Skip to main content

बौधायनशुल्बसूत्रम्

Baudhāyana Śulbasūtra

रचयिता: Baudhayana285 श्लोक

इस अनुवाद के विषय में

This is technical geometric and ritual-construction prose-sutra (śulba-sūtra), not devotional verse; diagrams would aid comprehension but the text is followable in translation alone. Hindi and English renderings were produced directly from the Sanskrit for Eternal Raga (not quoted from any published translation), staying close to the grammar and the technical vocabulary of Vedic altar-construction (cord/rajju, peg/śaṅku, side-generating cord/karaṇī, brick/iṣţakā, span/prādeśa, cubit/aratni, pace/prakrama, man-height/puruṣa, etc.), glossing technical terms on first use. Several sutras describe brick-laying schemes for named altar shapes (śyena/falcon, kaṅka/heron, alaja, prauga, rathacakra/chariot-wheel, droṇa/trough, kūrma/tortoise, śmaśāna) whose full ritual precision depends on conventions the sūtra assumes rather than states; such verses carry a review_note flagging the specific uncertainty rather than inventing detail. No lacunae (missing/lost text) were found in this source; it is a continuous, complete recension of all 21 sections.

15 श्लोकों पर टिप्पणी दी गई है, जहाँ पाठ विवादित है।

प्रथमः खण्डः

श्लोक 1.1

अथेमेऽग्निचयाः

atheme'gnicayāḥ

अब ये अग्निचय (अग्नि-वेदियों के निर्माण-विधान) हैं।

श्लोक 1.2

तेषां भूमेः परिमाणविहारान्व्याख्यास्यामः

teṣāṁ bhūmeḥ parimāṇavihārānvyākhyāsyāmaḥ

हम उनके क्षेत्रफल के परिमाण और उनकी रचना-विधियों की व्याख्या करेंगे।

श्लोक 1.3

अथाङ्गुलप्रमाणं चतुर्दशाणवः चतुस्त्रिंशत्तिलाः पृथुसंश्लिष्टा इत्यपरम् । दशाङ्गुलं क्षुद्रपदम् । द्वादश प्रादेशः । पृथोत्तरयुगे त्रयोदशिके । पदं पञ्चदश । अष्टाशीतिशतमीषा । चतुःशतमक्षः । षडशीतिर्युगम् । द्वात्रिंशज्जानुः । षट्त्रिंशच्छम्याबाहू । द्विपदः प्रक्रमः । द्वौ प्रादेशावरत्निः । अथाप्युदाहरन्ति पदे युगे प्रक्रमेऽरत्नावियति शम्यायां च मानार्थेषु याथाकामीति । पञ्चारत्निः पुरुषो व्यामश्च । चतुररत्निर्व्यायामः

athāṅgulapramāṇaṁ caturdaśāṇavaḥ catustriṁśattilāḥ pṛthusaṁśliṣṭā ityaparam | daśāṅgulaṁ kṣudrapadam | dvādaśa prādeśaḥ | pṛthottarayuge trayodaśike | padaṁ pañcadaśa | aṣṭāśītiśatamīṣā | catuḥśatamakṣaḥ | ṣaḍaśītiryugam | dvātriṁśajjānuḥ | ṣaṭtriṁśacchamyābāhū | dvipadaḥ prakramaḥ | dvau prādeśāvaratniḥ | athāpyudāharanti pade yuge prakrame'ratnāviyati śamyāyāṁ ca mānārtheṣu yāthākāmīti | pañcāratniḥ puruṣo vyāmaśca | caturaratnirvyāyāmaḥ

अब अङ्गुल का प्रमाण: चौदह जौ के दाने एक साथ रखे हुए, अथवा दूसरे मत से चौंतीस तिल चौड़ाई में सटाकर रखे हुए। दस अङ्गुल का एक क्षुद्रपद होता है। बारह अङ्गुल का प्रादेश होता है; बड़े युग (जुए) में यह तेरह अङ्गुल का गिना जाता है। पद पंद्रह अङ्गुल का होता है। ईषा (जुए का डंडा) एक सौ अठासी अङ्गुल की, अक्ष एक सौ चार अङ्गुल का, युग छियासी अङ्गुल का, जानु बत्तीस अङ्गुल का, शम्या और बाहु छत्तीस-छत्तीस अङ्गुल के होते हैं। दो पद का एक प्रक्रम होता है। दो प्रादेश का एक अरत्नि होता है। यह भी बताया जाता है कि पद, युग, प्रक्रम, अरत्नि और शम्या के मापों में, प्रयोजन के अनुसार, यथेच्छ प्रयोग किया जा सकता है। पाँच अरत्नि का एक पुरुष (मनुष्य-ऊँचाई) और व्याम (भुजाविस्तार) होता है; चार अरत्नि का एक व्यायाम होता है।

श्लोक 1.4

चतुरश्रं चिकीर्षन्यावच्चिकीर्षेत्तावतीं रज्जुमुभयतः पाशां कृत्वा मध्ये लक्षणं करोति । लेखामालिख्य तस्या मध्ये शङ्कुं निहन्यात् । तस्मिन्पाशौ प्रतिमुच्य लक्षणेन मण्डलं परिलिखेत् । विष्कम्भान्तयोः शङ्कू निहन्यात् । पूर्वस्मिन्पाशं प्रतिमुच्य पाशेन मण्डलं परिलिखेत् । एवमपरस्मिंस्ते यत्र समेयातां तेन द्वितीयं विष्कम्भमायच्छेत् । विष्कम्भान्तयोः शङ्कू निहन्यात् । पूर्वस्मिन्पाशौ प्रतिमुच्य लक्षणेन मण्डलं परिलिखेत् । एवं दक्षिणत एवं पश्चादेवमुत्तरतस्तेषां येऽन्त्याः संसर्गास्तच्चतुरश्रं संपद्यते

caturaśraṁ cikīrṣanyāvaccikīrṣettāvatīṁ rajjumubhayataḥ pāśāṁ kṛtvā madhye lakṣaṇaṁ karoti | lekhāmālikhya tasyā madhye śaṅkuṁ nihanyāt | tasminpāśau pratimucya lakṣaṇena maṇḍalaṁ parilikhet | viṣkambhāntayoḥ śaṅkū nihanyāt | pūrvasminpāśaṁ pratimucya pāśena maṇḍalaṁ parilikhet | evamaparasmiṁste yatra sameyātāṁ tena dvitīyaṁ viṣkambhamāyacchet | viṣkambhāntayoḥ śaṅkū nihanyāt | pūrvasminpāśau pratimucya lakṣaṇena maṇḍalaṁ parilikhet | evaṁ dakṣiṇata evaṁ paścādevamuttaratasteṣāṁ ye'ntyāḥ saṁsargāstaccaturaśraṁ saṁpadyate

एक वर्गाकार क्षेत्र बनाना चाहने वाला, जितना वह बनाना चाहे उतनी लंबी रस्सी लेकर उसके दोनों सिरों पर फंदा बनाए और उसके बीच में एक चिह्न बनाए। एक रेखा खींचकर उसके मध्य में एक खूँटी गाड़नी चाहिए। उस खूँटी में फंदों को बाँधकर, चिह्न वाले बिंदु से एक वृत्त खींचना चाहिए। व्यास के दोनों सिरों पर खूँटियाँ गाड़नी चाहिए। पूर्वी खूँटी में फंदा बाँधकर, फंदे से एक वृत्त खींचना चाहिए। इसी प्रकार दूसरी ओर भी करते हुए, जहाँ वे दोनों वृत्त एक-दूसरे को काटें, उस बिंदु से दूसरा व्यास ले लेना चाहिए। उस व्यास के सिरों पर भी खूँटियाँ गाड़नी चाहिए और पहले की भाँति वृत्त खींचने चाहिए। इसी प्रकार दक्षिण में, इसी प्रकार पश्चिम में, इसी प्रकार उत्तर में भी करना चाहिए। इस प्रकार जो अंतिम प्रतिच्छेदन-बिंदु बनते हैं, उन्हें मिलाने से वह वर्गाकार क्षेत्र बन जाता है।

श्लोक 1.5

अथापरम् । प्रमाणाद्द्विगुणां रज्जुमुभयतः पाशां कृत्वा मध्ये लक्षणं करोति । स प्राच्यर्थः । अपरस्मिन्नर्धे चतुर्भागोने लक्षणं करोति । तन्न्यञ्चनम् । अर्धेंऽसार्थं । पृष्ठ्यान्तयोः पाशौ प्रतिमुच्य न्यञ्चनेन दक्षिणापायम्यार्धेन श्रोण्यंसान्निर्हरेत्

athāparam | pramāṇāddviguṇāṁ rajjumubhayataḥ pāśāṁ kṛtvā madhye lakṣaṇaṁ karoti | sa prācyarthaḥ | aparasminnardhe caturbhāgone lakṣaṇaṁ karoti | tannyañcanam | ardheṁ'sārthaṁ | pṛṣṭhyāntayoḥ pāśau pratimucya nyañcanena dakṣiṇāpāyamyārdhena śroṇyaṁsānnirharet

अब एक और विधि। प्रमाण से दुगुनी रस्सी लेकर उसके दोनों सिरों पर फंदा बनाकर, उसके मध्य में एक चिह्न बनाएँ। वह प्राची (पूर्व) दिशा की ओर का सिरा है। दूसरे आधे भाग में, चौथाई भाग कम करके चिह्न बनाएँ; उसे न्यञ्चन (नीचे की ओर मोड़) कहते हैं — यह अभीष्ट कंधे-स्थान के लिए है। पीठ के दोनों सिरों पर फंदे बाँधकर, न्यञ्चन-चिह्न से दक्षिण की ओर खींचकर चिह्न पर, कंधे और कमर के कोनों को निकालना चाहिए।

श्लोक 1.6

दीर्घचतुरश्रं चिकीर्षन्यावच्चिकीर्षे त्तावत्यां भूम्यां द्वौ शङ्कू निहन्यात् । द्वौ द्वावेकैकमभितः समौ । यावती तिर्यङ्मानी तावतीं रज्जुमुभयतः पाशां कृत्वा मध्ये लक्षणं करोति । पूर्वेषामन्त्ययोः पाशौ प्रतिमुच्य लक्षणेन दक्षिणापायम्य लक्षणे लक्षणं करोति । मध्यमे पाशौ प्रतिमुच्य लक्षणस्योपरिष्टाद्दक्षिणापायम्य लक्षणे शङ्कुं निहन्यात् । सॐऽस एतेनोत्तरॐऽसो व्याख्यातस्तथा श्रोणी

dīrghacaturaśraṁ cikīrṣanyāvaccikīrṣe ttāvatyāṁ bhūmyāṁ dvau śaṅkū nihanyāt | dvau dvāvekaikamabhitaḥ samau | yāvatī tiryaṅmānī tāvatīṁ rajjumubhayataḥ pāśāṁ kṛtvā madhye lakṣaṇaṁ karoti | pūrveṣāmantyayoḥ pāśau pratimucya lakṣaṇena dakṣiṇāpāyamya lakṣaṇe lakṣaṇaṁ karoti | madhyame pāśau pratimucya lakṣaṇasyopariṣṭāddakṣiṇāpāyamya lakṣaṇe śaṅkuṁ nihanyāt | saoṁ'sa etenottaraoṁ'so vyākhyātastathā śroṇī

आयताकार (दीर्घचतुरश्र) क्षेत्र बनाना चाहने वाला, जितनी भूमि पर बनाना चाहे उस पर दो खूँटियाँ गाड़े — दोनों ओर एक-एक, समान दूरी पर। जितनी तिर्यक्-माप (चौड़ाई) होनी हो, उतनी लंबी रस्सी लेकर, दोनों सिरों पर फंदा बनाकर, बीच में चिह्न बनाए। पूर्व की दोनों खूँटियों के सिरों पर फंदे बाँधकर, चिह्न से दक्षिण की ओर खींचकर चिह्न पर, चिह्न बनाना चाहिए। मध्य फंदे को बाँधकर, चिह्न के ऊपर से दक्षिण की ओर खींचकर चिह्न पर खूँटी गाड़नी चाहिए। इस प्रकार एक कंधा हुआ; इससे दूसरा कंधा भी समझ लेना चाहिए, वैसे ही दोनों कमर-कोने भी।

टिप्पणी: The source wikitext prints the syllable ॐ (oṁ, the sacred OM glyph) twice in this sutra ('saॐ'sa ... uttaroॐ'so'), where the grammar and sense clearly call for so'ṃsaḥ / uttaro'ṃso ('that is the shoulder' / 'the other shoulder'). This looks like a digitization artifact (likely an OCR or transcription substitution of ॐ for the expected o+anusvāra ligature) rather than an intentional invocation of Om in the middle of a construction sutra. The Devanagari is preserved exactly as published on Wikisource; the transliteration renders ॐ literally as 'oṁ'; the translation follows the contextually sensible reading (aṃsa, 'shoulder').

श्लोक 1.7

यत्र पुरस्तादंहीयसीं मिनुयात्तत्र तदर्धे लक्षणं करोति

yatra purastādaṁhīyasīṁ minuyāttatra tadardhe lakṣaṇaṁ karoti

जहाँ सामने की ओर (कोई माप) संकरी निकले, वहाँ उसके आधे भाग पर चिह्न बनाना चाहिए।

श्लोक 1.8

अथापरम् । प्रमाणादध्यर्धां रज्जुमुभयतः पाशां कृत्वापरस्मिंस्तृतीये षड्भागोने लक्षणं करोति । तन्न्यञ्छनम् । इष्टेंऽसार्थम् । पृष्ठ्यान्तयोः पाशौ प्रतिमुच्य न्यञ्छनेन दक्षिणापायम्येष्टेन श्रोण्यंसान्निर्हरेत्

athāparam | pramāṇādadhyardhāṁ rajjumubhayataḥ pāśāṁ kṛtvāparasmiṁstṛtīye ṣaḍbhāgone lakṣaṇaṁ karoti | tannyañchanam | iṣṭeṁ'sārtham | pṛṣṭhyāntayoḥ pāśau pratimucya nyañchanena dakṣiṇāpāyamyeṣṭena śroṇyaṁsānnirharet

अब एक और विधि। प्रमाण से डेढ़ गुनी रस्सी लेकर, दोनों सिरों पर फंदा बनाकर, दूसरे भाग में तिहाई में से छठा भाग कम करके चिह्न बनाना चाहिए; उसे न्यञ्छन कहते हैं — यह अभीष्ट कंधे-स्थान के लिए है। पीठ के दोनों सिरों पर फंदे बाँधकर, न्यञ्छन से दक्षिण की ओर खींचकर अभीष्ट बिंदु पर, कंधे और कमर के कोने निकालने चाहिए।

श्लोक 1.9

समचतुरश्रस्याक्ष्णयारज्जुर्द्विस्तावतीं भूमिं करोति

samacaturaśrasyākṣṇayārajjurdvistāvatīṁ bhūmiṁ karoti

समचतुरश्र (वर्ग) क्षेत्र की विकर्ण-रस्सी उससे दुगुनी भूमि बना देती है।

श्लोक 1.10

प्रमाणं तिर्यग्द्विकरण्यायामस्तस्याक्ष्णयारज्जुस्त्रिकरणी

pramāṇaṁ tiryagdvikaraṇyāyāmastasyākṣṇayārajjustrikaraṇī

जिसका प्रमाण तिर्यक् (आड़े) में दो करणी के बराबर हो, उसकी विकर्ण-रस्सी तीन करणी के बराबर होती है।

श्लोक 1.11

तृतीयकरण्येतेन व्याख्याता नवमस्तु भूमेर्भागो भवतीति

tṛtīyakaraṇyetena vyākhyātā navamastu bhūmerbhāgo bhavatīti

इसी से तीसरी करणी की भी व्याख्या हो जाती है; परंतु (उस क्षेत्र का) नवाँ भाग ही (मूल) भूमि का भाग होता है।

श्लोक 1.12

दीर्घचतुरश्रस्याक्ष्णयारज्जुः पार्श्वमानी तिर्यङ्मानी च यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति

dīrghacaturaśrasyākṣṇayārajjuḥ pārśvamānī tiryaṅmānī ca yatpṛthagbhūte kurutastadubhayaṁ karoti

आयताकार (दीर्घचतुरश्र) क्षेत्र की विकर्ण-रस्सी, लंबाई-माप और चौड़ाई-माप — ये दोनों जो अलग-अलग (क्षेत्रफल) उत्पन्न करती हैं, वह (विकर्ण-रस्सी) दोनों को मिलाकर उत्पन्न करती है।

टिप्पणी: This is the single most historically significant passage in the text: an early general statement of what is now called the Pythagorean theorem (the square on the diagonal of a rectangle equals the sum of the squares on its two sides), predating the earliest surviving Greek formulations.

