत्ययान्त शब्द के साथ विकल्प से तत्पुरुष समास होता है। जैसे किसी दुष्ट पुरुष के लिए व्यंग्य में 'खट्वारूढः' कहा जाता है।

श्लोक 1.27

सामि

sāmi

'सामि' (आधा) — इस सुबन्त शब्द का क्त-प्रत्ययान्त शब्द के साथ विकल्प से तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'सामिकृतम्' (आधा किया हुआ), 'सामिपीतम्' (आधा पिया हुआ), 'सामिभुक्तम्' (आधा खाया हुआ)।

श्लोक 1.28

कालाः क्तेन

kālāḥ ktena

कालवाचक द्वितीयान्त शब्दों का क्त-प्रत्ययान्त शब्दों के साथ विकल्प से तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'मुहूर्तं सुखम्' के स्थान पर 'मुहूर्त्तसुखम्' (क्षण-भर का सुख) रूप बनता है।

श्लोक 1.29

अत्यन्तसंयोगे च

atyantasaṁyoge ca

अत्यन्त-संयोग (लगातार, पूरी अवधि तक सम्बद्ध होना) के गम्यमान होने पर भी कालवाचक द्वितीयान्त शब्दों का क्त-प्रत्ययान्त शब्दों के साथ विकल्प से तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'शङ्कुल्या खण्डः' से 'शङ्कुलाखण्डः' (चाकू से किया हुआ टुकड़ा) रूप बनता है।

श्लोक 1.30

तृतीया तत्कृतार्थेन गुणवचनेन

tṛtīyā tatkṛtārthena guṇavacanena

तृतीयान्त सुबन्त का, उसके द्वारा किए गए गुणवाची (विशेषणसूचक) प्रातिपदिक के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'शङ्कुल्या खण्डः' (आरे से किया हुआ टुकड़ा) से 'शङ्कुलाखण्डः' रूप बनता है — यहाँ खण्ड का गुण आरे द्वारा ही उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 1.31

पूर्वसदृशसमोनार्थकलहनिपुणमिश्रश्लक्ष्णैः

pūrvasadṛśasamonārthakalahanipuṇamiśraślakṣṇaiḥ

'पूर्व', 'सदृश', 'सम', 'ऊनार्थक', 'कलह', 'निपुण', 'मिश्र' और 'श्लक्ष्ण' — इन शब्दों के साथ तृतीयान्त पद का विकल्प से तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'मासेन पूर्वः' से 'मासपूर्वः' और 'मात्रा सदृशः' से 'मातृसदृशः' रूप बनते हैं।

श्लोक 1.32

कर्तृकरणे कृता बहुलम्

kartṛkaraṇe kṛtā bahulam

कर्ता और करण, इन दोनों अर्थों में वर्तमान तृतीयान्त सुबन्त का कृदन्त (कृत्-प्रत्ययान्त) शब्द के साथ बहुलता (अनियत रूप से, कभी होकर कभी न होकर) से तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'हरिणा त्रातः' से 'हरित्रातः' (हरि द्वारा रक्षित) रूप बनता है।

श्लोक 1.33

कृत्यैरधिकार्थवचने

kṛtyairadhikārthavacane

अधिकार्थवचन (अतिरिक्तता का बोध) के गम्यमान होने पर, कृत्य-प्रत्ययान्त (करणीय-वाचक) शब्दों के साथ कर्ता तथा करण में विहित तृतीयान्त शब्दों का विकल्प से तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'दध्ना उपसिक्तः ओदनः' से 'दध्योदनः' (दही मिला हुआ भात) रूप बनता है।

श्लोक 1.34

अन्नेन व्यञ्जनम्

annena vyañjanam

व्यञ्जनवाचक (साग-भाजी वाले) तृतीयान्त शब्द का अन्नवाचक सुबन्त के साथ विकल्प से तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'गुडेन मिश्राः धानाः' से 'गुडधानाः' (गुड़ मिली हुई लइया) रूप बनता है।

श्लोक 1.35

भक्ष्येण मिश्रीकरणम्

bhakṣyeṇa miśrīkaraṇam

मिश्रीकरण (मिलाना) के अर्थ में वर्तमान तृतीयान्त पद का भक्ष्यवाचक (खाद्य-वस्तु के) सुबन्त के साथ विकल्प से तत्पुरुष समास होता है। यह पूर्व सूत्र जैसे ही उदाहरणों — 'गुडधानाः', 'गुडपृथुकाः' आदि से स्पष्ट होता है।

श्लोक 1.36

चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः

caturthī tadarthārthabalihitasukharakṣitaiḥ

चतुर्थ्यन्त सुबन्त का 'तदर्थ' (उसके लिए बना हुआ), 'अर्थ', 'बलि', 'हित', 'सुख' और 'रक्षित' — इन छह प्रातिपदिकों के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'यूपाय दारु' से 'यूपदारुः' (यज्ञ-स्तम्भ के लिए काठ) रूप बनता है।

श्लोक 1.37

पञ्चमी भयेन

pañcamī bhayena

पञ्चम्यन्त सुबन्त का 'भय' प्रातिपदिक के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'चोरात् भयम्' से 'चोरभयम्' (चोर से उत्पन्न भय) रूप बनता है।

श्लोक 1.38

अपेतापोढमुक्तपतितापत्रस्तैरल्पशः

apetāpoḍhamuktapatitāpatrastairalpaśaḥ

'अपेत', 'अपोढ', 'मुक्त', 'पतित' तथा 'अपत्रस्त' शब्दों का पञ्चम्यन्त पद के साथ विकल्प से तत्पुरुष समास होता है, अल्प-मात्रा में (यहाँ 'अल्पशः' शब्द अगले सूत्र से मिलकर अर्थ खोलता है)। जैसे 'स्तोकात् मुक्तः' से 'स्तोकान्मुक्तः' रूप बनता है।

श्लोक 1.39

स्तोकान्तिकदूरार्थकृच्छ्राणि क्तेन

stokāntikadūrārthakṛcchrāṇi ktena

'स्तोक' (थोड़ा), 'अन्तिक' (समीप), दूरार्थवाचक तथा 'कृच्छ्र' (कष्ट) — इन चार प्रातिपदिकों के पञ्चम्यन्त सुबन्त का क्त-प्रत्ययान्त शब्द के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'स्तोकात् मुक्तः' से 'स्तोकान्मुक्तः' (थोड़े से ही मुक्त) रूप बनता है।

श्लोक 1.40

सप्तमी शौण्डैः

saptamī śauṇḍaiḥ

सप्तम्यन्त सुबन्त का 'शौण्ड' (निपुण, दक्ष) आदि शब्दों के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'अक्षेषु शौण्डः' से 'अक्षशौण्डः' (पासा खेलने में निपुण) रूप बनता है।

श्लोक 1.41

सिद्धशुष्कपक्वबन्धैश्च

siddhaśuṣkapakvabandhaiśca

'सिद्ध', 'शुष्क', 'पक्व' तथा 'बन्ध' शब्दों के साथ भी सप्तम्यन्त पद का तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'तीर्थे ध्वाङ्क्षः इव' से 'तीर्थध्वाङ्क्षः' (तीर्थ पर मँडराने वाला कौआ, लक्षणा से ढोंगी तीर्थयात्री) रूप बनता है।

श्लोक 1.42

ध्वाङ्क्षेण क्षेपे

dhvāṅkṣeṇa kṣepe

निन्दा के गम्यमान होने पर 'ध्वाङ्क्ष' (कौआ) शब्द के साथ सप्तम्यन्त पद का तत्पुरुष समास होता है — यही 'तीर्थध्वाङ्क्षः' जैसे व्यंग्यात्मक प्रयोगों का आधार है।

श्लोक 1.43

कृत्यैर्ऋणे

kṛtyairṛṇe

ऋण (कर्ज़) के गम्यमान होने पर कृत्य-प्रत्ययान्त शब्दों के साथ सप्तम्यन्त पद का तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'मासे देयम् ऋणम्' से 'मासदेयम् ऋणम्' (महीने भर में चुकाने योग्य ऋण) रूप बनता है।

श्लोक 1.44

संज्ञायाम्

saṁjñāyām

जब समस्त पद द्वारा किसी संज्ञा (विशेष नाम) का बोध होता हो, तब सप्तम्यन्त पद का सुबन्त पद के साथ तत्पुरुष समास नित्य (अनिवार्य रूप से) होता है। जैसे 'पूर्वाह्णे कृतम्' से 'पूर्वाह्णकृतम्' (पूर्वाह्न में किया गया कार्य) रूप बनता है।

श्लोक 1.45

क्तेनाहोरात्रावयवाः

ktenāhorātrāvayavāḥ

दिन ('अहन्') और रात्रि के अवयवों (भागों) के वाचक शब्दों का क्त-प्रत्ययान्त शब्द के साथ तत्पुरुष समास होता है। उदाहरण — 'तत्रभुक्तम्', 'तत्रपीतम्', 'तत्रकृतम्' जैसे रूप।

श्लोक 1.46

तत्र क्तेन

tatra ktena

'तत्र' (वहाँ, उस समय) पद का भी क्त-प्रत्ययान्त शब्द के साथ तत्पुरुष समास होता है — जैसे पूर्वोक्त 'तत्रभुक्तम्' आदि उदाहरणों में देखा जा सकता है।

श्लोक 1.47

क्षेपे

kṣepe

निन्दा के गम्यमान होने पर सप्तम्यन्त पद का क्त-प्रत्ययान्त पद के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'पात्रे समिताः' से 'पात्रेसमिताः' (बर्तन में इकट्ठे किए हुए, ताने के भाव में) रूप बनता है।

श्लोक 1.48

पात्रेसमितादयश्च

pātresamitādayaśca

'पात्रेसमित' आदि शब्दों का समस्त पद निपातन से सिद्ध होता है — जैसे 'स्नातानुभुक्तः' (नहाकर फिर खाया हुआ), 'एकभिक्षा' और 'सर्वमनुष्याः' आदि रूप सीधे निपातन से सिद्ध माने जाते हैं।

श्लोक 1.49

पूर्वकालैकसर्वजरत्पुराणनवकेवलाः समानाधिकरणेन

pūrvakālaikasarvajaratpurāṇanavakevalāḥ samānādhikaraṇena

पूर्वकालवाचक, 'एक', 'सर्व', 'जरत्', 'पुराण', 'नव' तथा 'केवल' शब्दों का समानाधिकरण (एक ही आधार वाले) सुबन्त के साथ तत्पुरुष समास होता है, यदि समस्त पद से किसी संज्ञा का बोध हो। जैसे 'स्नातः च अनुभुक्तः च' से 'स्नातानुभुक्तः' (पहले नहाया, फिर खाया) रूप बनता है।

श्लोक 1.50

दिक्संख्ये संज्ञायाम्

diksaṁkhye saṁjñāyām

संज्ञा के विषय में दिशावाचक और संख्यावाचक सुबन्त का समानाधिकरण सुबन्त के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'पूर्वा च इषुकामशमी च' से 'पूर्वेषुकामशमी' — एक ग्राम-विशेष का नाम — बनता है।

श्लोक 1.51

तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च

taddhitārthottarapadasamāhāre ca

तद्धितार्थ के विषय में, उत्तरपद के परे रहते और समाहार (समूह-बोध) वाच्य होने पर भी दिशावाचक और संख्यावाचक सुबन्त का समानाधिकरण सुबन्त के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'पौर्वशालः' (तद्धितार्थ में) और 'पञ्चगवधनः' (उत्तरपद में) रूप बनते हैं।

श्लोक 1.52

संख्यापूर्वो द्विगुः

saṁkhyāpūrvo dviguḥ

पूर्व सूत्र से विहित संख्यापूर्वक समास की संज्ञा 'द्विगु' होती है। जैसे 'पञ्चानां गवाम् समाहारः' से 'पञ्चगवम्' (पाँच गायों का समूह) रूप बनता है, और यह समास द्विगु कहलाता है।

श्लोक 1.53

कुत्सितानि कुत्सनैः

kutsitāni kutsanaiḥ

कुत्सितवाचक (निन्दनीय वस्तु के) सुबन्त का कुत्सावाचक (निन्दासूचक) सुबन्त के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'पापः च असौ नापितः च' से 'पापनापितः' (नीच नाई) रूप बनता है।

श्लोक 1.54

पापाणके कुत्सितैः

pāpāṇake kutsitaiḥ

'पाप' और 'अणक' शब्दों का कुत्सावाचक सुबन्त के साथ तत्पुरुष समास होता है — जैसे पूर्व सूत्र के 'पापनापितः', 'अणकनापितः' जैसे उदाहरणों में देखा जाता है।

श्लोक 1.55

उपमानानि सामान्यवचनैः

upamānāni sāmānyavacanaiḥ

उपमानवाचक सुबन्त का साधारणधर्मवाचक (गुण-सूचक) सुबन्त के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'घनः इव श्यामः' से 'घनश्यामः' (मेघ के समान श्याम-वर्ण) रूप बनता है।

श्लोक 1.56

उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे

upamitaṁ vyāghrādibhiḥ sāmānyāprayoge

यदि साधारण-धर्मवाचक पद का प्रयोग न हुआ हो, तो उपमेयवाचक सुबन्त पद का 'व्याघ्र' आदि उपमानवाचक सुबन्त के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'पुरुषव्याघ्रः' (बाघ जैसा वीर पुरुष) रूप बनता है।

श्लोक 1.57

विशेषणं विशेष्येण बहुलम्

viśeṣaṇaṁ viśeṣyeṇa bahulam

विशेषणवाची सुबन्त का समानाधिकरण विशेष्यवाची सुबन्त के साथ बहुलता (अनियत रूप) से तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'नीलम् उत्पलम्' से 'नीलोत्पलम्' (नीला कमल) रूप बनता है।

श्लोक 1.58

पूर्वापरप्रथमचरमजघन्यसमानमध्यमध्यमवीराश्च

pūrvāparaprathamacaramajaghanyasamānamadhyamadhyamavīrāśca

'पूर्व', 'अपर', 'प्रथम', 'चरम', 'जघन्य', 'समान', 'मध्य', 'मध्यम' तथा 'वीर' शब्दों का समानाधिकरण सुबन्त के साथ तत्पुरुष समास होता है — जैसे 'श्रेणिकृताः' (पंक्तिबद्ध किए हुए) और 'एककृताः' जैसे रूपों में इसकी झलक मिलती है।

श्लोक 1.59

श्रेण्यादयः कृतादिभिः

śreṇyādayaḥ kṛtādibhiḥ

'श्रेणी' आदि शब्दों (श्रेणी, एक, पूग, कुण्ड, राशि आदि) का समानाधिकरण 'कृत' आदि सुबन्तों के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'कृतं च तत् अकृतं च' से 'कृताकृतम्' (आधा किया, आधा अनकिया) रूप बनता है।

श्लोक 1.60

क्तेन नञ्विशिष्टेनानञ्

ktena nañviśiṣṭenānañ

जिस क्त-प्रत्ययान्त शब्द में मात्र नञ् (निषेधवाचक 'अ/अन्') के अलावा भी कोई और उपसर्ग/विशेषण जुड़ा हो, उससे समानाधिकरण नञ्-रहित क्त-प्रत्ययान्त शब्द का तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'सन् च असौ पुरुषः च' से 'सत्पुरुषः' (सज्जन) रूप बनता है।

श्लोक 1.61

सन्महत्परमोत्तमोत्कृष्टाः पूज्यमानैः

sanmahatparamottamotkṛṣṭāḥ pūjyamānaiḥ

'सत्', 'महत्', 'परम', 'उत्तम' तथा 'उत्कृष्ट' शब्दों का पूज्यमानवाचक (आदरसूचक) पदों के साथ तत्पुरुष समास होता है — जैसे पूर्व सूत्र के 'सत्पुरुषः', 'महापुरुषः', 'परमपुरुषः' जैसे उदाहरणों में देखा जाता है।

श्लोक 1.62

वृन्दारकनागकुञ्जरैः पूज्यमानम्

vṛndārakanāgakuñjaraiḥ pūjyamānam

पूज्यमानवाचक सुबन्त का 'वृन्दारक', 'नाग' तथा 'कुञ्जर' शब्दों के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'गौः च असौ वृन्दारकः च' से 'गोवृन्दारकः', 'गोनागः', 'गोकुञ्जरः' जैसे आदरसूचक रूप बनते हैं।

श्लोक 1.63

कतरकतमौ जातिपरिप्रश्ने

katarakatamau jātiparipraśne

जाति-सम्बन्धी परिप्रश्न (किस्म पूछना) के अर्थ में प्रयुक्त होने वाले 'कतर' तथा 'कतम' शब्दों का सुबन्त के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'कतरः कठः' से 'कतरकठः' (दो 'कठ' शाखियों में से कौन-सा) रूप बनता है।

श्लोक 1.64

किं क्षेपे

kiṁ kṣepe

निन्दा के गम्यमान होने पर 'किम्' शब्द का सुबन्त पद के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'किंसखा यः अभिद्रुह्यति' (वह कैसा मित्र, जो द्रोह करता है) और 'किंराजा यः न रक्षति' (वह कैसा राजा, जो रक्षा न करे) जैसे व्यंग्य-रूप बनते हैं।

श्लोक 1.65

पोटायुवतिस्तोककतिपयगृष्टिधेनुवशावेहद्बष्कयणीप्रवक्तृश्रोत्रियाध्यापकधूर्तैर्जातिः

poṭāyuvatistokakatipayagṛṣṭidhenuvaśāvehadbaṣkayaṇīpravaktṛśrotriyādhyāpakadhūrtairjātiḥ

'पोटा' (नपुंसक अर्थ), 'युवति', 'स्तोक', 'कतिपय', 'गृष्टि', 'धेनु', 'वशा', 'वेहत्', 'बष्कयणी', 'प्रवक्तृ', 'श्रोत्रिय', 'अध्यापक' तथा 'धूर्त' शब्दों के साथ जातिवाचक सुबन्त का तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'इभा च असौ पोटा च' से 'इभपोटा' रूप बनता है।

श्लोक 1.66

प्रशंसावचनैश्च

praśaṁsāvacanaiśca

प्रशंसावाचक (गुणगान करने वाले) सुबन्त के साथ भी जातिवाचक सुबन्त का तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'ब्राह्मणः च असौ तेजस्वी च' से 'ब्राह्मणतेजस्वी' अथवा 'ब्राह्मणशूरः' जैसे रूप बनते हैं।

श्लोक 1.67

युवा खलतिपलितवलिनजरतीभिः

yuvā khalatipalitavalinajaratībhiḥ

समानाधिकरण 'खलति' (गंजा), 'पलित' (पका बाल), 'वलिन' (झुर्रीदार) तथा 'जरती' शब्दों के साथ 'युवन्' शब्द का तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'युवा खलतिः' से 'युवखलतिः' (जवान होते हुए भी गंजा) रूप बनता है।

श्लोक 1.68

कृत्यतुल्याख्या अजात्या

kṛtyatulyākhyā ajātyā

कृत्य-प्रत्ययान्त तथा तुल्यार्थक सुबन्तों का, जातिवाचक से भिन्न समानाधिकरण सुबन्त के साथ, तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'भोज्यं च अदः उष्णं च' से 'भोज्योष्णम्' (खाने योग्य गरम वस्तु) रूप बनता है।

श्लोक 1.69

वर्णो वर्णेन

varṇo varṇena

वर्ण-विशेषवाचक (रंग-सूचक) सुबन्त का वर्णान्तरवाची (दूसरे रंग-सूचक) सुबन्त के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'कृष्णः च असौ सारङ्गः च' से 'कृष्णसारङ्गः' (काला हिरण) रूप बनता है।

श्लोक 1.70

कुमारः श्रमणादिभिः

kumāraḥ śramaṇādibhiḥ

'श्रमणा' आदि शब्दों (स्त्रीलिंग में प्रव्रजिता, कुलटा, गर्भिणी आदि; पुँल्लिंग में अध्यापक, पण्डित आदि) के साथ 'कुमार' शब्द का तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'कुमारी च असौ श्रमणा च' से 'कुमारश्रमणा' (युवा तपस्विनी) रूप बनता है।

श्लोक 1.71

चतुष्पादो गर्भिण्या

catuṣpādo garbhiṇyā

चतुष्पादवाचक (चौपाया-सूचक) सुबन्त का 'गर्भिणी' शब्द के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'गौः च असौ गर्भिणी च' से 'गोगर्भिणी' (गाभिन गाय) रूप बनता है।

श्लोक 1.72

मयूरव्यंसकादयश्च

mayūravyaṁsakādayaśca

'मयूरव्यंसक' आदि पदों का समास-निपातन किया जाता है, और ये भी तत्पुरुष ही कहलाते हैं। जैसे 'मयूरव्यंसकः' और 'छात्रव्यंसकः' — ये रूप सीधे निपातन से, नियमित प्रक्रिया के बिना, सिद्ध मान लिए जाते हैं।

द्वितीयोऽध्यायः, द्वितीयः पादः

श्लोक 2.1

पूर्वापराधरोत्तरमेकदेशिनैकाधिकरणे

pūrvāparādharottaramekadeśinaikādhikaraṇe

'पूर्व' (आगे का), 'अपर' (पीछे का), 'अधर' (नीचे का) तथा 'उत्तर' (ऊपर का) — इन चार प्रातिपदिकों के सुबन्त का, एक ही आधार पर स्थित अवयवी (जिसका वह अंश हो) के सुबन्त के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'पूर्वः कायस्य' से 'पूर्वकायः' (शरीर का अगला भाग) रूप बनता है।

श्लोक 2.2

अर्धं नपुंसकम्

ardhaṁ napuṁsakam

नपुंसकलिङ्ग 'अर्ध' (बराबर भाग) प्रातिपदिक के सुबन्त का, एकत्व-बोधक अवयवीवाचक सुबन्त के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'अर्धं पिप्पल्याः' से 'अर्धपिप्पली' (पीपल का आधा भाग) रूप बनता है।

श्लोक 2.3

द्वितीयतृतीयचतुर्थतुर्याण्यन्यतरस्याम्

dvitīyatṛtīyacaturthaturyāṇyanyatarasyām

'द्वितीय', 'तृतीय', 'चतुर्थ' तथा 'तुर्य' शब्दों का, एकत्व-संख्या-विशिष्ट अवयवी के साथ विकल्प से तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'द्वितीयं भिक्षायाः' से 'द्वितीयभिक्षा' अथवा विकल्प में 'भिक्षाद्वितीयम्' रूप बनते हैं।

श्लोक 2.4

प्राप्तापन्ने च द्वितीयया

prāptāpanne ca dvitīyayā

सुबन्त 'प्राप्त' और 'आपन्न' शब्दों का द्वितीयान्त सुबन्त के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'प्राप्तः जीविकाम्' से 'प्राप्तजीविकः' (जिसे जीविका मिल गई हो) रूप बनता है।

श्लोक 2.5

कालाः परिमाणिना

kālāḥ parimāṇinā

परिमाण-विशिष्ट द्रव्यवाचक सुबन्त के साथ परिमाणवाचक (मापक) कालवाचक शब्दों का तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'मासः जातस्य' से 'मासजातः' (महीने भर का जन्मा हुआ) रूप बनता है।

श्लोक 2.6

नञ्

nañ

निषेधवाचक 'नञ्' (न) का समर्थ सुबन्त के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'न ब्राह्मणः' से 'अब्राह्मणः' (ब्राह्मण से भिन्न) रूप बनता है।

श्लोक 2.7

ईषदकृता

īṣadakṛtā

कृदन्त से भिन्न सुबन्त के साथ 'ईषत्' (कुछ-कुछ, थोड़ा) शब्द का तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'ईषत् च असौ कडारः' से 'ईषत्कडारः' (हल्का भूरा) रूप बनता है।

श्लोक 2.8

षष्ठी

ṣaṣṭhī

षष्ठ्यन्त सुबन्त का सुबन्त के साथ तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'राज्ञः पुरुषः' से 'राजपुरुषः' (राजा का आदमी) रूप बनता है — यह सामान्य नियम है।

श्लोक 2.9

याजकादिभिश्च

yājakādibhiśca

'याजक' आदि शब्दों (पूजक, परिचारक, स्नातक, होतृ आदि) के साथ भी षष्ठ्यन्त का तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'ब्राह्मणस्य याजकः' से 'ब्राह्मणयाजकः' (ब्राह्मण के लिए यज्ञ करने वाला) रूप बनता है।

श्लोक 2.10

न निर्धारणे

na nirdhāraṇe

निर्धारण (किसी समूह में से किसी एक को अलग करके बताना) के अर्थ में विहित षष्ठी से युक्त पद का सुबन्त के साथ समास नहीं होता है। जैसे 'मनुष्याणां क्षत्रियः शूरतमः' में समास नहीं किया जाता।

श्लोक 2.11

पूरणगुणसुहितार्थसदव्ययतव्यसमानाधिकरणेन

pūraṇaguṇasuhitārthasadavyayatavyasamānādhikaraṇena

पूरणार्थ (क्रमसूचक), गुणार्थ, तृप्त्यर्थक, 'सत्' (शतृ/शानच्युक्त), अव्यय, तव्य-प्रत्ययान्त तथा समानाधिकरण शब्दों के साथ षष्ठ्यन्त का समास नहीं होता है। जैसे 'छात्राणां पञ्चमः' (छात्रों में पाँचवाँ) में समास नहीं होता।

श्लोक 2.12

क्तेन च पूजायाम्

ktena ca pūjāyām

आदरसूचक ('मति-बुद्धि' आदि सूत्रों से विहित) क्त-प्रत्ययान्त शब्द के साथ भी षष्ठ्यन्त का तत्पुरुष समास नहीं होता है। जैसे 'राज्ञां मतः' (राजाओं का माना हुआ, आदरार्थ) में समास वर्जित है।

श्लोक 2.13

अधिकरणवाचिना च

adhikaraṇavācinā ca

अधिकरणवाची (स्थानसूचक) क्त-प्रत्ययान्त के साथ भी षष्ठ्यन्त का समास नहीं होता है। जैसे 'इदम् एषां यातम्' (यह इनके जाने का मार्ग) में समास नहीं होता।

श्लोक 2.14

कर्मणि च

karmaṇi ca

'उभयप्राप्तौ कर्मणि' (2.3.66) सूत्र से विहित षष्ठ्यन्त का समर्थ सुबन्त के साथ भी तत्पुरुष समास नहीं होता है। जैसे 'रोचते मे मोदकस्य भोजनं बालेन' में समास नहीं होता।

श्लोक 2.15

तृजकाभ्यां कर्तरि

tṛjakābhyāṁ kartari

कर्तृ-अर्थ में विहित षष्ठ्यन्त शब्द का 'तृच्' तथा 'अक' (ण्वुल्) प्रत्ययान्त शब्दों के साथ तत्पुरुष समास नहीं होता है। जैसे 'पुराम् भेत्ता' (नगरों को तोड़ने वाला) में समास नहीं होता।

श्लोक 2.16

कर्तरि च

kartari ca

कर्तृ-विहित तृजन्त तथा अक-प्रत्ययान्त शब्दों के साथ भी षष्ठ्यन्त का समास नहीं होता है। जैसे 'तव शायिका' (तेरा सोना) और 'मम जागरिका' (मेरा जागना) में समास नहीं होता।

श्लोक 2.17

नित्यं क्रीडाजीविकयोः

nityaṁ krīḍājīvikayoḥ

क्रीड़ा (खेल) तथा जीविका (आजीविका) के अर्थ में विहित अक-प्रत्ययान्त सुबन्त के साथ षष्ठ्यन्त का समास नित्य (अनिवार्य) होता है — पूर्व दो सूत्रों के निषेध का यह अपवाद है। जैसे 'दन्तलेखकः' (जीविका-रूप में दाँत गढ़ने वाला) रूप बनता है।

श्लोक 2.18

कुगतिप्रादयः

kugatiprādayaḥ

'कु' (निन्दार्थक अव्यय), गति-संज्ञक शब्द, तथा 'प्र' आदि उपसर्ग-पद — इनका समर्थ सुबन्त के साथ नित्य तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'कुत्सितः पुरुषः' से 'कुपुरुषः' (बुरा आदमी) रूप बनता है।

श्लोक 2.19

उपपदमतिङ्

upapadamatiṅ

उपपद (साहचर्य-पद) का समर्थ के साथ नित्य समास होता है, और उस समास का उत्तरपद तिङन्त (क्रियापद) नहीं होता, अपितु कृदन्त रहता है। जैसे 'कुम्भं करोति' से 'कुम्भकारः' (घड़ा बनाने वाला) रूप बनता है।

श्लोक 2.20

अमैवाव्ययेन

amaivāvyayena

अव्यय के साथ यदि अतिङन्त (कृदन्त) उपपद का समास हो, तो केवल 'अम्'-अन्त अव्यय के साथ ही होता है। जैसे 'स्वादुङ्कारं भुङ्क्ते' (मीठा बनाकर खाता है) जैसे रूपों में यह देखा जाता है।

श्लोक 2.21

तृतीयाप्रभृतीन्यन्यतरस्याम्

tṛtīyāprabhṛtīnyanyatarasyām

'उपदंशस्तृतीयायाम्' सूत्र से लेकर जितने भी उपपद हैं, उनका समास केवल 'अम्'-अन्त अव्यय के साथ ही विकल्प से होता है। जैसे 'मूलकोपदंशं भुङ्क्ते' के स्थान पर विकल्प से 'मूलकेन उपदंशम्' भी कहा जा सकता है।

श्लोक 2.22

क्त्वा च

ktvā ca

क्त्वा-प्रत्ययान्त (सम्बन्धक-भूतकालिक) शब्द के साथ भी तृतीया-प्रभृति उपपदों का विकल्प से तत्पुरुष समास होता है। जैसे 'उच्चैः कृत्य' के स्थान पर विकल्प से 'उच्चैःकृत्य' रूप भी बनता है।

श्लोक 2.23

शेषो बहुव्रीहिः

śeṣo bahuvrīhiḥ

अव्ययीभाव और तत्पुरुष से भिन्न समास को 'बहुव्रीहि' कहते हैं। इस सूत्र का अधिकार 'तेन सहेति तुल्ययोगे' (2.2.28) तक चलता है।

श्लोक 2.24

अनेकमन्यपदार्थे

anekamanyapadārthe

अन्यपदार्थ (समास से किसी तीसरी, बाहरी वस्तु के बोध) में वर्तमान अनेक समर्थ सुबन्तों का परस्पर समास होता है — यही बहुव्रीहि है। जैसे 'पीताम्बरः' का अभिप्राय पीले वस्त्र से नहीं अपितु 'जिसका वस्त्र पीला है' अर्थात् श्रीकृष्ण से है।

श्लोक 2.25

संख्ययाव्ययासन्नादूराधिकसंख्याः संख्येये

saṁkhyayāvyayāsannādūrādhikasaṁkhyāḥ saṁkhyeye

संख्येयार्थक (गिने जाने योग्य) संख्यावाचक पदों के साथ अव्यय, 'आसन्न' (निकट), 'अदूर' (न-दूर) तथा अधिक-संख्यावाचक शब्दों का बहुव्रीहि समास होता है। जैसे 'उपदशाः' (दस के आस-पास) रूप बनता है।

श्लोक 2.26

दिङ्नामान्यन्तराले

diṅnāmānyantarāle

अन्तराल (दिशाओं का मध्यभाग) के वाच्य होने पर दिग्वाचक सुबन्तों का परस्पर बहुव्रीहि समास होता है। जैसे 'दक्षिणस्याः च पूर्वस्याः च दिशोः यत् अन्तरालम्' से 'दक्षिणपूर्वा' (आग्नेय दिशा) रूप बनता है।

श्लोक 2.27

तत्र तेनेदमिति सरूपे

tatra tenedamiti sarūpe

समान स्वरूप वाले सप्तम्यन्त पदों में, और समान स्वरूप वाले तृतीयान्त पदों में, 'इदम्' के अर्थ में, परस्पर बहुव्रीहि समास होता है। जैसे 'केशाकेशि' (एक-दूसरे के केश पकड़कर हुआ युद्ध) रूप बनता है।

श्लोक 2.28

तेन सहेति तुल्ययोगे

tena saheti tulyayoge

तुल्ययोग (समान संगति) में वर्तमान 'सह' शब्द का तृतीयान्त सुबन्त के साथ बहुव्रीहि समास होता है। जैसे 'सह पुत्रेण' से 'सपुत्रः' (पुत्र सहित) रूप बनता है।

श्लोक 2.29

चार्थे द्वन्द्वः

cārthe dvandvaḥ

'च' (और) के अर्थ में वर्तमान अनेक समर्थ सुबन्तों का परस्पर समास होता है, और यह समास 'द्वन्द्व' कहलाता है। जैसे 'ईश्वरं गुरुं च भजस्व' में 'ईश्वर' और 'गुरु' परस्पर स्वतन्त्र होकर जुड़े हैं — यही समुच्चय-भाव द्वन्द्व का आधार है।

श्लोक 2.30

उपसर्जनं पूर्वम्

upasarjanaṁ pūrvam

समास में उपसर्जन-संज्ञक (गौण) पद का प्रयोग पहले होता है। जैसे 'अधि हरौ' में 'अधि' उपसर्जन है, अतः वह पहले रखा जाकर 'अधिहरि' रूप बनता है।

श्लोक 2.31

राजदन्तादिषु परम्

rājadantādiṣu param

'राजदन्त' आदि गण में पठित शब्दों में उपसर्जन का प्रयोग पर (बाद में) होता है — यह पूर्व सूत्र के नियम का अपवाद है। जैसे 'दन्तानां राजा' से 'दन्तराजः' नहीं अपितु 'राजदन्तः' रूप बनता है।

श्लोक 2.32

द्वन्द्वे घि

dvandve ghi

द्वन्द्व समास में 'घि'-संज्ञक (इकारान्त/उकारान्त ह्रस्व) पद का प्रयोग पहले होता है। जैसे 'हरिः च हरः च' से 'हरिहरौ' (हरि और हर) रूप बनता है।

श्लोक 2.33

अजाद्यदन्तम्

ajādyadantam

द्वन्द्व समास में अजादि (जिसके आदि में स्वर हो) और अकारान्त (जिसके अन्त में अकार हो) पद का प्रयोग पहले होता है। जैसे 'ईशः च कृष्णः च' से 'ईशकृष्णौ' रूप बनता है।

श्लोक 2.34

अल्पाच्तरम्

alpāctaram

द्वन्द्व समास में अल्प अच् (कम स्वर-वर्ण) वाले पद का प्रयोग पहले होता है। जैसे 'शिवः च केशवः च' में 'शिव' के दो अच् और 'केशव' के तीन अच् होने से 'शिवकेशवौ' रूप बनता है।

श्लोक 2.35

सप्तमीविशेषणे बहुव्रीहौ

saptamīviśeṣaṇe bahuvrīhau

बहुव्रीहि समास में सप्तम्यन्त पद, और विशेषणवाचक पद, का प्रयोग पहले होता है। जैसे 'प्राप्तम् उदकं ग्रामम्' से (उपसर्जन-नियम को बाधकर) 'प्राप्तोदकग्रामः' (जहाँ पानी पहुँच चुका है, ऐसा गाँव) रूप बनता है।

श्लोक 2.36

निष्ठा

niṣṭhā

बहुव्रीहि समास में निष्ठान्त (क्त/क्तवतु-प्रत्ययान्त) पद का प्रयोग पहले होता है। जैसे 'युक्तः योगः येन' से 'युक्तयोगः' (जिसका योग सधा हुआ है, अर्थात् योगी) रूप बनता है।

श्लोक 2.37

वाऽऽहिताग्न्यादिषु

vā''hitāgnyādiṣu

'आहिताग्नि' आदि गण में पठित शब्दों के विषय में निष्ठान्त शब्दों का विकल्प से पूर्व-निपात होता है, अन्यथा पक्ष में पर-निपात भी होता है। जैसे 'पुत्रजातः' में 'जात' पर पड़ता है, जबकि 'जातदन्तः' में 'दन्तः' पर पड़ता है।

श्लोक 2.38

कडाराः कर्मधारये

kaḍārāḥ karmadhāraye

'कडार' आदि शब्दों का कर्मधारय समास में विकल्प से पूर्व-प्रयोग होता है। जैसे 'कडारः च असौ जैमिनिः च' से 'कडारजैमिनिः' या विकल्प से 'जैमिनिकडारः' रूप बनता है।

द्वितीयोऽध्यायः, तृतीयः पादः

श्लोक 3.1

अनभिहिते

anabhihite

यहाँ से आगे के सूत्रों में 'अनभिहिते' (जो किसी और प्रत्यय द्वारा पहले से व्यक्त न हो) का अधिकार चलता है — अर्थात् आगे बताई गई विभक्तियाँ तभी होती हैं जब कारक-अर्थ पहले से किसी कृत्, तद्धित या समास आदि से व्यक्त न हो चुका हो।

श्लोक 3.2

कर्मणि द्वितीया

karmaṇi dvitīyā

अनभिहित कर्म (जो कर्म पहले से व्यक्त न हो) में द्वितीया विभक्ति होती है। जैसे 'कटं करोति' (चटाई बनाता है) में 'कट' कर्म-कारक होने से उसमें द्वितीया हुई है।

श्लोक 3.3

तृतीया च होश्छन्दसि

tṛtīyā ca hośchandasi

वेद में 'हु' (हवन करना) धातु के कर्म से तृतीया भी होती है, और द्वितीया भी। जैसे 'यवाग्वा अग्निहोत्रं जुहोति' के स्थान पर 'यवागूम् अग्निहोत्रं जुहोति' भी वेद में मिलता है।

श्लोक 3.4

अन्तरान्तरेण युक्ते

antarāntareṇa yukte

'अन्तरा' तथा 'अन्तरेण' के योग में द्वितीया विभक्ति होती है। जैसे 'त्वां मां च अन्तरा हरिः अस्ति' (तेरे और मेरे बीच हरि है) में द्वितीया हुई है।

श्लोक 3.5

कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे

kālādhvanoratyantasaṁyoge

कालवाचक तथा मार्गवाचक शब्दों से द्वितीया विभक्ति होती है, यदि अत्यन्त-संयोग (लगातार, सम्पूर्ण अवधि/दूरी तक व्याप्ति) की प्रतीति हो। जैसे 'मासम् अधीतः अनुवाकः' (महीने भर अनुवाक पढ़ा) में द्वितीया हुई है।

श्लोक 3.6

अपवर्गे तृतीया

apavarge tṛtīyā

फल-प्राप्ति के साथ क्रिया की समाप्ति (अपवर्ग) के गम्यमान होने पर कालवाचक तथा मार्गवाचक शब्दों से तृतीया विभक्ति होती है। जैसे 'मासेन अनुवाकः अधीतः' (महीने में अनुवाक पढ़ लिया, और याद भी हो गया) में तृतीया हुई है।

श्लोक 3.7

सप्तमीपञ्चम्यौ कारकमध्ये

saptamīpañcamyau kārakamadhye

दो कारकों के मध्य में वर्तमान कालवाचक तथा मार्गवाचक शब्दों से सप्तमी और पञ्चमी विभक्ति होती है। जैसे 'देवदत्तः भुक्त्वा द्व्यहे भोक्ता' (देवदत्त खाकर दो दिन बाद फिर खाएगा) में सप्तमी हुई है।

श्लोक 3.8

कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया

karmapravacanīyayukte dvitīyā

कर्मप्रवचनीय (उपसर्ग-जैसे प्रयुक्त कुछ अव्यय) से युक्त शब्दों से द्वितीया विभक्ति होती है। जैसे 'लक्ष्मणः रामम् अनुगच्छति' (लक्ष्मण राम के पीछे-पीछे चलते हैं) में द्वितीया हुई है।

श्लोक 3.9

यस्मादधिकं यस्य चेश्वरवचनं तत्र सप्तमी

yasmādadhikaṁ yasya ceśvaravacanaṁ tatra saptamī

कर्मप्रवचनीय से युक्त होने पर, जिससे अधिकता और जिसका सामर्थ्य (स्वामित्व) बताया जाए, उससे सप्तमी विभक्ति होती है। जैसे 'उपखार्याम् द्रोणः' (खारी से अधिक द्रोण-परिमाण) में सप्तमी हुई है।

श्लोक 3.10

पञ्चम्यपाङ्परिभिः

pañcamyapāṅparibhiḥ

'अप', 'आङ्' तथा 'परि' — इन तीन कर्मप्रवचनीयों के योग में पञ्चमी विभक्ति होती है। जैसे 'अप त्रिगर्तेभ्यः वृष्टः देवः' (त्रिगर्त देश को छोड़कर बाकी जगह वर्षा हुई) में पञ्चमी हुई है।

श्लोक 3.11

प्रतिनिधिप्रतिदाने च यस्मात्

pratinidhipratidāne ca yasmāt

कर्मप्रवचनीय से युक्त होने पर, जिससे प्रतिनिधित्व अथवा प्रतिदान (बदले में देना) सूचित हो, उससे पञ्चमी विभक्ति होती है। जैसे 'तिलेभ्यः प्रति माषान् अस्मै यच्छति' (तिल के बदले उड़द देता है) में पञ्चमी हुई है।

श्लोक 3.12

गत्यर्थकर्मणि द्वितीयाचतुर्थ्यौ चेष्टायामनध्वनि

gatyarthakarmaṇi dvitīyācaturthyau ceṣṭāyāmanadhvani

गमन-अर्थक (चेष्टारूप) धातुओं के मार्ग-भिन्न कर्मकारक से द्वितीया तथा चतुर्थी विभक्तियाँ होती हैं। जैसे 'ग्रामं व्रजति' के स्थान पर 'ग्रामाय व्रजति' भी कहा जा सकता है (गाँव की ओर जाता है)।

श्लोक 3.13

चतुर्थी सम्प्रदाने

caturthī sampradāne

सम्प्रदान (जिसे कुछ दिया जाए) में चतुर्थी विभक्ति होती है। जैसे 'विप्राय गां ददाति' (ब्राह्मण को गाय देता है) में विप्र के सम्प्रदान-संज्ञक होने से चतुर्थी हुई है।

श्लोक 3.14

क्रियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिनः

kriyārthopapadasya ca karmaṇi sthāninaḥ

जिस अप्रयुज्यमान (सूत्र में साक्षात् अप्रयुक्त) धातु का उपपद किसी दूसरी क्रिया के अर्थ में हो, उसके अनभिहित कर्म से चतुर्थी विभक्ति होती है। जैसे 'एधेभ्यः व्रजति' (ईंधन लेने के लिए जाता है) में चतुर्थी हुई है।

श्लोक 3.15

तुमर्थाच्च भाववचनात्

tumarthācca bhāvavacanāt

तुमुन्-प्रत्यय के अर्थ-समान भाववाचक प्रातिपदिक से चतुर्थी विभक्ति होती है। जैसे 'पाकाय व्रजति' (पकाने के लिए जाता है) और 'सम्पत्तये व्रजति' (सम्पत्ति के लिए जाता है) में चतुर्थी हुई है।

श्लोक 3.16

नमःस्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषड्योगाच्च

namaḥsvastisvāhāsvadhā'laṁvaṣaḍyogācca

'नमः', 'स्वस्ति', 'स्वाहा', 'स्वधा', 'अलम्' (समर्थ, पर्याप्त) तथा 'वषट्' — इन छह अव्ययों के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है। जैसे 'हरये नमः' (हरि को नमस्कार) में चतुर्थी हुई है।

श्लोक 3.17

मन्यकर्मण्यनादरे विभाषाऽप्राणिषु

manyakarmaṇyanādare vibhāṣā'prāṇiṣu

अनादर (उपेक्षा) के गम्यमान होने पर 'मन्' धातु के प्राणि-भिन्न कर्म से विकल्प से चतुर्थी विभक्ति होती है। जैसे 'न त्वा तृणं मन्ये' के स्थान पर 'न त्वा तृणाय मन्ये' (मैं तुझे तिनके-भर भी नहीं गिनता) भी कहा जाता है।

श्लोक 3.18

कर्तृकरणयोस्तृतीया

kartṛkaraṇayostṛtīyā

अनभिहित कर्ता और करण में तृतीया विभक्ति होती है। जैसे 'रामेण बाणेन हतः बाली' (राम द्वारा बाण से मारा गया बालि) में 'राम' कर्ता और 'बाण' करण, दोनों में तृतीया हुई है — क्योंकि यह कर्मवाच्य वाक्य है।

श्लोक 3.19

सहयुक्तेऽप्रधाने

sahayukte'pradhāne

'सह' (साथ) से युक्त अप्रधान (गौण) पद से तृतीया विभक्ति होती है। जैसे 'पुत्रेण सह आगतः पिता' (पुत्र के साथ पिता आया) में 'पुत्र' गौण होकर तृतीया लेता है।

श्लोक 3.20

येनाङ्गविकारः

yenāṅgavikāraḥ

जिस विकृत अङ्ग से (शरीर के भाग से) अङ्गी का विकार लक्षित हो, उससे तृतीया विभक्ति होती है। जैसे 'अक्ष्णा काणः' (आँख से काना) और 'पादेन खञ्जः' (पैर से लंगड़ा) में तृतीया हुई है।

श्लोक 3.21

इत्थम्भूतलक्षणे

itthambhūtalakṣaṇe

जिस चिह्न-विशेष से किसी की तत्कालीन अवस्था लक्षित हो (इत्थम्भूतलक्षण), उससे तृतीया होती है। जैसे 'अपि भवान् कमण्डलुना छात्रम् अद्राक्षीत्' (क्या आपने कमण्डलु लिए हुए छात्र को देखा) में तृतीया हुई है।

श्लोक 3.22

संज्ञोऽन्यतरस्यां कर्मणि

saṁjño'nyatarasyāṁ karmaṇi

'सम्'-पूर्वक 'ज्ञा' धातु के कर्मकारक से, द्वितीया के स्थान पर विकल्प से तृतीया विभक्ति होती है। जैसे 'मात्रा संजानीते बालः' के स्थान पर विकल्प से 'मातरं संजानीते' भी कहा जाता है (बालक माता को पहचानता है)।

श्लोक 3.23

हेतौ

hetau

हेतुवाचक (कारण-सूचक) शब्द से तृतीया विभक्ति होती है। जैसे 'विद्यया' (विद्या के कारण), 'सत्सङ्गेन' (सत्सङ्ग के कारण), 'धनेन' (धन के कारण) में तृतीया हुई है।

श्लोक 3.24

अकर्तर्यृणे पञ्चमी

akartaryṛṇe pañcamī

कर्ता से भिन्न, ऋण-वाचक शब्द से पञ्चमी विभक्ति होती है। जैसे 'शतात् बद्धः' (सौ रुपये के ऋण से बँध गया, अर्थात् नौकर बन गया) में पञ्चमी हुई है।

श्लोक 3.25

विभाषा गुणेऽस्त्रियाम्

vibhāṣā guṇe'striyām

स्त्रीलिङ्ग-भिन्न, गुणवाची हेतु-शब्द से विकल्प से पञ्चमी विभक्ति होती है। जैसे 'जाड्यात् बद्धः' के स्थान पर विकल्प से 'जाड्येन बद्धः' (मूर्खता के कारण बँधा) भी कहा जाता है।

श्लोक 3.26

षष्ठी हेतुप्रयोगे

ṣaṣṭhī hetuprayoge

हेतु-शब्द के प्रत्यक्ष प्रयोग द्वारा हेतु के द्योतित होने पर षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे 'अन्नस्य हेतोः धनिकुले वसति' (अन्न के कारण धनी के घर में रहता है) में 'अन्न' को षष्ठी मिली है।

श्लोक 3.27

सर्वनाम्नस्तृतीया च

sarvanāmnastṛtīyā ca

हेतु-शब्द के प्रयोग द्वारा हेतु के द्योत्य होने पर सर्वनाम-शब्दों से तृतीया तथा षष्ठी, दोनों विभक्तियाँ होती हैं। जैसे 'कस्य हेतोः वसति' के साथ-साथ 'केन हेतुना वसति' भी कहा जाता है (किस कारण से रहता है)।

श्लोक 3.28

अपादाने पञ्चमी

apādāne pañcamī

अपादान-कारक में पञ्चमी विभक्ति होती है। जैसे 'ग्रामात् आयाति' में 'ग्राम' अपादान-संज्ञक होने से पञ्चमी हुई है — जिस स्थिर वस्तु से गति दूर हो, वह अपादान है।

श्लोक 3.29

अन्यारादितरर्तेदिक्शब्दाञ्चूत्तरपदाजाहियुक्ते

anyārāditarartedikśabdāñcūttarapadājāhiyukte

अन्यार्थक, 'आरात्', 'इतर', 'ऋते', दिशावाचक शब्द, अञ्चु-उत्तरपद, 'आच्' तथा 'आहि' — इनके योग में पञ्चमी विभक्ति होती है। जैसे 'देवदत्तात् अन्यः' (देवदत्त से भिन्न) और 'यज्ञदत्तात् ऋते' (यज्ञदत्त के बिना) में पञ्चमी हुई है।

श्लोक 3.30

षष्ठ्यतसर्थप्रत्ययेन

ṣaṣṭhyatasarthapratyayena

'अतसुच्' प्रत्यय तथा उसके अर्थ में विहित प्रत्ययों से युक्त शब्द के साथ षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे 'दक्षिणतः ग्रामस्य' (गाँव के दक्षिण में) और 'उपरि ग्रामस्य' (गाँव के ऊपर) में षष्ठी हुई है।

श्लोक 3.31

एनपा द्वितीया

enapā dvitīyā

एनप्-प्रत्ययान्त शब्द के योग में द्वितीया विभक्ति होती है। जैसे 'दक्षिणेन ग्रामम्' (गाँव से दक्षिण की ओर) में द्वितीया हुई है।

श्लोक 3.32

पृथग्विनानानाभिस्तृतीयान्यतरस्याम्

pṛthagvinānānābhistṛtīyānyatarasyām

'पृथक्', 'विना' तथा 'नाना' — इन शब्दों के योग में तृतीया और पञ्चमी, दोनों विभक्तियाँ विकल्प से होती हैं। जैसे 'पृथक् ग्रामेण' के साथ-साथ 'पृथक् ग्रामात्' (गाँव से अलग) भी कहा जाता है।

श्लोक 3.33

करणे च स्तोकाल्पकृच्छ्रकतिपयस्यासत्त्ववचनस्य

karaṇe ca stokālpakṛcchrakatipayasyāsattvavacanasya

असत्त्ववाची (अमूर्त-भाव के) 'स्तोक', 'अल्प', 'कृच्छ्र' तथा 'कतिपय' शब्दों के योग में करण-अर्थ में षष्ठी और पञ्चमी, दोनों विभक्तियाँ होती हैं। जैसे 'स्तोकेन मुक्तः' के साथ-साथ 'स्तोकात् मुक्तः' (थोड़े से ही मुक्त) भी कहा जाता है।

श्लोक 3.34

दूरान्तिकार्थैः षष्ठ्यन्यतरस्याम्

dūrāntikārthaiḥ ṣaṣṭhyanyatarasyām

दूरार्थक तथा आन्तिकार्थक (समीपार्थक) शब्दों के योग में षष्ठी और पञ्चमी, दोनों विभक्तियाँ विकल्प से होती हैं। जैसे 'ग्रामाद् दूरम्' के साथ-साथ 'ग्रामस्य दूरम्' (गाँव से दूर) भी कहा जाता है।

श्लोक 3.35

दूरान्तिकार्थेभ्यो द्वितीया च

dūrāntikārthebhyo dvitīyā ca

दूरार्थक तथा आन्तिकार्थक शब्दों से द्वितीया, तृतीया और पञ्चमी — तीनों विभक्तियाँ होती हैं। जैसे 'दूरं ग्रामस्य', 'दूरेण ग्रामस्य' तथा 'दूराद् ग्रामस्य' — तीनों रूप वैकल्पिक रूप से सिद्ध होते हैं।

श्लोक 3.36

सप्तम्यधिकरणे च

saptamyadhikaraṇe ca

अधिकरण-कारक में सप्तमी विभक्ति होती है, और दूर-अन्तिक अर्थवाचक शब्दों में भी सप्तमी विकल्प से जुड़ती है। जैसे 'कटे आस्ते' (चटाई पर बैठता है) में 'कट' अधिकरण होने से सप्तमी हुई है।

श्लोक 3.37

यस्य च भावेन भावलक्षणम्

yasya ca bhāvena bhāvalakṣaṇam

जिसकी एक क्रिया से दूसरी क्रिया लक्षित हो, उस क्रियावान् से सप्तमी विभक्ति होती है। जैसे 'गोषु दुह्यमानासु गतः' (गौओं के दुहे जाने के समय गया) में सप्तमी हुई है — दुहने की क्रिया से जाने की क्रिया लक्षित हो रही है।

श्लोक 3.38

षष्ठी चानादरे

ṣaṣṭhī cānādare

किन्तु अनादर (उपेक्षा) के प्रतीत होने पर, जिसकी एक क्रिया से दूसरी क्रिया लक्षित हो, उस क्रियावान् से षष्ठी और सप्तमी, दोनों विभक्तियाँ विकल्प से होती हैं। जैसे 'रुदतः प्राव्राजीत्' के साथ-साथ 'रुदति प्राव्राजीत्' (रोते हुए को छोड़कर संन्यासी बन गया) भी कहा जाता है।

श्लोक 3.39

स्वामीश्वराधिपतिदायादसाक्षिप्रतिभूप्रसूतैश्च

svāmīśvarādhipatidāyādasākṣipratibhūprasūtaiśca

'स्वामिन्', 'ईश्वर', 'अधिपति', 'दायाद', 'साक्षिन्', 'प्रतिभू' तथा 'प्रसूत' — इन शब्दों के योग में षष्ठी और सप्तमी, दोनों विभक्तियाँ विकल्प से होती हैं। जैसे 'गवां स्वामी' के साथ-साथ 'गोषु स्वामी' (गौओं का स्वामी) भी कहा जाता है।

श्लोक 3.40

आयुक्तकुशलाभ्यां चासेवायाम्

āyuktakuśalābhyāṁ cāsevāyām

आसेवा (लगाव, तत्परता) के गम्यमान न होने पर, 'आयुक्त' (नियुक्त) तथा 'कुशल' शब्दों के योग में षष्ठी और सप्तमी, दोनों विभक्तियाँ विकल्प से होती हैं। जैसे 'आयुक्तः कटकरणस्य' के साथ-साथ 'आयुक्तः कटकरणे' (चटाई बनाने में नियुक्त) भी कहा जाता है।

श्लोक 3.41

यतश्च निर्धारणम्

yataśca nirdhāraṇam

जिस समूह में से निर्धारण (किसी एक अंश का पृथक्करण) किया जाए, उससे सप्तमी और षष्ठी, दोनों विभक्तियाँ विकल्प से होती हैं। जैसे 'मनुष्याणां क्षत्रियः शूरतमः' के साथ-साथ 'मनुष्येषु क्षत्रियः शूरतमः' (मनुष्यों में क्षत्रिय सबसे शूर है) भी कहा जाता है।

श्लोक 3.42

पञ्चमी विभक्ते

pañcamī vibhakte

जिस निर्धारणाश्रय (आधार) में स्पष्ट विभाजन (भेद) दिखलाया जाए, उससे पञ्चमी विभक्ति होती है। जैसे 'माथुराः पाटलिपुत्रकेभ्यः सुकुमारतराः' (मथुरा वाले पटना वालों से अधिक सुकुमार हैं) में पञ्चमी हुई है।

श्लोक 3.43

साधुनिपुणाभ्यामर्चायां सप्तम्यप्रतेः

sādhunipuṇābhyāmarcāyāṁ saptamyaprateḥ

अर्चा (पूजा, आदर) के गम्यमान होने पर 'साधु' और 'निपुण' शब्दों के योग में सप्तमी विभक्ति होती है, यदि 'प्रति' शब्द का प्रयोग न हुआ हो। जैसे 'मातरि साधुः' (माता के प्रति भक्त) में सप्तमी हुई है।

श्लोक 3.44

प्रसितोत्सुकाभ्यां तृतीया च

prasitotsukābhyāṁ tṛtīyā ca

'प्रसित' तथा 'उत्सुक' शब्दों के योग में तृतीया और सप्तमी, दोनों विभक्तियाँ विकल्प से होती हैं। जैसे 'केशैः प्रसितः' के साथ-साथ 'केशेषु प्रसितः' (केशों को सँवारने में लगा हुआ) भी कहा जाता है।

श्लोक 3.45

नक्षत्रे च लुपि

nakṣatre ca lupi

लुबन्त (जिस पर प्रत्यय लगकर लुप्त हो गया हो) नक्षत्रवाचक शब्दों से तृतीया और सप्तमी, दोनों विभक्तियाँ विकल्प से होती हैं। जैसे 'पुष्येण पायसम् अश्नीयात्' के साथ-साथ 'पुष्ये पायसम् अश्नीयात्' (पुष्य नक्षत्र में खीर खाए) भी कहा जाता है।

श्लोक 3.46

प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा

prātipadikārthaliṅgaparimāṇavacanamātre prathamā

प्रातिपदिकार्थ-मात्र (केवल जाति/व्यक्ति), लिङ्ग-मात्र, परिमाण-मात्र (माप) तथा वचन-मात्र में प्रथमा विभक्ति होती है। जैसे 'वृक्षः' (लिङ्गमात्र), 'द्रोणः' (परिमाणमात्र) तथा 'एकः, द्वौ' (वचनमात्र) में प्रथमा हुई है।

श्लोक 3.47

सम्बोधने च

sambodhane ca

सम्बोधन (पुकार) के अर्थ में भी प्रथमा विभक्ति होती है। जैसे 'हे राम' में सम्बोधन-अर्थ में 'राम' से प्रथमा विभक्ति हुई है।

श्लोक 3.48

सामन्त्रितम्

sāmantritam

सम्बोधन के लिए विहित प्रथमान्त शब्द-स्वरूप की 'आमन्त्रित' संज्ञा होती है। जैसे 'अग्ने' (हे अग्नि) — यह रूप आमन्त्रित कहलाता है।

श्लोक 3.49

एकवचनं सम्बुद्धिः

ekavacanaṁ sambuddhiḥ

सम्बोधन में प्रथमा के एकवचन की संज्ञा 'सम्बुद्धि' होती है। जैसे 'अग्ने', 'वायो', 'देवदत्त' — ये एकवचन-आमन्त्रित रूप सम्बुद्धि कहलाते हैं।

श्लोक 3.50

षष्ठी शेषे

ṣaṣṭhī śeṣe

प्रातिपदिकार्थ आदि उक्त सम्बन्धों से भिन्न जन्य-जनक आदि अन्य किसी भी शेष सम्बन्ध में षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे 'राज्ञः पुरुषः' (राजा का आदमी) में स्वामी-भृत्य-सम्बन्ध होने से 'राजन्' में षष्ठी हुई है।

श्लोक 3.51

ज्ञोऽविदर्थस्य करणे

jño'vidarthasya karaṇe

अज्ञानार्थक 'ज्ञा' धातु के करण-कारक से षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे 'सर्पिषः जानीते' (घी के बारे में — घी को पहचानने के साधन से — जानता है) में षष्ठी हुई है।

श्लोक 3.52

अधीगर्थदयेशां कर्मणि

adhīgarthadayeśāṁ karmaṇi

स्मरणार्थक 'अधि+इ' (अधीङ्), 'दय्' तथा 'ईश्' धातुओं के कर्मकारक से, शेषत्व की विवक्षा में, षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे 'मातुः अध्येति' (माता का स्मरण करता है) में षष्ठी हुई है।

श्लोक 3.53

कृञः प्रतियत्ने

kṛñaḥ pratiyatne

गुणाधान (गुण-सम्पादन) के प्रतीत होने पर 'कृ' धातु के शेष-रूप में विवक्षित कर्मकारक से षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे 'एधोदकस्य उपस्करोति' (ईंधन और जल के गुण को सुधारता है) में षष्ठी हुई है।

श्लोक 3.54

रुजार्थानां भाववचनानामज्वरेः

rujārthānāṁ bhāvavacanānāmajvareḥ

'ज्वर्' धातु से भिन्न, रोगार्थक भाववाचक (घञ्-आदि प्रत्ययान्त) शब्दों के कर्मकारक से, शेषत्व की विवक्षा में, षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे 'चौरस्य रुजति रोगः' (रोग चोर को कष्ट देता है) में षष्ठी हुई है।

श्लोक 3.55

आशिषि नाथः

āśiṣi nāthaḥ

आशीर्वाद के अर्थ में वर्तमान 'नाथ्' धातु के कर्मकारक से, शेषत्व की विवक्षा में, षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे 'सर्पिषः नाथते' (घी की कामना करता है) में षष्ठी हुई है।

श्लोक 3.56

जासिनिप्रहणनाटक्राथपिषां हिंसायाम्

jāsiniprahaṇanāṭakrāthapiṣāṁ hiṁsāyām

हिंसा (मारना, कष्ट देना) के अर्थ में वर्तमान 'जसि', नि-प्र-पूर्वक 'हन्', 'नाट्', 'क्राथ्' तथा 'पिष्' धातुओं के कर्मकारक से, शेषत्व की विवक्षा में, षष्ठी होती है। जैसे 'चौरस्य उज्जासयति' (चोर को मारता है) में षष्ठी हुई है।

श्लोक 3.57

व्यवहृपणोः समर्थयोः

vyavahṛpaṇoḥ samarthayoḥ

समानार्थक 'वि-अव'-पूर्वक 'हृ' तथा 'पण्' धातुओं के कर्मकारक से, शेषत्व की विवक्षा में, षष्ठी होती है। जैसे 'शतस्य व्यवहरति' (सौ रुपये का व्यवहार करता है) में षष्ठी हुई है।

श्लोक 3.58

दिवस्तदर्थस्य

divastadarthasya

'व्यवहृ' और 'पण्' के समानार्थक 'दिव्' धातु के कर्मकारक से, शेषत्व की विवक्षा में, षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे 'शतस्य दीव्यति' (सौ रुपये पर जुआ खेलता है, अर्थात् व्यवहार करता है) में षष्ठी हुई है।

श्लोक 3.59

विभाषोपसर्गे

vibhāṣopasarge

उपसर्ग-सहित 'दिव्' धातु के कर्म से विकल्प से षष्ठी होती है। जैसे 'शतस्य प्रतिदीव्यति' के साथ-साथ 'शतं प्रतिदीव्यति' (सौ के बदले जुआ खेलता है) भी कहा जाता है।

श्लोक 3.60

द्वितीया ब्राह्मणे

dvitīyā brāhmaṇe

ब्राह्मण-ग्रन्थों (वेद के गद्य-भाग) के विषय में, उपसर्ग-रहित 'दिव्' धातु के कर्मकारक से, शेषत्व की विवक्षा में, द्वितीया विभक्ति होती है। जैसे 'तद् अहः सभायां दीव्येयुः' में द्वितीया हुई है।

श्लोक 3.61

प्रेष्यब्रुवोर्हविषो देवतासम्प्रदाने

preṣyabruvorhaviṣo devatāsampradāne

देवता के सम्प्रदान-संज्ञक होने पर 'प्र+इष्' तथा 'ब्रू' धातुओं के हविर्वाचक कर्म से, शेषत्व की विवक्षा में, षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे 'अग्नये छागस्य हविषः वपायाः प्रेष्य' में षष्ठी हुई है।

श्लोक 3.62

चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि

caturthyarthe bahulaṁ chandasi

वेद में, चतुर्थी के अर्थ में, बाहुल्येन (प्रायः) षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे 'दार्वाघाटः ते वनस्पतीनाम्' में चतुर्थी के स्थान पर षष्ठी का बहुल प्रयोग देखा जाता है।

श्लोक 3.63

यजेश्च करणे

yajeśca karaṇe

वेद में 'यज्' धातु के करण-कारक से षष्ठी होती है। जैसे 'घृतस्य यजते' के साथ-साथ 'घृतेन यजते' (घी से यज्ञ करता है) भी कहा जाता है।

श्लोक 3.64

कृत्वोऽर्थप्रयोगे कालेऽधिकरणे

kṛtvo'rthaprayoge kāle'dhikaraṇe

'कृत्वसुच्' प्रत्यय तथा उसके अर्थ में विहित प्रत्ययों के प्रयोग होने पर, कालवाचक अधिकरण-कारक से षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे 'पञ्चकृत्वः अह्नः भुङ्क्ते' (दिन में पाँच बार खाता है) में षष्ठी हुई है।

श्लोक 3.65

कर्तृकर्मणोः कृति

kartṛkarmaṇoḥ kṛti

कृत्-प्रत्यय के प्रयोग में कर्ता तथा कर्म, दोनों कारकों से षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे कर्तृ में 'भवतः शायिका' (आपका सोना) और कर्म में 'पुराम् भेत्ता' (नगरों को तोड़ने वाला) — दोनों में षष्ठी हुई है।

श्लोक 3.66

उभयप्राप्तौ कर्मणि

ubhayaprāptau karmaṇi

यदि कृत्-प्रत्यय के प्रयोग में कर्ता तथा कर्म, दोनों से षष्ठी की प्राप्ति हो, तो केवल कर्म-कारक से ही षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे 'गवां दोहः अगोपालकेन' में कर्ता और कर्म दोनों सम्भव होने पर भी 'गौ' (कर्म) को ही षष्ठी मिली है।

श्लोक 3.67

क्तस्य च वर्तमाने

ktasya ca vartamāne

वर्तमानकाल में विहित क्त-प्रत्ययान्त शब्द के योग में भी षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे 'राज्ञां मतः' (राजाओं का माना हुआ) में षष्ठी हुई है — यहाँ क्त प्रत्यय भूतकालिक न होकर वर्तमान-सादृश्य में है।

श्लोक 3.68

अधिकरणवाचिनश्च

adhikaraṇavācinaśca

अधिकरण-विहित क्त-प्रत्ययान्त शब्द के योग में भी षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे 'इदम् एषां यातम्' (यह इनके जाने का मार्ग) और 'इदम् एषां भुक्तम्' (यह इनके भोजन का स्थान) में षष्ठी हुई है।

श्लोक 3.69

न लोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतृनाम्

na lokāvyayaniṣṭhākhalarthatṛnām

लकार-स्थानिक आदेश (शतृ/शानच् आदि), अव्यय, निष्ठा-प्रत्यय (क्त/क्तवतु), खल्-अर्थक प्रत्यय तथा तृन्-प्रत्यय के प्रयोग होने पर 'कर्तृकर्मणोः कृति' (2.3.65) से षष्ठी का विधान नहीं होता है। जैसे 'ओदनं पचन्' (भात पकाता हुआ) में षष्ठी नहीं होती, कर्म में द्वितीया ही रहती है।

श्लोक 3.70

अकेनोर्भविष्यदाधमर्ण्ययोः

akenorbhaviṣyadādhamarṇyayoḥ

भविष्यदर्थक 'अक' प्रत्यय तथा भविष्यत् व आधमर्ण्य (ऋणीपन) अर्थ में विहित 'इन्' प्रत्यय के प्रयोग में षष्ठी नहीं होती है। जैसे 'कटं कारकः व्रजति' में षष्ठी न होकर कर्म द्वितीयान्त ही बना रहता है।

श्लोक 3.71

कृत्यानां कर्तरि वा

kṛtyānāṁ kartari vā

कृत्य-प्रत्यय (गेरुण्डिव, करणीय-वाचक) के प्रयोग में कर्ता से विकल्प से षष्ठी होती है, परन्तु कर्म से यह कभी नहीं होती। जैसे 'देवदत्तस्य कर्तव्यः' के साथ-साथ 'देवदत्तेन कर्तव्यः' (देवदत्त द्वारा करने योग्य) भी कहा जाता है।

श्लोक 3.72

तुल्यार्थैरतुलोपमाभ्यां तृतीयान्यतरस्याम्

tulyārthairatulopamābhyāṁ tṛtīyānyatarasyām

'तुला' और 'उपमा' शब्दों को छोड़कर बाकी तुल्यार्थक शब्दों के योग में विकल्प से तृतीया और षष्ठी, दोनों विभक्तियाँ होती हैं। जैसे 'तुल्यः देवदत्तेन' के साथ-साथ 'तुल्यः देवदत्तस्य' (देवदत्त के तुल्य) भी कहा जाता है।

श्लोक 3.73

चतुर्थी चाशिष्यायुष्यमद्रभद्रकुशलसुखार्थहितैः

caturthī cāśiṣyāyuṣyamadrabhadrakuśalasukhārthahitaiḥ

आशीर्वाद के प्रतीत होने पर 'आयुष्य', 'मद्र', 'भद्र', 'कुशल', 'सुख', 'अर्थ' तथा 'हित' शब्दों के योग में चतुर्थी विभक्ति विकल्प से होती है। जैसे 'आयुष्यं देवदत्ताय भूयात्' के साथ-साथ 'आयुष्यं देवदत्तस्य भूयात्' (देवदत्त को दीर्घायु हो) भी कहा जाता है।

द्वितीयोऽध्यायः, चतुर्थः पादः

श्लोक 4.1

द्विगुरेकवचनम्

dvigurekavacanam

समाहार-द्विगु समास एकवचनान्त (एकार्थ-बोधक) होता है। जैसे 'पञ्चगवम्' (पाँच गायों का समूह) समाहार-द्विगु होने से एकवचन में ही प्रयुक्त होता है।

श्लोक 4.2

द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम्

dvandvaśca prāṇitūryasenāṅgānām

प्राणी के अङ्ग (हाथ-पैर आदि), वाद्य के अङ्ग (मृदंग-वंशी आदि) तथा सेना के अङ्ग (रथ-अश्व आदि) — इनका द्वन्द्व समास भी एकवचनान्त होता है। जैसे 'पाणी च पादौ च' से 'पाणिपादम्' (हाथ-पैर) रूप बनता है।

श्लोक 4.3

अनुवादे चरणानाम्

anuvāde caraṇānām

अनुवाद (पहले से ज्ञात बात को दुहराना) के गम्यमान होने पर चरणवाचक (वैदिक शाखा-सूचक) शब्दों में विहित द्वन्द्व समास एकवद्भाव को प्राप्त होता है। जैसे 'उद्गात् कठकालापम्' (कठ और कालाप शाखाओं की उन्नति हुई) में यह देखा जाता है।

श्लोक 4.4

अध्वर्युक्रतुरनपुंसकम्

adhvaryukraturanapuṁsakam

अध्वर्यु द्वारा सम्पन्न किए जाने वाले यज्ञों (क्रतुओं) के वाचक, नपुंसकलिङ्ग-भिन्न शब्दों का द्वन्द्व एकवद्भाव को प्राप्त होता है। जैसे 'अर्कः च अश्वमेधः च' से 'अर्काश्वमेधम्' रूप बनता है।

श्लोक 4.5

अध्ययनतोऽविप्रकृष्टाख्यानाम्

adhyayanato'viprakṛṣṭākhyānām

अध्ययन की दृष्टि में परस्पर समीपस्थ (सटे हुए) पदार्थों के वाचक शब्दों में विहित द्वन्द्व एकवद्भाव को प्राप्त होता है। जैसे 'वैयाकरणनैरुक्तम्' (व्याकरण और निरुक्त शास्त्र, जो पढ़ने में निकट माने जाते हैं) रूप बनता है।

श्लोक 4.6

जातिरप्राणिनाम्

jātiraprāṇinām

अप्राणिवाचक (निर्जीव वस्तुओं के) जातिवाचक शब्दों में विहित द्वन्द्व एकवद्भाव को प्राप्त होता है। जैसे 'आरा च शस्त्री च' से 'आराशस्त्रि' (करौंत और आरी) रूप बनता है।

श्लोक 4.7

विशिष्टलिङ्गो नदीदेशोऽग्रामाः

viśiṣṭaliṅgo nadīdeśo'grāmāḥ

भिन्न-भिन्न लिङ्ग वाले नदीवाचक शब्दों का, तथा ग्राम-भिन्न देशवाचक शब्दों का, द्वन्द्व समास एकवद्भाव को प्राप्त होता है। जैसे 'उद्ध्यः च इरावती च' से 'उद्ध्येरावति' रूप बनता है।

श्लोक 4.8

क्षुद्रजन्तवः

kṣudrajantavaḥ

क्षुद्र (छोटे) जन्तुओं के वाचक शब्दों का द्वन्द्व एकवद्भाव को प्राप्त होता है। जैसे 'यूका च लिक्षा च' से 'यूकालिक्षम्' (जूँ और लीख) रूप बनता है।

श्लोक 4.9

येषां च विरोधः शाश्वतिकः

yeṣāṁ ca virodhaḥ śāśvatikaḥ

जिन पदार्थों में नित्य (सदा बना रहने वाला) विरोध हो, उन वाचक शब्दों का द्वन्द्व भी एकवद्भाव को प्राप्त होता है। जैसे 'मार्जारः च मूषकः च' से 'मार्जारमूषकम्' (बिल्ली और चूहा, जिनका बैर सदा बना रहता है) रूप बनता है।

श्लोक 4.10

शूद्राणामनिरवसितानाम्

śūdrāṇāmaniravasitānām

जिनके भोजन-पात्र आदि का संस्कार आवश्यक न हो (अनिरवसित), ऐसे शूद्र-जातिवाचक शब्दों का द्वन्द्व एकवद्भाव को प्राप्त होता है। जैसे 'तक्षा च अयस्कारः च' से 'तक्षायस्कारम्' (बढ़ई और लोहार) रूप बनता है।

श्लोक 4.11

गवाश्वप्रभृतीनि च

gavāśvaprabhṛtīni ca

'गवाश्व' आदि शब्दों का समास (एकवद्भाव सहित) साधु (शुद्ध, निपातन-सिद्ध) माना जाता है। जैसे 'गौः च अश्वः च' से 'गवाश्वम्' (गाय और घोड़ा) रूप बनता है।

श्लोक 4.12

विभाषा वृक्षमृगतृणधान्यव्यञ्जनपशुशकुन्यश्ववडवपूर्वापराधरोत्तराणाम्

vibhāṣā vṛkṣamṛgatṛṇadhānyavyañjanapaśuśakunyaśvavaḍavapūrvāparādharottarāṇām

वृक्ष, मृग, तृण, धान्य, व्यञ्जन, पशु, शकुनि, अश्व-वडवा तथा पूर्वापर-अधरोत्तरवाचक शब्दों का द्वन्द्व विकल्प से एकवद्भाव को प्राप्त होता है। जैसे 'प्लक्षः च न्यग्रोधः च' से विकल्प से 'प्लक्षन्यग्रोधम्' अथवा 'प्लक्षन्यग्रोधाः' रूप बनते हैं।

श्लोक 4.13

विप्रतिषिद्धं चानधिकरणवाचि

vipratiṣiddhaṁ cānadhikaraṇavāci

अधिकरण-वाचक से भिन्न, परस्पर विरुद्धार्थ बतलाने वाले शब्दों का द्वन्द्व भी विकल्प से एकवद्भाव को प्राप्त होता है। जैसे 'शीतम् च उष्णम् च' से विकल्प से 'शीतोष्णम्' अथवा 'शीतोष्णे' रूप बनते हैं।

श्लोक 4.14

न दधिपय आदीनि

na dadhipaya ādīni

'दधि', 'पयस्' आदि शब्दों में विहित द्वन्द्व एकवद्भाव को प्राप्त नहीं होता, यद्यपि ये व्यञ्जनवाची होने से पूर्व सूत्रों से एकवद्भाव के अधिकारी प्रतीत होते हैं। जैसे 'दधि च पयः च' से 'दधिपयसी' (दही और दूध) रूप ही रहता है, एकवचन नहीं होता।

श्लोक 4.15

अधिकरणैतावत्त्वे च

adhikaraṇaitāvattve ca

अधिकरण (स्थान/द्रव्य) के परिमाण-मात्र (इयत्ता) के वाचक शब्दों में विहित द्वन्द्व भी एकवद्भाव को प्राप्त नहीं होता। जैसे 'उपदशं दन्तोष्ठम्' (लगभग दस दाँत और होंठ) में द्वन्द्व एकवचन नहीं बनता, बहुवचन में 'उपदशाः दन्तोष्ठाः' ही रहता है।

श्लोक 4.16

विभाषा समीपे

vibhāṣā samīpe

अधिकरण की इयत्ता के समीप्य-मात्र के अभिधान में विकल्प से एकवद्भाव होता है। जैसे 'पञ्चगवम्' और 'दशगवम्' के साथ-साथ द्वन्द्व में 'पाणिपादम्' अथवा 'शिरोग्रीवम्' रूप भी विकल्प से बनते हैं।

श्लोक 4.17

स नपुंसकम्

sa napuṁsakam

इस एकवचन-प्रकरण में जिसका एकवद्भाव होता है, वह नपुंसकलिङ्ग होता है — चाहे वह समाहार-द्विगु हो या द्वन्द्व। जैसे 'पञ्चगव' समाहार-द्विगु होने पर नपुंसक में 'पञ्चगवम्' रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.18

अव्ययीभावश्च

avyayībhāvaśca

अव्ययीभाव समास भी नपुंसकलिङ्ग होता है। जैसे 'अधि हरौ' से 'अधिहरि' रूप में अव्ययीभाव होने के कारण नपुंसकलिङ्ग हुआ है (और आगे ह्रस्व होकर 'अधिगोप' जैसे रूप बनते हैं)।

श्लोक 4.19

तत्पुरुषोऽनञ्कर्मधारयः

tatpuruṣo'nañkarmadhārayaḥ

नञ्-समास तथा कर्मधारय को छोड़कर शेष सभी तत्पुरुष समास नपुंसकलिङ्ग होते हैं (यह भी विकल्प से, अधिकार-सूत्र के रूप में आगे चलता है)। जैसे 'ब्राह्मणसेनम्' के साथ-साथ स्त्रीलिङ्ग में 'ब्राह्मणसेना' भी कहा जाता है।

श्लोक 4.20

संज्ञायां कन्थोशीनरेषु

saṁjñāyāṁ kanthośīnareṣu

संज्ञा के विषय में, यदि 'कन्था' शब्द उशीनर देश से सम्बन्धित हो, तो कन्था-शब्दान्त तत्पुरुष नपुंसकलिङ्ग होता है। जैसे 'सौशामिकन्थम्' (सौशामि लोगों की बस्ती) रूप बनता है।

श्लोक 4.21

उपज्ञोपक्रमं तदाद्याचिख्यासायाम्

upajñopakramaṁ tadādyācikhyāsāyām

उपज्ञान्त तथा उपक्रमान्त तत्पुरुष नपुंसकलिङ्ग होते हैं, यदि उपज्ञेय अथवा उपक्रम्य के प्रथम कर्ता के अभिधान की इच्छा हो। जैसे 'पाणिन्युपज्ञम् व्याकरणम्' (पाणिनि की उपज्ञा से रचित व्याकरण) रूप बनता है।

श्लोक 4.22

छाया बाहुल्ये

chāyā bāhulye

बाहुल्य (प्रचुरता) के अर्थ में 'छाया'-शब्दान्त तत्पुरुष नपुंसकलिङ्ग होता है। जैसे 'शलभच्छायम्' (टिड्डियों की भरमार, जो छाया जैसी घनी हो) रूप बनता है।

श्लोक 4.23

सभा राजामनुष्यपूर्वा

sabhā rājāmanuṣyapūrvā

राज-पर्यायवाची शब्द-पूर्वक अथवा अमनुष्य-पूर्वक 'सभा'-शब्दान्त तत्पुरुष नपुंसकलिङ्ग होता है। जैसे 'इनसभम्' (राजा की सभा) और 'रक्षःसभम्' (राक्षसों की सभा) रूप बनते हैं।

श्लोक 4.24

अशाला च

aśālā ca

शालार्थ (भवन-अर्थ) से भिन्न 'सभा'-शब्दान्त तत्पुरुष भी नपुंसकलिङ्ग होता है। जैसे 'स्त्रीसभम्' (स्त्रियों का जमघट, भवन-अर्थ के बिना) रूप बनता है।

श्लोक 4.25

विभाषा सेनासुराच्छायाशालानिशानाम्

vibhāṣā senāsurācchāyāśālāniśānām

'सेना', 'सुरा', 'छाया', 'शाला' तथा 'निशा' शब्दान्त तत्पुरुष विकल्प से नपुंसकलिङ्ग होते हैं। जैसे 'ब्राह्मणसेनम्' के साथ-साथ 'ब्राह्मणसेना' भी कहा जाता है।

श्लोक 4.26

परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः

paravalliṅgaṁ dvandvatatpuruṣayoḥ

समाहार से भिन्न द्वन्द्व और तत्पुरुष में लिङ्ग उत्तरपद के समान होता है। जैसे 'कुक्कुटः च मयूरी च' से 'कुक्कुटमयूर्यौ' रूप बनता है — यहाँ उत्तरपद 'मयूरी' स्त्रीलिङ्ग में होने से समस्त पद भी स्त्रीलिङ्ग हुआ है।

श्लोक 4.27

पूर्ववदश्ववडवौ

pūrvavadaśvavaḍavau

एकवद्भाव से भिन्न स्थल में 'अश्ववडव' का द्वन्द्व, पहले (उत्तरपद के नहीं, पूर्व-पद के अनुसार) के शब्द के लिङ्ग का अनुसरण करता है। जैसे 'अश्वः च वडवा च' से 'अश्ववडवा' रूप बनता है।

श्लोक 4.28

हेमन्तशिशिरावहोरात्रे च च्छन्दसि

hemantaśiśirāvahorātre ca cchandasi

वेद में, 'हेमन्त' तथा 'शिशिर' के द्वन्द्व का, और 'अहन्' तथा 'रात्रि' के द्वन्द्व का, लिङ्ग पूर्व-पद के अनुसार होता है। जैसे 'हेमन्तशिशिरौ ऋतू' और 'अहोरात्रे ऊर्ध्वष्ठीवे' जैसे रूपों में यह देखा जाता है।

श्लोक 4.29

रात्राह्नाहाः पुंसि

rātrāhnāhāḥ puṁsi

यदि द्वन्द्व अथवा तत्पुरुष के अन्त में 'रात्र', 'अहन्' अथवा 'अह' शब्द हो, तो वे सदा पुंल्लिङ्ग में ही होते हैं। जैसे 'अहोरात्र' के अन्त में 'रात्र' होने से पुंल्लिङ्ग एकवचन में 'अहोरात्रः' रूप बनता है।

श्लोक 4.30

अपथं नपुंसकम्

apathaṁ napuṁsakam

'अपथ' शब्द नित्य नपुंसकलिङ्ग होता है। जैसे 'अपथम् इदम्' (यह कुमार्ग है) में नपुंसकलिङ्ग प्रयोग देखा जाता है।

श्लोक 4.31

अर्धर्चाः पुंसि च

ardharcāḥ puṁsi ca

'अर्धर्च' (आधी ऋचा) आदि शब्द पुंल्लिङ्ग तथा नपुंसकलिङ्ग, दोनों में प्रयुक्त होते हैं। जैसे 'अर्धम् ऋचः' से बने 'अर्धर्च' शब्द का पुंल्लिङ्ग में 'अर्धर्चः' तथा नपुंसकलिङ्ग में 'अर्धर्चम्' — दोनों रूप बनते हैं।

श्लोक 4.32

इदमोऽन्वादेशेऽशनुदात्तस्तृतीयादौ

idamo'nvādeśe'śanudāttastṛtīyādau

तृतीयादि विभक्तियों के परे रहते, अन्वादेश (पहले कही बात को फिर से कहना) में वर्तमान 'इदम्' शब्द के स्थान पर अनुदात्त 'अश्' आदेश होता है। जैसे 'अस्मै छात्राय कम्बलं देहि, अथो अस्मै शाटकम् अपि देहि' में यह आदेश देखा जाता है।

श्लोक 4.33

एतदस्त्रतसोस्त्रतसौ चानुदात्तौ

etadastratasostratasau cānudāttau

'त्र' और 'तस्' प्रत्ययों के परे रहते, अन्वादेश में वर्तमान 'एतत्' शब्द के स्थान पर अनुदात्त 'अत्र' और 'अतस्' आदेश होते हैं। जैसे 'एतस्मिन् ग्रामे वसामः, अथो अत्र युक्ताः अधीमहे' में यह आदेश देखा जाता है।

श्लोक 4.34

द्वितीयाटौस्स्वेनः

dvitīyāṭaussvenaḥ

द्वितीया विभक्ति तथा 'टा' और 'ओस्' प्रत्ययों के परे रहते (अन्वादेश में) 'एतत्'/'इदम्' के स्थान पर 'एन' आदेश होता है। जैसे 'इमं छात्रं छन्दः अध्यापय, अथो एनं व्याकरणम् अपि अध्यापय' में यह आदेश देखा जाता है।

श्लोक 4.35

आर्धधातुके

ārdhadhātuke

यहाँ से आगे 'आर्धधातुक' (जो प्रत्यय सार्वधातुक न हों) प्रत्ययों के परे रहते होने वाले कार्यों का अधिकार चलता है — यह एक अधिकार-सूत्र है, जो आगे के अनेक धातु-आदेश सूत्रों पर लागू होता है।

श्लोक 4.36

अदो जग्धिर्ल्यप्ति किति

ado jagdhirlyapti kiti

ल्यप् प्रत्यय, तथा तकारादि किद्-प्रत्यय के परे रहते, 'अद्' (खाना) धातु को 'जग्धि' आदेश होता है। जैसे 'अद्+क्त' से 'जग्धः' (खाया हुआ) रूप बनता है।

श्लोक 4.37

लुङ्सनोर्घसॢ्

luṅsanorghasḷ्

लुङ् तथा सन् प्रत्यय परे होने पर 'अद्' धातु के स्थान पर 'घस्ऌ' आदेश होता है। जैसे लुङ् लकार के प्रथमपुरुष एकवचन में यह आदेश होकर, आगे प्रक्रिया द्वारा 'अघसत्' रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.38

घञपोश्च

ghañapośca

घञ् तथा अप् प्रत्ययों के परे रहते भी 'अद्' धातु के स्थान पर 'घस्ऌ' आदेश होता है। जैसे 'अद्+घञ्' से 'घासः' और 'प्र+अद्+अप्' से 'प्रघसः' रूप बनते हैं।

श्लोक 4.39

बहुलं छन्दसि

bahulaṁ chandasi

वेद में बहुलता (अनियत प्रयोग) से 'अद्' के स्थान पर 'घस्ऌ' आदेश होता है, अर्थात् यह नियम वेद में और भी व्यापक रूप से, तथा कभी अपवाद-सहित, लागू होता है। उदाहरण — 'घासम् अग्ने' आदि।

श्लोक 4.40

लिट्यन्यतरस्याम्

liṭyanyatarasyām

लिट् लकार परे होने पर 'अद्' धातु के स्थान पर विकल्प से 'घस्ऌ' आदेश होता है। जैसे विकल्प से 'जघास' (घस्ऌ-आदेश से) तथा 'आद' (मूल अद् से) — दोनों रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 4.41

वेञो वयिः

veño vayiḥ

लिट् परे रहते 'वेञ्' (बुनना) धातु के स्थान पर विकल्प से 'वयि' आदेश होता है। जैसे 'उवाय' के साथ-साथ 'ववौ' जैसे रूप भी सिद्ध होते हैं।

श्लोक 4.42

हनो वध लिङि

hano vadha liṅi

आर्धधातुक लिङ् परे होने पर 'हन्' धातु के स्थान पर 'वध' आदेश होता है। जैसे लिङ् (आशीर्लिङ्) में यह आदेश होकर आगे 'वध्यात्' रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.43

लुङि च

luṅi ca

लुङ् परे होने पर भी 'हन्' धातु के स्थान पर 'वध' आदेश होता है। जैसे लुङ् में यह आदेश होकर आगे 'अवधीत्' रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.44

आत्मनेपदेष्वन्यतरस्याम्

ātmanepadeṣvanyatarasyām

आत्मनेपद में, लुङ् परे रहते, 'हन्' धातु को विकल्प से 'वध' आदेश होता है। जैसे 'आवधिष्ट' के साथ-साथ 'आहत' (मूल हन् से) भी सिद्ध होता है।

श्लोक 4.45

इणो गा लुङि

iṇo gā luṅi

लुङ् परे रहते 'इण्' (जाना) धातु के स्थान पर 'गा' आदेश होता है। जैसे लुङ् के प्रथमपुरुष एकवचन में यह आदेश होकर आगे 'अगात्' रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.46

णौ गमिरबोधने

ṇau gamirabodhane

अवबोधन (समझना) से भिन्न अर्थ में, णिच् प्रत्यय परे रहते, 'इण्' धातु के स्थान पर 'गम्' आदेश होता है। जैसे 'गमि+णिच्' से 'गमयति' रूप बनता है।

श्लोक 4.47

सनि च

sani ca

सन् प्रत्यय परे रहते भी अवबोधन-भिन्न अर्थ में 'इण्' धातु के स्थान पर 'गम्' आदेश होता है। जैसे 'जिगमिषति' (जाना चाहता है) रूप बनता है।

श्लोक 4.48

इङश्च

iṅaśca

सन् प्रत्यय परे रहते 'इङ्' (पढ़ना, अध्ययन करना) धातु के स्थान पर भी 'गम्' आदेश होता है। जैसे 'अधिजिगांसते' (पढ़ना चाहता है) रूप बनता है।

श्लोक 4.49

गाङ् लिटि

gāṅ liṭi

लिट् परे होने पर 'इङ्' धातु के स्थान पर 'गाङ्' आदेश होता है। जैसे लिट् लकार में यह आदेश होकर आगे 'अधिजगे' रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.50

विभाषा लुङ्लृङोः

vibhāṣā luṅlṛṅoḥ

लुङ् और लृङ् लकार परे होने पर 'इङ्' धातु के स्थान पर विकल्प से 'गाङ्' आदेश होता है। जैसे 'अध्यगीष्यत' जैसे रूप में यह आदेश देखा जाता है।

श्लोक 4.51

णौ च सन्श्चङोः

ṇau ca sanścaṅoḥ

सन्-प्रत्ययान्त तथा चङ्-प्रत्ययान्त णिच् के परे रहते 'इङ्' धातु के स्थान पर विकल्प से 'गाङ्' आदेश होता है। जैसे 'अधिजिगापयिषति' के साथ-साथ 'अध्यापिपयिषति' भी बनता है।

श्लोक 4.52

अस्तेर्भूः

asterbhūḥ

आर्धधातुक प्रत्यय परे रहते 'अस्' (होना) धातु के स्थान पर 'भू' आदेश होता है। जैसे लिट् में यह आदेश होकर 'बभूव' रूप सिद्ध होता है, और 'भवितुम्' जैसे रूप भी इसी से बनते हैं।

श्लोक 4.53

ब्रुवो वचिः

bruvo vaciḥ

आर्धधातुक प्रत्यय परे रहते 'ब्रू' (बोलना) धातु के स्थान पर 'वचि' आदेश होता है। जैसे यह आदेश होकर आगे 'उवाच' और 'वक्तुम्' रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 4.54

चक्षिङः ख्याञ्

cakṣiṅaḥ khyāñ

आर्धधातुक प्रत्यय परे रहते 'चक्षिङ्' (कहना, दिखाना) धातु के स्थान पर 'ख्याञ्' आदेश होता है। जैसे 'चक्ष्+तुम्' से 'ख्यातुम्' रूप बनता है।

श्लोक 4.55

वा लिटि

vā liṭi

लिट् परे रहते 'चक्षिङ्' धातु के स्थान पर विकल्प से 'ख्याञ्' आदेश होता है। जैसे 'आचख्यौ' के साथ-साथ 'आचचक्षे' (आदेश के बिना) भी सिद्ध होता है।

श्लोक 4.56

अजेर्व्यघञपोः

ajervyaghañapoḥ

घञ् तथा अप् से भिन्न आर्धधातुक प्रत्ययों के परे रहते 'अज्' (फेंकना/चलना) धातु के स्थान पर 'वी' आदेश होता है। जैसे 'अज्+तुम्' से 'वेतुम्' रूप बनता है।

श्लोक 4.57

वा यौ

vā yau

ल्युट् प्रत्यय परे रहते 'अज्' धातु के स्थान पर विकल्प से 'वी' आदेश होता है। जैसे 'वायुः' जैसा रूप इसी आदेश से सिद्ध होता है।

श्लोक 4.58

ण्यक्षत्रियार्षाञितो यूनि लुगणिञोः

ṇyakṣatriyārṣāñito yūni lugaṇiñoḥ

गोत्रार्थक ण्य-प्रत्ययान्त, क्षत्रिय-वाची-गोत्र-प्रत्ययान्त, ऋषिवाची-गोत्र-प्रत्ययान्त तथा ञित्-गोत्र-प्रत्ययान्त शब्दों से, युवा-सन्तति के अर्थ में विहित 'अण्' तथा 'इञ्' प्रत्ययों का लोप होता है। जैसे 'कौरव्यः पिता, कौरव्यः पुत्रः' (पिता और पुत्र दोनों एक ही रूप में) देखा जाता है।

श्लोक 4.59

पैलादिभ्यश्च

pailādibhyaśca

'पैल' आदि शब्दों से भी युवा-सन्तति में विहित प्रत्यय का लोप होता है। जैसे 'पैलः पिता, पैलः पुत्रः' — दोनों में एक ही रूप बना रहता है।

श्लोक 4.60

इञः प्राचाम्

iñaḥ prācām

प्राच्य (पूर्वी) आचार्यों के मत से, गोत्रार्थक 'इञ्' प्रत्ययान्त शब्दों से भी युवा-सन्तति में विहित प्रत्यय का लोप होता है। जैसे 'पन्नागारिः पिता, पन्नागारिः पुत्रः' रूप बनता है।

श्लोक 4.61

न तौल्वलिभ्यः

na taulvalibhyaḥ

'तौल्वलि' आदि शब्दों से युवा-सन्तति में विहित प्रत्यय का लोप नहीं होता है। जैसे 'तौल्वलिः पिता' रहते हुए भी पुत्र के लिए भिन्न रूप 'तौल्वलायनः पुत्रः' प्रयुक्त होता है।

श्लोक 4.62

तद्राजस्य बहुषु तेनैवास्त्रियाम्

tadrājasya bahuṣu tenaivāstriyām

स्त्रीलिङ्ग को छोड़कर, बहुवचन के अर्थ में, 'तद्राज' प्रत्यय (जो राजा से जन-वाचक शब्द बनाता है) का लोप होता है। जैसे 'ऐक्ष्वाकव' (इक्ष्वाकु के अपत्य/राज्यवासी) में बहुवचन की विवक्षा में अञ् प्रत्यय का लोप हो जाता है।

श्लोक 4.63

यस्कादिभ्यो गोत्रे

yaskādibhyo gotre

'यास्क' आदि शब्दों से, गोत्र-अर्थ में, बहुवचन में विहित प्रत्यय का लोप होता है, बशर्ते यह बहुवचन उसी गोत्र-प्रत्यय से जन्य हो। जैसे 'यास्काः' (एकवचन-बहुवचन दोनों एक ही रूप में) प्रयुक्त होता है।

श्लोक 4.64

यञञोश्च

yañañośca

स्त्रीलिङ्ग से भिन्न लिङ्ग में, गोत्र-अर्थ में वर्तमान 'यञ्' तथा 'अञ्' प्रत्ययान्त शब्दों का बहुवचन में लोप होता है। जैसे 'गार्ग्य' (यञ्-प्रत्ययान्त) से बहुवचन में यञ् का लोप होकर 'गार्ग' रूप बनता है।

श्लोक 4.65

अत्रिभृगुकुत्सवसिष्ठगोतमाङ्गिरोभ्यश्च

atribhṛgukutsavasiṣṭhagotamāṅgirobhyaśca

'अत्रि', 'भृगु', 'कुत्स', 'वसिष्ठ', 'गोतम' तथा 'अङ्गिरस्' शब्दों से भी, तत्कृत बहुत्व-अर्थक गोत्रापत्य में विहित प्रत्यय का लोप होता है। जैसे 'अत्रयः' (अत्रि के वंशज, बहुवचन) रूप बनता है।

श्लोक 4.66

बह्वचः इञः प्राच्यभरतेषु

bahvacaḥ iñaḥ prācyabharateṣu

बहु-अच् (अनेक स्वर वाले) शब्दों से, प्राच्य तथा भरत गोत्रों में विहित 'इञ्' प्रत्यय का, तत्कृत बहुत्व-अर्थ में, लोप होता है। जैसे 'पन्नागाराः' (पन्नागार के अनेक वंशज) रूप बनता है।

श्लोक 4.67

न गोपवनादिभ्यः

na gopavanādibhyaḥ

'गोपवन' आदि शब्दों से यह प्रत्यय-लोप नहीं होता है। जैसे 'गौपवनाः' (लोप के बिना ही) रूप बनता है।

श्लोक 4.68

तिककितवादिभ्यो द्वन्द्वे

tikakitavādibhyo dvandve

'तिक' तथा 'कितव' आदि शब्दों से, द्वन्द्व समास में, तत्कृत बहुत्व-अर्थक गोत्रापत्य प्रत्यय का लोप होता है। जैसे 'तैकायनयः च कैतवायनयः च' से 'तिककितवाः' रूप बनता है।

श्लोक 4.69

उपकादिभ्योऽन्यतरस्यामद्वन्द्वे

upakādibhyo'nyatarasyāmadvandve

'उपक' आदि शब्दों से विकल्प से यह प्रत्यय-लोप होता है, द्वन्द्व-भिन्न समास में भी। जैसे 'उपकमलकाः' — यहाँ द्वन्द्वेतर स्थिति में भी विकल्प से लोप देखा जाता है।

श्लोक 4.70

आगस्त्यकौण्डिन्ययोरगस्तिकुण्डिनच्

āgastyakauṇḍinyayoragastikuṇḍinac

'अगस्त्य' तथा 'कौण्डिन्य' शब्दों से विहित अण् तथा यञ् प्रत्ययों का लोप होकर, शेष प्रकृति को क्रमशः 'अगस्ति' तथा 'कुण्डिनच्' आदेश होता है। जैसे 'अगस्तयः' तथा 'कुण्डिनाः' रूप बनते हैं।

श्लोक 4.71

सुपो धातुप्रातिपदिकयोः

supo dhātuprātipadikayoḥ

धातु तथा प्रातिपदिक के अवयवभूत सुप् (सु, औ, जस् आदि इक्कीस विभक्ति-प्रत्ययों में से किसी) का लोप होता है — जब वह धातु या प्रातिपदिक अन्य किसी शब्द के अंग के रूप में जुड़ा हो। जैसे 'पुत्र-अम्-य' में 'अम्' सुप् का लोप होकर 'पुत्रय' रूप बनता है।

श्लोक 4.72

अदिप्रभृतिभ्यः शपः

adiprabhṛtibhyaḥ śapaḥ

'अद्' (खाना) आदि धातुओं से परे 'शप्' प्रत्यय का लुक् (लोप) होता है। जैसे 'अद्+ति' में सार्वधातुक तिप् परे रहते शप् प्राप्त होकर भी, 'अद्' के बाद होने से उसका लोप हो जाता है, और 'अत्ति' रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.73

बहुलं छन्दसि

bahulaṁ chandasi

वेद में बहुलता से (अनियत रूप से, और अन्य गणों की धातुओं से भी) शप् का लोप होता है। जैसे 'हनति वृत्रम्' और 'त्रायध्वम् नः देवाः' जैसे वैदिक रूपों में यह देखा जाता है।

श्लोक 4.74

यङोऽचि च

yaṅo'ci ca

अच्-प्रत्यय (स्वरादि प्रत्यय) परे रहते 'यङ्' प्रत्यय का लोप होता है, भले ही यह सामान्यतः अच् न परे होने पर भी लागू है। जैसे 'भू' धातु से यङ्-प्रत्यय होकर उसका लोप होने पर 'बोभूति' जैसे रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 4.75

जुहोत्यादिभ्यः श्लुः

juhotyādibhyaḥ śluḥ

'हु' (देना/चढ़ाना) आदि (जुहोत्यादि-गण की) धातुओं से परे शप् का 'श्लु' (विशेष प्रकार का लोप, जिसमें द्वित्व शेष रहता है) होता है। जैसे 'हु+ति' से 'जुहोति' रूप बनता है, न कि शप्-सहित लम्बा रूप।

श्लोक 4.76

बहुलं छन्दसि

bahulaṁ chandasi

वेद में शप् का श्लु बहुलता से (अनियत रूप से) होता है। उदाहरण — 'दाति प्रियाणि', 'धाति प्रियाणि', 'पूर्णां विवष्टि' जैसे वैदिक रूप।

श्लोक 4.77

गातिस्थाघुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु

gātisthāghupābhūbhyaḥ sicaḥ parasmaipadeṣu

'गा', 'स्था', 'घु' (दा/धा), 'पा' तथा 'भू' धातुओं से परे, परस्मैपद में, सिच् प्रत्यय का लुक् होता है। जैसे 'अभूत्' रूप में भू धातु से परे सिच् का लोप होकर यह रूप सिद्ध हुआ है।

श्लोक 4.78

विभाषा घ्राधेट्शाच्छासः

vibhāṣā ghrādheṭśācchāsaḥ

परस्मैपद परे होने पर 'घ्रा' (सूँघना), 'धेट्' (पीना), 'शा' (पतला करना), 'छा' (काटना) तथा 'सा' (नाश करना) धातुओं से परे सिच् का विकल्प से लोप होता है। जैसे विकल्प से 'अशात्' और 'अशासीत्' — दोनों रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 4.79

तनादिभ्यस्तथासोः

tanādibhyastathāsoḥ

'तनादि' गण की धातुओं से परे, 'त' तथा 'थास्' प्रत्यय परे रहते, सिच् का विकल्प से लोप होता है। जैसे 'अतत' के साथ-साथ 'अतनिष्ट' भी सिद्ध होता है।

श्लोक 4.80

मन्त्रे घसह्वरणशवृदहादृवृजिकृगमिजनिभ्यो लेः

mantre ghasahvaraṇaśavṛdahādṛvṛjikṛgamijanibhyo leḥ

मन्त्र (वैदिक स्तोत्र) के विषय में 'घस्', 'ह्वृ', 'नश्', 'वृ', 'दह्', 'दा' (ऋकारान्त-ग्रहण), 'वृज्', 'कृ', 'गम्' तथा 'जन्' धातुओं से परे 'च्लि' का लोप होता है। जैसे 'अक्षन् पितरः' जैसे वैदिक रूपों में यह देखा जाता है।

श्लोक 4.81

आमः

āmaḥ

आम्-प्रत्यय से परे लकार का लुक् (लोप) होता है। जैसे 'गोपायाम्' (गोपाय+आम्) में आम् से परे शेष लकार-अंश का लोप होकर यह रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.82

अव्ययादाप्सुपः

avyayādāpsupaḥ

अव्यय से विहित आप् (टाप्/डाप् आदि स्त्री-प्रत्यय) तथा सुप् (सु/औ/जस् आदि इक्कीस विभक्ति) प्रत्ययों का लोप होता है। जैसे 'तत्र' शब्द अव्यय होने से उस पर लगने वाले टाप् और विभक्ति प्रत्ययों का लोप हो जाता है, और 'तत्र' रूप ही बना रहता है।

श्लोक 4.83

नाव्ययीभावादतोऽम्त्वपञ्चम्याः

nāvyayībhāvādato'mtvapañcamyāḥ

अकारान्त अव्ययीभाव के बाद सुप् का लोप नहीं होता, किन्तु पञ्चमी को छोड़कर शेष विभक्तियों के स्थान पर 'अम्' आदेश होता है। जैसे 'अधिगोप' से 'अधिगोपम्' रूप बनता है, पञ्चमी को छोड़कर।

श्लोक 4.84

तृतीयासप्तम्योर्बहुलम्

tṛtīyāsaptamyorbahulam

अकारान्त अव्ययीभाव के बाद, तृतीया ('टा') और सप्तमी ('ङि') के स्थान पर बहुलता से 'अम्' आदेश होता है। जैसे 'उपकुम्भेन कृतम्' के साथ-साथ 'उपकुम्भं कृतम्' भी कहा जाता है।

श्लोक 4.85

लुटः प्रथमस्य डारौरसः

luṭaḥ prathamasya ḍāraurasaḥ

लुट् लकार के प्रथमपुरुष तिप्/तस्/झि के स्थान पर क्रमशः 'डा', 'रौ' तथा 'रस्' आदेश होते हैं। जैसे 'भवितास्+ति' में तिप् के स्थान पर डा-आदेश होकर आगे 'भविता' रूप सिद्ध होता है।

तृतीयोऽध्यायः, प्रथमः पादः

श्लोक 1.1

प्रत्ययः

pratyayaḥ

यह अधिकार-सूत्र है। इससे आगे पंचम अध्याय के अन्त तक जो भी विधान किया जाएगा, वह 'प्रत्यय' संज्ञा से जाना जाएगा।

श्लोक 1.2

परश्च

paraśca

प्रत्यय सदैव प्रकृति (धातु अथवा प्रातिपदिक) के बाद ही जुड़ता है। यह भी आगे के सभी प्रत्यय-सूत्रों पर लागू होने वाला अधिकार-सूत्र है।

श्लोक 1.3

आद्युदात्तश्च

ādyudāttaśca

जब तक अन्यत्र विशेष स्वर-विधान न हो, प्रत्यय का प्रथम स्वर उदात्त (उच्च स्वर) होता है।

श्लोक 1.4

अनुदात्तौ सुप्पितौ

anudāttau suppitau

उपर्युक्त सामान्य नियम का अपवाद: सुप् (सुबन्त विभक्ति-प्रत्यय) तथा पित् (जिनमें इत्संज्ञक 'प्' हो, ऐसे) प्रत्यय अनुदात्त (निम्न स्वर वाले) होते हैं।

श्लोक 1.5

गुप्तिज्किद्भ्यः सन्

guptijkidbhyaḥ san

गुप् (रक्षा करना), तिज् (तीक्ष्ण होना) तथा कित्-संज्ञक धातुओं से सन् (इच्छार्थक) प्रत्यय होता है; इनके साथ सन् रूढ़िगत विशिष्ट अर्थ देता है — जुगुप्सा (घृणा), तितिक्षा (सहनशीलता) — न कि केवल शाब्दिक इच्छा।

श्लोक 1.6

मान्बधदान्शान्भ्यो दीर्घश्च अभ्यासस्य

mānbadhadānśānbhyo dīrghaśca abhyāsasya

मान् (जिज्ञासा), बध् (निन्दा/वैरूप्य), दान् (सरलता) और शान् (चिह्न बनाना) — इन अर्थों में इन धातुओं से सन् होने पर अभ्यास का इकार दीर्घ भी होता है (मीमांसते, बीभत्सते, दीदांसते, शीशंसते); अन्य अर्थों में इन्हीं धातुओं से सामान्य णिजन्त रूप (मानयति आदि) बनते हैं।

श्लोक 1.7

धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा

dhātoḥ karmaṇaḥ samānakartṛkādicchāyāṁ vā

यदि इच्छा करने वाला और धातु के कर्म का कर्ता एक ही व्यक्ति हो, तो इच्छा के अर्थ में धातु के बाद विकल्प से सन् प्रत्यय होता है।

श्लोक 1.8

सुपः आत्मनः क्यच्

supaḥ ātmanaḥ kyac

यदि इच्छा का सुबन्त कर्म स्वयं कर्ता से सम्बन्धित हो, तो उस सुबन्त के बाद विकल्प से क्यच् प्रत्यय होता है (पुत्रीयति = अपने पुत्र को चाहता है)।

श्लोक 1.9

काम्यच् च

kāmyac ca

उसी प्रकार, स्व-सम्बन्धी इच्छा के सुबन्त कर्म के बाद विकल्प से काम्यच् प्रत्यय भी होता है (पुत्रकाम्यति)।

श्लोक 1.10

उपमानात् आचारे

upamānāt ācāre

आचरण (किसी के समान बर्ताव करना) के अर्थ में उपमानवाची सुबन्त कर्म के बाद विकल्प से क्यच् प्रत्यय होता है (पुत्रीयति = पुत्र के समान बर्ताव करता है)।

श्लोक 1.11

कर्तुः क्यङ् सलोपश्च

kartuḥ kyaṅ salopaśca

उपमानभूत कर्ता-कारकस्थानीय सुबन्त से आचार अर्थ में विकल्प से क्यङ् प्रत्यय होता है, और अन्त्य सकार का लोप भी हो जाता है (श्येनायते = बाज जैसा आचरण करता है)।

श्लोक 1.12

भृशादिभ्यो भुवि अच्वेर्लोपश्च हलः

bhṛśādibhyo bhuvi acverlopaśca halaḥ

च्वि-प्रत्ययान्त को छोड़कर भृश आदि शब्दों से 'होना' अर्थ में क्यङ् प्रत्यय होता है, और अन्त्य व्यञ्जन का लोप भी होता है (भृशायते = अधिक हो जाता है)।

श्लोक 1.13

लोहितादिडाच्भ्यः क्यष्

lohitādiḍācbhyaḥ kyaṣ

लोहित आदि शब्दों तथा डाच्-प्रत्ययान्त (ध्वन्यात्मक द्वित्व) शब्दों से 'होना/वैसी ध्वनि करना' अर्थ में क्यष् प्रत्यय होता है (लोहितायति = लाल हो जाता है, पटपटायति = 'पट-पट' शब्द करता है)।

श्लोक 1.14

कष्टाय क्रमणे

kaṣṭāya kramaṇe

उत्साहपूर्वक आगे बढ़ने के अर्थ में चतुर्थी-विभक्त 'कष्ट' शब्द के बाद विशेष रूप से क्यङ् का निपातन होता है (कष्टायते = कष्ट सहने को उद्यत होता है)।

श्लोक 1.15

कर्मणो रोमन्थतपोभ्यां वर्तिचरोः

karmaṇo romanthatapobhyāṁ varticaroḥ

कर्मरूप रोमन्थ (जुगाली) तथा तपस् शब्दों से क्रमशः 'वर्तन करना' और 'आचरण करना' अर्थ में क्यङ् प्रत्यय होता है (रोमन्थायते = जुगाली करता है, तपस्यति = तप करता है)।

श्लोक 1.16

बाष्पोष्माभ्यामुद्वमने

bāṣpoṣmābhyāmudvamane

कर्मरूप बाष्प (भाप/आँसू) तथा ऊष्मन् शब्दों से उगलने के अर्थ में क्यङ् प्रत्यय होता है (बाष्पायते = भाप छोड़ता है)।

श्लोक 1.17

शब्दवैरकलहाभ्रकण्वमेघेभ्यः करणे

śabdavairakalahābhrakaṇvameghebhyaḥ karaṇe

'करना' के अर्थ में कर्मरूप शब्द, वैर, कलह, अभ्र, कण्व और मेघ — इन छह शब्दों से क्यङ् प्रत्यय होता है (शब्दायते = शोर करता है)।

श्लोक 1.18

सुखादिभ्यः कर्तृवेदनायाम्

sukhādibhyaḥ kartṛvedanāyām

कर्ता द्वारा स्वयं अनुभव किए जाने के अर्थ में कर्मरूप सुख आदि शब्दों से क्यङ् प्रत्यय होता है (सुखायते = सुख का अनुभव करता है)।

श्लोक 1.19

नमोवरिवश्चित्रङः क्यच्

namovarivaścitraṅaḥ kyac

नमस्, वरिवस् तथा चित्रङ् शब्दों से 'करना' अर्थ में विकल्प से क्यच् प्रत्यय होता है (नमस्यति = नमस्कार करता है, चित्रीयते = आश्चर्य करता है)।

श्लोक 1.20

पुच्छभाण्डचीवरात् णिङ्

pucchabhāṇḍacīvarāt ṇiṅ

पुच्छ, भाण्ड और चीवर शब्दों से करण के अर्थ में णिङ् प्रत्यय होता है, जिससे सदैव आत्मनेपद रूप बनता है (सञ्चीवरयते = वस्त्र धारण करता है)।

श्लोक 1.21

मुण्डमिश्रश्लक्ष्णलवणव्रतवस्त्रहलकलकृततूस्तेभ्यो णिच्

muṇḍamiśraślakṣṇalavaṇavratavastrahalakalakṛtatūstebhyo ṇic

मुण्ड, मिश्र, श्लक्ष्ण, लवण, व्रत, वस्त्र, हल, कल, कृत और तूस्त — इन दस शब्दों से करण अर्थ में णिच् प्रत्यय होता है (मुण्डयति = मूंड देता है)।

श्लोक 1.22

धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ्

dhātorekāco halādeḥ kriyāsamabhihāre yaṅ

जिस धातु में केवल एक ही स्वर हो और जो व्यञ्जन से आरम्भ होती हो, उससे क्रिया की बार-बार पुनरावृत्ति या तीव्रता के अर्थ में विकल्प से यङ् प्रत्यय होता है (भू से बोभूयते = बार-बार होता है)।

श्लोक 1.23

नित्यं कौटिल्ये गतौ

nityaṁ kauṭilye gatau

कुटिलतापूर्वक गति के अर्थ में गत्यर्थक हलादि-एकाच् धातु से यङ् प्रत्यय अनिवार्य रूप से होता है (वाव्रज्यते = टेढ़े-मेढ़े चलता है)।

श्लोक 1.24

लुपसदचरजपजभदहदंशगृभ्यो भावगर्हायाम्

lupasadacarajapajabhadahadaṁśagṛbhyo bhāvagarhāyām

लुप्, सद्, चर्, जप्, जभ्, दह्, दंश् और गृ धातुओं से क्रिया की निन्दा के अर्थ में यङ् प्रत्यय होता है (लोलुप्यते = निन्दनीय ढंग से उचकता है)।

श्लोक 1.25

सत्यापपाशरूपवीणातूलश्लोकसेनालोमत्वग्वर्मवर्णचूर्णचुरादिभ्यो णिच्

satyāpapāśarūpavīṇātūlaślokasenālomatvagvarmavarṇacūrṇacurādibhyo ṇic

सत्याप्, पाश, रूप, वीणा, तूल, श्लोक, सेना, लोमन्, त्वच्, वर्मन्, वर्ण, चूर्ण तथा चुरादिगण की धातुओं से (किसी भी अन्य प्रत्यय से पहले) णिच् प्रत्यय अनिवार्यतः होता है (चोरयति = चुराता है)।

श्लोक 1.26

हेतुमति च

hetumati ca

प्रेरणा (किसी और से कार्य करवाना) के अर्थ में भी धातु के बाद णिच् प्रत्यय होता है (भावयति = करवाता है)।

श्लोक 1.27

कण्ड्वादिभ्यो यक्

kaṇḍvādibhyo yak

कण्डू (खुजलाना) आदि गणपाठ-पठित धातुओं से यक् प्रत्यय होता है (कण्डूयति/कण्डूयते = खुजलाता है)।

श्लोक 1.28

गुपूधूपविच्छिपणिपनिभ्य आयः

gupūdhūpavicchipaṇipanibhya āyaḥ

गुप्, धूप्, विच्छि, पणि और पनि धातुओं से स्वार्थ में (अर्थ बदले बिना) आय प्रत्यय होता है (गोपायति = रक्षा करता है)।

श्लोक 1.29

ऋतेरीयङ्

ṛterīyaṅ

घृणा के अर्थ वाली 'ऋ' धातु से ईयङ् प्रत्यय होता है (ऋतीयते = घृणा करता है)।

श्लोक 1.30

कमेर्णिङ्

kamerṇiṅ

कम् (चाहना) धातु से स्वार्थ में णिङ् प्रत्यय होता है (कामयते = चाहता है)।

श्लोक 1.31

आयादय आर्धधातुके वा

āyādaya ārdhadhātuke vā

आर्धधातुक प्रत्यय परे होने पर धातु से आय, ईयङ् और णिङ् — इनमें से कोई भी प्रत्यय विकल्प से होता है (जैसे गुप् से गोपायति/जुगुप्सते)।

श्लोक 1.32

सनाद्यन्ता धातवः

sanādyantā dhātavaḥ

सन् से लेकर णिङ् पर्यन्त बारह प्रत्ययों (सन्, क्यच्, क्यङ्, काम्यच्, क्यष्, क्विप्, णिङ्, णिच्, यङ्, यक्, आय, ईयङ्) से युक्त शब्द-रूप की भी 'धातु' संज्ञा होती है, जिससे उन पर आगे के सभी धात्वधिकार-विहित कार्य लागू होते हैं।

श्लोक 1.33

स्यतासी लृलुटोः

syatāsī lṛluṭoḥ

लृट् (सामान्य भविष्यत्) परे होने पर धातु से स्य प्रत्यय और लुट् (अनद्यतन भविष्यत्) परे होने पर तासि प्रत्यय होता है (तासि में इकार इत्संज्ञक है, अतः केवल तास् शेष रहता है)।

श्लोक 1.34

सिब्बहुलं लेटि

sibbahulaṁ leṭi

लेट् लकार (वैदिक प्रयोग की एक विशेष विध्यर्थक लकार) परे होने पर धातु से बहुलता से (अनियमित रूप से) सिप् प्रत्यय होता है।

श्लोक 1.35

कास्प्रत्ययादाममन्त्रे लिटि

kāspratyayādāmamantre liṭi

मन्त्र-भाग को छोड़कर अन्यत्र, कास् धातु तथा सन्नन्तादि प्रत्ययान्त धातुओं से लिट् परे रहते आम् प्रत्यय होता है (कासाञ्चक्रे = वह खाँसा, लोलूयाञ्चक्रे = बार-बार काटा)।

श्लोक 1.36

इजादेर्गुरुमतोऽनृच्छः

ijādergurumato'nṛcchaḥ

ऋच्छ् धातु को छोड़कर, गुरु (दीर्घ अथवा संयुक्त-व्यञ्जन-युक्त) स्वर वाले तथा इक्-वर्ण (इ, उ, ऋ आदि) से आरम्भ होने वाले धातुओं से भी लिट् परे रहते आम् प्रत्यय होता है (एधाम् चक्रे)।

श्लोक 1.37

दयायासश्च

dayāyāsaśca

लिट् परे रहते दय् (देना/रक्षा करना), अय् (जाना) और आस् (बैठना) धातुओं से भी आम् प्रत्यय होता है (अयाञ्चक्रे)।

श्लोक 1.38

उषविदजागृभ्योऽन्यतरस्याम्

uṣavidajāgṛbhyo'nyatarasyām

लिट् परे रहते उष् (जलाना), विद् (जानना) और जागृ (जागना) धातुओं से विकल्प से आम् प्रत्यय होता है (विदाञ्चकार/विविद)।

श्लोक 1.39

भीह्रीभृहुवां श्लुवच्च

bhīhrībhṛhuvāṁ śluvacca

लिट् परे रहते भी (डरना), ह्री (लजाना), भृ (पालना) और हु (हवन करना) धातुओं से विकल्प से आम् प्रत्यय होता है, और आम् होने पर द्वित्व श्लु (लोपाभाव) की भाँति होता है (जुहवाम् चक्रे)।

श्लोक 1.40

कृञ्चानुप्रयुज्यते लिटि

kṛñcānuprayujyate liṭi

लिट् परे रहते आम्-प्रत्ययान्त धातु के बाद कृ, भू अथवा अस् धातु का अनुप्रयोग (सहायक क्रिया के रूप में प्रयोग) होता है (गोपायाम्चकार)।

श्लोक 1.41

विदां कुर्वन्त्वित्यन्यतरस्याम्

vidāṁ kurvantvityanyatarasyām

लोट् लकार परे रहते विद् धातु से विकल्प से आम् प्रत्यय, लोट् का लुक् (लोप) तथा कृ धातु का अनुप्रयोग होता है (विदां कुर्वन्तु)।

श्लोक 1.42

अभ्युत्सादयामकः प्रजनयामकः चिकयामकः रमयामकः पावयांक्रियात् विदामक्रन्निति छन्दसि

abhyutsādayāmakaḥ prajanayāmakaḥ cikayāmakaḥ ramayāmakaḥ pāvayāṁkriyāt vidāmakranniti chandasi

वेद में अभ्युत्सादयामकः, प्रजनयामकः, चिकयामकः, रमयामकः, पावयांक्रियात् तथा विदामक्रन् — इन विशिष्ट आम्-प्रत्ययान्त रूपों का निपातन होता है, जो सामान्य नियम से नहीं बनते।

श्लोक 1.43

च्लि लुङि

cli luṅi

लुङ् (सामान्य भूत) लकार परे रहते धातु से 'च्लि' नामक आदेश-स्थान होता है, जो शप्, श्यन्, श आदि विकरणों का बाधक है।

श्लोक 1.44

च्लेः सिच्

cleḥ sic

च्लि के स्थान पर (साधारणतः) सिच् आदेश होता है।

श्लोक 1.45

शलः इगुपधादनिटः क्सः

śalaḥ igupadhādaniṭaḥ ksaḥ

श, ष, स अथवा ह-अन्त, इक्-उपधा (इ/उ/ऋ/ऌ ठीक अन्त्य व्यञ्जन से पहले) वाले तथा अनिट् (इट्-रहित) धातु से च्लि के स्थान पर क्स आदेश होता है (दुह् से अधुक्षत्)।

श्लोक 1.46

श्लिषः आलिङ्गने

śliṣaḥ āliṅgane

आलिङ्गन (गले लगाना) अर्थ में श्लिष् धातु से भी च्लि के स्थान पर क्स आदेश होता है (आश्लिक्षत्)।

श्लोक 1.47

न दृशः

na dṛśaḥ

दृश् (देखना) धातु से च्लि को क्स आदेश नहीं होता (इसके बदले अद्राक्षीत् जैसा रूप अन्य नियम से बनता है)।

श्लोक 1.48

णिश्रिद्रुस्रुभ्यः कर्तरि चङ्

ṇiśridrusrubhyaḥ kartari caṅ

कर्तृवाच्य लुङ् परे रहते णिजन्त (जिसमें णिच्/णिङ् प्रत्यय हो), श्रि (आश्रय लेना), द्रु (दौड़ना) और स्रु (बहना) धातुओं से च्लि के स्थान पर चङ् (द्वित्वयुक्त) आदेश होता है।

श्लोक 1.49

विभाषा धेट्श्व्योः

vibhāṣā dheṭśvyoḥ

धेट् (पान करना) तथा श्वि (बढ़ना) धातुओं से विकल्प से चङ् आदेश होता है (अदधत्/अधात्/अधासीत्)।

श्लोक 1.50

गुपेश्छन्दसि

gupeśchandasi

वेद-विषय में गुप् धातु से विकल्प से चङ् आदेश होता है (अजूगुपतम्/अगौप्तम्)।

श्लोक 1.51

नोनयतिध्वनयत्येलयत्यर्दयतिभ्यः

nonayatidhvanayatyelayatyardayatibhyaḥ

ऊन्, ध्वन्, इल् और अर्द् — इन धातुओं के णिजन्त रूपों से (यद्यपि ये गुरुमत् इजादि नहीं हैं, फिर भी) चङ् आदेश नहीं होता।

श्लोक 1.52

अस्यतिवक्तिख्यातिभ्योऽङ्

asyativaktikhyātibhyo'ṅ

कर्तृवाच्य लुङ् परे रहते अस् (फेंकना), वच् (बोलना, ब्रू के स्थान पर) और ख्या (कहना) धातुओं से च्लि के स्थान पर अङ् आदेश होता है (अवोचत्)।

श्लोक 1.53

लिपिसिचिह्वश्च

lipisicihvaśca

लिप् (लीपना), सिच् (सींचना) और ह्वे (बुलाना) धातुओं से भी च्लि के स्थान पर अङ् आदेश होता है (असिचत्)।

श्लोक 1.54

आत्मनेपदेष्वन्यतरस्याम्

ātmanepadeṣvanyatarasyām

आत्मनेपद प्रत्यय परे होने पर लिप्, सिच् और ह्वे धातुओं से विकल्प से ही अङ् आदेश होता है (असिचत/असिक्त दोनों सिद्ध)।

श्लोक 1.55

पुषादिद्युताद्यॢदितः परस्मैपदेषु

puṣādidyutādyḷditaḥ parasmaipadeṣu

परस्मैपद कर्तृवाच्य लुङ् परे रहते पुष् आदि (दिवादिगण), द्युत् आदि तथा ऌदित् (जिनका ऌकार इत्संज्ञक हो) धातुओं से च्लि के स्थान पर अङ् आदेश होता है (अगमत्)।

श्लोक 1.56

सर्तिशास्त्यृतिभ्यश्च

sartiśāstyṛtibhyaśca

सृ (जाना), शास् (आज्ञा देना) और ऋ (जाना) धातुओं से भी च्लि के स्थान पर अङ् आदेश होता है (असरत्, अशिषत्, आरत्)।

श्लोक 1.57

इरितो वा

irito vā

परस्मैपद परे होने पर इर्-इत्संज्ञक (णिज् जैसे) धातुओं से विकल्प से अङ् आदेश होता है (अनिजत्/अनैक्षीत्)।

श्लोक 1.58

जॄ स्तम्भुम्रुचुम्लुचुग्रुचुग्लुचुग्लुञ्चुश्विभ्यश्च

jṝ stambhumrucumlucugrucuglucugluñcuśvibhyaśca

जॄ (जीर्ण होना), स्तम्भु (रोकना), म्रुचु, म्लुचु, ग्रुचु, ग्लुचु, ग्लुञ्चु (चोरी/गमन) तथा श्वि (बढ़ना) — इन आठ धातुओं से भी विकल्प से अङ् आदेश होता है।

श्लोक 1.59

कृमृदृरुहिभ्यश्छन्दसि

kṛmṛdṛruhibhyaśchandasi

वेद-विषय में कृ, मृ, दृ और रुह् धातुओं से भी च्लि के स्थान पर अङ् आदेश होता है (अकरत्, अमरत्, अदरत्, आरुहत्)।

श्लोक 1.60

चिण् ते पदः

ciṇ te padaḥ

त-आदि (आत्मनेपद) प्रत्यय परे रहते पद् (जाना) धातु से च्लि के स्थान पर चिण् आदेश होता है (अपादि)।

श्लोक 1.61

दीपजनबुधपूरितायिप्यायिभ्योऽन्यतरस्याम्

dīpajanabudhapūritāyipyāyibhyo'nyatarasyām

त-आदि प्रत्यय परे रहते दीप् (चमकना), जन् (जन्मना), बुध् (जानना), पूरी (भरना), ताय् (फैलना) और प्याय् (फूलना) धातुओं से विकल्प से चिण् आदेश होता है (अजनि/अजनिष्ट)।

श्लोक 1.62

अचः कर्मकर्तरि

acaḥ karmakartari

स्वरान्त धातु से, त-प्रत्यय परे रहते, कर्मकर्ता (जिस कर्म में कर्तृत्व भी आरोपित हो) के अर्थ में विकल्प से चिण् आदेश होता है (अकारि कटः स्वयमेव)।

श्लोक 1.63

दुहश्च

duhaśca

दुह् (दुहना) धातु से भी कर्मकर्ता में त-प्रत्यय परे रहते विकल्प से चिण् आदेश होता है (अदोहि गौः स्वयमेव)।

श्लोक 1.64

न रुधः

na rudhaḥ

रुध् (रोकना) धातु से कर्मकर्ता में चिण् आदेश नहीं होता।

श्लोक 1.65

तपोऽनुतापे च

tapo'nutāpe ca

तप् (तपना) धातु से कर्मकर्ता में, तथा पश्चात्ताप के अर्थ में भी, चिण् आदेश नहीं होता।

श्लोक 1.66

चिण् भावकर्मणोः

ciṇ bhāvakarmaṇoḥ

त-प्रत्यय परे रहते धातु से भाव (अकर्मक क्रिया का सामान्य निर्देश) तथा कर्म — दोनों अर्थों में च्लि के स्थान पर चिण् आदेश होता है (अशायि भवता, अकारि कटः)।

श्लोक 1.67

सार्वधातुके यक्

sārvadhātuke yak

भाव और कर्म अर्थ में विहित सार्वधातुक प्रत्यय परे रहते धातु से यक् (य) प्रत्यय होता है (गम्यते, स्थीयते)।

श्लोक 1.68

कर्तरि शप्

kartari śap

कर्ता के अर्थ में सार्वधातुक प्रत्यय परे रहते धातु से शप् प्रत्यय होता है — यही वह मूल विकरण (अ) है जो किसी और विशेष विकरण के अभाव में सार्वत्रिक रूप से लगता है (भवति)।

श्लोक 1.69

दिवादिभ्यः श्यन्

divādibhyaḥ śyan

कर्ता के अर्थ में सार्वधातुक प्रत्यय परे रहते दिवादिगण की धातुओं से श्यन् (य) विकरण होता है (दीव्यति, सीव्यति)।

श्लोक 1.70

वा भ्राशभ्लाशभ्रमुक्रमुक्लमुत्रसित्रुटिलषः

vā bhrāśabhlāśabhramukramuklamutrasitruṭilaṣaḥ

कर्ता के अर्थ में सार्वधातुक परे रहते भ्राश्, भ्लाश्, भ्रम्, क्रम्, क्लम्, त्रस्, त्रुट् और लष् — इन आठ धातुओं से विकल्प से श्यन् प्रत्यय होता है (क्राम्यति/क्रामति)।

श्लोक 1.71

यसोऽनुपसर्गात्

yaso'nupasargāt

उपसर्ग-रहित यस् (यत्न करना) धातु से विकल्प से श्यन् प्रत्यय होता है (यस्यति/यसति)।

श्लोक 1.72

संयसश्च

saṁyasaśca

सम्-उपसर्गपूर्वक यस् धातु से भी विकल्प से श्यन् प्रत्यय होता है (संयस्यति/संयसति)।

श्लोक 1.73

स्वादिभ्यः श्नुः

svādibhyaḥ śnuḥ

कर्ता के अर्थ में सार्वधातुक परे रहते सु (अभिषव करना) आदि धातुओं से श्नु (नु) विकरण होता है (सुनोति)।

श्लोक 1.74

श्रुवः शृ च

śruvaḥ śṛ ca

कर्ता के अर्थ में सार्वधातुक परे रहते श्रु (सुनना) धातु के स्थान पर शृ आदेश तथा शप् के स्थान पर श्नु आदेश होता है (शृणोति)।

श्लोक 1.75

अक्षोऽन्यतरस्याम्

akṣo'nyatarasyām

अक्ष् (व्याप्त होना/खेलना) धातु से विकल्प से श्नु प्रत्यय होता है (अक्षति/अक्ष्णोति)।

श्लोक 1.76

तनूकरणे तक्षः

tanūkaraṇe takṣaḥ

तनूकरण (छीलना, पतला करना) के अर्थ में तक्ष् धातु से विकल्प से शप् और श्नु दोनों होते हैं (तक्षति/तक्ष्णोति)।

श्लोक 1.77

तुदादिभ्यः शः

tudādibhyaḥ śaḥ

कर्ता के अर्थ में सार्वधातुक परे रहते तुदादिगण की धातुओं से श (अ) विकरण होता है (तुदति)।

श्लोक 1.78

रुधादिभ्यः श्नम्

rudhādibhyaḥ śnam

कर्ता के अर्थ में रुधादिगण की धातुओं से श्नम् (न, अंग में घुसकर) विकरण होता है (रुणद्धि)।

श्लोक 1.79

तनादिकृञ्भ्य उः

tanādikṛñbhya uḥ

कर्ता के अर्थ में सार्वधातुक परे रहते तनादिगण की धातुओं तथा कृञ् (करना) धातु से उ विकरण होता है (तनोति, विदाङ्करोति)।

श्लोक 1.80

धिन्विकृण्व्योर च

dhinvikṛṇvyora ca

धिवि तथा कृवि धातुओं से उ विकरण के साथ अन्त्य व्यञ्जन को अकार आदेश होता है (धिनोति, कृणोति)।

श्लोक 1.81

क्र्यादिभ्यः श्ना

kryādibhyaḥ śnā

कर्ता के अर्थ में सार्वधातुक परे रहते क्रीआदिगण की धातुओं से श्ना (ना) विकरण होता है (क्रीणाति)।

श्लोक 1.82

स्तन्भुस्तुन्भुस्कन्भुस्कुन्भुस्कुञ्भ्यः श्नुश्च

stanbhustunbhuskanbhuskunbhuskuñbhyaḥ śnuśca

स्तन्भु, स्तुन्भु, स्कन्भु, स्कुन्भु और स्कुञ् — इन पाँच धातुओं से श्ना के अतिरिक्त श्नु विकरण भी विकल्प से होता है (स्कुनोति/स्कुनाति)।

श्लोक 1.83

हलः श्नः शानज्झौ

halaḥ śnaḥ śānajjhau

हि प्रत्यय परे रहते व्यञ्जनान्त धातु के श्ना (ना) विकरण को शानच् (आन) आदेश होता है (अशान)।

श्लोक 1.84

छन्दसि शायजपि

chandasi śāyajapi

वेद-विषय में श्ना को शायच् (आय) तथा शानच् (आन) दोनों ही आदेश हो सकते हैं (गृभाय, बधान)।

श्लोक 1.85

व्यत्ययो बहुलम्

vyatyayo bahulam

वेद-विषय में विभिन्न प्रत्ययों तथा उनकी प्रकृतियों का परस्पर अनियमित विनिमय (एक के स्थान पर दूसरे का प्रयोग) भी हो जाता है।

श्लोक 1.86

लिङि आशिषि अङ्

liṅi āśiṣi aṅ

वेद में आशीर्वाद के अर्थ वाले लिङ् लकार के परे रहते धातु से (श्यन् आदि विकरणों के स्थान पर) अङ् प्रत्यय होता है (उपगेयम्, गमेम)।

श्लोक 1.87

कर्मवत् कर्मणा तुल्यक्रियः

karmavat karmaṇā tulyakriyaḥ

जिस कर्ता की क्रिया, स्वाभाविक रूप से कर्मस्थ क्रिया के तुल्य प्रतीत हो (अर्थात् स्वतः घटित होती दिखे), वह कर्ता कर्मकर्ता कहलाकर कर्मवत् (कर्म के समान) व्यवहृत होता है (भिद्यते काष्ठं स्वयमेव)।

श्लोक 1.88

तपस्तपःकर्मकस्यैव

tapastapaḥkarmakasyaiva

तप् धातु का कर्मकर्मवद्भाव तभी होता है जब उसका कर्म भी 'तपस्' ही हो, अन्यथा नहीं (तप्यते तपस्तापसः)।

श्लोक 1.89

न दुहस्नुनमां यक्चिणौ

na duhasnunamāṁ yakciṇau

दुह्, स्नु और नम् धातुओं का कर्मकर्ता में प्रयोग होने पर भी इन्हें विहित यक् प्रत्यय तथा चिण् आदेश नहीं होते (नमस्ते दण्डः स्वयमेव)।

श्लोक 1.90

कुषिरञ्जोः प्राचां श्यन् परस्मैपदं च

kuṣirañjoḥ prācāṁ śyan parasmaipadaṁ ca

पूर्वाचार्यों के मत में कुष् (खींचना) और रञ्ज् (रंगना) धातुओं से कर्मकर्ता में श्यन् प्रत्यय तथा परस्मैपद होता है (कुष्यति पादः स्वयमेव)।

श्लोक 1.91

धातोः

dhātoḥ

यह अधिकार-सूत्र है: तृतीय अध्याय के अन्त तक (कृदन्त-प्रकरण में) आगे जो भी विधान हो, वह 'धातु' के बाद ही समझा जाए।

श्लोक 1.92

तत्रोपपदं सप्तमीस्थम्

tatropapadaṁ saptamīstham

धात्वधिकार में सप्तमी विभक्ति द्वारा निर्दिष्ट पद 'उपपद' संज्ञा पाता है (जैसे 'कर्मणि' सूत्र में सप्तमी-निर्दिष्ट कर्म उपपद कहलाता है)।

श्लोक 1.93

कृदतिङ्

kṛdatiṅ

तिङ् (सामान्य आख्यात/क्रियापद प्रत्ययों) से भिन्न सभी धातु-प्रत्यय 'कृत्' संज्ञक होते हैं।

श्लोक 1.94

वा असरूपोऽस्त्रियाम्

vā asarūpo'striyām

स्त्री-प्रत्यय-अधिकार को छोड़कर, कृदधिकार में उत्सर्गप्राप्त (सामान्य) प्रत्यय का, उससे असदृशरूप कोई अन्य (अपवाद) प्रत्यय विकल्प से बाधक होता है।

श्लोक 1.95

कृत्याः प्राङ् ण्वुलः

kṛtyāḥ prāṅ ṇvulaḥ

यहाँ से लेकर ण्वुल् (३.१.१३३) से पूर्व तक विहित प्रत्यय 'कृत्य' (अवश्य करणीयता सूचक कृदन्त) संज्ञक होते हैं (गन्तव्यः)।

श्लोक 1.96

तव्यत्तव्यानीयरः

tavyattavyānīyaraḥ

धातु से (भाव अथवा कर्म अर्थ में) तव्यत्, तव्य और अनीयर् — ये तीन कृत्य-प्रत्यय होते हैं (कर्तव्यम्, करणीयम् = करने योग्य)।

श्लोक 1.97

अचो यत्

aco yat

स्वरान्त धातु से कृत्य अर्थ में यत् प्रत्यय होता है (गेयम् = गाने योग्य, पेयम् = पीने योग्य)।

श्लोक 1.98

पोरदुपधात्

poradupadhāt

यदि उपधा में ह्रस्व अकार हो, तो पवर्गान्त (प्/फ/ब/भ/म-अन्त) धातु से भी यत् प्रत्यय होता है (शप्यम्, लभ्यम्)।

श्लोक 1.99

शकिसहोश्च

śakisahośca

शक् (सकना) तथा सह् (सहना) धातुओं से भी यत् प्रत्यय होता है (शक्यम्, सह्यम्)।

श्लोक 1.100

गदमदचरयमश्चानुपसर्गे

gadamadacarayamaścānupasarge

उपसर्ग-रहित गद् (बोलना), मद् (हर्षित होना), चर् (चरना) और यम् (नियन्त्रण करना) धातुओं से यत् प्रत्यय होता है (गद्यम्, मद्यम्, चर्यम्, यम्यम्)।

श्लोक 1.101

अवद्यपण्यवर्या गर्ह्यपणितव्यानिरोधेषु

avadyapaṇyavaryā garhyapaṇitavyānirodheṣu

निन्दा (गर्ह्य), मोलभाव-योग्यता (पणितव्य) तथा अप्रतिबन्ध (अनिरोध) — इन तीन अर्थों में क्रमशः अवद्य, पण्य तथा वर्या शब्दों का निपातन होता है।

श्लोक 1.102

वह्यं करणम्

vahyaṁ karaṇam

करण (साधन) के अर्थ में वह् (ढोना) धातु से यत् प्रत्यय के साथ 'वह्यम्' शब्द का निपातन होता है (वह्यं शकटम् = ढोने का साधन, गाड़ी)।

श्लोक 1.103

अर्यः स्वामिवैश्ययोः

aryaḥ svāmivaiśyayoḥ

'स्वामी' और 'वैश्य' अर्थों में ऋ धातु से यत् प्रत्यय के साथ 'अर्यः' शब्द का निपातन होता है।

श्लोक 1.104

उपसर्या काल्या प्रजने

upasaryā kālyā prajane

गर्भधारण का समय आ पहुँचने के अर्थ में 'उपसर्या' शब्द का निपातन होता है (उपसर्या गौः)।

श्लोक 1.105

अजर्यं सङ्गतम्

ajaryaṁ saṅgatam

कभी पुरानी न पड़ने वाली मित्रता के अर्थ में 'अजर्यम्' शब्द का निपातन होता है (अजर्यं सङ्गतम्)।

श्लोक 1.106

वदः सुपि क्यप् च

vadaḥ supi kyap ca

सुबन्त उपपद वाले, उपसर्ग-रहित वद् (बोलना) धातु से क्यप् तथा यत् दोनों प्रत्यय होते हैं (ब्रह्मवद्यम्)।

श्लोक 1.107

भुवो भावे

bhuvo bhāve

सुबन्त उपपद वाले, उपसर्ग-रहित भू (होना) धातु से भाव के अर्थ में क्यप् प्रत्यय होता है (ब्रह्मभूयम् = ब्रह्मत्व-प्राप्ति)।

श्लोक 1.108

हनस्त च

hanasta ca

सुबन्त उपपद वाले, उपसर्ग-रहित हन् (मारना) धातु से भाव में क्यप् प्रत्यय होता है, और साथ ही हकार को तकार आदेश भी होता है (ब्रह्महत्या)।

श्लोक 1.109

एतिस्तुशास्वृदृजुषः क्यप्

etistuśāsvṛdṛjuṣaḥ kyap

इण् (जाना), स्तु (स्तुति करना), शास् (आज्ञा देना), वृ (चुनना), दृ (आदर करना) और जुष् (सेवा करना) धातुओं से क्यप् प्रत्यय होता है (स्तुत्यः, वृत्यः, जुष्यः)।

श्लोक 1.110

ऋदुपधाच्चाक्लृपिचृतेः

ṛdupadhāccāklṛpicṛteḥ

कॢप् और चृत् धातुओं को छोड़कर, जिन अन्य धातुओं की उपधा में ऋकार हो, उनसे भी क्यप् प्रत्यय होता है (वृत्यम्, वृध्यम्)।

श्लोक 1.111

ई च खनः

ī ca khanaḥ

खन् (खोदना) धातु से क्यप् प्रत्यय होता है और उसका अन्त्य स्वर ईकार आदेश पाता है (खेयम्)।

श्लोक 1.112

भृञोऽसंज्ञायाम्

bhṛño'saṁjñāyām

जब कोई विशेष संज्ञा (नाम) अभिप्रेत न हो, तब भृ (पोषण करना) धातु से क्यप् प्रत्यय होता है (भृत्याः = पालने योग्य, अर्थात् सेवक)।

श्लोक 1.113

मृजेर्विभाषा

mṛjervibhāṣā

मृज् (शुद्ध करना) धातु से विकल्प से क्यप् प्रत्यय होता है (परिमृज्यः, पक्षान्तर में परिमार्ग्यः)।

श्लोक 1.114

राजसूयसूर्यमृषोद्यरुच्यकुप्यकृष्टपच्याव्यथ्याः

rājasūyasūryamṛṣodyarucyakupyakṛṣṭapacyāvyathyāḥ

राजसूय, सूर्य, मृषोद्य, रुच्य, कुप्य, कृष्टपच्य तथा अव्यथ्य — ये क्यबन्त शब्द विशेष रूप से निपातित होते हैं, साधारण नियम से नहीं बनते।

श्लोक 1.115

भिद्योद्ध्यौ नदे

bhidyoddhyau nade

नदी अर्थ में भिद् धातु से क्यप् प्रत्यय के साथ 'भिद्यः' तथा उज्झ् धातु से 'उद्ध्यः' शब्दों का निपातन होता है (जो किनारों को तोड़ती/उलीचती हुई बहे)।

श्लोक 1.116

पुष्यसिद्ध्यौ नक्षत्रे

puṣyasiddhyau nakṣatre

नक्षत्र-विशेष के अर्थ में पुष् और सिध् धातुओं से अधिकरण-कारक में क्यप् प्रत्यय के साथ 'पुष्यः' तथा 'सिद्ध्यः' शब्दों का निपातन होता है।

श्लोक 1.117

विपूयविनीयजित्या मुञ्जकल्कहलिषु

vipūyavinīyajityā muñjakalkahaliṣu

मुञ्ज (एक प्रकार की घास), कल्क (ओषधि की पिट्ठी) तथा हलि (बड़ा हल) — इन अर्थों में क्रमशः विपूय, विनीय तथा जित्या शब्दों का निपातन होता है।

श्लोक 1.118

प्रत्यपिभ्यां ग्रहेश्छन्दसि

pratyapibhyāṁ graheśchandasi

वेद-विषय में प्रति तथा अपि उपसर्गपूर्वक ग्रह् (लेना) धातु से क्यप् प्रत्यय होता है (प्रतिग्राह्यम्, अपिग्राह्यम्)।

श्लोक 1.119

पदास्वैरिबाह्यापक्ष्येषु च

padāsvairibāhyāpakṣyeṣu ca

पद, अस्वैरिन् (पराधीन), बाह्य तथा पक्ष्य — इन अर्थों में भी ग्रह् धातु से क्यप् प्रत्यय होता है (गृह्या, ग्रामगृह्या)।

श्लोक 1.120

विभाषा कृवृषोः

vibhāṣā kṛvṛṣoḥ

कृ (करना) तथा वृष् (सींचना) धातुओं से विकल्प से क्यप् प्रत्यय होता है (कृत्यम्/कार्यम्, वृष्यम्/वर्ष्यम्)।

श्लोक 1.121

युग्यं च पत्त्रे

yugyaṁ ca pattre

वहन योग्य (जोतने योग्य) पशु के अर्थ में नपुंसकलिङ्ग 'युग्यम्' शब्द का निपातन होता है (युग्यो गौः = जोतने योग्य बैल)।

श्लोक 1.122

अमावस्यदन्यतरस्याम्

amāvasyadanyatarasyām

काल-वाचक अधिकरण में 'अमा' शब्द के साथ वस् (रहना) धातु से ण्यत् प्रत्यय होता है, और विकल्प से वृद्धि का अभाव भी होता है (अमावस्या/अमावास्या)।

श्लोक 1.123

छन्दसि निष्टर्क्यदेवहूयप्रणीयोन्नीयोच्छिष्यमर्यस्तर्याध्वर्यखन्यखान्यदेवयज्यापृच्छ्यप्रतिषीव्यब्रह्मवाद्यभाव्यस्ताव्योपचाय्यपृडानि

chandasi niṣṭarkyadevahūyapraṇīyonnīyocchiṣyamaryastaryādhvaryakhanyakhānyadevayajyāpṛcchyapratiṣīvyabrahmavādyabhāvyastāvyopacāyyapṛḍāni

वेद-विषय में निष्टर्क्य, देवहूय, प्रणीय, उन्नीय, उच्छिष्य, मर्य, स्तर्य, अध्वर्य, खन्य, खान्य, देवयज्या, आपृच्छ्य, प्रतिषीव्य, ब्रह्मवाद्य, भाव्य, स्ताव्य, उपचाय्य और पृड — इन सत्रह विशेष कृदन्त-रूपों का निपातन होता है।

श्लोक 1.124

ऋहलोर्ण्यत्

ṛhalorṇyat

ऋकारान्त तथा व्यञ्जनान्त (हलन्त) धातु से ण्यत् प्रत्यय होता है (कार्यम्, हार्यम्, धार्यम्, पाठ्यम्, पाक्यम्)।

श्लोक 1.125

ओरावश्यके

orāvaśyake

अनिवार्यता (आवश्यक) के अर्थ में उकारान्त धातु से ण्यत् प्रत्यय होता है (लाव्यम्, पाव्यम् = अवश्य काटने/पवित्र करने योग्य)।

श्लोक 1.126

आसुयुवपिरपिलपित्रपिचमश्च

āsuyuvapirapilapitrapicamaśca

आङ्-उपसर्गपूर्वक सु, यु, वप्, रप्, लप्, त्रप् तथा चम् धातुओं से ण्यत् प्रत्यय होता है (आसाव्यम्, आचाम्यम्)।

श्लोक 1.127

आनाय्योऽनित्ये

ānāyyo'nitye

अस्थायी (अनित्य) अर्थ में 'आनाय्यः' शब्द का निपातन होता है (आ+नी+ण्यत्)।

श्लोक 1.128

प्रणाय्योऽसम्मतौ

praṇāyyo'sammatau

असहमति (असम्मति) के अर्थ में 'प्रणाय्यः' शब्द का निपातन होता है (जबकि सामान्य अर्थ में प्रणेयः बनता है)।

श्लोक 1.129

पाय्यसान्नाय्यनिकाय्यधाय्या मानहविर्निवाससामिधेनीषु

pāyyasānnāyyanikāyyadhāyyā mānahavirnivāsasāmidhenīṣu

मान (मान-पात्र), हविस्, निवास तथा सामिधेनी — इन अर्थों में क्रमशः पाय्य, सान्नाय्य, निकाय्य तथा धाय्या शब्दों का निपातन होता है।

श्लोक 1.130

क्रतौ कुण्डपाय्यसंचाय्यौ

kratau kuṇḍapāyyasaṁcāyyau

यज्ञ-विशेष (क्रतु) के अर्थ में 'कुण्डपाय्य' तथा 'संचाय्य' शब्दों का निपातन होता है।

श्लोक 1.131

अग्नौ परिचाय्योपचाय्यसमूह्याः

agnau paricāyyopacāyyasamūhyāḥ

अग्नि (यज्ञाग्नि) के अर्थ में परिचाय्य, उपचाय्य तथा समूह्य शब्दों का निपातन होता है।

श्लोक 1.132

चित्याग्निचित्ये च

cityāgnicitye ca

अग्निचयन (यज्ञाग्नि-निर्माण) के अर्थ में 'चित्य' शब्द भी निपातित होता है (चीयतेऽसौ चित्यः)।

श्लोक 1.133

ण्वुल्तृचौ

ṇvultṛcau

कर्ता के सामान्य अर्थ में धातु से ण्वुल् (अक) और तृच् (तृ) प्रत्यय होते हैं (कारकः, कर्ता = करनेवाला)।

श्लोक 1.134

नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः

nandigrahipacādibhyo lyuṇinyacaḥ

नन्द् आदि, ग्रह् आदि और पच् आदि गणों की धातुओं से क्रमशः ल्यु (अन/अक), णिनि (इन्) और अच् (अ) प्रत्यय होते हैं (नन्दनः, ग्राही, पाचकः)।

श्लोक 1.135

इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः

igupadhajñāprīkiraḥ kaḥ

इक्-उपधा (इ/उ/ऋ/ऌ ठीक अन्त्य व्यञ्जन से पहले) वाले धातुओं से, तथा ज्ञा, प्री और कॄ धातुओं से भी, कर्ता अर्थ में क प्रत्यय होता है (बुधः, ज्ञः, प्रियः, किरः)।

श्लोक 1.136

आतश्चोपसर्गे

ātaścopasarge

उपसर्ग उपपद होने पर आकारान्त धातु से भी क प्रत्यय होता है (प्रज्ञः, प्रस्थः)।

श्लोक 1.137

पाघ्राध्माधेट्दृशः शः

pāghrādhmādheṭdṛśaḥ śaḥ

उपसर्गोपपदक पा (पीना), घ्रा (सूँघना), ध्मा (फूँकना), धेट् (पीना) और दृश् (देखना) धातुओं से श प्रत्यय होता है (उत्पिबः, विजिघ्रः)।

श्लोक 1.138

अनुपसर्गाल्लिम्पविन्दधारिपारिवेद्युदेजिचेतिसातिसाहिभ्यश्च

anupasargāllimpavindadhāripārivedyudejicetisātisāhibhyaśca

उपसर्ग-रहित लिप्, विद्, धारि, पारि, वेद्, उदेजि, चेति, साति और साहि धातुओं से भी श प्रत्यय होता है (लिम्पः)।

श्लोक 1.139

ददातिदधात्योर्विभाषा

dadātidadhātyorvibhāṣā

दा (देना) तथा धा (धारण करना) धातुओं से विकल्प से श प्रत्यय होता है (ददः/दायः, दधः/धायः)।

श्लोक 1.140

ज्वलितिकसन्तेभ्यो णः

jvalitikasantebhyo ṇaḥ

ज्वल् से लेकर कस् पर्यन्त गण की धातुओं से ण प्रत्यय होता है (ज्वालः, चालः)।

श्लोक 1.141

श्यादिव्यधास्त्रुसंस्त्रुअतीणवसावहृलिहश्लिषश्वसश्च

śyādivyadhāstrusaṁstruatīṇavasāvahṛlihaśliṣaśvasaśca

श्यै आदि, व्यध्, आस्त्रु, संस्त्रु, अतीण्, अवसा, अवहृ, लिह्, श्लिष् और श्वस् धातुओं से भी ण प्रत्यय होता है (व्याधः, लेहः, श्लेषः, श्वासः)।

श्लोक 1.142

दुन्योरनुपसर्गे

dunyoranupasarge

उपसर्ग-रहित दु (जलाना) और नी (ले जाना) धातुओं से ण प्रत्यय होता है (दावः, नायः; परन्तु उपसर्ग सहित प्रणयः)।

श्लोक 1.143

विभाषा ग्रहेः

vibhāṣā graheḥ

ग्रह् (पकड़ना) धातु से विकल्प से ण प्रत्यय होता है (ग्राहः/ग्रहः)।

श्लोक 1.144

गेहे कः

gehe kaḥ

'घर' के अर्थ में ग्रह् धातु से क प्रत्यय होता है, जिसमें संप्रसारण भी होता है (गृहम् = घर)।

श्लोक 1.145

शिल्पिनि ष्वुन्

śilpini ṣvun

कारीगर (शिल्पी) के अर्थ में धातु से ष्वुन् (अक) प्रत्यय होता है (नर्तकः, खनकः, रजकः)।

श्लोक 1.146

गः स्थकन्

gaḥ sthakan

शिल्पी अर्थ में गै (गाना) धातु से थकन् प्रत्यय होता है (गाथकः = गवैया)।

श्लोक 1.147

ण्युट् च

ṇyuṭ ca

गै धातु से शिल्पी अर्थ में ण्युट् (अन) प्रत्यय भी होता है (गायनः/गायनी)।

श्लोक 1.148

हश्च व्रीहिकालयोः

haśca vrīhikālayoḥ

व्रीहि (धान्य-विशेष) तथा काल (वर्ष) के अर्थ में ओहाक्/ओहाङ् धातु से ण्युट् प्रत्यय होता है (हायना = धान्य, हायनः = वर्ष)।

श्लोक 1.149

प्रुसृल्वः समभिहारे वुन्

prusṛlvaḥ samabhihāre vun

प्रु (बहना), सृ (चलना) और लू (काटना) धातुओं से बार-बार/अच्छी तरह करने के अर्थ (समभिहार) में वुन् (अक) प्रत्यय होता है (प्रवकः, सरकः, लवकः)।

श्लोक 1.150

आशिषि च

āśiṣi ca

आशीर्वाद (शुभकामना) के अर्थ में किसी भी धातु से वुन् प्रत्यय होता है (जीवकः = जीता रहे, नन्दकः = आनन्दित रहे)।

तृतीयोऽध्यायः, द्वितीयः पादः

श्लोक 2.1

कर्मण्यण्

karmaṇyaṇ

कर्म के उपपद रहने पर धातु से अण् प्रत्यय होता है (कुम्भकारः = घड़ा बनानेवाला, कुम्हार)।

श्लोक 2.2

ह्वावामश्च

hvāvāmaśca

कर्मोपपदक ह्वे (बुलाना), वे (बुनना) तथा मा (मापना) धातुओं से भी अण् प्रत्यय होता है (तन्तुवायः = जुलाहा)।

श्लोक 2.3

आतोऽनुपसर्गे कः

āto'nupasarge kaḥ

उपसर्ग-रहित कर्मोपपदक आकारान्त धातु से क प्रत्यय होता है (गोदः = गाय देनेवाला)।

श्लोक 2.4

सुपि स्थः

supi sthaḥ

सुबन्त उपपद रहने पर स्था (खड़ा होना) धातु से क प्रत्यय होता है (समस्थः = समभाव में खड़ा)।

श्लोक 2.5

तुन्दशोकयोः परिमृजापनुदोः

tundaśokayoḥ parimṛjāpanudoḥ

कर्मरूप तुन्द (पेट) तथा शोक के उपपद होने पर क्रमशः परिमृज् और अपनुद् धातुओं से क प्रत्यय होता है (तुन्दपरिमृजः, शोकापनुदः)।

श्लोक 2.6

प्रे दाज्ञः

pre dājñaḥ

प्र-उपसर्गपूर्वक दा (देना) तथा ज्ञा (जानना) धातुओं से कर्मोपपद रहने पर क प्रत्यय होता है (विद्याप्रदः, शास्त्रप्रज्ञः)।

श्लोक 2.7

समि ख्यः

sami khyaḥ

सम्-उपसर्गपूर्वक ख्या (गिनना) धातु से कर्मोपपद रहने पर क प्रत्यय होता है (गोसंख्यः = गायों की गणना करनेवाला)।

श्लोक 2.8

गापोष्टक्

gāpoṣṭak

उपसर्ग-रहित कर्मोपपदक गै (गाना) तथा पा (पीना) धातुओं से टक् प्रत्यय होता है (शक्रगः, सामगः = साम गानेवाला)।

श्लोक 2.9

हरतेरनुद्यमनेऽच्

harateranudyamane'c

बिना उठाए ले जाने (अनुद्यमन) के अर्थ में कर्मोपपदक हृ (ले जाना) धातु से अच् प्रत्यय होता है (भागहरः = हिस्सा लेनेवाला)।

श्लोक 2.10

वयसि च

vayasi ca

आयु (वयस्) के अभिप्रेत होने पर भी कर्मोपपदक हृ धातु से अच् प्रत्यय होता है (अस्थिहरः श्वा = हड्डी उठाए फिरनेवाला कुत्ता)।

श्लोक 2.11

आङि ताच्छील्ये

āṅi tācchīlye

आ-उपसर्गपूर्वक, स्वभावतः ऐसा करनेवाला (ताच्छील्य) होने पर, कर्मोपपदक हृ धातु से अच् प्रत्यय होता है (फलाहारः = फल खानेवाला)।

श्लोक 2.12

अर्हः

arhaḥ

कर्मोपपदक अर्ह् (योग्य होना) धातु से अच् प्रत्यय होता है (पूजार्हा = पूजा के योग्य)।

श्लोक 2.13

स्तम्बकर्णयो रमिजपोः

stambakarṇayo ramijapoḥ

सुबन्त स्तम्ब उपपद होने पर रम् धातु से, और सुबन्त कर्ण उपपद होने पर जप् धातु से अच् प्रत्यय होता है (स्तम्बेरमः = हाथी, झाड़ियों में रमनेवाला)।

श्लोक 2.14

शमिधातोः संज्ञायाम्

śamidhātoḥ saṁjñāyām

शम्-उपपद रहने पर, नाम/संज्ञा के अर्थ में, किसी भी धातु से अच् प्रत्यय होता है (शङ्करः, सम्भवः)।

श्लोक 2.15

अधिकरणे शेतेः

adhikaraṇe śeteḥ

अधिकरण-वाचक उपपद रहने पर शीङ् (सोना) धातु से अच् प्रत्यय होता है (खशयः = खोह में सोनेवाला)।