श्लोक 1.13

तासां त्रिकचतुस्कयोर्द्वादशिकपञ्चिकयोः पञ्चदशिकाष्टिकयोः सप्तिकचतुर्विंशिकयोर्द्वादशिकपञ्चत्रिंशिकयोः पञ्चदशिकषट्त्रिंशिकयोरित्येतासूपलब्धिः

tāsāṁ trikacatuskayordvādaśikapañcikayoḥ pañcadaśikāṣṭikayoḥ saptikacaturviṁśikayordvādaśikapañcatriṁśikayoḥ pañcadaśikaṣaṭtriṁśikayorityetāsūpalabdhiḥ

इनकी उपलब्धि इन जोड़ों में होती है: तीन और चार में, बारह और पाँच में, पंद्रह और आठ में, सात और चौबीस में, बारह और पैंतीस में, पंद्रह और छत्तीस में।

टिप्पणी: A list of integer side-pairs (Pythagorean triples, alongside their implicit hypotenuse) illustrating the diagonal-rule of 1.12 — e.g. 3-4-5, 5-12-13, 8-15-17, 7-24-25, 12-35-37, 15-36-39.

द्वितीयः खण्डः

श्लोक 2.1

नानाचतुरश्रे समस्यन्कनीयसः करण्या वर्षीयसो वृध्रमुल्लिखेत् । वृध्रस्याक्ष्णयारज्जुः समस्तयोः पार्श्वमानी भवति

nānācaturaśre samasyankanīyasaḥ karaṇyā varṣīyaso vṛdhramullikhet | vṛdhrasyākṣṇayārajjuḥ samastayoḥ pārśvamānī bhavati

भिन्न-भिन्न आकार के वर्गों को जोड़ते समय, छोटे वर्ग की करणी (भुजा-रज्जु) से बड़े वर्ग में उसकी अधिकता (वृध्र) अंकित करनी चाहिए। उस अधिकता-भाग की विकर्ण-रस्सी ही दोनों (वर्गों) के योग की भुजा-माप होती है।

श्लोक 2.2

चतुरश्राच्चतुरश्रं निर्जिहीर्षन्यावन्निर्जिहीर्षेत्तस्य करण्या वर्षीयसो वृध्रमुल्लिखेत् । वृध्रस्य पार्श्वमानीमक्ष्णयेतरत्पार्श्वमुपसंहरेत् । सा यत्र निपतेत्तदपच्छिन्द्यात् । छिन्नया निरस्तम्

caturaśrāccaturaśraṁ nirjihīrṣanyāvannirjihīrṣettasya karaṇyā varṣīyaso vṛdhramullikhet | vṛdhrasya pārśvamānīmakṣṇayetaratpārśvamupasaṁharet | sā yatra nipatettadapacchindyāt | chinnayā nirastam

एक वर्ग को दूसरे वर्ग में से घटाना चाहने वाला, घटाए जाने वाले वर्ग की करणी से बड़े वर्ग में अधिकता (वृध्र) अंकित करे। उस अधिकता की भुजा-माप को विकर्णतः लेकर दूसरी भुजा पर मिलाना चाहिए। वह जहाँ गिरे, वहाँ काट देना चाहिए। काटे गए भाग से घटाव पूर्ण होता है।

श्लोक 2.3

समचतुरश्रं दीर्घचतुरश्रं चिकीर्षंस्तदक्ष्णयापच्छिद्य भागं द्वेधा विभज्य पार्श्वयोरुपदध्याद्यथायोगम्

samacaturaśraṁ dīrghacaturaśraṁ cikīrṣaṁstadakṣṇayāpacchidya bhāgaṁ dvedhā vibhajya pārśvayorupadadhyādyathāyogam

वर्ग को आयत (दीर्घचतुरश्र) बनाना चाहने वाला, उसे विकर्णतः काटकर, उस भाग को दो में बाँटकर, यथायोग्य दोनों भुजाओं पर लगा दे।

श्लोक 2.4

अपि वै तस्मिंश्चतुरश्रं समस्य तस्य करण्यापच्छिद्य यदतिशिष्यते तदितरत्रोपदध्यात्

api vai tasmiṁścaturaśraṁ samasya tasya karaṇyāpacchidya yadatiśiṣyate taditaratropadadhyāt

अथवा उसमें एक वर्ग जोड़कर, उसकी करणी से काटकर, जो अधिक बचे उसे अन्यत्र लगा देना चाहिए।

श्लोक 2.5

दीर्घचतुरश्रं समचतुरश्रं चिकीर्षंस्तिर्यङ्मानीं करणीं कृत्वा शेषं द्वेधा विभज्य पार्श्वयोरुपदध्यात् । खण्डमावापेन तत्संपूरयेत् । तस्य निर्हार उक्तः

dīrghacaturaśraṁ samacaturaśraṁ cikīrṣaṁstiryaṅmānīṁ karaṇīṁ kṛtvā śeṣaṁ dvedhā vibhajya pārśvayorupadadhyāt | khaṇḍamāvāpena tatsaṁpūrayet | tasya nirhāra uktaḥ

आयत को वर्ग बनाना चाहने वाला, उसकी चौड़ाई-माप को करणी (वर्ग-भुजा) बनाकर, शेष भाग को दो में बाँटकर दोनों भुजाओं पर लगा दे। जो रिक्त स्थान बचे उसे एक टुकड़े से भर देना चाहिए। इसका निकालना (घटाना) पहले ही बताया जा चुका है।

श्लोक 2.6

चतुरश्रमेकतोऽणिमच्चिकीर्षन्नणिमतः करणीं तिर्यङ्मानीं कृत्वा शेषमक्ष्णया विभज्य विपर्यस्येतरत्रोपदध्यात्

caturaśramekato'ṇimaccikīrṣannaṇimataḥ karaṇīṁ tiryaṅmānīṁ kṛtvā śeṣamakṣṇayā vibhajya viparyasyetaratropadadhyāt

वर्ग को एक ओर से छोटा करना चाहने वाला, छोटे किए जाने वाले भाग की भुजा को आड़ी करणी बनाकर, शेष भाग को विकर्णतः बाँटकर, उलटकर दूसरी ओर लगा दे।

श्लोक 2.7

चतुरश्रं प्रौगं चिकीर्षन्यावच्चिकीर्षेद्द्विस्तावतीं भूमिं समचतुरश्रां कृत्वा पूर्वस्याः करण्याः मध्ये शङ्कुं निहन्यात् । तस्मिन्पाशौ प्रतिमुच्य दक्षिणोत्तरयोः श्रोण्योर्निपातयेत् । बहिस्पन्द्यमपच्छिन्द्यात्

caturaśraṁ praugaṁ cikīrṣanyāvaccikīrṣeddvistāvatīṁ bhūmiṁ samacaturaśrāṁ kṛtvā pūrvasyāḥ karaṇyāḥ madhye śaṅkuṁ nihanyāt | tasminpāśau pratimucya dakṣiṇottarayoḥ śroṇyornipātayet | bahispandyamapacchindyāt

वर्ग को प्रौग (नौका-मुख आकृति) बनाना चाहने वाला, जितना बड़ा बनाना चाहे उतने क्षेत्रफल का दुगुना वर्ग बनाकर, उसकी पहली भुजा-रज्जु के मध्य में खूँटी गाड़े। उसमें फंदा बाँधकर, दक्षिण और उत्तर के कमर-कोनों पर गिराए। बाहर बचा हुआ भाग (स्पन्द्य) काट देना चाहिए।

श्लोक 2.8

चतुरश्रमुभयतः प्रौगं चिकीर्षन्यावच्चिकीर्षेद्द्विस्तावतीं भूमिं दीर्घचतुरश्रां कृत्वा पूर्वस्याः करण्याः मध्ये शङ्कुं निहन्यात् । तस्मिन्पाशौ प्रतिमुच्य दक्षिणोत्तरयोर्मध्यदेशयोर्निपातयेत् । बहिःस्पन्द्यमपच्छिन्द्यात् । एतेनापरं प्रौगं व्याख्यातम्

caturaśramubhayataḥ praugaṁ cikīrṣanyāvaccikīrṣeddvistāvatīṁ bhūmiṁ dīrghacaturaśrāṁ kṛtvā pūrvasyāḥ karaṇyāḥ madhye śaṅkuṁ nihanyāt | tasminpāśau pratimucya dakṣiṇottarayormadhyadeśayornipātayet | bahiḥspandyamapacchindyāt | etenāparaṁ praugaṁ vyākhyātam

वर्ग को दोनों ओर से प्रौग बनाना चाहने वाला, जितना बड़ा बनाना चाहे उतने क्षेत्रफल का दुगुना आयत बनाकर, उसकी पहली भुजा-रज्जु के मध्य में खूँटी गाड़े। उसमें फंदा बाँधकर, दक्षिण और उत्तर के मध्य-भागों पर गिराए। बाहर बचा हुआ भाग काट देना चाहिए। इससे दूसरा प्रौग भी समझ लेना चाहिए।

श्लोक 2.9

चतुरश्रं मण्डलं चिकीर्षन्नक्ष्णयार्धं मध्यात्प्राचीमभ्यापातयेत् । यदतिशिष्यते तस्य सह तृतीयेन मण्डलं परिलिखेत्

caturaśraṁ maṇḍalaṁ cikīrṣannakṣṇayārdhaṁ madhyātprācīmabhyāpātayet | yadatiśiṣyate tasya saha tṛtīyena maṇḍalaṁ parilikhet

वर्ग को वृत्त बनाना चाहने वाला, विकर्ण के आधे भाग को मध्य से पूर्व दिशा में गिराए। जो अधिक बचे, उसके तिहाई भाग सहित वृत्त खींचना चाहिए।

टिप्पणी: This is Baudhayana's approximate circling-of-the-square construction: radius = half the side + one third of the difference between half the diagonal and half the side.

श्लोक 2.10

मण्डलं चतुरश्रं चिकीर्षन्विष्कम्भमष्टौ भागान्कृत्वा भागमेकोनत्रिंशधा विभज्याष्टाविंशतिभागानुद्धरेत् । भागस्य च षष्ठमष्टमभागोनम्

maṇḍalaṁ caturaśraṁ cikīrṣanviṣkambhamaṣṭau bhāgānkṛtvā bhāgamekonatriṁśadhā vibhajyāṣṭāviṁśatibhāgānuddharet | bhāgasya ca ṣaṣṭhamaṣṭamabhāgonam

वृत्त को वर्ग बनाना चाहने वाला, व्यास के आठ भाग करे, और एक भाग के उनतीस भाग करके उनमें से अट्ठाईस भाग ले ले; और उस भाग के छठे भाग में से भी आठवाँ भाग कम कर दे।

टिप्पणी: Baudhayana's famous approximate squaring-of-the-circle construction, giving the side of the square in terms of the diameter (an early approximation equivalent to a value of pi close to 3.088).

श्लोक 2.11

अपि वा पञ्चदशभागान्कृत्वा द्वावुद्धरेत् । सैषानित्या चतुरश्रकरणी

api vā pañcadaśabhāgānkṛtvā dvāvuddharet | saiṣānityā caturaśrakaraṇī

अथवा पंद्रह भाग करके उनमें से दो भाग कम कर दे। यही वर्ग बनाने की स्थिर (व्यावहारिक) विधि है।

श्लोक 2.12

प्रमाणं तृतीयेन वर्धयेत्तच्च चतुर्थेनात्मचतुस्त्रिंशोनेन । सविशेषः

pramāṇaṁ tṛtīyena vardhayettacca caturthenātmacatustriṁśonena | saviśeṣaḥ

मूल प्रमाण को उसके तिहाई भाग से बढ़ा दे, और उस तिहाई को फिर उसके चौथाई भाग से, और उस चौथाई भाग में से अपने चौंतीसवें भाग को घटाकर बढ़ा दे। यह विशेष (परिशुद्ध) माप है।

टिप्पणी: Baudhayana's celebrated approximation of the square root of two: 1 + 1/3 + 1/(3×4) − 1/(3×4×34), accurate to five decimal places.

तृतीयः खण्डः

श्लोक 3.1

अथाग्न्याधेयिके विहारे गार्हपत्यादाहवनीयस्यायतनम् । विज्ञायतेऽष्टषु प्रक्रमेषु ब्राह्मणोऽग्निमादधीतैकादशसु राजन्यो द्वादशसु वैश्य इति

athāgnyādheyike vihāre gārhapatyādāhavanīyasyāyatanam | vijñāyate'ṣṭaṣu prakrameṣu brāhmaṇo'gnimādadhītaikādaśasu rājanyo dvādaśasu vaiśya iti

अब अग्न्याधेय (अग्नि-स्थापना) के विन्यास में, गार्हपत्य से आहवनीय तक की दूरी बताई जाती है। ऐसा जाना जाता है कि ब्राह्मण आठ प्रक्रमों पर, क्षत्रिय ग्यारह प्रक्रमों पर, और वैश्य बारह प्रक्रमों पर अग्नि की स्थापना करे।

श्लोक 3.2

आयामतृतीयेन त्रीणि चतुरश्राण्यनूचीनानि कारयेत् । अपरस्योत्तरस्यां श्रोण्यां गार्हपत्यः । तस्यैव दक्षिणेंऽसेऽन्वाहार्यपचनः पूर्वस्योत्तरेंऽस आहवनीयः

āyāmatṛtīyena trīṇi caturaśrāṇyanūcīnāni kārayet | aparasyottarasyāṁ śroṇyāṁ gārhapatyaḥ | tasyaiva dakṣiṇeṁ'se'nvāhāryapacanaḥ pūrvasyottareṁ'sa āhavanīyaḥ

लंबाई को तीन भागों में बाँटकर उत्तर-दक्षिण दिशा में तीन वर्ग बनाने चाहिए। पिछले (पश्चिमी) वर्ग के उत्तरी कमर-कोने पर गार्हपत्य अग्नि है; उसी के दक्षिणी कंधे पर अन्वाहार्यपचन (दक्षिणाग्नि) है; पहले (पूर्वी) वर्ग के उत्तरी कंधे पर आहवनीय अग्नि है।

श्लोक 3.3

अपि वा गार्हपत्याहवनीययोरन्तरालं पञ्चधा षोढा वा संभुज्य षष्ठं सप्तमं वा भागमागन्तुकमुपसमस्य समं त्रैधं विभज्य पूर्वस्मादन्ताद् द्वयोर्भागयोर्लक्षणं करोति । गार्हपत्याहवनीययोरन्तौ नियम्य लक्षणेन दक्षिणापायम्य लक्षणे शङ्कुं निहन्ति । तद्दक्षिणाग्नेरायतनं भवति

api vā gārhapatyāhavanīyayorantarālaṁ pañcadhā ṣoḍhā vā saṁbhujya ṣaṣṭhaṁ saptamaṁ vā bhāgamāgantukamupasamasya samaṁ traidhaṁ vibhajya pūrvasmādantād dvayorbhāgayorlakṣaṇaṁ karoti | gārhapatyāhavanīyayorantau niyamya lakṣaṇena dakṣiṇāpāyamya lakṣaṇe śaṅkuṁ nihanti | taddakṣiṇāgnerāyatanaṁ bhavati

अथवा गार्हपत्य और आहवनीय के बीच की दूरी को पाँच या छह भागों में बाँटकर, एक अतिरिक्त छठा या सातवाँ भाग जोड़कर, उसे समान तीन भागों में बाँटना चाहिए। पूर्वी छोर से दो भाग पर चिह्न बनाना चाहिए। गार्हपत्य और आहवनीय के छोरों को स्थिर करके, चिह्न से दक्षिण की ओर खींचकर दूसरे चिह्न पर खूँटी गाड़नी चाहिए। वही दक्षिणाग्नि का स्थान होता है।

श्लोक 3.4

अपि वा प्रमाणं पञ्चमेन वर्धयेत् । तत्सर्वं पञ्चधा संभुज्यापरस्मादन्ताद्द्वयोर्भागयोर्लक्षणं करोति । पृष्ठ्यान्तयोः पाशौ प्रतिमुच्य लक्षणेन दक्षिणापायम्य लक्षणे शङ्कुं निहन्ति । तद्दक्षि णाग्नेरायतनं भवति

api vā pramāṇaṁ pañcamena vardhayet | tatsarvaṁ pañcadhā saṁbhujyāparasmādantāddvayorbhāgayorlakṣaṇaṁ karoti | pṛṣṭhyāntayoḥ pāśau pratimucya lakṣaṇena dakṣiṇāpāyamya lakṣaṇe śaṅkuṁ nihanti | taddakṣi ṇāgnerāyatanaṁ bhavati

अथवा प्रमाण को पाँचवें भाग से बढ़ा देना चाहिए। उस सम्पूर्ण को पाँच भागों में बाँटकर पश्चिमी छोर से दो भाग पर चिह्न बनाना चाहिए। पीठ-रेखा के दोनों छोरों पर फंदे बाँधकर, चिह्न से दक्षिण की ओर खींचकर दूसरे चिह्न पर खूँटी गाड़नी चाहिए। वही दक्षिणाग्नि का स्थान होता है।

श्लोक 3.5

विपर्यस्तैतेनोत्करो व्याख्यातः

viparyastaitenotkaro vyākhyātaḥ

इसी को उलटकर उत्कर (राख के ढेर का स्थान) समझाया गया है।

श्लोक 3.6

अपरेनाहवनीयं यजमानमात्री भवतीति दर्शपौर्णमासिकाया वेदेर्विज्ञायते

aparenāhavanīyaṁ yajamānamātrī bhavatīti darśapaurṇamāsikāyā vedervijñāyate

दर्शपौर्णमास की वेदी के विषय में जाना जाता है कि आहवनीय के पश्चिम में वह यजमान की ऊँचाई के बराबर होती है।

श्लोक 3.7

तस्यास्त्रिभागोनं पश्चात्तिरश्ची । तस्या एवार्धं पुरस्तात्तिरश्ची । एवं दीर्घचतुरश्रमेकतोऽणिमद्विहृत्य स्रक्तिषु शङ्कून्निहन्यात्

tasyāstribhāgonaṁ paścāttiraścī | tasyā evārdhaṁ purastāttiraścī | evaṁ dīrghacaturaśramekato'ṇimadvihṛtya sraktiṣu śaṅkūnnihanyāt

उसकी पिछली (पश्चिमी) चौड़ाई उस माप से एक तिहाई कम होती है; और उसकी अगली (पूर्वी) चौड़ाई उसकी आधी होती है। इस प्रकार एक ओर से संकरे आयत का विन्यास करके, कोनों पर खूँटियाँ गाड़नी चाहिए।

श्लोक 3.8

यावती पार्श्वमानी द्विरभ्यस्ता तावतीं रज्जुमुभयतः पाशां कृत्वा मध्ये लक्षणं करोति । दक्षिणयोः पार्श्वयोः पाशौ प्रतिमुच्य लक्षणेन दक्षिणापायम्य लक्षणे शङ्कुं निहन्यात् । तस्मिन्पाशौ प्रतिमुच्य लक्षणेन दक्षिणं पार्श्वं परिलिखेत् । एतेनोत्तरं पार्श्वं व्याख्यातम् । पूवं पार्श्वं तया द्विरभ्यस्तया परिलिखेत् । एवमपरम्

yāvatī pārśvamānī dvirabhyastā tāvatīṁ rajjumubhayataḥ pāśāṁ kṛtvā madhye lakṣaṇaṁ karoti | dakṣiṇayoḥ pārśvayoḥ pāśau pratimucya lakṣaṇena dakṣiṇāpāyamya lakṣaṇe śaṅkuṁ nihanyāt | tasminpāśau pratimucya lakṣaṇena dakṣiṇaṁ pārśvaṁ parilikhet | etenottaraṁ pārśvaṁ vyākhyātam | pūvaṁ pārśvaṁ tayā dvirabhyastayā parilikhet | evamaparam

जितनी भुजा-माप हो, उससे दुगुनी रस्सी लेकर, दोनों सिरों पर फंदा बनाकर, मध्य में चिह्न बनाना चाहिए। दक्षिणी भुजा के दोनों सिरों पर फंदे बाँधकर, चिह्न से दक्षिण की ओर खींचकर दूसरे चिह्न पर खूँटी गाड़नी चाहिए। उस खूँटी में फंदा बाँधकर, चिह्न से दक्षिणी भुजा खींचनी चाहिए। इसी से उत्तरी भुजा भी समझ लेनी चाहिए। अगली (सामने की) भुजा भी उसी दुगुनी रस्सी से खींचनी चाहिए; इसी प्रकार पिछली भी।

श्लोक 3.9

दशपदा पश्चात्तिरश्ची द्वादशपदा प्राच्यष्टापदा पुरस्तात्तिरश्चीति पाशुबन्धिकाया वेदेर्विज्ञायते । मानयोगस्तस्या व्याख्यातः । रथसंमितेत्येकेषाम् । विराट्संपन्नेत्येकेषाम्

daśapadā paścāttiraścī dvādaśapadā prācyaṣṭāpadā purastāttiraścīti pāśubandhikāyā vedervijñāyate | mānayogastasyā vyākhyātaḥ | rathasaṁmitetyekeṣām | virāṭsaṁpannetyekeṣām

पशुबंध की वेदी के विषय में जाना जाता है कि उसकी पिछली चौड़ाई दस पद, लंबाई बारह पद, और अगली चौड़ाई आठ पद होती है। उसका अनुपात-विधान पहले बताया जा चुका है। कुछ लोग इसे 'रथसंमिता' कहते हैं, कुछ 'विराट्संपन्ना' कहते हैं।

श्लोक 3.10

शम्यामात्री चतुःस्रक्तिर्भवतीत्युत्तरवेदेर्विज्ञायते । समचतुरश्राविशेषात्

śamyāmātrī catuḥsraktirbhavatītyuttaravedervijñāyate | samacaturaśrāviśeṣāt

उत्तरवेदी के विषय में जाना जाता है कि वह शम्या-मात्र (शम्या के बराबर माप की) और चतुष्कोण होती है, वर्ग से बिना किसी भेद के।

श्लोक 3.11

वितृतीया वेदिर्भवतीति पैतृक्या वेदेर्विज्ञायते । महावेदेस्तृतीयेन समचतुरश्रकृतायास्तृतीयकरणी भवतीति । नवमस्तु भूमेर्भागो भवति । यजमानमात्री चतुःस्रक्तिर्भवतीत्येकेषाम् । दिक्षु स्रक्तयो भवन्ति

vitṛtīyā vedirbhavatīti paitṛkyā vedervijñāyate | mahāvedestṛtīyena samacaturaśrakṛtāyāstṛtīyakaraṇī bhavatīti | navamastu bhūmerbhāgo bhavati | yajamānamātrī catuḥsraktirbhavatītyekeṣām | dikṣu sraktayo bhavanti

पितृ-संबंधी वेदी के विषय में जाना जाता है कि वह 'वितृतीया' (तिहाई से घटी हुई) होती है। महावेदी के तिहाई भाग से वर्ग बनाए जाने पर वह तृतीय करणी (एक-तिहाई का वर्गमूल) होती है; और भूमि का नवाँ भाग (उसका क्षेत्रफल) होता है। कुछ के अनुसार वह यजमान-मात्र और चतुष्कोण होती है, जिसके कोने दिशाओं की ओर होते हैं।

श्लोक 3.12

वेदितृतीये यजेतेति सौत्रामणिकीं वेदिमभ्युपदिशन्ति । महावेदेस्तृतीयेन समचतुरश्रकृताया अष्टादशपदा पार्श्वमानी भवति । तस्यै दीर्घकरण्यामेकतोऽणिमत्करण्यां च यथाकामीति

veditṛtīye yajeteti sautrāmaṇikīṁ vedimabhyupadiśanti | mahāvedestṛtīyena samacaturaśrakṛtāyā aṣṭādaśapadā pārśvamānī bhavati | tasyai dīrghakaraṇyāmekato'ṇimatkaraṇyāṁ ca yathākāmīti

'वेदी के तिहाई भाग पर यजन करे' — इस वचन से सौत्रामणी की वेदी का संकेत दिया जाता है। महावेदी के तिहाई भाग से वर्ग बनाए जाने पर उसकी भुजा-माप अठारह पद होती है। उसके लिए, दीर्घ बनाने की विधि से हो या एक ओर से घटाने की विधि से, जैसी इच्छा हो वैसे किया जा सकता है।

चतुर्थः खण्डः

श्लोक 4.1

प्राग्वंशः षोडशप्रक्रमायामो द्वादशव्यासोऽपि वा द्वादशप्रक्रमायामो दशव्यासः

prāgvaṁśaḥ ṣoḍaśaprakramāyāmo dvādaśavyāso'pi vā dvādaśaprakramāyāmo daśavyāsaḥ

प्राग्वंश (पूर्वी यज्ञशाला) सोलह प्रक्रम लंबा और बारह चौड़ा होता है; अथवा बारह प्रक्रम लंबा और दस चौड़ा।

श्लोक 4.2

तस्य मध्ये द्वादशिको विहारः

tasya madhye dvādaśiko vihāraḥ

उसके मध्य में बारह (मात्रा) का विहार (खुला स्थान) होता है।

श्लोक 4.3

त्रिंशत्पदानि प्रक्रमा वा पश्चात्तिरश्ची भवति षट्त्रिंशत्प्राची चतुर्विंशतिः पुरस्तात्तिरश्चीति महावेदेर्विज्ञायते । मानयोगस्तस्या व्याख्यातः । आहवनीयात्षट् प्रक्रमान्महावेदिः

triṁśatpadāni prakramā vā paścāttiraścī bhavati ṣaṭtriṁśatprācī caturviṁśatiḥ purastāttiraścīti mahāvedervijñāyate | mānayogastasyā vyākhyātaḥ | āhavanīyātṣaṭ prakramānmahāvediḥ

महावेदी के विषय में जाना जाता है कि उसकी पिछली चौड़ाई तीस पद या प्रक्रम होती है, लंबाई छत्तीस, और अगली चौड़ाई चौबीस। उसका अनुपात-विधान बताया जा चुका है। आहवनीय से महावेदी छह प्रक्रम दूर होती है।

श्लोक 4.4

तत एकस्मिन्सदः । तद्दशकम् । उदक् सप्तविंशत्यरत्नयः । अष्टादशेत्येकेषाम्

tata ekasminsadaḥ | taddaśakam | udak saptaviṁśatyaratnayaḥ | aṣṭādaśetyekeṣām

उससे आगे एक (स्थान पर) सदस् (सभा-कक्ष) होता है। वह दस (मात्रा) का होता है। उत्तर दिशा में सत्ताईस अरत्नि; कुछ के मत से अठारह।

श्लोक 4.5

ततश्चतुर्षु हविर्धानम् । तद्दशकं द्वादशकं वा मानयोगस्तयोर्व्याख्यातः

tataścaturṣu havirdhānam | taddaśakaṁ dvādaśakaṁ vā mānayogastayorvyākhyātaḥ

उससे आगे चार भागों में हविर्धान (सोम-शकट का स्थान) होता है। वह दस या बारह (मात्रा) का होता है; दोनों का अनुपात-विधान बताया जा चुका है।

श्लोक 4.6

यूपावटीयाच्छङ्कोरर्धप्रक्रममवशिष्योत्तरवेदिं विमिमीते । दशपदोत्तरवेदिर्भवतीति सोमे विज्ञायते । मानयोगस्तस्या व्याख्यातः

yūpāvaṭīyācchaṅkorardhaprakramamavaśiṣyottaravediṁ vimimīte | daśapadottaravedirbhavatīti some vijñāyate | mānayogastasyā vyākhyātaḥ

यूपावटी (यूप-गड्ढे) की खूँटी से आधा प्रक्रम शेष छोड़कर उत्तरवेदी नापनी चाहिए। सोम-यज्ञ में जाना जाता है कि उत्तरवेदी दस पद की होती है। उसका अनुपात-विधान बताया जा चुका है।

श्लोक 4.7

चात्वालः शम्यामात्रोऽपरिमितो वा

cātvālaḥ śamyāmātro'parimito vā

चात्वाल (गड्ढा) शम्या के बराबर माप का, अथवा असीमित माप का होता है।

श्लोक 4.8

अथोपरवाः प्रादेशमुखाः प्रादेशान्तरालाः । अरत्निमात्रं समचतुरश्रं विहृत्य स्रक्तिषु शङ्कून्निहन्यात् । अर्धप्रादेशेनार्धप्रादेशेनैकैकं मण्डलं परिलिखेत्

athoparavāḥ prādeśamukhāḥ prādeśāntarālāḥ | aratnimātraṁ samacaturaśraṁ vihṛtya sraktiṣu śaṅkūnnihanyāt | ardhaprādeśenārdhaprādeśenaikaikaṁ maṇḍalaṁ parilikhet

अब उपरव (छोटे अग्नि-गड्ढे): उनके मुख एक प्रादेश (बित्ता) के होते हैं, और उनके बीच का अंतराल भी एक प्रादेश का। एक अरत्नि माप का वर्ग बनाकर, उसके कोनों पर खूँटियाँ गाड़नी चाहिए। आधे-आधे प्रादेश (त्रिज्या) से एक-एक वृत्त खींचना चाहिए।