श्लोक 2.16

चरेष्टः

careṣṭaḥ

अधिकरण कारक में सुबन्त उपपद रहने पर चर् (विचरना) धातु से ट प्रत्यय होता है (कुरुचरः = कुरु देश में विचरनेवाला)।

श्लोक 2.17

भिक्षासेनादायेषु च

bhikṣāsenādāyeṣu ca

भिक्षा, सेना और आदाय — इन तीन शब्दों के उपपद होने पर भी चर् धातु से ट प्रत्यय होता है (भिक्षाचरः, सेनाचरः)।

श्लोक 2.18

पुरोऽग्रतोऽग्रेषु सर्तेः

puro'grato'greṣu sarteḥ

पुरस्, अग्रतस् और अग्रे — इन उपपदों के रहने पर सृ (चलना) धातु से ट प्रत्यय होता है (पुरस्सरः = आगे चलनेवाला)।

श्लोक 2.19

पूर्वे कर्तरि

pūrve kartari

कर्ता के अर्थ वाले 'पूर्व' शब्द के उपपद होने पर सृ धातु से ट प्रत्यय होता है (पूर्वसरः = पहले चलनेवाला)।

श्लोक 2.20

कृञो हेतुताच्छील्यानुलोम्येषु

kṛño hetutācchīlyānulomyeṣu

हेतु (कारण), ताच्छील्य (स्वाभाविक प्रवृत्ति) और अनुलोम्य (अनुकूलता) के अर्थों में कृ धातु से ट प्रत्यय होता है (यशस्करः = यश का कारण/यश करनेवाला)।

श्लोक 2.21

दिवाविभानिशाप्रभाभास्करान्तानन्तादिबहुनान्दीकिंलिपिलिबिबलिभक्तिकर्तृचित्रक्षेत्रसंख्याजङ्घाबाह्वहर्यत्तद्धनुःसु

divāvibhāniśāprabhābhāskarāntānantādibahunāndīkiṁlipilibibalibhaktikartṛcitrakṣetrasaṁkhyājaṅghābāhvaharyattaddhanuḥsu

दिवा, विभा, निशा, प्रभा, भास्कर, अन्त, अनन्त, आदि, बहु, नान्दी, किम्, लिपि, लिबि, बलि, भक्ति, कर्तृ, चित्र, क्षेत्र, संख्या, जङ्घा, बाहु, अहन्, यत्, तद् तथा धनुस् — इन शब्दों के उपपद होने पर कृ धातु से ट प्रत्यय होता है (दिवाकरः = सूर्य)।

श्लोक 2.22

कर्मणि भृतौ

karmaṇi bhṛtau

सेवा (भृति) के अर्थ में, क्रियावाचक कर्म-शब्द के उपपद होने पर, कृ धातु से ट प्रत्यय होता है (कर्मकरः = नौकर)।

श्लोक 2.23

न शब्दश्लोककलहगाथावैरचाटुसूत्रमन्त्रपदेषु

na śabdaślokakalahagāthāvairacāṭusūtramantrapadeṣu

शब्द, श्लोक, कलह, गाथा, वैर, चाटु, सूत्र, मन्त्र और पद — इन उपपदों के रहने पर कृ धातु से ट प्रत्यय नहीं होता (केवल साधारण अण् से शब्दकारः बनता है)।

श्लोक 2.24

स्तम्बशकृतोरिन्

stambaśakṛtorin

स्तम्ब और शकृत् के उपपद होने पर कृ धातु से इन् प्रत्यय होता है (स्तम्बकरिः, शकृत्करिः)।

श्लोक 2.25

हरतेर्दृतिनाथयोः पशौ

haraterdṛtināthayoḥ paśau

पशु-वाचक कर्ता के अभिप्रेत होने पर दृति तथा नाथ शब्दों के उपपद होने पर हृ धातु से इन् प्रत्यय होता है (दृतिहरिः, नाथहरिः)।

श्लोक 2.26

फलेग्रहिरात्मम्भरिश्च

phalegrahirātmambhariśca

'फलेग्रहिः' (फल ग्रहण करनेवाला) तथा 'आत्मम्भरिः' (अपना पोषण करनेवाला) शब्दों का निपातन होता है।

श्लोक 2.27

छन्दसि वनसनरक्षिमथां

chandasi vanasanarakṣimathāṁ

वेद-विषय में कर्मोपपदक वन्, सन्, रक्ष् और मथ् धातुओं से इन् प्रत्यय होता है (ब्रह्मवनिः, गोसनिः)।

श्लोक 2.28

एजेः खश्

ejeḥ khaś

कर्म के उपपद रहने पर णिजन्त एज् (कँपाना) धातु से खश् प्रत्यय होता है (जनेजयः)।

श्लोक 2.29

नासिकास्तनयोर्ध्माधेटोः

nāsikāstanayordhmādheṭoḥ

कर्मरूप नासिका तथा स्तन के उपपद होने पर ध्मा (फूँकना) और धेट् (पीना) धातुओं से खश् प्रत्यय होता है (नासिकन्धमः)।

श्लोक 2.30

नाडीमुष्ट्योश्च

nāḍīmuṣṭyośca

कर्मरूप नाड़ी तथा मुष्टि के उपपद होने पर भी ध्मा और धेट् धातुओं से खश् प्रत्यय होता है (नाडिन्धमः, मुष्टिन्धमः)।

श्लोक 2.31

उदि कूले रुजिवहोः

udi kūle rujivahoḥ

कर्मरूप कूल के उपपद होने पर उद्-उपसर्गपूर्वक रुज् (तोड़ना) तथा वह् (बहना) धातुओं से खश् प्रत्यय होता है (कूलमुद्रुजति)।

श्लोक 2.32

वहाभ्रे लिहः

vahābhre lihaḥ

कर्मरूप वह (बादल) तथा अभ्र (आकाश) के उपपद होने पर लिह् (चाटना) धातु से खश् प्रत्यय होता है (वहंलिहः, अभ्रंलिहः = आकाश-चुम्बी)।

श्लोक 2.33

परिमाणे पचः

parimāṇe pacaḥ

परिमाण-वाचक शब्द के उपपद होने पर पच् (पकाना) धातु से खश् प्रत्यय होता है (प्रस्थम्पचा = एक प्रस्थ-भर पकानेवाली)।

श्लोक 2.34

मितनखे च

mitanakhe ca

कर्मरूप मित (नपा-तुला) तथा नख (गीला) के उपपद होने पर भी पच् धातु से खश् प्रत्यय होता है (मितम्पचा)।

श्लोक 2.35

विधुअरुषोस्तुदः

vidhuaruṣostudaḥ

कर्मरूप विधु (चन्द्रमा) तथा अरुस् (घाव) के उपपद होने पर तुद् (पीड़ा देना) धातु से खश् प्रत्यय होता है (विधुन्तुदः = राहु, अरुन्तुदः = मर्मभेदी)।

श्लोक 2.36

असूर्यललाटयोर्दृशितपोः

asūryalalāṭayordṛśitapoḥ

कर्मरूप असूर्य तथा ललाट के उपपद होने पर क्रमशः दृश् (देखना) तथा तप् (तपना) धातुओं से खश् प्रत्यय होता है (असूर्यम्पश्या, ललाटन्तपः)।

श्लोक 2.37

उग्रम्पश्येरम्मदपाणिन्धमाश्च

ugrampaśyerammadapāṇindhamāśca

'उग्रम्पश्यः', 'इरम्मदः' तथा 'पाणिन्धमाः' शब्दों का निपातन होता है।

श्लोक 2.38

प्रियवशे वदः खच्

priyavaśe vadaḥ khac

कर्मरूप प्रिय तथा वश के उपपद होने पर वद् (बोलना) धातु से खच् प्रत्यय होता है (प्रियंवदः, वशंवदः = वश में करनेवाला)।

श्लोक 2.39

द्विषत्परयोस्तापेः

dviṣatparayostāpeḥ

कर्मरूप द्विषत् (शत्रु) तथा पर के उपपद होने पर तप् धातु से खच् प्रत्यय होता है (द्विषन्तपः, परन्तपः = शत्रु-तापक)।

श्लोक 2.40

वाचि यमो व्रते

vāci yamo vrate

व्रत के गम्यमान होने पर कर्मरूप वाच् (वाणी) के उपपद होने पर यम् (नियन्त्रित करना) धातु से खच् प्रत्यय होता है (वाचंयमः = मौन-व्रती)।

श्लोक 2.41

पूःसर्वयोर्दारिसहोः

pūḥsarvayordārisahoḥ

कर्मरूप पुर् तथा सर्व के उपपद होने पर क्रमशः दारि (णिजन्त दॄ, तोड़ना) तथा सह् धातुओं से खच् प्रत्यय होता है (पुरन्दरः = इन्द्र, नगर-भेत्ता)।

श्लोक 2.42

सर्वकूलाभ्रकरीषेषु कषः

sarvakūlābhrakarīṣeṣu kaṣaḥ

कर्मरूप सर्व, कूल, अभ्र और करीष के उपपद होने पर कष् (रगड़ना/पीड़ित करना) धातु से खच् प्रत्यय होता है (सर्वंकषः, अभ्रंकषः = गगनचुम्बी)।

श्लोक 2.43

मेघर्तिभयेषु कृञः

meghartibhayeṣu kṛñaḥ

कर्मरूप मेघ, ऋति और भय के उपपद होने पर कृ धातु से खच् प्रत्यय होता है (मेघंकरः, भयंकरः)।

श्लोक 2.44

क्षेमप्रियमद्रेऽण् च

kṣemapriyamadre'ṇ ca

कर्मरूप क्षेम, प्रिय और मद्र के उपपद होने पर कृ धातु से अण् प्रत्यय भी होता है (क्षेमकारः/क्षेमंकरः)।

श्लोक 2.45

आशिते भुवः करणभावयोः

āśite bhuvaḥ karaṇabhāvayoḥ

सुबन्त 'आशित' उपपद होने पर करण तथा भाव अर्थों में भू धातु से खच् प्रत्यय होता है (आशितंभवः = तृप्तिदायक)।

श्लोक 2.46

संज्ञायां भृतॄवृजिधारिसहितपिदमः

saṁjñāyāṁ bhṛtṝvṛjidhārisahitapidamaḥ

संज्ञा (नामकरण) के अर्थ में कर्मरूप अथवा सुबन्तमात्र के उपपद होने पर भृ, तॄ, वृ, धारि (णिजन्त धृ), सह्, तप् तथा दम् धातुओं से खच् प्रत्यय होता है (विश्वम्भरः, शत्रुञ्जयः, युगन्धरः)।

श्लोक 2.47

गमश्च

gamaśca

सुबन्त उपपद रहने पर गम् (जाना) धातु से भी खच् प्रत्यय होता है (सुतङ्गमः)।

श्लोक 2.48

अन्तात्यन्ताध्वदूरपारसर्वानन्तेषु डः

antātyantādhvadūrapārasarvānanteṣu ḍaḥ

कर्मरूप अन्त, अत्यन्त, अध्वन्, दूर, पार, सर्व तथा अनन्त के उपपद होने पर गम् धातु से ड प्रत्यय होता है (अन्तगः, दूरगः, पारगः)।

श्लोक 2.49

आशिषि हनः

āśiṣi hanaḥ

आशीर्वाद के अर्थ में कर्मरूप उपपद रहते हन् (मारना) धातु से ड प्रत्यय होता है (शत्रुहः = शत्रु-नाशक, शुभकामना-सूचक)।

श्लोक 2.50

अपे क्लेशतमसोः

ape kleśatamasoḥ

कर्मरूप क्लेश तथा तमस् के उपपद होने पर अप-उपसर्गपूर्वक हन् धातु से ड प्रत्यय होता है (क्लेशापहः, तमोपहः = अन्धकार दूर करनेवाला)।

श्लोक 2.51

कुमारशीर्षयोर्णिनिः

kumāraśīrṣayorṇiniḥ

कर्मरूप कुमार तथा शीर्ष के उपपद होने पर हन् धातु से णिनि प्रत्यय होता है (कुमारघाती, शीर्षघाती)।

श्लोक 2.52

लक्षणे जायापत्योष्टक्

lakṣaṇe jāyāpatyoṣṭak

लक्षण (पहचान-चिह्न) के अर्थ में कर्मरूप जाया तथा पति के उपपद होने पर हन् धातु से टक् प्रत्यय होता है (जायाघ्नः = पत्नी-हन्ता-लक्षणवाला)।

श्लोक 2.53

अमनुष्यकर्तृके च

amanuṣyakartṛke ca

अमनुष्य कर्ता के अभिप्रेत होने पर भी कर्मरूप उपपद रहते हन् धातु से टक् प्रत्यय होता है (श्लेष्मघ्नं मधु = कफनाशक शहद)।

श्लोक 2.54

शक्तौ हस्तिकपाटयोः

śaktau hastikapāṭayoḥ

समर्थ होने (शक्ति) के अर्थ में कर्मरूप हस्तिन् तथा कपाट के उपपद होने पर हन् धातु से टक् प्रत्यय होता है (हस्तिघ्नः = हाथी मारने में समर्थ)।

श्लोक 2.55

पाणिघताडघौ शिल्पिनि

pāṇighatāḍaghau śilpini

शिल्पी (कारीगर) के अर्थ में कर्मरूप पाणि और ताड के उपपद होने पर हन् धातु से क प्रत्यय होता है, साथ ही टि-लोप और घ-आदेश भी (पाणिघः, ताडघः)।

श्लोक 2.56

आढ्यसुभगस्थूलपलितनग्नान्धप्रियेषु च्व्यर्थेष्वच्वौ कृञः करणे ख्युन्

āḍhyasubhagasthūlapalitanagnāndhapriyeṣu cvyartheṣvacvau kṛñaḥ karaṇe khyun

च्वि-अर्थ में होते हुए भी च्वि-प्रत्यय-रहित आढ्य, सुभग, स्थूल, पलित, नग्न, अन्ध और प्रिय शब्दों के उपपद होने पर करण अर्थ में कृ धातु से ख्युन् प्रत्यय होता है (आढ्यंकरणम् = धनी बनाने का साधन)।

श्लोक 2.57

कर्तरि भुवः खिष्णुच्खुकञौ

kartari bhuvaḥ khiṣṇuckhukañau

उसी प्रकार आढ्य आदि शब्दों के उपपद होने पर कर्ता के अर्थ में भू धातु से खिष्णुच् और खुकञ् प्रत्यय होते हैं (आढ्यंभविष्णुः, आढ्यंभावुकः = धनी बननेवाला)।

श्लोक 2.58

स्पृशोऽनुदके क्विन्

spṛśo'nudake kvin

उदक (जल) से भिन्न किसी भी सुबन्त के उपपद होने पर स्पृश् (छूना) धातु से क्विन् प्रत्यय होता है (मन्त्रस्पृक् = मन्त्र का स्पर्श करनेवाला)।

श्लोक 2.59

ऋत्विग्दधृक्स्रग्दिगुष्णिगञ्चुयुजिक्रुञ्चां च

ṛtvigdadhṛksragdiguṣṇigañcuyujikruñcāṁ ca

ऋत्विज्, दधृक्, स्रज्, दिश्, उष्णिह्, अञ्च्, युज् तथा क्रुञ्च् धातुओं से भी क्विन् प्रत्यय होता है (प्राङ्, युङ्, क्रुङ्)।

श्लोक 2.60

त्यदादिषु दृशोऽनालोचने कञ् च

tyadādiṣu dṛśo'nālocane kañ ca

त्यद् आदि (सर्वनाम) उपपद रहते, जानबूझकर देखने से भिन्न अर्थ में, दृश् धातु से कञ् तथा क्विन् प्रत्यय होते हैं (तादृक्, तादृश)।

श्लोक 2.61

सत्सूद्विषद्रुहदुहयुजविदभिदच्छिदजिनीराजामुपसर्गेऽपि क्विप्

satsūdviṣadruhaduhayujavidabhidacchidajinīrājāmupasarge'pi kvip

उपसर्ग-सहित अथवा उपसर्ग-रहित सुबन्त उपपद रहने पर सद्, सू, द्विष्, द्रुह्, दुह्, युज्, विद्, भिद्, छिद्, जि, नी और राजृ धातुओं से क्विप् प्रत्यय होता है (विद्वान्, भूमिभृत्)।

श्लोक 2.62

भजो ण्विः

bhajo ṇviḥ

उपसर्ग-सहित अथवा उपसर्ग-रहित सुबन्त उपपद रहने पर भज् (बाँटना) धातु से ण्वि प्रत्यय होता है (अर्धभाक् = आधे का हिस्सेदार)।

श्लोक 2.63

छन्दसि सहः

chandasi sahaḥ

वेद-विषय में सुबन्त उपपदक सह् (सहना/जीतना) धातु से ण्वि प्रत्यय होता है (तुराषाट् = शीघ्र विजयी)।

श्लोक 2.64

वहश्च

vahaśca

वेद-विषय में वह् (ढोना) धातु से भी ण्वि प्रत्यय होता है (दित्यवाट्)।

श्लोक 2.65

काव्यपुरीषपुरीष्येषु ञ्युट्

kāvyapurīṣapurīṣyeṣu ñyuṭ

काव्य, पुरीष तथा पुरीष्य के उपपद होने पर वेद-विषय में वह् धातु से ञ्युट् प्रत्यय होता है (कव्यवाहनः = पितरों तक हव्य पहुँचानेवाला अग्नि)।

श्लोक 2.66

हव्येऽनन्तःपादम्

havye'nantaḥpādam

हव्य शब्द के उपपद होने पर, यदि वह् ऋचा के पादमध्य में (न कि पादान्त में) आए, तो वेद-विषय में ञ्युट् प्रत्यय होता है (हव्यवाहनः)।

श्लोक 2.67

जनसनखनक्रमगमो विट्

janasanakhanakramagamo viṭ

सुबन्त उपपद रहने पर जन्, सन्, खन्, क्रम् और गम् धातुओं से वेद-विषय में विट् प्रत्यय होता है (अब्जाः = जल में जन्मा, गोषाः)।

श्लोक 2.68

अदोऽनन्ने

ado'nanne

अन्न से भिन्न सुबन्त उपपद होने पर अद् (खाना) धातु से विट् प्रत्यय होता है (आमात् = कच्चा माँस खानेवाला)।

श्लोक 2.69

क्रव्ये च

kravye ca

क्रव्य (कच्चा माँस) के उपपद होने पर भी अद् धातु से विट् प्रत्यय होता है (क्रव्यात् = मांसभक्षी, राक्षस)।

श्लोक 2.70

दुहः कप् घश्च

duhaḥ kap ghaśca

सुबन्त उपपद रहने पर दुह् (दुहना) धातु से कप् प्रत्यय होता है और साथ ही घकारान्त आदेश भी (कामदुघा = इच्छा पूरी करनेवाली गौ)।

श्लोक 2.71

मन्त्रे श्वेतवहोक्थशस्पुरोडाशो ण्विन्

mantre śvetavahokthaśaspuroḍāśo ṇvin

मन्त्र-विषय में श्वेत-उपपदक वह्, उक्थ-उपपदक शंस् तथा पुरस्-उपपदक दाश् धातुओं से ण्विन् प्रत्यय होता है, साथ ही कुछ विशेष रूपों का भी निपातन (श्वेतवाः, पुरोडाः = पुरोडाश)।

श्लोक 2.72

अवे यजः

ave yajaḥ

अव-उपसर्गपूर्वक यज् (यजन करना) धातु से मन्त्र-विषय में ण्विन् प्रत्यय होता है (अवयाः)।

श्लोक 2.73

विच् उपे छन्दसि

vic upe chandasi

उप-उपसर्गपूर्वक यज् धातु से वेद-विषय में विच् प्रत्यय होता है (उपयट्)।

श्लोक 2.74

आतो मनिन्क्वनिब्वनिपश्च

āto maninkvanibvanipaśca

सुबन्त तथा उपसर्ग के उपपद होने पर आकारान्त धातु से मनिन्, क्वनिप् और वनिप् प्रत्यय होते हैं (सुदामा, सुधीवा, भूरिदावा)।

श्लोक 2.75

अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते

anyebhyo'pi dṛśyante

अकारान्त से भिन्न धातुओं से भी (शास्त्रीय प्रयोगों में) मनिन्, क्वनिप्, वनिप् तथा विच् प्रत्यय पाए जाते हैं (सुशर्मा, प्रातरित्वा, विजावा)।

श्लोक 2.76

क्विप् च

kvip ca

सुबन्त उपपद रहने पर (शेष सभी) धातुओं से क्विप् प्रत्यय होता है, जिसमें केवल व् शेष रहता है (उखास्रत्, पर्णध्वत्)।

श्लोक 2.77

स्थः क च

sthaḥ ka ca

सुबन्त तथा उपसर्ग के उपपद होने पर स्था (खड़ा होना) धातु से क तथा क्विप् दोनों प्रत्यय होते हैं (शंस्थः/शंस्थाः)।

श्लोक 2.78

सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये

supyajātau ṇinistācchīlye

जाति-वाचक से भिन्न सुबन्त उपपद रहने पर, स्वभाव (ताच्छील्य) के अर्थ में, धातु से णिनि प्रत्यय होता है (उष्णभोजी = सदैव गरम भोजन करनेवाला)।

श्लोक 2.79

कर्तर्युपमाने

kartaryupamāne

कर्ता के अर्थ में उपमान-वाचक उपपद रहने पर धातु से णिनि प्रत्यय होता है (उष्ट्रक्रोशी = ऊँट की तरह चिल्लानेवाला)।

श्लोक 2.80

व्रते

vrate

व्रत के गम्यमान होने पर सुबन्त उपपद रहने पर धातु से णिनि प्रत्यय होता है (स्थण्डिलशायी = भूमि पर सोने का व्रत रखनेवाला)।

श्लोक 2.81

बहुलमाभीक्ष्ण्ये

bahulamābhīkṣṇye

बार-बार करने (आभीक्ष्ण्य) के अर्थ में धातु से अनियमित रूप से णिनि प्रत्यय होता है (कषायपायी = बार-बार काढ़ा पीनेवाला)।

श्लोक 2.82

मनः

manaḥ

सुबन्त उपपद रहने पर मन् (मानना) धातु से णिनि प्रत्यय होता है (दर्शनीयमानी = अपने को सुन्दर माननेवाला)।

श्लोक 2.83

आत्ममाने खश्च

ātmamāne khaśca

अपने आप को (ऐसा) मानने के अर्थ में सुबन्त उपपद रहने पर मन् धातु से खश् प्रत्यय भी होता है, साथ ही मुँम् आगम (पण्डितम्मन्यः = अपने को विद्वान् माननेवाला)।

श्लोक 2.84

भूते

bhūte

यहाँ से आगे, लट् (वर्तमान काल) के सूत्र से पहले तक, विहित णिनि प्रत्यय भूतकाल (बीता हुआ कर्म) के अर्थ में समझा जाए।

श्लोक 2.85

करणे यजः

karaṇe yajaḥ

करण-वाचक उपपद रहने पर, भूतकाल के अर्थ में, यज् धातु से णिनि प्रत्यय होता है (सोमयाजी = जिसने सोम से यज्ञ किया)।

श्लोक 2.86

कर्मणि हनः

karmaṇi hanaḥ

कर्मरूप उपपद रहने पर, भूतकाल के अर्थ में, हन् धातु से णिनि प्रत्यय होता है (पितृव्यघाती)।

श्लोक 2.87

ब्रह्मभ्रूणवृत्रेषु क्विप्

brahmabhrūṇavṛtreṣu kvip

कर्मरूप ब्रह्म, भ्रूण और वृत्र के उपपद होने पर, भूतकाल के अर्थ में, हन् धातु से क्विप् प्रत्यय होता है (ब्रह्महा, वृत्रहा)।

श्लोक 2.88

बहुलं छन्दसि

bahulaṁ chandasi

वेद-विषय में अन्य उपपदों के साथ भी हन् धातु से अनियमित रूप से क्विप् प्रत्यय होता है (मातृघातः, पितृघातः)।

श्लोक 2.89

सुकर्मपापमन्त्रपुण्येषु कृञः

sukarmapāpamantrapuṇyeṣu kṛñaḥ

सु तथा कर्मरूप कर्मन्, पाप, मन्त्र और पुण्य के उपपद होने पर कृ धातु से क्विप् प्रत्यय होता है (सुकृत्, पापकृत्, पुण्यकृत्)।

श्लोक 2.90

सोमे सुञः

some suñaḥ

कर्मरूप सोम के उपपद होने पर सु (अभिषव करना) धातु से क्विप् प्रत्यय होता है (सोमसुत् = सोम निचोड़नेवाला)।

श्लोक 2.91

अग्नौ चेः

agnau ceḥ

कर्मरूप अग्नि के उपपद होने पर चि (चयन करना) धातु से क्विप् प्रत्यय होता है (अग्निचित् = अग्नि को चुनकर/सजाकर स्थापित करनेवाला)।

श्लोक 2.92

कर्मण्यग्न्याख्यायाम्

karmaṇyagnyākhyāyām

कर्मरूप शब्द के उपपद होने पर चि धातु से क्विप् प्रत्यय होता है, बशर्ते बना हुआ पद स्वयं अग्नि का ही नाम हो (श्येनचित् = श्येन के आकार में सजाई अग्नि)।

श्लोक 2.93

कर्मणीनिर्विक्रियः

karmaṇīnirvikriyaḥ

कर्मरूप उपपद रहने पर वि-उपसर्गपूर्वक क्री (बेचना) धातु से इनि प्रत्यय होता है (सोमविक्रयी = सोम बेचनेवाला)।

श्लोक 2.94

दृशेः क्वनिप्

dṛśeḥ kvanip

कर्मरूप उपपद रहने पर, भूतकाल के अर्थ में, दृश् (देखना) धातु से क्वनिप् प्रत्यय होता है (पारदृश्वा = जिसने पार देख लिया हो, पारंगत)।

श्लोक 2.95

राजनि युधिकृञः

rājani yudhikṛñaḥ

कर्मरूप राजन् के उपपद होने पर, भूतकाल के अर्थ में, युध् (णिजन्त, लड़वाना) और कृ धातुओं से क्वनिप् प्रत्यय होता है (राजयुध्वा, राजकृत्वा)।

श्लोक 2.96

सहे च

sahe ca

सह उपपद रहने पर, भूतकाल के अर्थ में, युध् और कृ धातुओं से क्वनिप् प्रत्यय होता है (सहयुध्वा = साथ लड़नेवाला)।

श्लोक 2.97

सप्तम्यां जनेर्डः

saptamyāṁ janerḍaḥ

सप्तम्यन्त पद के उपपद होने पर जन् (जन्मना) धातु से ड प्रत्यय होता है (सरसिजः = तालाब में जन्मा, कमल)।

श्लोक 2.98

पञ्चम्यामजातौ

pañcamyāmajātau

जातिवाचक से भिन्न पञ्चम्यन्त पद के उपपद होने पर जन् धातु से ड प्रत्यय होता है (शोकजः = शोक से उत्पन्न)।

श्लोक 2.99

उपसर्गे च संज्ञायाम्

upasarge ca saṁjñāyām

उपसर्ग उपपद होने पर, संज्ञा (नाम) के अर्थ में, जन् धातु से ड प्रत्यय होता है (प्रजाः = सन्तान)।

श्लोक 2.100

अनौ कर्मणि

anau karmaṇi

कर्मरूप उपपद रहने पर अनु-उपसर्गपूर्वक जन् धातु से ड प्रत्यय होता है (पुमनुजः)।

श्लोक 2.101

अन्येष्वपि दृश्यते

anyeṣvapi dṛśyate

अन्य कारकों के उपपद होने पर भी (शास्त्रीय प्रयोग में) जन् धातु से ड प्रत्यय पाया जाता है (ब्राह्मणजः, परिखा)।

श्लोक 2.102

निष्ठा

niṣṭhā

भूतकाल के अर्थ में धातु से क्त और क्तवतु प्रत्यय होते हैं; इन दोनों की संज्ञा 'निष्ठा' है (स्तुतः, भिन्नवान्)।

श्लोक 2.103

सुयजोर्ङ्वनिप्

suyajorṅvanip

सु (अभिषव करना) तथा यज् (यजन करना) धातुओं से क्वनिप्-सदृश ङ्वनिप् प्रत्यय होता है (सुत्वा, यज्वा = यज्ञकर्ता)।

श्लोक 2.104

जीर्यतेरतृन्

jīryateratṛn

जॄ (बूढ़ा होना) धातु से भूतकाल के अर्थ में अतृन् प्रत्यय होता है (जरन्तौ = बूढ़े हो चुके दो)।

श्लोक 2.105

छन्दसि लिट्

chandasi liṭ

वेद-विषय में धातु से भूतकाल के अर्थ में लिट् लकार होता है (ददर्श, आततान)।

श्लोक 2.106

लिटः कानच् वा

liṭaḥ kānac vā

लिट् के स्थान पर विकल्प से कानच् आदेश होता है (चक्राणः = किया हुआ)।

श्लोक 2.107

क्वसुश्च

kvasuśca

वेद-विषय में लिट् के स्थान पर क्वसु आदेश भी होता है (गम्वस्)।

श्लोक 2.108

भाषायां सदवसश्रुवः

bhāṣāyāṁ sadavasaśruvaḥ

लौकिक संस्कृत में सद्, वस् और श्रु धातुओं के लिट् के स्थान पर विकल्प से क्वसु आदेश होता है (सेदिवान्, ऊषिवान्, शुश्रुवान्)।

श्लोक 2.109

उपेयिवाननाश्वाननूचानश्च

upeyivānanāśvānanūcānaśca

'उपेयिवान्', 'अनाश्वान्' तथा 'अनूचानः' शब्दों का निपातन होता है।

श्लोक 2.110

लुङ्

luṅ

भूतकाल के सामान्य अर्थ में धातु से लुङ् (अनद्यतन-निरपेक्ष भूत) लकार होता है (अभूत् = हुआ)।

श्लोक 2.111

अनद्यतने लङ्

anadyatane laṅ

जब क्रिया आज से पहले घटित हुई प्रकट हो, तब धातु से लङ् (अनद्यतन भूत) लकार होता है (अभवत् = हुआ था, आज से पहले)।

श्लोक 2.112

अभिज्ञावचने लृट्

abhijñāvacane lṛṭ

स्मृति सूचित करनेवाले शब्द (अभिजानासि आदि) के उपपद होने पर, अनद्यतन भूत की बात होने पर भी, धातु से लृट् (सामान्य भविष्यत्) प्रत्यय होता है (अभिजानासि, कश्मीरेषु वत्स्यामः = याद है, हम कश्मीर में रहा करते थे)।

श्लोक 2.113

न यदि

na yadi

यदि 'यत्' शब्द भी साथ हो, तो स्मृति-सूचक उपपद रहते हुए भी लृट् प्रत्यय नहीं होता (अन्य उपयुक्त लकार का प्रयोग होता है)।

श्लोक 2.114

विभाषा साकाङ्क्षे

vibhāṣā sākāṅkṣe

यदि वाक्य अभी अधूरा (साकांक्ष) हो — अर्थात् आगे और कुछ कहना शेष हो — तो 'यत्'-सहित अथवा असहित स्मृति-सूचक उपपद रहते विकल्प से लट् (वर्तमानकालिक) प्रत्यय भी होता है।

श्लोक 2.115

परोक्षे लिट्

parokṣe liṭ

अनद्यतन तथा परोक्ष (जिसके साक्षी हम स्वयं न रहे हों) भूतकाल में धातु से लिट् (परोक्ष भूत/पूर्ण भूत) लकार होता है (बभूव = हो चुका था)।

श्लोक 2.116

हशश्वतोर्लङ् च

haśaśvatorlaṅ ca

'ह' तथा 'शश्वत्' के उपपद होने पर, परोक्ष भूत में भी, धातु से लङ् प्रत्यय विकल्प से होता है, लिट् के साथ (इति हाकरोत्/इति ह चकार)।

श्लोक 2.117

प्रश्ने चासन्नकाले

praśne cāsannakāle

निकट भूतकाल (आसन्न काल) से सम्बन्धित प्रश्न में धातु से लङ् और लट् दोनों लकार होते हैं (देवदत्तोऽगच्छत् किम्?/देवदत्तो गच्छति किम्?)।

श्लोक 2.118

लट् स्मे

laṭ sme

'स्म' शब्द के उपपद होने पर, अनद्यतन-अपरोक्ष भूत के अर्थ में भी, धातु से लट् (वर्तमानकालिक) प्रत्यय होता है (युधिष्ठिरो यजते स्म = युधिष्ठिर यज्ञ किया करते थे)।

श्लोक 2.119

अपरोक्षे च

aparokṣe ca

साक्षात् देखे गए (अपरोक्ष) अनद्यतन भूतकाल में भी, 'स्म' शब्द के उपपद होने पर, धातु से लट् प्रत्यय होता है (गुरुर्माम् अध्यापयति स्म = गुरु मुझे पढ़ाया करते थे)।

श्लोक 2.120

ननौ पृष्टप्रतिवचने

nanau pṛṣṭaprativacane

'ननु' शब्द के उपपद होने पर, भूतकालिक प्रश्न के उत्तर में, धातु से लट् प्रत्यय होता है (ननु करोमि भोः = जी हाँ, मैं करता हूँ/कर चुका हूँ)।

श्लोक 2.121

नन्वोर्विभाषा

nanvorvibhāṣā

भूतकालिक प्रश्न के उत्तर में 'न' तथा 'नु' के उपपद होने पर धातु से विकल्प से लट् प्रत्यय होता है।

श्लोक 2.122

पुरि लुङ् चास्मे

puri luṅ cāsme

'स्म' के बिना 'पुरा' शब्द के उपपद होने पर धातु से लुङ् प्रत्यय भी (लट्, लङ्, लिट् के साथ विकल्पतः) होता है (पुराऽयासीत्)।

श्लोक 2.123

वर्तमाने लट्

vartamāne laṭ

वर्तमानकाल के अर्थ में धातु से लट् लकार होता है (पचति = पकाता है)।

श्लोक 2.124

लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे

laṭaḥ śatṛśānacāvaprathamāsamānādhikaraṇe

प्रथमा-विभक्ति से भिन्न समानाधिकरण (एक ही विशेष्य से सम्बद्ध) प्रयोग में लट् के स्थान पर शतृ और शानच् आदेश होते हैं (पचन्तम्, पचमानम्)।

श्लोक 2.125

सम्बोधने च

sambodhane ca

सम्बोधन (पुकारने) की स्थिति में भी लट् के स्थान पर शतृ और शानच् आदेश होते हैं (हे पचन्, हे पचमान)।

श्लोक 2.126

लक्षणहेत्वोः क्रियायाः

lakṣaṇahetvoḥ kriyāyāḥ

किसी क्रिया के चिह्न (लक्षण) या कारण (हेतु) के अर्थ में भी लट् के स्थान पर शतृ और शानच् आदेश होते हैं (शयानो भुङ्क्ते = लेटा हुआ खा रहा है)।

श्लोक 2.127

तौ सत्

tau sat

शतृ और शानच् — इन दोनों प्रत्ययों की सामूहिक संज्ञा 'सत्' है।

श्लोक 2.128

पूङ्यजोः शानन्

pūṅyajoḥ śānan

पूङ् (पवित्र करना) तथा यज् (यजन करना) धातुओं से शानच् के स्थान पर विशेष रूप से शानन् प्रत्यय होता है (पवमानः, यजमानः)।

श्लोक 2.129

ताच्छील्यवयोवचनशक्तिषु चानश्

tācchīlyavayovacanaśaktiṣu cānaś

स्वाभाविक प्रवृत्ति (ताच्छील्य), आयु-सूचन (वयोवचन) तथा समर्थता (शक्ति) के अर्थों में धातु से चानश् प्रत्यय होता है (मुण्डयमानाः = मुंडन कराए हुए)।

श्लोक 2.130

इङ्धार्योः शतृ ऋच्छ्रिणि

iṅdhāryoḥ śatṛ ṛcchriṇi

इङ् (पढ़ना) तथा धारि (णिजन्त धृ) धातुओं से वर्तमानकाल में शतृ प्रत्यय होता है, यदि क्रिया कष्टसाध्य (ऋच्छ्रि) न हो (अधीयन्, धारयन्)।

श्लोक 2.131

द्विषोऽमित्रे

dviṣo'mitre

शत्रु (अमित्र) के अर्थ में द्विष् (घृणा करना) धातु से वर्तमानकाल में शतृ प्रत्यय होता है (द्विषन् = शत्रु)।

श्लोक 2.132

सुञो यज्ञसंयोगे

suño yajñasaṁyoge

यज्ञ से जुड़े अभिषव के अर्थ में सु (निचोड़ना) धातु से वर्तमानकाल में शतृ प्रत्यय होता है (सुन्वन्तः = सोम निचोड़ते हुए)।

श्लोक 2.133

अर्हः पूजायाम्

arhaḥ pūjāyām

प्रशंसा (पूजा) के अर्थ में अर्ह् धातु से शतृ प्रत्यय होता है (अर्हन् = प्रशंसा के योग्य)।

श्लोक 2.134

आक्वेस्तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिषु

ākvestacchīlataddharmatatsādhukāriṣu

यहाँ से लेकर 'भ्राजभासधुर्विद्युतोर्जिपॄजुग्रावस्तुवः क्विप्' (3.2.177) तक विहित सभी प्रत्यय तच्छील (स्वभाव से किसी कार्य में लगे रहना), तद्धर्म (कर्तव्य समझकर वैसा करना) और तत्साधुकारिता (उसे कुशलतापूर्वक करना) — इन तीन अर्थों में प्रयुक्त होते हैं।

श्लोक 2.135

तृन्

tṛn

तच्छील आदि अर्थों में कर्ता वाची धातु से तृन् प्रत्यय होता है (कर्ता = बनाने का स्वभाव रखनेवाला)।

श्लोक 2.136

अलंकृञ्निराकृञ्प्रजनोत्पचोत्पतोन्मदरुच्यपत्रपवृतुवृधुसहचर इष्णुच्

alaṁkṛñnirākṛñprajanotpacotpatonmadarucyapatrapavṛtuvṛdhusahacara iṣṇuc

अलंकृ, निराकृ, प्रजन्, उत्पच्, उत्पत्, उन्मद्, रुच्, अपत्रप्, वृत्, वृध्, सह् और चर् — इन धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में इष्णुच् प्रत्यय होता है (अलंकरिष्णुः, वर्धिष्णुः, सहिष्णुः = सहनशील)।

श्लोक 2.137

णेश्छन्दसि

ṇeśchandasi

वेद-विषय में णिजन्त (णिच्-प्रत्ययान्त) धातु से भी तच्छील आदि अर्थों में इष्णुच् प्रत्यय होता है (धारयिष्णवः)।

श्लोक 2.138

भुवश्च

bhuvaśca

भू धातु से भी वेद-विषय में तच्छील आदि अर्थों में इष्णुच् प्रत्यय होता है (भविष्णुः)।

श्लोक 2.139

ग्लाजिस्थश्च क्स्नुः

glājisthaśca ksnuḥ

ग्लै, जि और स्था धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में क्स्नु प्रत्यय होता है (ग्लास्नुः, जिष्णुः, स्थास्नुः)।

श्लोक 2.140

त्रसिगृधिधृषिक्षिपेः क्नुः

trasigṛdhidhṛṣikṣipeḥ knuḥ

त्रस्, गृध्, धृष् और क्षिप् धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में क्नु प्रत्यय होता है (त्रस्नुः, गृध्नुः, धृष्णुः)।

श्लोक 2.141

शमित्यष्टाभ्यो घिनुण्

śamityaṣṭābhyo ghinuṇ

शम् आदि आठ धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में घिनुण् प्रत्यय होता है (शमी, दमी, क्षमी = क्षमाशील)।

श्लोक 2.142

संपृचानुरुधाङ्यमाङ्यसपरिसृसंसृजपरिदेविसंज्वरपरिक्षिपपरिवदपरिदहपरिमुहदुषद्विषद्रुहदुहयुजाक्रीडविविचत्यजरजभजातिचरापचरामुषाभ्याहनश्च

saṁpṛcānurudhāṅyamāṅyasaparisṛsaṁsṛjaparidevisaṁjvaraparikṣipaparivadaparidahaparimuhaduṣadviṣadruhaduhayujākrīḍavivicatyajarajabhajāticarāpacarāmuṣābhyāhanaśca

सम्पृच्, अनुरुध्, आङ्यम्, आङ्यस्, परिसृ, संसृज्, परिदेवि, संज्वर्, परिक्षिप्, परिवद्, परिदह्, परिमुह्, दुष्, द्विष्, द्रुह्, दुह्, युज्, आक्रीड्, विविच्, त्यज्, रज्, भज्, अतिचर्, अपचर्, आमुष् और अभ्याहन् — इन बहुत-सी धातुओं से भी तच्छील आदि अर्थों में घिनुण् प्रत्यय होता है (सम्पर्की, अनुरोधी, परिवादी)।

श्लोक 2.143

वौ कषलसकत्थस्रम्भः

vau kaṣalasakatthasrambhaḥ

वि-उपसर्गपूर्वक कष्, लस्, कत्थ् और स्त्रम्भु धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में घिनुण् प्रत्यय होता है (विकाषी, विलासी, विकत्थी)।

श्लोक 2.144

अपे च लषः

ape ca laṣaḥ

अप-उपसर्गपूर्वक (तथा वि-उपसर्गपूर्वक भी) लष् धातु से तच्छील आदि अर्थों में घिनुण् प्रत्यय होता है (अपलाषी, विलाषी)।

श्लोक 2.145

प्रे लपसृद्रुमथवदवसः

pre lapasṛdrumathavadavasaḥ

प्र-उपसर्गपूर्वक लप्, सृ, द्रु, मन्थ्, वद् और वस् धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में घिनुण् प्रत्यय होता है (प्रलापी, प्रवासी)।

श्लोक 2.146

निन्दहिंसक्लिशखादविनाशपरिक्लिशपरिरटपरिवादिव्याभाषासूयो वुञ्

nindahiṁsakliśakhādavināśaparikliśapariraṭaparivādivyābhāṣāsūyo vuñ

निन्द्, हिंस्, क्लिश्, खाद्, विनाश् (णिजन्त नश्), परिक्लिश्, परिरट्, परिवादि (णिजन्त वद्), व्याभाष् (व्याङ्+भाष्) तथा असूय् धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में वुञ् प्रत्यय होता है (निन्दकः, हिंसकः, असूयकः)।

श्लोक 2.147

देविक्रुशोश्चोपसर्गे

devikruśoścopasarge

उपसर्गयुक्त णिजन्त दिव् तथा क्रुश् धातुओं से भी तच्छील आदि अर्थों में वुञ् प्रत्यय होता है (आदेवकः, आक्रोशकः)।

श्लोक 2.148

चलनशब्दार्थादकर्मकाद् युच्

calanaśabdārthādakarmakād yuc

चलने या शब्द करने के अर्थवाली अकर्मक धातु से तच्छील आदि अर्थों में युच् प्रत्यय होता है (चलनः, शब्दनः)।

श्लोक 2.149

अनुदात्तेतश्च हलादेः

anudāttetaśca halādeḥ

व्यञ्जन से आरम्भ होनेवाली, अनुदात्त-इत् (अनुदात्त स्वरवाला इत्-चिह्न रखनेवाली) अकर्मक धातु से भी युच् प्रत्यय होता है (वर्तनः, स्पर्धनः)।

श्लोक 2.150

जुचङ्क्रम्यदन्द्रम्यसृगृधिज्वलशुचलषपतपदः

jucaṅkramyadandramyasṛgṛdhijvalaśucalaṣapatapadaḥ

जु, चङ्क्रम्य (यङन्त क्रम्), दन्द्रम्य (यङन्त द्रम्), सृ, गृध्, ज्वल्, शुच्, लष्, पत् तथा पद् धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में युच् प्रत्यय होता है (जवनः, सरणः, ज्वलनः)।

श्लोक 2.151

क्रुधमण्डार्थेभ्यश्च

krudhamaṇḍārthebhyaśca

क्रोध के अर्थवाली तथा शृंगार/भूषण के अर्थवाली धातुओं से भी तच्छील आदि अर्थों में युच् प्रत्यय होता है (क्रोधनः, भूषणः)।

श्लोक 2.152

न यः

na yaḥ

यकारान्त धातु से युच् प्रत्यय नहीं होता (इसके बदले तृन् प्रत्यय होता है)।

श्लोक 2.153

सूददीपदीक्षश्च

sūdadīpadīkṣaśca

सूद्, दीप् और दीक्ष् धातुओं से भी युच् प्रत्यय नहीं होता।

श्लोक 2.154

लषपतपदस्थाभूवृषहनकमगमशॄभ्य उकञ्

laṣapatapadasthābhūvṛṣahanakamagamaśṝbhya ukañ

लष्, पत्, पद्, स्था, भू, वृष्, हन्, कम्, गम् और शॄ धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में उकञ् प्रत्यय होता है (अपलाषुकम् = इच्छुक)।

श्लोक 2.155

जल्पभिक्षकुट्टलुण्टवृङ्भ्यः षाकन्

jalpabhikṣakuṭṭaluṇṭavṛṅbhyaḥ ṣākan

जल्प् (बोलना), भिक्ष् (माँगना), कुट्ट् (कूटना), लुण्ट् (लूटना) और वृङ् (सेवा करना) धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में षाकन् प्रत्यय होता है (जल्पाकः, भिक्षाकः, वराकः = दीन)।

श्लोक 2.156

प्रजोरिनिः

prajoriniḥ

प्र-उपसर्गपूर्वक जि (जीतना) धातु से तच्छील आदि अर्थों में इनि प्रत्यय होता है (प्रजवी = तीव्रगामी)।

श्लोक 2.157

जिदृक्षिविश्रीण्वमाव्यथाभ्यमपरिभूप्रसूभ्यश्च

jidṛkṣiviśrīṇvamāvyathābhyamaparibhūprasūbhyaśca

जि, दृ, क्षि, विश्रि, इण्, वम्, अव्यथ्, अभ्यम्, परिभू और प्रसू धातुओं से भी तच्छील आदि अर्थों में इनि प्रत्यय होता है (जयी, वमी, परिभवी)।

श्लोक 2.158

स्पृहिगृहिपतिदयिनिद्रातन्द्राश्रद्धाभ्य आलुच्

spṛhigṛhipatidayinidrātandrāśraddhābhya āluc

स्पृह्, गृह्, पत्, दय्, निद्रा, तन्द्रा और श्रद्धा धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में आलुच् प्रत्यय होता है (दयालुः, श्रद्धालुः, निद्रालुः)।

श्लोक 2.159

दाधेट्सिशदसदः उः

dādheṭsiśadasadaḥ uḥ

दा, धेट्, सि, शद् और सद् धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में उ प्रत्यय होता है (दारुः, सद्रुः)।

श्लोक 2.160

सृघस्यदःक्मरच्

sṛghasyadaḥkmarac

सृ, घस् और अद् धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में क्मरच् प्रत्यय होता है (सृमरः, घस्मरः = खूब खानेवाला)।

श्लोक 2.161

भञ्जभासमिदो घुरच्

bhañjabhāsamido ghurac

भञ्ज्, भास् और भिद् धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में घुरच् प्रत्यय होता है (भङ्गुरम् = टूटनेवाला)।

श्लोक 2.162

विदिभिदिच्छिदेः कुरच्

vidibhidicchideḥ kurac

विद् (जानना), भिद् और छिद् धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में कुरच् (उर) प्रत्यय होता है (विदुरः = ज्ञानी, भिदुरम्)।

श्लोक 2.163

इण्नश्जिसर्तिभ्यः क्वरप्

iṇnaśjisartibhyaḥ kvarap

इण्, नश्, जि और सृ धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में क्वरप् (वर) प्रत्यय होता है (इत्वरः, नश्वरः = नाशवान्)।

श्लोक 2.164

गत्वरश्च

gatvaraśca

गम् धातु से भी क्वरप् प्रत्यय होता है, साथ ही अनुनासिक-लोप (गत्वरः = गतिशील)।

श्लोक 2.165

जागरूकः

jāgarūkaḥ

जागृ (जागना) धातु से तच्छील आदि अर्थों में ऊक प्रत्यय के साथ 'जागरूकः' शब्द बनता है (सावधान)।

श्लोक 2.166

यजजपदशां यङः

yajajapadaśāṁ yaṅaḥ

यङन्त (द्वित्व-गहन) यज्, जप् और दंश् धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में ऊक प्रत्यय होता है (यायजूकः, जञ्जपूकः)।

श्लोक 2.167

नमिकम्पिस्म्यजसकमहिंसदीपो रः

namikampismyajasakamahiṁsadīpo raḥ

नम्, कम्प्, स्मि, अजस् (यङन्त), कम्, हिंस् और दीप् धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में र प्रत्यय होता है (नम्रः, कम्प्रः = काँपनेवाला)।

श्लोक 2.168

सन्नाशंसभिक्ष उः

sannāśaṁsabhikṣa uḥ

सन्-प्रत्ययान्त धातु से, तथा आशंस् और भिक्ष् धातुओं से, तच्छील आदि अर्थों में उ प्रत्यय होता है (चिकीर्षुः = करने का इच्छुक)।

श्लोक 2.169

विन्दुरिच्छुः

vinduricchuḥ

विद् धातु से नुँम्-आगम-सहित उ प्रत्यय के साथ 'विन्दुः' तथा इष् धातु से ष्-को-छ्-आदेश-सहित उ प्रत्यय के साथ 'इच्छुः' शब्द निपातित होते हैं।

श्लोक 2.170

क्यात् छन्दसि

kyāt chandasi

वेद-विषय में क्यच्/क्यङ्/क्यष्-प्रत्ययान्त धातु से तच्छील आदि अर्थों में उ प्रत्यय होता है (देवयुः, सुम्नयुः)।

श्लोक 2.171

आतृगमहनजनः किकिनौ लिट् च

ātṛgamahanajanaḥ kikinau liṭ ca

अकारान्त, ऋकारान्त, गम्, हन् और जन् धातुओं से वेद-विषय में क तथा किन् प्रत्यय होते हैं, जो लिट्-वत् व्यवहृत होते हैं (ददिः, जग्मिः)।

श्लोक 2.172

स्वपितृषोर्नजिङ्

svapitṛṣornajiṅ

स्वप् (सोना) और तृष् (प्यासा होना) धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में नजिङ् प्रत्यय होता है (स्वप्नजः, तृष्णजः)।

श्लोक 2.173

शॄवन्द्योरारुः

śṝvandyorāruḥ

शॄ (हिंसा करना) और वन्द् (नमन करना) धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में आरु प्रत्यय होता है (शरारुः = हिंसक, वन्दारुः = वन्दना करनेवाला)।

श्लोक 2.174

भियः क्रुक्लुकनौ

bhiyaḥ kruklukanau

भी (डरना) धातु से तच्छील आदि अर्थों में क्रु तथा लुकन् प्रत्यय होते हैं (भीरुः, भीलुकः = डरपोक)।

श्लोक 2.175

स्थेशभासपिसकसो वरच्

stheśabhāsapisakaso varac

स्था, ईश्, भास्, पिस् और कस् धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में वरच् प्रत्यय होता है (स्थावरः = स्थिर, ईश्वरः = शासक, भास्वरः = चमकीला)।

श्लोक 2.176

यश्च यङः

yaśca yaṅaḥ

यङन्त या (जाना) धातु से भी वरच् प्रत्यय होता है (यायावरः = घुमक्कड़)।

श्लोक 2.177

भ्राजभासधुर्विद्युतोर्जिपॄजुग्रावस्तुवः क्विप्

bhrājabhāsadhurvidyutorjipṝjugrāvastuvaḥ kvip

भ्राज्, भास्, धुर्व्, द्युत्, ऊर्ज्, पॄ, जु और ग्राव-उपपदक स्तु — इन आठ धातुओं से तच्छील आदि अर्थों में क्विप् प्रत्यय होता है (विभ्राट्, भाः, धूः = बोझ)।

श्लोक 2.178

अन्येभ्योऽपि दृश्यते

anyebhyo'pi dṛśyate

इसी अर्थ में अन्य धातुओं से भी (शास्त्रीय प्रयोग में) क्विप् प्रत्यय पाया जाता है (पक्, भित्, युक्)।

श्लोक 2.179

भुवः संज्ञान्तरयोः

bhuvaḥ saṁjñāntarayoḥ

संज्ञा (नामकरण) तथा अन्तर (श्रेष्ठता/भिन्नता) के अर्थ गम्यमान होने पर भू धातु से क्विप् प्रत्यय होता है (विभूः, स्वयम्भूः, प्रतिभूः = ज़मानती)।

श्लोक 2.180

विप्रसम्भ्यो डु असंज्ञायाम्

viprasambhyo ḍu asaṁjñāyām

वि, प्र और सम् उपसर्गपूर्वक भू धातु से, जब समुदाय-वाचक संज्ञा अभिप्रेत न हो, तब डु प्रत्यय होता है (विभुः, प्रभुः, सम्भुः)।

श्लोक 2.181

धः कर्मणि ष्ट्रन्

dhaḥ karmaṇi ṣṭran

धेट् (पीना) तथा धा (धारण करना) धातुओं से कर्म कारक में ष्ट्रन् प्रत्यय होता है (धात्री = धारण करनेवाली, आया)।

श्लोक 2.182

दाप्नीशसयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदशनहः करणे

dāpnīśasayuyujastutudasisicamihapatadaśanahaḥ karaṇe

करण कारक में दाप्, नी, शस्, यु, युज्, स्तु, तुद्, सि, सिच्, मिह्, पत्, दंश् और नह् — इन तेरह धातुओं से ष्ट्रन् प्रत्यय होता है (दात्रम् = हँसिया, नेत्रम् = आँख, शस्त्रम्)।

श्लोक 2.183

हलसूकरयोः पुवः

halasūkarayoḥ puvaḥ

हल के भाग तथा सूकर के भाग के अर्थ में पू/पूङ् धातु से करण कारक में ष्ट्रन् प्रत्यय होता है (पोत्रम् = हल की फाल/सूकर की थूथन)।

श्लोक 2.184

अर्तिलूधूसूखनसहचर इत्रः

artilūdhūsūkhanasahacara itraḥ

करण कारक में ऋ, लू, धू, सू, खन्, सह् और चर् — इन सात धातुओं से इत्र प्रत्यय होता है (अरित्रम् = चप्पू, खनित्रम् = खुरपी)।

श्लोक 2.185

पुवः संज्ञायाम्

puvaḥ saṁjñāyām

संज्ञा (नामकरण) के अर्थ में पूङ्/पूञ् (शुद्ध करना) धातु से करण कारक में इत्र प्रत्यय होता है (पवित्रम् = शुद्ध करने का साधन)।

श्लोक 2.186

कर्तरि चर्षिदेवतयोः

kartari carṣidevatayoḥ

पू धातु से ऋषि-वाचक करण कारक में, तथा देवता-वाचक कर्ता कारक में, इत्र प्रत्यय होता है (पवित्रः = वह मन्त्र जिससे शुद्ध किया जाए; देवता में अग्निः पवित्रम्)।

श्लोक 2.187

ञीत इतः क्तः

ñīta itaḥ ktaḥ

ञि-इत्संज्ञक (ञीत्) धातुओं से वर्तमानकाल के अर्थ में क्त प्रत्यय होता है (मुन्नः, क्ष्विण्णः, धृष्टः)।

श्लोक 2.188

मतिबुद्धिपूजार्थेभ्यश्च

matibuddhipūjārthebhyaśca

इच्छा, ज्ञान और सत्कार के अर्थवाली धातुओं से भी वर्तमानकाल के अर्थ में क्त प्रत्यय होता है (मतः = अभीष्ट, बुद्धः, पूजितः)। इस प्रकार तृतीय अध्याय का द्वितीय पाद यहीं पूर्ण होता है।

तृतीयोऽध्यायः, तृतीयः पादः

श्लोक 3.1

उणादयो बहुलम्

uṇādayo bahulam

वर्तमान काल में संज्ञा अर्थ में धातु से अनियमित रूप से उण् आदि प्रत्यय होते हैं (कारुः = शिल्पी, कृ धातु से)।

श्लोक 3.2

भूतेऽपि दृश्यन्ते

bhūte'pi dṛśyante

भूतकाल में भी उणादि प्रत्यय पाए जाते हैं (वर्त्म = मार्ग, चर्म = चमड़ा)।

श्लोक 3.3

भविष्यति गम्यादयः

bhaviṣyati gamyādayaḥ

भविष्यत् काल में 'गमी' आदि शब्द साधु (व्याकरण-सम्मत) माने जाते हैं (आगामी, भावी)।

श्लोक 3.4

यावत्पुरानिपातयोर्लट्

yāvatpurānipātayorlaṭ

'यावत्' अथवा 'पुरा' निपात के उपपद होने पर भविष्यत् अर्थ में भी धातु से लट् प्रत्यय होता है (यावद् भुङ्क्ते = जब तक खाएगा)।

श्लोक 3.5

विभाषा कदाकर्ह्योः

vibhāṣā kadākarhyoḥ

'कदा' तथा 'कर्हि' के उपपद होने पर भविष्यत् अर्थ में विकल्प से लट् प्रत्यय होता है (कदा भुङ्क्ते/भोक्ष्यते = कब खाएगा)।

श्लोक 3.6

किंवृत्ते लिप्सायाम्

kiṁvṛtte lipsāyām

विभक्त्यन्त 'किम्' (या डतर/डतम-प्रत्ययान्त किम्) के उपपद होने पर, पाने की इच्छा (लिप्सा) के गम्यमान होने पर, भविष्यत् अर्थ में विकल्प से लट् प्रत्यय होता है (कं भोजयति = किसको खिलाएगा)।

श्लोक 3.7

लिप्स्यमानसिद्धौ च

lipsyamānasiddhau ca

चाही गई वस्तु की प्राप्ति के परिणामस्वरूप कुछ और सिद्ध होना अभिप्रेत होने पर भी भविष्यत् अर्थ में विकल्प से लट् प्रत्यय होता है (यो भक्तं ददाति स स्वर्गं गच्छति)।

श्लोक 3.8

लोडर्थलक्षणे च

loḍarthalakṣaṇe ca

लोट् (आज्ञा) के अर्थ को इंगित करनेवाली शर्त की स्थिति में भी भविष्यत् अर्थ में विकल्प से लट् प्रत्यय होता है (उपाध्यायश्चेद् आगच्छति, अथ त्वं पठ = यदि गुरुजी आएँ तो तुम पढ़ना)।

श्लोक 3.9

लिङ् चोर्ध्वमौहूर्तिके

liṅ cordhvamauhūrtike

एक मुहूर्त के बाद घटित होनेवाली उपर्युक्त शर्त की स्थिति में विकल्प से लिङ् (तथा लट्) प्रत्यय भी होता है (उपाध्यायश्चेद् आगच्छेत्)।

श्लोक 3.10

तुमुन्ण्वुलौ क्रियायां क्रियार्थायाम्

tumunṇvulau kriyāyāṁ kriyārthāyām

जब एक क्रिया दूसरी क्रिया के प्रयोजन के लिए हो (क्रियार्था क्रिया), तब भविष्यत् अर्थ में धातु से तुमुन् और ण्वुल् प्रत्यय होते हैं (द्रष्टुं याति = देखने जाता है, दर्शकः)।

श्लोक 3.11

भाववचनाश्च

bhāvavacanāśca

भाववाचक प्रत्यय भी, क्रियार्था क्रिया के उपपद रहने पर, तुमुन्/ण्वुल् के अर्थ में समान रूप से प्रयुक्त होते हैं (पुष्टये व्रजति = पुष्टि के लिए जाता है)।

श्लोक 3.12

अण् कर्मणि च

aṇ karmaṇi ca

कर्मरूप उपपद रहने पर भी, क्रियार्था क्रिया के प्रयोजन में, भविष्यत् अर्थ में धातु से अण् प्रत्यय होता है (काण्डलावो व्रजति = शाखा काटने जाता है)।

श्लोक 3.13

लृट् शेषे च

lṛṭ śeṣe ca

भविष्यत्काल की सामान्य अभिव्यक्ति में (चाहे क्रियार्था क्रिया हो या न हो) धातु से लृट् प्रत्यय होता है (अहं पठिष्यामि = मैं पढ़ूँगा)।

श्लोक 3.14

लृटः सत् वा

lṛṭaḥ sat vā

जब प्रथमा-विभक्ति से भिन्न किसी विभक्ति में समानाधिकरण प्रयोग हो, तब लृट् के स्थान पर विकल्प से शतृ और शानच् आदेश होते हैं (करिष्यन्तम्/करिष्यमाणम्)।

श्लोक 3.15

अनद्यतने लुट्

anadyatane luṭ

जब क्रिया का घटित होना आज के बाद के किसी दिन में हो, तब धातु से लुट् (परोक्ष भविष्यत्) प्रत्यय होता है (रावणः श्वः कर्ता = रावण कल करेगा)।

श्लोक 3.16

पदरुजविशस्पृशो घञ्

padarujaviśaspṛśo ghañ

पद्, रुज्, विश् और स्पृश् धातुओं से घञ् प्रत्यय होता है (पादः, रोगः, वेशः, स्पर्शः)।

श्लोक 3.17

सृ स्थिरे

sṛ sthire

दृढ़/स्थिर वस्तु (कर्ता) के अर्थ में सृ धातु से घञ् प्रत्यय होता है (चन्दनसारः = चन्दन का सारभाग)।

श्लोक 3.18

भावे

bhāve

भाव (धात्वर्थ मात्र, अमूर्त क्रिया-भाव) के अर्थ में धातु से घञ् प्रत्यय होता है (पाकः = पकाना, त्यागः, रागः)।

श्लोक 3.19

अकर्तरि च कारके संज्ञायाम्

akartari ca kārake saṁjñāyām

संज्ञा (नामकरण) के अर्थ में कर्ता-कारक को छोड़कर किसी भी अन्य कारक में धातु से घञ् प्रत्यय होता है (रागः = रंगने का साधन)।

श्लोक 3.20

परिमाणाख्यायां सर्वेभ्यः

parimāṇākhyāyāṁ sarvebhyaḥ

परिमाण (नाप) के नामकरण अर्थ में सभी धातुओं से घञ् प्रत्यय होता है (काराः = एक नाप-विशेष)।

श्लोक 3.21

इङः च

iṅaḥ ca

इङ् (पढ़ना) धातु से भी घञ् प्रत्यय होता है (अध्यायः = अध्ययन/अध्याय)।

श्लोक 3.22

उपसर्गे रुवः

upasarge ruvaḥ

उपसर्ग उपपद रहने पर रु (आवाज करना) धातु से घञ् प्रत्यय होता है (संरावः = शोर)।

श्लोक 3.23

समि युद्रुद्रुवः

sami yudrudruvaḥ

सम्-उपसर्गपूर्वक यु और द्रु धातुओं से घञ् प्रत्यय होता है (संयावः = हलुआ, सन्द्रावः = भागना)।

श्लोक 3.24

श्रिणीभुवोऽन्यतरस्याम्

śriṇībhuvo'nyatarasyām

उपसर्ग-रहित श्रि, नी और भू धातुओं से विकल्प से घञ् प्रत्यय होता है (श्रायः, नायः, भावः)।

श्लोक 3.25

वौ क्षुस्रुवः

vau kṣusruvaḥ

वि-उपसर्गपूर्वक क्षु और श्रु धातुओं से घञ् प्रत्यय होता है (विक्षावः, विश्रावः = अति प्रसिद्धि)।

श्लोक 3.26

अवोदोर्नियः

avodorniyaḥ

अव तथा उत् उपसर्गपूर्वक नी धातु से घञ् प्रत्यय होता है (अवनायः = पतन, उन्नायः = उन्नति)।

श्लोक 3.27

प्रे द्रुस्तुस्रुवः

pre drustusruvaḥ

प्र-उपसर्गपूर्वक द्रु, स्तु और स्रु धातुओं से घञ् प्रत्यय होता है (प्रद्रावः = भागना, प्रस्तावः, प्रस्त्रावः)।

श्लोक 3.28

निरभ्योः पूल्वोः

nirabhyoḥ pūlvoḥ

निस्-उपसर्गपूर्वक पू, और अभि-उपसर्गपूर्वक लू धातुओं से घञ् प्रत्यय होता है (निष्पावः = शुद्धीकरण, अभिलावः = काटना)।

श्लोक 3.29

उदन्योर्गृः

udanyorgṛḥ

उत् तथा नि उपसर्गपूर्वक गृ (निगलना) धातु से घञ् प्रत्यय होता है (उद्गारः = डकार, निगारः = भोजन)।

श्लोक 3.30

कॄ धान्ये

kṝ dhānye

धान्य से सम्बन्ध होने पर उत्/नि-उपसर्गपूर्वक कॄ (बिखेरना) धातु से घञ् प्रत्यय होता है (उत्कारः, निकारः = अनाज छाँटना-सम्बन्धी क्रिया)।

श्लोक 3.31

यज्ञे समि स्तुवः

yajñe sami stuvaḥ

यज्ञ-सम्बन्धी प्रयोग में सम्-उपसर्गपूर्वक स्तु धातु से घञ् प्रत्यय होता है (संस्तावः = यज्ञ में स्तुति)।

श्लोक 3.32

प्रे स्त्रोऽयज्ञे

pre stro'yajñe

यज्ञ-भिन्न विषय में प्र-उपसर्गपूर्वक स्तॄ (फैलाना) धातु से घञ् प्रत्यय होता है (प्रस्तारः = विस्तार)।

श्लोक 3.33

प्रथने वावशब्दे

prathane vāvaśabde

शब्द-भिन्न विस्तार (प्रथन) के अर्थ में वि-उपसर्गपूर्वक स्तॄ धातु से घञ् प्रत्यय होता है (विस्तारः = फैलाव)।

श्लोक 3.34

छन्दोनाम्नि च

chandonāmni ca

छन्दोविशेष (वृत्त) के नामकरण के अर्थ में नि-उपसर्गपूर्वक स्तॄ धातु से घञ् प्रत्यय होता है (विष्टारपङ्क्तिः = एक छन्द-विशेष)।

श्लोक 3.35

उदि ग्रहः

udi grahaḥ

उत्-उपसर्गपूर्वक ग्रह् धातु से घञ् प्रत्यय होता है (उद्ग्राहः = विद्या का ग्रहण/विचार)।

श्लोक 3.36

समि मुष्टौ

sami muṣṭau

मुट्ठी बांधने (मुष्टि) के अर्थ में सम्-उपसर्गपूर्वक ग्रह् धातु से घञ् प्रत्यय होता है (संग्राहः)।

श्लोक 3.37

परिन्योर्नीइणोर्द्यूताभ्रेषयोः

parinyornīiṇordyūtābhreṣayoḥ

परि-उपसर्गपूर्वक नी धातु से 'द्यूत' (जुआ) के अर्थ में, और नि-उपसर्गपूर्वक इण् धातु से 'अभ्रेष' के अर्थ में, घञ् प्रत्यय होता है (परिणयः)।

श्लोक 3.38

परावनुपात्यये इणः

parāvanupātyaye iṇaḥ

क्रमबद्ध पुनरावृत्ति (अनुपात्यय, परिपाटी) के अर्थ में परि-उपसर्गपूर्वक इण् धातु से घञ् प्रत्यय होता है (पर्यायः = क्रम)।

श्लोक 3.39

व्युपयोः शेतेः पर्याये

vyupayoḥ śeteḥ paryāye

क्रम (पर्याय) के अर्थ में वि तथा उप उपसर्गपूर्वक शीङ् (सोना) धातु से घञ् प्रत्यय होता है (विशायः)।

श्लोक 3.40

हस्त आदाने चेरस्तेये

hasta ādāne cerasteye

चोरी से भिन्न, हाथ से पकड़ने (हस्त-आदान) के अर्थ में चि धातु से घञ् प्रत्यय होता है (प्रचायः)।

श्लोक 3.41

निवासचितिशरीरोपसमाधानेष्वादेश्च कः

nivāsacitiśarīropasamādhāneṣvādeśca kaḥ

निवास, चिति (चेतना), शरीर तथा उपसमाधान (ढेर लगाना) के अर्थों में चि धातु से घञ् प्रत्यय होता है, और आदि-वर्ण के स्थान पर ककार आदेश भी (निकायः = आवास/समूह)।

श्लोक 3.42

सङ्घे च अनौत्तराधर्ये

saṅghe ca anauttarādharye

पहले-बाद के क्रम (औत्तराधर्य) से भिन्न, केवल समूह (संघ) के अर्थ में चि धातु से घञ् प्रत्यय होता है (ब्राह्मणनिकायः = ब्राह्मणों का समूह)।

श्लोक 3.43

कर्मव्यतिहारे णच् स्त्रियाम्

karmavyatihāre ṇac striyām

पारस्परिक क्रिया-विनिमय (एक-दूसरे पर की गई क्रिया) के अर्थ में, स्त्रीलिंग में, धातु से णच् प्रत्यय होता है (व्यावक्रोशी = परस्पर चिल्लाना)।

श्लोक 3.44

अभिविधौ भावे इनुण्

abhividhau bhāve inuṇ

पूर्णतः व्याप्त होने (अभिविधि) के अर्थ में भाव-वाची धातु से इनुण् प्रत्यय होता है (सांकूटिनम् = पूरी तरह कुटिलतापूर्ण)।

श्लोक 3.45

आक्रोशेऽवन्योर्ग्रहः

ākrośe'vanyorgrahaḥ

निन्दा/धिक्कार (आक्रोश) के अर्थ में अव तथा नि उपसर्गपूर्वक ग्रह् धातु से घञ् प्रत्यय होता है (अवग्रहः, निग्रहः = दमन)।

श्लोक 3.46

प्रे लिप्सायाम्

pre lipsāyām

पाने की इच्छा (लिप्सा) के अर्थ में प्र-उपसर्गपूर्वक ग्रह् धातु से घञ् प्रत्यय होता है (पात्रप्रग्राहेण = पात्र पकड़ने की इच्छा से)।

श्लोक 3.47

परौ यज्ञे

parau yajñe

यज्ञ-सम्बन्धी अर्थ में परि-उपसर्गपूर्वक धातु से घञ् प्रत्यय होता है (उत्तरपरिग्राहः = यज्ञ की उत्तर वेदी का निर्माण)।

श्लोक 3.48

नौ वृ धान्ये

nau vṛ dhānye

धान्य-विशेष के नामकरण अर्थ में नि-उपसर्गपूर्वक वृ धातु से घञ् प्रत्यय होता है (नीवाराः = नीवार नामक धान्य)।

श्लोक 3.49

उदि श्रयतियौतिपूद्रुवः

udi śrayatiyautipūdruvaḥ

उत्-उपसर्गपूर्वक श्रि, यु, पू और द्रु धातुओं से घञ् प्रत्यय होता है (उच्छ्रायः = ऊँचाई, उद्द्रावः = भागना)।

श्लोक 3.50

विभाषाऽऽङि रुप्लुवोः

vibhāṣā''ṅi rupluvoḥ

आ-उपसर्गपूर्वक रु और प्लु धातुओं से विकल्प से घञ् प्रत्यय होता है (आरावः = आवाज)।

श्लोक 3.51

अवे ग्रहो वर्षप्रतिबन्धे

ave graho varṣapratibandhe

वर्षा के रुक जाने (वर्षप्रतिबन्ध) के अर्थ में अव-उपसर्गपूर्वक ग्रह् धातु से विकल्प से घञ् प्रत्यय होता है (अवग्राहः/अवग्रहः)।

श्लोक 3.52

प्रे वणिजाम्

pre vaṇijām

व्यापारी-सम्बन्धी वस्तु के अर्थ में प्र-उपसर्गपूर्वक ग्रह् धातु से विकल्प से घञ् प्रत्यय होता है (तुलाप्रग्राहः/तुलाप्रग्रहः = तराजू की डोरी)।

श्लोक 3.53

रश्मौ च

raśmau ca

रश्मि (लगाम) के अर्थ में भी प्र-उपसर्गपूर्वक ग्रह् धातु से विकल्प से घञ् प्रत्यय होता है (प्रग्राहः/प्रग्रहः)।

श्लोक 3.54

वृणोतेराच्छादने

vṛṇoterācchādane

ढकने (आच्छादन) के अर्थ में प्र-उपसर्गपूर्वक वृ धातु से विकल्प से घञ् प्रत्यय होता है (प्रवारः = चादर)।

श्लोक 3.55

परौ भुवोऽवज्ञाने

parau bhuvo'vajñāne

तिरस्कार (अवज्ञा) के अर्थ में परि-उपसर्गपूर्वक भू धातु से विकल्प से घञ् प्रत्यय होता है (परिभावः/परिभवः = अनादर)।

श्लोक 3.56

एरच्

erac

भाव या कर्ता-भिन्न कारक में इकारान्त/ईकारान्त धातु से अच् प्रत्यय होता है (चयः = ढेर, जयः = विजय)।

श्लोक 3.57

ॠदोरप्

ṝdorap

भाव या कर्ता-भिन्न कारक में ऋकारान्त तथा उकारान्त/ऊकारान्त धातु से अप् प्रत्यय होता है (करः = हाथ/कर, टैक्स)।

श्लोक 3.58

ग्रहवृदृनिश्चिगमश्च

grahavṛdṛniścigamaśca

ग्रह्, वृ, दृ, नि-उपसर्गपूर्वक चि, तथा गम् धातुओं से भी अप् प्रत्यय होता है (ग्रहः, वरः, निश्चयः, गमः)।

श्लोक 3.59

उपसर्गेऽदः

upasarge'daḥ

उपसर्ग उपपद रहने पर अद् (खाना) धातु से अप् प्रत्यय होता है (विघसः, प्रघसः = जूठन)।

श्लोक 3.60

नौ ण च

nau ṇa ca

नि-उपसर्गपूर्वक अद् धातु से ण तथा अप् दोनों प्रत्यय होते हैं (न्यादः/निघसः)।

श्लोक 3.61

व्यधजपोरनुपसर्गे

vyadhajaporanupasarge

उपसर्ग-रहित व्यध् और जप् धातुओं से अप् प्रत्यय होता है (व्यधः, जपः)।

श्लोक 3.62

स्वनहसोर्वा

svanahasorvā

उपसर्ग-रहित स्वन् और हस् धातुओं से विकल्प से अप् प्रत्यय होता है (स्वनः/स्वानः, हसः/हासः)।

श्लोक 3.63

यमः समुपनिविषु

yamaḥ samupaniviṣu

सम्, उप, नि तथा वि उपसर्गपूर्वक यम् धातु से विकल्प से अप् प्रत्यय होता है (संयमः/संयामः)।

श्लोक 3.64

नौ गदनदपठस्वनः

nau gadanadapaṭhasvanaḥ

नि-उपसर्गपूर्वक गद्, नद्, पठ् और स्वन् धातुओं से विकल्प से अप् प्रत्यय होता है (निगदः/निगादः)।

श्लोक 3.65

क्वणः वीणायां च

kvaṇaḥ vīṇāyāṁ ca

निपूर्वक तथा उपसर्ग-रहित क्वण् धातु से भी, वीणा अर्थ में, विकल्प से अप् प्रत्यय होता है (निक्वणः/निक्वाणः)।

श्लोक 3.66

नित्यं पणः परिमाणे

nityaṁ paṇaḥ parimāṇe

परिमाण (नपी-तुली मात्रा) के अर्थ में पण् धातु से अनिवार्यतः अप् प्रत्यय होता है (मूलकपणः = मूली का गट्ठा)।

श्लोक 3.67

मदोऽनुपसर्गे

mado'nupasarge

उपसर्ग-रहित मद् धातु से अप् प्रत्यय होता है (विद्यामदः = विद्या का अभिमान)।

श्लोक 3.68

प्रमदसम्मदौ हर्षे

pramadasammadau harṣe

हर्ष (आनन्द) के अर्थ में 'प्रमदः' तथा 'सम्मदः' शब्दों का निपातन होता है।

श्लोक 3.69

समुदोरजः पशुषु

samudorajaḥ paśuṣu

पशु-विषय में सम्/उत् उपसर्गपूर्वक अज् धातु से अप् प्रत्यय होता है (समजः = झुंड)।

श्लोक 3.70

अक्षेषु ग्लहः

akṣeṣu glahaḥ

पासे के खेल (अक्ष) के अर्थ में ग्रह् धातु से अप् प्रत्यय होता है, साथ ही र्-को-ल्-आदेश भी (ग्लहः = जुए में लगाई शर्त)।

श्लोक 3.71

प्रजने सर्तेः

prajane sarteḥ

गर्भधारण हेतु प्रथम गमन (प्रजन) के अर्थ में सृ धातु से अप् प्रत्यय होता है (उपसरः = गौ का पहला गर्भ-गमन)।

श्लोक 3.72

ह्वः सम्प्रसारणं च नि अभि उप विषु

hvaḥ samprasāraṇaṁ ca ni abhi upa viṣu

नि, अभि, उप तथा वि उपसर्गपूर्वक ह्वे (बुलाना) धातु से अप् प्रत्यय होता है, साथ ही सम्प्रसारण भी (निहवः, उपहवः)।

श्लोक 3.73

आङि युद्धे

āṅi yuddhe

युद्ध के अर्थ में आ-उपसर्गपूर्वक ह्वे धातु से भी अप् प्रत्यय तथा सम्प्रसारण होता है (आहवः = युद्धक्षेत्र)।

श्लोक 3.74

निपानम् आहावः

nipānam āhāvaḥ

जलाशय (निपान) के अर्थ में आ-उपसर्गपूर्वक ह्वे धातु से अप् प्रत्यय, सम्प्रसारण, तथा वृद्धि का निपातन होता है (आहावः = पानी की नाँद)।

श्लोक 3.75

भावेऽनुपसर्गस्य

bhāve'nupasargasya

भाव अर्थ में उपसर्ग-रहित ह्वे धातु से अप् प्रत्यय तथा सम्प्रसारण होता है (हवः = पुकार)।

श्लोक 3.76

हनश्च वधः

hanaśca vadhaḥ

भाव अर्थ में उपसर्ग-रहित हन् धातु से अप् प्रत्यय होने पर हन् को 'वध' आदेश हो जाता है (वधः = हत्या)।

श्लोक 3.77

मूर्तौ घनः

mūrtau ghanaḥ

कठोरता (मूर्ति/जमाव) के अर्थ में हन् धातु से अप् प्रत्यय तथा 'घन' आदेश होता है (घनः = ठोस, बादल)।

श्लोक 3.78

अन्तर्घनो देशे

antarghano deśe

देशविशेष के अर्थ में अन्तर्-उपसर्गपूर्वक हन् धातु से अप् प्रत्यय तथा घन-आदेश होता है (अन्तर्घनः = किसी देश का नाम)।

श्लोक 3.79

अगार एकदेशे प्रघणप्रघाणौ च

agāra ekadeśe praghaṇapraghāṇau ca

घर के एक भाग (द्वार-चबूतरा) के अर्थ में प्र-उपसर्गपूर्वक हन् धातु से अप् और घञ् दोनों प्रत्यय होते हैं, घन-आदेश सहित (प्रघणः/प्रघाणः)।

श्लोक 3.80

उद्घनोऽत्याधानम्

udghano'tyādhānam

अत्याधान (लकड़ी छीलने का पाटा) के अर्थ में उत्-उपसर्गपूर्वक हन् धातु से 'उद्घनः' शब्द का निपातन होता है।

श्लोक 3.81

अपघनोऽङ्गम्

apaghano'ṅgam

शरीर के अंग-विशेष (हाथ/पैर) के अर्थ में अप-उपसर्गपूर्वक हन् धातु से 'अपघनः' शब्द का निपातन होता है।

श्लोक 3.82

करणेऽयो विद्रुषु

karaṇe'yo vidruṣu

करण-कारक में अयस् (लोहा), वि तथा द्रु के उपपद होने पर हन् धातु से अप् प्रत्यय तथा घन-आदेश होता है (विघनः = हथौड़ा, द्रुघनः = लकड़ी का मूसल)।

श्लोक 3.83

स्तम्बे क च

stambe ka ca

स्तम्ब (झाड़ी) के उपपद होने पर करण-कारक में हन् धातु से क और अप् दोनों प्रत्यय होते हैं (स्तम्बघ्नः/स्तम्बघनः)।

श्लोक 3.84

परौ घः

parau ghaḥ

परि-उपसर्गपूर्वक हन् धातु से करण-कारक में अप् प्रत्यय तथा घ-आदेश होता है (परिघः = लोहे का गदा/छड़)।

श्लोक 3.85

उपघ्न आश्रये

upaghna āśraye

आश्रय (सहारा) के अर्थ में उप-उपसर्गपूर्वक हन् धातु से अप् प्रत्यय तथा उपधा-लोप का निपातन होता है (पर्वतोपघ्नः = पहाड़ के सहारे बना)।

श्लोक 3.86

सङ्घोद्घौ गणप्रशंसयोः

saṅghodghau gaṇapraśaṁsayoḥ

समूह (गण) के अर्थ में सम्-उपसर्गपूर्वक, और प्रशंसा के अर्थ में उत्-उपसर्गपूर्वक, हन् धातु से अप् प्रत्यय होता है, टि-लोप तथा घ-आदेश सहित (सङ्घः, उद्घः)।

श्लोक 3.87

निघो नीमितम्

nigho nīmitam

समान ऊँचाई (निमित) के अर्थ में नि-उपसर्गपूर्वक हन् धातु से अप् प्रत्यय होता है, टि-लोप तथा घ-आदेश सहित (निघाः वृक्षाः = एक-सी ऊँचाई के वृक्ष)।

श्लोक 3.88

डु इतोऽः क्त्रिः

ḍu ito'ḥ ktriḥ

यदि धातु 'डु' इत्-संज्ञक हो, तो भाव अथवा कर्ता-भिन्न कारक में उससे क्त्रि (त्रि) प्रत्यय होता है (पवित्रि जैसे रूप)।

श्लोक 3.89

ट्वितोऽथुच्

ṭvito'thuc

यदि धातु 'टु' इत्-संज्ञक हो, तो भाव अथवा कर्ता-भिन्न कारक में उससे अथुच् प्रत्यय होता है (वेपथुः = काँपना)।

श्लोक 3.90

यजयाचयतविच्छप्रच्छरक्षो नङ्

yajayācayatavicchapraccharakṣo naṅ

भाव अथवा कर्ता-भिन्न कारक में यज्, याच्, यत्, विच्छ्, प्रच्छ् और रक्ष् — इन छह धातुओं से नङ् प्रत्यय होता है (यज्ञः, याच्ञा, यत्नः, प्रश्नः)।

श्लोक 3.91

स्वपो नन्

svapo nan

भाव अथवा कर्ता-भिन्न कारक में स्वप् (सोना) धातु से नन् प्रत्यय होता है (स्वप्नः = नींद/स्वप्न)।

श्लोक 3.92

उपसर्गे घोः किः

upasarge ghoḥ kiḥ

भाव अथवा कर्ता-भिन्न कारक में, उपसर्ग उपपद रहने पर, घु-संज्ञक (दा/धा जैसी) धातुओं से कि प्रत्यय होता है (विधिः, निधिः)।

श्लोक 3.93

कर्मण्यधिकरणे च

karmaṇyadhikaraṇe ca

कर्मरूप उपपद रहने पर घु-संज्ञक धातुओं से अधिकरण कारक में भी कि प्रत्यय होता है (जलधिः = समुद्र, जल का पात्र)।

श्लोक 3.94

स्त्रियां क्तिन्

striyāṁ ktin

स्त्रीलिंग में, भाव अथवा कर्ता-भिन्न कारक में, धातु से क्तिन् प्रत्यय होता है (कृतिः, भूतिः)।

श्लोक 3.95

स्थागापापचां भावे

sthāgāpāpacāṁ bhāve

भाव अर्थ में स्था, गा, पा और पच् धातुओं से स्त्रीलिंग में क्तिन् प्रत्यय होता है (प्रस्थितिः, पक्तिः = पकाना)।

श्लोक 3.96

मन्त्रे वृषेषपचमनविदभूवीरा उदात्तः

mantre vṛṣeṣapacamanavidabhūvīrā udāttaḥ

मन्त्र-विषय में वृष्, इष्, पच्, मन्, विद्, भू, वी और रा धातुओं से भाव अर्थ में स्त्रीलिंग क्तिन् प्रत्यय होता है, और वह उदात्त (उच्च स्वर) भी होता है (वृष्टिः, इष्टिः, भूतिः)।

श्लोक 3.97

ऊतियूतिजूतिसातिहेतिकीर्तयश्च

ūtiyūtijūtisātihetikīrtayaśca

'ऊतिः' (अव धातु से), 'यूतिः', 'जूतिः', 'सातिः', 'हेतिः' और 'कीर्तिः' शब्दों का निपातन होता है।

श्लोक 3.98

व्रजयजोर्भावे क्यप्

vrajayajorbhāve kyap

भाव अर्थ में व्रज् और यज् धातुओं से स्त्रीलिंग में उदात्त क्यप् प्रत्यय होता है (व्रज्या = गमन, इज्या = यज्ञ करना)।

श्लोक 3.99

संज्ञायां समजनिषदनिपतमनविदषुञ्शीङ्भृञ् इणः

saṁjñāyāṁ samajaniṣadanipatamanavidaṣuñśīṅbhṛñ iṇaḥ

संज्ञा-विषय में सम्-उपसर्गपूर्वक अज्, नि-उपसर्गपूर्वक सद्/पत्, तथा मन्, विद्, षु, शी, भृ और इण् धातुओं से स्त्रीलिंग में उदात्त क्यप् प्रत्यय होता है (समज्या = सभा, शय्या = खाट)।

श्लोक 3.100

कृञः श च

kṛñaḥ śa ca

कृ धातु से स्त्रीलिंग में क्यप् तथा श — दोनों प्रत्यय होते हैं (कृत्या, क्रिया)।

श्लोक 3.101

इच्छा

icchā

'इच्छा' शब्द का निपातन होता है, साथ ही 'परिचर्या', 'मृगया' जैसे श-यक् से बने रूप भी।

श्लोक 3.102

अप्रत्ययात्

apratyayāt

स्त्रीलिंग में भाव अथवा संज्ञार्थ कर्ता-भिन्न कारक में, जिस धातु के अन्त में पहले से ही कोई (सनादि) प्रत्यय लगा हो, उससे अ प्रत्यय होता है (चिकीर्षा = करने की इच्छा)।

श्लोक 3.103

गुरोश्च हलः

gurośca halaḥ

स्त्रीलिंग में भाव अथवा संज्ञार्थ कर्ता-भिन्न कारक में गुरु-स्वरवाली, व्यञ्जनान्त धातु से भी अ प्रत्यय होता है (ईहा = चेष्टा, ऊहा)।

श्लोक 3.104

षित्भिदादिभ्योऽङ्

ṣitbhidādibhyo'ṅ

षकार-इत्संज्ञक तथा भिद् आदि धातुओं से स्त्रीलिंग में अङ् प्रत्यय होता है (त्रपा, भिदा, विदा)।

श्लोक 3.105

चिन्तिपूजिकथिकुम्बिचर्चश्च

cintipūjikathikumbicarcaśca

चिन्त्, पूज्, कथ्, कुम्ब् और चर्च् धातुओं से भी स्त्रीलिंग में अङ् प्रत्यय होता है (चिन्ता, पूजा, कथा, चर्चा)।

श्लोक 3.106

आतश्चोपसर्गे

ātaścopasarge

उपसर्ग-युक्त आकारान्त धातु से भी स्त्रीलिंग में अङ् प्रत्यय होता है (संज्ञा, प्रदा)।

श्लोक 3.107

ण्यासस्रन्थो युच्

ṇyāsasrantho yuc

णिजन्त धातु, आस् (बैठना) तथा स्रन्थ् (छोड़ना) धातुओं से स्त्रीलिंग में युच् प्रत्यय होता है (कारणा, आसना)।

श्लोक 3.108

रोगाख्यायां ण्वुल् बहुलम्

rogākhyāyāṁ ṇvul bahulam

रोग के नामकरण के अर्थ में धातु से अनियमित रूप से ण्वुल् प्रत्यय होता है (प्रवाहिका = पेचिश)।

श्लोक 3.109

संज्ञायाम्

saṁjñāyām

संज्ञा-विषय में (विशेष रूप से खेल-क्रीड़ाओं के नाम में) धातु से ण्वुल् प्रत्यय होता है (शालभञ्जिका = एक क्रीड़ा-विशेष)।

श्लोक 3.110

विभाषाख्यानपरिप्रश्नयोरिञ् च

vibhāṣākhyānaparipraśnayoriñ ca

प्रश्न-पूछने (परिप्रश्न) तथा वर्णन (आख्यान) के अर्थ में विकल्प से ण्वुल् और इञ् प्रत्यय होते हैं (कां कारिकाम्/कारिणीम् अकार्षीः = तुमने क्या किया)।

श्लोक 3.111

पर्यायार्हणोत्पत्तिषु ण्वुच्

paryāyārhaṇotpattiṣu ṇvuc

बारी (पर्याय), योग्यता (अर्ह), ऋण तथा उत्पत्ति के अर्थों में धातु से ण्वुच् प्रत्यय होता है (भवतः शायिका = आपकी सोने की बारी)।

श्लोक 3.112

आक्रोशे नञ्यनिः

ākrośe nañyaniḥ

निन्दा (आक्रोश) के अर्थ में नञ्-उपपद रहने पर धातु से अनि प्रत्यय होता है (अकरणिः = तेरे कर्मों का नाश हो)।

श्लोक 3.113

कृत्यल्युटो बहुलम्

kṛtyalyuṭo bahulam

कृत्य-संज्ञक प्रत्यय और ल्युट् प्रत्यय इन नियत अर्थों से भिन्न अर्थों में भी अनियमित रूप से प्रयुक्त होते हैं (स्नानीयम् = स्नान का साधन)।

श्लोक 3.114

नपुंसके भावे क्तः

napuṁsake bhāve ktaḥ

नपुंसकलिंग में भाव अर्थ में धातु से क्त प्रत्यय होता है (हसितम् = हँसना, सुप्तम् = सोना)।

श्लोक 3.115

ल्युट् च

lyuṭ ca

नपुंसकलिंग में भाव अर्थ में धातु से ल्युट् प्रत्यय भी होता है (हसनम् = हँसना)।

श्लोक 3.116

कर्मणि च येन संस्पृशात् कर्तुः शरीरसुखम्

karmaṇi ca yena saṁspṛśāt kartuḥ śarīrasukham

जिस कर्म के स्पर्श से कर्ता के शरीर को सुख मिले, उस कर्म-उपपद रहते भाव अर्थ में धातु से ल्युट् प्रत्यय होता है, और वह नपुंसकलिंग होता है (ओदनभोजनं सुखम् = चावल खाना सुखद है)।

श्लोक 3.117

करणाधिकरणयोश्च

karaṇādhikaraṇayośca

करण तथा अधिकरण कारकों के अभिप्रेत होने पर भी धातु से ल्युट् प्रत्यय होता है (इध्मप्रव्रश्चनः = लकड़ी चीरने का साधन)।

श्लोक 3.118

पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण

puṁsi saṁjñāyāṁ ghaḥ prāyeṇa

करण तथा अधिकरण कारकों में, पुल्लिंग संज्ञा के अर्थ में, प्रायः धातु से घ प्रत्यय होता है (आकरः = खान, स्रोत)।

श्लोक 3.119

गोचरसंचरवहव्रजव्यजापणनिगमाश्च

gocarasaṁcaravahavrajavyajāpaṇanigamāśca

पूर्वोक्त अर्थ में ही 'गोचरः', 'संचरः', 'वहः', 'व्रजः', 'व्यजः' (पंखा), 'आपणः' (बाजार) तथा 'निगमः' (वेद) शब्दों का निपातन होता है।

श्लोक 3.120

अवे तॄस्त्रोर्घञ्

ave tṝstrorghañ

अव-उपसर्गपूर्वक तॄ (पार करना) और स्तॄ (ढकना) धातुओं से करण/अधिकरण में पुल्लिंग संज्ञा अर्थ में घञ् प्रत्यय होता है (अवतारः = अवतरण)।

श्लोक 3.121

हलश्च

halaśca

करण/अधिकरण कारक में व्यञ्जनान्त धातु से भी पुल्लिंग संज्ञा अर्थ में घञ् प्रत्यय होता है (रामः, लेखः = लिखना/लेख)।

श्लोक 3.122

अध्यायन्यायोद्यावसंहाराधारावायाश्च

adhyāyanyāyodyāvasaṁhārādhārāvāyāśca

पूर्वोक्त अर्थ में ही 'अध्यायः', 'न्यायः', 'उद्यावः', 'संहारः', 'आधारः' तथा 'आवायः' — इन घञ्-प्रत्ययान्त शब्दों का निपातन होता है।

श्लोक 3.123

उदङ्कोऽनुदके

udaṅko'nudake

जल से भिन्न पदार्थ (जैसे तेल, घी) के अर्थ में 'उदङ्कः' शब्द का निपातन होता है (तैलोदङ्कः = तेल की कुप्पी)।

श्लोक 3.124

जालम् आनायः

jālam ānāyaḥ

जाल के अर्थ में 'आनायः' शब्द का निपातन होता है (आनायो मत्स्यानाम् = मछलियों का जाल)।

श्लोक 3.125

खनो घ च

khano gha ca

करण/अधिकरण अर्थ में खन् (खोदना) धातु से घ तथा घञ् दोनों प्रत्यय होते हैं (आखनः/आखानः)।

श्लोक 3.126

ईषद्दुस्सुषु कृच्छ्राकृच्छ्रार्थेषु खल्

īṣaddussuṣu kṛcchrākṛcchrārtheṣu khal

ईषत्, दुस् और सु उपपद रहने पर कठिनाई (कृच्छ्र) तथा सुगमता (अकृच्छ्र) के अर्थ में धातु से खल् प्रत्यय होता है (दुष्करः = करने में कठिन)।

श्लोक 3.127

कर्तृकर्मणोश्च भूकृञोः

kartṛkarmaṇośca bhūkṛñoḥ

कर्ता-उपपद रहने पर भू धातु से, और कर्म-उपपद रहने पर कृ धातु से, ईषत् आदि के अर्थ में खल् प्रत्यय होता है (ईषदाढ्यम्भवः = सुगमता से धनी बननेवाला)।

श्लोक 3.128

आतो युच्

āto yuc

दुःख अथवा सुख अर्थ में दुस्/ईषत्/सु उपपद रहने पर आकारान्त धातु से युच् प्रत्यय होता है (ईषत्पानः = आसानी से पीने योग्य)।

श्लोक 3.129

छन्दसि गत्यर्थेभ्यः

chandasi gatyarthebhyaḥ

वेद-विषय में ईषत् आदि उपपद रहने पर गत्यर्थक धातुओं से भी युच् प्रत्यय होता है।

श्लोक 3.130

अन्येभ्योऽपि दृश्यते

anyebhyo'pi dṛśyate

वेद में गत्यर्थ-भिन्न धातुओं से भी इसी अर्थ में युच् प्रत्यय पाया जाता है (सुदोहना, सुवेदना)।

श्लोक 3.131

वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा

vartamānasāmīpye vartamānavadvā

वर्तमान काल के अत्यन्त समीपवर्ती भूत तथा भविष्यत् में भी विकल्प से वर्तमानकालिक (लट्) प्रत्यय होता है (देवदत्त, कदा आगतोऽसि? अयम् आगच्छामि = अभी आया)।

श्लोक 3.132

आशंसायां भूतवच्च

āśaṁsāyāṁ bhūtavacca

अभी न प्राप्त हुई किन्तु आशा की हुई वस्तु (आशंसा) के भविष्यत्काल में विकल्प से भूतकाल तथा वर्तमानकाल के प्रत्यय भी होते हैं (आगतः/आगच्छति वा = आ चुके, मानो आ ही गए)।

श्लोक 3.133

क्षिप्रवचने लृट्

kṣipravacane lṛṭ

शीघ्रता-सूचक शब्द के उपपद होने पर, आशंसा के अर्थ में, धातु से लृट् प्रत्यय होता है (क्षिप्रम् आगमिष्यति = शीघ्र आएगा)।

श्लोक 3.134

आशंसावचने लिङ्

āśaṁsāvacane liṅ

आशंसा-सूचक शब्द के उपपद होने पर धातु से लिङ् प्रत्यय होता है (आगच्छेत् = आ जाए तो अच्छा हो)।

श्लोक 3.135

नानद्यतनवत्क्रियाप्रबन्धसामीप्ययोः

nānadyatanavatkriyāprabandhasāmīpyayoḥ

निरन्तर चलती रहनेवाली क्रिया (क्रियाप्रबन्ध) तथा निकटवर्ती क्रिया (सामीप्य) के अर्थ में 'अनद्यतन भूत'-सदृश प्रत्यय-विधान लागू नहीं होता (यावज्जीवं ददात् = जब तक जिया, देता रहा)।

श्लोक 3.136

भविष्यति मर्यादावचनेऽवरस्मिन्

bhaviṣyati maryādāvacane'varasmin

भविष्यत्काल में, यदि पूर्व-सीमा (जिसके इस ओर की बात हो) का निर्देश करना हो, तो 'अनद्यतन भूत'-सदृश प्रत्यय-विधान लागू नहीं होता (कौशाम्ब्याः अवरे द्विरोदनं भोक्ष्यामहे = कौशाम्बी से इस तरफ दो बार खाएँगे)।

श्लोक 3.137

कालविभागे चानहोरात्राणाम्

kālavibhāge cānahorātrāṇām

कालविभाग (समय की सीमा) में, यदि वह विभाजन दिन-रात्रि से सम्बन्धित न हो, तो भविष्यत्काल में 'अनद्यतन भूत'-सदृश प्रत्यय-विधान लागू नहीं होता (आग्रहायणी से इधर पढ़ेंगे)।

श्लोक 3.138

परस्मिन् विभाषा

parasmin vibhāṣā

यदि कालकृत सीमा के उत्तरवर्ती (परवर्ती) भाग का निर्देश करना हो, तो भविष्यत्काल में यह प्रतिबन्ध विकल्प से लागू होता है (अध्येष्यामहे/अध्येतास्महे)।

श्लोक 3.139

लिङ्निमित्ते लृङ् क्रियातिपत्तौ

liṅnimitte lṛṅ kriyātipattau

जब लिङ् (सम्भावना) निमित्त हो और क्रिया का न घटित होना (अतिपत्ति) अभिप्रेत हो, तो धातु से लृङ् (संकेतार्थक भूत/भविष्य) लकार होता है (यदि नमेत्, सुखं यायात् = यदि नमस्कार करता तो सुखी होता)।

श्लोक 3.140

भूते च

bhūte ca

लिङ्-निमित्त भूतकाल में विद्यमान होने पर भी, यदि क्रिया किसी कारणवश सिद्ध न हुई हो, तो धातु से लृङ् प्रत्यय होता है (यदि दृष्टोऽभविष्यत्, तदा अभोक्ष्यत् = यदि देखा होता तो खिलाता)।

श्लोक 3.141

वा आ उताप्योः

vā ā utāpyoḥ

'उताप्योः समर्थयोः' सूत्र (3.3.152) से पहले तक विहित सभी लकारों के स्थान पर, लिङ्-निमित्त की स्थिति में, भूतकाल में विकल्प से लृङ् प्रत्यय भी समझना चाहिए, यदि क्रिया सिद्ध न हुई हो।

श्लोक 3.142

गर्हायां लट् अपिजात्वोः

garhāyāṁ laṭ apijātvoḥ

'अपि' तथा 'जातु' के उपपद होने पर, निन्दा (गर्हा) के अर्थ में, धातु से (काल-भेद के बावजूद) लट् प्रत्यय होता है (अपि मांसं खादति = क्या मांस खाता है! धिक्कार है)।

श्लोक 3.143

विभाषा कथमि लिङ् च

vibhāṣā kathami liṅ ca

'कथम्' शब्द के उपपद होने पर, निन्दा के अर्थ में, विकल्प से लिङ् (तथा लट्) प्रत्यय होता है (कथं भवान् क्रोशेत् = आप कैसे डाँट सकते हैं!)।

श्लोक 3.144

किंवृत्ते लिङ्लृटौ

kiṁvṛtte liṅlṛṭau

'किम्' से बने शब्द के उपपद होने पर, निन्दा के अर्थ में, लिङ् और लृट् प्रत्यय होते हैं (को नाम विद्यां निन्देत् = कौन भला विद्या की निन्दा करे!)।

श्लोक 3.145

अनवकल्प्त्यमर्षयोरकिंवृत्तेऽपि

anavakalptyamarṣayorakiṁvṛtte'pi

अविश्वसनीयता (अनवकल्प्ति) तथा असहनशीलता (अमर्ष) के अर्थ में, चाहे किम्-शब्द से बना उपपद न भी हो, धातु से लिङ् तथा लृट् प्रत्यय होते हैं (न सम्भावयामि, भवान् मांसं भुञ्जीत = मुझे विश्वास नहीं कि आप मांस खाएँ)।

श्लोक 3.146

किंकिलास्त्यर्थेषु लृट्

kiṁkilāstyartheṣu lṛṭ

'किंकिल', तथा 'अस्ति'/'विद्यते' जैसे शब्दों के उपपद होने पर, अविश्वसनीयता और असहनशीलता के अर्थ में, धातु से लृट् प्रत्यय होता है।

श्लोक 3.147

जातुयदोर्लिङ्

jātuyadorliṅ

'जातु' और 'यत्' के उपपद होने पर अविश्वसनीयता तथा असहनशीलता के अर्थ में लिङ् प्रत्यय होता है (न सम्भावयामि जातु भवान् धर्मं त्यजेत् = मुझे यह विश्वास नहीं कि आप कभी धर्म त्यागें)।

श्लोक 3.148

यच्चयत्रयोः

yaccayatrayoḥ

'यच्च' और 'यत्र' के उपपद होने पर भी अविश्वसनीयता तथा असहनशीलता के अर्थ में लिङ् प्रत्यय होता है।

श्लोक 3.149

गर्हायां च

garhāyāṁ ca

'यच्च' और 'यत्र' के उपपद होने पर निन्दा (गर्हा) के अर्थ में भी लिङ् प्रत्यय होता है (यच्च भवान् मांसं खादेत्, अहो गर्हितम् = आप मांस खाते हैं, यह निन्दनीय है)।

श्लोक 3.150

चित्रीकरणे च

citrīkaraṇe ca

'यच्च' और 'यत्र' के उपपद होने पर आश्चर्य (चित्रीकरण) के अर्थ में भी लिङ् प्रत्यय होता है (यच्च भवान् वेदविद्यां निन्देत्, आश्चर्यम् एतत् = आप वेदविद्या की निन्दा करते हैं, यह आश्चर्यजनक है)।

श्लोक 3.151

शेषे लृट् अयदौ

śeṣe lṛṭ ayadau

'यच्च'/'यत्र' शब्दों के प्रयोग के बिना ही, शेष (शेष सभी) स्थितियों में, आश्चर्य के अर्थ में धातु से लृट् प्रत्यय होता है (अन्धो नाम मार्गे क्षिप्रं यास्यति, आश्चर्यम् एतत् = अन्धा तेज चलेगा, कैसा आश्चर्य)।

श्लोक 3.152

उताप्योः समर्थयोः लिङ्

utāpyoḥ samarthayoḥ liṅ

समानार्थक 'उत' और 'अपि' शब्दों के उपपद होने पर धातु से लिङ् प्रत्यय होता है (उत कुर्यात्, अपि कुर्यात् = क्या वह करे)।

श्लोक 3.153

कामप्रवेदनेऽकच्चिति

kāmapravedane'kacciti

'कच्चित्' शब्द से भिन्न शब्द के उपपद होने पर, अपनी इच्छा प्रकट करने (कामप्रवेदन) के अर्थ में, धातु से लिङ् प्रत्यय होता है (कामो मे भुञ्जीत भवान् = मेरी इच्छा है कि आप भोजन करें)।

श्लोक 3.154

सम्भावनेऽलमिति चेत् सिद्धाप्रयोगे

sambhāvane'lamiti cet siddhāprayoge

सम्भावना (कल्पना) के अर्थ में, यदि 'अलम्' शब्द के बिना ही उसका अर्थ स्वतः सिद्ध हो जाए, तब भी धातु से लिङ् प्रत्यय होता है (अपि पर्वतं शिरसा भिन्द्यात् = मानो पहाड़ को सिर से फोड़ दे)।

श्लोक 3.155

विभाषा धातौ सम्भावनावचनेऽयदि

vibhāṣā dhātau sambhāvanāvacane'yadi

सम्भावनार्थक धातु उपपद होने पर, 'यत्' के प्रयोग के बिना, सम्भावना के अर्थ में विकल्प से लिङ् प्रत्यय होता है (सम्भावयामि भोक्ष्यते भवान्/भुञ्जीत भवान्)।

श्लोक 3.156

हेतुहेतुमतोर्लिङ्

hetuhetumatorliṅ

कारण-कार्य (हेतु-हेतुमत्) सम्बन्ध में धातु से लिङ् प्रत्यय होता है (यदि दक्षिणेन यायात्, न शकटं पर्याभवेत् = यदि दाईं ओर से जाए, तो गाड़ी न पलटे)।

श्लोक 3.157

इच्छार्थेषु लिङ्लोटौ

icchārtheṣu liṅloṭau

इच्छार्थक धातु के उपपद होने पर धातु से लिङ् और लोट् प्रत्यय होते हैं (इच्छामि भुञ्जीत भवान्/भुङ्क्तां भवान् = चाहता हूँ आप भोजन करें)।

श्लोक 3.158

समानकर्तृकेषु तुमुन्

samānakartṛkeṣu tumun

जब इच्छा और क्रिया का कर्ता एक ही हो, तब धातु से तुमुन् प्रत्यय होता है (भोक्तुम् इच्छति = खाना चाहता है)।

श्लोक 3.159

लिङ् च

liṅ ca

समान-कर्तृक इच्छार्थक स्थिति में धातु से लिङ् प्रत्यय भी होता है (भुञ्जीय इति इच्छति = 'मैं खाऊँ' ऐसा चाहता है)।

श्लोक 3.160

इच्छार्थेभ्यो विभाषा वर्तमाने

icchārthebhyo vibhāṣā vartamāne

इच्छार्थक धातुओं से वर्तमानकाल में विकल्प से लिङ् प्रत्यय होता है (इच्छेत्/इच्छति = चाहता है)।

श्लोक 3.161

विधिनिमन्त्रणामन्त्रणाधीष्टसम्प्रश्नप्रार्थनेषु लिङ्

vidhinimantraṇāmantraṇādhīṣṭasampraśnaprārthaneṣu liṅ

विधि (आदेश), निमन्त्रण, आमन्त्रण, अधीष्ट (सादर निवेदन), संप्रश्न (सम्मानपूर्ण प्रश्न) और प्रार्थना — इन छह अर्थों में धातु से लिङ् प्रत्यय होता है (ओदनं पचेत् = चावल पकाए)।

श्लोक 3.162

लोट् च

loṭ ca

उन्हीं छह अर्थों में धातु से लोट् प्रत्यय भी होता है (भवतो मङ्गलं भवतु = आपका मंगल हो)।

श्लोक 3.163

प्रैषातिसर्गप्राप्तकालेषु कृत्याश्च

praiṣātisargaprāptakāleṣu kṛtyāśca

आज्ञा (प्रैष), अनुमति (अतिसर्ग) और उपयुक्त समय (प्राप्तकाल) के अर्थों में धातु से कृत्य-प्रत्यय तथा लोट् भी होते हैं (कटः कर्तव्यः = चटाई बनानी चाहिए)।

श्लोक 3.164

लिङ् च ऊर्ध्वमौहूर्तिके

liṅ ca ūrdhvamauhūrtike

उपर्युक्त अर्थों के एक मुहूर्त बाद घटित होने की स्थिति में धातु से लिङ् (तथा यथोचित कृत्य) प्रत्यय भी होता है (मुहूर्तस्य पश्चात् भवता कटः करणीयः)।

श्लोक 3.165

स्मे लोट्

sme loṭ

'स्म' शब्द के उपपद होने पर, उपर्युक्त मुहूर्त-पश्चाद्वर्ती अर्थ में, धातु से लोट् प्रत्यय होता है (मुहूर्तात् पश्चाद् भवान् कटं करोतु स्म)।

श्लोक 3.166

अधीष्टे च

adhīṣṭe ca

'स्म' शब्द के उपपद होने पर सादर निवेदन (अधीष्ट) के अर्थ में भी धातु से लोट् प्रत्यय होता है (अधीच्छामि भवान् माणवकम् अध्यापयतु स्म)।

श्लोक 3.167

कालसमयवेलासु तुमुन्

kālasamayavelāsu tumun

काल, समय और वेला — इन शब्दों के उपपद होने पर धातु से तुमुन् प्रत्यय होता है (भोक्तुं कालः = भोजन का समय है)।

श्लोक 3.168

लिङ् यदि

liṅ yadi

'यत्' शब्द के साथ काल/समय/वेला के उपपद होने पर धातु से लिङ् प्रत्यय होता है (कालो यद् भुञ्जीत भवान् = समय है कि आप भोजन करें)।

श्लोक 3.169

अर्हे कृत्यतृचश्च

arhe kṛtyatṛcaśca

योग्यता (अर्ह) के अर्थ में धातु से कृत्य-प्रत्यय और तृच् (और लिङ्) प्रत्यय होते हैं (पठितव्या विद्या = विद्या पढ़ने योग्य है, पठिता विद्यायाः)।

श्लोक 3.170

आवश्यकाधमर्ण्ययोर्णिनिः

āvaśyakādhamarṇyayorṇiniḥ

अनिवार्यता (आवश्यक) और ऋणी होने (आधमर्ण्य) के अर्थ में कर्ता-वाची धातु से णिनि प्रत्यय होता है (अवश्यङ्कारी = अवश्य करनेवाला, शतदायी = सौ का ऋणी)।

श्लोक 3.171

कृत्याश्च

kṛtyāśca

उसी अर्थ में (आवश्यकता और ऋण) धातु से कृत्य-प्रत्यय भी होते हैं (अवश्यं कटः कर्तव्यः, शतं दातव्यम्)।

श्लोक 3.172

शकि लिङ् च

śaki liṅ ca

शक्य होना (समर्थता) के अर्थ में धातु से लिङ् और कृत्य-प्रत्यय होते हैं (शत्रुं जयेत् = शत्रु को जीत सकता है, शत्रुर्जेतव्यः)।

श्लोक 3.173

आशिषि लिङ्लोटौ

āśiṣi liṅloṭau

आशीर् (शुभकामना) के अर्थ में धातु से लिङ् और लोट् प्रत्यय होते हैं (पुत्रं ते भवतु/भूयात् = तुम्हारे पुत्र हो)।

श्लोक 3.174

क्तिच् क्तौ च संज्ञायाम्

ktic ktau ca saṁjñāyām

आशीर् अर्थ में ही, यदि संज्ञा (नाम) बनाना अभिप्रेत हो, तो धातु से क्तिच् और क्त प्रत्यय भी होते हैं (भूतिः, देवदत्तः = 'देवों-द्वारा-दिया')।

श्लोक 3.175

माङि लुङ्

māṅi luṅ

माङ् (निषेधसूचक अव्यय) के उपपद होने पर धातु से लुङ् लकार होता है, भूतकाल न होने पर भी (क्लैब्यं मा गमः = कायरता मत अपनाओ)।

श्लोक 3.176

स्म उत्तरे लङ् च

sma uttare laṅ ca

'स्म' के बाद आनेवाले माङ् के उपपद होने पर धातु से लङ् लकार भी होता है, साथ ही लुङ् का भी विकल्प (मा स्म भवत्/भूत् = ऐसा न हो)। इस प्रकार तृतीय अध्याय का तृतीय पाद यहीं पूर्ण होता है।

तृतीयोऽध्यायः, चतुर्थः पादः

श्लोक 4.1

धातुसम्बन्धे प्रत्ययाः

dhātusambandhe pratyayāḥ

यह अधिकार-सूत्र है: चतुर्थ अध्याय के अन्त तक, धातु के अर्थ मात्र से सम्बद्ध (काल-निरपेक्ष) प्रत्ययों का विधान समझा जाए (अग्निष्टोमयाजी अस्य पुत्रो जनिता = यह जिसने यज्ञ किया है, इसका पुत्र होनेवाला है)।

श्लोक 4.2

क्रियासमभिहारे लोट्, लोटो हिस्वौ वा च तध्वमोः

kriyāsamabhihāre loṭ, loṭo hisvau vā ca tadhvamoḥ

क्रिया की पुनरावृत्ति (समभिहार) के अर्थ में धातु-सम्बन्ध व्यक्त करने को लोट् लकार होता है; उस लोट् के स्थान पर 'हि' और 'तु' (स्व) आदेश तथा त/ध्वम् के स्थान पर विकल्प से हि/स्व आदेश होते हैं।

श्लोक 4.3

समुच्चये अन्यतरस्याम्

samuccaye anyatarasyām

क्रियाओं के समुच्चय (जोड़) के अर्थ में विकल्प से धातु-सम्बन्ध में लोट् लकार होता है (भ्राष्टमट, मठमट = भाड़ पर जाता है, मठ जाता है — एक के बाद एक कई स्थानों पर)।

श्लोक 4.4

यथाविधि अनुप्रयोगः पूर्वस्मिन्

yathāvidhi anuprayogaḥ pūrvasmin

पूर्व सूत्र (3.4.2) से विहित लोट् की मूल धातु का ही उसी रूप में अनुप्रयोग (दोहराव) होता है, जैसा नियम के अनुसार उचित हो (लुनीहि लुनीहीति लुनाति = 'काटो, काटो' कहते हुए काटता है)।

श्लोक 4.5

समुच्चये सामान्यवचनस्य

samuccaye sāmānyavacanasya

समुच्चय के अर्थ में, विशेष क्रियाओं के समूह के सामान्य प्रतिपादन हेतु, एक सामान्यार्थक धातु का अनुप्रयोग होता है (ओदनं भुङ्क्ष्व...इत्यभ्यवहरति = चावल खाओ...आदि सब 'खाना' क्रिया में समाहित होकर कहा जाता है)।

श्लोक 4.6

छन्दसि लुङ्लङ्लिटः

chandasi luṅlaṅliṭaḥ

वेद में धातु-सम्बन्ध मात्र दर्शाने के लिए, काल-भेद के बिना, लुङ्, लङ् और लिट् — तीनों लकार प्रयुक्त होते हैं।

श्लोक 4.7

लिङ् अर्थे लेट्

liṅ arthe leṭ

वेद में लिङ् लकार के अर्थ में विकल्प से लेट् लकार होता है (नेज्जिह्मायन्तो नरकं पताम = कुटिल होकर हम नरक में न गिरें)।

श्लोक 4.8

उपसंवाद आशङ्कयोश्च

upasaṁvāda āśaṅkayośca

वादे की गई शर्त (उपसंवाद) तथा आशंका के अर्थ में भी वेद में लेट् लकार होता है।

श्लोक 4.9

तुमर्थे सेसेनसेऽसेङ्क्सेकसेन्अध्यैअध्यैन्कध्यैकध्यैन्शध्यैशध्यैन्तवैतवेङ्तवेनः

tumarthe sesenase'seṅksekasenadhyaiadhyainkadhyaikadhyainśadhyaiśadhyaintavaitaveṅtavenaḥ

वेद में तुमुन् (के लिए) प्रत्यय के स्थान में से, सेन्, असे, असेन्, क्से, कसेन्, अध्यै, अध्यैन्, कध्यै, कध्यैन्, शध्यै, शध्यैन्, तवै, तवेङ् और तवेन् — ये चौदह प्रत्यय होते हैं (वक्षे = ले जाने के लिए, पातवै = पीने के लिए)।

श्लोक 4.10

प्रयै रोहिष्यै अव्यथिष्यै

prayai rohiṣyai avyathiṣyai

वेद में तुमुन् के अर्थ में 'प्रयै', 'रोहिष्यै' तथा 'अव्यथिष्यै' शब्दों का निपातन होता है।

श्लोक 4.11

दृशे विख्ये च

dṛśe vikhye ca

वेद में तुमुन् के अर्थ में 'दृशे' (देखने के लिए) तथा 'विख्ये' (विख्यात होने के लिए) शब्दों का निपातन होता है।

श्लोक 4.12

शकि णमुल्कमुलौ

śaki ṇamulkamulau

शक् धातु के उपपद होने पर वेद में तुमुन् के अर्थ में णमुल् और कमुल् प्रत्यय होते हैं (विभाजम् = बाँटने के लिए)।

श्लोक 4.13

ईश्वरे तोसुन्कसुनौ

īśvare tosunkasunau

'ईश्वर' शब्द के उपपद होने पर वेद में तुमुन् के अर्थ में तोसुन् और कसुन् प्रत्यय होते हैं (अभिचरितोः, विलिखः)।

श्लोक 4.14

कृत्यार्थे तवैकेन्केन्यत्वनः

kṛtyārthe tavaikenkenyatvanaḥ

भाव और कर्म अर्थ में वेद में कृत्य-प्रत्यय के स्थान में तवै, केन्, केन्य और त्वन् प्रत्यय होते हैं (नावगाहे = अवगाहन नहीं करने योग्य, कर्त्वं हविः = हवि बनाने योग्य)।

श्लोक 4.15

अवचक्षे च

avacakṣe ca

अव-उपसर्गपूर्वक चक्ष् (बोलना) धातु से भी वेद में कृत्य-अर्थ में 'एश्' प्रत्यय का निपातन होता है (अवचक्षे = कहने योग्य)।

श्लोक 4.16

भावलक्षणे स्थेण्कृवदिचरिहुतमिजनिभ्यस्तोसुन्

bhāvalakṣaṇe stheṇkṛvadicarihutamijanibhyastosun

भाव-लक्षक अर्थ में स्था, इण्, कृ, वद्, चर्, हु, तम् तथा जन् धातुओं से वेद में तुमुन् के अर्थ में तोसुन् प्रत्यय होता है (आ संस्थातोः = स्थिर होने तक)।

श्लोक 4.17

सृपितृदोः कसुन्

sṛpitṛdoḥ kasun

वेद में सृप् (रेंगना) और तृद् (छेदना) धातुओं से भाव-लक्षक अर्थ में तुमुन्-भाव में कसुन् प्रत्यय होता है (विसृपः, आतृदः)।

श्लोक 4.18

अलं खल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा

alaṁ khalvoḥ pratiṣedhayoḥ prācāṁ ktvā

निषेध-वाचक 'अलम्' और 'खलु' के उपपद होने पर, प्राचीन आचार्यों के मत में, धातु से विकल्प से क्त्वा प्रत्यय होता है (अलं दत्त्वा = मत दो)।

श्लोक 4.19

उदीचां माङो व्यतीहारे

udīcāṁ māṅo vyatīhāre

पारस्परिक विनिमय (व्यतीहार) के अर्थ में उत्तर-दिशा के आचार्यों के मत में माङ् (निषेध) धातु से क्त्वा प्रत्यय होता है (अपमित्य याचते)।

श्लोक 4.20

परावरयोगे च

parāvarayoge ca

'पर' के पूर्व अथवा 'अवर' के पश्चात् के संयोग के अर्थ में भी धातु से क्त्वा प्रत्यय होता है (अप्राप्य नदीं पर्वतः स्थितः = नदी तक पहुँचने से पहले पर्वत है)।

श्लोक 4.21

समानकर्तृकयोः पूर्वकाले

samānakartṛkayoḥ pūrvakāle

समान कर्तावाली दो क्रियाओं में से, पहले घटित होनेवाली क्रिया के धातु से क्त्वा प्रत्यय होता है (भुक्त्वा व्रजति = खाकर जाता है)।

श्लोक 4.22

आभीक्ष्ण्ये णमुल् च

ābhīkṣṇye ṇamul ca

पुनरावृत्ति (आभीक्ष्ण्य) के अर्थ में सुबन्त शब्द का द्वित्व होता है, तथा (पूर्वकालिक क्रिया में) णमुल् प्रत्यय भी होता है (ग्रामो ग्रामो रमणीयः = हर गाँव सुन्दर है)।

श्लोक 4.23

न यदि अणाकाङ्क्षे

na yadi aṇākāṅkṣe

अनाकांक्ष (आगे कुछ और कहने की आवश्यकता न रखनेवाला) कर्ता के वाच्य होने पर, समान-कर्तृक पूर्वकालिक धातु से, 'यत्' के साथ, आभीक्ष्ण्य अर्थ में क्त्वा और णमुल् प्रत्यय नहीं होते (यदयं भुङ्क्ते ततः पठति = यह पहले खाता है फिर पढ़ता है)।

श्लोक 4.24

विभाषाऽग्रेप्रथमपूर्वेषु

vibhāṣā'greprathamapūrveṣu

'अग्रे', 'प्रथम' और 'पूर्व' शब्दों के उपपद होने पर समान-कर्तृक पूर्वकालिक धातु से विकल्प से क्त्वा और णमुल् प्रत्यय होते हैं (अग्रे भुक्त्वा/भोजं व्रजति = पहले खाकर जाता है)।

श्लोक 4.25

कर्मण्याक्रोशे कृञः खमुञ्

karmaṇyākrośe kṛñaḥ khamuñ

कर्मरूप उपपद रहने पर, समान-कर्तृक पूर्वकालिक कृ धातु से, धिक्कार (आक्रोश) के अर्थ में खमुञ् प्रत्यय होता है (चौरङ्कारमाक्रोशति = 'चोर है' कहकर चिल्लाता है)।

श्लोक 4.26

स्वादुमि णमुल्

svādumi ṇamul

'स्वादु' आदि (स्वाद-सूचक) शब्दों के उपपद होने पर समान-कर्तृक पूर्वकालिक कृ धातु से णमुल् प्रत्यय होता है (स्वादुङ्कारं भुङ्क्ते = स्वाद लेते हुए खाता है)।

श्लोक 4.27

अन्यथैवंकथमित्थंसु सिद्धाप्रयोगश्चेत्

anyathaivaṁkathamitthaṁsu siddhāprayogaścet

'अन्यथा', 'एवम्', 'कथम्' और 'इत्थम्' — इन अव्ययों के उपपद होने पर, यदि इनसे अर्थ पहले ही सिद्ध हो, फिर भी कृ धातु से णमुल् प्रत्यय होता है (अन्यथाकारम् = अन्यथा ही, भले ही 'कृ' अनावश्यक जोड़ हो)।

श्लोक 4.28

यथातथयोरसूयाप्रतिवचने

yathātathayorasūyāprativacane

'यथा' और 'तथा' के उपपद होने पर, असूया (जलन) के उत्तर के अर्थ में, कृ धातु से णमुल् प्रत्यय होता है (यथाकारमहं भोक्ष्ये, तथाकारं किं तवानेन = जैसे मैं खाऊँगा, वैसे में तुम्हें क्या)।

श्लोक 4.29

कर्मणि दृशिविदोः साकल्ये

karmaṇi dṛśividoḥ sākalye

कर्मरूप उपपद रहने पर, पूर्णता (साकल्य) के अर्थ में, दृश् और विद् धातुओं से णमुल् प्रत्यय होता है (यवनदर्शनं हन्ति = जिस-जिस यवन को देखता है, मार डालता है)।

श्लोक 4.30

यावति विन्दजीवोः

yāvati vindajīvoḥ

'यावत्' शब्द के उपपद होने पर विद् (पाना) और जीव् (जीना) धातुओं से णमुल् प्रत्यय होता है (यावद्वेदं भोजयति = जितना पाता है उतना खिलाता है, यावज्जीवम् = जीवनभर)।

श्लोक 4.31

चर्मोदरयोः पूरेः

carmodarayoḥ pūreḥ

कर्मरूप चर्मन् और उदर शब्दों के उपपद होने पर पूर् (भरना) धातु से णमुल् प्रत्यय होता है (चर्मपूरम् = पूरा चमड़ा ढकते हुए, उदरपूरम् = पेट भरते हुए)।

श्लोक 4.32

वर्षप्रमाणे ऊल्लोपश्चास्यान्यतरस्याम्

varṣapramāṇe ūllopaścāsyānyatarasyām

कर्मरूप उपपद रहने पर पूर् धातु से णमुल् प्रत्यय, वर्षा की मात्रा (प्रमाण) के अर्थ में, तथा उसके ऊकार का विकल्प से लोप भी होता है (गोष्पदपूरम्/गोष्पदपुरम् = खुर के गड्ढे भर जाने जितनी बारिश)।

श्लोक 4.33

चेले क्नोपेः

cele knopeḥ

वस्त्र-वाचक कर्म के उपपद होने पर क्नोपि (भिगोना) धातु से णमुल् प्रत्यय होता है, वर्षा की मात्रा के अर्थ में (चेलक्नोपम् = कपड़ा भीग जाए इतनी बारिश)।

श्लोक 4.34

निमूलसमूलयोः कषः

nimūlasamūlayoḥ kaṣaḥ

कर्मरूप निमूल और समूल शब्दों के उपपद होने पर कष् (काटना) धातु से णमुल् प्रत्यय होता है (निर्मूलकाषम् = जड़ छोड़कर काटते हुए, समूलकाषम् = जड़ समेत काटते हुए)।

श्लोक 4.35

शुष्कचूर्णरूक्षेषु पिषः

śuṣkacūrṇarūkṣeṣu piṣaḥ

कर्मरूप शुष्क, चूर्ण और रूक्ष शब्दों के उपपद होने पर पिष् (पीसना) धातु से णमुल् प्रत्यय होता है (शुष्कपेषम्, चूर्णपेषम्)।

श्लोक 4.36

समूलाकृतजीवेषु हन्कृग्रहः

samūlākṛtajīveṣu hankṛgrahaḥ

कर्मरूप समूल, अकृत और जीव शब्दों के उपपद होने पर क्रमशः हन्, कृ और ग्रह् धातुओं से णमुल् प्रत्यय होता है (समूलघातम् = जड़ समेत मारते हुए, जीवग्राहम् = जीवित पकड़ते हुए)।

श्लोक 4.37

करणे हनः

karaṇe hanaḥ

करण-कारक के उपपद होने पर हन् धातु से णमुल् प्रत्यय होता है (पाण्युपघातम् = हाथ से मारते हुए)।

श्लोक 4.38

स्नेहने पिषः

snehane piṣaḥ

स्नेहन (चिकनाई से गीला करना) के अर्थवाले करण के उपपद होने पर पिष् धातु से णमुल् प्रत्यय होता है (उदपेषम्, तैलपेषम् = पानी/तेल से पीसते हुए)।

श्लोक 4.39

हस्ते वर्तिग्रहोः

haste vartigrahoḥ

हस्त-वाचक करण के उपपद होने पर णिजन्त वृत् और ग्रह् धातुओं से णमुल् प्रत्यय होता है (हस्तवर्तम् = हाथ से गोली बनाते हुए, हस्तग्राहम् = हाथ से पकड़ते हुए)।

श्लोक 4.40

स्वे पुषः

sve puṣaḥ

स्वार्थक (अपने ही सहारे) करण के उपपद होने पर पुष् (पोसना) धातु से णमुल् प्रत्यय होता है (स्वपोषम् = अपनी शक्ति से पालते हुए)।

श्लोक 4.41

अधिकरणे बन्धः

adhikaraṇe bandhaḥ

अधिकरण-कारक के उपपद होने पर बन्ध् धातु से णमुल् प्रत्यय होता है (चक्रबन्धम् = पहिये के आकार में बाँधते हुए)।

श्लोक 4.42

संज्ञायाम्

saṁjñāyām

संज्ञा (नाम) के अर्थ में भी बन्ध् धातु से णमुल् प्रत्यय होता है (क्रौञ्चबन्धम्, मयूरिकाबन्धम् = बन्धन की विशेष शैलियाँ)।

श्लोक 4.43

कर्त्रोर्जीवपुरुषयोर्नशिवहोः

kartrorjīvapuruṣayornaśivahoḥ

कर्तृवाची जीव और पुरुष शब्दों के उपपद होने पर क्रमशः नश् और वह् धातुओं से णमुल् प्रत्यय होता है (जीवनाशम् = जीव के रूप में नष्ट होते हुए)।

श्लोक 4.44

ऊर्ध्वे शुषिपूरोः

ūrdhve śuṣipūroḥ

कर्तृवाची 'ऊर्ध्व' शब्द के उपपद होने पर शुष् और पूर् धातुओं से णमुल् प्रत्यय होता है (ऊर्ध्वशोषम् = ऊपर से सूखते हुए, ऊर्ध्वपूरम् = ऊपर तक भरते हुए)।

श्लोक 4.45

उपमाने कर्मणि च

upamāne karmaṇi ca

उपमान-वाचक कर्म तथा कर्ता के उपपद होने पर भी धातु से णमुल् प्रत्यय होता है (मातृधायं धयति = माँ के दूध की तरह पीता है, सिंहगर्जं गर्जति = सिंह की तरह गरजता है)।

श्लोक 4.46

कषादिषु यथाविध्यनुप्रयोगः

kaṣādiṣu yathāvidhyanuprayogaḥ

'निमूलसमूलयोः कषः' (3.4.34) से आगे जिन-जिन धातुओं से णमुल् विहित हुआ है, उन्हीं का नियमानुसार अनुप्रयोग (सहायक क्रिया के रूप में दोहराव) समझा जाए।

श्लोक 4.47

उपदंशस्तृतीयायाम्

upadaṁśastṛtīyāyām

तृतीयान्त उपपद रहते उप-उपसर्गपूर्वक दंश् धातु से णमुल् प्रत्यय होता है (मूलकोपदंशम् = मूली को स्वाद के लिए साथ खाते हुए)।

श्लोक 4.48

हिंसार्थानां च समानकर्मकाणाम्

hiṁsārthānāṁ ca samānakarmakāṇām

तृतीयान्त उपपद रहते, समान कर्मवाली हिंसार्थक धातुओं का भी अनुप्रयोग-सहित णमुल् प्रत्यय होता है (दण्डोपघातम् = डंडे से मारते हुए)।

श्लोक 4.49

सप्तम्यां चोपपीडरुधकर्षः

saptamyāṁ copapīḍarudhakarṣaḥ

सप्तम्यन्त अथवा तृतीयान्त उपपद रहते उप-उपसर्गपूर्वक पीड्, रुध् और कष् धातुओं से णमुल् प्रत्यय होता है (पार्श्वोपपीडम् = बगल में दबाते हुए)।

श्लोक 4.50

समासत्तौ

samāsattau

निकटता (सन्निकर्ष) के अर्थ में सप्तम्यन्त अथवा तृतीयान्त उपपद रहते धातु से णमुल् प्रत्यय होता है (केशग्राहम् = बाल पकड़कर, नज़दीक से)।

श्लोक 4.51

प्रमाणे च

pramāṇe ca

लंबाई-नाप (प्रमाण) के अर्थ में भी तृतीयान्त अथवा सप्तम्यन्त उपपद रहते धातु से णमुल् प्रत्यय होता है (द्व्यङ्गुलोत्कर्षम् = दो अंगुल छोड़ते हुए)।

श्लोक 4.52

अपादाने परीप्सायाम्

apādāne parīpsāyām

अपादान-कारक के उपपद होने पर, तुरन्त कुछ पाने की इच्छा (परीप्सा) के अर्थ में, धातु से णमुल् प्रत्यय होता है (शय्योत्थायम् = खाट से उठते ही)।

श्लोक 4.53

द्वितीयायां च

dvitīyāyāṁ ca

द्वितीयान्त उपपद रहते भी परीप्सा के अर्थ में धातु से णमुल् प्रत्यय होता है (यष्टिग्राहम् = लाठी उठाकर तुरत)।

श्लोक 4.54

स्वाङ्गेऽध्रुवे

svāṅge'dhruve

अध्रुव (जिसे काटने पर मृत्यु न हो) शरीर-अंग वाचक द्वितीयान्त उपपद रहते धातु से णमुल् प्रत्यय होता है (अक्षिनिकाणम् = आँख मिचकाते हुए)।

श्लोक 4.55

परिक्लिश्यमाने च

parikliśyamāne ca

पीड़ित किए जाते हुए (परिक्लिश्यमान) शरीर-अंग वाचक द्वितीयान्त उपपद रहते भी धातु से णमुल् प्रत्यय होता है (उरःपेषम् = छाती को कष्ट देते हुए)।

श्लोक 4.56

विशिपतिपदिस्कन्दां व्याप्यमानासेव्यमानयोः

viśipatipadiskandāṁ vyāpyamānāsevyamānayoḥ

द्वितीयान्त उपपद रहते विश्, पत्, पद् और स्कन्द् धातुओं से, पूर्णतः व्याप्त होने अथवा निरन्तर सेवन के अर्थ में, णमुल् प्रत्यय होता है (गेहानुप्रवेशम् = घर-घर में घुसते हुए)।

श्लोक 4.57

अस्यतितृषोः क्रियान्तरे कालेषु

asyatitṛṣoḥ kriyāntare kāleṣu

कालवाचक द्वितीयान्त उपपद रहते, किसी अन्य क्रिया के बीच में (क्रियान्तर) के अर्थ में, अस् और तृष् धातुओं से णमुल् प्रत्यय होता है (द्व्यहात्यासम् = दो दिन के अन्तराल पर)।

श्लोक 4.58

नाम्न्यादिशिग्रहोः

nāmnyādiśigrahoḥ

द्वितीयान्त 'नामन्' शब्द के उपपद होने पर आ-उपसर्गपूर्वक दिश् और ग्रह् धातुओं से णमुल् प्रत्यय होता है (नामादेशम्/नामग्राहम् = नाम लेकर)।

श्लोक 4.59

अव्यये अयथाभिप्रेताख्याने कृञः क्त्वाणमुलौ

avyaye ayathābhipretākhyāne kṛñaḥ ktvāṇamulau

अव्यय के उपपद होने पर, अभीष्ट-भिन्न अर्थ के कथन में (व्यंग्यार्थक प्रयोग में), कृ धातु से क्त्वा तथा णमुल् प्रत्यय होते हैं (नीचैः कृत्वा/कारम् = नीचे करके — जब वस्तुतः विपरीत हुआ हो, व्यंग्यपूर्वक)।

श्लोक 4.60

तिर्यचि अपवर्गे

tiryaci apavarge

'तिर्यक्' शब्द के उपपद होने पर, कार्य की पूर्ण समाप्ति (अपवर्ग) के अर्थ में, कृ धातु से क्त्वा तथा णमुल् प्रत्यय होते हैं (तिर्यक्कृत्वा/कारम् = पूरा काम निपटाकर)।

श्लोक 4.61

स्वाङ्गे तस्प्रत्यये कृभ्वोः

svāṅge taspratyaye kṛbhvoḥ

तस्-प्रत्ययान्त शरीरांग-वाचक शब्द के उपपद होने पर कृ तथा भू धातुओं से क्त्वा तथा णमुल् प्रत्यय होते हैं (मुखतः कृत्वा = सामने होकर, मुखतोभूय)।

श्लोक 4.62

नाधार्थप्रत्यये च्व्यर्थे

nādhārthapratyaye cvyarthe

'च्वि' (अभूततद्भाव, "जो पहले वैसा न था, वैसा हो गया") के अर्थवाले 'ना', 'धा' तथा तत्समानार्थक प्रत्ययों से युक्त शब्दों के उपपद होने पर कृ और भू धातुओं से क्त्वा तथा णमुल् प्रत्यय होते हैं (नानाकृत्य = अलग-अलग करके, तूष्णींभूय = चुप होकर)।

श्लोक 4.63

तूष्णीमि भुवः

tūṣṇīmi bhuvaḥ

'तूष्णीम्' (चुपचाप) शब्द के उपपद होने पर भू धातु से क्त्वा तथा णमुल् प्रत्यय होता है (तूष्णींभूय गतः = चुप होकर चला गया)।

श्लोक 4.64

अन्वचि आनुलोम्ये

anvaci ānulomye

'अन्वक्' शब्द के उपपद होने पर, अनुकूलता (आनुलोम्य) के अर्थ में, भू धातु से क्त्वा तथा णमुल् प्रत्यय होते हैं (अन्वग्भूय = अनुकूल बनकर)।

श्लोक 4.65

शकधृषज्ञाग्लाघटरभलभक्रमसहार्हास्त्यर्थेषु तुमुन्

śakadhṛṣajñāglāghaṭarabhalabhakramasahārhāstyartheṣu tumun

शक्, धृष्, ज्ञा, ग्ला, घट्, रभ्, लभ्, क्रम्, सह्, अर्ह् तथा अस्ति-अर्थक शब्दों के उपपद होने पर धातु से तुमुन् प्रत्यय होता है (शक्नोति भोक्तुम् = खाने में समर्थ है)।

श्लोक 4.66

पर्याप्तिवचनेष्वलमर्थेषु

paryāptivacaneṣvalamartheṣu

पर्याप्ति (पूर्णतः समर्थ होना) सूचक 'अलम्'-अर्थक शब्दों के उपपद होने पर धातु से तुमुन् प्रत्यय होता है (पर्याप्तो भोक्तुम् = खाने में पूरी तरह समर्थ है)।

श्लोक 4.67

कर्तरि कृत्

kartari kṛt

कृत्-संज्ञक प्रत्ययों का सामान्य अर्थ कर्ता (करनेवाला) होता है, जब तक कोई विशेष अर्थ-विधान न हो।

श्लोक 4.68

भव्यगेयप्रवचनीयोपस्थानीयजन्याप्लाव्यापात्या वा

bhavyageyapravacanīyopasthānīyajanyāplāvyāpātyā vā

'भव्य', 'गेय', 'प्रवचनीय', 'उपस्थानीय', 'जन्य', 'आप्लाव्य' तथा 'आपात्य' — ये विशेष रूप-निर्मित शब्द विकल्प से कर्ता-वाचक कृदन्त रूपों के रूप में निपातित होते हैं।

श्लोक 4.69

लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः

laḥ karmaṇi ca bhāve cākarmakebhyaḥ

सकर्मक धातुओं से कर्ता और कर्म — दोनों में, तथा अकर्मक धातुओं से कर्ता और भाव — दोनों में, लकार (तिङन्त प्रत्यय) होता है।

श्लोक 4.70

तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः

tayoreva kṛtyaktakhalarthāḥ

उन्हीं दो (कर्म और भाव) अर्थों में ही कृत्य-प्रत्यय, क्त प्रत्यय, तथा खल् आदि उसी अर्थवाले प्रत्यय प्रयुक्त होते हैं (कर्तव्यो घटः कुलालेन, आसितव्यं भवता)।

श्लोक 4.71

आदिकर्मणि क्तः कर्तरि च

ādikarmaṇi ktaḥ kartari ca

कार्य के आरम्भ (आदिकर्म) के अर्थ में क्त प्रत्यय कर्ता में भी होता है, न कि केवल कर्म/भाव में (प्रकृतः कटं देवदत्तः = देवदत्त ने चटाई बनाना शुरू किया)।

श्लोक 4.72

गत्यर्थाकर्मकश्लिषशीङ्स्थाआसवसजनरुहजीर्यतिभ्यश्च

gatyarthākarmakaśliṣaśīṅsthāāsavasajanaruhajīryatibhyaśca

गत्यर्थक, अकर्मक, तथा श्लिष्, शीङ्, स्था, आस्, वस्, जन्, रुह् और जॄ धातुओं से भी क्त प्रत्यय कर्ता में होता है (गतो देवदत्तो ग्रामम् = देवदत्त गाँव गया)।

श्लोक 4.73

दाशगोघ्नौ सम्प्रदाने

dāśagoghnau sampradāne

सम्प्रदान-कारक के अर्थ में 'दाशः' और 'गोघ्नः' शब्दों का निपातन होता है (दाशः = जिसके लिए दिया जाए)।

श्लोक 4.74

भीमादयोऽपादाने

bhīmādayo'pādāne

अपादान-कारक के अर्थ में 'भीम' आदि शब्दों का निपातन होता है (भीमः/भीष्मः = जिससे लोग डरते हैं)।

श्लोक 4.75

ताभ्यामन्यत्रोणादयः

tābhyāmanyatroṇādayaḥ

सम्प्रदान और अपादान से भिन्न कारकों के अर्थ में उण् आदि प्रत्यय होते हैं (कृषिः = खेती, तन्तुः = धागा)।

श्लोक 4.76

क्तोऽधिकरणे च ध्रौव्यगतिप्रत्यवसानार्थेभ्यः

kto'dhikaraṇe ca dhrauvyagatipratyavasānārthebhyaḥ

स्थिरता (ध्रौव्य), गति और भक्षण (प्रत्यवसान) के अर्थवाली धातुओं से क्त प्रत्यय अधिकरण में भी होता है, कर्ता/भाव के साथ-साथ (इदमेषामासितम् = यह इनके बैठने का स्थान है)।

श्लोक 4.77

लस्य

lasya

यह अधिकार-सूत्र है: यहाँ से आगे 'ल' (लकार) के स्थान पर होनेवाले आदेशों का विधान समझा जाए।

श्लोक 4.78

तिप्तस्झिसिप्थस्थमिब्वस्मस्ताताञ्झथासाथांध्वमिड्वहिमहिङ्

tiptasjhisipthasthamibvasmastātāñjhathāsāthāṁdhvamiḍvahimahiṅ

लकार के स्थान पर परस्मैपद में तिप्, तस्, झि, सिप्, थस्, थ, मिप्, वस्, मस्; तथा आत्मनेपद में त, आताम्, झ, थास्, आथाम्, ध्वम्, इट्, वहि, महिङ् — ये अठारह वास्तविक तिङ्-प्रत्यय आदेश होते हैं।

श्लोक 4.79

टित आत्मनेपदानां टेरे

ṭita ātmanepadānāṁ ṭere

टित्-संज्ञक लकारों (लट्, लिट्, लुट्, लृट्, लेट्, लोट्) से सम्बद्ध आत्मनेपद प्रत्ययों की 'टि' (अन्त्य अकार-आदि भाग) के स्थान पर एकार आदेश होता है (एधते)।

श्लोक 4.80

थासः से

thāsaḥ se

टित् लकारों के थास् के स्थान पर 'से' आदेश होता है (एधसे)।

श्लोक 4.81

लिटस्तझयोरेशिरेच्

liṭastajhayoreśirec

लिट् लकार के त् के स्थान पर 'ए' तथा झ् के स्थान पर 'इरेच्' आदेश होता है (एधाञ्चक्रे, एधिरे)।

श्लोक 4.82

परस्मैपदानां णलतुसुसणल्वमाः

parasmaipadānāṁ ṇalatususaṇalvamāḥ

लिट् लकार में परस्मैपद तिप्-आदि प्रत्ययों के स्थान पर क्रमशः णल्, अतुस्, उस्, थल्, अथुस्, अ, णल्, व, म आदेश होते हैं (बभूव)।

श्लोक 4.83

विदो लटो वा

vido laṭo vā

विद् (जानना) धातु से परे, लट्-सम्बन्धी परस्मैपद प्रत्ययों के स्थान पर विकल्प से लिट्-सदृश (णल् आदि) आदेश होते हैं (वेद/वेत्ति = जानता है)।

श्लोक 4.84

ब्रुवः पञ्चानामादित आहो ब्रुवः

bruvaḥ pañcānāmādita āho bruvaḥ

ब्रू (बोलना) धातु से परे, लट् के आरम्भिक पाँच परस्मैपद प्रत्ययों (तिप्, तस्, झि, सिप्, थस्) के स्थान पर विकल्प से 'आह्' आदेश होता है (आह, आहतुः, आहुः)।

श्लोक 4.85

लोटो लङ्वत्

loṭo laṅvat

लोट् लकार के तस्-आदि प्रत्ययों का कार्य लङ् लकार के समान होता है (ताम्-आदेश तथा ङित्-निमित्तक स-लोप सहित)।

श्लोक 4.86

एरुः

eruḥ

लोट् के इकार के स्थान पर उकार आदेश होता है (भवतु)।

श्लोक 4.87

सेर्हि अपित् च

serhi apit ca

लोट् के 'सि' के स्थान पर 'हि' आदेश होता है, और वह अपित् (गुण न करानेवाला) भी होता है (स्तुहि)।

श्लोक 4.88

वा छन्दसि

vā chandasi

वेद में लोट्-स्थानिक 'हि' विकल्प से पित् भी हो सकता है (जुहोधि/जुहुधि)।

श्लोक 4.89

मेर्निः

merniḥ

लोट् के 'मि' के स्थान पर 'नि' आदेश होता है (भूनि)।

श्लोक 4.90

आमेतः

āmetaḥ

लोट् के एकार के स्थान पर 'आम्' आदेश होता है (एधताम्)।

श्लोक 4.91

सवाभ्यां व अमौ

savābhyāṁ va amau

सकार तथा वकार से परे लोट् के एकार के स्थान पर क्रमशः 'व' तथा 'अम्' आदेश होते हैं (एधस्व)।

श्लोक 4.92

आडुत्तमस्य पिच्च

āḍuttamasya picca

लोट् के उत्तम पुरुष को आट् आगम होता है, जो पित् (गुणादि-बाधक न होनेवाला) भी होता है (भवानि)।

श्लोक 4.93

एतः ऐ

etaḥ ai

लोट् के उत्तम पुरुष के एकार के स्थान पर ऐकार आदेश होता है (एधै)।

श्लोक 4.94

लेटोऽटाटौ

leṭo'ṭāṭau

लेट् लकार को विकल्प से अट् तथा आट् आगम होते हैं (भवति/भ्वाति/भविषति)।

श्लोक 4.95

आतः ऐ

ātaḥ ai

द्विवचन में लेट्-सम्बन्धी आत्मनेपदीय आकार के स्थान पर ऐकार आदेश होता है (एते → ऐते)।

श्लोक 4.96

वा एतोऽन्यत्र

vā eto'nyatra

पूर्वोक्त क्षेत्र के अतिरिक्त, अन्यत्र लेट्-सम्बन्धी एकार के स्थान पर विकल्प से ऐकार आदेश होता है (अते → अतै)।

श्लोक 4.97

इतश्च लोपः परस्मैपदेषु

itaśca lopaḥ parasmaipadeṣu

लेट्-सम्बन्धी परस्मैपद प्रत्ययों के इकार का विकल्प से लोप होता है (अति → अत्)।

श्लोक 4.98

सः उत्तमस्य

saḥ uttamasya

लेट्-सम्बन्धी उत्तम पुरुष के सकार का विकल्प से लोप होता है (अवः → अव)।

श्लोक 4.99

नित्यं ङितः

nityaṁ ṅitaḥ

ङित्-संज्ञक लकारों में उत्तम पुरुष के सकारान्त का लोप अनिवार्यतः होता है (अपचाव)।

श्लोक 4.100

इतश्च

itaśca

ङित्-संज्ञक लकारों (लिङ्, लङ्, लुङ्, लृङ्) से सम्बद्ध इकारान्त परस्मैपद के अन्त्य इकार का लोप होता है (अभवत्)।

श्लोक 4.101

तस्थस्थमिपां तांतंतमः

tasthasthamipāṁ tāṁtaṁtamaḥ

लङ्, लिङ्, लुङ् और लृङ् लकारों के तस्, थस्, थ और मिप् के स्थान पर क्रमशः ताम्, तम्, त और अम् आदेश होते हैं (अपचताम्, अपचम्)।

श्लोक 4.102

लिङः सीयुट्

liṅaḥ sīyuṭ

लिङ् लकार के आत्मनेपद प्रत्ययों को 'सीयुट्' आगम होता है (एधेत)।

श्लोक 4.103

यासुट् परस्मैपदेषूदात्तो ङिच्च

yāsuṭ parasmaipadeṣūdātto ṅicca

लिङ् के परस्मैपद प्रत्ययों को उदात्त, ङित्-संज्ञक 'यासुट्' आगम होता है (कुर्यात्)।

श्लोक 4.104

कित् आशिषि

kit āśiṣi

आशीर् (शुभकामना) के अर्थ में लिङ्-सम्बन्धी 'यासुट्' कित् (गुण-बाधक) हो जाता है (भूयात्)।

श्लोक 4.105

झस्य रन्

jhasya ran

लिङ् के 'झ' के स्थान पर 'रन्' आदेश होता है (एधेरन्)।

श्लोक 4.106

इटोऽत्

iṭo't

लिङ् के 'इट्' के स्थान पर 'अत्' आदेश होता है (एधेय)।

श्लोक 4.107

सुट् तिथोः

suṭ tithoḥ

आशीर्लिङ् के तकार और थकार को 'सुट्' आगम होता है (एधिषीष्ट)।

श्लोक 4.108

झेर्जुस्

jherjus

लिङ् की 'झि' के स्थान पर 'जुस्' आदेश होता है (भवेयुः)।

श्लोक 4.109

सिजभ्यस्तविदिभ्यश्च

sijabhyastavidibhyaśca

सिच्-प्रत्ययान्त, अभ्यस्त-संज्ञक (जागृ आदि द्वित्ववाली) तथा विद् धातुओं से परे, ङित्-लकार-सम्बन्धी झि के स्थान पर भी जुस् आदेश होता है (अकार्षुः)।

श्लोक 4.110

आतः

ātaḥ

अकारान्त धातु से परे भी ङित्-लकार-सम्बन्धी झि के स्थान पर जुस् आदेश होता है (अपुः)।

श्लोक 4.111

लङः शाकटायनस्यैव

laṅaḥ śākaṭāyanasyaiva

अकारान्त धातु से परे लङ् की झि के स्थान पर जुस् आदेश केवल शाकटायन आचार्य के मत में होता है (अयुः)।

श्लोक 4.112

द्विषश्च

dviṣaśca

द्विष् धातु से विहित लिङ्-सम्बन्धी झि के स्थान पर भी शाकटायन के मत में जुस् आदेश होता है (अद्विषुः)।

श्लोक 4.113

तिङ्शित्सार्वधातुकम्

tiṅśitsārvadhātukam

तिङ्-प्रत्यय तथा शित्-संज्ञक (इत्संज्ञक श्-वाले) प्रत्यय 'सार्वधातुक' संज्ञा पाते हैं।

श्लोक 4.114

आर्धधातुकं शेषः

ārdhadhātukaṁ śeṣaḥ

तिङ् और शित् से भिन्न शेष सभी धातु-प्रत्यय 'आर्धधातुक' संज्ञा पाते हैं।

श्लोक 4.115

लिट् च

liṭ ca

लिट्-सम्बन्धी तिङ् प्रत्ययों की भी 'आर्धधातुक' संज्ञा होती है (यद्यपि वे तिङ् हैं)।

श्लोक 4.116

लिङ् आशिषि

liṅ āśiṣi

आशीर् (शुभकामना) के अर्थ में लिङ्-सम्बन्धी तिङ् प्रत्ययों की भी 'आर्धधातुक' संज्ञा होती है (एधिषीष्ट)।

श्लोक 4.117

छन्दस्युभयथा

chandasyubhayathā

वेद में तिङ् तथा शित् प्रत्ययों की यथायोग्य 'सार्वधातुक' और 'आर्धधातुक' — दोनों ही संज्ञाएँ हो सकती हैं। इस प्रकार तृतीय अध्याय का चतुर्थ (अन्तिम) पाद, और सम्पूर्ण तृतीय अध्याय, यहीं पूर्ण होता है।

चतुर्थोऽध्यायः, प्रथमः पादः

श्लोक 1.1

ङ्याप्प्रातिपदिकात्

ṅyāpprātipadikāt

यह सूत्र अध्याय ४ का आरम्भ करता है और आगे के तद्धित-प्रकरण के लिए अधिकार-सूत्र है: प्रातिपदिक (मूल नाम-शब्द) से अथवा ङी/आप्-अन्त (पहले से स्त्रीलिङ्ग बने) प्रातिपदिक से आगे प्रत्यय जोड़े जाते हैं।

श्लोक 1.2

स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्ङेभ्याम्भ्यस्ङसिभ्याम्भ्यस्ङसोसाम्ङ्योस्सुप्

svaujasamauṭchaṣṭābhyāmbhisṅebhyāmbhyasṅasibhyāmbhyasṅasosāmṅyossup

प्रातिपदिक अथवा ङी/आप्-अन्त शब्द से परे सु, औ, जस् आदि इक्कीस विभक्ति-प्रत्ययों (सुप्) की संज्ञा होती है, जिनसे संज्ञा-शब्दों के सभी कारक-रूप (प्रथमा से सम्बोधन तक) सिद्ध होते हैं। उदाहरण: कुमारी, कुमार्यौ, कुमार्यः आदि।

श्लोक 1.3

स्त्रियाम्

striyām

आगे कहे जाने वाले प्रत्यय स्त्रीलिङ्ग के अर्थ में प्रातिपदिक से होते हैं - यह सूत्र स्त्रीप्रत्यय-प्रकरण का प्रवर्तक है।

श्लोक 1.4

अजाद्यतष्टाप्

ajādyataṣṭāp

अजादिगण में पठित 'अज' आदि शब्दों से, तथा सामान्यतः अकारान्त प्रातिपदिक से, स्त्रीत्व के अर्थ में 'टाप्' (आ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: अज + टाप् = अजा; वर्धमान + टाप् = वर्धमाना।

श्लोक 1.5

ऋन्नेभ्योङीप्

ṛnnebhyoṅīp

ऋकारान्त और नकारान्त प्रातिपदिकों से स्त्रीलिङ्ग में 'ङीप्' (ई) प्रत्यय होता है। उदाहरण: कर्तृ+ ई = कर्त्री, दण्डिन् + ई = दण्डिनी।

श्लोक 1.6

उगितश्च

ugitaśca

जिस प्रातिपदिक का अन्त्य उ, ऋ या ऌ 'इत्' (उगित्) हो, उससे स्त्रीलिङ्ग में ङीप् (ई) प्रत्यय होता है; जैसे 'भवतु' प्रत्ययान्त शब्द भवत् से भवती।

श्लोक 1.7

वनोरच

vanoraca

वन्-अन्त प्रातिपदिक से स्त्रीलिङ्ग में ङीप् (ई) प्रत्यय होता है और साथ ही न् को र् आदेश भी होता है। उदाहरण: धीवन् → धीवरी, पीवन् → पीवरी, शर्वन् → शर्वरी।

श्लोक 1.8

पादोऽन्यतरस्याम्

pādo'nyatarasyām

इस सूत्र से पहले (5.2.1 तक) विहित अपत्य, भव, समूह आदि सभी अर्थों में स्त्री-वाचक शब्द से 'नञ्' (न) और पुंस्-वाचक शब्द से 'स्नञ्' (स्न) प्रत्यय विकल्प से होता है। उदाहरण: स्त्री + नञ् → स्त्रैण।

श्लोक 1.9

टाबृचि

ṭābṛci

जब ऋक् (वैदिक ऋचा) अभिप्रेत हो, तब पाद-शब्दान्त प्रातिपदिक से स्त्रीलिङ्ग में टाप् (आ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्विपदा ऋक्, त्रिपदा ऋक्, चतुष्पदा ऋक्।

श्लोक 1.10

न षट्स्वस्रादिभ्यः

na ṣaṭsvasrādibhyaḥ

'षट्' संज्ञा वाले संख्या-शब्दों (पञ्चन्, सप्तन् आदि) से तथा स्वसृ-आदि गण के शब्दों से परे ङीप् और टाप् प्रत्यय नहीं होते - इनके स्त्रीलिङ्ग रूप ज्यों के त्यों रहते हैं। उदाहरण: पञ्च ब्राह्मण्यः, सप्त ब्राह्मण्यः।

श्लोक 1.11

मनः

manaḥ

मन्-अन्त (मनिप् प्रत्ययान्त) प्रातिपदिक से ङीप् प्रत्यय नहीं होता। उदाहरण: दामन् → दामा, पामन् → पामा, सीमन् → सीमा (पुंवत् रूप ही रहते हैं)।

श्लोक 1.12

अनो बहुव्रीहेः

ano bahuvrīheḥ

अन्-अन्त बहुव्रीहि समास से ङीप् प्रत्यय नहीं होता। उदाहरण: शोभनं पर्व अस्याः = सुपर्वा (सुन्दर जोड़ोंवाली), सुपर्वाणौ, सुपर्वाणः।

श्लोक 1.13

डाबुभाभ्यामन्यतरस्याम्

ḍābubhābhyāmanyatarasyām

मन्-अन्त प्रातिपदिक तथा अन्-अन्त बहुव्रीहि से विकल्प से 'डाप्' (आ) प्रत्यय होता है, अर्थात् पिछले दो सूत्रों के निषेध के स्थान पर वैकल्पिक रूप से यह प्रत्यय भी चल सकता है। उदाहरण: पामा/पामे, बहुराजा/बहुराजे।

श्लोक 1.14

अनुपसर्जनात्

anupasarjanāt

यहाँ से आगे 'अनुपसर्जनात्' पद का अधिकार चलता है, अर्थात् आगे के कई सूत्रों में प्रत्यय केवल उन्हीं शब्दों से होगा जो समास में गौण (उपसर्जन) न होकर प्रधान पद हों। उदाहरण: कुरुषु चरतीति कुरुचरी।

श्लोक 1.15

टिड्ढाणञ्द्व्यसज्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठक्ठञ्कञ्क्वरपः

ṭiḍḍhāṇañdvyasajdaghnañmātractayapṭhakṭhañkañkvarapaḥ

टित्-प्रत्ययान्त (जिसके अन्त में इत्-टकार हो), तथा ढ, अण्, अञ्, द्व्यसच्, दघ्नच्, मात्रच्, तयप्, ठक्, ठञ्, कञ् और क्वरप् - इन प्रत्ययों से बने अकारान्त, गौण न होकर प्रधान (अनुपसर्जन) प्रातिपदिकों से स्त्रीलिङ्ग में ङीप् (ई) होता है। उदाहरण: कुरुचर + ई = कुरुचरी, औपगव + ई = औपगवी।

श्लोक 1.16

यञश्च

yañaśca

यञ्-प्रत्ययान्त प्रातिपदिक से स्त्रीलिङ्ग में ङीप् (ई) प्रत्यय होता है। उदाहरण: गार्ग्य → गार्ग्यी (गोत्रकुल-वाचक यञन्त शब्द का स्त्रीरूप)।

श्लोक 1.17

प्राचांष्फतद्धितः

prācāṁṣphataddhitaḥ

पूर्वदेशीय आचार्यों के मत से यञ्-प्रत्ययान्त प्रातिपदिक से स्त्रीलिङ्ग में 'ष्फ' प्रत्यय भी होता है (जो आगे 'आयन्' आदेश पाकर गार्ग्यायणी जैसे रूप बनाता है)।