श्लोक 4.9

सदसः पूर्वार्धाद्द्विप्रक्रममवशिष्य धिष्ण्यानां द्विप्रादेशो विष्कम्भस्तथान्तरालाः

sadasaḥ pūrvārdhāddviprakramamavaśiṣya dhiṣṇyānāṁ dviprādeśo viṣkambhastathāntarālāḥ

सदस् के अगले आधे भाग से दो प्रक्रम शेष छोड़कर, धिष्ण्यों (छोटी वेदियों) की चौड़ाई दो प्रादेश होती है, और वैसे ही उनके अंतराल भी।

श्लोक 4.10

आग्नीध्रागारस्य पार्श्वमानी पञ्चारत्निः

āgnīdhrāgārasya pārśvamānī pañcāratniḥ

आग्नीध्रागार (आग्नीध्र-पुरोहित की कुटी) की भुजा-माप पाँच अरत्नि होती है।

श्लोक 4.11

एतेन मार्जालीयो व्याख्यातः । तस्योदीचीं द्वारं कुर्वन्ति

etena mārjālīyo vyākhyātaḥ | tasyodīcīṁ dvāraṁ kurvanti

इसी से मार्जालीय (एक सहायक अग्नि-स्थान) भी समझाया गया है। उसका द्वार उत्तर दिशा में बनाते हैं।

श्लोक 4.12

रथाक्षान्तराला यूपावटा भवन्तीत्येकादशिन्यां विज्ञायते । तस्या दशानां च रथाक्षाणामेकादशानां च पदानामष्टाङ्गुलस्य च चतुर्विंशं भागमाददीत । स प्रक्रमः स्यात् । तेन वेदिं विमिमीते

rathākṣāntarālā yūpāvaṭā bhavantītyekādaśinyāṁ vijñāyate | tasyā daśānāṁ ca rathākṣāṇāmekādaśānāṁ ca padānāmaṣṭāṅgulasya ca caturviṁśaṁ bhāgamādadīta | sa prakramaḥ syāt | tena vediṁ vimimīte

एकादशिनी (यज्ञ) में जाना जाता है कि यूप-गड्ढों का अंतराल रथ-अक्षों के बराबर होता है। उसमें दस रथ-अक्षों, ग्यारह पदों और आठ अङ्गुल के चौबीसवें भाग को लेना चाहिए। वही प्रक्रम होता है। उसी से वेदी नापनी चाहिए।

श्लोक 4.13

अथाश्वमेधे विंशत्याश्च रथाक्षाणामेकविंशत्याश्च पदानामष्टाङ्गुलस्य च चतुर्विंशं भागमाददीत । स प्रक्रमः स्यात् । तेन वेदिं विमिमीते

athāśvamedhe viṁśatyāśca rathākṣāṇāmekaviṁśatyāśca padānāmaṣṭāṅgulasya ca caturviṁśaṁ bhāgamādadīta | sa prakramaḥ syāt | tena vediṁ vimimīte

अब अश्वमेध में, बीस रथ-अक्षों, इक्कीस पदों और आठ अङ्गुल के चौबीसवें भाग को लेना चाहिए। वही प्रक्रम होता है। उसी से वेदी नापनी चाहिए।

श्लोक 4.14

अथ प्राच्येकादशिन्यां यूपार्थं वेदेः पूर्वार्धात्पदार्धव्यासमपच्छिद्य तत्पुरस्तात्प्राञ्चं दध्यात् । नात्राष्टाङ्गुलं विद्यते । न व्यतिषङ्गः

atha prācyekādaśinyāṁ yūpārthaṁ vedeḥ pūrvārdhātpadārdhavyāsamapacchidya tatpurastātprāñcaṁ dadhyāt | nātrāṣṭāṅgulaṁ vidyate | na vyatiṣaṅgaḥ

अब पूर्वी एकादशिनी में, यूप के लिए वेदी के अगले आधे भाग से आधे पद की चौड़ाई काटकर, उसे उसके आगे पूर्व दिशा में लगाना चाहिए। यहाँ आठ अङ्गुल (का सामान्य नियम) नहीं लगता; कोई अतिव्याप्ति नहीं होती।

श्लोक 4.15

यूपावटाः पदविष्कम्भास्त्रिपदपरिणाहानि यूपोपराणीति

yūpāvaṭāḥ padaviṣkambhāstripadapariṇāhāni yūpoparāṇīti

यूप-गड्ढे एक पद चौड़े होते हैं, और यूप के चारों ओर के मिट्टी-घेरे तीन पद की परिधि के होते हैं।

पञ्चमः खण्डः

श्लोक 5.1

अर्धाष्टमाः पुरुषाः प्रथमोऽग्निः । अर्धनवमा द्वितीयः । अर्धदशमास्तृतीयः । एवमुत्तरोत्तरो विधाभ्यास एकशतविधात् । तदेतत्सप्तविधप्रभृत्येकशतविधान्तम्

ardhāṣṭamāḥ puruṣāḥ prathamo'gniḥ | ardhanavamā dvitīyaḥ | ardhadaśamāstṛtīyaḥ | evamuttarottaro vidhābhyāsa ekaśatavidhāt | tadetatsaptavidhaprabhṛtyekaśatavidhāntam

साढ़े सात पुरुष का पहला अग्नि (आकार) होता है। साढ़े आठ पुरुष का दूसरा। साढ़े नौ पुरुष का तीसरा। इस प्रकार क्रमशः बढ़ते हुए यह श्रेणी साढ़े एक सौ एक तक जाती है। इस प्रकार यह साढ़े सात से आरंभ होकर साढ़े एक सौ एक तक पहुँचती है।

टिप्पणी: Sets out the traditional agnicayana series of altar sizes, increasing in steps of one puruṣa from 7½ to 101½ puruṣas.

श्लोक 5.2

अत ऊर्ध्वमेकशतविधानेव प्रत्याददीत । अनग्निकान्वा यज्ञक्रतूनाहरेत् । अन्यत्राश्वमेधात्

ata ūrdhvamekaśatavidhāneva pratyādadīta | anagnikānvā yajñakratūnāharet | anyatrāśvamedhāt

इससे आगे साढ़े एक सौ एक के आकार तक ही लौट आना चाहिए। अथवा अश्वमेध को छोड़कर अन्य यज्ञों में बिना (इससे बड़े) अग्नि के भी कर्म किया जा सकता है।

श्लोक 5.3

अश्वमेधमप्राप्तं चेदाहरेदत ऊर्ध्वं विधामभ्यस्येन्नेतरदाद्रियेत

aśvamedhamaprāptaṁ cedāharedata ūrdhvaṁ vidhāmabhyasyennetaradādriyeta

यदि अश्वमेध तक न पहुँचा हो तो इससे आगे की श्रेणी को दुहराना चाहिए; दूसरे (नियम) की चिंता नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 5.4

अतीतं चेदाहरेदाहृत्य कृतान्तादेव प्रत्याददीत

atītaṁ cedāharedāhṛtya kṛtāntādeva pratyādadīta

यदि अश्वमेध को पार कर चुका हो और फिर यज्ञ करे, तो कर्म करने के बाद पहले नियत आकार पर ही लौट आना चाहिए।

श्लोक 5.5

कथमु खलु विधामभ्यस्येत्

kathamu khalu vidhāmabhyasyet

तो फिर इस श्रेणी को किस प्रकार दुहराया जाए?

श्लोक 5.6

यदन्यत्प्रकृतेस्तत्पञ्चदश भागान्कृत्वा विधायां विधायां द्वौ द्वौ भागौ समस्येत् । ताभिरर्धाष्टमाभिरग्निं चिनुयात्

yadanyatprakṛtestatpañcadaśa bhāgānkṛtvā vidhāyāṁ vidhāyāṁ dvau dvau bhāgau samasyet | tābhirardhāṣṭamābhiragniṁ cinuyāt

मूल आकार से जो अतिरिक्त हो, उसे पंद्रह भागों में बाँटकर, प्रत्येक चरण में दो-दो भाग जोड़ते जाना चाहिए। साढ़े सात (पुरुष) से आरंभ करके, इन्हीं वृद्धियों से अग्नि का चयन करना चाहिए।

श्लोक 5.7

ऊर्ध्वप्रमाणाभ्यासं जानोः पञ्चमस्य चतुर्विंशेनैके समामनन्ति

ūrdhvapramāṇābhyāsaṁ jānoḥ pañcamasya caturviṁśenaike samāmananti

ऊँचाई के प्रमाण की पुनरावृत्ति के विषय में कुछ आचार्य जानु (घुटने के माप) के पाँचवें भाग के चौबीसवें भाग के बराबर मानते हैं।

टिप्पणी: A terse technical rule on scaling the altar's height across the size-series; the precise computation depends on ritual conventions not fully spelled out in this sutra alone.

श्लोक 5.8

अथ हैक एकविधप्रभृतीनपक्षपुच्छांश्चिन्वते

atha haika ekavidhaprabhṛtīnapakṣapucchāṁścinvate

अब कुछ लोग एक-आकार की श्रेणी से लेकर पंख और पूँछ रहित अग्नि का चयन करते हैं।

श्लोक 5.9

तन्नोपपद्यते पूर्वोत्तरविरोधात्

tannopapadyate pūrvottaravirodhāt

वह उचित नहीं है, क्योंकि इससे पूर्व और बाद के कथनों में विरोध होता है।

श्लोक 5.10

अथ हैकेषां ब्राह्मणं भवति श्येनचिदग्नीनां पूर्वा ततिरिति

atha haikeṣāṁ brāhmaṇaṁ bhavati śyenacidagnīnāṁ pūrvā tatiriti

अब कुछ लोगों के अनुसार एक ब्राह्मण-वचन है: 'श्येनचित् (बाज़-आकार) अग्नियों का विस्तार पहले होता है।'

श्लोक 5.11

अथापरेषां न ज्यायांसं चित्वा कनीयांसं चिन्वीतेति

athāpareṣāṁ na jyāyāṁsaṁ citvā kanīyāṁsaṁ cinvīteti

अब दूसरों के अनुसार: 'बड़ा आकार बनाकर फिर छोटा आकार न बनाए।'

श्लोक 5.12

अथास्माकं । पक्षी भवति । न ह्यपक्षः पतितुमर्हति । अरत्निना पक्षौ द्राघीयांसौ भवतः । तस्मात्पक्षप्रवयांसि वयांसि । व्याममात्रौ पक्षौ च पुच्छं च भवतीति

athāsmākaṁ | pakṣī bhavati | na hyapakṣaḥ patitumarhati | aratninā pakṣau drāghīyāṁsau bhavataḥ | tasmātpakṣapravayāṁsi vayāṁsi | vyāmamātrau pakṣau ca pucchaṁ ca bhavatīti

अब हमारे मत में: वह (अग्नि) पक्षी है। बिना पंखों के पक्षी उड़ने योग्य नहीं होता। एक अरत्नि से पंख (शरीर से) लंबे होते हैं। इसलिए पक्षियों का शरीर पंखों से आगे बढ़ा हुआ होता है। पंख और पूँछ दोनों एक-एक व्याम (भुजा-विस्तार) के माप के होते हैं।

श्लोक 5.13

नापक्षपुच्छः श्येनो विद्यते । न चासप्तविधस्य पक्षपुच्छानि विद्यन्ते । न च सप्तविधं चित्वैकविधप्रसङ्गः । तस्मात्सप्तविध एव प्रथमोऽग्निः

nāpakṣapucchaḥ śyeno vidyate | na cāsaptavidhasya pakṣapucchāni vidyante | na ca saptavidhaṁ citvaikavidhaprasaṅgaḥ | tasmātsaptavidha eva prathamo'gniḥ

बिना पंख और पूँछ के कोई श्येन (बाज़) नहीं होता। और सात-आकार से कम के (पक्षी) के पंख-पूँछ नहीं होते। सात-आकार का चयन करके एक-आकार का प्रसंग भी नहीं बनता। इसलिए सात-आकार वाला ही पहला अग्नि है।

श्लोक 5.14

भेदान्वर्जयेत् । अधरोत्तरयोः पार्श्वसंधानं भेदा इत्युपदिशन्ति । तदग्न्यन्तेषु न विद्यते न स्रक्तिपार्श्वयोः

bhedānvarjayet | adharottarayoḥ pārśvasaṁdhānaṁ bhedā ityupadiśanti | tadagnyanteṣu na vidyate na sraktipārśvayoḥ

जोड़ों (भेद) से बचना चाहिए। वे बताते हैं कि निचली और ऊपरी परतों के किनारों का मिलन ही भेद कहलाता है। वह अग्नि के छोरों पर नहीं होता, न ही कोनों की भुजाओं पर।

श्लोक 5.15

साहस्रं चिन्वीत प्रथमं चिन्वान इति

sāhasraṁ cinvīta prathamaṁ cinvāna iti

'पहली बार चयन करने वाले को एक हज़ार (ईंटों से) चयन करना चाहिए' — ऐसा कहा गया है।

श्लोक 5.16

पञ्चमायां वा चितौ संख्यां पूरयेत्

pañcamāyāṁ vā citau saṁkhyāṁ pūrayet

अथवा पाँचवीं परत में ही (पूरी) गिनती पूरी कर लेनी चाहिए।

श्लोक 5.17

द्विशताश्चेच्चिकीर्षेत्पञ्चचोडाभिर्नाकसदः समानसंख्यं प्रतीयात्

dviśatāśceccikīrṣetpañcacoḍābhirnākasadaḥ samānasaṁkhyaṁ pratīyāt

यदि दो सौ (ईंटों से) चयन करना चाहे, तो पाँच चोटी वाली नाकसद् ईंटों सहित बराबर गिनती मान लेनी चाहिए।

टिप्पणी: Refers to specific named brick-classes of the agnicayana ritual (nākasad, pañcacūḍā) whose exact identity is set by ritual convention rather than by this sutra alone.

षष्ठः खण्डः

श्लोक 6.1

पशुधर्मो ह वा अग्निः । यथा ह वै पशोर्दक्षिणेषामस्थ्नां यद्दक्षिणं पार्श्वं तदुत्तरेषामुत्तरं यदुत्तरेषां दक्षिणं तद्दक्षिणेषामुत्तरं यदवाक् चोर्ध्वं च तत्समानमेवमिष्टकानां रूपाण्युपदध्यात्

paśudharmo ha vā agniḥ | yathā ha vai paśordakṣiṇeṣāmasthnāṁ yaddakṣiṇaṁ pārśvaṁ taduttareṣāmuttaraṁ yaduttareṣāṁ dakṣiṇaṁ taddakṣiṇeṣāmuttaraṁ yadavāk cordhvaṁ ca tatsamānamevamiṣṭakānāṁ rūpāṇyupadadhyāt

अग्नि वास्तव में पशु-धर्म वाला है। जिस प्रकार पशु की दाहिनी ओर की हड्डियों का दाहिना पार्श्व उत्तर की ओर होता है, और बाईं ओर की हड्डियों का बायाँ पार्श्व दक्षिण की ओर होता है — अर्थात् दाहिनी हड्डियों का दाहिना भाग उत्तर बनता है और बाईं हड्डियों का बायाँ भाग दक्षिण — जबकि जो नीचे और जो ऊपर है वह दोनों में समान रहता है — इसी प्रकार ईंटों के आकार भी बिछाने चाहिए।

टिप्पणी: A dense osteological analogy: brick orientation is said to mirror the left/right symmetry of an animal's bones while preserving a constant top/bottom orientation. The precise laying convention it describes is terse even by this text's standards.

श्लोक 6.2

या दक्षिणावृतो लेखास्ता दक्षिणत उपदध्यात् सव्यावृत उत्तरतः । ऋजुलेखाः पश्चाच्च पुरस्ताच्च भवन्ति । त्र्यालिखिता मध्ये । अथ या विशयस्था यथा ह वै पशोः पृष्ठवंशो नैवैकस्मिन्पार्श्वे व्यतिरेकेण वर्तते नैवापरस्मिन्नेवं तासामुपधानं प्रतीयात्

yā dakṣiṇāvṛto lekhāstā dakṣiṇata upadadhyāt savyāvṛta uttarataḥ | ṛjulekhāḥ paścācca purastācca bhavanti | tryālikhitā madhye | atha yā viśayasthā yathā ha vai paśoḥ pṛṣṭhavaṁśo naivaikasminpārśve vyatirekeṇa vartate naivāparasminnevaṁ tāsāmupadhānaṁ pratīyāt

जिन ईंटों पर दाईं ओर मुड़ी हुई रेखाएँ हों, उन्हें दक्षिण की ओर रखना चाहिए; बाईं ओर मुड़ी हुई रेखाओं वाली को उत्तर की ओर। सीधी रेखा वाली ईंटें पीछे और आगे रखी जाती हैं। तीन-रेखा वाली मध्य में। अब जो विशय (विभाजन-रेखा) पर स्थित हों — जैसे पशु की रीढ़ किसी एक ओर विशेष रूप से नहीं झुकती, न ही दूसरी ओर — वैसे ही उनका बिछाना समझना चाहिए।

श्लोक 6.3

अथापि ब्राह्मणं भवति । प्रजापतिर्वा अथर्वाग्निरेव दध्यङ्ङाथर्वणस्तस्येष्टका अस्थानीति

athāpi brāhmaṇaṁ bhavati | prajāpatirvā atharvāgnireva dadhyaṅṅātharvaṇastasyeṣṭakā asthānīti

इस पर एक ब्राह्मण-वचन भी है: 'प्रजापति ही अथर्वा है; अग्नि ही आथर्वण दध्यङ् है; उसकी ईंटें ही उसकी हड्डियाँ हैं।'

श्लोक 6.4

तस्माद् बहिस्तन्वं चेच्चिनुयात्तन्वोपप्लवमध्यैरात्मोपप्लवमध्यात् संदध्यात्

tasmād bahistanvaṁ ceccinuyāttanvopaplavamadhyairātmopaplavamadhyāt saṁdadhyāt

इसलिए यदि शरीर (तनु) को बाहर की ओर से चयन करे, तो शरीर के जोड़ों के मध्य-भागों से, आत्म-भाग के जोड़ के मध्य से, उसे जोड़ना चाहिए।

टिप्पणी: A terse technical instruction on how the overlapping brick-courses of the altar's body should be joined; the exact procedure relies on conventions assumed but not spelled out here.

श्लोक 6.5

प्राञ्चमेनं चिनुत इति विज्ञायते

prāñcamenaṁ cinuta iti vijñāyate

यह जाना जाता है कि इसका चयन पूर्वाभिमुख होकर किया जाता है।

श्लोक 6.6

अमृन्मयीभिरनिष्टकाभिर्न संख्यां पूरयेत्

amṛnmayībhiraniṣṭakābhirna saṁkhyāṁ pūrayet

मिट्टी की न बनी हुई, अर्थात् जो ईंट ही न हो, ऐसी वस्तुओं से गिनती पूरी नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 6.7

इष्टकचिद्वा अन्योऽग्निः पशुचिदन्य इत्येतस्माद्ब्राह्मणात्

iṣṭakacidvā anyo'gniḥ paśucidanya ityetasmādbrāhmaṇāt

इस ब्राह्मण-वचन से यह भी कहा जाता है: 'ईंटों से बना एक अग्नि है, पशु-रूप से बना दूसरा अग्नि है।'

श्लोक 6.8

पशुर्वा एष यदग्निर्योनिः खलु वा एषा पशोर्विक्रियते यत्प्राचीनमैष्टाकाद्यजुः क्रियत इति च

paśurvā eṣa yadagniryoniḥ khalu vā eṣā paśorvikriyate yatprācīnamaiṣṭākādyajuḥ kriyata iti ca

'यह अग्नि ही पशु है; पशु का यह उद्गम-स्थान (योनि) ही रूपांतरित होता है, क्योंकि ईंटों के रखे जाने से पहले ही यजुष् (मंत्र) का पाठ किया जाता है' — ऐसा भी कहा गया है।

श्लोक 6.9

लोकबाधीनि द्रव्याण्यवटेषूपदध्यात्

lokabādhīni dravyāṇyavaṭeṣūpadadhyāt

लोकबाधी (संसार को दूर रखने वाली) वस्तुओं को गड्ढों में रखना चाहिए।

टिप्पणी: The exact identity of the 'lokabādhi' materials is a matter of ritual convention not specified in this sutra.

श्लोक 6.10

मण्डलमृषभं विकर्णीमितीष्टकासु लक्ष्माणि प्रतीयात्

maṇḍalamṛṣabhaṁ vikarṇīmitīṣṭakāsu lakṣmāṇi pratīyāt

ईंटों पर के चिह्नों को वृत्त, वृषभ (बैल) और विकर्ण-रेखा के रूप में समझना चाहिए।

श्लोक 6.11

इष्टकामन्त्रयोरिष्टकाव्यतिरेके लोकंपृणाः संप्रद्यन्ते परिमाणाभावात्

iṣṭakāmantrayoriṣṭakāvyatireke lokaṁpṛṇāḥ saṁpradyante parimāṇābhāvāt

जहाँ ईंटों की गिनती और मंत्रों की गिनती में भेद हो, वहाँ प्रमाण की कमी के कारण लोकंपृणा ('लोक भरने वाली') ईंटें रखी जाती हैं।

श्लोक 6.12

अतीतानेव वेष्टकागणानत्रोपदध्यात्

atītāneva veṣṭakāgaṇānatropadadhyāt

यहाँ केवल उन्हीं ईंट-समूहों को रखना चाहिए जो पहले प्रयोग में आ चुके हों।

श्लोक 6.13

पञ्च लोकंपृणाः

pañca lokaṁpṛṇāḥ

लोकंपृणा ईंटें पाँच होती हैं।

श्लोक 6.14

मन्त्रव्यतिरेकेऽक्ताः शर्कराः संधिषूपदध्यात्

mantravyatireke'ktāḥ śarkarāḥ saṁdhiṣūpadadhyāt

जहाँ मंत्र की गिनती में भेद हो, वहाँ जोड़ों पर अभिमंत्रित कंकड़ (शर्करा) रखने चाहिए।

श्लोक 6.15

प्राचीरुपदधाति प्रतीचीरुपदधातीति गणेषु रीतिवादः

prācīrupadadhāti pratīcīrupadadhātīti gaṇeṣu rītivādaḥ

'पूर्वाभिमुख रखता है, पश्चिमाभिमुख रखता है' — यह समूहों के विषय में प्रचलित कथन है।

श्लोक 6.16

प्राचीमुपदधाति प्रतीचीमुपदधातीति कर्तुर्मुखवादः

prācīmupadadhāti pratīcīmupadadhātīti karturmukhavādaḥ

'पूर्वाभिमुख रखता है, पश्चिमाभिमुख रखता है' — यह कर्ता के अपने मुख की दिशा से कहा गया कथन है।

श्लोक 6.17

पुरस्तादन्याः प्रतीचीरुपदधाति पश्चादन्याः प्राचीरित्यपवर्गः

purastādanyāḥ pratīcīrupadadhāti paścādanyāḥ prācīrityapavargaḥ

'आगे कुछ ईंटें पश्चिमाभिमुख रखता है, पीछे कुछ पूर्वाभिमुख' — यह पूर्णता के लिए दिया गया नियम है।

श्लोक 6.18

चतुरश्रास्वेवैतदुपपद्यते

caturaśrāsvevaitadupapadyate

यह नियम केवल वर्गाकार (चतुरश्र) वेदियों में ही लागू होता है।

सप्तमः खण्डः

श्लोक 7.1

न खण्डामुपदध्यात् । न भिन्नामुपदध्यात् । न कृष्णामुपदध्यात् । न जीर्णामुपदध्यात् । न लक्ष्मणामुपदध्यात् । न स्वयमातृण्णां स्वयंचितावुपदध्यात्

na khaṇḍāmupadadhyāt | na bhinnāmupadadhyāt | na kṛṣṇāmupadadhyāt | na jīrṇāmupadadhyāt | na lakṣmaṇāmupadadhyāt | na svayamātṛṇṇāṁ svayaṁcitāvupadadhyāt

टूटी हुई ईंट न रखे। चटकी हुई ईंट न रखे। काली ईंट न रखे। पुरानी (घिसी) ईंट न रखे। दाग़दार ईंट न रखे। और नियमित चिति में स्वतः चटक गई ईंट को न रखे।

श्लोक 7.2

ऊर्ध्वप्रमाणमिष्टकानां जानोः पञ्चमेन कारयेत् । अर्धेन नाकसदां पञ्चचोडानां च

ūrdhvapramāṇamiṣṭakānāṁ jānoḥ pañcamena kārayet | ardhena nākasadāṁ pañcacoḍānāṁ ca

ईंटों की ऊँचाई जानु (घुटने के माप) के पाँचवें भाग के बराबर बनानी चाहिए; नाकसद् और पञ्चचूड़ा ईंटों की ऊँचाई उसकी आधी।

श्लोक 7.3

यच्छोषपाकाभ्यां प्रतिह्रसेत पुरीषेण तत्संपूरयेत् पुरीषस्यानियतपरिमाणत्वात्

yacchoṣapākābhyāṁ pratihraseta purīṣeṇa tatsaṁpūrayet purīṣasyāniyataparimāṇatvāt

सूखने और पकाए जाने से जो ऊँचाई घट जाए, उसे पुरीष (भराव-मिट्टी) से पूरा कर देना चाहिए, क्योंकि पुरीष की कोई निश्चित माप नहीं होती।

श्लोक 7.4

व्यायाममात्री भवतीति गार्हपत्यचितेर्विज्ञायते

vyāyāmamātrī bhavatīti gārhapatyacitervijñāyate

यह जाना जाता है कि गार्हपत्य-चिति व्यायाम-मात्र (एक व्यायाम के बराबर माप की) होती है।

श्लोक 7.5

चतुरश्रेत्येकेषां । परिमण्डलेत्येकेषाम्

caturaśretyekeṣāṁ | parimaṇḍaletyekeṣām

कुछ के अनुसार यह वर्गाकार होती है, कुछ के अनुसार वृत्ताकार।

श्लोक 7.6

चतुरश्रं सप्तधा विभज्य तिरश्चीं त्रेधा विभजेत् । अपरस्मिन्प्रस्तार उदीचीरुपदधाति

caturaśraṁ saptadhā vibhajya tiraścīṁ tredhā vibhajet | aparasminprastāra udīcīrupadadhāti

वर्ग को सात भागों में बाँटकर, आड़ी रेखा को तीन भागों में बाँटना चाहिए। दूसरी परत में ईंटें उत्तराभिमुख रखी जाती हैं।

श्लोक 7.7

समचतुरश्राश्चेदुपदध्याद्व्यायामषष्ठेनेष्टकाः कारयेच्चतुर्थेन तृतीयेनेति । तासां नव प्रथमा द्वादश द्वितीया इति पूर्वस्मिन्प्रस्तार उपदधाति । पञ्च तृतीयाः षोडश प्रथमा इत्यपरस्मिन्

samacaturaśrāścedupadadhyādvyāyāmaṣaṣṭheneṣṭakāḥ kārayeccaturthena tṛtīyeneti | tāsāṁ nava prathamā dvādaśa dvitīyā iti pūrvasminprastāra upadadhāti | pañca tṛtīyāḥ ṣoḍaśa prathamā ityaparasmin

यदि वर्गाकार ईंटें रखनी हों, तो उन्हें व्यायाम के छठे, चौथे या तिहाई भाग के माप की बनाना चाहिए। पहली परत में इनमें से नौ ईंटें पहले माप की और बारह दूसरे माप की रखी जाती हैं। दूसरी परत में पाँच तीसरे माप की और सोलह पहले माप की रखी जाती हैं।

श्लोक 7.8

परिमण्डलायां यावत्संभवेत्तावत्समचतुरश्रं कृत्वा तन्नवधा विभजेत् प्रधींस्त्रिधा त्रिधेति । अपरं प्रस्तारं तथोपदध्याद्यथा प्रध्यनीकेषु स्रक्तयो भवन्ति

parimaṇḍalāyāṁ yāvatsaṁbhavettāvatsamacaturaśraṁ kṛtvā tannavadhā vibhajet pradhīṁstridhā tridheti | aparaṁ prastāraṁ tathopadadhyādyathā pradhyanīkeṣu sraktayo bhavanti

वृत्ताकार (चिति) में, जितना बड़ा वर्ग समा सके उतना बनाकर, उसे नौ भागों में बाँटना चाहिए, और परिधि-खंडों (प्रधि) को तीन-तीन भागों में। दूसरी परत इस प्रकार बिछानी चाहिए कि कोने परिधि की संधियों पर पड़ें।

श्लोक 7.9

धिष्ण्या एकचितीकाश्चतुरश्राः परिमण्डला वा

dhiṣṇyā ekacitīkāścaturaśrāḥ parimaṇḍalā vā

धिष्ण्य (छोटी वेदियाँ) एक ही परत की, वर्गाकार या वृत्ताकार होती हैं।

श्लोक 7.10

तेषामाग्नीध्रीयं नवधा विभज्यैकस्याः स्थानेऽश्मानमुपदध्यात्

teṣāmāgnīdhrīyaṁ navadhā vibhajyaikasyāḥ sthāne'śmānamupadadhyāt

उनके आग्नीध्रीय (स्थान) को नौ भागों में बाँटकर, एक भाग के स्थान पर एक पत्थर रखना चाहिए।

श्लोक 7.11

अथ होतुर्धिष्ण्यं नवधा विभज्य पूर्वांस्त्रिभागानेकैकं द्वेधा विभजेत्

atha hoturdhiṣṇyaṁ navadhā vibhajya pūrvāṁstribhāgānekaikaṁ dvedhā vibhajet

अब होता के धिष्ण्य को नौ भागों में बाँटकर, अगले तीन भागों में से प्रत्येक को दो-दो भागों में बाँटना चाहिए।

श्लोक 7.12

अथेतरान्नवधा नवधा विभज्य मध्यमपूर्वौ द्वौ भागौ समस्येत्

athetarānnavadhā navadhā vibhajya madhyamapūrvau dvau bhāgau samasyet

अब दूसरे धिष्ण्यों को नौ-नौ भागों में बाँटकर, मध्य और अगले दो भागों को मिला देना चाहिए।

श्लोक 7.13

अथ मार्जालीयं त्रेधा विभज्य पूर्वापरौ भागौ पञ्चधा विभजेत्

atha mārjālīyaṁ tredhā vibhajya pūrvāparau bhāgau pañcadhā vibhajet

अब मार्जालीय को तीन भागों में बाँटकर, अगले और पिछले भागों को पाँच-पाँच भागों में बाँटना चाहिए।