श्लोक 1.18

सर्वत्रलोहितादिकतन्तेभ्यः

sarvatralohitādikatantebhyaḥ

लोहित से लेकर 'कत'-पर्यन्त यञन्त प्रातिपदिकों से भी स्त्रीलिङ्ग में ष्फ प्रत्यय होता है। उदाहरण: लौहित्यायणी, बाभ्रव्यायणी।

श्लोक 1.19

कौरव्यमाण्डूकाभ्यांच

kauravyamāṇḍūkābhyāṁca

कौरव्य और माण्डूक शब्दों से भी स्त्रीलिङ्ग में ष्फ प्रत्यय होता है। उदाहरण: कौरव्यायणी, माण्डूकायनी।

श्लोक 1.20

वयसिप्रथमे

vayasiprathame

कौमार अवस्था के अर्थ में प्रयुक्त अकारान्त प्रातिपदिक से स्त्रीलिङ्ग में ङीष् (ई) प्रत्यय होता है। उदाहरण: कुमार + ई = कुमारी (कन्या)।

श्लोक 1.21

द्विगोः

dvigoḥ

अकारान्त द्विगु-संज्ञक प्रातिपदिक से स्त्रीलिङ्ग में ङीष् (ई) प्रत्यय होता है, परन्तु अजादिगण के अकारान्त द्विगु शब्दों से नहीं। उदाहरण: त्रिलोक → त्रिलोकी।

श्लोक 1.22

अपरिमाणबिस्ताचितकम्बल्येभ्योनतद्धितलुकि

aparimāṇabistācitakambalyebhyonataddhitaluki

अपरिमाणवाचक द्विगु से, तथा विस्त, अचित एवं कम्बल्य शब्दान्त प्रातिपदिकों से, तद्धित-प्रत्यय का लुक् होने पर ङीप् प्रत्यय नहीं होता। उदाहरण: पञ्चाश्वा, द्विवर्षा, द्विबिस्ता, द्व्याचिता।

श्लोक 1.23

काण्डान्तात्क्षेत्रे

kāṇḍāntātkṣetre

काण्ड-शब्दान्त द्विगु से, क्षेत्र अर्थ में तद्धितलुक् होने पर, ङीप् प्रत्यय नहीं होता। उदाहरण: द्विकाण्डा क्षेत्रभक्तिः, त्रिकाण्डा।

श्लोक 1.24

पुरुषात्प्रमाणेऽन्यतरस्याम्

puruṣātpramāṇe'nyatarasyām

प्रमाण अर्थ में पुरुष-शब्दान्त द्विगु से, तद्धितलुक् होने पर, विकल्प से ङीप् प्रत्यय का निषेध होता है। उदाहरण: द्विपुरुषा/द्विपुरुषी परिखा (दो पुरुष प्रमाण गहरी खाई)।

श्लोक 1.25

बहुव्रीहेरुधसोङीष्

bahuvrīherudhasoṅīṣ

ऊधस्-शब्दान्त बहुव्रीहि से स्त्रीलिङ्ग में ङीष् (ई) प्रत्यय होता है। उदाहरण: कुण्डोध्नी, घटोध्नी (कुण्ड/घट के समान थन वाली गाय)।

श्लोक 1.26

संख्याव्ययादेर्ङीप्

saṁkhyāvyayāderṅīp

संख्या-पूर्वक तथा अव्यय-पूर्वक ऊधस्-शब्दान्त बहुव्रीहि से ङीप् प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्व्यूध्नी, त्र्यूध्नी (संख्यादि); अत्यूध्नी, निरूध्नी (अव्ययादि)।

श्लोक 1.27

दामहायनान्ताच्च

dāmahāyanāntācca

संख्या-पूर्वक दामन्-शब्दान्त तथा हायन-शब्दान्त बहुव्रीहि से ङीप् प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्विदाम्नी, त्रिदाम्नी; द्विहायणी, त्रिहायणी, चतुर्हायणी।

श्लोक 1.28

अनउपधालोपिनोऽन्यतरस्याम्

anaupadhālopino'nyatarasyām

उपधालोपी अन्-अन्त बहुव्रीहि से विकल्प से ङीप् प्रत्यय होता है। उदाहरण: बहुराज्ञी सभा (पक्ष में बहुराजा, बहुराजे)।

श्लोक 1.29

नित्यं संज्ञाछन्दसोः

nityaṁ saṁjñāchandasoḥ

संज्ञा और छन्द (वेद) में उपधालोपी अन्-अन्त बहुव्रीहि से नित्य ङीप् प्रत्यय होता है (विकल्प नहीं)। उदाहरण: सुराज्ञी नाम ग्रामः; छन्दसि - पञ्चदाम्नी।

श्लोक 1.30

केवलमामकभागधेयपापापरसमानार्यकृतसुमङ्गलभेषजाच्च

kevalamāmakabhāgadheyapāpāparasamānāryakṛtasumaṅgalabheṣajācca

संज्ञा और वेद में केवल, मामक, भागधेय, पाप, अपर, समान, आर्य, कृत, सुमङ्गल तथा भेषज - इन शब्दों से ङीप् प्रत्यय होता है (लोक में केवला आदि रूप भी चलते हैं)। उदाहरण: केवली/केवला, मामकी/मामिका।

श्लोक 1.31

रात्रेश्वाजसौ

rātreśvājasau

संज्ञा और वेद में रात्रि शब्द से, प्रथमा बहुवचन (जस्) के विषय को छोड़कर, ङीप् प्रत्यय होता है। उदाहरण: या रात्री सृष्टा रात्रीभिः।

श्लोक 1.32

अन्तर्वत्पतिवतोर्नुक्

antarvatpativatornuk

अन्तर्वत् और पतिवत् शब्दों से ङीप् प्रत्यय होता है और साथ ही 'नुक्' का आगम भी होता है। उदाहरण: अन्तर्वत्नी (गर्भवती), पतिवत्नी।

श्लोक 1.33

पत्युर्नोयज्ञसंयोगे

patyurnoyajñasaṁyoge

यज्ञ-सम्बन्धी अर्थ में पति शब्द को स्त्रीत्व-विवक्षा में नकार आदेश होता है। उदाहरण: यजमानस्य पत्नी।

श्लोक 1.34

विभाषासपूर्वस्य

vibhāṣāsapūrvasya

जब पति शब्द के पूर्व कोई अन्य पद हो, तब भी विकल्प से वही नकार आदेश होता है। उदाहरण: वृद्धपत्नी/वृद्धपतिः, स्थूलपत्नी/स्थूलपतिः।

श्लोक 1.35

नित्यं सपत्न्यादिषु

nityaṁ sapatnyādiṣu

सपत्नी आदि निश्चित शब्दों में पति को नित्य (अनिवार्यतः) नकार आदेश होता है। उदाहरण: समानः पतिः अस्याः = सपत्नी; एकपत्नी।

श्लोक 1.36

पूतक्रतोरैच

pūtakratoraica

स्त्रीत्व-विवक्षा में पूतक्रतु शब्द से ङीप् प्रत्यय होता है और अन्त में ऐकार आदेश भी होता है। उदाहरण: पूतक्रतायी (पूतक्रतु नामक पुरुष की पत्नी)।

श्लोक 1.37

वृषाकप्यग्निकुसितकुसीदानामुदात्तः

vṛṣākapyagnikusitakusīdānāmudāttaḥ

वृषाकपि, अग्नि, कुसित और कुसीद शब्दों से स्त्रीलिङ्ग में ङीप् प्रत्यय होता है और अन्त में उदात्त ऐकार आदेश होता है। उदाहरण: वृषाकपायी, अग्नायी, कुसितायी, कुसीदायी।

श्लोक 1.38

मनोरौवा

manorauvā

मनु शब्द से स्त्रीलिङ्ग में ङीप् प्रत्यय होता है और विकल्प से अन्त में औकार अथवा उदात्त ऐकार आदेश होता है। उदाहरण: मानवी अथवा मनायी।

श्लोक 1.39

वर्णादनुदात्तात्तोपधात्तो नः

varṇādanudāttāttopadhātto naḥ

जिस वर्ण-वाचक (रंग बतानेवाले) शब्द का स्वर अनुदात्त हो और उपधा में तकार हो, उससे स्त्रीलिङ्ग में विकल्प से ङीष् प्रत्यय होता है और तकार को नकार आदेश हो जाता है। उदाहरण: एत → एनी (चितकबरी)।

श्लोक 1.40

अन्यतोङीष्

anyatoṅīṣ

अन्य अनुदात्तान्त वर्ण-वाचक शब्दों से स्त्रीलिङ्ग में ङीष् प्रत्यय होता है (बिना नकार आदेश के)। उदाहरण: सारंगी, कल्माषी, शबली।

श्लोक 1.41

षिद् गौरादिभ्यश्च

ṣid gaurādibhyaśca

षकार-इत् प्रातिपदिकों से तथा गौरादिगण के गौर आदि शब्दों से स्त्रीलिङ्ग में ङीष् (ई) प्रत्यय होता है। उदाहरण: गार्ग्यायणी, गौरी, नर्तकी, रजकी।

श्लोक 1.42

जानपदकुण्डगोणस्थलभाज्नागकालनीलकुशकामुककबराद् वृत्त्यमत्रावपनाकृत्रिमाश्राणास्थौल्यवर्णनाच्छादनायोविकारमैथुनेच्छाकेशवेशेषु

jānapadakuṇḍagoṇasthalabhājnāgakālanīlakuśakāmukakabarād vṛttyamatrāvapanākṛtrimāśrāṇāsthaulyavarṇanācchādanāyovikāramaithunecchākeśaveśeṣu

जानपद, कुण्ड, गोण, स्थल, भाज्, नाग, काल, नील, कुश, कामुक और कबर - इन ग्यारह शब्दों से क्रमशः वृत्ति, पात्र, बोरी आदि ग्यारह विशिष्ट अर्थों में ङीप् प्रत्यय होता है। उदाहरण: जानपदी (आजीविका), कुण्डी (पात्र), गोणी (बोरी), नीली (नील की औषधि)।

श्लोक 1.43

शोणात्प्राचाम्

śoṇātprācām

प्राचीन आर्यों के मत में शोण शब्द से स्त्रीत्व-विवक्षा में ङीप् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शोणी (लाल घोड़ी), पक्ष में शोणा।

श्लोक 1.44

वोतोगुणवचनात्

votoguṇavacanāt

उकारान्त गुणवाचक (गुण बतानेवाले) प्रातिपदिक से स्त्रीलिङ्ग में विकल्प से ङीष् प्रत्यय होता है, जहाँ उकार को यण् (व्) आदेश हो जाता है। उदाहरण: मृदु → मृद्वी।

श्लोक 1.45

बह्वादिभ्यश्च

bahvādibhyaśca

बह्वादिगण में पठित बहु आदि शब्दों से स्त्रीलिङ्ग में ङीष् प्रत्यय होता है। उदाहरण: बहु → बह्वी (पक्ष में बहुः)।

श्लोक 1.46

नित्यंछन्दसि

nityaṁchandasi

वेद में बहु आदि शब्दों से नित्य ङीप् प्रत्यय होता है (विकल्प नहीं)। उदाहरण: बह्वीषु हित्वा प्रतिबन्।

श्लोक 1.47

भुवश्च

bhuvaśca

वेद में 'भू' शब्द से नित्य ङीप् प्रत्यय होता है। उदाहरण: विभ्वी, प्रभ्वी, सम्भवी।

श्लोक 1.48

पुंयोगादाख्यायाम्

puṁyogādākhyāyām

पुरुष-वाचक प्रातिपदिक जब पति-पत्नी सम्बन्ध के कारण स्त्रीलिङ्ग में प्रयुक्त हो, तब उससे ङीष् प्रत्यय होता है। उदाहरण: गोप → गोपी (गोप की पत्नी)।

श्लोक 1.49

इन्द्रवरुणभवशर्वरुद्रमृडहिमारण्ययवयवनमातुलाचार्याणामानुक्

indravaruṇabhavaśarvarudramṛḍahimāraṇyayavayavanamātulācāryāṇāmānuk

इन्द्र, वरुण, भव, शर्व, रुद्र, मृड, हिम, अरण्य, यव, यवन, मातुल और आचार्य - इन बारह पुरुष-वाचक शब्दों से पुंयोग (पत्नी-अर्थ) में ङीष् प्रत्यय होता है और साथ ही 'आनुक्' (आन्) का आगम भी होता है। उदाहरण: इन्द्र → इन्द्राणी, वरुण → वरुणानी।

श्लोक 1.50

क्रीतात्करणपूर्वात्

krītātkaraṇapūrvāt

जिस अकारान्त प्रातिपदिक के आदि में करण-कारक हो और अन्त में 'क्रीत' शब्द हो, उससे स्त्रीलिङ्ग में ङीष् प्रत्यय होता है। उदाहरण: वस्त्रक्रीत → वस्त्रक्रीती (वस्त्र से खरीदी हुई)।

श्लोक 1.51

क्तादल्पाख्यायाम्

ktādalpākhyāyām

करण-कारक पूर्वक क्त-प्रत्ययान्त प्रातिपदिक से, अल्पार्थ (थोड़ी मात्रा) में, ङीप् प्रत्यय होता है। उदाहरण: अभ्रविलिप्ती द्यौः (छिटपुट बादलोंवाला आकाश)।

श्लोक 1.52

बहुव्रीहेश्चान्तोदात्तात्

bahuvrīheścāntodāttāt

अन्तोदात्त (अन्तिम स्वर उदात्त) क्तान्त बहुव्रीहि से स्त्रीत्व-विवक्षा में ङीप् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शङ्खभिन्नी, केशलूनी।

श्लोक 1.53

अस्वाङ्गपूर्वपदाद्वा

asvāṅgapūrvapadādvā

जिस अन्तोदात्त क्तान्त बहुव्रीहि के पूर्वपद में अङ्ग-वाचक शब्द न हो, उससे विकल्प से ङीप् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शार्ङ्गजग्धी/शार्ङ्गजग्धा, सुरापीती/सुरापीता।

श्लोक 1.54

स्वाङ्गाच्चोपसर्जना दसंयोगोपधात्

svāṅgāccopasarjanā dasaṁyogopadhāt

यदि अकारान्त प्रातिपदिक के अन्त में असंयोगोपध और गौण (उपसर्जन) अङ्गवाचक शब्द हो, तो स्त्रीलिङ्ग में विकल्प से ङीष् प्रत्यय होता है। उदाहरण: चन्द्रमुखी/चन्द्रमुखा, सुकेशी/सुकेशा।

श्लोक 1.55

नासिकोदरौष्ठजङ्घादन्तकर्णशृङ्गाच्च

nāsikodarauṣṭhajaṅghādantakarṇaśṛṅgācca

नासिका, उदर, ओष्ठ, जङ्घा, दन्त, कर्ण और शृङ्ग - इन अङ्गवाचक शब्दान्त प्रातिपदिकों से भी विकल्प से ङीप् प्रत्यय होता है। उदाहरण: तुङ्गनासिकी/तुङ्गनासिका, बिम्बोष्ठी/बिम्बोष्ठा, समदन्ती/समदन्ता।

श्लोक 1.56

नक्रोडादिबह्वचः

nakroḍādibahvacaḥ

क्रोडादिगण के 'क्रोड' आदि, तथा बहु-अच् (अनेक स्वरोंवाले) अङ्गवाचक शब्द अन्त में हों तो ङीष् प्रत्यय नहीं होता। उदाहरण: कल्याणक्रोडा, पृथुजघना, महाललाटा।

श्लोक 1.57

सहनञ्विद्यमानपूर्वाच्च

sahanañvidyamānapūrvācca

सह-पूर्वक, नञ्-पूर्वक और विद्यमान-पूर्वक अङ्गवाचक प्रातिपदिक से भी ङीप् प्रत्यय नहीं होता। उदाहरण: सकेशा, अकेशा, विद्यमानकेशा।

श्लोक 1.58

नखमुखात्संज्ञायाम

nakhamukhātsaṁjñāyāma

यदि प्रातिपदिक के अन्त में मुख या नख शब्द हो, तो संज्ञा के अर्थ में ङीष् प्रत्यय नहीं होता। उदाहरण: शूर्पणखा, गौरमुखा।

श्लोक 1.59

दीर्घजिह्वीचछन्दसि

dīrghajihvīcachandasi

वेद में 'दीर्घजिह्वी' शब्द का निपातन (विशेष रूप से सिद्ध रूप) होता है। उदाहरण: दीर्घजिह्वी वै देवानां हव्यमलेट्।

श्लोक 1.60

दिक्पूर्वपदान्ङीप्

dikpūrvapadānṅīp

जिस प्रातिपदिक के आरम्भ में दिशा-वाचक शब्द हो, उससे ङीप् प्रत्यय होता है। उदाहरण: प्राङ्मुखी/प्राङ्मुखा, प्राङ्नासिकी।

श्लोक 1.61

वाहः

vāhaḥ

वाह्-अन्त (वहन करनेवाला) प्रातिपदिक से स्त्रीत्व-विवक्षा में विकल्प से ङीप् प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्वित्यौही, प्रष्ठौही।

श्लोक 1.62

सख्यशिश्वीतिभाषायाम्

sakhyaśiśvītibhāṣāyām

लोकभाषा में ङीष्-प्रत्ययान्त 'सखी' तथा 'अशिश्वी' शब्दों का निपातन होता है। उदाहरण: सखी यं मे ब्राह्मणी; अशिश्वी (जिसके शिशु नहीं हैं)।

श्लोक 1.63

जातेरस्त्रीविषयादयोपधात्

jāterastrīviṣayādayopadhāt

जिसकी उपधा में यकार न हो और जो स्त्रीलिङ्ग-नियत न हो, ऐसे जातिवाचक प्रातिपदिक से स्त्रीलिङ्ग में ङीष् प्रत्यय होता है। उदाहरण: कुक्कुटी, ब्राह्मणी, वृषली, हंसी।

श्लोक 1.64

पाककर्णपर्णपुष्पफलमूलवालोत्तरपदाच्च

pākakarṇaparṇapuṣpaphalamūlavālottarapadācca

पाक, कर्ण, पर्ण, पुष्प, फल, मूल और वाल - इन शब्दों के उत्तरपद वाले जातिवाचक प्रातिपदिकों से भी ङीप् प्रत्यय होता है। उदाहरण: ओदनपाकी, शङ्कुकर्णी, शालपर्णी।

श्लोक 1.65

इतोमनुष्यजातेः

itomanuṣyajāteḥ

मनुष्य-जाति-वाचक इकारान्त प्रातिपदिक से स्त्रीलिङ्ग में ङीष् प्रत्यय होता है। उदाहरण: दाक्षि → दाक्षी, अवन्ति → अवन्ती, कुन्ति → कुन्ती।

श्लोक 1.66

ऊङुतः

ūṅutaḥ

जिसकी उपधा में यकार न हो, ऐसे मनुष्यजाति-वाचक उकारान्त प्रातिपदिक से स्त्रीलिङ्ग में 'ऊङ्' (ऊ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: वीरबन्धुः, कुरूः।

श्लोक 1.67

बाह्वन्तात्संज्ञायाम्

bāhvantātsaṁjñāyām

बाहु-शब्दान्त प्रातिपदिक से संज्ञा के अर्थ में ऊङ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: भद्रबाहूः, जालबाहूः (स्त्री-नाम)।

श्लोक 1.68

पङ्गोश्च

paṅgośca

पङ्गु शब्द से भी (श्वशुर की भाँति) स्त्रीलिङ्ग में ऊङ् (ऊ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: पङ्गूः (लंगड़ी स्त्री)।

श्लोक 1.69

उरुत्तरपदादौपम्ये

uruttarapadādaupamye

यदि प्रातिपदिक के उत्तरपद में 'ऊरु' शब्द हो और उपमा का भाव हो, तो स्त्रीलिङ्ग में ऊङ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: कदलीस्तम्भोरूः (केले के खम्भे जैसी मोटी जङ्घावाली)।

श्लोक 1.70

संहितशफलक्षणवामादेश्च

saṁhitaśaphalakṣaṇavāmādeśca

यदि प्रातिपदिक के आदि में संहित, शफ, लक्षण अथवा वाम शब्द हों और अन्त में 'ऊरु' हो, तो स्त्रीलिङ्ग में ऊङ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: संहितोरुः, शफोरुः, वामोरुः (सुन्दर जङ्घावाली)।

श्लोक 1.71

कद्रुकमण्डल्वोश्छन्दसि

kadrukamaṇḍalvośchandasi

वेद में कद्रु और कमण्डलु शब्दों से स्त्रीत्व-विवक्षा में ऊङ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: कद्रूः, कमण्डलूः।

श्लोक 1.72

संज्ञायाम्

saṁjñāyām

संज्ञा (लोकभाषा में भी) कद्रु और कमण्डलु शब्दों से ऊङ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: कद्रूः (विनता की बहन का नाम), कमण्डलूः।

श्लोक 1.73

शार्ङ्गरवाद्यञोङीन्

śārṅgaravādyañoṅīn

शार्ङ्गरवादिगण में पठित तथा अञ्-प्रत्ययान्त जातिवाचक प्रातिपदिक से 'ङीन्' (ई) प्रत्यय होता है। उदाहरण: शार्ङ्गरव → शार्ङ्गरवी, बैद → बैदी।

श्लोक 1.74

यङश्चाप्

yaṅaścāp

यङ्-प्रत्ययान्त प्रातिपदिक से स्त्रीत्व-विवक्षा में 'चाप्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: आम्बष्ठ्या, कारीषगन्ध्या, वाराह्या।

श्लोक 1.75

आवट्याच्च

āvaṭyācca

आवट्य शब्द से भी स्त्रीलिङ्ग में चाप् प्रत्यय होता है। उदाहरण: आवट्या (अवट की पौत्री)।

श्लोक 1.76

तद्धिताः

taddhitāḥ

इस सूत्र से लेकर 'निष्प्रवाणिश्च' (5.4.160) तक विहित सभी प्रत्ययों की संज्ञा 'तद्धित' है - यहीं से अष्टाध्यायी का तद्धित-प्रकरण औपचारिक रूप से आरम्भ होता है।

श्लोक 1.77

यूनस्तिः

yūnastiḥ

युवन् शब्द से स्त्रीलिङ्ग में 'ति' प्रत्यय होता है; न-लोप होकर युवति रूप बनता है। उदाहरण: युवतिः (युवा स्त्री)।

श्लोक 1.78

अणिञोरनार्षयोर्गुरुपोत्तमयोः ष्यङ् गोत्रे

aṇiñoranārṣayorgurupottamayoḥ ṣyaṅ gotre

अनार्ष गोत्र में विहित अण् या इञ् प्रत्ययान्त, गुरु (भारी) उपान्त्य स्वरवाले प्रातिपदिकों से स्त्रीत्व-विवक्षा में 'ष्यङ्' आदेश होता है। उदाहरण: कारीषगन्ध्या, वाराह्या।

श्लोक 1.79

गोत्रअवयवात्

gotraavayavāt

गोत्र में विहित अण् या इञ् प्रत्ययान्त पुणिक, भुणिक, मुखर आदि कुलवाचक शब्दों से भी ष्यङ् आदेश होता है। उदाहरण: पौणिकिः → पौणिक्या, मौखरि → मौखर्या।

श्लोक 1.80

क्रौड्यादिभ्यश्च

krauḍyādibhyaśca

क्रौड्यादिगण में पठित प्रातिपदिकों से स्त्रीलिङ्ग में ष्यङ् आदेश होता है। उदाहरण: क्रौडिः → क्रौड्या, लाडिः → लाड्या।

श्लोक 1.81

दैवयज्ञिशौचिवृक्षिसात्यमुग्रिकाण्डेविद्धिभ्योऽन्यतरस्याम्

daivayajñiśaucivṛkṣisātyamugrikāṇḍeviddhibhyo'nyatarasyām

दैवयज्ञि, शौचिवृक्षि, सात्यमुग्रि तथा काण्ठेविद्धि शब्दों से स्त्रीत्व-विवक्षा में विकल्प से ष्यङ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: दैवयज्ञ्या।

श्लोक 1.82

समर्थानांप्रथमाद्वा

samarthānāṁprathamādvā

यहाँ से 'अहंशुभमोर्युस्' (5.2.140) तक विहित प्रत्यय समर्थ (सम्बद्ध) पदों में से प्रथम (मूल) पद से होते हैं। उदाहरण: दशरथस्य अपत्यम् में प्रथम पद दशरथ से इञ् होकर दाशरथिः बनता है।

श्लोक 1.83

प्राग्दीव्यतोऽण्

prāgdīvyato'ṇ

यहाँ से आगे 'दीव्यति' (4.4.2 के पूर्व) तक अपत्य आदि अर्थों में अण् (अ) प्रत्यय होता है - यह अगले अनेक सूत्रों का सामान्य नियम है। उदाहरण: औपगवः, कापटवः।

श्लोक 1.84

अश्वपत्यादिभ्यश्च

aśvapatyādibhyaśca

अश्वपति आदि (शतपति, धनपति, गणपति आदि) 'पति' उत्तरपदवाले शब्दों से भी अपत्यादि अर्थ में अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: आश्वपतः, शातपतः।

श्लोक 1.85

दित्यदित्यादित्यपत्युत्तरपदाण्ण्यः

dityadityādityapatyuttarapadāṇṇyaḥ

दिति, अदिति, आदित्य और पति-उत्तरपदवाले शब्दों से अपत्य अर्थ में 'ण्य' (य) प्रत्यय होता है। उदाहरण: दितेरपत्यं दैत्यः, अदितेरपत्यम् आदित्यः, सेनापति → सैनापत्यम्।

श्लोक 1.86

उत्सादिभ्योऽञ्

utsādibhyo'ñ

उत्स आदि शब्दों से अपत्यादि अर्थ में अञ् (अ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: उत्सस्य अपत्यम् = औत्सः, उदपान → औदपानः।

श्लोक 1.87

स्त्रीपुंसाभ्यांनञ्स्नञौभवनात्

strīpuṁsābhyāṁnañsnañaubhavanāt

स्त्री और पुंस् शब्दों से (4.1.8 में कहे गये) अर्थों में क्रमशः नञ् और स्नञ् प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: स्त्रीषु भवम् = स्त्रैणम्, पुंसि भवम् = पौंस्नम्।

श्लोक 1.88

द्विगोर्लुगनपत्ये

dvigorluganapatye

अपत्य-अर्थ को छोड़कर, द्विगु-सम्बन्धी तद्धित-प्रत्यय का लुक् (लोप) होता है। उदाहरण: पञ्चकपाल (पाँच कपालोंवाला पात्र) - प्रत्यय का लोप होकर वही रूप रहता है।

श्लोक 1.89

गोत्रेऽलुगचि

gotre'lugaci

यस्कादिगण में गोत्र-प्रत्यय के लोप की जो विधि है (2.4.63), वह अजादि प्राग्दीव्यतीय (offspring) अर्थ के प्रत्यय-विधान में लागू नहीं होती। उदाहरण: गार्ग्य → गार्गीयाः।

श्लोक 1.90

यूनिलुक्

yūniluk

अजादि प्राग्दीव्यतीय (offspring) अर्थ के प्रत्यय-विधान में युवा-वाचक (यूनि) प्रत्यय का लोप होता है। उदाहरण: फाण्टाहृतः, ग्लौचुकायनाः।

श्लोक 1.91

फक्फिञोरन्यतरस्याम्

phakphiñoranyatarasyām

फक् और फिञ् इन दोनों 'यूनि' प्रत्ययों का विकल्प से लोप होता है। उदाहरण: गार्गीयाः/गार्ग्यायणीयाः, यास्कीयाः/यास्कायनीयाः।

श्लोक 1.92

तस्यापत्यम्

tasyāpatyam

प्रथमा-षष्ठ्यन्त समर्थ (सम्बद्ध) पद से 'अपत्य' अर्थ में प्रत्यय होता है - यह आगे के सम्पूर्ण अपत्याधिकार का मूल सूत्र है। उदाहरण: उपगोः अपत्यम्।

श्लोक 1.93

एकोगोत्रे

ekogotre

गोत्र (वंशपरम्परा) के अर्थ में अपत्यवाचक एक ही प्रत्यय पर्याप्त होता है, बार-बार नहीं लगाना पड़ता। उदाहरण: औपगवः शब्द उपगु के पुत्र, पौत्र आदि सभी वंशजों का बोध कराता है।

श्लोक 1.94

गोत्राद्यून्यस्त्रियाम्

gotrādyūnyastriyām

स्त्रीलिङ्ग को छोड़कर, युवा अर्थ में गोत्र-प्रत्ययान्त शब्द से अपत्यवाचक प्रत्यय होता है। उदाहरण: गार्ग्यस्य अपत्यं युवा = गार्ग्यायणः।

श्लोक 1.95

अत इञ्

ata iñ

अकारान्त प्रातिपदिक के षष्ठ्यन्त समर्थ से अपत्य अर्थ में 'इञ्' (इ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: दक्षस्य अपत्यम् = दाक्षिः।

श्लोक 1.96

बाह्वादिभ्यश्च

bāhvādibhyaśca

बाहु आदि शब्दों के षष्ठ्यन्त समर्थ से भी अपत्य अर्थ में इञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: बाहोः अपत्यम् = बाहविः, उडुलोमन् → औडुलोमिः।

श्लोक 1.97

सुधातुरकङ्च

sudhāturakaṅca

सुधातृ शब्द से अपत्यार्थ में इञ् प्रत्यय होता है और साथ ही 'अकङ्' आदेश भी होता है। उदाहरण: सौधातकिः।

श्लोक 1.98

गोत्रे कुञ्जादिभ्यश्च्फञ्

gotre kuñjādibhyaścphañ

गोत्र अर्थ में कुञ्ज आदि शब्दों से 'च्फञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कुञ्ज → कौञ्जायन्यः, शङ्ख → शङ्खायन्यः।

श्लोक 1.99

नडादिभ्यःफक्

naḍādibhyaḥphak

नड आदि शब्दों से 'फक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: नडस्य गोत्रापत्यम् = नाडायनः।

श्लोक 1.100

हरितादिभ्योऽ ञः

haritādibhyo' ñaḥ

अञ्-प्रत्ययान्त हरित् आदि शब्दों से अपत्यार्थ में 'फक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: हारित → हारितायनः, कैन्दास → कैन्दासायनः।

श्लोक 1.101

यञिञोश्च

yañiñośca

गोत्र अर्थ में यञ्-प्रत्ययान्त और इञ्-प्रत्ययान्त शब्दों से भी फक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: गार्ग्य → गार्ग्यायणः, वात्स्य → वात्स्यायनः, दाक्षि → दाक्षायणः।

श्लोक 1.102

शरद्वच्छुनकदर्भाद् भृगुवत्साग्रायणेषु

śaradvacchunakadarbhād bhṛguvatsāgrāyaṇeṣu

भृगु, वत्स और आग्रायण गोत्रों में क्रमशः शरद्वत्, शुनक और दर्भ शब्दों से फक् प्रत्यय होता है (अन्यत्र नहीं)। उदाहरण: शारद्वतायनः (भार्गवगोत्र में), शौनकायनः (वात्स्यगोत्र में)।

श्लोक 1.103

द्रोणपर्वतजीवन्तादन्यतरस्याम्

droṇaparvatajīvantādanyatarasyām

द्रोण, पर्वत और जीवन्त शब्दों से गोत्रापत्य में विकल्प से फक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्रौणायनः/द्रौणिः, पार्वतायनः/पार्वतिः।

श्लोक 1.104

अनृष्यानन्तर्येबिदादिभ्योऽञ्

anṛṣyānantaryebidādibhyo'ñ

बिदादिगण के ऋषिवाचक शब्दों से गोत्र अर्थ में, और अनृषिवाचक शब्दों से अपत्य अर्थ में, अञ् (अ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: बिद (ऋषि) → बैदः।

श्लोक 1.105

गर्गादिभ्योयञ्

gargādibhyoyañ

गर्ग आदि शब्दों से गोत्र अर्थ में यञ् (य) प्रत्यय होता है। उदाहरण: गर्गस्य गोत्रापत्यम् = गार्ग्यः।

श्लोक 1.106

मधुबभ्रूवोर्ब्राह्मणकौशिकयोः

madhubabhrūvorbrāhmaṇakauśikayoḥ

ब्राह्मण-गोत्र में मधु शब्द से, और कौशिक-गोत्र में बभ्रु शब्द से, यञ् प्रत्यय होता है (अन्यत्र नहीं)। उदाहरण: माधव्यः (ब्राह्मणगोत्र में), बाभ्रव्यः (कौशिकगोत्र में)।

श्लोक 1.107

कपिबोधादाङ्गिरसे

kapibodhādāṅgirase

आङ्गिरस-गोत्र में कपि और बोध शब्दों से यञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: काप्यः, बौध्यः।

श्लोक 1.108

वतण्डाच्च

vataṇḍācca

आङ्गिरस-गोत्र में वतण्ड शब्द से भी यञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: वातण्ड्यः।

श्लोक 1.109

लुक्स्त्रियाम्

lukstriyām

वतण्ड शब्द से विहित यञ् प्रत्यय का स्त्रीलिङ्ग में लोप हो जाता है और अण्+ङीप् से रूप बनता है। उदाहरण: वातण्डी।

श्लोक 1.110

अश्वादिभ्यःफञ्

aśvādibhyaḥphañ

अश्व आदि शब्दों से गोत्रापत्य में 'फञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अश्वायनः, आश्मायनः।

श्लोक 1.111

भर्गात्त्रैगर्ते

bhargāttraigarte

त्रैगर्त देश में भर्ग शब्द से फञ् प्रत्यय होता है (अन्यत्र इञ्)। उदाहरण: भार्गायणः (त्रैगर्त में), भर्गिः (अन्यत्र)।

श्लोक 1.112

शिवादिभ्योऽण्

śivādibhyo'ṇ

षष्ठ्यन्त शिव आदि शब्दों से अपत्य अर्थ में अण् (अ) प्रत्यय होता है (यह पूर्वप्राप्त इञ् का बाध करता है)। उदाहरण: शिवस्य अपत्यम् = शैवः।

श्लोक 1.113

अवृद्धाभ्योनदीमानुषीभ्यस्तन्नामिकाभ्यः

avṛddhābhyonadīmānuṣībhyastannāmikābhyaḥ

वृद्धसंज्ञा से भिन्न नदी-वाचक तथा मनुष्य-स्त्री-नामवाचक शब्दों से अपत्य अर्थ में अञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: यमुनायाः अपत्यम् = यामुनः, शिक्षिताया अपत्यम् = शैक्षितः।

श्लोक 1.114

ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च

ṛṣyandhakavṛṣṇikurubhyaśca

ऋषिवाचक तथा अन्धक, वृष्णि और कुरु कुलवाचक शब्दों से भी अपत्य अर्थ में अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: वसिष्ठस्य अपत्यम् = वासिष्ठः।

श्लोक 1.115

मातुरुत्संख्यासंभद्रपूर्वायाः

māturutsaṁkhyāsaṁbhadrapūrvāyāḥ

संख्यावाचक, 'सम्' अथवा 'भद्र' पूर्वपदवाली मातृ शब्द के षष्ठ्यन्त समर्थ से अपत्य अर्थ में अण् प्रत्यय होता है, और मातृ के ऋकार का 'उर्' आदेश होता है। उदाहरण: द्विमातुः अपत्यम् (दो माताओं का पुत्र)।

श्लोक 1.116

कन्यायाःकनीनच

kanyāyāḥkanīnaca

कन्या शब्द के षष्ठ्यन्त समर्थ से अपत्य अर्थ में अण् प्रत्यय होता है और 'कन्या' के स्थान पर 'कनीन' आदेश होता है। उदाहरण: कन्यायाः अपत्यम् = कनीनः।

श्लोक 1.117

विकर्णशुङ्गच्छगलाद्वत्सभरद्वाजात्रिषु

vikarṇaśuṅgacchagalādvatsabharadvājātriṣu

विकर्ण, शुङ्ग और छगल शब्दों से क्रमशः वत्स, भरद्वाज और अत्रि कुलों में अपत्य अर्थ में अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: वैकर्णः, शौङ्गः, छागलः।

श्लोक 1.118

पीलायावा

pīlāyāvā

पीला शब्द से अपत्यार्थ में विकल्प से अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: पीलायाः अपत्यम् = पैलः/पैलेयः।

श्लोक 1.119

ढक्चमण्डूकात्

ḍhakcamaṇḍūkāt

मण्डूक शब्द से अपत्यार्थ में विकल्प से ढक् प्रत्यय होता है (पक्ष में अण् और इञ् भी)। उदाहरण: मण्डूकेयः, माण्डूकः, माण्डूकिः।

श्लोक 1.120

स्त्रीभ्योढक्

strībhyoḍhak

स्त्री-प्रत्ययान्त शब्दों के षष्ठ्यन्त समर्थ से अपत्य अर्थ में ढक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: विनतायाः अपत्यम् = वैनतेयः।

श्लोक 1.121

द्वयचः

dvayacaḥ

द्वि-अच् (दो स्वरोंवाले) स्त्री-प्रत्ययान्त शब्द से भी अपत्यार्थ में ढक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: गङ्गायाः अपत्यम् = गाङ्गेयः, दत्ताया अपत्यम् = दात्तेयः।

श्लोक 1.122

इतश्चानिञः

itaścāniñaḥ

इञ्-प्रत्ययान्त से भिन्न इकारान्त प्रातिपदिक से अपत्यार्थ में ढक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: अत्रेः अपत्यम् = आत्रेयः, निधेः अपत्यम् = नैधेयः।

श्लोक 1.123

शुभ्रादिभ्यश्च

śubhrādibhyaśca

शुभ्र आदि शब्दों से भी अपत्यार्थ में ढक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शुभ्रस्य अपत्यम् = शौभ्रेयः।

श्लोक 1.124

विकर्णकुषीतकात् काश्यपे

vikarṇakuṣītakāt kāśyape

काश्यप-गोत्र के विशेष अर्थ में विकर्ण और कुशीतक शब्दों से ढक् प्रत्यय होता है (अन्यत्र इञ्)। उदाहरण: वैकर्णेयः, कौषीतकेयः (काश्यप में); वैकर्णिः, कौषीतकिः (अन्यत्र)।

श्लोक 1.125

भ्रुवोवुक्च

bhruvovukca

भ्रू शब्द से अपत्यार्थ में ढक् प्रत्यय होता है और साथ ही 'वुक्' का आगम भी होता है। उदाहरण: भ्रौवेयः।

श्लोक 1.126

कल्याण्यादीनामिनङ्च

kalyāṇyādīnāminaṅca

कल्याणी आदि शब्दों से अपत्यार्थ में ढक् प्रत्यय होता है और अन्त में 'इनङ्' आदेश होता है। उदाहरण: कल्याणी → कल्याणिनेयः, सुभगा → सौभागिनेयः।

श्लोक 1.127

कुलटायावा

kulaṭāyāvā

कुलटा शब्द से अपत्यार्थ में ढक् प्रत्यय होता है और विकल्प से इनङ् आदेश। उदाहरण: कौलटिनेयः/कौलटेयः।

श्लोक 1.128

चटकायाऐरक्

caṭakāyāairak

चटका शब्द से अपत्यार्थ में 'एरक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: चाटकैरः।

श्लोक 1.129

गोधायाढ्रक्

godhāyāḍhrak

गोधा शब्द से अपत्यार्थ में 'ढ्रक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: गौधेरः।

श्लोक 1.130

आरगुदीचाम्

āragudīcām

उदीच्य आचार्यों के मत से गोधा शब्द से 'आरक्' प्रत्यय भी होता है। उदाहरण: गौधारः।

श्लोक 1.131

क्षुद्राभ्योवा

kṣudrābhyovā

क्षुद्रा (छोटे कुल का नाम रखनेवाले) शब्दों से अपत्यार्थ में विकल्प से ढक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: काणेरः/काणेयः, दासेरः/दासेयः।

श्लोक 1.132

पितृष्वसुश्छण्

pitṛṣvasuśchaṇ

पितृष्वसृ (बुआ) शब्द से अपत्यार्थ में 'छण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पैतृष्वस्त्रीयः।

श्लोक 1.133

ढकिलोपः

ḍhakilopaḥ

पितृष्वसृ शब्द से विहित 'छण्' प्रत्यय का, 'ढक्' प्रत्यय परे रहने पर, लोप हो जाता है। उदाहरण: पैतृष्वसेयः।

श्लोक 1.134

मातृष्वसुश्च

mātṛṣvasuśca

मातृष्वसृ (मौसी) शब्द से भी अपत्यार्थ में छण् प्रत्यय होता है, जिसका ढक् परे रहने पर लोप हो जाता है। उदाहरण: मातृष्वसेयः।

श्लोक 1.135

चतुष्पाद्भयोढञ्

catuṣpādbhayoḍhañ

चतुष्पाद्-वाचक (पशुवाचक) शब्दों से अपत्यार्थ में ढञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शुन्तिबाहु → शौन्तिबाहेयः, जम्बू → जाम्बेयः।

श्लोक 1.136

गृष्टयादिभ्यश्च

gṛṣṭayādibhyaśca

गृष्टि आदि शब्दों से भी अपत्यार्थ में ढञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: गृष्टेः अपत्यम् = गार्ष्टेयः।

श्लोक 1.137

राजश्वशुराद्यत्

rājaśvaśurādyat

श्वशुर शब्द से अपत्य अर्थ में, और राजन् शब्द से जाति अर्थ में, 'यत्' (य) प्रत्यय होता है। उदाहरण: श्वशुरस्य अपत्यम् = श्वशुर्यः (साला)।

श्लोक 1.138

क्षत्राद् घः

kṣatrād ghaḥ

क्षत्त्र शब्द से 'घ' प्रत्यय होता है, जो आगे इय् में बदलकर क्षत्त्रिय रूप बनाता है। उदाहरण: क्षत्त्रियः।

श्लोक 1.139

कुलात् खः

kulāt khaḥ

कुल शब्द तथा कुल-शब्दान्त प्रातिपदिक से अपत्यार्थ में 'ख' प्रत्यय होता है। उदाहरण: आढ्यकुलीनः, क्षेत्रियकुलीनः।

श्लोक 1.140

अपूर्वपदादन्यतरस्यांयड्ढकञौ

apūrvapadādanyatarasyāṁyaḍḍhakañau

पूर्वपद-रहित कुल शब्द से विकल्प से यत् और ढकञ् प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: कुल्यः, कौलेयकः, कुलीनः।

श्लोक 1.141

महाकुलादञ्खञौ

mahākulādañkhañau

महाकुल शब्द से विकल्प से अपत्यार्थ में अञ् और खञ् प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: माहाकुलः, माहाकुलीनः।

श्लोक 1.142

दुष्कुलाड्ढक्

duṣkulāḍḍhak

दुष्कुल शब्द से अपत्यार्थ में विकल्प से ढक् और ख प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: दौष्कुलेयः, दुष्कुलीनः।

श्लोक 1.143

स्वसुश्छः

svasuśchaḥ

स्वसृ (बहिन) शब्द से अपत्यार्थ में 'छ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: स्वसुः अपत्यम् = स्वस्त्रीयः (बहिन का पुत्र)।

श्लोक 1.144

भ्रातुर्व्यच्च

bhrāturvyacca

भ्रातृ शब्द से अपत्यार्थ में व्यत् और छ दोनों प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: भ्रातुः अपत्यम् = भ्रातृव्यः/भ्रात्रीयः (भाई का पुत्र)।

श्लोक 1.145

व्यन्सपत्ने

vyansapatne

जब 'सपत्न' (शत्रु) अर्थ अभिप्रेत हो, तब भ्रातृ शब्द से केवल 'व्यत्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: भ्रातृव्यः कण्टकः (शत्रुरूपी भतीजा)।

श्लोक 1.146

रेवत्यादिभ्यष्ठक्

revatyādibhyaṣṭhak

षष्ठ्यन्त रेवती आदि शब्दों से अपत्य अर्थ में 'ठक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: रेवत्याः अपत्यम् = रैवतिकः (जाति-प्रत्यय); कर्तृ → कार्त्रः → कार्त्रायणिः।

श्लोक 1.147

गोत्रस्त्रियाः कुत्सने ण च

gotrastriyāḥ kutsane ṇa ca

स्त्रीत्व-विशिष्ट गोत्रवाचक शब्द से निन्दा (कुत्सा) अर्थ में विकल्प से ण और ठच् प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: गार्ग्याः अपत्यम् = गार्गः जाल्मः (निन्दित), गार्गिकः।

श्लोक 1.148

वृद्धाट्ठक् सौवीरेषु बहुलम्

vṛddhāṭṭhak sauvīreṣu bahulam

सौवीर-गोत्र में वृद्धसंज्ञक शब्द से, निन्दा अभिप्रेत होने पर, बहुधा 'ठक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: भागवित्तिकः जाल्मः।

श्लोक 1.149

फेश्छच

pheśchaca

सौवीर-गोत्र के फिञ्-प्रत्ययान्त शब्दों से, निन्दा अभिप्रेत होने पर, अपत्यार्थ में छ और पाक्षिक ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: यामुन्दायनीयः, यामुन्दायनिकः।

श्लोक 1.150

फाण्टाहृतिमिमताभ्यांण फिञौ

phāṇṭāhṛtimimatābhyāṁṇa phiñau

फाण्टाहृति और मिमत शब्दों से सौवीर-गोत्र के अर्थ में ण और फिञ् प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: फाण्टाहृतायनिः, मैमतायनिः।

श्लोक 1.151

कुर्वादिभ्योण्यः

kurvādibhyoṇyaḥ

कुरु आदि शब्दों से अपत्यार्थ में 'ण्य' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कुरोः अपत्यम् = कौरव्यः।

श्लोक 1.152

सेनान्तलक्षणकारिभ्यश्च

senāntalakṣaṇakāribhyaśca

सेना-अन्तवाले प्रातिपदिक, लक्षण शब्द तथा शिल्पी-वाचक (कारीगर बतानेवाले) शब्दों से भी अपत्यार्थ में ण्य प्रत्यय होता है। उदाहरण: कारिषेण्यः, कौम्भकार्यः (कुम्हार का पुत्र)।

श्लोक 1.153

उदीचामिञ्

udīcāmiñ

उदीच्य आचार्यों के मत में सेना-अन्त आदि प्रातिपदिकों से इञ् प्रत्यय भी होता है। उदाहरण: कारिषेणिः, कौम्भकारिः।

श्लोक 1.154

तिकादिभ्यःफिञ्

tikādibhyaḥphiñ

तिक आदि शब्दों से अपत्यार्थ में 'फिञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: तिकस्य अपत्यम् = तैकायनिः।

श्लोक 1.155

कौशल्यकार्मार्याभ्यांच

kauśalyakārmāryābhyāṁca

कौशल्य और कार्मार्य शब्दों से भी अपत्यार्थ में फिञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: कौशल्यायनिः, कार्मार्यायणिः।

श्लोक 1.156

अणोद्वयचः

aṇodvayacaḥ

अण्-प्रत्ययान्त द्वि-अच् (दो स्वरोंवाले) प्रातिपदिक से अपत्यार्थ में फिञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: कार्त्रस्य अपत्यम् = कार्त्रायणिः।

श्लोक 1.157

उदीचांवृद्धादगोत्रात्

udīcāṁvṛddhādagotrāt

उदीच्य आचार्यों के मत में, गोत्रवाचक से भिन्न वृद्धसंज्ञक शब्द से अपत्यार्थ में फिञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: आम्रगुप्तस्य अपत्यम् = आम्रगुप्तायनिः।

श्लोक 1.158

वाकिनादीनांकुक्च

vākinādīnāṁkukca

वाकिन आदि शब्दों से अपत्यार्थ में फिञ् प्रत्यय होता है और साथ ही 'कुक्' का आगम भी होता है। उदाहरण: वाकिनकायनिः, गारेधकायनिः।

श्लोक 1.159

पुत्रान्तादन्यतरस्याम्

putrāntādanyatarasyām

पुत्र-अन्त प्रातिपदिक से विहित फिञ् प्रत्यय के परे रहते, पुत्र-अन्त शब्द को विकल्प से कुक् का आगम होता है। उदाहरण: गार्गीपुत्रकायणिः/गार्गीपुत्रायणिः/गार्गीपुत्रिः।

श्लोक 1.160

प्राचामवृद्धात् फिन्बहुलम्

prācāmavṛddhāt phinbahulam

पूर्वीय आचार्यों के मत में, अवृद्ध शब्दों से अपत्यार्थ में बहुधा 'फिन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: ग्लुचुकायनिः, पक्षे इञ् - ग्लौचुकिः।

श्लोक 1.161

मनोर्जातावञ्यतौषुक्च

manorjātāvañyatauṣukca

मनु शब्द से, जब जाति (मानव-जाति) का बोध अभिप्रेत हो, विकल्प से अञ् और यत् प्रत्यय एवं 'षुक्' का आगम होता है। उदाहरण: मानुषः।

श्लोक 1.162

अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम्

apatyaṁ pautraprabhṛti gotram

यदि पौत्र (या और आगे की पीढ़ी) को भी 'अपत्य' रूप में ही कहना अभीष्ट हो, तो उसकी 'गोत्र' संज्ञा होती है। उदाहरण: उपगु के पौत्र को भी उपगु की सन्तान कहने पर वह गोत्र-संज्ञक होगा।

श्लोक 1.163

जीवति तु वंश्ये युवा

jīvati tu vaṁśye yuvā

यदि पिता आदि पूर्वज जीवित हों, तो पौत्र से आगे की सन्तान की 'युवा' संज्ञा होती है, गोत्र संज्ञा नहीं। उदाहरण: गार्ग्यस्य युवापत्यम् = गार्ग्यायणः।

श्लोक 1.164

भ्रातरिचज्यायसि

bhrātaricajyāyasi

बड़े भाई के जीवित रहने पर छोटे भाई की 'युवा' संज्ञा होती है (और बड़े भाई की गोत्र-संज्ञा ही रहती है)। उदाहरण: गार्ग्य (बड़ा भाई) - गार्ग्यायण (छोटा भाई)।

श्लोक 1.165

वान्यस्मिन्सपिण्डेस्थविरतरेजीवति

vānyasminsapiṇḍesthaviratarejīvati

भाई से भिन्न किसी वृद्धतर सपिण्ड (कुटुम्बी) के जीवित रहने पर, पौत्र आदि जीवित सन्तानों की विकल्प से 'युवा' संज्ञा होती है। उदाहरण: गार्ग्यायणः, पक्षे गार्ग्यः।

श्लोक 1.166

वृद्धस्यचपूजायाम्

vṛddhasyacapūjāyām

सम्मान (पूजा) का भाव अभिप्रेत होने पर विकल्प से वृद्ध (पूर्वज) की भी 'युवा' संज्ञा हो सकती है।

श्लोक 1.167

यूनश्चकुत्सायाम्

yūnaścakutsāyām

निन्दा (कुत्सा) का भाव अभिप्रेत होने पर विकल्प से युवा (नवीन सन्तान) की वृद्ध-सदृश (गोत्र) संज्ञा भी हो सकती है।

श्लोक 1.168

जनपदशब्दात्क्षत्रियादञ्

janapadaśabdātkṣatriyādañ

जो जनपद-वाचक शब्द क्षत्रिय-वाचक भी हो, उससे अपत्य अर्थ में 'अञ्' (अ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: पञ्चालः (पञ्चाल जनपद के क्षत्रिय की सन्तान)।

श्लोक 1.169

साल्वेयगान्धारिभ्यांच

sālveyagāndhāribhyāṁca

साल्वेय और गान्धारि शब्दों से भी अपत्यार्थ में अञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: साल्वेयः, गान्धारः।

श्लोक 1.170

द्वयञ्मगधकलिङ्गसूरमसादण्

dvayañmagadhakaliṅgasūramasādaṇ

क्षत्रिय-वाचक जनपद-अर्थ में प्रयुक्त द्वि-अच् शब्दों से, तथा मगध, कलिङ्ग और सूरमस शब्दों से, अपत्यार्थ में अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: अङ्गानाम् अपत्यम् = आङ्गः, मगधानाम् अपत्यम् = मागधः।

श्लोक 1.171

वृद्धेत्कोसलाजादाञ्ञ्यङ्

vṛddhetkosalājādāññyaṅ

वृद्धसंज्ञक, इकारान्त, कोसल तथा अजाद शब्दों से अपत्यार्थ में 'ज्यङ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: आम्बष्ठ्यः, आवन्त्यः, कौसलेयः, आजाद्यः।

श्लोक 1.172

कुरूनादिभ्योण्यः

kurūnādibhyoṇyaḥ

कुरु और न-आदि (नकारादि) क्षत्रिय-वाचक जनपद शब्दों से 'ण्य' (य) प्रत्यय होता है। उदाहरण: कुरोः अपत्यम् = कौरव्यः, नैषध्यः।

श्लोक 1.173

साल्वावयवप्रत्यग्रथकलकूटाश्मकादिञ्

sālvāvayavapratyagrathakalakūṭāśmakādiñ

साल्व के अवयव-वाचक (उपविभाग-वाचक), प्रत्यग्रथ, कलकूट तथा अश्मक शब्दों से अपत्यार्थ में 'ज्यङ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: औदुम्बरिः, कालकूटिः, आश्मकिः।

श्लोक 1.174

तेतद्राजाः

tetadrājāḥ

इस सूत्र से लेकर अञ्-आदि उपर्युक्त सभी प्रत्ययों की 'तद्राज' संज्ञा होती है (जो जनपद और उसके क्षत्रिय दोनों को बतलाए)। उदाहरण: पाञ्चालः (देश और क्षत्रिय दोनों अर्थों में)।

श्लोक 1.175

कम्बोजाल्लुक्

kambojālluk

कम्बोज शब्द के आगे तद्राज-प्रत्यय का लोप हो जाता है (अर्थात् प्रत्यय जुड़कर भी रूप वही रहता है)। उदाहरण: कम्बोजस्य अपत्यम् = कम्बोजः।

श्लोक 1.176

स्त्रियामवन्तिकुन्तिकुरुभ्यश्च

striyāmavantikuntikurubhyaśca

अवन्ति, कुन्ति और कुरु शब्दों से विहित तद्राज-प्रत्ययों का स्त्रीत्व-विवक्षा में लोप हो जाता है। उदाहरण: अवन्ती, कुन्ती, कुरूः।

श्लोक 1.177

अतश्च

ataśca

तद्राज-संज्ञक अकारान्त प्रत्यय का स्त्रीत्व-विवक्षा में लुक् हो जाता है। उदाहरण: शूरसेनस्य अपत्यं स्त्री = शूरसेनी, मद्री।

श्लोक 1.178

नप्राच्यभर्गादियौधेयादिभ्यः

naprācyabhargādiyaudheyādibhyaḥ

प्राच्य क्षत्रिय-वाचक, भर्गादि तथा योधेयादि शब्दों से विहित तद्राज-प्रत्ययों का लोप नहीं होता। उदाहरण: पाञ्चाली, वैदेही, भार्गी, यौधेयी।

चतुर्थोऽध्यायः, द्वितीयः पादः

श्लोक 2.1

तेनरक्तंरागात्

tenaraktaṁrāgāt

'रँगा हुआ' (रक्त) अर्थ में तृतीयान्त रंग-वाचक पद से ही (4.1.83 में कहा) अण् आदि यथाविहित प्रत्यय होता है। उदाहरण: कषायेण रक्तं वस्त्रम् = काषायम् (कषाय रंग से रँगा वस्त्र)।

श्लोक 2.2

लाक्षारोचनाशकलकर्दमाट्ठक्

lākṣārocanāśakalakardamāṭṭhak

रंग-वाचक तृतीयान्त लाक्षा, रोचना, शकल और कर्दम शब्दों से 'रक्त' अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शकलम्, कर्दमम्, नीलम्, हारिद्रम् (हल्दी रंग का)।

श्लोक 2.3

नक्षत्रेणयुक्तःकालः

nakṣatreṇayuktaḥkālaḥ

जिस काल (दिन/रात) का सम्बन्ध किसी नक्षत्र से हो, उस नक्षत्र-वाचक तृतीयान्त शब्द से अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: पुष्येण युक्तं दिनम् = पौष्यम् (पुष्य नक्षत्र से युक्त दिन)।

श्लोक 2.4

लुबविशेषे

lubaviśeṣe

जब यह स्पष्ट न हो कि दिन है या रात, तब नक्षत्र-युक्त काल अर्थ में विहित अण् प्रत्यय का लोप हो जाता है। उदाहरण: अद्य पुष्येण युक्तः कालः = पुष्यः (केवल)।

श्लोक 2.5

संज्ञायांश्रवणाश्चत्थाभ्याम्

saṁjñāyāṁśravaṇāścatthābhyām

श्रवणा और अश्वत्थ शब्दों से, संज्ञा (विशेषनाम) के विषय में, विहित प्रत्यय बना रहता है (लोप नहीं होता) - अर्थात् श्रावणी, आश्वत्थी जैसे रूप संज्ञा बनते हैं।

श्लोक 2.6

द्वन्द्वाच्छः

dvandvācchaḥ

तृतीयासमर्थ नक्षत्र-द्वन्द्व (दो नक्षत्रों के समास) से, काल-विशेष हो या सामान्य, 'छ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: राधानुराधा → राधानुराधीयम्।

श्लोक 2.7

दृष्टंसाम

dṛṣṭaṁsāma

'देखा गया साम (वैदिक गान)' अर्थ में तृतीयान्त (द्रष्टा वाचक) शब्द से ही यथाविहित (अण् आदि) प्रत्यय होता है। उदाहरण: वसिष्ठेन दृष्टं साम = वासिष्ठम्।

श्लोक 2.8

कलेर्ढक्

kalerḍhak

तृतीयासमर्थ कलि शब्द से 'देखा गया साम' अर्थ में ढक् प्रत्यय होता है।

श्लोक 2.9

वामदेवाड्ड्यड्ड्यौ

vāmadevāḍḍyaḍḍyau

'देखा गया साम' अर्थ में तृतीयान्त वामदेव शब्द से ड्यत् और ड्य प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: वामदेवेन दृष्टं साम = वामदेव्यम्।

श्लोक 2.10

परिवृतोरथः

parivṛtorathaḥ

'घिरा हुआ रथ' अर्थ में तृतीयान्त समर्थ शब्द से अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: वस्त्रेण परिवृतो रथः = वास्त्रः, कम्बलेन → काम्बलः।

श्लोक 2.11

पाण्डुकम्बलादिनिः

pāṇḍukambalādiniḥ

तृतीयासमर्थ पाण्डुकम्बल शब्द से 'घिरा हुआ रथ' अर्थ में 'इनि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पाण्डुकम्बली (रथ)।

श्लोक 2.12

द्वैपवैयाघ्रादञ्

dvaipavaiyāghrādañ

तृतीयासमर्थ द्वैप और वैयाघ्र शब्दों से 'घिरा हुआ रथ' अर्थ में अञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्वैपः, वैयाघ्रः।

श्लोक 2.13

कौमारापूर्ववचने

kaumārāpūrvavacane

'अपूर्ववचन' (पहली बार विवाहित होना बतलाने) के अर्थ में 'कौमार' शब्द का निपातन (विशेष रूप) होता है। उदाहरण: कौमारो भर्ता (जिसका यह प्रथम विवाह है, ऐसा पति), कौमारी भार्या।

श्लोक 2.14

तत्रोद्धृतममत्रेभ्यः

tatroddhṛtamamatrebhyaḥ

'निकाला हुआ' (उद्धृत) अर्थ में सप्तमी-अन्त पात्र-वाचक शब्दों से अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शरावे उद्धृतम् = शारावम्, मल्लिका → माल्लिकम्।

श्लोक 2.15

स्थण्डिलाच्छयितरिव्रते

sthaṇḍilācchayitarivrate

सप्तमीसमर्थ स्थण्डिल शब्द से 'सोनेवाला' अर्थ में यथाविहित प्रत्यय होता है, भले ही व्रत का समुदाय-अर्थ भासित हो। उदाहरण: स्थण्डिले शयितुं व्रतमस्य = स्थाण्डिलः (चबूतरे पर सोने का व्रतधारी यति)।

श्लोक 2.16

संस्कृतंभक्षाः

saṁskṛtaṁbhakṣāḥ

यदि दाँतों से चबाकर खाने योग्य पदार्थ हो तो, उसके 'संस्कार किया गया' अर्थ में सप्तमी-अन्त शब्द से अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: भ्राष्ट्रेषु संस्कृताः यवाः = भ्राष्ट्राः, घृत → घार्तम्।

श्लोक 2.17

शूलोखाद्यत्

śūlokhādyat

सप्तमीसमर्थ शूल और उखा शब्दों से 'संस्कृत भक्ष्य' अर्थ में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शूल्यम् (शूल पर भूना हुआ)।

श्लोक 2.18

दध्नष्ठक्

dadhnaṣṭhak

सप्तमीसमर्थ दधि शब्द से 'संस्कृत भक्ष्य' अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: दाधिकम्।

श्लोक 2.19

उदश्वितोऽन्यतरस्याम्

udaśvito'nyatarasyām

सप्तमीसमर्थ उदश्वित् शब्द से विकल्प से (ठक् के स्थान पर) अण् प्रत्यय भी होता है। उदाहरण: औदश्वितम्।

श्लोक 2.20

क्षीराड्ढञ्

kṣīrāḍḍhañ

सप्तमीसमर्थ क्षीर शब्द से 'संस्कृत भक्ष्य' अर्थ में ढञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: यवागूः (दूध में पकाई गयी लपसी)।

श्लोक 2.21

सास्मिन्पौर्णमासीति संज्ञायाम्

sāsminpaurṇamāsīti saṁjñāyām

प्रथमान्त शब्द से सप्तम्यर्थ में यथाविहित प्रत्यय होता है, यदि उस सप्तम्यर्थ से पौर्णमासी (पूर्णिमा-तिथि) का बोध हो। उदाहरण: पुष्यनक्षत्रेण युक्ता पौर्णमासी = पौषी पौर्णमासी।

श्लोक 2.22

आग्रहायण्यश्वत्थाट्ठक्

āgrahāyaṇyaśvatthāṭṭhak

पौर्णमासी-वाचक अग्रहायणी और अश्वत्थ शब्दों से उक्त सप्तम्यर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: आग्रहायणिकः (मासः), आश्वत्थिकः।

श्लोक 2.23

विभाषा फाल्गुनीश्रवणाकार्तिकीचैत्रीभ्यः

vibhāṣā phālgunīśravaṇākārtikīcaitrībhyaḥ

पौर्णमासी-वाचक फाल्गुनी, श्रवण, कार्तिकी और चैत्री शब्दों से विकल्प से ठक् प्रत्यय होता है (पक्ष में अण्)। उदाहरण: फाल्गुनिकः/फाल्गुनः, श्रावणिकः/श्रावणः।

श्लोक 2.24

सास्य देवता

sāsya devatā

'यह इसका देवता है' - इस अर्थ में प्रथमान्त प्रातिपदिक से अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: इन्द्रो देवताऽस्य = ऐन्द्रः।

श्लोक 2.25

कस्येत्

kasyet

प्रजापति-वाचक 'क' शब्द के स्थान में, देवतार्थक प्रत्यय के साथ, इकार आदेश होता है। उदाहरण: कः देवताऽस्य हविः = कायं हविः।

श्लोक 2.26

शुक्राद् घन्

śukrād ghan

'इसका देवता है' अर्थ में शुक्र शब्द से घन् (घ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: शुक्रः देवताऽस्य = शुक्रियम्।

श्लोक 2.27

अपोनप्त्रपां नप्तृभ्यां घः

aponaptrapāṁ naptṛbhyāṁ ghaḥ

'इसका देवता है' अर्थ में अपोनप्तृ और अपांनप्तृ शब्दों से 'घ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अपोनपात्, अपांनपात्।

श्लोक 2.28

छच

chaca

उन्हीं शब्दों (अपोनप्तृ, अपांनप्तृ) से विकल्प से 'छ' प्रत्यय भी होता है। उदाहरण: अपोनप्त्रीयं हविः।

श्लोक 2.29

महेन्द्राद्घाणौच

mahendrādghāṇauca

महेन्द्र शब्द से 'इसका देवता है' अर्थ में विकल्प से घ और अण् प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: महेन्द्रः/माहेन्द्रम्/महेन्द्रीयम्।

श्लोक 2.30

सोमाट्ट्यण्

somāṭṭyaṇ

'इसका देवता है' अर्थ में सोम शब्द से 'ट्यण्' (य) प्रत्यय होता है। उदाहरण: सोमो देवताऽस्य = सौम्यम्।

श्लोक 2.31

वाय्वृतुपित्रुषसोयत्

vāyvṛtupitruṣasoyat

'इसका देवता है' अर्थ में वायु, ऋतु, पितृ और उषस् - इन चार शब्दों से 'यत्' (य) प्रत्यय होता है। उदाहरण: वायुर्देवताऽस्य = वायव्यम्।

श्लोक 2.32

द्यावापृथिवीशुनासीरमरुत्वदग्नीषोमवास्तोष्पतिगृहमेधाच्छच

dyāvāpṛthivīśunāsīramarutvadagnīṣomavāstoṣpatigṛhamedhācchaca

द्यावापृथिवी, शुनासीर, मरुत्वत्, अग्नीषोम, वास्तोष्पति और गृहमेध शब्दों से 'इसका देवता है' अर्थ में छ प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्यावापृथिवीयम्/द्यावापृथिव्यम्।

श्लोक 2.33

अग्नेर्ढक्

agnerḍhak

अग्नि शब्द से 'इसका देवता है' अर्थ में ढक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: अग्निर्देवताऽस्य = आग्नेयो मन्त्रः।

श्लोक 2.34

कालेभ्योभववत्

kālebhyobhavavat

काल-विशेषवाचक शब्दों से देवतार्थ में भी वैसे ही प्रत्यय होते हैं जैसे भाव अर्थ में होते हैं। उदाहरण: मासिकम्, सांवत्सरिकम्।

श्लोक 2.35

महाराजप्रोष्ठपदाट्ठञ्

mahārājaproṣṭhapadāṭṭhañ

महाराज और प्रोष्ठपद शब्दों से 'इसका देवता है' अर्थ में ठञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: माहाराजिकम्, प्रौष्ठपदिकम्।

श्लोक 2.36

पितृव्यमातुलमतामहपितामहाः

pitṛvyamātulamatāmahapitāmahāḥ

'भाई' के अर्थ में प्रयुक्त पितृ और मातृ शब्दों से क्रमशः व्यन् और डुलच् प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: पितृ → पितृव्यः (चाचा, पिता-तुल्य भाई), मातृ → मातुलः।

श्लोक 2.37

तस्य समूहः

tasya samūhaḥ

'समूह' अर्थ में षष्ठ्यन्त समर्थ से अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: काकानां समूहः = काकम्, शुक → शौकम्, बक → बाकम्।

श्लोक 2.38

भिक्षादिभ्योऽण्

bhikṣādibhyo'ṇ

षष्ठ्यन्त भिक्षा आदि शब्दों से समूह अर्थ में अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: भिक्षाणां समूहः = भैक्षम्।

श्लोक 2.39

गोत्रोक्षोष्ट्रोरभ्रराजराजन्यराजपुत्रवत्समनुष्याजाद्वुञ्

gotrokṣoṣṭrorabhrarājarājanyarājaputravatsamanuṣyājādvuñ

गोत्र, उक्षन्, उष्ट्र, उरभ्र, राजन्, राजन्य, राजपुत्र, वत्स, मनुष्य और अज आदि शब्दों से समूह अर्थ में 'वुञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: औपगवकम्, औरभ्रकम्, राजकम्, मानुष्यकम्।

श्लोक 2.40

केदाराद्यञ्च

kedārādyañca

केदार शब्द से समूह अर्थ में विकल्प से यञ् और वुञ् प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: कैदार्यम्/कैदारकम् (खेतों का समूह)।

श्लोक 2.41

ठञ् कवचिनश्च

ṭhañ kavacinaśca

कवचिन् और केदार शब्दों से समूह अर्थ में ठञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: कावचिकम् (कवचधारियों का समूह), कैदारिकम्।

श्लोक 2.42

ब्राह्मणमाणववाडवाद्यन्

brāhmaṇamāṇavavāḍavādyan

ब्राह्मण, माणव और वाडव शब्दों से समूह अर्थ में 'यत्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: ब्राह्मण्यम्, माणव्यम्, वाडव्यम्।

श्लोक 2.43

ग्रामजनबन्धुसहायेभ्यस्तल्

grāmajanabandhusahāyebhyastal

ग्राम, जन, बन्धु और सहाय शब्दों से समूह अर्थ में 'तल्' (त) प्रत्यय होता है। उदाहरण: ग्रामाणां समूहः = ग्रामता।

श्लोक 2.44

अनुदात्तादेरञ्

anudāttāderañ

अनुदात्तादि (जिसका आदि स्वर अनुदात्त हो) शब्दों से समूह अर्थ में अञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: कपोतानां समूहः = कापोतम्, मायूरम्।

श्लोक 2.45

खण्डिकादिभ्यश्च

khaṇḍikādibhyaśca

खण्डिका आदि शब्दों से भी समूह अर्थ में अञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: खाण्डिकम्, वाडवम्।

श्लोक 2.46

चरणेभ्यो धर्मवत्

caraṇebhyo dharmavat

षष्ठ्यन्त चरण-वाचक (वैदिक शाखा बतानेवाले) शब्दों से समूह अर्थ में वही प्रत्यय होते हैं जो 'धर्म' अर्थ में होते हैं। उदाहरण: कठानां धर्मः/समूहः = काठकम्, छान्दोग्यम्।

श्लोक 2.47

अचित्तहस्तिधेनोष्ठक्

acittahastidhenoṣṭhak

अचेतन-पदार्थवाचक, तथा हस्ति और धेनु शब्दों से समूह अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: सक्तूनां समूहः = साक्तुकम्।

श्लोक 2.48

केशाश्वाभ्यांयञ्छावन्यतरस्याम्

keśāśvābhyāṁyañchāvanyatarasyām

केश और अश्व शब्दों से समूह अर्थ में क्रमशः यञ् और छ प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: कैश्यम्/कैशिकम्, अश्वीयम्/आश्वम्।

श्लोक 2.49

पाशादिभ्योयः

pāśādibhyoyaḥ

पाश आदि शब्दों से समूह अर्थ में 'य' प्रत्यय होता है (स्त्रीलिङ्ग में)। उदाहरण: पाशानां समूहः = पश्या, तृण्या।

श्लोक 2.50

खलगोरथात्

khalagorathāt

खल, गो और रथ शब्दों से समूह अर्थ में भी 'य' प्रत्यय होता है। उदाहरण: खल्या, गव्या, रथ्या।

श्लोक 2.51

इनित्रकट्यश्च

initrakaṭyaśca

उन्हीं खल, गो और रथ शब्दों से क्रमशः इनि, त्र और कट्यच् प्रत्यय भी होते हैं। उदाहरण: खलिनी, गोत्रा, रथकट्या।

श्लोक 2.52

विषयोदेशे

viṣayodeśe

यदि 'विषय' (क्षेत्र) अर्थ देश-वाचक हो, तो षष्ठ्यन्त शब्दों से यथाविहित प्रत्यय होता है। उदाहरण: वृषलानां विषयः = वार्षलः, यावनः।

श्लोक 2.53

राजन्यादिभ्योवुञ्

rājanyādibhyovuñ

राजन्य आदि शब्दों से 'उनका निवास-क्षेत्र' अर्थ में वुञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: राजन्यकः, दैवयानकः।

श्लोक 2.54

भौरिक्याद्यैषुकार्यादिभ्योविधल्भक्तलौ

bhaurikyādyaiṣukāryādibhyovidhalbhaktalau

भौरिक्य आदि तथा ऐषुकारि आदि शब्दों से यथाक्रम विधल् और भक्तल् प्रत्यय होते हैं 'निवास-क्षेत्र' अर्थ में। उदाहरण: भौरिकिविधः, ऐषुकारिभक्तः।

श्लोक 2.55

सोऽस्यादिरितिच्छन्दसःप्रगाथेषु

so'syādiriticchandasaḥpragātheṣu

प्रथमान्त छन्दोवाचक शब्द से, जब वह किसी प्रगाथ (वैदिक स्तोत्र-समूह) का आदि हो, षष्ठ्यर्थ में यथाविहित प्रत्यय होता है। उदाहरण: पंक्तिरादिरस्य = पाङ्क्तः प्रगाथः (जिसका आरम्भ पंक्ति छन्द से हो)।

श्लोक 2.56

संग्रामे प्रयोजनयोद्धृभ्यः

saṁgrāme prayojanayoddhṛbhyaḥ

प्रथमान्त प्रयोजन-वाचक और योद्धृ-वाचक शब्दों से, जब संग्राम अभिप्रेत हो, यथाविहित प्रत्यय होता है। उदाहरण: भद्रा प्रयोजनम् अस्य संग्रामस्य = भाद्रः संग्रामः।

श्लोक 2.57

तदस्यांप्रहरणमितिक्रीडायांणः

tadasyāṁpraharaṇamitikrīḍāyāṁṇaḥ

प्रथमान्त प्रहरण (हथियार) वाचक शब्दों से, जब 'क्रीडा' अभिप्रेत हो, 'ण' प्रत्यय होता है। उदाहरण: दण्डः प्रहरणम् अस्यां क्रीडायाम् = दाण्डा (दण्डे से खेला जानेवाला खेल)।

श्लोक 2.58

घञःसास्यांक्रियेतिञः

ghañaḥsāsyāṁkriyetiñaḥ

प्रथमान्त घञ्-प्रत्ययान्त क्रियावाचक शब्दों से, स्त्रीलिङ्ग सप्तम्यर्थ (जिसमें यह क्रिया प्रचलित हो) में, 'ञ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: श्येनपातः अस्यां क्रियायाम् = श्यैनम्पाता (मृगया)।

श्लोक 2.59

तदधीतेतद्वेद

tadadhītetadveda

द्वितीयान्त प्रातिपदिक से 'पढ़ता है' और 'जानता है' - इन दोनों अर्थों में यथाविहित प्रत्यय होता है। उदाहरण: व्याकरणम् अधीते वेत्ति वा = वैयाकरणः।

श्लोक 2.60

क्रतूक्थादिसूत्रान्ताट्ठक्

kratūkthādisūtrāntāṭṭhak

द्वितीयासमर्थ क्रतु-विशेष-वाचक, उक्थ आदि तथा सूत्र-शब्दान्त शब्दों से ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: अश्वमेधम् अधीते वेद वा = आश्वमेधिकः।

श्लोक 2.61

क्रमादिभ्योवुन्

kramādibhyovun

द्वितीयान्त क्रम आदि शब्दों से 'पढ़ता/जानता है' अर्थ में वुन् (वु) प्रत्यय होता है। उदाहरण: क्रमम् अधीते वेत्ति वा = क्रमकः।

श्लोक 2.62

अनुब्रह्मणादिनिः

anubrahmaṇādiniḥ

अनुब्राह्मण शब्द से 'पढ़ता/जानता है' अर्थ में इनि प्रत्यय होता है (पूर्वसूत्रों के प्रत्ययों का यहाँ लोप है)। उदाहरण: अनुब्राह्मणी।

श्लोक 2.63

वसन्तादिभ्यष्ठक्

vasantādibhyaṣṭhak

वसन्त आदि शब्दों से 'पढ़ता/जानता है' अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: वासन्तिकः, वार्षिकः।

श्लोक 2.64

प्रोक्ताल्लुक्

proktālluk

'प्रोक्त' (जिसने उपदेश दिया हो) अर्थवाले प्रत्ययान्त शब्दों से विहित 'पढ़ता/जानता है' प्रत्यय का लोप हो जाता है। उदाहरण: आपिशलि → आपिशलम् (प्रत्यय-रहित)।

श्लोक 2.65

सूत्राच्चकोपधात्

sūtrāccakopadhāt

ककारोपध सूत्र-वाचक शब्द से भी 'अध्येता/वेत्ता' प्रत्यय का लोप होता है। उदाहरण: अष्टकाः पाणिनीयाः (आठ अध्यायोंवाले पाणिनि-सूत्र को पढ़नेवाले)।

श्लोक 2.66

छन्दोब्राह्माणानि च तद्विषयाणि

chandobrāhmāṇāni ca tadviṣayāṇi

प्रोक्त-प्रत्ययान्त छन्दोवाचक और ब्राह्मणवाचक शब्द ही 'अध्येता/वेत्ता' प्रत्ययों का विषय बनते हैं। उदाहरण: कठेन प्रोक्तं छन्दः अधीयते = कठाः, तैत्तिरीयाः।

श्लोक 2.67

तदस्मिन्नस्तीतिदेशेतन्नाम्नि

tadasminnastītideśetannāmni

'यह अस्तित्वयुक्त है' अर्थवाले प्रथमान्त शब्दों से सप्तम्यर्थ में यथाविहित प्रत्यय होता है, यदि प्रत्ययान्त शब्द देश का नाम बने। उदाहरण: शिरीष → शैरीषः, खदिर → खादिरः।

श्लोक 2.68

तेननिर्वृत्तम्

tenanirvṛttam

यदि प्रत्ययान्त शब्द किसी देश का नाम हो, तो 'बसाया गया' (निर्वृत्त) अर्थ में तृतीयान्त समर्थ से अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: कुशाम्बेन निर्वृत्ता नगरी = कौशाम्बी (कुशाम्ब राजा द्वारा बसाई नगरी)।

श्लोक 2.69

तस्यनिवासः

tasyanivāsaḥ

यदि प्रत्ययान्त शब्द देश का नाम हो, तो 'निवास-स्थान' अर्थ में षष्ठ्यन्त समर्थ से अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शिबीनां निवासो देशः = शैबः।

श्लोक 2.70

अदूरभवश्च

adūrabhavaśca

यदि प्रत्ययान्त शब्द देश का नाम हो, तो 'निकटवर्ती' (अदूरभव) अर्थ में भी षष्ठ्यन्त समर्थ से अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: विदिशाया नद्याः अदूरभवं नगरम् = वैदिशम्।

श्लोक 2.71

ओरञ्

orañ

उ-वर्णान्त समर्थ शब्द से उक्त चार अर्थों (सप्तम्यर्थ, निवास, निर्वृत्त, अदूरभव) में अञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: परशुना निर्वृत्तम् = पारशवम्।

श्लोक 2.72

मतोश्चबह्वजङ्गात्

matoścabahvajaṅgāt

अनेक स्वरोंवाले मतुप्-अन्त प्रातिपदिक से भी उक्त चार अर्थों में अञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: इषुकावती नदी → तस्याः अदूरभवं नगरम् = ऐषुकावतम्।

श्लोक 2.73

बह्वचःकूपेषु

bahvacaḥkūpeṣu

अनेक स्वरोंवाले प्रातिपदिक से, जब 'कुआँ' अभिप्रेत हो, चातुर्थिक (उक्त चार अर्थोंवाला) अञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: दैर्घवरत्रः (कूप)।

श्लोक 2.74

उदक्चविपाशः

udakcavipāśaḥ

विपाशा नदी के उत्तर तट के कुओं के नाम में भी चातुर्थिक अञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: दात्तः, गौप्तः (कूप)।

श्लोक 2.75

संकलादिभ्यश्च

saṁkalādibhyaśca

सङ्कल आदि शब्दों से भी चातुर्थिक अञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: साङ्कलः, पौष्कलः (सङ्कल/पुष्कल नामक व्यक्ति द्वारा बनाया कूप)।

श्लोक 2.76

स्त्रीषुसौवीरसाल्वप्राक्षु

strīṣusauvīrasālvaprākṣu

स्त्रीलिङ्ग तथा सौवीर, साल्व और प्राचीन देशों के वाच्य होने पर चातुर्थिक अञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: सुवास्तोः अदूरभवं नगरम् = सौवास्तवम्।

श्लोक 2.77

सुवास्त्वादिभ्योऽण्

suvāstvādibhyo'ṇ

सुवास्तु आदि शब्दों से चातुर्थिक अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: रौणः, आजकरोणः।

श्लोक 2.78

रोणी

roṇī

रोणी शब्द से भी चातुर्थिक अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: रोणी → रौणः, अजकरोणी → अजकरोणः।

श्लोक 2.79

कोपधाच्च

kopadhācca

ककारोपध शब्द से चातुर्थिक अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: कर्णवेष्टकेन निर्वृत्तः कूपः = कार्णवेष्टकः।

श्लोक 2.80

वुञ्छण्कठजिलसेनिरढञ्ण्ययफक्फिञिञ्ञ्यकक्ठकोऽरीहणकृशाश्चर्श्यकुमुदकाशतृणप्रेक्षाश्मसखिसंकाशबलपक्षकर्णसुतंगमप्रगदिन्वराहकुमुदादिभ्यः

vuñchaṇkaṭhajilaseniraḍhañṇyayaphakphiñiññyakakṭhako'rīhaṇakṛśāścarśyakumudakāśatṛṇaprekṣāśmasakhisaṁkāśabalapakṣakarṇasutaṁgamapragadinvarāhakumudādibhyaḥ

अरीहण आदि (लगभग अठारह) प्रातिपदिकों से क्रमशः वुञ् आदि प्रत्यय उक्त चार अर्थों में होते हैं। उदाहरण: आरीहणकम्, द्रौघणकम्।

श्लोक 2.81

जनपदेलुप्

janapadelup

यदि प्रत्ययान्त शब्द जनपद (राष्ट्र) का नाम हो, तो चातुर्थिक प्रत्यय का लोप हो जाता है। उदाहरण: पञ्चालानां निवासो जनपदः = पञ्चालः (प्रत्यय-रहित)।

श्लोक 2.82

वरणादिभ्यश्च

varaṇādibhyaśca

वरणा आदि शब्दों के बाद भी चातुर्थिक प्रत्यय का लोप होता है। उदाहरण: वरणानाम् अदूरभवं नगरम् = वरणा (प्रत्यय-रहित)।

श्लोक 2.83

शर्करायावा

śarkarāyāvā

शर्करा शब्द से विहित चातुर्थिक प्रत्यय का विकल्प से लोप होता है। उदाहरण: शर्करा/शार्करः।

श्लोक 2.84

ठक्छौच

ṭhakchauca

शर्करा शब्द से (प्रत्यय रहने के पक्ष में) ठक् और छ प्रत्यय भी होते हैं। उदाहरण: शार्करिकः, शर्करीयः।

श्लोक 2.85

नद्यांमतुप्

nadyāṁmatup

जब नदी अभिप्रेत हो, प्रातिपदिक से चातुर्थिक 'मतुप्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: उदुम्बरावती, मशकावती (नदियों के नाम)।

श्लोक 2.86

मध्वादिभ्यश्च

madhvādibhyaśca

मधु आदि शब्दों से भी चातुर्थिक मतुप् प्रत्यय होता है। उदाहरण: मधु अस्ति अस्मिन् देशे = मधुमान् देशः।

श्लोक 2.87

कुमुदनडवेतसेभ्योड्मतुप्

kumudanaḍavetasebhyoḍmatup

यदि प्रत्ययान्त देशवाचक बने, तो कुमुद, नड और वेतस शब्दों से उक्त चार अर्थों में 'ड्मतुप्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कुमुदाः सन्ति अस्मिन् देशे = कुमुद्मान्।

श्लोक 2.88

नडशादाड्ड्वलच्

naḍaśādāḍḍvalac

उक्त चार अर्थों में नड और शाद (घास) शब्दों से 'ड्वलच्' (वल) प्रत्यय होता है। उदाहरण: नडाः सन्ति अस्मिन् देशे = नड्वलः।

श्लोक 2.89

शिखायावलच्

śikhāyāvalac

यदि प्रत्ययान्त देश-नाम बने, तो उक्त चार अर्थों में शिखा शब्द से 'वलच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शिखाः सन्ति अस्मिन् देशे = शिखावलः।

श्लोक 2.90

उत्करादिभ्यश्छः

utkarādibhyaśchaḥ

उत्कर आदि शब्दों से चातुर्थिक 'छ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: उत्करीयम् (जहाँ धान फैलाया जाय, ऐसा स्थान), शफरीयम्।

श्लोक 2.91

नडादीनांकुक्च

naḍādīnāṁkukca

नड आदि शब्दों से चातुर्थिक छ प्रत्यय तथा प्रकृति को 'कुक्' का आगम होता है। उदाहरण: नड + कुक् + ईय = नडकीयम्, प्लक्षकीयम्।

श्लोक 2.92

शेषे

śeṣe

यहाँ से 'तस्य विकारः' (4.3.83) तक विहित प्रत्यय 'शेष' अर्थ में (अपत्य, रक्त और चातुर्थिक अर्थों को छोड़कर शेष सभी अर्थों में) होते हैं - यह एक बड़ा अधिकार-सूत्र है। उदाहरण: चक्षुषा गृह्यते = चाक्षुषम्।

श्लोक 2.93

राष्ट्रावारपाराद् घखौ

rāṣṭrāvārapārād ghakhau

शेष अर्थों में राष्ट्र शब्द से 'घ' और अवारपार शब्द से 'ख' प्रत्यय होता है। उदाहरण: राष्ट्रे जातः भवो वा = राष्ट्रियः।

श्लोक 2.94

ग्रामाद्यखञौ

grāmādyakhañau

ग्राम शब्द से शेष अर्थ में 'य' और 'खञ्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: ग्रामे भवः = ग्राम्यः/ग्रामीणः।

श्लोक 2.95

कत्त्र्यादिभ्यो ढकञ्

kattryādibhyo ḍhakañ

कत्त्रि आदि शब्दों से 'ढकञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कात्रेयकः, नागरेयकः, माहिष्मतेयकः।

श्लोक 2.96

कुलकुक्षिग्रीवाभ्यःश्वास्यलंकारेषु

kulakukṣigrīvābhyaḥśvāsyalaṁkāreṣu

कुल, कुक्षि और ग्रीवा शब्दों से, कुत्ता (श्वा), तलवार (असि) और आभूषण (अलंकार) के अर्थ में, ढकञ् प्रत्यय तथा यकार का लोप होता है। उदाहरण: कुले भवः श्वा = कौलेयकः, ग्रीवायां भवः अलंकारः = ग्रैवेयकः।

श्लोक 2.97

नद्यादिभ्यो ढक्

nadyādibhyo ḍhak

नदी आदि शब्दों से जात (उत्पन्न) अर्थ में 'ढक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: नदी → नादेयम्, मही → माहेयम्।

श्लोक 2.98

दक्षिणापश्चात्पुरसस्त्यक्

dakṣiṇāpaścātpurasastyak

दक्षिणा, पश्चात् और पुरस् शब्दों से 'त्यक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: दक्षिणस्यां जातः भवो वा = दक्षिणात्यः, पश्चात् → पाश्चात्यः।

श्लोक 2.99

कापिश्याःष्फक्

kāpiśyāḥṣphak

कापिशी शब्द से शेषार्थ में 'ष्फक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कापिश्यां भवं मधु = कापिशायनं मधु।

श्लोक 2.100

रङ्कोरमनुष्येऽण् च

raṅkoramanuṣye'ṇ ca

रङ्कु शब्द से, जब अमनुष्य (पशु) अभिप्रेत हो, शेषार्थक अण् और ष्फक् दोनों प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: राङ्कवो गौः/राङ्कवायणो गौः।

श्लोक 2.101

द्युप्रागपागुदक्प्रतीचोयत्

dyuprāgapāgudakpratīcoyat

दिव्, प्राच्, अपाच्, उदच् और प्रतीच् शब्दों से 'यत्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: दिवि भवं जातम् = दिव्यम्, प्राच् → प्राच्यम्, प्रतीच् → प्रतीच्यम्।

श्लोक 2.102

कन्थायाष्ठक्

kanthāyāṣṭhak

कन्था शब्द से शेषार्थक ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: कान्थिकः।

श्लोक 2.103

वर्णौवुक्

varṇauvuk

वर्णु देश से सम्बन्धित कन्था शब्द से 'वुक्' का आगम होता है। उदाहरण: वर्णौ या कन्था तत्र जाता यूका = कान्थिका।

श्लोक 2.104

अव्ययात्त्यप्

avyayāttyap

शेष अर्थ में अव्यय शब्दों से 'त्यप्' (त्य) प्रत्यय होता है। उदाहरण: अमा सह भवः = अमात्यः (राजा के साथ रहनेवाला, मन्त्री)।

श्लोक 2.105

ऐषमोह्यःश्वसोऽन्यतरस्याम्

aiṣamohyaḥśvaso'nyatarasyām

ऐषमस्, ह्यस् और श्वस् शब्दों से विकल्प से शेषार्थक त्यप् प्रत्यय होता है (पक्ष में तन)। उदाहरण: ऐषमस्त्यम्/ऐषमस्तनम्, ह्यस्त्यम्/ह्यस्तनम्।

श्लोक 2.106

तीररूप्योत्तरपदादञ्ञौ

tīrarūpyottarapadādaññau

तीर-उत्तरपदक तथा रूप्य-उत्तरपदक प्रातिपदिक से क्रमशः अञ् और ञ् प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: काकतीर → काकतीरम्, वार्करूप्य → वार्करूप्यम्।

श्लोक 2.107

दिक्पूर्वपदादसंज्ञायांञः

dikpūrvapadādasaṁjñāyāṁñaḥ

यदि दिशावाचक शब्द पूर्वपद में हो और अर्थ संज्ञावाचक न हो, तो शेष अर्थों में केवल 'ञ' (अ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: पूर्वशाला → पूर्वशालम्।

श्लोक 2.108

मद्रेभ्योऽञ्

madrebhyo'ñ

दिक्-पूर्वपदक मद्र शब्द से शेषार्थक अञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: पूर्वमद्र → पौर्वमद्रः, अपरमद्र → आपरमद्रः।

श्लोक 2.109

उदीच्यग्रामाच्चबह्वचोऽन्तोदात्तात्

udīcyagrāmāccabahvaco'ntodāttāt

उदीच्य-ग्रामवाचक अनेकस्वर, अन्तोदात्त प्रातिपदिक से शेषार्थ में अञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शिवपुरे भवम् = शैवपुरम्।

श्लोक 2.110

प्रस्थोत्तरपदपलद्यादिकोपधादण्

prasthottarapadapaladyādikopadhādaṇ

प्रस्थ-उत्तरपदक, पलद्य आदि तथा ककारोपध प्रातिपदिकों से शेषार्थक अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: माद्रीप्रस्थे भवः = माद्रीप्रस्थः, नलीनक → नैलीनकः।

श्लोक 2.111

कण्वादिभ्योगोत्रे

kaṇvādibhyogotre

गोत्र-प्रत्ययान्त कण्व आदि शब्दों से शेषार्थक अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: काण्व्यस्य छात्राः = काण्वाः (कण्व के शिष्य)।

श्लोक 2.112

इञश्व

iñaśva

गोत्रार्थक इञ्-प्रत्ययान्त प्रातिपदिक से भी शेषार्थक अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: दाक्षाः, प्लाक्षाः।

श्लोक 2.113

नद्वयचःप्राच्यभरतेषु

nadvayacaḥprācyabharateṣu

प्राच्य-भरत गोत्रार्थक इञ्-प्रत्ययान्त द्वि-अच् (दो स्वरोंवाले) प्रातिपदिक से शेषार्थक अण् प्रत्यय नहीं होता (अपितु छ)। उदाहरण: चैदिः → चैदीयाः (छात्र)।

श्लोक 2.114

वृद्धाच्छः

vṛddhācchaḥ

वृद्धसंज्ञक शब्द से शेषार्थक 'छ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शालायां भवो जातो वा = शालीयः।

श्लोक 2.115

भवतष्ठक्छसौ

bhavataṣṭhakchasau

वृद्धसंज्ञक भवत् शब्द से शेषार्थ में ठक् और छस् प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: भवतश्छात्रः = भावत्कः/भवदीयः।

श्लोक 2.116

काश्यादिभ्यष्ठ ञ्ञिठौ

kāśyādibhyaṣṭha ññiṭhau

काशि आदि शब्दों से शेषार्थक ठञ् और ञिठ प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: काशिकी/काशिका, वैदिकी/वैदिका।

श्लोक 2.117

वाहीकग्रामेभ्यश्च

vāhīkagrāmebhyaśca

वाहीक-ग्रामवाचक वृद्धसंज्ञक प्रातिपदिक से भी शेषार्थक ठञ् और ञिठ प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: शाकलिकी/शाकलिका।

श्लोक 2.118

विभाषोशीनरेषु

vibhāṣośīnareṣu

उशीनर-प्रदेश के वाहीक-ग्रामवाचक प्रातिपदिक से विकल्प से ठञ्, ञिठ अथवा छ प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: आह्वजालिकी/आह्वजालिका/आह्वजालीया।

श्लोक 2.119

ओर्देशेठञ्

ordeśeṭhañ

देशवाचक उ-वर्णान्त प्रातिपदिक से शेषार्थक ठञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: निषादकर्षू → नैषादकर्षुकः।

श्लोक 2.120

वृद्धत् प्राचाम्

vṛddhat prācām

वृद्धसंज्ञक प्राच्य-देशार्थक उ-वर्णान्त प्रातिपदिक से भी शेषार्थक ठञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: नापितवास्तुकः, शाकजम्बुकः।

श्लोक 2.121

धन्वयोपधाद्वुञ्

dhanvayopadhādvuñ

मरुदेशवाचक तथा वृद्धसंज्ञक यकारोपध देशवाचक प्रातिपदिकों से शेषार्थक वुञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: पारेधन्वकः, सांकाश्यकः।

श्लोक 2.122

प्रस्थपुरवहान्ताच्च

prasthapuravahāntācca

प्रस्थ-अन्त, पुर-अन्त और वह-अन्त देशवाचक वृद्धसंज्ञक प्रातिपदिकों से भी शेषार्थक वुञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: मालाप्रस्थकः, नान्दीपुरकः, पैलुवहकः।

श्लोक 2.123

रोपधेतोःप्राचाम्

ropadhetoḥprācām

रकारोपध तथा ईकारान्त प्राच्य-देशवाचक वृद्धसंज्ञक प्रातिपदिकों से शेषार्थक वुञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: पाटलिपुत्रकाः, काकन्दकः।

श्लोक 2.124

जनपदतदवघ्योश्च

janapadatadavaghyośca

वृद्धसंज्ञा से भिन्न जनपदवाचक तथा जनपद-सीमावाचक प्रातिपदिकों से शेषार्थक वुञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: आभिसारकः, त्रैगर्त्तकः।

श्लोक 2.125

अवृद्धादपिबहुवचनविषयात्

avṛddhādapibahuvacanaviṣayāt

वृद्धसंज्ञा-रहित जनपद और सीमावाचक शब्दों से भी वुञ् प्रत्यय होता है, यदि मूल शब्द बहुवचनान्त हो। उदाहरण: अङ्ग → आङ्गकः, कलिङ्ग → कलिंगकः।

श्लोक 2.126

कच्छाग्निवक्त्रवर्तोत्तरपदात्

kacchāgnivaktravartottarapadāt

कच्छ-उत्तरपदक, अग्नि-उत्तरपदक, वक्त्र-उत्तरपदक तथा वर्त-उत्तरपदक देशवाची प्रातिपदिकों से शेषार्थक वुञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: दारुकच्छकः, ऐन्द्रवक्त्रकः।

श्लोक 2.127

धूमादिभ्यश्व

dhūmādibhyaśva

धूम आदि देशवाचक शब्दों से भी शेषार्थक वुञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: धौमकः, खाण्डकः।

श्लोक 2.128

नगरात्कुत्सनप्रावीण्ययोः

nagarātkutsanaprāvīṇyayoḥ

जब निन्दा या प्रवीणता (दक्षता) अभिप्रेत हो, तब नगर शब्द से शेषार्थक वुञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: नागरकः (चतुर या धूर्त नगरवासी)।

श्लोक 2.129

अरण्यान्मनुष्ये

araṇyānmanuṣye

जब मनुष्य अभिप्रेत हो, तब अरण्य शब्द से शेषार्थक वुञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: आरण्यको मनुष्यः (वनवासी)।

श्लोक 2.130

विभाषाकुरुयुगन्धराभ्याम्

vibhāṣākuruyugandharābhyām

कुरु और युगन्धर शब्दों से शेषार्थक वुञ् प्रत्यय विकल्प से होता है। उदाहरण: कौरवकः/कौरवः, यौगन्धरकः/यौगन्धरः।

श्लोक 2.131

मद्रवृज्योःकन्

madravṛjyoḥkan

मद्र और वृजि शब्दों से शेषार्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: मद्रकः, वृजिकः।

श्लोक 2.132

कोपधादण्

kopadhādaṇ

जब देश अभिप्रेत हो, ककारोपध शब्द से शेषार्थक अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: ऋषिकेषु जातः = आर्षिकः, ऐक्ष्वाकः।

श्लोक 2.133

कच्छादिभ्यश्च

kacchādibhyaśca

देशवाचक कच्छ आदि शब्दों से भी शेषार्थक अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: काच्छः, सैन्धवः।

श्लोक 2.134

मनुष्यतत्स्थयोर्वुञ्

manuṣyatatsthayorvuñ

मनुष्य तथा मनुष्य-सम्बन्धी पदार्थ की उत्पत्ति आदि अर्थ में कच्छ आदि शब्दों से वुञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: काच्छको मनुष्यः; काच्छकम् अस्य हसितम् (उसकी हँसी)।

श्लोक 2.135

अपदातौसाल्वात्

apadātausālvāt

मनुष्य और उससे सम्बन्धित अर्थों में साल्व शब्द से भी वुञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: साल्वको मनुष्यः; साल्वकम् अस्य हसितम्।

श्लोक 2.136

गोयवाग्वोश्च

goyavāgvośca

गौ और यवागू (लपसी) से सम्बन्धित अर्थों में साल्व शब्द से वुञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: साल्वको गौः, साल्विका यवागूः।

श्लोक 2.137

गर्तोत्तरपदाच्छः

gartottarapadācchaḥ

गर्त-उत्तरपदक देशवाचक प्रातिपदिक से शेषार्थक 'छ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: वृकगर्त्तीयम्, शृगालगर्त्तीयम्।

श्लोक 2.138

गहादिभ्यश्च

gahādibhyaśca

गह आदि (देशविशेष-वाचक) शब्दों से भी शेषार्थक छ प्रत्यय होता है। उदाहरण: गहे जातः = गहीयः, मुखतस् → मुखतीयम्।

श्लोक 2.139

प्राचांकटादेः

prācāṁkaṭādeḥ

प्राच्य-देशवाचक कट आदि प्रातिपदिकों से शेषार्थ में छ प्रत्यय होता है। उदाहरण: कटनगरीयम्, कटघोषीयम्।

श्लोक 2.140

राज्ञःकच

rājñaḥkaca

राजन् शब्द से छ प्रत्यय होता है और साथ ही ककारान्त आदेश भी होता है। उदाहरण: राजकीयम्।

श्लोक 2.141

वृद्धादकेकान्तखोपधात्

vṛddhādakekāntakhopadhāt

वृद्धसंज्ञक देशार्थक अकारान्त, इकारान्त तथा ककारोपध प्रातिपदिकों से शेषार्थक छ प्रत्यय होता है। उदाहरण: अरीहणकीयम्, आश्वपथिकीयम्, कौटिशिखीयम्।

श्लोक 2.142

कन्थापलदनगरग्रामह्रदोत्तरपदात्

kanthāpaladanagaragrāmahradottarapadāt

देशार्थक वृद्धसंज्ञक कन्था-उत्तरपदक, पलद-उत्तरपदक, नगर-उत्तरपदक, ग्राम-उत्तरपदक और ह्रद-उत्तरपदक प्रातिपदिकों से शेषार्थ में छ प्रत्यय होता है। उदाहरण: दाक्षिकन्थीयम्, दाक्षिनगरीयम्।

श्लोक 2.143

पर्वताच्च

parvatācca

पर्वत शब्द से भी शेषार्थक छ प्रत्यय होता है। उदाहरण: पर्वतीयो राजा।

श्लोक 2.144

विभाषाऽमनुष्ये

vibhāṣā'manuṣye

जब अमनुष्य (वस्तु) अभिप्रेत हो, पर्वत शब्द से विकल्प से छ प्रत्यय होता है (पक्ष में अण्)। उदाहरण: पर्वतीयानि/पार्वतानि फलानि।

श्लोक 2.145

कृकणपर्णाद्भारद्वाजे

kṛkaṇaparṇādbhāradvāje

भारद्वाज देश से सम्बद्ध कृकण और पर्ण शब्दों से शेषार्थक छ प्रत्यय होता है। उदाहरण: कृकणीयम्, पर्णीयम्। इसके साथ पाद २ (देशीय/समूहवाचक तद्धित) समाप्त होता है।

चतुर्थोऽध्यायः, तृतीयः पादः

श्लोक 3.1

युष्मदस्मदोरन्यतरस्यांखञ् च

yuṣmadasmadoranyatarasyāṁkhañ ca

शेष अर्थ में युष्मद् और अस्मद् शब्दों से खञ्, छ और अण् - ये तीन प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: युष्मद् → यौष्माकीणः/युष्मदीयः/यौष्माकः; अस्मद् → आस्माकीनः/अस्मदीयः/आस्माकः।

श्लोक 3.2

तस्मिन्नणिचयुष्माकास्माकौ

tasminnaṇicayuṣmākāsmākau

खञ् और अण् प्रत्यय परे होने पर युष्मद् के स्थान पर 'युष्माक' और अस्मद् के स्थान पर 'अस्माक' आदेश होता है। उदाहरण: युष्मद् + खञ् = यौष्माकीणः।

श्लोक 3.3

तवकममकावेकवचने

tavakamamakāvekavacane

खञ् और अण् प्रत्यय परे होने पर, एकवचन में, युष्मद् के स्थान पर 'तवक' और अस्मद् के स्थान पर 'ममक' आदेश होता है। उदाहरण: तावकीनः (तेरा), मामकीनः (मेरा)।

श्लोक 3.4

अर्धाद्यत्

ardhādyat

'अर्ध' शब्द से शेषार्थ में 'यत्' प्रत्यय होता है (यह अण् का अपवाद है)। उदाहरण: अर्ध्यम्।

श्लोक 3.5

परावराधमोत्तमपूर्वाच्च

parāvarādhamottamapūrvācca

पर, अवर, अधम और उत्तम शब्दपूर्वक 'अर्ध' शब्द से भी यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: परार्ध्यम्, अवरार्ध्यम्, उत्तमार्ध्यम्।

श्लोक 3.6

दिक्पूर्वपदाट् ठञ्च

dikpūrvapadāṭ ṭhañca

दिक्-पूर्वपदक (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण) अर्ध-शब्दान्त प्रातिपदिक से शेषार्थ में ठञ् और यत् दोनों प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: पौर्वार्धिकः/पूर्वार्ध्यः, दक्षिणार्धिकः/दक्षिणार्ध्यः।

श्लोक 3.7

ग्रामजनपदैकदेशादञ्ठञौ

grāmajanapadaikadeśādañṭhañau

दिक्-पूर्वपदक ग्राम-एकदेशवाची तथा जनपद-एकदेशवाची शब्दों से शेषार्थक अञ् और ठञ् प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: पौर्वार्धाः/पौर्वार्धिकाः (गाँव या जनपद का पूर्वी भाग)।

श्लोक 3.8

मध्यान्मः

madhyānmaḥ

मध्य शब्द से 'म' प्रत्यय होता है (यह अण् का अपवाद है)। उदाहरण: मध्ये भवः = मध्यमः।

श्लोक 3.9

अ साम्प्रतिके

a sāmpratike

'वर्तमान/सुसंगत' (साम्प्रतिक) अर्थ में मध्य शब्द से 'अ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: नातिह्रस्वं नातिदीर्घं मध्यं काष्ठम् (न बहुत छोटी न बहुत लम्बी बीच की लकड़ी)।

श्लोक 3.10

द्वीपादनुसमुद्रंयञ्

dvīpādanusamudraṁyañ

समुद्र के निकटवर्ती द्वीपार्थक 'द्वीप' शब्द से शेषार्थक 'यञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्वैपं मधु, द्वैप्या कन्या।

श्लोक 3.11

कालाट्ठञ्

kālāṭṭhañ

काल-वाचक शब्दों से शेष अर्थ (उत्पन्न/उससे सम्बद्ध) में 'ठञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: काले भवं जातं वा = कालिकम्।

श्लोक 3.12

श्राद्धेशरदः

śrāddheśaradaḥ

श्राद्ध-अर्थ में शरद् शब्द से ठञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शरदि भवं श्राद्धं कर्म = शारदिकम्।

श्लोक 3.13

विभाषारोगातपयोः

vibhāṣārogātapayoḥ

रोग और आतप (धूप) के अभिधेय होने पर शरद् शब्द से विकल्प से ठञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शारदिको रोगः/शारदो रोगः।

श्लोक 3.14

निशाप्रदोषाभ्यां च

niśāpradoṣābhyāṁ ca

निशा और प्रदोष शब्दों से शेषार्थक ठञ् प्रत्यय विकल्प से होता है। उदाहरण: नैशिकम्/नैशम्, प्रादोषिकम्/प्रदोषम्।

श्लोक 3.15

श्वसस्तुट् च

śvasastuṭ ca

श्वस् (कल) शब्द से विकल्प से शेषार्थक ठञ् प्रत्यय होता है, और उसे 'तुट्' का आगम भी होता है। उदाहरण: शैवास्तिकः/श्वस्त्यः/श्वस्तनः।

श्लोक 3.16

सन्धिवेलाद्यृतुनक्षत्रेभ्योऽण्

sandhivelādyṛtunakṣatrebhyo'ṇ

काल-विशेषवाचक सन्धि-बेला आदि, ऋतुवाचक और नक्षत्रवाचक प्रातिपदिकों से शेषार्थक 'अण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सान्ध्यम्, ग्रैष्मम् (गर्मी ऋतु का), तैषम् (तिष्य नक्षत्र का)।

श्लोक 3.17

प्रावृषएण्यः

prāvṛṣaeṇyaḥ

'प्रावृष्' (वर्षा-ऋतु) शब्द से 'एण्य' प्रत्यय होता है। उदाहरण: प्रावृषि भवः = प्रावृषेण्यः।

श्लोक 3.18

वर्षाभ्यष्ठक्

varṣābhyaṣṭhak

'वर्षा' शब्द से शेषार्थक 'ठक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: वार्षिकं गोमयम्, वार्षिकम् अनुलेपनम्।

श्लोक 3.19

छन्दसिठञ्

chandasiṭhañ

वेद में वर्षा शब्द से 'ठञ्' प्रत्यय होता है (लोक में ठक्)। उदाहरण: नभश्च नभस्यश्च वार्षिकावृतू (वर्षा के दो मास)।

श्लोक 3.20

वसन्ताच्च

vasantācca

वसन्त शब्द से भी वेद में ठञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: मधुश्च माधवश्च वासन्तिकावृतू (वसन्त के दो मास)।

श्लोक 3.21

हेमन्ताच्च

hemantācca

हेमन्त शब्द से भी वेद में ठञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: सहश्च सहस्यश्च हैमन्तिकावृतू (हेमन्त के दो मास)।

श्लोक 3.22

सर्वत्राण्चतलोपश्च

sarvatrāṇcatalopaśca

हेमन्त शब्द से लोक और वेद दोनों में अण् प्रत्यय भी होता है, और तब प्रकृति के अन्त्य तकार का लोप होता है। उदाहरण: हैमनः।

श्लोक 3.23

सायंचिरंप्राह्णेप्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्यटयुलौ तुट् च

sāyaṁciraṁprāhṇeprage'vyayebhyaṣṭyaṭayulau tuṭ ca

सायम्, चिरम्, प्राह्ण, प्रगे और अव्यय शब्दों से शेष अर्थ में 'ट्यु' प्रत्यय होता है (जिसमें से केवल 'यु' भाग शेष बचता है), साथ ही 'तुट्' आगम भी। उदाहरण: सायम् → सायन्तनम्, चिरम् → चिरन्तनम्।

श्लोक 3.24

विभाषापूर्वाह्णापराह्णाभ्याम्

vibhāṣāpūrvāhṇāparāhṇābhyām

पूर्वाह्ण और अपराह्ण शब्दों से विकल्प से 'ट्यु' प्रत्यय (तुट् सहित) होता है। उदाहरण: पूर्वाह्णेतनम्/पौर्वाह्णिकम्, अपराह्णेतनम्/अपराह्णिकम्।

श्लोक 3.25

तत्र जातः

tatra jātaḥ

'वहाँ उत्पन्न हुआ' (तत्र जातः) अर्थ में सप्तमी-अन्त समर्थ शब्द से यथाविहित प्रत्यय होता है। उदाहरण: स्त्रुध्ने जातः = स्त्रौध्नः।

श्लोक 3.26

प्रावृषष्ठप्

prāvṛṣaṣṭhap

'उत्पन्न हुआ' अर्थ में सप्तमी-अन्त 'प्रावृष्' शब्द से 'ठप्' (ठ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: प्रावृषि जातः = प्रावृषिकः।

श्लोक 3.27

संज्ञायांशरदोवुञ्

saṁjñāyāṁśaradovuñ

संज्ञा-विषय में सप्तमी-अन्त 'शरद्' शब्द से 'उत्पन्न' अर्थ में वुञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शरदि जाताः शारदकाः दर्भाः, शारदाः मुद्गाः।

श्लोक 3.28

पूर्वाह्णापराह्णार्द्रमूलप्रदोषावस्कराद् वुन्

pūrvāhṇāparāhṇārdramūlapradoṣāvaskarād vun

संज्ञा-विषय में सप्तमी-अन्त पूर्वाह्ण, अपराह्ण, आर्द्रामूल, प्रदोष और अवस्कर शब्दों से 'उत्पन्न' अर्थ में वुन् प्रत्यय होता है। उदाहरण: पूर्वाह्णकः, आर्द्रकः, प्रदोषकः।

श्लोक 3.29

पथःपन्थच

pathaḥpanthaca

सप्तमी-अन्त 'पथिन्' शब्द से 'उत्पन्न' अर्थ में वुन् प्रत्यय होता है। उदाहरण: पथिन् → पन्थकः।

श्लोक 3.30

अमावास्यायावा

amāvāsyāyāvā

सप्तमी-अन्त 'अमावस्या' शब्द से 'उत्पन्न' अर्थ में विकल्प से वुन् प्रत्यय होता है (पक्ष में अण्)। उदाहरण: अमावास्यकः/आमावास्यः।

श्लोक 3.31

अच

aca

अमावस्या शब्द से 'उत्पन्न' अर्थ में 'अ' प्रत्यय भी होता है। उदाहरण: अमावस्यः।

श्लोक 3.32

सिन्ध्वपकराभ्यांकन्

sindhvapakarābhyāṁkan

सिन्धु और अपकार शब्दों से 'उत्पन्न' अर्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सिन्धुकः, अपकरकः।

श्लोक 3.33

अणञौच

aṇañauca

उन्हीं सिन्धु और अपकार शब्दों से क्रमशः अण् और अञ् प्रत्यय भी होते हैं। उदाहरण: सैन्धवः, आपकरः।

श्लोक 3.34

श्रविष्ठाफल्गुन्यनुराधास्वातितिष्यपुनर्वसुहस्तविशाखाऽषाढाबहुलाल्लुक्

śraviṣṭhāphalgunyanurādhāsvātitiṣyapunarvasuhastaviśākhā'ṣāḍhābahulālluk

श्रविष्ठा, फल्गुनी, अनुराधा, स्वाति, तिष्य, पुनर्वसु, हस्त, विशाखा, आषाढा और बहुला - इन नक्षत्र-नामों से विहित 'उत्पन्न' अर्थक प्रत्यय (अण् आदि) का लोप हो जाता है। उदाहरण: श्रविष्ठा → श्रविष्ठः (प्रत्यय-रहित रूप)।

श्लोक 3.35

स्थानान्तगोशालखरशालाच्च

sthānāntagośālakharaśālācca

स्थान-शब्दान्त, गोशाल और खरशाल शब्दों से भी 'उत्पन्न' अर्थ में विहित प्रत्यय का लोप होता है। उदाहरण: गोस्थाने जातः = गोस्थानः, गोशालः।

श्लोक 3.36

वत्सशालाभिजिदश्वयुक्शतभिषजोवा

vatsaśālābhijidaśvayukśatabhiṣajovā

वत्सशाला आदि शब्दों से विहित 'उत्पन्न' अर्थक प्रत्यय का विकल्प से लोप होता है। उदाहरण: वत्सशालः/वात्सशालः, अभिजित्/आभिजितः।

श्लोक 3.37

नक्षत्रेभ्योबहुलम्

nakṣatrebhyobahulam

नक्षत्रवाचक शब्दों से विहित 'उत्पन्न' अर्थक प्रत्यय का बहुधा (बहुलम्) लोप होता है। उदाहरण: भरण्यां जातः = भरणः/भारणः, रोहिणः/रौहिणः।

श्लोक 3.38

कृतलब्धक्रीतकुशलाः

kṛtalabdhakrītakuśalāḥ

सप्तमी-अन्त प्रातिपदिक से 'कृत' (बना हुआ), 'लब्ध' (पाया हुआ), 'क्रीत' (खरीदा हुआ) और 'कुशल' (निपुण) अर्थों में यथाविहित प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: स्त्रुध्ने कृतः/लब्धः/क्रीतः/कुशलः = स्त्रौध्नः।

श्लोक 3.39

प्रायभवः

prāyabhavaḥ

'प्रायः होनेवाला' अर्थ में सप्तमी-अन्त समर्थ से यथाविहित प्रत्यय होता है। उदाहरण: स्त्रुध्ने प्रायेण भवति = स्त्रौध्नः (वहाँ अधिकतर होनेवाला)।

श्लोक 3.40

उपजानूपकर्णोपनीवेष्ठक्

upajānūpakarṇopanīveṣṭhak

सप्तमी-अन्त उपजानु, उपकर्ण और उपनीवि शब्दों से 'प्रायः होनेवाला' अर्थ में 'ठक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: औपजानुकः, औपकर्णिकः।

श्लोक 3.41

संभूते

saṁbhūte

'संभव' (सम्भूत) अर्थ में सप्तमी-अन्त समर्थ से यथाविहित प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: स्त्रुध्ने संभवति = स्त्रौध्नः।

श्लोक 3.42

कोशाड्ढञ्

kośāḍḍhañ

'संभव' अर्थ में सप्तमी-अन्त 'कोश' शब्द से 'ढञ्' (ढ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: कोशे संभवति = कौशेयम् (कोश/कोकून में उत्पन्न - रेशम)।

श्लोक 3.43

कालात्साधुपुष्प्यत् पच्यमानेषु

kālātsādhupuṣpyat pacyamāneṣu

सप्तमी-अन्त काल-विशेषवाचक शब्दों से 'साधु' (उपयुक्त), 'पुष्प्यत्' (खिलनेवाला) और 'पच्यमान' (पकनेवाला) अर्थों में यथाविहित प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: हेमन्ते साधुः = हैमन्तः प्राकारः; वसन्ते पुष्यन्ति = वासन्त्यः कुन्दलताः; शरदि पच्यन्ते = शारदाः शालयः।

श्लोक 3.44

उप्तेच

upteca

सप्तमी-अन्त काल-विशेषवाचक प्रातिपदिकों से 'बोया जाना' (उप्त) अर्थ में भी यथाविहित प्रत्यय होता है। उदाहरण: हेमन्त उप्यन्ते यवाः = हैमन्ता यवाः।

श्लोक 3.45

आश्वयुज्यावुञ्

āśvayujyāvuñ

'आश्वयुजी' शब्द से 'बोया जाना' अर्थ में 'वुञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: आश्वयुज्याम् उप्ताः माषाः = आश्वयुजका माषाः।

श्लोक 3.46

ग्रीष्मवसन्तादन्यतरस्याम्

grīṣmavasantādanyatarasyām

ग्रीष्म और वसन्त शब्दों से 'बोया जाना' अर्थ में विकल्प से वुञ् प्रत्यय होता है (पक्ष में अण्)। उदाहरण: ग्रैष्मकम्/ग्रैष्मम्, वासन्तकम्/वासन्तम्।

श्लोक 3.47

देयमृणे

deyamṛṇe

सप्तमी-अन्त काल-वाचक शब्दों से 'देय ऋण' (जिस समय ऋण चुकाना हो) अर्थ में यथाविहित प्रत्यय होता है। उदाहरण: वैशाखे देयम् ऋणम् = वैशाखम्; मासे देयम् ऋणम् = मासिकम्।

श्लोक 3.48

कलाप्यश्वत्थयवबुसाद्वुन्

kalāpyaśvatthayavabusādvun

कलापि, अश्वत्थ और यवबुस - इन काल-वाचक सप्तमी-अन्त शब्दों से 'देय ऋण' अर्थ में 'वुन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कलापकम्, अश्वत्थकम्।

श्लोक 3.49

ग्रीष्मावरसमाद् वुञ्

grīṣmāvarasamād vuñ

सप्तमी-अन्त ग्रीष्म और अवरसम शब्दों से 'देय ऋण' अर्थ में 'वुञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: ग्रैष्मकम्, आवरसमकम्।

श्लोक 3.50

संवत्सराग्रहायणीभ्यांठञ्च

saṁvatsarāgrahāyaṇībhyāṁṭhañca

सप्तमी-अन्त संवत्सर और आग्रहायणी शब्दों से 'देय ऋण' अर्थ में ठञ् और वुञ् दोनों प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: सांवत्सरिकम्/सांवत्सरकम्, आग्रहायणिकम्/आग्रहायणकम्।

श्लोक 3.51

व्याहरतिमृगः

vyāharatimṛgaḥ

सप्तमी-अन्त काल-वाचक प्रातिपदिक से 'हिरन (मृग) का विचरना' अर्थ में यथाविहित प्रत्यय होता है। उदाहरण: निशायां व्याहरति मृगः = नैशः/नैशिकः।

श्लोक 3.52

तदस्यसोढम्

tadasyasoḍham

प्रथमान्त काल-वाचक शब्दों से 'इसका सह्य (विषय) है' अर्थ में यथाविहित प्रत्यय होता है। उदाहरण: निशासहचरितम् अध्ययनं तत्सोढम् अस्य = नैशिकः/नैशः छात्रः।

श्लोक 3.53

तत्रभवः

tatrabhavaḥ

'होने वाला' (तत्र भवः) अर्थ में सप्तमी-अन्त समर्थ से ही यथाविहित प्रत्यय होता है। उदाहरण: स्त्रुध्ने भवः = स्त्रौध्नः, मथुरा → माथुरः।

श्लोक 3.54

दिगादिभ्योयत्

digādibhyoyat

'होने वाला' अर्थ में सप्तमी-अन्त दिश् आदि शब्दों से 'यत्' (य) प्रत्यय होता है। उदाहरण: दिशि भवम् = दिश्यम्, वर्ग्यम्।

श्लोक 3.55

शरीरावयवाच्च

śarīrāvayavācca

'होने वाला' अर्थ में शरीर के अवयव-वाचक सप्तमी-अन्त समर्थ से भी यत् (य) प्रत्यय होता है। उदाहरण: दन्तेषु भवम् = दन्त्यम्।

श्लोक 3.56

दृतिकुक्षिकलशिवस्त्यस्त्यहेर्ढञ्

dṛtikukṣikalaśivastyastyaherḍhañ

दृति, कुक्षि, कलशि, वस्ति और अहि शब्दों से 'भव' अर्थ में 'ढञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: दृति → दार्तेयम्, कुक्षि → कौक्षेयम्।

श्लोक 3.57

ग्रीवाभ्योऽण्च

grīvābhyo'ṇca

'भव' अर्थ में ग्रीवा शब्द से अण् और ढञ् दोनों प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: ग्रीवासु भवं = ग्रैवम्/ग्रैवेयम्।

श्लोक 3.58

गम्भीराञ्ञ्यः

gambhīrāññyaḥ

'भव' अर्थ में 'गम्भीर' शब्द से 'ञ्य' प्रत्यय होता है। उदाहरण: गम्भीर → गाम्भीर्यम् (गहराई का भाव)।

श्लोक 3.59

अव्ययीभावाच्च

avyayībhāvācca

अव्ययीभाव-संज्ञक शब्दों से भी 'भव' अर्थ में ञ्य प्रत्यय होता है। उदाहरण: परिमुख → पारिमुख्यम्।

श्लोक 3.60

अन्तःपूर्वपदाट्ठञ्

antaḥpūrvapadāṭṭhañ

अन्तः-पूर्वपदक अव्ययीभाव से 'भाव' अर्थ में ठञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: आन्तर्वेश्मिकम्, आन्तर्गेहिकम्।

श्लोक 3.61

ग्रामात्पर्यनुपूर्वात्

grāmātparyanupūrvāt

परि-पूर्वक और अनु-पूर्वक ग्राम-शब्दान्त अव्ययीभाव से 'भाव' अर्थ में ठञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: परिग्राम → पारिग्रामिकः, अनुग्राम → अनुग्रामिकः।

श्लोक 3.62

जिह्वामूलाङ्गुलेश्छः

jihvāmūlāṅguleśchaḥ

'भव' अर्थ में सप्तमी-अन्त जिह्वामूल और अङ्गुलि शब्दों से 'छ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: जिह्वामूले भवम् = जिह्वामूलीयम्।

श्लोक 3.63

वर्गान्ताच्च

vargāntācca

'भव' अर्थ में सप्तमी-अन्त वर्ग-अन्त प्रातिपदिक से भी 'छ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कवर्गे भवम् = कवर्गीयम्, चवर्गे → चवर्गीयम्।

श्लोक 3.64

अशब्दे यत्खावन्यतरस्याम्

aśabde yatkhāvanyatarasyām

वर्ग-अन्त प्रातिपदिक से, जब प्रत्ययार्थ शब्द-भिन्न (व्यक्ति-समूह) हो, विकल्प से 'यत्' और 'ख' प्रत्यय भी होते हैं (छ के अतिरिक्त)। उदाहरण: अक्रूरवर्ग्यः/अक्रूरवर्गीणः/अक्रूरवर्गीयः।

श्लोक 3.65

कर्णललाटात्कनलंकारे

karṇalalāṭātkanalaṁkāre

कर्ण और ललाट शब्दों से, अलंकार (आभूषण) अभिप्रेत होने पर, 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कर्णिका (कान का आभूषण), ललाटिका।

श्लोक 3.66

तस्य व्याख्यान इति च व्याख्यातव्यनाम्नः

tasya vyākhyāna iti ca vyākhyātavyanāmnaḥ

'व्याख्यातव्य' (जिसकी व्याख्या की जानी हो) नाम रखनेवाले षष्ठ्यन्त शब्द से 'भाव' और 'व्याख्यान' दोनों अर्थों में यथाविहित प्रत्यय होता है। उदाहरण: सुपां व्याख्यानो ग्रन्थः = सौपः।

श्लोक 3.67

बह्वचोऽन्तोदात्ताट्ठञ्

bahvaco'ntodāttāṭṭhañ

उसी 'व्याख्यातव्य' अर्थ में अनेकस्वर, अन्तोदात्त षष्ठ्यन्त प्रातिपदिक से 'ठञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: षत्वणत्वयोः व्याख्यानं/भवम् = षात्वणत्विकम्।

श्लोक 3.68

क्रतुयज्ञेभ्यश्च

kratuyajñebhyaśca

'व्याख्यातव्य' अर्थ में क्रतु-वाचक और यज्ञ-वाचक षष्ठ्यन्त प्रातिपदिक से भी ठञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: अग्निष्टोमस्य व्याख्यानो ग्रन्थः/भवः = आग्निष्टोमिकः।

श्लोक 3.69

अध्यायेष्वेवर्षेः

adhyāyeṣvevarṣeḥ

'भव' और 'व्याख्यान' अर्थों में ग्रन्थपरक ऋषि-वाचक शब्दों से ठञ् प्रत्यय होता है, यदि प्रत्ययार्थ का विशेषण 'अध्याय' हो। उदाहरण: वसिष्ठस्य ग्रन्थस्य व्याख्यानः/तत्र भवः = वासिष्ठिकोऽध्यायः।

श्लोक 3.70

पौरोडाशपुरोडाशात्ष्ठन्

pauroḍāśapuroḍāśātṣṭhan

पौरोडाश और पुरोडाश शब्दों से 'भव' और 'व्याख्यान' अर्थों में 'ष्ठन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पुरोडाशिकः, पौरोडाशिकः।

श्लोक 3.71

छन्दसोयदणौ

chandasoyadaṇau

'छन्दस्' शब्द से 'भव' और 'व्याख्यान' अर्थों में यत् और अण् दोनों प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: छन्दस्यः/छान्दसः।

श्लोक 3.72

द्वद्यजृद् ब्राह्मणर्क् प्रथमाध्वरपुरश्वरणनामाख्याताट्ठक्

dvadyajṛd brāhmaṇark prathamādhvarapuraśvaraṇanāmākhyātāṭṭhak

द्वि-अच्, ऋकारान्त, ब्राह्मण, ऋक्, प्रथम, अध्वर, पुरश्चरण, नाम और आख्यात शब्दों से 'भव' तथा 'व्याख्यान' अर्थों में 'ठक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पशु → पाशुकः, इष्ट → ऐष्टिकः।

श्लोक 3.73

अणृगयनादिभ्यः

aṇṛgayanādibhyaḥ

ऋगयन आदि प्रातिपदिकों से 'भव' और 'व्याख्यान' अर्थों में 'अण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: उपनिषद् → औपनिषदः, व्याकरण → वैयाकरणः।

श्लोक 3.74

तत आगतः

tata āgataḥ

'वहाँ से आया हुआ' (तत आगतः) अर्थ में पञ्चमी-अन्त समर्थ से ही यथाविहित प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: स्त्रुध्नात् आगतः = स्त्रौध्नः।

श्लोक 3.75

ठगायस्थानेभ्यः

ṭhagāyasthānebhyaḥ

'आया हुआ' अर्थ में पञ्चमी-अन्त आयस्थान (कर वसूली का स्थान) वाचक शब्द से 'ठक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शुक्लशालायाः आगतः = शौल्कशालिकः।

श्लोक 3.76

शुण्डिकादिभ्योऽण्

śuṇḍikādibhyo'ṇ

पञ्चमी-अन्त शुण्डिक आदि प्रातिपदिकों से 'आया हुआ' अर्थ में 'अण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शुण्डिकात् आगतः = शौण्डिकः।

श्लोक 3.77

विद्यायोनिसम्बन्धेभ्योवुञ्

vidyāyonisambandhebhyovuñ

'आया हुआ' अर्थ में विद्या-सम्बन्ध और योनि-सम्बन्ध वाचक पञ्चमी-अन्त समर्थ से 'वुञ्' (वु) प्रत्यय होता है। उदाहरण: उपाध्यायात् आगतः = औपाध्यायकः (गुरु से प्राप्त विद्या)।

श्लोक 3.78

ऋतष्ठञ्

ṛtaṣṭhañ

विद्या-योनि-सम्बन्ध वाचक ऋकारान्त पञ्चमी-अन्त प्रातिपदिक से 'आगत' अर्थ में 'ठञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: होतुः आगतम् = हौतृकम्; भ्रातृ → भ्रातृकम्।

श्लोक 3.79

पितुर्यच्च

pituryacca

पितृ शब्द से 'आगत' अर्थ में ठञ् और यत् दोनों प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: पितुः आगतम् = पित्र्यम्/पैतृकम्।

श्लोक 3.80

गोत्रादङ्कवत्

gotrādaṅkavat

गोत्र-प्रत्ययान्त शब्दों से, 'अङ्क' अर्थक प्रत्ययों की भाँति, 'आगत' अर्थ में भी प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: औपगवेभ्यः आगतम् = औपगवकम्।

श्लोक 3.81

हेतुमनुष्येभ्योऽन्यतरस्यांरुप्यः

hetumanuṣyebhyo'nyatarasyāṁrupyaḥ

'आया हुआ' अर्थ में हेतु (कारण) और मनुष्य-वाचक पञ्चमी-अन्त समर्थ से विकल्प से 'रूप्य' प्रत्यय होता है। उदाहरण: समात् आगतम् = समरूप्यम्।

श्लोक 3.82

मयट् च

mayaṭ ca

उसी हेतु-वाचक और मनुष्य-वाचक पञ्चमी-अन्त प्रातिपदिक से 'मयट्' (मय) प्रत्यय भी होता है। उदाहरण: समात् आगतः = सममयम्।

श्लोक 3.83

प्रभवति

prabhavati

'प्रकट होता है / निकलता है' (प्रभवति, जैसे नदी) अर्थ में पञ्चमी-अन्त समर्थ से ही यथाविहित प्रत्यय होते हैं - इसके साथ 'शेष' अधिकार (4.2.92 से) समाप्त होता है। उदाहरण: हिमवतः प्रभवति = हैमवती (नदी)।

श्लोक 3.84

विदूराञ्ञ्यः

vidūrāññyaḥ

पञ्चमी-अन्त 'विदुर' शब्द से 'प्रभवन' अर्थ में 'ञ्य' प्रत्यय होता है। उदाहरण: विदूरात् प्रभवति = वैदूर्यम् (वैदूर्य मणि/नदी)।

श्लोक 3.85

तद्गच्छतिपथिदूतयोः

tadgacchatipathidūtayoḥ

जब पथ (मार्ग) या दूत अभिप्रेत हो, 'जाता है' (गच्छति) अर्थ में द्वितीयान्त प्रातिपदिक से ही यथाविहित प्रत्यय होता है। उदाहरण: स्त्रुध्नं गच्छति (पथ/दूत) = स्त्रौध्नः।

श्लोक 3.86

अभिनिष्क्रामतिद्वारम्

abhiniṣkrāmatidvāram

यदि निकलनेवाला 'द्वार' हो, तो 'उस ओर निकलता है' (अभिनिष्क्रामति) अर्थ में द्वितीयान्त प्रातिपदिक से यथाविहित प्रत्यय होता है। उदाहरण: स्त्रुध्नम् अभिनिष्क्रामति (द्वारम्) = स्त्रौध्नम्।

श्लोक 3.87

अधिकृत्यकृतेग्रन्थे

adhikṛtyakṛtegranthe

'अधिकृत करके बनाया गया ग्रन्थ' अर्थ में द्वितीयान्त प्रातिपदिक से यथाविहित प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: शारीरकम् अधिकृत्य कृतो ग्रन्थः = शारीरकीयम्।

श्लोक 3.88

शिशुक्रन्दयमसभद्वन्द्वेन्द्रजननादिभ्यश्छः

śiśukrandayamasabhadvandvendrajananādibhyaśchaḥ

द्वितीयासमर्थ शिशु, क्रन्द, यम, सभा, द्वन्द्व, इन्द्रजनन आदि शब्दों से, 'विषय बनाकर रचित ग्रन्थ' अर्थ में, 'छ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शिशुक्रन्दम् अधिकृत्य कृतो ग्रन्थः = शिशुक्रन्दीयः।

श्लोक 3.89

सोऽस्यनिवासः

so'syanivāsaḥ

'इसका निवास है' (सोऽस्य निवासः) अर्थ में प्रथमान्त प्रातिपदिक से यथाविहित प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: स्त्रुध्नः निवासः अस्य = स्त्रौध्नः।

श्लोक 3.90

अभिजनश्च

abhijanaśca

प्रथमासमर्थ शब्दों से 'इसका अभिजन (पूर्वज-निवासस्थान) है' अर्थ में यथाविहित प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: इन्द्रप्रस्थ → ऐन्द्रप्रस्थः, ग्राम → ग्रामीणः/ग्राम्यः।

श्लोक 3.91

आयुधजीविभ्यश्छःपर्वते

āyudhajīvibhyaśchaḥparvate

पर्वत-वाचक प्रथमासमर्थ शब्द से, आयुधजीवी (शस्त्रजीवी) के अभिधान हेतु, षष्ठ्यर्थ में 'छ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: हृद्गोलः पर्वतः अभिजनः एषाम् = हृद्गोलीयाः आयुधजीविनः।

श्लोक 3.92

शण्डिकादिभ्योञ्यः

śaṇḍikādibhyoñyaḥ

शण्डिक आदि शब्दों से 'इसका अभिजन है' अर्थ में 'ञ्य' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शण्डिकः अभिजनः अस्य = शाण्डिक्यः।

श्लोक 3.93

सिन्धुतक्षशिलादिभ्योऽणञौ

sindhutakṣaśilādibhyo'ṇañau

सिन्धु, तक्षशिला आदि प्रातिपदिकों से 'अभिजन' अर्थ में क्रमशः 'अण्' और 'अञ्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: सिन्धुः अभिजनः अस्य = सैन्धवः; तक्षशिलादिभ्यः → ताक्षशिलः।

श्लोक 3.94

तूदीशलातुरवर्मतीकूचवाराड्ढक्छण्ढञ्यकः

tūdīśalāturavarmatīkūcavārāḍḍhakchaṇḍhañyakaḥ

तूदी, शलातुर, वर्मवती और कूचवार शब्दों से 'अभिजन' अर्थ में क्रमशः ढक्, छण्, ढञ् और यक् प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: तूदी → तौदेयः, शलातुर → शालातुरीयः।

श्लोक 3.95

भक्तिः

bhaktiḥ

प्रथमासमर्थ शब्द से 'इसकी निष्ठा/भक्ति है' अर्थ में यथाविहित प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: स्त्रुध्नः भक्तिः अस्य = स्त्रौध्नः, राष्ट्रियः।

श्लोक 3.96

अचित्ताददेशकालाट्ठक्

acittādadeśakālāṭṭhak

देश और काल से भिन्न अचेतन-वाचक प्रातिपदिक से 'इसकी भक्ति है' अर्थ में 'ठक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पायस् → पायसिकः (जिसे खीर प्रिय है)।

श्लोक 3.97

महाराजट्ठञ्

mahārājaṭṭhañ

महाराज शब्द से 'इसकी भक्ति है' अर्थ में 'ठञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: महाराजः भक्तिः अस्य = माहाराजिकः।

श्लोक 3.98

वासुदेवार्जुनाभ्यां वुन्

vāsudevārjunābhyāṁ vun

वासुदेव और अर्जुन शब्दों से 'इसकी भक्ति है' अर्थ में 'वुन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: वासुदेवः भक्तिः अस्य = वासुदेवकः, अर्जुनकः।

श्लोक 3.99

गोत्रक्षत्रियाख्येभ्योबहुलंवुञ्

gotrakṣatriyākhyebhyobahulaṁvuñ

गोत्र-वाचक और क्षत्रिय-वाचक शब्दों से 'इसकी भक्ति है' अर्थ में बहुधा 'वुञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: ग्लौचुकायनिः भक्तिः अस्य = ग्लौचुकायनकः; नाकुलकः, साहदेवकः।

श्लोक 3.100

जनपदिनां जनपदवत्सर्वं जनपदेनसमानशब्दानां बहुवचने

janapadināṁ janapadavatsarvaṁ janapadenasamānaśabdānāṁ bahuvacane

जो शब्द जनपद-स्वामी-वाचक हैं और बहुवचन में जनपद-वाचक शब्दों के समान ही सुने जाते हैं, उनसे भी 'भक्ति' अर्थ में जनपदवाचक शब्दों जैसा ही प्रकृति-प्रत्यय होता है। उदाहरण: आङ्गकः, वाङ्गकः (अङ्ग देश के क्षत्रियों के भक्त)।

श्लोक 3.101

तेनप्रोक्तम्

tenaproktam

'प्रवचन किया हुआ' (प्रोक्तम्) अर्थ में तृतीयान्त प्रातिपदिक से यथाविहित (अण्, छ आदि) प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: पाणिनिना प्रोक्तम् = पाणिनीयम्।

श्लोक 3.102

तित्तिरिवरतन्तुखण्डिकोखाच्छण्

tittirivaratantukhaṇḍikokhācchaṇ

तृतीयासमर्थ तित्तिरि, वरतन्तु, खण्डिक और उख शब्दों से 'प्रोक्त' अर्थ में 'छण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: तित्तिरिणा प्रोक्तम् = तैत्तिरीयम्।

श्लोक 3.103

काश्यपकौशिकाभ्यामृषिभ्यांणिनिः

kāśyapakauśikābhyāmṛṣibhyāṁṇiniḥ

तृतीयासमर्थ ऋषि-वाचक काश्यप और कौशिक शब्दों से 'प्रोक्त' अर्थ में 'णिनि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कश्यपेन प्रोक्तम् = काश्यपिनः।

श्लोक 3.104

कलापिवैशम्पायनान्तेवासिभ्यश्च

kalāpivaiśampāyanāntevāsibhyaśca

कलापि के शिष्यों तथा वैशम्पायन के शिष्यों को बतानेवाले तृतीयासमर्थ शब्दों से भी 'प्रोक्त' अर्थ में णिनि प्रत्यय होता है। उदाहरण: हरिद्रुणा प्रोक्तम् अधीते = हारिद्रविणः।

श्लोक 3.105

पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मणकल्पेषु

purāṇaprokteṣu brāhmaṇakalpeṣu

यदि प्रोक्त पदार्थ पुराण-मुनि-प्रोक्त 'ब्राह्मण' अथवा 'कल्प' ग्रन्थ हो, तो तृतीयासमर्थ शब्द से 'प्रोक्त' अर्थ में णिनि प्रत्यय होता है। उदाहरण: भल्लवेन प्रोक्तं ब्राह्मणम् अधीयते = भाल्लविनः।

श्लोक 3.106

शौनकादिभ्यश्छन्दसि

śaunakādibhyaśchandasi

यदि छन्दस् (वेद-संहिता) अभिधेय हो, तो शौनक आदि शब्दों से 'प्रोक्त' अर्थ में णिनि प्रत्यय होता है। उदाहरण: शौनकेन प्रोक्तम् अधीयते = शौनकिनः।

श्लोक 3.107

कठचरकाल्लुक्

kaṭhacarakālluk

कठ और चरक शब्दों से विहित 'प्रोक्त' अर्थक प्रत्यय का लोप हो जाता है। उदाहरण: कठेन प्रोक्तम् अधीयते = कठाः (प्रत्यय-रहित)।

श्लोक 3.108

कलापिनोऽण्

kalāpino'ṇ

'कलापिन्' शब्द से 'प्रोक्त' अर्थ में 'अण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कलापिना प्रोक्तम् अधीयते = कालापाः।

श्लोक 3.109

छगलिनो ढिनुक्

chagalino ḍhinuk

'छगलिन्' शब्द से 'प्रोक्त' अर्थ में 'ढिनुक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: छगलिना प्रोक्तम् अधीयते = छागलेयिनः।

श्लोक 3.110

पाराशर्यशिलालिभ्यांभिक्षुनटसूत्रयोः

pārāśaryaśilālibhyāṁbhikṣunaṭasūtrayoḥ

पाराशर्य और शिलालि शब्दों से, यदि क्रमशः भिक्षु-सूत्र और नट-सूत्र अभिधेय हों, 'प्रोक्त' अर्थ में णिनि प्रत्यय होता है। उदाहरण: पाराशर्येण प्रोक्तम् अधीयते = पाराशरिणो भिक्षवः; शैलालिनो नटाः।

श्लोक 3.111

कर्मन्दक्रिशाश्वादिनिः

karmandakriśāśvādiniḥ

कर्मन्द और कृशाश्व शब्दों से भी, क्रमशः भिक्षु-सूत्र और नट-सूत्र अभिधेय होने पर, णिनि प्रत्यय होता है। उदाहरण: कर्मन्देन प्रोक्तम् अधीयते = कर्मन्दिनो भिक्षवः।

श्लोक 3.112

तेनैकदिक्

tenaikadik

तृतीयासमर्थ शब्द से 'एक दिशा में' (एकदिक्) अर्थ में यथाविहित प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: इन्द्रप्रस्थेन एकदिक् = ऐन्द्रप्रस्थो ग्रामः।

श्लोक 3.113

तसिश्व

tasiśva

तृतीयासमर्थ से 'एकदिक्' अर्थ में 'तसि' प्रत्यय भी होता है। उदाहरण: इन्द्रप्रस्थतः, वाराणसीतः।

श्लोक 3.114

उरसोयच्च

urasoyacca

तृतीयासमर्थ 'उरस्' शब्द से 'एकदिक्' अर्थ में यत् और तसि दोनों प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: उरसा एकदिक् = उरस्यः/उरस्तः।

श्लोक 3.115

उपज्ञाते

upajñāte

तृतीयासमर्थ शब्द से 'उपज्ञात' (पहली बार जाना/रचा गया) अर्थ में यथाविहित प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: पाणिनिना उपज्ञातम् = पाणिनीयम् अकालकं व्याकरणम्।

श्लोक 3.116

कृतेग्रन्थे

kṛtegranthe

तृतीयासमर्थ से 'रचित ग्रन्थ' अर्थ में यथाविहित प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: वररुचिना कृताः श्लोकाः = वाररुचाः श्लोकाः।

श्लोक 3.117

संज्ञायाम्

saṁjñāyām

तृतीयासमर्थ से 'रचित ग्रन्थ' अर्थ में यथाविहित प्रत्यय होते हैं, यदि प्रत्ययान्त शब्द से संज्ञा (विशेषनाम) का बोध हो।

श्लोक 3.118

कुलालादिभ्यो वुञ्

kulālādibhyo vuñ

तृतीयासमर्थ कुलाल आदि शब्दों से, संज्ञा अभिप्रेत होने पर, 'कृत' अर्थ में 'वुञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कुलालेन कृतम् = कैलालकम्।

श्लोक 3.119

क्षुद्राभ्रमरवटरपादपादञ्

kṣudrābhramaravaṭarapādapādañ

तृतीयासमर्थ क्षुद्रा, भ्रमर और पादप शब्दों से, संज्ञा अभिप्रेत होने पर, 'कृत' अर्थ में 'अञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: क्षुद्राभिः कृतम् = क्षौद्रम् (मधु)।

श्लोक 3.120

तस्येदम्

tasyedam

षष्ठ्यन्त प्रातिपदिक से 'यह इसका है' (इदम्) अर्थ में यथाविहित प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: उपगोः इदम् = औपगवम्।

श्लोक 3.121

रथाद्यत्

rathādyat

षष्ठीसमर्थ 'रथ' शब्द से 'इदम्' अर्थ में 'यत्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: रथस्य इदम् = रथ्यम्।

श्लोक 3.122

पत्रपूर्वादञ्

patrapūrvādañ

वाहन-वाचक शब्दपूर्वक 'रथ' शब्द से 'इदम्' अर्थ में 'अञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अश्वरथस्य इदम् = आश्वरथम्।

श्लोक 3.123

पत्राध्वर्युपरिषदश्च

patrādhvaryupariṣadaśca

षष्ठीसमर्थ वाहन-वाचक शब्द तथा अध्वर्यु और परिषद् शब्दों से 'इदम्' अर्थ में 'अञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: गर्दभस्य इदम् = गार्दभम्; अध्वर्योः इदम् = आध्वर्यवम्।

श्लोक 3.124

हलसीराट्ठक्

halasīrāṭṭhak

षष्ठीसमर्थ हल और सीर शब्दों से 'इदम्' अर्थ में 'ठक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: हलस्य इदम् = हालिकम्; सीरस्य इदम् = सैरिकम्।

श्लोक 3.125

द्वन्द्वाद्वुन्वैरमैथुनिकयोः

dvandvādvunvairamaithunikayoḥ

द्वन्द्व-संज्ञक शब्द से 'इदम्' अर्थ में 'वुन्' प्रत्यय होता है, जब वैर या मैथुनिक (सन्तति) प्रत्ययार्थ का विशेषण हो। उदाहरण: बाभ्रव्यशालङ्कायनयोः इदं वैरम् = बाभ्रव्यशालङ्कायनिका।

श्लोक 3.126

गोत्रचरणाद् वुञ्

gotracaraṇād vuñ

गोत्र-वाचक और चरण-वाचक शब्दों से 'इदम्' अर्थ में 'वुञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: ग्लौचुकायङ्कम् (गोत्रात्), काठकम् (चरणात्)।

श्लोक 3.127

सङ्घाङ्कलक्षणेष्वञ्यञिञामण्

saṅghāṅkalakṣaṇeṣvañyañiñāmaṇ

संघ (समूह), अङ्क (चिह्न) और लक्षण के प्रत्ययार्थ-विशेषण होने पर यञन्त और इञन्त प्रातिपदिक से 'इदम्' अर्थ में 'अञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: गार्गः सङ्घः, गार्गः अङ्कः, गार्गं लक्षणम्।

श्लोक 3.128

शाकलाद्वा

śākalādvā

संघ आदि के प्रत्ययार्थ-विशेषण होने पर 'शाकल' शब्द से विकल्प से 'अण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शाकलः/शाकलम्/शाकलकः।

श्लोक 3.129

छन्दोगौक्थिकयाज्ञिकबह् वृचनटाञ्ञ्यः

chandogaukthikayājñikabah vṛcanaṭāññyaḥ

छन्दोग, औक्थिक, याज्ञिक, बह्वृच और नट शब्दों से 'इदम्' अर्थ में 'ञ्य' प्रत्यय होता है। उदाहरण: छन्दोगानां धर्मः/आम्नायः = छान्दोग्यम्।

श्लोक 3.130

नदण्डमाणवान्तेवासिषु

nadaṇḍamāṇavāntevāsiṣu

जब दण्ड-प्रधान माणव (शिष्य) या अन्तेवासी (शिष्य) अभिप्रेत हों, तब गोत्र-प्रत्ययान्त से 'वुञ्' प्रत्यय नहीं होता (केवल गोत्र-प्रत्यय ही रहता है)। उदाहरण: गौकक्ष्यस्य दण्डमाणवाः/अन्तेवासिनः = गौकक्षाः।

श्लोक 3.131

रैवतिकादिभ्यश्छः

raivatikādibhyaśchaḥ

रैवतिक आदि शब्दों से 'इदम्' अर्थ में 'छ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: रैवतिकीयः, स्वापिशीयः।

श्लोक 3.132

कौपिञ्ज`लहास्तिपदादण्

kaupiñja`lahāstipadādaṇ

कौपिञ्जल और हस्तिपद शब्दों से 'इदम्' अर्थ में 'अञ्' प्रत्यय होता है।

श्लोक 3.133

आथर्वणिकस्येकलोपश्च

ātharvaṇikasyekalopaśca

'आथर्वणिक' शब्द से 'इदम्' अर्थ में 'अण्' प्रत्यय होता है और साथ ही उसके 'इक्' भाग का लोप होता है।

श्लोक 3.134

तस्यविकारः

tasyavikāraḥ

षष्ठ्यन्त प्रातिपदिक से 'विकार' (रूपान्तर) अर्थ में यथाविहित प्रत्यय होते हैं - यहाँ से एक नया बड़ा प्रकरण (द्रव्य-विकार) आरम्भ होता है। उदाहरण: अश्मनः विकारः = आश्मः।

श्लोक 3.135

अवयवेचप्राण्योषधिवृक्षेभ्यः

avayavecaprāṇyoṣadhivṛkṣebhyaḥ

प्राणि-वाचक, ओषधि-वाचक और वृक्ष-वाचक षष्ठ्यन्त प्रातिपदिकों से 'अवयव' (भाग) और 'विकार' दोनों अर्थों में यथाविहित प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: कपोतस्य विकारः/अवयवः = कापोतः।

श्लोक 3.136

बिल्वादिभ्योऽण्

bilvādibhyo'ṇ

बिल्व आदि शब्दों से 'विकार' और 'अवयव' अर्थों में 'अण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: बिल्वस्य विकारः/अवयवः = बैल्वः।

श्लोक 3.137

कोपधाच्च

kopadhācca

ककारोपध शब्दों से भी 'विकार' और 'अवयव' अर्थों में अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: तित्तिडीकस्य विकारः/अवयवः = तैत्तिडीकम्।

श्लोक 3.138

त्रपुजतुनोः षुक्

trapujatunoḥ ṣuk

त्रपु (राँगा) और जतु (लाख) शब्दों से 'विकार' अर्थ में 'अञ्' प्रत्यय तथा 'षुक्' का आगम होता है। उदाहरण: त्रपुणः विकारः = त्रापुषम्।

श्लोक 3.139

ओरञ्

orañ

उ-वर्णान्त प्रातिपदिक से 'विकार' और 'अवयव' अर्थों में 'अञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: देवदारोः विकारः/अवयवः = दैवदारवम्।

श्लोक 3.140

अनुदात्तादेश्च

anudāttādeśca

अनुदात्तादि प्रातिपदिक से भी 'विकार' और 'अवयव' अर्थों में अञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: दाधित्थम्, कापित्थम्।

श्लोक 3.141

पलाशादिभ्यो वा

palāśādibhyo vā

पलाश आदि प्रातिपदिकों से उक्त अर्थों में विकल्प से अञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: पलाशस्य विकारः/अवयवः = पालाशम्।

श्लोक 3.142

शम्याः ष्लञ्

śamyāḥ ṣlañ

शमी शब्द से 'विकार' और 'अवयव' अर्थों में 'ष्लञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शम्याः विकारः = शामीलं भस्म।

श्लोक 3.143

मयड्वैतयोर्भाषायामभक्ष्याच्छादनयोः

mayaḍvaitayorbhāṣāyāmabhakṣyācchādanayoḥ

जब भक्ष्य (खाद्य) और आच्छादन (ओढ़ने का वस्त्र) अभिप्रेत न हों, लौकिक संस्कृत में षष्ठ्यन्त प्रातिपदिक से 'विकार'/'अवयव' अर्थ में विकल्प से 'मयट्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अश्मनः अवयवः/विकारः = अश्ममयम्।

श्लोक 3.144

नित्यंवृद्धशरादिभ्यः

nityaṁvṛddhaśarādibhyaḥ

यदि अवयव/विकार भक्ष्य या आच्छादन न हो, वृद्धसंज्ञक और शरादि-गण के शब्दों से नित्य (सदा) मयट् प्रत्यय होता है। उदाहरण: आम्रस्य अवयवः/विकारः = आम्रमयम्।

श्लोक 3.145

गोश्चपुरीषे

goścapurīṣe

'पुरीष' (गोबर) अर्थ में षष्ठ्यन्त 'गो' शब्द से 'मयट्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: गोः पुरीषम् = गोमयम्।

श्लोक 3.146

पिष्टाच्च

piṣṭācca

'पिष्ट' (आटा) शब्द से भी 'विकार' अर्थ में मयट् प्रत्यय होता है। उदाहरण: पिष्टस्य विकारः = पिष्टमयं भस्म।

श्लोक 3.147

संज्ञायांकन्

saṁjñāyāṁkan

संज्ञा-विषय में 'पिष्ट' शब्द से 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पिष्टकः।

श्लोक 3.148

व्रीहेः पुरोडाशे

vrīheḥ puroḍāśe

'व्रीहि' शब्द से, पुरोडाश-रूप विकार के अर्थ में, मयट् प्रत्यय होता है। उदाहरण: व्रीहिमयः पुरोडाशः।

श्लोक 3.149

असंज्ञायांतिलयवाभ्याम्

asaṁjñāyāṁtilayavābhyām

असंज्ञा-विषय में तिल और यव शब्दों से 'विकार'/'अवयव' अर्थों में मयट् प्रत्यय होता है। उदाहरण: तिलस्य विकारः/अवयवः = तिलमयम्।

श्लोक 3.150

द्वयचश्छन्दसि

dvayacaśchandasi

वेद में द्वि-अच् प्रातिपदिक से 'विकार'/'अवयव' अर्थों में मयट् प्रत्यय होता है। उदाहरण: पर्णमयी जुहूः, दर्भमयं वासः।

श्लोक 3.151

नोत्वद्वर्ध्रबिल्वात्

notvadvardhrabilvāt

उकारवाले प्रातिपदिक से, तथा वर्ध्र और बिल्व शब्दों से, मयट् प्रत्यय नहीं होता (अपितु अण् आदि)। उदाहरण: मौञ्जं शिक्यम् (मुञ्ज-घास का), वार्ध्रम्, बैल्वम्।

श्लोक 3.152

तालादिभ्योऽण्

tālādibhyo'ṇ

ताल आदि शब्दों से 'विकार'/'अवयव' अर्थों में अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: तालं धनुः = तालम्, बार्हिणम् (मोर-पंख का)।

श्लोक 3.153

जातरुपेभ्यःपरिमाणे

jātarupebhyaḥparimāṇe

सुवर्ण-वाचक शब्द से, परिमाण-रूप 'विकार' अर्थ में, अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: जातरूपं कर्षापणम् (सोने का सिक्का) = जातरूपः।

श्लोक 3.154

प्राणिरजतादिभ्योऽञ्

prāṇirajatādibhyo'ñ

प्राणि-वाचक और रजत आदि शब्दों से 'विकार'/'अवयव' अर्थों में अञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: कपोतस्य विकारः/अवयवः = कापोतम्; रजतादिभ्यः - राजतम्।

श्लोक 3.155

ञितश्चतत्प्रत्ययात्

ñitaścatatpratyayāt

जो शब्द पहले ही ञित् विकार/अवयव-अर्थक प्रत्ययान्त हो, उससे उन्हीं अर्थों में पुनः अञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शामीलस्य विकारः/अवयवः = शामीलम्।

श्लोक 3.156

क्रीतवत् परिमाणात्

krītavat parimāṇāt

परिमाण-वाचक शब्दों से 'क्रीत' अर्थक प्रत्ययों की भाँति 'विकार' अर्थक प्रत्यय भी होते हैं। उदाहरण: निष्केण क्रीतं/निष्कस्य विकारः = नैष्किकम्।

श्लोक 3.157

उष्ट्राद् वुञ्

uṣṭrād vuñ

'उष्ट्र' शब्द से 'विकार'/'अवयव' अर्थों में 'वुञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: उष्ट्रस्य विकारः/अवयवः = औष्ट्रकः।

श्लोक 3.158

उमोर्णयोर्वा

umorṇayorvā

उमा और ऊर्णा शब्दों से 'विकार'/'अवयव' अर्थों में विकल्प से वुञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: औमकम्/औमम्, और्णकम्/और्णम्।

श्लोक 3.159

एण्या ढञ्

eṇyā ḍhañ

'एणी' (हरिणी) शब्द से 'विकार'/'अवयव' अर्थों में 'ढञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: एण्याः विकारः/अवयवः = ऐणेयं मांसम्।

श्लोक 3.160

गोपयसोर्यत्

gopayasoryat

'अवयव' और 'विकार' अर्थ में षष्ठ्यन्त गो और पयस् शब्दों से 'यत्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: गोः अवयवः/विकारः = गव्यम्।

श्लोक 3.161

द्रोश्च

drośca

'द्रु' (काठ) शब्द से भी 'विकार'/'अवयव' अर्थों में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्रोः विकारः/अवयवः = द्रव्यम्।

श्लोक 3.162

मानेवयः

mānevayaḥ

'द्रु' शब्द से, मान (मापने के उपकरण) रूप विकार अर्थ में, 'वय्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्रु + वय = द्रव्यम् (एक प्रकार का माप)।

श्लोक 3.163

फलेलुक्

phaleluk

फल-रूप 'विकार' अभिप्रेत होने पर विकार/अवयव अर्थक प्रत्ययों का लोप हो जाता है। उदाहरण: आमलक्याः फलं विकारः/अवयवः = आमलकम् (प्रत्यय-रहित)।

श्लोक 3.164

प्लक्षादिभ्योऽण्

plakṣādibhyo'ṇ

प्लक्ष आदि शब्दों से फल-रूप विकार और तदाश्रित अवयव अर्थों में 'अण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: प्लक्षस्य विकारः/अवयवः = प्लाक्षम्।

श्लोक 3.165

जम्ब्वावा

jambvāvā

'जम्बू' शब्द से फल-रूप विकार आदि अर्थों में विकल्प से अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: जम्बू + अण् = जाम्ब्वम्।

श्लोक 3.166

लुप् च

lup ca

'जम्बू' शब्द से विहित फलार्थक प्रत्यय का विकल्प से लोप भी होता है। उदाहरण: जम्बूः फलम्/जम्बु फलम्।

श्लोक 3.167

हरीतक्यादिभ्यश्व

harītakyādibhyaśva

हरीतकी आदि शब्दों से भी विहित फलार्थक प्रत्यय का लोप होता है। उदाहरण: हरीतक्याः फलम् = हरीतकी फलम् (प्रत्यय-रहित)।

श्लोक 3.168

कंसीयपरशव्ययोर्यञञौलुक्च

kaṁsīyaparaśavyayoryañañaulukca

कंसीय और परशव्य शब्दों से 'विकार' अर्थ में क्रमशः यञ् और अञ् प्रत्यय होते हैं, और साथ ही प्रकृति के अन्त्य भाग का लोप भी होता है। उदाहरण: कंसीयस्य विकारः = कंस्यः; परशव्यस्य विकारः = पराशवः। इसके साथ पाद ३ (विकार-अवयव तद्धित) समाप्त होता है।

चतुर्थोऽध्यायः, चतुर्थः पादः

श्लोक 4.1

प्राग्वहतेष्ठक्

prāgvahateṣṭhak

इस सूत्र से लेकर 'तद्वहति रथयुगप्रासङ्गम्' (4.4.76) तक 'ठक्' प्रत्यय का अधिकार चलता है - यह पाद 4 का प्रवर्तक अधिकार-सूत्र है। उदाहरण: अक्षैः दीव्यति = आक्षिकः।

श्लोक 4.2

तेन दीव्यति खनति जयति जितम्

tena dīvyati khanati jayati jitam

'खेलता है' (दीव्यति), 'खोदता है' (खनति), 'जीतता है' (जयति) और 'जीता हुआ' (जितम्) - इन चार अर्थों में तृतीयान्त प्रातिपदिक से ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: अक्षैः दीव्यति/जयति/खनति/जितं वा = आक्षिकः।

श्लोक 4.3

संस्कृतम्

saṁskṛtam

'संस्कार किया हुआ' (संस्कृतम्) अर्थ में तृतीयान्त प्रातिपदिक से ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: दध्ना संस्कृतम् = दाधिकम्।

श्लोक 4.4

कुलत्थकोपधादण्

kulatthakopadhādaṇ

कुलत्थ और ककारोपध शब्दों से 'संस्कृत' अर्थ में अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: कुलत्थैः संस्कृतम् = कौलत्थम्।

श्लोक 4.5

तरति

tarati

'तैरता/पार जाता है' (तरति) अर्थ में तृतीयान्त प्रातिपदिक से ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: उडुपेन तरति = औडुपिकः।

श्लोक 4.6

गोपुच्छाट्ठञ्

gopucchāṭṭhañ

गोपुच्छ शब्द से 'तरति' अर्थ में ठञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: गोपुच्छेन तरति = गौपुच्छिकः।

श्लोक 4.7

नौद्वयचष्ठ्न

naudvayacaṣṭhna

नौ और द्वि-अच् प्रातिपदिक से 'तरति' अर्थ में ठन् प्रत्यय होता है। उदाहरण: नावा तरति = नाविकः; घटेन तरति = घटिकः।

श्लोक 4.8

चरति

carati

'चलता है/खाता है' (चरति) अर्थ में तृतीयान्त प्रातिपदिक से ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: हस्तिना चरति = हास्तिकः।

श्लोक 4.9

आकर्षात्ष्ठल्

ākarṣātṣṭhal

आकर्ष शब्द से 'चरति' अर्थ में ष्ठल् प्रत्यय होता है। उदाहरण: आकर्षेण चरति = आकर्षिकः।

श्लोक 4.10

पर्पादिभ्यः ष्ठन्

parpādibhyaḥ ṣṭhan

पर्प आदि शब्दों से 'चरति' अर्थ में ष्ठन् प्रत्यय होता है। उदाहरण: पर्पेण चरति = पर्पिकः।

श्लोक 4.11

श्वगणाट्ठञ्च

śvagaṇāṭṭhañca

श्वगण शब्द से 'चरति' अर्थ में ठञ् और ष्ठन् दोनों प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: श्वगणेन चरति = श्वागणिकः/श्वगणिकः।

श्लोक 4.12

वेतनादिभ्यो जीवति

vetanādibhyo jīvati

तृतीयासमर्थ वेतन आदि शब्दों से 'जीता है' (जीवति) अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: वेतनेन जीवति = वैतनिकः।

श्लोक 4.13

वस्नक्रयविक्रयाट्ठन्

vasnakrayavikrayāṭṭhan

तृतीयासमर्थ वस्न, क्रय, विक्रय और क्रयविक्रय शब्दों से 'जीता है' अर्थ में ठन् प्रत्यय होता है। उदाहरण: वस्निकः, क्रयिकः।

श्लोक 4.14

आयुधाच्छ च

āyudhāccha ca

तृतीयासमर्थ आयुध शब्द से 'जीता है' अर्थ में छ और ठन् दोनों प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: आयुधीयः/आयुधिकः।

श्लोक 4.15

हरत्युत्सङ्गादिभ्यः

haratyutsaṅgādibhyaḥ

तृतीयासमर्थ उत्सङ्ग आदि शब्दों से 'हरण/स्थानान्तरण करता है' (हरति) अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: उत्सङ्गेन हरति = औत्सङ्गिकः।

श्लोक 4.16

भस्त्रादिभ्यः ष्ठन्

bhastrādibhyaḥ ṣṭhan

भस्त्रा आदि शब्दों से 'हरति' अर्थ में ष्ठन् प्रत्यय होता है। उदाहरण: भस्त्रया हरति = भस्त्रिकः।

श्लोक 4.17

विभाषा विवधात्

vibhāṣā vivadhāt

विवध और वीवध शब्दों से विकल्प से 'हरति' अर्थ में ष्ठन् प्रत्यय होता है। उदाहरण: विवधिकः/वैवधिकः।

श्लोक 4.18

अण्कुटिलिकायाः

aṇkuṭilikāyāḥ

तृतीयासमर्थ कुटिलिका शब्द से 'हरति' अर्थ में अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: कुटिलिकया व्याधं हरति = कौटिलिकः।

श्लोक 4.19

निर्वृतेऽक्षद्यूतादिभ्यः

nirvṛte'kṣadyūtādibhyaḥ

तृतीयासमर्थ अक्षद्यूत आदि शब्दों से 'सम्पन्न किया गया' (निर्वृत्त) अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: जानुप्रहृतेन निर्वृत्तम् = जानुप्रहृतिकम्।

श्लोक 4.20

क्त्रेर्मम्नित्यम्

ktrermamnityam

'सिद्ध किया गया' अर्थ में क्त्रि-प्रत्ययान्त शब्द से नित्य 'मप्' (म) प्रत्यय होता है (स्वतन्त्र क्त्रि-रूप का प्रयोग नहीं होता)। उदाहरण: पक्त्रि → पक्त्रिमम्, उप्त्रि → उप्त्रिमम्।

श्लोक 4.21

अपमित्ययाचिताभ्यांकक्कनौ

apamityayācitābhyāṁkakkanau

अपमिति और अयाचित शब्दों से क्रमशः 'निर्वृत्त' अर्थ में कक् और कन् प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: आपमित्यकम्, याचितकम्।

श्लोक 4.22

संसृष्टे

saṁsṛṣṭe

'मिला हुआ' (संसृष्ट) अर्थ में तृतीयान्त प्रातिपदिक से ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: दध्ना संसृष्टम् = दाधिकम्।

श्लोक 4.23

चूर्णादिनिः

cūrṇādiniḥ

चूर्ण शब्द से 'संसृष्ट' अर्थ में इनि प्रत्यय होता है। उदाहरण: चूर्णिनः (चूर्ण-मिश्रित)।

श्लोक 4.24

लवणाल्लुक्

lavaṇālluk

लवण शब्द से विहित 'संसृष्ट' अर्थक ठक् प्रत्यय का लोप हो जाता है। उदाहरण: लवणेन संसृष्टः = लवणः सूपः (प्रत्यय-रहित)।

श्लोक 4.25

मुद्गादण्

mudgādaṇ

मुद्ग शब्द से 'संसृष्ट' अर्थ में अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: मुद्गेन संसृष्टः = मौद्ग ओदनः।

श्लोक 4.26

व्यञ्जनैरुपसिक्ते

vyañjanairupasikte

तृतीयासमर्थ व्यञ्जन-वाचक प्रातिपदिक से 'उपसिक्त'/'व्यवहार करता है' अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: दध्ना वर्तते = दाधिकः, सूपेन → सौपिकः।

श्लोक 4.27

ओजःसहोम्भसा वर्तते

ojaḥsahombhasā vartate

तृतीयासमर्थ ओजस्, सहस् और अम्भस् शब्दों से 'वर्तते' (आचरण करता है) अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: ओजसा वर्तते = औजसिकः शूरः।

श्लोक 4.28

तत्प्रत्यनुपूर्वमीपलोमकूलम्

tatpratyanupūrvamīpalomakūlam

प्रति-पूर्वक और अनु-पूर्वक ईप, लोम और कूल शब्दों से 'वर्तते' अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: अन्वीपम् → आन्वीपिकः, प्रतिलोम → प्रातिलोमिकः।

श्लोक 4.29

परिमुखं च

parimukhaṁ ca

द्वितीयासमर्थ 'परिमुख' शब्द से 'वर्तते' अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: परिमुखं वर्तते = पारिमुखिकः।

श्लोक 4.30

प्रयच्छति गर्ह्यम्

prayacchati garhyam

निन्द्य-अर्थक द्वितीयासमर्थ शब्दों से 'देता है' (प्रयच्छति) अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्विगुणं प्रयच्छति = द्वैगुणिकः।

श्लोक 4.31

कुसीद दशैकादशात्ष्ठन्ष्ठचौ

kusīda daśaikādaśātṣṭhanṣṭhacau

निन्द्य-अर्थक कुसीद और दशैकादश शब्दों से 'देता है' अर्थ में क्रमशः ष्ठन् और ष्ठच् प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: कुसीदं प्रयच्छति = कुसीदिकः।

श्लोक 4.32

उञ्छति

uñchati

द्वितीयासमर्थ शब्दों से 'बीने हुए (जमीन पर गिरे) दानों को चुनता है' (उञ्छति) अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: गोधूमान् उञ्छति = गौधूमिकः।

श्लोक 4.33

रक्षति

rakṣati

द्वितीयासमर्थ शब्दों से 'रक्षा करता है' (रक्षति) अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: समाजं रक्षति = सामाजिकः।

श्लोक 4.34

शब्ददर्दुरंकरोति

śabdadarduraṁkaroti

'शब्दं करोति' (आवाज करता है) और 'दर्दुरं करोति' - इन दो अर्थों में द्वितीयान्त प्रातिपदिक से ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शब्दं करोति = शाब्दिको वैयाकरणः।

श्लोक 4.35

पक्षिमत्स्यमृगान्हन्ति

pakṣimatsyamṛgānhanti

द्वितीयासमर्थ शब्दों से 'पक्षी, मछली या पशु को मारता है' (हन्ति) अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: पक्षिणः हन्ति = पाक्षिकः/शाकुनिकः।

श्लोक 4.36

परिपन्थंचतिष्ठति

paripanthaṁcatiṣṭhati

द्वितीयासमर्थ 'परिपन्थ' शब्द से 'ठहरता है' (तिष्ठति) और 'मारता है' (हन्ति) अर्थों में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: परिपन्थं तिष्ठति/हन्ति = पारिपन्थिकः (डाकू)।

श्लोक 4.37

माथोत्तरपदपदव्यनुपदंधावति

māthottarapadapadavyanupadaṁdhāvati

माथ-शब्दोत्तरपदक प्रातिपदिकों से, तथा पदवी और अनुपद शब्दों से, 'दौड़ता है' (धावति) अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: विद्यामाथं धावति = वैद्यामाथिकः; पदवीं धावति = पादविकः।

श्लोक 4.38

आक्रन्दाट्ठञ्च

ākrandāṭṭhañca

द्वितीयासमर्थ 'आक्रन्द' शब्द से 'दौड़ता है' अर्थ में ठञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: आक्रन्दं धावति = आक्रन्दिकः।

श्लोक 4.39

पदोत्तरपदं गृह्राति

padottarapadaṁ gṛhrāti

पद-शब्दोत्तरपदक द्वितीयासमर्थ प्रातिपदिक से 'ग्रहण करता है' (गृह्णाति) अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: पूर्वपदं गृह्णाति = पौर्वपदिकः।

श्लोक 4.40

प्रतिकण्ठार्थललामं च

pratikaṇṭhārthalalāmaṁ ca

द्वितीयासमर्थ प्रतिकण्ठ, अर्थ और ललाम शब्दों से 'ग्रहण करता है' अर्थ में ठन् और ठक् प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: प्रतिकण्ठं गृह्णाति = प्रातिकण्ठिकः।

श्लोक 4.41

धर्मं चरति

dharmaṁ carati

'धर्म का सदा आचरण करता है' (धर्मं चरति) अर्थ में द्वितीयान्त प्रातिपदिक से ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: धर्मं चरति = धार्मिकः।

श्लोक 4.42

प्रतिपथमेतिठंश्च

pratipathametiṭhaṁśca

द्वितीयासमर्थ 'प्रतिपथ' शब्द से 'जाता है' (एति) अर्थ में ठन् और ठक् दोनों प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: प्रतिपथम् एति = प्रतिपथिकः/प्रातिपथिकः।

श्लोक 4.43

समवायान्समवैति

samavāyānsamavaiti

द्वितीयासमर्थ समय-वाचक शब्दों से 'एकत्र होता है' (समवैति) अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: समवायान् समवैति = सामवायिकः।

श्लोक 4.44

परिषदो ण्यः

pariṣado ṇyaḥ

द्वितीयासमर्थ 'परिषत्' शब्द से 'समवैति' अर्थ में ण्य प्रत्यय होता है। उदाहरण: परिषदं समवैति = पारिषद्यः।

श्लोक 4.45

सेनायावा

senāyāvā

द्वितीयासमर्थ 'सेना' शब्द से 'समवैति' अर्थ में विकल्प से ण्य प्रत्यय होता है (पक्ष में ठक्)। उदाहरण: सैन्यः/सैनिकः।

श्लोक 4.46

संज्ञायां ललाटकुक्कुटयौ पश्यति

saṁjñāyāṁ lalāṭakukkuṭayau paśyati

संज्ञा-विषय में द्वितीयासमर्थ ललाट और कुक्कुटी शब्दों से 'देखता है' (पश्यति) अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: ललाटं पश्यति = लालाटिकः।

श्लोक 4.47

तस्यधर्म्यम्

tasyadharmyam

षष्ठ्यन्त समर्थ से 'न्यायसंगत/उचित' (धर्म्य) अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: हाटकस्य धर्म्यम् = हाटकिकम्।

श्लोक 4.48

अण्महिष्यादिभ्यः

aṇmahiṣyādibhyaḥ

षष्ठ्यन्त महिषी आदि शब्दों से 'धर्म्य' अर्थ में अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: महिष्याः धर्म्यम् = माहिषिकम्।

श्लोक 4.49

ऋतोऽञ्

ṛto'ñ

षष्ठ्यन्त ऋकारान्त प्रातिपदिक से 'धर्म्य' अर्थ में अञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: होतृ → हौत्रम्, पोतृ → पौत्रम्।

श्लोक 4.50

अवक्रयः

avakrayaḥ

षष्ठ्यन्त प्रातिपदिक से 'किराया/उपयोगशुल्क' (अवक्रय) अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शुल्कशालायाः अवक्रयः = शैल्कशालिकः।

श्लोक 4.51

तदस्य पण्यम्

tadasya paṇyam

पण्य (बिकाऊ माल) बतानेवाले प्रथमासमर्थ शब्द से षष्ठ्यर्थ में ठञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: अपूपाः पण्यम् अस्य = आपूपिकः (पूए बेचनेवाला)।

श्लोक 4.52

लवणाट्ठञ्

lavaṇāṭṭhañ

पण्य-स्थानीय लवण शब्द से षष्ठ्यर्थ में ठञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: लवणं पण्यम् अस्य = लावणिकः।

श्लोक 4.53

किसरादिभ्यःष्ठन्

kisarādibhyaḥṣṭhan

पण्य-स्थानीय किशर आदि शब्दों से षष्ठ्यर्थ में ष्ठन् प्रत्यय होता है। उदाहरण: किशराः पण्यम् अस्य = किशरिकः।

श्लोक 4.54

शलालुनोऽन्यतरस्याम्

śalāluno'nyatarasyām

पण्य-स्थानीय शलालु शब्द से षष्ठ्यर्थ में विकल्प से ष्ठन् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शलालुकः/शालालुकः।

श्लोक 4.55

शिल्पम्

śilpam

यदि प्रथमान्त प्रातिपदिक शिल्प (हुनर) हो, तो 'इसका है' अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: मृदङ्गं शिल्पम् अस्य = मार्दङ्गिकः (मृदङ्ग-वादक)।

श्लोक 4.56

मड्डुकझर्झरादणन्यतरस्याम्

maḍḍukajharjharādaṇanyatarasyām

शिल्प-स्थानीय मड्डुक और झर्झर शब्दों से विकल्प से षष्ठ्यर्थ में अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: माड्डुकः/माड्डुकिकः, झार्झरः/झार्झरिकः।

श्लोक 4.57

प्रहरणम्

praharaṇam

'इसका है' अर्थ में प्रहरण (आयुध)-वाचक प्रथमान्त प्रातिपदिक से ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: असिः → आसिकः, दण्डः → दाण्डिकः।

श्लोक 4.58

परश्वधाट्ठञ्च

paraśvadhāṭṭhañca

प्रहरण-स्थानीय 'परश्वध' शब्द से ठञ् और ठक् प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: परश्वधः → पारश्वधिकः।

श्लोक 4.59

शक्तियष्ट्योरीकक्

śaktiyaṣṭyorīkak

प्रहरण-स्थानीय शक्ति और यष्टि शब्दों से षष्ठ्यर्थ में 'ईकक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शक्तिः → शाक्तीकः, यष्टिः → याष्टीकः।

श्लोक 4.60

अस्तिनास्तिदिष्टंमतिः

astināstidiṣṭaṁmatiḥ

प्रथमासमर्थ मति (मान्यता) बतानेवाले अस्ति, नास्ति और दिष्ट शब्दों से षष्ठ्यर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: अस्ति मतिः अस्य = आस्तिकः; नास्ति मतिः अस्य = नास्तिकः।

श्लोक 4.61

शीलम्

śīlam

'इसका है' अर्थ में स्वभाव (शील)-वाचक प्रथमान्त प्रातिपदिक से ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: अपूपं शीलम् अस्य = आपूपिकः (जिसकी आदत माल-पूए खाने की है)।

श्लोक 4.62

छत्रादिभ्योणः

chatrādibhyoṇaḥ

शील-प्रतिपादक छत्र आदि शब्दों से षष्ठ्यर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है। उदाहरण: छत्रं शीलम् अस्य = छात्रः (छत्र धारण करने का स्वभाव है जिसका - विद्यार्थी)।

श्लोक 4.63

कर्माध्ययनेवृत्तम्

karmādhyayanevṛttam

प्रथमासमर्थ शब्दों से 'इसके अध्ययन में कार्य सम्पन्न हुआ' (कर्म अध्ययने वृत्तम्) अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: एकम् अन्यत् अध्ययने कर्म वृत्तम् अस्य = ऐकान्यिकः।

श्लोक 4.64

बह्वच्पूर्वपदाट्ठञ्

bahvacpūrvapadāṭṭhañ

अनेकस्वर-पूर्वपदक प्रथमासमर्थ प्रातिपदिक से 'अध्ययन में कार्य सम्पन्न हुआ' अर्थ में 'ठञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्वादशान्यानि → द्वादशान्यिकः।

श्लोक 4.65

हितंभक्षाः

hitaṁbhakṣāḥ

'हितकर भोजन' (हित भक्ष्य) बतानेवाले प्रथमासमर्थ शब्दों से षष्ठ्यर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: अपूपभक्षणं हितम् अस्मै = आपूपिकः।

श्लोक 4.66

तदस्मै दीयते नियुक्तम्

tadasmai dīyate niyuktam

निश्चित रूप से दिये जानेवाले पदार्थ बतानेवाले शब्दों से चतुर्थ्यर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: अपूपाः → अपूपिकः (नियमित दिये जानेवाले पूए)।

श्लोक 4.67

श्राणामांसौदनाट्टिठन्

śrāṇāmāṁsaudanāṭṭiṭhan

निश्चित रूप से दिये जानेवाले पदार्थ बतानेवाले श्राणा और मांसौदन शब्दों से चतुर्थ्यर्थ में 'ठिठन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: श्राणा नियुक्तम् अस्मै दीयते = श्राणिकः।

श्लोक 4.68

भक्तादणन्यतरस्याम्

bhaktādaṇanyatarasyām

निश्चित रूप से दिये जानेवाले 'भक्त' (भोजन) शब्द से चतुर्थ्यर्थ में विकल्प से अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: भक्तं नियुक्तम् अस्मै दीयते = भाक्तः/भाक्तिकः।

श्लोक 4.69

तत्रनियुक्तः

tatraniyuktaḥ

सप्तमीसमर्थ शब्दों से 'नियुक्त' (नियुक्त किया गया) अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शुल्कशालायां नियुक्तः = शैल्कशालिकः।

श्लोक 4.70

अगारान्ताट्ठन्

agārāntāṭṭhan

सप्तमीसमर्थ अगार-शब्दान्त प्रातिपदिक से 'नियुक्त' अर्थ में ठन् प्रत्यय होता है। उदाहरण: देवागारे नियुक्तः = देवागारिकः।

श्लोक 4.71

अध्यायिन्यदेशकालात्

adhyāyinyadeśakālāt

अध्ययन-निषिद्ध सप्तमीसमर्थ देश और काल-वाचक शब्दों से, 'पढ़नेवाला' (अध्यायी) अभिप्रेत होने पर, ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शमशाने अधीते = शमशानिकः; चतुर्दश्याम् अधीते = चातुर्दशिकः।

श्लोक 4.72

कठिनान्तप्रस्तारसंस्थानेषुव्यवहरति

kaṭhināntaprastārasaṁsthāneṣuvyavaharati

सप्तमीसमर्थ कठिन-शब्दान्त, प्रस्तार और संस्थान शब्दों से 'व्यवहार करता है' (व्यवहरति) अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: वंशकठिने व्यवहरति = वांशकठिनिकः।

श्लोक 4.73

निकटेवसति

nikaṭevasati

'निकट में रहता है' (निकटे वसति) अर्थ में सप्तमी-अन्त प्रातिपदिक से ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: निकटे वसति = नैकटिकः।

श्लोक 4.74

आवसथात्ष्ठल्

āvasathātṣṭhal

सप्तमीसमर्थ 'आवसथ' शब्द से 'वसति' अर्थ में ष्ठल् प्रत्यय होता है। उदाहरण: आवसथे वसति = आवसथिकः।

श्लोक 4.75

प्राग्घिताद्यत्

prāgghitādyat

'तस्मै हितम्' (5.1.5) सूत्र से पहले तक 'यत्' प्रत्यय का अधिकार चलता है - यह एक नया लघु अधिकार-सूत्र है। उदाहरण: रथ्यः, युग्यः।

श्लोक 4.76

तद्वहति रथयुगप्रासङ्गम्

tadvahati rathayugaprāsaṅgam

'वहन करता है' (वहति) अर्थ में द्वितीयान्त प्रातिपदिक रथ, युग और प्रासङ्ग से 'यत्' (य) प्रत्यय होता है - इसके साथ 'ठक्' का 4.4.1 से चला आया अधिकार समाप्त होता है। उदाहरण: रथं वहति = रथ्यः।

श्लोक 4.77

धुरो यड्ढकौ

dhuro yaḍḍhakau

'वहति' अर्थ में द्वितीयान्त 'धुर' शब्द से यत् और ढक् दोनों प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: धुरं वहति = धौरेयः (ढक्-रूप)।

श्लोक 4.78

खःसर्वधुरात्

khaḥsarvadhurāt

द्वितीयासमर्थ 'सर्वधुरा' शब्द से 'वहति' अर्थ में 'ख' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सर्वधुरं वहति = सर्वधुरीणः।

श्लोक 4.79

एकधुराल्लुक्च

ekadhurāllukca

द्वितीयासमर्थ 'एकधुरा' शब्द से 'वहति' अर्थ में ख प्रत्यय होता है, और उसका लोप भी होता है (विकल्प से)। उदाहरण: एकधुरं वहति = एकधुरीणः/एकधुरः।

श्लोक 4.80

शकटादण्

śakaṭādaṇ

द्वितीयासमर्थ 'शकट' शब्द से 'वहति' अर्थ में अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शकटं वहति = शाकटो गौः।

श्लोक 4.81

हलसीराट्ठक्

halasīrāṭṭhak

द्वितीयासमर्थ हल और सीर शब्दों से 'वहति' अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: हलं वहति = हालिकः।

श्लोक 4.82

संज्ञायां जन्याः

saṁjñāyāṁ janyāḥ

संज्ञा-विषय में द्वितीयासमर्थ 'जनी' (वधू) शब्द से 'वहति' अर्थ में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: जनीं (वधूम्) वहति = जन्या।

श्लोक 4.83

विध्यत्यधनुषा

vidhyatyadhanuṣā

द्वितीयासमर्थ शब्द से 'बेधता है' (विध्यति) अर्थ में यत् प्रत्यय होता है, यदि धनुष् वेधन का साधन (करण) न हो। उदाहरण: पादौ विध्यन्ति = पद्याः शर्कराः।

श्लोक 4.84

धनगणंलब्धा

dhanagaṇaṁlabdhā

द्वितीयासमर्थ धन और गण शब्दों से 'प्राप्त करनेवाला' (लब्धा) अर्थ में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: धनं लभते = धन्यः; गणं लभते = गण्यः।

श्लोक 4.85

अन्नाण्णः

annāṇṇaḥ

द्वितीयासमर्थ 'अन्न' शब्द से 'लब्धा' अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अन्नं लभते = आन्नः।

श्लोक 4.86

वशंगतः

vaśaṁgataḥ

द्वितीयासमर्थ 'वश' शब्द से 'प्राप्त हुआ' (गतः) अर्थ में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: वशं गतः = वश्यः।

श्लोक 4.87

पदमस्मिन् दृश्यम्

padamasmin dṛśyam

'दृश्य' उपाधिवाला प्रथमासमर्थ 'पद' शब्द सप्तम्यर्थ में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: पदम् अस्मिन् दृश्यम् = पद्यः कर्दमः (जिसमें पैरों के निशान दिख सकें, ऐसा दलदल)।

श्लोक 4.88

मूलमस्याबर्हि

mūlamasyābarhi

'आबर्हि' (उखाड़ने योग्य) उपाधिवाले मूल-वाचक शब्द से षष्ठ्यर्थ में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: मूलम् एषाम् आबर्हि = मूल्याः माषाः।

श्लोक 4.89

संज्ञायांधेनुष्या

saṁjñāyāṁdhenuṣyā

संज्ञा-विषय में 'धेनुष्या' यह विशेष रूप (निपातन) है। उदाहरण: धेनु + यत् (+षुक् आगम) = धेनुष्या।

श्लोक 4.90

गृहपतिनासंयुक्तेञ्यः

gṛhapatināsaṁyukteñyaḥ

तृतीयासमर्थ 'गृहपति' शब्द से 'संयुक्त' अर्थ में 'ञ्य' प्रत्यय होता है। उदाहरण: गृहपतिना संयुक्तः अग्निः = गार्हपत्यः अग्निः।

श्लोक 4.91

नौवयोधर्मविषमूलमूलसीतातुलाभ्यस्तार्यतुल्यप्राप्यवध्यानाम्यसमसमितसंमितेषु

nauvayodharmaviṣamūlamūlasītātulābhyastāryatulyaprāpyavadhyānāmyasamasamitasaṁmiteṣu

नौ, वयस्, धर्म, विष, मूल, सीता और तुला शब्दों से क्रमशः तार्य, तुल्य, प्राप्य, वध्य, समान, समित और संमित अर्थों में तृतीयान्त से 'यत्' (य) प्रत्यय होता है। उदाहरण: नावा तार्यम् = नाव्यम्; धर्म → धर्म्यम्; तुला → तुल्यम्।

श्लोक 4.92

धर्मपथ्यर्थन्यायादनपेते

dharmapathyarthanyāyādanapete

पञ्चमीसमर्थ धर्म, पथिन्, अर्थ और न्याय शब्दों से 'अनपेत' (जो इनसे विरत न हो, उचित) अर्थ में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: धर्म्यम्, पथ्यम्, न्याय्यम्।

श्लोक 4.93

छन्दसो निर्मिते

chandaso nirmite

तृतीयासमर्थ 'छन्दस्' शब्द से 'निर्मित' अर्थ में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: छन्दसा निर्मितम् = छान्दस्यम्।

श्लोक 4.94

उरसोऽण् च

uraso'ṇ ca

तृतीयासमर्थ 'उरस्' शब्द से 'निर्मित' अर्थ में अण् और यत् दोनों प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: औरसः/उरस्यः।

श्लोक 4.95

हृदयस्य प्रियः

hṛdayasya priyaḥ

षष्ठ्यन्त 'हृदय' शब्द से 'प्रिय' अर्थ में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: हृदयस्य प्रियः = हृद्यो देशः।

श्लोक 4.96

बन्धनेचषौ

bandhanecaṣau

षष्ठ्यन्त 'हृद्' शब्द से 'बन्धन' अर्थ में यत् प्रत्यय होता है (वशीकारक वेद के अर्थ में)। उदाहरण: हृदः बन्धनम् ऋषिः = हृद्यः।

श्लोक 4.97

मतजनहलात् करणजल्पकर्षेषु

matajanahalāt karaṇajalpakarṣeṣu

षष्ठ्यन्त मत, जन और हल शब्दों से क्रमशः 'करण', 'जल्प' और 'कर्ष' (जोतना) अर्थों में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: मतस्य करणम् = मत्यम्; जनस्य जल्पः = जन्यः; हलस्य कर्षः = हल्यः।

श्लोक 4.98

तत्र साधुः

tatra sādhuḥ

'योग्य/प्रवीण' (साधु) अर्थ में सप्तमी-अन्त प्रातिपदिक से 'यत्' (य) प्रत्यय होता है। उदाहरण: अग्रे साधुः = अग्रयः (आगे रहने में प्रवीण)।

श्लोक 4.99

प्रतिजनादिभ्यःखञ्

pratijanādibhyaḥkhañ

सप्तमीसमर्थ प्रतिजन आदि शब्दों से 'साधु' अर्थ में खञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: प्रतिजने साधुः = प्रतिजनीनः।

श्लोक 4.100

भक्ताण्णः

bhaktāṇṇaḥ

सप्तमीसमर्थ 'भक्त' शब्द से 'साधु' अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है। उदाहरण: भक्ते साधुः = भाक्तः शालिः।

श्लोक 4.101

परिषदोण्यः

pariṣadoṇyaḥ

सप्तमीसमर्थ 'परिषत्' शब्द से 'साधु' अर्थ में ण्य प्रत्यय होता है। उदाहरण: परिषदि साधुः = पारिषद्यः।

श्लोक 4.102

कथादिभ्यष्ठक्

kathādibhyaṣṭhak

सप्तमीसमर्थ कथा आदि शब्दों से 'साधु' अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है। उदाहरण: कथायां साधुः = काथिकः।

श्लोक 4.103

गुडादिभ्यष्ठञ्

guḍādibhyaṣṭhañ

सप्तमीसमर्थ गुड़ आदि शब्दों से 'साधु' अर्थ में ठञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: गुडे साधुः = गौडिकः।

श्लोक 4.104

पथ्यतिथिवसतिस्वपतेर्ढञ्

pathyatithivasatisvapaterḍhañ

सप्तमीसमर्थ पथिन्, अतिथि, वसति और स्वपति शब्दों से 'साधु' अर्थ में ठञ् प्रत्यय होता है। उदाहरण: पथि साधुः = पाथेयम् (यात्रा में उपयोगी)।

श्लोक 4.105

सभायायः

sabhāyāyaḥ

'साधु' अर्थ में सप्तमी-अन्त 'सभा' शब्द से 'य' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सभायां साधुः = सभ्यः (सभा में प्रवीण)।

श्लोक 4.106

ढश्छन्दसि

ḍhaśchandasi

वेद में सप्तमी-अन्त 'सभा' शब्द से 'साधु' अर्थ में 'ढ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सभेयो युवा।

श्लोक 4.107

समानतीर्थेवासी

samānatīrthevāsī

सप्तमीसमर्थ 'समानतीर्थ' शब्द से 'वासी' अर्थ में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: समाने तीर्थे वासी = सतीर्थ्यः (सहपाठी)।

श्लोक 4.108

समानोदरेशयितओचोदात्तः

samānodareśayitaocodāttaḥ

सप्तमीसमर्थ 'समानोदर' शब्द से 'शयति' अर्थ में यत् प्रत्यय होता है, और प्रकृतिगत ओकार उदात्त हो जाता है। उदाहरण: समानोदरे शयितः = समानोदर्यः (सहोदर)।

श्लोक 4.109

सोदराद्यः

sodarādyaḥ

सप्तमीसमर्थ 'सोदर' शब्द से 'शयति' अर्थ में 'य' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सोदर्यो भ्राता (सहोदर भाई)।

श्लोक 4.110

भवेछन्दसि

bhavechandasi

वेद में सप्तमीसमर्थ शब्दों से 'भाव' अर्थ में भी 'य' प्रत्यय होता है। उदाहरण: मेध्याय च विद्युत्याय च नमः।

श्लोक 4.111

पाथोनदीभ्यां ड्यण्

pāthonadībhyāṁ ḍyaṇ

सप्तमीसमर्थ 'पाथस्' और 'नदी' शब्दों से 'भव' अर्थ में 'ड्यण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पाथसि भवः = पाथ्यः; नद्यां भवः = नाद्यः।

श्लोक 4.112

वेशन्तहिमवद्भयामण्

veśantahimavadbhayāmaṇ

सप्तमीसमर्थ वेशन्त और हिमवत् शब्दों से 'भव' अर्थ में अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: वेशन्ते भवः = वैशन्तः।

श्लोक 4.113

स्त्रोतसो विभाषा ड्यड्ड्यौ

strotaso vibhāṣā ḍyaḍḍyau

सप्तमीसमर्थ 'स्रोतस्' शब्द से 'भव' अर्थ में विकल्प से ड्यत् और ड्य प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: स्रोत्यः/स्रोतस्यः।

श्लोक 4.114

सगर्भसयूथसनुताद्यन्

sagarbhasayūthasanutādyan

सप्तमीसमर्थ सगर्भ, सयूथ और सनुत शब्दों से 'भव' अर्थ में 'यन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अनुभ्राता सगर्भ्यः; अनुसखा सयूथ्यः।

श्लोक 4.115

तुग्राद् घन्

tugrād ghan

सप्तमीसमर्थ 'तुग्र' शब्द से 'भव' अर्थ में 'घन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: त्वम् अग्ने वृषभः तुग्रियाणाम्।

श्लोक 4.116

अग्राद्यत्

agrādyat

सप्तमीसमर्थ 'अग्र' शब्द से 'भव' अर्थ में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: अग्रे भवः = अग्रयः।

श्लोक 4.117

घच्छौच

ghacchauca

सप्तमीसमर्थ 'अग्र' शब्द से 'भव' अर्थ में 'घ' और 'छ' प्रत्यय भी होते हैं। उदाहरण: अग्रीयः/अग्रियः।

श्लोक 4.118

समुद्राभ्राद् घः

samudrābhrād ghaḥ

सप्तमीसमर्थ समुद्र और अभ्र शब्दों से 'भव' अर्थ में 'घ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: समुद्रियाणां नदीनाम्; अभ्रियस्य इव घोषः।

श्लोक 4.119

बर्हिषिदत्तम्

barhiṣidattam

सप्तमीसमर्थ 'बर्हिस्' शब्द से 'दत्त' अर्थ में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: बर्हिषि दत्तम् = बर्हिष्यम्।

श्लोक 4.120

दूतस्यभागकर्मणी

dūtasyabhāgakarmaṇī

षष्ठ्यन्त 'दूत' शब्द से 'भाग' और 'कर्म' (कार्य) दोनों अर्थों में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: दूतस्य भागः/कर्म वा = दूत्यम्।

श्लोक 4.121

रक्षोयातूनां हननी

rakṣoyātūnāṁ hananī

षष्ठ्यन्त रक्षस् और यातु शब्दों से स्त्रीलिङ्ग 'हनन-करण' (मारने का साधन) अर्थ में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: रक्षसां हननी = रक्षस्या तनूः।

श्लोक 4.122

रेवतीजगतीहविष्याभ्यःप्रशस्ये

revatījagatīhaviṣyābhyaḥpraśasye

षष्ठ्यन्त रेवती, जगती और हविष्या शब्दों से 'प्रशस्य' (प्रशंसनीय) अर्थ में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: यत् वः रेवती = रेवत्यम्।

श्लोक 4.123

असुरस्य स्वम्

asurasya svam

षष्ठ्यन्त 'असुर' शब्द से 'स्व' (आत्मीय/उससे सम्बद्ध) अर्थ में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: असुर्यं वा एतत् पात्रम्।

श्लोक 4.124

मायायामण्

māyāyāmaṇ

षष्ठ्यन्त 'असुर' शब्द से, माया-रूप 'स्व' अर्थ में, अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: असुरस्य इयम् आसुरी माया।

श्लोक 4.125

तद्वानासामुपधानो मन्त्र इतीष्टकासु लुक्च मतोः

tadvānāsāmupadhāno mantra itīṣṭakāsu lukca matoḥ

मतुप्-अन्त प्रथमासमर्थ प्रातिपदिक से, स्त्रीलिङ्ग षष्ठ्यर्थ में, यत् प्रत्यय होता है, यदि प्रथमासमर्थ (उपधान) मन्त्र-रूप हो और षष्ठ्यर्थ (इष्टका) ईंट-रूप हो; तब प्रकृति के मतुप् का लोप भी होता है। उदाहरण: वर्चस्वान् मन्त्रः → वर्चस्या इष्टकाः।

श्लोक 4.126

अश्विमानण्

aśvimānaṇ

'अश्विमत्' शब्द से उपर्युक्त परिस्थिति में अण् प्रत्यय होता है। उदाहरण: अश्विन् + अण् + ङीप् = आश्विनी।

श्लोक 4.127

वयस्यासुमूर्ध्नोमतुप्

vayasyāsumūrdhnomatup

'वयस्या' (आयु-सम्बद्ध) अभिप्रेत होने पर 'मूर्धन्' शब्द से मतुप् प्रत्यय होता है। उदाहरण: मूर्धन्वत्।

श्लोक 4.128

मत्वर्थेमासतन्वोः

matvarthemāsatanvoḥ

जिस अर्थ में मतुप् विहित है, उसी अर्थ में वेद में मास और तनु के अभिधेय होने पर यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: मासे नभांसि विद्यन्ते → नभस्यो मासः; ओजः अस्यां विद्यते → ओजस्या तनूः।

श्लोक 4.129

मधोर्ञच

madhorñaca

'मधु' शब्द से मतुप्-अर्थ में 'ञ' और 'यत्' दोनों प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: मधु अस्मिन् अस्ति = माधवो मासः/मधव्यः।

श्लोक 4.130

ओजसोऽहनि यत्खौ

ojaso'hani yatkhau

दिन के अभिधेय होने पर 'ओजस्' शब्द से मतुप्-अर्थ में यत् और ख प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: ओजस्यम् अहः/ओजसीनम् अहः।

श्लोक 4.131

वेशोयशआदेर्भगाद्यल्

veśoyaśaāderbhagādyal

वेश:-पूर्वक और यशः-पूर्वक 'भग'-शब्दान्त प्रातिपदिकों से मतुप्-अर्थ में 'यल्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: वेशोभगः विद्यते यस्य = वेशोभग्यः।

श्लोक 4.132

खच

khaca

वेश:-पूर्वक और यशः-पूर्वक 'भग'-शब्दान्त प्रातिपदिकों से 'ख' प्रत्यय भी मतुप्-अर्थ में होता है। उदाहरण: वेशोभगीनः, यशोभगीनः।

श्लोक 4.133

पूर्वैः कृतमिनयौ च

pūrvaiḥ kṛtaminayau ca

तृतीयासमर्थ 'पूर्व' शब्द से 'कृत' अर्थ में इन् और य प्रत्यय होते हैं (तथा ख भी)। उदाहरण: पूर्वैः कृतम् = पूर्विणैः/पूर्व्यैः/पूर्वीणैः।

श्लोक 4.134

अद्भिः संस्कृतम्

adbhiḥ saṁskṛtam

तृतीयासमर्थ 'अप्' (जल) शब्द से 'संस्कृत' अर्थ में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: अद्भिः संस्कृतम् = अप्यं हविः।

श्लोक 4.135

सहस्त्रेणसंमितौघः

sahastreṇasaṁmitaughaḥ

तृतीयासमर्थ 'सहस्र' शब्द से 'तुल्य' (सम्मित) अर्थ में 'घ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सहस्रेण संमितः = सहस्रियः अग्निः।

श्लोक 4.136

मतौच

matauca

मत्वर्थ (धारण करनेवाला) अर्थ में भी तृतीयासमर्थ 'सहस्र' शब्द से 'घ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सहस्रम् अस्य विद्यते = सहस्रियः।

श्लोक 4.137

सोममर्हतियः

somamarhatiyaḥ

द्वितीयासमर्थ 'सोम' शब्द से 'योग्य है' (अर्हति) अर्थ में 'य' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सोमम् अर्हन्ति = सोम्याः ब्राह्मणाः।

श्लोक 4.138

मयेच

mayeca

'सोम' शब्द से 'मयट्' के अर्थ (विकार/अवयव/आगत/प्रकृत) में भी 'य' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सोमस्य विकारः/अवयवो वा = सोम्यः।

श्लोक 4.139

मधोः

madhoḥ

'मधु' शब्द से 'मयट्' के अर्थ में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: मधव्यान् स्तोकान्।

श्लोक 4.140

वसोः समूहे च

vasoḥ samūhe ca

'वसु' शब्द से 'समूह' और 'मयट्' के अर्थों में यत् प्रत्यय होता है। उदाहरण: वसोः समूहः/विकारः/अवयवो वा = वसव्यः।

श्लोक 4.141

नक्षत्राद् घः

nakṣatrād ghaḥ

'नक्षत्र' शब्द से स्वार्थ में 'घ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: नक्षत्राणि एव नक्षत्रियाणि।

श्लोक 4.142

सर्वदेवात्तातिल्

sarvadevāttātil

'सर्व' और 'देव' शब्दों से स्वार्थ में वेद में 'तातिल्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सर्वतातिः, देवतातिः।

श्लोक 4.143

शिवशमरिष्टस्य करे

śivaśamariṣṭasya kare

षष्ठ्यन्त शिव, शम् और अरिष्ट शब्दों से 'करना' (कर) अर्थ में तातिल् प्रत्यय होता है। उदाहरण: शिवं करोति = शिवतातिः।

श्लोक 4.144

भावे च

bhāve ca

'भाव' अर्थ में भी शिव आदि शब्दों से वेद-विषय में तातिल् प्रत्यय होता है - इसी के साथ सम्पूर्ण अष्टाध्यायी का चतुर्थ अध्याय समाप्त होता है। उदाहरण: शिवतातिः, शमतातिः, अरिष्टतातिः।

पञ्चमोऽध्यायः, प्रथमः पादः

श्लोक 1.1

प्राक् क्रीताच्छः ।

prāk krītācchaḥ |

यह एक अधिकार-सूत्र है: यहाँ से लेकर 'तेन क्रीतम्' (5.1.37) तक के सूत्रों में, जब तक कोई विशेष प्रत्यय न बताया जाए, 'इतने में खरीदा हुआ' के अर्थ में डिफ़ॉल्ट रूप से 'छ' (ईय) प्रत्यय होता है। उदाहरण: वत्सेभ्यो हितः → वत्सीयः (वत्स + छ)।

श्लोक 1.2

उगवादिभ्यो यत् ।

ugavādibhyo yat |

'तेन क्रीतम्' के प्राक्कालिक (5.1.1 के अधिकार में आने वाले) अर्थों में, उकारान्त/ऊकारान्त शब्दों से और गवादि-गण में पढ़े गए 'गो' आदि शब्दों से 'यत्' (य) प्रत्यय होता है। उदाहरण: शङ्कु+यत्=शङ्कव्यः, चरु+यत्=चरव्यः, सक्तु+यत्=सक्तव्याः।

श्लोक 1.3

कम्बलाच्च संज्ञायाम् ।

kambalācca saṁjñāyām |

कम्बल शब्द से भी उसी 'खरीदे जाने योग्य' अर्थ में 'यत्' प्रत्यय होता है, जब प्रत्ययान्त शब्द किसी संज्ञा (नाम-विशेष) का बोध कराए। उदाहरण: कम्बल+यत्=कम्बल्य, आगे कम्बल्य+छ=कम्बलीया।

श्लोक 1.4

विभाषा हविरपूपादिभ्यः ।

vibhāṣā havirapūpādibhyaḥ |

हवि-वाचक शब्दों और अपूप आदि शब्दों से विकल्प से (यानी वैकल्पिक रूप से) उसी 'खरीदे जाने योग्य' अर्थ में 'यत्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अपूप+यत्=अपूप्यम्, तण्डुल+यत्=तण्डुल्यम्; इसी सूची में पृथुक, ओदन, सूप, पूप, किण्व, प्रदीप, मुसल, कटक, अर्गल आदि शब्द भी आते हैं।

श्लोक 1.5

तस्मैहितम् ।

tasmaihitam |

'हितम्' (जिसके लिए हितकर हो) अर्थ में चतुर्थी-विभक्ति वाले शब्द से यथोचित प्रत्यय (जैसे छ/ईय, यत्/य आदि) होता है। उदाहरण: वत्सेभ्यो हितः (बछड़ों के लिए हितकर) → वत्सीयः।

श्लोक 1.6

शरीरावयवाद्यत् ।

śarīrāvayavādyat |

'हितम्' अर्थ में, शरीर के किसी अंग को बताने वाले चतुर्थी-विभक्ति शब्द से 'यत्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: दन्तेभ्यो हितम् (दाँतों के लिए हितकर) → दन्त्यम्; इसी तरह गो+यत्=गव्यम्, हविस्+यत्=हविष्यम्।

श्लोक 1.7

खलयवमाषतिलवृषब्रह्मणश्च ।

khalayavamāṣatilavṛṣabrahmaṇaśca |

'उसके लिए हितकर' अर्थ में खल, यव, माष, तिल, वृष और ब्रह्मन् शब्दों से 'यत्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: खल्यम्, यव्यम्, माष्यम्, तिल्यम्, वृष्यम्, रथ्या।

श्लोक 1.8

अजाविभ्यां थ्यन् ।

ajāvibhyāṁ thyan |

अज (बकरी) और अवि (भेड़) शब्दों से 'हितम्' अर्थ में 'थ्यन्' (थ्य) प्रत्यय होता है। उदाहरण: अज+थ्यन्=अजथ्या, अवि+थ्यन्=अविथ्या।

श्लोक 1.9

आत्मन्विश्वजनभोगोत्तरपदात्खः ।

ātmanviśvajanabhogottarapadātkhaḥ |

'हितम्' अर्थ में आत्मन्, विश्वजन और 'भोग' शब्द से अन्त होने वाले (जैसे मातृभोग) चतुर्थी-विभक्ति शब्दों से 'ख' (ईन) प्रत्यय होता है। उदाहरण: विश्वजनेभ्यो हितम् → विश्वजनीनम्; आत्मनीनम्।

श्लोक 1.10

सर्वपुरुषाभ्यांणढञौ ।

sarvapuruṣābhyāṁṇaḍhañau |

सर्व और पुरुष शब्दों से 'उसके लिए हितकर' अर्थ में क्रमशः 'ण' (अ) और 'ढञ्' (एय) प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: सर्वस्मै हितम् → सार्वम्; पुरुष+ढञ्=पौरुषेयम्।

श्लोक 1.11

माणव चरकाभ्यां खञ् ।

māṇava carakābhyāṁ khañ |

माणव और चरक शब्दों से 'उसके लिए हितकर' अर्थ में 'खञ्' (ईन) प्रत्यय होता है। उदाहरण: माणवाय हितम् → माणवीनम्; चारकीणम्।

श्लोक 1.12

तदर्थंविकृतेःप्रकृतौ ।

tadarthaṁvikṛteḥprakṛtau |

जब विकार (परिणाम/उत्पाद) का उपादान-कारण (मूल द्रव्य) कहा जाना हो, तो उस उपादेय-वाचक (विकार-वाचक) शब्द से यथोचित प्रत्यय होता है — यानी 'यह किस चीज़ से बना है' यह बताने के लिए। उदाहरण: अङ्गारेभ्यो हितानि काष्ठानि → अङ्गारीयाणि काष्ठानि; शङ्कव्यं दारु, पिचव्यः कार्पासः।

श्लोक 1.13

छदिरूपधिबलेर्ढञ् ।

chadirūpadhibalerḍhañ |

छदिस् (आवरण), उपधि और बलि शब्दों से उसी 'उत्पाद-हेतु प्रकृति' अर्थ में 'ढञ्' (एय) प्रत्यय होता है। उदाहरण: छदिर्भ्यो हितानि तृणानि → छादिषेणानि तृणानि; औपधेयं दारु; बालेयास्तण्डुलाः।

श्लोक 1.14

ऋषभोपानहोर्ञ्यः ।

ṛṣabhopānahorñyaḥ |

ऋषभ और उपानह् शब्दों से उसी अर्थ में 'ञ्य' (य) प्रत्यय होता है। उदाहरण: ऋषभाय हितम् वत्सः → आर्षभ्यो वत्सः; औपानह्यो मुञ्जः।

श्लोक 1.15

चर्मणोऽञ् ।

carmaṇo'ñ |

चर्म-विकार को बताने वाले शब्द से उसी अर्थ में 'अञ्' (अ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: वरध्राय हितं चर्म → वारध्रं चर्म, वारत्रं चर्म।

श्लोक 1.16

तदस्य तदस्मिन् स्यादिति ।

tadasya tadasmin syāditi |

यह अधिकार-सूत्र है: प्रथमा-विभक्ति वाले शब्द से षष्ठी (संबंध) और सप्तमी (अधिकरण) के अर्थ में यथोचित प्रत्यय तब होते हैं जब वह 'स्यात्' (संभावित/भविष्य में होने वाला) हो। उदाहरण: षष्ठी में — प्राकार आसामिष्टकानां स्यात् → प्राकारीया इष्टकाः; सप्तमी में — प्रकारोऽस्मिन् देशे स्यात् → प्राकारीया भूमिः।

श्लोक 1.17

परिखायाढञ् ।

parikhāyāḍhañ |

परिखा शब्द से उसी 'संभावित होने वाला' अर्थ में 'ढञ्' (एय) प्रत्यय होता है। उदाहरण: परिखा+ढञ्=पारिखेयी।

श्लोक 1.18

प्राग्वतेष्ठञ् ।

prāgvateṣṭhañ |

'तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः' (5.1.115) तक के सूत्रों में डिफ़ॉल्ट प्रत्यय 'ठञ्' (इक) है। उदाहरण: पारायणं वर्तयति → पारायणिकः, तैरायणिकः, चान्द्रायणिकः।

श्लोक 1.19

आर्हादगोपुच्छसंख्यापरिमाणाट्ठक् ।

ārhādagopucchasaṁkhyāparimāṇāṭṭhak |

इससे आगे 'ठक्' प्रत्यय का अधिकार समझना चाहिए, सिवाय गोपुच्छ, संख्या-वाचक और परिमाण-वाचक शब्दों के (उनके लिए अलग नियम आगे आएँगे)।

श्लोक 1.20

असमासे निष्कादिभ्यः ।

asamāse niṣkādibhyaḥ |

निष्क आदि शब्दों से 'इतने में खरीदा हुआ' (आर्हीय) अर्थ में, जब समास न हो, तब 'ठक्' (इक) प्रत्यय होता है। उदाहरण: निष्क+ठक्=नैष्किकम्, पण+ठक्=पाणिकम्, पाद+ठक्=पादिकम्, माष+ठक्=माषिकम्।

श्लोक 1.21

शताच्चठन्यतावशते ।

śatāccaṭhanyatāvaśate |

जब शत से भिन्न कोई और पदार्थ अभिप्रेत हो, तब शत शब्द से उसी 'आर्हीय' अर्थ में 'ठन्' (इक) और 'यत्' (य) दोनों प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: शतेन क्रीतम् → शतिकम्, शत्यम्।

श्लोक 1.22

संख्याया अतिशदन्तायाःकन् ।

saṁkhyāyā atiśadantāyāḥkan |

'अत्यन्त' और 'शत्' से अन्त होने वाले संख्या-वाचक शब्दों से उसी अर्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पञ्चभिः क्रीतः → पञ्चकः, दशकः।

श्लोक 1.23

वतोरिड् वा ।

vatoriḍ vā |

वत्-अन्त (जैसे तावत्, यावत्) संख्या-वाचक शब्दों से विहित 'कन्' प्रत्यय होने पर विकल्प से 'इट्' का आगम होता है। उदाहरण: तावता क्रीतः → तावतिकः/तावत्कः; यावतिकः/यावत्कः।

श्लोक 1.24

विंशतित्रिंशद्भयां ड्वुन्नसंज्ञायाम् ।

viṁśatitriṁśadbhayāṁ ḍvunnasaṁjñāyām |

विंशति और त्रिंशत् शब्दों से उसी 'आर्हीय' अर्थ में, जब कोई संज्ञा (नाम) न बने, तब 'ड्वुन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: विंशत्या क्रीतः → विंशकः, त्रिंशकः।

श्लोक 1.25

कंसाट्टिठन् ।

kaṁsāṭṭiṭhan |

कंस शब्द से, जब संज्ञा न बने, तब उसी अर्थ में 'टिठन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कंस+टिठन्=कंसिकी (स्त्रीलिंग में)।

श्लोक 1.26

शूर्पादञन्यतरस्याम् ।

śūrpādañanyatarasyām |

शूर्प शब्द से विकल्प से 'अञ्' प्रत्यय होता है, और (टिप्पणी के अनुसार) कर्षापण शब्द से 'टिठन्' (इक) प्रत्यय होता है। उदाहरण: शूर्प+टिठक्=शूर्पिकम्।

श्लोक 1.27

शतमानविंशतिकसहस्त्रवसनादण् ।

śatamānaviṁśatikasahastravasanādaṇ |

शतमान, विंशतिक, सहस्र और वसन शब्दों से उसी 'आर्हीय' अर्थ में 'अण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शतमानेन क्रीतम् → शातमानम्; वैंशतिकम्, साहस्रम्, वासनम्।

श्लोक 1.28

अध्यर्धपूर्वद्विगोर्लुगसंज्ञायाम् ।

adhyardhapūrvadvigorlugasaṁjñāyām |

अध्यर्ध (डेढ़) से पहले वाले और द्विगु समास से बने प्रातिपदिकों से विहित 'आर्हीय' प्रत्ययों का लोप होता है, जब कोई संज्ञा न बने। उदाहरण: अध्यर्धेन कंसेन क्रीतम् → अध्यर्धकंसम्; द्वाभ्यां कंसाभ्याम् → द्विकंसम्, त्रिकंसम्।

श्लोक 1.29

विभाषा कार्षापणसहस्त्राभ्याम् ।

vibhāṣā kārṣāpaṇasahastrābhyām |

अध्यर्ध-कार्षापण, अध्यर्ध-सहस्र शब्दों से और कार्षापण/सहस्र-अन्त द्विगु से विहित 'आर्हीय' प्रत्यय का विकल्प से लोप होता है। उदाहरण: अध्यर्धकार्षापणम्/अध्यर्धकार्षापणिकम्; द्विसहस्रम्/द्विसाहस्रम्।

श्लोक 1.30

द्वित्रिपूर्वान्निष्कात् ।

dvitripūrvānniṣkāt |

द्वि- और त्रि-पूर्वक निष्क-अन्त द्विगु से विहित प्रत्यय का विकल्प से लोप होता है। उदाहरण: द्विनिष्कम्/द्विनैष्किकम्; त्रिनिष्कम्/त्रिनैष्किकम्।

श्लोक 1.31

बिस्ताच्च ।

bistācca |

उसी तरह द्वि- त्रि-पूर्वक बिस्त-अन्त द्विगु से भी विकल्प से लोप होता है। उदाहरण: द्विबिस्तम्/द्विबैस्तिकम्; बहुबिस्तम्/बहुबैस्तिकम्।

श्लोक 1.32

विंशतिकात्खः ।

viṁśatikātkhaḥ |

अध्यर्ध-विंशतिक और विंशति-अन्त द्विगु से उसी अर्थ में 'ख' (ईन) प्रत्यय होता है। उदाहरण: अध्यर्धविंशतिकीनम्, द्विविंशतिकीनम्।

श्लोक 1.33

खार्या ईकन् ।

khāryā īkan |

अध्यर्ध-खारी और खारी-अन्त द्विगु से 'ईकन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अध्यर्धखारी+ईकन्=अध्यर्धखारिकम्; खारी+ईकन्=खारिकम्।

श्लोक 1.34

पणपादमाषशताद्यत् ।

paṇapādamāṣaśatādyat |

अध्यर्ध-पूर्वक पण, पाद, माष, शत शब्दों से और इन्हीं शब्दों से अन्त होने वाले द्विगु से उसी अर्थ में 'यत्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अध्यर्धपण्यम्, द्विपण्यम्, अध्यर्धमाष्यम्, द्विशत्यम्।

श्लोक 1.35

शाणाद्वा ।

śāṇādvā |

अध्यर्ध-शाण और शाण-अन्त द्विगु से उसी अर्थ में 'अण्' और विकल्प से 'यत्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: अध्यर्धशाण्यम्/अध्यर्धशाणम्; द्विशाण्यम्/द्विशाणम्।

श्लोक 1.36

द्वित्रिपूर्वादण्च ।

dvitripūrvādaṇca |

द्वि- और त्रि-पूर्वक शाण-अन्त द्विगु से भी उसी तरह 'अण्' और विकल्प से 'यत्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: त्रिशाण्यम्/त्रिशाणम्।

श्लोक 1.37

तेनक्रीतम् ।

tenakrītam |

यह पूरे प्राक्कीतीय प्रकरण का मूल सूत्र है: 'खरीदा गया' अर्थ में तृतीया-विभक्ति वाले शब्द से यथोचित प्रत्यय होता है। उदाहरण: सप्तत्या क्रीतम् (सत्तर में खरीदा हुआ) → साप्तिकम्।

श्लोक 1.38

तस्यनिमित्तंसंयोगोत्पातौ ।

tasyanimittaṁsaṁyogotpātau |

षष्ठी-विभक्ति वाले शब्द से 'उसका निमित्त' अर्थ में — चाहे वह संयोग (संयोग-जनित घटना) हो या उत्पात (अपशकुन) — यथोचित प्रत्यय होता है। उदाहरण: शतस्य निमित्तं संयोगः/उत्पातः → शत्यः, शतिकः, साहस्रः।

श्लोक 1.39

गोद्वयचोऽसंख्यापरिमाणाश्वादेर्यत् ।

godvayaco'saṁkhyāparimāṇāśvāderyat |

उसी 'निमित्त' अर्थ में षष्ठी-विभक्ति वाले गो शब्द से, और संख्या-वाचक, परिमाण-वाचक तथा अश्व-आदि से भिन्न दो-अक्षर वाले शब्दों से 'यत्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: गोर्निमित्तम् → गव्यः; धन्यम्, स्वर्ग्यम्, यशस्यम्।

श्लोक 1.40

पुत्राच्छच ।

putrācchaca |

उसी 'निमित्त' अर्थ में पुत्र शब्द से विकल्प से 'छ' और 'यत्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: पुत्रस्य निमित्तम् → पुत्रीयः/पुत्र्यः।

श्लोक 1.41

सर्वभूमिपृथिवीभ्यामणञौ ।

sarvabhūmipṛthivībhyāmaṇañau |

उसी अर्थ में सर्वभूमि और पृथिवी शब्दों से क्रमशः 'अण्' और 'अञ्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: सर्वभूमेर्निमित्तम् → सार्वभौमः; पृथिव्याः → पार्थिवः।

श्लोक 1.42

तस्येश्वरः ।

tasyeśvaraḥ |

षष्ठी-विभक्ति वाले सर्वभूमि और पृथिवी शब्दों से 'ईश्वरः' (स्वामी) अर्थ में भी वही क्रमशः 'अण्'/'अञ्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: पृथिव्या ईश्वरः → पार्थिवः।

श्लोक 1.43

तत्र विदित इति च ।

tatra vidita iti ca |

सप्तमी-विभक्ति वाले सर्वभूमि और पृथिवी शब्दों से 'वहाँ प्रसिद्ध' (विदित) अर्थ में भी क्रमशः वही 'अण्'/'अञ्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: सर्वभूमौ विदितः → सार्वभौमः; पृथिव्यां विदितः → पार्थिवः।

श्लोक 1.44

लोकसर्वलोकाट्ठञ् ।

lokasarvalokāṭṭhañ |

सप्तमी-विभक्ति वाले लोक और सर्वलोक शब्दों से 'विदित' अर्थ में 'ढञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: लोके विदितः → लौकिकः; सर्वलोके विदितः → सार्वलौकिकः।

श्लोक 1.45

तस्यवापः ।

tasyavāpaḥ |

षष्ठी-विभक्ति वाले शब्द से 'वाप' (जोता हुआ खेत) अर्थ में यथोचित प्रत्यय होता है। उदाहरण: प्रस्थस्य वापः क्षेत्रम् → प्रास्थिकम्; द्रौणिकम्, खारीकम्।

श्लोक 1.46

पात्रात्ष्ठन् ।

pātrātṣṭhan |

षष्ठी-विभक्ति वाले पात्र शब्द से उसी 'वाप' अर्थ में 'ष्ठन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पात्रस्य वापः → पात्रिकं क्षेत्रम्।

श्लोक 1.47

तदस्मिन्वृद्धयायलाभशुल्कोपदादीयते ।

tadasminvṛddhayāyalābhaśulkopadādīyate |

जिस पदार्थ में वृद्धि, आय, लाभ, शुल्क अथवा उपदा (रिश्वत) के रूप में कुछ दिया जाता हो, उसके प्रथमा-विभक्ति वाले वाचक शब्द से सप्तम्यर्थ में यथोचित प्रत्यय होता है। उदाहरण: पञ्चास्मिन् वृद्धिर्वा दीयते → पञ्चकः, शत्यः, साहस्रः।

श्लोक 1.48

पूरणार्धाट्ठन् ।

pūraṇārdhāṭṭhan |

उसी अर्थ में पूरण-वाचक (क्रम-सूचक) शब्दों और 'अर्ध' शब्द से 'ठन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्वितीयो वृद्धिर्दीयते अस्मिन् → द्वितीयिकः, पञ्चमिकः; आर्द्धिकः।

श्लोक 1.49

भागाद्यच्च ।

bhāgādyacca |

उसी अर्थ में भाग शब्द से 'यत्' और वैकल्पिक 'ठन्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: भागो वृद्धयादिर्दीयते अस्मिन् → भाग्यम्, भागिकम्।

श्लोक 1.50

तद्धरतिवहत्यावहतिभाराद्वंशादिभ्यः ।

taddharativahatyāvahatibhārādvaṁśādibhyaḥ |

'हरति/वहति/आवहति' (ढोता है/लाता है) अर्थ में द्वितीया-विभक्ति वाले भार-अन्त शब्द से, और वंश आदि शब्दों से (जो स्वयं भार-रूप हों) यथोचित प्रत्यय होता है। उदाहरण: इक्षुभारिकः, कोटजभारिकः, बाल्वजभारिकः।

श्लोक 1.51

वस्नद्रव्याभ्यां ठन् कनौ ।

vasnadravyābhyāṁ ṭhan kanau |

द्वितीया-विभक्ति वाले वस्न (मूल्य) और द्रव्य शब्दों से क्रमशः 'ठन्' और 'कन्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: वस्नं हरति → वस्निकः; द्रव्यकः।

श्लोक 1.52

संभवत्यवहरति पचति ।

saṁbhavatyavaharati pacati |

द्वितीया-विभक्ति वाले शब्द से 'सम्भवति' (उत्पन्न होता है), 'अवहरति' (उपसंहार करता है) और 'पचति' (पकाता है) अर्थों में यथोचित प्रत्यय होता है। उदाहरण: प्रस्थ+ठञ्=प्रास्थिकम्, खारी+ईकन्=खारीकः।

श्लोक 1.53

आढकाचितपात्रात् खोऽन्यतरस्याम् ।

āḍhakācitapātrāt kho'nyatarasyām |

उन्हीं अर्थों में आढक, आचित और पात्र शब्दों से विकल्प से 'ख' (ईन) प्रत्यय होता है। उदाहरण: आढक+ख=आढकीना, आचित+ख=आचितीना, पात्र+ख=पात्रीणा।

श्लोक 1.54

द्विगोःष्ठंश्च ।

dvigoḥṣṭhaṁśca |

आढक, आचित और पात्र शब्दों से बने द्विगु समास से उन्हीं अर्थों में 'ष्ठन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्व्याढक+ष्ठन्+ङीष्=द्व्याढकिकी।

श्लोक 1.55

कुलिजाल्लुक्खौच ।

kulijāllukkhauca |

कुलिज-अन्त द्विगु से उन्हीं अर्थों में विकल्प से 'ठञ्' और 'ख' प्रत्यय होते हैं, और इन दोनों का लोप भी होता है। उदाहरण: द्विकुलिजी (लोप-पक्ष), द्विकुलिजीना (ख-पक्ष), द्विकुलिजिकी (ठञ्-पक्ष)।

श्लोक 1.56

सोऽस्यांशवस्नभृतयः ।

so'syāṁśavasnabhṛtayaḥ |

अंश-वाचक, मूल्य-वाचक (वस्न) और वेतन-वाचक (भृति) प्रथमा-विभक्ति शब्दों से षष्ठी-अर्थ में यथोचित प्रत्यय होता है। उदाहरण: पञ्च अंशो वस्नो भृतिर्वाऽस्य → पञ्चकः, साहस्रः।

श्लोक 1.57

तदस्यपरिमाणम् ।

tadasyaparimāṇam |

'परिमाण' (नाप) को बताने वाले प्रथमा-विभक्ति शब्द से षष्ठी-अर्थ में यथोचित प्रत्यय होता है। उदाहरण: प्रस्थः परिमाणमस्य → प्रस्थिको राशिः; खारीकः, शत्यः, द्रौणिकः, कौडविकः।

श्लोक 1.58

संख्यायाः संज्ञासङ्घसूत्राध्ययनेषु ।

saṁkhyāyāḥ saṁjñāsaṅghasūtrādhyayaneṣu |

परिमाण-सूचक संख्या-वाचक प्रथमा-विभक्ति शब्दों से, जब वह किसी संज्ञा, समूह, सूत्र-ग्रन्थ या अध्ययन-विषय का वाचक हो, तब षष्ठी-अर्थ में यथोचित प्रत्यय होता है। उदाहरण: अष्टकः सङ्घः; अष्टावध्यायाः परिमाणमस्य सूत्रस्य → अष्टकम्।

श्लोक 1.59

पंक्तिविंशतित्रिंशच्चत्वारिंशत्पञ्चाशत्षष्टिसप्तत्यशीतिनवतिशतम् ।

paṁktiviṁśatitriṁśaccatvāriṁśatpañcāśatṣaṣṭisaptatyaśītinavatiśatam |

पङ्क्ति, विंशति, त्रिंशत्, चत्वारिंशत्, पञ्चाशत्, षष्टि, सप्तति, अशीति, नवति और शत — ये शब्द-रूप निपातन (अनियमित रूप से सिद्ध) से बनते हैं। उदाहरण: अशीति (अस्सी) निपातन से सिद्ध होता है।

श्लोक 1.60

पञ्चद्दशतौवर्गेवा ।

pañcaddaśatauvargevā |

वर्ग (समूह) के अर्थ में परिमाण-सूचक पञ्चन् और दशन् शब्दों से पञ्चत् और दशत् रूपों का निपातन होता है, विकल्प से। उदाहरण: पञ्च परिमाणमस्य → पञ्चद् वर्गः/पञ्चको वर्गः; दशद् वर्गः/दशको वर्गः।

श्लोक 1.61

सप्तनोऽञ् छन्दसि ।

saptano'ñ chandasi |

उसी 'वर्ग' अर्थ में सप्तन् शब्द से छन्दस् (वैदिक भाषा) में 'अञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सप्त → साप्तानि।

श्लोक 1.62

त्रिंशच्चत्वारिंशतोर्ब्राह्मणेसंज्ञायांडण् ।

triṁśaccatvāriṁśatorbrāhmaṇesaṁjñāyāṁḍaṇ |

'ब्राह्मण' नामक वेद-भाग की संज्ञा के अर्थ में परिमाण-सूचक त्रिंशत् और चत्वारिंशत् शब्दों से 'डण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: त्रिंशदध्यायाः परिमाणमेषां ब्राह्मणानाम् → त्रैंशानि ब्राह्मणानि; चात्वारिंशानि ब्राह्मणानि।

श्लोक 1.63

तदर्हति ।

tadarhati |

द्वितीया-विभक्ति वाले शब्द से 'अर्हति' (उसके योग्य होता है/उसे पाने योग्य है) अर्थ में यथोचित प्रत्यय होता है। उदाहरण: श्वेतच्छत्रमर्हति → श्वैतच्छत्रिकः।

श्लोक 1.64

छेदादिभ्योनित्यम् ।

chedādibhyonityam |

द्वितीया-विभक्ति वाले छेद आदि शब्दों से 'सदा योग्य है' (नित्यमर्हति) अर्थ में 'ठक्' (इक) प्रत्यय होता है। उदाहरण: छेद+ठक्=छैदिकः, भेद+ठक्=भैदिकः, द्रोह+ठक्=द्रौहिकः।

श्लोक 1.65

शीर्षच्छेदाद्यच्च ।

śīrṣacchedādyacca |

द्वितीया-विभक्ति वाले शीर्षच्छेद शब्द से उसी 'नित्यमर्हति' अर्थ में 'यत्' और यथोचित प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: शिरश्छेदं नित्यमर्हति → शीर्षच्छेद्यः/शैर्षच्छेदिकः।

श्लोक 1.66

दण्डादिभ्योः यः ।

daṇḍādibhyoḥ yaḥ |

'अर्हति' अर्थ में दण्ड-आदि-गण में पढ़े गए द्वितीया-विभक्ति के दण्ड आदि शब्दों से 'यत्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: दण्डमर्हति → दण्ड्यः; मुसल्यः, मेघ्यः, उदक्यः।

श्लोक 1.67

छन्दसि च ।

chandasi ca |

छन्दस् (वेद) में मात्र किसी भी द्वितीया-विभक्ति शब्द से 'अर्हति' अर्थ में 'यत्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: उदक+यत्=उदक्याः, यूप+यत्=यूप्यः।

श्लोक 1.68

पात्राद् घंश्च ।

pātrād ghaṁśca |

द्वितीया-विभक्ति वाले पात्र शब्द से 'अर्हति' अर्थ में विकल्प से 'घन्' और 'यत्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: पात्र+घन्=पात्रियः; पात्र+यत्=पात्र्यः।

श्लोक 1.69

कडङ्करदक्षिणाच्छ च ।

kaḍaṅkaradakṣiṇāccha ca |

द्वितीया-विभक्ति वाले कडङ्कर और दक्षिणा शब्दों से उसी अर्थ में विकल्प से 'छ' और 'यत्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: कडङ्कर+छ=कडङ्करीयः/कडङ्कर+यत्=कडङ्कर्यः; दक्षिणीयः/दक्षिण्यः।

श्लोक 1.70

स्थालीबिलात् ।

sthālībilāt |

द्वितीया-विभक्ति वाले स्थालीबिल शब्द से भी उसी अर्थ में विकल्प से 'छ' और 'यत्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: स्थालीबिलमर्हन्ति तण्डुलाः → स्थालीबिलीयास्तण्डुलाः/स्थालीबिल्याः।

श्लोक 1.71

यज्ञर्त्विग्भ्यांघखञौ ।

yajñartvigbhyāṁghakhañau |

द्वितीया-विभक्ति वाले यज्ञ और ऋत्विक् शब्दों से उसी 'अर्हति' अर्थ में क्रमशः 'घ' और 'खञ्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: यज्ञ+घ=यज्ञ्यः; ऋत्विज्+खञ्=ऋत्विजीनः।

श्लोक 1.72

पारायणतुरायणचान्द्रायणंवर्तयति ।

pārāyaṇaturāyaṇacāndrāyaṇaṁvartayati |

द्वितीया-विभक्ति वाले पारायण, तुरायण और चान्द्रायण शब्दों से 'वर्तयति' (उसका सम्पादन करता है) अर्थ में 'ठन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पारायणं वर्तयति → पारायणिकश्छात्रः; चान्द्रायणिकस्तपस्वी।

श्लोक 1.73

संशयमापन्नः ।

saṁśayamāpannaḥ |

द्वितीया-विभक्ति वाले संशय शब्द से 'आपन्नः' (उसमें पड़ा हुआ) अर्थ में 'ठञ्' (इक) प्रत्यय होता है। उदाहरण: संशय+ठञ्=साांशयिकः।

श्लोक 1.74

योजनं गच्छति ।

yojanaṁ gacchati |

द्वितीया-विभक्ति वाले योजन शब्द से 'गच्छति' (उतनी दूर जाता है) अर्थ में 'ठञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: योजनं गच्छति → यौजनिकः।

श्लोक 1.75

पथःष्कन् ।

pathaḥṣkan |

द्वितीया-विभक्ति वाले पथिन् शब्द से 'गच्छति' अर्थ में 'ष्कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पन्थानं गच्छति → पथिकः (स्त्रीलिंग में पथिकी)।

श्लोक 1.76

पन्थोणनित्यम् ।

panthoṇanityam |

द्वितीया-विभक्ति वाले पथिन् शब्द से 'सदा जाता है' (नित्यं गच्छति) अर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है, और पथिन् को 'पन्थ' आदेश होता है। उदाहरण: पन्थानं नित्यं गच्छति → पान्थो भिक्षां याचते।

श्लोक 1.77

उत्तरपथेनाहृतं च ।

uttarapathenāhṛtaṁ ca |

तृतीया-विभक्ति वाले उत्तरपथ शब्द से 'आहृतम्' (लाया गया) और 'गच्छति' अर्थों में 'ठञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: उत्तरपथेनाहृतम् → औत्तरपथिकम्; उत्तरपथेन गच्छति → औत्तरपथिकः।

श्लोक 1.78

कालात् ।

kālāt |

यह अधिकार-सूत्र है: यहाँ से आगे बताए जाने वाले प्रत्यय काल-वाचक शब्दों से ही समझने चाहिए। उदाहरण: मासेन निर्वृत्तम् → मासिकम्, आर्द्धमासिकम्, सांवत्सरिकम्।

श्लोक 1.79

तेननिर्वृत्तम् ।

tenanirvṛttam |

तृतीया-विभक्ति वाले काल-वाचक शब्द से 'निर्वृत्तम्' (उस समय में सिद्ध/तैयार हुआ) अर्थ में 'ठञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अह्ना निर्वृत्तम् (एक दिन में तैयार हुआ) → आहनिकम्।

श्लोक 1.80

तमधीष्टोभृतोभूतोभावी ।

tamadhīṣṭobhṛtobhūtobhāvī |

द्वितीया-विभक्ति वाले काल-वाचक शब्दों से 'अधीष्ट' (आदरपूर्वक नियुक्त), 'भृत' (वेतन पर लिया), 'भूत' (हो चुका) और 'भावी' (होने वाला) अर्थों में यथोचित प्रत्यय होता है। उदाहरण: मासमधीष्टः → मासिकोऽध्यापकः; मासं भृतः → मासिकः कर्मकरः।

श्लोक 1.81

मासाद् वयसि यत्खञौ ।

māsād vayasi yatkhañau |

द्वितीया-विभक्ति वाले मास शब्द से 'वयस्' (आयु/अवस्था) अर्थ में विकल्प से 'यत्' और 'खञ्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: मासं भूतः शिशुः → मास्यः/मासीनः।

श्लोक 1.82

द्विगोर्यप् ।

dvigoryap |

मास-अन्त द्विगु से 'बीता हुआ वयस्' अर्थ में 'यप्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: षण्मास+यत्=षण्मास्यः।

श्लोक 1.83

षण्मासाण्ण्यच्च ।

ṣaṇmāsāṇṇyacca |

षण्मास शब्द से 'वयस्' अर्थ में विकल्प से 'ण्यत्' और 'यप्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: षण्मास+ण्यत्=षाण्मास्यः; षण्मास+यप्=षण्मास्यः।

श्लोक 1.84

अवयसिठंश्च ।

avayasiṭhaṁśca |

'वयस्' से भिन्न अर्थ में षण्मास शब्द से 'ठन्' और विकल्प से 'ण्यत्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: षण्मास+ठक्=षाण्मासिकः; षण्मास+यत्=षाण्मास्यः।

श्लोक 1.85

समायाःखः ।

samāyāḥkhaḥ |

द्वितीया-विभक्ति वाले समा (वर्ष) शब्द से पूर्वोक्त चार अर्थों (अधीष्ट, भृत, भूत, भावी) में 'ख' प्रत्यय होता है। उदाहरण: समामधीष्टः/भृतः/भूतः/भावी → समीनः।

श्लोक 1.86

द्विगोर्वा ।

dvigorvā |

समा-अन्त द्विगु से उन पाँच अर्थों (निर्वृत्त सहित) में विकल्प से 'ख' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्वे समे अधीष्टः → द्विसमीनः/द्वैसमिकः।

श्लोक 1.87

रात्र्यहःसंवत्सराच्च ।

rātryahaḥsaṁvatsarācca |

रात्रि-, अहन्- और संवत्सर-अन्त द्विगु से भी उन पाँच अर्थों में विकल्प से 'ख' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्विरात्रीणः/द्वैरात्रिकः; द्व्यहीनः/द्वैयह्निकः; द्विसंवत्सरीणः/द्विसांवत्सरिकः।

श्लोक 1.88

वर्षाल्लुक्च ।

varṣāllukca |

वर्ष-अन्त द्विगु से उन पाँच अर्थों में विकल्प से 'ख' और 'ठञ्' प्रत्यय होते हैं, और दोनों का विकल्प से लोप भी। उदाहरण: द्विवर्षीणः/द्विवार्षिकः/द्विवर्षः।

श्लोक 1.89

चित्तवतिनित्यम् ।

cittavatinityam |

उपर्युक्त वर्ष-अन्त द्विगु से विहित प्रत्यय का लोप अनिवार्य रूप से होता है, यदि प्रत्ययान्त शब्द किसी सजीव प्राणी का वाचक हो। उदाहरण: द्विवर्षो दारकः (दो साल का बच्चा)।

श्लोक 1.90

षष्टिकाःषष्टिरात्रेणपच्यन्ते ।

ṣaṣṭikāḥṣaṣṭirātreṇapacyante |

तृतीया-विभक्ति वाले षष्टिरात्र शब्द से 'पच्यन्ते' (पकाए जाते हैं) अर्थ में 'कन्' प्रत्यय और 'रात्र' शब्द का लोप निपातन से होता है। उदाहरण: षष्टिरात्रेण पच्यन्ते → षष्टिकाः (साठ रातों में पकने वाले चावल)।

श्लोक 1.91

वत्सरान्ताच्छश्छन्दसि ।

vatsarāntācchaśchandasi |

वत्सर-अन्त प्रातिपदिकों से उन पाँच अर्थों में छन्दस् (वेद) में 'छ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: इद्वत्सरीयः, इदावत्सरीयः।

श्लोक 1.92

संपरिपूर्वात्खच ।

saṁparipūrvātkhaca |

सम्- और परि-पूर्वक वत्सर-अन्त प्रातिपदिकों से उन अर्थों में छन्दस् में विकल्प से 'ख' और 'छ' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: संवत्सरीणः/संवत्सरीयः; परिवत्सरीणः/परिवत्सरीयः।

श्लोक 1.93

तेनपरिजय्यलभ्यकार्यसुकरम् ।

tenaparijayyalabhyakāryasukaram |

तृतीया-विभक्ति वाले काल-वाचक शब्दों से 'परिजय्य' (जीतने योग्य), 'लभ्य' (पाने योग्य), 'कार्य' और 'सुकर' (आसानी से होने वाला) अर्थों में 'ठञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: मासेन परिजय्यः → मासिको व्याधिः; मासेन कार्यम् → मासिकं चान्द्रायणम्।

श्लोक 1.94

तदस्यब्रह्मचर्यम् ।

tadasyabrahmacaryam |

द्वितीया-विभक्ति वाले काल-वाचक शब्द से षष्ठी-अर्थ में 'ठञ्' प्रत्यय होता है, जब 'ब्रह्मचर्य' (उस अवधि का व्रत) अभिप्रेत हो। उदाहरण: मासोऽस्य ब्रह्मचर्यस्य → मासिकं ब्रह्मचर्यम्।

श्लोक 1.95

तस्य च दक्षिणा यज्ञाख्येभ्यः ।

tasya ca dakṣiṇā yajñākhyebhyaḥ |

यज्ञ-वाचक षष्ठी-विभक्ति शब्दों से 'दक्षिणा' (यज्ञ की भेंट) अर्थ में 'ठञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अग्निष्टोमस्य दक्षिणा → आग्निष्टोमिकी, वाजपेयिकी, राजसूयिकी।

श्लोक 1.96

तत्रचदीयतेकार्यंभववत् ।

tatracadīyatekāryaṁbhavavat |

सप्तमी-विभक्ति वाले शब्द से 'दीयते' (उसमें दिया जाता है) और 'कार्यम्' (उसमें करना है) अर्थों में उसी तरह प्रत्यय होते हैं जैसे 'भव' (उसमें होने वाला) अर्थ में होते हैं। उदाहरण: मासे दीयते कार्यं वा → मासिकम्, सांवत्सरिकम्; प्रावृषि दीयते कार्यं वा → प्रावृषेण्यम्।

श्लोक 1.97

व्युष्टादिभ्योऽण् ।

vyuṣṭādibhyo'ṇ |

सप्तमी-विभक्ति वाले व्युष्ट आदि शब्दों से उन्हीं 'दीयते'/'कार्यम्' अर्थों में 'अण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: व्युष्ट+अण्=वैयुष्टम्; नित्य+अण्=नैत्यम्।

श्लोक 1.98

तेनयथाकथाचहस्ताभ्यांणयतौ ।

tenayathākathācahastābhyāṁṇayatau |

तृतीया-विभक्ति वाले यथाकथाच और हस्त शब्दों से उन्हीं अर्थों में क्रमशः 'ण' और 'यत्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: यथाकथाच दीयते कार्यं वा → याथाकथाचम्; हस्तेन → हस्त्यम्।

श्लोक 1.99

संपादिनि ।

saṁpādini |

तृतीया-विभक्ति वाले शब्द से 'गुण को सम्पन्न करने वाला' (सम्पादि) अर्थ में 'ठञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कर्णवेष्टकाभ्यां सम्पादि मुखम् → कार्णवेष्टाकिकं मुखम्।

श्लोक 1.100

कर्मवेषाद्यत् ।

karmaveṣādyat |

तृतीया-विभक्ति वाले कर्मन् और वेष शब्दों से उसी 'गुण-सम्पादक' अर्थ में 'यत्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कर्मणा सम्पद्यते → कर्मण्यं शरीरम्; वेषेण सम्पद्यते → वेष्यो नटः।

श्लोक 1.101

तस्मैप्रभवतिसंतापादिभ्यः ।

tasmaiprabhavatisaṁtāpādibhyaḥ |

चतुर्थी-विभक्ति वाले संताप आदि शब्दों से 'उसके लिए समर्थ होता है' (तस्मै प्रभवति) अर्थ में 'ठञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: संतापाय प्रभवति → सांतापिकः, सान्नाहिकः।

श्लोक 1.102

योगाद्यच्च ।

yogādyacca |

चतुर्थी-विभक्ति वाले योग शब्द से उसी 'प्रभवति' अर्थ में 'यत्' और 'ठञ्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: योग+यत्=योग्यः; योग+ठञ्=यौगिकः।

श्लोक 1.103

कर्मणउकञ् ।

karmaṇaukañ |

चतुर्थी-विभक्ति वाले कर्मन् शब्द से उसी अर्थ में 'उकञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कर्मन्+उकञ्=कार्मुकः (धनुष)।

श्लोक 1.104

समयस्तदस्यप्राप्तम् ।

samayastadasyaprāptam |

'समय आ पहुँचा है' अर्थ के समय-वाचक प्रथमा-विभक्ति समय शब्द से षष्ठी-अर्थ में 'ठञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: समयः प्राप्तोऽस्य → सामयिकं कार्यम्।

श्लोक 1.105

ऋतोरण् ।

ṛtoraṇ |

प्रथमा-विभक्ति वाले 'समय आ पहुँचा' अर्थ के ऋतु शब्द से षष्ठी-अर्थ में 'अण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: ऋतुः प्राप्तोऽस्य → आर्तवं पुष्पम्।

श्लोक 1.106

छन्दसिघस् ।

chandasighas |

छन्दस् (वेद) में ऋतु शब्द से उसी अर्थ में 'घस्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अयं ते योनिरऋत्वियः।

श्लोक 1.107

कालाद्यत् ।

kālādyat |

'समय आ पहुँचा' अर्थ के प्रथमा-विभक्ति काल शब्द से षष्ठी-अर्थ में 'यत्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: काल+यत्=काल्यम्।

श्लोक 1.108

प्रकृष्टेठञ् ।

prakṛṣṭeṭhañ |

'प्रकृष्ट' (दीर्घ/बड़ा) अर्थ में प्रथमा-विभक्ति काल शब्द से षष्ठी-अर्थ में 'ठञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: प्रकृष्टो दीर्घः कालोऽस्य → कालिकमृणम्, कालिकं वैरम्।

श्लोक 1.109

प्रयोजनम् ।

prayojanam |

'प्रयोजन' के स्थान पर आने वाले प्रथमा-विभक्ति शब्द से षष्ठी-अर्थ में 'ठञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: धर्म+ठञ्=धार्मिकः, परीक्षक+ठञ्=पारीक्षकः।

श्लोक 1.110

विशाखाषाढादण्मन्थदण्डयोः ।

viśākhāṣāḍhādaṇmanthadaṇḍayoḥ |

'प्रयोजन'-वाचक प्रथमा-विभक्ति विशाखा और आषाढा शब्दों से 'अण्' प्रत्यय होता है, यदि प्रत्ययान्त शब्द क्रमशः मन्थ और दण्ड का वाचक हो। उदाहरण: विशाखा प्रयोजनमस्य मन्थस्य → वैशाखो मन्थः; आषाढो दण्डः।

श्लोक 1.111

अनुप्रवचनादिभ्यश्छः ।

anupravacanādibhyaśchaḥ |

'प्रयोजन'-वाचक प्रथमा-विभक्ति अनुप्रवचन आदि शब्दों से षष्ठी-अर्थ में 'छ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अनुप्रवचन+छ=अनुप्रवचनीयम्; उत्थापनीयम्, उपस्थानीयम्, अनुवासनीयम्।

श्लोक 1.112

समापनात् सपूर्वपदात् ।

samāpanāt sapūrvapadāt |

पूर्वपद-युक्त 'समापन' शब्द से (प्रयोजन-वाचक होने पर) षष्ठी-अर्थ में 'छ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: छन्दःसमापनं प्रयोजनमस्य → छन्दःसमापनीयम्, व्याकरणसमापनीयम्।

श्लोक 1.113

ऐकागारिकट् चौरे ।

aikāgārikaṭ caure |

जब 'चोर' अभिप्रेत हो, तब प्रयोजन-वाचक 'एकागार' शब्द के स्थान पर 'ऐकागारिकट्' शब्द निपातन से सिद्ध होता है। उदाहरण: एकागारं प्रयोजनमस्य → ऐकागारिकः चौरः (जो अकेले घर में चोरी करे)।

श्लोक 1.114

आकालिकडाद्यन्तवचने ।

ākālikaḍādyantavacane |

'उत्पत्ति', 'विनाश' और 'भय' के अर्थ में समय-वाचक काल शब्द के स्थान पर 'आकाल' आदेश होता है, और उससे 'इकट्' प्रत्यय निपातन से सिद्ध होता है। (इस सूत्र का स्रोत-पाठ यहाँ आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त है; ऊपर दिया गया सारांश उपलब्ध अंश पर आधारित है।)

श्लोक 1.115

तेनतुल्यंक्रियाचेद्वतिः ।

tenatulyaṁkriyācedvatiḥ |

तृतीया-विभक्ति वाले शब्द से 'तुल्यं क्रिया चेत्' (यदि क्रिया समान हो) अर्थ में 'वति' (वत्) प्रत्यय होता है। उदाहरण: ब्राह्मणेन तुल्या क्रिया → ब्राह्मणवत् (ब्राह्मण जैसा आचरण)।

श्लोक 1.116

तत्रतस्येव ।

tatratasyeva |

षष्ठी- या सप्तमी-विभक्ति वाले शब्द से 'इव' (के समान) अर्थ में भी 'वति' (वत्) प्रत्यय होता है। उदाहरण: मथुरायामिव → मथुरावत् (मथुरा के समान)।

श्लोक 1.117

तदर्हम् ।

tadarham |

द्वितीया-विभक्ति वाले शब्द से 'अर्हम्' (के योग्य) अर्थ में 'वति' प्रत्यय होता है। उदाहरण: राजानमर्हति → राजवत् पालनम्; ब्राह्मणवद् विद्याप्रचारः।

श्लोक 1.118

उपसर्गाच्छन्दसि धात्वर्थे ।

upasargācchandasi dhātvarthe |

छन्दस् (वेद) में, धातु के अर्थ से युक्त उपसर्ग से स्वार्थ में 'वति' प्रत्यय होता है। उदाहरण: यद् उद्वतो निवतो यासि।

श्लोक 1.119

तस्य भावस्त्व तलौ ।

tasya bhāvastva talau |

षष्ठी-विभक्ति वाले शब्द से 'भाव' (अवस्था/धर्म) अर्थ में 'त्व' और 'तल्' (त) प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: गोर्भावः → गोत्वम्।

श्लोक 1.120

आचत्वात् ।

ācatvāt |

'ब्रह्मणस्त्वः' (5.1.136) तक के सूत्रों में भी षष्ठी-विभक्ति वाले शब्द से 'त्व' और 'तल्' प्रत्यय होते रहते हैं, यह अधिकार-सूत्र है। उदाहरण: पृथुता, पृथुत्वम्।

श्लोक 1.121

ननञ्पूर्वात्तत्पुरुषादचतुरसंगतलवणवटयुधकतरसलसेभ्यः ।

nanañpūrvāttatpuruṣādacaturasaṁgatalavaṇavaṭayudhakatarasalasebhyaḥ |

नञ्-पूर्वक तत्पुरुष समास वाले षष्ठी-विभक्ति शब्दों से भाव-अर्थ में आगे विहित होने वाले प्रत्यय (जैसे यक्) नहीं होते — सिवाय अचतुर, असंगत, अलवण, अवट, अयुध, अकतर, अरस और अलस शब्दों के, जिनसे वे होते भी हैं। उदाहरण: अपतित्वम्, अपतिता (केवल त्व/तल् से)।

श्लोक 1.122

पृथ्वादिभ्यइमनिज्वा ।

pṛthvādibhyaimanijvā |

पृथु-आदि-गण में पढ़े गए षष्ठी-विभक्ति शब्दों से 'भाव' अर्थ में विकल्प से 'इमनिच्' (इमन्) प्रत्यय होता है। उदाहरण: पृथोर्भावः → प्रथिमा (पृथु+इमनिच्)।

श्लोक 1.123

वर्णदृढादिभ्यःष्यञ्च ।

varṇadṛḍhādibhyaḥṣyañca |

रंग-वाचक शब्दों और दृढ-आदि-गण के षष्ठी-विभक्ति शब्दों से 'भाव' अर्थ में 'ष्यञ्' (य) और 'इमनिच्' दोनों प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: शुक्लस्य भावः → शौक्ल्यम्/शुक्लिमा; कृष्णता, दृढ़ता।

श्लोक 1.124

गुणवचनब्राह्मणादिभ्यःकर्मणिच ।

guṇavacanabrāhmaṇādibhyaḥkarmaṇica |

गुण-वाचक और ब्राह्मण-आदि-गण के षष्ठी-विभक्ति शब्दों से 'कर्म' (क्रिया) और 'भाव' दोनों अर्थों में 'ष्यञ्' (य) प्रत्यय होता है। उदाहरण: जडस्य कर्म भावो वा → जाड्यम्।

श्लोक 1.125

स्तेनाद्यन्नलोपश्च ।

stenādyannalopaśca |

षष्ठी-समर्थ स्तेन शब्द से उन्हीं भाव-कर्म अर्थों में 'यत्' प्रत्यय होता है, और प्रकृति के अन्तिम 'न' का लोप हो जाता है। उदाहरण: स्तेन+यत्=स्तेयम् (चोरी)।

श्लोक 1.126

सख्युर्यः ।

sakhyuryaḥ |

षष्ठी-विभक्ति वाले सखि शब्द से भाव-कर्म अर्थ में 'य' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सख्युः कर्म भावो वा → सख्यम् (मित्रता)।

श्लोक 1.127

कपिज्ञात्योर्ढक् ।

kapijñātyorḍhak |

षष्ठी-विभक्ति वाले कपि और ज्ञाति शब्दों से भाव-कर्म अर्थ में 'ढक्' (एय) प्रत्यय होता है। उदाहरण: कपेः → कापेयम्।

श्लोक 1.128

पत्यन्तपुरोहितादिभ्योयक् ।

patyantapurohitādibhyoyak |

षष्ठी-विभक्ति वाले 'पति'-अन्त शब्दों और पुरोहित-आदि-गण के शब्दों से भाव-कर्म अर्थ में 'यक्' (य) प्रत्यय होता है। उदाहरण: सेनापतेः कर्म भावो वा → सैनापत्यम्।

श्लोक 1.129

प्राणभृज्जातिवयोवचनोद् गात्रादिभ्योऽञ् ।

prāṇabhṛjjātivayovacanod gātrādibhyo'ñ |

षष्ठी-समर्थ प्राणि-जाति-वाचक शब्दों, वय-वाचक (अवस्था बताने वाले) शब्दों और उद्गातृ-आदि-गण के शब्दों से भाव-कर्म अर्थ में 'अञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अश्वस्य भावः कर्म वा → आश्वम्; कौमारम्, कैशोरम्; उद्गातुर्भावः → औद्गात्रम्।

श्लोक 1.130

हायनान्तयुवादिभ्योऽण् ।

hāyanāntayuvādibhyo'ṇ |

षष्ठी-समर्थ 'हायन'-अन्त शब्दों और युवन्-आदि-गण के शब्दों से भाव-कर्म अर्थ में 'अण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्विहायनस्य भावः कर्म वा → द्वैहायनम्; युवन् से यौवनम्, स्थविर से स्थाविरम्।

श्लोक 1.131

इगन्ताच्चलघुपूर्वात् ।

igantāccalaghupūrvāt |

जिसके पहले लघु (ह्रस्व) स्वर हो, ऐसे इक्-अन्त (इ/उ/ऋ-अन्त) षष्ठी-समर्थ शब्दों से भाव-कर्म अर्थ में 'अण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शुचि+अण्=शौचम् (त्व/तल् पक्ष में शुचित्वम्, शुचिता); मुनि+अण्=मौनम्।

श्लोक 1.132

योपधाद् गुरुपोत्तमाद् वुञ् ।

yopadhād gurupottamād vuñ |

य-उपधा (जिसमें अन्त्याक्षर से पहले 'य' हो) और गुरु-उपान्त्य (अन्त से पहले गुरु स्वर वाले) शब्दों से भाव-कर्म अर्थ में 'वुञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: रमणीय+वुञ्=रामणीयकम्; वसनीय+वुञ्=वासनीयकम्।

श्लोक 1.133

द्वन्द्वमनोज्ञादिभ्यश्च ।

dvandvamanojñādibhyaśca |

द्वन्द्व-समास वाले और मनोज्ञ-आदि-गण के शब्दों से भी भाव-कर्म अर्थ में 'वुञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: मनोज्ञ+वुञ्=मनोज्ञकम्; कल्याण+वुञ्=कल्याणकम्।

श्लोक 1.134

गोत्रचरणाच्छ्लाघात्याकारतदवेतेषु ।

gotracaraṇācchlāghātyākāratadaveteṣu |

गोत्र-वाचक और चरण-वाचक शब्दों से 'श्लाघा' (प्रशंसा), 'अत्याकार' (निन्दा) और 'अवेत' (जिसे प्राप्त किया गया हो) अर्थों में 'वुञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: गार्गिकया श्लाघते; गार्गिकामवेतः।

श्लोक 1.135

होत्राभ्यश्छः ।

hotrābhyaśchaḥ |

ऋत्विक्-विशेष-वाचक शब्दों से भाव-कर्म अर्थ में 'छ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अच्छावाकस्य भावः कर्म वा → अच्छावाकीयम्; मित्रावरुणीयम्।

श्लोक 1.136

ब्रह्मणस्त्वः ।

brahmaṇastvaḥ |

ऋत्विक्-विशेष-वाचक शब्दों से भाव-कर्म अर्थ में 'त्व' प्रत्यय भी होता है — इस प्रकार अध्याय के पहले पाद (यज्ञ-विषयक प्रत्ययों) का समापन होता है। उदाहरण: ब्रह्मणो भावः कर्म वा → ब्रह्मत्वम्।

पञ्चमोऽध्यायः, द्वितीयः पादः

श्लोक 2.1

धान्यानांभवनेक्षेत्रेखञ् ।

dhānyānāṁbhavanekṣetrekhañ |

धान्य-वाचक षष्ठी-विभक्ति शब्द से 'भवनं क्षेत्रम्' (जहाँ वह पैदा होता है, वह खेत) अर्थ में 'खञ्' (ख) प्रत्यय होता है। उदाहरण: मुद्गानां भवनं क्षेत्रम् → मौद्गीनम्।

श्लोक 2.2

व्रीहिशाल्योर्ढक् ।

vrīhiśālyorḍhak |

उसी 'खेत' अर्थ में व्रीहि और शालि शब्दों से 'ढक्' (ढ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: व्रीहीणां भवनं क्षेत्रम् → व्रैहेयम्; शालेयम्।

श्लोक 2.3

यवयवकषष्टिकाद्यत् ।

yavayavakaṣaṣṭikādyat |

क्षेत्र (उत्पत्ति-स्थान) के अर्थ में षष्ठी-विभक्ति वाले यव, यवक और षष्टिक शब्दों से 'यत्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: यव+यत्=यव्यम्; यवक+यत्=यवक्यम्; षष्टिक+यत्=षष्टिक्यम्।

श्लोक 2.4

विभाषा तिलमाषोमाभङ्गाणुभ्यः ।

vibhāṣā tilamāṣomābhaṅgāṇubhyaḥ |

उसी 'क्षेत्र' अर्थ में तिल, माष, उमा, भङ्ग और अणु शब्दों से विकल्प से 'यत्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: तिल+यत्=तिल्यम्/तिल+खञ्=तैलीनम्; माष्यम्/माषीणम्; उम्यम्/औमीनम्।

श्लोक 2.5

सर्वचर्मणःकृतःखखञौ ।

sarvacarmaṇaḥkṛtaḥkhakhañau |

तृतीया-विभक्ति वाले 'सर्वचर्मन्' शब्द से 'कृतः' (उससे बना हुआ) अर्थ में विकल्प से 'ख' और 'खञ्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: सर्वचर्म+ख/खञ्=सर्वचर्मीणः।

श्लोक 2.6

यथामुखसंमुखस्यदर्शनःखः ।

yathāmukhasaṁmukhasyadarśanaḥkhaḥ |

षष्ठी-विभक्ति वाले यथामुख और सम्मुख शब्दों से 'दर्शन' (जिसमें प्रतिबिम्ब दिखता हो) अर्थ में 'ख' प्रत्यय होता है। उदाहरण: यथामुखं दर्शनः → यथामुखीनः (जैसा मुख वैसा दिखाने वाला दर्पण); सम्मुखीनः।

श्लोक 2.7

तत् सर्वादेःपथ्यङ्गकर्मपत्रपात्रंव्याप्नोति ।

tat sarvādeḥpathyaṅgakarmapatrapātraṁvyāpnoti |

द्वितीया-विभक्ति वाले सर्व-पूर्वपद युक्त पथिन्-, अङ्ग-, कर्मन्-, पत्र- और पात्र-अन्त शब्दों से 'व्याप्नोति' (पूरी तरह व्याप्त करता है) अर्थ में 'ख' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सर्वपथिन्+ख=सर्वपथीनः; सर्वाङ्ग+ख=सर्वाङ्गीणः; सर्वकर्मीणः।

श्लोक 2.8

आप्रपदं प्राप्नोति ।

āprapadaṁ prāpnoti |

द्वितीया-विभक्ति वाले 'आप्रपद' शब्द से 'प्राप्नोति' (वहाँ तक पहुँचता है) अर्थ में 'ख' प्रत्यय होता है। उदाहरण: आप्रपदं प्राप्नोति → आप्रपदीनः पटः (पैर की उँगलियों तक पहुँचने वाला वस्त्र)।

श्लोक 2.9

अनुपदसर्वान्नायानयं बद्धाभक्षयतिनेयेषु ।

anupadasarvānnāyānayaṁ baddhābhakṣayatineyeṣu |

द्वितीया-विभक्ति वाले अनुपद शब्द से 'बद्ध' (बँधा हुआ) अर्थ में, सर्वान्त शब्द से 'भक्षयति' (खाता है) अर्थ में, और अयानय शब्द से 'नेय' (ले जाने योग्य) अर्थ में 'ख' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अनुपदं बद्धा → अनुपदीना उपानत् (पैर से ठीक-ठीक बँधा जूता); सर्वान्नानि भक्षयति → सर्वान्नीनो भिक्षुः।

श्लोक 2.10

परोवरपरंपरपुत्रपौत्रमनुभवति ।

parovaraparaṁparaputrapautramanubhavati |

द्वितीया-विभक्ति वाले परोवर, परम्पर और पुत्रपौत्र शब्दों से 'अनुभवति' (भोगता/अनुभव करता है) अर्थ में 'ख' प्रत्यय होता है। उदाहरण: परोवर+ख=परोवरीणः; परम्पर+ख=परम्परीणः।

श्लोक 2.11

अवारपारात्यन्तानुकामंगामी ।

avārapārātyantānukāmaṁgāmī |

द्वितीया-विभक्ति वाले अवारपार, अत्यन्त और अनुकाम शब्दों से 'गामी' (जाने वाला) अर्थ में 'ख' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अवारपार+ख=अवारपारीणः; अत्यन्त+ख=अत्यन्तीनः; अनुकाम+ख=अनुकामीनः।

श्लोक 2.12

समांसमांविजायते ।

samāṁsamāṁvijāyate |

द्वितीया-विभक्ति में दोहराए गए 'समांसमाम्' शब्द से 'गर्भधारण करती है' अर्थ में 'ख' प्रत्यय होता है। उदाहरण: समांसमां विजायते → समांसमीना गौः (जो हर वर्ष ब्याती है)।

श्लोक 2.13

अद्यश्वीनावष्टब्धे ।

adyaśvīnāvaṣṭabdhe |

'आज या कल प्रसव होगा' (अनिश्चित शीघ्र प्रसव) अर्थ में 'अद्यश्वीन' शब्द का निपातन (अनियमित रूप से सिद्ध) होता है। उदाहरण: अद्यश्वीना गौः, अद्यश्वीना वडवा।

श्लोक 2.14

आगवीनः ।

āgavīnaḥ |

'कर्मकर' (मज़दूर/नौकर) अर्थ में आ-पूर्वक गो शब्द से 'ख' प्रत्यय का निपातन होता है। उदाहरण: आगवीनः कर्मकरः (गौओं की देखभाल करने वाला मज़दूर)।

श्लोक 2.15

अनुग्वलंगामी ।

anugvalaṁgāmī |

काल-वाचक सप्तमी-विभक्ति सर्व, एक, अन्य, किम्, यद् और तद् शब्दों से 'दा' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सर्वस्मिन् काले → सर्वदा (सब समय में/हमेशा)।

श्लोक 2.16

अध्वनो यत्खौ ।

adhvano yatkhau |

द्वितीया-विभक्ति वाले अध्वन् शब्द से 'अलंगामी' (उतना चलने में समर्थ) अर्थ में विकल्प से 'यत्' और 'ख' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: अध्वन्+यत्=अध्वन्यः; अध्वन्+ख=अध्वनीनः।

श्लोक 2.17

अभ्यमित्राच्छ च ।

abhyamitrāccha ca |

द्वितीया-विभक्ति वाले अभ्यमित्र शब्द से उसी 'अलंगामी' अर्थ में विकल्प से 'छ', 'यत्' और 'ख' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: अभ्यमित्रीयः/अभ्यमित्र्यः/अभ्यमित्रीणः।

श्लोक 2.18

गोष्ठात्खञ्भूतपूर्वे ।

goṣṭhātkhañbhūtapūrve |

'भूतपूर्व' (जो पहले था) विशेषण-युक्त गोष्ठ शब्द से स्वार्थ में 'खञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: गोष्ठो भूतपूर्वः → गौष्ठीनो देशः (जो पहले गोशाला थी, वह जगह)।

श्लोक 2.19

अश्वस्यैकाहगमः ।

aśvasyaikāhagamaḥ |

षष्ठी-विभक्ति वाले अश्व शब्द से 'एक दिन में तय किया जाने वाला मार्ग' अर्थ में 'खञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अश्व+खञ्=आश्वीनः।

श्लोक 2.20

शालीनकौपीने अधृष्टाकार्ययोः ।

śālīnakaupīne adhṛṣṭākāryayoḥ |

'अधृष्ट' (संकोची/भीरु) और 'अकार्य' (न करने योग्य) अर्थों में क्रमशः 'शालीन' और 'कौपीन' शब्द निपातन से सिद्ध होते हैं। उदाहरण: शालाप्रवेशमर्हति → शालीनो भीरुः; कूपावतारमर्हति → कौपीनं पापम्।

श्लोक 2.21

व्रातेनजीवति ।

vrātenajīvati |

तृतीया-विभक्ति वाले व्रात शब्द से 'जीवति' (उससे जीविका चलाता है) अर्थ में 'खञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: व्रात+खञ्=व्रातीनः।

श्लोक 2.22

साप्तपदीनंसख्यम् ।

sāptapadīnaṁsakhyam |

मैत्री (दोस्ती) अर्थ में सप्तपद शब्द से 'खञ्' प्रत्यय निपातन से सिद्ध होता है। उदाहरण: सप्तभिः पदैरवाप्यते → साप्तपदीनम् (सात कदम साथ चलने से बनी मैत्री)।

श्लोक 2.23

हैयंगवीनं संज्ञायाम् ।

haiyaṁgavīnaṁ saṁjñāyām |

एक संज्ञा (नाम) के गठन के लिए 'ह्योगवीन' (एक दिन पहले दुहा दूध) शब्द के स्थान पर 'हियङ्गु' आदेश होकर उससे 'खञ्' प्रत्यय से 'हैयंगवीन' रूप बनता है — यह पूरी तरह निपातन (अनियमित सिद्धि) है।

श्लोक 2.24

तस्य पाकमूले पील्वादिकर्णादिभ्यःकुणब्जाहचौ ।

tasya pākamūle pīlvādikarṇādibhyaḥkuṇabjāhacau |

षष्ठी-विभक्ति वाले पीलु आदि शब्दों से क्रमशः 'पाक' और 'मूल' अर्थ में 'कुणप्' और 'जाहच्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: पीलु+कुणप्=पीलुकुणः; कर्कन्धू+जाहच्=कर्कन्धुजाहः।

श्लोक 2.25

पक्षात्तिः ।

pakṣāttiḥ |

षष्ठी-विभक्ति वाले पक्ष शब्द से 'मूल' अर्थ में 'ति' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पक्ष+ति=पक्षति।

श्लोक 2.26

तेन वित्तश्चुञ्चुप्चणपौ ।

tena vittaścuñcupcaṇapau |

तृतीया-विभक्ति वाले शब्द से 'वित्त' (जिसके द्वारा प्राप्त/अर्जित किया गया हो) अर्थ में 'चुञ्चुप्' और 'चणप्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: विद्या+चुञ्चुप्=विद्याचुञ्चुः; विद्या+चणप्=विद्याचणः।

श्लोक 2.27

विनञ्भ्यांनानाञौनसह ।

vinañbhyāṁnānāñaunasaha |

पृथक्भाव (अलग होना) के अर्थ में वि और नञ् शब्दों से स्वार्थ में क्रमशः 'ना' और 'नाञ्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: वि+ना=विना; नञ्+नाञ्=नाना।

श्लोक 2.28

वेःशालच्छङ्कटचौ ।

veḥśālacchaṅkaṭacau |

धातु के अर्थ से युक्त साधन-वाचक वि शब्द से स्वार्थ में 'शालच्' और 'शङ्कटच्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: वि+शालच्=विशालः; वि+शङ्कटच्=विशङ्कटः।

श्लोक 2.29

संप्रोदश्चकटच् ।

saṁprodaścakaṭac |

उसी तरह सम्, प्र, उत् और वि शब्दों से 'कटच्' प्रत्यय समझना चाहिए। उदाहरण: सम्+कटच्=सङ्कटम्; प्र+कटच्=प्रकटम्; उत्+कटच्=उत्कटम्; वि+कटच्=विकटम्।

श्लोक 2.30

अवात्कुटारच्च ।

avātkuṭāracca |

अव शब्द से विकल्प से 'कुटारच्' और 'कटच्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: अवकुटारम् (निचली भूमि), अवकटम्।

श्लोक 2.31

नते नासिकायाःसंज्ञायां टीटञ्नाटज्भ्रटचः ।

nate nāsikāyāḥsaṁjñāyāṁ ṭīṭañnāṭajbhraṭacaḥ |

नासिका के नमन (झुकाव) के अर्थ में अव शब्द से 'टीटच्', 'नाटच्' और 'भ्रटच्' प्रत्यय संज्ञा-विषय में होते हैं। उदाहरण: अव+टीटच्=अवटीटम्; अव+नाटच्=अवनाटम्; अव+भ्रटच्=अवभ्रटम्।

श्लोक 2.32

नेर्बिडज्बिरीसचौ ।

nerbiḍajbirīsacau |

उसी नासिका-नमन अर्थ में नि शब्द से 'बिडच्' और 'बिरीसच्' प्रत्यय संज्ञा-विषय में होते हैं। उदाहरण: निबिडम् (झुकी हुई नासिका, या ऐसी नासिका वाला व्यक्ति), निबिरीसम्।

श्लोक 2.33

इनच्पिटच्चिकचि च ।

inacpiṭaccikaci ca |

नासिका के झुकाव के अर्थ में नि शब्द से क्रमशः 'इनच्' और 'पिटच्' प्रत्यय होते हैं, और इनच् के साथ नि को क्रमशः 'चिक' और 'चि' आदेश होता है। उदाहरण: नि+इनच्=चिकिनः; नि+पिटच्=चिपिटम्।

श्लोक 2.34

उपाधिभ्यांत्यकन्नासन्नारूढयोः ।

upādhibhyāṁtyakannāsannārūḍhayoḥ |

'आसन्न' (निकट) और 'आरूढ़' (चढ़ा हुआ) अर्थों में क्रमशः उप और अधि शब्दों से स्वार्थ में 'त्यकन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पर्वतस्यासन्नम् → उपत्यका (पहाड़ की तराई); अधित्यका (पहाड़ का पठार)।

श्लोक 2.35

कर्मणिघटोऽठच् ।

karmaṇighaṭo'ṭhac |

सप्तमी-विभक्ति वाले कर्मन् शब्द से 'घट' (दृढ़/कुशल) अर्थ में 'अठच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कर्मन्+अठच्=कर्मठः (कार्यकुशल)।

श्लोक 2.36

तदस्यसंजातंतारकादिभ्यइतच् ।

tadasyasaṁjātaṁtārakādibhyaitac |

तारका-आदि-गण में पढ़े गए प्रथमा-विभक्ति शब्दों से 'ये इसके हो गए हैं' (तदस्य संजातम्) अर्थ में 'इतच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: तारकाः सञ्जाता अस्य → तारकितम् (तारों से भरा)।

श्लोक 2.37

प्रमाणेद्वयसज्दघ्नञ्मात्रचः ।

pramāṇedvayasajdaghnañmātracaḥ |

प्रथमा-विभक्ति वाले शब्द से 'यह इसका प्रमाण (माप) है' अर्थ में 'द्वयसच्', 'दघ्नच्' और 'मात्रच्' — ये तीन प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: ऊरुः प्रमाणमस्य → ऊरुद्वयसम् (जांघ तक ऊँचा)।

श्लोक 2.38

पुरुषहस्तिभ्यामण्च ।

puruṣahastibhyāmaṇca |

प्रमाण-वाचक प्रथमा-विभक्ति पुरुष और हस्तिन् शब्दों से षष्ठी-अर्थ में 'द्वयसच्', 'दघ्नच्' और 'मात्रच्' के साथ-साथ 'अण्' प्रत्यय भी होता है। उदाहरण: पुरुषः प्रमाणस्य → पौरुषम्, पुरुषद्वयसम्, पुरुषदघ्नम्, पुरुषमात्रम्।

श्लोक 2.39

यत्तदेतेभ्यःपरिमाणेवतुप् ।

yattadetebhyaḥparimāṇevatup |

प्रथमा-विभक्ति यद्, तद् और एतद् शब्दों से 'यह इसका परिमाण है' अर्थ में 'वतुप्' (वत्) प्रत्यय होता है। उदाहरण: यत् परिमाणमस्य → यावत्/यावान्।

श्लोक 2.40

किमिदंभ्यांवोघः ।

kimidaṁbhyāṁvoghaḥ |

प्रथमा-विभक्ति किम् और इदम् शब्दों से उसी 'परिमाण' अर्थ में 'वतुप्' प्रत्यय होता है, और उसके 'व' को 'घ' आदेश होता है (जो आगे 'इय' बनता है)। उदाहरण: इदं परिमाणमस्य → इदमियत् (इयत्)।

श्लोक 2.41

किमःसंख्यापरिमाणेडति च ।

kimaḥsaṁkhyāparimāṇeḍati ca |

संख्या के नियम (गिनती) में वर्तमान प्रथमा-विभक्ति किम् शब्द से षष्ठी-अर्थ में 'डति' प्रत्यय होता है। उदाहरण: का सङ्ख्या परिमाणमेषाम् → कति ब्राह्मणाः (कितने ब्राह्मण)।

श्लोक 2.42

संख्याया अवयवे तयप् ।

saṁkhyāyā avayave tayap |

'इसके इतने अवयव (भाग) हैं' अर्थ में प्रथमा-विभक्ति संख्या-वाचक शब्द से 'तयप्' (तय) प्रत्यय होता है। उदाहरण: पञ्च अवयवा अस्य → पञ्चतयम्।

श्लोक 2.43

द्वित्रिभ्यांतयस्यायज्वा ।

dvitribhyāṁtayasyāyajvā |

द्वि और त्रि से आगे 'तयप्' के स्थान पर विकल्प से 'अयच्' आदेश होता है। उदाहरण: द्वौ अवयवौ अस्य → द्वयम् (द्वि+अयच्)।

श्लोक 2.44

उभादुदात्तोनित्यम् ।

ubhādudāttonityam |

उभ शब्द से आगे 'तयप्' के स्थान पर नित्य ही 'अयच्' आदेश होता है। उदाहरण: उभौ अवयवौ अस्य → उभयम् (उभ+अयच्)।

श्लोक 2.45

तदस्मिन्नधिकमितिदशान्ताड्डः ।

tadasminnadhikamitidaśāntāḍḍaḥ |

जब प्रथमा-विभक्ति दशान्त संख्या-वाचक शब्द किसी संख्या में 'उतना अधिक' जोड़ने का बोध कराए, तब सप्तमी-अर्थ में 'ड' प्रत्यय होता है। उदाहरण: एकादश अधिका अस्मिन् शते → एकादशं शतम् (एक सौ ग्यारह)।

श्लोक 2.46

शदन्तविंशतेश्च ।

śadantaviṁśateśca |

उसी 'अधिक्य' अर्थ में शत्-अन्त और विंशति संख्या-वाचक शब्दों से भी सप्तमी-अर्थ में 'ड' प्रत्यय होता है। उदाहरण: त्रिंशदधिका यस्मिन् शते → त्रिंशं शतम्; विंशतिरधिका → विंशं शतम्।

श्लोक 2.47

संख्यायागुणस्यनिमानेमयट् ।

saṁkhyāyāguṇasyanimānemayaṭ |

मूल्य-वाचक भाग में स्थित संख्या-वाचक प्रथमा-विभक्ति शब्द से षष्ठी-अर्थ में 'मयट्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्वौ भागौ निमानं मूल्यमस्य → द्विमयम्; त्रिमयम्, चतुर्मयम्।

श्लोक 2.48

तस्यपूरणेडट् ।

tasyapūraṇeḍaṭ |

'पूरण' (क्रम-सूचक, जैसे पहला/दूसरा) अर्थ में संख्या-वाचक षष्ठी-विभक्ति शब्द से 'डट्' (अ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: एकादशानां पूरणः → एकादशः (ग्यारहवाँ)।

श्लोक 2.49

नान्तादसंख्यादेर्मट् ।

nāntādasaṁkhyādermaṭ |

जिसके पहले कोई संख्या-वाचक शब्द न हो, ऐसे नकारान्त संख्या-वाचक शब्द से विहित 'डट्' के स्थान में 'मट्' का आगम होता है। उदाहरण: पञ्चानां पूरणः → पञ्चमः; सप्तमः।

श्लोक 2.50

थट्चच्छन्दसि ।

thaṭcacchandasi |

छन्दस् (वेद) में उसी n-अन्त संख्या-वाचक शब्द से विहित 'डट्' के स्थान में 'थट्' का आगम होता है। उदाहरण: पञ्चन्+थट्+डट्=पञ्चथः।

श्लोक 2.51

षट्कतिकतिपयचतुरांथुक् ।

ṣaṭkatikatipayacaturāṁthuk |

षष् (छः), कति, कतिपय और चतुर् — इन चार शब्दों को 'डट्' के परे होने पर 'थुक्' का आगम होता है। उदाहरण: षष्+थुक्+अ=षष्ठः (ष्टुत्व से)।

श्लोक 2.52

बहुपूगगणसङ्घस्यतिथुक् ।

bahupūgagaṇasaṅghasyatithuk |

बहु, पूग, गण और संघ शब्दों को भी 'डट्' के परे होने पर 'तिथुक्' का आगम होता है। उदाहरण: बहु+तिथुक्=बहुतिथः; पूगतिथः, गणतिथः, संघतिथः।

श्लोक 2.53

वतोरिथुक् ।

vatorithuk |

वत्-अन्त शब्द को 'डट्' के परे होने पर 'इथुक्' का आगम होता है। उदाहरण: यावत्+इथुक्+डट्=यावतिथः।

श्लोक 2.54

द्वेस्तीयः ।

dvestīyaḥ |

पूरण अर्थ में षष्ठी-विभक्ति 'द्वि' शब्द से 'तीय' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्वयोः पूरणः → द्वितीयः।

श्लोक 2.55

त्रेःसम्प्रसारणंच ।

treḥsamprasāraṇaṁca |

पूरण अर्थ में षष्ठी-विभक्ति 'त्रि' शब्द से भी 'तीय' प्रत्यय होता है, और साथ ही 'त्रि' को सम्प्रसारण (अर्ध-स्वर का स्वर में परिवर्तन) होता है। उदाहरण: त्रयाणां पूरणः → तृतीयः।

श्लोक 2.56

विंशत्यादिभ्यस्तमडन्यतरस्याम् ।

viṁśatyādibhyastamaḍanyatarasyām |

विंशति आदि शब्दों से विहित 'डट्' को विकल्प से 'तमट्' का आगम होता है। उदाहरण: विंशति+तम्+अ=विंशतितमः; एकविंश+तम्+अ=एकविंशतितमः।

श्लोक 2.57

नित्यंशतादिमासार्धमाससंवत्सराच्च ।

nityaṁśatādimāsārdhamāsasaṁvatsarācca |

शत-आदि शब्दों, मास, अर्धमास और संवत्सर शब्दों से विहित 'डट्' को नित्य ही 'तमट्' का आगम होता है। उदाहरण: शतस्य पूरणः → शततमः; मासतमः, अर्धमासतमः, संवत्सरतमः।

श्लोक 2.58

षष्ट्यादेश्चासंख्यादेः ।

ṣaṣṭyādeścāsaṁkhyādeḥ |

संख्या-वाचक शब्द से भिन्न (अकेले खड़े) षष्टि-आदि शब्दों से विहित 'डट्' को भी नित्य ही 'तमट्' का आगम होता है। उदाहरण: षष्टि+तमट्+डट्=षष्टितमः।

श्लोक 2.59

मतौछःसूक्तसाम्नोः ।

matauchaḥsūktasāmnoḥ |

'सूक्त' और 'साम' नाम के वेद-भाग को बताने के लिए प्रातिपदिक मात्र से मत्वर्थ (उसका होना) में 'छ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सूक्त+छ=सूक्तीयम्।

श्लोक 2.60

अध्यायानुवाकयोर्लुक् ।

adhyāyānuvākayorluk |

'अध्याय' और 'अनुवाक' अभिप्रेत होने पर उसी मत्वर्थीय 'छ' प्रत्यय का लोप होता है। उदाहरण: गर्दभाण्ड शब्दोऽस्मिन्नस्ति → गर्दभाण्डोऽध्यायः, गर्दभाण्डोऽनुवाकः।

श्लोक 2.61

विमुक्तादिभ्योऽण् ।

vimuktādibhyo'ṇ |

अध्याय और अनुवाक अर्थों में विमुक्त आदि शब्दों से मत्वर्थीय 'अण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: विमुक्त+अध्याय+अण्=वैमुक्तोऽध्यायः; दैवासुरोऽध्यायः।

श्लोक 2.62

गोषदादिभ्योवुन् ।

goṣadādibhyovun |

अध्याय और अनुवाक अर्थों में गोषद आदि शब्दों से मत्वर्थीय 'वुन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: गोषद+वुन्=गोषदकः; इषेत्वा+वुन्=इषेत्वकः।

श्लोक 2.63

तत्रकुशलःपथः ।

tatrakuśalaḥpathaḥ |

सप्तमी-विभक्ति वाले पथिन् शब्द से 'कुशल' (निपुण) अर्थ में 'वुन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पथि कुशलः → पथकः (यात्रा में निपुण)।

श्लोक 2.64

आकर्षादिभ्यःकन् ।

ākarṣādibhyaḥkan |

सप्तमी-विभक्ति वाले आकर्ष आदि शब्दों से उसी 'कुशल' अर्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: आकर्ष+कन्=आकर्षकः; त्सरु+कन्=त्सरूकः।

श्लोक 2.65

धनहिरण्यात्कामे ।

dhanahiraṇyātkāme |

सप्तमी-विभक्ति वाले धन और हिरण्य शब्दों से 'काम' (लालसा) अर्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: धने कामः → धनको देवदत्तस्य (देवदत्त की धन की लालसा); हिरण्यकः।

श्लोक 2.66

स्वाङ्गेभ्यःप्रसिते ।

svāṅgebhyaḥprasite |

सप्तमी-विभक्ति वाले शरीर-अंग-वाचक (स्वाङ्ग) शब्दों से 'उसमें लगा हुआ' (प्रसित) अर्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: केश+कन्=केशकः; दन्त+कन्=दन्तकः; ओष्ठ+कन्=ओष्ठकः।

श्लोक 2.67

उदराट्ठगाद्यूने ।

udarāṭṭhagādyūne |

जब कर्ता को उसे जीतने की इच्छा न हो, ऐसे 'प्रसित' अर्थ में सप्तमी-विभक्ति उदर शब्द से 'ठक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: उदरे प्रसितः → औदरिकः (पेटू, हमेशा खाते रहने वाला)।

श्लोक 2.68

सस्येनपरिजातः ।

sasyenaparijātaḥ |

तृतीया-विभक्ति वाले सस्य शब्द से 'परिजात' (चारों ओर से पूर्ण गुणों से युक्त) अर्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सस्येन परिजातः → सस्यकः शालिः; सस्यकः साधुः (गुणों से परिपूर्ण साधु)।

श्लोक 2.69

अंशंहारी ।

aṁśaṁhārī |

द्वितीया-विभक्ति वाले अंश शब्द से 'हारी' (ले जाने वाला) अर्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अंशको दायादः (पैतृक सम्पत्ति के भाग का उत्तराधिकारी)।

श्लोक 2.70

तन्त्रादचिरापहृते ।

tantrādacirāpahṛte |

सप्तमी-विभक्ति वाले तन्त्र शब्द से 'अचिरापहृत' (अभी-अभी हटाया गया) अर्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: तन्त्रादचिरापहृतः → तन्त्रकः पटः (करघे से अभी उतारा गया वस्त्र)।

श्लोक 2.71

ब्राह्मणकोष्णिकेसंज्ञायाम् ।

brāhmaṇakoṣṇikesaṁjñāyām |

संज्ञा के अर्थ में 'ब्राह्मणक' और 'उष्णिक' शब्दों का 'कन्'-प्रत्ययान्त रूप निपातन से सिद्ध होता है। उदाहरण: ब्राह्मणको देशः; उष्णिका यवागूः (गाढ़े दलिये का नाम)।

श्लोक 2.72

शीतोष्णाभ्यांकारिणि ।

śītoṣṇābhyāṁkāriṇi |

द्वितीया-विभक्ति वाले शीत और उष्ण शब्दों से 'कारी' (करने वाला) अर्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शीत+कन्=शीतकः; उष्ण+कन्=उष्णकः।

श्लोक 2.73

अधिकम् ।

adhikam |

'अध्यारूढ़' शब्द से 'कन्' प्रत्यय का, और साथ ही उत्तरपद 'आरूढ़' के लोप का निपातन होता है। उदाहरण: अध्यारूढ+कन् → अधिकम् (आरूढ़ का लोप करके)।

श्लोक 2.74

अनुकाभिकाभीकःकमिता ।

anukābhikābhīkaḥkamitā |

'कमिता' (इच्छा करने वाला) अर्थ में क्रिया-विशिष्ट साधन-वाचक अनु और अभि शब्दों से 'कन्' प्रत्यय होता है, और अभि के इ को विकल्प से दीर्घ किया जाता है। उदाहरण: अनुकः (चाहने वाला); अभिकः/अभीकः (कामुक अथवा क्रूर)।

श्लोक 2.75

पार्श्वेनान्विच्छति ।

pārśvenānvicchati |

तृतीया-विभक्ति वाले पार्श्व शब्द से 'अन्विच्छति' (उसके सहारे ढूँढ़ता है) अर्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पार्श्व+कन्=पार्श्वकः।

श्लोक 2.76

अयःशूलदण्डाजिनाभ्यांठक्ठञौ ।

ayaḥśūladaṇḍājinābhyāṁṭhakṭhañau |

तृतीया-विभक्ति वाले अयःशूल और दण्डाजिन शब्दों से उसी 'अन्विच्छति' अर्थ में क्रमशः 'ठक्' और 'ठञ्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: अयःशूलेनान्विच्छति → आयःशूलिकः साहसिकः; दाण्डाजिनिकः दाम्भिकः।

श्लोक 2.77

तावतिथंग्रहणमितिलुग्वा ।

tāvatithaṁgrahaṇamitilugvā |

'इतने वें रूप (क्रम) से ग्रहण करता है' अर्थ में पूरण-प्रत्ययान्त शब्दों से 'कन्' प्रत्यय होता है, और पूरण-प्रत्यय का विकल्प से लोप होता है। उदाहरण: द्वितीयेन रूपेण ग्रन्थं गृह्णाति → द्विकम्/द्वितीयकम्।

श्लोक 2.78

सएषांग्रामणीः ।

saeṣāṁgrāmaṇīḥ |

प्रथमा-विभक्ति वाले प्रातिपदिक से षष्ठी-अर्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है, यदि वह प्रातिपदिक ग्राम-मुखिया (ग्रामणी) का वाचक हो। उदाहरण: देवदत्त+कन्=देवदत्तकाः; यज्ञदत्त+कन्=यज्ञदत्तकाः।

श्लोक 2.79

शृङ्खलमस्यबन्धनंकरभे ।

śṛṅkhalamasyabandhanaṁkarabhe |

'बन्धन' (बाँधने की वस्तु) अर्थ में प्रथमा-विभक्ति शृङ्खल शब्द से, जब वह ऊँट के गले की जंजीर (करभ) हो, षष्ठी-अर्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शृङ्खल+कन्=शृङ्खलकः।

श्लोक 2.80

उत्कउन्मनाः ।

utkaunmanāḥ |

'उन्मनस्' (उत्कण्ठित) अर्थ में उत् शब्द से स्वार्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: उत्+कन्=उत्कः।

श्लोक 2.81

कालप्रयोजनाद्रोगे ।

kālaprayojanādroge |

पूरण-प्रत्ययान्त काल-वाचक सप्तमी शब्द से 'उस दिन उत्पन्न रोग' अर्थ में, करण-वाचक तृतीया शब्द से 'उससे उत्पन्न रोग' अर्थ में, और फल-वाचक प्रथमा शब्द से 'यह इसका कार्य है' अर्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्वितीयेऽह्नि भवः → द्वितीयको ज्वरः; विष्पुष्पैर्जनितः → विष्पुष्पको ज्वरः; उष्णं कार्यमस्य → उष्णकः।

श्लोक 2.82

तदस्मिन्नन्नंप्रायेसंज्ञायाम् ।

tadasminnannaṁprāyesaṁjñāyām |

प्रथमा-विभक्ति प्रातिपदिक से सप्तमी-अर्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है, यदि वह किसी बाहुल्य-युक्त भोज्य पदार्थ (अन्न) का वाचक हो। उदाहरण: गुडापूपाः प्रायेणान्नमस्याम् → गुडापूपिका पौर्णमासी।

श्लोक 2.83

कुल्माषादञ् ।

kulmāṣādañ |

प्रथमा-विभक्ति कुल्माष शब्द से उसी अर्थ में 'अण्' प्रत्यय होता है, यदि वह बाहुल्य-युक्त अन्न का वाचक हो। उदाहरण: कुल्माषाः प्रायेणान्नमस्याम् → कौलमाषी पौर्णमासी।

श्लोक 2.84

श्रोत्रियंश्छन्दोऽधीते ।

śrotriyaṁśchando'dhīte |

'वेद पढ़ने वाला' अर्थ में 'श्रोत्रिय' शब्द (छन्दस्→श्रोत्र आदेश के साथ) निपातन से सिद्ध होता है। उदाहरण: छन्दस्+घन्→श्रोत्रीयः।

श्लोक 2.85

श्राद्धमनेनभुक्तमिनिठनौ ।

śrāddhamanenabhuktaminiṭhanau |

'भुक्त' (जिसके द्वारा भोजन कराया गया हो) विशेषण-युक्त श्राद्ध शब्द से तृतीया-अर्थ में 'इनि' और 'ठन्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: श्राद्ध+इनि=श्राद्धी; श्राद्ध+ठक्=श्राद्धिकः।

श्लोक 2.86

पूर्वादिनिः ।

pūrvādiniḥ |

'अनेन' (इसके द्वारा किया गया) अर्थ में 'पूर्व' शब्द से 'इनि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पूर्वं कृतमनेन → पूर्वी।

श्लोक 2.87

सपूर्वाच्च ।

sapūrvācca |

जिसके पहले कोई शब्द हो, ऐसे 'पूर्व' शब्द से भी उसी 'अनेन' अर्थ में 'इनि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कृतं पूर्वमनेन → कृतपूर्वी।

श्लोक 2.88

इष्टादिभ्यश्च ।

iṣṭādibhyaśca |

इष्ट-आदि-गण में पढ़े गए शब्दों से भी 'अनेन' अर्थ में 'इनि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: इष्टमनेन → इष्टी (जिसने यज्ञ किया हो)।

श्लोक 2.89

छन्दसि परिपन्थि परिपरिणौ पर्यवस्थातरि ।

chandasi paripanthi paripariṇau paryavasthātari |

छन्दस् (वेद) में 'पर्यवस्थाता' (आड़ में रहकर घात लगाने वाला) अर्थ में परिपन्थिन् और परिपरिन् शब्दों का निपातन होता है। उदाहरण: मा त्वा परिपन्थिनो विदन्; मा त्वा परिपरिणो विदन्।

श्लोक 2.90

अनुपद्यन्वेष्टा ।

anupadyanveṣṭā |

'अन्वेष्टा' (ढूँढ़ने वाला) अर्थ में 'अनुपद' शब्द का निपातन होता है। उदाहरण: अनुपद+इनि=अनुपदी।

श्लोक 2.91

साक्षाद्द्रष्टरिसंज्ञायाम् ।

sākṣāddraṣṭarisaṁjñāyām |

'द्रष्टा' (साक्षी/देखने वाला) अर्थ में साक्षात् शब्द से 'इनि' प्रत्यय होता है, यदि प्रत्ययान्त से एक संज्ञा (नाम) बने। उदाहरण: साक्ष+इनि=साक्षी।

श्लोक 2.92

क्षेत्रियच्परक्षेत्रेचिकित्स्यः ।

kṣetriyacparakṣetrecikitsyaḥ |

सप्तमी-विभक्ति वाले परक्षेत्र शब्द से 'चिकित्स्य' (जिसका इलाज करना हो) अर्थ में 'घञ्' प्रत्यय होता है, और 'पर' शब्द का लोप निपातन से होता है। उदाहरण: परक्षेत्रे चिकित्स्यः → क्षेत्रियो व्याधिः, क्षेत्रियं कुष्ठम्।

श्लोक 2.93

इन्द्रियमिन्द्रलिङ्गमिन्द्रदृष्टमिन्द्रसृष्टमिन्द्रजुष्टमिन्द्रदत्तमितिवा ।

indriyamindraliṅgamindradṛṣṭamindrasṛṣṭamindrajuṣṭamindradattamitivā |

तृतीया-विभक्ति वाले इन्द्र शब्द से 'दृष्ट', 'सृष्ट', 'जुष्ट' और 'दत्त' अर्थों में 'घच्' प्रत्यय होता है, जिससे 'इन्द्रिय' आदि रूप विकल्प से बनते हैं। उदाहरण: इन्द्रस्य लिङ्गम्/इन्द्रेण दृष्टम्/सृष्टम् → इन्द्रियम्।

श्लोक 2.94

तदस्यास्त्यस्मिन्नितिमतुप् ।

tadasyāstyasminnitimatup |

'इसका है/इसके हैं' और 'इसमें है/इसमें हैं' — इन अर्थों में प्रथमा-विभक्ति प्रातिपदिक से 'मतुप्' (मत्) प्रत्यय होता है — यह पूरे मत्वर्थीय (स्वामित्व-सूचक) प्रकरण का मूल सूत्र है। उदाहरण: गावोऽस्यास्मिन् वा सन्ति → गोमत्/गोमान्।

श्लोक 2.95

रसादिभ्यश्च ।

rasādibhyaśca |

प्रथमा-विभक्ति रस-आदि-गण के शब्दों से सप्तमी-अर्थ में विकल्प से 'मतुप्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: रसोऽस्मिन्नस्ति → रसवान्; रूपवान्।

श्लोक 2.96

प्राणिस्थादातोलजन्यतरस्याम् ।

prāṇisthādātolajanyatarasyām |

प्राणी के अंग-वाचक अकारान्त प्रथमा-विभक्ति शब्दों से उसी अर्थ में विकल्प से 'लच्' (ल) प्रत्यय होता है। उदाहरण: चूड़ा अस्य सन्ति → चूड़ालः।

श्लोक 2.97

सिध्मादिभ्यश्च ।

sidhmādibhyaśca |

सिध्म-आदि-गण के शब्दों से भी मत्वर्थ में विकल्प से 'लच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सिध्म+लच्=सिध्मलः; गडु+लच्=गडुलः; मणि+लच्=मणिलः।

श्लोक 2.98

वत्सांसाभ्यांकामबले ।

vatsāṁsābhyāṁkāmabale |

'कामवत्' (प्रिय) और 'बलवत्' (बलवान) अर्थों में क्रमशः वत्स और अंस शब्दों से 'लच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: वत्सलः (छोटों पर स्नेह रखने वाला); अंसलः (बलवान)।

श्लोक 2.99

फेनादिलच्च ।

phenādilacca |

फेन शब्द से मत्वर्थ में 'इलच्' और 'लच्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: फेनमस्ति अस्य/अस्मिन् → फेनिलः/फेनलः/फेनवान्।

श्लोक 2.100

लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यःशनेलचः ।

lomādipāmādipicchādibhyaḥśanelacaḥ |

'लोमन्' आदि शब्दों से विकल्प से 'श', 'पामन्' आदि से विकल्प से 'न', और 'पिच्छ' आदि से विकल्प से 'इलच्' प्रत्यय मत्वर्थ में होते हैं। उदाहरण: पिच्छमस्ति अस्य → पिच्छिलः (या मतुप्-पक्ष में पिच्छवान्)।

श्लोक 2.101

प्रज्ञाश्रद्धार्चाभ्योणः ।

prajñāśraddhārcābhyoṇaḥ |

प्रज्ञा, श्रद्धा, अर्चा और वृत्ति शब्दों से मत्वर्थ में 'ण' प्रत्यय होता है। उदाहरण: प्रज्ञाऽस्यास्ति → प्राज्ञः; श्रद्धावान्→श्राद्धः; आर्चः।

श्लोक 2.102

तपःसहस्त्राभ्यांविनीनी ।

tapaḥsahastrābhyāṁvinīnī |

तपस् और सहस्र शब्दों से मत्वर्थ में 'विनि' और 'इनि' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: तपोऽस्यास्ति/अस्मिन् → तपस्वी; सहस्री।

श्लोक 2.103

अण्च ।

aṇca |

तपस् और सहस्र शब्दों से मत्वर्थ में 'अण्' प्रत्यय भी होता है। उदाहरण: तपस्+अण्=तापसः; सहस्र+अण्=साहस्रः।

श्लोक 2.104

सिकताशर्कराभ्यांच ।

sikatāśarkarābhyāṁca |

सिकता और शर्करा शब्दों से भी मत्वर्थ में 'अण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सैकतो घटः; शार्करं मधु।

श्लोक 2.105

देशेलुबिलचौच ।

deśelubilacauca |

सिकता और शर्करा शब्दों से विकल्प से 'इलच्', 'अण्' और 'मतुप्' प्रत्यय होते हैं, और इनका विकल्प से लोप भी होता है, जब प्रत्ययान्त से किसी क्षेत्र (देश) का बोध हो। उदाहरण: सिकता अस्मिन् विद्यन्ते → सिकता/सिकतिलः/सैकतः/सिकतावान् देशः।

श्लोक 2.106

दन्तउन्नतउरच् ।

dantaunnataurac |

'उन्नत' विशेषण-युक्त प्रथमा-विभक्ति दन्त शब्द से मत्वर्थ में 'उरच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: उन्नता दन्ताः सन्ति अस्य → दन्तुरः (उभरे हुए दाँतों वाला)।

श्लोक 2.107

ऊषशुषिमुष्कमधोरः ।

ūṣaśuṣimuṣkamadhoraḥ |

ऊष, सुषि, मुष्क और मधु शब्दों से मत्वर्थ में 'र' प्रत्यय होता है। उदाहरण: ऊषरं क्षेत्रम् (लवणीय भूमि); सुषिरं काष्ठम् (खोखली लकड़ी); मधुरो गुड़ः।

श्लोक 2.108

द्युद्रुभ्यांमः ।

dyudrubhyāṁmaḥ |

द्यु और द्रु शब्दों से मत्वर्थ में 'म' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्यु+म=द्युमः (सूर्य); द्रु+म=द्रुमः (वृक्ष)।

श्लोक 2.109

केशाद्वोऽन्यतरस्याम् ।

keśādvo'nyatarasyām |

प्रथमा-विभक्ति 'केश' शब्द से विकल्प से 'व' प्रत्यय होता है। उदाहरण: केशा अस्य सन्ति → केशवः।

श्लोक 2.110

गाण्ड्यजगात्संज्ञायाम् ।

gāṇḍyajagātsaṁjñāyām |

संज्ञा के अर्थ में गाण्डी और अजग शब्दों से मत्वर्थ में 'व' प्रत्यय होता है। उदाहरण: गाण्डी+व=गाण्डीव; अजग+व=अजगव (धनुष के नाम)।

श्लोक 2.111

काण्डाण्डादीरन्नीरचौ ।

kāṇḍāṇḍādīrannīracau |

मत्वर्थ में काण्ड और अण्ड शब्दों से क्रमशः 'ईरन्' और 'ईरच्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: काण्ड+ईरन्=काण्डीरः; अण्ड+ईरच्=अण्डीरः।

श्लोक 2.112

रजःकृष्यासुतिपरिषदोवलच् ।

rajaḥkṛṣyāsutipariṣadovalac |

रजस्, कृषि, आसुति और परिषद् शब्दों से मत्वर्थ में 'वलच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: राजस्वला स्त्री; कृषीवलः (किसान); आसुतीवलः (शराब बेचने वाला); परिषद्वलो राजा।

श्लोक 2.113

दन्तशिखात्संज्ञायाम् ।

dantaśikhātsaṁjñāyām |

जब प्रत्ययान्त से संज्ञा (नाम) बने, तब दन्त और शिखा शब्दों से 'वलच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: दन्तावलः/दन्तावलो गजः (बड़े दाँतों वाला हाथी); शिखावलम् नगरम्।

श्लोक 2.114

ज्योत्स्नातमिस्त्राशृङ्गिणोर्जस्विन्नूर्जस्वलगोमिन्मलिनमलीमसाः ।

jyotsnātamistrāśṛṅgiṇorjasvinnūrjasvalagominmalinamalīmasāḥ |

संज्ञा-गठन के लिए ज्योत्स्ना, तमिस्रा, शृङ्गिन्, ओजस्विन्, ऊर्जस्वल, गोमिन्, मलिन और मलीमस शब्दों का निपातन (अनियमित सिद्धि) होता है। उदाहरण: ज्यु+उत्स्+न+टाप्=ज्योत्स्ना (चाँदनी)।

श्लोक 2.115

अतइनिठनौ ।

atainiṭhanau |

प्रथमा-विभक्ति अकारान्त प्रातिपदिक से 'इसका है'/'इसमें है' अर्थों में विकल्प से 'इनि' और 'ठन्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: दण्डोऽस्यास्ति → दण्डी (या दण्डिकः)।

श्लोक 2.116

व्रीह्यादिभ्यश्च ।

vrīhyādibhyaśca |

व्रीहि-आदि-गण के प्रथमा-विभक्ति शब्दों से भी उसी अर्थ में विकल्प से 'इनि' और 'ठन्' प्रत्यय होते हैं (और पक्ष में मतुप् भी)। उदाहरण: व्रीहयोऽस्य सन्ति → व्रीही/व्रीहिकः/व्रीहिमान्।

श्लोक 2.117

तुन्दादिभ्यइलच्च ।

tundādibhyailacca |

तुन्द-आदि-गण के शब्दों से मत्वर्थ में 'इलच्', 'इनि' और 'ठन्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: तुन्द+इनि=तुन्दी; तुन्द+ठन्=तुन्दिकः।

श्लोक 2.118

एकगोपूर्वाट्ठञ्नित्यम् ।

ekagopūrvāṭṭhañnityam |

एक-पूर्वक और गो-पूर्वक शब्दों से मत्वर्थ में नित्य 'ठञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: एकशतमस्यास्ति → ऐकशतिकः; गौशतिकः, गौसहस्रिकः।

श्लोक 2.119

शतसहस्त्रान्ताच्चनिष्कात् ।

śatasahastrāntāccaniṣkāt |

निष्क-पूर्वपदक शत और सहस्र शब्दों से मत्वर्थ में नित्य 'ठञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: निष्कशतमस्यास्ति → नैष्कशतिकः; नैष्कसहस्रिकः।

श्लोक 2.120

रूपादाहतप्रशंसयोर्यप् ।

rūpādāhatapraśaṁsayoryap |

'आहत' (ढला/बना हुआ) और 'प्रशंसा' के अर्थों में रूप शब्द से मत्वर्थ में 'यप्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: आहतं रूपमस्यास्ति → रूप्यो दीनारः; प्रशस्तं रूपमस्यास्ति → रूप्यः पुरुषः।

श्लोक 2.121

अस्मायामेधास्त्रजोविनिः ।

asmāyāmedhāstrajoviniḥ |

प्रथमा-विभक्ति अस्-अन्त शब्दों से और माया, मेधा, स्रज् शब्दों से विकल्प से 'विनि' (विन्) प्रत्यय होता है। उदाहरण: यशोऽस्यास्ति → यशस्विन्→यशस्वी।

श्लोक 2.122

बहुलंछन्दसि ।

bahulaṁchandasi |

छन्दस् (वेद) में 'विनि' प्रत्यय बहुत सामान्यतः प्रयुक्त होता है (और कभी-कभी नहीं भी होता)। उदाहरण: अग्ने तेजस्विन्; किन्तु सूर्यो वर्चस्वान् (मतुप्-सदृश रूप भी मिलता है)।

श्लोक 2.123

ऊर्णायायुस् ।

ūrṇāyāyus |

ऊर्णा शब्द से मत्वर्थ में 'युस्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: ऊर्णा विद्यतेऽस्य/अस्मिन् → ऊर्णायुः।

श्लोक 2.124

वाचोग्मिनिः ।

vācogminiḥ |

प्रथमा-विभक्ति 'वाच्' शब्द से मत्वर्थ में 'ग्मिनि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: वागस्यास्ति → वाग्ग्मी।

श्लोक 2.125

आलजाटचौबहुभाषिणि ।

ālajāṭacaubahubhāṣiṇi |

जब प्रत्ययान्त 'बहुभाषी' (बातूनी) का वाचक हो, तब प्रथमा-विभक्ति वाच् शब्द से 'आलच्' और 'आटच्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: वाचालः, वाचाटः।

श्लोक 2.126

स्वामिन्नैश्वर्ये ।

svāminnaiśvarye |

'ऐश्वर्य' (स्वामित्व) अर्थ में 'स्वामिन्' शब्द निपातन से सिद्ध होता है। उदाहरण: स्वम्=ऐश्वर्यमस्यास्ति → स्वामी।

श्लोक 2.127

अर्श आदिभ्योऽच् ।

arśa ādibhyo'c |

प्रथमा-विभक्ति 'अर्शस्' (बवासीर) आदि शब्दों से मत्वर्थ में 'अच्' (अ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: अर्शोऽस्य विद्यते → अर्शसः।

श्लोक 2.128

द्वन्द्वोपतापगर्ह्यात् प्राणिस्थादिनिः ।

dvandvopatāpagarhyāt prāṇisthādiniḥ |

द्वन्द्व-समास, उपताप (रोग) और निन्दनीय प्राणी-अंग को बताने वाले शब्दों से मत्वर्थ में 'इनि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कटकवलयिनी; कुष्ठी, किलासी; ककुदावर्ती।

श्लोक 2.129

वातातीसाराभ्यांकुक्च ।

vātātīsārābhyāṁkukca |

वात (वायु-रोग) और अतिसार शब्दों से 'इनि' प्रत्यय होता है, और प्रकृति को 'कुक्' का आगम होता है। उदाहरण: वातोऽस्यास्ति → वातकी; अतीसारकी।

श्लोक 2.130

वयसिपूरणात् ।

vayasipūraṇāt |

पूरण-प्रत्ययान्त प्रातिपदिक से, जब 'वयस्' (आयु) द्योतित हो, मत्वर्थ में 'इनि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पञ्चमोऽस्यास्ति मासः/संवत्सरः → पञ्चमी उष्ट्रः; नवमी, दशमी।

श्लोक 2.131

सुखादिभ्यश्च ।

sukhādibhyaśca |

सुख-आदि-गण के शब्दों से भी मत्वर्थ में 'इनि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सुखमस्यास्ति → सुखी; दुःखी।

श्लोक 2.132

धर्मशीलवर्णान्ताच्च ।

dharmaśīlavarṇāntācca |

धर्म-अन्त, शील-अन्त और वर्ण-अन्त शब्दों से मत्वर्थ में 'इनि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: ब्राह्मणधर्मः सोऽस्यास्ति → ब्राह्मणधर्मी; ब्राह्मणशीली; ब्राह्मणवर्णी।

श्लोक 2.133

हस्ताज्जातौ ।

hastājjātau |

जब प्रत्ययान्त जाति (प्रजाति) का वाचक हो, तब हस्त शब्द से मत्वर्थ में 'इनि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: हस्तिऽस्यास्ति → हस्ती (हाथी)।

श्लोक 2.134

वर्णाद्ब्रह्मचारिणि ।

varṇādbrahmacāriṇi |

जब प्रत्ययान्त 'ब्रह्मचारी' का वाचक हो, तब वर्ण शब्द से मत्वर्थ में 'इनि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: वर्णोऽस्यास्ति → वर्णी ब्रह्मचारी।

श्लोक 2.135

पुष्करादिभ्योदेशे ।

puṣkarādibhyodeśe |

जब प्रत्ययान्त किसी विशेष स्थान (देश) का वाचक हो, तब पुष्कर-आदि-गण के शब्दों से 'इनि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पुष्करिणी; पद्मिनी (कमल-तालाब)।

श्लोक 2.136

बलादिभ्योमतुबन्यतरस्याम् ।

balādibhyomatubanyatarasyām |

बल-आदि-गण के शब्दों से विकल्प से 'मतुप्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: बलमस्यास्ति → बलवान्/बली; उत्साहवान्/उत्साही।

श्लोक 2.137

संज्ञायांमन्माभ्याम् ।

saṁjñāyāṁmanmābhyām |

मन्-अन्त और म-अन्त प्रातिपदिक से मत्वर्थ में 'इनि' प्रत्यय होता है, जब पूरे समुदाय से एक संज्ञा बनती हो। उदाहरण: प्रथिमा विद्यतेऽस्याः → प्रथिमिनी (विस्तारवाली); होमो विद्यतेऽस्याः → हेमिनी।

श्लोक 2.138

कंशंभ्यांवभयुस्तितुतयसः ।

kaṁśaṁbhyāṁvabhayustitutayasaḥ |

कम् और शम् शब्दों से 'ब', 'भ', 'युस्', 'ति', 'तु', 'त' और 'यस्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: कम्बः, शम्बः; कम्भः, शम्भः; कंयुः, शंयुः; कन्तिः, कन्तुः, कन्तः, कंयः।

श्लोक 2.139

तुन्दिबलिवटेर्भः ।

tundibalivaṭerbhaḥ |

तुन्दि, बलि और वटि शब्दों से मत्वर्थ में 'भ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: तुन्दिरस्यास्ति → तुन्दिभः; बालिभः; वटिभः।

श्लोक 2.140

अहंशुभमोर्युस् ।

ahaṁśubhamoryus |

'अहम्' (अहंकार) और 'शुभम्' (कल्याण) शब्दों से मत्वर्थ में 'युस्' (यु) प्रत्यय होता है — इस प्रकार दूसरे पाद (द्रव्य/क्षेत्र-वाचक और मत्वर्थीय प्रत्ययों) का समापन होता है। उदाहरण: अहंकारोऽस्यास्ति → अहंयुः।

पञ्चमोऽध्यायः, तृतीयः पादः

श्लोक 3.1

प्राग्दिशोविभक्तिः ।

prāgdiśovibhaktiḥ |

यह अधिकार-सूत्र है: 'दिक्शब्देभ्यः' (5.3.27) सूत्र तक जो भी प्रत्यय विहित होंगे, उन्हें 'विभक्ति' संज्ञा प्राप्त होगी। उदाहरण: ततः, यतः।

श्लोक 3.2

किंसर्वनामबहुभ्योऽद्वयादिभ्यः ।

kiṁsarvanāmabahubhyo'dvayādibhyaḥ |

5.3.27 तक विहित होने वाले ये प्रत्यय द्वि आदि (द्वि, युष्मद्, अस्मद्, भवत्) को छोड़कर, सर्वनाम, किम् और बहु शब्दों के बाद होते हैं। उदाहरण: कुतः, कुत्र (किम्); यतः, यत्र (सर्वनाम); बहुतः, बहुत्र।

श्लोक 3.3

इदम इश् ।

idama iś |

उन्हीं (5.3.27 से पहले वाले) प्रत्ययों के परे होने पर 'इदम्' के स्थान पर 'इश्' आदेश होता है। उदाहरण: इदम्+तसिल्→इतः; इदम्+ह→इह (यहाँ)।

श्लोक 3.4

एतेतौ रथोः ।

etetau rathoḥ |

उन्हीं प्रत्ययों में से र-आदि और थ-आदि प्रत्यय परे होने पर 'इदम्' के स्थान पर क्रमशः 'एत' और 'इत्' आदेश होता है। उदाहरण: इदम्+र्हिल्→एतर्हि (अब); इदम्+स्थमु→इत्थम् (इस प्रकार)।

श्लोक 3.5

एतदोऽन् ।

etado'n |

र-आदि प्रत्यय परे होने पर 'एतद्' के स्थान पर 'एत्', और थ-आदि प्रत्यय परे होने पर 'इत्' आदेश होता है। उदाहरण: एतद्+तसिल्→अतः (नकार-लोप सहित)।

श्लोक 3.6

सर्वस्य सोऽन्यतरस्यां दि ।

sarvasya so'nyatarasyāṁ di |

द-आदि प्रत्यय परे होने पर 'सर्व' के स्थान पर विकल्प से 'स' आदेश होता है। उदाहरण: सर्व+दा→सदा (विकल्प-पक्ष में सर्वदा भी)।

श्लोक 3.7

पञ्चम्यास्तसिल् ।

pañcamyāstasil |

पञ्चमी-विभक्ति में द्वि-आदि से भिन्न सर्वनाम, किम् और बहु शब्दों से 'तसिल्' (तस्) प्रत्यय होता है। उदाहरण: कस्मात्→कस्मात्तस् (कुतः की व्युत्पत्ति)।

श्लोक 3.8

तसेश्च ।

taseśca |

किम्, सर्वनाम और बहु से विहित 'तसि' प्रत्यय के स्थान पर भी 'तसिल्' आदेश होता है। उदाहरण: सर्वस्मिन् काले → सदा/सर्वदा।

श्लोक 3.9

पर्यभिभ्यां च ।

paryabhibhyāṁ ca |

परि (सर्व के अर्थ में) और अभि (उभय के अर्थ में) से भी 'तसिल्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: परि+तसिल्→परितः; अभि+तसिल्→अभितः (दोनों ओर से)।

श्लोक 3.10

सप्तम्यास्त्रल् ।

saptamyāstral |

सप्तमी-विभक्ति में द्वि-आदि से भिन्न सर्वनाम, किम् और बहु शब्दों से 'त्रल्' (त्र) प्रत्यय होता है। उदाहरण: कस्मिन्→कुत्र (किम् को 'कु' आदेश सहित)।

श्लोक 3.11

इदमोहः ।

idamohaḥ |

सप्तमी-विभक्ति इदम् शब्द से 'ह' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अस्मिन्→इह (इदम्→इश् आदेश सहित)।

श्लोक 3.12

किमोऽत् ।

kimo't |

सप्तमी-विभक्ति किम् शब्द से विकल्प से 'अत्' (अ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: कस्मिन्→क्व (व्युत्पत्ति में)।

श्लोक 3.13

वाहचच्छन्दसि ।

vāhacacchandasi |

छन्दस् (वेद) में सप्तमी-विभक्ति किम् शब्द से विकल्प से 'ह' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कुह (कहाँ)।

श्लोक 3.14

इतराभ्योऽपि दृश्यन्ते ।

itarābhyo'pi dṛśyante |

पञ्चमी और सप्तमी से भिन्न प्रथमा आदि विभक्तियों से भी 'तसिल्' आदि प्रत्यय दिखाई देते हैं। उदाहरण: स भवान् → ततः (तद्+तसिल्, भवत् के साथ प्रयोग में)।

श्लोक 3.15

सर्वैकान्यकिंयत्तदःकालेदा ।

sarvaikānyakiṁyattadaḥkāledā |

सप्तमी-विभक्ति सर्व, एक, अन्य, किम्, यत् और तत् शब्दों से 'दा' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सर्वस्मिन् काले → सर्वदा; एकस्मिन् काले → एकदा।

श्लोक 3.16

इदमोर्हिल् ।

idamorhil |

काल-अर्थ में वर्तमान सप्तमी-विभक्ति इदम् शब्द से 'र्हिल्' (र्हि) प्रत्यय होता है। उदाहरण: अस्मिन् काले → इदम्+र्हि (आगे 'अधुना' आदि रूप बनते हैं)।

श्लोक 3.17

अधुना ।

adhunā |

सप्तमी-विभक्ति इदम् शब्द से काल-अर्थ में 'अधुना' प्रत्यय होता है, और इदम् को 'इश्' आदेश निपातन से होता है। उदाहरण: इदम्+अधुना→अधुना (अब)।

श्लोक 3.18

दानीं च ।

dānīṁ ca |

सप्तमी-विभक्ति इदम् शब्द से काल-अर्थ में 'दानीम्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: इदम्+दानीम्→इदानीम् (अब)।

श्लोक 3.19

तदोदा च ।

tadodā ca |

सप्तमी-विभक्ति तत् शब्द से काल-अर्थ में विकल्प से 'दा' और 'दानीम्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: तद्+दा→तदा; तद्+दानीम्→तदानीम् (तब)।

श्लोक 3.20

तयोर्दार्हिलौचच्छन्दसि ।

tayordārhilaucacchandasi |

छन्दस् (वेद) में सप्तमी-विभक्ति इदम् और तत् शब्दों से क्रमशः 'दा' और 'र्हिल्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: अस्मिन् काले→इदा; तस्मिन् काले→तर्हि।

श्लोक 3.21

अनद्यतने र्हिलन्यतरस्याम् ।

anadyatane rhilanyatarasyām |

'अनद्यतन' (आज नहीं होने वाला) काल-अर्थ में सप्तमी-विभक्ति किम्, द्वि-आदि से भिन्न सर्वनाम और बहु शब्दों से विकल्प से 'र्हिल्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कस्मिन् काले→कर्हि (किम् को 'क' आदेश सहित)।

श्लोक 3.22

सद्यःपरुत्, परारि, ऐषमःपरेद्यवि, अद्यपूर्वेद्युरन्येद्युरन्यतरेद्युरितरेद्युरपरेद्युरधरेद्युरुभयेद्युरुत्तरेद्युः ।

sadyaḥparut, parāri, aiṣamaḥparedyavi, adyapūrvedyuranyedyuranyataredyuritaredyuraparedyuradharedyurubhayedyuruttaredyuḥ |

काल-अर्थ में सप्तमी-विभक्ति सर्वनाम से सद्यः, परुत्, परारि, ऐषम्, परेद्यवि, अद्य, पूर्वेद्युः और अन्यतरेद्युः/इतरेद्युः/अपरेद्युः/अधरेद्युः/उभयेद्युः/उत्तरेद्युः आदि शब्दों का निपातन होता है। उदाहरण: अन्यतरस्मिन् अह्नि→अन्यतरेद्युः; उत्तरस्मिन् अह्नि→उत्तरेद्युः।

श्लोक 3.23

प्रकारवचनेथाल् ।

prakāravacanethāl |

'प्रकार' (ढंग) के अर्थ में किम्, द्वि-आदि से भिन्न सर्वनाम और बहु शब्दों से 'थाल्' (था) प्रत्यय होता है। उदाहरण: तेन प्रकारेण→तथा (तद्+था, सन्धि सहित)।

श्लोक 3.24

इदमस्थमुः ।

idamasthamuḥ |

'प्रकार' अर्थ में इदम् शब्द से 'थमु' (थम्) प्रत्यय होता है। उदाहरण: अनेन प्रकारेण→इत्थम् (इदम्→इत् आदेश सहित)।

श्लोक 3.25

किमश्च ।

kimaśca |

'प्रकार' अर्थ में किम् शब्द से भी 'थमु' प्रत्यय होता है। उदाहरण: केन प्रकारेण→कथम् (किम्→क आदेश सहित)।