श्लोक 7.14

उख्यभस्मना संसृज्येष्टकाः कारयेदिति

ukhyabhasmanā saṁsṛjyeṣṭakāḥ kārayediti

यह बताया गया है कि ईंटें उखा (अग्नि-पात्र) की राख मिलाकर बनानी चाहिए।

श्लोक 7.15

संवत्सरभृत एवैतदुपपद्यते न रात्रिभृतः

saṁvatsarabhṛta evaitadupapadyate na rātribhṛtaḥ

यह नियम केवल वर्षभर चलने वाले यज्ञ पर ही लागू होता है, रात्रि-भर चलने वाले पर नहीं।

श्लोक 7.16

एवमस्य मन्त्रवती चितिकॢप्तिः

evamasya mantravatī citikḷptiḥ

इस प्रकार इसकी मंत्र-सहित चिति-रचना होती है।

श्लोक 7.17

छन्दश्चितं त्रिषाहस्रस्य परस्ताच्चिन्वीत कामविवेकात् तस्य रूपंश्येनाकृतिर्भवतीति

chandaścitaṁ triṣāhasrasya parastāccinvīta kāmavivekāt tasya rūpaṁśyenākṛtirbhavatīti

तीन हज़ार (ईंटों के अग्नि) से आगे, इच्छानुसार विवेक से छन्दश्चित (छंद के अनुसार बना अग्नि) का चयन करना चाहिए। उसका रूप श्येन (बाज़) की आकृति का होता है, ऐसा कहा गया है।

अष्टमः खण्डः

श्लोक 8.1

अथ वै भवति श्येनचितं चिन्वीत सुवर्गकाम इति

atha vai bhavati śyenacitaṁ cinvīta suvargakāma iti

अब यह कहा गया है: 'स्वर्ग की कामना करने वाले को श्येनचित् (बाज़-आकार अग्नि) का चयन करना चाहिए।'

श्लोक 8.2

आकृतिद्वैविध्यम् । चतुराश्रात्मा श्येनाकृतिश्च

ākṛtidvaividhyam | caturāśrātmā śyenākṛtiśca

इसकी आकृति दो प्रकार की होती है: एक वर्गाकार शरीर वाली, और दूसरी वास्तविक बाज़ के आकार वाली।

श्लोक 8.3

विज्ञायते उभयं ब्राह्मणम्

vijñāyate ubhayaṁ brāhmaṇam

दोनों को ब्राह्मण (शास्त्रीय) प्रमाण से मान्यता प्राप्त माना जाता है।

श्लोक 8.4

पञ्च दक्षिणायां श्रोण्यामुपदधाति पञ्चोत्तरस्याम् । बस्तो वय इति दक्षिणेंऽस उपदधाति । वृष्णिर्वय इत्युत्तरे । व्याघ्रो वय इति दक्षिणे पक्ष उपदधाति । सिंहो वय इत्युत्तरे पुरुषो वय इति मध्य इति च

pañca dakṣiṇāyāṁ śroṇyāmupadadhāti pañcottarasyām | basto vaya iti dakṣiṇeṁ'sa upadadhāti | vṛṣṇirvaya ityuttare | vyāghro vaya iti dakṣiṇe pakṣa upadadhāti | siṁho vaya ityuttare puruṣo vaya iti madhya iti ca

दक्षिणी कमर-कोने पर पाँच ईंटें रखता है, उत्तरी पर पाँच। 'बकरा पक्षी है' — इस मंत्र से दक्षिणी कंधे पर रखता है। 'भेड़ पक्षी है' — उत्तरी पर। 'बाघ पक्षी है' — इस मंत्र से दक्षिणी पंख पर रखता है। 'सिंह पक्षी है' — उत्तरी पर; 'मनुष्य पक्षी है' — मध्य में।

श्लोक 8.5

अथापरं वयसां वा एष प्रतिमया चीयते यदग्निरिति । उत्पततां छाययेत्यर्थः

athāparaṁ vayasāṁ vā eṣa pratimayā cīyate yadagniriti | utpatatāṁ chāyayetyarthaḥ

अब यह भी कहा गया है: 'यह अग्नि पक्षियों की छवि के अनुरूप चीयमान होता है' — अर्थात् उड़ते हुए (पक्षियों) की परछाई के रूप में।

श्लोक 8.6

समचतुरश्राभिरग्निं चिनुते दैव्यस्य च मानुषस्य च व्यावृत्त्या इति मैत्रायणीयब्राह्मणं भवति

samacaturaśrābhiragniṁ cinute daivyasya ca mānuṣasya ca vyāvṛttyā iti maitrāyaṇīyabrāhmaṇaṁ bhavati

'दैवी और मानुषी (माप) के भेद के अनुसार वर्गाकार ईंटों से अग्नि का चयन करता है' — यह मैत्रायणीय ब्राह्मण का वचन है।

श्लोक 8.7

तस्येष्टकाः कारयेत् पुरुषस्य चतुर्थेन पञ्चमेन षष्ठेन दशमेनेति

tasyeṣṭakāḥ kārayet puruṣasya caturthena pañcamena ṣaṣṭhena daśameneti

उसकी ईंटें पुरुष के चौथे, पाँचवें, छठे या दसवें भाग के माप की बनानी चाहिए।

श्लोक 8.8

अथाग्निं विमिमीते

athāgniṁ vimimīte

अब अग्नि को नापा जाता है।

श्लोक 8.9

यावान्पुरुष ऊर्ध्वबाहुस्तावदन्तराले वेणोश्छिद्रे करोति । मध्ये तृतीयं । यदमुत्र स्पन्द्यया करोति तदिह वेणुना करोति

yāvānpuruṣa ūrdhvabāhustāvadantarāle veṇośchidre karoti | madhye tṛtīyaṁ | yadamutra spandyayā karoti tadiha veṇunā karoti

जितनी ऊँचाई भुजाएँ उठाए खड़े मनुष्य की हो, उतनी माप एक बाँस की नली में छेद करके अंकित करनी चाहिए। मध्य में तीसरा (चिह्न)। जो काम अन्यत्र रस्सी (स्पन्द्या) से किया जाता है, वही यहाँ बाँस से किया जाता है।

श्लोक 8.10

तस्यात्मा समचतुरश्रश्चत्वारः पुरुषाः । पक्षः समचतुरश्रः पुरुषः । स तु दक्षिणतोऽरत्निना द्राघीयान् । एतेनोत्तरः पक्षो व्याख्यातः । पुच्छः समचतुरश्रः पुरुषः । तमवस्तात्प्रादेशेन वर्धयेत् । एवं सारत्नि प्रादेशा सप्तविधः संप्रद्यतः

tasyātmā samacaturaśraścatvāraḥ puruṣāḥ | pakṣaḥ samacaturaśraḥ puruṣaḥ | sa tu dakṣiṇato'ratninā drāghīyān | etenottaraḥ pakṣo vyākhyātaḥ | pucchaḥ samacaturaśraḥ puruṣaḥ | tamavastātprādeśena vardhayet | evaṁ sāratni prādeśā saptavidhaḥ saṁpradyataḥ

उसका शरीर (आत्मा) चार पुरुष का वर्ग होता है। पंख एक पुरुष का वर्ग होता है, परंतु दक्षिण की ओर वह एक अरत्नि अधिक लंबा होता है। इसी से उत्तरी पंख भी समझाया गया है। पूँछ एक पुरुष का वर्ग होती है; उसे नीचे की ओर एक प्रादेश बढ़ा देना चाहिए। इस प्रकार अरत्नि और प्रादेश सहित, सात-भाग वाला (अग्नि) बनता है।

श्लोक 8.11

उपधाने पक्षाग्रादुत्तरतः पुरुषतृतीयवेलायां चतस्रः पञ्चम्यस्तासामभितो द्वे द्वे पादेष्टके ततोऽष्टौ चतुर्थ्यः । पक्षशेषं षड्भागीयाभिः प्रच्छादयेत् । एतेनोत्तरः पक्षो व्याख्यातः

upadhāne pakṣāgrāduttarataḥ puruṣatṛtīyavelāyāṁ catasraḥ pañcamyastāsāmabhito dve dve pādeṣṭake tato'ṣṭau caturthyaḥ | pakṣaśeṣaṁ ṣaḍbhāgīyābhiḥ pracchādayet | etenottaraḥ pakṣo vyākhyātaḥ

बिछाने में: पंख के अग्रभाग से उत्तर की ओर, पुरुष के तिहाई भाग जितनी दूरी पर, पाँचवें-भाग की चार ईंटें रखें; उनके दोनों ओर दो-दो चौथाई-ईंटें; फिर चौथे-भाग की आठ ईंटें। शेष पंख को छठे-भाग की ईंटों से ढक देना चाहिए। इसी से उत्तरी पंख भी समझाया गया है।

श्लोक 8.12

पूर्वापरयोः पुच्छपार्श्वयोश्चतुर्भागीया उपदध्यात् । दक्षिणोत्तरयोः पादेष्टकाः । शेषमग्निं पञ्चमभागीयाभिः प्रच्छादयेत्

pūrvāparayoḥ pucchapārśvayoścaturbhāgīyā upadadhyāt | dakṣiṇottarayoḥ pādeṣṭakāḥ | śeṣamagniṁ pañcamabhāgīyābhiḥ pracchādayet

पूँछ के अगले और पिछले किनारों पर चौथे-भाग की ईंटें रखनी चाहिए। दक्षिण और उत्तर में चौथाई-ईंटें। शेष अग्नि को पाँचवें-भाग की ईंटों से ढक देना चाहिए।

श्लोक 8.13

एष द्विशतः प्रस्तारः

eṣa dviśataḥ prastāraḥ

यह दो-सौ (ईंटों की) परत है।

श्लोक 8.14

अपरस्मिन्प्रस्तारे पक्षाग्रादुत्तरतोऽर्धव्यायामवेलायां तिस्रस्तिस्रः षष्ठ्यो द्वे द्वे द्विपदे इति विपर्यासमुपदध्यात् । तथोत्तरे

aparasminprastāre pakṣāgrāduttarato'rdhavyāyāmavelāyāṁ tisrastisraḥ ṣaṣṭhyo dve dve dvipade iti viparyāsamupadadhyāt | tathottare

दूसरी परत में, पंख के अग्रभाग से उत्तर की ओर, आधे व्यायाम जितनी दूरी पर, तीन-तीन छठे-भाग की ईंटें और दो-दो द्विपद ईंटें उलटे क्रम में रखनी चाहिए। उत्तर में भी वैसे ही।

श्लोक 8.15

दक्षिणस्यां श्रोण्यां नव षष्ठ्यश्चतुरश्रकृताः । तथोत्तरस्याम्

dakṣiṇasyāṁ śroṇyāṁ nava ṣaṣṭhyaścaturaśrakṛtāḥ | tathottarasyām

दक्षिणी कमर-कोने पर नौ छठे-भाग की ईंटें, वर्गाकार बनाकर। उत्तरी में भी वैसे ही।

श्लोक 8.16

नव नव षष्ठ्यो द्वे द्वे दिपदे इति दक्षिणादंसादुत्तरादंसाद्विपर्यासमुपदध्यात्

nava nava ṣaṣṭhyo dve dve dipade iti dakṣiṇādaṁsāduttarādaṁsādviparyāsamupadadhyāt

नौ-नौ छठे-भाग की ईंटें और दो-दो द्विपद ईंटें — दक्षिणी कंधे से और उत्तरी कंधे से, उलटे क्रम में रखनी चाहिए।

श्लोक 8.17

शेषमग्निं पञ्चमभागीयाभिः प्रच्छादयेत्

śeṣamagniṁ pañcamabhāgīyābhiḥ pracchādayet

शेष अग्नि को पाँचवें-भाग की ईंटों से ढक देना चाहिए।

श्लोक 8.18

एष द्विशतः प्रस्तारो व्यत्यासं चिनुयाद्यावतः प्रस्तारांश्चिकीर्षेत्

eṣa dviśataḥ prastāro vyatyāsaṁ cinuyādyāvataḥ prastārāṁścikīrṣet

यह दो-सौ (ईंटों की) परत है। जितनी परतें बनानी हों, उतनी बार इसी उलट-क्रम से चयन करना चाहिए।

नवमः खण्डः

श्लोक 9.1

अथापरः

athāparaḥ

अब एक और विधि।

श्लोक 9.2

पुरुषस्य पञ्चम्यः । ता एवैकतोऽध्यर्धाः । तासामर्ध्याः पाद्याश्च

puruṣasya pañcamyaḥ | tā evaikato'dhyardhāḥ | tāsāmardhyāḥ pādyāśca

ईंटें पुरुष के पाँचवें भाग की होती हैं। इन्हीं को एक ओर से डेढ़-गुना बनाकर अध्यर्ध ईंटें बनाई जाती हैं। इनकी आधी और चौथाई ईंटें भी होती हैं।

श्लोक 9.3

उपधाने । पूर्वापरयोः पक्षपार्श्वयोरर्धेष्टका उदीचीरुपदध्यात् । तथोत्तरे

upadhāne | pūrvāparayoḥ pakṣapārśvayorardheṣṭakā udīcīrupadadhyāt | tathottare

बिछाने में: पंख के अगले और पिछले किनारों पर आधी ईंटें उत्तराभिमुख रखनी चाहिए। उत्तरी पंख में भी वैसे ही।

श्लोक 9.4

दक्षिणोत्तरयोः पुच्छपार्श्वयोश्चतस्रश्चतस्रोऽध्यर्धा उदीचीः । पुच्छस्यावस्ताच्चतस्रोऽर्धेष्टका उदीचीः । तासामभितो द्वे पादेष्टके । जघनेन पुच्छाप्ययोरेकैकामर्धेष्टकां प्राचीम्

dakṣiṇottarayoḥ pucchapārśvayoścatasraścatasro'dhyardhā udīcīḥ | pucchasyāvastāccatasro'rdheṣṭakā udīcīḥ | tāsāmabhito dve pādeṣṭake | jaghanena pucchāpyayorekaikāmardheṣṭakāṁ prācīm

पूँछ के दक्षिणी और उत्तरी किनारों पर चार-चार डेढ़-ईंटें उत्तराभिमुख। पूँछ के नीचे चार आधी ईंटें उत्तराभिमुख; उनके दोनों ओर दो चौथाई-ईंटें। पीछे, पूँछ के जोड़ पर, एक-एक आधी ईंट पूर्वाभिमुख।

श्लोक 9.5

शेषमग्निं पञ्चमभागीयाभिः प्रच्छादयेत्

śeṣamagniṁ pañcamabhāgīyābhiḥ pracchādayet

शेष अग्नि को पाँचवें-भाग की ईंटों से ढक देना चाहिए।

श्लोक 9.6

एष द्विशतः प्रस्तारः

eṣa dviśataḥ prastāraḥ

यह दो-सौ (ईंटों की) परत है।

श्लोक 9.7

अपरस्मिन् प्रस्तार आत्मस्रक्तिषु चतस्रः पादेष्टका उपदध्यात् । तासामभितो द्वे द्वे अर्धेष्टके । पूर्वस्मिन्ननिके पञ्च

aparasmin prastāra ātmasraktiṣu catasraḥ pādeṣṭakā upadadhyāt | tāsāmabhito dve dve ardheṣṭake | pūrvasminnanike pañca

दूसरी परत में, शरीर के कोनों पर चार चौथाई-ईंटें रखनी चाहिए। उनके दोनों ओर दो-दो आधी ईंटें। अगले मुख पर पाँच (ईंटें)।