श्लोक 3.26

थाहेतौचच्छन्दसि ।

thāhetaucacchandasi |

छन्दस् (वेद) में हेतु और प्रकार दोनों अर्थों में किम् शब्द से 'था' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कथा ग्रामं न पृच्छसि (किस कारण गाँव के बारे में नहीं पूछते?); कथा देवा आसन् (देवता कैसे थे?)।

श्लोक 3.27

दिक्शब्देभ्यःसप्तमीपञ्चमीप्रथमाभ्योदिग्देशकालेष्वस्तातिः ।

dikśabdebhyaḥsaptamīpañcamīprathamābhyodigdeśakāleṣvastātiḥ |

दिशा, स्थान और काल के अर्थ में सप्तमी, पञ्चमी और प्रथमा-विभक्ति दिशा-वाचक शब्दों से 'अस्ताति' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पूर्व+अस्ताति→पुरस्तात्।

श्लोक 3.28

दक्षिणोत्तराभ्यामतसुच् ।

dakṣiṇottarābhyāmatasuc |

उसी अर्थ में दक्षिणा और उत्तरा शब्दों से 'अतसुच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: दक्षिणतो वसति; उत्तरत आगतः; दक्षिणतो रमणीयम्।

श्लोक 3.29

विभाषा परावराभ्याम् ।

vibhāṣā parāvarābhyām |

पर और अवर शब्दों से भी उसी दिशा/स्थान/काल अर्थ में विकल्प से 'अतसुच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: परतो वसति/परस्ताद् वसति; अवरतो वसति/अवस्ताद् वसति।

श्लोक 3.30

अञ्चेर्लुक् ।

añcerluk |

अञ्च्-अन्त दिशा-वाचक शब्दों से विहित 'अस्ताति' प्रत्यय का लोप होता है। उदाहरण: प्राच्यां दिशि वसति→प्राग्वसति; प्राग् रमणीयम्।

श्लोक 3.31

उपर्युपरिष्टात् ।

uparyupariṣṭāt |

'अस्ताति' अर्थ में 'उपरि' और 'उपरिष्टात्' — ये दोनों शब्द निपातन से सिद्ध होते हैं। उदाहरण: ऊर्ध्वायां दिशि वसति→उपरि वसति/उपरिष्टाद् वसति।

श्लोक 3.32

पश्चात् ।

paścāt |

उसी 'अस्ताति' अर्थ में 'अपर' शब्द से 'पश्चात्' रूप निपातन से सिद्ध होता है। उदाहरण: अपर+आति→पश्चात्।

श्लोक 3.33

पश्च पश्चा च च्छन्दसि ।

paśca paścā ca cchandasi |

छन्दस् (वेद) में उसी अर्थ में 'पश्च' और 'पश्चा' रूपों का भी निपातन होता है। उदाहरण: पश्च सिंहः/पश्चा सिंहः/पश्चात् सिंहः।

श्लोक 3.34

उत्तराधरदक्षिणादातिः ।

uttarādharadakṣiṇādātiḥ |

'अस्ताति' अर्थ में उत्तर, अधर और दक्षिण शब्दों से 'आति' प्रत्यय होता है। उदाहरण: उत्तर+आति→उत्तरात्; अधरात्, दक्षिणात्।

श्लोक 3.35

एनबन्यतरस्यामदूरेऽपञ्चम्याः ।

enabanyatarasyāmadūre'pañcamyāḥ |

जब अवधि (सन्दर्भ-बिन्दु) दूरवर्ती हो, तब सप्तमी और प्रथमा-विभक्ति उत्तर, अधर और दक्षिण शब्दों से 'अस्ताति' अर्थ में विकल्प से 'एनप्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: उत्तरेण वसति/उत्तराद् वसति/उत्तरतो वसति।

श्लोक 3.36

दक्षिणादाच् ।

dakṣiṇādāc |

सप्तमी और प्रथमा-विभक्ति दक्षिण शब्द से 'अस्ताति' अर्थ में 'आच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: दक्षिणा वसति; दक्षिणा रमणीयम्।

श्लोक 3.37

आहिचदूरे ।

āhicadūre |

अवधि के दूरवर्ती होने पर सप्तमी और प्रथमा-विभक्ति दक्षिण शब्द से विकल्प से 'आहि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: दक्षिणाहि वसति/दक्षिणा वसति।

श्लोक 3.38

उत्तराच्च ।

uttarācca |

अवधि के दूरवर्ती होने पर सप्तमी और प्रथमा-विभक्ति उत्तर शब्द से भी 'आहि' और 'आच्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: उत्तरा वसति/उत्तराहि वसति।

श्लोक 3.39

पूर्वाधरावराणामसिपुरधवश्चैषाम् ।

pūrvādharāvarāṇāmasipuradhavaścaiṣām |

'अस्ताति' अर्थ में पूर्व, अवर और अधर शब्दों से 'असि' प्रत्यय होता है, और इन तीन शब्दों को क्रमशः 'पुर्', 'अव्' और 'अध्' आदेश होता है। उदाहरण: पूर्वस्यां दिशि वसति→पुरो वसति; अधो वसति; अवो वसति।

श्लोक 3.40

अस्तातिच ।

astātica |

'अस्ताति' प्रत्यय के परे रहने पर भी पूर्व, अधर और अवर को क्रमशः 'पुर्', 'अध्' और 'अव्' आदेश होता है। उदाहरण: पुरस्तात् वसति; अधस्तात्; अवस्तात्।

श्लोक 3.41

विभाषाऽवरस्य ।

vibhāṣā'varasya |

'अस्ताति' प्रत्यय के परे रहने पर 'अवर' के स्थान पर विकल्प से 'अव्' आदेश होता है। उदाहरण: अवस्तात् वसति/अवरस्ताद् वसति।

श्लोक 3.42

संख्यायाविधार्थेधा ।

saṁkhyāyāvidhārthedhā |

'विधा' (प्रकार) के अर्थ में संख्या-वाचक शब्दों से 'धा' प्रत्यय होता है। उदाहरण: एकधा भुङ्क्ते (एक प्रकार से खाता है); द्विधा गच्छति; त्रिधा, चतुर्धा।

श्लोक 3.43

अधिकरणविचाले च ।

adhikaraṇavicāle ca |

जब किसी द्रव्य की संख्या में परिवर्तन (बाँटना) अभिप्रेत हो, तब भी संख्या-वाचक शब्दों से स्वार्थ में 'धा' प्रत्यय होता है। उदाहरण: एकं राशिं पञ्चधा कुरु (एक ढेर को पाँच भागों में बाँटो); अष्टधा कुरु।

श्लोक 3.44

एकाद्धोध्यमुञन्यतरस्याम् ।

ekāddhodhyamuñanyatarasyām |

एक शब्द से विहित 'धा' प्रत्यय के स्थान पर विकल्प से 'ध्यमुञ्' आदेश होता है। उदाहरण: एकधा राशिं कुरु/ऐकध्यं राशिं कुरु।

श्लोक 3.45

द्वित्र्योश्चधमुञ् ।

dvitryoścadhamuñ |

द्वि और त्रि शब्दों से विहित 'धा' के स्थान पर विकल्प से 'धमुञ्' आदेश होता है। उदाहरण: द्वि+धा→द्वैधम्।

श्लोक 3.46

एधाच्च ।

edhācca |

द्वि और त्रि शब्दों से विहित 'धा' के स्थान पर विकल्प से 'एधाच्' भी आदेश होता है। उदाहरण: द्वि+एधाच्→द्वेधा; त्रि→त्रेधा।

श्लोक 3.47

याप्येपाशप् ।

yāpyepāśap |

कुत्सित (निन्दित) अर्थ में वर्तमान प्रातिपदिक से स्वार्थ में 'पाशप्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कुत्सितो वैयाकरणः→वैयाकरणपाशः; याज्ञिकपाशः।

श्लोक 3.48

पूरणाद्भागेतीयादन् ।

pūraṇādbhāgetīyādan |

भाग-वाचक पूरण-प्रत्ययान्त 'तीय' शब्द से स्वार्थ में 'अन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्वितीयो भागः→द्वितीयः; तृतीयः।

श्लोक 3.49

प्रागेकादशभ्योऽछन्दसि ।

prāgekādaśabhyo'chandasi |

एकादश से पहले की संख्याओं के भाग-वाचक पूरण-प्रत्ययान्त शब्दों से छन्दस् (वेद) से बाहर स्वार्थ में 'अन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पञ्चमः, सप्तमः, नवमः, दशमः।

श्लोक 3.50

षष्ठाष्टमाभ्यांञच ।

ṣaṣṭhāṣṭamābhyāṁñaca |

भाग-वाचक षष्ठ और अष्टम शब्दों से वेद में 'ञ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: षाष्ठो भागः/षष्ठो भागः; आष्टमो भागः/अष्टमो भागः।

श्लोक 3.51

मानपश्वङ्गयोःकन्लुकौ च ।

mānapaśvaṅgayoḥkanlukau ca |

यदि षष्ठ शब्द तौल के भाग का और अष्टम शब्द पशु-अंग के भाग का वाचक हो, तो 'कन्' प्रत्यय होता है और साथ ही कन् व पूर्व-विहित ञ का लोप भी होता है। उदाहरण: षष्ठको भागो मानं चेत् → षाष्ठः/षष्ठः।

श्लोक 3.52

एकादाकिनिच्चासहाये ।

ekādākiniccāsahāye |

'असहाय' (अकेला) अर्थ में एक शब्द से स्वार्थ में 'आकिनिच्' और 'कन्' प्रत्यय होते हैं (और उनका लोप भी)। उदाहरण: एक+आकिनिच्→एकाकी।

श्लोक 3.53

भूतपूर्वे चरट् ।

bhūtapūrve caraṭ |

'भूतपूर्व' (जो पहले था) अर्थ में वर्तमान प्रातिपदिक से स्वार्थ में 'चरट्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: आढ्यो भूतपूर्वः→आढ्यचरः (जो पहले धनवान था); सुकुमारचरः।

श्लोक 3.54

षष्ठया रूप्य च ।

ṣaṣṭhayā rūpya ca |

षष्ठी-विभक्ति प्रातिपदिक से 'रूप्य' और 'चरट्' दोनों प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: देवदत्तस्य भूतपूर्वो गौः→देवदत्तरूप्यः/देवदत्तचरः।

श्लोक 3.55

अतिशायने तमबिष्ठनौ ।

atiśāyane tamabiṣṭhanau |

'अतिशयन' (अधिकता/श्रेष्ठता) अर्थ में वर्तमान प्रातिपदिक से 'तमप्' (तम) और 'इष्ठन्' (इष्ठ) — ये दो प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: अतिशयेन आढ्यः→आढ्यतमः।

श्लोक 3.56

तिङश्च ।

tiṅaśca |

उसी अतिशयन अर्थ में तिङन्त (क्रियापद) से भी 'तमप्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अतिशयेन पचति→पचतितमम् (सबसे अच्छा पकाता है)।

श्लोक 3.57

द्विवचनविभज्योपपदेतरबीयसुनौ ।

dvivacanavibhajyopapadetarabīyasunau |

जब दो के बीच तुलना (विभज्य) हो, तब उपपद के साथ प्रातिपदिक और तिङन्त से अतिशयन अर्थ में 'तरप्' (तर) और 'ईयसुन्' (ईयस्) प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: अनयोरतिशयेन लघुः→लघुतरः।

श्लोक 3.58

अजादी गुणवचनादेव ।

ajādī guṇavacanādeva |

'इष्ठन्' और 'ईयसुन्' प्रत्यय केवल गुण-वाचक शब्दों से ही विहित होते हैं। उदाहरण: पटीयान्, लघीयान्; पटिष्ठः, लघिष्ठः।

श्लोक 3.59

तुश्छन्दसि ।

tuśchandasi |

तृन्- और तृच्-प्रत्ययान्त (कर्तृवाचक) शब्दों से छन्दस् (वेद) में भी 'इष्ठन्' और 'ईयसुन्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: कर्तृ+इष्ठन्→करिष्ठः; कर्तृ+ईयसुन्→करीयान्।

श्लोक 3.60

प्रशस्यस्य श्रः ।

praśasyasya śraḥ |

इष्ठन्/ईयसुन् (स्वर-आदि) प्रत्यय परे होने पर 'प्रशस्य' (प्रशंसनीय) के स्थान पर 'श्र' आदेश होता है। उदाहरण: प्रशस्य+इष्ठन्→श्रेष्ठः।

श्लोक 3.61

ज्य च ।

jya ca |

उन्हीं स्वर-आदि प्रत्ययों के परे 'प्रशस्य' के स्थान पर 'ज्य' आदेश भी होता है। उदाहरण: प्रशस्य+इष्ठन्→ज्येष्ठः।

श्लोक 3.62

वृद्धस्य च ।

vṛddhasya ca |

उन्हीं प्रत्ययों के परे 'वृद्ध' के स्थान पर भी 'ज्य' आदेश होता है। उदाहरण: वृद्ध→ज्येष्ठः (वृद्धि-सहित)।

श्लोक 3.63

अन्तिकबाढयोर्नेदसाधौ ।

antikabāḍhayornedasādhau |

उन्हीं प्रत्ययों के परे अन्तिक और बाढ़ शब्दों को क्रमशः 'नेद' और 'साध' आदेश होता है। उदाहरण: नेदिष्ठम्, नेदीयः (सबसे/अधिक निकट); साधिष्ठम्, साधीयः (सबसे/अधिक अच्छा)।

श्लोक 3.64

युवाल्पयोः कनन्यतरस्याम् ।

yuvālpayoḥ kananyatarasyām |

अतिशयन अर्थ में युवन् और अल्प शब्दों को इन प्रत्ययों के परे विकल्प से 'कन्' आदेश होता है। उदाहरण: अतिशयेन युवा→कनिष्ठः/यविष्ठः; अल्पिष्ठः।

श्लोक 3.65

विन्मतोर्लुक् ।

vinmatorluk |

इष्ठन्/ईयसुन् प्रत्यय परे होने पर 'विन्' और 'मतुप्' — इन दो प्रत्ययों का लोप होता है। उदाहरण: स्त्रग्विन्+इष्ठन्→स्रजिष्ठः; स्रज्+ईयसुन्→स्रजीयान्।

श्लोक 3.66

प्रशंसायां रूपप् ।

praśaṁsāyāṁ rūpap |

'प्रशंसा' अर्थ में वर्तमान प्रातिपदिक से स्वार्थ में 'रूपप्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: प्रशस्तो वैयाकरणः→वैयाकरणरूपः; तिङन्त से भी: पचतिरूपम् (अच्छा पकाता है)।

श्लोक 3.67

ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः ।

īṣadasamāptau kalpabdeśyadeśīyaraḥ |

'ईषद्-असमाप्ति' (कुछ कमी) अर्थ में प्रातिपदिक और तिङन्त से 'कल्पप्' (कल्प), 'देश्य' और 'देशीयर्' (देशीय) — ये तीन प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: ईषदसमाप्तो विद्वान्→विद्वत्कल्पः।

श्लोक 3.68

विभाषा सुपो बहुच्पुरस्तात्तु ।

vibhāṣā supo bahucpurastāttu |

उसी 'ईषद्-असमाप्ति' अर्थ में सुबन्त (विभक्ति-प्रत्ययान्त) से विकल्प से 'बहुच्' (बहु) प्रत्यय होता है, जो सुबन्त के आगे (पहले) लगता है, पीछे नहीं। उदाहरण: ईषत्समाप्तः लेखः→बहुलेखः; पक्ष में लेखकल्पः।

श्लोक 3.69

प्रकारवचने जातीयर् ।

prakāravacane jātīyar |

'प्रकार' अर्थ में सुबन्त से स्वार्थ में 'जातीयर्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पटुप्रकारः→पटुजातीयः; मृदुजातीयः।

श्लोक 3.70

प्रागिवात्कः ।

prāgivātkaḥ |

'इवे प्रतिकृतौ' (5.3.96) सूत्र तक 'क' प्रत्यय होता है — यह अधिकार-सूत्र है। उदाहरण: अश्वकः, गर्दभकः।

श्लोक 3.71

अव्ययसर्वनाम्नामकच्प्राक्टेः ।

avyayasarvanāmnāmakacprākṭeḥ |

यहाँ से 5.3.96 तक अव्यय, सर्वनाम और तिङन्त की विभक्ति ('टि') से पहले 'अकच्' (अक) प्रत्यय होता है। उदाहरण: युवकयोः, आवकयोः; कहीं-कहीं सुबन्त-प्रत्यय के पहले भी: त्वयका, मयका।

श्लोक 3.72

कस्यचदः ।

kasyacadaḥ |

अकच् प्रत्यय होने पर ककारान्त प्रातिपदिक के अन्तिम 'क' को 'द' आदेश होता है। उदाहरण: धिक्+अकच्→धकित्; पृथक्+अकच्→पृथकत्।

श्लोक 3.73

अज्ञाते ।

ajñāte |

'सामान्यतः ज्ञात किन्तु विशेष रूप से अज्ञात' अर्थ में प्रातिपदिक और तिङन्त से यथोचित प्रत्यय होता है। उदाहरण: अज्ञातोऽश्वः→अश्वकः, गर्दभकः; उच्चकैः, नीचकैः।

श्लोक 3.74

कुत्सिते ।

kutsite |

'कुत्सित' (निन्दित) अर्थ में तिङन्त, सुबन्त और प्रातिपदिक से यथोचित प्रत्यय ('क' या 'अकच्') होता है। उदाहरण: कुत्सितोऽश्वः→अश्वकः।

श्लोक 3.75

संज्ञायां कन् ।

saṁjñāyāṁ kan |

जब प्रत्ययान्त संज्ञा (नाम) का वाचक हो, तब कुत्सित अर्थ में प्रातिपदिक से 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शूद्र+कन्=शूद्रकः; राध+कन्=राधकः।

श्लोक 3.76

अनुकम्पायाम् ।

anukampāyām |

'अनुकम्पा' (स्नेह/करुणा) अर्थ में भी तिङन्त, सुबन्त और प्रातिपदिक से यथोचित प्रत्यय ('क'/'अकच्') होता है। उदाहरण: अज्ञातोऽश्वः→अश्वकः (करुणा-भाव में भी यही रूप)।

श्लोक 3.77

नीतौ च तद्युक्तात् ।

nītau ca tadyuktāt |

जब सामनीति (कूटनीतिक व्यवहार) अभिप्रेत हो, तब परम्परा या अनुकम्पा से जुड़े शब्दों से भी यथोचित प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: तिल+अकच्=तिलकाः; धान्य+अकच्=धानकाः।

श्लोक 3.78

बह्वचो मनुष्यनाम्नष्ठज्वा ।

bahvaco manuṣyanāmnaṣṭhajvā |

अनुकम्पा और नीति के अर्थ में अनेक-स्वर वाले मनुष्य-वाचक प्रातिपदिकों से विकल्प से 'ठच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: देवदत्त+ठच्→देविकः (मध्य भाग का लोप सहित); यज्ञदत्त+ठच्→यज्ञिकः।

श्लोक 3.79

घनिलचौ च ।

ghanilacau ca |

उन्हीं अर्थों में अनेक-स्वर वाले मनुष्य-वाचक शब्दों से 'घन्', 'इलच्' और 'ठच्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: यज्ञ+घन्=यज्ञियः; यज्ञ+इलच्=यज्ञिलः; यज्ञ+ठच्=यज्ञिकः।

श्लोक 3.80

प्राचामुपादेरडज्वुचौ च ।

prācāmupāderaḍajvucau ca |

जिन अनेक-स्वर वाले मनुष्य-वाचक शब्दों के आरम्भ में 'उप' हो, उनसे 'अडच्', 'वुच्' और (पूर्वोक्त) प्रत्यय विकल्प से होते हैं। उदाहरण: उपेन्द्रदत्त+ठच्→उपिकः; उपेन्द्रदत्त+घन्→उपियः।

श्लोक 3.81

जातिनाम्नः कन् ।

jātināmnaḥ kan |

व्याघ्र आदि शब्द, जो एक जाति के वाचक होते हैं, यदि मनुष्य के नाम के रूप में प्रयुक्त हों तो नीति के अर्थ में उनसे 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: व्याघ्र+कन्=व्याघ्रकः; सिंह+कन्=सिंहकः।

श्लोक 3.82

अजिनान्तस्योत्तरपदलोपश्च ।

ajināntasyottarapadalopaśca |

'अजिन'-अन्त मनुष्य-वाचक प्रातिपदिक से अनुकम्पा अर्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है, और 'अजिन' पद का लोप होता है। उदाहरण: व्याघ्राजिन+कन्→व्याघ्रकः (अजिन का लोप करके)।

श्लोक 3.83

ठाजादावूर्ध्वं द्वितीयादचः ।

ṭhājādāvūrdhvaṁ dvitīyādacaḥ |

इस प्रकरण में विहित अनुकम्पा और नीति के 'ठ' तथा स्वर-आदि प्रत्ययों के परे प्रकृति के दूसरे स्वर से आगे के भाग का लोप होता है। उदाहरण: देवदत्त+ठच्→देविकः; देवदत्त+घन्→देवियः।

श्लोक 3.84

शेवलसुपरिविशालवरुणार्यमादीनां तृतीयात् ।

śevalasupariviśālavaruṇāryamādīnāṁ tṛtīyāt |

शेवल आदि मनुष्य-नाम वाले शब्दों के तीसरे स्वर से आगे के भाग का 'ठ' तथा स्वर-आदि प्रत्ययों के परे लोप होता है। उदाहरण: शेवलदत्तः (अनुकम्पित)→शेवलिकः, शेवलियः, शेवलिलः।

श्लोक 3.85

अल्पे ।

alpe |

'अल्प' (छोटापन) के अर्थ में वर्तमान प्रातिपदिक से यथोचित प्रत्यय होता है। उदाहरण: अल्पं तैलम्→तैलकम्, घृतकम्; सर्वनाम से 'अकच्': सर्वकम्, विश्वकम्।

श्लोक 3.86

ह्रस्वे ।

hrasve |

'ह्रस्व' (छोटापन/नाटापन) के अर्थ में भी वर्तमान प्रातिपदिक से यथोचित प्रत्यय होता है। उदाहरण: ह्रस्वो वृक्षः→वृक्षकः; प्लक्षकः, स्तम्भकः।

श्लोक 3.87

संज्ञायां कन् ।

saṁjñāyāṁ kan |

ह्रस्वत्व के कारण किसी संज्ञा (नाम) के गठन के लिए प्रातिपदिक से 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: वेणु+कन्=वेणुकः; दण्ड+कन्=दण्डकः।

श्लोक 3.88

कुटीशमीशुण्डाभ्यो रः ।

kuṭīśamīśuṇḍābhyo raḥ |

कुटी, शमी और शुण्डा शब्दों से ह्रस्वत्व-द्योतन के लिए 'र' प्रत्यय होता है। उदाहरण: ह्रस्वा कुटी→कुटीरः; शमीरः, शुण्डारः।

श्लोक 3.89

कुत्वा डुपच् ।

kutvā ḍupac |

ह्रस्वत्व-द्योतन के लिए 'कुतू' शब्द से 'डुपच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: ह्रस्वा कुतूः→कुतुपम्।

श्लोक 3.90

कासूगोणीभ्यांष्टरच् ।

kāsūgoṇībhyāṁṣṭarac |

ह्रस्वत्व-द्योतन के लिए कासू और गोणी शब्दों से 'ष्टरच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: ह्रस्वा कासू→कासूतरी; गोणीतरी।

श्लोक 3.91

वत्सोक्षाश्वर्षभेभ्यश्च तनुत्वे ।

vatsokṣāśvarṣabhebhyaśca tanutve |

'तनुत्व' (कोमलता/युवावस्था) के द्योतन के लिए वत्स, उक्षन्, अश्व और ऋषभ शब्दों से 'ष्टरच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: वत्सतरः, उक्षतरः, अश्वतरः, ऋषभतरः।

श्लोक 3.92

किं यत्तदोनिर्धारणेद्वयोरेकस्यडतरच् ।

kiṁ yattadonirdhāraṇedvayorekasyaḍatarac |

दो में से एक के निर्धारण (कौन-सा) के अर्थ में किम्, यद् और तद् शब्दों से 'डतरच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अनयोः कः वैष्णवः→कतरः (इन दोनों में कौन वैष्णव है)।

श्लोक 3.93

वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने डतमच् ।

vā bahūnāṁ jātiparipraśne ḍatamac |

बहुतों में से एक को जाति (प्रकार) के प्रश्न में निर्धारित करने के अर्थ में किम्, यद् और तद् शब्दों से विकल्प से 'डतमच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कतमो भवतां कठः (आप में से किस शाखा का)।

श्लोक 3.94

एकाच्च प्राचाम् ।

ekācca prācām |

उन्हीं अर्थों में एक शब्द से भी विकल्प से 'डतरच्' और 'डतमच्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: एकतरो भवतोर्देवदत्तः; एकतमो भवतां देवदत्तः।

श्लोक 3.95

अवक्षेपणे कन् ।

avakṣepaṇe kan |

'अवक्षेपण' (उलाहना/ताना) के अर्थ में वर्तमान प्रातिपदिक से 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: व्याकरणकेन नाम त्वं गर्वितः (व्याकरण के ज्ञान के बल पर तू अभिमानी है)।

श्लोक 3.96

इवेप्रतिकृतौ ।

ivepratikṛtau |

'प्रतिकृति' (प्रतिमा/मूरत) अर्थ में वर्तमान प्रातिपदिक से 'इव' (सदृश) अर्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अश्व इव प्रतिकृतिः→अश्वकः (घोड़े जैसी मूरत)।

श्लोक 3.97

संज्ञायां च ।

saṁjñāyāṁ ca |

यदि प्रत्ययान्त से संज्ञा (नाम) बने, तब भी 'इव' अर्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अश्वकः, उष्ट्रकः, गर्दभकः।

श्लोक 3.98

लुम्मनुष्ये ।

lummanuṣye |

जब प्रत्ययान्त मनुष्य का वाचक हो, तब संज्ञा-सूत्र से विहित 'कन्' प्रत्यय का लोप होता है। उदाहरण: चञ्चा+कन्→चञ्चा (कन् का लोप)।

श्लोक 3.99

जीविकार्थे चापण्ये ।

jīvikārthe cāpaṇye |

जब जीविका के लिए बनी, बिकाऊ न होने वाली वस्तु (अपण्य) अभिप्रेत हो, तब भी विहित प्रत्यय का लोप होता है। उदाहरण: वासुदेवः, शिवः, स्कन्दः, विष्णुः (महापुरुषों की मूर्तियाँ, जो प्राचीन काल में बेची नहीं जाती थीं, केवल दिखाकर जीविका चलाई जाती थी)।

श्लोक 3.100

देवपथादिभ्यश्च ।

devapathādibhyaśca |

'इवे प्रतिकृतौ' और 'संज्ञायां च' सूत्रों से विहित 'कन्' प्रत्यय का देवपथ आदि शब्दों से भी लोप होता है। उदाहरण: देवपथः, जलपथः, राजपथः (इनकी प्रतिकृतियों को भी उन्हीं नामों से पुकारा जाता है)।

श्लोक 3.101

वस्तेर्ढञ् ।

vasterḍhañ |

यहाँ से आगे विहित प्रत्यय 'इव' अर्थ में — प्रतिकृति के लिए या दोनों (मूल और प्रतिकृति) के लिए — समझने चाहिए। उदाहरण: वस्ति इव→वास्तेयः।

श्लोक 3.102

शिलाया ढः ।

śilāyā ḍhaḥ |

शिला शब्द से 'इव' (सादृश्य) अर्थ में 'ढ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शिला+ढ=शिलेयम्।

श्लोक 3.103

शाखादिभ्यो यत् ।

śākhādibhyo yat |

शाखा आदि शब्दों से 'इव' अर्थ में 'यत्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शाखा+यत्=शाख्यः; मुख+यत्=मुख्यः; जघन+यत्=जघन्यः।

श्लोक 3.104

द्रव्यं च भव्ये ।

dravyaṁ ca bhavye |

जब प्रत्ययान्त 'भव्य' (सुन्दर/शुभ) का वाचक हो, तब द्रु शब्द से 'इव' अर्थ में 'यत्' प्रत्यय निपातन से सिद्ध होता है। उदाहरण: द्रव्योऽयं राजपुत्रः (यह राजकुमार सुन्दर है)।

श्लोक 3.105

कुशाग्राच्छः ।

kuśāgrācchaḥ |

कुशाग्र शब्द से 'इव' अर्थ में 'छ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कुशाग्रमिव सूक्ष्मत्वात्→कुशाग्रीया बुद्धिः (कुश की नोक जैसी तीक्ष्ण बुद्धि)।

श्लोक 3.106

समासाच्च तद्विषयात् ।

samāsācca tadviṣayāt |

'इव' अर्थ से युक्त समास से भी 'इव' अर्थ में 'छ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: काकतालम् (कौवे का बैठना और ताड़-फल का गिरना, दोनों 'इव' अर्थों का समास) → काकतालीयम् (संयोग से घटित)।

श्लोक 3.107

शर्करादिभ्योऽण् ।

śarkarādibhyo'ṇ |

शर्करा आदि शब्दों से 'इव' अर्थ में 'अण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शर्करा+अण्=शर्करम्; कपालिका+अण्=कपालिकम्।

श्लोक 3.108

अङ्गुल्यादिभ्यष्ठक् ।

aṅgulyādibhyaṣṭhak |

अङ्गुली आदि शब्दों से 'इव' अर्थ में 'ठक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अङ्गुली+ठक्=आङ्गुलिकः; बभ्रु+ठक्=बाभ्रुकः।

श्लोक 3.109

एकशालायाष्ठजन्यतरस्याम् ।

ekaśālāyāṣṭhajanyatarasyām |

एकशाला शब्द से 'इव' अर्थ में विकल्प से 'ठच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: एकशाला+ठच्=एकशालिकः; विकल्प में ऐकशालिकः।

श्लोक 3.110

कर्कलोहितादीकक् ।

karkalohitādīkak |

कर्क और लोहित शब्दों से 'इव' अर्थ में 'ईकक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कर्क+ईकक्=कार्क्कीकः; लोहित+ईकक्=लौहितीकः।

श्लोक 3.111

प्रत्नपूर्वविश्वेमात्थाल्छन्दसि ।

pratnapūrvaviśvemātthālchandasi |

प्रत्न, पूर्व, विश्व और इम शब्दों से 'इव' अर्थ में छन्दस् (वेद) में 'थाल्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: प्रत्न+इव=प्रत्नथा; पूर्व+इव=पूर्वथा; विश्व+इव=विश्वथा।

श्लोक 3.112

पूगाञ्ञ्योऽग्रामणीपूर्वात् ।

pūgāññyo'grāmaṇīpūrvāt |

जब 'अग्रामणी' (ग्राम-मुखिया नहीं) शब्द पहले हो, तब समूह-वाचक शब्द से 'इव' अर्थ में 'ञ्य' प्रत्यय होता है। उदाहरण: लोहितध्वज+ञ्य=लौहितध्वज्यः; शिबि+ञ्य=शैब्यः।

श्लोक 3.113

व्रातच्फञोरस्त्रियाम् ।

vrātacphañorastriyām |

व्रात-वाचक और च्फञ्-प्रत्ययान्त प्रातिपदिकों से स्वार्थ में पुल्लिंग/नपुंसकलिंग में (स्त्रीलिंग को छोड़कर) 'ञ्य' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कापोतपाक्यः, कापोतपाक्यौ, कपोतपाकाः; व्रैहिमत्यः।

श्लोक 3.114

आयुधजीविसंघाञ्ञ्यड्वाहीकेष्वब्राह्मणराजन्यात् ।

āyudhajīvisaṁghāññyaḍvāhīkeṣvabrāhmaṇarājanyāt |

वाहीक-देश में प्रचलित आयुध-जीवी संघ-वाचक, ब्राह्मण और राजन्य से भिन्न प्रातिपदिकों से स्वार्थ में 'ञ्यट्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कौण्डीबृस्यः, कौण्डीबृस्यौ, कौण्डीबृसाः; मालव्यः।

श्लोक 3.115

वृकाट्टेण्यण् ।

vṛkāṭṭeṇyaṇ |

आयुध-जीवी संघ-वाचक वृक शब्द से 'टेण्यण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: वार्केण्यः, वार्केण्यौ, वृकाः।

श्लोक 3.116

दामन्यादित्रिगर्तषष्ठाच्छः ।

dāmanyāditrigartaṣaṣṭhācchaḥ |

आयुध-जीवी संघ-वाचक दामिनी आदि शब्दों और त्रिगर्त-षष्ठ शब्द से स्वार्थ में 'छ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: दामनि+छ=दामनीयः; औलपि+छ=औलपीयः।

श्लोक 3.117

पर्श्वादियौधेयादिभ्यामणञौ ।

parśvādiyaudheyādibhyāmaṇañau |

आयुध-जीवी संघ-वाचक पर्शु आदि और यौधेय आदि शब्दों से स्वार्थ में क्रमशः 'अण्' और 'अञ्' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: पार्शवः, पार्शवौ, पार्शवः; यौधेयः, शौक्रेयः।

श्लोक 3.118

अभिजिद्विदभृच्छालावच्छिखावच्छमीवदूर्णावच्छ्रुमदणो यञ् ।

abhijidvidabhṛcchālāvacchikhāvacchamīvadūrṇāvacchrumadaṇo yañ |

अण्-प्रत्ययान्त अभिजित् आदि शब्दों से स्वार्थ में 'यञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अभिजित्+अण्=आभिजितः, तदन्त+यञ्=आभिजित्यः; वैदभृत्यः; शालावत्यः।

श्लोक 3.119

ञ्यादयस्तद्राजाः ।

ñyādayastadrājāḥ |

'पूगाञ्ञ्योऽग्रामणीपूर्वात्' (5.3.112) से विहित प्रत्यय, और उसके बाद विहित प्रत्यय भी, 'तद्राज' नामक तकनीकी संज्ञा पाते हैं — इसके साथ तीसरे पाद का समापन होता है। उदाहरण: लोहितध्वज+ञ्य=लौहितध्वज्यः; शिबि+ञ्य=शैब्यः।

पञ्चमोऽध्यायः, चतुर्थः पादः

श्लोक 4.1

पादशतस्य संख्यादेर्वीप्सायां वुन्लोपश्च ।

pādaśatasya saṁkhyādervīpsāyāṁ vunlopaśca |

संख्या-पूर्वक पाद-अन्त और शत-अन्त शब्दों से 'वीप्सा' (बार-बार/प्रत्येक) के अर्थ में 'वुन्' प्रत्यय होता है, और साथ ही अन्त्य अकार का लोप होता है। उदाहरण: द्विपाद्+इक→द्विपादिका।

श्लोक 4.2

दण्डव्यवसर्गयोश्च ।

daṇḍavyavasargayośca |

दण्ड (जुर्माना) और व्यवसर्ग (बाँटना) के अर्थ में भी संख्या-पूर्वक पाद-अन्त और शत-अन्त शब्दों से 'वुन्' प्रत्यय और अन्त्य-लोप होता है। उदाहरण: स्थूल प्रकार अर्थ में: स्थूलकः, अणुकः, माषकः (देखें अगला सूत्र)।

श्लोक 4.3

स्थूलादिभ्यः प्रकारवचने कन् ।

sthūlādibhyaḥ prakāravacane kan |

'प्रकार' (ढंग) के द्योतन के लिए स्थूल आदि शब्दों से 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: स्थूल+कन्=स्थूलकः; अणु+कन्=अणुकः; माष+कन्=माषकः; कृष्ण+कन्=कृष्णकः।

श्लोक 4.4

अनत्यन्तगतौ क्तात् ।

anatyantagatau ktāt |

क्त-प्रत्ययान्त (भूतकालिक कृदन्त) शब्दों से आंशिक सम्बन्ध ('पूरी तरह नहीं') के द्योतन के लिए 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: भिन्न+कन्=भिन्नकः; छिन्न+कन्=छिन्नकः।

श्लोक 4.5

न सामिवचने ।

na sāmivacane |

जब 'सामि' (आधा) या उसी अर्थ का शब्द उपपद हो, तब क्त-प्रत्ययान्त शब्दों से वह 'कन्' प्रत्यय नहीं होता। उदाहरण: सामिकृतम् (आधा किया गया), सामिभुक्तम्; समानार्थक शब्दों से भी: नेमकृतम्।

श्लोक 4.6

बृहत्या आच्छादने ।

bṛhatyā ācchādane |

'आच्छादन' (ढकना/ओढ़ना) के अर्थ में वर्तमान बृहती शब्द से स्वार्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: बृहती+कन्=बृहतिका (एक ओढ़नी)।

श्लोक 4.7

अषडक्षाशितङ्ग्वलंङ्कर्मालंपुरुषाध्युत्तरपदात्खः ।

aṣaḍakṣāśitaṅgvalaṁṅkarmālaṁpuruṣādhyuttarapadātkhaḥ |

अषडक्ष, आशितङ्गु, अलङ्कर्मन्, अलम्पुरुष शब्दों से, और 'अधि'-उत्तरपद वाले शब्दों से स्वार्थ में 'ख' प्रत्यय होता है। उदाहरण: राजाधि+ख=राजाधीनः; ईश्वराधि+ख=ईश्वराधीनः।

श्लोक 4.8

विभाषाञ्चेरदिक्स्त्रियाम् ।

vibhāṣāñceradikstriyām |

अञ्च्-धातु से बने और स्त्रीलिंग-रहित दिशा-वाचक शब्दों से स्वार्थ में विकल्प से 'ख' प्रत्यय होता है (यदि प्रकृति स्त्रीत्व-रहित दिशा का वाचक हो)। उदाहरण: प्राक्+ख=प्राचीनम्; प्रत्यक्+ख=प्रतीचीनम्; अवाक्+ख=अवाचीनम्।

श्लोक 4.9

जात्यन्ताच्छ बन्धुनि ।

jātyantāccha bandhuni |

'बन्धु' (जाति दर्शाने वाली वस्तु) अर्थ में जाति-वाचक शब्दान्त प्रातिपदिक से 'छ' प्रत्यय होता है। उदाहरण: ब्राह्मणजाति+छ=ब्राह्मणजातीयः; क्षत्रियजातीयः; वैश्यजातीयः।

श्लोक 4.10

स्थानान्ताद्विभाषा सस्थानेनेति चेत् ।

sthānāntādvibhāṣā sasthāneneti cet |

'स्थान'-अन्त प्रातिपदिक से विकल्प से 'छ' प्रत्यय होता है, यदि प्रत्ययान्त से 'समान स्थान वाला' अर्थ निकलता हो। उदाहरण: पित्रा तुल्यः→पितृस्थानीयः/पितृस्थानः; मातृस्थानीयः/मातृस्थानः।

श्लोक 4.11

किमेत्तिङ्गव्ययघादाम्वद्रव्यप्रकर्षे ।

kimettiṅgavyayaghādāmvadravyaprakarṣe |

यदि किम्, ए-अन्त, तिङन्त या अव्यय के बाद 'घ' (तमप्/तरप्) प्रत्यय आया हो, तो उस घ-प्रत्ययान्त शब्द से द्रव्य-भिन्न (गुण/क्रिया) अर्थ की अधिकता (प्रकर्ष) में 'आमु' (आम्) प्रत्यय होता है। उदाहरण: पचतितमम्→पचतितमाम् (सबसे बढ़िया पकाता है)।

श्लोक 4.12

अमु च च्छन्दसि ।

amu ca cchandasi |

उन्हीं घ-प्रत्ययान्त शब्दों से छन्दस् (वेद) में 'अमु' प्रत्यय होता है। उदाहरण: किंतराम्, किंतमाम्; पचतितराम्, पचतितमाम्; उच्चैस्तराम्, उच्चैस्तमाम्।

श्लोक 4.13

अनुगादिनष्ठक् ।

anugādinaṣṭhak |

अनुगादिन् शब्द से स्वार्थ में 'ठक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अनुगादि+ठक्=अनुगादिकः।

श्लोक 4.14

णचःस्त्रियामञ् ।

ṇacaḥstriyāmañ |

'कर्म-व्यतिहार' (आपसी क्रिया-अदला-बदली) अर्थक णच्-प्रत्ययान्त शब्द से स्वार्थ में 'अञ्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: व्यावक्रोशी, व्यावलेखी, व्यावहासी।

श्लोक 4.15

अणिनुणः ।

aṇinuṇaḥ |

इनुण्-प्रत्ययान्त शब्द से स्वार्थ में 'अण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सांराविणम्, सांकूटिनम्।

श्लोक 4.16

विसारिणो मत्स्ये ।

visāriṇo matsye |

'मत्स्य' (मछली) अर्थ में वर्तमान विसारिन् शब्द से स्वार्थ में 'अण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: वैसारिणो मत्स्यः (इधर-उधर तैरने वाली मछली)।

श्लोक 4.17

संख्यायाःक्रियाभ्यावृत्तिगणने कृत्वसुच् ।

saṁkhyāyāḥkriyābhyāvṛttigaṇane kṛtvasuc |

क्रिया की आवृत्ति (कितनी बार दुहराई गई) की गणना अर्थ में संख्या-वाचक शब्दों से स्वार्थ में 'कृत्वसुच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सप्तकृत्वः (सात बार), पञ्चकृत्वः।

श्लोक 4.18

द्वित्रिचतुर्भ्यःसुच् ।

dvitricaturbhyaḥsuc |

उसी 'आवृत्ति-गणना' में द्वि, त्रि और चतुर् शब्दों से 'सुच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्विर्भुङ्क्ते (दो बार खाता है); त्रिर्भुङ्क्ते; चतुर्भुक्तम्।

श्लोक 4.19

एकस्य सकृच्च ।

ekasya sakṛcca |

उसी अर्थ में एक शब्द से 'सुच्' प्रत्यय होता है, और एक के स्थान पर 'सकृत्' रूप निपातन से सिद्ध होता है। उदाहरण: सकृद्भुङ्क्ते (एक बार खाता है); सकृदधीते।

श्लोक 4.20

विभाषा बहोर्धाऽविप्रकृष्टकाले ।

vibhāṣā bahordhā'viprakṛṣṭakāle |

जब क्रियाएँ निकट-कालिक हों, तो उनकी आवृत्ति की गणना में 'बहु' शब्द से विकल्प से 'धा' प्रत्यय होता है। उदाहरण: बहुधा दिवसस्य भुङ्क्ते/बहुकृत्वो दिवसस्य भुङ्क्ते।

श्लोक 4.21

तत्प्रकृतवचनेमयट् ।

tatprakṛtavacanemayaṭ |

'प्रकृत' (प्रचुरता से बना/प्रस्तुत) अर्थ में प्रथमा-विभक्ति प्रातिपदिक से 'मयट्' (मय) प्रत्यय होता है। उदाहरण: अन्नं प्रकृतम्→अन्नमयम् (अनाज से बना/भरपूर भोजन)।

श्लोक 4.22

समूहवच्चबहुषु ।

samūhavaccabahuṣu |

जब बहुत-सी वस्तुओं का उल्लेख करना हो, तब समूहार्थक प्रत्यय के साथ-साथ 'मयट्' प्रत्यय भी विकल्प से होता है। उदाहरण: मोदकाः प्राचुर्येण प्रस्तुताः→मौदकिकम्/मोदकमयम्।

श्लोक 4.23

अनन्तावसथेतिहभेषजाञ्ञ्यः ।

anantāvasathetihabheṣajāññyaḥ |

अनन्त, आवसथ, इति ह और भेषज शब्दों से स्वार्थ में 'ञ्य' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अनन्त+ञ्य=आनन्त्यम्; आवसथ+ञ्य=आवसथ्यम्; इतिह+ञ्य=ऐतिह्यम्।

श्लोक 4.24

देवतान्तात्तादर्थ्ये यत् ।

devatāntāttādarthye yat |

चतुर्थी-विभक्ति में देवता-शब्दान्त प्रातिपदिक से 'तादर्थ्य' (उसके लिए) अर्थ में 'यत्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अग्निदेवता+यत्=अग्निदेवत्यम्; पितृदेवता+यत्=पितृदेवत्यम्।

श्लोक 4.25

पादार्घाभ्यां च ।

pādārghābhyāṁ ca |

चतुर्थी-विभक्ति पाद और अर्ध शब्दों से उसी 'तादर्थ्य' अर्थ में 'यत्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पाद+यत्=पाद्यम्; अर्घ+यत्=अर्घ्यम्।

श्लोक 4.26

अतिथेर्ञ्यः ।

atitherñyaḥ |

चतुर्थी-विभक्ति अतिथि शब्द से उसी अर्थ में 'ञ्य' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अतिथि+ञ्य=आतिथ्यम् (अतिथि-सत्कार)।

श्लोक 4.27

देवात्तल् ।

devāttal |

देव शब्द से स्वार्थ में 'तल्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: देव+तल्=देवता।

श्लोक 4.28

अवेःकः ।

aveḥkaḥ |

अवि शब्द से स्वार्थ में 'क' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अवि+क=अविकः (भेड़)।

श्लोक 4.29

यावादिभ्यः कन् ।

yāvādibhyaḥ kan |

याव आदि शब्दों से स्वार्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: याव+कन्=यावकः; मणि+कन्=मणिकः; ज्ञात+कन्=ज्ञातकः।

श्लोक 4.30

लोहितान्मणौ ।

lohitānmaṇau |

मणि-वाचक लोहित शब्द से स्वार्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: लोहित+कन्=लोहितकः (एक रत्न)।

श्लोक 4.31

वर्णेचानित्ये ।

varṇecānitye |

अस्थायी वर्ण (रंग) अर्थ में वर्तमान लोहित शब्द से भी स्वार्थ में 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: लोहितकः कोपेन (क्रोध से लाल)।

श्लोक 4.32

रक्ते ।

rakte |

'रक्त' (लाक्षा-रंगा) अर्थ में वर्तमान लोहित शब्द से भी 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: लोहित+कन्=लोहितकः (लाख से रंगा हुआ)।

श्लोक 4.33

कालाच्च ।

kālācca |

अस्थायी वर्ण और रक्त (रंगा हुआ) अर्थों में काल शब्द से भी 'कन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: काल+कन्=कालकः।

श्लोक 4.34

विनयादिभ्यष्ठक् ।

vinayādibhyaṣṭhak |

विनय आदि शब्दों से स्वार्थ में 'ठक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: विनय+ठक्=वैनयिकः; समय+ठक्=सामयिकः; संगति+ठक्=सांगतिकः।

श्लोक 4.35

वाचो व्याहृतार्थायाम् ।

vāco vyāhṛtārthāyām |

'प्रकाशित अर्थ' (सन्देश-वाक्) अर्थ में प्रयुक्त वाच् शब्द से स्वार्थ में 'ठक्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: वाच्+ठक्=वाचिकम् (मौखिक सन्देश)।

श्लोक 4.36

तद्युक्तात्कर्मणोऽण् ।

tadyuktātkarmaṇo'ṇ |

उस 'सन्देश-वाक्' से सम्बद्ध कर्म को बताने वाले कर्मन् शब्द से स्वार्थ में 'अण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कर्मन्+अण्=कार्मणम्।

श्लोक 4.37

ओषधेरजातौ ।

oṣadherajātau |

जाति-भिन्न (एक ही पौधे का प्रकार/भाग, अलग जाति नहीं) अर्थ में ओषधि शब्द से स्वार्थ में 'अण्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: ओषधि+अण्=औषधम्।

श्लोक 4.38

प्रज्ञादिभ्यश्च ।

prajñādibhyaśca |

प्रज्ञा-आदि-गण में पढ़े गए 'प्रज्ञ' आदि शब्दों से भी 'अण्' (अ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: प्रज्ञ+अण्→प्राज्ञः; वणिजः, उशिजः, विद्वसः।

श्लोक 4.39

मृदस्तिकन् ।

mṛdastikan |

मृद् (मिट्टी) शब्द से स्वार्थ में 'तिकन्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: मृद्+तिकन्=मृत्तिका।

श्लोक 4.40

सस्नौप्रशंसायाम् ।

sasnaupraśaṁsāyām |

मृद् शब्द से 'प्रशंसा' अर्थ में 'स' और 'स्न' प्रत्यय होते हैं। उदाहरण: मृद्+स=मृत्सा; मृद्+स्न=मृत्स्ना।

श्लोक 4.41

वृकज्येष्ठाभ्यांतिल्तातिलौचच्छन्दसि ।

vṛkajyeṣṭhābhyāṁtiltātilaucacchandasi |

वृक और ज्येष्ठ शब्दों से 'प्रशंसा' अर्थ में क्रमशः 'तिल्' और 'तातिल्' प्रत्यय छन्दस् (वेद) में होते हैं। उदाहरण: वृक+तिल्=वृकतिः; वृक+तातिल्=वृकतातिः; ज्येष्ठतिः, ज्येष्ठतातिः।

श्लोक 4.42

बह्वल्पार्थाच्छस्कारकादन्यतरस्याम् ।

bahvalpārthācchaskārakādanyatarasyām |

बहु-अर्थक और अल्प-अर्थक कारक-वाचक शब्दों से विकल्प से स्वार्थ में 'शस्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: बहूनि ददाति→बहुशः; अल्पं ददाति→अल्पशः।

श्लोक 4.43

संख्यैकवचनाच्च वीप्सायाम् ।

saṁkhyaikavacanācca vīpsāyām |

संख्या-वाचक और एक-वचन (एकवचन-अर्थक) शब्दों से भी 'वीप्सा' (हर एक के अनुसार बाँटकर) के द्योतन के लिए विकल्प से 'शस्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्वौ द्वौ मोदकौ ददाति→द्विशो ददाति; कार्षापणं कार्षापणं ददाति→कार्षापणशो ददाति।

श्लोक 4.44

प्रतियोगे पञ्चम्यास्तसिः ।

pratiyoge pañcamyāstasiḥ |

'प्रति' कर्मप्रवचनीय के योग में विहित पञ्चमी-विभक्ति से 'तसि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: आदि+तसि=आदितः; मध्य+तसि=मध्यतः; पार्श्व+तसि=पार्श्वतः।

श्लोक 4.45

अपादानेचाहीयरूहोः ।

apādānecāhīyarūhoḥ |

अपादान-अर्थक पञ्चमी-विभक्ति से भी 'तसि' प्रत्यय होता है, यदि वह अपादान 'हीय्' या 'रुह्' धातु से सम्बद्ध न हो। उदाहरण: ग्रामत आगच्छति/ग्रामाद् आगच्छति; चोरतो बिभेति/चोराद् बिभेति।

श्लोक 4.46

अतिग्रहाव्यथनक्षेपेष्वकर्तरितृतीयायाः ।

atigrahāvyathanakṣepeṣvakartaritṛtīyāyāḥ |

'अतिग्रह' (काबू में करना), 'अव्यथन' (न घबराना) और 'क्षेप' (निन्दा) के अर्थों में विहित तृतीया-विभक्ति से, जब वह कर्ता-वाचक न हो, विकल्प से 'तसि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: वृत्तेन अतिगृह्यते→वृत्ततोऽतिगृह्यते; वृत्तेन न व्यथते→वृत्ततो न व्यथते; वृत्तेन क्षिप्तः→वृत्ततः क्षिप्तः।

श्लोक 4.47

हीयमानपापयोगाच्च ।

hīyamānapāpayogācca |

'हीयमान' (घटता हुआ) और पाप से सम्बद्ध पदार्थों के अर्थ में विहित तृतीया (कर्ता-भिन्न) से भी विकल्प से 'तसि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: वृत्तेन हीयते→वृत्ततो हीयते; वृत्तेन पापः→वृत्ततः पापः।

श्लोक 4.48

षष्ठ्याव्याश्रये ।

ṣaṣṭhyāvyāśraye |

जब 'पक्ष लेना' (व्याश्रय) अभिप्रेत हो, तब षष्ठी-विभक्ति से विकल्प से 'तसि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: देवा अर्जुनतोऽभवन् (देवता अर्जुन के पक्ष में हुए)।

श्लोक 4.49

रोगाच्चापनयने ।

rogāccāpanayane |

व्याधि-वाचक षष्ठी-विभक्ति शब्द से 'अपनयन' (दूर करने) के अर्थ में 'तसि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: प्रवाहिकातः कुरु (दस्त का उपचार कर); कासतः कुरु।

श्लोक 4.50

कृभ्वस्तियोगे संपद्यकर्तरिच्विः ।

kṛbhvastiyoge saṁpadyakartaricviḥ |

जब कोई वस्तु पहले जैसी न होकर कुछ और बन जाती है ('सम्पद्यमान'), तब उस अर्थ में वर्तमान प्रातिपदिक से कृ, भू और अस् धातुओं के योग में 'च्वि' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अशुक्लः शुक्लः सम्पद्यते तं करोति→शुक्लं करोति (अशुक्ल को शुक्ल बनाता है)।

श्लोक 4.51

अरुर्मनश्चक्षुश्चेतोरहोरजसांलोपश्च ।

arurmanaścakṣuścetorahorajasāṁlopaśca |

उसी परिस्थिति में अरुस्, मनस्, चक्षुस्, चेतस्, रहस् और रजस् शब्दों से 'च्वि' प्रत्यय होता है, और प्रकृति के अन्त्य 'स' का लोप होता है। उदाहरण: अरुस्+च्वि→अरु; गार्गस्+च्वि→गार्ग।

श्लोक 4.52

विभाषा साति कार्त्स्न्ये ।

vibhāṣā sāti kārtsnye |

जब पूर्णता (कार्त्स्न्य) अभिप्रेत हो, तब कृ, भू, अस् धातुओं के योग में सम्पाद्य-कर्ता से विकल्प से 'साति' (सात्) प्रत्यय होता है। उदाहरण: कृत्स्नं शस्त्रम् अग्निः भवति→अग्निसात् भवति (पूरा शस्त्र अग्निरूप हो जाता है)।

श्लोक 4.53

अभिविधौ संपदा च ।

abhividhau saṁpadā ca |

जब 'अभिविधि' (पूर्ण व्याप्ति) अभिप्रेत हो, तब सम्-पूर्वक कृ, भू, अस् धातुओं के योग में भी 'साति' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शस्त्रम् अग्निसात् सम्पद्यते; लवणम् जलासात् भवति।

श्लोक 4.54

तदधीनवचने ।

tadadhīnavacane |

जब किसी स्वामी के अधीन करना (ईशित्व) अभिप्रेत हो, तब सम्-पूर्वक कृ, भू, अस् के योग में स्वामि-वाचक प्रातिपदिक से 'साति' प्रत्यय होता है। उदाहरण: राज्ञोऽधीनं करोति→राजसात्करोति (राजा के अधीन करता है)।

श्लोक 4.55

देयेत्रा च ।

deyetrā ca |

देय पदार्थ को किसी के अधीन करने के अर्थ में स्वामि-वाचक शब्द से 'त्रा' प्रत्यय भी होता है, और 'साति' प्रत्यय भी (सम्-पूर्वक कृ, भू, अस् के साथ)। उदाहरण: ब्राह्मणाधीनं देयं करोति→ब्राह्मणसात्करोति/ब्राह्मणत्रा करोति।

श्लोक 4.56

देवमनुष्यपुरुषपुरुमर्त्येभ्यो द्वितीयासप्तम्योर्बहुलम् ।

devamanuṣyapuruṣapurumartyebhyo dvitīyāsaptamyorbahulam |

द्वितीया और सप्तमी-विभक्ति देव, मनुष्य, पुरुष, पुरु और मर्त्य शब्दों से व्यापक रूप से 'त्रा' प्रत्यय होता है। उदाहरण: देव+त्रा=देवत्रा; मनुष्य+त्रा=मनुष्यत्रा; पुरु+त्रा=पुरुत्रा।

श्लोक 4.57

अव्यक्तानुकरणाद्द्वयजवरार्धादनितौ डाच् ।

avyaktānukaraṇāddvayajavarārdhādanitau ḍāc |

यदि आगे 'इति' न हो, तो अनेक-स्वर वाले, अर्ध-भाग को बताने वाले अव्यक्त-अनुकरणवाची (ध्वनि-अनुकरण) शब्द से कृ, भू, अस् धातुओं के योग में 'डाच्' (आ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: पटत् करोति→पटत् पटत् आ करोति (द्वित्व सहित)।

श्लोक 4.58

कृञो द्वितीयतृतीयशम्बबीजात्कृषौ ।

kṛño dvitīyatṛtīyaśambabījātkṛṣau |

द्वितीय, तृतीय, शम्ब और बीज शब्दों से 'कृषि' (जोतना/बोना) अर्थ में 'कृञ्' धातु के योग में 'डाच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्वितीय+डाच्=द्वितीया; तृतीय+डाच्=तृतीया; बीज+डाच्=बीजा।

श्लोक 4.59

संख्यायाश्च गुणान्तायाः ।

saṁkhyāyāśca guṇāntāyāḥ |

संख्या-वाचक शब्द के पास आने वाले 'गुण'-अन्त शब्द से भी 'कृषि' अर्थ में 'कृञ्' के योग में 'डाच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्विगुण+डाच्=द्विगुणा; त्रिगुण+डाच्=त्रिगुणा।

श्लोक 4.60

समयाच्च यापनायाम् ।

samayācca yāpanāyām |

'यापना' (गुज़ारा/निर्वाह) के अर्थ में समय शब्द से 'कृञ्' के योग में 'डाच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: समय+डाच्=समया।

श्लोक 4.61

सपत्रनिष्पत्रादतिव्यथने ।

sapatraniṣpatrādativyathane |

'कृञ्' धातु के योग में सपत्र और निष्पत्र शब्दों से 'डाच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सपत्र+डाच्=सपत्रा; निष्पत्र+डाच्=निष्पत्रा।

श्लोक 4.62

निष्कुलान्निष्कोषणे ।

niṣkulānniṣkoṣaṇe |

'कृञ्' के योग में 'निष्कोषण' (छिलका उतारना) अर्थक निष्कुल शब्द से 'डाच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: निष्कुल+डाच्=निष्कुला।

श्लोक 4.63

सुखप्रियादानुलोम्ये ।

sukhapriyādānulomye |

'अनुकूलता' के अर्थ में सुख और प्रिय शब्दों से 'कृञ्' के योग में 'डाच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सुख+डाच्=सुखा; प्रिय+डाच्=प्रिया।

श्लोक 4.64

दुःखात्प्रातिलोम्ये ।

duḥkhātprātilomye |

'प्रतिकूलता' अर्थ में दुःख शब्द से 'कृञ्' के योग में 'डाच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: दुःख+डाच्=दुःखा।

श्लोक 4.65

शूलात्पाके ।

śūlātpāke |

'पाक' (पकाने) के विषय में शूल शब्द से 'कृञ्' के योग में 'डाच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शूल+डाच्=शूला।

श्लोक 4.66

सत्यादशपथे ।

satyādaśapathe |

'अशपथ' (शपथ के बिना) अर्थक सत्य शब्द से 'कृञ्' के योग में 'डाच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सत्य+डाच्=सत्या।

श्लोक 4.67

मद्रात्परिवापणे ।

madrātparivāpaṇe |

मुण्डन (सिर मुड़ाना) अर्थ में 'मद्र' शब्द से 'कृञ्' के योग में 'डाच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: मद्र+डाच्=मद्रा।

श्लोक 4.68

समासान्ताः ।

samāsāntāḥ |

यह अधिकार-सूत्र है: यहाँ से पञ्चम अध्याय की समाप्ति तक विहित होने वाले सभी प्रत्यय समास के अन्तिम अवयव (समासान्त) माने जाने चाहिए। उदाहरण: उपराजम् (अव्ययीभाव); द्विपुरी (द्विगु); विधुरः (तत्पुरुष); उच्चैर्धुरः (बहुव्रीहि)।

श्लोक 4.69

नपूजनात् ।

napūjanāt |

प्रशंसा-वाचक शब्दों (जैसे 'सु') के बाद समासान्त प्रत्यय नहीं होते। उदाहरण: शोभनो राजा→सुराजा (राजाहःसखिभ्यष्टच् से प्राप्त समासान्त टच् का यहाँ निषेध)।

श्लोक 4.70

किमःक्षेपे ।

kimaḥkṣepe |

'क्षेप' (उलाहना/लांछन) अर्थक किम् शब्द से उत्तर आने वाले शब्द से समासान्त प्रत्यय नहीं होता। उदाहरण: किराजा यो न रक्षति (कैसा राजा जो रक्षा न करे!); किसखा, किगौः।

श्लोक 4.71

नञस्तत्पुरुषात् ।

nañastatpuruṣāt |

नञ्-पूर्वक तत्पुरुष समास से समासान्त प्रत्यय नहीं होता। उदाहरण: अराजा, असखा, अगौः।

श्लोक 4.72

पथोविभाषा ।

pathovibhāṣā |

नञ्-पूर्वक पथिन्-अन्त तत्पुरुष से (जिसे समासान्त-निषेध से छोड़कर) अन्य पथिन्-अन्त समासों से विकल्प से समासान्त 'डच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: पन्थाः, अपन्थाः/अपथम्।

श्लोक 4.73

बहुव्रीहौसंख्येयेडजबहुगणात् ।

bahuvrīhausaṁkhyeyeḍajabahugaṇāt |

बहुव्रीहि समास में, संख्या को बताने वाले (बहु-अन्त और गण-अन्त को छोड़कर) समासों से समासान्त 'डच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: उप+दशन्+डच्=उपदशाः; उपत्रिंशाः, आसन्नदशाः।

श्लोक 4.74

ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे ।

ṛkpūrabdhūḥpathāmānakṣe |

जिस समास के अन्त में ऋच्, पुर्, अप्, पथिन् और अक्ष-भिन्न अर्थ में घूर् शब्द हो, उसका अन्तिम अवयव 'अ' प्रत्यय पाता है। उदाहरण: अर्धम् ऋचः→अर्धर्चः (आधी ऋचा)।

श्लोक 4.75

अच्प्रत्यन्ववपूर्वात्सामलोम्नः ।

acpratyanvavapūrvātsāmalomnaḥ |

प्रति-, अनु- और अव-पूर्वक साम-अन्त और लोमन्-अन्त समासों से समासान्त 'अच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: प्रतिसामम्, अनुसामम्, अवसामम्; प्रतिलोमम्, अनुलोमम्, अवलोमम्।

श्लोक 4.76

अक्ष्णोऽदर्शनात् ।

akṣṇo'darśanāt |

यदि अक्षि शब्द 'चक्षु' (आँख) का वाचक न हो, तो उससे समासान्त 'अच्' (अ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: गवाम् अक्षि (गौओं की आँख जैसा, उपमा-मात्र में)→गवाक्षः (झरोखा)।

श्लोक 4.77

अचतुरविचतुरसुचतुरस्त्रीपुंसधेन्वनडुहर्क्सामवाङ् मनसाक्षिभ्रुवदारगवोर्वष्ठीवपदष्ठीवनक्तंदिवरात्रिंदिवाहर्दिवसरजसनिःश्रेयसपुरुषायुषद्वयायुषत्र्यायुषर्ग्यजुषजातोक्षमहोक्षवृद्धोक्षोपशुनगोष्ठश्वाः ।

acaturavicaturasucaturastrīpuṁsadhenvanaḍuharksāmavāṅ manasākṣibhruvadāragavorvaṣṭhīvapadaṣṭhīvanaktaṁdivarātriṁdivāhardivasarajasaniḥśreyasapuruṣāyuṣadvayāyuṣatryāyuṣargyajuṣajātokṣamahokṣavṛddhokṣopaśunagoṣṭhaśvāḥ |

अच्-प्रत्ययान्त अचतुर, विचतुर, सुचतुर, स्त्रीपुंस, धेनु-अनडुह्, ऋक्-साम, वाङ्मनस्, अक्षि-भ्रू, दार-गो आदि अनेक विशेष शब्दों का निपातन (अनियमित सिद्धि) होता है। उदाहरण: अचतुर्+अ=अचतुरः; सुचतुर्+अ=सुचतुरः।

श्लोक 4.78

ब्रह्महस्तिभ्यांवर्चसः ।

brahmahastibhyāṁvarcasaḥ |

ब्रह्मवर्चस् और हस्तिवर्चस् शब्दों से समासान्त 'अच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: ब्रह्म+वर्चस्+अच्=ब्रह्मवर्चसम्; हस्ति+वर्चस्+अच्=हस्तिवर्चसम्।

श्लोक 4.79

अवसमन्धेभ्यस्तमसः ।

avasamandhebhyastamasaḥ |

अवतमस्, सन्तमस् और अन्धतमस् शब्दों से भी समासान्त 'अच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अवहीनं तमः→अवतमसम्; अन्धं तमः→अन्धतमसम्।

श्लोक 4.80

श्वसोवसीयःश्रेयसः ।

śvasovasīyaḥśreyasaḥ |

श्वोवसीयस् और श्वःश्रेयस् शब्दों से समासान्त 'अच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: श्वोवसीयसम्, श्वःश्रेयसम्।

श्लोक 4.81

अन्ववतप्ताद्रहसः ।

anvavataptādrahasaḥ |

अनुरहस्, अवरहस् और तप्तरहस् शब्दों से समासान्त 'अच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अनुगतं रहः→अनुरहसम्; अवगतं रहः→अवरहसम्।

श्लोक 4.82

प्रतेरुरसःसप्तमीस्थात् ।

praterurasaḥsaptamīsthāt |

'प्रति'-पूर्वक सप्तमी-अर्थ में वर्तमान उरस्-अन्त समास से 'अच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: उरसि वर्तते→प्रत्युरसम् (हृदय में स्थित)।

श्लोक 4.83

अनुगवमायामे ।

anugavamāyāme |

'आयाम' (लम्बाई) अर्थ में अच्-प्रत्ययान्त 'अनुगव' शब्द निपातन से सिद्ध होता है। उदाहरण: अनुगवं यानम्।

श्लोक 4.84

द्विस्तावात्रिस्तावावेदिः ।

dvistāvātristāvāvediḥ |

'वेदी' अर्थ में अजन्त द्विस्तावा और त्रिस्तावा शब्दों का निपातन होता है। उदाहरण: द्विस्तावा वेदिः; त्रिस्तावा वेदिः।

श्लोक 4.85

उपसर्गादध्वनः ।

upasargādadhvanaḥ |

उपसर्ग के बाद अध्वन् (मार्ग) शब्द से समासान्त 'अच्' (अ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: प्रगतोऽध्वानम्→प्राध्वः।

श्लोक 4.86

तत्पुरुषस्याङ्गुलेःसंख्याव्ययादेः ।

tatpuruṣasyāṅguleḥsaṁkhyāvyayādeḥ |

जिस तत्पुरुष के आरम्भ में संख्या-वाचक या अव्यय-वाचक शब्द हो और अन्त में अङ्गुलि शब्द हो, उससे समासान्त 'अच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्वे अङ्गुली→द्वि+अङ्गुलि+अच् (आगे 'द्व्यङ्गुलम्' आदि बनता है)।

श्लोक 4.87

अहःसर्वैकदेशसंख्यातपुण्याच्चरात्रेः ।

ahaḥsarvaikadeśasaṁkhyātapuṇyāccarātreḥ |

द्वन्द्व समास में 'अहः' (दिन) के बाद, और तत्पुरुष में सर्व, एकदेश, संख्यात और पुण्य के बाद, रात्रि शब्द से समासान्त 'अच्' (अ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: अहश्च रात्रिश्च→अहोरात्रम् (दिन और रात)।

श्लोक 4.88

अह्नोऽह्न एतेभ्यः ।

ahno'hna etebhyaḥ |

सर्व-पूर्व, एकदेश-वाचक-पूर्व, संख्यात-पूर्व, संख्या-वाचक-पूर्व और अव्यय-पूर्व अहन्-अन्त समास में, 'टच्' प्रत्यय के परे रहने पर अहन् के स्थान में 'अह्न' आदेश होता है। उदाहरण: द्वयोरह्नोर्भवः→द्व्यह्नः; अहरतिक्रान्तः→अत्यह्नः; पूर्वाह्णः, अपराह्णः।

श्लोक 4.89

न संख्यादेःसमाहारे ।

na saṁkhyādeḥsamāhāre |

जब संख्या पूर्व होने पर समाहार (एकत्रित संख्या का बोध) अभिप्रेत हो, तब अहन् के स्थान में 'अह्न' आदेश नहीं होता, टच् परे होने पर भी। उदाहरण: द्वि+अहन्+टच्=द्वयहः; त्र्यहः।

श्लोक 4.90

उत्तमैकाभ्यां च ।

uttamaikābhyāṁ ca |

उत्तम और एक शब्दों के बाद वाले अहन् शब्द से भी 'टच्' परे होने पर 'अह्न' आदेश नहीं होता। उदाहरण: पुण्यम्+अहन्+टच्=पुण्याहः; एकाहः।

श्लोक 4.91

राजाहःसखिभ्यष्टच् ।

rājāhaḥsakhibhyaṣṭac |

यदि तत्पुरुष के अन्त में राजन्, अहन् या सखि शब्द हो, तो समासान्त 'टच्' (अ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: परमश्च असौ राजा च→परमराजः।

श्लोक 4.92

गोरतद्धितलुकि ।

gorataddhitaluki |

यदि तद्धित प्रत्यय का लोप न हुआ हो, तो गो-अन्त तत्पुरुष से समासान्त 'टच्' (अ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: पञ्चगो→पञ्चगवधनः (ओ को अव् आदेश सहित)।

श्लोक 4.93

अग्राख्यायामुरसः ।

agrākhyāyāmurasaḥ |

'प्रधानता' के अर्थ में उरस्-अन्त तत्पुरुष से 'टच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अश्वोरस्+टच्=अश्वोरसम्; हस्त्युरस्+टच्=हस्त्युरसम्।

श्लोक 4.94

अनोश्मायःसरसांजातिसंज्ञयोः ।

anośmāyaḥsarasāṁjātisaṁjñayoḥ |

अनस्-अन्त, अश्मन्-अन्त, अयस्-अन्त और सरस्-अन्त तत्पुरुषों से जाति (सामान्य वस्तु) और संज्ञा (विशेष नाम) दोनों विषयों में 'टच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: उपगतम् अनः→उपानसम्; कालायसम्; जलस्य सरः→जलसरसम्।

श्लोक 4.95

ग्रामकौटाभ्यां च तक्ष्णः ।

grāmakauṭābhyāṁ ca takṣṇaḥ |

ग्रामतक्षन् और कौटतक्षन् शब्दों से जाति और संज्ञा दोनों विषयों में 'टच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: ग्रामस्य तक्षा→ग्रामतक्षः; कौटतक्षः।

श्लोक 4.96

अतेःशुनः ।

ateḥśunaḥ |

'अति'-श्वन् शब्द से 'टच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अति+श्वन्+टच्=अतिश्वः।

श्लोक 4.97

उपमानादप्राणिषु ।

upamānādaprāṇiṣu |

अप्राणी (निर्जीव वस्तु) की उपमा देने वाले श्वन्-अन्त तत्पुरुष से समासान्त 'टच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: आकर्षश्वन्+टच्=आकर्षश्वः; फलकश्वन्+टच्=फलकश्वः।

श्लोक 4.98

उत्तरमृगपूर्वाच्चसक्थ्नः ।

uttaramṛgapūrvāccasakthnaḥ |

उत्तर-, मृग-, पूर्व-पूर्वक और उपमान-वाचक-पूर्वक सक्थिन्-अन्त तत्पुरुष से समासान्त 'टच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: उत्तरं सक्थ्नः→उत्तरसक्थम्; मृगस्य सक्थि→मृगसक्थम्।

श्लोक 4.99

नावोद्विगोः ।

nāvodvigoḥ |

नौ-अन्त द्विगु समास से समासान्त 'टच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्वे नावौ समाहृते→द्विनावम्; त्रिनावम्।

श्लोक 4.100

अर्धाच्च ।

ardhācca |

अर्ध-पूर्वक नौ-अन्त तत्पुरुष से भी समासान्त 'टच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अर्धनावम्।

श्लोक 4.101

खार्याःप्राचाम् ।

khāryāḥprācām |

प्राचीन आचार्यों के मत में खारी-अन्त द्विगु और अर्ध-पूर्वक खारी-अन्त तत्पुरुष समासों से 'टच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्विखारी+टच्=द्विखारम्; अर्धखारी+टच्=अर्धखारम्।

श्लोक 4.102

द्वित्रिभ्यामञ्जलेः ।

dvitribhyāmañjaleḥ |

द्वि-पूर्वक और त्रि-पूर्वक अञ्जलि-अन्त द्विगु समास से समासान्त 'टच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्वि+अञ्जलि+टच्=द्वयञ्जलम्; त्रि+अञ्जलि+टच्=त्रयञ्जलम्।

श्लोक 4.103

अनसन्तान्नपुंसकाच्छन्दसि ।

anasantānnapuṁsakācchandasi |

अन्-अन्त और अस्-अन्त नपुंसक-लिंग तत्पुरुष से छन्दस् (वेद) में विकल्प से समासान्त 'टच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: हस्तिचर्मन्+टच्=हस्तिचर्मे।

श्लोक 4.104

ब्रह्मणोजानपदाख्यायाम् ।

brahmaṇojānapadākhyāyām |

जब जनपद (देश) का नाम अभिप्रेत हो, तब ब्रह्मन्-अन्त तत्पुरुष से 'टच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: सुराष्ट्रब्रह्मन्+टच्=सुराष्ट्रब्रह्मः; अवन्तिब्रह्मः।

श्लोक 4.105

कुमहद्भयामन्यतरस्याम् ।

kumahadbhayāmanyatarasyām |

कुब्रह्मन् और महाब्रह्मन् शब्दों से भी समासान्त 'टच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कुब्रह्मन्+टच्=कुब्रह्मः; महाब्रह्मन्+टच्=महाब्रह्मः।

श्लोक 4.106

द्वन्द्वाच्चुदषहान्तात्समाहारे ।

dvandvāccudaṣahāntātsamāhāre |

'समाहार' (एकत्रित संकलन) के अर्थ में च-वर्ग-अन्त, द-अन्त, ष-अन्त और ह-अन्त द्वन्द्व समास से समासान्त 'टच्' (अ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: वाक् च त्वक् च→वाक्त्वचम् (वाणी और त्वचा, संकलित रूप में)।

श्लोक 4.107

अव्ययीभावेशरत्प्रभृतिभ्यः ।

avyayībhāveśaratprabhṛtibhyaḥ |

अव्ययीभाव में शरद्-आदि शब्दों से समासान्त 'टच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: शरदः समीपम्→उपशरदम्; प्रतिशरदम्, अनुपथम्।

श्लोक 4.108

अनश्च ।

anaśca |

अन्-अन्त अव्ययीभाव से भी समासान्त 'टच्' (अ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: राज्ञः समीपम्→उपराजम्; अध्यात्मम्, प्रत्यात्मम्।

श्लोक 4.109

नपुंसकादन्यतरस्याम् ।

napuṁsakādanyatarasyām |

अन्-अन्त नपुंसक-लिंग वाले अव्ययीभाव से विकल्प से समासान्त 'टच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: चर्मणः समीपम्→उपचर्मम्/उपचर्म।

श्लोक 4.110

नदीपौर्णमास्याग्रहायणीभ्यः ।

nadīpaurṇamāsyāgrahāyaṇībhyaḥ |

नदी-अन्त, पौर्णमासी-अन्त और आग्रहायणी-अन्त अव्ययीभाव से विकल्प से 'टच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: नद्याः समीपम्→उपनदम्/उपनदि; उपपौर्णमासम्/उपपौर्णमासि।

श्लोक 4.111

झयः ।

jhayaḥ |

झय्-अन्त (किसी वर्ग के प्रथम/द्वितीय/तृतीय/चतुर्थ वर्ण-अन्त) अव्ययीभाव से विकल्प से समासान्त 'टच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: समिधः समीपम्→उपसमिधम्/उपसमित्।

श्लोक 4.112

गिरेश्चसेनकस्य ।

gireścasenakasya |

सेनक आचार्य के मत में गिरि-अन्त अव्ययीभाव से 'टच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अन्तर्गिरम्/अन्तर्गिरि; उपगिरम्/उपगिरि।

श्लोक 4.113

बहुव्रीहौसक्थ्यक्ष्णोःस्वाङ्गात्षच् ।

bahuvrīhausakthyakṣṇoḥsvāṅgātṣac |

यदि बहुव्रीहि समास के अन्त में शरीर-अंग-वाचक (स्वाङ्ग) सक्थि या अक्षि शब्द हो, तो समासान्त 'षच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: दीर्घे सक्थिनी यस्य→दीर्घसक्थः (जिसकी जांघें बड़ी हों)।

श्लोक 4.114

अङ्गुलेर्दारुणि ।

aṅgulerdāruṇi |

जब समास का अर्थ 'काष्ठ' (लकड़ी) हो, तब अङ्गुलि-अन्त बहुव्रीहि से समासान्त 'षच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्वे अङ्गुली अस्य→द्व्यङ्गुलं दारु; त्र्यङ्गुलं दारु।

श्लोक 4.115

द्वित्रिभ्यांषमूर्ध्नः ।

dvitribhyāṁṣamūrdhnaḥ |

बहुव्रीहि समास में द्वि और त्रि के बाद मूर्धन् शब्द से समासान्त 'ष' प्रत्यय होता है। उदाहरण: द्वौ मूर्धानौ यस्य→द्विमूर्धः; त्रिमूर्धः।

श्लोक 4.116

अप्पूरणीप्रमाण्योः ।

appūraṇīpramāṇyoḥ |

जिस बहुव्रीहि के अन्त में पूरण-प्रत्ययान्त स्त्रीलिंग शब्द या 'प्रमाणी' शब्द हो, उससे समासान्त 'अप्' (अ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: कल्याणी पञ्चमी यासां रात्रीणाम्→कल्याणीपञ्चमम् (जिनमें पाँचवीं रात कल्याणकारी हो)।

श्लोक 4.117

अन्तर्बहिर्भ्यां च लोम्नः ।

antarbahirbhyāṁ ca lomnaḥ |

बहुव्रीहि में 'अन्तर्' और 'बहिर्' के बाद लोमन् (रोआँ) शब्द से समासान्त 'अप्' (अ) प्रत्यय होता है। उदाहरण: अन्तर् लोमानि यस्य→अन्तर्लोमः; बहिर्लोमः।

श्लोक 4.118

अञ्नासिकायाःसंज्ञायांनसंचास्थूलात् ।

añnāsikāyāḥsaṁjñāyāṁnasaṁcāsthūlāt |

यदि नासिका शब्द 'स्थूल' शब्द से न आया हो, तो नासिका-अन्त बहुव्रीहि से समासान्त 'अच्' प्रत्यय होता है, और नासिका को 'नस्' आदेश होता है। उदाहरण: द्रुरिव नासिकाऽस्य→द्रुणसः।

श्लोक 4.119

उपसर्गाच्च ।

upasargācca |

उपसर्ग-पूर्वक नासिका-अन्त बहुव्रीहि से भी समासान्त 'अच्' प्रत्यय और 'नस्' आदेश होता है। उदाहरण: उन्नता नासिकाऽस्य→उन्नसः; प्रणसः।

श्लोक 4.120

सुप्रातसुश्वसुदिवशारिकुक्षचतुरश्रैणीपदाजपदप्रोष्ठपदाः ।

suprātasuśvasudivaśārikukṣacaturaśraiṇīpadājapadaproṣṭhapadāḥ |

बहुव्रीहि समास में अच्-प्रत्ययान्त 'सुप्रात' आदि शब्दों का निपातन होता है। उदाहरण: सुप्रात+अच्=सुप्रातः; सुश्व+अच्=सुश्वः; चतुरश्र+अच्=चतुरश्रः।

श्लोक 4.121

नञ्दुःसुभ्योहलिसक्थ्योरन्यतरस्याम् ।

nañduḥsubhyohalisakthyoranyatarasyām |

नञ्, दुस् और सु शब्दों के बाद आने वाले हलि और सक्थि शब्दों से बने बहुव्रीहि से विकल्प से समासान्त 'अच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अविद्यमाना हलिरस्य→अहलः/अहलिः; दुर्हलः/दुर्हलिः।

श्लोक 4.122

नित्यमसिच्प्रजा मेधयोः ।

nityamasicprajā medhayoḥ |

नञ्, दुस् और सु के बाद प्रजा और मेधस् शब्दों से बने बहुव्रीहि से नित्य समासान्त 'असिच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: अप्रजा+असिच्=अप्रजाः; दुष्प्रजाः, सुप्रजाः।

श्लोक 4.123

बहुप्रजाश्छन्दसि ।

bahuprajāśchandasi |

छन्दस् (वेद) में 'बहुप्रजाः' शब्द का निपातन होता है। उदाहरण: बहुप्रजा निरृतिमाविवेश।

श्लोक 4.124

धर्मादनिच्केवलात् ।

dharmādanickevalāt |

केवल एक ही पूर्वपद वाले (सरल) धर्म-शब्द से बने बहुव्रीहि से समासान्त 'अनिच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: कल्याणधर्म+अनिच्=कल्याणधर्मा; प्रियधर्मा।

श्लोक 4.125

जम्भासुहरिततृणसोमेभ्यः ।

jambhāsuharitatṛṇasomebhyaḥ |

सु, हरित्, तृण और सोम के बाद आने वाले जम्भा शब्द के समासान्त-प्रत्ययान्त रूप का निपातन होता है। उदाहरण: शोभनो जम्भोऽस्य→सुजम्भा देवदत्तः; हरितजम्भा।

श्लोक 4.126

दक्षिणेर्मालुब्धयोगे ।

dakṣiṇermālubdhayoge |

'व्याध रोग' (एक विशेष रोग) होने पर समासान्त प्रत्ययविशिष्ट 'दक्षिणेर्मा' शब्द का निपातन होता है। उदाहरण: दक्षिणमीर्मम् अस्य→दक्षिणेर्मा मृगः।

श्लोक 4.127

इच्कर्मव्यतिहारे ।

ickarmavyatihāre |

'कर्म-व्यतिहार' (आपसी क्रिया-अदला-बदली) अर्थ में बहुव्रीहि समास से समासान्त 'इच्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: केशेषु केशेषु गृहीत्वा युद्धम्→केशाकेशि/कचाकचि; मुसलैर्मुसलैः प्रहृत्य युद्धम्→मुसलामुसलि।

श्लोक 4.128

द्विदण्ड्यादिभ्यश्च ।

dvidaṇḍyādibhyaśca |

समासान्त इच्-प्रत्ययान्त 'द्विदण्डि' आदि शब्दों का निपातन होता है। उदाहरण: द्वाभ्यां दण्डाभ्यां प्रहरति यः सः→द्विदण्डि; द्विमुसलि।

श्लोक 4.129

प्रसंभ्यांजानुनोर्ज्ञुः ।

prasaṁbhyāṁjānunorjñuḥ |

प्र और सम् शब्दों के बाद जानु शब्द को बहुव्रीहि में 'ज्ञु' आदेश होता है। उदाहरण: प्र+जानु=प्रज्ञुः; सम्+जानु=सञ्ज्ञुः।

श्लोक 4.130

ऊर्ध्वाद्विभाषा ।

ūrdhvādvibhāṣā |

ऊर्ध्व शब्द के बाद जानु के स्थान में विकल्प से 'ज्ञु' आदेश होता है। उदाहरण: ऊर्ध्व+जानु=ऊर्ध्वज्ञुः।

श्लोक 4.131

ऊधसोऽनङ् ।

ūdhaso'naṅ |

ऊधस्-अन्त बहुव्रीहि को 'अनङ्' आदेश होता है। उदाहरण: ऊधस्+अनङ्=ऊधोऽस्याः।

श्लोक 4.132

धनुषश्च ।

dhanuṣaśca |

धनुस्-अन्त बहुव्रीहि को भी 'अनङ्' आदेश होता है। उदाहरण: शार्ङ्गं धनुरस्य→शार्ङ्गधन्वा; गाण्डीवधन्वा।

श्लोक 4.133

वासंज्ञायाम् ।

vāsaṁjñāyām |

जब समास से एक संज्ञा (विशेष नाम) बनती हो, तो धनुस्-अन्त बहुव्रीहि को विकल्प से 'अनङ्' आदेश होता है। उदाहरण: शतं धनूंषि यस्य→शतधनुः/शतधन्वा।

श्लोक 4.134

जायाया निङ् ।

jāyāyā niṅ |

जाया-अन्त बहुव्रीहि को 'निङ्' आदेश होता है। उदाहरण: युवतिर्जाया यस्य→युवजानिः; वृद्धजानिः।

श्लोक 4.135

गन्धस्येदुत्पूतिसुसुरभिभ्यः ।

gandhasyedutpūtisusurabhibhyaḥ |

उत्, पूति, सु और सुरभि शब्दों के बाद गन्ध शब्द के स्थान में बहुव्रीहि में इकार-आदेश होता है। उदाहरण: उत्+गन्ध=उद्गन्धिः; पूति+गन्ध=पूतिगन्धिः; सुगन्धिः।

श्लोक 4.136

अल्पाख्यायाम् ।

alpākhyāyām |

'अल्प' (थोड़ा) अर्थक गन्ध शब्द के स्थान में बहुव्रीहि में इकार-आदेश होता है। उदाहरण: सूपोऽल्पोऽस्मिन् भोजने→सूपगन्धि भोजनम्।

श्लोक 4.137

उपमानाच्च ।

upamānācca |

उपमान (तुलना) के बाद आने वाले गन्ध शब्द को भी बहुव्रीहि में इकार-आदेश होता है। उदाहरण: पद्यस्येव गन्धोऽस्य→पद्मगन्धिः; उत्पलगन्धिः।

श्लोक 4.138

पादस्यलोपोऽहस्त्यादिभ्यः ।

pādasyalopo'hastyādibhyaḥ |

हस्ति आदि को छोड़कर अन्य किसी उपमान के बाद आने वाले पाद शब्द के अन्त्य अकार का बहुव्रीहि में समासान्त-लोप होता है। उदाहरण: व्याघ्रस्येव पादौ यस्य→व्याघ्रपात्; सिंहपात्।

श्लोक 4.139

कुम्भपदीषु च ।

kumbhapadīṣu ca |

'कुम्भपदी' आदि शब्दों की सिद्धि के लिए पाद शब्द का लोप होता है, और नित्य 'ङीप्' प्रत्यय का निपातन होता है। उदाहरण: कुम्भ इव पादावस्याः→कुम्भपदी; शतपदी।

श्लोक 4.140

संख्यासुपूर्वस्य ।

saṁkhyāsupūrvasya |

संख्या-वाचक शब्द और 'सु' के बाद आने पर पाद शब्द के अकार का बहुव्रीहि में समासान्त-लोप होता है। उदाहरण: द्वौ पादौ यस्य→द्विपाद्→द्विपात्; त्रिपात्, सुपात्।

श्लोक 4.141

वयसिदन्तस्यदतृ ।

vayasidantasyadatṛ |

संख्या-पूर्वक और सु-पूर्वक दन्त-अन्त बहुव्रीहि के दन्त शब्द के स्थान में, जब समुदाय से आयु का बोध हो, 'दतृ' आदेश होता है। उदाहरण: द्वौ दन्तौ अस्य→द्विदन्, त्रिदन्, चतुर्दन्; सुदन्।

श्लोक 4.142

छन्दसि च ।

chandasi ca |

वेद में बहुव्रीहि समास के अन्तिम अवयव दन्त शब्द के स्थान में भी 'दतृ' आदेश होता है। उदाहरण: पत्रदतम् आलभेत; उभयादतः आलभते।

श्लोक 4.143

स्त्रियांसंज्ञायाम् ।

striyāṁsaṁjñāyām |

स्त्रीलिंग में, संज्ञा (नाम) के अर्थ में वर्तमान दन्त शब्द के स्थान में 'दतृ' आदेश होता है। उदाहरण: अय इव दन्ता अस्याः→अयोदती; फालदती।

श्लोक 4.144

विभाषाश्यावारोकाभ्याम् ।

vibhāṣāśyāvārokābhyām |

श्याव और अरोक शब्दों के बाद आने वाले दन्त शब्द के स्थान में बहुव्रीहि में विकल्प से 'दतृ' आदेश होता है। उदाहरण: श्याव+दन्त=श्यावदन्तः/श्यावदन्; अरोकदन्तः।

श्लोक 4.145

अग्रान्तशुद्धशुभ्रवृषवराहेभ्यश्च ।

agrāntaśuddhaśubhravṛṣavarāhebhyaśca |

अग्र-अन्त शब्दों, तथा शुद्ध, शुभ्र, वृष और वराह शब्दों के बाद आने वाले दन्त शब्द के स्थान में भी विकल्प से 'दतृ' आदेश होता है। उदाहरण: शुद्ध+दन्त=शुद्धदन्तः; शुभ्रदन्तः; वृषदन्तः।

श्लोक 4.146

ककुदस्यावस्थायां लोपः ।

kakudasyāvasthāyāṁ lopaḥ |

जब 'अवस्था' (आयु की स्थिति) अभिप्रेत हो, तब ककुद्-अन्त बहुव्रीहि का समासान्त-लोप होता है। उदाहरण: असंजातं ककुदमस्य→असञ्जातककुत् (बछड़ा); पूर्णककुत् (मध्यवय); उन्नतककुत् (वृद्ध)।

श्लोक 4.147

त्रिककुत्पर्वते ।

trikakutparvate |

'त्रिककुद्' का ककुद शब्द लुप्त होता है यदि समुदाय से किसी पर्वत का बोध हो। उदाहरण: त्रीणि ककुदान्यस्य→त्रिककुत् (तीन शिखरों वाला पर्वत)।

श्लोक 4.148

उद्विभ्यां काकुदस्य ।

udvibhyāṁ kākudasya |

उद् और वि के बाद आने वाले काकुद (तालु) शब्द का बहुव्रीहि में समासान्त-लोप होता है। उदाहरण: उद्गतं काकुदं यस्य→उत्काकुत्; विकाकुत्।

श्लोक 4.149

पूर्णाद्विभाषा ।

pūrṇādvibhāṣā |

'पूर्ण' के बाद आने वाले काकुद शब्द के अकार का बहुव्रीहि में विकल्प से समासान्त-लोप होता है। उदाहरण: पूर्णं काकुदं यस्य→पूर्णकाकुत्/पूर्णकाकुदः।

श्लोक 4.150

सुहृद् दुर्हृदौ मित्रामित्रयोः ।

suhṛd durhṛdau mitrāmitrayoḥ |

'मित्र' और 'अमित्र' अर्थों में क्रमशः सुहृद् और दुर्हृद् शब्दों का निपातन होता है (हृदय से हृद्)। उदाहरण: सु+हृदय→सुहृद् (मित्र); दुर्हृद् (शत्रु)।

श्लोक 4.151

उरःप्रभृतिभ्यःकप् ।

uraḥprabhṛtibhyaḥkap |

उरस् आदि शब्दों से बने बहुव्रीहि से समासान्त 'कप्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: व्यूढम् उरो यस्य→व्यूढोरस्कः (जिसका वक्षःस्थल विशाल हो)।

श्लोक 4.152

इनःस्त्रियाम् ।

inaḥstriyām |

इन्-प्रत्ययान्त बहुव्रीहि से, स्त्रीत्व की विवक्षा में, 'कप्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: बहवो दण्डिनो यस्यां शालायां सा→बहुदण्डिका शाला।

श्लोक 4.153

नद्यृतश्च ।

nadyṛtaśca |

'नदी'-संज्ञक शब्द-अन्त और ऋकारान्त बहुव्रीहि से स्वार्थ में 'कप्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: बह्व्यः कुमार्योऽस्मिन् देशे→बहुकुमारीको देशः; बहुकर्तृकः प्रसादः।

श्लोक 4.154

शेषाद्विभाषा ।

śeṣādvibhāṣā |

जिस बहुव्रीहि से कोई (विशेष) समासान्त प्रत्यय विहित नहीं हुआ, उससे विकल्प से समासान्त 'कप्' प्रत्यय होता है। उदाहरण: महद् यशो यस्य→महायशस्कः।

श्लोक 4.155

नसंज्ञायाम् ।

nasaṁjñāyām |

जब समास से एक संज्ञा (नाम) बनती हो, तब वह वैकल्पिक 'कप्' प्रत्यय नहीं होता। उदाहरण: विश्वे देवा यस्य सः→विश्वदेवः।

श्लोक 4.156

ईयसश्च ।

īyasaśca |

ईयसुन्-प्रत्ययान्त बहुव्रीहि से 'कप्' प्रत्यय नहीं होता। उदाहरण: बहवः श्रेयांसो यस्य सः→बहुश्रेयान्।

श्लोक 4.157

वन्दिते भ्रातुः ।

vandite bhrātuḥ |

'वन्दित' (आदरणीय) अर्थक भ्रातृ-अन्त बहुव्रीहि से 'कप्' प्रत्यय नहीं होता। उदाहरण: शोभनो भ्राताऽस्य सः→सुभ्राता।

श्लोक 4.158

ऋतश्छन्दसि ।

ṛtaśchandasi |

ऋकारान्त बहुव्रीहि से भी छन्दस् (वेद) में 'कप्' प्रत्यय नहीं होता। उदाहरण: हता मातास्य→हतमाता; हतपिता; सुहोता।

श्लोक 4.159

नाडीतन्त्र्योःस्वाङ्गे ।

nāḍītantryoḥsvāṅge |

शरीर-अंग-वाचक नाड़ी और तन्त्री शब्दों से बने बहुव्रीहि से भी 'नदी'-सम्बन्धी 'कप्' प्रत्यय नहीं होता। उदाहरण: बह्व्यो नाड्यो यस्य सः→बहुनाडिः कायः; बहुतन्त्री ग्रीवा।

श्लोक 4.160

निष्प्रवाणिश्च ।

niṣpravāṇiśca |

'निष्प्रवाणि' शब्द से भी 'नद्यृतश्च' (5.4.153) से प्राप्त 'नदी'-सम्बन्धी 'कप्' प्रत्यय नहीं होता — इसके साथ अध्याय पाँच का समापन होता है। उदाहरण: निष्प्रवाणिः (बिना ताने के, अधूरा बुना कपड़ा)।

षष्ठोऽध्यायः, प्रथमः पादः

श्लोक 1.1

एक अचः द्वे प्रथमस्य

eka acaḥ dve prathamasya

यह एक अधिकार-सूत्र है जो यहाँ से लेकर सम्प्रसारण-विधान तक चलता है। इसका आशय है कि द्वित्व (दोहराव) करते समय शब्द के प्रथम एक-स्वर वाले अंश की दो बार आवृत्ति होती है, जैसे जागृ से जजागार और पच् से पपाच रूप बनता है।

श्लोक 1.2

अच् आदेर्द्वितीयस्य

ac āderdvitīyasya

स्वरादि (अजादि) धातुओं में द्वित्व प्रथम अंश के स्थान पर नहीं, बल्कि धातु के दूसरे एक-स्वर वाले अंश पर होता है, जैसे इच्छार्थक सन्नन्त रूपों अटिटिषति, अशिशिषति और अरिरिषति में देखा जाता है।

श्लोक 1.3

न न्द्राः संयोग आदयः

na ndrāḥ saṁyoga ādayaḥ

यदि द्वित्व को प्राप्त होने वाले उस दूसरे एक-स्वर अंश के आरम्भ में संयोग बनाने वाले न्, द् या र् वर्ण हों तो उनका द्वित्व नहीं होता। जैसे ऊर्णु धातु के लिट् रूप में संयोगादि र् का द्वित्व निषिद्ध होकर अन्ततः ऊर्णुवान् रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 1.4

पूर्वः अभ्यासः

pūrvaḥ abhyāsaḥ

द्वित्व बनाते समय जो पहला (पूर्व) रूप बनता है, उसकी संज्ञा 'अभ्यास' होती है; जैसे भू-भू-अ में पहला भू अभ्यास कहलाता है।

श्लोक 1.5

उभे अभ्यस्तं

ubhe abhyastaṁ

द्वित्व से बने दोनों अंश मिलकर एक साथ 'अभ्यस्त' संज्ञा पाते हैं, जबकि केवल पहला रूप 'अभ्यास' कहलाता है; जैसे दा-दा में दोनों मिलकर अभ्यस्त हैं, पर पहला दा ही अभ्यास है।

श्लोक 1.6

जक्षिति आदयः षट्

jakṣiti ādayaḥ ṣaṭ

जक्ष् धातु और उसके बाद आने वाली छह धातुएँ पहले से ही 'अभ्यस्त' संज्ञा पाती हैं। इसी कारण जक्षत् जैसे रूपों में आगे नुम् आगम नहीं होता, केवल अन्त्य सकार का लोप होकर जक्षत् रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 1.7

तुजादीनां दीर्घः अभ्यासस्य

tujādīnāṁ dīrghaḥ abhyāsasya

तुज् आदि धातुओं के अभ्यास (द्वित्व के पहले अंश) के स्वर को दीर्घ आदेश होता है; जैसे तूतुजानः, मीमाय और दाधार रूपों में देखा जाता है।

श्लोक 1.8

लिटि धातोरनभ्यासस्य

liṭi dhātoranabhyāsasya

लिट् लकार में धातु का द्वित्व होता है, और द्वित्व में पहले अंग को अभ्यास कहते हैं। धातु के आदि एक-स्वर अंश का द्वित्व होता है (स्वरादि धातु में सम्भव हो तो दूसरे अंश का)। अभ्यास में क-वर्ग और ह् क्रमशः च-वर्ग और ज् में बदल जाते हैं, केवल पहला व्यंजन शेष रहता है, शेष हल् वर्णों का लोप होता है, स्वर ह्रस्व और महाप्राण अल्पप्राण हो जाता है, तथा ऋ को अ, भू के ऊ को अ, और य्/व् को इ/उ आदेश होता है। उदाहरण: कृ से चकृ, हृ से जहृ, विश् से विविश्, वच् से उवच्, स्वप् से सुष्वप्।

श्लोक 1.9

सन्यङोः

sanyaṅoḥ

जब संज्ञक-अभ्यास अभी नहीं हुआ हो ऐसी धातु में सन् (इच्छार्थक) या यङ् (आवृत्त्यर्थक) प्रत्यय जुड़े, तो उसके प्रथम एक-स्वर अंश का भी द्वित्व होता है; जैसे पठ् धातु से पढ़ने की इच्छा के अर्थ में पिपठिषति रूप बनता है।

श्लोक 1.10

श्लौ

ślau

जब शप् जैसे विकरण का लोप (श्लु) होता हो, तब भी अभी तक अद्वित्व धातु का द्वित्व होता है; जैसे हु धातु से जुहोति रूप बनता है।

श्लोक 1.11

चङि

caṅi

चङ् (णिजन्त लुङ् का विकरण) परे होने पर भी अद्वित्व धातु के प्रथम एक-स्वर अंश का द्वित्व होता है; जैसे कम् धातु से अचीकमत् जैसा रूप बनता है।

श्लोक 1.12

दाश्वान् साह्वान् मीढ्वान् च

dāśvān sāhvān mīḍhvān ca

लोक-व्यवहार और वेद दोनों में दाश्वान्, साह्वान् और मीढ्वान् शब्दों को सीधे निपातन (विशेष रूप में सिद्धि) द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है।

श्लोक 1.13

ष्यङः सम्प्रसारणं पुत्रपत्योः तत्पुरुषे

ṣyaṅaḥ samprasāraṇaṁ putrapatyoḥ tatpuruṣe

पुत्र या पति शब्द उत्तरपद हो ऐसे तत्पुरुष समास में ष्यङ् प्रत्यय के यकार के स्थान पर सम्प्रसारण (इकार) होता है; जैसे कारीषगन्धीपुत्रः, कौमुदगन्धीपतिः।

श्लोक 1.14

बन्धुनि बहुव्रीहौ

bandhuni bahuvrīhau

बन्धु शब्द उत्तरपद हो ऐसे बहुव्रीहि समास में भी ष्यङ् के स्थान पर सम्प्रसारण होता है; जैसे कारीषगन्धीबन्धुः।

श्लोक 1.15

वचिस्वपियज आदिणां किति

vacisvapiyaja ādiṇāṁ kiti

कित् प्रत्यय परे होने पर वच् (बोलना), स्वप् (सोना), यज् (यज्ञ करना) आदि धातुओं के य्, व्, र्, ल् वर्णों के स्थान पर सम्प्रसारण होता है; जैसे यज् से ईजतुः रूप बनता है।

श्लोक 1.16

ग्रहिज्यावयिव्यधिवष्टिविचतिवृश्चतिपृछ्हतिभृज्जतीणां ङ्इति च

grahijyāvayivyadhivaṣṭivicativṛścatipṛchhatibhṛjjatīṇāṁ ṅiti ca

कित् और ङित् प्रत्यय परे होने पर ग्रह्, ज्या, वेञ्, व्यध्, वश्, व्यच्, व्रश्च्, प्रच्छ् और भ्रस्ज् - इन नौ धातुओं के य्/व्/र्/ल् के स्थान पर क्रमशः इ/उ/ऋ/ऌ सम्प्रसारण होता है; जैसे व्यध् से विध्यति रूप बनता है।

श्लोक 1.17

लिटि अभ्यासस्य उभयेषां

liṭi abhyāsasya ubhayeṣāṁ

लिट् लकार परे होने पर उपरोक्त दोनों गणों की धातुओं के अभ्यास (द्वित्व के पहले अंश) में भी सम्प्रसारण होता है; जैसे यज् से इयाज रूप में अभ्यास इ बनता है।

श्लोक 1.18

स्वापेः चङि

svāpeḥ caṅi

चङ् प्रत्यय परे होने पर णिजन्त (प्रयोजक) स्वापि धातु के व् के स्थान पर सम्प्रसारण (उ) होता है; जैसे असूषुपत् रूप बनता है।

श्लोक 1.19

स्वपिस्यमिव्येञां यङि

svapisyamivyeñāṁ yaṅi

यङ् प्रत्यय परे होने पर स्वप्, स्यम् और व्येञ् धातुओं के य्/व् के स्थान पर सम्प्रसारण होता है; जैसे सोषुप्यते, सेसिम्यते, वेवीयते रूप बनते हैं।

श्लोक 1.20

न वशः

na vaśaḥ

यङ् प्रत्यय परे होने पर भी वश् धातु के व् के स्थान पर सम्प्रसारण नहीं होता।

श्लोक 1.21

चायः की

cāyaḥ kī

यङ् प्रत्यय परे होने पर चायृ धातु के स्थान पर सीधे की आदेश होता है।

श्लोक 1.22

स्फ्सायः स्फी निष्ठायां

sphsāyaḥ sphī niṣṭhāyāṁ

निष्ठा (क्त/क्तवतु) प्रत्यय परे होने पर स्फायी धातु के स्थान पर स्फी आदेश होता है; जैसे स्फीतः, स्फीतवान् रूप बनते हैं।

श्लोक 1.23

स्त्यः प्रपूर्वस्य

styaḥ prapūrvasya

प्र उपसर्गपूर्वक स्त्या धातु के य् के स्थान पर निष्ठा प्रत्यय परे सम्प्रसारण (इ) होता है; जैसे प्रस्तीतः, प्रस्तीमः रूप बनते हैं।

श्लोक 1.24

द्रवमूर्तिस्पर्शयोः श्यः

dravamūrtisparśayoḥ śyaḥ

तरल पदार्थ के ठोस होने या स्पर्श के अर्थ में श्या धातु के य् के स्थान पर निष्ठा प्रत्यय परे सम्प्रसारण होता है; जैसे शीनं घृतं (जमा हुआ घी) और शीतम् उदकम् (ठण्डा पानी) रूप बनते हैं।

श्लोक 1.25

प्रतेः च

prateḥ ca

प्रति उपसर्गपूर्वक श्या धातु के य् के स्थान पर भी निष्ठा प्रत्यय परे सम्प्रसारण होता है; जैसे प्रतिशीनः।

श्लोक 1.26

विभाषा अभि अवपूर्वस्य

vibhāṣā abhi avapūrvasya

अभि और अव उपसर्गपूर्वक श्या धातु में निष्ठा प्रत्यय परे सम्प्रसारण विकल्प से होता है; जैसे अभिशीनम् और अभिश्यानम् दोनों रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 1.27

शृतं पाके

śṛtaṁ pāke

निष्ठा प्रत्यय परे होने पर यदि अर्थ पाक (पकाने) से सम्बन्धित हो तो ण्यन्त या अण्यन्त श्रा धातु के स्थान पर विकल्प से शृ आदेश होता है; जैसे श्रापिता रूप के साथ-साथ शृत रूप भी सिद्ध होता है।

श्लोक 1.28

प्यायः पी

pyāyaḥ pī

निष्ठा प्रत्यय परे होने पर आप्यायी धातु के स्थान पर विकल्प से पी आदेश होता है; जैसे पीनं मुखम् रूप के साथ-साथ आप्यानश्चन्द्रमाः रूप भी मिलता है।

श्लोक 1.29

लिट् यङोः च

liṭ yaṅoḥ ca

लिट् लकार और यङ् प्रत्यय परे होने पर भी आप्यायी धातु के स्थान पर विकल्प से पी आदेश होता है; जैसे आपिप्ये/आपेपीयते जैसे रूप बनते हैं।

श्लोक 1.30

विभाषा श्वेः

vibhāṣā śveḥ

लिट् लकार और यङ् परे होने पर श्वि धातु के व् के स्थान पर विकल्प से सम्प्रसारण होता है; जैसे शुशाव/शिश्वाय रूप बनते हैं।

श्लोक 1.31

णौ च सन् चङोः

ṇau ca san caṅoḥ

सन् और चङ् से युक्त णिच् प्रत्यय परे होने पर भी श्वि धातु को विकल्प से सम्प्रसारण होता है; जैसे शुशावयिषति/शिश्वाययिषति और अशूशवत्/अशिश्वयत् रूप बनते हैं।

श्लोक 1.32

ह्वः सम्प्रसारणं

hvaḥ samprasāraṇaṁ

सन् और चङ् से युक्त णिच् प्रत्यय परे होने पर ह्वेञ् धातु के व् के स्थान पर नियमित रूप से सम्प्रसारण होकर हु बनता है; जैसे जुहावयिषति, अजूहवत् रूप बनते हैं।

श्लोक 1.33

अभ्यस्तस्य च

abhyastasya ca

आगे बनने वाली 'अभ्यस्त' संज्ञा की अपेक्षा से ह्वेञ् धातु के व् के स्थान पर द्वित्व होने से पहले ही सम्प्रसारण हो जाता है; जैसे जुहूषति रूप बनता है।

श्लोक 1.34

बहुलं छन्दसि

bahulaṁ chandasi

वेद-विषय में ह्वेञ् धातु के व् के स्थान पर बहुलता से (अनियमित रूप से) सम्प्रसारण होता है; कहीं होता है जैसे हुवे में, तो कहीं नहीं होता जैसे ह्वयामि में।

श्लोक 1.35

चायः की

cāyaḥ kī

वेद-विषय में भी चायृ धातु के स्थान पर बहुलता से की आदेश होता है; जैसे निचाय्य रूप में सम्प्रसारण नहीं होता देखा जाता है।

श्लोक 1.36

अपस्पृधेथाम् आनृचुः आनृहुस्चिच्युषेतित्याजश्राताःश्रितम् आशीर्तः

apaspṛdhethām ānṛcuḥ ānṛhuscicyuṣetityājaśrātāḥśritam āśīrtaḥ

वेद-विषय में अपस्पृधेथाम्, आनृचुः, आनृहुः, चिच्युषे, तित्याज, श्राता, श्रितम्, आशीः और आशीर्तः - इन विशेष शब्दों को सीधे निपातन द्वारा स्वीकार कर लिया गया है।

श्लोक 1.37

न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणं

na samprasāraṇe samprasāraṇaṁ

यदि किसी शब्द में एक स्थान पर पहले ही सम्प्रसारण हो चुका है तो उसी शब्द में दूसरी बार सम्प्रसारण नहीं होता; जैसे व्यध् में केवल य् को सम्प्रसारण होता है, व् को नहीं।

श्लोक 1.38

लिटि वयो यः

liṭi vayo yaḥ

लिट् प्रत्यय परे होने पर वय (बुनना) धातु के य् के स्थान पर सम्प्रसारण नहीं होता; जैसे उवाय, ऊयतुः रूप बनते हैं।

श्लोक 1.39

वः च अस्य अन्यतरस्यां किति

vaḥ ca asya anyatarasyāṁ kiti

इसी वय धातु के य् के स्थान पर कित्-चिह्नित लिट् प्रत्यय परे होने पर विकल्प से वकार आदेश भी होता है; जैसे ऊवतुः/ऊयतुः दोनों रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 1.40

वेञः

veñaḥ

तन्तु-सन्तान (बुनाई) के अर्थ वाली वेञ् धातु के व् के स्थान पर लिट् लकार परे होने पर सम्प्रसारण नहीं होता; जैसे ववौ, ववतुः रूप बनते हैं।

श्लोक 1.41

ल्यपि च

lyapi ca

ल्यप् प्रत्यय परे होने पर भी वेञ् धातु के व् के स्थान पर सम्प्रसारण नहीं होता; जैसे प्रवाय, उपवाय रूप बनते हैं।

श्लोक 1.42

ज्यः च

jyaḥ ca

आयु के क्षीण होने के अर्थ वाली ज्या धातु के य् के स्थान पर भी ल्यप् प्रत्यय परे सम्प्रसारण नहीं होता; जैसे प्रज्याय, उपज्याय रूप बनते हैं।

श्लोक 1.43

व्यः च

vyaḥ ca

आवरण (ढकने) के अर्थ वाली व्येञ् धातु के व् के स्थान पर भी ल्यप् परे सम्प्रसारण नहीं होता; जैसे प्रव्याय रूप बनता है।

श्लोक 1.44

विभाषा परेः

vibhāṣā pareḥ

परि उपसर्गपूर्वक व्येञ् धातु के व् के स्थान पर ल्यप् परे होने पर विकल्प से सम्प्रसारण होता है; जैसे परिवीय और परिव्याय दोनों रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 1.45

आत् एचः उपदेशे अश्इति

āt ecaḥ upadeśe aśiti

यदि शित् प्रत्यय परे न हो तो मूल उपदेश (धातुपाठ) में एच्-अन्त (ए/ओ/ऐ/औ में अन्त होने वाली) धातु के उस अन्त्य स्वर के स्थान पर आकार आदेश होता है; जैसे ग्लै धातु से ग्ला रूप बनता है।

श्लोक 1.46

न व्यः लिटि

na vyaḥ liṭi

लिट् प्रत्यय परे होने पर व्येञ् धातु के स्थान पर उपर्युक्त आकारादेश नहीं होता; जैसे संविव्याय रूप बनता है।

श्लोक 1.47

स्फुरतिस्फुलत्योर्घञि

sphuratisphulatyorghañi

चलन (हिलने-डुलने) के अर्थ वाली स्फुर् और स्फुल् धातुओं के मूल एच् स्वर के स्थान पर घञ् प्रत्यय परे भी आकारादेश होता है; जैसे विस्फारः, विस्फालः रूप बनते हैं।

श्लोक 1.48

क्रीइङ्जीणां णौ

krīiṅjīṇāṁ ṇau

क्री, इङ् और जी धातुओं के एच् स्वर के स्थान पर णिच् (प्रयोजक) प्रत्यय परे आकारादेश होता है; जैसे क्रापयति, जापयति रूप बनते हैं।

श्लोक 1.49

सिध्यतेरपारलौकिके

sidhyaterapāralaukike

लौकिक (सांसारिक, न कि पारलौकिक) अर्थ में प्रयुक्त सिध् (सिद्ध होना) धातु के एच् स्वर के स्थान पर णिच् प्रत्यय परे आकारादेश होता है; जैसे साधयति रूप बनता है।

श्लोक 1.50

मीनातिमिनोतिदीङां ल्यपि च

mīnātiminotidīṅāṁ lyapi ca

ल्यप् तथा शित्-भिन्न प्रत्यय परे होने पर मीञ् (हिंसा करना), मिञ् (फेंकना) और दीङ् (क्षय होना) धातुओं के एच् स्वर के स्थान पर आकारादेश होता है; जैसे लुङ् में दीङ् से अदास्त रूप बनता है।

श्लोक 1.51

विभाषा लीयतेः

vibhāṣā līyateḥ

उपर्युक्त एच्-विषय में तथा ल्यप् प्रत्यय परे भी ली और लीङ् धातुओं के अन्त्य स्वर के स्थान पर विकल्प से आकारादेश होता है; जैसे लापयिष्यति/लाययिष्यति दोनों रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 1.52

खिदेः छन्दसि

khideḥ chandasi

वेद-विषय में दीनता के अर्थ वाली खिद् धातु के एच् स्वर को विकल्प से आकारादेश होता है; जैसे चखाद/चिखेद दोनों रूप मिलते हैं।

श्लोक 1.53

अपगुरो णमुलि

apaguro ṇamuli

अप उपसर्गपूर्वक गुर् धातु के एच् स्वर के स्थान पर णमुल् प्रत्यय परे विकल्प से आकारादेश होता है; जैसे अपगोरम्/अपगारम् दोनों रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 1.54

चिस्फुरोर्णौ

cisphurorṇau

चि और स्फुर् धातुओं के एच् स्वर के स्थान पर णिच् प्रत्यय परे विकल्प से आकारादेश होता है; जैसे स्फारयिष्यति रूप बनता है।

श्लोक 1.55

प्रजने वीयतेः

prajane vīyateḥ

गर्भ-धारण (सन्तानोत्पत्ति) के अर्थ में वी धातु के अन्त्य स्वर के स्थान पर आकारादेश होता है, जैसा कि इससे बनने वाले प्रयोजक रूपों में देखा जाता है।

श्लोक 1.56

बिभेतेर्हेतुभये

bibheterhetubhaye

प्रयोजक-कृत भय के अर्थ में भी (डरना) धातु के अन्त्य स्वर के स्थान पर णि प्रत्यय परे विकल्प से आकारादेश होता है; जैसे भापयते/भीषयते दोनों रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 1.57

नित्यं स्मयतेः

nityaṁ smayateḥ

स्मीङ् (आश्चर्यचकित होना) धातु के अन्त्य स्वर के स्थान पर णि प्रत्यय परे नित्य (सदा) ही आकारादेश होता है, जब यह भाव प्रयोजककृत भय से जुड़ा हो; जैसे विस्मापयते रूप बनता है।

श्लोक 1.58

सृजिदृशोर्झलि अम् अकिति

sṛjidṛśorjhali am akiti

कित्-भिन्न झलादि प्रत्यय (जिसके आदि में झल् वर्ण हो) परे होने पर सृज् (छोड़ना) और दृश् (देखना) धातुओं में अम् का आगम होता है; जैसे लुट् लकार में सृज् धातु से बनने वाले रूप में देखा जाता है।

श्लोक 1.59

अनुदात्तस्य च ऋत् पधस्य न्यतरस्यां

anudāttasya ca ṛt padhasya nyatarasyāṁ

कित्-भिन्न झलादि प्रत्यय परे होने पर, मूल उपदेश में अनुदात्त स्वर वाली और उपधा में ह्रस्व ऋकार वाली धातु में भी विकल्प से अम् का आगम होता है; जैसे तृप् धातु से तत्रप्थ रूप बनता है।

श्लोक 1.60

शीर्षन् छन्दसि

śīrṣan chandasi

सिर के अर्थ वाले शीर्षन् शब्द का वेद-विषय में निपातन (सीधी सिद्धि) स्वीकार किया गया है; जैसे शीर्ष्णा रूप में देखा जाता है।

श्लोक 1.61

ये च तद्धिते

ye ca taddhite

इस सूत्र के साथ दी गई स्रोत-टिप्पणी वस्तुतः किसी अन्य सूत्र (उपसर्गपूर्वक ऋकारादि धातु में वृद्धि की विधि) की व्याख्या प्रतीत होती है और 'ये च तद्धिते' सूत्र के शब्दों से मेल नहीं खाती, अतः यहाँ स्रोत-पाठ अस्पष्ट है। सूत्र के शब्दों के आधार पर इतना ही कहा जा सकता है कि यह पूर्वसूत्र से चली आ रही किसी विधि (सम्भवतः गुण/वृद्धि) का 'तद्धित' प्रत्यय के परे रहने पर भी विस्तार करता है।

श्लोक 1.62

अचि शीर्षः

aci śīrṣaḥ

स्वरादि तद्धित प्रत्यय परे होने पर शिरस् शब्द के स्थान पर शीर्ष आदेश होता है; जैसे हास्तिशीर्षण्या जैसे रूप में देखा जाता है।

श्लोक 1.63

पद्दत्नः माः हृद् निश् असन् यूषन् दोषन् यकन् शकनुदन् आसन् शस्प्रभृतिषु

paddatnaḥ māḥ hṛd niś asan yūṣan doṣan yakan śakanudan āsan śasprabhṛtiṣu

शस् आदि प्रत्यय परे होने पर पाद, दन्त, नासिका, मांस, हृदय, निशा, असृज्, यूष, दोष, यकृत्, उदक और आस्य शब्दों के स्थान पर क्रमशः पद्, दत्, नस्, मास्, हृत्, निश्, असन्, यूषन्, दोषन्, यकन्, उदन्/शकन् और आसन् आदेश होते हैं; जैसे निपदश्चतुरो जहि, पदा वर्तय गोदुहम् में देखा जाता है।

श्लोक 1.64

धात्व् आदेः षः सः

dhātv ādeḥ ṣaḥ saḥ

धातु के आदि षकार के स्थान पर सकार आदेश होता है; जैसे ष्वद् से स्वद्, ष्ठा से स्था रूप बनता है।

श्लोक 1.65

णः नः

ṇaḥ naḥ

धातु के आदि णकार के स्थान पर नकार आदेश होता है; जैसे णदि से नदि, णम् से नम् रूप बनता है।

श्लोक 1.66

लोपो व्योर्वलि

lopo vyorvali

यदि स्वर या यकार से भिन्न कोई वल् वर्ण परे हो तो यकार और वकार का लोप होता है; जैसे भवेय्+त् में यकार का लोप होकर भवेत् रूप बनता है।

श्लोक 1.67

वेरपृक्तस्य

verapṛktasya

अपृक्त (केवल एक वर्ण के बने) संज्ञक वकार का लोप होता है; जैसे ब्रह्महा, घृतस्पृक् जैसे रूपों में देखा जाता है।

श्लोक 1.68

हल् ङी आप् भ् यः दीर्घात् सुतिसि अपृक्तं हल्

hal ṅī āp bh yaḥ dīrghāt sutisi apṛktaṁ hal

हलन्त, अथवा ङी या आप् प्रत्यययुक्त दीर्घान्त शब्दों से परे सु, ति और सि के अपृक्त (एकवर्णीय) हल् रूप का लोप होता है; जैसे अहन्+ति से अहन्, अहन्+सि से अहन् रूप बनता है।

श्लोक 1.69

एङ् ह्रस्वात् सम्बुद्धेः

eṅ hrasvāt sambuddheḥ

सम्बुद्धि (सम्बोधन एकवचन) में एङ्-अन्त या ह्रस्वान्त शब्द से परे हल् प्रत्यय का लोप होता है; जैसे हे राम में सकार का लोप होकर हे राम रूप बनता है।

श्लोक 1.70

शेः छन्दसि बहुलं

śeḥ chandasi bahulaṁ

वेद-विषय में शि प्रत्यय का बहुलता से (अनियमित रूप से) लोप होता है; जैसे या क्षेत्रा जैसे रूपों में देखा जाता है।

श्लोक 1.71

ह्रस्वस्य पिति कृति तुक्

hrasvasya piti kṛti tuk

यदि कृत् प्रत्यय पकार-इत् संज्ञक हो तो उसके परे होने पर ह्रस्व स्वर में तुक् (त्) का आगम होता है; जैसे इ से इत्यः, वृ से वृत्यः रूप बनता है।

श्लोक 1.72

संहितायां

saṁhitāyāṁ

यह सूत्र 'अनुदात्तं पदमेकवर्जम्' तक 'संहिता' (सटे हुए शब्दों के उच्चारण) का अधिकार स्थापित करता है, अर्थात् आगे के सूत्र संहिता-विषय में लागू होंगे; जैसे दध्यत्र, मध्वत्र रूपों में देखा जाता है।

श्लोक 1.73

छे च

che ca

छकार परे होने पर भी ह्रस्व स्वर में तुक् का आगम होता है, और कित् होने के कारण यह तुक् पूर्व शब्द के अन्त में ही जुड़ता है; जैसे गम्+शप् से गच्छ, यम्+शप् से यच्छ रूप बनता है।

श्लोक 1.74

आङ्माङोः च

āṅmāṅoḥ ca

ईषत्-क्रिया, मर्यादा या अभिविधि अर्थ वाले ङित् आ शब्द को, तथा निषेधार्थक ङित् मा शब्द को भी, छकार परे होने पर संहिता-विषय में तुक् का आगम होता है; जैसे आच्छाया, माच्छैत्सीत् रूप बनते हैं।

श्लोक 1.75

दीर्घात्

dīrghāt

संहिता-विषय में स्वर (अच्) परे होने पर ए, ओ, ऐ, औ के स्थान पर क्रमशः अय्, अव्, आय्, आव् आदेश होता है।

श्लोक 1.76

पद अन्तात् वा

pada antāt vā

छकार परे होने पर पदान्त दीर्घ स्वर में भी विकल्प से तुक् का आगम होता है, और कित् होने से यह तुक् पदान्त दीर्घ स्वर के अन्त में ही जुड़ता है; जैसे कुटीच्छाया/कुटीछाया दोनों रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 1.77

इकः यण् अचि

ikaḥ yaṇ aci

स्वर परे होने पर इक् (इ, उ, ऋ, ऌ) के स्थान पर क्रमशः यण् (य्, व्, र्, ल्) आदेश होता है; जैसे प्रति+एकः से प्रत्येकः रूप बनता है।

श्लोक 1.78

एचः अयवायावः

ecaḥ ayavāyāvaḥ

स्वर परे होने पर एच् (ए, ओ, ऐ, औ) के स्थान पर क्रमशः अय्, अव्, आय्, आव् आदेश होता है; जैसे जि से जय, नी से नय, भू से भव रूप बनता है।

श्लोक 1.79

व अन्तः यि प्रत्यये

va antaḥ yi pratyaye

यकारादि प्रत्यय परे होने पर भी ओकार और औकार के स्थान पर अव् और आव् आदेश होता है; जैसे गो+यत् से गव्यम् रूप बनता है।

श्लोक 1.80

धातोः तन्निमित्तस्य एव

dhātoḥ tannimittasya eva

धातु के एच् स्वर में भी वकारान्त आदेश होता है, बशर्ते यकारादि प्रत्यय ही उस एच् की उत्पत्ति का निमित्त हो; जैसे लव्यम्, पव्यम् रूप बनते हैं।

श्लोक 1.81

क्षय्यजय्याउ शक्य अर्थे

kṣayyajayyāu śakya arthe

'शक्य' के अर्थ में यत् प्रत्यय परे होने पर क्षि और जि धातुओं के एच् (क्षे, जे) के स्थान पर अय् आदेश होता है; जैसे क्षय्यः (नष्ट किया जा सकने योग्य) और जय्यः (जीता जा सकने योग्य) रूप बनते हैं।

श्लोक 1.82

क्रय्यः तदर्थे

krayyaḥ tadarthe

क्री धातु के कर्मवाचक यत् प्रत्यय परे होने पर उसके एच् के स्थान पर अयादेश का निपातन होता है; जैसे क्रय्यौ गौः, क्रय्यः कम्बलः जैसे रूप बनते हैं।

श्लोक 1.83

भय्य प्रवय्ये च छन्दसि

bhayya pravayye ca chandasi

वेद-विषय में यत् प्रत्यय परे होने पर भी भी (डरना) और प्र+वी धातुओं के एच् के स्थान पर अयादेश का निपातन होता है; जैसे भय्यम्, प्रवय्या रूप बनते हैं।

श्लोक 1.84

एकः पूर्वपरयोः

ekaḥ pūrvaparayoḥ

यहाँ से लेकर 'ख्यत्यात्परस्य' सूत्र तक जितने भी आदेशों का विधान होगा, उन सभी में पूर्व और पर दोनों मूल वर्णों के स्थान पर एक ही आदेश समझा जाएगा; जैसे खट्वा+इन्द्रः से खट्वेन्द्रः रूप बनता है।

श्लोक 1.85

अन्त आदिवत् च

anta ādivat ca

पूर्व और पर स्थानियों के स्थान पर विहित यह एकादेश अपने पूर्व शब्द के अन्तिम अंश के समान, और अपने पर शब्द के प्रथम अंश के समान, माना जाता है; जैसे ब्रह्मबन्धूः वृक्षौ रूप में देखा जाता है।

श्लोक 1.86

षत्वतुकोरसिद्धः

ṣatvatukorasiddhaḥ

षत्व और तुक् के विधान की दृष्टि से यह एकादेश असिद्ध (अघटित) माना जाता है, अर्थात् उसके होते हुए भी षत्व और तुक् के नियम पहले जैसे ही लगते हैं; जैसे कोऽसिचत्, अधीत्य रूपों में देखा जाता है।

श्लोक 1.87

आत् गुणः

āt guṇaḥ

अवर्ण (अ/आ) से परे इक् (इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ) होने पर पूर्व-पर दोनों के स्थान पर क्रमशः गुण (ए, ओ, अर्, अल्) आदेश होता है; जैसे नय+इते से नयेते रूप बनता है।

श्लोक 1.88

वृद्धिरेचि

vṛddhireci

अवर्णान्त अंग से परे एच् (ए, ओ, ऐ, औ) होने पर पूर्व-पर के स्थान पर वृद्धि (ऐ, औ) आदेश होता है; जैसे कृष्ण+एकत्वम् से कृष्णैकत्वम् रूप बनता है।

श्लोक 1.89

एति एधति ऊठ्सु

eti edhati ūṭhsu

अवर्ण (अ/आ) से परे 'एति', 'एधति' या 'ऊठ्' का कोई अच् स्वर होने पर पूर्व-पर के स्थान पर वृद्धि आदेश होता है; यह सूत्र आगे आने वाले 'एङि पररूपम्' नियम का अपवाद है, जैसा कि गंगा+उदकम् से बनने वाले रूपों में देखा जाता है।

श्लोक 1.90

आटः च

āṭaḥ ca

आट् (आगम) से परे स्वर होने पर भी पूर्व-पर के स्थान पर वृद्धि आदेश होता है; जैसे आ+इच्छ से ऐच्छत्, आ+उक्ष से औक्षत् रूप बनता है।

श्लोक 1.91

उपसर्गात् ऋति धातौ

upasargāt ṛti dhātau

परवर्ती ऋकारादि धातु के आद्य ऋकार तथा पूर्ववर्ती अवर्णान्त उपसर्ग के अन्त्य अवर्ण के स्थान पर वृद्धि आदेश होता है; जैसे उप+ऋच्छति से उपार्च्छति रूप बनता है।

श्लोक 1.92

वा सुप्य् आपिशलेः

vā supy āpiśaleḥ

सुबन्त (नाम-पद) अंग की ऋकारादि धातु में, ऋकार से पूर्व अवर्णान्त उपसर्ग होने पर, आपिशलि आचार्य के मत के अनुसार विकल्प से वृद्धि एकादेश होता है; जैसे उपर्षभीयति/उपार्षभीयति दोनों रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 1.93

आ ओतः अंशसोः

ā otaḥ aṁśasoḥ

ओकारान्त शब्द से परे अम् और शस् प्रत्ययों का अकार आदेश होता है; जैसे गाम् पश्य, गाः पश्य जैसे रूपों में देखा जाता है।

श्लोक 1.94

एङि पररूपं

eṅi pararūpaṁ

अवर्णान्त उपसर्ग के बाद एकारादि या ओकारादि धातु होने पर पूर्व-पर दोनों के स्थान पर पररूप (आगे वाले वर्ण के समान) एकादेश होता है; जैसे प्र+एजते से प्रेजते रूप बनता है।

श्लोक 1.95

ओम् आङोः च

om āṅoḥ ca

अवर्ण से परे 'ओम्' या 'आङ्' होने पर भी पररूप एकादेश होता है; जैसे शिवाय+ओम् से शिवायोम् रूप बनता है।

श्लोक 1.96

उसि अपद अन्तात्

usi apada antāt

पदान्त में न आने वाले अवर्ण से परे उस् (कृत् प्रत्यय) होने पर पूर्व-पर दोनों के स्थान पर पररूप एकादेश होता है; जैसे अप्+उस् से अपुः रूप बनता है।

श्लोक 1.97

अतः गुणे

ataḥ guṇe

पदान्त में न आने वाले ह्रस्व अकार से परे गुण-स्वर (अ, ए, ओ) होने पर पूर्व-पर दोनों के स्थान पर पररूप एकादेश होता है; जैसे भव+अति से भवति रूप बनता है।

श्लोक 1.98

अव्यक्त अनुकरणस्य अतः इतौ

avyakta anukaraṇasya ataḥ itau

अस्पष्ट ध्वनि के अनुकरण वाले 'अत्' शब्द से परे 'इति' शब्द होने पर पूर्व-पर के स्थान पर पररूप एकादेश होता है; जैसे पटत्+इति से पटिति रूप बनता है।

श्लोक 1.99

न आम्रेडितस्य अन्त्यस्य तु वा

na āmreḍitasya antyasya tu vā

पुनरुक्त (आम्रेडित) अनुकरण-वाचक 'अत्' शब्द से परे 'इति' होने पर पूर्ण पररूप एकादेश नहीं होता, बल्कि केवल उस अत् के अन्तिम तकार और इति के आद्य इ के स्थान पर विकल्प से पररूप होता है; जैसे पटत्पटदिति/पटत्पटेति दोनों रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 1.100

नित्यं आम्रेडिते डाचि

nityaṁ āmreḍite ḍāci

डाच् प्रत्यययुक्त पुनरुक्त अनुकरण-वाचक 'अत्' शब्द से परे 'इति' होने पर पूर्व-पर के स्थान पर सदा ही पररूप एकादेश होता है; जैसे पटपटा रूप बनता है।

श्लोक 1.101

अकः सवर्णे दीर्घः

akaḥ savarṇe dīrghaḥ

अक् (अ, इ, उ, ऋ, ऌ - ह्रस्व या दीर्घ) से परे सजातीय (सवर्ण) अक् होने पर पूर्व-पर दोनों के स्थान पर दीर्घ आदेश होता है; जैसे मदिरा+आलय से मदिरालयः, मुनि+इन्द्र से मुनीन्द्रः रूप बनता है।

श्लोक 1.102

प्रथमयोः पूर्वसवर्णः

prathamayoḥ pūrvasavarṇaḥ

प्रथम अंग के अन्तिम अक् स्वर से परे प्रथमा या द्वितीया विभक्ति का कोई अच् स्वर होने पर पूर्व-पर दोनों के स्थान पर पूर्व-सवर्ण दीर्घ आदेश होता है; यह सामान्य दीर्घ सन्धि नहीं है। जैसे बालक+अः से बालकाः रूप बनता है।

श्लोक 1.103

तस्मात्शसः नः पुंसि

tasmātśasaḥ naḥ puṁsi

पुल्लिङ्ग में यदि शस् प्रत्यय के सकार से पहले दीर्घ सवर्ण स्वर हो तो उस सकार के स्थान पर नकार आदेश होता है; जैसे बालकान् रूप बनता है।

श्लोक 1.104

न आत् इचि

na āt ici

अवर्णान्त (अ/आ अन्त वाले) अंग से परे इच् (ए, ऐ, ओ, औ) होने पर पूर्व-सवर्ण दीर्घ का निषेध होता है; जैसे बाल+औ से बालौ रूप बनता है।

श्लोक 1.105

दीर्घात् जसि च

dīrghāt jasi ca

दीर्घ अंग से परे जस् और इच् प्रत्यय होने पर भी पूर्व-सवर्ण दीर्घ का निषेध होता है; जैसे विश्वपा+औ से विश्वपौ रूप बनता है (यहाँ वृद्धि-सन्धि होती है)।

श्लोक 1.106

वा छन्दसि

vā chandasi

वेद-विषय में दीर्घ अक् से परे जस् और इच् परे होने पर भी विकल्प से पूर्व-सवर्ण दीर्घ एकादेश हो जाता है; जैसे मरुतीश्चतस्रः जैसे रूपों में देखा जाता है।

श्लोक 1.107

अमि पूर्वः

ami pūrvaḥ

द्वितीया एकवचन में अक् स्वर से परे अम् का अच् स्वर होने पर पूर्वरूप एकादेश होता है, जिससे सामान्य दीर्घ सन्धि का निषेध हो जाता है; जैसे बालक+अम् से बालकम् रूप बनता है।

श्लोक 1.108

सम्प्रसारणात् च

samprasāraṇāt ca

सम्प्रसारण से बने स्वर से परे कोई अच् स्वर होने पर भी पूर्व-पर के स्थान पर पूर्वरूप एकादेश होता है; जैसे जि+ना से जिना रूप बनता है।

श्लोक 1.109

एङः पद अन्तात् अति

eṅaḥ pada antāt ati

पदान्त एङ् (ए, ओ) से परे ह्रस्व अकार होने पर पूर्व-पर के स्थान पर पूर्वरूप एकादेश होता है; जैसे हरे+अव से हरेव रूप बनता है।

श्लोक 1.110

ङसिङसोः च

ṅasiṅasoḥ ca

एङ् (ए, ओ) से परे ङसि (अस्) या ङस् (अस्) का अकार होने पर भी पूर्वरूप एकादेश होता है; जैसे कवि+अस् से कवेः रूप बनता है (पहले गुण होकर कवे, फिर पूर्वरूप से कवेः)।

श्लोक 1.111

ऋतः उत्

ṛtaḥ ut

ह्रस्व ऋकार से परे ङसि या ङस् का अकार होने पर पूर्व के स्थान पर ह्रस्व उकार आदेश होता है; जैसे पितुः, होतुः रूप बनते हैं।

श्लोक 1.112

ख्यत्यात् परस्य

khyatyāt parasya

यण् आदेश हो चुके ह्रस्वान्त 'खि', 'ति' तथा दीर्घान्त 'खी', 'ती' प्रकार के शब्दों से परे ङसि और ङस् के अकार के स्थान पर उकार आदेश होता है; जैसे सख्युः, पत्युः रूप बनते हैं।

श्लोक 1.113

अतः रोः अप्लुतात् अप्लुते

ataḥ roḥ aplutāt aplute

जब अप्लुत (सामान्य, दीर्घीकृत न किया गया) अकार के बाद पुनः अप्लुत अकार आता है, तो विसर्ग/स् के स्थान पर आए 'रु' आदेश के स्थान पर ह्रस्व उकार आदेश हो जाता है। जैसे रामस् + अवदत् = रामोऽवदत्, देवस् + अधुना = देवोऽधुना।

श्लोक 1.114

हशि च

haśi ca

हश् प्रत्याहार (झ्, भ्, घ्, ढ्, ध् को छोड़कर शेष घोष वर्ण तथा स्वर) परे होने पर भी अप्लुत अकार के बाद 'रु' के स्थान पर ह्रस्व उकार आदेश होता है। जैसे रामस् + जयति = रामो जयति, मनस् + रथः = मनोरथः, यशस् + दा = यशोदा।

श्लोक 1.115

प्रकृत्या अन्तःपादं अव्यपरे

prakṛtyā antaḥpādaṁ avyapare

यदि वकार या यकार से पूर्ववर्ती न हो ऐसा अकार परे हो, और यह स्थिति किसी ऋचा के पादमध्य में पड़े, तो पूर्ववर्ती एङ् (ए/ओ) प्रकृतिस्थित ही रहता है अर्थात् उसकी संधि नहीं होती। जैसे 'ते अग्रे अश्वमायुञ्जन्', 'शिरो अपश्यम्'।

श्लोक 1.116

अव्यात् अवद्यात् अवक्रमुसव्रत अयम् अवन्तु अव् अस्युषु

avyāt avadyāt avakramusavrata ayam avantu av asyuṣu

अव्यात्, अवद्यात्, अवक्रमुः, अव्रताः, अयम्, अवन्तु और अवस्यवः — इन विशिष्ट शब्दों में वकार या यकार से पूर्ववर्ती अकार परे होने पर भी पूर्ववर्ती एङ् प्रकृतिस्थित ही रह जाता है, संधि नहीं होती। जैसे 'नो अव्यात्', 'ते नो अवन्तु पितरः'।

श्लोक 1.117

यजुषि उरः

yajuṣi uraḥ

यजुर्वेद में एङन्त 'उरस्' शब्द भी अकार परे होने पर प्रकृतिस्थित ही रहता है, संधि नहीं होती। जैसे 'उरो अन्तरिक्षम्'।

श्लोक 1.118

आपो जुसाणो व् ऋष्णो वर्षिष्ठे अम्बे अम्बाले अम्बिकेपूर्वे

āpo jusāṇo v ṛṣṇo varṣiṣṭhe ambe ambāle ambikepūrve

यजुर्वेद में आपः, जुषाणः, वृष्णः, वर्षिष्ठे शब्द तथा अम्बिके से पूर्व आने वाले अम्बे और अम्बाले शब्द भी अकार परे होने पर प्रकृतिस्थित ही रहते हैं। जैसे 'आपो अस्मान् मातरः शुन्धयन्तु', 'अम्बे अम्बाले अम्बिके'।

श्लोक 1.119

अङ्ग इत्यादौ च

aṅga ityādau ca

'अङ्ग' शब्द के अवयवभूत एङ् तथा उससे प्रारम्भ होने वाले पदसमूह में स्थित एङ् भी अकार परे होने पर यजुर्वेद में प्रकृतिस्थित रहता है। जैसे 'ऐन्द्रः प्राणो अङ्गे अङ्गे निदीध्यत्'।

श्लोक 1.120

अनुदात्ते च कुधपरे

anudātte ca kudhapare

ककारवर्गीय अथवा धकार से आरम्भ होने वाला अनुदात्त अकार परे होने पर भी यजुर्वेद में पूर्ववर्ती एङ् प्रकृतिस्थित ही रह जाता है। जैसे 'अयं सो अग्निः', 'अयं सो अध्वरः'।

श्लोक 1.121

अवपथासि च

avapathāsi ca

'अवपथाः' शब्द में भी अनुदात्त अकार परे होने पर पूर्ववर्ती एङ् प्रकृतिस्थित रहता है। जैसे 'त्री रुद्रेभ्यो अवपथाः'।

श्लोक 1.122

सर्वत्र विभाषा गोः

sarvatra vibhāṣā goḥ

ह्रस्व आकार परे होने पर पदान्त तथा एङन्त 'गो' शब्द में लौकिक और वैदिक संस्कृत दोनों में विकल्प से प्रकृतिभाव होता है, अर्थात् संधि हो भी सकती है और नहीं भी। जैसे 'गो अग्रम्' अथवा 'गोऽग्रम्', छन्दस् में 'गोअश्वेभ्यः' अथवा 'गोऽश्वाः'।

श्लोक 1.123

अवङ् स्फोटायनस्य

avaṅ sphoṭāyanasya

स्फोटायन आचार्य के मत में स्वर-वर्ण परे होने पर पदान्त और ओकारान्त 'गो' शब्द के स्थान पर विकल्प से 'अव्' (अवङ्) आदेश होता है। जैसे गो + अग्रम् = गव् अग्रम्, फिर दीर्घ होकर गवाग्रम्।

श्लोक 1.124

इन्द्रे नित्यम्

indre nityam

'इन्द्र' शब्द परे होने पर ओकारान्त 'गो' शब्द के स्थान पर 'अव्' आदेश अनिवार्य रूप से (नित्य) होता है। जैसे गो + इन्द्रः = गवेन्द्रः।

श्लोक 1.125

प्लुत प्रगृह्याः अचि नित्यं

pluta pragṛhyāḥ aci nityaṁ

स्वर-वर्ण (अच्) परे होने पर प्लुत और प्रगृह्य संज्ञक वर्णों की संधि नहीं होती, वे ज्यों के त्यों बने रहते हैं। जैसे प्लुत में 'देवदत्ता३ अत्र', प्रगृह्य में 'अग्नि इति', 'वायु इति'।

श्लोक 1.126

आङः अनुनासिकः छन्दसि

āṅaḥ anunāsikaḥ chandasi

संहिता-पाठ में स्वर-वर्ण (अच्) परे होने पर नासिक्य आङ् (आँ) भी प्रकृतिस्थित रहता है, संधि नहीं होती। जैसे 'अभ्र आँ अपः'।

श्लोक 1.127

इकः असवर्णे शाकल्यस्य ह्रस्वशः च

ikaḥ asavarṇe śākalyasya hrasvaśaḥ ca

शाकल्य आचार्य के मत में असवर्ण स्वर परे होने पर पदान्त ह्रस्व या दीर्घ इ, उ, ऋ, ऌ के स्थान पर यण् आदेश के विकल्प में ह्रस्व इ, उ, ऋ, ऌ आदेश भी होता है। जैसे 'दधि अत्र', 'मधु अत्र' के पक्ष में यण्-आदेश होकर 'दध्यत्र', 'मध्वत्र'।

श्लोक 1.128

ऋत्य् अकः

ṛty akaḥ

ह्रस्व ऋकार परे होने पर पदान्त ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ, ऋ, ऌ के स्थान पर विकल्प से ह्रस्व अकार आदि आदेश होता है। जैसे ब्रह्मा + ऋषिः के विकल्प से 'ब्रह्म ऋषिः', अन्यथा गुण होकर 'ब्रह्मर्षिः'।

श्लोक 1.129

अप्लुतवत् उपस्थिते

aplutavat upasthite

लौकिक (अनार्ष) 'इति' शब्द परे होने पर पूर्ववर्ती प्लुत स्वर अप्लुत के समान व्यवहृत होता है, अर्थात् प्लुत का प्रभाव नहीं रहता। जैसे 'सुश्लोका३ इति' का 'सुश्लोकेति' रूप बन जाता है।

श्लोक 1.130

ई३ चाक्रवर्मणस्य

ī3 cākravarmaṇasya

चाक्रवर्मण आचार्य के मत में स्वर-वर्ण परे होने पर ईकारात्मक प्लुत स्वर भी अप्लुत के समान माना जाता है। जैसे 'अस्तु ही इत्यब्रवीत्' (पक्षान्तर में 'अस्तु ही३ इत्यब्रवीत्')।

श्लोक 1.131

दिवः उत्

divaḥ ut

'दिव्' शब्द के स्थान पर ह्रस्व उकार आदेश होता है। जैसे द्युकामः, द्युमान्, द्युभ्याम्, द्युभिः।

श्लोक 1.132

एतद् तदोः सुलोपः अकोः अनञ्संआसे हलि

etad tadoḥ sulopaḥ akoḥ anañsaṁāse hali

नञ् समास न होने पर व्यंजन (हल्) परे होने पर ककाररहित 'एतद्' और 'तद्' शब्दों के 'सु' प्रत्यय का लोप हो जाता है। जैसे सः + अपि = सोऽपि, एषः + अपि = एषोऽपि।

श्लोक 1.133

स्यश् छन्दसि बहुलं

syaś chandasi bahulaṁ

वैदिक (छान्दस) प्रयोग में संहिता के विषय में 'स्यः' शब्द के 'सु' का लोप बाहुल्येन (प्रायः, पर सर्वत्र नहीं) होता है। जैसे 'उत स्य वाजी', किन्तु 'यत्र स्यो निपतेत्' में लोप नहीं होता।

श्लोक 1.134

सः अचि लोपे चेत् पादपूरणं

saḥ aci lope cet pādapūraṇaṁ

स्वर-वर्ण (अच्) परे होने पर 'सस्' के 'सु' का लोप तभी होता है जब उससे छन्द के पाद (चरण) की पूर्ति होती हो। जैसे 'सेन्दू राजा क्षयति', 'सैष दशरथी रामः'।

श्लोक 1.135

सुट् कत् पूर्वः

suṭ kat pūrvaḥ

यह अधिकार-सूत्र है — आगे 'पारस्करप्रभृतीनि च संज्ञायाम्' सूत्र तक 'सुट्' (स् आगम) तथा 'क् से पूर्व होना' — इन दोनों की अनुवृत्ति समझनी चाहिए।

श्लोक 1.136

अट् अभ्यासव्यवाये अपि

aṭ abhyāsavyavāye api

बीच में अट् (आगम) अथवा अभ्यास (द्वित्व) का व्यवधान आ जाने पर भी क् से पूर्व सुट् के आगम का विधान बाधित नहीं होता।

श्लोक 1.137

सम्परि उपेभ्यः करोतौ भूषणे

sampari upebhyaḥ karotau bhūṣaṇe

सम् और परि उपसर्गों के बाद 'भूषण' (सजाने) के अर्थ में प्रयुक्त 'कृ' धातु के ककार से पूर्व सुट् (स्) का आगम होता है। जैसे सम् + करोति = संस्करोति, परि + करोति = परिष्करोति।

श्लोक 1.138

समवाये च

samavāye ca

सम् और परि के बाद 'समवाय' (इकट्ठा करने) के अर्थ में वर्तमान 'कृ' धातु के ककार से पूर्व भी सुट् का आगम होता है। जैसे संस्करोति, संस्कुर्वन्ति।

श्लोक 1.139

उपात् प्रतियत्नवैकृतवाक्य ध्याहारेषु

upāt pratiyatnavaikṛtavākya dhyāhāreṣu

उप उपसर्ग के बाद सजाना, इकट्ठा करना, प्रतियत्न (गुण-रंग ग्रहण करना), विकार (वैकृत) तथा वाक्य में अध्याहृत पद की पूर्ति — इन पाँच अर्थों में वर्तमान 'कृ' धातु के ककार से पूर्व सुट् का आगम होता है। जैसे 'उपस्कृता कन्या' (सजी हुई कन्या)।

श्लोक 1.140

किरतौ लवने

kiratau lavane

उप उपसर्ग के बाद 'छेदन' (काटने) के अर्थ में वर्तमान 'कॄ' (किर्) धातु के ककार से पूर्व सुट् का आगम होता है। जैसे उप + किरति = उपस्किरति।

श्लोक 1.141

हिंसायां प्रतेः च

hiṁsāyāṁ prateḥ ca

उप और प्रति उपसर्गों के बाद 'हिंसा' के अर्थ में वर्तमान 'कॄ' धातु के ककार से पूर्व भी सुट् का आगम होता है। जैसे उपस्किरति, प्रतिस्किरति।

श्लोक 1.142

अपात् चतुष्पाद् शकुनिषु आलेखने

apāt catuṣpād śakuniṣu ālekhane

चतुष्पद प्राणी अथवा पक्षी द्वारा जमीन कुरेदने (आलेखन) के अर्थ में वर्तमान 'किर्' धातु के ककार से पूर्व अप उपसर्ग के बाद सुट् का आगम होता है। जैसे 'अपस्किरते वृषभः', 'अपस्किरते कुक्कुटः'।

श्लोक 1.143

कुस्तुम्बुरूणि जातिः

kustumburūṇi jātiḥ

जाति (प्रकार) के अर्थ में 'कुस्तुम्बुरुणि' (धनिया) शब्द की सिद्धि 'कु + तुम्बुरुणि' से सुट् के निपातन (अनियमित रूप-निर्माण) द्वारा होती है।

श्लोक 1.144

अपरस्पराः क्रियासातत्ये

aparasparāḥ kriyāsātatye

क्रिया की निरन्तरता (क्रियासातत्य) के अर्थ में 'अपरस्पराः' (अपरे च परे च) शब्द की सिद्धि सुट् के निपातन द्वारा होती है। जैसे 'अपरस्पराः सार्था गच्छन्ति' (काफिले निरन्तर चलते रहते हैं)।

श्लोक 1.145

गोष्पदं सेवित असेवितप्रमाणेषु

goṣpadaṁ sevita asevitapramāṇeṣu

सेवित (बसा हुआ), असेवित (निर्जन) तथा प्रमाण (लंबाई-चौड़ाई/क्षेत्रफल) — इन तीनों अर्थों में 'गोष्पद' शब्द की सिद्धि सुट् के निपातन द्वारा होती है। जैसे गोष्पदो देशः, अगोष्पदान्यरण्यानि, गोष्पदमात्रं क्षेत्रम्।

श्लोक 1.146

आस्पदं प्रतिष्ठायाम्

āspadaṁ pratiṣṭhāyām

प्रतिष्ठा (आश्रय/स्थिति) के अर्थ में 'आस्पद' शब्द की सिद्धि सुट् के निपातन द्वारा होती है। जैसे 'आस्पदमनेन लब्धम्' (इसने आश्रय प्राप्त कर लिया)।

श्लोक 1.147

आश्चर्यं अनित्ये

āścaryaṁ anitye

अनित्य (असाधारण, आश्चर्यजनक) अर्थ में 'आश्चर्य' शब्द की सिद्धि सुट् के निपातन द्वारा होती है। जैसे 'आश्चर्यं यदि स भुञ्जीत' (आश्चर्य है कि वह भोजन करे)।

श्लोक 1.148

वर्चस्के अवस्करः

varcaske avaskaraḥ

अन्नमल (विष्ठा) के अर्थ में 'अवस्कर' शब्द की सिद्धि सुट् के निपातन द्वारा होती है। जैसे 'अवस्करोऽन्नमलम्'।

श्लोक 1.149

अपस्करो रथ अङ्गं

apaskaro ratha aṅgaṁ

रथ के अवयव (अंग) के अर्थ में 'अपस्कर' शब्द की सिद्धि सुट् के निपातन द्वारा होती है। जैसे 'अपस्करो रथावयवः'।

श्लोक 1.150

विष्किरः शकुनिर्वा

viṣkiraḥ śakunirvā

पक्षी (शकुनि) के अर्थ में 'विष्किर' और 'विकिर' — दोनों रूपों का विकल्प से निपातन होता है, अर्थात् सुट् के साथ और बिना सुट् के दोनों रूप मान्य हैं।

श्लोक 1.151

ह्रस्वात् चन्द्र उत्तरपदे मन्त्रे

hrasvāt candra uttarapade mantre

मन्त्र (वैदिक) विषय में जब 'चन्द्र' शब्द समास का उत्तरपद (पिछला अंग) होता है, तो पूर्ववर्ती ह्रस्व स्वर के बाद सुट् का आगम होता है। जैसे 'सुश्चन्द्रो युष्मान्'।

श्लोक 1.152

प्रतिष्कशः च कशेः

pratiṣkaśaḥ ca kaśeḥ

प्रति उपसर्गपूर्वक 'कश्' धातु से कप्रत्यय होने पर उपसर्ग के बाद सुट् के आगम के निपातन द्वारा 'प्रतिष्कश' शब्द सिद्ध होता है। जैसे 'भव मे त्वं प्रतिष्कशः'।

श्लोक 1.153

प्रस्कण्वहरिस्चन्द्रौ ऋष्ई

praskaṇvahariscandrau ṛṣī

ऋषिविशेष के नाम के अर्थ में 'प्रस्कण्व' (प्र + कण्व) तथा 'हरिश्चन्द्र' (हरि + चन्द्र) शब्दों की सिद्धि सुट् के निपातन द्वारा होती है।

श्लोक 1.154

मस्करमस्करिणौ वेणुपरिव्राजकयोः

maskaramaskariṇau veṇuparivrājakayoḥ

बांस (वेणु) के अर्थ में 'मस्कर' शब्द तथा परिव्राजक (संन्यासी) के अर्थ में 'मस्करिन्' शब्द की सिद्धि क्रमशः सुट् तथा सुट्-सहित इनि प्रत्यय के निपातन द्वारा होती है।

श्लोक 1.155

कास्तीर अजस्तुन्दे नगरे

kāstīra ajastunde nagare

नगर-विशेष के नाम के अर्थ में 'कास्तीर' और 'अजस्तुन्द' शब्दों की सिद्धि सुट् के निपातन द्वारा होती है। जैसे 'कास्तीरं नाम नगरम्', 'अजस्तुन्दं नाम नगरम्'।

श्लोक 1.156

कारस्करो वृक्षः

kāraskaro vṛkṣaḥ

वृक्षविशेष के अर्थ में 'कारस्कर' शब्द की सिद्धि सुट् के निपातन द्वारा होती है।

श्लोक 1.157

पारस्कर प्रभृतीनि च संज्ञायां

pāraskara prabhṛtīni ca saṁjñāyāṁ

व्यक्तिवाचक संज्ञा के रूप में 'पारस्कर' आदि शब्दों की सिद्धि सुट् के निपातन द्वारा होती है। जैसे पारस्करो देशः, कारस्करो वृक्षः, रथस्पा नदी।

श्लोक 1.158

अनुदत्तं पदम् एकवर्जम्

anudattaṁ padam ekavarjam

जिस पद में किसी एक उदात्त या स्वरित स्वर का विशेष विधान किया गया हो, उसे छोड़कर उस पद के शेष सभी स्वर अनुदात्त (साधारण उच्चारण वाले) हो जाते हैं। जैसे गोपायति में केवल एक स्वर उदात्त, शेष सभी अनुदात्त।

श्लोक 1.159

कर्ष आत्वतः घञः अन्त दात्तः

karṣa ātvataḥ ghañaḥ anta dāttaḥ

'कर्ष' शब्द (भ्वादिगणीय 'कृष्' धातु से निष्पन्न) तथा अकारान्त घञ्-प्रत्ययान्त शब्दों का अन्त्य स्वर उदात्त होता है। जैसे कर्षः, पाकः, त्यागः, रागः, दायः।

श्लोक 1.160

उञ्छ आदीणां च

uñcha ādīṇāṁ ca

'उञ्छ' आदि शब्दों का भी अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है। जैसे उञ्छः, म्लेच्छः, जल्पः, जपः, व्यधः।

श्लोक 1.161

अनुदात्तस्य च यत्र उदात्तलोपः

anudāttasya ca yatra udāttalopaḥ

जिस अनुदात्त प्रत्यय के परे होने पर मूल शब्द के उदात्त स्वर का लोप हो जाता है, वहाँ वह शब्द आद्युदात्त (प्रथम स्वर पर उदात्त) हो जाता है। जैसे कुमारी, पथः, पथा, कुमुद्वान्।

श्लोक 1.162

धातोः

dhātoḥ

धातु का अन्त्य स्वर उदात्त होता है। जैसे पचति, पठति, ऊर्णोति, असि सत्यः।

श्लोक 1.163

च्इत् अः

cit aḥ

चित्-संज्ञक (जिसका चकार इत्संज्ञक हो) प्रत्यय से युक्त शब्द का अन्त्य स्वर उदात्त होता है। जैसे भङ्गुरम्, भासुरम्, कुण्डिनाः।

श्लोक 1.164

तद्धितस्य

taddhitasya

चित्-संज्ञक तद्धित प्रत्यय का भी अन्त्य स्वर उदात्त होता है। जैसे कौञ्जायनाः, भौञ्जायनाः।

श्लोक 1.165

कितः

kitaḥ

कित्-संज्ञक (जिसका ककार इत्संज्ञक हो) तद्धित प्रत्यय का भी अन्त्य स्वर उदात्त होता है। जैसे नाडायनः, चारायणः, आक्षिकः, शालाकिकः।

श्लोक 1.166

तिसृभ्यः जसः

tisṛbhyaḥ jasaḥ

'तिसृ' शब्द से परे आने वाले 'जस्' (अस्) प्रत्यय का स्वर उदात्त होता है। जैसे तिस्रस्तिष्ठन्ति, तिस्रो द्यावः।

श्लोक 1.167

चतुरः शसि

caturaḥ śasi

शस् प्रत्यय परे होने पर 'चतुर्' शब्द अन्तोदात्त हो जाता है। जैसे चतुरः पश्यः।

श्लोक 1.168

सौ एक अचः तृतीया आदिर्विभक्तिः

sau eka acaḥ tṛtīyā ādirvibhaktiḥ

एकाच् (एक स्वरवाले) शब्द से परे 'सु' विभक्ति के प्रसंग में तृतीया आदि विभक्तियाँ उदात्त हो जाती हैं। जैसे वाचा, वाग्भ्याम्, वाग्भिः, वाग्भ्यः।

श्लोक 1.169

अन्त दत्तात् इत्तरपदात्न्यतरयां अनित्यांआसे

anta dattāt ittarapadātnyatarayāṁ anityāṁāse

अनित्य समास में जो उत्तरपद एकाच् तथा अन्तोदात्त होता है, उससे परे तृतीया आदि विभक्तियाँ विकल्प से उदात्त होती हैं। जैसे परमवाचा, परमवाचे (अन्यथा समास ही अन्तोदात्त रहता है)।

श्लोक 1.170

अञ्चेः छन्दसि असर्वआमस्थाने

añceḥ chandasi asarvaāmasthāne

'अञ्च्' धातु से बने शब्दों से परे असर्वनामस्थान विभक्तियाँ छन्दोविषय (वैदिक प्रयोग) में उदात्त हो जाती हैं। जैसे 'इन्द्रो दधीचो अस्थभिः'।

श्लोक 1.171

ऊठ् इदम् पदादि अप्पुम्रैद्युभ्यः

ūṭh idam padādi appumraidyubhyaḥ

ऊठ्-विशिष्ट शब्द, इदम्, पद्-आदि आदेशवाले शब्द तथा अप्, पुंस्, रै और दिव् शब्दों से परे असर्वनामस्थान विभक्तियाँ उदात्त हो जाती हैं। जैसे प्रष्ठौहः, आभ्याम्, एभिर्नृभिर्नृतमः।

श्लोक 1.172

अष्टनो दीर्घात्

aṣṭano dīrghāt

दीर्घान्त 'अष्टन्' शब्द से परे असर्वनामस्थान विभक्तियाँ उदात्त हो जाती हैं। जैसे अष्टाभिर्दशभिः, अष्टाभ्यः।

श्लोक 1.173

शतुरनुमः नदी अच् आदी

śaturanumaḥ nadī ac ādī

नुम् आगमरहित शतृ-प्रत्ययान्त शब्दों से परे नदीसंज्ञक (स्त्रीलिंगबोधक ई-प्रत्यय) तथा स्वरादि असर्वनामस्थान विभक्तियाँ उदात्त हो जाती हैं। जैसे तुदती, नुदती, तुदता, नुदता।

श्लोक 1.174

उदात्तयणः हल्पूर्वात्

udāttayaṇaḥ halpūrvāt

व्यंजन जिसके पूर्व में हो ऐसे उदात्तस्थानिक यण् (व्/य्/र्/ल् आदेश) से परे नदीसंज्ञक प्रत्यय तथा स्वरादि असर्वनामस्थान विभक्तियाँ उदात्त हो जाती हैं। जैसे कर्त्री, हर्त्री, कर्त्रा।

श्लोक 1.175

न ऊङ्धात्वोः

na ūṅdhātvoḥ

किन्तु ऊङ् प्रत्यय में अथवा धातु में स्थित उदात्त के स्थान पर हुए हल्पूर्वक यण् से परे स्वरादि असर्वनामस्थान विभक्तियाँ उदात्त नहीं होतीं। जैसे ब्रह्मबन्ध्वा, सकृल्ल्वा।

श्लोक 1.176

ह्रस्वनुट् भ्यां मतुप्

hrasvanuṭ bhyāṁ matup

अन्तोदात्त ह्रस्वान्त शब्द तथा नुट् आगम से परे 'मतुप्' प्रत्यय उदात्त होता है। जैसे अग्निमान्, वायुमान्, अक्षण्वता।

श्लोक 1.177

णां अन्यतरस्याम्

ṇāṁ anyatarasyām

मतुप् प्रत्यय के परे होने पर ह्रस्वान्त अन्तोदात्त शब्द से परे 'नाम्' (षष्ठी बहुवचन) विकल्प से उदात्त होता है। जैसे अग्नीनाम् अथवा अग्नीनाम् (दोनों रूप मान्य)।

श्लोक 1.178

ङ्याः छन्दसि बहुलं

ṅyāḥ chandasi bahulaṁ

ङीप्रत्ययान्त शब्दों से परे 'नाम्' छन्दोविषय (वैदिक प्रयोग) में बाहुल्येन (प्रायः किन्तु सार्वत्रिक नहीं) उदात्त होता है। जैसे देवसेनानाम्, किन्तु 'सङ्गमे च नदीनाम्' में नहीं।

श्लोक 1.179

षष्त्रिचतुर्भ्यः हल् आदिः

ṣaṣtricaturbhyaḥ hal ādiḥ

षट्संज्ञक (छह और उससे ऊपर की संख्यावाचक) तथा त्रि एवं चतुर् शब्दों से परे हलादि (व्यंजन से आरंभ होने वाली) विभक्तियाँ उदात्त हो जाती हैं। जैसे षड्भिः, त्रिभिः, चतुर्णाम्।

श्लोक 1.180

झलि उपोत्तमं

jhali upottamaṁ

षट्संज्ञक, त्रि तथा चतुर् शब्दों में झलादि विभक्ति परे होने पर उपोत्तम (अन्त्य से पूर्ववाला) स्वर उदात्त होता है। जैसे पञ्चभिस्तपः, सप्तभिः।

श्लोक 1.181

विभाषा भाषायां

vibhāṣā bhāṣāyāṁ

लौकिक भाषा-प्रयोग में षट्, त्रि, चतुर् शब्दों में झलादि विभक्ति परे होने पर उपोत्तम स्वर विकल्प से उदात्त होता है। जैसे पञ्चभिः अथवा पञ्चभिः, सप्तभिः अथवा सप्तभिः।

श्लोक 1.182

न गोश्वन्सौ अवर्ण राज् अङ् क्रुङ् कृद्भ्यः

na gośvansau avarṇa rāj aṅ kruṅ kṛdbhyaḥ

गो और श्वन् शब्दों में प्रथमा (सु) विभक्ति परे रहने पर, तथा अवर्णान्त 'राट्', 'अङ्', 'क्रुङ्' और कृत्-प्रत्ययान्त शब्दों में उपर्युक्त स्वर-विधान लागू नहीं होता। जैसे गवा, गवे, सुगुना, सुगुने।

श्लोक 1.183

दिवो झल्

divo jhal

'दिव्' शब्द से परे झलादि विभक्तियाँ उदात्त नहीं होतीं। जैसे द्युभ्याम्, द्युभिः।

श्लोक 1.184

नृ च अन्यतरस्यां

nṛ ca anyatarasyāṁ

'नृ' शब्द से परे झलादि विभक्तियाँ भी विकल्प से उदात्त नहीं होतीं, अर्थात् दोनों रूप — उदात्त और अनुदात्त — मान्य हैं। जैसे नृभिः, नृभ्यः।

श्लोक 1.185

त् इत्स्वरितं

t itsvaritaṁ

तित्-संज्ञक (जिसका तकार इत्संज्ञक हो) प्रत्यय स्वरित हो जाता है। जैसे चिकीर्ष्यम्, जिहीर्ष्यम्, कार्यम्, हार्यम्।

श्लोक 1.186

तासि अनुदात्त इत् ङ् इत् अत् उपदेशात् लसार्वधातुकं अनुदात्तम् अह्नु इङोः

tāsi anudātta it ṅ it at upadeśāt lasārvadhātukaṁ anudāttam ahnu iṅoḥ

तासि प्रत्यय, अनुदात्तेत् धातु, ह्रु, ङित् तथा इङ् धातुओं को छोड़कर शेष ङित् धातुओं एवं उपदेश (धातुपाठ) में अकारान्त धातुओं से परे लकारस्थानिक सार्वधातुक प्रत्यय अनुदात्त हो जाते हैं। जैसे कर्त्ता, आस्ते, सूते, शेते, तुदतः, पचतः।

श्लोक 1.187

आदिः सिचः अन्यतरस्यां

ādiḥ sicaḥ anyatarasyāṁ

सिच्-प्रत्ययान्त (सिजन्त) रूप का आद्युदात्त होना विकल्प से होता है। जैसे मा हि कार्ष्टाम् अथवा मा हि कार्ष्टाम् (दोनों स्वर-रूप मान्य)।

श्लोक 1.188

स्वप् आदि हिंसां अचि अनिटि

svap ādi hiṁsāṁ aci aniṭi

'स्वप्' आदि तथा 'हिंस्' धातुओं से परे अजादि (स्वर से आरंभ होने वाला) और अनिट् लकारस्थानिक सार्वधातुक प्रत्यय होने पर आद्युदात्त हो जाता है। जैसे स्वपन्ति, श्वसन्ति, हिंसन्ति।

श्लोक 1.189

अभ्यस्ताणां आदिः

abhyastāṇāṁ ādiḥ

अभ्यस्तसंज्ञक (द्विरुक्त) धातुओं से परे अजादि तथा अनिट् लकारस्थानिक सार्वधातुक प्रत्यय होने पर आदि स्वर उदात्त हो जाता है। जैसे ददति, दधति, जक्षति, जाग्रति।

श्लोक 1.190

अनुदात्ते च

anudātte ca

जिस लकारस्थानिक सार्वधातुक प्रत्यय में उदात्त स्वर न हो, ऐसा प्रत्यय परे रहने पर भी अभ्यस्तसंज्ञक धातुओं का आदि स्वर उदात्त हो जाता है। जैसे ददाति, जहाति, दधाति, जिहीते।

श्लोक 1.191

सर्वस्य सुपि

sarvasya supi

सुप् प्रत्यय परे रहने पर 'सर्व' शब्द का आदि स्वर उदात्त हो जाता है। जैसे सर्वः, सर्वौ, सर्वे।

श्लोक 1.192

भीह्रीभृहुमदजनधनदरिद्राजागरां पूर्वम् पिति

bhīhrībhṛhumadajanadhanadaridrājāgarāṁ pūrvam piti

'भी', 'ह्री', 'भृ', 'हु', 'मद्', 'जन्', 'धन्', 'दरिद्रा' और 'जागृ' धातुओं के अभ्यास (द्वित्व) का स्वर, प्रत्यय से ठीक पूर्व उदात्त होता है यदि आगे पित् लकारस्थानिक सार्वधातुक प्रत्यय हो। जैसे बिभेति, जिह्रेति, बिभर्ति, जुहोति।

श्लोक 1.193

ल्इति

liti

इत्संज्ञक लकार (ल्) से युक्त प्रत्यय परे होने पर प्रत्यय से ठीक पूर्व का स्वर उदात्त होता है। जैसे चिकीर्षकः, जिहीर्षकः।

श्लोक 1.194

आदिर्णमुलि अन्यतरस्यां

ādirṇamuli anyatarasyāṁ

णमुल् प्रत्यय परे रहने पर शब्द का आद्युदात्तत्व वैकल्पिक होता है। जैसे लोलूयंलोलूयम् दोनों स्वर-रूपों में मान्य है।

श्लोक 1.195

अचः कर्तृयकि

acaḥ kartṛyaki

औपदेशिक (धातुपाठोक्त) अजन्त धातुओं का आदि स्वर विकल्प से उदात्त होता है यदि आगे कर्त्रर्थक 'यक्' प्रत्यय हो। जैसे लूयते अथवा लूयते, स्तीयते अथवा स्तीर्यते।

श्लोक 1.196

थलि च सैटि इट् अन्तः वा

thali ca saiṭi iṭ antaḥ vā

इट्-सहित 'थल्' प्रत्यय के विषय में इट्, आदि स्वर तथा अन्त्य स्वर — इन तीनों में विकल्प से उदात्त होने के कारण कुल चार प्रकार के स्वर-रूप बनते हैं। जैसे लुलविथ के चार रूप।

श्लोक 1.197

ञ्ण् इत्य् आदिर्नित्यं

ñṇ ity ādirnityaṁ

ञित् तथा णित् प्रत्ययों के परे रहने पर शब्द का आदि स्वर सदैव (नित्य) उदात्त हो जाता है। जैसे गार्ग्यः, वात्स्यः, वासुदेवकः, अर्जुनकः।

श्लोक 1.198

आमन्त्रितस्य च

āmantritasya ca

आमन्त्रितसंज्ञक (संबोधन) पद का भी आदि स्वर उदात्त हो जाता है। जैसे देवदत्त!, देवदत्तौ!, देवदत्ताः!

श्लोक 1.199

पथिमथोः सर्वनामस्थाने

pathimathoḥ sarvanāmasthāne

सर्वनामस्थान विभक्ति परे रहने पर 'पथिन्' तथा 'मथिन्' शब्दों का आदि स्वर उदात्त हो जाता है। जैसे पन्थाः, पन्थानौ, मन्थाः, मन्थानौ।

श्लोक 1.200

अन्तः च तवै युगपत्

antaḥ ca tavai yugapat

तवैप्रत्ययान्त शब्द में आदि तथा अन्त्य दोनों स्वर एक साथ उदात्त हो जाते हैं। जैसे कर्त्तवै, हर्त्तवै।

श्लोक 1.201

क्षयः निवासे

kṣayaḥ nivāse

निवास (रहने के स्थान) के अर्थ में 'क्षय' शब्द का आदि स्वर उदात्त होता है। जैसे क्षयः, स्वे क्षये शुचिव्रतः।

श्लोक 1.202

जयः करणं

jayaḥ karaṇaṁ

करणवाचक (साधनरूप) अर्थ में 'जय' शब्द का आदि स्वर उदात्त होता है। जैसे 'जयन्ति तेन इति जयः' (अश्व आदि)।

श्लोक 1.203

वृष आदीणां च

vṛṣa ādīṇāṁ ca

'वृष' आदि शब्दों का भी आदि स्वर उदात्त होता है। जैसे वृषः, जनः, ज्वरः, ग्रहः, हयः, गयः।

श्लोक 1.204

संज्ञायां उपमानम्

saṁjñāyāṁ upamānam

व्यक्तिवाचक संज्ञा (नाम) के रूप में प्रयुक्त उपमानवाचक शब्द का आद्युदात्त होता है। जैसे चञ्चा, वद्ध्रिका, खरकुटी, दासी।

श्लोक 1.205

निष्ठा च द्व्यच् अणात्

niṣṭhā ca dvyac aṇāt

संज्ञाविषय में निष्ठान्त (कृदन्त) द्व्यच् (दो स्वरवाले) शब्द का आदि स्वर उदात्त होता है, बशर्ते वह आदि स्वर अकार से भिन्न हो। जैसे दत्तः, गुप्तः, बुद्धः।

श्लोक 1.206

शुष्क धृष्टौ

śuṣka dhṛṣṭau

'शुष्क' और 'धृष्ट' शब्दों का आदि स्वर उदात्त होता है। जैसे शुष्कः, धृष्टः।

श्लोक 1.207

आशितः कर्ता

āśitaḥ kartā

कर्तृवाचक अर्थ में 'आशित' शब्द का आदि स्वर उदात्त होता है। जैसे आशितो देवदत्तः।

श्लोक 1.208

रिक्ते विभाषा

rikte vibhāṣā

'रिक्त' शब्द का आदि स्वर विकल्प से उदात्त होता है, अर्थात् उदात्त और अनुदात्त दोनों रूप मान्य हैं।

श्लोक 1.209

जुष्ट अर्पिते च छन्दसि

juṣṭa arpite ca chandasi

छन्दोविषय (वैदिक प्रयोग) में 'जुष्ट' तथा 'अर्पित' शब्दों का आदि स्वर विकल्प से उदात्त होता है। जैसे जुष्टः अथवा जुष्टः, अर्पितः अथवा अर्पितः।

श्लोक 1.210

नित्यं मन्त्रे

nityaṁ mantre

किन्तु मन्त्रविषय-प्रयोग में 'जुष्ट' तथा 'अर्पित' शब्दों का आद्युदात्तत्व नित्य (अनिवार्य) है, विकल्प नहीं। जैसे जुष्टं देवानाम्, अर्पितं पितॄणाम्।

श्लोक 1.211

युष्मद् अस्मदोर्ङसि

yuṣmad asmadorṅasi

ङसि (पञ्चमी एकवचन) प्रत्यय परे रहने पर 'युष्मद्' तथा 'अस्मद्' शब्दों का आदि स्वर उदात्त होता है। जैसे तव स्वम्, मम स्वम्।

श्लोक 1.212

ङयि च

ṅayi ca

ङे (चतुर्थी एकवचन) विभक्ति परे रहने पर भी 'युष्मद्' तथा 'अस्मद्' शब्दों का आदि स्वर उदात्त होता है। जैसे तुभ्यम्, मह्यम्।

श्लोक 1.213

यतः अनावः

yataḥ anāvaḥ

यत्-प्रत्ययान्त द्व्यच् (दो स्वरवाले) शब्द का आदि स्वर उदात्त होता है, बशर्ते वह यत् प्रत्यय 'नौ' शब्द से विहित न हो। जैसे चेयम्, जेयम्।

श्लोक 1.214

ईडवन्दवृशंसदुहां ण्यतः

īḍavandavṛśaṁsaduhāṁ ṇyataḥ

ण्यत् प्रत्ययान्त 'ईड्', 'वन्द्', 'वृ', 'शंस्' तथा 'दुह्' धातुओं का आदि स्वर उदात्त होता है। जैसे ईड्यम्, वन्द्यम्, वार्यम्, शंस्यम्, दोह्यम्।

श्लोक 1.215

विभाषा वेणु इन्धानयोः

vibhāṣā veṇu indhānayoḥ

'वेणु' तथा 'इन्धान' शब्दों का आदि स्वर विकल्प से उदात्त होता है। जैसे वेणुः अथवा वेणुः, इन्धानः अथवा इन्धानः।

श्लोक 1.216

त्यागराग हासकुहश्वठक्रथाणां

tyāgarāga hāsakuhaśvaṭhakrathāṇāṁ

'त्याग', 'राग', 'हास', 'कुह', 'श्वठ' और 'क्रथ' शब्दों का आदि स्वर विकल्प से उदात्त होता है। जैसे त्यागः अथवा त्यागः, रागः अथवा रागः, हासः अथवा हासः।

श्लोक 1.217

उप उत्तमं र्इति

upa uttamaṁ riti

रित्-संज्ञक (जिसका रकार इत्संज्ञक हो) प्रत्यय परे रहने पर उपोत्तम स्वर उदात्त होता है। जैसे करणीयम्, हरणीयम्, पटुजातीयः।

श्लोक 1.218

चङि अन्यतरस्यां

caṅi anyatarasyāṁ

चङ्-प्रत्ययान्त (लुङ् के अभ्यस्त) रूपों में उपोत्तम स्वर का उदात्तत्व वैकल्पिक होता है। जैसे मा ही चीकरताम् दोनों स्वर-रूपों में मान्य है।

श्लोक 1.219

मतोः पूर्वं आत् संज्ञायां स्त्रियाम्

matoḥ pūrvaṁ āt saṁjñāyāṁ striyām

यदि मतुबन्त शब्द किसी स्त्रीत्वविशिष्ट पदार्थ की व्यक्तिवाचक संज्ञा हो, तो मतुप् से ठीक पहले आया 'आ' स्वर उदात्त होता है। जैसे उदुम्बरावती, पुष्करावती, शरावती।

श्लोक 1.220

अन्तः अवत्याः

antaḥ avatyāḥ

स्त्रीत्वविशिष्ट संज्ञा के विषय में 'अवती' शब्दान्त शब्दों का अन्त्य स्वर उदात्त होता है। जैसे अजिरावती, खदिरावती, हंसवती।

श्लोक 1.221

ईवत्याः

īvatyāḥ

यदि समुदाय से स्त्रीत्वविशिष्ट संज्ञा की प्रतीति होती हो, तो 'ईवती' शब्दान्त शब्द का भी अन्त्य स्वर उदात्त होता है। जैसे अहीवती, कृषीवती, मुनीवती।

श्लोक 1.222

चौ

cau

लुप्त-ङकार 'अञ्च्' धातु परे होने पर पूर्ववर्ती शब्द का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है। जैसे दधीचः, दधीचा, मधूचः।

श्लोक 1.223

संआसस्य

saṁāsasya

समास का अन्त्य स्वर उदात्त होता है। जैसे राजपृषत्, ब्राह्मणकम्बलः, कन्यास्वनः, पटहशब्दः, नदीघोषः।

षष्ठोऽध्यायः, द्वितीयः पादः

श्लोक 2.1

बहुव्रीहौ प्रकृत्या पूर्वपदं

bahuvrīhau prakṛtyā pūrvapadaṁ

बहुव्रीहि समास में पूर्वपद अपना मूल (समास से पहले वाला) स्वर ही बनाए रखता है, यानी समास बनने पर भी उसके स्वर में परिवर्तन नहीं होता, जैसे 'कार्ष्णोत्तरासङ्गाः' में।

श्लोक 2.2

तत्पुरुषे तुल्य अर्थतृतीयासप्तमीउपमान अव्ययद्वितीयाकृत्याः

tatpuruṣe tulya arthatṛtīyāsaptamīupamāna avyayadvitīyākṛtyāḥ

तत्पुरुष समास में यदि पूर्वपद तुल्यार्थक, तृतीयान्त, सप्तम्यन्त, उपमानवाचक, अव्यय, द्वितीयान्त या कृत्य-प्रत्ययान्त शब्द हो, तो वह अपना मूल स्वर बनाए रखता है; जैसे 'तुल्यश्वेतः' और 'सदृक्श्वेतः' में।

श्लोक 2.3

वर्णः वर्णेषु अनेते

varṇaḥ varṇeṣu anete

यदि तत्पुरुष समास के दोनों पद वर्णवाचक (रंग-सूचक) हों और उत्तरपद 'एत' शब्द न हो, तो पूर्वपद अपना पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'कृष्णसारङ्गः', 'लोहितसारङ्गः'।

श्लोक 2.4

गाधलवणयोः प्रमाणे

gādhalavaṇayoḥ pramāṇe

मात्रा/परिमाण के अर्थ में बने तत्पुरुष समास में यदि उत्तरपद 'गाध' या 'लवण' हो, तो पूर्वपद पूर्ववत् स्वर बनाए रखता है, जैसे 'शम्बगाधमुदकम्', 'गोलवणम्'।

श्लोक 2.5

दायाद्यं दायादे

dāyādyaṁ dāyāde

'दायाद' (उत्तराधिकारी/हिस्सेदार) शब्द उत्तरपद होने पर, उत्तराधिकार को सूचित करने वाला पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'विद्यादायादः', 'धनदायादः'।

श्लोक 2.6

प्रतिबन्धि चिरकृच्छ्रयोः

pratibandhi cirakṛcchrayoḥ

'चिर' या 'कृच्छ्र' शब्द उत्तरपद होने पर, बाधा/रुकावट के अर्थ वाला पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'गमनचिरम्', 'गमनकृच्छ्रम्'।

श्लोक 2.7

पदे अपदेशे

pade apadeśe

बहाना/व्याज के अर्थ में बने तत्पुरुष में 'पद' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'मूत्रपदेन प्रस्थितः'।

श्लोक 2.8

निवाते वातत्राणे

nivāte vātatrāṇe

वायु से बचाव (वातत्राण) के अर्थ में 'निवात' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'कुटीनिवातम्'।

श्लोक 2.9

शारदे अणार्तवे

śārade aṇārtave

ऋतु से भिन्न अर्थ (ताज़ा/नया) में प्रयुक्त 'शारद' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'रज्जुशारदमुदकम्'।

श्लोक 2.10

अध्वर्युकषाययोर्जातौ

adhvaryukaṣāyayorjātau

जाति के अर्थ में बने तत्पुरुष में 'अध्वर्यु' या 'कषाय' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'प्राच्याध्वर्युः', 'सर्पिर्मण्डकषायम्'।

श्लोक 2.11

सदृशप्रतिरूपयोः सादृश्ये

sadṛśapratirūpayoḥ sādṛśye

समानता के अर्थ में 'सदृश' या 'प्रतिरूप' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'मातृसदृशः', 'पितृप्रतिरूपः'।

श्लोक 2.12

द्विगौ प्रमाणे

dvigau pramāṇe

परिमाण के अर्थ में बने तत्पुरुष में उत्तरपद स्वयं द्विगु समास हो तो पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'प्राच्यसप्तसमः'।

श्लोक 2.13

गन्तव्यपण्यं वाणिजे

gantavyapaṇyaṁ vāṇije

'वाणिज' (व्यापारी) शब्द उत्तरपद होने पर गन्तव्य-स्थान या माल (पण्य) को सूचित करने वाला पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'मद्रवाणिजः', 'पण्यगोवाणिजः'।

श्लोक 2.14

मात्रा उपज्ञा उपक्रम छाये नपुंसके

mātrā upajñā upakrama chāye napuṁsake

नपुंसकलिङ्गी तत्पुरुष में 'मात्रा', 'उपज्ञा', 'उपक्रम' या 'छाया' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'भिक्षामात्रम्', 'पाणिन्युपज्ञम्'।

श्लोक 2.15

सुखप्रिययोर्हिते

sukhapriyayorhite

हित के अर्थ में 'सुख' या 'प्रिय' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'गमनसुखम्', 'गमनप्रियम्'।

श्लोक 2.16

प्रीतौ च

prītau ca

जब समास से प्रीति/स्नेह का भाव प्रकट होता है, तब भी 'सुख' या 'प्रिय' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'ब्राह्मणसुखं पायसम्', 'कन्याप्रियो मृदङ्गः'।

श्लोक 2.17

स्वं स्वामिनि

svaṁ svāmini

'स्वामिन्' शब्द उत्तरपद होने पर, स्वामित्व की वस्तु को सूचित करने वाला पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'गोस्वामी', 'अश्वस्वामी'।

श्लोक 2.18

पत्यौ ऐश्वर्ये

patyau aiśvarye

ऐश्वर्य/स्वामित्व के अर्थ में 'पति' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'सेनापतिः', 'नरपतिः'।

श्लोक 2.19

न भूवाच् चित् दिधिषु

na bhūvāc cit didhiṣu

किन्तु ऐसे ही 'पति'-समास में यदि पूर्वपद 'भू', 'वाक्', 'चित्' या 'दिधिषू' हो, तो वे पूर्व स्वर नहीं रखते (अर्थात् इनके लिए सूत्र १८ की छूट लागू नहीं होती), जैसे 'भूपतिः', 'वाक्पतिः', 'चित्पतिः', 'दिधिषूपतिः'।

श्लोक 2.20

वा भुवनं

vā bhuvanaṁ

उसी 'पति'-समास में पूर्वपद 'भुवन' का स्वर विकल्प से पूर्ववत् बना रहता है, जैसे 'भुवनपतिः' के दो रूप सम्भव हैं।

श्लोक 2.21

आशङ्क आबाधनेद्ईयस्सु सम्भावने

āśaṅka ābādhanedīyassu sambhāvane

सम्भावना के अर्थ में 'आशङ्का', 'अबाध' या 'नेदीयस्' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'गमनाशङ्का', 'गमनाबाधम्', 'गमननेदीयः'।

श्लोक 2.22

पूर्वे भूतपूर्वे

pūrve bhūtapūrve

'भूतपूर्व' (पहले जो था) के अर्थ में 'पूर्व' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'आढ्यपूर्वः'।

श्लोक 2.23

सविधसनीडसमर्यादसवेशसदेशेषु सामीप्ये

savidhasanīḍasamaryādasaveśasadeśeṣu sāmīpye

समीपता के अर्थ में 'सविध', 'सनीड', 'समर्याद', 'सवेश' या 'सदेश' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'मद्रसविधम्', 'गान्धारसनीडम्'।

श्लोक 2.24

विस्पष्ट आदीनि गुणवचनेषु

vispaṣṭa ādīni guṇavacaneṣu

गुणवाचक (विशेषणसूचक) उत्तरपद के होने पर 'विस्पष्ट' आदि पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखते हैं, जैसे 'विस्पष्टकटुकम्', 'विचित्रकटुकम्'।

श्लोक 2.25

श्रज्य अवमकन्पापवत्सु भावे कर्मधारये

śrajya avamakanpāpavatsu bhāve karmadhāraye

भाव/अवस्था के अर्थ में बने कर्मधारय समास में उत्तरपद 'श्र' (श्रेष्ठ/श्रेयः), 'ज्या' (ज्येष्ठ/ज्यायः), 'अवम्', 'कन्' (कनिष्ठ/कनीयः) या पापयुक्त (पापिष्ठ/पापीयः) शब्दों से बना हो, तो पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'गमनश्रेष्ठम्', 'गमनकनिष्ठम्'।

श्लोक 2.26

कुमारः च

kumāraḥ ca

कर्मधारय समास में पूर्वपद के रूप में प्रयुक्त 'कुमार' शब्द पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'कुमारश्रमणा', 'कुमारकुलटा'।

श्लोक 2.27

आदिः प्रत्येनसि

ādiḥ pratyenasi

'प्रत्येनस्' शब्द उत्तरपद होने पर कर्मधारय समास में पूर्वपद (कुमार) का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'कुमारप्रत्येनाः'।

श्लोक 2.28

पूगेषु अन्यतरस्यां

pūgeṣu anyatarasyāṁ

समूह/गिरोह (पूग) वाचक शब्द उत्तरपद होने पर कर्मधारय समास में पूर्वपद (कुमार) का आदि स्वर विकल्प से उदात्त होता है, जैसे 'कुमारचातकाः' के दो उच्चारण सम्भव हैं।

श्लोक 2.29

इक् अन्त कालकपालभगालशरावेषु द्विगौ

ik anta kālakapālabhagālaśarāveṣu dvigau

द्विगु समास में यदि उत्तरपद इगन्त (इ/उ/ऋ/ऌ में समाप्त होने वाला), कालवाचक, या 'कपाल', 'भगाल', 'शराव' शब्द हो, तो पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'पञ्चारत्निः', 'पञ्चकपालः'।

श्लोक 2.30

बहु अन्यतरस्यां

bahu anyatarasyāṁ

उपर्युक्त प्रकार के उत्तरपदों से पहले द्विगु समास में पूर्वपद 'बहु' का स्वर भी विकल्प से पूर्ववत् बना रहता है, जैसे 'बह्वरत्निः' के दो रूप सम्भव हैं।

श्लोक 2.31

दिष्टिवितस्त्योः च

diṣṭivitastyoḥ ca

'दिष्टि' या 'वितस्ति' शब्द उत्तरपद होने पर द्विगु समास में पूर्वपद का स्वर विकल्प से पूर्ववत् बना रहता है, जैसे 'पञ्चदिष्टिः' के दो रूप सम्भव हैं।

श्लोक 2.32

सप्तंई सिद्धशुष्कपक्वबन्धेषु अकालात्

saptaṁī siddhaśuṣkapakvabandheṣu akālāt

'सिद्ध', 'शुष्क', 'पक्व' या 'बन्ध' शब्द उत्तरपद होने पर, कालवाचक से भिन्न सप्तम्यन्त पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'साङ्काश्यसिद्धः', 'कुम्भीपक्वः'।

श्लोक 2.33

परिप्रति उप अपाः वर्ज्यंआन अहोरात्र वयवेषु

pariprati upa apāḥ varjyaṁāna ahorātra vayaveṣu

अव्ययीभाव समास में जब उत्तरपद दिन-रात के किसी अंश को सूचित करे और उस अंश के अपवर्जन (वर्ज्यमान) का बोध हो, तब पूर्वपदस्थानीय 'परि', 'प्रति', 'उप' और 'अप' अपना स्वर पूर्ववत् बनाए रखते हैं, जैसे 'परित्रिगर्तम्', 'प्रतिपूर्वाह्णम्'।

श्लोक 2.34

राजन्यबहुवचनद्वंद्वे अन्धकवृष्णिषु

rājanyabahuvacanadvaṁdve andhakavṛṣṇiṣu

क्षत्रिय-कुलवाचक बहुवचनान्त शब्दों के द्वन्द्व समास में यदि अन्धक या वृष्णि वंश का बोध हो, तो पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'श्वाफल्कचैत्रकाः'।

श्लोक 2.35

संख्या

saṁkhyā

द्वन्द्व समास में संख्यावाचक पूर्वपद अपना स्वर पूर्ववत् बनाए रखता है, जैसे 'एकादश', 'द्वादश', 'त्रयोदश'।

श्लोक 2.36

आचार्य उपसर्जनः च न्तेवासी

ācārya upasarjanaḥ ca ntevāsī

जब आचार्यों के नाम अप्रधान (उपसर्जन) रूप में शिष्यों के नामों के साथ द्वन्द्व समास बनाते हैं, तो पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'आपिशल-पाणिनीयाः'।

श्लोक 2.37

कार्तकौजप आदयः

kārtakaujapa ādayaḥ

'कार्त-कौजप' आदि निश्चित द्वन्द्व समासों में पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'कार्त्तकौजपौ', 'सावर्णिमाण्डूकेयौ'।

श्लोक 2.38

महान् व्रीहि अपराह्ण गृष्टि इष्वासजाबालभारभारतहैलिहिलरौरवप्रवृद्धेषु

mahān vrīhi aparāhṇa gṛṣṭi iṣvāsajābālabhārabhāratahailihilarauravapravṛddheṣu

'व्रीहि', 'अपराह्ण', 'गृष्टि', 'इष्वास', 'जाबाल', 'भार', 'भारत', 'हैलिहिल', 'रौरव' या 'प्रवृद्ध' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद 'महत्' पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'महाभारतः', 'महापराह्णः'।

श्लोक 2.39

क्षुल्लकः च वैश्वदेवे

kṣullakaḥ ca vaiśvadeve

'वैश्वदेव' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद 'क्षुल्लक' और 'महत्' पूर्व स्वर बनाए रखते हैं, जैसे 'क्षुल्लकवैश्वदेवम्', 'महावैश्वदेवम्'।

श्लोक 2.40

उष्ट्रः सादिवाम्योः

uṣṭraḥ sādivāmyoḥ

'सादि' या 'वामि' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद 'उष्ट्र' पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'उष्ट्रसादिः', 'उष्ट्रवामिः'।

श्लोक 2.41

गौः सादसादिसारथिषु

gauḥ sādasādisārathiṣu

'साद', 'सादि' या 'सारथि' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद 'गो' पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'गोसादः', 'गोसारथिः'।

श्लोक 2.42

कुरुगार्हपतरिक्तगुरु असूतजरती अश्लीलदृढरूपापारेवडवातैत्तिलकद्रूःपण्य अम्बलः आसीभाराणां च

kurugārhapatariktaguru asūtajaratī aślīladṛḍharūpāpārevaḍavātaittilakadrūḥpaṇya ambalaḥ āsībhārāṇāṁ ca

'कुरुगार्हपत', 'रिक्तगुरु', 'असूतजरती', 'अश्लीलदृढ़रूपा' जैसे कुछ निश्चित समास-शब्दों की सूची में पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'कुरुगार्हपतम्', 'रिक्तगुरुः'।

श्लोक 2.43

चतुर्थी तदर्थे

caturthī tadarthe

जब उत्तरपद उस वस्तु को सूचित करे जिसके लिए पूर्वपद-वाची वस्तु का प्रयोजन (तदर्थ) हो, तो चतुर्थ्यन्त पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'यूपदारु', 'कुण्डलहिरण्यम्'।

श्लोक 2.44

अर्थे

arthe

'अर्थ' शब्द उत्तरपद होने पर चतुर्थ्यन्त पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'मात्रर्थम्', 'पित्रर्थम्'।

श्लोक 2.45

क्ते च

kte ca

क्त-प्रत्ययान्त शब्द उत्तरपद होने पर चतुर्थ्यन्त पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'गोहितम्', 'अश्वहितम्'।

श्लोक 2.46

कर्मधारये अनिष्ठा

karmadhāraye aniṣṭhā

कर्मधारय समास में क्त-प्रत्ययान्त उत्तरपद होने पर, स्वयं निष्ठान्त (क्त-प्रत्ययान्त) न होने वाला पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'श्रेणिकृताः', 'ऊककृताः'।

श्लोक 2.47

अहीने द्वितीया

ahīne dvitīyā

अहीन (न छोड़े जाने) के अर्थ में क्त-प्रत्ययान्त उत्तरपद होने पर द्वितीयान्त पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'कष्टश्रितः', 'ग्रामगतः'।

श्लोक 2.48

तृतीया कर्मणि

tṛtīyā karmaṇi

जब क्त-प्रत्ययान्त उत्तरपद कर्म (क्रिया की क्रियाग्रस्त वस्तु) को सूचित करे, तब तृतीयान्त पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'अहिहतः', 'वज्रहतः'।

श्लोक 2.49

गतिरनन्तरः

gatiranantaraḥ

कर्मवाचक क्त-प्रत्ययान्त उत्तरपद के ठीक पहले आने वाला गतिसंज्ञक (उपसर्ग जैसा) पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'प्रकृतः', 'प्रहृतः'।

श्लोक 2.50

त आदौ च ण् इति कृति अतौ

ta ādau ca ṇ iti kṛti atau

तकारादि (तुम्-प्रत्यय को छोड़कर) तथा नित् संज्ञक कृत्-प्रत्ययों वाला उत्तरपद होने पर उससे ठीक पहले आने वाला गतिसंज्ञक पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'प्रकर्त्ता', 'प्रकृतिः'।

श्लोक 2.51

तवै च अन्तः च युगपत्

tavai ca antaḥ ca yugapat

'तवै' प्रत्यय के अन्त्य स्वर के उदात्त होने के साथ-साथ, उससे ठीक पहले आने वाला गतिसंज्ञक पूर्वपद भी अपना पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'अन्वेतवै', 'परिस्तरितवै'।

श्लोक 2.52

अनिक् अन्तः अञ्चतौ वप्रत्यये

anik antaḥ añcatau vapratyaye

जब 'अञ्च्' धातु से 'व' प्रत्यययुक्त उत्तरपद (जैसे प्राङ्) बनता है, तो इगन्त (इ/उ/ऋ/ऌ में समाप्त) से भिन्न गतिसंज्ञक पूर्वपद पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'प्राङ्', 'परांङ्'।

श्लोक 2.53

नि अध्ई च

ni adhī ca

उसी 'अञ्च्+व' रूपी उत्तरपद के होने पर, इगन्त होते हुए भी 'नि' और 'अधि' पूर्वपद अपना पूर्व स्वर बनाए रखते हैं, जैसे 'न्यङ्', 'अध्यङ्'।

श्लोक 2.54

ईषत् अन्यतरस्यां

īṣat anyatarasyāṁ

पूर्वपद 'ईषत्' का स्वर विकल्प से पूर्ववत् बना रहता है, जैसे 'ईषत्कडारः' के दो रूप सम्भव हैं।

श्लोक 2.55

हिरण्यपरिमाणं धने

hiraṇyaparimāṇaṁ dhane

'धन' शब्द उत्तरपद होने पर स्वर्ण के परिमाण को सूचित करने वाला पूर्वपद विकल्प से पूर्व स्वर बनाए रखता है, जैसे 'द्विसुवर्णधनम्' के दो रूप सम्भव हैं।

श्लोक 2.56

प्रथमः अचिर पामत्तौ

prathamaḥ acira pāmattau

नवीनता के भाव में पूर्वपद 'प्रथम' का स्वर विकल्प से पूर्ववत् बना रहता है, जैसे 'प्रथमवैयाकरणः' के दो रूप सम्भव हैं।

श्लोक 2.57

कतर कतमौ कर्मधारये

katara katamau karmadhāraye

कर्मधारय समास में पूर्वपद 'कतर' और 'कतम' का स्वर विकल्प से पूर्ववत् बना रहता है, जैसे 'कतरकठः' के दो रूप सम्भव हैं।

श्लोक 2.58

आर्यः ब्राह्मणकुमारयोः

āryaḥ brāhmaṇakumārayoḥ

'ब्राह्मण' या 'कुमार' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद 'आर्य' का स्वर विकल्प से पूर्ववत् बना रहता है, जैसे 'आर्यब्राह्मणः' के दो रूप सम्भव हैं।

श्लोक 2.59

राजा च

rājā ca

उन्हीं उत्तरपदों (ब्राह्मण, कुमार) के होने पर पूर्वपद 'राजन्' का स्वर भी विकल्प से पूर्ववत् बना रहता है, जैसे 'राजब्राह्मणः' के दो रूप सम्भव हैं।

श्लोक 2.60

षष्ठी प्रत्येनसि

ṣaṣṭhī pratyenasi

'प्रत्येनस्' शब्द उत्तरपद होने पर षष्ठ्यन्त 'राज्ञः' पूर्वपद का स्वर भी विकल्प से पूर्ववत् बना रहता है, जैसे 'राज्ञः प्रत्येनाः' के दो रूप सम्भव हैं।

श्लोक 2.61

क्ते नित्य अर्थे

kte nitya arthe

नित्यता के अर्थ में क्त-प्रत्ययान्त उत्तरपद होने पर पूर्वपद अपना मूल स्वर विकल्प से बनाए रखता है, जैसे 'नित्यप्रहसितः' के दो रूप सम्भव हैं।

श्लोक 2.62

ग्रामः शिल्पिनि

grāmaḥ śilpini

शिल्पी (कारीगर) वाचक शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद 'ग्राम' का स्वर विकल्प से पूर्ववत् बना रहता है, जैसे 'ग्रामनापितः' के दो रूप सम्भव हैं।

श्लोक 2.63

राजा च प्रशंसायां

rājā ca praśaṁsāyāṁ

प्रशंसा का बोध होने पर शिल्पीवाचक उत्तरपद के साथ पूर्वपद 'राजन्' का स्वर भी विकल्प से पूर्ववत् बना रहता है, जैसे 'राजनापितः' के दो रूप सम्भव हैं।

श्लोक 2.64

आदिरुदात्तः

ādirudāttaḥ

यह एक अधिकार-सूत्र है: इससे आगे के सूत्रों में यह समझना चाहिए कि पूर्वपद का आदि स्वर उदात्त हो जाता है (जब तक अन्यथा न कहा जाए)।

श्लोक 2.65

सप्तमीहारिणौ धर्म्ये अहरणे

saptamīhāriṇau dharmye aharaṇe

धर्म्य (रूढ़, गैर-शाब्दिक) अर्थ में 'हरण' शब्द उत्तरपद होने पर सप्तम्यन्त पूर्वपद तथा 'हारिन्' पूर्वपद का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'स्तूपेशाणः', 'याज्ञिकाश्वः'।

श्लोक 2.66

युक्ते च

yukte ca

'युक्त' (जुड़ा हुआ/संलग्न) के अर्थ में बने समास में पूर्वपद का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'गोबल्लवः', 'गोसङ्ख्यः'।

श्लोक 2.67

विभाषा अध्यक्षे

vibhāṣā adhyakṣe

'अध्यक्ष' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद का आदि स्वर विकल्प से उदात्त होता है, जैसे 'गवाध्यक्षः' के दो रूप सम्भव हैं।

श्लोक 2.68

पापं च शिल्पिनि

pāpaṁ ca śilpini

शिल्पीवाचक उत्तरपद होने पर पूर्वपद 'पाप' का आदि स्वर भी विकल्प से उदात्त होता है, जैसे 'पापनापितः' के दो रूप सम्भव हैं।

श्लोक 2.69

गोत्र अन्तेवासिन्माणवब्राह्मणेषु क्षेपे

gotra antevāsinmāṇavabrāhmaṇeṣu kṣepe

निन्दा (क्षेप) के भाव में गोत्रवाचक, अन्तेवासीवाचक, माणववाचक या 'ब्राह्मण' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'जङ्घावात्स्यः', 'कुमारीदाक्षाः'।

श्लोक 2.70

अङ्गानि मैरेये

aṅgāni maireye

'मैरेय' (एक प्रकार की मदिरा) शब्द उत्तरपद होने पर उसके घटक द्रव्य को सूचित करने वाला पूर्वपद का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'गुडमैरेयः', 'मधुमैरेयः'।

श्लोक 2.71

भक्त आख्याः तदर्थेषु

bhakta ākhyāḥ tadartheṣu

जब उत्तरपद भोजन के लिए प्रयुक्त पात्र (अन्नार्थ) को सूचित करे, तब भोज्य वस्तु (भक्त) को सूचित करने वाले पूर्वपद का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'भिक्षाकंसः', 'श्राणाकंसः'।

श्लोक 2.72

गोबिडालसिंहसेन्धवेषु उपमाने

gobiḍālasiṁhasendhaveṣu upamāne

उपमान (तुलना का आधार) के अर्थ में 'गो', 'बिडाल', 'सिंह' या 'सैन्धव' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'धान्यगवः', 'भिक्षाबिडालः'।

श्लोक 2.73

अके जीविका अर्थे

ake jīvikā arthe

जीविका (आजीविका) के अर्थ में 'अक'-प्रत्ययान्त उत्तरपद होने पर पूर्वपद का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'दन्तलेखकः', 'नखलेखकः'।

श्लोक 2.74

प्राचां क्रीडायां

prācāṁ krīḍāyāṁ

प्राच्य (पूर्वी) प्रदेश की क्रीड़ा के अर्थ में 'अक'-प्रत्ययान्त उत्तरपद होने पर पूर्वपद का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'शालभञ्जिका', 'तालभञ्जिका'।

श्लोक 2.75

अणि नियुक्ते

aṇi niyukte

नित्य नियोजन (नियुक्त) के अर्थ में 'अण्'-प्रत्ययान्त उत्तरपद होने पर पूर्वपद का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'छत्रधारः', 'तूणीरधारः'।

श्लोक 2.76

शिल्पिनि च अकृञः

śilpini ca akṛñaḥ

शिल्पीवाचक समास में 'अण्'-प्रत्ययान्त उत्तरपद होने पर (यदि वह प्रत्यय 'कृञ्' धातु से न बना हो), पूर्वपद का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'तन्तुवायः', 'तुन्नवायः'।

श्लोक 2.77

संज्ञायां च

saṁjñāyāṁ ca

इसी प्रकार संज्ञा (विशिष्ट नाम) के विषय में भी 'अण्'-प्रत्ययान्त (कृञ् धातु से भिन्न) उत्तरपद होने पर पूर्वपद का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'तन्तुवायो नाम कीटः'।

श्लोक 2.78

गोतन्तियवं पाले

gotantiyavaṁ pāle

'पाल' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद 'गो', 'तन्ति' और 'यव' का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'गोपालः', 'यवपालः'।

श्लोक 2.79

णिनि

ṇini

'णिन्'-प्रत्ययान्त शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'फलहारी', 'पर्णहारी'।

श्लोक 2.80

उपमानं शब्द र्थप्रकृतौ व

upamānaṁ śabda rthaprakṛtau va

उपसर्ग-रहित शब्दार्थक (ध्वनि करने के अर्थ वाली) धातु से बना णिन्नन्त उत्तरपद होने पर, उपमानवाचक पूर्वपद का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'उष्ट्रक्रोशी', 'खरनादी'।

श्लोक 2.81

युक्त आ रोहिन्आदयः च

yukta ā rohinādayaḥ ca

'युक्तारोहिन्' आदि निश्चित समासों में पूर्वपद का आदि स्वर उदात्त होता है, जैसे 'युक्तारोही', 'आगतयोधी'।

श्लोक 2.82

दीर्घकाशतुषभ्राष्ट्रवटं जे

dīrghakāśatuṣabhrāṣṭravaṭaṁ je

'ज' (जन्मा हुआ) शब्द उत्तरपद होने पर दीर्घान्त, 'काश', 'तुष', 'भ्राष्ट्र' और 'वट' पूर्वपदों का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'कुटीजः', 'काशजः'।

श्लोक 2.83

अन्त्यात् पूर्वं बह्वचः

antyāt pūrvaṁ bahvacaḥ

'ज' शब्द उत्तरपद होने पर बहुस्वर (अनेक अक्षरों वाले) पूर्वपद का अन्त्य से पहले वाला (उपान्त्य) स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'उपसरजः', 'आमलकीजः'।

श्लोक 2.84

ग्रामे अनिवसन्तः

grāme anivasantaḥ

'ग्राम' शब्द उत्तरपद होने पर, निवासी को न सूचित करने वाले पूर्वपद का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'मल्लग्रामः', 'देवग्रामः'।

श्लोक 2.85

घोष आदिषु

ghoṣa ādiṣu

'घोष' आदि निश्चित शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'दाक्षिघोषः', 'दाक्षिकटः'।

श्लोक 2.86

छात्त्रि आदयः शालायां

chāttri ādayaḥ śālāyāṁ

'शाला' शब्द उत्तरपद होने पर, निवासी को सूचित करने वाले 'छात्री' आदि पूर्वपदों का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'चात्रिशाला', 'भाण्डिशाला'।

श्लोक 2.87

प्रस्थे अवृद्धं अकर्की आदीणाम्

prasthe avṛddhaṁ akarkī ādīṇām

'प्रस्थ' शब्द उत्तरपद होने पर, वृद्धिसंज्ञक न होने वाले तथा 'कर्की' आदि सूची से भिन्न पूर्वपद का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'इन्द्रप्रस्थः', 'कुण्डप्रस्थः'।

श्लोक 2.88

माला आदीणां च

mālā ādīṇāṁ ca

'प्रस्थ' शब्द उत्तरपद होने पर 'माला' आदि पूर्वपदों का भी आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'मालाप्रस्थः', 'शालाप्रस्थः'।

श्लोक 2.89

अमहत्नवं नगरे अनुदीचां

amahatnavaṁ nagare anudīcāṁ

उदीच्य (उत्तरी) प्रदेश की प्रवृत्ति से भिन्न 'नगर' शब्द उत्तरपद होने पर, 'महत्' और 'नव' को छोड़कर शेष पूर्वपद का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'सुह्मनगरम्', 'पुड्रनगरम्'।

श्लोक 2.90

अर्मे च अवर्णं द्व्यच् त्र्यच्

arme ca avarṇaṁ dvyac tryac

'अर्म' शब्द उत्तरपद होने पर द्व्यच् (दो अक्षरों वाले) या त्र्यच् (तीन अक्षरों वाले) पूर्वपद का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'दत्तार्मम्', 'कुक्कुटार्मम्'।

श्लोक 2.91

न भूत अधिकसंजीवमद्र अश्मन्कज्जलं

na bhūta adhikasaṁjīvamadra aśmankajjalaṁ

'अर्म' शब्द उत्तरपद होने पर भी 'भूत', 'अधिक', 'संजीव', 'भद्र/मद्र', 'अश्मन्' और 'कज्जल' पूर्वपदों का आदि स्वर उदात्त नहीं होता (यह सूत्र ९० का अपवाद है), जैसे 'भूतार्मम्', 'अधिकार्मम्'।

श्लोक 2.92

अन्तः

antaḥ

यह एक अधिकार-सूत्र है: इससे आगे के सूत्रों में यह समझना चाहिए कि पूर्वपद का अन्त्य (अन्तिम) स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे आगे 'सर्वश्वेतः', 'सर्वकृष्णः' में देखा जाएगा।

श्लोक 2.93

सर्वं गुणकार्त्स्न्ये

sarvaṁ guṇakārtsnye

सम्पूर्णता (गुणकार्त्स्न्य) के अर्थ में प्रयुक्त पूर्वपद 'सर्व' का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'सर्वश्वेतः' (पूरा सफेद), 'सर्वकृष्णः'।

श्लोक 2.94

संज्ञायां गिरिनिकाययोः

saṁjñāyāṁ girinikāyayoḥ

संज्ञा (विशिष्ट नाम) के विषय में 'गिरि' या 'निकाय' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'अञ्जनागिरिः', 'शापिण्डिनिकायः'।

श्लोक 2.95

कुमार्यां वयसि

kumāryāṁ vayasi

आयु (वयस्) के बोध में 'कुमारी' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'वृद्धकुमारी', 'जरत्कुमारी'।

श्लोक 2.96

उदके अच्अकेवले

udake acakevale

जब मिश्रण (शुद्ध जल न होने) का बोध हो और 'उदक' शब्द उत्तरपद हो, तब पूर्वपद का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'गुडोदकम्', 'तिलोदकम्'।

श्लोक 2.97

द्विगौ क्रतौ

dvigau kratau

यज्ञ/क्रतु के अर्थ में उत्तरपद स्वयं द्विगु समास हो तो पूर्वपद का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'गर्गत्रिरात्रः', 'चरकत्रिरात्रः'।

श्लोक 2.98

सभायां नपुंसके

sabhāyāṁ napuṁsake

नपुंसकलिङ्गी समास में 'सभा' शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'गोपालसभम्', 'पशुपालसभम्'।

श्लोक 2.99

पुरे प्राचां

pure prācāṁ

प्राच्य (पूर्वी) प्रदेश की प्रवृत्ति में 'पुर' शब्द उत्तरपद होने पर नगर-नामवाचक पूर्वपद का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'ललाटपुरम्', 'काञ्चीपुरम्'।

श्लोक 2.100

अरिष्टगौडपूर्वे च

ariṣṭagauḍapūrve ca

उसी 'पुर'-समास (नगर-नामवाचक) में पूर्वपद 'अरिष्ट' और 'गौड' का भी अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे 'अरिष्टपुरम्', 'गौडपुरम्'।

श्लोक 2.101

न हास्तिनफलकमार्देयाः

na hāstinaphalakamārdeyāḥ

"पुर" शब्द जब उत्तरपद हो, तो उससे पूर्ववर्ती हास्तिन, फलक तथा मार्देय शब्दों का अन्त्य स्वर उदात्त नहीं होता, जैसे हास्तिनपुरम्, फलकपुरम्, मार्देयपुरम्।

श्लोक 2.102

कुसूलकूपकुम्भशालं बिले

kusūlakūpakumbhaśālaṁ bile

बिल शब्द उत्तरपद होने पर कुसूल, कूप, कुम्भ तथा शाला शब्द पूर्वपद होने पर भी इसी प्रकार उनका अन्त्य स्वर उदात्त नहीं होता; उदाहरण: कुसूलबिलम् (कोठले का मुख), कूपबिलम् (कुएँ का मुख), कुम्भबिलम् (घड़े का मुख), शालाबिलम् (घर का द्वार)।

श्लोक 2.103

दिक् शब्दाः ग्रामजनपद आख्यानचानराटेषु

dik śabdāḥ grāmajanapada ākhyānacānarāṭeṣu

ग्राम, जनपद, उपाख्यान (कथावाचक) तथा चानराट जैसे प्रसिद्ध शब्दरूप शब्द उत्तरपद हों, तो पूर्वपद में आए हुए दिशासूचक शब्दों (जैसे पूर्व, अपर आदि) का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे पूर्वपञ्चालाः, अपरपञ्चालाः।

श्लोक 2.104

आचार्य उपसर्जनः च न्तेवासी

ācārya upasarjanaḥ ca ntevāsī

अन्तेवासी (शिष्य) वाचक शब्द उत्तरपद हो और आचार्यवाचक शब्द गौण पद (उपसर्जन) के रूप में पूर्वपद बने, तो उस समास में भी दिग्वाचक पूर्वपदों का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे पूर्वपाणिनीयाः, अपरपाणिनीयाः, पूर्वकाशकृत्स्नाः।

श्लोक 2.105

उत्तरपदवृद्धौ सर्वं च

uttarapadavṛddhau sarvaṁ ca

जिन शब्दों को उत्तरपदवृद्धि सम्बन्धी सूत्रों में गिनाया गया है, वे उत्तरपद हों तो पूर्वपदस्थ सर्व शब्द तथा दिग्वाचक शब्द भी उदात्त हो जाते हैं, जैसे सर्वपाञ्चालकः, पूर्वपाञ्चालकः, उत्तरपाञ्चालकः।

श्लोक 2.106

बहुव्रीहौ विश्वं संज्ञयां

bahuvrīhau viśvaṁ saṁjñayāṁ

किसी व्यक्तिवाचक संज्ञा के रूप में प्रयुक्त बहुव्रीहि समास में पूर्वपदस्थ विश्व शब्द का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे विश्वदेवः, विश्वयशाः, विश्वमहान्, विश्वकर्मा।

श्लोक 2.107

उदर अश्व इषुषु

udara aśva iṣuṣu

बहुव्रीहि समास में उदर, अश्व तथा इषु शब्द उत्तरपद होने पर पूर्वपद का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे वृकोदरः (भेड़िये-जैसा पेट वाला, भीमसेन का नाम), हर्यश्वः (तेज घोड़ोंवाला, इन्द्र का नाम), सुवर्णपुङ्खेषुः (सोने के पंखवाले बाणोंवाला)।

श्लोक 2.108

क्षेपे

kṣepe

उदर, अश्व और इषु उत्तरपद वाले उपर्युक्त बहुव्रीहि समास संज्ञा न होकर यदि निन्दा (क्षेप) का बोध कराएँ, तब भी पूर्वपद का अन्त्य स्वर उदात्त होता है, जैसे कुण्डोदरः (कुण्ड-जैसा पेट), कटुकाश्वः (चंचल घोड़ेवाला), स्पन्दिताश्वः।

श्लोक 2.109

नदी बन्धुनि

nadī bandhuni

बन्धु शब्द उत्तरपद होने पर बहुव्रीहि समास में नदी-संज्ञक (स्त्रीलिङ्ग ई/ऊ-कारान्त) पूर्वपद का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे गार्गीबन्धुः (जिसकी बन्धु गार्गी है), वात्सीबन्धुः।

श्लोक 2.110

निष्ठा उपसर्गपूर्वं अन्यतरस्याम्

niṣṭhā upasargapūrvaṁ anyatarasyām

बहुव्रीहि समास में यदि पूर्वपद उपसर्गयुक्त निष्ठा (क्त/क्तवतु) प्रत्ययान्त शब्द हो, तो उसका अन्त्य स्वर विकल्प से उदात्त होता है, जैसे प्रधौतमुखः, प्रक्षालितमुखः, जिनके कई वैकल्पिक उच्चारण-रूप मिलते हैं।

श्लोक 2.111

उत्तरपद आदिः

uttarapada ādiḥ

यह एक अधिकार-सूत्र है: यहाँ से आगे जिन नियमों में स्वर का उल्लेख होगा, वे उत्तरपद के आदि (प्रथम) स्वर के उदात्त होने से सम्बन्धित समझे जाएँगे, जैसे आगे कहे जाने वाले शुक्लकर्णः, कृष्णकर्णः जैसे उदाहरणों में यही प्रवृत्त होता है।

श्लोक 2.112

कर्णः वर्णलक्षणात्

karṇaḥ varṇalakṣaṇāt

बहुव्रीहि समास में वर्णवाचक (रंग बतानेवाले) तथा लक्षणवाचक (चिह्न बतानेवाले) शब्दों से परे आने वाले कर्ण शब्द (उत्तरपद) का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे शुक्लकर्णः (सफेद कानोंवाला), कृष्णकर्णः, दात्राकर्णः (हँसिया-जैसे चिह्नवाले कानों वाला)।

श्लोक 2.113

संज्ञा औपम्ययोः च

saṁjñā aupamyayoḥ ca

व्यक्तिवाचक संज्ञा तथा उपमा (समानता) के अर्थ में प्रयुक्त बहुव्रीहि समास में भी कर्ण शब्द (उत्तरपद) का आदि स्वर उदात्त होता है, जैसे कुञ्चिकर्णः, मणिकर्णः (संज्ञा में) और गोकर्णः, खरकर्णः (उपमा में)।

श्लोक 2.114

कण्ठपृष्ठग्रीवाजंघं च

kaṇṭhapṛṣṭhagrīvājaṁghaṁ ca

संज्ञा और उपमा के अर्थ वाले बहुव्रीहि समासों में कण्ठ, पृष्ठ, ग्रीवा तथा जङ्घा शब्द उत्तरपद होने पर भी इनका आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे नीलकण्ठः (संज्ञा में), खरकण्ठः (उपमा में)।

श्लोक 2.115

शृङ्गं अवस्थायां च

śṛṅgaṁ avasthāyāṁ ca

अवस्था (स्थिति), संज्ञा तथा उपमा — इन तीनों अर्थों में प्रयुक्त बहुव्रीहि समास में शृङ्ग शब्द उत्तरपद हो, तो उसका भी आदि स्वर उदात्त होता है, जैसे उद्गतशृङ्गः (ऊँचे सींगोंवाला), द्व्यङ्गुलशृङ्गः (दो अंगुल के सींगोंवाला)।

श्लोक 2.116

नञः जरमरमित्रमृताः

nañaḥ jaramaramitramṛtāḥ

नञ् (निषेधवाचक न-कार) पूर्वपद होने पर जर, मर, मित्र तथा मृत शब्द उत्तरपद बनने पर उनका आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे अजरः (जरारहित), अमरः, अमित्रः (शत्रु), अमृतः।

श्लोक 2.117

सोर्मनसी अलोमन्उषसी

sormanasī alomanuṣasī

सु (शोभनार्थक) पूर्वपद वाले बहुव्रीहि समास में मन्-प्रत्ययान्त (लोमन् को छोड़कर) तथा अस्-प्रत्ययान्त (उषस् को छोड़कर) उत्तरपदों का आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे सुकर्मा, सुधर्मा (मन्नन्त); सुयशाः, सुमनाः (असन्त)।

श्लोक 2.118

क्रतु आदयः

kratu ādayaḥ

सु पूर्वपद वाले बहुव्रीहि समास में क्रत्वादि गण में पठित क्रतु आदि शब्द उत्तरपद हों, तो उनका भी आदि स्वर उदात्त होता है, जैसे सुक्रतुः, सुदृशीकः।

श्लोक 2.119

आदि उदात्तं द्व्यच् छन्दसि

ādi udāttaṁ dvyac chandasi

यदि उत्तरपद दो स्वरोंवाला (द्व्यच्) हो और स्वयं आद्युदात्त हो, तो सु-पूर्वपदक बहुव्रीहि समास में भी वेद-विषय में वह आद्युदात्त ही बना रहता है, जैसे स्वश्वाः, सुरथाः।

श्लोक 2.120

वीरवीर्यौ च

vīravīryau ca

सु शब्द से उत्तरवर्ती वीर तथा वीर्य शब्दों का आदि स्वर भी बहुव्रीहि समास में उदात्त हो जाता है, जैसे सुवीरेण, सुवीर्यस्य।

श्लोक 2.121

कूलतीरतूलमूलशाला अक्षसमं अव्ययीभावे

kūlatīratūlamūlaśālā akṣasamaṁ avyayībhāve

अव्ययीभाव समास में कूल, तीर, तूल, मूल, शाला, अक्ष तथा सम शब्द उत्तरपद हों, तो उनका आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे परिकूलम्, उपकूलम्, परितीरम्, उपतीरम्, परिमूलम्।

श्लोक 2.122

कंसमन्थशूर्पपाय्यकाण्डं द्विगौ

kaṁsamanthaśūrpapāyyakāṇḍaṁ dvigau

द्विगु समास में कंस, मन्थ, शूर्प, पाय्य तथा काण्ड शब्द उत्तरपद हों, तो उनका आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे द्विकंसः, त्रिकंसः, द्विमन्थः, द्विशूर्पः, द्विकाण्डः।

श्लोक 2.123

तत्पुरुषे शालायां नपुंसके

tatpuruṣe śālāyāṁ napuṁsake

नपुंसकलिङ्ग तत्पुरुष समास में शाला शब्द उत्तरपद हो, तो उसका आदि स्वर उदात्त होता है, जैसे ब्राह्मणशालम्, क्षत्रियशालम्।

श्लोक 2.124

कन्था च

kanthā ca

नपुंसकलिङ्ग तत्पुरुष समास में कन्था शब्द भी उत्तरपद होने पर उसका आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे सौशमिकन्थम्, आह्वकन्थम्, चप्पकन्थम्।

श्लोक 2.125

आदिः चिहण आदीणां

ādiḥ cihaṇa ādīṇāṁ

उपर्युक्त कन्था-अन्त तत्पुरुष समास में यदि पूर्वपद चिहणादि गण के शब्द हों, तो पूर्वपद का ही आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे चिहणकन्थम्, मडरकन्थम्।

श्लोक 2.126

चेलखेटकटुककाण्डं गर्हायां

celakheṭakaṭukakāṇḍaṁ garhāyāṁ

तत्पुरुष समास में चेल, खेट, कटुक तथा काण्ड शब्द उत्तरपद हों और समास से निन्दा (गर्हा) का बोध हो, तो उनका आदि स्वर उदात्त होता है, जैसे पुत्रचेलम् (फटे वस्त्र-जैसा निकम्मा पुत्र), नगरखेटम् (खराब जूता), दधिकटुकम् (खट्टा दही)।

श्लोक 2.127

चीरं उपमानम्

cīraṁ upamānam

उपमानार्थक (समानता बतानेवाले) तत्पुरुष समास में चीर शब्द उत्तरपद हो, तो उसका आदि स्वर उदात्त होता है, जैसे वस्त्रचीरम् (कपड़े की पट्टी-जैसा), पटचीरम्, कम्बलीचीरम्।

श्लोक 2.128

पललसूपशाकं मिश्रे

palalasūpaśākaṁ miśre

मिश्रण (मिलावट) के अर्थ वाले तत्पुरुष समास में पलल, सूप तथा शाक शब्द उत्तरपद हों, तो उनका आदि स्वर उदात्त होता है, जैसे गुडपललम् (गुड़ मिला तिल का चूर्ण), धृतसूपः (घी मिली दाल), धृतशाकम्।

श्लोक 2.129

कूलसूदस्थलकर्षाः संज्ञायां

kūlasūdasthalakarṣāḥ saṁjñāyāṁ

व्यक्तिवाचक संज्ञा के रूप में प्रयुक्त तत्पुरुष समास में कूल, सूद, स्थल तथा कर्ष शब्द उत्तरपद हों, तो उनका आदि स्वर उदात्त होता है, जैसे दाक्षिकूलम्, देवसूदम्, दाण्डायनस्थली, दाक्षिकर्षः।

श्लोक 2.130

अकर्मधारये राज्यं

akarmadhāraye rājyaṁ

कर्मधारय से भिन्न तत्पुरुष समास में राज्य शब्द उत्तरपद हो, तो उसका आदि स्वर उदात्त होता है, जैसे ब्राह्मणराज्यम्, क्षत्रियराज्यम्।

श्लोक 2.131

वर्ग्य आदयः च

vargya ādayaḥ ca

कर्मधारय-भिन्न तत्पुरुष समास में वर्ग्यादि गण के शब्द उत्तरपद हों, तो उनका भी आदि स्वर उदात्त होता है, जैसे वासुदेववर्ग्यः, अर्जुनपक्ष्यः।

श्लोक 2.132

पुत्रः पुंभ्यः

putraḥ puṁbhyaḥ

पुरुषवाचक शब्द पूर्वपद होने पर तत्पुरुष समास में पुत्र शब्द उत्तरपद का आदि स्वर उदात्त होता है, जैसे कौनटिपुत्रः (कौनटि का पुत्र), दामकपुत्रः, माहिषकपुत्रः।

श्लोक 2.133

न आचार्यराजन्ऋत्विज्संयुक्तज्ञाति आख्यायां

na ācāryarājanṛtvijsaṁyuktajñāti ākhyāyāṁ

किन्तु आचार्यवाचक, राजावाचक, ऋत्विग्वाचक, स्त्री-सम्बन्धवाचक तथा ज्ञातिवाचक (सम्बन्धी-वाचक) पुंशब्दों से परे रहने पर पुत्र शब्द का आदि स्वर उदात्त नहीं होता, जैसे आचार्यपुत्रः, राजपुत्रः, ऋत्विक्पुत्रः।

श्लोक 2.134

चूर्णआदीनि अप्राणिषष्ठ्याः

cūrṇaādīni aprāṇiṣaṣṭhyāḥ

तत्पुरुष समास में प्राणिवाचक-भिन्न षष्ठ्यन्त (सम्बन्ध कारक) शब्द से परे चूर्णादि गण के शब्दों का आदि स्वर उदात्त होता है, जैसे मुद्गचूर्णम् (मूँग का आटा), मसूरचूर्णम्।

श्लोक 2.135

षट् च काण्डआदीनि

ṣaṭ ca kāṇḍaādīni

प्राणिवाचक-भिन्न षष्ठ्यन्त पूर्वपद से परे काण्ड, चीर, पलल, सूप, शाक तथा कूल — इन छह शब्दों का भी आदि स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे दर्भकाण्डम्, शरकाण्डम्, दर्भचीरम्, कुशचीरम्।

श्लोक 2.136

कुण्डं वनं

kuṇḍaṁ vanaṁ

वनवाचक (वन के नाम बतानेवाले) तत्पुरुष समास में कुण्ड शब्द उत्तरपद हो, तो उसका आदि स्वर उदात्त होता है, जैसे दर्भकुण्डम्, शरकुण्डम्।

श्लोक 2.137

प्रकृत्या भगालं

prakṛtyā bhagālaṁ

तत्पुरुष समास में भगाल तथा उसके अर्थ में आने वाले शब्द उत्तरपद हों, तो वे अपने स्वाभाविक (प्रकृति) स्वर में ही बने रहते हैं, अर्थात् उनका स्वर परिवर्तित नहीं होता, जैसे कुम्भीभगालम् (घड़े का आधा टुकड़ा), कुम्भीकपालम्।

श्लोक 2.138

शितेर्नित्य अ बह्व् च् अहुव्रीहौ अभसत्

śiternitya a bahv c ahuvrīhau abhasat

शिति शब्द पूर्वपद वाले बहुव्रीहि समास में यदि उत्तरपद दो से अधिक स्वरोंवाला न हो, तो वह उत्तरपद भसत् शब्द को छोड़कर सदा अपने मूल (प्रकृति) स्वर में ही बना रहता है, जैसे शितिपादः, शित्यंसः, शित्योष्ठः।

श्लोक 2.139

गतिकारक उपपदात् कृत्

gatikāraka upapadāt kṛt

गतिसंज्ञक शब्द, कारकवाचक शब्द तथा उपपद से परे तत्पुरुष समास में उत्तरपदरूप कृदन्त शब्द अपने ही मूल स्वर में बना रहता है, जैसे प्रकारकः, प्रहारकः (गति से); इध्मप्रव्रश्चनः, पलाशशातनः (कारक से)।

श्लोक 2.140

उभे वनस्पतिआदिषु युगपत्

ubhe vanaspatiādiṣu yugapat

वनस्पत्यादि गण में पठित कुछ निश्चित समस्त शब्दों में पूर्वपद और उत्तरपद दोनों के स्वर एक साथ अपने मूल रूप में ही बने रहते हैं, जैसे वनस्पतिः, बृहस्पतिः (बृहतां + पतिः)।

श्लोक 2.141

देवताद्वंद्वे च

devatādvaṁdve ca

देवता-वाचक शब्दों के द्वन्द्व समास में भी पूर्वपद और उत्तरपद दोनों के स्वर एक साथ मूल रूप में ही बने रहते हैं, जैसे इन्द्रासोमौ, इन्द्रावरुणौ, इन्द्राबृहस्पती।

श्लोक 2.142

न उत्तरपदे अनुदात्त आदौ अपृथिवीरुद्रपूषन्मन्थिषु

na uttarapade anudātta ādau apṛthivīrudrapūṣanmanthiṣu

किन्तु देवताद्वन्द्व समास में यदि उत्तरपद पृथिवी, रुद्र, पूषन् तथा मन्थिन् को छोड़कर किसी अन्य अनुदात्तादि (आदि में अनुदात्त स्वरवाले) शब्द का हो, तो पूर्वोत्तर दोनों पदों का मूल स्वर एक साथ नहीं बना रहता, जैसे इन्द्राग्नी, इन्द्रावायू।

श्लोक 2.143

अन्तः

antaḥ

यह भी एक अधिकार-सूत्र है: यहाँ से आगे के नियम समास में उत्तरपद के अन्तिम स्वर के उदात्त होने से सम्बन्धित समझे जाने चाहिए, जैसे आगे कहे जाने वाले सुनीथः, अवभृथः जैसे उदाहरणों में यह प्रवृत्त होता है।

श्लोक 2.144

थ अथघञ्क्त अच् अप् इत्रकाणां

tha athaghañkta ac ap itrakāṇāṁ

गतिसंज्ञक, कारकवाचक तथा उपपद से परे रहने वाले उत्तरपदस्थ थ-अन्त, अथ-अन्त, घञ्-प्रत्ययान्त, क्र-प्रत्ययान्त, अच्-प्रत्ययान्त, अप्-प्रत्ययान्त, इत्र-प्रत्ययान्त तथा क-प्रत्ययान्त शब्दों का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे सुनीथः (थ), आवसथः (अथ), प्रभेदः (घञ्), प्रलवः (अप्), गोवृषः (क)।

श्लोक 2.145

सु उपमाणात् क्तः

su upamāṇāt ktaḥ

सु शब्द तथा उपमानवाचक शब्दों से परे रहने वाले क्त-प्रत्ययान्त (भूतकृदन्त) उत्तरपद का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे सुकृतम्, सुभुक्तम् (सु से); वृकावलुप्तम्, शशप्लुतम् (उपमान से)।

श्लोक 2.146

संज्ञायां अणाचित आदीणाम्

saṁjñāyāṁ aṇācita ādīṇām

गतिसंज्ञक, कारक तथा उपपद से परे रहने वाले क्त-प्रत्ययान्त उत्तरपदों में से (अचित शब्द को छोड़कर) शेष सभी का अन्त्य स्वर संज्ञा-विषयक समास में उदात्त हो जाता है, जैसे उपहूतः शाकल्यः; कारक से — धनुष्खाता नदी, कुद्दालखातं नगरम्।

श्लोक 2.147

प्रवृद्धआदीणां च

pravṛddhaādīṇāṁ ca

प्रवृद्धादि गण में पठित समस्त शब्दों में उत्तरपदस्थ क्त-प्रत्ययान्त शब्द का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे प्रवृद्धं यानम्, प्रवृद्धो वृषलः, प्रयुक्ताः सक्तवः।

श्लोक 2.148

कारकात् दत्त श्रुतयोरेव आशिषि

kārakāt datta śrutayoreva āśiṣi

संज्ञाविषयक समास में यदि आशीर्वाद का अर्थ प्रकट होता हो, तो कारक से परे केवल दत्त तथा श्रुत — इन दो क्त-प्रत्ययान्त शब्दों का ही अन्त्य स्वर उदात्त होता है, जैसे देवदत्तः (देवताओं द्वारा दिया गया), विष्णुश्रुतः।

श्लोक 2.149

इत्थम्भूतेन कृतं इति च

itthambhūtena kṛtaṁ iti ca

"इस प्रकार के व्यक्ति के द्वारा किया गया" — इस अर्थ में बने समास में क्त-प्रत्ययान्त उत्तरपद का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे सुप्तप्रलपितम् (सोए हुए व्यक्ति का बड़बड़ाना), उन्मत्तप्रलपितम्, प्रमत्तगीतम्।

श्लोक 2.150

अनः भावकर्मवचनः

anaḥ bhāvakarmavacanaḥ

भाव (क्रिया की अवस्था) तथा कर्म के अर्थ में विहित अन्-प्रत्यय से युक्त कारकोत्तरवर्ती क्त-प्रत्ययान्त उत्तरपद का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे ओदनभोजनं सुखम्, पयःपानं सुखम्; कर्म अर्थ में राजभोजनाः शालयः।

श्लोक 2.151

मंक्तिन् व्याख्यानशयन आसनस्थानयाजक आदिक्रीताः

maṁktin vyākhyānaśayana āsanasthānayājaka ādikrītāḥ

कारकोत्तरवर्ती उत्तरपदस्थानीय मन्-प्रत्ययान्त, क्तिन्-प्रत्ययान्त तथा व्याख्यान, शयन, आसन, स्थान, याजक आदि एवं क्रीत शब्दों का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे रथवर्त्म, शकटवर्त्म (मन्); पाणिनिकृतिः (क्तिन्); ऋग्यनव्याख्यानम् (व्याख्यान)।

श्लोक 2.152

सप्तम्याः पुण्यं

saptamyāḥ puṇyaṁ

सप्तम्यन्त (अधिकरण कारक) पूर्वपद से परे रहने वाले पुण्य शब्द (उत्तरपद) का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे अध्ययनपुण्यम्, वेदपुण्यम्।

श्लोक 2.153

ऊन अर्थकलहं तृतीययाः

ūna arthakalahaṁ tṛtīyayāḥ

तृतीयान्त (करण कारक) पूर्वपद से परे रहने वाले ऊनार्थक (कमी बतानेवाले) शब्दों तथा कलह शब्द का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे माषोनम्, माषविकलम्, असिकलहः, वाक्कलहः।

श्लोक 2.154

मिश्रं च अनुपसर्गं असंधौ

miśraṁ ca anupasargaṁ asaṁdhau

यदि सन्धि (मेल/जोड़) का अर्थ प्रकट न होता हो, तो तृतीयान्त से परे उपसर्गरहित मिश्र शब्द (उत्तरपद) का भी अन्त्य स्वर उदात्त होता है, जैसे गुडमिश्राः, तिलमिश्राः, सर्पिर्मिश्राः।

श्लोक 2.155

नञः गुणप्रतिषेधे सम्पादिन्अर्हहित अलमर्थाः तद्धिताः

nañaḥ guṇapratiṣedhe sampādinarhahita alamarthāḥ taddhitāḥ

यदि नञ् (निषेधवाचक) गुण के निषेध का बोध कराता हो, तो उससे परे सम्पाद्यर्थक, अर्हार्थक, हितार्थक तथा अलमर्थक तद्धित प्रत्ययों से बने शब्दों का अन्त्य स्वर उदात्त होता है, जैसे अकार्णवेष्टकिकम्, अच्छैदिकः (काटने योग्य न हो)।

श्लोक 2.156

ययतोः च अतदर्थे

yayatoḥ ca atadarthe

"उसी के लिए होना" (तादर्थ्य) से भिन्न अर्थ में यदि य तथा यत् प्रत्ययों से युक्त शब्द नञ् से परे हों, तो उनका भी अन्त्य स्वर उदात्त होता है, जैसे अपाश्या, अदन्त्यम् (दाँत में उत्पन्न न होने वाला), अकर्ण्यम्।

श्लोक 2.157

अच् कौ अशक्ते

ac kau aśakte

यदि समुदाय से अशक्ति (असमर्थता) का बोध होता हो, तो अच्-प्रत्ययान्त तथा क-प्रत्ययान्त उत्तरपदों का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे अपचः, अजयः (अच् से); अविक्षिपः, अविलिखः (क से)।

श्लोक 2.158

आक्रोशे च

ākrośe ca

यदि समुदाय से आक्रोश (गाली/भर्त्सना) का बोध हो, तो नञ् से परे रहने वाले अच्-प्रत्ययान्त तथा क-प्रत्ययान्त उत्तरपदों का भी अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे अपचोऽयं जाल्मः, अपठोऽयं जाल्मः।

श्लोक 2.159

संज्ञायां

saṁjñāyāṁ

आक्रोश के अर्थ में यदि नञ् से परे उत्तरपद संज्ञावाचक (नामरूप) हो, तो उसका भी अन्त्य स्वर उदात्त होता है, जैसे अदेवदत्तः, अयज्ञदत्तः, अविष्णुमित्रः।

श्लोक 2.160

कृत्य उक इष्णुच्चारु आदयः

kṛtya uka iṣṇuccāru ādayaḥ

नञ् से परे रहने वाले कृत्य-प्रत्ययान्त, उक-प्रत्ययान्त, इष्णुच्-प्रत्ययान्त तथा चारु आदि गण के उत्तरपदों का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे अकर्तव्यम्, अनागामुकम्, अनलङ्करिष्णुः, अचारुः, असाधुः।

श्लोक 2.161

विभाषा तृन् अन्नतीक्ष्णशुचिषु

vibhāṣā tṛn annatīkṣṇaśuciṣu

नञ् से परे रहने वाले तृच्-प्रत्ययान्त, अन्न, तीक्ष्ण तथा शुचि शब्दों का अन्त्य स्वर विकल्प से उदात्त होता है, जैसे अकर्त्ता (दोनों रूपों में), अनन्नम्, अतीक्ष्णम्।

श्लोक 2.162

बहुव्रीहौ इदम् एतद् तध्यः प्रथमपूरणयोः क्रियागणने

bahuvrīhau idam etad tadhyaḥ prathamapūraṇayoḥ kriyāgaṇane

बहुव्रीहि समास में इदम्, एतद् तथा तद् शब्दों से परे रहने वाले प्रथम शब्द का, और क्रिया की गिनती के प्रसंग में पूरणप्रत्ययान्त (द्वितीय, तृतीय आदि) शब्दों का अन्त्य स्वर उदात्त होता है, जैसे इदंप्रथमः, इदंद्वितीयः, एतत्तृतीयः।

श्लोक 2.163

संख्यायाः स्तनः

saṁkhyāyāḥ stanaḥ

बहुव्रीहि समास में संख्यावाचक शब्द से परे रहने वाले स्तन शब्द का अन्त्य स्वर उदात्त होता है, जैसे द्विस्तना, त्रिस्तना, चतुःस्तना।

श्लोक 2.164

विभाषा छन्दसि

vibhāṣā chandasi

वेद-विषय में संख्यावाचक शब्द से परे रहने वाले स्तन शब्द का अन्त्य स्वर बहुव्रीहि समास में विकल्प से उदात्त होता है, जैसे द्विस्तनाम्, चतुःस्तनाम् — दोनों उच्चारणों में मिलते हैं।

श्लोक 2.165

संज्ञायां मित्र अजिनयोः

saṁjñāyāṁ mitra ajinayoḥ

संज्ञा-विषयक बहुव्रीहि समास में मित्र तथा अजिन शब्द उत्तरपद हों, तो उनका अन्त्य स्वर उदात्त होता है, जैसे देवमित्रः, ब्रह्ममित्रः, वृकाजिनः, कृष्णाजिनः।

श्लोक 2.166

व्यवायिनः अन्तरं

vyavāyinaḥ antaraṁ

व्यवधानवाचक (बीच में आने का बोध कराने वाले) शब्दों से परे रहने वाले अन्तर शब्द का बहुव्रीहि समास में अन्त्य स्वर उदात्त होता है, जैसे वस्त्रान्तरः (जिसके बीच में वस्त्र की आड़ हो), पटान्तरः, कम्बलान्तरः।

श्लोक 2.167

मुखं स्व अङ्गं

mukhaṁ sva aṅgaṁ

बहुव्रीहि समास में शरीरांग-वाचक (स्वाङ्ग) उत्तरपद मुख शब्द का अन्त्य स्वर उदात्त होता है, जैसे गौरमुखः, भद्रमुखः।

श्लोक 2.168

न अव्यय दिक् शब्दगोमहत्स्थूलमुष्टिपृथुवत्सेभ्यः

na avyaya dik śabdagomahatsthūlamuṣṭipṛthuvatsebhyaḥ

किन्तु अव्यय, दिग्वाचक शब्द, गो, महत्, स्थूल, मुष्टि, पृथु तथा वत्स शब्दों से परे रहने पर मुख शब्द का अन्तिम स्वर उदात्त न होकर आदि स्वर उदात्त होता है, जैसे उच्चैर्मुखः, प्राङ्मुखः, गोमुखः, महामुखः।

श्लोक 2.169

निष्ठा उपमाणात्न्यतरस्यां

niṣṭhā upamāṇātnyatarasyāṁ

निष्ठा (क्त) प्रत्ययान्त तथा उपमानवाचक शब्दों से परे रहने वाले स्वाङ्गवाचक मुख शब्द का बहुव्रीहि समास में अन्त्य स्वर विकल्प से उदात्त होता है, जैसे प्रक्षालितमुखः, सिंहमुखः — दोनों रूपों में मिलते हैं।

श्लोक 2.170

जातिकालसुख आदिभ्यः अणाच्छादणात् क्तः अकृतमितप्रतिपन्णाः

jātikālasukha ādibhyaḥ aṇācchādaṇāt ktaḥ akṛtamitapratipanṇāḥ

आच्छादन (ढकने) के अर्थ से भिन्न जातिवाचक, कालवाचक तथा सुखादि गण के शब्दों से परे रहने वाले क्त-प्रत्ययान्त उत्तरपदों में से (कृत, मित तथा प्रतिपन्न को छोड़कर) शेष सभी का अन्त्य स्वर बहुव्रीहि समास में उदात्त होता है, जैसे सारङ्गजग्धः, मासजातः, सुखजातः।

श्लोक 2.171

वा जाते

vā jāte

जातिवाचक, कालवाचक तथा सुखादि गण के शब्दों से परे रहने वाले जात शब्द (उत्तरपद) का बहुव्रीहि समास में अन्त्य स्वर विकल्प से उदात्त होता है, जैसे दन्तजातः, मासजातः, सुखजातः — दोनों रूपों में मिलते हैं।

श्लोक 2.172

नन्सुभ्यां

nansubhyāṁ

बहुव्रीहि समास में नञ् तथा सु — इन दोनों से परे रहने वाले उत्तरपदों का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे अयवः, अव्रीहिः, अमाषः (नञ् से); सुयवः, सुव्रीहिः, सुमाषः (सु से)।

श्लोक 2.173

कपि पूर्वं

kapi pūrvaṁ

नञ् तथा सु से परे उत्तरपद के बाद यदि कप् प्रत्यय जुड़ा हो, तो कप् से पहले (अर्थात् उत्तरपद के अन्त में) स्वर उदात्त होता है, जैसे अकुमारीकः, अब्रह्मबन्धूकः, सुकुमारीकः।

श्लोक 2.174

ह्रस्व अन्ते अन्त्यात् पूर्वं

hrasva ante antyāt pūrvaṁ

यदि कप्-प्रत्ययान्त उत्तरपद की मूल प्रकृति ह्रस्वस्वरान्त हो, तो नञ् तथा सु से परे बहुव्रीहि समास में अन्त्य स्वर से पहले नहीं, बल्कि प्रकृति के अन्त्य स्वर से पहले स्वर उदात्त होता है, जैसे अयवकः, अव्रीहिकः, सुयवकः।

श्लोक 2.175

बहोर्नञ्वत्त्तरपदहूम्नि

bahornañvatttarapadahūmni

उत्तरपद के अर्थ की बहुलता (बहुत होने के भाव) को बताने वाले बहु शब्द से परे रहने वाला उत्तरपद भी स्वर-विधान में नञ् से परे उत्तरपद के समान ही व्यवहार करता है, जैसे बहुयवः, बहुव्रीहिः, बहुकुमारीकः।

श्लोक 2.176

न गुण आदयः अवयवाः

na guṇa ādayaḥ avayavāḥ

किन्तु अवयव (भाग/अंश) के अर्थ में प्रयुक्त बहु शब्द से पहले रहने पर गुणादि गण के शब्दों का अन्त्य स्वर उदात्त नहीं होता, जैसे बहुगुणा रज्जुः, बह्वक्षरं पदम्, बहुच्छन्दो मानम्।

श्लोक 2.177

उपसर्गात् स्व अङ्गं ध्रुवम् अपर्शु

upasargāt sva aṅgaṁ dhruvam aparśu

प्र आदि उपसर्गों से परे स्वाङ्गवाचक (पर्शु शब्द को छोड़कर) शब्दों का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, यदि समास से शरीरांग की स्थायी (ध्रुव) एकरूपता का बोध हो, जैसे प्रपृष्ठः (जिसकी पीठ सदा झुकी रहती है), प्रोदरः, प्रललाटः।

श्लोक 2.178

वनं संआसे

vanaṁ saṁāse

प्र आदि उपसर्गों से परे रहने वाला वन शब्द (ढलान/किनारे के अर्थ में) समास मात्र में ही अन्तोदात्त हो जाता है, जैसे प्रवणे यष्टव्यम् (ढाल पर यज्ञ करना चाहिए), निर्वणे प्राणिधीयते।

श्लोक 2.179

अन्तः

antaḥ

अन्तः शब्द से परे रहने पर वन शब्द भी समासमात्र में अन्तोदात्त हो जाता है, जैसे अन्तर्वणः (जिसमें वन हो)।

श्लोक 2.180

अन्तः च

antaḥ ca

प्र आदि उपसर्गों से पहले अन्तः शब्द भी समासमात्र में अन्तोदात्त हो जाता है, जैसे प्रान्तः, पर्यन्तः।

श्लोक 2.181

न निविभ्यां

na nivibhyāṁ

परन्तु नि तथा वि उपसर्गों से परे रहने पर अन्त शब्द का अन्तोदात्तत्व नहीं होता, जैसे न्यन्तः, व्यन्तः।

श्लोक 2.182

परेरभितोभाविमण्डलं

parerabhitobhāvimaṇḍalaṁ

यदि पूर्वपद परि हो, तो किसी वस्तु के दोनों ओर होने वाले पदार्थ का बोध कराने वाला शब्द (अभितोभावी) तथा मण्डल शब्द अन्तोदात्त हो जाते हैं, जैसे परिकूलम्, परितीरम् (अभितोभावी में); परिमण्डलम्।

श्लोक 2.183

प्रात् अस्व अङ्गं संज्ञायां

prāt asva aṅgaṁ saṁjñāyāṁ

संज्ञा-विषय में प्र शब्द से परे रहने वाला, स्वाङ्ग-भिन्न शब्द अन्तोदात्त हो जाता है, जैसे प्रकोष्ठम् (कमरा), प्रगृहम्, प्रद्वारम् (घर के सामने का द्वार)।

श्लोक 2.184

निरुदक आदीनि च

nirudaka ādīni ca

निरुदकादि गण में पठित समस्त शब्द-समूह भी अन्तोदात्त होता है, जैसे निरुदकम्, निरुपलम्।

श्लोक 2.185

अभेर्मुखं

abhermukhaṁ

अभि शब्द से परे रहने पर मुख शब्द अन्तोदात्त हो जाता है, जैसे अभिमुखः (सामने की ओर मुख किए हुए)।

श्लोक 2.186

अपात् च

apāt ca

अप शब्द से परे रहने पर भी मुख शब्द अन्तोदात्त हो जाता है, जैसे अपमुखः (मुख फेरे हुए)।

श्लोक 2.187

स्फिगपूतवीणाअञ्जसध्वन्कुक्षिसीरनामनाम च

sphigapūtavīṇāañjasadhvankukṣisīranāmanāma ca

अप शब्द से परे रहने पर स्फिज्, पूत, वीणा, अञ्जस्, अध्वन्, कुक्षि, सीर (तथा सीर के अर्थ में अन्य शब्द) एवं नामन् शब्द भी अन्तोदात्त हो जाते हैं, जैसे अपस्फिगम्, अपाध्वा, अपकुक्षिः, अपनाम्।

श्लोक 2.188

अधेरुपरिस्थं

adheruparisthaṁ

अधि शब्द से परे रहने पर ऊपर की स्थिति बतानेवाले (उपरिस्थ) शब्दों का अन्त्य स्वर उदात्त हो जाता है, जैसे अधिदन्तः, अधिकर्णः, अधिकेशः।

श्लोक 2.189

अनोरप्रधानकणीयसी

anorapradhānakaṇīyasī

अनु शब्द से परे रहने पर अप्रधान (गौण) पदार्थ बतानेवाला शब्द तथा कनीयस् शब्द अन्तोदात्त हो जाते हैं, जैसे अनुज्येष्ठः, अनुमध्यमः (गौण अर्थ में); अनुकनीयान् (कनीयस् में)।

श्लोक 2.190

पुरुषः च अन्व् आदिष्टः

puruṣaḥ ca anv ādiṣṭaḥ

अनु शब्द से परे रहने पर अन्वादिष्ट (अनुगमन करने वाला/नियुक्त) अर्थ का बोधक पुरुष शब्द भी अन्तोदात्त हो जाता है, जैसे अनुपुरुषः।

श्लोक 2.191

अतेरकृत्पदे

aterakṛtpade

अति शब्द से परे रहने पर कृदन्त-भिन्न शब्द तथा पद शब्द अन्तोदात्त हो जाते हैं, जैसे अत्यङ्कुशः (अंकुश को लाँघने वाला हाथी), अतिकशः; पद में अतिपदा (शक्वरी छन्द)।

श्लोक 2.192

नेरनिधाने

neranidhāne

यदि समुदाय से "अनिधान" (अप्रतिष्ठा/अभाव) का बोध होता हो, तो नि शब्द से परे रहने वाला उत्तरपद अन्तोदात्त हो जाता है, जैसे निमूलम् (जिसकी जड़ निकल गई हो), न्यक्षम्, नितृणम्।

श्लोक 2.193

प्रतेरंशु आदयः तत्पुरुषे

prateraṁśu ādayaḥ tatpuruṣe

तत्पुरुष समास में प्रति शब्द से परे रहने वाले अंश्वादि गण के शब्द अन्तोदात्त हो जाते हैं, जैसे प्रत्यंशुः, प्रतिजनः, प्रतिराजा।

श्लोक 2.194

उपात् द्व्यच् अजिनं अगौरआदयः

upāt dvyac ajinaṁ agauraādayaḥ

उप शब्द से परे रहने वाले, गौरादि गण के शब्दों को छोड़कर, द्व्यच् (दो स्वरोंवाले) शब्द तथा अजिन शब्द अन्तोदात्त हो जाते हैं, जैसे उपदेवः, उपसोमः, उपेन्द्रः (द्व्यच्); उपाजिनम् (अजिन)।

श्लोक 2.195

सोरवक्षेपणे

soravakṣepaṇe

यदि समुदाय से निन्दा (अवक्षेपण) का बोध होता हो, तो सु शब्द से परे रहने वाला उत्तरपद तत्पुरुष समास में अन्तोदात्त हो जाता है, जैसे सुस्थण्डिले, सुप्रत्यवसितः।

श्लोक 2.196

विभाषा उत्पुच्छे

vibhāṣā utpucche

तत्पुरुष समास में उत्पुच्छ शब्द का अन्तोदात्तत्व वैकल्पिक होता है, जैसे उत्पुच्छः — दोनों रूपों में उच्चरित हो सकता है।

श्लोक 2.197

द्वित्रिभ्यां पद्दत्मूर्धसु बहुव्रीहौ

dvitribhyāṁ paddatmūrdhasu bahuvrīhau

बहुव्रीहि समास में द्वि तथा त्रि से परे रहने वाले पाद्, दत् (दन्त) तथा मूर्धन् शब्दों का अन्तोदात्तत्व वैकल्पिक होता है, जैसे द्विपात्, त्रिपात्, द्विदन्, त्रिदन् — दोनों रूपों में मिलते हैं।

श्लोक 2.198

सक्थं च अक्र अन्तात्

sakthaṁ ca akra antāt

क्रश शब्दान्त-भिन्न शब्दों से परे रहने वाला सक्थ शब्द बहुव्रीहि समास में विकल्प से अन्तोदात्त होता है, जैसे गौरसक्थः, श्लक्ष्णसक्थः — दोनों रूपों में मिलते हैं।

श्लोक 2.199

पर आदिः छन्दसि बहुलं

para ādiḥ chandasi bahulaṁ

वेद-विषय में उत्तरपदस्थानीय परे शब्द का आद्युदात्तत्व भी प्रचुरता से (बिना कड़े नियम के) होता है, और यह प्रवृत्ति अन्य पदों तथा अन्य समासों में भी पाई जाती है, जैसे अञ्जिसक्थम्, ऋजुबाहुः (बहुव्रीहि), वाक्पतिः, चित्पतिः (षष्ठी-तत्पुरुष)।

षष्ठोऽध्यायः, तृतीयः पादः

श्लोक 3.1

अलुक् उद्त्तरपदे

aluk udttarapade

यह एक अधिकार-सूत्र है। इसमें प्रयुक्त 'अलुक्' (लोप का अभाव) और 'उत्तरपद' (समास का परवर्ती पद) शब्दों की अनुवृत्ति आगे के अनेक सूत्रों में चलती है, अर्थात् आगामी सूत्र समास में उत्तरपद परे रहने पर पूर्वपद की विभक्ति के लोप न होने का विधान करेंगे।

श्लोक 3.2

पञ्चम्याः स्तोक आदिभ्यः

pañcamyāḥ stoka ādibhyaḥ

उत्तरपद परे होने पर स्तोक, अन्तिक, दूरवाचक तथा कृच्छ्र आदि शब्दों के बाद पञ्चमी विभक्ति (ङसि) का लोप नहीं होता; जैसे 'स्तोकात् मुक्तः' से 'स्तोकान्मुक्तः' (थोड़े से मुक्त हुआ) रूप बनता है।

श्लोक 3.3

ओजः सहसम्भः तमसः तृतीययाः

ojaḥ sahasambhaḥ tamasaḥ tṛtīyayāḥ

ओजस्, सहस्, अम्भस् तथा तमस् शब्दों से विहित तृतीया विभक्ति का उत्तरपद परे रहने पर लोप नहीं होता; जैसे ओजसाकृतम्, सहसाकृतम्, अम्भसाकृतम्, तमसाकृतम् (क्रमशः बल, बल, जल और अन्धकार से किया गया)।

श्लोक 3.4

मनसः संज्ञायां

manasaḥ saṁjñāyāṁ

जब 'मनस्' शब्द किसी संज्ञा (नाम) के पूर्वपद के रूप में प्रयुक्त होता है, तब उससे विहित तृतीया विभक्ति (मनसा) का उत्तरपद परे रहने पर लोप नहीं होता; जैसे मनसादत्ता, मनसागुप्ता, मनसासंगता जैसे नाम बनते हैं।

श्लोक 3.5

आज्ञायिनि च

ājñāyini ca

'अज्ञायिन्' (जिसका स्वभाव जान-बूझकर न जानना हो) शब्द उत्तरपद होने पर भी 'मनस्' शब्द से विहित तृतीया (मनसा) का लोप नहीं होता; जैसे 'मनसा अज्ञातुं शीलम् अस्य' से 'मनसाज्ञायी' रूप बनता है।

श्लोक 3.6

आत्मनः च पूरणे

ātmanaḥ ca pūraṇe

पूरण (क्रमसूचक) प्रत्ययान्त उत्तरपद परे रहने पर 'आत्मन्' शब्द से विहित तृतीया (आत्मना) का भी लोप नहीं होता; जैसे आत्मनापञ्चमः (स्वयं सहित पाँचवाँ), आत्मनाषष्ठः (स्वयं सहित छठा)।

श्लोक 3.7

वैयाकरण आख्यायां चतुर्थ्याः

vaiyākaraṇa ākhyāyāṁ caturthyāḥ

केवल वैयाकरणों द्वारा प्रयुक्त तकनीकी संज्ञा-शब्दों में, पूर्वपद 'आत्मन्'/'पर' से विहित चतुर्थी विभक्ति का उत्तरपद परे रहने पर लोप नहीं होता; जैसे परस्मैपदम्, परस्मैभाषा, आत्मनेपदम्, आत्मनेभाषा।

श्लोक 3.8

परस्य च

parasya ca

इसी प्रकार वैयाकरणों में प्रसिद्ध संज्ञा-शब्दों में, पूर्वपद 'पर' से विहित चतुर्थी विभक्ति का, उत्तरपद व्यंजन से आरम्भ होने पर भी, लोप नहीं होता; अन्य उदाहरणों में अकारान्त पूर्वपदों से विहित सप्तमी का भी इसी प्रकार अलुक् दिखाई देता है, जैसे अरण्येतिलकाः, वनेकिंशुकाः।

श्लोक 3.9

हल् अत् अन्तात् सप्तम्याः संज्ञायां

hal at antāt saptamyāḥ saṁjñāyāṁ

व्यंजनान्त (हलन्त) अथवा अकारान्त शब्द के बाद, संज्ञा (नाम) के अर्थ में, सप्तमी विभक्ति का उत्तरपद परे रहने पर लोप नहीं होता; जैसे 'कण्ठे काल' रूप में सामान्यतः दोनों विभक्तियों का लोप होकर 'कण्ठकालः' बनना चाहिए था, किन्तु इस सूत्र से सप्तमी ङि का लोप रुक जाने से 'कण्ठेकालः' (कण्ठ में काला) नाम सिद्ध होता है।

श्लोक 3.10

कारनाम्नि च प्राचां हल् आदौ

kāranāmni ca prācāṁ hal ādau

जिस समस्त शब्द से पूर्वी देशवासियों में प्रचलित 'कर' (राजस्व के रूप में दिया जाने वाला धन) का बोध होता हो, उस समास में हलन्त तथा अदन्त पूर्वपदों से विहित सप्तमी विभक्ति का, उत्तरपद व्यंजन से आरम्भ होने पर भी, लोप नहीं होता; जैसे स्तूपेशाणः, दृषदिमाषकः, हलेद्विपदिका, हलेत्रिपदिका।

श्लोक 3.11

मध्याद् गुरौ

madhyād gurau

'मध्य' शब्द से विहित सप्तमी विभक्ति का, उत्तरपद में 'गुरु' शब्द आने पर, लोप नहीं होता; जैसे मध्येगुरुः (गुरु के बीच में)।

श्लोक 3.12

अमूर्धन्मस्तकात् स्व अङ्गात् अकामे

amūrdhanmastakāt sva aṅgāt akāme

मूर्धन् और मस्तक को छोड़कर शेष हलन्त तथा अदन्त शरीरांगवाचक (स्वांग) शब्दों से विहित सप्तमी विभक्ति का, उत्तरपद 'काम' शब्द से भिन्न होने पर, लोप नहीं होता; जैसे कण्ठेकालः, उरसिलोमा, उदरेमणिः।

श्लोक 3.13

बन्धे च विभाषा

bandhe ca vibhāṣā

घञ्-प्रत्ययान्त 'बन्ध' शब्द उत्तरपद होने पर हलन्त और अदन्त शब्दों से विहित सप्तमी विभक्ति का ('काम' शब्द को छोड़कर) विकल्प से लोप नहीं होता; जैसे हस्तेबन्धः/हस्तबन्धः, चक्रेबन्धः/चक्रबन्धः।

श्लोक 3.14

तत्पुरुषे कृति बहुलं

tatpuruṣe kṛti bahulaṁ

तत्पुरुष समास में कृदन्त (जिसके अन्त में कोई कृत् प्रत्यय हो) उत्तरपद परे होने पर सामान्यतः सप्तमी विभक्ति का लोप नहीं होता, यद्यपि यह नियम सार्वत्रिक नहीं है; जैसे सरस् + ज = सरसिजम् (सरोवर में उत्पन्न, कमल), जबकि सरोजम् रूप में लोप भी होता देखा जाता है।

श्लोक 3.15

प्रावृष्शरद्कालदिवां जे

prāvṛṣśaradkāladivāṁ je

'ज' (जन्-मूलक, अर्थात् 'से उत्पन्न') प्रत्ययान्त शब्द उत्तरपद परे होने पर, प्रावृट् (वर्षाकाल), शरद्, काल तथा दिव् शब्दों से विहित सप्तमी विभक्ति का विकल्प से लोप नहीं होता; जैसे प्रावृषिजः, शरदिजः, कालेजः, दिविजः।

श्लोक 3.16

विभष वर्षक्षरशरवरात्

vibhaṣa varṣakṣaraśaravarāt

इसी प्रकार 'ज' उत्तरपद परे रहने पर वर्ष, क्षर, शर तथा वर शब्दों से विहित सप्तमी विभक्ति का भी विकल्प से लोप नहीं होता; जैसे वर्षेजः/वर्षजः, क्षरेजः/क्षरजः, शरेजः/शरजः, वरेजः/वरजः।

श्लोक 3.17

घकालतनेषु कालनाम्नः

ghakālataneṣu kālanāmnaḥ

घ-संज्ञक प्रत्ययों (तरप्/तमप्), 'काल' शब्द तथा 'तन' प्रत्यय के उत्तरपद होने पर, कालवाचक शब्दों से विहित सप्तमी विभक्ति का विकल्प से लोप नहीं होता; जैसे पूर्वाह्णेतरे/पूर्वाह्णतरे, पूर्वाह्णेकाले/पूर्वाह्णकाले, पूर्वाह्णेतने/पूर्वाह्णतने।

श्लोक 3.18

शयवासवासिषु अकालात्

śayavāsavāsiṣu akālāt

'शय', 'वास' तथा 'वासिन्' शब्दों के उत्तरपद होने पर, कालवाचक शब्दों के अतिरिक्त शेष शब्दों से विहित सप्तमी विभक्ति का विकल्प से लोप नहीं होता; जैसे खेशयः/खशयः, ग्रामेवासः/ग्रामवासः, ग्रामेवासी/ग्रामवासी।

श्लोक 3.19

न इन् सिद्धबध्नातिषु

na in siddhabadhnātiṣu

उत्तरपद यदि इन्-प्रत्ययान्त शब्द, 'सिद्ध' शब्द अथवा 'बन्ध्' धातु (बध्नाति) से बना हो, तो पूर्वोक्त सप्तमी-अलुक् का विधान लागू नहीं होता, अर्थात् इन स्थितियों में विभक्ति का सामान्य नियम से लोप हो जाता है; जैसे स्थण्डिलशायी, सांकाश्यसिद्धः, चक्रबद्धः।

श्लोक 3.20

स्थे च भाषायां

sthe ca bhāṣāyāṁ

लौकिक (वैदिक-भिन्न) भाषा-प्रयोग में तथा उत्तरपद में 'स्थ' शब्द रहने पर भी सप्तमी विभक्ति का लोप सामान्य नियम से हो जाता है, अलुक् नहीं होता। (टिप्पणी: स्रोत में इस सूत्र के साथ दिए गए उदाहरण-रूप, जैसे शरावती, वस्तुतः मतुप् प्रत्यय से पूर्व दीर्घादेश के भिन्न प्रसंग के प्रतीत होते हैं, संभवतः मूल पाठ में उदाहरणों का मेल त्रुटिपूर्ण है।)

श्लोक 3.21

षष्ठ्याः आक्रोशे

ṣaṣṭhyāḥ ākrośe

जब समास से समुदायरूप से आक्रोश (गाली अथवा निन्दा) का बोध होता है, तब उत्तरपद परे रहने पर षष्ठी विभक्ति का लोप नहीं होता; जैसे चौरस्यकुलम् (चोर का कुल), वृषलस्यकुलम्।

श्लोक 3.22

पुत्रे अन्यतरस्यां

putre anyatarasyāṁ

आक्रोश-सूचक समास में उत्तरपद 'पुत्र' शब्द होने पर पूर्वपद-विहित षष्ठी विभक्ति का विकल्प से लोप नहीं होता; जैसे दासीपुत्रः (दास्याः पुत्रः), वृषलीपुत्रः (वृषल्याः पुत्रः)।

श्लोक 3.23

ऋतो विद्यायोनिसम्बन्धेह्यः

ṛto vidyāyonisambandhehyaḥ

ऋकारान्त, विद्या-सम्बन्धवाचक (गुरु-शिष्य सम्बन्ध बताने वाले) तथा योनि-सम्बन्धवाचक (जन्मजात नातेदारी बताने वाले) शब्दों से विहित षष्ठी विभक्ति का उत्तरपद परे रहने पर लोप नहीं होता; जैसे होतुरन्तेवासी, होतुःपुत्रः (विद्या-सम्बन्ध में); पितुरन्तेवासी, पितुःपुत्रः (योनि-सम्बन्ध में)।

श्लोक 3.24

विभाषा स्वसृ पत्योः

vibhāṣā svasṛ patyoḥ

उत्तरपद में 'स्वसृ' (बहन) अथवा 'पति' शब्द रहने पर, विद्या-सम्बन्ध तथा योनि-सम्बन्धवाचक ऋकारान्त शब्दों से विहित षष्ठी विभक्ति का विकल्प से लोप नहीं होता; जैसे मातुःस्वसा/मातृष्वसा, पितुःस्वसा/पितृष्वसा, दुहितुःपतिः/दुहितृपतिः, ननान्दुःपतिः/ननान्दृपतिः।

श्लोक 3.25

आनङ् ऋतः द्वंद्वे

ānaṅ ṛtaḥ dvaṁdve

विद्या-सम्बन्ध तथा योनि-सम्बन्धवाचक ऋकारान्त शब्दों के द्वन्द्व समास में पूर्वपद के अन्त्य ऋकार के स्थान में 'आनङ्' आदेश होता है; जैसे होतापोतारौ, प्रशास्तापतिहर्तारौ (विद्या-सम्बन्ध में), मातापितरौ (योनि-सम्बन्ध में)।

श्लोक 3.26

देवताद्वंद्वे च

devatādvaṁdve ca

देवतावाचक शब्दों के द्वन्द्व समास में भी पूर्वपद के अन्त में 'आनङ्' आदेश होता है; जैसे इन्द्रावरुणौ, इन्द्रासोमौ, इन्द्राबृहस्पती।

श्लोक 3.27

ईत् अग्नेः सोमवरुणयोः

īt agneḥ somavaruṇayoḥ

सोम अथवा वरुण शब्द के साथ देवता-द्वन्द्व होने पर पूर्वपदस्थ 'अग्नि' शब्द के अन्त्य स्वर के स्थान में दीर्घ 'ई' आदेश होता है; जैसे अग्नीषोमौ, अग्नीवरुणौ।

श्लोक 3.28

इत् वृद्धौ

it vṛddhau

वृद्धि-कृत उत्तरपद 'विष्णु' शब्द के परे होने पर, अग्नि शब्द के स्थान में पूर्वसूत्र-प्राप्त 'ई' आदेश का निषेध हो जाता है; जैसे आग्निवारुणीम्, आग्निमारुतम्।

श्लोक 3.29

दिवः द्यावा

divaḥ dyāvā

देवता-द्वन्द्व में उत्तरपद परे रहने पर पूर्वपदस्थ 'दिव्' (आकाश) शब्द के स्थान में 'द्यावा' आदेश होता है; जैसे द्यावाक्षामा, द्यावाभूमी (स्वर्ग और पृथ्वी)।

श्लोक 3.30

दिवसः च पृथिव्यां

divasaḥ ca pṛthivyāṁ

उत्तरपद में 'पृथिवी' शब्द रहने पर, देवता-द्वन्द्व के पूर्वपद 'दिव्' शब्द के स्थान में (द्यावा के विकल्प में) 'दिवस्' आदेश भी होता है; जैसे दिवस्पृथिव्यौ, द्यावापृथिव्यौ।

श्लोक 3.31

उषासा उषसः

uṣāsā uṣasaḥ

देवता-द्वन्द्व में उत्तरपद परे रहने पर पूर्वपदस्थ 'उषस्' (उषा) शब्द के स्थान में 'उषासा' आदेश होता है; जैसे उषासासूर्यम्, उषासानक्ता।

श्लोक 3.32

मातरपितरौ उदीचां

mātarapitarau udīcāṁ

उदीच्य (उत्तर-प्रदेशीय) आचार्यों के मत में, 'मातृ' और 'पितृ' शब्दों के द्वन्द्व समास में पूर्वपद 'मातृ' के स्थान में 'अरङ्' आदेश होकर 'मातर-पितरौ' जैसा रूप बनता है।

श्लोक 3.33

पितरामातरा च छन्दसि

pitarāmātarā ca chandasi

वैदिक (छान्दस) प्रयोग में 'पितरामातरा' रूप का निपातन (विशेष सिद्ध रूप के रूप में स्वीकृति) होता है।

श्लोक 3.34

स्त्रियाः पुंवत् हाषितपुंस्कात् अणूङ् समान अधिकरणे स्त्रियां अपूरणीप्रिया आदिषु

striyāḥ puṁvat hāṣitapuṁskāt aṇūṅ samāna adhikaraṇe striyāṁ apūraṇīpriyā ādiṣu

पूरणी (क्रमसूचक) और प्रिय आदि शब्दों को छोड़कर, समानाधिकरण स्त्रीलिंग उत्तरपद परे रहने पर, भाषितपुंस्क (जिसका पुल्लिंग रूप भी प्रचलित हो) तथा ऊङ्-प्रत्ययरहित स्त्रीवाचक पूर्वपद पुल्लिंग के समान रूप धारण कर लेता है, अर्थात् उसका स्त्रीप्रत्यय हट जाता है; जैसे 'चित्रा गौः' से 'चित्रगोः' रूप बनता है।

श्लोक 3.35

तसिल् आदिषु आ कृत्वसुचः

tasil ādiṣu ā kṛtvasucaḥ

तसिल् से लेकर कृत्वसुच् तक विहित सभी प्रत्ययों के परे रहने पर भी भाषितपुंस्क, ऊङ्-रहित स्त्रीलिंग शब्द पुल्लिंगवत् रूप धारण करता है; जैसे हस्तिनी + ठक् == हस्तिकम्।

श्लोक 3.36

क्यङ् मानिनोः च

kyaṅ māninoḥ ca

क्यङ् तथा मानिन् प्रत्यय परे रहने पर भी भाषितपुंस्क स्त्रीलिंग शब्द पुंवत् रूप धारण करता है; जैसे एनी > एतायते, श्येनी > श्येतायते; दर्शनीयमानिनी > दर्शनीयमानी।

श्लोक 3.37

न क उपधायाः

na ka upadhāyāḥ

जिस स्त्रीलिंग शब्द के उपान्त्य वर्ण में ककार हो, वह इस पुंवत्-रूपान्तरण (जो आगे सूत्र ४२ में जातीय/देशीय प्रत्ययों के सन्दर्भ में विहित है) से अपवादस्वरूप बाहर रहता है; इस प्रसंग में 'पाचिका' शब्द उदाहरणस्वरूप उल्लिखित है।

श्लोक 3.38

संज्ञापूरण्योः च

saṁjñāpūraṇyoḥ ca

इसी प्रकार संज्ञावाचक (व्यक्ति-नामवाचक) तथा पूरणी (क्रमसूचक) शब्द भी इस पुंवत्-रूपान्तरण से अपवादस्वरूप बाहर रहते हैं; इस प्रसंग में 'दत्ता' शब्द उदाहरणस्वरूप उल्लिखित है।

श्लोक 3.39

वृद्धिनिमित्तस्य च तद्धितस्य अरक्तविकारे

vṛddhinimittasya ca taddhitasya araktavikāre

रक्त (रंग) अथवा विकार (परिणाम) अर्थ से भिन्न, वृद्धि उत्पन्न करने वाले तद्धित प्रत्यय से बने स्त्रीलिंग शब्द भी इस पुंवत्-रूपान्तरण से अपवादस्वरूप बाहर रहते हैं।

श्लोक 3.40

स्व अङ्गात् च ईतः अमानिनि

sva aṅgāt ca ītaḥ amānini

उपर्युक्त अपवादों के प्रतिअपवादस्वरूप, 'मानिन्' प्रत्यय से भिन्न उत्तरपद परे रहने पर, शरीरांगवाचक (स्वांग) ईकारान्त स्त्रीलिंग शब्द को पुंवत् रूप प्राप्त होता है; जैसे श्लक्ष्णमुखी-प्रकार के शब्द इसके उदाहरण हैं।

श्लोक 3.41

जातेः च

jāteḥ ca

जातिवाचक (वर्ग या कुल बताने वाले) स्त्रीलिंग शब्दों को भी अपवादस्वरूप पुंवत् रूप प्राप्त होता है; जैसे कठी > कठजातीया, बह्वृची > बह्वृचजातीया।

श्लोक 3.42

पुंवत् कर्मधारयजातीयदेशीयेषु

puṁvat karmadhārayajātīyadeśīyeṣu

कर्मधारय समास में उत्तरपद परे रहने पर, तथा 'जातीय' एवं 'देशीय' प्रत्यय परे रहने पर, ऊङ्-प्रत्ययरहित भाषितपुंस्क स्त्रीलिंग शब्द (पूर्वोक्त अपवादों को छोड़कर) पुंवत् रूप धारण करता है; जैसे पाचिका + जातीयर् == पाचकजातीया।

श्लोक 3.43

घरूपकल्पचेलट्ब्रुवगोत्रमतहतेषु ङ्यः अनेक अचः ह्रस्वः

gharūpakalpacelaṭbruvagotramatahateṣu ṅyaḥ aneka acaḥ hrasvaḥ

घ-संज्ञक प्रत्यय (तरप्/तमप्), रूपप्, कल्पप्, चेलट्, ध्रुव, गोत्र, मत तथा हत शब्दों के उत्तरपद होने पर, ङी-प्रत्ययान्त तथा एक से अधिक स्वरवाले भाषितपुंस्क स्त्रीलिंग शब्द को ह्रस्वादेश होता है; जैसे ब्राह्मणितरा, ब्राह्मणिरूपा, ब्राह्मणिकल्पा, ब्राह्मणिचेली, ब्राह्मणिब्रुवा, ब्राह्मणिगोत्रा, ब्राह्मणिमता, ब्राह्मणिहता।

श्लोक 3.44

नद्याः शेषस्य अन्यतरस्यां

nadyāḥ śeṣasya anyatarasyāṁ

पूर्वसूत्रोक्त घ आदि शब्दों के उत्तरपद होने पर, पूर्वसूत्र से भिन्न शेष 'नदी'-संज्ञक (दीर्घ ई/ऊ-अन्त) स्त्रीलिंग शब्दों को भी विकल्प से ह्रस्वादेश होता है; जैसे ब्रह्मबन्धुतरा/ब्रह्मबन्धूतरा, स्त्रितरा/स्त्रीतरा, स्त्रितमा/स्त्रीतमा।

श्लोक 3.45

उक् इतः च

uk itaḥ ca

उगित् (जिस प्रत्यय का इत्संज्ञक वर्ण उकार हो, उससे बने) प्रकृतिवाले 'नदी'-संज्ञक शब्दों को भी विकल्प से ह्रस्वादेश होता है; जैसे श्रेयसितरा/श्रेयसीतरा, विदुषितरा/विदुषीतरा।

श्लोक 3.46

आत्महतः समान अधिकरणजतीययोः

ātmahataḥ samāna adhikaraṇajatīyayoḥ

समानाधिकरण उत्तरपद तथा 'जातीय' प्रत्यय के परे रहने पर, 'महत्' (बड़ा) शब्द के अन्त्य 'त्' वर्ण के स्थान में 'आ' आदेश होता है; जैसे महत् + राजन् से 'महाराजः' (महान राजा) रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 3.47

द्व्यष्टनः संख्यायां अबहुव्रीहि अशीत्योः

dvyaṣṭanaḥ saṁkhyāyāṁ abahuvrīhi aśītyoḥ

बहुव्रीहि समास और 'अशीति' (अस्सी) शब्द को छोड़कर, संख्यावाचक उत्तरपद परे रहने पर 'द्वि' (दो) और 'अष्टन्' (आठ) शब्दों के स्थान में 'आ' आदेश होता है; जैसे द्वि + दशन् == द्वादशन् (बारह) रूप बनता है।

श्लोक 3.48

त्रेः त्रयः

treḥ trayaḥ

बहुव्रीहि-भिन्न समास में, अशीति-भिन्न संख्यावाचक उत्तरपद परे रहने पर 'त्रि' (तीन) शब्द के स्थान में 'त्रयस्' आदेश होता है; जैसे त्रयोदश (तेरह), त्रयोविंशतिः (तेईस), त्र्यस्त्रिंशत् (तैंतीस)।

श्लोक 3.49

विभाषा चत्वारिंशत्प्रभृतौ सर्वेषां

vibhāṣā catvāriṁśatprabhṛtau sarveṣāṁ

बहुव्रीहि-भिन्न समास में, 'चत्वारिंशत्' (चालीस) आदि से आरम्भ होने वाली सभी संख्याओं के उत्तरपद परे रहने पर, द्वि, अष्टन् तथा त्रि शब्दों के लिए पूर्वोक्त आदेश विकल्प से होते हैं; जैसे द्विचत्वारिंशत्/द्वाचत्वारिंशत्, त्रिपञ्चाशत्/त्रयःपञ्चाशत्, अष्टचत्वारिंशत्/अष्टाचत्वारिंशत्।

श्लोक 3.50

हृदयस्य हृद् लेखयत् अण्लासेषु

hṛdayasya hṛd lekhayat aṇlāseṣu

लेख, यत्, अण् तथा लास शब्दों के उत्तरपद होने पर 'हृदय' शब्द के स्थान में 'हृद्' आदेश होता है; जैसे हृल्लेखः, हृद्यम् (हृदय को प्रिय), हार्दम् (हार्दिक), हृल्लासः।

श्लोक 3.51

वा शोकष्यञ्रोगेषु

vā śokaṣyañrogeṣu

शोक, ष्यञ् प्रत्यय तथा रोग शब्दों के उत्तरपद होने पर 'हृदय' के स्थान में विकल्प से 'हृद्' आदेश होता है; जैसे सुहृदय + ष्यञ् से 'सौहार्द्यम्' रूप बनता है।

श्लोक 3.52

पादस्य पद आजि आति गौपहतेषु

pādasya pada āji āti gaupahateṣu

आजि, आति, ग (गम्-मूलक) तथा उपहत शब्दों के उत्तरपद होने पर 'पाद' शब्द के स्थान में 'पद्' आदेश होता है; जैसे पदाजिः (पैरों से लड़ने वाला), पदातिः (पैदल चलने वाला), पदगः, पदोपहतः।

श्लोक 3.53

पद् यति अतदर्थे

pad yati atadarthe

तदर्थ (उसी प्रयोजन के लिए) से भिन्न अर्थ में 'यत्' प्रत्यय परे रहने पर भी 'पाद' शब्द के स्थान में 'पद्' आदेश होता है; जैसे 'पादौ विध्यन्ति' अर्थ में 'पद्याः शर्कराः' (पैरों में चुभने वाले कंकड़)।

श्लोक 3.54

हिमकाषिहतिषु च

himakāṣihatiṣu ca

हिम, काषिन् तथा हति शब्दों के उत्तरपद होने पर भी 'पाद' शब्द के स्थान में 'पद्' आदेश होता है; जैसे पद्धिमम्, पत्काषिणः, पद्धतिः (पैरों से मारा जाना, मार्ग)।

श्लोक 3.55

ऋचः शे

ṛcaḥ śe

ऋक् (वैदिक मन्त्र) से सम्बन्धित प्रसंग में 'श' प्रत्यय परे रहने पर 'पाद' शब्द के स्थान में 'पद्' आदेश होता है; जैसे 'पच्छः' (गायत्री मन्त्र का एक पाद/चरण)।

श्लोक 3.56

वा घोषमिश्रशब्देषु

vā ghoṣamiśraśabdeṣu

घोष, मिश्र तथा शब्द शब्दों के उत्तरपद होने पर 'पाद' शब्द के स्थान में विकल्प से 'पद्' आदेश होता है; जैसे पद्घोषः/पादघोषः, पन्मिश्रः/पादमिश्रः, पच्छब्दः/पादशब्दः।

श्लोक 3.57

उदकस्य उदः संज्ञायां

udakasya udaḥ saṁjñāyāṁ

संज्ञा (नाम) के अर्थ में उत्तरपद परे रहने पर 'उदक' (जल) शब्द के स्थान में 'उद' आदेश होता है; जैसे 'उदमेघ' नामक व्यक्ति के पुत्र के लिए 'औदमेघिः', 'उदवाह' के पुत्र के लिए 'औदवाहिः' रूप बनता है।

श्लोक 3.58

पेषम्वासवाहनधिषु

peṣamvāsavāhanadhiṣu

पेषम्, वास, वाहन तथा धि शब्दों के उत्तरपद होने पर भी 'उदक' के स्थान में 'उद' आदेश होता है; जैसे उदपेषम्, उदवासः, उदवाहनः, उदधिः (समुद्र, जिसमें जल धारण किया जाता है)।

श्लोक 3.59

एकहल् आदौ पूरयितव्ये न्यारयां

ekahal ādau pūrayitavye nyārayāṁ

'पूर्ण करने योग्य' अर्थ में, एक व्यंजन-वर्ण से आरम्भ होने वाला उत्तरपद परे रहने पर 'उदक' के स्थान में विकल्प से 'उद' आदेश होता है; जैसे उदकुम्भः/उदककुम्भः, उदपात्रम्/उदकपात्रम्।

श्लोक 3.60

मन्थ ओदनसक्तुबिन्दुवज्रभारहारवीवधगाहेषु च

mantha odanasaktubinduvajrabhārahāravīvadhagāheṣu ca

मन्थ, ओदन, सक्तु, बिन्दु, वज्र, भार, हार, वीवध तथा गाह शब्दों के उत्तरपद होने पर भी 'उदक' के स्थान में विकल्प से 'उद' आदेश होता है; जैसे उदमन्थः/उदकमन्थः, उदौदनः/उदकौदनः, उदसक्तुः/उदकसक्तुः, उदबिन्दुः/उदकबिन्दुः।

श्लोक 3.61

इकः ह्रस्वः अङ्यः गालवस्य

ikaḥ hrasvaḥ aṅyaḥ gālavasya

गालव आचार्य के मत में, ङी-प्रत्ययान्त तथा इ/ई/उ/ऊ-कारान्त (इगन्त) शब्द के स्थान में, उत्तरपद परे रहने पर विकल्प से ह्रस्वादेश होता है; जैसे ग्रामणिपुत्रः/ग्रामणीपुत्रः, ब्रह्मबन्धुपुत्रः/ब्रह्मबन्धूपुत्रः।

श्लोक 3.62

एक तद्धिते च

eka taddhite ca

तद्धित प्रत्यय परे रहने पर 'एक' शब्द (अथवा एकादेश-प्राप्त शब्द) के अन्त्य स्वर को ह्रस्वादेश होता है; जैसे एकत्वम्, एकता (भाव-अर्थ में); एकक्षीरम्, एकदुग्धम् (उत्तरपद-प्रसंग में)।

श्लोक 3.63

ङी आपोः संज्ञाछन्दसोः अहुलं

ṅī āpoḥ saṁjñāchandasoḥ ahulaṁ

संज्ञा तथा वैदिक (छान्दस) प्रयोग में, ङी-प्रत्ययान्त तथा टाप्/आप्-प्रत्ययान्त स्त्रीलिंग शब्दों को प्रायः (बाहुल्येन, सर्वत्र नहीं) ह्रस्वादेश होता है; जैसे रेवतिपुत्रः, रोहिणिपुत्रः, भरणिपुत्रः (संज्ञा में), शिलवहम् (आबन्त में); किन्तु नन्दीकरः जैसे रूपों में यह ह्रस्वादेश नहीं भी होता।

श्लोक 3.64

त्वे च

tve ca

'त्व' प्रत्यय परे रहने पर भी ङी/आप्-प्रत्ययान्त स्त्रीलिंग शब्दों को प्रायः ह्रस्वादेश होता है; जैसे अजा से अजत्वम्, रोहिणी से रोहिणित्वम् (बाहुल्य के कारण अजात्वम्, रोहिणीत्वम् रूप भी सिद्ध हैं)।

श्लोक 3.65

इष्टका इषीकामालाणां चिततूलभारिषु

iṣṭakā iṣīkāmālāṇāṁ citatūlabhāriṣu

क्रमशः चित्, तूल तथा भारिन् शब्दों के उत्तरपद होने पर पूर्वपदस्थ इष्टका, इषीका तथा माला शब्दों को ह्रस्वादेश होता है; जैसे इष्टकचितम्, इषीकतूलम्, मालभारिणी।

श्लोक 3.66

ख्इति अनव्ययस्य

khiti anavyayasya

खित् (जिसका इत्संज्ञक वर्ण खकार हो) प्रत्ययान्त उत्तरपद परे रहने पर, अव्यय-भिन्न शब्द को ह्रस्वादेश होता है; जैसे 'काली' + मन्य से 'कालिमन्या' (अपने आप को काली मानने वाली) रूप बनता है।

श्लोक 3.67

अरुः द्विषत् अच् न्त स्य मुं

aruḥ dviṣat ac nta sya muṁ

खित् उत्तरपद परे रहने पर, 'अरुस्' (मर्मस्थल), 'द्विषत्' (शत्रु) तथा अव्यय-भिन्न अजन्त (स्वरान्त) शब्दों के अन्त में 'मुम्' (म्) का आगम होता है; जैसे 'जन' + एजय (खित् खश् प्रत्यययुक्त) से 'जनमेजयः' रूप बनता है।

श्लोक 3.68

इचः एक अचः म्रत्ययात् अ

icaḥ eka acaḥ mratyayāt a

खित् उत्तरपद परे रहने पर, इकारान्त/ईकारान्त एक-स्वरवाले (एकाच्) शब्द को 'अम्' का आगम होता है, और वह 'अम्' आगे द्वितीया के एकवचन 'अम्' के समान कार्यों का विषय बनता है; जैसे गांमन्यः, नरंमन्यः, स्त्रियंमन्यः, श्रियंमन्यः, भ्रुवंमन्यः।

श्लोक 3.69

वाचंयमपुरंदरौ

vācaṁyamapuraṁdarau

'वाचंयम' तथा 'पुरन्दर' शब्दों का निपातन (विशेष सिद्ध रूपों के रूप में स्वीकृति) होता है; जैसे वाचंयमः (वाणी को संयत रखने वाला, मौनी), पुरंदरः (नगर/शत्रु-नगर का विदारक, इन्द्र का विशेषण)।

श्लोक 3.70

कारे सत्य अगदस्य

kāre satya agadasya

'कार' शब्द के उत्तरपद होने पर 'सत्य' तथा 'अगद' शब्दों को भी 'मुम्' का आगम होता है; जैसे सत्यङ्कारः, अगदङ्कारः।

श्लोक 3.71

श्येनतिलस्य पाते ञे

śyenatilasya pāte ñe

जब उत्तरपद 'पात' धातु से बना ञ्-प्रत्ययान्त शब्द हो, तब पूर्वपद श्येन और तिल शब्दों को मुम् (म्) का आगम होता है, जैसे श्यैनम्पाता (बाज़ के झपटने की क्रीड़ा) और तैलम्पाता।

श्लोक 3.72

रात्रेः कृति विभाषा

rātreḥ kṛti vibhāṣā

कृदन्त उत्तरपद के परे रहने पर रात्रि शब्द को विकल्प से मुम् का आगम होता है; इसी कारण रात्रिञ्चरः और रात्रिचरः दोनों रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 3.73

नलोपः नञः

nalopaḥ nañaḥ

समास में उत्तरपद परे रहने पर निषेधवाचक नञ् (न) के नकार का लोप हो जाता है, जैसे न + ब्राह्मणः से अब्राह्मणः रूप बनता है।

श्लोक 3.74

तस्मात्नुट् अचि

tasmātnuṭ aci

जिस नञ् के नकार का लोप हो चुका है, उससे परे स्वरादि (अजादि) उत्तरपद रहने पर नुट् (न्) का आगम होता है; इस प्रकार न + अश्वः से अनश्वः रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 3.75

नभ्राज् नपात्नवेदः नासत्यानमुचिनकुलनखनपुंसकनक्षत्रनक्रनाकेषु प्रकृत्या

nabhrāj napātnavedaḥ nāsatyānamucinakulanakhanapuṁsakanakṣatranakranākeṣu prakṛtyā

नभ्राट्, नपात्, नवेदाः, नासत्या, नमुचि, नकुल, नख, नपुंसक, नक्षत्र, नक्र और नाक — इन विशिष्ट पारम्परिक शब्दों में नञ् (न) ज्यों का त्यों बना रहता है, उसके नकार का लोप नहीं होता।

श्लोक 3.76

एक आदिः च एकस्य च आदुक्

eka ādiḥ ca ekasya ca āduk

जिस नञ् के आगे 'एक' शब्द आता है, वह नञ् भी प्रकृतिस्थ (अपरिवर्तित) रहता है, और 'एक' शब्द को अदुक् (द्) का आगम होता है; इस प्रकार एकोनविंशति के स्थान पर एकान्नविंशतिः (उन्नीस) रूप बनता है।

श्लोक 3.77

नगः अप्राणिषु न्यारयां

nagaḥ aprāṇiṣu nyārayāṁ

जब नग शब्द अचेतन (अप्राणी) पदार्थ के अर्थ में प्रयुक्त होता है, तब उसमें नञ् विकल्प से प्रकृतिस्थ रहता है, अतः नगाः और अगाः दोनों रूप (वृक्ष अथवा पर्वत के अर्थ में) सिद्ध होते हैं।

श्लोक 3.78

सहस्य सः संज्ञायां

sahasya saḥ saṁjñāyāṁ

जब समस्त पद कोई संज्ञा (विशेष नाम) बनाता है, तब उत्तरपद के परे रहने पर सह शब्द के स्थान पर स आदेश होता है; जैसे सह अश्वत्थेन से साश्वत्थम् बनता है।

श्लोक 3.79

ग्रन्थ अन्त अधिके च

grantha anta adhike ca

ग्रन्थ (पाठ) की समाप्ति के अर्थ में और 'अधिक मात्रा' के अर्थ में भी सह के स्थान पर स आदेश होता है; जैसे सकलं ज्योतिषम् (सम्पूर्ण ज्योतिष-पाठ) और सद्रोणा खारी (एक द्रोण अधिक की खारी)।

श्लोक 3.80

द्वितीये च अनुप अत्यये

dvitīye ca anupa atyaye

जब सहचारी (साथ रहनेवाला) परन्तु प्रत्यक्ष दिखाई न देनेवाला गौण पदार्थ उत्तरपद के रूप में कहा जाए, तब भी सह के स्थान पर स आदेश होता है; जैसे साग्निः कपोतः (अग्नि-सदृश वर्णवाला कबूतर, जिसमें वास्तविक अग्नि नहीं है)।

श्लोक 3.81

अव्ययीभावे च अकाले

avyayībhāve ca akāle

अव्ययीभाव समास में, यदि उत्तरपद काल (समय) का वाचक न हो, तो भी सह के स्थान पर स आदेश होता है; जैसे सहहरि से सहरि रूप बनता है।

श्लोक 3.82

वा उपसर्जनस्य

vā upasarjanasya

बहुव्रीहि समास में उपसर्जन (गौण) पद के रूप में प्रयुक्त सह शब्द के स्थान पर विकल्प से स आदेश होता है; अतः सुपुत्रः और सहपुत्रः दोनों रूप सिद्ध हैं।

श्लोक 3.83

प्रकृत्या आशिषि गोवत्सहलेषु

prakṛtyā āśiṣi govatsahaleṣu

आशीर्वाद के प्रसंग में, गो, वत्स और हल शब्दों को छोड़कर अन्य उत्तरपदों के परे सह शब्द ज्यों का त्यों बना रहता है, स आदेश नहीं होता; जैसे स्वस्ति देवदत्ताय सहपुत्राय।

श्लोक 3.84

समानस्य छन्दसि अमूर्धन्प्रभृति उदर्केषु

samānasya chandasi amūrdhanprabhṛti udarkeṣu

वैदिक (छान्दस) प्रयोग में, मूर्धन् आदि तथा उदक शब्द को छोड़कर शेष उत्तरपदों के परे समान शब्द के स्थान पर स आदेश होता है; जैसे सगर्भ्यः (एक ही गर्भ से उत्पन्न)।

श्लोक 3.85

ज्योतिस्जनपदरात्रिनाभिनामन्गोत्ररूपस्थानवर्णवयस्वचनबन्धुषु

jyotisjanapadarātrinābhināmangotrarūpasthānavarṇavayasvacanabandhuṣu

ज्योतिस्, जनपद, रात्रि, नाभि, नामन्, गोत्र, रूप, स्थान, वर्ण, वयस्, वचन और बन्धु — इन शब्दों के उत्तरपद होने पर समान के स्थान पर स आदेश होता है; जैसे सज्योतिः, सजनपदः, सनाभिः, सगोत्रः आदि।

श्लोक 3.86

चरणे ब्रह्मचारिणि

caraṇe brahmacāriṇi

जब 'चरण' (वैदिक शाखा) का अर्थ अभिप्रेत हो, तब ब्रह्मचारिन् शब्द के उत्तरपद होने पर समान के स्थान पर स आदेश होता है; समानो ब्रह्मचारी से सब्रह्मचारी (एक ही शाखा में पढ़नेवाला सहपाठी) रूप बनता है।

श्लोक 3.87

तीर्थे ये

tīrthe ye

यत्-प्रत्ययान्त तीर्थ शब्द के उत्तरपद होने पर भी समान के स्थान पर स आदेश होता है; समानतीर्थ + यत् से सतीर्थ्यः (समान गुरु से शिक्षा पानेवाला सहपाठी) रूप बनता है।

श्लोक 3.88

विभाषा उदरे

vibhāṣā udare

उदर शब्द के उत्तरपद होने पर समान के स्थान पर विकल्प से स आदेश होता है; अतः सोदर्यः और समानोदर्यः दोनों रूप (सहोदर के अर्थ में) सिद्ध होते हैं।

श्लोक 3.89

दृश् दृश वतुषु

dṛś dṛśa vatuṣu

दृक्, दृश् और वतु (वतुप् प्रत्यय) के परे रहने पर समान के स्थान पर स आदेश होता है; इस प्रकार सदृक् और सदृशः (समान रूपवाला) रूप बनते हैं।

श्लोक 3.90

इदंकिमोरीश्की

idaṁkimorīśkī

दृक्, दृश् अथवा वतुप् प्रत्यय के परे रहने पर इदम् शब्द के स्थान पर ईश् (ई) तथा किम् शब्द के स्थान पर की सर्वादेश होता है; जैसे इदम् + इयत् में ई-आदेश होकर, आगे के नियमों से अन्ततः इयान् रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 3.91

आ सर्वनाम्नः

ā sarvanāmnaḥ

दृक्, दृश् और वतु के परे रहने पर सर्वनाम शब्दों के अन्तिम वर्ण के स्थान पर आ आदेश होता है; जैसे तद् + दृश् में द् के स्थान पर आ होकर, सवर्णदीर्घ होने पर तादृश् रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 3.92

विष्वञ्च्देवयोः च टेरद्रि अञ्चतौ वप्रत्यये

viṣvañcdevayoḥ ca ṭeradri añcatau vapratyaye

जब 'अञ्चु' धातु से बना व-प्रत्ययान्त (अच्) उत्तरपद परे हो, तब विष्वक्, देव तथा सर्वनाम शब्दों के टि-भाग (अन्त्य स्वर से आगे का अंश) के स्थान पर अद्रि आदेश होता है; जैसे विष्वद्रयङ्, देवद्रयङ्, तद्रयङ्, यद्रयङ्।

श्लोक 3.93

समः समि

samaḥ sami

व-प्रत्ययान्त अञ्चु धातु के परे रहने पर सम् शब्द के स्थान पर समि आदेश होता है; जैसे सम् + अच् से समि अच् (समीचीन के अर्थ में) रूप बनता है।

श्लोक 3.94

तिरसः तिरि अलोपे

tirasaḥ tiri alope

जिस अञ्चु धातु का अकार लुप्त नहीं हुआ है, ऐसे व-प्रत्ययान्त अञ्चु धातु के परे रहने पर सम्पूर्ण तिरस् शब्द के स्थान पर तिरि आदेश होता है; इस प्रकार तिर्यङ्, तिर्यञ्चौ, तिर्यञ्चः रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 3.95

सहस्य सध्रिः

sahasya sadhriḥ

व-प्रत्ययान्त अञ्चु धातु के परे रहने पर सह शब्द के स्थान पर सध्रि आदेश होता है; इस प्रकार सध्रयङ्, सध्रयञ्चौ, सध्रीचः रूप बनते हैं।

श्लोक 3.96

सध मादस्थयोः हन्दसि

sadha mādasthayoḥ handasi

वैदिक (छान्दस) प्रयोग में माद और स्थ शब्दों के उत्तरपद होने पर सह शब्द के स्थान पर सध आदेश होता है; जैसे सधमादः और सधस्थाः (साथ हर्षित होने या साथ रहनेवाले के अर्थ में)।

श्लोक 3.97

द्वि अन्तरुपसर्गेह्यः अपः ईत्

dvi antarupasargehyaḥ apaḥ īt

द्वि, अन्तर तथा उपसर्गों से परे रहने पर आप् (जल) शब्द के स्थान पर ईकार आदेश होता है; इस प्रकार द्वीपम्, अन्तरीपम्, नीपम्, समीपम् आदि रूप बनते हैं।

श्लोक 3.98

ऊत् अनोर्देशे

ūt anordeśe

जब समूचे समुदाय से किसी प्रदेश का बोध कराना अभीष्ट हो, तब अनु शब्द से परे आप् शब्द के स्थान पर ऊकार आदेश होता है; जैसे अनूपो देशः (जलाशयों से युक्त प्रदेश)।

श्लोक 3.99

अषष्ठी अतृतीयस्थस्य न्यस्य दुक् आशिः आशा आस्था आस्थित उत्सुक ऊतिकारकराग छेषु

aṣaṣṭhī atṛtīyasthasya nyasya duk āśiḥ āśā āsthā āsthita utsuka ūtikārakarāga cheṣu

आशिस्, आशा, आस्था, आस्थित, उत्सुक, ऊति, कारक, राग तथा छ-प्रत्ययान्त शब्दों के परे रहने पर, षष्ठी अथवा तृतीया विभक्ति में स्थित न होनेवाले अन्य शब्द को दुक् (द्) का आगम होता है; जैसे अन्यदाशीः, अन्यत्कारकः, अन्यद्रागः आदि।

श्लोक 3.100

अर्थे विभाषा

arthe vibhāṣā

अर्थ शब्द के उत्तरपद होने पर अन्य शब्द को विकल्प से दुक् का आगम होता है; अतः अन्यदर्थम् और अन्यार्थम् दोनों रूप सिद्ध हैं।

श्लोक 3.101

कोः कत् तत्पुरुषे अचि

koḥ kat tatpuruṣe aci

तत्पुरुष समास में स्वरादि (अजादि) उत्तरपद के परे रहने पर निन्दार्थक कु शब्द के स्थान पर कत् आदेश होता है; जैसे कदजः, कदश्वः, कदन्नम्।

श्लोक 3.102

रथवदयोः च

rathavadayoḥ ca

रथ और वद शब्दों के उत्तरपद होने पर भी कु शब्द के स्थान पर कत् आदेश होता है; कद्रथः, कद्वदः रूप बनते हैं।

श्लोक 3.103

तृणे च जातौ

tṛṇe ca jātau

जाति-विशेष के अर्थ में तृण शब्द के उत्तरपद होने पर भी कु के स्थान पर कत् आदेश होता है; जैसे कत्तृणा नामक घास की एक जाति।

श्लोक 3.104

का पथिन्अक्षयोः

kā pathinakṣayoḥ

पथिन् और अक्ष शब्दों के उत्तरपद होने पर कु के स्थान पर का आदेश होता है; कापथः (बुरा मार्ग) और काक्षः (बुरी आँखोंवाला) रूप बनते हैं।

श्लोक 3.105

ईषदर्थे

īṣadarthe

'कुछ थोड़ा-सा' (ईषत्) के अर्थ में प्रयुक्त कु शब्द के स्थान पर भी उत्तरपद के परे का आदेश होता है; कामधुरम् (कुछ मीठा), कालवणम् (कुछ खारा)।

श्लोक 3.106

विभाषा पुरुषे

vibhāṣā puruṣe

पुरुष शब्द के उत्तरपद होने पर कु के स्थान पर विकल्प से का आदेश होता है; अतः कापुरुषः और कुपुरुषः दोनों रूप (कायर पुरुष के अर्थ में) सिद्ध हैं।

श्लोक 3.107

कवं च उष्णे

kavaṁ ca uṣṇe

उष्ण शब्द के उत्तरपद होने पर कु के स्थान पर कव आदेश होता है, और विकल्प से का आदेश भी होता है; इस प्रकार कवोष्णम्, कोष्णम्, कदुष्णम् — तीनों रूप (कुछ गरम के अर्थ में) सिद्ध होते हैं।

श्लोक 3.108

पथि च छन्दसि

pathi ca chandasi

वैदिक (छान्दस) प्रयोग में पथिन् शब्द के उत्तरपद होने पर भी कु के स्थान पर विकल्प से का और कव आदेश होते हैं; कवपथः, कापथः, कुपथः तीनों रूप सिद्ध हैं।

श्लोक 3.109

पृषोदर आदीनि यथोपदिष्तं

pṛṣodara ādīni yathopadiṣtaṁ

पृषोदर आदि अनियमित रूप से निष्पन्न शब्दों को विद्वानों के प्रयोग में जिस रूप में पाया जाता है, उसी रूप में साधु (शुद्ध) मान लिया जाता है, चाहे उसके लिए लोप, आगम आदि किसी अविहित प्रक्रिया की कल्पना ही क्यों न करनी पड़े; जैसे पृषोदरम्, बलाहकः, जीमूतः।

श्लोक 3.110

संख्याविसाय ऊर्वस्य अह्नस्य अहन् अन्यतरस्यां ङौ

saṁkhyāvisāya ūrvasya ahnasya ahan anyatarasyāṁ ṅau

संख्यावाचक शब्दों, वि और साय शब्दों से परे अह्न शब्द के स्थान पर सप्तमी विभक्ति के एकवचन में विकल्प से अहन् आदेश होता है; जैसे द्वयह्नि/द्वयहनि और सायाह्नि/सायाहनि।

श्लोक 3.111

ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घः णः

ḍhralope pūrvasya dīrghaḥ ṇaḥ

ढकार और रकार (जब उनका लोप हो चुका हो) के परे रहने पर उनसे पहले आनेवाले अ, इ, उ स्वरों के स्थान पर क्रमशः आ, ई, ऊ दीर्घ आदेश होता है; जैसे हरिस् + रभ्यः में स्/र् का लोप होकर हरी रभ्यः रूप बनता है।

श्लोक 3.112

सहिवहोरोत् अवर्णस्य

sahivahorot avarṇasya

ढकार और रकार का लोप होने पर सह् और वह् धातुओं के अकार (अवर्ण) के स्थान पर ओकार आदेश होता है; जैसे उव् + ढ में ढकार का लोप होकर, वकार के बाद के अकार का ओकार होने पर उवोढ रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 3.113

साढ्यै साड्व्ह्वा साढ इति निगमे

sāḍhyai sāḍvhvā sāḍha iti nigame

वैदिक प्रयोग में साढ्यै, साढ्वा और साढा — ये तीन रूप निपातन (विशेष रूप से स्वीकृत अनियमित रूप) के रूप में स्वीकार किए जाते हैं; सह् धातु से बने इन क्त्वा-प्रत्ययान्त रूपों में सामान्य नियमों से हटकर विशेष रूपान्तर देखा जाता है।

श्लोक 3.114

संहितायां

saṁhitāyāṁ

इस सूत्र से आगे 'संहितायाम्' (संहिता के विषय में) का अधिकार प्रारम्भ होता है, अर्थात् इसके बाद बताए गए सभी कार्य संहितापाठ (सन्धियुक्त पदों) में ही होते हैं, अलग-अलग पदों के पाठ में नहीं।

श्लोक 3.115

कर्णे लक्षनस्य अविष्टाष्टन्पञ्चन्मणिभिन्नछिन्नछिद्रस्रुवस्वस्तिकस्य

karṇe lakṣanasya aviṣṭāṣṭanpañcanmaṇibhinnachinnachidrasruvasvastikasya

कर्ण शब्द के उत्तरपद होने पर, विष्ट, अष्टन्, पञ्चन्, मणि, भिन्न, छिन्न, छिद्र, स्त्रुव और स्वस्तिक शब्दों को छोड़कर शेष चिह्न/लक्षणवाचक शब्दों के अन्त्य स्वर को दीर्घ आदेश होता है; जैसे दात्राकर्णः (हँसिये के आकार के कान वाला)।

श्लोक 3.116

नहिवृतिवृषिव्यधिरुचिसहितनिषु क्वौ

nahivṛtivṛṣivyadhirucisahitaniṣu kvau

क्विप्-प्रत्ययान्त नह्, वृत्, वृष्, व्यध्, रुच्, सह् और तन् — इन धातुओं में से किसी के उत्तरपद होने पर पूर्वपद के अन्त्य स्वर को दीर्घ आदेश होता है; जैसे उप + नह् (क्विप्) से उपानह् रूप बनता है।

श्लोक 3.117

वनगिर्योः संज्ञायां कोटरकिंशुलक आदीणां

vanagiryoḥ saṁjñāyāṁ koṭarakiṁśulaka ādīṇāṁ

संज्ञा (विशेषनाम) के विषय में, वन शब्द के उत्तरपद होने पर कोटर आदि शब्दों को तथा गिरि शब्द के उत्तरपद होने पर किंशुलुक आदि शब्दों को दीर्घ आदेश होता है; कोटरावणम्, किंशुलुकागिरिः जैसे रूप बनते हैं।

श्लोक 3.118

वले

vale

वल शब्द के उत्तरपद होने पर पूर्वपद के अ, इ, उ स्वर को दीर्घ आदेश होता है; कृषि + वलच् से कृषीवलः और आसुति + वलच् से आसुतीवलः रूप बनते हैं।

श्लोक 3.119

मतौ बह्वचः अनजिर आदीणां

matau bahvacaḥ anajira ādīṇāṁ

मतुप् प्रत्यय के परे रहने पर, अजिर आदि शब्दों को छोड़कर, एक से अधिक स्वरोंवाले (अनेकाच्) शब्दों के अन्त्य स्वर को दीर्घ आदेश होता है; उदुम्बर + मतुप् से उदुम्बरावती रूप बनता है।

श्लोक 3.120

शर आदीणां च

śara ādīṇāṁ ca

मतुप् प्रत्यय के परे रहने पर शर आदि शब्दों को (चाहे वे एक ही स्वरवाले क्यों न हों) भी दीर्घ आदेश होता है; शरावती, वंशावती, धूमावती रूप बनते हैं।

श्लोक 3.121

इकः वहे अपीलोः

ikaḥ vahe apīloḥ

वह शब्द के उत्तरपद होने पर, पीलु शब्द को छोड़कर, इकारान्त/उकारान्त (इगन्त) शब्दों के अन्त्य स्वर को दीर्घ आदेश होता है; कपीवहम्, मुनीवहम् रूप बनते हैं।

श्लोक 3.122

उपसर्गस्य घञि अमनुष्ये बहुलं

upasargasya ghañi amanuṣye bahulaṁ

जब समास से किसी मनुष्य का बोध न हो, तब घञ्-प्रत्ययान्त उत्तरपद के परे रहने पर उपसर्ग को प्रायः (बहुलता से) दीर्घ आदेश होता है, किन्तु यह नियम सर्वत्र लागू नहीं होता; जैसे वीक्लेदः, अपामार्गः बनते हैं, जबकि प्रसेवः में दीर्घ नहीं होता।

श्लोक 3.123

इकः काशे

ikaḥ kāśe

काश शब्द के उत्तरपद होने पर इगन्त (इ/उ-अन्त) पूर्वपद को दीर्घ आदेश होता है; नीकाशः, वीकाशः, अनूकाशः रूप बनते हैं।

श्लोक 3.124

दः ति

daḥ ti

दा धातु के स्थान पर आनेवाले तकारादि आदेश (जैसे 'त्त') के परे रहने पर इगन्त उपसर्ग को दीर्घ आदेश होता है; नीत्तम्, वीत्तम्, परीत्तम् रूप बनते हैं।

श्लोक 3.125

अष्टनः संज्ञायां

aṣṭanaḥ saṁjñāyāṁ

संज्ञा (विशेषनाम) बनने के प्रसंग में उत्तरपद के परे रहने पर अष्टन् शब्द को दीर्घ आदेश होता है; अष्टावक्रः, अष्टापदम् रूप बनते हैं।

श्लोक 3.126

छन्दसि च

chandasi ca

वैदिक (छान्दस) प्रयोग में भी उत्तरपद के परे अष्टन् शब्द को दीर्घ आदेश होता है, चाहे संज्ञा न भी बने; अष्टाकपालम्, अष्टापदी जैसे रूप मिलते हैं।

श्लोक 3.127

चितेः कपि

citeḥ kapi

कप् प्रत्यय के परे रहने पर चिति शब्द को दीर्घ आदेश होता है; एकचितीकः, द्विचितीकः, त्रिचितीकः रूप बनते हैं।

श्लोक 3.128

विश्वस्य वसुराटोः

viśvasya vasurāṭoḥ

वसु अथवा राट् शब्द के परे रहने पर विश्व शब्द को दीर्घ आदेश होता है; विश्वावसुः (एक गन्धर्व का नाम) और विश्वाराट् रूप बनते हैं।

श्लोक 3.129

नरे संज्ञायां

nare saṁjñāyāṁ

संज्ञा के प्रसंग में नर शब्द के उत्तरपद होने पर विश्व शब्द को दीर्घ आदेश होता है; विश्वानरः नामक व्यक्ति के पुत्र को वैश्वानरिः कहा जाता है।

श्लोक 3.130

मित्रे च ऋषौ

mitre ca ṛṣau

जब समस्त पद से किसी विशिष्ट ऋषि का बोध हो, तब मित्र शब्द के उत्तरपद होने पर भी विश्व शब्द को दीर्घ आदेश होता है; इस प्रकार प्रसिद्ध ऋषि विश्वामित्रः का नाम सिद्ध होता है।

श्लोक 3.131

मन्त्रे सोम अश्व इन्द्रिय विश्वएव्यय मतौ

mantre soma aśva indriya viśvaevyaya matau

मन्त्र (वैदिक स्तोत्र) के विषय में मतुप् प्रत्यय के परे रहने पर सोम, अश्व, इन्द्रिय और विश्वदेव्य शब्दों को दीर्घ आदेश होता है; सोमावती, अश्वावती, इन्द्रियावती, विश्वदेव्यावती रूप बनते हैं।

श्लोक 3.132

ओष्सधेः च विभक्तौ अप्रथमाआं

oṣsadheḥ ca vibhaktau aprathamāāṁ

मन्त्र-प्रयोग में प्रथमा से भिन्न किसी भी विभक्ति के परे रहने पर ओषधि शब्द को दीर्घ आदेश होता है; ओषधीभिः, ओषधीभ्यः रूप बनते हैं।

श्लोक 3.133

ऋचि तुनुघमक्षुतङ्कुत्र उरुष्याणां

ṛci tunughamakṣutaṅkutra uruṣyāṇāṁ

ऋग्वेद-सम्बन्धी प्रयोग में तु, नु, घ, मक्षु, तङ्, कु, त्र और उरुष्य — इन निपातों/शब्दों को दीर्घ आदेश होता है; इस कारण वेद में नू, घा, मक्षू जैसे दीर्घयुक्त रूप मिलते हैं।

श्लोक 3.134

इकः सुञि

ikaḥ suñi

मन्त्र-प्रयोग में सु निपात के परे रहने पर इगन्त (इ/उ-अन्त) शब्द को दीर्घ आदेश होता है; इसी कारण वेद में 'अभी षु' जैसे दीर्घयुक्त रूप देखे जाते हैं।

श्लोक 3.135

द्व्यचः अतः तिङः

dvyacaḥ ataḥ tiṅaḥ

ऋग्वेद-सम्बन्धी प्रयोग में दो स्वरोंवाले (द्व्यच्) क्रियापद (तिङन्त) के अकार को दीर्घ आदेश होता है; इस प्रकार विद्मः के स्थान पर विद्मा और विद्यः के स्थान पर विद्या जैसे रूप मिलते हैं।

श्लोक 3.136

निपातस्य च

nipātasya ca

ऋग्वेद-सम्बन्धी प्रयोग में निपातों (अव्ययों) के अकार को भी दीर्घ आदेश होता है; एव के स्थान पर एवा और अच्छ के स्थान पर अच्छा जैसे रूप मिलते हैं।

श्लोक 3.137

अन्येषां अपि दृश्यते

anyeṣāṁ api dṛśyate

ऊपर के नियमों में वर्णित शब्दों के अतिरिक्त भी अन्य शब्दों में दीर्घ स्वर देखा जाता है, और चूँकि यह शिष्ट (विद्वान) पुरुषों के प्रयोग में पाया जाता है, अतः उसे भी साधु (शुद्ध) मान लिया जाता है; जैसे केशाकेशि, कचाकचि।

श्लोक 3.138

चौ

cau

जिस अञ्चु धातु के नकार का लोप हो चुका है, उसके परे रहने पर पूर्वपद के अ, इ, उ स्वर को दीर्घ आदेश होता है; प्र + अच् में अकार के दीर्घ होने पर प्राच् रूप बनता है, जिससे विसर्ग होकर प्राचः रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 3.139

सम्प्रसारणस्य

samprasāraṇasya

उत्तरपद के परे रहने पर, सम्प्रसारण (य्/व् आदि अर्धस्वरों का इ/उ में परिवर्तन) से बने पूर्वपद के अन्त्य स्वर को दीर्घ आदेश होता है; कारीषगन्धीपुत्रः, कौमुदगन्धीपतिः जैसे रूप बनते हैं।

षष्ठोऽध्यायः, चतुर्थः पादः

श्लोक 4.1

अङ्गस्य

aṅgasya

यह सूत्र अधिकार-सूत्र है; इसमें 'अङ्ग' (प्रत्यय से पूर्ववर्ती प्रकृति-रूप) शब्द की अनुवृत्ति आगे के अनेक सूत्रों तक चलती है, अर्थात् इस अध्याय-पाद में आगे बतलाए गए सभी आदेश, लोप, दीर्घ आदि कार्य अङ्ग के ही होते हैं। उदाहरणार्थ राजन् शब्द में अगले सूत्रों के सहयोग से नकार-लोप, जश्त्व आदि होकर राज्ञः रूप सिद्ध होता है, जिसमें ये सभी कार्य 'अङ्ग' राजन् पर ही होते हैं।

श्लोक 4.2

हलः

halaḥ

जब अङ्ग में हल् वर्ण (व्यंजन) से परे कोई सम्प्रसारण-स्वर (अ, इ, उ) आए, तो उस सम्प्रसारण स्वर को दीर्घ कर दिया जाता है। जैसे ज्या धातु में यकार के सम्प्रसारण से प्राप्त इकार ज्-वर्ण (हल्) से परे होने के कारण दीर्घ होकर ईकार बनता है, जिससे जीनः रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.3

नामि

nāmi

स्वरान्त (अजन्त) अङ्ग के अन्तिम स्वर को दीर्घ आदेश होता है, यदि उसके बाद षष्ठी बहुवचन का 'नाम्' प्रत्यय आए। जैसे बाल+नाम्=बालानाम्, गुरु+नाम्=गुरूणाम्, कवि+नाम्=कवीनाम्, वारि+नाम्=वारीणाम्; जो अङ्ग पहले से ही दीर्घ-स्वरान्त हैं (जैसे वधू), उनमें कोई परिवर्तन नहीं होता।

श्लोक 4.4

न तिसृचतसृ

na tisṛcatasṛ

स्त्रीलिङ्ग संख्यावाचक 'तिसृ' (तीन) और 'चतसृ' (चार) शब्दों को नाम् प्रत्यय परे रहने पर पूर्वसूत्र से प्राप्त दीर्घादेश नहीं होता। जैसे तिसृ+नाम्=तिसृणाम् (न कि तिसॄणाम्)।

श्लोक 4.5

छन्दसि उभयथा

chandasi ubhayathā

छन्दोविषयक (वैदिक) प्रयोग में तिसृ और चतसृ शब्दों को नाम् परे होने पर दीर्घ और अदीर्घ दोनों रूप वैकल्पिक रूप से मान्य हैं। जैसे तिसृणाम् मध्यन्दिने और तिसॄणाम् मध्यन्दिने दोनों प्रयुक्त होते हैं।

श्लोक 4.6

नृ च

nṛ ca

नाम् प्रत्यय परे होने पर 'नृ' (पुरुष) शब्द को भी विकल्प से दीर्घादेश होता है। जैसे नृ+नाम्=नॄणाम् अथवा नृणाम्।

श्लोक 4.7

न उपधायाः

na upadhāyāḥ

'न्' अन्तवाले अङ्ग की उपधा (अन्त्य वर्ण से पहले वाला स्वर) को नाम् प्रत्यय परे होने पर दीर्घादेश होता है। जैसे पञ्चन्+नाम्=पञ्चानाम्, सप्तन्+नाम्=सप्तानाम्, नवन्+नाम्=नवानाम्, दशन्+नाम्=दशानाम्।

श्लोक 4.8

सर्वनामस्थाने च असम्बुद्धौ

sarvanāmasthāne ca asambuddhau

सम्बोधन को छोड़कर अन्य सर्वनामस्थान प्रत्यय (सु, औ, जस् आदि) परे होने पर भी नकारान्त अङ्ग की उपधा को दीर्घादेश होता है। जैसे सखि शब्द से बने सखन् अङ्ग में सु प्रत्यय परे होने पर उपधा को दीर्घ, प्रत्यय व अन्त्य नकार के लोप के बाद सखा रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.9

वा षपूर्वस्य निगमे

vā ṣapūrvasya nigame

निगम (वैदिक शास्त्रीय प्रयोग) में षकारपूर्वक नकारान्त अङ्ग की उपधा को असम्बुद्धि सर्वनामस्थान परे होने पर विकल्प से दीर्घादेश होता है। जैसे तक्षन् से स तक्षाणं तिष्ठन्तम् और स तक्षणं तिष्ठन्तम् दोनों रूप, तथा ऋभुक्षाणम् और ऋभुक्षणम् दोनों रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 4.10

स अन्तमहतः संयोगस्य

sa antamahataḥ saṁyogasya

असम्बुद्धि सर्वनामस्थान प्रत्यय (सु, औ, जस्, अम्, औट्) परे होने पर 'स्' अन्तवाले संयोगयुक्त अङ्ग की तथा 'महत्' शब्द की उपधा को दीर्घादेश होता है। जैसे महत्+सु में उपधा अकार दीर्घ होकर महान् रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.11