श्लोक 9.8

पक्षाग्रयोस्तिस्रस्तिस्रोऽध्यर्धा उदीचीः । तासामन्तरलेष्वेकैकामर्धेष्टकां प्राचीम्

pakṣāgrayostisrastisro'dhyardhā udīcīḥ | tāsāmantaraleṣvekaikāmardheṣṭakāṁ prācīm

पंखों के अग्रभागों पर तीन-तीन डेढ़-ईंटें उत्तराभिमुख। उनके बीच के अंतरालों में एक-एक आधी ईंट पूर्वाभिमुख।

श्लोक 9.9

शेषमग्निं पञ्चमभागीयाभिः प्रच्छादयेत्

śeṣamagniṁ pañcamabhāgīyābhiḥ pracchādayet

शेष अग्नि को पाँचवें-भाग की ईंटों से ढक देना चाहिए।

श्लोक 9.10

एष द्विशतः प्रस्तारो व्यत्यासं चिनुयाद्यावतः प्रस्तारांश्चिकीर्षेत्

eṣa dviśataḥ prastāro vyatyāsaṁ cinuyādyāvataḥ prastārāṁścikīrṣet

यह दो-सौ (ईंटों की) परत है। जितनी परतें बनानी हों, उतनी बार इसी उलट-क्रम से चयन करना चाहिए।

दशमः खण्डः

श्लोक 10.1

अथ वक्रपक्षो व्यस्तपुच्छः

atha vakrapakṣo vyastapucchaḥ

अब वह (आकृति) जिसके पंख मुड़े हुए और पूँछ विस्थापित हो।

श्लोक 10.2

तस्येष्टकाः कारयेत्पुरुषस्य चतुर्थ्यः । तासामर्ध्याः पाद्याश्च । नित्यमक्ष्ण्यापच्छेदनमनादेशे

tasyeṣṭakāḥ kārayetpuruṣasya caturthyaḥ | tāsāmardhyāḥ pādyāśca | nityamakṣṇyāpacchedanamanādeśe

इसकी ईंटें पुरुष के चौथे भाग की बनानी चाहिए। इनकी आधी और चौथाई ईंटें भी होती हैं। जहाँ कोई विशेष नियम न हो, वहाँ सदैव विकर्णतः ही काटना चाहिए।

श्लोक 10.3

पादेष्टकाश्चतुर्भिः परिगृह्णीयादर्धपदेन पदेनाध्यर्धपदेन पदसविशेषेणेति । ते द्वे यथा दीर्घसंश्लिष्टे स्यातां तथार्धेष्टकां कारयेत्

pādeṣṭakāścaturbhiḥ parigṛhṇīyādardhapadena padenādhyardhapadena padasaviśeṣeṇeti | te dve yathā dīrghasaṁśliṣṭe syātāṁ tathārdheṣṭakāṁ kārayet

चौथाई-ईंट को चार माप से समझना चाहिए: आधा पद, एक पद, डेढ़ पद, और एक पद से कुछ अधिक। उन दोनों को इस प्रकार जोड़ना चाहिए कि वे लंबाई में मिल जाएँ; इस प्रकार आधी ईंट बनानी चाहिए।

श्लोक 10.4

अथाग्निं विमिमीत । आत्मा द्विपुरुषायामो दशपदव्यासः । तस्य दक्षिणादंसादुत्तरतोऽध्यर्धप्रक्रमे लक्षणं करोति । एवमपरतः । तयोरुपरिष्टात्स्पन्द्यां नियम्यांसमपच्छिन्द्यात् । एतेनेतरासां स्रक्तीनामपच्छेदा व्याख्याताः । स आत्मा

athāgniṁ vimimīta | ātmā dvipuruṣāyāmo daśapadavyāsaḥ | tasya dakṣiṇādaṁsāduttarato'dhyardhaprakrame lakṣaṇaṁ karoti | evamaparataḥ | tayorupariṣṭātspandyāṁ niyamyāṁsamapacchindyāt | etenetarāsāṁ sraktīnāmapacchedā vyākhyātāḥ | sa ātmā

अब अग्नि को नापा जाता है। शरीर (आत्मा) दो पुरुष लंबा, दस पद चौड़ा होता है। उसके दक्षिणी कंधे से उत्तर की ओर डेढ़ प्रक्रम पर चिह्न बनाना चाहिए। इसी प्रकार दूसरी ओर भी। उन दोनों के ऊपर रस्सी (स्पन्द्या) बाँधकर कंधे को काट देना चाहिए। इसी से अन्य कोनों का कटान भी समझाया गया है। यह शरीर हुआ।

श्लोक 10.5

शिरोऽर्धषष्ठपदायाममर्धपुरुषव्यासं । तस्यांसौ प्रक्रमेण प्रक्रमेणापच्छिन्द्यात्

śiro'rdhaṣaṣṭhapadāyāmamardhapuruṣavyāsaṁ | tasyāṁsau prakrameṇa prakrameṇāpacchindyāt

सिर साढ़े पाँच पद लंबा, आधे पुरुष जितना चौड़ा होता है। उसके कंधों को एक-एक प्रक्रम से काट देना चाहिए।

श्लोक 10.6

पुच्छस्य षट्पदा प्राची द्विपुरुषोदीची । तस्य पूर्वे स्रक्ति त्रिभिस्त्रिभिः प्रक्रमैरपच्छिन्द्यात्

pucchasya ṣaṭpadā prācī dvipuruṣodīcī | tasya pūrve srakti tribhistribhiḥ prakramairapacchindyāt

पूँछ की पूर्वी माप छह पद, उत्तरी माप दो पुरुष होती है। उसके अगले दोनों कोनों को तीन-तीन प्रक्रम से काट देना चाहिए।

श्लोक 10.7

पक्षो द्वादशपदायामो दशपदव्यासः । तस्य मध्यात्प्राञ्चि षट्पदानि प्रक्रम्य शङ्कुं निहन्यात् । श्रोण्योरेकैकम् । अथैनं स्पन्द्यया परिचिनुयात् । अन्तस्पन्द्यमपच्छिद्य तत्पुरस्तात् प्राञ्चं दध्यात् । स निर्णामः । एतेनोत्तरस्य पक्षस्य निर्णामो व्याख्यातः

pakṣo dvādaśapadāyāmo daśapadavyāsaḥ | tasya madhyātprāñci ṣaṭpadāni prakramya śaṅkuṁ nihanyāt | śroṇyorekaikam | athainaṁ spandyayā paricinuyāt | antaspandyamapacchidya tatpurastāt prāñcaṁ dadhyāt | sa nirṇāmaḥ | etenottarasya pakṣasya nirṇāmo vyākhyātaḥ

पंख बारह पद लंबा, दस पद चौड़ा होता है। उसके मध्य से आगे की ओर छह पद चलकर खूँटी गाड़नी चाहिए; कमर-कोनों में भी एक-एक। फिर इसे रस्सी से घेरकर खींचना चाहिए। भीतरी रस्सी-भाग को काटकर उसे आगे, पूर्व दिशा में, आगे कर देना चाहिए। यह निर्णाम (बाहर की ओर मोड़) है। इसी से उत्तरी पंख का निर्णाम भी समझाया गया है।

श्लोक 10.8

पक्षाग्रयोः प्रक्रमप्रमाणानि पञ्च पञ्च चतुरश्राण्यनूचीनानि कृत्वा सर्वाण्यवाञ्चमक्ष्णयापच्छिन्द्यादर्धान्युद्धरेत्

pakṣāgrayoḥ prakramapramāṇāni pañca pañca caturaśrāṇyanūcīnāni kṛtvā sarvāṇyavāñcamakṣṇayāpacchindyādardhānyuddharet

पंखों के अग्रभागों पर, एक-एक प्रक्रम की पाँच-पाँच वर्गाकार आकृतियाँ लंबाई में बनाकर, सबको नीचे की ओर विकर्णतः काट देना चाहिए और आधे भाग निकाल लेने चाहिए।

श्लोक 10.9

एवं सारत्निप्रादेशः सप्तविधः संपद्यतः

evaṁ sāratniprādeśaḥ saptavidhaḥ saṁpadyataḥ

इस प्रकार अरत्नि और प्रादेश सहित, सात-भाग वाला (अग्नि) बनता है।

श्लोक 10.10

उपधाने शिरसोऽप्यये चतुर्थीमुपदध्यात् । हंसमुखी पुरस्तात् । पादेष्टके अभितः । तयोरवस्तादभितस्तिस्रस्तिस्रश्चतुरश्रपाद्याः । शेषे पादेष्टकाः

upadhāne śiraso'pyaye caturthīmupadadhyāt | haṁsamukhī purastāt | pādeṣṭake abhitaḥ | tayoravastādabhitastisrastisraścaturaśrapādyāḥ | śeṣe pādeṣṭakāḥ

बिछाने में: सिर के जोड़ पर चौथाई-ईंट रखनी चाहिए। हंसमुखी (हंस-मुख आकार की ईंट) आगे की ओर। उसके दोनों ओर चौथाई-ईंटें। उनके नीचे दोनों ओर तीन-तीन वर्गाकार चौथाई-ईंटें। शेष में चौथाई-ईंटें।

श्लोक 10.11

अपि वा शिरसोऽग्रे हंसमुखीमुपदध्यात्तस्य अवस्ताच्चतुर्थीमुपदध्यात्पादेष्टके अभितः । तयोरवस्तादभितस्तिस्रस्तिस्रश्चतुरश्रपाद्याः । शेषे पादेष्टकाः

api vā śiraso'gre haṁsamukhīmupadadhyāttasya avastāccaturthīmupadadhyātpādeṣṭake abhitaḥ | tayoravastādabhitastisrastisraścaturaśrapādyāḥ | śeṣe pādeṣṭakāḥ

अथवा सिर के अग्रभाग में हंसमुखी रखनी चाहिए; उसके नीचे चौथाई-ईंट, और उसके दोनों ओर चौथाई-ईंटें। उनके नीचे दोनों ओर तीन-तीन वर्गाकार चौथाई-ईंटें। शेष में चौथाई-ईंटें।

श्लोक 10.12

शिरसोऽवस्तात्पञ्चपादेष्टका व्यतिषक्ता उपदध्यात् । तथा पुच्छस्य पुरस्तात् यद्यदपच्छिन्नं तस्मिन्नर्धेष्टकाः पादेष्टकाश्चोपदध्यात्

śiraso'vastātpañcapādeṣṭakā vyatiṣaktā upadadhyāt | tathā pucchasya purastāt yadyadapacchinnaṁ tasminnardheṣṭakāḥ pādeṣṭakāścopadadhyāt

सिर के नीचे पाँच चौथाई-ईंटें आपस में गुँथी हुई रखनी चाहिए। इसी प्रकार पूँछ के आगे, जहाँ-जहाँ कोई भाग कटा हो, वहाँ आधी और चौथाई ईंटें रखनी चाहिए।

श्लोक 10.13

शेषमग्निं चतुर्भागीयाभिः प्रच्छादयेत् । पाद्याभिः सार्ध्याभिः संख्यां पूरयेत्

śeṣamagniṁ caturbhāgīyābhiḥ pracchādayet | pādyābhiḥ sārdhyābhiḥ saṁkhyāṁ pūrayet

शेष अग्नि को चौथाई-भाग की ईंटों से ढक देना चाहिए। चौथाई और आधी ईंटों से गिनती पूरी करनी चाहिए।

श्लोक 10.14

एष द्विशतः प्रस्तारः

eṣa dviśataḥ prastāraḥ

यह दो-सौ (ईंटों की) परत है।

श्लोक 10.15

अपरस्मिन्प्रस्तारे हंसमुखीश्चतस्रश्चतसृभिः पादेष्टकाभिः संयोजयेद्यथा दीर्घचतुरश्रं संपद्यते । तत्तिर्यक् स्वयमातृण्णावकाश उपदध्यात्

aparasminprastāre haṁsamukhīścatasraścatasṛbhiḥ pādeṣṭakābhiḥ saṁyojayedyathā dīrghacaturaśraṁ saṁpadyate | tattiryak svayamātṛṇṇāvakāśa upadadhyāt

दूसरी परत में, चार हंसमुखी ईंटों को चार-चार चौथाई-ईंटों से इस प्रकार जोड़ना चाहिए कि एक आयत बन जाए। उसे आड़ा करके, स्वतः विभाजित ईंटों के लिए बने रिक्त स्थान में रखना चाहिए।

श्लोक 10.16

हंसमुख्यौ प्रतीच्यौ पुच्छाप्ययेऽर्धपदेनात्मनि विशये । तयोरवस्तादभितस्तिस्रः पादेष्टकाः प्राङ्मुखीरुपदध्यात्

haṁsamukhyau pratīcyau pucchāpyaye'rdhapadenātmani viśaye | tayoravastādabhitastisraḥ pādeṣṭakāḥ prāṅmukhīrupadadhyāt

दो हंसमुखी ईंटें पश्चिमाभिमुख, पूँछ के जोड़ पर, शरीर की सीमा-रेखा में आधे पद भीतर। उनके नीचे दोनों ओर तीन-तीन चौथाई-ईंटें पूर्वाभिमुख रखनी चाहिए।

श्लोक 10.17

पुच्छस्यावस्तात्पञ्चदश पादेष्टका व्यतिषक्ता उपदध्यात्

pucchasyāvastātpañcadaśa pādeṣṭakā vyatiṣaktā upadadhyāt

पूँछ के नीचे पंद्रह चौथाई-ईंटें आपस में गुँथी हुई रखनी चाहिए।

श्लोक 10.18

पादेष्टके अर्धेष्टकेति पक्षपत्राणां प्राचीर्व्यत्यासं चिनुयात्

pādeṣṭake ardheṣṭaketi pakṣapatrāṇāṁ prācīrvyatyāsaṁ cinuyāt

'चौथाई-ईंट, आधी-ईंट' — इस क्रम में पंख के पंखों (पत्तों) का पूर्वाभिमुख उलट-क्रम बनाना चाहिए।

श्लोक 10.19

विशये यदपच्छिन्नं तस्मिन्नर्धेष्टकाः पादेष्टकाश्चोपदध्यात्

viśaye yadapacchinnaṁ tasminnardheṣṭakāḥ pādeṣṭakāścopadadhyāt

सीमा-रेखा पर जहाँ-जहाँ कोई भाग कटा हो, वहाँ आधी और चौथाई ईंटें रखनी चाहिए।

श्लोक 10.20

शेषमग्निं चतुर्भागीयाभिः प्रच्छादयेत् । पाद्याभिः सार्ध्याभिः संख्यां पूरयेत्

śeṣamagniṁ caturbhāgīyābhiḥ pracchādayet | pādyābhiḥ sārdhyābhiḥ saṁkhyāṁ pūrayet

शेष अग्नि को चौथाई-भाग की ईंटों से ढक देना चाहिए। चौथाई और आधी ईंटों से गिनती पूरी करनी चाहिए।

एकादशः खण्डः

श्लोक 11.1

अथापरः

athāparaḥ

अब एक और विधि।

श्लोक 11.2

पुरुषस्य पञ्चमीभिः शतमशीतिः सप्तार्धं च सारत्निप्रादेशः सप्तविधः संपद्यते

puruṣasya pañcamībhiḥ śatamaśītiḥ saptārdhaṁ ca sāratniprādeśaḥ saptavidhaḥ saṁpadyate

पुरुष के पाँचवें-भाग की ईंटों से, एक सौ अस्सी और साढ़े सात — इस प्रकार अरत्नि और प्रादेश सहित सात-भाग वाला (अग्नि) बनता है।

टिप्पणी: Gives the total brick count (187½) for this variant built from fifth-measure bricks.