अप्तृन्तृच्स्वसृनप्तृनेष्टृत्वष्टृक्षत्तृ होतृपोतृप्रशास्त् ऋलपॄणां

aptṛntṛcsvasṛnaptṛneṣṭṛtvaṣṭṛkṣattṛ hotṛpotṛpraśāst ṛlapṝṇāṁ

अप् (जल), तृन्/तृच् प्रत्ययान्त शब्द, स्वसृ (बहन), नप्तृ (पौत्र/नाती), नेष्टृ, त्वष्टृ, क्षत्तृ, होतृ, पोतृ और प्रशास्तृ - इन शब्दों की उपधा को सम्बुद्धि-भिन्न सर्वनामस्थान (सुट् सहित) प्रत्यय परे होने पर दीर्घादेश होता है। जैसे क्रोष्टृ शब्द से सु प्रत्यय परे होने पर उपधा को दीर्घ, अपृक्त प्रत्यय के लोप और पदान्त नकार लोप होकर क्रोष्टा रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.12

इन्हन्पूषन्अर्यम्णां शौ

inhanpūṣanaryamṇāṁ śau

इन्-अन्त (जैसे दण्डिन्), हन्-अन्त, तथा पूषन् और आर्यमन् शब्दों की उपधा को नपुंसकलिंग सर्वनामस्थान-आदेश 'शि' परे होने पर दीर्घादेश होता है। जैसे बहुदण्डीनि, बहुवृत्रहाणि, बहुपूषाणि, बह्वर्यमाणि।

श्लोक 4.13

सौ च

sau ca

इन्-अन्त, हन्-अन्त, पूषन् और आर्यमन् शब्दों की उपधा को सम्बुद्धिभिन्न 'सु' प्रत्यय परे होने पर भी दीर्घादेश होता है। जैसे दण्डी, वृत्रहा, पूषा, अर्यमा।

श्लोक 4.14

अतु असन्तस्य च अधातोः

atu asantasya ca adhātoḥ

सम्बुद्धिभिन्न 'सु' परे होने पर अतु-अन्त (जैसे मतुप्-प्रत्ययान्त) अङ्ग की तथा धातु से भिन्न अस्-अन्त अङ्ग की उपधा को दीर्घादेश होता है। जैसे धीमत् (धी+मतुप्) शब्द में मकार के बाद के अकार को दीर्घ आकार होकर धीमान् रूप बनता है।

श्लोक 4.15

अनुनासिकस्य क्विझलोः क्ङ्इति

anunāsikasya kvijhaloḥ kṅiti

जब क्वि (क्विप् आदि) अथवा झलादि (जिसके आदि में झल् वर्ण हो) कित् या ङित् प्रत्यय परे हो, तो अनुनासिक वर्णान्त अङ्ग की उपधा को दीर्घादेश होता है। यह कार्य क्विप् प्रत्यय के होकर पुनः लुप्त हो जाने पर भी, 'प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम्' न्याय से, लागू रहता है।

श्लोक 4.16

अच् हनगंआं सनि

ac hanagaṁāṁ sani

झलादि सन् प्रत्यय परे होने पर स्वरान्त (अजन्त) अङ्ग की तथा हन् व गम् धातुओं की अन्त्य ध्वनि को दीर्घादेश होता है। जैसे कृ धातु स्वरान्त होने से सन् (स) परे होने पर ऋकार दीर्घ ॠकार होकर कॄस रूप बनता है, जो आगे चिकीर्षति जैसे रूपों का आधार बनता है।

श्लोक 4.17

तनोतेर्विभाषा

tanotervibhāṣā

अङ्गभूत 'तनु' (फैलाना) धातु को झलादि सन् प्रत्यय परे होने पर विकल्प से दीर्घादेश होता है। जैसे तन्+सन् से द्वित्व व अभ्यास कार्य होकर तितांसति रूप बनता है।

श्लोक 4.18

क्रमः च क्त्वि

kramaḥ ca ktvi

झलादि क्त्वा प्रत्यय परे होने पर 'क्रम्' धातु की उपधा को भी दीर्घादेश होता है, विकल्प से। जैसे क्रान्त्वा और क्रन्त्वा दोनों रूप सिद्ध हैं।

श्लोक 4.19

च्छ्वोः श्ऊठ् अनुनासिके च

cchvoḥ śūṭh anunāsike ca

अनुनासिक, क्वि (क्विप्) तथा झलादि कित्-ङित् प्रत्यय परे होने पर अङ्ग के 'च्छ्' और 'व्' वर्णों के स्थान पर क्रमशः 'श्' और 'ऊठ्' आदेश होते हैं। जैसे प्रच्छ् धातु से क्विप् होकर च्छ् के स्थान पर श् होने पर प्राश् रूप बनता है, जिससे प्रथमा एकवचन में 'प्राट्' (प्रश्न करने वाला) रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.20

ज्वरत्वरस्रिवि अविमवां उपहायाः च

jvaratvarasrivi avimavāṁ upahāyāḥ ca

क्वि, अनुनासिक अथवा झलादि कित्-ङित् प्रत्यय परे होने पर ज्वर् (रोगी होना), त्वर् (जल्दी करना), स्त्रिव्, अव् (रक्षा करना) और मव् (बाँधना) - इन पाँच धातुओं के वकार तथा उपधा-अकार, दोनों के स्थान पर मिलाकर 'ऊठ्' (ऊ) आदेश होता है। इस प्रकार क्रमशः जूः, तूः, स्त्रूः, ऊः और मूः रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 4.21

रात् लोपः

rāt lopaḥ

क्वि (क्विप्) और झलादि कित्-ङित् प्रत्यय परे होने पर अङ्ग में रकार के बाद आए हुए 'च्छ्' या 'व्' का लोप हो जाता है। जैसे धुर्व् शब्द में रकार के बाद के वकार का लोप होकर धुर् और अन्ततः धूः रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.22

असिधवत् अत्र आ भात्

asidhavat atra ā bhāt

यहाँ से लेकर छठे अध्याय के अन्त तक यदि कोई समान-आश्रय (एक ही स्थान पर लागू होने वाला) कार्य करना हो, तो पहले सम्पन्न हो चुका कार्य असिद्ध (मानो न हुआ हो) माना जाता है। उदाहरणस्वरूप 'जहि' रूप में ज-आदेश तथा हि-प्रत्यय के लुक् - दोनों समानाश्रय कार्य होने से एक की सिद्धि दूसरे को असिद्ध मानकर होती है, जिससे सही रूप 'जहि' ही बनता है, हि का लोप नहीं होता।

श्लोक 4.23

श्णात्नलोपः

śṇātnalopaḥ

श्नम् प्रत्यय के ठीक बाद आने वाले नकार का लोप हो जाता है। जैसे इन्ध् धातु से श्नम् जोड़ने पर बने रूप में उत्तरवर्ती नकार का लोप होकर इनध रूप बनता है, और अञ्ज् से अनज् रूप बनता है।

श्लोक 4.24

अनित् इतां हलः उपधायाः क्ङ्इति

anit itāṁ halaḥ upadhāyāḥ kṅiti

कित् या ङित् प्रत्यय परे होने पर, जिन हलन्त धातुओं के ह्रस्व इकार की 'इत्' संज्ञा नहीं हुई है (अर्थात् अनिदित् धातु), उनकी उपधा के नकार का लोप हो जाता है। जैसे बन्ध्+श्ना=बध्ना (बध्नन्ति), श्रन्थ्+श्ना=श्रध्ना (श्रथ्नन्ति)।

श्लोक 4.25

दन्शसञ्जस्वञ्जां शपि

danśasañjasvañjāṁ śapi

शप् प्रत्यय परे होने पर दंश् (काटना), सञ्ज् (चिपकना/लटकना) और स्वञ्ज् (आलिंगन करना) - इन अङ्गसंज्ञक धातुओं के उपधाभूत अनुनासिक नकार का लोप होता है। जैसे दंश्+शप्=दश, सञ्ज्=सज, स्वञ्ज्=स्वज।

श्लोक 4.26

रञ्जेः च

rañjeḥ ca

शप् प्रत्यय परे होने पर 'रञ्ज्' (रंगना) धातु के उपधा-नकार का भी लोप होता है। जैसे रजति, रजतः, रजन्ति।

श्लोक 4.27

घञि च भावकरणयोः

ghañi ca bhāvakaraṇayoḥ

भाव (क्रिया के सामान्य अर्थ) और करण-कारक में घञ् प्रत्यय परे होने पर भी 'रञ्ज्' धातु के नकार का लोप होता है। जैसे रञ्ज्+अ(घञ्) में नकार-लोप, उपधा-वृद्धि और कुत्व होकर रागः रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.28

स्यदः जवे

syadaḥ jave

वेग (तेज़ गति) अर्थ का बोध कराने पर घञ्-प्रत्ययान्त 'स्यद' शब्द का निपातन (अनियमित रूप से सिद्धि) होता है। जैसे स्यन्द्+घञ्=स्यन्दः।

श्लोक 4.29

अवोद एध ओद्मन्प्रश्रथहिमश्रथाः

avoda edha odmanpraśrathahimaśrathāḥ

घञ्-प्रत्ययान्त अवोद, एध, औद्म, प्रश्रथ और हिमश्रथ शब्दों का निपातन (अनियमित सिद्धि) होता है। जैसे अव+उन्द्+घञ्=अवोदः, इन्ध्+घञ्=एधः, प्र+श्रन्थ्+घञ्=प्रश्रथः, हिम+श्रन्थ्+घञ्=हिमश्रथः।

श्लोक 4.30

न अञ्चेः पूजायां

na añceḥ pūjāyāṁ

'पूजा' (सम्मान/आदर) अर्थ में अञ्चु धातु के उपधाभूत नकार का लोप नहीं होता। जैसे अञ्चिता अस्य गुरवः, अञ्चितमिव शिरो वहति।

श्लोक 4.31

क्त्वि स्कन्दिस्यन्द्योः

ktvi skandisyandyoḥ

क्त्वा प्रत्यय परे होने पर 'स्कन्द्' (कूदना) और 'स्यन्द्' (बहना) धातुओं के उपधा-नकार का लोप होता है। जैसे स्कन्त्वा, स्यन्त्वा। स्यन्द् उदित् होने से इट्-आगम-पक्ष में स्यन्दित्वा रूप भी बनता है।

श्लोक 4.32

ज अन्तनशां विभाषा

ja antanaśāṁ vibhāṣā

जकारान्त अङ्ग तथा 'नश्' (नष्ट होना) धातु के उपधा-नकार का क्त्वा प्रत्यय परे होने पर विकल्प से लोप होता है। जैसे रञ्ज् से रङ्क्त्वा/रक्त्वा, भञ्ज् से भङ्क्त्वा/भक्त्वा, नश् से नंष्ट्वा/नष्ट्वा।

श्लोक 4.33

भञ्जेः च चिणि

bhañjeḥ ca ciṇi

चिण् प्रत्यय (कर्मवाच्य लुङ्) परे होने पर भी 'भञ्ज्' (तोड़ना) धातु के उपधा-नकार का विकल्प से लोप होता है। जैसे अभाजि और अभञ्जि दोनों रूप सिद्ध हैं।

श्लोक 4.34

शासः इत् अङ्हलोः

śāsaḥ it aṅhaloḥ

अङ् प्रत्यय तथा हलादि कित्-ङित् प्रत्यय परे होने पर 'शास्' (आदेश देना/सिखाना) धातु की उपधा (आकार) के स्थान पर ह्रस्व इकार आदेश होता है। जैसे शास्+यत् (क्यप्) से शास्य, फिर षकार परिवर्तन के बाद शिष्य रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.35

शा हौ

śā hau

'हि' प्रत्यय परे होने पर 'शास्' धातु के स्थान पर 'शा' आदेश होता है। जैसे शास्+हि=शा+हि=शाधि।

श्लोक 4.36

हन्तेर्जः

hanterjaḥ

'हि' प्रत्यय परे होने पर 'हन्' (मारना) धातु के स्थान पर 'ज' आदेश होता है। जैसे हन्+हि=जहि।

श्लोक 4.37

अनुदात्त उपदेशवनतितनोति आदीणां अनुआस्कओपः झलि क्ङ्इति

anudātta upadeśavanatitanoti ādīṇāṁ anuāskaopaḥ jhali kṅiti

झलादि कित् या ङित् प्रत्यय परे होने पर अनुदात्तोपदेश (जिनका उच्चारण अनुदात्त बताया गया है) छह धातुओं की तथा वन्, तन् आदि आठ धातुओं की अनुनासिक ध्वनि का लोप होता है। जैसे हन् धातु (जो अनुदात्तोपदेश है) से लट् के प्रथमपुरुष-द्विवचन में तस् (ङित्वत्) परे होने पर अनुनासिक नकार का लोप होकर हतः रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.38

वा ल्यपि

vā lyapi

ल्यप् प्रत्यय परे होने पर उपर्युक्त अनुदात्तोपदेश, वन् तथा तन् आदि धातुओं के अनुनासिक का लोप विकल्प से होता है। जैसे प्रयत्य/प्रयम्य, प्रणत्य/प्रणम्य, आगत्य/आगम्य आदि दोनों रूप सिद्ध हैं।

श्लोक 4.39

न क्तिचि दीर्घः च

na ktici dīrghaḥ ca

क्तिच् प्रत्यय परे होने पर उपर्युक्त धातुओं का न तो अनुनासिकलोप होता है और न ही दीर्घादेश। जैसे यन्तिः, वन्तिः, तन्तिः रूप बनते हैं, जिनमें अनुनासिक ज्यों का त्यों बना रहता है।

श्लोक 4.40

गमः क्वौ

gamaḥ kvau

क्वि (क्विप्) प्रत्यय परे होने पर 'गम्' धातु के अनुनासिक (मकार) का लोप होता है। जैसे अध्वानं गच्छन्तीति अध्वग- रूप बनता है, जहाँ गम् का म् लुप्त हो गया है।

श्लोक 4.41

विट् वनोरनुनासिकस्य आत्

viṭ vanoranunāsikasya āt

विट् (एक विशेष अन्तादेश) और वन् (वनिप् प्रत्यय) परे होने पर अनुनासिकान्त अङ्ग के अन्त्य वर्ण के स्थान पर आकार आदेश होता है। जैसे वि+जन् धातु से वनिप् (वन्) प्रत्यय होकर विजन्वन्, फिर अनुनासिक नकार के स्थान पर आकार व सवर्णदीर्घ होकर विजावन् और अन्ततः विजावा रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.42

जनसनखणां सन् झलोः

janasanakhaṇāṁ san jhaloḥ

सन् प्रत्यय तथा झलादि कित्-ङित् प्रत्यय परे होने पर जन् (उत्पन्न होना), सन् (दान देना) और खन् (खोदना) - इन तीन धातुओं के स्थान पर दीर्घ आकार आदेश होता है। जैसे सन् धातु से लुङ् के प्रथमपुरुष-एकवचन में झलादि ङित् त परे होने पर नकार के स्थान पर आकार होकर, स्वरदीर्घ के बाद असात रूप सिद्ध होता है (इट्-आगम पक्ष में असनिष्ट रूप भी बनता है)।

श्लोक 4.43

ये विभाषा

ye vibhāṣā

यकारादि कित्-ङित् प्रत्यय परे होने पर जन्, सन् और खन् धातुओं के स्थान पर विकल्प से दीर्घ आकार आदेश होता है। जैसे सन् धातु से आशीर्लिङ् में यासुट् (या) परे होने पर सायात् अथवा सन्यात् दोनों रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 4.44

तनोतेर्यकि

tanoteryaki

यक् प्रत्यय (कर्मवाच्य/भाववाच्य य) परे होने पर 'तनु' धातु के स्थान पर विकल्प से आकार आदेश होता है। जैसे तायते और तन्यते दोनों रूप सिद्ध हैं।

श्लोक 4.45

सनः क्तिचि लोपः च अस्य न्यारयां

sanaḥ ktici lopaḥ ca asya nyārayāṁ

'सन्' (दान देना) धातु के स्थान में क्तिच् प्रत्यय परे होने पर विकल्प से आकारादेश तथा अन्त्य वर्ण का लोप - दोनों होते हैं। जैसे सातिः, सतिः और सन्तिः - तीनों रूप सिद्ध हैं।

श्लोक 4.46

आर्धधातुके

ārdhadhātuke

यह अधिकार-सूत्र है; यहाँ से लेकर 'न ल्यपि' (६.४.६९) सूत्र तक 'आर्धधातुक' पद की अनुवृत्ति चलती है, अर्थात् आगे बताए गए सभी कार्य आर्धधातुक प्रत्यय परे होने पर ही होते हैं। जैसे चिकीर्षिता, बेभिदिता, बेभिदितुम्, बेभिदितव्यम्, कारणा, हारणा आदि रूपों में यह अधिकार लागू होता है।

श्लोक 4.47

भ्रस्जः र उपधयोः रं अन्यारयाम्

bhrasjaḥ ra upadhayoḥ raṁ anyārayām

आर्धधातुक प्रत्यय परे होने पर 'भ्रस्ज्' (भूनना) धातु के रकार और उपधाभूत सकार - दोनों के स्थान पर विकल्प से 'रम्' आदेश होता है। जैसे भ्रस्ज्+स्यति=भर्ज्+स्यति=भर्क्ष्यति।

श्लोक 4.48

अतः लोपः

ataḥ lopaḥ

आर्धधातुक प्रत्यय परे होने पर अकारान्त अङ्ग के अन्त्य अकार का लोप होता है। जैसे गोपाय+आम्(लिट्)=गोपायाम्, तथा नेनीय+ण्वुल्(अक)=नेनीयकः।

श्लोक 4.49

यस्य हलः

yasya halaḥ

आर्धधातुक प्रत्यय परे होने पर हल् (व्यंजन) वर्ण के बाद आए 'य्' का लोप होता है। जैसे व्रज् धातु से यङ्, द्वित्व आदि होकर बने वाव्रज्य रूप में हलन्त जकार के बाद के यकार का लोप होकर वाव्रज अ आम् रूप बनता है।

श्लोक 4.50

क्यस्य विभाषा

kyasya vibhāṣā

आर्धधातुक प्रत्यय परे होने पर हल् वर्ण के बाद आए क्यच्, क्यङ् और क्यष् प्रत्ययों का विकल्प से लोप होता है। जैसे समिध्+अम्+क्यच् से बने समिध्य रूप में, आगे आर्धधातुक 'इट्-उक्' परे होने पर क्यच् (य) का लोप विकल्प से होता है।

श्लोक 4.51

णेरनिटि

ṇeraniṭi

जिस आर्धधातुक प्रत्यय के पहले इट् का आगम नहीं होता (अनिट्), उसके परे होने पर 'णि' (णिच्) प्रत्यय का लोप हो जाता है। जैसे कामि धातु से चङ् (अनिट् आर्धधातुक) परे होने पर णि के इकार का लोप होकर अकामत रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.52

निष्ठायां सेटि

niṣṭhāyāṁ seṭi

इट् सहित निष्ठा प्रत्यय (क्त और क्तवतु) परे होने पर भी 'णि' का लोप होता है। जैसे भावि (भू+णिच्) धातु से क्त प्रत्यय होकर भावितः तथा क्तवतु प्रत्यय होकर भावितवान् रूप सिद्ध होते हैं, जिनमें णि का इकार लुप्त हो चुका है।

श्लोक 4.53

जनिता मन्त्रे

janitā mantre

मन्त्रविषयक (वैदिक) प्रयोग में इडागमयुक्त तृच् प्रत्यय परे होने पर 'जन्' धातु के णि (णिच्) का लोप निपातन से (अनियमित रूप से) होता है। जैसे 'यो नः पिता जनिता' में यह रूप देखा जाता है।

श्लोक 4.54

शमिता यज्ञे

śamitā yajñe

यज्ञविषयक प्रयोग में इडागमयुक्त तृच् प्रत्यय परे होने पर 'शम्' (शान्त करना) धातु से विहित णि का लोप निपातन से होता है। जैसे 'शृतं हविः शमिता' में यह रूप प्रयुक्त है।

श्लोक 4.55

अय् आम् अन्त आलु आय्य इत्नु इष्णुषु

ay ām anta ālu āyya itnu iṣṇuṣu

आम्, अन्त, आलु, आय्य, इत्नु और इष्णु - इन प्रत्ययों के परे होने पर णि का लोप नहीं होता, बल्कि णि के इकार के स्थान पर 'अय्' आदेश होता है। जैसे कामि धातु से लिट् व आम् परे होने पर णि के इकार को अय् होकर कामयाम्, और आगे कामयाञ्चके रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.56

ल्यपि लघुपूर्वात्

lyapi laghupūrvāt

लघु (ह्रस्व) स्वरवाले वर्ण से ठीक बाद आए 'णि' के स्थान पर ल्यप् प्रत्यय परे होने पर 'अय्' आदेश होता है। जैसे प्रशमय्य, प्रगणय्य, प्रबेभिदय्य आदि रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 4.57

विभाषा आपः

vibhāṣā āpaḥ

'आप्' धातु से ठीक बाद आए णि के स्थान पर ल्यप् प्रत्यय परे होने पर विकल्प से 'अय्' आदेश होता है। जैसे प्रापय्य और प्राप्य दोनों रूप सिद्ध हैं।

श्लोक 4.58

युप्लुवोर्दीर्घः छन्दसि

yupluvordīrghaḥ chandasi

छन्दोविषय (वैदिक) प्रयोग में ल्यप् प्रत्यय परे होने पर 'यु' और 'प्लु' धातुओं को दीर्घादेश होता है। जैसे वियूय, परिप्लूय आदि रूप देखे जाते हैं।

श्लोक 4.59

क्षियः

kṣiyaḥ

ल्यप् प्रत्यय परे होने पर 'क्षि' (नाश होना) धातु के स्थान में भी दीर्घादेश होता है। जैसे प्रक्षीय रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.60

निष्ठायां अण्यत् अर्थे

niṣṭhāyāṁ aṇyat arthe

भाव और कर्म से भिन्न अर्थ में विहित निष्ठा (क्त) प्रत्यय परे होने पर भी 'क्षि' धातु को दीर्घादेश होता है। जैसे आक्षीणः, प्रक्षीणः, परिक्षीणः रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 4.61

वा आक्रोशदैन्ययोः

vā ākrośadainyayoḥ

आक्रोश (शाप/कोसना) अथवा दैन्य (दीनता) अर्थ में भावकर्म से भिन्न अर्थवाची निष्ठा प्रत्यय परे होने पर 'क्षि' धातु को विकल्प से दीर्घादेश होता है। जैसे आक्रोश में क्षितायुः/क्षीणायुः, तथा दैन्य में क्षितकः/क्षीणकः, क्षितोऽयं तपस्वी/क्षीणोऽयं तपस्वी।

श्लोक 4.62

स्यसिच्सीयुट्तासिसु भावकर्मणोः उपदेशे अच् हनग्रहदृशां चिण्वत् इट् च

syasicsīyuṭtāsisu bhāvakarmaṇoḥ upadeśe ac hanagrahadṛśāṁ ciṇvat iṭ ca

स्य, सिच्, सीयुट् और तासि - इन प्रत्ययों के परे भाव और कर्म (अकर्मक/कर्मवाच्य) अर्थ में, उपदेश में अजन्त धातुओं की तथा हन्, ग्रह और दृश् धातुओं की चिण् प्रत्यय के परे होने जैसी स्थिति (चिण्वद्भाव) एवं इट् का आगम विकल्प से होता है। ध्यातव्य है कि यहाँ दिए गए स्रोत में उद्धृत उदाहरण (गद् से जगद्) वस्तुतः किसी अन्य नियम (द्वित्व में कवर्ग-हकार को चवर्ग करने वाले सूत्र) से सम्बन्धित प्रतीत होता है और इस सूत्र के आशय से मेल नहीं खाता; उस अंश में मूल पाठ अशुद्ध/असंगत जान पड़ता है।

श्लोक 4.63

दीङः युट् अचि क्ङ्इति

dīṅaḥ yuṭ aci kṅiti

अजादि (जिसके आदि में स्वर हो) कित्-ङित् प्रत्यय परे होने पर 'दीङ्' (क्षय होना) धातु को 'युट्' का आगम होता है। जैसे दीङ् धातु से लिट् लकार में आत्मनेपद प्रत्यय (एश् आदेश) परे होने पर, वह अपित् होने से कित् तथा अजादि भी है, अतः युट् (य्) का आगम होकर दिद्ये जैसा रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.64

आतः लोपः इटि च

ātaḥ lopaḥ iṭi ca

अजादि आर्धधातुक कित्-ङित् प्रत्यय तथा इट् परे होने पर दीर्घ आकारान्त अङ्ग के आकार का लोप होता है। जैसे पा धातु से तस् (अपित् लिट् होने से कित्, और अजादि) परे होने पर आकार का लोप होकर तथा रुत्व-विसर्ग होकर पपतुः रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.65

ईत् यति

īt yati

'यत्' प्रत्यय परे होने पर आकारान्त अङ्ग के स्थान पर ईकार आदेश होता है। जैसे दा धातु से यत् (य) परे होने पर आकार को ईकार होकर दीय, फिर गुण होकर देयम् रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.66

घुमास्थागापाजहातिसां हलि

ghumāsthāgāpājahātisāṁ hali

हलादि कित्-ङित् आर्धधातुक प्रत्यय परे होने पर घुसंज्ञक (दा, धा) तथा मा (नापना), स्था (ठहरना), गा (गाना), पा (पीना), हा (त्यागना) और सा (नष्ट करना) - इन धातुओं के आकार के स्थान पर ईकार आदेश होता है। जैसे अधि+गा+स्(हलादि ङित्) से अधि+गी+स्, फिर षत्व-ष्टुत्व होकर अध्यगीष्ट रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.67

एर्लिङि

erliṅi

आर्धधातुक कित्-लिङ् प्रत्यय परे होने पर घुसंज्ञक तथा मा, स्था, गा, पा, हा और सो (अन्त करना) धातुओं के आकार के स्थान पर एकार आदेश होता है। जैसे पा धातु से आशीर्लिङ् में यासुट् (कित्) परे होने पर आकार को एकार होकर पेयात् रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.68

वा अन्यस्य संयोग आदेः

vā anyasya saṁyoga ādeḥ

आर्धधातुक कित्-लिङ् परे होने पर, घु, मा, स्था, गा, पा, हा और सो को छोड़कर, अन्य संयोगादि (जिसके आरम्भ में संयुक्त व्यंजन हो) आकारान्त अङ्ग के आकार के स्थान पर विकल्प से ऐकार आदेश होता है। जैसे ग्लै धातु से ग्लायात् रूप में आकार को ऐकार होकर ग्लेयात् रूप भी सिद्ध होता है।

श्लोक 4.69

न ल्यपि

na lyapi

ल्यप् प्रत्यय परे होने पर घुसंज्ञक तथा मा, स्था, गा, हा (ओहाक्) और सा धातुओं को पूर्वसूत्रों से विहित ईकार-आदेश नहीं होता। जैसे प्रदाय, प्रधाय, प्रमाय, प्रस्थाय, प्रगाय, प्रहाय, अवसाय रूप सिद्ध होते हैं, जिनमें आकार ज्यों का त्यों बना रहता है।

श्लोक 4.70

मयतेरित् अन्यतरस्यां

mayaterit anyatarasyāṁ

'मेङ्' (बदलना/जाना) धातु के स्थान में ल्यप् प्रत्यय परे होने पर विकल्प से 'इत्' (इकार) आदेश होता है। जैसे अपमित्य और अपमाय दोनों रूप सिद्ध हैं।

श्लोक 4.71

लुङ्लिङ् लृङ्क्षु अट् उदात्तः

luṅliṅ lṛṅkṣu aṭ udāttaḥ

लुङ्, लङ् और लृङ् - इन तीन लकारों में से कोई भी परे होने पर अङ्ग को 'अट्' का आगम होता है, और वह उदात्त स्वरवाला होता है (टकार होने से यह अङ्ग का आदि अवयव बनता है)। जैसे भू धातु से लङ् में अट्-आगम, तिप्, शप्, गुण आदि होकर अभवत् रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.72

आट् अच् आदीणां

āṭ ac ādīṇāṁ

लुङ्, लङ् और लृङ् परे होने पर स्वरादि (अजादि) अङ्ग को 'आट्' का आगम होता है, जो उदात्त होता है (यह पूर्वसूत्र से प्राप्त अट् का बाध करता है)। जैसे अत् धातु से लङ् में आट्-आगम, वृद्धि-आकार व इकार-लोप होकर आतत् रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.73

छन्दसि अपि दृश्यते

chandasi api dṛśyate

छन्दोविषयक (वैदिक) प्रयोग में स्वरादि से भिन्न धातुओं को भी कभी-कभी 'आट्' का आगम देखा जाता है। जैसे आवः, आनक्, आयुनक् आदि रूप वेद में प्रयुक्त हैं।

श्लोक 4.74

न माङ्योगे

na māṅyoge

'माङ्' (निषेधसूचक अव्यय) के योग में अट् और आट् - दोनों आगम नहीं होते। जैसे 'मा भूत्' में लुङ् के प्रथमपुरुष-एकवचन में अट्-आगम न होने से 'अभूत्' न होकर 'भूत्' रूप ही रहता है।

श्लोक 4.75

बहुलं छन्दस्य् अमाङ्योगे अपि

bahulaṁ chandasy amāṅyoge api

छन्दोविषय प्रयोग में माङ् के योग में भी बहुलता (विविध रूप से) अट्-आट् का आगम होता है, और माङ् का योग न होने पर भी कभी उनका अभाव देखा जाता है। जैसे 'मा अभित्थाः', 'मा आवः' आदि रूप वेद में प्रयुक्त हैं।

श्लोक 4.76

इरयः रे

irayaḥ re

छन्दोविषय प्रयोग में 'इरे' प्रत्यय के स्थान पर बहुलता से 'रे' आदेश होता है। जैसे दध्रे, दधिरे - दोनों प्रकार के रूप वेद में प्रयुक्त मिलते हैं।

श्लोक 4.77

अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङ् उनङौ

aci śnudhātubhruvāṁ yvoriyaṅ unaṅau

अजादि प्रत्यय परे होने पर श्नु-प्रत्ययान्त अङ्ग, इकारान्त/उकारान्त धातुरूप तथा 'भ्रू' शब्द के अन्त्य यकार अथवा वकार के स्थान पर क्रमशः 'इयङ्' और 'उवङ्' आदेश होते हैं। जैसे वी+अन्ति=वियन्ति, क्षि+अ=क्षिय, धी+अ=धिय आदि रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 4.78

अभ्यासस्य असवर्णे

abhyāsasya asavarṇe

असवर्ण (भिन्न-जातीय) स्वर परे होने पर अभ्यास (द्वित्व से बने पहले अंश) के इकार और उकार के स्थान पर क्रमशः 'इयङ्' और 'उवङ्' आदेश होते हैं। जैसे इण् धातु से लिट् में द्वित्वादि होकर इ+आय्+अ में असवर्ण अकार परे होने पर अभ्यास इकार को इयङ् होकर इयाय रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.79

स्त्रियाः

striyāḥ

अजादि प्रत्यय परे होने पर 'स्त्री' शब्द के स्थान पर 'इयङ्' आदेश होता है। जैसे स्त्रियौ, स्त्रियः रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 4.80

वा अंशसोः

vā aṁśasoḥ

अम् और शस् प्रत्यय परे होने पर 'स्त्री' शब्द के स्थान पर विकल्प से 'इयङ्' आदेश होता है। जैसे स्त्रीं पश्य/स्त्रियं पश्य (अम्), तथा स्त्रीः पश्य/स्त्रियः पश्य (शस्) - दोनों रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 4.81

इणः यण्

iṇaḥ yaṇ

अजादि प्रत्यय परे होने पर 'इण्' (जाना) धातु के इकार के स्थान पर यकार (यण्) आदेश होता है। जैसे इण् धातु से लट् के प्रथमपुरुष-बहुवचन में झि परे होने पर इकार को यकार होकर यन्ति रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.82

एः अनेक अचः असंओगऊर्वस्य

eḥ aneka acaḥ asaṁogaūrvasya

स्वर (अच्) प्रत्यय परे होने पर, संयोग से पूर्व न होनेवाले (असंयोगपूर्व) अनेकाच् (एकाधिक स्वरवाले) अङ्ग के अन्त्य इकार/ईकार आदि के स्थान पर यण् (य्, व् आदि) आदेश होता है। जैसे बिभी+अति=बिभ्यति, नेनी+अति=नेन्यति, दीधी+आते=दीध्याते।

श्लोक 4.83

ओः सुपि

oḥ supi

अजादि सुप् प्रत्यय परे होने पर अनेकाच् अङ्ग के अन्त्य उकार/ऊकार के स्थान पर भी यण् (वकार) आदेश होता है। जैसे खलप्वौ, खलप्वः; शतस्वौ, शतस्वः; सकृल्ल्वौ, सकृल्ल्वः रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 4.84

वर्षाभ्वः च

varṣābhvaḥ ca

अजादि सुप् प्रत्यय परे होने पर 'वर्षाभू' शब्द के स्थान पर भी यण् आदेश होता है। जैसे वर्षाभ्वौ, वर्षाभ्वः रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 4.85

न भूसुधियोः

na bhūsudhiyoḥ

अजादि सुप् प्रत्यय परे होने पर 'भू' और 'सुधी' शब्दों के स्थान पर यण् आदेश नहीं होता। जैसे प्रतिभुवौ, प्रतिभुवः; सुधियौ, सुधियः रूप सिद्ध होते हैं (यण् न होकर मूल स्वर ज्यों का त्यों रहता है)।

श्लोक 4.86

छन्दसि उभयथा

chandasi ubhayathā

छन्दोविषय प्रयोग में 'भू' और 'सुधी' शब्दों के स्थान पर यण्-आदेश तथा उसका अभाव - दोनों रूप वैकल्पिक रूप से देखे जाते हैं। जैसे विभ्वम्/विभुवम्, सुध्यो हव्यमग्ने/सुधियो हव्यमग्ने आदि।

श्लोक 4.87

हुश्नुवोः सार्वधातुके

huśnuvoḥ sārvadhātuke

अजादि सार्वधातुक प्रत्यय परे होने पर 'हु' (होम करना) धातु तथा अनेकाच् श्नु-प्रत्ययान्त, असंयोगपूर्व उकारान्त अङ्ग के स्थान पर यण् आदेश होता है। जैसे सुनु+शतृ=सुन्वन्, सुनु+शानच्=सुन्वानः; स्तृणु+शतृ=स्तृण्वन्, स्तृणु+शानच्=स्तृण्वानः।

श्लोक 4.88

भुवः वुक् लुङ्लिटोः

bhuvaḥ vuk luṅliṭoḥ

लुङ् और लिट् लकार के प्रत्यय का 'अच्' (स्वर) परे आने पर 'भू' धातु को 'वुक्' का आगम होता है, जिसमें 'उक्' भाग को इत्-संज्ञा प्राप्त है (अतः वकार ही शेष रहता है)। जैसे भू+अ में वुक्-आगम होकर भुव रूप बनता है, जो आगे अभूवन्, बभूव आदि रूपों का आधार है।

श्लोक 4.89

ऊत् उपधायाः गोहः

ūt upadhāyāḥ gohaḥ

गुहू (गुह्) धातु की उपधा को स्वरादि प्रत्यय परे रहने पर दीर्घ ऊकार आदेश होता है; जैसे नि+गुह्+शप्+ते से निगूहते रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.90

दोषः णौ

doṣaḥ ṇau

णिच् प्रत्यय परे रहने पर दुष् धातु की उपधा को दीर्घ ऊकार आदेश होता है; जैसे दुष्+णिच् से दूषयति, दूषयतः, दूषयन्ति रूप बनते हैं।

श्लोक 4.91

वा चित्तविरागे

vā cittavirāge

जब दुष् धातु का प्रयोग चित्त या मन के विकार (द्वेष, विराग) के अर्थ में हो, तब णिच् परे रहने पर उपधा को ऊकार आदेश विकल्प से होता है; इस प्रकार दूषयति के साथ दोषयति रूप भी सिद्ध होता है।

श्लोक 4.92

ं इतां ह्रस्वः

ṁ itāṁ hrasvaḥ

णिच् प्रत्यय परे रहने पर मित्-संज्ञक धातुओं (जैसे घट्) की उपधा को ह्रस्व स्वर आदेश होता है, वृद्धि नहीं; उदाहरणार्थ घट् धातु से घटयति रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.93

चिण्णमुलोर्दीर्घः अन्यतरस्यां

ciṇṇamulordīrghaḥ anyatarasyāṁ

चिण् (कर्मवाच्य लुङ् का प्रत्यय) और णमुल् प्रत्यय परे रहने पर मित् धातुओं की उपधा को विकल्प से दीर्घ आदेश भी हो सकता है; जैसे शमिष्यते के साथ शामिष्यते रूप भी बनता है।

श्लोक 4.94

खचि ह्रस्वः

khaci hrasvaḥ

खच् प्रत्यय से युक्त णि परे रहने पर अङ्ग की उपधा को ह्रस्व आदेश होता है; द्विषन्तपः, परन्तपः, पुरन्दरः जैसे रूप इसी नियम से सिद्ध होते हैं।

श्लोक 4.95

ह्लादः निष्ठायां

hlādaḥ niṣṭhāyāṁ

निष्ठा प्रत्यय (क्त/क्तवतु) परे रहने पर ह्लाद् धातु की उपधा को ह्रस्व आदेश होता है; जैसे प्रह्लन्नः, प्रह्लन्नवान् रूप बनते हैं।

श्लोक 4.96

छादेर्घे अद्वि उपसर्गस्य

chāderghe advi upasargasya

यदि छद् धातु के पहले दो उपसर्ग न लगे हों, तो घ प्रत्यय परे रहने पर उसकी उपधा को ह्रस्व आदेश होता है; जैसे दन्तच्छद (होंठ) रूप इसी से बनता है, किन्तु दो उपसर्ग होने पर यह ह्रस्वादेश नहीं होता।

श्लोक 4.97

इस्मन्त्रंक्विषु च

ismantraṁkviṣu ca

इस्, मन्, त्रन् और क्विन् प्रत्यय परे रहने पर भी छद् धातु की उपधा को ह्रस्व आदेश होता है; जैसे छदिः, छद्म, छत्रम्, धामच्छत्, उपच्छत् आदि रूप बनते हैं।

श्लोक 4.98

गमहनजनखनघसां लोपः क्ङ्इति अनङि

gamahanajanakhanaghasāṁ lopaḥ kṅiti anaṅi

जब अङ्-आदेश से भिन्न कोई स्वरादि कित् या ङित् प्रत्यय परे हो, तब गम्, हन्, जन्, खन् और घस् धातुओं की उपधा का लोप हो जाता है; जैसे लिट् लकार में गम् धातु से अतुस् प्रत्यय परे जग्मतुः रूप बनता है।

श्लोक 4.99

तनिपत्योः छन्दसि

tanipatyoḥ chandasi

वेद-विषयक प्रयोगों में स्वरादि कित्-ङित् प्रत्यय परे रहने पर तन् और पत् धातुओं की भी उपधा का लोप होता है; जैसे तन्त्रिरे, पप्तिम जैसे वैदिक रूप बनते हैं।

श्लोक 4.100

घसिभसोर्हलि च

ghasibhasorhali ca

वेद-विषय में हलादि तथा अजादि दोनों प्रकार के कित्-ङित् प्रत्यय परे रहने पर घस् और भस् धातुओं की उपधा का भी लोप होता है; जैसे बभस्+तः से बभ्स्तः रूप बनता है।

श्लोक 4.101

हुझल्भ्यः हेर्धिः

hujhalbhyaḥ herdhiḥ

हु धातु से तथा झल् वर्ण में अन्त होने वाली धातुओं से परे हि प्रत्यय के स्थान पर धि आदेश होता है; जैसे जुहुधि, भिन्द्धि रूप बनते हैं।

श्लोक 4.102

श्रुशृणुपॄकृवृभ्यः छन्दसि

śruśṛṇupṝkṛvṛbhyaḥ chandasi

वेद-विषय में श्रु, शृणु, पॄ, कृ और वृ धातुओं से परे हि प्रत्यय के स्थान पर भी धि आदेश होता है; जैसे श्रुधी, शृणुधी, पूर्धि, कृधि, अपावृधि आदि रूप बनते हैं।

श्लोक 4.103

अङ्इत् अः च

aṅit aḥ ca

वेद-विषय में जिन धातुओं के अन्त में इकार (इत्) नहीं है, ऐसी अनित् धातुओं से परे भी हि के स्थान पर धि आदेश होता है; जैसे रारन्धि, युयोध्यस्मत् जैसे रूप।

श्लोक 4.104

चिणः लुक्

ciṇaḥ luk

चिण् प्रत्यय (कर्मवाच्य लुङ्) के बाद आने वाले तकार का लुक् अर्थात् पूर्ण लोप हो जाता है; जैसे अजनि रूप में इकार के बाद के तकार का लोप होकर यह रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.105

अतः हेः

ataḥ heḥ

अकारान्त अङ्ग से परे हि (आज्ञार्थक प्रत्यय) का लोप हो जाता है; जैसे भव+हि से भव रूप बनता है।

श्लोक 4.106

उतः च प्रत्ययात् असंयोगऊर्वात्

utaḥ ca pratyayāt asaṁyogaūrvāt

जब अङ्ग के अन्त में असंयुक्त उकारान्त प्रत्यय (जैसे श्नु) हो, तब उसके बाद भी हि का लोप हो जाता है; जैसे शृणु+हि से शृणु रूप बनता है। इसी प्रकार चिनु, सिनु, कुरु।

श्लोक 4.107

लोपः च अस्य अन्यतरस्यां म्वोः

lopaḥ ca asya anyatarasyāṁ mvoḥ

जब उत्तमपुरुष के व (वस्) या म (मस्) प्रत्यय परे हों, तब असंयोगपूर्व उकारान्त श्नु प्रत्यय के उकार का विकल्प से लोप होता है; जैसे शृण्वः/शृणुवः और शृण्मः/शृणुमः दोनों रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 4.108

नित्यं करोतेः

nityaṁ karoteḥ

कृ धातु के बाद यदि म या व से युक्त प्रत्यय परे हो, तो उकारान्त प्रत्यय का लोप अनिवार्य रूप से होता है, वैकल्पिक नहीं; जैसे कृ+वस् से केवल कुर्वः रूप ही सिद्ध होता है।

श्लोक 4.109

ये च

ye ca

कृ धातु के बाद यकारादि प्रत्यय परे होने पर भी उकारान्त प्रत्यय का लोप होता है; जैसे विधिलिङ् में कुर्यात् रूप इसी नियम से सिद्ध होता है।

श्लोक 4.110

अतः उत् सार्वधातुके

ataḥ ut sārvadhātuke

उ-प्रत्ययान्त कृ धातु से परे यदि कित् या ङित् सार्वधातुक प्रत्यय हो, तो उसके अकार के स्थान पर उकार आदेश होता है; जैसे विदाङ्कुरुतात् रूप इसी से बनता है।

श्लोक 4.111

श्न असोरत् लोपः

śna asorat lopaḥ

सार्वधातुक कित्-ङित् प्रत्यय परे रहने पर श्न प्रत्यय और अस् (होना) धातु के अकार का लोप हो जाता है; जैसे अस्+तस् से स्तः रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.112

श्ना अभ्यस्तयोरातः

śnā abhyastayorātaḥ

कित्-ङित् सार्वधातुक प्रत्यय परे रहने पर श्ना प्रत्यय और द्वित्व (अभ्यस्त) अङ्गों के आकार का लोप होता है; जैसे हा धातु से जहति रूप इसी से बनता है।

श्लोक 4.113

ई हलि अ घोः

ī hali a ghoḥ

हलादि कित्-ङित् सार्वधातुक प्रत्यय परे रहने पर श्ना तथा अभ्यस्त अङ्ग के आकार के स्थान पर ईकार आदेश होता है, परन्तु घुसंज्ञक धातुओं में ऐसा नहीं होता; जैसे हा+तस् से जहीतः रूप बनता है।

श्लोक 4.114

इत् दरिद्रस्य

it daridrasya

हलादि कित्-ङित् सार्वधातुक प्रत्यय परे रहने पर दरिद्रा धातु के अन्त्य आकार के स्थान पर इकार आदेश होता है; जैसे दरिद्रा+तः से दरिद्रितः रूप बनता है।

श्लोक 4.115

भियः अन्यतरस्यां

bhiyaḥ anyatarasyāṁ

हलादि कित्-ङित् सार्वधातुक प्रत्यय परे रहने पर भी (डरना) धातु के ईकार के स्थान पर विकल्प से ह्रस्व इकार आदेश होता है; जैसे बिभितः और बिभीतः दोनों रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 4.116

जहातेः च

jahāteḥ ca

हलादि कित्-ङित् सार्वधातुक प्रत्यय परे रहने पर हा (त्यागना) धातु के आकार के स्थान पर भी विकल्प से इकार आदेश होता है; जैसे जहितः रूप बनता है।

श्लोक 4.117

आ च हौ

ā ca hau

हि (आज्ञार्थक) प्रत्यय परे होने पर हा धातु के स्थान पर विकल्प से आकार आदेश होता है; जैसे जहाहि रूप इसी नियम से सिद्ध होता है।

श्लोक 4.118

लोपः यि

lopaḥ yi

यकारादि कित्-ङित् सार्वधातुक प्रत्यय परे रहने पर हा धातु के आकार का लोप हो जाता है; जैसे विधिलिङ् में जह्यात् रूप इसी से बनता है।

श्लोक 4.119

घु असोरेत् हौ भ्यासओपः च

ghu asoret hau bhyāsaopaḥ ca

हि प्रत्यय परे रहने पर घुसंज्ञक धातुओं तथा अस् (होना) धातु के अन्त्य स्वर के स्थान पर एकार आदेश होता है और उनके द्वित्व (अभ्यास) का भी लोप हो जाता है; जैसे अस्+हि से एधि रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.120

अतः एकहल्मध्ये अणादेश आदेर्लिटि

ataḥ ekahalmadhye aṇādeśa āderliṭi

कित् लिट् (परोक्ष भूतकाल) प्रत्यय परे रहने पर, जिस अङ्ग के आदि में कोई आदेश नहीं हुआ है, उसके दो असंयुक्त व्यंजनों के बीच स्थित अकार के स्थान पर एकार आदेश होता है; जैसे पपठ्+अतुः से पेठतुः रूप बनता है।

श्लोक 4.121

थलि च स इटि

thali ca sa iṭi

यदि इट् सहित थल् प्रत्यय परे हो, तो भी जिस अङ्ग के आदि में लिट्-निमित्तक आदेश न हुआ हो, उसके असंयुक्त व्यंजनों के बीच के अकार को एकार होता है और अभ्यास का लोप होता है; जैसे नद् धातु से नेदिथ रूप बनता है।

श्लोक 4.122

तॄफलभजत्रपः च

tṝphalabhajatrapaḥ ca

कित् लिट् तथा इट्युक्त थल् परे रहने पर तॄ (तैरना), फल् (फलना), भज् (सेवा करना) और त्रप् (लज्जित होना) धातुओं के अकार के स्थान पर भी एकार आदेश होता है और अभ्यास का लोप होता है; जैसे त्रप् से त्रेपे रूप सिद्ध होता है।

श्लोक 4.123

राधः हिंसायां

rādhaḥ hiṁsāyāṁ

जब राध् धातु का प्रयोग हिंसा (पीड़ा पहुँचाना) के अर्थ में हो, तब कित्-ङित् लिट् या सेट् थल् परे रहने पर उसके अवर्ण (अ) के स्थान पर भी एकार आदेश तथा अभ्यास का लोप होता है; जैसे रिध्+स से रित्स रूप बनता है।

श्लोक 4.124

वा जॄभ्रमुत्रसां

vā jṝbhramutrasāṁ

कित्-ङित् लिट् या सेट् थल् परे रहने पर जॄ (जीर्ण होना), भ्रमु (घूमना) और त्रस् (डरना) धातुओं के ह्रस्व अकार के स्थान पर विकल्प से एकार आदेश होता है और अभ्यास का लोप भी विकल्प से होता है; जैसे त्रस् से त्रेसतुः रूप बनता है।

श्लोक 4.125

फणां च सप्ताणां

phaṇāṁ ca saptāṇāṁ

कित्-ङित् लिट् तथा इडागमसहित थल् प्रत्यय परे रहने पर फण् आदि सात धातुओं के अकार के स्थान में भी विकल्प से एकार आदेश और अभ्यास का लोप होता है; जैसे फेणिथ और पफणिथ दोनों रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 4.126

न शसददव् आदिगुणाणां

na śasadadav ādiguṇāṇāṁ

शस्, दद् तथा वकारादि धातुओं एवं गुण के अर्थ में प्रयुक्त शब्दों में उक्त एकार आदेश तथा अभ्यास-लोप नहीं होते; जैसे दद् धातु का रूप दददे ही बनता है।

श्लोक 4.127

अर्वणः तृ असौ अनञः

arvaṇaḥ tṛ asau anañaḥ

यदि अर्वन् (घोड़ा) शब्द के पहले नकारात्मक उपसर्ग नञ् न हो, तो उसके स्थान पर तृ आदेश होता है; जैसे अर्वन्तौ, अर्वतः, अर्वता आदि रूप बनते हैं।

श्लोक 4.128

मघवा बहुलं

maghavā bahulaṁ

मघवन् (इन्द्र का एक नाम) शब्द में उक्त तृ-आदेश बहुधा अर्थात् विकल्प से होता है; जैसे मघवन्तः के साथ-साथ मघवानः रूप भी सिद्ध होता है।

श्लोक 4.129

भस्य

bhasya

यह सूत्र आगामी सूत्रों के लिए भ-संज्ञक अंग का अधिकार (विषय-निर्धारण) स्थापित करता है, अर्थात् आगे के अनेक सूत्र भ-संज्ञक अंग से सम्बन्धित नियम बताएँगे।

श्लोक 4.130

पादः पद्

pādaḥ pad

पाद् शब्द से अन्त होने वाले भसंज्ञक अङ्ग के स्थान पर पत् आदेश होता है; जैसे व्याघ्रपाद् शब्द से वैयाघ्रपद्यः रूप बनता है।

श्लोक 4.131

वसोः सम्प्रसारणं

vasoḥ samprasāraṇaṁ

वसु (वस्) प्रत्यय से अन्त होने वाले भसंज्ञक अङ्ग में सम्प्रसारण (व् के स्थान पर उकार) होता है; जैसे विद्वस्+अस् से विदुषः रूप बनता है।

श्लोक 4.132

वाहः ऊठ्

vāhaḥ ūṭh

भसंज्ञक वाह् शब्द के स्थान पर सम्प्रसारण करते हुए ऊठ् (दीर्घ ऊकार) आदेश होता है; जैसे विश्ववाह् से विश्व+ऊ+आह् बनकर आगे विश्वौढः जैसे रूप बनते हैं।

श्लोक 4.133

श्वन्युवन्मघोणां अतद्धिते

śvanyuvanmaghoṇāṁ ataddhite

श्वन्, युवन् और मघवन् शब्दों में, जब तद्धित से भिन्न प्रत्यय परे हो, तब सम्प्रसारण हो जाता है; जैसे शुनः, यूनः, मघोनः रूप बनते हैं।

श्लोक 4.134

अत् लुपः अनः

at lupaḥ anaḥ

भसंज्ञक अङ्ग के अन्त्य अवयव अन् के ह्रस्व अकार का लोप होता है; जैसे राजन् शब्द से राज्ञः, राज्ञा, राज्ञे रूप बनते हैं।

श्लोक 4.135

षपूर्वहन्धृतराज्ञां अणि

ṣapūrvahandhṛtarājñāṁ aṇi

अण् प्रत्यय परे रहने पर षकार-पूर्वक अन्-अन्तवाले शब्दों, हन् धातु-अन्तवाले शब्दों तथा धृतराजन् शब्द के अकार का लोप होता है; जैसे उक्षन् से औक्ष्णः, भ्रूणहन् से भ्रौणघ्नः, धृतराजन् से धार्तराज्ञः रूप बनते हैं।

श्लोक 4.136

विभाषा ङिश्योः

vibhāṣā ṅiśyoḥ

सप्तमी के ङि प्रत्यय तथा शी (स्त्रीलिङ्ग) परे रहने पर अङ्ग के अन् के अकार का लोप विकल्प से होता है; जैसे राज्ञि और राजनि दोनों रूप, साम्नी और सामनी दोनों रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 4.137

न संयोगात् व म् अन्तात्

na saṁyogāt va m antāt

यदि व् या म् वर्ण से पहले व्यंजन-संयोग हो, तो उसके बाद आने वाले अन् के अकार का लोप नहीं होता; जैसे पर्वन् से पर्वणा, पर्वणे और चर्मन् से चर्मणा, चर्मणे रूप बनते हैं।

श्लोक 4.138

अचः

acaḥ

जिसका नकार पहले ही लुप्त हो चुका है, ऐसी भसंज्ञक अञ्चु (अच्) धातु के ह्रस्व अकार का भी लोप हो जाता है; जैसे दधि+अच्+अण् से दाधीचः रूप बनता है।

श्लोक 4.139

उदः ईत्

udaḥ īt

उद् उपसर्ग से परे रहने पर, नकार-लुप्त अञ्चु धातु के भसंज्ञक अङ्ग के अकार के स्थान पर लोप के बदले ईकार आदेश होता है; जैसे उद्+अच्+अस् से उदीचः रूप बनता है।

श्लोक 4.140

आतः धातोः

ātaḥ dhātoḥ

आकारान्त धातु से बने भसंज्ञक अंग के अन्तिम आकार का लोप होता है; जैसे विश्वपा+अस् से विश्वपः रूप बनता है, जिसमें पा धातु का अन्त्य आकार लुप्त हो जाता है।

श्लोक 4.141

मन्त्रेषु आङि आदेरात्मनः

mantreṣu āṅi āderātmanaḥ

वैदिक मन्त्रों में आङ् (आ) उपसर्ग परे रहने पर आत्मन् शब्द के आदि अक्षर आ का लोप होता है; जैसे त्मना देवेषु, त्मना सोमेषु जैसे वैदिक प्रयोग।

श्लोक 4.142

ति विंशतेर्ड्इति

ti viṁśaterḍiti

जिस प्रत्यय का डकार इत्संज्ञक हो (डित्), वह परे रहने पर भसंज्ञक विंशति शब्द के अन्त्य ति भाग का लोप होता है; जैसे विंशति+डट् से विंशः, एकविंशः रूप बनते हैं।

श्लोक 4.143

टेः

ṭeḥ

डित् प्रत्यय परे रहने पर भसंज्ञक अंग की टि (अंतिम अच् से आगे का भाग) का सामान्यतः लोप होता है; जैसे कुमुद्वान्, नड्वान्, त्रिंशक आदि रूप इसी नियम से बनते हैं।

श्लोक 4.144

नः तद्धिते

naḥ taddhite

नकारान्त भसंज्ञक अङ्ग की टि (अन्तिम अच् से आगे का भाग) का तद्धित प्रत्यय परे रहने पर लोप होता है; जैसे उपराजन्+अ से उपराजम् रूप बनता है।

श्लोक 4.145

अह्नः टखोरेव

ahnaḥ ṭakhoreva

अहन् (दिन) शब्द की टि का लोप केवल ट (अ) और ख प्रत्यय परे रहने पर ही होता है, अन्यत्र नहीं; जैसे द्व्यहन्+ट से द्व्यहः और द्व्यहन्+ख से द्व्यहीनः रूप बनते हैं।

श्लोक 4.146

ओर्गुणः

orguṇaḥ

तद्धित प्रत्यय परे रहने पर उकारान्त भसंज्ञक अङ्ग के उकार को गुण (ओकार) आदेश होता है; जैसे औपगु+अण् से औपगवः रूप बनता है।

श्लोक 4.147

ढे लोपः अकद्र्वाः

ḍhe lopaḥ akadrvāḥ

ढ (एय) प्रत्यय परे रहने पर, कद्रू शब्द को छोड़कर, अन्य भसंज्ञक उवर्णान्त अंगों के उकार का लोप हो जाता है; जैसे कमण्डलु+ढक् से कामण्डलेयः और जम्बू+ढक् से जाम्बेयः रूप बनते हैं।

श्लोक 4.148

यस्य ईति च

yasya īti ca

ईकारादि तथा तद्धित प्रत्यय परे रहने पर भसंज्ञक अंग के अन्त्य इवर्ण या अवर्ण का लोप होता है; जैसे दक्ष+इञ् से दाक्षिः, विनता+एय से वैनतेयः, कुन्ती+ढक् से कौन्तेयः रूप बनते हैं।

श्लोक 4.149

सूर्यतिष्यागस्त्यमत्स्याणां यः उपधायाः

sūryatiṣyāgastyamatsyāṇāṁ yaḥ upadhāyāḥ

सूर्य, तिष्य, अगस्त्य और मत्स्य शब्दों की उपधा में स्थित यकार का, अण् आदि प्रत्यय परे रहने पर, लोप होता है; जैसे सूर्य से सौरः, तिष्य से तैषः, अगस्त्य से आगस्तः, मत्स्य से मात्सः रूप बनते हैं।

श्लोक 4.150

हलः तद्धितस्य

halaḥ taddhitasya

ईकार (स्त्रीप्रत्यय) परे रहने पर, भसंज्ञक अङ्ग में व्यंजन के बाद आने वाले तद्धित-प्रत्यय के उपधाभूत यकार का लोप होता है; जैसे गार्ग्य+ई से गार्गी, वात्स्य+ई से वात्सी रूप बनते हैं।

श्लोक 4.151

आपत्यस्य च तद्धिते अणाति

āpatyasya ca taddhite aṇāti

आकारादि से भिन्न तद्धित प्रत्यय परे रहने पर, व्यंजन से पहले आने वाले अपत्यवाचक यकार का भी लोप होता है; जैसे गार्ग्य+वुञ् से गार्गकम्, वात्स्य+वुञ् से वात्सकम् रूप बनते हैं।

श्लोक 4.152

क्यच्व्योः च

kyacvyoḥ ca

क्य और च्वि प्रत्यय परे रहने पर भी व्यंजन से पहले आने वाले अपत्यवाचक यकार का लोप होता है; जैसे गार्ग्य+च्वि से गार्गीभूतः, वात्स्य+च्वि से वात्सीभूतः रूप बनते हैं।

श्लोक 4.153

बिल्वक आदिभ्यः छस्य लुक्

bilvaka ādibhyaḥ chasya luk

बिल्वक आदि गणपठित शब्दों के बाद आने वाले भसंज्ञक छ प्रत्यय का, अन्य तद्धित प्रत्यय परे रहने पर, लुक् (सम्पूर्ण लोप) होता है; जैसे बिल्वकीया से बैल्वकाः, वेणुकीया से वैणुकाः रूप बनते हैं।

श्लोक 4.154

तुरिष्ठन्इमनिच्ईयस्सु

turiṣṭhanimanicīyassu

यह सूत्र इष्ठन्, ईयसुन् और इमनिच् प्रत्ययों के अधिकार को आगे के सूत्रों के लिए स्थापित करता है, जिनके परे रहने पर भसंज्ञक अङ्ग की टि का लोप होता है; जैसे करिष्ठः, विजयिष्ठः, वहिष्ठः तथा दोहीयसी जैसे रूप इसी क्षेत्र में बनते हैं।

श्लोक 4.155

टेः

ṭeḥ

इष्ठन्, इमनिच् और ईयसुन् प्रत्यय परे रहने पर भसंज्ञक अङ्ग की टि का लोप होता है; जैसे प्रथु+इमनिच् से प्रथिमन् (प्रथिमा) और महत्+इमनिच् से महिमन् (महिमा) रूप बनते हैं।

श्लोक 4.156

स्थूलदूरयुवन्ह्रस्वक्षिप्रक्षुद्राणां यण् आदि परं पूर्वस्य च गुणः

sthūladūrayuvanhrasvakṣiprakṣudrāṇāṁ yaṇ ādi paraṁ pūrvasya ca guṇaḥ

स्थूल, दूर, युवन्, ह्रस्व, क्षिप्र और क्षुद्र शब्दों में इष्ठन्, ईयसुन् तथा इमनिच् प्रत्यय परे रहने पर यण् वर्ण (य्, व्, र्, ल्) से आगे का अंश लुप्त हो जाता है और शेष रहे पूर्व स्वर को गुण होता है; जैसे स्थूल से स्थविष्ठ, दूर से दविष्ठ, युवन् से यविष्ठ, ह्रस्व से ह्रसिष्ठ, क्षिप्र से क्षेपिष्ठ, क्षुद्र से क्षोदिष्ठ रूप बनते हैं।

श्लोक 4.157

प्रियस्थिरस्फिरौरुबहुलगुरुवृद्धतृप्रदीर्घवृन्दारकाणां प्रस्थस्फवर्बंहिगर्वर्षित्रप्द्राघिवृन्दाः

priyasthirasphiraurubahulaguruvṛddhatṛpradīrghavṛndārakāṇāṁ prasthasphavarbaṁhigarvarṣitrapdrāghivṛndāḥ

इष्ठन्, ईयसुन् और इमनिच् प्रत्यय परे रहने पर प्रिय, स्थिर, स्फिर, उरु, बहुल, गुरु, वृद्ध, तृप्र, दीर्घ और वृन्दारक शब्दों के स्थान पर क्रमशः प्र, स्थ, स्फ, वर्, बंहि, गर्, वषि, त्रप्, द्राघि और वृन्द आदेश होते हैं; जैसे प्रिय से प्रेष्ठः/प्रेयान्, स्थिर से स्थेष्ठः/स्थेयान् रूप बनते हैं।

श्लोक 4.158

बहोर्लोपः भू च बहोः

bahorlopaḥ bhū ca bahoḥ

बहु शब्द के आगे इष्ठन्, इमनिच् और ईयसुन् प्रत्ययों के आदि भाग का लोप होता है और बहु के स्थान पर भू आदेश होता है; जैसे बहु+इमनिच् से भूमन् (भूमा) रूप बनता है।

श्लोक 4.159

इष्ठस्य यिट् च

iṣṭhasya yiṭ ca

भू के साथ इष्ठन् प्रत्यय के इष्ठ भाग को यिट् (यि) आगम होता है; जैसे भू+ष्ठ से भूयिष्ठ रूप बनता है, जिससे प्रथमा एकवचन में भूयिष्ठः सिद्ध होता है।

श्लोक 4.160

ज्यात् आत् ईयसः

jyāt āt īyasaḥ

ज्य (ज्येष्ठ का मूल रूप) शब्द के बाद ईयस्/ईयसुन् प्रत्यय के ईकार के स्थान पर आकार आदेश होता है; जैसे ज्य+ईयस् से ज्यायस् और अन्ततः ज्यायान् रूप बनता है।

श्लोक 4.161

र ऋत् अः हलादेर्लघोः

ra ṛt aḥ halāderlaghoḥ

इष्ठन्, इमनिच् और ईयसुन् प्रत्यय परे रहने पर, जिस अङ्ग के आदि में व्यंजन हो, उसके ह्रस्व ऋकार के स्थान पर र आदेश होता है; जैसे पृथु+इमनिच् से प्रथिमन् रूप बनता है।

श्लोक 4.162

विभाषा ऋजोः छन्दसि

vibhāṣā ṛjoḥ chandasi

वेद-विषय में इष्ठन्, इमनिच् और ईयसुन् प्रत्यय परे रहने पर ऋजु शब्द के ऋकार के स्थान पर विकल्प से र आदेश होता है; जैसे रजिष्ठः और ऋजिष्ठः दोनों रूप वैदिक प्रयोग में मिलते हैं।

श्लोक 4.163

प्रकृत्या एक अच्

prakṛtyā eka ac

इष्ठन्, इमनिच् और ईयसुन् प्रत्यय परे रहने पर, यदि अङ्ग में केवल एक ही स्वर हो, तो वह अङ्ग यथावत् बना रहता है और उस पर टि-लोप जैसे कार्य नहीं होते; जैसे श्रि धातु से गुण होकर श्रेष्ठः रूप बनता है।

श्लोक 4.164

इन् अणि अनपत्ये

in aṇi anapatye

जब अण् प्रत्यय अपत्य (सन्तान) से भिन्न किसी अर्थ में प्रयुक्त हो, तब इन्-प्रत्ययान्त अङ्ग यथावत् बना रहता है, अर्थात् उसकी टि का लोप नहीं होता; जैसे गर्भिन्+अण् से गार्भिणम् रूप बनता है।

श्लोक 4.165

गाथिन्विदथिन्केशिन्गणिन्पणिनः च

gāthinvidathinkeśingaṇinpaṇinaḥ ca

अण् प्रत्यय परे रहने पर गाथिन्, विदथिन्, केशिन्, गणिन् और पणिन् शब्द भी बिना किसी परिवर्तन के बने रहते हैं; जैसे गाथिनः, वैदथिनः, कैशिनः, गाणिनः, पाणिनः रूप बनते हैं।

श्लोक 4.166

संयोग आदिः च

saṁyoga ādiḥ ca

जिस इन्-प्रत्ययान्त अङ्ग के आदि में व्यंजन-संयोग हो, वह भी अण् प्रत्यय परे रहने पर बिना परिवर्तन के बना रहता है; जैसे मद्रिन्+अण् से माद्रिणः, वज्रिन्+अण् से वाज्रिणः रूप बनते हैं।

श्लोक 4.167

अन्

an

अण् प्रत्यय परे रहने पर अन्-प्रत्ययान्त अङ्ग की टि (अन्) भी बिना परिवर्तन के बनी रहती है और उसका लोप नहीं होता; जैसे राजन्+अण् से राजनः (राजा की सन्तान) रूप बनता है।

श्लोक 4.168

ये च अभावकर्मणोः

ye ca abhāvakarmaṇoḥ

कर्म और भाव के अर्थ को छोड़कर अन्य किसी अर्थ में यकारादि तद्धित प्रत्यय परे रहने पर भी अन्-प्रत्ययान्त अङ्ग यथावत् बना रहता है; जैसे राजन्+यत् से राजन्यः रूप बनता है।

श्लोक 4.169

आत्मन्अध्वानौ खे

ātmanadhvānau khe

ख प्रत्यय परे रहने पर आत्मन् और अध्वन् (मार्ग) शब्द भी बिना परिवर्तन के बने रहते हैं; जैसे आत्मन्+ख से आत्मनीनम् रूप बनता है।

श्लोक 4.170

न मपूर्वः अपत्ये अवर्मणः

na mapūrvaḥ apatye avarmaṇaḥ

वर्मन् शब्द को छोड़कर, म-पूर्वक अन्-अन्तवाले अन्य शब्दों में, अपत्यार्थक अण् प्रत्यय परे रहने पर, उक्त प्रकृतिभाव नहीं होता; जैसे सुषामन्+अण् से सौषामः रूप बनता है।

श्लोक 4.171

ब्राह्मः अजातौ

brāhmaḥ ajātau

अपत्यार्थक अण् प्रत्यय परे रहने पर ब्रह्मन् शब्द की टि का लोप निपातन द्वारा होता है (ब्राह्मः रूप बनता है), किन्तु जातिवाचक अर्थ में विहित अण् प्रत्यय परे होने पर यह लोप नहीं होता (ब्राह्मणः रूप बनता है)।

श्लोक 4.172

कार्मः ताच्छील्ये

kārmaḥ tācchīlye

ताच्छील्य (स्वभावगत प्रवृत्ति) के अर्थ में कर्मन् शब्द की टि का लोप निपातन द्वारा होता है; जैसे कर्मन्+ण से कार्मः रूप बनता है।

श्लोक 4.173

औक्षं अनप्त्ये

aukṣaṁ anaptye

सन्तान से भिन्न अर्थ में अण् प्रत्यय परे रहने पर औक्ष शब्द का रूप निपातन द्वारा सिद्ध होता है; जैसे औक्षन्+अण् से औक्षम् रूप बनता है।

श्लोक 4.174

दाण्डिणायनहास्तिणायनआथर्वणिकजैह्माशिनेयवासिनेयनिभ्रौणहत्यधैवत्यसारवैक्ष्वाकमैत्रेयहिरण्मयानि

dāṇḍiṇāyanahāstiṇāyanaātharvaṇikajaihmāśineyavāsineyanibhrauṇahatyadhaivatyasāravaikṣvākamaitreyahiraṇmayāni

दाण्डिनायन, हास्तिनायन, आथर्वणिक, जैह्माशिनेय, वाशिनायनि, भ्रौणहत्य, धैवत्य, सारव, ऐक्ष्वाक, मैत्रेय और हिरण्मय — इन शब्दों की सिद्धि नियमानुसार व्युत्पत्ति के बदले निपातन (सीधे प्रामाणिक रूप में स्वीकृति) द्वारा होती है; जैसे इक्ष्वाकु+अण् से ऐक्ष्वाकः रूप बनता है।

श्लोक 4.175

ऋत्व्यवास्त्व्य वास्त्वमाध्वीहिरण्ययानि छन्दसि

ṛtvyavāstvya vāstvamādhvīhiraṇyayāni chandasi

वेद-विषय में ऋत्व्य, वास्त्व्य, वास्त्व, माध्वी और हिरण्यय शब्दों की सिद्धि भी निपातन द्वारा होती है; जैसे ऋतु-सम्बन्धी अर्थ में ऋत्व्यम् और वास्तु-सम्बन्धी अर्थ में वास्त्व्यम्/वास्त्वः रूप बनते हैं।

सप्तमोऽध्यायः, प्रथमः पादः

श्लोक 1.1

युवोरनाकौ

yuvoranākau

धातु से बने कृदन्त प्रत्ययों 'यु' और 'वु' के स्थान पर क्रमशः 'अन्' और 'अक्' आदेश होता है; जैसे कृ+ण्वुल् से कारकः (करने वाला)।

श्लोक 1.2

आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम्

āyaneyīnīyiyaḥ phaḍhakhachaghāṁ pratyayādīnām

प्रत्यय के आरम्भ में स्थित फ, ढ, ख, छ, घ वर्णों के स्थान पर क्रमशः आयन्, एय्, ईन्, ईय् आदेश होते हैं; जैसे गार्ग्य+फक् से गार्ग्यायणः।

श्लोक 1.3

झोऽन्तः

jho'ntaḥ

प्रत्यय के 'झ्' (बहुवचन-प्रत्यय का अवयव) के स्थान पर 'अन्त्' आदेश होता है; जैसे भू+झि से भवन्ति।

श्लोक 1.4

अदभ्यस्तात्

adabhyastāt

अभ्यस्त (द्वित्व-युक्त) अङ्ग के बाद 'झ्' के स्थान पर 'अत्' आदेश होता है; जैसे हु के अभ्यस्त रूप जुहु+झि से जुह्वति।

श्लोक 1.5

आत्मनेपदेष्वनतः

ātmanepadeṣvanataḥ

अकार-भिन्न अङ्ग से परे आत्मनेपद के 'झ्' के स्थान पर भी 'अत्' आदेश होता है; जैसे एध् धातु से ऐधिषत्।

श्लोक 1.6

शीङो रुट्

śīṅo ruṭ

शीङ् (लेटना) धातु के अङ्ग से परे हुए 'अत्' आदेश से पहले 'रुट्' (र्) का आगम होता है; जैसे शी से शेरते।

श्लोक 1.7

वेत्तेर्विभाषा

vettervibhāṣā

'विद्' (जानना) धातु के बाद उक्त 'रुट्' का आगम विकल्प से होता है; जैसे संविद्रते अथवा संविदते।

श्लोक 1.8

बहुलं छन्दसि

bahulaṁ chandasi

छन्द (वेद) के प्रयोग में उक्त 'रुट्'-आगम बहुलता से (अनियमित रूप से) होता है।

श्लोक 1.9

अतो भिस ऐस्

ato bhisa ais

अकारान्त अङ्ग से परे तृतीया-बहुवचन के 'भिस्' प्रत्यय के स्थान पर 'ऐस्' आदेश होता है; जैसे बाल+भिस् से बालैः।

श्लोक 1.10

बहुलं छन्दसि

bahulaṁ chandasi

छन्द में उक्त 'ऐस्' आदेश बाहुल्येन होता है, यहाँ तक कि अकारान्त-भिन्न अङ्गों में भी; जैसे नद्यैः।

श्लोक 1.11

नेदमदसोरकोः

nedamadasorakoḥ

ककार-रहित 'इदम्' और 'अदस्' शब्दों के 'भिस्' का 'ऐस्' आदेश नहीं होता; जैसे एभिः, अमीभिः।

श्लोक 1.12

टा ङसिङसामिनात्स्याः

ṭā ṅasiṅasāminātsyāḥ

अकारान्त अङ्ग से परे 'टा' को 'इन', 'ङसि' को 'आत्' तथा 'ङस्' को 'स्य' आदेश होता है; जैसे बालेन, बालात्, बालस्य।

श्लोक 1.13

ङेर्यः

ṅeryaḥ

अकारान्त अङ्ग से परे चतुर्थी-एकवचन 'ङे' प्रत्यय को 'य' आदेश होता है; जैसे बालाय।

श्लोक 1.14

सर्वनाम्नः स्मै

sarvanāmnaḥ smai

अकारान्त सर्वनाम शब्द से परे 'ङे' को 'स्मै' आदेश होता है; जैसे सर्वस्मै।

श्लोक 1.15

ङसिङ्योः स्मात्स्मिनौ

ṅasiṅyoḥ smātsminau

अकारान्त सर्वनाम से परे 'ङसि' को 'स्मात्' और 'ङि' को 'स्मिन्' आदेश होता है; जैसे सर्वस्मात्, सर्वस्मिन्।

श्लोक 1.16

पूर्वादिभ्यो नवभ्यो वा

pūrvādibhyo navabhyo vā

पूर्व, पर, अवर, अधर, उत्तर, अपर, दक्षिण, स्व, अन्तर—इन नौ शब्दों के बाद 'स्मात्' और 'स्मिन्' आदेश विकल्प से होते हैं; जैसे पूर्वस्मात् अथवा पूर्वात्।

श्लोक 1.17

जसः शी

jasaḥ śī

अकारान्त सर्वनाम से परे नाम-बहुवचन 'जस्' को 'शी' आदेश होता है; जैसे सर्वे।

श्लोक 1.18

औङ आपः

auṅa āpaḥ

आकारान्त (स्त्रीलिंग) अङ्ग से परे 'औङ्' प्रत्यय को 'शी' आदेश होता है; जैसे रमा+औ से रमे।

श्लोक 1.19

नपुंसकाच्च

napuṁsakācca

नपुंसकलिंग अङ्ग से परे भी 'औङ्' को 'शी' आदेश होता है, जिससे केवल 'ई' शेष रहता है; जैसे फले।

श्लोक 1.20

जश्शसोः शिः

jaśśasoḥ śiḥ

नपुंसकलिंग अङ्ग से परे 'जस्' और 'शस्' प्रत्ययों को 'शि' आदेश होता है; जैसे फलानि।

श्लोक 1.21

अष्टाभ्य औश्

aṣṭābhya auś

अकारान्त-आदेशित 'अष्टन्' शब्द से परे 'जस्' और 'शस्' को 'औश्' आदेश होता है; जैसे अष्टौ तिष्ठन्ति।

श्लोक 1.22

षड्भ्यो लुक्

ṣaḍbhyo luk

षट्-संज्ञक (छह आदि संख्यावाचक) शब्दों से परे 'जस्' और 'शस्' का लोप हो जाता है; जैसे षट्, पञ्च, सप्त।

श्लोक 1.23

स्वमोर्नपुंसकात्

svamornapuṁsakāt

नपुंसकलिंग अङ्ग से परे 'सु' और 'अम्' प्रत्ययों का लोप होता है; जैसे दधि तिष्ठति, मधु पश्य।

श्लोक 1.24

अतोऽम्

ato'm

नपुंसकलिंग अकारान्त अङ्ग से परे 'सु' और 'अम्' प्रत्ययों के स्थान पर 'अम्' आदेश होता है; जैसे ज्ञानम्।

श्लोक 1.25

अद्ड्डतरादिभ्यः पञ्चभ्यः

adḍḍatarādibhyaḥ pañcabhyaḥ

डतर, डतम, अन्य, अन्यतर तथा इतर—इन पाँच नपुंसक अङ्गों से परे 'सु' और 'अम्' के स्थान पर 'अद्' आदेश होता है; जैसे कतरद्।

श्लोक 1.26

नेतराच्छन्दसि

netarācchandasi

छन्द के प्रयोग में 'इतर' शब्द से परे 'सु' और 'अम्' को 'अदङ्' आदेश होता है; जैसे इतरम्।

श्लोक 1.27

युष्मदस्मद्भयां ङसोऽश्

yuṣmadasmadbhayāṁ ṅaso'ś

युष्मद् और अस्मद् शब्दों से परे षष्ठी-एकवचन 'ङस्' को 'अश्' आदेश होता है; जैसे तव, मम।

श्लोक 1.28

ङे प्रथमयोरम्

ṅe prathamayoram

युष्मद् और अस्मद् से परे 'ङे' तथा प्रथमा-द्वितीया के प्रत्ययों को 'अम्' आदेश होता है; जैसे तुभ्यम्, त्वाम्।

श्लोक 1.29

शसो न

śaso na

युष्मद् और अस्मद् से परे 'शस्' को 'न्' आदेश होता है; जैसे युष्मान्, अस्मान्।

श्लोक 1.30

भ्यसो भ्यम्

bhyaso bhyam

युष्मद् और अस्मद् से परे 'भ्यस्' को 'अभ्यम्' आदेश होता है; जैसे युष्मभ्यम्, अस्मभ्यम्।

श्लोक 1.31

पञ्चम्या अत्

pañcamyā at

युष्मद् और अस्मद् से परे पञ्चमी-बहुवचन 'भ्यस्' को 'अत्' आदेश होता है; जैसे युष्मद् गच्छन्ति।

श्लोक 1.32

एकवचनस्य च

ekavacanasya ca

इसी प्रकार पञ्चमी-एकवचन 'ङसि' को भी 'अत्' आदेश होता है; जैसे त्वत्, मत्।

श्लोक 1.33

साम आकम्

sāma ākam

युष्मद् और अस्मद् से परे षष्ठी-बहुवचन 'साम्' को 'आकम्' आदेश होता है; जैसे युष्माकम्, अस्माकम्।

श्लोक 1.34

आत औ णलः

āta au ṇalaḥ

आकारान्त अङ्ग के बाद लिट्-प्रत्यय 'णल्' को 'औ' आदेश होता है; जैसे पा से पपौ।

श्लोक 1.35

तु ह्योस्तातङ्ङाशिष्यन्यतरस्याम्

tu hyostātaṅṅāśiṣyanyatarasyām

आशीर्वाद अर्थ में 'तु' और 'हि' प्रत्ययों को विकल्प से 'तातङ्' आदेश होता है; जैसे भवतात् अथवा भवतु।

श्लोक 1.36

विदेः शतुर्वसुः

videḥ śaturvasuḥ

'विद्' (जानना) धातु के बाद शतृ प्रत्यय को विकल्प से 'वसु' आदेश होता है; जैसे विद्वान् अथवा विदन्।

श्लोक 1.37

समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप्

samāse'nañpūrve ktvo lyap

नञ्-रहित पूर्वपद वाले समास में परवर्ती 'क्त्वा' को 'ल्यप्' आदेश होता है; जैसे प्र+कृत्वा से प्रकृत्य।

श्लोक 1.38

क्त्वापिच्छन्दसि

ktvāpicchandasi

छन्द (वेद) के प्रयोग में समास-पूर्व 'क्त्वा' के स्थान पर विकल्प से 'क्त्वा' और 'ल्यप्' दोनों ही रहते हैं; जैसे उद्धृत्य।

श्लोक 1.39

सुपां सुलुक् पूर्वसवर्णाच्छेयाडाडयायाजालः

supāṁ suluk pūrvasavarṇāccheyāḍāḍayāyājālaḥ

छन्द के प्रयोग में सुप् प्रत्ययों के स्थान पर सु, लुक्, पूर्वसवर्ण, आ, आत्, शे, या, डा, डया, थाच् तथा आल्—इन अनेक रूपों का आदेश होता है; जैसे पन्थाः (पन्थानः के स्थान पर)।

श्लोक 1.40

अमो मश्

amo maś

छन्द में उत्तमपुरुष के 'अम्' (मिप्-आदेश) को 'मश्' आदेश होता है; जैसे वधीम् वृत्रम्।

श्लोक 1.41

लोपस्त आत्मनेपदेषु

lopasta ātmanepadeṣu

छन्द में आत्मनेपद-प्रत्ययों के 'त्' का लोप हो जाता है; जैसे अदुह्र (अदुहत के स्थान पर)।

श्लोक 1.42

ध्वमो ध्वात्

dhvamo dhvāt

छन्द में 'ध्वम्' प्रत्यय को 'ध्वात्' आदेश होता है; जैसे वारयध्वात्।

श्लोक 1.43

यजध्वैनमिति च

yajadhvainamiti ca

छन्द में 'एनम्' परे रहते 'यजध्वम्' के मकार का लोप हो जाता है; जैसे यजध्वैनं प्रियमेधाः।

श्लोक 1.44

तस्य तात्

tasya tāt

लोट् लकार के मध्यमपुरुष-बहुवचन के 'त' प्रत्यय को छन्द में 'तात्' आदेश होता है; जैसे कृणुतात्।

श्लोक 1.45

तप्तनप्तनथनाश्च

taptanaptanathanāśca

छन्द में उक्त 'त' प्रत्यय को तप्, तनप्, तन तथा थन आदेश भी होते हैं; जैसे सुनोत, दधातन।

श्लोक 1.46

इदन्तो मसि

idanto masi

छन्द में उत्तमपुरुष-बहुवचन 'मस्' प्रत्यय को इकार का आगम होता है; जैसे दीपयामसि।

श्लोक 1.47

क्त्वो यक्

ktvo yak

छन्द में 'क्त्वा' प्रत्यय को 'यक्' का आगम होता है; जैसे दत्त्वाय सविता धियः।

श्लोक 1.48

इष्ट्वीनमिति च

iṣṭvīnamiti ca

छन्द में 'इष्ट्वीनम्' शब्द का निपातन होता है, इष्ट्वा के स्थान पर; जैसे इष्ट्वीनं देवान्।

श्लोक 1.49

स्नात्व्यादयश्च

snātvyādayaśca

छन्द में स्नात्वी आदि शब्दों का भी इसी प्रकार निपातन होता है; जैसे स्नात्वी, पीत्वी (स्नात्वा, पीत्वा के स्थान पर)।

श्लोक 1.50

आज्जसेरसुक्

ājjaserasuk

छन्द में अवर्णान्त अङ्ग से परे 'जस्' प्रत्यय को 'असुक्' (अक्) का आगम होता है; जैसे ब्राह्मणासः, सोम्यासः।

श्लोक 1.51

अश्वक्षीरवृषलवणानामात्मप्रीतौ क्यचि

aśvakṣīravṛṣalavaṇānāmātmaprītau kyaci

आत्म-प्रीति (अपने लिए चाहना) अर्थ में अश्व, क्षीर, वृष तथा लवण शब्दों से 'क्यच्' प्रत्यय परे रहते 'असुक्' का आगम होता है; जैसे अश्वस्यति (घोड़ा चाहती है)।

श्लोक 1.52

आमि सर्वनाम्नः सुट्

āmi sarvanāmnaḥ suṭ

अवर्णान्त सर्वनाम से परे षष्ठी-बहुवचन 'आम्' को 'सुट्' का आगम होता है; जैसे सर्वेषाम्।

श्लोक 1.53

त्रेस्त्रयः

trestrayaḥ

'आम्' प्रत्यय परे होने पर 'त्रि' के स्थान पर 'त्रय' आदेश होता है; जैसे त्रयाणाम्।

श्लोक 1.54

ह्रस्वनद्यापो नुट्

hrasvanadyāpo nuṭ

ह्रस्वान्त, नदी-संज्ञक और आबन्त अङ्गों से परे 'आम्' को 'नुट्' का आगम होता है; जैसे बालानाम्।

श्लोक 1.55

षट्चतुर्भ्यश्च

ṣaṭcaturbhyaśca

षट्-संज्ञक शब्दों और 'चतुर्' से परे भी 'आम्' को 'नुट्' का आगम होता है; जैसे षण्णाम्, चतुर्णाम्।

श्लोक 1.56

श्रीग्रामण्योश्छन्दसि

śrīgrāmaṇyośchandasi

छन्द में 'श्री' और 'ग्रामणी' शब्दों से परे भी 'आम्' को 'नुट्' का आगम होता है; जैसे श्रीणाम्।

श्लोक 1.57

गोःपादान्ते

goḥpādānte

ऋचा के पाद के अन्त में स्थित 'गो' शब्द से परे भी 'आम्' को 'नुट्' का आगम होता है; जैसे शूरगोनाम्।

श्लोक 1.58

इदितो नुम् धातोः

idito num dhātoḥ

'इत्'-संज्ञक इकारवाले धातुओं को 'नुम्' (न्) का आगम होता है; जैसे कुडि से कुण्डिता।

श्लोक 1.59

शे मुचादीनाम्

śe mucādīnām

'श' (श्नु) प्रत्यय परे होने पर मुच् आदि आठ धातुओं को 'नुम्' का आगम होता है; जैसे मुच् से मुञ्चति।

श्लोक 1.60

मस्जिनशोर्झलि

masjinaśorjhali

झल् वर्ण परे होने पर मस्ज् (नहाना) और नश् (नाश होना) धातुओं को 'नुम्' का आगम होता है; जैसे नश् से ननंष्ठ।

श्लोक 1.61

रधिजभोरचि

radhijabhoraci

स्वरादि प्रत्यय परे होने पर 'रध्' और 'जभ्' धातुओं को 'नुम्' का आगम होता है; जैसे जभ् से जम्भते।

श्लोक 1.62

नेट्यलिटिरधेः

neṭyaliṭiradheḥ

लिङ्-भिन्न इडादि प्रत्ययों के परे रहने पर 'रध्' धातु को 'नुम्' का आगम नहीं होता; जैसे रधिता।

श्लोक 1.63

रभेरशब्लिटोः

rabheraśabliṭoḥ

शप् और लिट् से भिन्न स्वरादि प्रत्यय परे होने पर 'रभ्' धातु को 'नुम्' का आगम होता है; जैसे आरम्भकः।

श्लोक 1.64

लभेश्च

labheśca

इसी प्रकार 'लभ्' धातु को भी शप्-लिट् से भिन्न स्वरादि प्रत्यय परे रहते 'नुम्' का आगम होता है; जैसे लम्भकः।

श्लोक 1.65

आङो यि

āṅo yi

'आङ्' उपसर्गपूर्वक 'लभ्' धातु को यकारादि प्रत्यय परे रहते 'नुम्' का आगम होता है; जैसे आलम्भ्या।

श्लोक 1.66

उपात्प्रशंसायाम्

upātpraśaṁsāyām

प्रशंसा का अर्थ होने पर 'उप' उपसर्गपूर्वक 'लभ्' को भी यकारादि प्रत्यय परे 'नुम्' का आगम होता है; जैसे उपलम्भ्या विद्या।

श्लोक 1.67

उपसर्गात्खल्घञोः

upasargātkhalghañoḥ

उपसर्गयुक्त 'लभ्' धातु को 'खल्' और 'घञ्' प्रत्यय परे रहते 'नुम्' का आगम होता है; जैसे प्रलम्भः।

श्लोक 1.68

न सुदुर्भ्यां केवलाभ्याम्

na sudurbhyāṁ kevalābhyām

केवल 'सु' अथवा 'दुर्' उपसर्गयुक्त (अन्य उपसर्ग-रहित) 'लभ्' को उक्त 'नुम्' का आगम नहीं होता; जैसे सुलाभः, दुर्लाभः।

श्लोक 1.69

विभाषा चिण्णमुलोः

vibhāṣā ciṇṇamuloḥ

'चिण्' और 'णमुल्' प्रत्यय परे रहते 'लभ्' को 'नुम्' का आगम विकल्प से होता है; जैसे अलाभि, अलम्भि।

श्लोक 1.70

उगिदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः

ugidacāṁ sarvanāmasthāne'dhātoḥ

सर्वनामस्थान प्रत्यय परे होने पर धातु-भिन्न उगित् (उ/ऋ/ऌ-इत्) अङ्गों और नकार-लोपी 'अञ्चु' को 'नुम्' का आगम होता है; जैसे भवान्, श्रेयान्।

श्लोक 1.71

युजेरसमासे

yujerasamāse

समास को छोड़कर अन्य स्थानों में सर्वनामस्थान परे रहते 'युज्' धातु को 'नुम्' का आगम होता है; जैसे युङ्, युञ्जौ।

श्लोक 1.72

नपुंसकस्य झलचः

napuṁsakasya jhalacaḥ

सर्वनामस्थान ('शि') प्रत्यय परे होने पर नपुंसकलिंग व्यञ्जनान्त या स्वरान्त अङ्ग को 'नुम्' का आगम होता है; जैसे फलानि, मुखानि।

श्लोक 1.73

इकोऽचि विभक्तौ

iko'ci vibhaktau

इकारादि-अन्तवाले (इ/उ/ऋ/ऌ-अन्त) अङ्ग से परे स्वरादि विभक्ति को 'नुम्' का आगम होता है; जैसे त्रपुणी, जतुनी।

श्लोक 1.74

तृतीयादिषु भाषितपुंस्कं पुंवद् गालवस्य

tṛtīyādiṣu bhāṣitapuṁskaṁ puṁvad gālavasya

तृतीया आदि विभक्तियाँ परे होने पर 'भाषितपुंस्क' (जो पुंल्लिंग में भी प्रयुक्त हो) शब्द गालव के मत में पुंल्लिंग के समान व्यवहृत होता है; जैसे ग्रामणिना।

श्लोक 1.75

अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णामनङुदात्तः

asthidadhisakthyakṣṇāmanaṅudāttaḥ

स्वरादि तृतीया आदि विभक्ति परे होने पर अस्थि, दधि, सक्थि तथा अक्षि शब्दों को उदात्त 'अनङ्' आदेश होता है; जैसे अस्थ्ना, दध्ना।

श्लोक 1.76

छन्दस्यपि दृश्यते

chandasyapi dṛśyate

छन्द में यह 'अनङ्' आदेश स्वरादि-भिन्न तथा अतृतीयादि स्थलों में भी बाहुल्येन दिखाई देता है; जैसे अस्थभिः।

श्लोक 1.77

ई च द्विवचने

ī ca dvivacane

द्विवचन में अस्थि, दधि, सक्थि तथा अक्षि शब्दों को 'ई' आदेश होता है, जो उदात्त भी होता है; जैसे अक्षी।

श्लोक 1.78

नाभ्यस्ताच्छतुः

nābhyastācchatuḥ

अभ्यस्त (द्वित्व-युक्त) अङ्ग से परे शतृ प्रत्यय को 'नुम्' का आगम नहीं होता; जैसे ददत्।

श्लोक 1.79

वा नपुंसकस्य

vā napuṁsakasya

अभ्यस्त से परे नपुंसकलिंग शतृ-अङ्ग को सर्वनामस्थान परे रहते विकल्प से 'नुम्' का आगम होता है; जैसे ददन्ति।

श्लोक 1.80

आच्छीनद्योर्नुम्

ācchīnadyornum

अवर्णान्त अङ्ग के शतृ-प्रत्ययान्त रूप को 'शी' और 'नदी' परे रहते विकल्प से 'नुम्' का आगम होता है; जैसे तुदन्ती।

श्लोक 1.81

शप्श्यनोर्नित्यम्

śapśyanornityam

शप् और श्यन् प्रत्ययों वाले शतृ-अङ्ग को नदी और शी परे रहते नित्य 'नुम्' का आगम होता है; जैसे पचन्ती।

श्लोक 1.82

सावनडुहः

sāvanaḍuhaḥ

'सु' प्रत्यय परे होने पर 'अनडुह्' शब्द को 'नुम्' का आगम होता है; जैसे अनड्वान्।

श्लोक 1.83

दृक्स्ववस्स्वतवसां छन्दसि

dṛksvavassvatavasāṁ chandasi

छन्द में दृक्, स्ववस् तथा स्वतवस् शब्दों को 'सु' परे रहते 'नुम्' का आगम होता है; जैसे ईदृङ्, स्ववान्।

श्लोक 1.84

दिव औत्

diva aut

'सु' प्रत्यय परे होने पर 'दिव्' शब्द को 'औत्' आदेश होता है; जैसे द्यौः।

श्लोक 1.85

पथिमथ्यृभुक्षामात्

pathimathyṛbhukṣāmāt

'सु' प्रत्यय परे होने पर पथिन्, मथिन् तथा ऋभुक्षिन् शब्दों को आकार आदेश होता है; जैसे पन्थाः, मन्थाः।

श्लोक 1.86

इतोऽत्सर्वनामस्थाने

ito'tsarvanāmasthāne

सर्वनामस्थान परे रहते उक्त शब्दों के ह्रस्व इकार को ह्रस्व अकार आदेश होता है; जैसे पन्थानौ, पन्थानः।

श्लोक 1.87

थो न्थः

tho nthaḥ

सर्वनामस्थान परे रहते इन शब्दों के थकार को 'न्थ' आदेश होता है; जैसे पन्थानौ।

श्लोक 1.88

भस्य टेर्लोपः

bhasya ṭerlopaḥ

भ-संज्ञक शब्दों की 'टि' (अन्तिम स्वर व उसके बाद के वर्ण) का लोप होता है; जैसे पथः, मथः।

श्लोक 1.89

पुंसोऽसुङ्

puṁso'suṅ

सर्वनामस्थान प्रत्यय परे होने पर 'पुंस्' शब्द के सकार को 'असुङ्' (अस्) आदेश होता है; जैसे पुमान्।

श्लोक 1.90

गोतो णित्

goto ṇit

ओकारान्त 'गो' शब्द से परे सर्वनामस्थान प्रत्यय 'णित्' के समान व्यवहृत होता है; जैसे गौः, गावौ, गावः।

श्लोक 1.91

णलुत्तमो वा

ṇaluttamo vā

लिट् के उत्तमपुरुष-एकवचन 'णल्' को विकल्प से 'णित्' माना जाता है; जैसे जगाद अथवा जगद्।

श्लोक 1.92

सख्युरसंबुद्धौ

sakhyurasaṁbuddhau

'सखि' शब्द से परे संबोधन-भिन्न सर्वनामस्थान प्रत्यय 'णित्' के समान व्यवहृत होता है; जैसे सखायौ।

श्लोक 1.93

अनङ् सौ

anaṅ sau

संबोधन-भिन्न 'सु' प्रत्यय परे होने पर 'सखि' के अन्त्य भाग को 'अनङ्' आदेश होता है; जैसे सखायः, सखायम्।

श्लोक 1.94

ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसां च

ṛduśanaspurudaṁso'nehasāṁ ca

ऋकारान्त शब्दों, उशनस् (शुक्राचार्य), पुरुदंसस् तथा अनेहस् शब्दों को भी संबोधन-भिन्न 'सु' परे 'अनङ्' आदेश होता है।

श्लोक 1.95

तृज्वत् क्रोष्टुः

tṛjvat kroṣṭuḥ

संबोधन-भिन्न सर्वनामस्थान परे रहते 'क्रोष्टु' शब्द ऋकारान्त 'क्रोष्टृ' के रूप में व्यवहृत होता है; जैसे क्रोष्टा, क्रोष्टारौ।

श्लोक 1.96

स्त्रियां च

striyāṁ ca

स्त्रीलिंग में भी 'क्रोष्टु' शब्द तृजन्त शब्द के समान व्यवहार का आश्रय लेता है; जैसे क्रोष्ट्री।

श्लोक 1.97

विभाषा तृतीयादिष्वचि

vibhāṣā tṛtīyādiṣvaci

तृतीया आदि स्वरादि विभक्तियाँ परे होने पर 'क्रोष्टु' विकल्प से ऋकारान्त रूप लेता है; जैसे क्रोष्ट्रा अथवा क्रोष्टुना।

श्लोक 1.98

चतुरनडुहोरामुदात्तः

caturanaḍuhorāmudāttaḥ

सर्वनामस्थान प्रत्यय परे होने पर 'चतुर्' और 'अनडुह्' शब्दों को उदात्त 'आम्' का अवयव जुड़ता है; जैसे चत्वारः, अनड्वान्।

श्लोक 1.99

अम्संबुद्धौ

amsaṁbuddhau

संबोधन परे होने पर उक्त शब्दों को 'अम्' (लघु रूप) आदेश होता है; जैसे हे अनड्वन्।

श्लोक 1.100

ॠत इद् धातौः

ṝta id dhātauḥ

दीर्घ ऋकारान्त धातु के ऋकार के स्थान पर ह्रस्व इकार आदेश होता है; जैसे कॄ से किरति।

श्लोक 1.101

उपधायाश्च

upadhāyāśca

उपधा (अन्त्य से पहले) में स्थित ऋकार के स्थान पर भी इकार आदेश होता है; जैसे कीर्तयति।

श्लोक 1.102

उदोष्ठ्यपूर्वस्य

udoṣṭhyapūrvasya

यदि ऋकारान्त धातु के पूर्व कोई ओष्ठ्य वर्ण (प, फ, ब, भ, म, उ आदि) हो तो ऋकार के स्थान पर उकार आदेश होता है; जैसे पिपुर्तः।

श्लोक 1.103

बहुलं छन्दसि

bahulaṁ chandasi

छन्द में यह उकार-आदेश बाहुल्येन (ओष्ठ्य वर्ण के अभाव में भी) होता है; जैसे ततुरिः।

सप्तमोऽध्यायः, द्वितीयः पादः

श्लोक 2.1

सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु

sici vṛddhiḥ parasmaipadeṣu

परस्मैपद में 'सिच्' प्रत्यय परे होने पर इगन्त अङ्ग के स्वर को वृद्धि आदेश होता है; जैसे क्षि से अक्षैषीत्।

श्लोक 2.2

अतो ल्रान्तस्य

ato lrāntasya

रकार अथवा लकार से ठीक पहले स्थित अकार को परस्मैपद 'सिच्' परे वृद्धि आदेश होता है; जैसे ज्वल् से अज्वालीत्।

श्लोक 2.3

वदव्रजहलन्तस्याचः

vadavrajahalantasyācaḥ

वद्, व्रज् तथा व्यञ्जनान्त अङ्गों के स्वर को परस्मैपद 'सिच्' परे वृद्धि आदेश होता है; जैसे व्रज् से अव्राजीत्।

श्लोक 2.4

नेटि

neṭi

इडादि परस्मैपद 'सिच्' परे होने पर व्यञ्जनान्त अङ्ग को वृद्धि नहीं होती; जैसे दिवु से अदेवीत्।

श्लोक 2.5

ह्ययन्तक्षणश्वसजागृणिश्व्येदिताम्

hyayantakṣaṇaśvasajāgṛṇiśvyeditām

हकारान्त, मकारान्त, एकारान्त अङ्गों तथा क्षण्, श्वस्, जागृ, ण्यन्त और एदित् धातुओं को इडादि सिच् परे वृद्धि नहीं होती; जैसे कटे से अकटीत्।

श्लोक 2.6

ऊर्णोतेर्विभाषा

ūrṇotervibhāṣā

इडादि परस्मैपद 'सिच्' परे होने पर 'ऊर्णु' (ढकना) धातु को विकल्प से वृद्धि आदेश होता है।

श्लोक 2.7

अतो हलादेर्लघोः

ato halāderlaghoḥ

इडादि परस्मैपद 'सिच्' परे होने पर व्यञ्जन से आरम्भ होनेवाले अङ्ग के लघु अकार को विकल्प से वृद्धि होती है; जैसे गद् से अगादीत् अथवा अगदीत्।

श्लोक 2.8

नेड् वशि कृति

neḍ vaśi kṛti

व-वर्ग-आदि (वश्-प्रत्याहार से आरम्भ होनेवाला) कृत् प्रत्यय को इडागम नहीं होता; जैसे सुशर्मन् से सुशर्मा।

श्लोक 2.9

तितुत्रतथसिसुसरकसेषु च

titutratathasisusarakaseṣu ca

ति, तु, त्र, त, थ, सि, सु, सुर, क तथा स—इन दस प्रत्ययों के परे भी इडागम नहीं होता; जैसे दात्रम्।

श्लोक 2.10

एकाच उपदेशेऽनुदात्तात्

ekāca upadeśe'nudāttāt

उपदेश-अवस्था में एकाच् (एक ही स्वरवाला) और अनुदात्त धातु से परे इडागम नहीं होता; जैसे गोपायाञ्चकर्थ।

श्लोक 2.11

श्र्युकः किति

śryukaḥ kiti

'श्रि' (आश्रय लेना) और उगन्त (उ/ऋ/ऌ-अन्त) धातुओं से कित् प्रत्यय परे रहते इडागम नहीं होता; जैसे श्रित्वा, लूनः।

श्लोक 2.12

सनि ग्रहगुहोश्च

sani grahaguhośca

'सन्' प्रत्यय परे होने पर 'ग्रह्' (पकड़ना), 'गुह्' (छिपाना) और उगन्त धातुओं को इडागम नहीं होता; जैसे भू से बुभूषति।

श्लोक 2.13

कृसृभृवृस्तुद्रुस्त्रुश्रुवो लिटि

kṛsṛbhṛvṛstudrustruśruvo liṭi

कृ, सृ, भृ, वृ, स्तु, द्रु, स्त्रु तथा श्रु—इन आठ धातुओं से परे लिट् (परोक्ष भूत) को इडागम नहीं होता।

श्लोक 2.14

श्वीदितो निष्ठायाम्

śvīdito niṣṭhāyām

निष्ठा (क्त/क्तवतु) प्रत्यय परे होने पर 'श्वि' (सूजना) और ईदित् धातुओं को इडागम नहीं होता; जैसे शूनः, लग्नः।

श्लोक 2.15

यस्यविभाषा

yasyavibhāṣā

जिस धातु को अन्यत्र विकल्प से इडागम विहित है, उसे निष्ठा प्रत्यय परे होने पर इट् नहीं होता; जैसे विधूतः, गूढः।

श्लोक 2.16

आदितश्च

āditaśca

'आत्' को इत्संज्ञा प्राप्त धातुओं को भी निष्ठा प्रत्यय परे इडागम नहीं होता; जैसे मित्रः, क्ष्विण्णः।

श्लोक 2.17

विभाषा भावादिकर्मणोः

vibhāṣā bhāvādikarmaṇoḥ

भाव तथा आदिकर्म अर्थ में आदित् धातुओं को निष्ठा प्रत्यय परे विकल्प से इडागम नहीं होता; जैसे मित्रम्, मेदितम्।

श्लोक 2.18

क्षुब्धस्वान्तध्वान्तलग्नम्लिष्टविरिब्धफाण्टबाढानिमन्थमनस्तमःसक्ताविस्पष्टस्वरानायासभृशेसु

kṣubdhasvāntadhvāntalagnamliṣṭaviribdhaphāṇṭabāḍhānimanthamanastamaḥsaktāvispaṣṭasvarānāyāsabhṛśesu

मन्थ, मनस्, तमस्, सक्त, अस्पष्ट, स्वर, अनायास तथा भृश—इन अर्थों में क्रमशः क्षुब्ध, स्वान्त, ध्वान्त, लग्न, म्लिष्ट, विरिब्ध, फाण्ट और बाढ़ शब्दों का निपातन होता है; जैसे क्षुब्धो मन्थः।

श्लोक 2.19

धृषिशसी वैयात्ये

dhṛṣiśasī vaiyātye

अविनय (धृष्टता) का अर्थ होने पर 'धृष्' और 'शस्' धातुओं को निष्ठा प्रत्यय परे इडागम नहीं होता; जैसे धृष्टः, विशस्तः।

श्लोक 2.20

दृढः स्थूलबलयोः

dṛḍhaḥ sthūlabalayoḥ

स्थूल और बलवान् अर्थ में 'दृढ' शब्द का निपातन होता है; दृह् धातु से दृढः।

श्लोक 2.21

प्रभौ परिवृढः

prabhau parivṛḍhaḥ

स्वामी (प्रभु) के अर्थ में 'परिवृढ' शब्द का निपातन होता है; जैसे परिवृढः कुटुम्बी।

श्लोक 2.22

कृच्छ्रगहनयोः कषः

kṛcchragahanayoḥ kaṣaḥ

कठिन (कृच्छ्र) और सघन (गहन) अर्थ में 'कष्' धातु को निष्ठा प्रत्यय परे इडागम नहीं होता; जैसे कष्टोऽग्निः।

श्लोक 2.23

घुषिरविशब्दने

ghuṣiraviśabdane

शब्द न होने के अर्थ में 'घुषिर्' धातु को निष्ठा प्रत्यय परे इडागम नहीं होता; जैसे घुष्टा रज्जुः (रगड़ी हुई रस्सी)।

श्लोक 2.24

अर्द्देः सन्निविभ्यः

arddeḥ sannivibhyaḥ

सम्, नि तथा वि उपसर्गों से युक्त 'अर्द्' धातु को निष्ठा प्रत्यय परे इडागम नहीं होता; जैसे समर्णः, न्यर्णः, व्यर्णः।

श्लोक 2.25

अभेश्चाविदूर्ये

abheścāvidūrye

'समीप' (न दूर) अर्थ में 'अभि' उपसर्गपूर्वक 'अर्द्' धातु को भी इडागम नहीं होता; जैसे अभ्यर्णा सेना।

श्लोक 2.26

णेरध्ययने वृत्तम्

ṇeradhyayane vṛttam

अध्ययन के अर्थ में प्रयुक्त णिजन्त 'वृत्' धातु से णि के लोप और इडागम-अभाव का निपातन होता है; जैसे वृत्तं पारायणं देवदत्तेन।

श्लोक 2.27

वादान्तशान्तपूर्णदस्तस्पष्टच्छन्नज्ञप्ताः

vādāntaśāntapūrṇadastaspaṣṭacchannajñaptāḥ

णिजन्त 'दम्', 'शम्', 'पूरी', 'दस्', 'स्पश्', 'छद्' तथा 'ज्ञप्' धातुओं को निष्ठा प्रत्यय परे विकल्प से इडागम-निषेध होता है; जैसे दान्तः/दमितः, शान्तः/शमितः।

श्लोक 2.28

रुष्यमत्वरसंघुषास्वनाम्

ruṣyamatvarasaṁghuṣāsvanām

'रुष्', 'अम्', 'त्वर्', सम्पूर्वक 'घुष्' तथा आङ्पूर्वक 'स्वन्' धातुओं को निष्ठा प्रत्यय परे विकल्प से इडागम-निषेध होता है।

श्लोक 2.29

हृषेर्लोमसु

hṛṣerlomasu

'रोम' (शरीर के बाल) से संबंधित प्रयोग में 'हृष्' धातु को निष्ठा प्रत्यय परे विकल्प से इडागम-निषेध होता है; जैसे हृष्टानि/हृषितानि लोमानि।

श्लोक 2.30

अपचितश्च

apacitaśca

आदर करने के अर्थ में प्रयुक्त 'चायृ' धातु को भी निष्ठा में इडागम-निषेध तथा 'चाय्' के स्थान पर 'च' आदेश विकल्प से निपातित होता है; जैसे अपचितः/अपचायितः।

श्लोक 2.31

ह्रु ह्वरेश्छन्दसि

hru hvareśchandasi

छन्द (वेद) के प्रयोग में 'ह्वृ' धातु के निष्ठा-रूप के स्थान पर 'ह्रु' आदेश होता है; जैसे ह्रुतस्य।

श्लोक 2.32

अपरिह्वृताश्च

aparihvṛtāśca

छन्द में 'अपरिह्वृत' शब्द का निपातन होता है; जैसे अपरिह्वृताः सनुयाम।

श्लोक 2.33

सोमे ह्वरितः

some hvaritaḥ

सोम अर्थ में 'ह्वृ' धातु को इडागम तथा गुण का निपातन होता है; जैसे मा नः सोमो ह्वरितः।

श्लोक 2.34

ग्रसितस्कभितस्तभितोत्तभितचत्तविकस्ता विशस्तृशंस्तृशास्तृतरुतृवरुतृवरुतृवरुत्रीरुज्ज्वलितिक्षरितिक्षमितिवमित्यमितीति च

grasitaskabhitastabhitottabhitacattavikastā viśastṛśaṁstṛśāstṛtarutṛvarutṛvarutṛvarutrīrujjvalitikṣaritikṣamitivamityamitīti ca

छन्द में ग्रसित, स्कभित, स्तभित, उत्तभित, चत्त, विकस्त आदि शब्दों का निपातन (अनियमित रूप) होता है।

श्लोक 2.35

आर्धधातुकस्येड् वलादेः

ārdhadhātukasyeḍ valādeḥ

व्यञ्जन (वल्) से आरम्भ होनेवाले आर्धधातुक प्रत्यय को इडागम होता है; जैसे भू से बभूविथ।

श्लोक 2.36

स्नुक्रमोरनात्मनेपदनिमित्ते

snukramoranātmanepadanimitte

आत्मनेपद के निमित्त-भिन्न स्नु और क्रमु धातुओं को व्यञ्जनादि आर्धधातुक परे इडागम होता है; जैसे प्रस्नविता, प्रक्रमिता।

श्लोक 2.37

ग्रहोऽलिटि दीर्घः

graho'liṭi dīrghaḥ

लिट् से भिन्न स्थान में 'ग्रह्' (ग्रहण करना) धातु के बाद के इडागम को दीर्घ आदेश होता है; जैसे ग्रहीता।

श्लोक 2.38

वॄतो वा

vṝto vā

लिट् से भिन्न स्थान में वृङ्, वृञ् और दीर्घ ऋकारान्त धातुओं के बाद इडागम को विकल्प से दीर्घ आदेश होता है; जैसे परीता।

श्लोक 2.39

न लिङि

na liṅi

लिङ् (आशीर्लिङ्) प्रत्यय परे होने पर वृङ्, वृञ् और दीर्घ ऋकारान्त धातुओं के बाद इडागम को दीर्घ नहीं होता; जैसे स्तरिषीष्ट।

श्लोक 2.40

सिचि च परस्मैपदेषु

sici ca parasmaipadeṣu

स्वृ, षूङ् (दोनों), धूञ् तथा ऊदित् (जिनका दीर्घ ऊ इत्संज्ञक है) धातुओं के बाद व्यञ्जनादि आर्धधातुक को विकल्प से इडागम होता है।

श्लोक 2.41

इट् सनि वा

iṭ sani vā

'सन्' प्रत्यय परे होने पर वृ, वृङ् तथा ऋकारान्त धातुओं को विकल्प से इडागम होता है; जैसे तितीर्षति अथवा तितरिषति।

श्लोक 2.42

लिङ् सिचोरात्मनेपदेषु

liṅ sicorātmanepadeṣu

आत्मनेपद परे होने पर वृङ्, वृञ् और दीर्घ ऋकारान्त धातुओं को लिङ् और सिच् प्रत्ययों में विकल्प से इडागम होता है।

श्लोक 2.43

ऋतश्च संयोगादेः

ṛtaśca saṁyogādeḥ

आत्मनेपद परे होने पर संयोगादि (जिसके आदि में संयुक्त व्यञ्जन हो) ऋकारान्त धातुओं को भी लिङ् और सिच् में विकल्प से इडागम होता है; जैसे ध्वृषीष्ट/ध्वरिषीष्ट।

श्लोक 2.44

स्वरतिसूतिसूयतिधूञूदितो वा

svaratisūtisūyatidhūñūdito vā

स्वृ, षूङ् (दोनों), धूञ् तथा ऊदित् धातुओं से परे व्यञ्जनादि आर्धधातुक को विकल्प से इडागम होता है; जैसे स्वर्ता अथवा स्वरिता।

श्लोक 2.45

रधादिभ्यश्च

radhādibhyaśca

'रध्' आदि आठ धातुओं से परे भी व्यञ्जनादि आर्धधातुक को विकल्प से इडागम होता है; जैसे नश् से नेशिथ।

श्लोक 2.46

निरः कुषः

niraḥ kuṣaḥ

'निर्' उपसर्गपूर्वक 'कुष्' धातु को भी व्यञ्जनादि आर्धधातुक परे विकल्प से इडागम होता है; जैसे निष्कोष्टा अथवा निष्कोषिता।

श्लोक 2.47

इण्निष्ठायाम्

iṇniṣṭhāyām

'निर्' उपसर्गयुक्त 'कुष्' धातु से विहित निष्ठा प्रत्यय को नित्य इडागम होता है; जैसे निष्कुषितः।

श्लोक 2.48

तीषसहलुभरुषरिषः

tīṣasahalubharuṣariṣaḥ

इष् (चाहना), सह् (सहना), लुभ् (लुभाना), रुष् (दुःख देना) तथा रिष् (मारना)—इन पाँच धातुओं को तकारादि आर्धधातुक परे विकल्प से इडागम होता है; जैसे लोभिता अथवा लोब्धा।

श्लोक 2.49

सनीवन्तर्धभ्रस्जदम्भुश्रिस्वृयूर्णुभरज्ञपिसनाम्

sanīvantardhabhrasjadambhuśrisvṛyūrṇubharajñapisanām

'सन्' प्रत्यय परे होने पर इवन्त धातुओं तथा ऋध्, भ्रस्ज्, दम्भु, श्रि, स्वृ, पू, ऊर्णु, भर, ज्ञप् और सन्-धातुओं को विकल्प से इडागम होता है; जैसे दिदेविषति/दुद्यूषति।

श्लोक 2.50

क्लिशः क्त्वानिष्ठयोः

kliśaḥ ktvāniṣṭhayoḥ

'क्लिश्' धातु से विहित 'क्त्वा' तथा निष्ठा प्रत्ययों को विकल्प से इडागम होता है; जैसे क्लिष्ट्वा अथवा क्लिशित्वा।

श्लोक 2.51

पूङश्च

pūṅaśca

'पूङ्' धातु से विहित 'क्त्वा' तथा निष्ठा प्रत्ययों को भी विकल्प से इडागम होता है; जैसे पूत्वा अथवा पवित्वा।

श्लोक 2.52

वसतिक्षुधोरिट्

vasatikṣudhoriṭ

'वस्' (रहना) और 'क्षुध्' (भूखा होना) धातुओं को 'क्त्वा' तथा निष्ठा प्रत्ययों में नित्य इडागम होता है; जैसे उषित्वा, क्षुधित्वा।

श्लोक 2.53

अञ्चेः पूजायाम्

añceḥ pūjāyām

पूजा (आदर) के अर्थ में 'अञ्च्' धातु को भी क्त्वा और निष्ठा में इडागम होता है; जैसे अञ्चित्वा जानु जुहोति।

श्लोक 2.54

लुभो विमोहने

lubho vimohane

विमोहित करने के अर्थ में 'लुभ्' धातु को भी इडागम होता है; जैसे लुभित्वा, विलुभिताः केशाः।

श्लोक 2.55

जॄव्रश्च्योः क्त्वि

jṝvraścyoḥ ktvi

'जॄ' (बूढ़ा होना) और 'व्रश्च्' (काटना) धातुओं को 'क्त्वा' परे इडागम होता है; जैसे जरित्वा, व्रश्चित्वा।

श्लोक 2.56

उदितो वा

udito vā

उदित् (उकार-इत्संज्ञक) धातुओं को 'क्त्वा' परे विकल्प से इडागम होता है; जैसे शम् से शमित्वा अथवा शान्त्वा।

श्लोक 2.57

सेऽसिचि कृतचृतच्छृदतृदनृतः

se'sici kṛtacṛtacchṛdatṛdanṛtaḥ

कृत्, चृत्, छृद्, तृद् तथा नृत्—इन पाँच धातुओं को सिच् से भिन्न सकारादि आर्धधातुक परे इडागम होता है; जैसे नर्तिष्यति।

श्लोक 2.58

गमेरिट् परस्मैपदेषु

gameriṭ parasmaipadeṣu

परस्मैपद परे होने पर 'गम्' धातु के बाद सकारादि आर्धधातुक को इडागम होता है; जैसे गमिष्यति।

श्लोक 2.59

न वृद्भयश्चतुर्भ्यः

na vṛdbhayaścaturbhyaḥ

परस्मैपद परे होने पर वृत्, वृध्, शृध् तथा स्यन्द्—इन चार धातुओं के बाद सकारादि आर्धधातुक को इडागम नहीं होता; जैसे वर्त्स्यति।

श्लोक 2.60

तासि च कॢपः

tāsi ca kḷpaḥ

'कॢप्' धातु को 'तास्' तथा सकारादि आर्धधातुक परे भी इडागम नहीं होता; जैसे कल्प्ता।

श्लोक 2.61

अचस्तास्वत्थल्यनिटो नित्यम्

acastāsvatthalyaniṭo nityam

उपदेश-अवस्था में स्वरान्त और तास्-परे नित्य अनिट् धातु को 'थल्' प्रत्यय भी इडागम-रहित होता है; जैसे चिक्षेथ।

श्लोक 2.62

उपदेशेऽत्वतः

upadeśe'tvataḥ

उपदेश-अवस्था में ह्रस्व अकारवाली और तास्-परे नित्य अनिट् धातु को भी 'थल्' प्रत्यय इडागम-रहित होता है; जैसे पच् से पपक्थ।

श्लोक 2.63

ऋतो भारद्वाजस्य

ṛto bhāradvājasya

भारद्वाज आचार्य के मत में ऋकारान्त और तास्-परे नित्य अनिट् धातु को भी 'थल्' इडागम-रहित होता है; जैसे चिक्षयिथ अथवा चिक्षेथ।

श्लोक 2.64

बभूथाततन्थजगृम्भववर्थेति निगमे

babhūthātatanthajagṛmbhavavartheti nigame

वैदिक प्रयोग में बभूथ, आततन्थ, जगृम्भ तथा ववर्थ शब्दों का निपातन होता है।

श्लोक 2.65

विभाषा सृजिदृशोः

vibhāṣā sṛjidṛśoḥ

'सृज्' और 'दृश्' धातुओं को 'थल्' प्रत्यय परे विकल्प से इडागम-निषेध होता है; जैसे ससर्जिथ अथवा सस्रष्ठ।

श्लोक 2.66

इडत्त्यर्तिव्ययतीनाम्

iḍattyartivyayatīnām

अद् (खाना), ऋ (जाना) तथा व्येञ् (ढकना) धातुओं को 'थल्' प्रत्यय परे नित्य इडागम होता है; जैसे आदिथ।

श्लोक 2.67

वस्वेकाजाद्घसाम्

vasvekājādghasām

एक ही स्वरवाले, अकारान्त तथा 'घस्' धातुओं को 'वसु' (क्वसु) प्रत्यय परे इडागम होता है; जैसे आशिवान्, जक्षिवान्।

श्लोक 2.68

विभाषा गमहनविदविशाम्

vibhāṣā gamahanavidaviśām

गम्, हन्, विद् तथा विश्—इन चार धातुओं को 'वसु' प्रत्यय परे विकल्प से इडागम होता है; जैसे जघ्निवान् अथवा जघन्वान्।

श्लोक 2.69

सनिं ससनिवांसम्

saniṁ sasanivāṁsam

'षणु' अथवा 'षण्' धातु से द्वितीयान्त 'सनिम्' के बाद 'ससनिवांसम्' शब्द का निपातन होता है; जैसे आजिं त्वाग्रे सनिंससनिवांसम्।

श्लोक 2.70

ऋद्धनोः स्ये

ṛddhanoḥ sye

ऋकारान्त धातुओं और 'हन्' धातु के बाद 'स्य' (भविष्यत्-प्रत्यय) को इडागम होता है; जैसे करिष्यति, हनिष्यति।

श्लोक 2.71

अञ्जेः सिचि

añjeḥ sici

'अञ्जू' (लेप करना) धातु से परे 'सिच्' को इडागम होता है; जैसे आञ्जीत्, आञ्जिष्टाम्।

श्लोक 2.72

स्तु सुधूञ्भ्यः परस्मैपदेषु

stu sudhūñbhyaḥ parasmaipadeṣu

परस्मैपद परे होने पर स्तु, सु तथा धूञ्—इन तीन धातुओं के बाद 'सिच्' को इडागम होता है; जैसे सु से असविषत्।

श्लोक 2.73

यमरमनमातां सक्च

yamaramanamātāṁ sakca

परस्मैपद परे होने पर यम्, रम्, नम् तथा आकारान्त धातुओं को 'सक्' का आगम और 'सिच्' को इडागम होता है; जैसे अयंसीत्, अयासीत्।

श्लोक 2.74

स्मिपूङ्रञ्ज्वशां सनि

smipūṅrañjvaśāṁ sani

स्मिङ् (मुस्कुराना), पूङ्, ऋ, अञ्जू तथा अशू धातुओं से पहले 'सन्' प्रत्यय को इडागम होता है; जैसे सिस्मयिषते।

श्लोक 2.75

किरश्च पञ्चभ्यः

kiraśca pañcabhyaḥ

कॄ, गॄ, दृङ्, धृङ् तथा प्रच्छ्—इन पाँच धातुओं से पहले भी 'सन्' प्रत्यय को इडागम होता है; जैसे चिकरिषति, पिपृच्छिषति।

श्लोक 2.76

रुदादिभ्यः सार्वधातुके

rudādibhyaḥ sārvadhātuke

रुद्, स्वप्, श्वस्, अन् तथा जक्ष्—इन पाँच धातुओं से पहले व्यञ्जनादि सार्वधातुक प्रत्यय को इडागम होता है; जैसे रोदिति, स्वपिति।

श्लोक 2.77

ईशः से

īśaḥ se

'ईश्' (शासन करना) धातु से पहले 'से' रूप सार्वधातुक प्रत्यय को इडागम होता है; जैसे ईशिषे।

श्लोक 2.78

ईडजनोर्ध्वे च

īḍajanordhve ca

'ईड्' और 'जन्' धातुओं से पहले 'से' तथा 'ध्वे' प्रत्ययों को इडागम होता है; जैसे ईडिध्वे, जनिध्वे।

श्लोक 2.79

लिङः सलोपोऽनन्त्यस्य

liṅaḥ salopo'nantyasya

सार्वधातुक लिङ् प्रत्यय के अनन्त्य (अन्त में न स्थित) सकार का लोप होता है।

श्लोक 2.80

अतो येयः

ato yeyaḥ

अकारान्त अङ्ग से परे सार्वधातुक लिङ् के 'यासुट्' (या) के स्थान में 'इय्' आदेश होता है; जैसे भवेत्।

श्लोक 2.81

आतो ङितः

āto ṅitaḥ

अकारान्त अङ्ग से परे ङित्-संज्ञक सार्वधातुक के आकार के स्थान पर 'इय्' आदेश होता है; जैसे एधेते।

श्लोक 2.82

आने मुक्

āne muk

ह्रस्व अकारान्त अङ्ग को 'आन' (शानच्) प्रत्यय परे होने पर 'मुक्' (म्) का आगम होता है; जैसे पचमानम्।

श्लोक 2.83

ईदासः

īdāsaḥ

'आस्' धातु से परे 'आन' प्रत्यय को 'ई' आदेश होता है; जैसे आसीनः।

श्लोक 2.84

अष्टन आ विभक्तौ

aṣṭana ā vibhaktau

'अष्टन्' शब्द को हलादि (व्यञ्जन से आरम्भ होनेवाली) विभक्ति परे 'आ' आदेश होता है; जैसे अष्टाभिः, अष्टानाम्।

श्लोक 2.85

रायो हलि

rāyo hali

हलादि विभक्ति परे होने पर 'रै' शब्द के स्थान पर अकार आदेश होता है; जैसे राभ्याम्, राभिः।

श्लोक 2.86

युष्मदस्मदोरनादेशे

yuṣmadasmadoranādeśe

जिस हलादि विभक्ति को कोई विशेष आदेश नहीं हुआ, उसके परे होने पर युष्मद् और अस्मद् शब्दों को आकार आदेश होता है; जैसे युष्माभिः, अस्माभिः।

श्लोक 2.87

द्वितीयायां च

dvitīyāyāṁ ca

द्वितीया विभक्ति परे होने पर भी युष्मद् और अस्मद् शब्दों को आकार आदेश होता है; जैसे त्वाम्, युष्मान्।

श्लोक 2.88

प्रथमायाश्र्च द्विवचने भाषायाम्

prathamāyāśrca dvivacane bhāṣāyām

लौकिक संस्कृत में प्रथमा-द्विवचन परे होने पर भी युष्मद् और अस्मद् शब्दों को आकार आदेश होता है; जैसे युवाम्, आवाम्।

श्लोक 2.89

योऽचि

yo'ci

जिस स्वरादि विभक्ति को कोई विशेष आदेश नहीं हुआ, उसके परे होने पर युष्मद् और अस्मद् को यकार आदेश होता है; जैसे त्वया, मया।

श्लोक 2.90

शेषे लोपः

śeṣe lopaḥ

जहाँ आकार या यकार का विधान नहीं हुआ, वहाँ युष्मद् और अस्मद् के 'म'-पर्यन्त भाग का लोप होता है; जैसे त्वम्, अहम्।

श्लोक 2.91

मपर्यन्तस्य

maparyantasya

आगे बताए जाने वाले आदेश युष्मद् और अस्मद् शब्दों के 'म' तक के अंश के स्थान में ही होते हैं (यह एक अधिकार-सूत्र है)।

श्लोक 2.92

युवावौ द्विवचने

yuvāvau dvivacane

द्विवचन में युष्मद् और अस्मद् के 'म'-पर्यन्त भाग के स्थान पर क्रमशः 'युव' और 'आव' आदेश होता है; जैसे युवाम्, आवाम्।

श्लोक 2.93

यूयवयौ जसि

yūyavayau jasi

'जस्' (प्रथमा-बहुवचन) परे होने पर युष्मद्/अस्मद् के 'म'-पर्यन्त भाग को क्रमशः 'यूय' और 'वय' आदेश होता है; जैसे यूयम्, वयम्।

श्लोक 2.94

त्वाहौसौ

tvāhausau

'सु' (प्रथमा-एकवचन) परे होने पर युष्मद्/अस्मद् के 'म'-पर्यन्त भाग को क्रमशः 'त्व' और 'अह' आदेश होता है; जैसे त्वम्, अहम्।

श्लोक 2.95

तुभ्यमह्यौङयि

tubhyamahyauṅayi

'ङे' (चतुर्थी-एकवचन) परे होने पर युष्मद्/अस्मद् के 'म'-पर्यन्त भाग को क्रमशः 'तुभ्य' और 'मह्य' आदेश होता है; जैसे तुभ्यम्, मह्यम्।

श्लोक 2.96

तवममौङसि

tavamamauṅasi

'ङस्' (षष्ठी-एकवचन) परे होने पर युष्मद्/अस्मद् के 'म'-पर्यन्त भाग को क्रमशः 'तव' और 'मम' आदेश होता है; जैसे तव, मम।

श्लोक 2.97

त्वमावेकवचने

tvamāvekavacane

एकवचन में विभक्ति परे होने पर युष्मद्/अस्मद् के 'म'-पर्यन्त भाग को क्रमशः 'त्व' और 'म' आदेश होता है; जैसे त्वाम्, माम्।

श्लोक 2.98

प्रत्ययोत्तरपदयोश्च

pratyayottarapadayośca

प्रत्यय अथवा उत्तरपद परे होने पर भी एकवचन में युष्मद्/अस्मद् के 'म'-पर्यन्त भाग को 'त्व' और 'म' आदेश होता है; जैसे त्वदीयः, मदीयः।

श्लोक 2.99

त्रिचतुरोः स्त्रियांतिसृचतसृ

tricaturoḥ striyāṁtisṛcatasṛ

स्त्रीलिंग में विभक्ति परे होने पर 'त्रि' और 'चतुर्' शब्दों के स्थान पर क्रमशः 'तिसृ' और 'चतसृ' आदेश होता है; जैसे तिस्रः, चतस्रः।

श्लोक 2.100

अचि र ऋतः

aci ra ṛtaḥ

स्वर (अच्) परे होने पर 'तिसृ'/'चतसृ' के ऋकार के स्थान पर रकार आदेश होता है; जैसे तिस्रः, चतस्रः।

श्लोक 2.101

जराया जरसन्यतरस्याम्

jarāyā jarasanyatarasyām

स्वरादि विभक्ति परे होने पर 'जरा' (बुढ़ापा) शब्द को विकल्प से 'जरस्' आदेश होता है; जैसे जरसा अथवा जरया।

श्लोक 2.102

त्यदादीनामः

tyadādīnāmaḥ

विभक्ति परे होने पर त्यद्, तद्, यद्, एतद् आदि सर्वनाम शब्दों के अन्तिम वर्ण के स्थान पर अकार आदेश होता है; जैसे ततः, द्वौ।

श्लोक 2.103

किमः कः

kimaḥ kaḥ

विभक्ति परे होने पर 'किम्' शब्द के स्थान पर 'क' आदेश होता है; जैसे कथम्।

श्लोक 2.104

कु तिहोः

ku tihoḥ

तकारादि और हकारादि प्रत्यय परे होने पर 'किम्' के स्थान पर 'कु' आदेश होता है; जैसे कुतः।

श्लोक 2.105

क्वाति

kvāti

'अत्' प्रत्यय परे होने पर 'किम्' के स्थान पर 'क्व' आदेश होता है; जैसे क्व।

श्लोक 2.106

तदोः सः सावनन्त्ययोः

tadoḥ saḥ sāvanantyayoḥ

'सु' प्रत्यय परे होने पर अनन्त्य तकार और दकार के स्थान पर सकार आदेश होता है; जैसे तद् से सः, अदस् से असौ।

श्लोक 2.107

अदस औ सुलोपश्च

adasa au sulopaśca

'सु' प्रत्यय परे होने पर 'अदस्' शब्द के स्थान पर 'औ' आदेश तथा 'सु' का लोप होता है; जैसे असौ।

श्लोक 2.108

इदमो मः

idamo maḥ

'सु' प्रत्यय परे होने पर 'इदम्' शब्द के स्थान पर मकार आदेश होता है; जैसे अयम्, इयम्।

श्लोक 2.109

दश्च

daśca

विभक्ति परे होने पर 'इदम्' के दकार के स्थान पर भी मकार आदेश होता है।

श्लोक 2.110

यः सौ

yaḥ sau

'सु' प्रत्यय परे होने पर 'इदम्' के दकार के स्थान पर यकार आदेश होता है; जैसे इयम्।

श्लोक 2.111

इदोऽय् पुंसि

ido'y puṁsi

पुंल्लिंग में 'सु' प्रत्यय परे होने पर 'इद्' के स्थान पर 'अय्' आदेश होता है; जैसे अयं ब्राह्मणः।

श्लोक 2.112

अनाप्यकः

anāpyakaḥ

'आप्' (स्वरादि) प्रत्यय परे होने पर ककार-रहित 'इदम्' के स्थान पर 'अन्' आदेश होता है; जैसे अनेन, अनयोः।

श्लोक 2.113

हलि लोपः

hali lopaḥ

हलादि तृतीया आदि विभक्ति परे होने पर ककार-रहित 'इदम्' के 'इद्' भाग का लोप होता है; जैसे आभ्याम्, एभिः।

श्लोक 2.114

मृजेर्वृद्धिः

mṛjervṛddhiḥ

अङ्गसंज्ञक 'मृज्' धातु के इक् (इकार) के स्थान पर वृद्धि आदेश होता है; जैसे मार्ग्यः।

श्लोक 2.115

अचो ञ्णिति

aco ñṇiti

'ञित्' और 'णित्' प्रत्यय परे होने पर स्वरान्त अङ्ग को वृद्धि आदेश होता है; जैसे सखायौ।

श्लोक 2.116

अत उपधायाः

ata upadhāyāḥ

'ञित्' और 'णित्' प्रत्यय परे होने पर अङ्ग की उपधा में स्थित ह्रस्व अकार के स्थान पर भी वृद्धि आदेश होता है; जैसे जगाद।

श्लोक 2.117

तद्धितेष्वचामादेः

taddhiteṣvacāmādeḥ

'ञित्' और 'णित्' तद्धित प्रत्यय परे होने पर अङ्ग के स्वरों में से आदि स्वर के स्थान पर वृद्धि आदेश होता है; जैसे पौर्वशालः, काषायः।

श्लोक 2.118

किति च

kiti ca

कित्-संज्ञक तद्धित प्रत्यय परे होने पर भी अङ्ग के आदि स्वर के स्थान पर वृद्धि आदेश होता है; जैसे बाहीकः, आक्षिकः।

सप्तमोऽध्यायः, तृतीयः पादः

श्लोक 3.1

देविकाशिंशिपादित्यवाड्दीर्घसत्रश्रेयसामात्

devikāśiṁśipādityavāḍdīrghasatraśreyasāmāt

तद्धित 'ञित्', 'णित्' तथा 'कित्' प्रत्यय परे होने पर देविका, शिंशपा, दित्यवाह्, दीर्घसत्र तथा श्रेयस् शब्दों के आदि स्वर को वृद्धि के बदले आकार आदेश होता है; जैसे दाविकम्, शांशपः।

श्लोक 3.2

केकयमित्रयुप्रलयानांयादेरियः

kekayamitrayupralayānāṁyāderiyaḥ

तद्धित प्रत्यय परे होने पर केकय, मित्रयु तथा प्रलय शब्दों के यकारादि भाग के स्थान पर 'इय्' आदेश होता है; जैसे कैकेयः, मैत्रेयः, प्रालेयः।

श्लोक 3.3

नय्वाभ्यां पदान्ताभ्यां पूर्वौतु ताभ्यामैच्

nayvābhyāṁ padāntābhyāṁ pūrvautu tābhyāmaic

तद्धित प्रत्यय परे होने पर पदान्त यकार और वकार के बाद के आदि स्वर को वृद्धि नहीं होती, अपितु उनसे पहले ऐकार अथवा औकार का आगम होता है; जैसे वैयाकरणः।

श्लोक 3.4

द्वारादीनां च

dvārādīnāṁ ca

द्वार आदि शब्दों में भी यकार-वकार से पहले वृद्धि के स्थान पर ऐकार/औकार का आगम होता है; जैसे दौवारिकः, सौवरः।

श्लोक 3.5

न्यग्रोधस्य च केवलस्य

nyagrodhasya ca kevalasya

अकेले (असमस्त) 'न्यग्रोध' शब्द में भी यकार के बाद वृद्धि नहीं होकर उससे पहले ऐकार का आगम होता है; जैसे नैयग्रोधः।

श्लोक 3.6

न कर्मव्यतिहारे

na karmavyatihāre

क्रिया-विनिमय (परस्पर आदान-प्रदान) के अर्थ में उक्त वृद्धि-निषेध तथा ऐच्-आगम नहीं होता; जैसे व्याववर्ती।

श्लोक 3.7

स्वागतादीनां च

svāgatādīnāṁ ca

स्वागत आदि शब्दों में भी उक्त वृद्धि-निषेध तथा आगम नहीं होते; जैसे स्वागतिकः।

श्लोक 3.8

श्वादेरिञि

śvāderiñi

श्व आदि अङ्ग के विषय में 'इञ्' प्रत्यय परे रहते भी उक्त वृद्धि-निषेध नहीं होता (अर्थात् साधारण वृद्धि होती है); जैसे श्वाभस्त्रिः।

श्लोक 3.9

पदान्तस्यान्यतरस्याम्

padāntasyānyatarasyām

पूर्वोक्त श्वादि अङ्ग यदि (स्वतंत्र) पद के अन्त में हो तो उक्त वृद्धि-निषेध विकल्प से होता है; जैसे श्वापदम् अथवा शौवापदम्।

श्लोक 3.10

उत्तरपदस्य

uttarapadasya

आगे के सूत्रों में 'उत्तरपद' (समास के दूसरे पद) का अधिकार चलता है, अर्थात् वहाँ बताए गए कार्य उत्तरपद के विषय में होंगे।

श्लोक 3.11

अवयवादृतोः

avayavādṛtoḥ

अवयव-वाचक (भाग सूचित करनेवाले) शब्द से पहले ऋतु-वाचक उत्तरपद के आदि स्वर को तद्धित प्रत्यय परे वृद्धि होती है; जैसे पूर्वहैमः, पूर्ववार्षिकम्।

श्लोक 3.12

सुसर्वार्द्धाज्जनपदस्य

susarvārddhājjanapadasya

'सु', 'सर्व' तथा 'अर्ध' शब्दों के बाद जनपद-वाचक (देश-सूचक) उत्तरपद के आदि स्वर को तद्धित प्रत्यय परे वृद्धि होती है; जैसे सुपाञ्चालकः, सर्वपाञ्चालकः।

श्लोक 3.13

दिशोऽमद्राणाम्

diśo'madrāṇām

दिशा-वाचक शब्द के बाद 'मद्र' से भिन्न जनपद-वाचक उत्तरपद के आदि स्वर को भी वृद्धि होती है; जैसे दक्षिणपाञ्चालकः।

श्लोक 3.14

प्राचां ग्रामनगराणाम्

prācāṁ grāmanagarāṇām

दिशावाचक शब्दपूर्वक प्राच्य (पूर्वी) देश के ग्राम और नगर-वाचक उत्तरपद के आदि स्वर को भी वृद्धि होती है; जैसे पूर्वकार्ष्णमृत्तिकः, पूर्वपाटलिपुत्रकः।

श्लोक 3.15

संख्यायाःसंवत्सरसंख्यस्य च

saṁkhyāyāḥsaṁvatsarasaṁkhyasya ca

संवत्सर-संख्या को सूचित करनेवाले संख्यावाचक शब्द के आदि स्वर को भी वृद्धि होती है; जैसे द्विसांवत्सरिकः, द्विसाप्ततिकः।

श्लोक 3.16

वर्षस्याभविष्यति

varṣasyābhaviṣyati

भविष्यत्काल के अर्थ से भिन्न होने पर संख्यावाचक शब्द के बाद 'वर्ष' उत्तरपद के आदि स्वर को वृद्धि होती है; जैसे द्विवार्षिकः, त्रिवार्षिकः।

श्लोक 3.17

परिमाणान्तस्यासंज्ञाशाणयोः

parimāṇāntasyāsaṁjñāśāṇayoḥ

संख्यावाचक पूर्वपद के बाद परिमाणवाचक उत्तरपद के आदि स्वर को वृद्धि होती है, किन्तु समुदाय के संज्ञा होने पर अथवा उत्तरपद 'शाण' होने पर यह नहीं होता; जैसे द्विकौडविकः।

श्लोक 3.18

जे प्रोष्ठपदानाम्

je proṣṭhapadānām

'उत्पन्न' (जात) के अर्थ में विहित प्रत्यय परे होने पर 'प्रोष्ठपद' शब्द के उत्तरपद के आदि स्वर को वृद्धि होती है; जैसे प्रोष्ठपादः, भाद्रपादः।

श्लोक 3.19

हृद्भगसिन्ध्वन्ते पूर्वपदस्य च

hṛdbhagasindhvante pūrvapadasya ca

'हृद्', 'भग' और 'सिन्धु' शब्द से अन्त होनेवाले अङ्ग के पूर्वपद और उत्तरपद—दोनों के आदि स्वर को वृद्धि होती है; जैसे सौहार्दम्, सौभाग्यम्, साक्तुशैन्धवः।

श्लोक 3.20

अनुशतिकादीनां च

anuśatikādīnāṁ ca

अनुशतिकादिगण में पठित शब्दों के भी पूर्वपद और उत्तरपद—दोनों के आदि स्वर को वृद्धि होती है; जैसे अधिदेव से आधिदैविकम्।

श्लोक 3.21

देवताद्वन्द्वे च

devatādvandve ca

देवता-द्वन्द्व समास में भी पूर्वपद और उत्तरपद दोनों के आदि स्वरों को वृद्धि होती है; जैसे आग्निमारुतम्, आग्निवारुणम्।

श्लोक 3.22

नेन्द्रस्य परस्य

nendrasya parasya

देवता-द्वन्द्व में उत्तरपद 'इन्द्र' हो तो उसके आदि स्वर को वृद्धि नहीं होती, केवल पूर्वपद को होती है; जैसे सौमेन्द्रः, आग्नेन्द्रः।

श्लोक 3.23

दीर्घाच्च वरुणस्य

dīrghācca varuṇasya

दीर्घ स्वर से पहले उत्तरपदस्थ 'वरुण' शब्द को भी वृद्धि नहीं होती; जैसे मैत्रावरुणम्, ऐन्द्रावरुणम्।

श्लोक 3.24

प्राचां नगरान्ते

prācāṁ nagarānte

प्राच्य देश के 'नगर' शब्दान्त समुदाय के भी पूर्वपद और उत्तरपद दोनों के आदि स्वरों को वृद्धि होती है; जैसे सौह्मनागरः, पौण्ड्रनागरः।

श्लोक 3.25

जङ्गलधेनुवलजान्तस्य विभाषितमुत्तरम्

jaṅgaladhenuvalajāntasya vibhāṣitamuttaram

जङ्गल, धेनु तथा वलज शब्दों से अन्त होनेवाले उत्तरपद के आदि स्वर को वृद्धि होती है, और पूर्वपद के आदि स्वर को विकल्प से; जैसे कौरुजङ्गलम्, वैश्वधेनवम्।

श्लोक 3.26

अर्धात्परिमाणस्य पूर्वस्य तु वा

ardhātparimāṇasya pūrvasya tu vā

'अर्ध' शब्दपूर्वक परिमाणवाचक उत्तरपद के आदि स्वर को वृद्धि होती है, और पूर्वपद ('अर्ध') के आदि स्वर को विकल्प से; जैसे अर्धद्रौणिकः अथवा आर्धद्रौणिकः।

श्लोक 3.27

नातः परस्य

nātaḥ parasya

यदि 'अर्ध'-पूर्वक परिमाणवाचक उत्तरपद के आदि स्वर में ह्रस्व अकार हो तो उसे वृद्धि नहीं होती, केवल पूर्वपद को विकल्प से होती है; जैसे अर्धप्रस्थिकः अथवा आर्धप्रस्थिकः।

श्लोक 3.28

प्रवाहणस्य ढे

pravāhaṇasya ḍhe

'ढक्' प्रत्यय परे होने पर 'प्रवाहण' शब्द के उत्तरपद (वाहन) के आदि स्वर को वृद्धि होती है, और पूर्वपद को विकल्प से; जैसे प्रवाहणेयः अथवा प्रावाहणेयः।

श्लोक 3.29

तत्प्रत्ययस्य च

tatpratyayasya ca

ढक्-प्रत्ययान्त 'प्रवाहणेय' शब्द में भी अगले तद्धित प्रत्यय परे रहते वही वृद्धि-विकल्प लागू होता है; जैसे प्रवाहणेयिः अथवा प्रावाहणेयिः।

श्लोक 3.30

नञः शुचीश्वरक्षेत्रज्ञकुशलनिपुणानाम्

nañaḥ śucīśvarakṣetrajñakuśalanipuṇānām

'नञ्' (न) से परे शुचि, ईश्वर, क्षेत्रज्ञ, कुशल तथा निपुण शब्दों के आदि स्वर को वृद्धि होती है, और पूर्वपद 'नञ्' को विकल्प से; जैसे आशौचः अथवा अशौचः।

श्लोक 3.31

यथातथयथापुरयोः पर्यायेण

yathātathayathāpurayoḥ paryāyeṇa

नञ्-पूर्वक यथातथ और यथापुर शब्दों में पूर्वपद अथवा उत्तरपद के आदि स्वर को बारी-बारी से वृद्धि होती है; जैसे आयथातथ्यम्, आयथापुर्यम्।

श्लोक 3.32

हनस्तोऽचिण्ण्लोः

hanasto'ciṇṇloḥ

चिण् और णल् से भिन्न णित् प्रत्यय परे होने पर 'हन्' धातु के नकार के स्थान पर तकार आदेश होता है; जैसे घातकः।

श्लोक 3.33

आतो युक् चिण्कृतोः

āto yuk ciṇkṛtoḥ

अकारान्त अङ्ग को चिण् तथा ञित् या णित् कृत् प्रत्यय परे 'युक्' का आगम होता है; जैसे धा से धायकः, पा से पायकः।

श्लोक 3.34

नोदात्तोपदेशस्य मान्तस्यानाचमेः

nodāttopadeśasya māntasyānācameḥ

'आ+चम्' से भिन्न, उपदेश में उदात्त मकारान्त धातुओं को चिण् तथा ञित्/णित् कृत् परे उपधा-वृद्धि नहीं होती; जैसे रम् से रामकः (राम्यकः नहीं)।

श्लोक 3.35

जनिवध्योश्च

janivadhyośca

'जन्' (उत्पन्न होना) और 'वध्' (मार डालना) धातुओं को भी चिण्, ञित्/णित् कृत् प्रत्यय परे उपधा-वृद्धि नहीं होती; जैसे अजनि।

श्लोक 3.36

अर्तिह्रीव्लीरीक्नूयीक्ष्माय्यातां पुङ्णौ

artihrīvlīrīknūyīkṣmāyyātāṁ puṅṇau

णि (प्रेरणार्थक) प्रत्यय परे होने पर ऋ, ह्री, ब्ली, री, क्नूयी, क्ष्मायी तथा अकारान्त धातुओं को 'पुक्' का आगम होता है; जैसे स्था से स्थापयति।

श्लोक 3.37

शाच्छासाह्वाव्यावेपां युक्

śācchāsāhvāvyāvepāṁ yuk

णि प्रत्यय परे होने पर शा, छा, सा, ह्वा, व्या तथा वे धातुओं को भी 'युक्' का आगम होता है; जैसे निशाययति, ह्वाययति।

श्लोक 3.38

वो विधूनने जुक्

vo vidhūnane juk

कम्पन (हिलाना) के अर्थ में 'वा' धातु को णि परे 'जुक्' का आगम होता है; जैसे पक्षेणोपवाजयति।

श्लोक 3.39

ली लोर्नुग्लुकावन्यतरस्यां स्नेहविपातने

lī lornuglukāvanyatarasyāṁ snehavipātane

स्नेह (चिकनाई) टपकाने के अर्थ में 'ली' और 'ला' धातुओं को णि परे विकल्प से नुक् अथवा लुक् का आगम होता है; जैसे लालयति।

श्लोक 3.40

भियो हेतुभये षुक्

bhiyo hetubhaye ṣuk

प्रयोजक (कराए गए) भय के अर्थ में 'भी' धातु को णि परे 'षुक्' का आगम होता है; जैसे भीषयिष्यते।

श्लोक 3.41

स्फायो वः

sphāyo vaḥ

णि प्रत्यय परे होने पर 'स्फाय्' धातु के यकार के स्थान पर वकार आदेश होता है; जैसे स्फावयति।

श्लोक 3.42

शदेरगतौ तः

śaderagatau taḥ

गति (जाना) से भिन्न अर्थ में 'शद्' धातु के दकार के स्थान पर णि परे तकार आदेश होता है; जैसे शातयति।

श्लोक 3.43

रूहः पोऽन्यतरस्याम्

rūhaḥ po'nyatarasyām

णि प्रत्यय परे होने पर 'रुह्' धातु के हकार के स्थान पर विकल्प से पकार आदेश होता है; जैसे रोहयति अथवा रोपयति।

श्लोक 3.44

प्रत्ययस्थात् कात् पूर्वस्यात इदाप्यसुपः

pratyayasthāt kāt pūrvasyāta idāpyasupaḥ

'टाप्' (आप्) प्रत्यय परे होने पर, प्रत्यय में स्थित ककार से ठीक पहले के अकार को इकार आदेश होता है; जैसे गोपालिका, जटिलिका।

श्लोक 3.45

न यासयोः

na yāsayoḥ

'या' और 'सा' शब्दों में प्रत्यय-स्थित ककार से पहले के अकार को इकार आदेश नहीं होता; जैसे यका, सका।

श्लोक 3.46

उदीचामातः स्थाने यक पूर्वायाः

udīcāmātaḥ sthāne yaka pūrvāyāḥ

उदीच्य आचार्यों के मत में यकार अथवा ककार से पहले के अकार को विकल्प से इकार आदेश होता है; जैसे इभ्यका अथवा इभ्यिका।

श्लोक 3.47

भस्त्रैषाजाज्ञाद्वास्वानञ्पूर्वाणामपि

bhastraiṣājājñādvāsvānañpūrvāṇāmapi

नञ्-रहित सहित भस्त्रा, एषा, अजा, ज्ञा, द्वा तथा स्वा शब्दों में उदीच्य मत का उक्त इत्व नहीं होता; जैसे भस्त्रका।

श्लोक 3.48

अभाषितपुंस्काच्च

abhāṣitapuṁskācca

अभाषितपुंस्क (जो कभी पुंल्लिंग में प्रयुक्त न हो) शब्दों में भी उदीच्य मत का यह इत्व नहीं होता; जैसे खट्वका।

श्लोक 3.49

आदाचार्याणाम्

ādācāryāṇām

अभाषितपुंस्क शब्दों में आत्-स्थानिक अत् के स्थान पर आचार्यों के मत में आकार आदेश होता है; जैसे गङ्गाका।

श्लोक 3.50

ठस्येकः

ṭhasyekaḥ

अङ्ग से परे 'ठ' प्रत्यय के स्थान पर 'इक्' आदेश होता है; जैसे रेवती से रैवतिकः।

श्लोक 3.51

इसुसुक्तान्तात्कः

isusuktāntātkaḥ

इसन्त, उसन्त, उगन्त तथा तकारान्त अङ्ग से परे 'ठ' के स्थान पर 'क' आदेश होता है; जैसे सक्तु से साक्तुकम्।

श्लोक 3.52

चजोःकुघिण्ण्यतोः

cajoḥkughiṇṇyatoḥ

घित् अथवा ण्यत् प्रत्यय परे होने पर चकार और जकार के स्थान पर कवर्ग (क, ख, ग, घ) का आदेश होता है; जैसे मृज् से मार्ग्यः।

श्लोक 3.53

न्यङ्क्वादीनां च

nyaṅkvādīnāṁ ca

न्यङ्कु आदि शब्दों की सिद्धि के लिए भी कवर्गादेश माना जाता है; जैसे उदङ्कः, मेघः, आवेदः।

श्लोक 3.54

हो हन्तेर्ञ्णिन्नेषु

ho hanterñṇinneṣu

ञित्, णित् प्रत्यय अथवा नकार परे होने पर 'हन्' धातु के हकार के स्थान पर कवर्ग आदेश होता है; जैसे घ्नन्ति।

श्लोक 3.55

अभ्यासाच्च

abhyāsācca

अभ्यास (द्वित्व-भाग) से परे भी 'हन्' धातु के हकार के स्थान पर कवर्ग आदेश होता है; जैसे जघनिथ।

श्लोक 3.56

हेरचङि

heracaṅi

अभ्यास के बाद के 'ह्' धातु के हकार को भी कवर्ग आदेश होता है, किन्तु चङ् प्रत्यय परे नहीं; जैसे प्रजिघीषति।

श्लोक 3.57

सन्लिटोर्जेः

sanliṭorjeḥ

सन् और लिट् प्रत्यय परे होने पर 'जि' धातु के अभ्यास के जकार के स्थान पर कवर्ग आदेश होता है; जैसे जिगीषति, जिगाय।

श्लोक 3.58

विभाषा चेः

vibhāṣā ceḥ

सन् और लिट् परे होने पर अभ्यास के 'चि' के चकार को विकल्प से ककार आदेश होता है; जैसे चिचीषति अथवा चिकीषति।

श्लोक 3.59

न क्वादेः

na kvādeḥ

जो धातु स्वयं कवर्ग से आरम्भ होती है, उसके चकार अथवा जकार को उक्त कवर्गादेश नहीं होता; जैसे कूजो वर्तते।

श्लोक 3.60

अजिव्रज्योश्च

ajivrajyośca

'अज्' और 'व्रज्' धातुओं के जकार के स्थान में भी कवर्गादेश नहीं होता; जैसे समाजः, परिव्राजः।

श्लोक 3.61

भुजन्युब्जौ पाण्युपतापयोः

bhujanyubjau pāṇyupatāpayoḥ

हाथ (भुजा) और उपताप (रोग) के अर्थ में क्रमशः 'भुज' और 'न्युब्ज' शब्दों का निपातन होता है; जैसे भुजः।

श्लोक 3.62

प्रयाजानुयाजौ यज्ञाङ्गे

prayājānuyājau yajñāṅge

यज्ञ के अङ्ग के अर्थ में 'प्रयाज' और 'अनुयाज' शब्दों का निपातन होता है; जैसे पञ्च प्रयाजाः।

श्लोक 3.63

वञ्चेर्गतौ

vañcergatau

गति (जाना) के अर्थ में 'वञ्च्' धातु के चकार के स्थान में कवर्गादेश नहीं होता; जैसे वञ्चं वञ्चन्ति वाणिजाः।

श्लोक 3.64

ओक उचः के

oka ucaḥ ke

'क' प्रत्यय परे होने पर 'उच्' धातु के 'ओक्' शब्द का निपातन होता है; जैसे न्योकः शकुन्तः, न्योको गृहम्।

श्लोक 3.65

ण्य आवश्यके

ṇya āvaśyake

आवश्यकता के अर्थ में 'ण्य' प्रत्यय परे भी कवर्गादेश नहीं होता; जैसे अवश्यपाच्यम्, अवश्यवाच्यम्।

श्लोक 3.66

यजयाचरुचप्रवचर्चश्च

yajayācarucapravacarcaśca

यज्, याच्, रुच्, प्रवच् तथा ऋच्—इन धातुओं के चकार को भी 'ण्यत्' प्रत्यय परे कवर्गादेश नहीं होता; जैसे याज्यम्, रोच्यम्, अर्च्यम्।

श्लोक 3.67

वचोऽशब्दसंज्ञायाम्

vaco'śabdasaṁjñāyām

प्रत्ययान्त शब्द की संज्ञा न होने पर 'वच्' धातु के चकार को भी 'ण्यत्' परे कवर्गादेश नहीं होता; जैसे वाच्यमाह।

श्लोक 3.68

प्रयोज्यनियोज्यौ शक्यार्थे

prayojyaniyojyau śakyārthe

'शक्य' (जो किया जा सके) के अर्थ में 'ण्यत्' परे प्र+युज् और नि+युज् के जकार को कवर्गादेश नहीं होता; जैसे प्रयोज्यः, नियोज्यः।

श्लोक 3.69

भोज्यं भक्ष्ये

bhojyaṁ bhakṣye

खाने योग्य (भक्ष्य) के अर्थ में 'भुज्' धातु के जकार को भी कवर्गादेश नहीं होता; जैसे भोज्यम्।

श्लोक 3.70

घोर्लोपो लेटि वा

ghorlopo leṭi vā

लेट् लकार (वैदिक) परे होने पर घु-संज्ञक धातुओं का अन्त्य भाग विकल्प से लुप्त हो जाता है; जैसे दधद् रत्नानि।

श्लोक 3.71

ओतः श्यनि

otaḥ śyani

'श्यन्' प्रत्यय परे होने पर धातु के अन्त्य ओकार का लोप होता है; जैसे शो से श्यति।

श्लोक 3.72

क्सस्याचि

ksasyāci

स्वरादि प्रत्यय परे होने पर 'क्स' (लुङ् का चिह्न) का लोप होता है।

श्लोक 3.73

लुग्वा दुहदिहलिहगुहामात्मनेपदेदन्त्ये

lugvā duhadihalihaguhāmātmanepadedantye

आत्मनेपद के त, थास् तथा ध्वम् प्रत्यय परे होने पर 'दुह्', 'दिह्', 'लिह्' तथा 'गुह्' धातुओं के 'क्स' का विकल्प से लोप होता है; जैसे अदुग्ध अथवा अधुक्षत।

श्लोक 3.74

शमामष्टानां दीर्घः श्यनि

śamāmaṣṭānāṁ dīrghaḥ śyani

'श्यन्' प्रत्यय परे होने पर शम्, तम्, दम्, श्रम्, भ्रम्, क्षम्, क्लम् तथा मद्—इन आठ धातुओं के स्वर को दीर्घ आदेश होता है; जैसे क्लाम्यति, भ्राम्यति।

श्लोक 3.75

ष्ठिवुक्लमुचमां शिति

ṣṭhivuklamucamāṁ śiti

शित् (जिसका शकार इत्संज्ञक है) प्रत्यय परे होने पर ष्ठिव्, क्लम् तथा चम् धातुओं को भी दीर्घ आदेश होता है; जैसे ष्ठीव, क्लाम, आचाम।

श्लोक 3.76

क्रमः परस्मैपदेषु

kramaḥ parasmaipadeṣu

परस्मैपद में शित् प्रत्यय परे होने पर 'क्रम्' धातु के स्वर को भी दीर्घ आदेश होता है; जैसे क्रामति, क्राम्यति।

श्लोक 3.77

इषुगमियमां छः

iṣugamiyamāṁ chaḥ

शित् प्रत्यय परे होने पर इष्, गम् तथा यम् धातुओं के व्यञ्जन के स्थान पर छकार आदेश होता है; जैसे गम् से गच्छति।

श्लोक 3.78

पाघ्राध्मास्थाम्नादाण्दृश्यर्तिसर्तिशदसदां पिबजिघ्रधमतिष्ठमनयच्छपश्यर्च्छधौशीयसीदाः

pāghrādhmāsthāmnādāṇdṛśyartisartiśadasadāṁ pibajighradhamatiṣṭhamanayacchapaśyarcchadhauśīyasīdāḥ

शित् प्रत्यय परे होने पर पा, घ्रा, ध्मा, स्था, म्ना, दाण्, दृशि, ऋ, सृ, शद् तथा सद्—इन धातुओं के स्थान पर क्रमशः पिब, जिघ्र, धम, तिष्ठ, मन, यच्छ, पश्य, ऋच्छ, धौ, शीय तथा सीद आदेश होते हैं; जैसे पिबति, तिष्ठति।

श्लोक 3.79

ज्ञाजनोर्जा

jñājanorjā

शित् प्रत्यय परे होने पर 'ज्ञा' (जानना) और 'जन्' (उत्पन्न होना) धातुओं के स्थान पर 'जा' आदेश होता है; जैसे जायते।

श्लोक 3.80

प्वादीनां ह्रस्वः

pvādīnāṁ hrasvaḥ

शित् प्रत्यय परे होने पर 'पू' (पूञ्) आदि चौबीस धातुओं के दीर्घ स्वर को ह्रस्व आदेश होता है; जैसे पुनाति।

श्लोक 3.81

मीनातेर्निगमे

mīnāternigame

वैदिक (निगम) प्रयोग में शित् प्रत्यय परे 'मी' धातु को भी ह्रस्व आदेश होता है; जैसे प्रमिणन्ति व्रतानि।

श्लोक 3.82

मिदेर्गुणः

miderguṇaḥ

शित् प्रत्यय परे होने पर 'मिद्' धातु के इकार के स्थान में गुण आदेश होता है; जैसे मेद्यति।

श्लोक 3.83

जुसि च

jusi ca

स्वरादि 'जुस्' प्रत्यय परे होने पर भी इ/उ/ऋ/ऌ-अन्त अङ्ग को गुण आदेश होता है।

श्लोक 3.84

सार्वधातुकार्धधातुकयोः

sārvadhātukārdhadhātukayoḥ

कित्, ङित्, ञित् तथा णित् से भिन्न सार्वधातुक और आर्धधातुक प्रत्यय परे होने पर इ/उ/ऋ/ऌ-अन्त अङ्ग को गुण आदेश होता है; जैसे भू से भवति।

श्लोक 3.85

जाग्रोऽविचिण्णल्ङित्सु

jāgro'viciṇṇalṅitsu

वि (क्विन्), चिण्, णल् तथा ङित् से भिन्न प्रत्यय परे होने पर 'जागृ' धातु के इकार को गुण आदेश होता है; जैसे जागरयिष्यति।

श्लोक 3.86

पुगन्तलघूपधस्य च

pugantalaghūpadhasya ca

सार्वधातुक और आर्धधातुक प्रत्यय परे होने पर पुक्-आगमवाले तथा लघु उपधावाले अङ्गों को भी गुण आदेश होता है; जैसे सिध् से सेधति।

श्लोक 3.87

नाभ्यस्तस्याचि पिति सार्वधातुके

nābhyastasyāci piti sārvadhātuke

तिप्, सिप् अथवा मिप् (पित् सार्वधातुक) परे होने पर अभ्यस्त (द्वित्व-युक्त) अङ्ग की लघु उपधा को गुण नहीं होता; जैसे नेनिजानि।

श्लोक 3.88

भूसुवोस्तिङि

bhūsuvostiṅi

सार्वधातुक तिङ् प्रत्यय परे होने पर 'भू' और 'सू' धातुओं को गुण नहीं होता; जैसे अभूत्।

श्लोक 3.89

उतो वृद्धिर्लुकि हलि

uto vṛddhirluki hali

'लुक्' (श्लु) के विषय में हलादि पित् सार्वधातुक (तिप्, सिप्, मिप्) परे होने पर अङ्ग के उकार को वृद्धि आदेश होता है, अभ्यस्त अङ्ग को छोड़कर; जैसे यु से यौति।

श्लोक 3.90

ऊर्णोते र्विभाषा

ūrṇote rvibhāṣā

हलादि पित् सार्वधातुक परे होने पर 'ऊर्णु' धातु को भी विकल्प से वृद्धि आदेश होता है; जैसे ऊर्णौति अथवा ऊर्णोति।

श्लोक 3.91

गुणोऽपृक्ते

guṇo'pṛkte

अपृक्त (केवल एक ही वर्णवाले) हलादि पित् सार्वधातुक परे होने पर 'ऊर्णु' धातु को गुण आदेश होता है; जैसे और्णोत्।

श्लोक 3.92

तृणह इम्

tṛṇaha im

हलादि पित् सार्वधातुक प्रत्ययों के परे 'तृणह्' शब्द को 'इम्' का आगम होता है; जैसे तृणेढि।

श्लोक 3.93

ब्रुव ईट्

bruva īṭ

'ब्रू' धातु के बाद हलादि पित् सार्वधातुक (तिप्, सिप्, मिप्) को 'ईट्' का आगम होता है; जैसे ब्रवीति।

श्लोक 3.94

यङो वा

yaṅo vā

यङ् (द्योतक द्वित्व-प्रत्यय) के बाद हलादि पित् सार्वधातुक को विकल्प से 'ईट्' का आगम होता है; जैसे बोभवीति।

श्लोक 3.95

तुरुस्तुशम्यमः सार्वधातुके

turustuśamyamaḥ sārvadhātuke

तु, रु, स्तु, शम् तथा अम्—इन धातुओं से परे हलादि पित् सार्वधातुक को विकल्प से 'ईट्' का आगम होता है; जैसे अमीति।

श्लोक 3.96

अस्तिसिचोऽपृक्ते

astisico'pṛkte

'अस्' धातु और 'सिच्' प्रत्यय परे होने पर अपृक्त (एकवर्णीय) हलादि प्रत्यय को इडागम होता है; जैसे आसीत्।

श्लोक 3.97

बहुलं छन्दसि

bahulaṁ chandasi

छन्द (वेद) में उपर्युक्त 'ईट्' का आगम बाहुल्येन (अनियमित रूप से) होता है।

श्लोक 3.98

रुदश्च पञ्चभ्यः

rudaśca pañcabhyaḥ

'रुद्' आदि पाँच धातुओं से पहले अपृक्त हलादि सार्वधातुक प्रत्यय को 'ईट्' का आगम होता है; जैसे अरोदीत्।

श्लोक 3.99

अङ्गा र्ग्यगालवयोः

aṅgā rgyagālavayoḥ

गार्ग्य और गालव आचार्यों के मत में 'रुद्' आदि पाँच धातुओं से पहले अपृक्त हलादि सार्वधातुक को 'ईट्' के बदले 'अट्' का आगम होता है; जैसे अरोदत्।

श्लोक 3.100

अदः सर्वेषाम्

adaḥ sarveṣām

'अद्' (खाना) धातु से परे अपृक्त सार्वधातुक प्रत्यय को सभी आचार्यों के मत में 'अट्' का आगम होता है; जैसे आदत्।

श्लोक 3.101

अतो दीर्घो यञि

ato dīrgho yañi

यञादि (य्,व्,र्,ल्,ञ्,म्,ङ्,ण्,न्,झ्,भ् से आरम्भ होनेवाले) सार्वधातुक प्रत्यय परे होने पर अकारान्त अङ्ग को दीर्घ आदेश होता है; जैसे नयामि।

श्लोक 3.102

सुपि च

supi ca

यञादि सुप् (कारक-विभक्ति) प्रत्यय परे भी अकारान्त अङ्ग को दीर्घ आदेश होता है; जैसे बालाभ्याम्।

श्लोक 3.103

बहुवचने झल्येत्

bahuvacane jhalyet

अकारान्त अङ्ग से परे झलादि बहुवचन-सुप् (भ्यस्, नाम् आदि) प्रत्यय में एकार आदेश होता है; जैसे रामेभ्याम्, सर्वेषाम्।

श्लोक 3.104

ओसि च

osi ca

अकारान्त अङ्ग से परे 'ओस्' प्रत्यय परे भी एकार आदेश होता है; जैसे बाले+ओस् से बालयोः।

श्लोक 3.105

आङि चापः

āṅi cāpaḥ

आकारान्त (आबन्त) अङ्ग से परे 'टा' (आङ्) अथवा 'ओस्' परे भी एकार आदेश होता है; जैसे खट्वया, खट्वयोः।

श्लोक 3.106

संबुद्धौ च

saṁbuddhau ca

संबोधन परे होने पर भी आबन्त अङ्ग के अन्त्य आकार को एकार आदेश होता है; जैसे हे खट्वे।

श्लोक 3.107

अम्बार्थनद्योर्ह्रस्वः

ambārthanadyorhrasvaḥ

संबोधन परे होने पर 'अम्बा' (माता-अर्थक) और नदी-संज्ञक शब्दों के अन्त्य स्वर को ह्रस्व आदेश होता है; जैसे हे अम्ब, हे कुमारि।

श्लोक 3.108

ह्रस्वस्य गुणः

hrasvasya guṇaḥ

ह्रस्वान्त अङ्ग को संबोधन में गुण आदेश होता है; जैसे हे अग्ने, हे वायो।

श्लोक 3.109

जसि च

jasi ca

'जस्' (प्रथमा-बहुवचन) परे होने पर भी ह्रस्वान्त अङ्ग को गुण आदेश होता है; जैसे हरयः।

श्लोक 3.110

ऋतो ङिसर्वनामस्थानयोः

ṛto ṅisarvanāmasthānayoḥ

सर्वनामस्थान अथवा 'ङि' प्रत्यय परे होने पर ऋकारान्त अङ्ग को गुण आदेश होता है; जैसे कर्तारौ, पितरि।

श्लोक 3.111

घेर्ङिति

gherṅiti

घि-संज्ञक अङ्ग को ङित् प्रत्यय परे होने पर गुण आदेश होता है।

श्लोक 3.112

आण्नद्याः

āṇnadyāḥ

नद्यन्त (ई/ऊ-अन्त स्त्रीलिंग) अङ्ग से परे ङित् प्रत्यय को 'आट्' का आगम होता है; जैसे कुमार्यै।

श्लोक 3.113

याडापः

yāḍāpaḥ

आकारान्त (आबन्त) अङ्ग से परे ङित् प्रत्यय के बीच 'याट्' का आगम होता है; जैसे खट्वायै।

श्लोक 3.114

सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च

sarvanāmnaḥ syāḍḍhrasvaśca

आबन्त सर्वनाम से परे ङित् प्रत्ययों में अङ्ग और प्रत्यय के मध्य 'स्याट्' का आगम तथा अङ्ग को ह्रस्व आदेश होता है; जैसे सर्वस्यै।

श्लोक 3.115

विभाषा द्वितीयातृतीयाभ्याम्

vibhāṣā dvitīyātṛtīyābhyām

'द्वितीय' और 'तृतीय' शब्दों से परे ङित् प्रत्ययों को विकल्प से 'स्याट्' का आगम होता है; जैसे द्वितीयस्यै अथवा द्वितीयायै।

श्लोक 3.116

ङेराम्नद्याम्नी भ्यः

ṅerāmnadyāmnī bhyaḥ

नद्यन्त, आबन्त तथा 'नी'-अन्त अङ्ग से परे 'ङि' प्रत्यय को 'आम्' आदेश होता है; जैसे सर्वस्याम्।

श्लोक 3.117

इदुद्भ्याम्

idudbhyām

ह्रस्व इकारान्त और उकारान्त नदी-संज्ञक शब्दों से परे 'ङि' के स्थान पर भी 'आम्' आदेश होता है; जैसे कृत्याम्, धेन्वाम्।

श्लोक 3.118

औत्

aut

ह्रस्व इकार और उकार से परे 'ङि' प्रत्यय के स्थान पर 'औ' आदेश होता है।

श्लोक 3.119

अच्च घेः

acca gheḥ

घि-संज्ञक अङ्ग से परे भी 'ङि' के इकार को 'औ' आदेश होता है, और अङ्ग को अकार आदेश होता है; इसी से आगे अग्निना जैसे रूप सिद्ध होते हैं।

श्लोक 3.120

आङोनाऽस्त्रियाम्

āṅonā'striyām

स्त्रीलिंग को छोड़कर अन्य घि-संज्ञक अङ्ग से परे 'आङ्' (टा) प्रत्यय के स्थान पर 'ना' आदेश होता है; जैसे हरिणा, गुरुणा।

सप्तमोऽध्यायः, चतुर्थः पादः

श्लोक 4.1

णौ चङ्युपधायाः ह्रस्वः

ṇau caṅyupadhāyāḥ hrasvaḥ

चङ्-परक (जिसके बाद चङ् प्रत्यय हो) णि प्रत्यय परे होने पर अङ्ग की उपधा को ह्रस्व आदेश होता है; जैसे अचकमत्।

श्लोक 4.2

नाग्लोपिशास्वृदिताम्

nāglopiśāsvṛditām

जिन अङ्गों का णि परे अक् का लोप हुआ हो, तथा 'शास्' और ऋदित् धातुओं की उपधा को उक्त ह्रस्वादेश नहीं होता; जैसे अमीमलत्, अशशासत्।

श्लोक 4.3

भ्राजभासभाषदीपजीवमीलपीडामन्यतरस्याम्

bhrājabhāsabhāṣadīpajīvamīlapīḍāmanyatarasyām

चङ्-परक णि प्रत्यय परे होने पर भ्राज्, भास्, भाष्, दीपी, जीव्, मील् तथा पीड्—इन सात धातुओं की उपधा को विकल्प से ह्रस्व आदेश होता है; जैसे अबिभ्रजत् अथवा अबभ्राजत्।

श्लोक 4.4

लोपःपिबतेरीच्चाभ्यासस्य

lopaḥpibaterīccābhyāsasya

चङ्-परक णि प्रत्यय परे होने पर 'पा' धातु की उपधा का लोप तथा अभ्यास को 'ई' आदेश होता है; जैसे अपीप्यत्।

श्लोक 4.5

तिष्ठतेरित्

tiṣṭhaterit

चङ्-परक णि प्रत्यय परे होने पर 'स्था' धातु की उपधा के स्थान पर ह्रस्व इकार आदेश होता है; जैसे अतिष्ठिपत्।

श्लोक 4.6

जिघ्रतेर्वा

jighratervā

चङ्-परक णि प्रत्यय परे होने पर 'घ्रा' धातु की उपधा को विकल्प से ईकार आदेश होता है; जैसे अजिघ्रिपत् अथवा अजिघ्रपत्।

श्लोक 4.7

उर्ऋत्

urṛt

चङ्-परक णि प्रत्यय परे होने पर अङ्ग के उपधाभूत ऋकार के स्थान पर विकल्प से 'ऋत्' आदेश होता है; जैसे अचीकृतत् अथवा अचिकीर्तत्।

श्लोक 4.8

नित्यं छन्दसि

nityaṁ chandasi

छन्द (वेद) में उपधाभूत ऋकार के स्थान पर नित्य 'ऋत्' आदेश होता है; जैसे अवीवृधत्।

श्लोक 4.9

दयतेर्दिगि लिटि

dayaterdigi liṭi

लिट् प्रत्यय परे होने पर 'दय्' धातु के स्थान पर 'दिगि' आदेश होता है; जैसे दिग्ये।

श्लोक 4.10

ऋतश्च संयोगादेर्गुणः

ṛtaśca saṁyogāderguṇaḥ

लिट् परे होने पर संयोगादि (जिसके आदि में संयुक्त व्यञ्जन हो) ऋकारान्त अङ्ग को वृद्धि के बदले गुण आदेश होता है; जैसे जह्णार, सस्वरतुः।

श्लोक 4.11

ऋच्छत्यॄताम्

ṛcchatyṝtām

लिट् परे होने पर 'ऋच्छ्' (जाना), 'ऋ' तथा ऋकारान्त अङ्गों को गुण आदेश होता है; जैसे पपरतुः।

श्लोक 4.12

शॄदॄप्रां ह्रस्वोवा

śṝdṝprāṁ hrasvovā

लिट् परे होने पर शॄ (मारना), दॄ (मारना) तथा पॄ (पालन करना) धातुओं को विकल्प से ह्रस्व आदेश होता है; जैसे पप्रतुः अथवा पपरतुः।

श्लोक 4.13

केऽणः

ke'ṇaḥ

'क' प्रत्यय परे होने पर 'अण्' प्रत्ययान्त अङ्ग को ह्रस्व आदेश होता है; जैसे शबरजम्बुकः।

श्लोक 4.14

न कपि

na kapi

'कप्' प्रत्यय परे होने पर 'अण्' प्रत्ययान्त अङ्ग को उक्त ह्रस्वादेश नहीं होता; जैसे बहुकुमारीकः।

श्लोक 4.15

आपोऽन्यतरस्याम्

āpo'nyatarasyām

'कप्' प्रत्यय परे होने पर आकारान्त (आबन्त) अङ्ग को विकल्प से ह्रस्व आदेश होता है; जैसे बहुमालकः अथवा बहुमालाकः।

श्लोक 4.16

ऋदृशोऽङि गुणः

ṛdṛśo'ṅi guṇaḥ

'अङ्' (लुङ् का एक प्रकार) प्रत्यय परे होने पर 'ऋ' और 'दृश्' धातुओं को गुण आदेश होता है; जैसे अदर्शत्।

श्लोक 4.17

अस्यतेस्थुक्

asyatesthuk

'अङ्' प्रत्यय परे होने पर 'अस्' (फेंकना) धातु को 'थुक्' का आगम होता है; जैसे आस्थत्।

श्लोक 4.18

श्वयतेरः

śvayateraḥ

'अङ्' प्रत्यय परे होने पर 'श्वि' (सूजना) धातु के स्थान पर अकार आदेश होता है; जैसे अश्वत्।

श्लोक 4.19

पतःपुम्

pataḥpum

'अङ्' प्रत्यय परे होने पर 'पत्' (गिरना) धातु को 'पुम्' का आगम होता है; जैसे अपप्तत्।

श्लोक 4.20

वच उम्

vaca um

'अङ्' प्रत्यय परे होने पर 'वच्' धातु को 'उम्' का आगम होता है; जैसे अवोचत्।

श्लोक 4.21

शीङः सार्वधातुके गुणः

śīṅaḥ sārvadhātuke guṇaḥ

सार्वधातुक प्रत्यय परे होने पर 'शीङ्' (लेटना) धातु को गुण आदेश होता है; जैसे शेते।

श्लोक 4.22

अयङ् यि क्ङिति

ayaṅ yi kṅiti

यकारादि कित् अथवा ङित् प्रत्यय परे होने पर 'शीङ्' धातु के स्थान पर 'अयङ्' आदेश होता है; जैसे शय्यते।

श्लोक 4.23

उपसर्गाद्ध्रस्व ऊहतेः

upasargāddhrasva ūhateḥ

यकारादि कित् अथवा ङित् प्रत्यय परे होने पर उपसर्ग से परे 'ऊह्' धातु को ह्रस्व आदेश होता है; जैसे समुह्यते।

श्लोक 4.24

एतेर्लिङि

eterliṅi

यकारादि कित् अथवा ङित् 'लिङ्' प्रत्यय परे होने पर उपसर्ग से परे 'इण्' (जाना) धातु को ह्रस्व आदेश होता है; जैसे निरियात्।

श्लोक 4.25

अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः

akṛtsārvadhātukayordīrghaḥ

कृत् और सार्वधातुक से भिन्न यकारादि कित् या ङित् प्रत्यय परे होने पर स्वरान्त अङ्ग को दीर्घ आदेश होता है; जैसे क्षीयात्।

श्लोक 4.26

च्वौ च

cvau ca

'च्वि' प्रत्यय परे होने पर भी स्वरान्त अङ्ग को दीर्घ आदेश होता है; जैसे अग्निभवति में अग्नी।

श्लोक 4.27

रीङ् ऋतः

rīṅ ṛtaḥ

कृत्-भिन्न असार्वधातुक यकार और च्वि प्रत्यय परे होने पर ह्रस्व ऋकारान्त अङ्ग के स्थान पर 'रीङ्' आदेश होता है; जैसे पितृ से पित्र्यम्, मातृ से मात्री।

श्लोक 4.28

रिङ् शयग्लिङ्क्षु

riṅ śayagliṅkṣu

श, यक् तथा सार्वधातुक से भिन्न यकारादि 'लिङ्' प्रत्यय परे होने पर ऋकार के स्थान पर 'रिङ्' आदेश होता है; जैसे भ्रियात्।

श्लोक 4.29

गुणोऽर्तिसंयोगाद्योः

guṇo'rtisaṁyogādyoḥ

यक् तथा सार्वधातुक से भिन्न यकारादि लिङ् परे होने पर 'ऋ' और संयोगादि ऋकारान्त अङ्गों को गुण आदेश होता है; जैसे अर्यात्।

श्लोक 4.30

यङि च

yaṅi ca

'यङ्' प्रत्यय परे होने पर भी 'ऋ' और संयोगादि ऋकारान्त धातुओं को गुण आदेश होता है; जैसे स्मर्स्मर्यते।

श्लोक 4.31

ई घ्राध्मोः

ī ghrādhmoḥ

'यङ्' प्रत्यय परे होने पर 'घ्रा' और 'ध्मा' धातुओं को ईकार आदेश होता है; जैसे घ्रीघ्रीयते, ध्मीध्मीयते।

श्लोक 4.32

अस्य च्वौ

asya cvau

'च्वि' प्रत्यय परे होने पर अकारान्त/आकारान्त अङ्ग के स्वर के स्थान पर ईकार आदेश होता है; जैसे शुक्ल से शुक्लीकरोति।

श्लोक 4.33

क्यचि च

kyaci ca

'क्यच्' प्रत्यय परे होने पर भी अवर्णान्त अङ्ग को ईकार आदेश होता है; जैसे पुत्र से पुत्रीयति।

श्लोक 4.34

अशनायोदन्यधनाया बुभुक्षापिपासागर्धेषु

aśanāyodanyadhanāyā bubhukṣāpipāsāgardheṣu

भूख (बुभुक्षा), प्यास (पिपासा) तथा लोभ (गर्ध) के अर्थों में क्रमशः अशनाय, उदन्य तथा धनाय शब्दों का निपातन होता है; जैसे अशनायति, उदन्यति।

श्लोक 4.35

न च्छन्दस्य पुत्रस्य

na cchandasya putrasya

छन्द में 'पुत्र' से भिन्न अवर्णान्त अङ्ग को 'क्यच्' प्रत्यय परे उक्त कोई कार्य नहीं होता; जैसे मित्रयुः, संस्वेदयुः।

श्लोक 4.36

दुरस्युर्द्रविणस्युर्वृषण्यतिरिषण्यति

durasyurdraviṇasyurvṛṣaṇyatiriṣaṇyati

दुरस्युः, द्रविणस्युः, वृषण्यति तथा रिषण्यति—ये शब्द वेद में इसी रूप में निपातित हैं।

श्लोक 4.37

अश्वाघस्यात्

aśvāghasyāt

छन्द में 'क्यच्' प्रत्यय परे होने पर 'अश्व' और 'अघ' शब्दों को अकार आदेश होता है; जैसे अश्वायन्तो मघवन्।

श्लोक 4.38

देवसुम्नयोर्यजुषि काठके

devasumnayoryajuṣi kāṭhake

कठ-शाखा के यजुर्वेद के प्रयोग में 'क्यच्' प्रत्यय परे 'देव' और 'सुम्न' शब्दों को अकार आदेश होता है; जैसे देवायन्तो यजमानाय।

श्लोक 4.39

कव्यध्वरपृतनस्यर्चि लोपः

kavyadhvarapṛtanasyarci lopaḥ

ऋग्वेद के प्रयोग में 'क्यच्' प्रत्यय परे 'कवि', 'अध्वर' तथा 'पृतना' शब्दों का लोप होता है; जैसे कव्यन्तः सुमनसः।

श्लोक 4.40

द्यतिस्यतिमास्थामित्ति किति

dyatisyatimāsthāmitti kiti

तकारादि कित् प्रत्यय परे होने पर 'द्यति', 'स्यति', 'मा' तथा 'स्था' धातुओं को इकार आदेश होता है; जैसे स्थितः, मितः।

श्लोक 4.41

शाच्छोरन्यतरस्याम्

śācchoranyatarasyām

तकारादि कित् प्रत्यय परे होने पर 'शा' और 'छा' धातुओं को विकल्प से इकार आदेश होता है; जैसे निशितम् अथवा निशातम्।

श्लोक 4.42

दधातेर्हिः

dadhāterhiḥ

तकारादि कित् प्रत्यय परे होने पर 'धा' (धारण करना) धातु के स्थान पर 'हि' आदेश होता है; जैसे हितम्।

श्लोक 4.43

जहातेश्च क्त्वि

jahāteśca ktvi

'क्त्वा' प्रत्यय परे होने पर 'हा' (छोड़ना) धातु के स्थान पर भी 'हि' आदेश होता है; जैसे हित्वा।

श्लोक 4.44

विभाषा छन्दसि

vibhāṣā chandasi

छन्द में 'क्त्वा' परे भी 'हा' धातु को विकल्प से 'हि' आदेश होता है; जैसे हित्वा अथवा हात्वा।

श्लोक 4.45

सुधितवसुधितनेमधितधिष्वधिषीय च

sudhitavasudhitanemadhitadhiṣvadhiṣīya ca

छन्द में सुधित, वसुधित, नेमधित, धिष्व तथा धिषीय शब्दों का निपातन होता है; जैसे सुहितम् के स्थान पर सुधितम्।

श्लोक 4.46

दो दद् घोः

do dad ghoḥ

तकारादि कित् प्रत्यय परे होने पर घु-संज्ञक 'दा' धातु के स्थान पर 'दद्' आदेश होता है; जैसे दत्तः।

श्लोक 4.47

अच उपसर्गात्तः

aca upasargāttaḥ

तकारादि कित् प्रत्यय परे होने पर स्वरान्त उपसर्ग से पहले घु-संज्ञक 'दा' के स्थान पर 'त' आदेश होता है; जैसे प्रत्तम्, अवत्तम्।

श्लोक 4.48

अपो भि

apo bhi

भकारादि प्रत्यय परे होने पर 'अप्' (जल) शब्द के स्थान पर तकार आदेश होता है; जैसे अद्भिः।

श्लोक 4.49

सः स्यार्धधातुके

saḥ syārdhadhātuke

सकारादि आर्धधातुक प्रत्यय परे होने पर सकार के स्थान पर तकार आदेश होता है (घस् आदि में); जैसे जिघत्सति।

श्लोक 4.50

तासस्त्योर्लोपः

tāsastyorlopaḥ

सकारादि प्रत्यय परे होने पर 'तास्' और 'अस्' धातु के अन्त्य सकार का लोप होता है; जैसे भवितासि।

श्लोक 4.51

रि च

ri ca

रकारादि प्रत्यय परे होने पर भी 'तास्' और 'अस्' के सकार का लोप होता है; जैसे भवितारौ।

श्लोक 4.52

ह एति

ha eti

एकार परे होने पर 'तास्' और 'अस्' के सकार के स्थान पर हकार आदेश होता है; जैसे एधिताहे।

श्लोक 4.53

यीवर्णयोर्दीधीवेव्योः

yīvarṇayordīdhīvevyoḥ

'दीधी' और 'वेवी' धातुओं का यकारादि तथा इवर्णादि प्रत्यय परे लोप हो जाता है; जैसे दीधीत, वेवीत।

श्लोक 4.54

सनि मीमाघुरभलभशकपतपदामच इस्

sani mīmāghurabhalabhaśakapatapadāmaca is

सकारादि 'सन्' प्रत्यय परे होने पर मी, मा, द्यु, रभ्, लभ्, शक्, पत् तथा पद्—इन धातुओं के स्वर के स्थान पर 'इस्' आदेश होता है; जैसे मित्सति, आरिप्सते।

श्लोक 4.55

आप्ज्ञप्यृधामीत्

āpjñapyṛdhāmīt

सकारादि 'सन्' प्रत्यय परे होने पर आप्, ज्ञप् तथा ऋध् धातुओं के स्वर के स्थान पर 'ई' आदेश होता है; जैसे ईप्सति।

श्लोक 4.56

दम्भ इच्च

dambha icca

सकारादि 'सन्' प्रत्यय परे होने पर 'दम्भ्' धातु के स्वर को इकार तथा विकल्प से ईकार आदेश होता है; जैसे धिप्सति अथवा धीप्सति।

श्लोक 4.57

मुचोऽकर्मकस्य गुणो वा

muco'karmakasya guṇo vā

सकारादि 'सन्' प्रत्यय परे होने पर अकर्मक 'मुच्' धातु को विकल्प से गुण आदेश होता है; जैसे मोक्षते।

श्लोक 4.58

अत्र लोपोऽभ्यासस्य

atra lopo'bhyāsasya

'सनि मीमाघु...' से लेकर 'मुचोऽकर्मकस्य' तक बताए गए सभी धातुओं में अभ्यास (द्वित्व-भाग) का लोप होता है; जैसे शक् से शिक्षति।

श्लोक 4.59

ह्रस्वः

hrasvaḥ

अभ्यास (द्वित्व-भाग) के स्वर को ह्रस्व आदेश होता है; जैसे भू से भु भूव् अ।

श्लोक 4.60

हलादिः शेषः

halādiḥ śeṣaḥ

द्वित्व करते समय अभ्यास का केवल आदि व्यञ्जन (उसके स्वर सहित) शेष रहता है, शेष सब वर्णों का लोप हो जाता है; जैसे चकास् से 'च' मात्र शेष रहता है।

श्लोक 4.61

शर्पूर्वाः खयः

śarpūrvāḥ khayaḥ

श, ष अथवा स से पहले आनेवाले झय् (वर्गों के प्रथम चार वर्ण) वर्ण अभ्यास में शेष रहते हैं, अन्य लुप्त हो जाते हैं; जैसे श्च्युत् से चुश्च्युत्।

श्लोक 4.62

कुहोश्चुः

kuhoścuḥ

अभ्यास के कवर्ग और हकार के स्थान पर चवर्ग आदेश होता है; जैसे खन् से चखान।

श्लोक 4.63

न कवतेर्यङि

na kavateryaṅi

'यङ्' प्रत्यय परे होने पर 'कु' (शब्द करना) धातु के अभ्यास के कवर्ग को उक्त चवर्गादेश नहीं होता।

श्लोक 4.64

कृषेश्छन्दसि

kṛṣeśchandasi

छन्द में 'यङ्' प्रत्यय परे 'कृष्' धातु के अभ्यास के ककार को भी चकारादेश नहीं होता; जैसे करीकृष्यते।

श्लोक 4.65

दाधर्तिदर्धर्तिदर्धषिबोभूतुतेतिक्तेऽलर्ष्यापनीफणत्संसनिष्यदत्करिक्रत्कनिक्रदद्भरिभ्रद्दविध्वतोदविद्युतत्तरित्रतःसरीसृपतंवरीवृजन्मर्मृज्यागनीगन्तीति च

dādhartidardhartidardhaṣibobhūtutetikte'larṣyāpanīphaṇatsaṁsaniṣyadatkarikratkanikradadbharibhraddavidhvatodavidyutattaritrataḥsarīsṛpataṁvarīvṛjanmarmṛjyāganīgantīti ca

छन्द में दाधर्ति, दर्धर्ति, दर्धर्षि, बोभूतु, तेतिक्ते आदि अनेक अनियमित पदों का निपातन होता है।

श्लोक 4.66

उरत्

urat

अभ्यास के ऋकार के स्थान पर ह्रस्व अकार आदेश होता है; जैसे कृ के अभ्यास से गोपायाञ्चकार।

श्लोक 4.67

द्युतिस्वाप्योःसंप्रसारणम्

dyutisvāpyoḥsaṁprasāraṇam

'द्युत्' (चमकना) और 'स्वप्' (सोना) के अभ्यास के यकार और वकार के स्थान पर क्रमशः इकार और उकार आदेश होता है; जैसे दिद्युते।

श्लोक 4.68

व्यथो लिटि

vyatho liṭi

'लिट्' प्रत्यय परे होने पर 'व्यथ्' धातु के अभ्यास को भी संप्रसारण होता है; जैसे विव्यथे।

श्लोक 4.69

दीर्घ इणः किति

dīrgha iṇaḥ kiti

कित्-संज्ञक लिट् प्रत्यय परे होने पर 'इण्' (जाना) धातु के अभ्यास को दीर्घ आदेश होता है; जैसे ईयतुः।

श्लोक 4.70

अत आदेः

ata ādeḥ

'लिट्' प्रत्यय परे होने पर अभ्यास के आदि ह्रस्व अकार को दीर्घ आदेश होता है; जैसे अत् से आत।

श्लोक 4.71

तस्मान्नुड् द्विहलः

tasmānnuḍ dvihalaḥ

उक्त दीर्घ आकार से परे यदि अङ्ग में दो व्यञ्जन हों तो उसे 'नुट्' (न्) का आगम होता है; जैसे अर्च् से आनर्च।

श्लोक 4.72

अश्नोतेश्च

aśnoteśca

उक्त दीर्घीभूत अभ्यास से पहले 'अशू' (व्याप्त होना) धातु को भी 'नुट्' का आगम होता है; जैसे व्यानशे।

श्लोक 4.73

भवतेरः

bhavateraḥ

'लिट्' प्रत्यय परे होने पर 'भू' धातु के अभ्यास के उकार के स्थान पर अकार आदेश होता है; जैसे बभूव।

श्लोक 4.74

ससूवेति निगमे

sasūveti nigame

वैदिक (निगम) प्रयोग में 'ससूव' शब्द का निपातन होता है; जैसे ससूव स्थविरं विपश्चिताम्।

श्लोक 4.75

निजां त्रयाणां गुणः श्लौ

nijāṁ trayāṇāṁ guṇaḥ ślau

श्लु के विषय में णिज्, विज् तथा विष्—इन तीन धातुओं के अभ्यास के स्थान पर गुण आदेश होता है; जैसे नेनेक्ति।

श्लोक 4.76

भृञामित्

bhṛñāmit

श्लु के विषय में 'भृ' आदि तीन धातुओं के अभ्यास के स्थान पर इकार आदेश होता है; जैसे मा से मिमीते।

श्लोक 4.77

अर्तिपिपर्त्योश्च

artipipartyośca

श्लु के विषय में 'ऋ' (जाना) और 'पृ' (पालन करना) धातुओं के अभ्यास के स्थान पर भी इकार आदेश होता है; जैसे पिपर्ति।

श्लोक 4.78

बहुलं छन्दसि

bahulaṁ chandasi

छन्द में श्लु होने पर भी अभ्यास के स्थान में गुण बाहुल्येन (अनियमित रूप से) होता है; जैसे पूर्णा विवष्टि।

श्लोक 4.79

सन्यतः

sanyataḥ

'सन्' प्रत्यय परे होने पर (अथवा सन्वद्भाव में) अभ्यास के अकार के स्थान पर इकार आदेश होता है; जैसे अचिकमत्।

श्लोक 4.80

ओःपुयण्ज्यपरे

oḥpuyaṇjyapare

अवर्ण-परक पवर्ग, यण् (य्,व्,र्,ल्) अथवा जकार परे होने पर सन्-परक अङ्ग के अभ्यास के उकार के स्थान पर इकार आदेश होता है।

श्लोक 4.81

स्त्रवतिश्रऋणोतिद्रवतिप्रवतिप्लवतिच्यवतीनां वा

stravatiśraṛṇotidravatipravatiplavaticyavatīnāṁ vā

'सन्' प्रत्यय परे उक्त प्रकार में स्त्रु, श्रु, द्रु, प्रु, प्लु तथा च्यु धातुओं के अभ्यास के उकार को विकल्प से इकार आदेश होता है; जैसे सिस्त्रावयिषति अथवा सुस्त्रावयिषति।

श्लोक 4.82

गुणो यङ्लुकोः

guṇo yaṅlukoḥ

'यङ्' अथवा 'यङ्लुक्' प्रत्यय परे होने पर अभ्यास के इक् (इ,उ,ऋ,ऌ) के स्थान पर गुण आदेश होता है; जैसे बोभूयते।

श्लोक 4.83

दीर्घोऽकितः

dīrgho'kitaḥ

'यङ्' अथवा 'यङ्लुक्' प्रत्यय परे होने पर कित्-भिन्न अभ्यास को दीर्घ आदेश होता है; जैसे वाव्रज्यते।

श्लोक 4.84

नीग्वञ्चुस्त्रंसुध्वंसुभ्रंसुकसपतपदस्कन्दाम्

nīgvañcustraṁsudhvaṁsubhraṁsukasapatapadaskandām

'यङ्' तथा 'यङ्लुक्' के विषय में वञ्चु, ध्वंसु, स्त्रंसु, भ्रंशु, कस्, पत्, पद् तथा स्कन्द्—इन आठ धातुओं के अभ्यास को 'नीक्' का आगम होता है; जैसे वनीवच्यते।

श्लोक 4.85

नुगतोऽनुनासिकान्तस्य

nugato'nunāsikāntasya

'यङ्' तथा 'यङ्लुक्' के विषय में अनुनासिकान्त अकारान्त अङ्ग के अभ्यास को 'नुक्' का आगम होता है; जैसे गम् से जङ्गम्यते।

श्लोक 4.86

जपजभदहदशभञ्जपशां च

japajabhadahadaśabhañjapaśāṁ ca

'यङ्' तथा 'यङ्लुक्' में जप्, जभ्, दह्, दश्, भञ्ज् तथा पश्—इन धातुओं के अभ्यास को भी 'नुक्' का आगम होता है; जैसे जंजप्यते।

श्लोक 4.87

चरफलोश्च

caraphalośca

'यङ्' तथा 'यङ्लुक्' में 'चर्' और 'फल्' धातुओं के अभ्यास को भी 'नुक्' का आगम होता है; जैसे चञ्चूर्यते।

श्लोक 4.88

उत्परस्यातः

utparasyātaḥ

'यङ्' तथा 'यङ्लुक्' में 'चर्' और 'फल्' धातुओं के अभ्यास से परे के अकार के स्थान पर इकार आदेश होता है; जैसे चञ्चुरीति।

श्लोक 4.89

ति च

ti ca

इसी प्रकार 'ति' प्रत्यय परे भी अभ्यासोत्तर अकार को इकार आदेश होता है; जैसे चूर्तिः, प्रफुल्तिः।

श्लोक 4.90

रीगृदुपधस्य च

rīgṛdupadhasya ca

'यङ्' तथा 'यङ्लुक्' परे होने पर ऋकार-उपधावाले अङ्ग के अभ्यास को 'रीक्' का आगम होता है; जैसे वृत् से वरीवृत्यते।

श्लोक 4.91

रूग्रिकौ च लुकि

rūgrikau ca luki

'यङ्लुक्' में ऋकार-उपधावाले अङ्ग के अभ्यास को 'रीक्' के साथ-साथ 'रुक्' और 'रिक्' का भी आगम होता है; जैसे नर्नर्ति, नरिनर्ति, नरीनर्ति।

श्लोक 4.92

ऋतश्च

ṛtaśca

'यङ्लुक्' में ऋकारान्त अङ्ग के अभ्यास को भी 'रुक्', 'रिक्' तथा 'रीक्' का आगम होता है; जैसे कृ से चर्कर्ति।

श्लोक 4.93

सन्वल्लघुनि चङ्परेऽनग्लोपे

sanvallaghuni caṅpare'naglope

यदि णि के कारण अक् का लोप न हुआ हो तो चङ्-परक णि परे होने पर लघु अभ्यासवाले अङ्ग को 'सन्' के समान व्यवहार (सन्वद्भाव) होता है।

श्लोक 4.94

दीर्घो लघोः

dīrgho laghoḥ

सन्वद्भाव के विषय में अभ्यास के लघु स्वर को दीर्घ आदेश होता है; जैसे अचीकमत्।

श्लोक 4.95

अत्स्मृ दॄत्वरप्रथम्रदस्तॄस्पशाम्

atsmṛ dṝtvaraprathamradastṝspaśām

चङ्-परक णि प्रत्यय परे होने पर स्मृ, दृ, त्वर्, प्रथ्, म्रद्, स्तृ तथा स्पश्—इन धातुओं के अभ्यास के स्थान में अकार आदेश होता है; जैसे असस्मरत्।

श्लोक 4.96

विभाषा वेष्टिचेष्ट्योः

vibhāṣā veṣṭiceṣṭyoḥ

चङ्-परक णि प्रत्यय परे होने पर 'वेष्ट्' और 'चेष्ट्' धातुओं के अभ्यास के स्थान में विकल्प से अकार आदेश होता है; जैसे अववेष्टत् अथवा अविवेष्टत्।

श्लोक 4.97

ई च गणः

ī ca gaṇaḥ

चङ्-परक णि प्रत्यय परे होने पर 'गण्' (गिनना) धातु के अभ्यास के स्थान में ईकार (और अकार) आदेश होता है; जैसे अजीगणत्।

अष्टमोऽध्यायः, प्रथमः पादः

श्लोक 1.1

सर्वस्य द्वे

sarvasya dve

यह अधिकार-सूत्र है — इससे आगे 'सर्वस्य द्वे' अर्थात् पूरे शब्द के द्वित्व (दुहराव) का अधिकार अगले सूत्रों तक चलता है।

श्लोक 1.2

तस्य परमाम्रेडितम्

tasya paramāmreḍitam

द्वित्व होने पर शब्द का पिछला (दूसरा) रूप 'आम्रेडित' संज्ञा पाता है।

श्लोक 1.3

अनुदात्तं च

anudāttaṁ ca

आम्रेडित संज्ञा पाने वाला रूप सर्वत्र अनुदात्त (स्वररहित) हो जाता है।

श्लोक 1.4

नित्यवीप्सयोः

nityavīpsayoḥ

'सदा ऐसा ही होता है' (नित्य) और 'एक-एक करके' (वीप्सा) अर्थ में शब्द का द्वित्व होता है; जैसे 'पचति पचति' (वह बार-बार पकाता ही रहता है), 'ग्रामो ग्रामो रमणीयः' (गाँव-गाँव सुंदर है)।

श्लोक 1.5

परेर्वर्जने

parervarjane

'छोड़कर, को अलग रखते हुए' अर्थ में प्रयुक्त 'परि' शब्द का द्वित्व होता है; जैसे 'परि परि त्रिगर्तेभ्यो वृष्टो देवः' (त्रिगर्त देश को छोड़कर सर्वत्र वर्षा हुई)।

श्लोक 1.6

प्रसमुपोदःपादपूरणे

prasamupodaḥpādapūraṇe

छन्द के पाद (चरण) को पूरा करने के लिए ही, बिना किसी अर्थभेद के, प्र, सम्, उप और उत् शब्दों का द्वित्व होता है।

श्लोक 1.7

उपर्यध्यधसःसामीप्ये

uparyadhyadhasaḥsāmīpye

'निकटता, एक के बाद एक सटकर' अर्थ अभीष्ट होने पर उपरि, अधि और अधस् शब्दों का द्वित्व होता है; जैसे 'उपर्युपरि दुःखम्' (दुःख पर दुःख)।

श्लोक 1.8

वाक्यादेरामन्त्रितस्यासूयाऽसंमति-कोपकुत्सनभर्त्सनेषु

vākyāderāmantritasyāsūyā'saṁmati-kopakutsanabhartsaneṣu

यदि वाक्य का भाव ईर्ष्या, सहमति, क्रोध, तिरस्कार अथवा धिक्कार में से किसी एक में परिणत हो, तो वाक्य के आरम्भ में आया सम्बोधन-पद (आमन्त्रित) दुहराया जाता है।

श्लोक 1.9

एकं बहुव्रीहिवत्

ekaṁ bahuvrīhivat

'एक' शब्द का द्वित्व होता है और बना हुआ पद बहुव्रीहि समास की तरह व्यवहृत होता है; जैसे 'एकैकम् अक्षरं पठति' (वह एक-एक अक्षर पढ़ता है)।

श्लोक 1.10

आबाधे च

ābādhe ca

पीड़ा या कष्ट का अर्थ होने पर भी शब्द का द्वित्व होता है और वह बहुव्रीहि की तरह व्यवहृत होता है; जैसे 'गतगतः' (जो बार-बार चला गया, विवशता से)।

श्लोक 1.11

कर्मधारयवदुत्तरेषु

karmadhārayavaduttareṣu

अब आगे जो द्वित्व-सम्बन्धी कार्य बताए जाएँगे, वे कर्मधारय समास की तरह होंगे (बहुव्रीहि की तरह नहीं)।

श्लोक 1.12

प्रकारे गुणवचनस्य

prakāre guṇavacanasya

'जैसा-वैसा, सादृश्यमात्र' (प्रकार) अर्थ में गुणवाचक शब्द का द्वित्व होता है; जैसे 'पटुपटुः' (कुछ-कुछ चतुर-सा)।

श्लोक 1.13

अकृच्छ्रे प्रियसुखयोरन्यतरस्याम्

akṛcchre priyasukhayoranyatarasyām

कठिनाई के अभाव (सहजता) का बोध कराने के लिए 'प्रिय' और 'सुख' शब्दों का विकल्प से द्वित्व होता है; जैसे 'प्रियप्रियेण ददाति' अथवा (पक्ष में) केवल 'प्रियेण ददाति'।

श्लोक 1.14

यथास्वे यथायथम्

yathāsve yathāyatham

'अपने-अपने ढंग से' अर्थ बताने के लिए 'यथा' शब्द के द्वित्व तथा नपुंसकलिंग रूप 'यथायथम्' का निपातन (विशेष निर्माण) किया गया है।

श्लोक 1.15

द्वन्द्वं रहस्यमर्यादावचनव्युत्क्रमण यज्ञपात्रप्रयोगाभिव्यक्तिषु

dvandvaṁ rahasyamaryādāvacanavyutkramaṇa yajñapātraprayogābhivyaktiṣu

'द्वन्द्व' शब्द का द्वित्व निपातन से सिद्ध होता है — पाँच अर्थों में: दो व्यक्तियों के बीच का भेद (रहस्य), निश्चित मर्यादा का कथन, आपस में अलग हो जाना (व्युत्क्रमण), यज्ञपात्रों का क्रमशः प्रयोग, और परस्पर सहचर्य से बनी पहचान (अभिव्यक्ति); जैसे 'द्वन्द्वं मन्त्रयन्ते' (वे दोनों गुप्त मंत्रणा करते हैं)।

श्लोक 1.16

पदस्य

padasya

यह अधिकार-सूत्र है — 'पद का' यह अधिकार आगे के सूत्रों में चलता रहता है, अर्थात् अब से वर्णित सभी कार्य 'पद' (पूर्ण विभक्त्यन्त शब्द) के स्थान में होने वाले माने जाएँगे।

श्लोक 1.17

पदात्

padāt

यह भी अधिकार-सूत्र है — 'पद से' यह अधिकार आगे चलता है, अर्थात् अब वर्णित कार्य पद के ठीक बाद होने वाले माने जाएँगे।

श्लोक 1.18

अनुदात्तं सर्वमपादादौ

anudāttaṁ sarvamapādādau

यह अधिकार-सूत्र है, जिससे आगे 'अनुदात्त', 'सर्वम्' (पूर्णतः) और 'अपादादौ' (पादारम्भ में न होने पर) — इन तीनों पदों का अधिकार चलता है।

श्लोक 1.19

आमन्त्रितस्य च

āmantritasya ca

पद के बाद आया सम्बोधन-पद (आमन्त्रित), यदि वह पाद के आरम्भ में न हो, तो पूरी तरह अनुदात्त हो जाता है; जैसे 'पचसि देवदत्त' में 'देवदत्त' का लोप-सा स्वर।

श्लोक 1.20

युष्मदस्मदोः षष्ठीचतुर्थी-द्वितीयास्थयोर्वा अनावौ

yuṣmadasmadoḥ ṣaṣṭhīcaturthī-dvitīyāsthayorvā anāvau

पद के बाद, षष्ठी, चतुर्थी और द्वितीया विभक्ति के द्विवचन में, 'युष्मद्' और 'अस्मद्' के स्थान पर क्रमशः अनुदात्त आदेश 'वाम्' और 'नौ' होते हैं; जैसे 'ग्रामो वां स्वम्' (गाँव तुम दोनों का धन है)।

श्लोक 1.21

बहुवचनस्य वस्-नसौ

bahuvacanasya vas-nasau

उन्हीं विभक्तियों के बहुवचन में 'युष्मद्' और 'अस्मद्' के स्थान पर क्रमशः 'वस्' और 'नस्' आदेश होते हैं; जैसे 'ग्रामो वः स्वम्' (गाँव तुम सबका धन है)।

श्लोक 1.22

तेमयावेकवचनस्य

temayāvekavacanasya

षष्ठी और चतुर्थी के एकवचन में 'युष्मद्' और 'अस्मद्' के स्थान पर क्रमशः 'ते' और 'मे' आदेश होते हैं; जैसे 'ग्रामस्ते स्वम्' (गाँव तुम्हारा धन है)।

श्लोक 1.23

त्वामौ द्वितीयायाः

tvāmau dvitīyāyāḥ

द्वितीया के एकवचन में 'युष्मद्' और 'अस्मद्' के स्थान पर क्रमशः 'त्वा' और 'मा' आदेश होते हैं; जैसे 'ग्रामस्त्वा पश्यति' (गाँव तुम्हें देखता है)।

श्लोक 1.24

न चवाहाहैवयुक्ते

na cavāhāhaivayukte

यदि 'युष्मद्'/'अस्मद्' के साथ च, वा, ह, अह अथवा एव शब्द जुड़ा हो, तो ऊपर बताए गए वाम्-नौ आदि आदेश नहीं होते, पूरा रूप ही रहता है — जैसे 'ग्रामस्तव च स्वम्'।

श्लोक 1.25

पश्यार्थेश्चानालोचने

paśyārtheścānālocane

देखने के अर्थ वाले शब्दों (जैसे 'पश्य') से जुड़े होने पर भी, यदि वह केवल आँख से देखना न होकर 'ध्यान में रखकर' अर्थ में हो, तो वाम्-नौ आदि आदेश नहीं होते; जैसे 'ग्रामस्तव स्वं समीक्ष्यागतः' (तुम्हारी सम्पत्ति का ख़याल करके आया)।

श्लोक 1.26

सपूर्वायाः प्रथमाया-विभाषा

sapūrvāyāḥ prathamāyā-vibhāṣā

यदि प्रथमान्त पद के पहले भी कोई अन्य शब्द विद्यमान हो, तो उस प्रथमान्त पद के बाद आए 'युष्मद्'/'अस्मद्' के वाम्-नौ आदि आदेश विकल्प से नहीं होते; जैसे 'ग्रामे कम्बलस्ते स्वम्' या पक्ष में 'ग्रामे कम्बलस्तव स्वम्'।

श्लोक 1.27

तिङो गोत्रादीनि कुत्सनाभीक्ष्ण्ययोः

tiṅo gotrādīni kutsanābhīkṣṇyayoḥ

तिङन्त (क्रियापद) से पहले यदि गोत्र-आदि शब्द निन्दा अथवा बार-बार दोहराए जाने (आभीक्ष्ण्य) के अर्थ में आए, तो वह अनुदात्त हो जाता है; जैसे 'पचति गोत्रम्' (निन्दा में 'कुलहीन पकाता है')।

श्लोक 1.28

तिङ् ङतिङः

tiṅ ṅatiṅaḥ

अतिङन्त (क्रियापद न होने वाला) पद के बाद आया तिङन्त पद अनुदात्त हो जाता है; जैसे 'देवदत्तः पचति' में क्रिया 'पचति' का स्वर चला जाता है।

श्लोक 1.29

न लुट्

na luṭ

किन्तु लुट् लकार (सामान्य भविष्यत्) में स्थित क्रिया का, उपर्युक्त नियम होते हुए भी, अनुदात्त नहीं होता; जैसे 'श्वः कर्त्ता' अपने स्वर के साथ ही रहता है।

श्लोक 1.30

निपातैर्यद्यदिहन्तकुविन्नेच्चेच्चण्क-च्चिद्यत्रयुक्तम्

nipātairyadyadihantakuvinnecceccaṇka-ccidyatrayuktam

यत्, यदि, हन्त, कुवित्, नेत्, चेत्, चण्, कच्चित् और यत्र — इन निपातों से जुड़ी क्रिया अनुदात्त हो जाती है; जैसे 'यत् करोति' (जो कुछ करता है)।

श्लोक 1.31

नह प्रत्यारम्भे

naha pratyārambhe

पुनः आरम्भ किए जाने के भाव में 'नह' शब्द से जुड़ी क्रिया अनुदात्त होती है; जैसे 'नह भोक्ष्यसे' (अब फिर से तो तुम खाओगे ही नहीं)।

श्लोक 1.32

सत्यं प्रश्ने

satyaṁ praśne

प्रश्न का भाव होने पर 'सत्यम्' शब्द से जुड़ी क्रिया अनुदात्त होती है; जैसे 'सत्यं भोक्ष्यसे' (सचमुच खाओगे न?)।

श्लोक 1.33

अङ्गात्प्रातिलोम्ये

aṅgātprātilomye

विपरीत भाव (व्यंग्य में उलटी बात कहना) व्यक्त होने पर 'अङ्ग' शब्द के बाद आई क्रिया अनुदात्त होती है; जैसे 'अङ्ग कुरु' (कर तो सही, देखें!)।

श्लोक 1.34

हि च

hi ca

उसी व्यंग्यात्मक भाव में 'हि' शब्द से जुड़ी क्रिया भी अनुदात्त होती है; जैसे 'त्वं हि कुरु'।

श्लोक 1.35

छ्न्दस्यनेकमपि साकाङ्क्षम्

chndasyanekamapi sākāṅkṣam

वेद में, 'हि' के बाद परस्पर सम्बद्ध (साकांक्ष) एक से अधिक क्रियापद हों तो भी वे सभी अनुदात्त होते हैं।

श्लोक 1.36

यावद्यथाभ्याम्

yāvadyathābhyām

आदर (पूजा) का भाव होने पर 'यावत्' और 'यथा' शब्दों से पहले आई क्रिया अनुदात्त होती है; जैसे 'यावद् भुङ्क्ते' (जब तक वे भोजन करते रहें, आदरसूचक)।

श्लोक 1.37

पूजायां नानन्तरम्

pūjāyāṁ nānantaram

किन्तु आदर का भाव होते हुए भी, यदि क्रिया 'यावत्'/'यथा' के ठीक बाद, बिना किसी व्यवधान के आए, तो अनुदात्त नहीं होती; जैसे 'यावत् पचति शोभनम्'।

श्लोक 1.38

उपसर्गव्यपेतं च

upasargavyapetaṁ ca

और यह अपवाद तब भी बना रहता है जब 'यावत्'/'यथा' और क्रिया के बीच केवल एक उपसर्ग व्यवधान करे; जैसे 'यावत् प्रपचति शोभनम्'।

श्लोक 1.39

तुपश्यपश्यताहैः पूजायाम्

tupaśyapaśyatāhaiḥ pūjāyām

आदर का भाव होने पर तु, पश्य, पश्यत और अह — इन शब्दों से जुड़ी क्रिया अनुदात्त होती है; जैसे 'पश्य माणवको भुङ्क्ते शोभनम्'।

श्लोक 1.40

अहो च

aho ca

उसी प्रकार आदर के भाव में 'अहो' शब्द से जुड़ी क्रिया भी अनुदात्त होती है; जैसे 'अहो देवदत्तः पचति शोभनम्'।

श्लोक 1.41

शेषे विभाषा

śeṣe vibhāṣā

आदर के अतिरिक्त अन्य भावों में 'अहो' से जुड़ी क्रिया विकल्प से अनुदात्त होती है।

श्लोक 1.42

पुरा च परीप्सायाम्

purā ca parīpsāyām

किसी बात के जल्दी घटित हो जाने की आशंका (परीप्सा) के भाव में 'पुरा' शब्द से जुड़ी क्रिया विकल्प से अनुदात्त होती है; जैसे 'पुरा विद्योतते विद्युत्' (कहीं बिजली न चमक जाए, इससे पहले...)।

श्लोक 1.43

नन्वित्यनुज्ञैषणायाम्

nanvityanujñaiṣaṇāyām

अनुमति माँगने के भाव में 'ननु' शब्द के बाद आई क्रिया अनुदात्त होती है; जैसे 'ननु करोमि भोः' (तो मैं करूँ न, महोदय?)।

श्लोक 1.44

किं क्रियाप्रश्नेऽनुपसर्गमप्रतिषिद्धम्

kiṁ kriyāpraśne'nupasargamapratiṣiddham

जब 'किम्' शब्द से क्रिया के विषय में ही प्रश्न पूछा जाए, तो उपसर्गरहित और निषेध का विषय न बनी हुई वह क्रिया अनुदात्त होती है; जैसे 'किं देवदत्तः पचति आहोस्विद् भुङ्क्ते' (क्या देवदत्त पकाता है या खाता है?)।

श्लोक 1.45

लोपे विभाषाः

lope vibhāṣāḥ

यदि उपर्युक्त 'किम्' का लोप हो गया हो, तो यह अनुदात्तत्व विकल्प से होता है; जैसे 'देवदत्तः पचति आहोस्वित् पठति' में क्रिया विकल्प से अनुदात्त होती है।

श्लोक 1.46

एहिमन्ये प्रहासे ऌट्

ehimanye prahāse ḷṭ

उपहास (प्रहास) के भाव में 'एहि मन्ये' पदसमूह से जुड़ी लृट् (सामान्य भविष्यत्) की क्रिया अनुदात्त होती है; जैसे 'एहि मन्ये ओदनं भोक्ष्यसे' (आओ, मान लो कि अब तुम खाओगे ही — व्यंग्य में)।

श्लोक 1.47

जात्वपूर्वम्

jātvapūrvam

जिस वाक्य में 'जातु' (कभी-न-कभी) शब्द से पहले कुछ भी न हो, उससे जुड़ी क्रिया अनुदात्त होती है; जैसे 'जातु भोक्ष्यसे'।

श्लोक 1.48

किंवृत्तं च चिदुत्तरम्

kiṁvṛttaṁ ca ciduttaram

'किम्' से बने हुए शब्द (जैसे कथम्, क्व) के बाद 'चित्' जुड़ा हो, तो उससे सम्बद्ध क्रिया भी (सूत्र ४४ की भाँति) अनुदात्त होती है।

श्लोक 1.49

आहो उताहो चानन्तरम्

āho utāho cānantaram

जिसके पहले कोई अन्य पद न हो, ऐसे 'आहो' या 'उताहो' शब्द से जुड़ी और उसके ठीक बाद आई क्रिया अनुदात्त होती है; जैसे 'आहो भुङ्क्ते'।

श्लोक 1.50

शेषे विभाषा

śeṣe vibhāṣā

अन्य स्थितियों में, अर्थात् 'आहो'/'उताहो' और क्रिया के बीच शब्दान्तर हो, तो यह अनुदात्तत्व विकल्प से होता है; जैसे 'आहो देवदत्तः पचति' में विकल्प है।

श्लोक 1.51

गत्यर्थलोटा ऌण्न चेत्कारकं सर्वान्यत्

gatyarthaloṭā ḷṇna cetkārakaṁ sarvānyat

जिस कर्ता या कर्म को गत्यर्थक धातु की लोट्-क्रिया इंगित करती हो, उसी कर्ता या कर्म को इंगित करने वाली लृट् (भविष्यत्) की क्रिया अनुदात्त होती है, बशर्ते कारक बिलकुल भिन्न न हो; जैसे 'आगच्छ देवदत्त ग्रामं द्रक्ष्यसि' में 'द्रक्ष्यसि'।

श्लोक 1.52

लोट् च

loṭ ca

उसी शर्त पर लोट् (आज्ञार्थक) की क्रिया भी अनुदात्त होती है; जैसे 'आगच्छ देवदत्त ग्रामं पश्य'।

श्लोक 1.53

विभाषितं सोपसर्गमनुत्तमम्

vibhāṣitaṁ sopasargamanuttamam

किन्तु यदि वह लोट् की क्रिया उपसर्गसहित हो और उत्तमपुरुष (मैं/हम) में न हो, तो अनुदात्तत्व विकल्प से होता है; जैसे 'आगच्छ देवदत्त ग्रामं प्रविश' में विकल्प है।

श्लोक 1.54

हन्त च

hanta ca

उसी उपसर्गसहित, अनुत्तमपुरुष लोट्-क्रिया का, 'हन्त' शब्द से जुड़े होने पर भी, अनुदात्तत्व विकल्प से होता है; जैसे 'हन्त प्रविश'।

श्लोक 1.55

आम एकान्तरमामन्त्रितमनन्तिके

āma ekāntaramāmantritamanantike

'आम्' शब्द से ठीक एक पद के अन्तर पर आया सम्बोधन-पद — जो न तो एकदम सटा है, न बहुत दूर — अनुदात्त नहीं होता; जैसे 'आम् पचसि देवदत्त' में विशेष स्थिति।

श्लोक 1.56

यद्धितुपरं छ्न्दसि

yaddhituparaṁ chndasi

वेद में, जिस क्रिया के ठीक बाद यत्, हि अथवा तु शब्द आए, वह क्रिया अनुदात्त नहीं होती।

श्लोक 1.57

चनचिदिवगोत्रादितद्धिता-म्रेडितेष्वगतेः

canacidivagotrāditaddhitā-mreḍiteṣvagateḥ

गतिसंज्ञक न होने वाली क्रिया, यदि उसके बाद चन, चित्, इव, गोत्रादि शब्द, तद्धितान्त शब्द अथवा आम्रेडित पद आए, तो वह अनुदात्त नहीं होती।

श्लोक 1.58

चादिषु च

cādiṣu ca

इसी प्रकार, गतिसंज्ञक न होने वाली क्रिया के बाद च, वा, ह, अह अथवा एव आए, तो भी वह अनुदात्त नहीं होती।

श्लोक 1.59

चवायोगे प्रथमा

cavāyoge prathamā

दो सहभावी किन्तु असम्बद्ध क्रियाओं में से, 'च' या 'वा' से जुड़ा पहला तिङन्त पद अनुदात्त नहीं होता; जैसे 'गर्दभांश्च कालयति वीणां च वादयति' में 'कालयति' अपना स्वर बनाए रखता है।

श्लोक 1.60

हेति क्षियायाम्

heti kṣiyāyām

धर्म के उल्लंघन का भाव होने पर, 'ह' से जुड़ा पहला तिङन्त पद अनुदात्त नहीं होता; जैसे 'स्वयं ह रथेन याति, उपाध्यायं पदातिं गमयति'।

श्लोक 1.61

अहेति विनियोगे च

aheti viniyoge ca

अनेक प्रयोजनों में बँटी हुई प्रेरणा (विनियोग) अथवा धर्मोल्लंघन का भाव होने पर, 'अह' से जुड़ा पहला तिङन्त पद अनुदात्त नहीं होता।

श्लोक 1.62

चाहलोप एवेत्यवधारणम्

cāhalopa evetyavadhāraṇam

यदि 'च' अथवा 'अह' का लोप होकर 'एव' शब्द से बल दिया गया हो, तब भी पहला तिङन्त पद अनुदात्त नहीं होता; जैसे 'देवदत्त एव ग्रामं गच्छतु'।

श्लोक 1.63

चादिलोपे विभाषा

cādilope vibhāṣā

किन्तु च, वा, ह, अह अथवा एव — इनमें से किसी का भी (बिना विशेष बल के) लोप हो जाए, तो पहले तिङन्त पद का अनुदात्तत्व विकल्प से होता है।

श्लोक 1.64

वैवावेति च च्छन्दसि

vaivāveti ca cchandasi

वेद में 'वै' और 'वाव' शब्दों से जुड़ा पहला तिङन्त पद भी विकल्प से अनुदात्त होता है; जैसे 'अहर्वै देवानामासीत्'।

श्लोक 1.65

एकान्याभ्यां समर्थाभ्याम्

ekānyābhyāṁ samarthābhyām

वेद में परस्पर सम्बद्ध 'एक' और 'अन्य' शब्दों से जुड़ा पहला तिङन्त पद भी विकल्प से अनुदात्त होता है।

श्लोक 1.66

यद्-वृत्तान्नित्यम्

yad-vṛttānnityam

'यत्' से बने हुए शब्द के बाद आई क्रिया सदैव, बिना किसी अपवाद के, अनुदात्त होती है; जैसे 'यो भुङ्क्ते, यं भोजयति'।

श्लोक 1.67

पूजना-त्पूजितमनुदात्तं काष्ठादिभ्यः

pūjanā-tpūjitamanudāttaṁ kāṣṭhādibhyaḥ

'काष्ठ' आदि व्यंग्यात्मक प्रशंसासूचक शब्दों के बाद, जिस शब्द की प्रशंसा की जा रही हो वह अनुदात्त हो जाता है; जैसे 'काष्ठाध्यापकः' (लकड़ी जैसा — यानी निकम्मा — अध्यापक, व्यंग्य में)।

श्लोक 1.68

सगतिरपि तिङ्

sagatirapi tiṅ

उसी प्रकार के व्यंग्यात्मक 'काष्ठ' आदि शब्दों के बाद आई क्रिया भी — चाहे उपसर्गसहित हो या रहित — अनुदात्त हो जाती है।

श्लोक 1.69

कुत्सने च सुप्यगोत्रादौ

kutsane ca supyagotrādau

निन्दा के भाव में, गोत्रवाचक को छोड़कर किसी भी सुबन्त शब्द के बाद आई क्रिया — उपसर्गसहित हो या रहित — अनुदात्त हो जाती है; जैसे 'पचति पूति' (सड़ा-गला पकाता है, निन्दा में)।

श्लोक 1.70

गतिर्गतौ

gatirgatau

गतिसंज्ञक शब्द के बाद आया दूसरा गतिसंज्ञक शब्द अनुदात्त हो जाता है; जैसे 'अभ्युद्धरति' में 'अभि' अनुदात्त है।

श्लोक 1.71

तिङि चोदात्तवति

tiṅi codāttavati

किन्तु यदि आगे की क्रिया स्वयं उदात्त (स्वरयुक्त) बनी रहे, तो उससे पहले आया गतिसंज्ञक शब्द भी उदात्त हो जाता है; जैसे 'यत् प्रपचति' में 'प्र' उदात्त रहता है।

श्लोक 1.72

आमन्त्रितं पूर्वमविद्यमानवत्

āmantritaṁ pūrvamavidyamānavat

किसी पद से पहले आया सम्बोधन-पद (आमन्त्रित) मानो वहाँ हो ही नहीं — अर्थात् जो नियम पद के ठीक पहले वाले शब्द पर निर्भर हों, वे आमन्त्रित पद की उपस्थिति में भी लागू होते रहते हैं।

श्लोक 1.73

नामन्त्रिते समानाधिकरणे सामान्यवचनम्

nāmantrite samānādhikaraṇe sāmānyavacanam

किन्तु यदि आगे आए सम्बोधन-पद के साथ समानाधिकरण (एक ही कारक में) कोई सामान्यवाचक शब्द हो, तो वह सामान्यवाचक शब्द 'न होने जैसा' नहीं माना जाता — अर्थात् वह अपनी उपस्थिति से नियमों को प्रभावित करता ही है; जैसे 'अग्ने गृहपते'।

श्लोक 1.74

विभाषितं विशेषवचने बहुवचनम्

vibhāṣitaṁ viśeṣavacane bahuvacanam

किन्तु यदि आगे आया सम्बोधन-पद कुछ विशेष बताता हो, तो उससे पहले आया समानाधिकरण बहुवचन सम्बोधन-पद विकल्प से 'न होने जैसा' माना जाता है; जैसे 'देवाः शरण्याः' — पक्ष में विशेष स्वर-भेद सम्भव।

अष्टमोऽध्यायः, द्वितीयः पादः

श्लोक 2.1

पूर्वत्रासिद्धम्

pūrvatrāsiddham

यह प्रसिद्ध अधिकार-सूत्र है — यहाँ से लेकर अष्टाध्यायी के अन्त तक के सभी सूत्र अपने से पहले के सूत्रों के लिए मानो 'घटित ही नहीं हुए' (असिद्ध) माने जाते हैं, और आगे का सूत्र भी अपने बाद वाले के लिए इसी तरह असिद्ध रहता है।

श्लोक 2.2

नलोपः सुप्स्वरसंज्ञातुग्विधिषु कृति

nalopaḥ supsvarasaṁjñātugvidhiṣu kṛti

सुबन्त, स्वर, संज्ञा तथा तुक् से जुड़े विधानों में, कृत् प्रत्यय परे होने पर, नकार का लोप होता है।

श्लोक 2.3

नमुने

namune

'ना' (आमन्त्रित सम्बुद्धि) के विषय में अथवा उसके परे होने पर, सु के मकार-उकार आदेश असिद्ध नहीं माने जाते — अर्थात् यहाँ पिछला नियम पूरी तरह काम करता है।

श्लोक 2.4

उदात्तस्वरितयोर्यणः स्वरितोऽनुदात्तस्य

udāttasvaritayoryaṇaḥ svarito'nudāttasya

उदात्त अथवा स्वरित के स्थान पर आया हुआ 'यण्' प्रत्याहार (य्, व्, र्, ल्), यदि उसके ठीक बाद अनुदात्त स्वर हो, तो वह अनुदात्त स्वरित हो जाता है।

श्लोक 2.5

एकादेश उदात्तेनोदात्तः

ekādeśa udāttenodāttaḥ

उदात्त स्वर के साथ जब अनुदात्त का एक आदेश (सन्धि-मिलन) बनता है, तो वह मिला हुआ स्वर उदात्त ही होता है।

श्लोक 2.6

स्वरितो वाऽनुदात्ते पदादौ

svarito vā'nudātte padādau

पद के आरम्भ में स्थित अनुदात्त स्वर का उदात्त के साथ जो एकादेश बनता है, वह विकल्प से स्वरित अथवा उदात्त होता है; जैसे 'सूत्थितः' या 'वीक्षते'।

श्लोक 2.7

नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य

nalopaḥ prātipadikāntasya

प्रातिपदिक-संज्ञक शब्द के अन्त में आए नकार 'न्' का लोप होता है; जैसे 'राजन्' से 'राज', 'आत्मन्' से 'आत्म'।

श्लोक 2.8

न ङिसंबुद्धयोः

na ṅisaṁbuddhayoḥ

किन्तु ङि विभक्ति अथवा सम्बुद्धि (सम्बोधन के एकवचन) परे होने पर यह नकार-लोप नहीं होता; जैसे 'हे राजन्'।

श्लोक 2.9

मादुपधायाश्च मतोर्वोऽयवादिभ्यः

mādupadhāyāśca matorvo'yavādibhyaḥ

यवादिगण को छोड़कर, मकारान्त अथवा अकार/आकारान्त (अवर्णोपध) शब्दों के बाद 'मतुप्' प्रत्यय के मकार के स्थान पर वकार आदेश होता है।

श्लोक 2.10

झयः

jhayaḥ

क्षकारान्त (झय्) शब्द के बाद भी मतुप् के मकार का वकार आदेश होता है; जैसे 'कुमुद्वान्'।

श्लोक 2.11

संज्ञायाम्

saṁjñāyām

संज्ञा (व्यक्तिवाचक नाम) बनाने के विषय में भी मतुप् के मकार का वकार आदेश होता है; जैसे 'अहीवती', 'ऋषिवती'।

श्लोक 2.12

आसन्दीवदष्ठीवच्चक्रीवत्कक्षीव-द्रुमण्वच्चर्मण्वती

āsandīvadaṣṭhīvaccakrīvatkakṣīva-drumaṇvaccarmaṇvatī

'आसन्दीवत्', 'अष्ठीवत्', 'चक्रीवत्', 'कक्षीवत्', 'द्रुमण्वत्' और 'चर्मण्वती' — ये संज्ञा-शब्द इसी वकार-आदेश के विशेष (निपातित) रूप हैं।

श्लोक 2.13

उदन्वानुदधौ च

udanvānudadhau ca

'समुद्र' के अर्थ में और संज्ञा के विषय में, 'उदक' शब्द के स्थान पर मतुप् से पहले 'उदन्' आदेश होता है; जैसे 'उदन्वान्' (समुद्र)।

श्लोक 2.14

राजन्वान्सौराज्ये

rājanvānsaurājye

'सुशासित राज्य' के अर्थ में 'राजन्वान्' शब्द का निपातन होता है; जैसे 'राजन्वती पृथिवी' (सुशासित पृथ्वी); अन्यत्र 'राजवान्' ही रूप बनता है।

श्लोक 2.15

छन्दसीरः

chandasīraḥ

वेद में इकारान्त-ईकारान्त और रेफान्त शब्दों के बाद मतुप् के मकार के स्थान पर नकार आदेश होता है; जैसे 'त्रिवती', 'हरिवः'।

श्लोक 2.16

अनो नुट्

ano nuṭ

वेद में नकारान्त शब्दों के बाद मतुप् के मकार के स्थान पर भी नकार आदेश और 'नुट्' का आगम होता है; जैसे 'अक्षण्वन्तः'।

श्लोक 2.17

नाद्-घस्य

nād-ghasya

वेद में नकारान्त शब्द के बाद 'घ' संज्ञक (तरप्, तमप्) प्रत्ययों को 'नुट्' का आगम होता है; जैसे 'सुपथिन्तरः'।

श्लोक 2.18

कृपो रो लः

kṛpo ro laḥ

'कृप्' धातु के रकार के स्थान पर लकार आदेश होता है; जैसे 'कृप्' + शप् से (गुण होकर) 'कल्पते' रूप बनता है।

श्लोक 2.19

उपसर्गस्यायतौ

upasargasyāyatau

'अय्' धातु परे होने पर उपसर्ग के रेफ का लकार आदेश होता है; जैसे 'प्र' + 'अय्' से 'प्लायते' रूप बनता है।

श्लोक 2.20

ग्रो यङि

gro yaṅi

यङ् प्रत्यय परे होने पर 'गॄ' (निगलना) धातु के रेफ का लकार आदेश होता है; जैसे 'गिल् गिल् यङ्'।

श्लोक 2.21

अचि विभाषा

aci vibhāṣā

स्वर वर्ण (अच्) परे होने पर 'गॄ' धातु के रकार के स्थान पर विकल्प से लकार आदेश होता है।

श्लोक 2.22

परेश्च घाङ्कयोः

pareśca ghāṅkayoḥ

'घ' संज्ञक शब्द अथवा 'अङ्क' शब्द के परे होने पर, 'परि' के रेफ के स्थान पर विकल्प से लकार आदेश होता है; जैसे 'परिघः'/'पलिघः', 'पर्यङ्कः'/'पल्यङ्कः'।

श्लोक 2.23

संयोगान्तस्य लोपः

saṁyogāntasya lopaḥ

संयुक्त व्यंजन (संयोग) यदि पदान्त में हो, तो उसके अन्तिम वर्ण का लोप हो जाता है।

श्लोक 2.24

रात्सस्य

rātsasya

रेफ के बाद आए संयोग में केवल सकार का ही लोप होता है, अन्य वर्ण का नहीं; जैसे 'नूत्न' रूप में।

श्लोक 2.25

धि च

dhi ca

धकारादि प्रत्यय परे होने पर, संयोग के अन्त में स्थित सकार का लोप होता है; जैसे 'एधिताध्वम्' रूप में।

श्लोक 2.26

झलो झलि

jhalo jhali

झल् वर्ण परे होने पर, संयोग में झल् के बाद आए सकार का लोप होता है; जैसे 'अगौप्ताम्' रूप में।

श्लोक 2.27

ह्रस्वादङ्गात्

hrasvādaṅgāt

झल् परे रहने पर, ह्रस्व स्वर वाले अङ्ग के बाद आए सकार का लोप होता है।

श्लोक 2.28

इट ईटि

iṭa īṭi

'ईट्' आगम परे होने पर, 'इट्' आगम से परे स्थित सकार का लोप होता है; जैसे 'आदीत' में।

श्लोक 2.29

स्कोः संयोगाद्योरन्ते च

skoḥ saṁyogādyorante ca

झल् वर्ण परे होने पर या पद के अन्त में, संयोग के आरम्भ में स्थित सकार और ककार का लोप होता है।

श्लोक 2.30

चोः कुः

coḥ kuḥ

चवर्ग के बाद झल् वर्ण परे हो अथवा वह पदान्त में हो, तो चवर्ग के स्थान पर कवर्ग आदेश (कुत्व) होता है; जैसे 'वाच्' से 'वाक्'।

श्लोक 2.31

हो ढः

ho ḍhaḥ

पदान्त में और झल् परे होने पर हकार के स्थान पर ढकार आदेश होता है; जैसे 'लिह्' से 'लिढ्'।

श्लोक 2.32

दादेर्धातोअर्घः

dāderdhātoarghaḥ

दकारादि धातु के हकार के स्थान पर, झल् परे होने पर या पदान्त में, घकार आदेश होता है; जैसे 'दुह्' से 'दुघ्'।

श्लोक 2.33

वा द्रुहमुहष्णुहष्णिहाम्

vā druhamuhaṣṇuhaṣṇihām

'द्रुह्', 'मुह्', 'ष्णुह्' और 'ष्णिह्' धातुओं के हकार के स्थान पर, झल् परे रहने पर या पदान्त में, विकल्प से धकार आदेश होता है; जैसे 'द्रुह्' से 'द्रुढ्'।

श्लोक 2.34

नहो धः

naho dhaḥ

'नह्' धातु के हकार के स्थान पर, झल् परे होने पर या पदान्त में, धकार आदेश होता है।

श्लोक 2.35

आहस्थः

āhasthaḥ

'आह्' के स्थान पर, झल् परे होने पर, थकार आदेश होता है; जैसे 'आत्थ' रूप में।

श्लोक 2.36

व्रश्चभ्रस्जसृजमृजयजराजभ्राज च्छ्शां षः

vraścabhrasjasṛjamṛjayajarājabhrāja cchśāṁ ṣaḥ

व्रश्च्, भ्रस्ज्, सृज्, मृज्, यज्, राज् और भ्राज् — इन सात धातुओं के अन्त्य वर्ण के तथा छकार-षकार के स्थान पर, झल् परे रहने पर या पदान्त में, षकार आदेश होता है; जैसे 'राज्' से 'राट्' से आगे 'राष्'।

श्लोक 2.37

एकाचो बशो भष् झषन्तस्य स्ध्वोः

ekāco baśo bhaṣ jhaṣantasya sdhvoḥ

स्धु (सकार-ध्व) परे होने पर या पदान्त में, एक-स्वर वाली झषन्त धातु के ब्, ग्, ड्, द् के स्थान पर क्रमशः भ्, घ्, ढ्, ध् आदेश होता है।

श्लोक 2.38

दधस्तथोश्च

dadhastathośca

तकार, थकार अथवा ध्व परे होने पर, द्वित्व-किए-गए झषन्त 'धा' धातु के ब्/ग्/ड्/द् के स्थान पर भ्/घ्/ढ्/ध् आदेश होता है; जैसे 'धत्तः'।

श्लोक 2.39

झलां जशोऽन्ते

jhalāṁ jaśo'nte

पद के अन्त में झल् वर्ण के स्थान पर जश् (अपने वर्ग का तृतीय वर्ण) आदेश होता है; जैसे 'वाक्' + 'ईशः' से 'वागीशः'।

श्लोक 2.40

झषस्तथोर्धोऽधः

jhaṣastathordho'dhaḥ

'धा' धातु को छोड़कर, किसी वर्ग के चतुर्थ वर्ण के बाद तकार अथवा थकार आने पर, उसके स्थान पर धकार आदेश होता है; जैसे 'दुग्ध्' + 'ति' से 'दुग्धः'।

श्लोक 2.41

षढोःकःसि

ṣaḍhoḥkaḥsi

सकार परे होने पर षकार और ढकार के स्थान पर ककार आदेश होता है; जैसे 'यष् स्यति' से 'यक्ष्यति'।

श्लोक 2.42

रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः

radābhyāṁ niṣṭhāto naḥ pūrvasya ca daḥ

रेफ और दकार के बाद क्त/क्तवतु के तकार के स्थान पर नकार आदेश होता है, तथा उस पहले वाले दकार के स्थान पर भी नकार आदेश होता है।

श्लोक 2.43

संयोगादेरातो धातोर्यण्वतः

saṁyogāderāto dhātoryaṇvataḥ

संयोग से आरम्भ होने वाली, आकारान्त, यण्-युक्त (य्/व्/र्/ल् वाली) धातु के बाद क्त/क्तवतु के तकार के स्थान पर नकार आदेश होता है; जैसे 'द्रा' से 'द्रान'।

श्लोक 2.44

ल्वादिभ्यः

lvādibhyaḥ

'लू' आदि इक्कीस धातुओं के बाद क्त/क्तवतु के तकार के स्थान पर नकार आदेश होता है; जैसे 'लून'।

श्लोक 2.45

ओदितश्च

oditaśca

जिस धातु में ओकार इत्संज्ञक हो (ओदित् धातु), उसके बाद क्त/क्तवतु के तकार के स्थान पर नकार आदेश होता है; जैसे 'भुग्न'।

श्लोक 2.46

क्षियो दीर्घात्

kṣiyo dīrghāt

दीर्घ अवयव (ईकार) वाली 'क्षि' धातु के बाद निष्ठा-तकार के स्थान पर नकार आदेश होता है; जैसे 'क्षीणाः'।

श्लोक 2.47

श्योऽस्पर्शे

śyo'sparśe

स्पर्श (छूना) के अतिरिक्त अर्थ में प्रयुक्त 'श्या' धातु के बाद निष्ठा-तकार का नकार आदेश होता है; जैसे 'शीनं मेदः'।

श्लोक 2.48

अञ्चोऽनपादाने

añco'napādāne

अपादान का भाव न हो तो 'अञ्च्' धातु के बाद निष्ठा-तकार का नकार आदेश होता है; जैसे 'न्यक्राः'।

श्लोक 2.49

दिवोऽविजिगीषायाम्

divo'vijigīṣāyām

'जीतने की इच्छा' (विजिगीषा) का भाव न हो तो 'दिव्' धातु के बाद निष्ठा-तकार का नकार आदेश होता है; जैसे 'आद्यूनः'।

श्लोक 2.50

निर्वाणोऽवाते

nirvāṇo'vāte

'वात' (हवा से जुड़ा भाव) न हो तो 'निस्' + 'वा' धातु के बाद भी निष्ठा-तकार का नकार आदेश होता है; जैसे 'निर्वाणोऽग्निः'।

श्लोक 2.51

शुषःकः

śuṣaḥkaḥ

'शुष्' (सूखना) धातु के बाद क्त/क्तवतु के तकार के स्थान पर ककार आदेश होता है; जैसे 'शुष्कः'।

श्लोक 2.52

पचो वः

paco vaḥ

'पच्' धातु के बाद क्त/क्तवतु के तकार के स्थान पर वकार आदेश होता है; जैसे 'पक्वः'।

श्लोक 2.53

क्षायो मः

kṣāyo maḥ

'क्षै' (कृश होना) धातु के बाद क्त/क्तवतु के तकार के स्थान पर मकार आदेश होता है; जैसे 'क्षामः'।

श्लोक 2.54

प्रस्त्योऽन्यतरस्याम्

prastyo'nyatarasyām

'प्र' पूर्वक 'स्त्यै' धातु के निष्ठा-तकार के स्थान पर विकल्प से मकार आदेश होता है; जैसे 'प्रस्तीमः'/'प्रस्तीतः'।

श्लोक 2.55

अनुपसर्गात्फुल्लक्षीबकृशोल्लाघाः

anupasargātphullakṣībakṛśollāghāḥ

उपसर्ग से पहले न होने पर, 'फुल्ल', 'क्षीव', 'कृश' और 'उल्लाघ' शब्द निष्ठा-प्रत्यय के विशेष (निपातित) रूप हैं।

श्लोक 2.56

नुदविदोन्दत्राघ्राह्रीभ्योऽन्यतरस्याम्

nudavidondatrāghrāhrībhyo'nyatarasyām

'नुद्', 'विद्', 'उन्दी', 'त्रा', 'घ्रा' और 'ह्री' धातुओं के निष्ठा-तकार के स्थान पर विकल्प से नकार आदेश होता है; जैसे 'नुन्नः'/'नुत्तः'।

श्लोक 2.57

न ध्याख्यापॄमूर्च्छिमदाम्

na dhyākhyāpṝmūrcchimadām

'ध्या', 'ख्या', 'पॄ', 'मूर्च्छि' और 'मद्' धातुओं के निष्ठा-तकार के स्थान पर नकार आदेश नहीं होता; जैसे 'ध्यातः', 'ख्यातः'।

श्लोक 2.58

वित्तो भोगप्रत्यययोः

vitto bhogapratyayayoḥ

'भोग' अथवा 'विश्वासपात्रता' (प्रत्यय) के अर्थ में प्रयुक्त 'विद्' (पाना) धातु के 'क्त' के तकार का नकारादेश नहीं, यह रूप निपातित है; जैसे 'वित्तमस्य बहु'।

श्लोक 2.59

भित्तं शकलम्

bhittaṁ śakalam

'इण्' अथवा ककार-वर्ग के बाद, पदान्त न होने पर, सकार के स्थान पर मूर्धन्य षकार आदेश होता है; जैसे 'भित्तं तिष्ठति' — इसमें 'त' का 'त्' मूर्धन्यकरण द्वारा रूप-निपातन 'भित्तम्' (टुकड़ा) शब्द में सधा है।

श्लोक 2.60

ऋणमाधमर्ण्ये

ṛṇamādhamarṇye

'ऋणी होने' (अधमर्ण्य) के भाव में, 'ऋ' धातु के 'क्त' प्रत्यय के तकार के स्थान पर नकार आदेश का निपातन है; जैसे 'ऋणं ददाति'।

श्लोक 2.61

नसत्तनिषत्तानुत्तप्रतूर्त्तसूर्त्तगूर्तानिच्छन्दसि

nasattaniṣattānuttapratūrttasūrttagūrtānicchandasi

वेद में 'नसत्त', 'निषत्त', 'अनुत्त', 'प्रतूर्त्त', 'सूर्त्त' और 'गूर्त्त' — ये छान्दस शब्द इसी प्रकार निपातित हैं (लौकिक भाषा में इनके नकारान्त रूप — नसन्न, निषण्ण आदि — मिलते हैं)।

श्लोक 2.62

क्विन्प्रत्ययस्य कुः

kvinpratyayasya kuḥ

पदान्त में, 'क्विन्' प्रत्यय जिससे बना हो, उस अंग के अन्तिम वर्ण के स्थान पर कवर्ग आदेश होता है; जैसे 'घृतस्पृक्'।

श्लोक 2.63

नशेर्वा

naśervā

पद के अन्त में 'नश्' धातु के स्थान पर विकल्प से कवर्ग आदेश होता है; जैसे 'नक्'/'नट्'।

श्लोक 2.64

मो नो धातोः

mo no dhātoḥ

धातु के मकार के स्थान पर नकार आदेश होता है; जैसे 'प्रशान्', 'प्रदान्'।

श्लोक 2.65

म्वोश्च

mvośca

मकार अथवा वकार परे होने पर, मकारान्त धातु के स्थान पर नकार आदेश होता है; जैसे 'जगन्वान्'।

श्लोक 2.66

ससजुषो रूः

sasajuṣo rūḥ

सकारान्त पद अथवा 'सजुष्' शब्द के अन्तिम वर्ण के स्थान पर 'रुँ' आदेश होता है (जिसमें से केवल रेफ शेष रहता है); जैसे 'रामस्' से 'रामर्'।

श्लोक 2.67

अवयाः श्चेतवाः पुरोडाश्च

avayāḥ ścetavāḥ puroḍāśca

'अवयाः', 'श्वेतवाः' और 'पुरोडाः' शब्दों का निपातन (विशेष रूप में स्थिरीकरण) है।

श्लोक 2.68

अहन्

ahan

पदान्त में, हल् से आरम्भ होने वाला सुप् प्रत्यय परे होने पर, 'अहन्' शब्द के नकार का 'रुँ' आदेश होता है।

श्लोक 2.69

रोऽसुपि

ro'supi

सुप् प्रत्यय परे न होने पर, 'अहन्' शब्द के स्थान पर रेफ आदेश होता है; जैसे 'अहर्ददाति'।

श्लोक 2.70

अम्नरुधरवरित्युभयथा छन्दसि

amnarudharavarityubhayathā chandasi

वेद में 'अम्नस्', 'ऊधस्' और 'अवस्' शब्दों के स्थान पर विकल्प से 'रुँ' अथवा रेफ आदेश होता है; जैसे 'ऊध एव'/'ऊधरेव'।

श्लोक 2.71

भुवश्च महाव्याहृतेः

bhuvaśca mahāvyāhṛteḥ

महाव्याहृति (भूः, भुवः, स्वः में से) 'भुवस्' शब्द के स्थान पर भी विकल्प से 'रुँ' अथवा रेफ आदेश होता है; जैसे 'भुव इत्यन्तरिक्षम्'/'भुवरित्यन्तरिक्षम्'।

श्लोक 2.72

वसुस्त्रंसुध्वंस्वनडुहां दः

vasustraṁsudhvaṁsvanaḍuhāṁ daḥ

'वसु', 'स्त्रंसु', 'ध्वंसु' और 'अनडुह्' शब्दों के अन्त में सकार के स्थान पर ढकार आदेश होता है; जैसे 'विद्वद्भ्याम्', 'अनडुद्भ्याम्'।

श्लोक 2.73

तिप्यनस्तेः

tipyanasteḥ

'अस्' धातु से भिन्न धातु से बने सकारान्त पद के स्थान पर, तिप् परे होने पर, दकार आदेश होता है; जैसे 'असत्' से 'असद्'।

श्लोक 2.74

सिपि धातो रुर्वा

sipi dhāto rurvā

सकारान्त धातु-पद के स्थान पर, सिप् परे होने पर, विकल्प से 'रुँ' अथवा दकार आदेश होता है; जैसे 'अचकाद्'।

श्लोक 2.75

दश्च

daśca

सिप् परे होने पर, दकारान्त धातु-पद के स्थान पर विकल्प से 'रुँ' आदेश होता है।

श्लोक 2.76

र्वोरुपधाया दीर्घ इकः

rvorupadhāyā dīrgha ikaḥ

पद के अन्त में, रेफान्त और वकारान्त धातु की उपधा के इक् (इ, उ, ऋ, ऌ) स्वर का दीर्घ आदेश होता है; जैसे 'पिपठीः'।

श्लोक 2.77

हलि च

hali ca

व्यंजन (हल्) परे होने पर भी, रेफान्त-वकारान्त धातु की उपधा के इक् स्वर का दीर्घ आदेश होता है; जैसे 'पिपूर्तः'।

श्लोक 2.78

उपधायां च

upadhāyāṁ ca

धातु की उपधा में रेफ या वकार हो और उसके बाद कोई व्यंजन आए, तो उससे पहले वाले इक् स्वर का भी दीर्घ आदेश होता है; जैसे 'हूर्छिता', 'मूर्छिता'।

श्लोक 2.79

नभकुर्छुराम्

nabhakurchurām

'भ्रं', 'कृर्' और 'छुर्' — इन रेफान्त-वकारान्त धातुओं की उपधा का दीर्घ आदेश नहीं होता; जैसे 'कुर्वन्ति'।

श्लोक 2.80

अदसोऽसेर्दादु दो मः

adaso'serdādu do maḥ

सकाररहित 'अदस्' शब्द के दकार के आगे के वर्ण को उकार तथा दीर्घ ऊकार तथा दकार को मकार आदेश होता है; जैसे 'अदः' से 'अमू'।

श्लोक 2.81

एत ईद् बहुवचने

eta īd bahuvacane

बहुवचन की विवक्षा में 'अदस्' शब्द के दकार से परे एकार के स्थान पर ईकार तथा दकार के स्थान पर मकार आदेश होता है; जैसे 'अमी'।

श्लोक 2.82

वाक्यस्य टेः प्लुत उदात्तः

vākyasya ṭeḥ pluta udāttaḥ

यह अधिकार-सूत्र है — यहाँ से इस पाद की समाप्ति तक 'वाक्य के टि-संज्ञक भाग' (अन्तिम स्वर-खण्ड) के लिए 'प्लुत' और 'उदात्त' का अधिकार चलता है।

श्लोक 2.83

प्रत्यभिवादेऽशूद्रे

pratyabhivāde'śūdre

शूद्र को छोड़कर द्विजातियों के लिए प्रयुक्त प्रत्यभिवादन-वाक्य के अन्तिम स्वर-खण्ड का प्लुत तथा उदात्त आदेश होता है; जैसे 'आयुष्मानेधि देवदत्त३'।

श्लोक 2.84

दूराद्धूते च

dūrāddhūte ca

दूर से किए गए सम्बोधन-वाक्य का अन्तिम स्वर-खण्ड भी प्लुत और उदात्त होता है; जैसे 'आगच्छ भो माणवक देवदत्त३'।

श्लोक 2.85

हैहेप्रयोगे हैहयोः

haiheprayoge haihayoḥ

दूर से बुलाने में प्रयुक्त 'है' अथवा 'हे' शब्द का भी प्लुत और उदात्त आदेश होता है; जैसे 'है३देवदत्त'।

श्लोक 2.86

गुरोरनृतोनन्त्यस्याप्येकैकस्य प्राचाम्

guroranṛtonantyasyāpyekaikasya prācām

प्राचीन आचार्यों के मत में, ऋकाररहित सम्बोधन-पद के अन्त्य अथवा अनन्त्य गुरु-संज्ञक स्वर-खण्ड में से — एक बार में केवल एक के — प्लुत और उदात्त होता है।

श्लोक 2.87

ओमभ्यादाने

omabhyādāne

आरम्भ में प्रयुक्त 'ॐ' शब्द का अन्तिम स्वर-खण्ड प्लुत और उदात्त होता है; जैसे 'ओ३म् अग्निमीळे पुरोहितम्'।

श्लोक 2.88

ये यज्ञकर्मणि

ye yajñakarmaṇi

यज्ञकर्म में प्रयुक्त 'ये' शब्द का अन्तिम स्वर-खण्ड प्लुत और उदात्त होता है; जैसे 'ये३यजामहे'।

श्लोक 2.89

प्रणवष्टेः

praṇavaṣṭeḥ

यज्ञकर्म में प्रयुक्त मन्त्र के अन्त्य स्वर-खण्ड के स्थान पर प्रणव (ॐ) आदेश होता है; जैसे 'जिन्वतो३म्'।

श्लोक 2.90

याज्यान्तः

yājyāntaḥ

याज्याकाण्ड में पठित मन्त्रों के अन्तिम स्वर-खण्ड का प्लुत आदेश होता है; जैसे 'चकृषे हव्यवाहा३म्'।

श्लोक 2.91

ब्रूहिप्रेष्यश्रौषड्वौषडावहानामादेः

brūhipreṣyaśrauṣaḍvauṣaḍāvahānāmādeḥ

यज्ञकर्म में यदि 'ब्रूहि', 'प्रेष्य', 'श्रौषट्', 'वौषट्' और 'आवह' शब्द प्रयुक्त हों, तो उनके आदि स्वर प्लुत हो जाते हैं; जैसे 'अग्नये गोमयान् प्रे३ष्य'।

श्लोक 2.92

अग्नीत्प्रेषणे परस्य च

agnītpreṣaṇe parasya ca

'अग्नि प्रज्वलित हो रहा है' — ऐसा कहने वाले ऋत्विक द्वारा दूसरे को कार्य सौंपे (प्रेषण) जाने पर, आदि स्वर और उससे पहले के स्वर का भी प्लुत आदेश होता है; जैसे 'आ३श्रा३वय'।

श्लोक 2.93

विभाषा पृष्टप्रतिवचने हेः

vibhāṣā pṛṣṭaprativacane heḥ

प्रश्न के उत्तर में कहे वाक्य में आया 'हि' शब्द विकल्प से प्लुत होता है; जैसे 'अकार्षं हि३'।

श्लोक 2.94

निगृह्रानुयोगे च

nigṛhrānuyoge ca

तर्क से किसी के पक्ष का खण्डन करके उसे निरुत्तर करने के बाद, उपहासादि के लिए उसी के पक्ष को दोहराने वाले वाक्य का अन्तिम स्वर-खण्ड उदात्त-प्लुत होता है।

श्लोक 2.95

आम्रेडितं भर्त्सने

āmreḍitaṁ bhartsane

धिक्कार (भर्त्सन) के अर्थ में दुहराए गए पद के पहले और बाद, दोनों भागों में उदात्त-प्लुत की व्याख्या करनी चाहिए; जैसे 'चौर चौर३'।

श्लोक 2.96

अङ्गयुक्तंतिङाकाङ्क्षम्

aṅgayuktaṁtiṅākāṅkṣam

धिक्कार भरे वाक्य में 'अङ्ग' शब्द से जुड़े, अपेक्षा रखने वाले तिङन्त पद का अन्तिम स्वर-खण्ड उदात्त-प्लुत होता है; जैसे 'अङ्ग कूज३'।

श्लोक 2.97

विचार्यमाणानाम्

vicāryamāṇānām

विचारात्मक (विकल्प जताने वाले) वाक्यों का अन्तिम स्वर-खण्ड उदात्त-प्लुत होता है; जैसे 'होतव्यं दीक्षितस्य गृहा३इ'।

श्लोक 2.98

पूर्वं तु भाषायाम्

pūrvaṁ tu bhāṣāyām

किन्तु सामान्य बोलचाल (भाषा) में विचारात्मक वाक्य के दो पक्षों में से पहले पद का ही अन्तिम स्वर-खण्ड प्लुत होता है; जैसे 'अहिर्नु३ रज्जुर्नु'।

श्लोक 2.99

प्रतिश्रवणे च

pratiśravaṇe ca

प्रतिज्ञा (वचन देने) के भाव वाले वाक्य का अन्तिम स्वर-खण्ड भी प्लुत होता है; जैसे 'अहं ते ददामि३'।

श्लोक 2.100

अनुदात्तंप्रश्नान्ताभि-पूजितयोः

anudāttaṁpraśnāntābhi-pūjitayoḥ

प्रश्नवाक्य के अन्त में और अभिपूजित (गुणगान वाले) वाक्य का अन्तिम स्वर-खण्ड अनुदात्त-प्लुत होता है; जैसे 'शोभनः खल्वसि माणवक३' — यहाँ प्लुत स्वर उदात्त न होकर अनुदात्त होता है।

श्लोक 2.101

चिदिति चोपमार्थे प्रयुज्यमाने

ciditi copamārthe prayujyamāne

उपमा के अर्थ में प्रयुक्त 'चित्' शब्द से युक्त वाक्य का अन्तिम स्वर-खण्ड भी अनुदात्त-प्लुत होता है; जैसे 'अग्निचिद् भयात्३'।

श्लोक 2.102

उपरिस्विदासीदिती च

uparisvidāsīditī ca

'उपरिस्विदासीत्' इस वाक्य का भी अन्तिम स्वर-खण्ड अनुदात्त-प्लुत होता है।

श्लोक 2.103

स्वरित माम्रेडितेऽसूयासंमति-कोपकुत्सनेषु

svarita māmreḍite'sūyāsaṁmati-kopakutsaneṣu

ईर्ष्या, सहमति, क्रोध और तिरस्कार के प्रतिपादक वाक्य में, आम्रेडित (दुहराए) पद के बाद वाले भाग का अन्तिम स्वर-खण्ड स्वरित-प्लुत होता है; जैसे 'माणवक॑३माणवक'।

श्लोक 2.104

क्षियाशीः प्रैषेषु तिङाकाङ्क्षम्

kṣiyāśīḥ praiṣeṣu tiṅākāṅkṣam

धर्मोल्लंघन, आशीर्वाद अथवा आदेश (प्रैष) का भाव होने पर, अपेक्षा रखने वाले तिङन्त पद का अन्तिम स्वर-खण्ड स्वरित-प्लुत होता है; जैसे 'सुताँश्च लप्सीष्ठा३धनं च तात'।

श्लोक 2.105

अनन्त्त्यस्यापि प्रश्राख्यानयोः

ananttyasyāpi praśrākhyānayoḥ

प्रश्न और वर्णन (आख्यान) के प्रतिपादक वाक्य का अन्त्य अथवा अनन्त्य स्वर-खण्ड भी स्वरित-प्लुत होता है।

श्लोक 2.106

प्लुतावैच इदुतौ

plutāvaica idutau

दूर से बुलाने आदि अर्थ में विहित प्लुत, यदि 'ऐच्' (ऐ/औ) के स्थान पर हो, तो उस ऐच् के भीतर छिपे इकार और उकार भाग प्लुत होते हैं; जैसे 'ऐ३तिकायन'।

श्लोक 2.107

एचोऽप्रगृह्रास्यादूराद्धूते पूर्वस्यार्धस्यादुत्तरस्येदुतौ

eco'pragṛhrāsyādūrāddhūte pūrvasyārdhasyāduttarasyedutau

दूर से पुकारना न हो, तो प्रगृह्य को छोड़कर, प्लुत होने वाले 'एच्' (ए/ऐ/ओ/औ) के पूर्वार्ध के स्थान पर प्लुत अकार तथा उत्तरार्ध के स्थान पर क्रमशः इकार और उकार आदेश होता है।

श्लोक 2.108

तयोर्य्वावचि संहितायाम्

tayoryvāvaci saṁhitāyām

संहिता (सन्धि) के विषय में, स्वर परे होने पर, पिछले सूत्र से बने इकार और उकार के स्थान पर क्रमशः यकार और वकार आदेश होता है; जैसे 'अग्ना३याशा'।

अष्टमोऽध्यायः, तृतीयः पादः

श्लोक 3.1

मतुवसो रु संबुद्धौ छन्दसि

matuvaso ru saṁbuddhau chandasi

वेद में, मतुप्-अन्त और वस्-अन्त पद के अन्त्य सकार के स्थान पर, सम्बुद्धि (सम्बोधन एकवचन) परे होने पर, 'रुँ' आदेश होता है।

श्लोक 3.2

अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा

atrānunāsikaḥ pūrvasya tu vā

'रुँ' आदेश होने पर, उससे पहले वाले वर्ण के स्थान पर विकल्प से अनुनासिक (नासिक्य उच्चारण) होता है; जैसे 'सँस्स्कर्त्ता'/'संस्स्कर्त्ता'।

श्लोक 3.3

आतोऽटि नित्यम्

āto'ṭi nityam

'अट्' परे होने पर, 'रुँ' से पहले आए आकार के स्थान पर सदैव अनुनासिक आदेश होता है; जैसे 'महाँ असि'।

श्लोक 3.4

अनुनासिकात्परोऽनुस्वारः

anunāsikātparo'nusvāraḥ

अनुनासिक न बनाए जाने के पक्ष में, 'रुँ' से पहले वाले वर्ण के बाद अनुस्वार होता है।

श्लोक 3.5

समः सुटि

samaḥ suṭi

सुट् परे होने पर, 'सम्' शब्द के स्थान पर 'रुँ' आदेश होता है; जैसे 'सँस्स्कर्त्ता'।

श्लोक 3.6

पुमः ख्य्यम्परे

pumaḥ khyyampare

अकार के बाद वाला खय् वर्ण परे होने पर, 'पुम्' शब्द के स्थान पर 'रुँ' आदेश होता है; जैसे 'पुंस्कामा'।

श्लोक 3.7

नश्छव्यप्रशान्

naśchavyapraśān

अकार-परक 'छव्' वर्ण (छ्, ठ्, थ्, च्, ट्, त्) परे होने पर, 'प्रशान्' को छोड़कर अन्य नकारान्त पद के स्थान पर 'रुँ' आदेश होता है; जैसे 'तान्' से 'ताँरु तान्'।

श्लोक 3.8

उभयथर्क्षु

ubhayatharkṣu

ऋग्वेद में, उस्ही स्थिति में नकारान्त पद के स्थान पर विकल्प से 'रुँ' अथवा नकार आदेश होता है; जैसे 'तस्मिँस्त्वा'/'तस्मिन्त्वा'।

श्लोक 3.9

दीर्घादटि समानपादे

dīrghādaṭi samānapāde

यदि निमित्त (नकार) और नैमित्तिक (अट्) एक ही पाद में हों, तो दीर्घ स्वर से पहले पदान्त नकार के स्थान पर, अट् परे होने पर, 'रुँ' आदेश होता है; जैसे 'महाँ इन्द्रः'।

श्लोक 3.10

नॄन्पे

nṝnpe

पकार परे होने पर, 'नॄन्' शब्द के स्थान पर विकल्प से 'रुँ' आदेश होता है; जैसे 'नॄः पाहि'।

श्लोक 3.11

स्वतवान्पायौ

svatavānpāyau

'पायु' शब्द परे होने पर, 'स्वतवान्' शब्द के नकार के स्थान पर 'रुँ' आदेश होता है; जैसे 'स्वतवाँः पायुः'।

श्लोक 3.12

कानाम्रेडिते

kānāmreḍite

आम्रेडित (दुहराव) परे होने पर, 'कान्' शब्द के स्थान पर 'रुँ' आदेश होता है; जैसे 'काँस्कान्'।

श्लोक 3.13

ढो ढे लोपः

ḍho ḍhe lopaḥ

ढकार परे होने पर, पहले वाले ढकार का लोप हो जाता है; जैसे 'उवढ' रूप में।

श्लोक 3.14

रोरि

rori

रेफ परे होने पर, पहले वाले रेफ का लोप हो जाता है; जैसे 'पुनर्' + 'रमते' से 'पुन रमते'।

श्लोक 3.15

खरवसानयोर्विसर्जनीयः

kharavasānayorvisarjanīyaḥ

पदान्त में, खर् प्रत्याहार वर्ण परे होने पर अथवा विराम (अवसान) में, रेफ के स्थान पर विसर्ग (:) आदेश होता है; जैसे 'रामः', 'अनयः'।

श्लोक 3.16

रोःसुपि

roḥsupi

सुप् प्रत्यय परे होने पर, 'रुँ' के स्थान पर विसर्ग आदेश होता है; जैसे 'पयःसु'।

श्लोक 3.17

भोभगो अघो अपूर्वस्य योऽशि

bhobhago agho apūrvasya yo'śi

'रुँ' से पहले भो, भगो, अघो अथवा अवर्ण (अ/आ) हो, तो 'अश्' प्रत्याहार परे होने पर उस 'रुँ' के स्थान पर यकार आदेश होता है; जैसे 'देवायिह'।

श्लोक 3.18

व्योर्लघुप्रयत्नतरः शाकटा-यनस्य

vyorlaghuprayatnataraḥ śākaṭā-yanasya

भो, भगो, अघो अथवा अवर्ण से पहले पदान्त यकार-वकार का, अश् परे होने पर, शाकटायन आचार्य के मतानुसार अत्यन्त हल्का (लघुप्रयत्नतर) उच्चारण होता है।

श्लोक 3.19

लोपः शाकल्यस्य

lopaḥ śākalyasya

अश् परे होने पर, अवर्ण से पहले आए पदान्त यकार-वकार का शाकल्य आचार्य के मतानुसार लोप ही हो जाता है; जैसे 'हरय् इह' से 'हर इह'।

श्लोक 3.20

ओतो गार्ग्यस्य

oto gārgyasya

अश् परे होने पर, ओकार से आगे आए यकार का गार्ग्य आचार्य के मतानुसार अवश्य लोप होता है; जैसे 'भो अत्र'।

श्लोक 3.21

उञि च पदे

uñi ca pade

पदसंज्ञक 'उञ्' परे होने पर, पदान्त वकार और यकार का लोप होता है; जैसे 'स उ एकाग्निः'।

श्लोक 3.22

हलि सर्वेषाम्

hali sarveṣām

भो, भगो, अधो अथवा अवर्ण से पहले आए पदान्त यकार का, व्यंजन (हल्) परे होने पर, लोप होता है; जैसे 'भो हसति'।

श्लोक 3.23

मोऽनुस्वारः

mo'nusvāraḥ

व्यंजन परे होने पर, मकारान्त पद के स्थान पर अनुस्वार आदेश होता है; जैसे 'मंस्यते'।

श्लोक 3.24

नश्चापदान्तस्य झलि

naścāpadāntasya jhali

वर्गों के प्रथम-द्वितीय-तृतीय-चतुर्थ वर्ण अथवा श्/ष्/स्/ह् परे होने पर, अपदान्त नकार और मकार के स्थान पर अनुस्वार आदेश होता है; जैसे 'हरिं वन्दे'।

श्लोक 3.25

मो राजि समः क्वौ

mo rāji samaḥ kvau

क्विप्-प्रत्ययान्त 'राज्' धातु परे होने पर, 'सम्' के मकार के स्थान पर मकार ही रहता है (अनुस्वार नहीं होता); जैसे 'सम्राट्'।

श्लोक 3.26

हे मपरे वा

he mapare vā

मकार-परक हकार परे होने पर, मकार के स्थान पर विकल्प से मकार ही रहता है; जैसे 'किम्ह्मलयति'।

श्लोक 3.27

नपरे नः

napare naḥ

नकार-परक अथवा नकार-वाला हकार परे होने पर, मकार के स्थान पर विकल्प से नकार आदेश होता है; जैसे 'किन्ह्नुते'/'किंह्नुते'।

श्लोक 3.28

ङ्णोः कुक्टुक्शरि

ṅṇoḥ kukṭukśari

शर् (श्/ष्/स्) परे होने पर, ङकार और णकार के बाद विकल्प से 'कुक्' और 'टुक्' का आगम होता है; जैसे 'प्राङ्क्शेते'/'प्राङ्शेते'।

श्लोक 3.29

डः सि धुट्

ḍaḥ si dhuṭ

डकार के बाद सकार आने पर, उस सकार से पहले विकल्प से 'धुट्' का आगम होता है; जैसे 'श्वलिट्त्साये'/'श्वलिट्साये'।

श्लोक 3.30

नश्च

naśca

नकार के बाद सकार आने पर भी विकल्प से 'धुट्' का आगम होता है; जैसे 'सन्त्सः'।

श्लोक 3.31

शि तुक्

śi tuk

शकार परे होने पर, नकारान्त पद में विकल्प से 'तुक्' का आगम होता है; जैसे 'सञ्छम्भुः'।

श्लोक 3.32

ङमो ह्रस्वादचि ङमुण्नित्यम्

ṅamo hrasvādaci ṅamuṇnityam

ह्रस्व स्वर से परे ङम्-अन्त पद के बाद स्वर आने पर, सदैव 'ङुट्', 'णुट्' और 'नुट्' का आगम होता है; जैसे 'प्रत्यङ्ङास्ते'।

श्लोक 3.33

मय उञो वो वा

maya uño vo vā

स्वर परे होने पर, मय् प्रत्याहार वर्ण के बाद आए 'उञ्' के स्थान पर विकल्प से वकार आदेश होता है; जैसे 'शम्वस्तु'।

श्लोक 3.34

विसर्जनीयस्य सः

visarjanīyasya saḥ

खर् परे होने पर, विसर्ग के स्थान पर सकार आदेश होता है; जैसे 'तांस्तान्'।

श्लोक 3.35

शर्परे विसर्जनीयः

śarpare visarjanīyaḥ

शर् (श्/ष्/स्) परे होने पर, विसर्ग के स्थान पर विसर्ग ही रहता है (सजातीय व्यंजन भी विकल्प से जुड़ सकता है)।

श्लोक 3.36

वा शरि

vā śari

शर् परे होने पर, विसर्ग के स्थान पर विकल्प से विसर्ग ही होता है; जैसे 'हरिश्शेते'/'हरिः शेते'।

श्लोक 3.37

कुप्वोः कपौच

kupvoḥ kapauca

कवर्ग और पवर्ग परे होने पर, विसर्ग के स्थान पर क्रमशः जिह्वामूलीय और उपध्मानीय आदेश होता है; जैसे 'वृक्षः करोति'।

श्लोक 3.38

सोऽपदादौ

so'padādau

पद के अन्त में न आने वाले कवर्ग-पवर्ग परे होने पर, विसर्ग के स्थान पर सकार आदेश होता है; जैसे 'पयस्कल्पम्'।

श्लोक 3.39

इणः षः

iṇaḥ ṣaḥ

अपदादि कवर्ग-पवर्ग परे होने पर, 'इण्' से पहले आए विसर्ग के स्थान पर षकार आदेश होता है; जैसे 'सर्पिष्कल्पम्'।

श्लोक 3.40

नमस्पुरसोर्गत्योः

namaspurasorgatyoḥ

कवर्ग-पवर्ग परे होने पर, गतिसंज्ञक 'नमस्' और 'पुरस्' शब्दों के विसर्ग के स्थान पर सकार आदेश होता है; जैसे 'नमस्कर्त्ता'।

श्लोक 3.41

इदुदुपधस्य चाप्रत्ययस्य

idudupadhasya cāpratyayasya

उपधा में इकार अथवा उकार वाले (प्रत्यय-भिन्न) शब्दों के विसर्ग के स्थान पर षकार आदेश होता है; जैसे 'निष्कृतम्'।

श्लोक 3.42

तिरसोऽन्यतरस्याम्

tiraso'nyatarasyām

कवर्ग-पवर्ग परे होने पर, 'तिरस्' शब्द के विसर्ग के स्थान पर विकल्प से सकार आदेश होता है; जैसे 'तिरस्कर्त्ता'/'तिरःकर्त्ता'।

श्लोक 3.43

द्विस्त्रिश्चतुरिति कृत्वोऽर्थे

dvistriścaturiti kṛtvo'rthe

कवर्ग-पवर्ग परे होने पर, 'बार' अर्थ बताने वाले 'द्विस्', 'त्रिस्' और 'चतुर्' शब्दों के विसर्ग के स्थान पर विकल्प से षकार आदेश होता है; जैसे 'द्विष्करोति'/'द्विः करोति'।

श्लोक 3.44

इसुसोः सामर्थ्ये

isusoḥ sāmarthye

सामर्थ्य (परस्पर सम्बद्धता) का भाव होने पर, कवर्ग-पवर्ग परे होने पर, 'इस्' और 'उस्' शब्दों के विसर्ग के स्थान पर विकल्प से षकार आदेश होता है।

श्लोक 3.45

नित्यं समासेऽनुत्तरपदस्थस्य

nityaṁ samāse'nuttarapadasthasya

समास में, उत्तरपद में न रहने वाले 'इस्'/'उस्' शब्दों के विसर्ग के स्थान पर, कवर्ग-पवर्ग परे होने पर, सदैव षकार आदेश होता है; जैसे 'सर्पिष्कुण्डिका'।

श्लोक 3.46

अतः कृकमिकंसकुम्भपात्रकु-शाकर्णीष्वनव्ययस्य

ataḥ kṛkamikaṁsakumbhapātraku-śākarṇīṣvanavyayasya

अकार के बाद, समास में उत्तरपद न बने विसर्ग के स्थान पर, कृ, कमि, कंस, कुम्भ, पात्र, कुशा और कर्णी परे होने पर, सदैव सकार आदेश होता है (यदि वह अव्यय का न हो)।

श्लोक 3.47

अधः शिरसी पदे

adhaḥ śirasī pade

समास में, उत्तरपद न बने 'अधस्' और 'शिरस्' शब्दों के विसर्ग के स्थान पर, पद परे होने पर, सकार आदेश होता है; जैसे 'अधस्पदम्'।

श्लोक 3.48

कस्कादिषु च

kaskādiṣu ca

कस्क आदि शब्द-समूह में, अपदादि कवर्ग-पवर्ग होने पर, विसर्ग के स्थान पर सकार आदेश होता है।

श्लोक 3.49

छन्दसि वाऽप्राम्रेडितयोः

chandasi vā'prāmreḍitayoḥ

वेद में, कवर्ग-पवर्ग परे होने पर, विसर्ग के स्थान पर विकल्प से सकार आदेश होता है — किन्तु 'प्र' शब्द अथवा आम्रेडित के परे होने पर यह नहीं होता; जैसे 'अयस्पात्रम्'।

श्लोक 3.50

कः करत्करतिकृधिकृतेष्वनदितेः

kaḥ karatkaratikṛdhikṛteṣvanaditeḥ

वेद में, 'अदिति' शब्द को छोड़कर, 'कः', 'करत्', 'करति', 'कृधि' और 'कृत' शब्द परे होने पर विसर्ग के स्थान पर सकार आदेश होता है; जैसे 'विश्वतस्कः'।

श्लोक 3.51

पञ्चम्याः परावध्यर्थे

pañcamyāḥ parāvadhyarthe

वेद में, 'ऊपर' के अर्थ में प्रयुक्त 'परि' शब्द परे होने पर, पञ्चमी विभक्ति के विसर्ग के स्थान पर सकार आदेश होता है; जैसे 'दिवस्परि'।

श्लोक 3.52

पातौ च बहुलम्

pātau ca bahulam

वेद में, 'पा' धातु परे होने पर भी, पञ्चमी के विसर्ग के स्थान पर प्रायः सकार आदेश होता है; जैसे 'दिवस्पातु'।

श्लोक 3.53

षष्ठ्याः पतिपुत्रपृष्ठपारपद-पयस्पोषेषु

ṣaṣṭhyāḥ patiputrapṛṣṭhapārapada-payaspoṣeṣu

वेद में, पति, पुत्र, पृष्ठ, पार, पद, पयस् और पोष शब्द परे होने पर, षष्ठी विभक्ति के विसर्ग के स्थान पर सकार आदेश होता है; जैसे 'वाचस्पतिम्'।

श्लोक 3.54

इडाया वा

iḍāyā vā

वेद में, 'इडा' शब्द से बनी षष्ठी के विसर्ग के स्थान पर भी, पति आदि शब्द परे होने पर, विकल्प से सकार आदेश होता है; जैसे 'इडायास्पतिः'/'इडायाःपतिः'।

श्लोक 3.55

अपदान्तस्य मूर्धन्यः

apadāntasya mūrdhanyaḥ

यह अधिकार-सूत्र है — अब से 'अपदान्त सकार का मूर्धन्य (षकार) आदेश' यह विषय आगे के सूत्रों में चलता है।

श्लोक 3.56

सहेः साडः सः

saheḥ sāḍaḥ saḥ

'साड्' रूप बनने वाली 'सह्' धातु के सकार के स्थान पर मूर्धन्य षकार आदेश होता है; जैसे 'जलाषाट्'।

श्लोक 3.57

इण्कोः

iṇkoḥ

यह अधिकार-सूत्र है — अब से 'इण् प्रत्याहार तथा कवर्ग से पहले' यह अधिकार चलता है; जैसे 'सिषेच', 'अग्निषु'।

श्लोक 3.58

नुम्विसर्जनीयशर्व्यवायेऽपि

numvisarjanīyaśarvyavāye'pi

नुम् आगम, विसर्ग अथवा श्/ष्/स् का व्यवधान होने पर भी, इण्-कवर्ग से परे सकार का मूर्धन्य आदेश होता है; जैसे 'पिपठीःसु'।

श्लोक 3.59

आदेशप्रत्ययोः

ādeśapratyayoḥ

इण्-कवर्ग के बाद, आदेशरूप अथवा प्रत्ययगत अपदान्त सकार के स्थान पर षकार आदेश होता है; जैसे 'रामेषु', 'पठिष्यति'।

श्लोक 3.60

शासिवसिघसीनां च

śāsivasighasīnāṁ ca

कवर्ग, स्वर अथवा ह्/य्/व्/र्/ल् के बाद 'शास्', 'वस्' और 'घस्' धातुओं का सकार भी मूर्धन्य षकार आदेश पाता है।

श्लोक 3.61

स्तौतिण्योरेव षण्यभ्यासात्

stautiṇyoreva ṣaṇyabhyāsāt

षत्व-प्राप्त 'सन्' प्रत्यय परे होने पर, 'स्तु' और णिच्-अन्त धातुओं के अभ्यास में इण् से पहले सकार का षकार आदेश होता है; जैसे 'तुष्टूषति'।

श्लोक 3.62

सः स्विदिस्वदिसहीनां च

saḥ svidisvadisahīnāṁ ca

उसी प्रकार 'स्विद्', 'स्वद्' और 'सह्' के णिच्-अन्त रूपों के अभ्यास-उत्तरवर्ती सकार का भी षकार आदेश होता है; जैसे 'सिस्वेदयिषति'।

श्लोक 3.63

प्राक्सितादड्व्यवायेऽपि

prāksitādaḍvyavāye'pi

'सित्' शब्द के उल्लेख से पहले तक जो भी मूर्धन्य आदेश बताए गए हैं, वे अट् का व्यवधान होने पर भी होते हैं; जैसे 'अभिषुणोति'।

श्लोक 3.64

स्थादिष्वभ्यासेन चाभ्यासस्य

sthādiṣvabhyāsena cābhyāsasya

'सित्' शब्द के उल्लेख से पहले तक, तथा 'स्था', 'सेनय', 'सेध', 'सिच्', 'सञ्ज्' और 'स्वञ्ज्' धातुओं में, अभ्यास का व्यवधान होने पर भी और अभ्यास के सकार के स्थान में भी षकार आदेश होता है; जैसे 'अभितष्ठौ'।

श्लोक 3.65

उपसर्गात् सुनोति-सुवति-स्यति-स्तौति-स्तोभति-स्था-सेनय-सेध-सिच-सञ्ज-स्वञ्जाम्

upasargāt sunoti-suvati-syati-stauti-stobhati-sthā-senaya-sedha-sica-sañja-svañjām

उपसर्ग में स्थित निमित्त (इण्/कवर्ग) से पहले 'सु', 'सुव्', 'स्य', 'स्तु', 'स्तोभ्', 'स्था', 'सेनय', 'सेध', 'सिच्', 'सञ्ज्' और 'स्वञ्ज्' धातुओं के सकार का षकार आदेश होता है; जैसे 'अभिषुणोति'।

श्लोक 3.66

सदिरप्रतेः

sadiraprateḥ

'प्रति' से भिन्न उपसर्ग में स्थित निमित्त से पहले, 'सद्' धातु के सकार का षकार आदेश होता है; जैसे 'निषीदति'।

श्लोक 3.67

स्तन्भेः

stanbheḥ

उपसर्ग के बाद, 'स्तम्भ्' धातु के अपदान्त सकार के स्थान पर मूर्धन्य आदेश होता है; जैसे 'विष्टभ्नाति'।

श्लोक 3.68

अवाच्चालम्बनाविदूर्ययोः

avāccālambanāvidūryayoḥ

'आलम्बन' (सहारा लेना) अथवा 'निकटता' का भाव होने पर, 'अव' उपसर्ग से परे 'स्तम्भ्' धातु के सकार का षकार आदेश होता है; जैसे 'अवष्टभ्यास्ते'।

श्लोक 3.69

वेश्च स्वनो भोजने

veśca svano bhojane

'वि' और 'अव' उपसर्गों से परे, भोजन के अर्थ वाली 'स्वन्' धातु के सकार का षकार आदेश होता है; जैसे 'विष्वणति'।

श्लोक 3.70

परिनिविभ्यः सेवसितसय-सिवुसहसुट्स्तुस्वञ्जाम्

parinivibhyaḥ sevasitasaya-sivusahasuṭstusvañjām

'परि', 'नि' और 'वि' उपसर्गों से परे, सेव्, सित्, सय्, सिवु, सह्, सुट्, स्तु और स्वञ्ज् धातुओं के सकार का षकार आदेश होता है; जैसे 'परिषेवते'।

श्लोक 3.71

सिवादीनां वाड्व्यवायेपि

sivādīnāṁ vāḍvyavāyepi

'सिवु' से 'स्वञ्ज्' तक धातुओं के सकार का उक्त उपसर्गों से पहले, अट् का व्यवधान होने पर भी, विकल्प से षकार आदेश होता है।

श्लोक 3.72

अनु-विपर्यभि-निभ्यः स्यन्दतेरप्राणिषु

anu-viparyabhi-nibhyaḥ syandateraprāṇiṣu

'अनु', 'वि', 'परि', 'अभि' और 'नि' उपसर्गों से पहले, अचेतन विषय में प्रयुक्त 'स्यन्द्' धातु के सकार का विकल्प से षकार आदेश होता है; जैसे 'अनुष्यन्दते'/'अनुस्यन्दते'।

श्लोक 3.73

वेः स्कन्दे रनिष्ठायाम्

veḥ skande raniṣṭhāyām

निष्ठा प्रत्यय न हो तो, 'वि' उपसर्ग से परे 'स्कन्द्' धातु के सकार का विकल्प से मूर्धन्य आदेश होता है; जैसे 'विष्कन्ता'/'विस्कन्ता'।

श्लोक 3.74

परेश्च

pareśca

'परि' उपसर्ग से पहले भी, 'स्कन्द्' धातु के सकार का विकल्प से षकार आदेश होता है; जैसे 'परिष्कन्ता'/'परिस्कन्ता'।

श्लोक 3.75

परिस्कन्दः प्राच्यभरतेषु

pariskandaḥ prācyabharateṣu

प्राच्य-भरत देश के प्रयोग में, 'परि' से जुड़ी 'स्कन्द्' धातु के सकार का, निष्ठा प्रत्यय परे होने पर, षकार आदेश नहीं होता।

श्लोक 3.76

स्फुरतिस्फुलत्योर्निर्निविभ्यः

sphuratisphulatyornirnivibhyaḥ

'निर्', 'नि' और 'वि' के बाद, 'स्फुर्' और 'स्फुल्' धातुओं के अपदान्त सकार का विकल्प से मूर्धन्य आदेश होता है।

श्लोक 3.77

वेः स्कभ्नातेर्नित्यम्

veḥ skabhnāternityam

'वि' उपसर्ग से जुड़ी 'स्कम्भ्' धातु के सकार का सदैव मूर्धन्य आदेश होता है; जैसे 'विष्कभ्नाति'।

श्लोक 3.78

इणः षीध्वंलुङ्-लिटां धोऽङ्गात्

iṇaḥ ṣīdhvaṁluṅ-liṭāṁ dho'ṅgāt

इणन्त अंग से परे, 'षीध्वम्', लुङ् और लिट् के धकार का मूर्धन्य (ढकार) आदेश होता है।

श्लोक 3.79

विभाषेटः

vibhāṣeṭaḥ

इण् के बाद 'इट्' आगम आने पर, उन्हीं धकारों का विकल्प से मूर्धन्य आदेश होता है।

श्लोक 3.80

समासे ऽङ्गुलेः सङ्गः

samāse 'ṅguleḥ saṅgaḥ

समास में, 'अङ्गुलि' शब्द से परे 'सङ्ग' शब्द के सकार का मूर्धन्य आदेश होता है; जैसे 'अङ्गुलिषङ्गः'।

श्लोक 3.81

भीरोः स्थानम्

bhīroḥ sthānam

समास में, 'भीरु' शब्द से परे 'स्थान' शब्द के सकार का मूर्धन्य आदेश होता है; जैसे 'भीरुष्ठानम्'।

श्लोक 3.82

अग्नेः स्तुत्स्तोमसोमाः

agneḥ stutstomasomāḥ

समास में, 'अग्नि' शब्द से पहले 'स्तुत्', 'स्तोम' और 'सोम' शब्दों के सकार का मूर्धन्य आदेश होता है; जैसे 'अग्निष्टुत्', 'अग्नीषोमौ'।

श्लोक 3.83

ज्योतिरायुषः स्तोमः

jyotirāyuṣaḥ stomaḥ

समास में, 'ज्योतिस्' और 'आयुस्' शब्दों से पहले 'स्तोम' शब्द के सकार का मूर्धन्य आदेश होता है; जैसे 'ज्योतिष्टोमः'।

श्लोक 3.84

मातृपितृभ्यां स्वसा

mātṛpitṛbhyāṁ svasā

समास में, मातृ और पितृ शब्दों से पहले 'स्वसृ' शब्द के सकार का मूर्धन्य आदेश होता है; जैसे 'मातृष्वसा'।

श्लोक 3.85

मातुः पितुर्भ्यामन्यतरस्याम्

mātuḥ piturbhyāmanyatarasyām

समास में, मातुर्/पितुर् शब्दों से पहले वही 'स्वसृ' का सकार विकल्प से मूर्धन्य होता है; जैसे 'मातुःष्वसा'/'मातुःस्वसा'।

श्लोक 3.86

अभिनिसः स्तनः शब्दसंज्ञायाम्

abhinisaḥ stanaḥ śabdasaṁjñāyām

समुदाय-वाचक विशेष अर्थ में, 'अभि' अथवा 'निस्' उपसर्ग से परे 'स्तन्' धातु के सकार का विकल्प से मूर्धन्य आदेश होता है।

श्लोक 3.87

उपसर्गप्रादुर्भ्यामस्तिर्यच्परः

upasargaprādurbhyāmastiryacparaḥ

इणन्त उपसर्ग और 'प्रादुस्' के बाद, यकार-आदि स्वर वाली 'अस्' धातु के सकार का षकार आदेश होता है।

श्लोक 3.88

सुविनिर्दुर्भ्यः सुपिसूतिसमाः

suvinirdurbhyaḥ supisūtisamāḥ

'सु', 'वि', 'निर्' अथवा 'दुर्' उपसर्गों से पहले 'स्वप्' और 'सम' के सकार का मूर्धन्य आदेश होता है; जैसे 'सुषुप्तः', 'सुषमम्'।

श्लोक 3.89

निनदीभ्यां स्नातेः कौशले

ninadībhyāṁ snāteḥ kauśale

कुशलता (दक्षता) का भाव समुदाय से प्रतीत होने पर, 'नि' अथवा नदी-वाचक शब्द से परे 'स्ना' धातु के सकार का मूर्धन्य आदेश होता है; जैसे 'निष्णातः'।

श्लोक 3.90

सूत्रं प्रतिष्णातम्

sūtraṁ pratiṣṇātam

'सूत्र' (धागा) के अर्थ में, 'प्रति' उपसर्ग से पहले 'स्ना' धातु के सकार का मूर्धन्यादेश निपातित रूप है; जैसे 'प्रतिष्णातं सूत्रम्'।

श्लोक 3.91

कपिष्ठलो गोत्रे

kapiṣṭhalo gotre

गोत्र (वंश) के अर्थ में, 'कपि' शब्द के बाद 'स्थल' शब्द के सकार का मूर्धन्यादेश निपातित रूप है; जैसे 'कपिष्ठलः'।

श्लोक 3.92

प्रष्ठोऽग्रगामिनि

praṣṭho'gragāmini

'आगे चलने वाला' अर्थ में 'प्रष्ठ' शब्द निपातित है (प्र + स्था धातु से, सकार के मूर्धन्यादेश सहित); जैसे 'प्रष्ठोऽश्वः'।

श्लोक 3.93

वृक्षासनयोर्विष्टरः

vṛkṣāsanayorviṣṭaraḥ

वृक्ष और आसन के अर्थ में 'विष्टर' शब्द (वि + स्तॄ से) निपातित है; जैसे 'विष्टरो वृक्षः'।

श्लोक 3.94

छन्दोनाम्नि च

chandonāmni ca

बृहती आदि छन्दों के नाम में भी 'विष्टार' शब्द निपातित है।

श्लोक 3.95

गवियुधिभ्यां स्थिरः

gaviyudhibhyāṁ sthiraḥ

'गवि' अथवा 'युधि' शब्द से पहले 'स्थिर' शब्द के सकार का मूर्धन्यादेश होता है; जैसे 'गविष्ठिरः', 'युधिष्ठिरः'।

श्लोक 3.96

विकुशमिपरिभ्यः स्थलम्

vikuśamiparibhyaḥ sthalam

'वि', 'कु', 'शमी' और 'परि' शब्दों से पहले 'स्थल' शब्द के सकार का मूर्धन्यादेश होता है; जैसे 'विष्ठलम्', 'परिष्ठलम्'।

श्लोक 3.97

अम्बाम्ब-गो-भूमि-सव्याप-द्वित्रिकुशेकु-शङ्क्वङ्गु-मञ्जि-पुञ्जि-परमे-बर्हिर्दिव्यग्निभ्यः-स्थः

ambāmba-go-bhūmi-savyāpa-dvitrikuśeku-śaṅkvaṅgu-mañji-puñji-parame-barhirdivyagnibhyaḥ-sthaḥ

अम्ब, अम्बा, गो, भूमि, सव्याप, द्वि, त्रि, कुश, इकु, शङ्कु, अङ्गु, मञ्जि, पुञ्जि, परमे, बर्हिस्, दिव् और अग्नि — इन शब्दों से पहले 'स्थ' शब्द के सकार का मूर्धन्यादेश होता है; जैसे 'गोष्ठः'।

श्लोक 3.98

सुषामादिषु च

suṣāmādiṣu ca

'सुषामा' आदि शब्दों की सिद्धि के लिए भी सकार का षकार आदेश होता है; जैसे 'सुषामा'।

श्लोक 3.99

एति संज्ञायामगात्

eti saṁjñāyāmagāt

यदि समुदायवाचक संज्ञा-शब्द हो, तो गकार के बाद न आने वाले एकार से पहले सकार का मूर्धन्यादेश होता है; जैसे 'हरिषेणः'।

श्लोक 3.100

नक्षत्राद्वा

nakṣatrādvā

उन्हीं परिस्थितियों में, नक्षत्र-वाचक शब्द के बाद, सकार का विकल्प से मूर्धन्यादेश होता है; जैसे 'रोहिणीषेणः'/'रोहिणीसेनः'।

श्लोक 3.101

ह्रस्वात्तादौ तद्धिते

hrasvāttādau taddhite

तकारादि तद्धित प्रत्यय परे होने पर, ह्रस्व स्वर से पहले आए सकार का मूर्धन्यादेश होता है; जैसे 'सर्पिष्टरम्'।

श्लोक 3.102

निसस्तपतावनासेवने

nisastapatāvanāsevane

'आसेवन' का भाव न हो तो, 'तपत्' शब्द परे होने पर, 'निस्' के सकार का मूर्धन्यादेश होता है; जैसे 'निष्टपति'।

श्लोक 3.103

युष्मत्तत्ततक्षुष्वन्तः पादम्

yuṣmattattatakṣuṣvantaḥ pādam

सकार पाद के अन्त में न हो तो, युष्मद्-निष्पन्न तकारादि आदेशों तथा तकारादि 'तत्'/'ततक्षुस्' शब्दों से पहले सकार का मूर्धन्यादेश होता है; जैसे 'अग्निष्ट्वम्'।

श्लोक 3.104

यजुष्येकेषाम्

yajuṣyekeṣām

यजुर्वेद-सम्बन्धी प्रयोग में, कुछ आचार्यों के मत से, युष्मद्, तत् और ततक्षुस् शब्दों से पहले सकार का षकार आदेश होता है; जैसे 'अर्चिभिष्ट्वम्'।

श्लोक 3.105

स्तुतस्तोमयोश्छन्दसि

stutastomayośchandasi

वेद में, 'स्तुत' और 'स्तोम' शब्दों से पहले भी सकार का षकार आदेश होता है; जैसे 'त्रिभिःष्टुतस्य'।

श्लोक 3.106

पूर्वपदात्

pūrvapadāt

वेद में, समास के पूर्वपद में स्थित निमित्त (इण्/कवर्ग) से पहले सकार का षकार आदेश होता है; जैसे 'द्विषन्धिः'।

श्लोक 3.107

सुञः

suñaḥ

वेद में, पूर्वपदस्थ निमित्त से पहले, निपातसंज्ञक 'सुञ्' के सकार का भी षकार आदेश होता है।

श्लोक 3.108

सनोतेरनः

sanoteranaḥ

अनकारान्त 'सन्' धातु के सकार का षकार आदेश होता है; जैसे 'गोषाः', 'नृषाः'।

श्लोक 3.109

सहेः पृतनर्ताभ्यां च

saheḥ pṛtanartābhyāṁ ca

'पृतना' और 'ऋत' शब्दों से पहले 'सह्' धातु के सकार का षकार आदेश होता है; जैसे 'पृतनाषाहम्'।

श्लोक 3.110

नरपरसृपिसृजिस्पृशिस्पृहिस-वनादीनाम्

naraparasṛpisṛjispṛśispṛhisa-vanādīnām

रेफ-परक सकार, तथा 'सृप्', 'सृज्', 'स्पृश्', 'स्पृह्' और 'सवन' आदि शब्दों के सकार का भी षकार आदेश होता है।

श्लोक 3.111

सात्पदाद्योः

sātpadādyoḥ

'सात्' प्रत्यय के सकार तथा पद के आदि सकार का मूर्धन्य आदेश नहीं होता; जैसे 'अग्निसात्'।

श्लोक 3.112

सिचो यङि

sico yaṅi

यङ् प्रत्यय परे होने पर, 'सिच्' के सकार का मूर्धन्य आदेश नहीं होता; जैसे 'सेसिच्यते'।

श्लोक 3.113

सेधतेर्गतौ

sedhatergatau

गति के अर्थ वाली 'सिध्' धातु के सकार का षकार आदेश नहीं होता; जैसे 'अभिसेधयति'।

श्लोक 3.114

प्रतिस्तब्धनिस्तब्धौ च

pratistabdhanistabdhau ca

'प्रति' और 'नि' उपसर्गों से पहले, क्त-प्रत्ययान्त 'स्तम्भ्' धातु के सकार का षकार आदेश नहीं होता; जैसे 'प्रतिस्तब्धः'।

श्लोक 3.115

सोढः

soḍhaḥ

'सोढ' रूप को प्राप्त 'सह्' धातु के सकार का षकार आदेश नहीं होता; जैसे 'परिसोढः'।

श्लोक 3.116

स्तम्भुसिवुसहां चङि

stambhusivusahāṁ caṅi

चङ् परे होने पर, 'स्तम्भ्', 'सिवु' और 'सह्' धातुओं के सकार का मूर्धन्य आदेश नहीं होता; जैसे 'पर्यत्स्तम्भत्'।

श्लोक 3.117

सुनोतेः स्यसनोः

sunoteḥ syasanoḥ

स्य और सन् प्रत्यय परे होने पर, 'सु' धातु के सकार का मूर्धन्य आदेश नहीं होता; जैसे 'अभिसोष्यति'।

श्लोक 3.118

सदेः परस्य लिटि

sadeḥ parasya liṭi

लिट् परे होने पर, 'सद्' और 'स्वञ्ज्' धातुओं से पहले सकार का षकार आदेश नहीं होता; जैसे 'निषसाद' में मूल सकार ही रहता है।

श्लोक 3.119

निव्यभिभ्योऽड्व्यवाये वा छन्दसि

nivyabhibhyo'ḍvyavāye vā chandasi

वेद में, 'नि', 'वि' और 'अभि' उपसर्गों से परे, निमित्त और नैमित्तिक के बीच अट् का व्यवधान होने पर भी, सकार का विकल्प से मूर्धन्य आदेश नहीं होता; जैसे 'न्यषीदत्'/'न्यसीदत्'।

अष्टमोऽध्यायः, चतुर्थः पादः

श्लोक 4.1

रषाभ्यां नो णः समानपदे

raṣābhyāṁ no ṇaḥ samānapade

एक ही पद में रेफ या षकार से परे आए नकार के स्थान पर णकार आदेश होता है; जैसे 'चतुर्णाम्', 'जीर्णः'।

श्लोक 4.2

अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि

aṭkupvāṅnumvyavāye'pi

अट्, कवर्ग, पवर्ग, आङ् और नुम्/अनुस्वार का व्यवधान होने पर भी, यदि पद अखण्डित हो तो रेफ-षकार से परे नकार का णकार आदेश होता है; जैसे 'रामेण'।

श्लोक 4.3

पूर्वपदात्संज्ञायामगः

pūrvapadātsaṁjñāyāmagaḥ

संज्ञा (व्यक्तिवाचक नाम) के विषय में, गकार-रहित पूर्वपद के रेफ-षकार से परे नकार का णकार आदेश होता है; जैसे 'शूर्पणखा'।

श्लोक 4.4

वनं पुरगामिश्रकासिध्रकाशा-रिकाकोटराग्रेभ्यः

vanaṁ puragāmiśrakāsidhrakāśā-rikākoṭarāgrebhyaḥ

समुदाय-वाचक संज्ञा होने पर, 'पुरगा', 'मिश्रका', 'सिध्रका', 'शारिका', 'कोटरा' और 'अग्रे' — इन पूर्वपदों से परे 'वन' शब्द के नकार का णकार आदेश होता है; जैसे 'पुरगावणम्'।

श्लोक 4.5

प्रनिरन्तःशरेक्षुप्लक्षाम्रकार्ष्य-खदिरपीयूक्षाभ्योऽसंज्ञायामपि

pranirantaḥśarekṣuplakṣāmrakārṣya-khadirapīyūkṣābhyo'saṁjñāyāmapi

'प्र', 'निर्', 'अन्तर्', 'शर', 'इक्षु', 'प्लक्ष', 'आम्र', 'कार्ष्य', 'खदिर' और 'पीयूक्षा' शब्दों से पहले, संज्ञा हो या न हो दोनों ही स्थितियों में, 'वन' शब्द के नकार का णकार आदेश होता है; जैसे 'प्रवणे'।

श्लोक 4.6

विभाषौषधिवनस्पतिभ्यः

vibhāṣauṣadhivanaspatibhyaḥ

ओषधि-वाचक और वनस्पति-वाचक शब्दों से परे भी, 'वन' शब्द के नकार का विकल्प से णकार आदेश होता है; जैसे 'दूर्वाणम्'/'दूर्वावनम्'।

श्लोक 4.7

अह्नोऽदन्तात्

ahno'dantāt

अकारान्त-भिन्न पूर्वपद में रहने वाले निमित्त से परे, 'अह्न' शब्द के नकार का विकल्प से णकार आदेश होता है; जैसे 'पूर्वाह्णः'।

श्लोक 4.8

वाहनमाहितात्

vāhanamāhitāt

'वाहन पर लदी वस्तु' के वाचक पूर्वपद में स्थित निमित्त से परे, 'वाहन' शब्द के नकार का णकार आदेश होता है; जैसे 'इक्षुवाहणम्'।

श्लोक 4.9

पानं देशे

pānaṁ deśe

समुदाय के देश-वाचक होने पर, पूर्वपदस्थ निमित्त से परे 'पान' शब्द के नकार का णकार आदेश होता है; जैसे 'क्षीरपाणाः'।

श्लोक 4.10

वा भारकरणयोः

vā bhārakaraṇayoḥ

भाव अथवा करण के अर्थ में बने 'पान' शब्द के नकार का, पूर्वपदस्थ निमित्त से परे, विकल्प से णकार आदेश होता है; जैसे 'क्षीरपाणम्'/'क्षीरपानम्'।

श्लोक 4.11

प्रातिपदिकान्तनुम्विभक्तिषु च

prātipadikāntanumvibhaktiṣu ca

प्रातिपदिक के अन्त में, नुम् में, और विभक्ति में स्थित नकार का भी, पूर्वपदस्थ निमित्त से परे, विकल्प से णकार आदेश होता है; जैसे 'माषवापिणौ'/'माषवापिनौ'।

श्लोक 4.12

एकाजुत्तरपदे णः

ekājuttarapade ṇaḥ

जिस समास के उत्तरपद में केवल एक स्वर हो, उसमें पूर्वपद के रेफ-षकार से परे, प्रातिपदिक-अन्त्य, नुम्-गत अथवा विभक्ति-गत नकार का सदैव णकार आदेश होता है; जैसे 'वृत्रहणः'।

श्लोक 4.13

कुमति च

kumati ca

कवर्गयुक्त उत्तरपद परे होने पर भी, पूर्वपदस्थ निमित्त से पहले उन्हीं स्थानों के नकार का णकार आदेश होता है; जैसे 'वस्त्रयुगिणौ'।

श्लोक 4.14

उपसर्गाद समासेऽपि णोपदेशस्य

upasargāda samāse'pi ṇopadeśasya

उपसर्ग में स्थित रेफ-षकार से परे, णोपदेश (जिसकी मूल संज्ञा में णकार हो) धातु के नकार का णकार आदेश होता है; जैसे 'प्रणदति'।

श्लोक 4.15

हिनुमीना

hinumīnā

उपसर्ग में स्थित रेफ-षकार के बाद, 'हिनु' (हि धातु का श्नु-रूप) और 'मीना' (मीञ् धातु का श्ना-रूप) के नकार का णकार आदेश होता है।

श्लोक 4.16

आनि लोट्

āni loṭ

उपसर्गस्थ निमित्त से परे, लोट् से सम्बद्ध 'आनि' के नकार का णकार आदेश होता है; जैसे 'प्रभवाणि'।

श्लोक 4.17

नेर्गद-नद-पत-पद-घु-मा-स्यति-हन्ति-याति-वाति-द्राति-प्साति-वपति-वहति-शाम्यति-चिनोति-देग्धिषु च

nergada-nada-pata-pada-ghu-mā-syati-hanti-yāti-vāti-drāti-psāti-vapati-vahati-śāmyati-cinoti-degdhiṣu ca

गद्, नद्, पत्, पद्, घु, मा, स्या, हन्, या, वा, द्रा, प्सा, वप्, वह्, शम्, चि और दिह् — इन सत्रह धातुओं में से किसी के परे होने पर, उपसर्गस्थ रेफ-षकार के बाद आए 'नि' के नकार का णकार आदेश होता है; जैसे 'प्रणिगदति'।

श्लोक 4.18

शेषे विभाषाऽकखादावषान्त उपदेशे

śeṣe vibhāṣā'kakhādāvaṣānta upadeśe

मूल रूप में ककारादि, खकारादि अथवा षकारान्त न होने वाली धातु परे होने पर, उपसर्गस्थ निमित्त के बाद वाले 'नि' के नकार का विकल्प से णकार आदेश होता है; जैसे 'प्रणिपचति'/'प्रनिपचति'।

श्लोक 4.19

अनितेः

aniteḥ

उपसर्गस्थ निमित्त से परे 'अन्' धातु के नकार का णकार आदेश होता है; जैसे 'हे प्राण्'।

श्लोक 4.20

अन्तः

antaḥ

उपसर्गस्थ निमित्त से परे 'अन्' धातु के पदान्त नकार का भी णकार आदेश होता है; जैसे 'प्राणिति'।

श्लोक 4.21

उभौ साभ्यासस्य

ubhau sābhyāsasya

उपसर्गस्थ निमित्त से पहले, अभ्यासयुक्त 'अन्' धातु के अभ्यास-गत तथा उत्तरवर्ती दोनों नकारों का णकार आदेश होता है; जैसे 'प्राणिणिषति'।

श्लोक 4.22

हन्तेरत्पूर्वस्य

hanteratpūrvasya

उपसर्गस्थ निमित्त से पहले, ह्रस्व अकार-पूर्वक 'हन्' धातु के नकार का णकार आदेश होता है; जैसे 'प्रहण्यते'।

श्लोक 4.23

वमोर्वा

vamorvā

वकार और मकार परे होने पर भी, उपसर्गस्थ निमित्त से पहले 'हन्' धातु के नकार का विकल्प से णकार आदेश होता है; जैसे 'प्रहण्वः'/'प्रहन्वः'।

श्लोक 4.24

अन्तरदेशे

antaradeśe

समुदाय देशवाचक न हो तो, 'अन्तर्' शब्द से परे अकार-पूर्वक 'हन्' धातु के नकार का णकार आदेश होता है; जैसे 'अन्तर्हण्यते'।

श्लोक 4.25

अयनं च

ayanaṁ ca

समुदाय संज्ञा-शब्द न हो तो, 'अन्तर्' से परे 'अयन' शब्द के नकार का भी णकार आदेश होता है; जैसे 'अन्तरयणम्'।

श्लोक 4.26

छन्दस्यृ दवग्रहात्

chandasyṛ davagrahāt

वेद में, ऋकारान्त अवग्रह वाले पूर्वपद से परे नकार का णकार आदेश होता है; जैसे 'नृमणाः'।

श्लोक 4.27

नश्च धातुस्थोरुषुभ्यः

naśca dhātusthoruṣubhyaḥ

वेद में, धातु में स्थित निमित्त, 'उरु' शब्द और 'षु' शब्द से परे 'नस्' शब्द के नकार का णकार आदेश होता है; जैसे 'रक्षा णः'।

श्लोक 4.28

उपसर्गाद् बहुलम्

upasargād bahulam

उपसर्गस्थ निमित्त से पहले, 'नस्' शब्द के नकार का प्रायः णकार आदेश होता है; जैसे 'प्रणः शूद्रः'।

श्लोक 4.29

कृत्यचः

kṛtyacaḥ

यदि कृत्-प्रत्यय के भीतर का नकार स्वर के बाद आया हो, तो उपसर्गस्थ निमित्त से पहले उसका णकार आदेश होता है; जैसे 'प्रयाणम्'।

श्लोक 4.30

णेर्विभाषा

ṇervibhāṣā

णि-अन्त धातु से बने कृत्-प्रत्यय के नकार का, उपसर्गस्थ निमित्त से परे, विकल्प से णकार आदेश होता है; जैसे 'प्रयापणम्'/'प्रयापनम्'।

श्लोक 4.31

हल श्चेजुपधात्

hala ścejupadhāt

हलादि तथा इक्-उपधा (इ/उ) वाली धातु से बने कृत्-प्रत्यय के, अन्तिम न होने वाले, नकार का भी उपसर्गस्थ निमित्त से परे णकार आदेश होता है; जैसे 'प्रकोपणम्'।

श्लोक 4.32

इजादेः सनुमः

ijādeḥ sanumaḥ

नुम्-सहित, इक्-आदि तथा हलन्त धातु से बने कृत्-प्रत्यय के नकार का भी उपसर्गस्थ निमित्त से परे णकार आदेश होता है; जैसे 'प्रेङ्खणम्'।

श्लोक 4.33

वा निंसनिक्षनिन्दाम्

vā niṁsanikṣanindām

उपसर्गस्थ निमित्त से पहले, 'निस्', 'निक्ष' और 'निन्द्' धातुओं के कृत्-प्रत्यय नकार का विकल्प से णकार आदेश होता है; जैसे 'प्रणिंसनम्'/'प्रनिंसनम्'।

श्लोक 4.34

न भाभूपूकमिगमिप्यायीवेपाम्

na bhābhūpūkamigamipyāyīvepām

उपसर्गस्थ निमित्त से पहले होने पर भी, 'भा', 'भू', 'पू', 'कम्', 'गम्', 'प्यायी' और 'वेप्' धातुओं से बने कृत्-प्रत्यय के नकार का णकार आदेश नहीं होता; जैसे 'प्रभानम्'।

श्लोक 4.35

षात्पदान्तात्

ṣātpadāntāt

षकारान्त पद से परे, कृत्-प्रत्यय के भीतर का नकार भी णकार नहीं बनता; जैसे 'निष्पानम्'।

श्लोक 4.36

नशेः षान्तस्य

naśeḥ ṣāntasya

षकारान्त 'नश्' धातु के नकार का भी णकार आदेश नहीं होता; जैसे 'प्रनष्टः'।

श्लोक 4.37

पदान्तस्य

padāntasya

पदान्त नकार का णकार आदेश नहीं होता; जैसे 'रामान्'।

श्लोक 4.38

पदव्यवायेऽपि

padavyavāye'pi

निमित्त और नैमित्तिक के बीच कोई पद व्यवधान डाले, तो भी नकार का णकार आदेश नहीं होता; जैसे 'माषकुम्भवापेन'।

श्लोक 4.39

क्षुभ्नादिषु च

kṣubhnādiṣu ca

'क्षुभ्ना' आदि गण के शब्दों में नकार का णकार आदेश नहीं होता।

श्लोक 4.40

स्तोः श्चुना श्चुः

stoḥ ścunā ścuḥ

'स्तु' वर्ग (स्/त-वर्ग) का शकार-चवर्ग के साथ योग होने पर, स्/त-वर्ग के स्थान पर शकार-चवर्ग आदेश होता है (आगे हो या पीछे, परिणाम स्तु-वर्ग ही रहेगा नहीं — बल्कि श्चु-वर्ग बनेगा); जैसे 'रामश्शेते'।

श्लोक 4.41

ष्टुना ष्टुः

ṣṭunā ṣṭuḥ

'ष्टु' वर्ग (ष्/ट-वर्ग) का स्/त-वर्ग या नकार के साथ योग होने पर, स्/त-वर्ग/नकार के स्थान पर ष्/ट-वर्ग आदेश होता है; जैसे 'कृष्णः', 'उष्ट्रः'।

श्लोक 4.42

न पदान्ताट्टोरनाम्

na padāntāṭṭoranām

पदान्त टवर्ग के बाद यह ष्टुत्व नहीं होता, परन्तु टवर्ग के बाद 'नाम्' शब्द के नकार का णकार आदेश होता है; जैसे 'श्वलिट् साये'।

श्लोक 4.43

तोः षि

toḥ ṣi

षकार परे होने पर, तवर्ग का ष्टुत्व (ष्/ट-वर्ग आदेश) नहीं होता; जैसे 'पेष्टा'।

श्लोक 4.44

शात्

śāt

शकार के बाद, तवर्ग का श्चुत्व (श्/च-वर्ग आदेश) नहीं होता; जैसे 'प्रश्नः'।

श्लोक 4.45

यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा

yaro'nunāsike'nunāsiko vā

अनुनासिक परे होने पर, पदान्त यर् (स्वर-भिन्न वर्ण) के स्थान पर विकल्प से अनुनासिक आदेश होता है; जैसे 'वाङ्मयम्'।

श्लोक 4.46

अचो रहाभ्यां द्वे

aco rahābhyāṁ dve

स्वर के बाद, रेफ और हकार से परे आए यर् का विकल्प से द्वित्व होता है; जैसे 'गौय्यौ'।

श्लोक 4.47

अनचि च

anaci ca

स्वर परे न होने पर, स्वर के बाद वाले यर् का भी विकल्प से द्वित्व होता है; जैसे 'दध्यत्र'/'दद्ध्यत्र'।

श्लोक 4.48

नादिन्याक्रोशे पुत्रस्य

nādinyākrośe putrasya

यदि वाक्य से धिक्कार का भाव प्रकट हो, तो 'आदिनी' शब्द परे होने पर 'पुत्र' शब्द के तकार का द्वित्व नहीं होता; जैसे 'पुत्रादिनी'।

श्लोक 4.49

शरोऽचि

śaro'ci

स्वर परे होने पर शर् (श्/ष्/स्) का द्वित्व नहीं होता; जैसे 'कर्षति'।

श्लोक 4.50

त्रिप्रभृतिषु शाकटायनस्य

triprabhṛtiṣu śākaṭāyanasya

शाकटायन आचार्य के मत में, तीन या अधिक व्यंजनों के संयोग में किसी का भी द्वित्व नहीं होता; जैसे 'इन्द्रः'।

श्लोक 4.51

सर्वत्र शाकल्यस्य

sarvatra śākalyasya

शाकल्य आचार्य के मत में, किसी भी संयोग में द्वित्व नहीं होता; जैसे 'अर्कः'।

श्लोक 4.52

दीर्घादाचार्याणाम्

dīrghādācāryāṇām

आचार्यों के मत में, दीर्घ स्वर के बाद आए संयोग का द्वित्व नहीं होता; जैसे 'पात्रम्'।

श्लोक 4.53

झलां जश्झशि

jhalāṁ jaśjhaśi

वर्गों के तृतीय-चतुर्थ वर्ण परे होने पर, प्रथम-द्वितीय-तृतीय-चतुर्थ वर्ण अथवा श्/ष्/स्/ह् के स्थान पर उस वर्ग का तृतीय वर्ण (जश्) आदेश होता है; जैसे 'रुणद्धि'।

श्लोक 4.54

अभ्यासे चर्च

abhyāse carca

अभ्यास (द्वित्व-स्थान) में, झल् वर्णों का चर् (प्रथम वर्ण) अथवा जश् (तृतीय वर्ण) आदेश होता है; जैसे 'च्' से 'छ्'।

श्लोक 4.55

खरि च

khari ca

खर् परे होने पर, झल् वर्ण का चर् (प्रथम वर्ण) आदेश होता है; जैसे 'अत्ता'।

श्लोक 4.56

वाऽवसाने

vā'vasāne

विराम (अवसान) में, झल् वर्ण का विकल्प से चर् आदेश होता है; जैसे 'अत्'/'अद्'।

श्लोक 4.57

अणोऽप्रगृह्मस्यानुनासिकः

aṇo'pragṛhmasyānunāsikaḥ

विराम में, प्रगृह्य-भिन्न अण् (अ/इ/उ) स्वर विकल्प से अनुनासिक हो जाता है; जैसे 'दधि'/'दधिँ'।

श्लोक 4.58

अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः

anusvārasya yayi parasavarṇaḥ

अपदान्त अनुस्वार के स्थान पर, यय् वर्ण परे होने पर, उसी वर्ग का अनुनासिक (सवर्ण) आदेश होता है; जैसे 'शाङ्करः'।

श्लोक 4.59

वा पदान्तस्य

vā padāntasya

यकार परे होने पर, पदान्त अनुस्वार के स्थान पर भी विकल्प से यही सवर्ण आदेश होता है; जैसे 'त्वङ्करोषि'/'त्वं करोषि'।

श्लोक 4.60

तोर्लि

torli

लकार परे होने पर, तवर्ग का सवर्ण (लकार) आदेश होता है; जैसे 'तल्लयः'।

श्लोक 4.61

उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य

udaḥ sthāstambhoḥ pūrvasya

'उद्' उपसर्ग से परे, 'स्था' और 'स्तम्भ्' धातुओं के आदि सकार के स्थान पर पूर्ववर्ती वर्ण का सवर्ण (तकार) आदेश होता है; जैसे 'उत्थाता'।

श्लोक 4.62

झयो होऽन्यतरस्याम्

jhayo ho'nyatarasyām

वर्गों के प्रथम-द्वितीय-तृतीय-चतुर्थ वर्ण के बाद हकार का, विकल्प से, पूर्व वर्ण के वर्ग के चतुर्थ वर्ण के रूप में सवर्ण आदेश होता है; जैसे 'अज्झीनम्'/'अझीनम्'।

श्लोक 4.63

शश्छोऽटि

śaścho'ṭi

अट् परे होने पर, पदान्त क्षय् के बाद शकार का विकल्प से छकार आदेश होता है; जैसे 'तच्छिवः'।

श्लोक 4.64

हलो यमां यमि लोपः

halo yamāṁ yami lopaḥ

व्यंजन के बाद, यम् वर्ण (ङ्/ञ्/ण्/न्/म्) का, समान यम् वर्ण परे होने पर, विकल्प से लोप होता है; जैसे 'आदित्यः'।

श्लोक 4.65

झरो झरि सवर्णे

jharo jhari savarṇe

सवर्ण झर् वर्ण परे होने पर, व्यंजन के बाद आए झर् का विकल्प से लोप होता है; जैसे 'सन्ति'।

श्लोक 4.66

उदात्तादनुदात्तस्य स्वरितः

udāttādanudāttasya svaritaḥ

उदात्त स्वर से पहले आए अनुदात्त स्वर के स्थान पर स्वरित आदेश होता है; जैसे 'गार्ग्यः'।

श्लोक 4.67

नोदात्तस्वरितोदयमगार्ग्यकाश्यप गालवानाम्

nodāttasvaritodayamagārgyakāśyapa gālavānām

गार्ग्य, काश्यप और गालव आचार्यों को छोड़कर अन्य आचार्यों के मत में, उदात्त अथवा स्वरित से आरम्भ होने वाले (उदय वाले) अनुदात्त का स्वरित आदेश नहीं होता।

श्लोक 4.68

अ अ

a a

अष्टाध्यायी की अन्तिम सूत्र — खुले उच्चारण वाले (विवृत) अकार के स्थान पर संवृत (बन्द, सामान्य) अकार आदेश होता है; जैसे 'वृक्षः', 'प्लक्षः' में साधारण अकार का उच्चारण।

स्रोत

Sanskrit Wikisource, अष्टाध्यायी (bare edition, 8 adhyayas) and अष्टाध्यायी हिन्दी व्याख्या सहितम् (Hindi commentary edition) — https://sa.wikisource.org/wiki/अष्टाध्यायी · CC BY-SA 4.0