श्लोक 11.3

तासां पञ्चाशद्द्वे चात्मन्यर्धचतुर्थ्यः शिरसि । पञ्चदश पुच्छे । अष्टपञ्चाशत्सार्ध्या दक्षिणे पक्ष उपदध्यात् । तथोत्तरे

tāsāṁ pañcāśaddve cātmanyardhacaturthyaḥ śirasi | pañcadaśa pucche | aṣṭapañcāśatsārdhyā dakṣiṇe pakṣa upadadhyāt | tathottare

इनमें से बावन शरीर में; साढ़े तीन-गुनी ईंटें सिर में; पंद्रह पूँछ में। अट्ठावन, आधी ईंटों सहित, दक्षिणी पंख में रखनी चाहिए। उत्तरी में भी वैसे ही।

श्लोक 11.4

अर्धव्यायामेन स्रक्तीनामपच्छेदः । संनतं पुच्छं । पक्षयोस्त्रिभिस्त्रिभिररत्निभिरपनामः । अध्यर्ध्याभिः षट् षट् पत्राणि कुर्यात् । आकृतिः शिरसो नित्या

ardhavyāyāmena sraktīnāmapacchedaḥ | saṁnataṁ pucchaṁ | pakṣayostribhistribhiraratnibhirapanāmaḥ | adhyardhyābhiḥ ṣaṭ ṣaṭ patrāṇi kuryāt | ākṛtiḥ śiraso nityā

कोनों का कटान आधे व्यायाम से होता है। पूँछ नीचे की ओर झुकी होती है। दोनों पंखों का विस्थापन तीन-तीन अरत्नि से होता है। डेढ़-ईंटों से छह-छह पंख (पत्तियाँ) बनानी चाहिए। सिर की आकृति सदा स्थिर रहती है।

श्लोक 11.5

अथेष्टकानां विकाराः

atheṣṭakānāṁ vikārāḥ

अब ईंटों के प्रकार (बताए जाते हैं)।

श्लोक 11.6

पुरुषस्य पञ्चम्यस्ता एवैकतोऽध्यर्धाः । ता एवैकतः सपादाः । पञ्चमभागीयायाः पाद्याः सार्ध्याः । तथाध्यर्धायाः । तयोश्चाष्टमभागौ तथा श्लेषयेद्यथा तिस्रः स्रक्तयो भवन्ति । पञ्चमभागीयायाश्चाष्टम्यः । तानि दश

puruṣasya pañcamyastā evaikato'dhyardhāḥ | tā evaikataḥ sapādāḥ | pañcamabhāgīyāyāḥ pādyāḥ sārdhyāḥ | tathādhyardhāyāḥ | tayoścāṣṭamabhāgau tathā śleṣayedyathā tisraḥ sraktayo bhavanti | pañcamabhāgīyāyāścāṣṭamyaḥ | tāni daśa

पुरुष के पाँचवें भाग की ईंटें; इन्हीं को एक ओर से डेढ़-गुना बनाकर; इन्हीं को एक ओर से सवागुना बनाकर। पाँचवें-भाग की ईंट की चौथाई और आधी ईंटें होती हैं; वैसे ही डेढ़-भाग की भी। इन दोनों के आठवें भागों को इस प्रकार जोड़ना चाहिए कि तीन कोने बन जाएँ। पाँचवें-भाग की ईंट की आठवीं ईंटें भी होती हैं। ये सब मिलाकर दस प्रकार हैं।

श्लोक 11.7

आत्मनि पञ्चमभागीयाः सार्ध्या उपदध्यात् । तथा पुच्छे

ātmani pañcamabhāgīyāḥ sārdhyā upadadhyāt | tathā pucche

शरीर में पाँचवें-भाग की ईंटें आधी ईंटों सहित रखनी चाहिए। पूँछ में भी वैसे ही।

श्लोक 11.8

पक्षयोश्चाध्यर्धाः सार्ध्याः

pakṣayoścādhyardhāḥ sārdhyāḥ

और दोनों पंखों में डेढ़-भाग की ईंटें आधी ईंटों सहित रखनी चाहिए।

श्लोक 11.9

शिरसि याः संभवन्ति

śirasi yāḥ saṁbhavanti

सिर में जो भी उपयुक्त हों, वे रखनी चाहिए।

श्लोक 11.10

अपरस्मिन्प्रस्तारे पूर्वयोः पक्षाप्यययोरेकैकामुभयीमुपदध्यात् । एकैकामपरयोः । द्वे द्वे शिरसः पार्श्वयोः

aparasminprastāre pūrvayoḥ pakṣāpyayayorekaikāmubhayīmupadadhyāt | ekaikāmaparayoḥ | dve dve śirasaḥ pārśvayoḥ

दूसरी परत में, अगले दोनों पंख-जोड़ों पर एक-एक दुहरी ईंट रखनी चाहिए; अन्य जोड़ों पर भी एक-एक। सिर के दोनों ओर दो-दो।

श्लोक 11.11

पुच्छस्यावस्तादध्यर्धाः प्राचीर्यथावकाशम् । पार्श्वयोः पाद्याः साष्टमभागाः

pucchasyāvastādadhyardhāḥ prācīryathāvakāśam | pārśvayoḥ pādyāḥ sāṣṭamabhāgāḥ

पूँछ के नीचे, जितनी जगह मिले, डेढ़-भाग की ईंटें पूर्वाभिमुख रखनी चाहिए। दोनों ओर आठवें-भाग सहित चौथाई ईंटें।

श्लोक 11.12

पक्षयोश्चाध्यर्धाः सावयवाः

pakṣayoścādhyardhāḥ sāvayavāḥ

और दोनों पंखों में डेढ़-भाग की ईंटें, उनके उप-भागों सहित।

श्लोक 11.13

शेषं यथायोगं यथासंख्यं यथाधर्मं चोपदध्यात्

śeṣaṁ yathāyogaṁ yathāsaṁkhyaṁ yathādharmaṁ copadadhyāt

शेष भाग को यथायोग्य, यथासंख्य और यथाविधि रखना चाहिए।

द्वादशः खण्डः

श्लोक 12.1

कङ्कचित एतेनात्मा पुच्छं च व्याख्यातम्

kaṅkacita etenātmā pucchaṁ ca vyākhyātam

कंकचित् (बगुला-आकार अग्नि) के लिए, इसी विधि से शरीर और पूँछ भी समझ ली जाती है।

श्लोक 12.2

शिरसि पञ्चोपदध्यात् । तस्याकृतिर्व्याख्यात

śirasi pañcopadadhyāt | tasyākṛtirvyākhyāta

सिर में पाँच (ईंटें) रखनी चाहिए। उसकी आकृति पहले समझाई जा चुकी है।

श्लोक 12.3

सप्तपञ्चाशद्दक्षिणे पक्ष उपदध्यात् । तथोत्तरे

saptapañcāśaddakṣiṇe pakṣa upadadhyāt | tathottare

सत्तावन ईंटें दक्षिणी पंख में रखनी चाहिए। उत्तरी में भी वैसे ही।

श्लोक 12.4

व्यायामेन सप्रादेशेन पक्षयोरपनामः । पञ्चमभागीयार्ध्याभिः षट् षट् पत्राणि कुर्यात् । अध्यर्धावशिष्यते

vyāyāmena saprādeśena pakṣayorapanāmaḥ | pañcamabhāgīyārdhyābhiḥ ṣaṭ ṣaṭ patrāṇi kuryāt | adhyardhāvaśiṣyate

दोनों पंखों का विस्थापन एक व्यायाम और एक प्रादेश से होता है। पाँचवें-भाग की आधी ईंटों से छह-छह पंख (पत्तियाँ) बनानी चाहिए। एक डेढ़-ईंट शेष रह जाती है।

श्लोक 12.5

तया पुच्छस्यावस्तात् पादावरत्निमात्रावरत्न्यन्तरालौ प्रादेशव्यासौ भवतः । तयोरवस्तादभितो द्वौद्वावष्टमभागौ प्राग्भेदावुपदध्यात्

tayā pucchasyāvastāt pādāvaratnimātrāvaratnyantarālau prādeśavyāsau bhavataḥ | tayoravastādabhito dvaudvāvaṣṭamabhāgau prāgbhedāvupadadhyāt

उस शेष ईंट से, पूँछ के नीचे, दो अरत्नि-माप के पैर बनते हैं, जिनके बीच एक अरत्नि का अंतराल होता है और जो एक प्रादेश चौड़े होते हैं। उनके नीचे दोनों ओर दो-दो आठवें-भाग की ईंटें, पूर्व की ओर विभाजित करके, रखनी चाहिए।

श्लोक 12.6

एवं सारत्निप्रादेशः सप्तविधः संपद्यते

evaṁ sāratniprādeśaḥ saptavidhaḥ saṁpadyate

इस प्रकार अरत्नि और प्रादेश सहित, सात-भाग वाला (अग्नि) बनता है।

श्लोक 12.7

अथेष्टकानां विकाराः । पञ्चमभागीयाः सावयवाः । पादेष्टकां चतुर्भिः परिगृह्णीयादर्धप्रादेशेनाध्यर्धप्रादेशेन प्रादेशेन प्रादेशसविशेषेनेति । अध्यर्धेष्टकां चतुर्भिः परिगृह्णीयादर्धव्यायामेन द्वाभ्यामरत्निभ्यामरत्निसविशेषेनेति । ताः षट्

atheṣṭakānāṁ vikārāḥ | pañcamabhāgīyāḥ sāvayavāḥ | pādeṣṭakāṁ caturbhiḥ parigṛhṇīyādardhaprādeśenādhyardhaprādeśena prādeśena prādeśasaviśeṣeneti | adhyardheṣṭakāṁ caturbhiḥ parigṛhṇīyādardhavyāyāmena dvābhyāmaratnibhyāmaratnisaviśeṣeneti | tāḥ ṣaṭ

अब ईंटों के प्रकार: पाँचवें-भाग की ईंटें, अपने उप-भागों सहित। चौथाई-ईंट को चार माप से समझना चाहिए: आधा प्रादेश, डेढ़ प्रादेश, एक प्रादेश, और एक प्रादेश से कुछ अधिक। डेढ़-भाग की ईंट को चार माप से समझना चाहिए: आधा व्यायाम, दो अरत्नि, और एक अरत्नि से कुछ अधिक। ये छह प्रकार हैं।

श्लोक 12.8

तासां चतुरश्रपाद्याः साष्टमभागाः पादयोरुपधाय शेषं यथायोगं यथासंख्यं यथाधर्मं चोपदध्यात्

tāsāṁ caturaśrapādyāḥ sāṣṭamabhāgāḥ pādayorupadhāya śeṣaṁ yathāyogaṁ yathāsaṁkhyaṁ yathādharmaṁ copadadhyāt

उन दोनों 'पैरों' पर वर्गाकार चौथाई-ईंटें उनके आठवें भागों सहित रखकर, शेष भाग को यथायोग्य, यथासंख्य और यथाविधि रखना चाहिए।

त्रयोदशः खण्डः

श्लोक 13.1

अलजचित एतेनात्मा शिरः पुच्छं च व्याख्यातं पादावपोद्धृत्य

alajacita etenātmā śiraḥ pucchaṁ ca vyākhyātaṁ pādāvapoddhṛtya

अलजचित् (अलज-पक्षी आकार अग्नि) के लिए, इसी विधि से शरीर, सिर और पूँछ समझाए गए हैं, केवल पैरों (कोनों) को हटाकर।

श्लोक 13.2

त्रिषष्टिर्दक्षिणे पक्ष उपदध्यात् । तथोत्तरे

triṣaṣṭirdakṣiṇe pakṣa upadadhyāt | tathottare

त्रेसठ ईंटें दक्षिणी पंख में रखनी चाहिए। उत्तरी में भी वैसे ही।

श्लोक 13.3

पुरुषेण पक्षयोरपनामः

puruṣeṇa pakṣayorapanāmaḥ

दोनों पंखों का विस्थापन एक पुरुष से होता है।

श्लोक 13.4

अपरस्मादपनामात्प्राञ्चमरत्निं मित्वा तस्मिन्स्पन्द्यां नियम्यापरं पक्षपत्रापच्छेदमन्वायच्छेत्

aparasmādapanāmātprāñcamaratniṁ mitvā tasminspandyāṁ niyamyāparaṁ pakṣapatrāpacchedamanvāyacchet

दूसरे विस्थापन-बिंदु से आगे की ओर एक अरत्नि नापकर, वहाँ रस्सी बाँधकर, पंख की पंखुड़ी के अगले कटान का अनुसरण करना चाहिए।

श्लोक 13.5

एवं पञ्च पञ्चम्यः सार्ध्या उद्धृता भवन्ति

evaṁ pañca pañcamyaḥ sārdhyā uddhṛtā bhavanti

इस प्रकार पाँच पाँचवें-भाग की ईंटें, आधी ईंटों सहित, प्राप्त होती हैं।

श्लोक 13.6

पादेष्टकामपनाम उपध्याय तासां चतुरश्र पाद्याः साष्टमभागा अपोद्धृत्य शेषं यथायोगं यथासंख्यं यथाधर्मं चोपदध्यात्

pādeṣṭakāmapanāma upadhyāya tāsāṁ caturaśra pādyāḥ sāṣṭamabhāgā apoddhṛtya śeṣaṁ yathāyogaṁ yathāsaṁkhyaṁ yathādharmaṁ copadadhyāt

विस्थापन-बिंदु पर चौथाई-ईंट रखकर, उनमें से वर्गाकार चौथाई ईंटों को उनके आठवें भागों सहित निकालकर, शेष भाग को यथायोग्य, यथासंख्य और यथाविधि रखना चाहिए।

चतुर्दशः खण्डः

श्लोक 14.1

प्रौगचितं चिन्वीतेति

praugacitaṁ cinvīteti

'प्रौगचित् (नौका-मुख आकार अग्नि) का चयन करे' — ऐसा कहा गया है।

श्लोक 14.2

यावानग्निः सारत्निप्रादेशस्तावत्प्रौगं कृत्वा तस्यापरस्याः करण्या द्वादशेनेष्टकास्तदर्धव्यासाः कारयेत् । तासामर्ध्याः पाद्याश्च

yāvānagniḥ sāratniprādeśastāvatpraugaṁ kṛtvā tasyāparasyāḥ karaṇyā dvādaśeneṣṭakāstadardhavyāsāḥ kārayet | tāsāmardhyāḥ pādyāśca

जितना बड़ा मानक (अरत्नि-प्रादेश सहित सात-भाग वाला) अग्नि होता है, उतना बड़ा प्रौग बनाकर, उसकी दूसरी भुजा-रज्जु के बारहवें भाग की ईंटें बनानी चाहिए, जो उसकी आधी चौड़ाई की हों। उनकी आधी और चौथाई ईंटें भी होती हैं।

श्लोक 14.3

तासां द्वे अर्धेष्टके बाह्यसविशेषे चुबुक उपदध्यादर्ध्याश्चान्तयोः

tāsāṁ dve ardheṣṭake bāhyasaviśeṣe cubuka upadadhyādardhyāścāntayoḥ

इनमें से दो आधी ईंटें, बाहर की ओर कुछ अधिक बढ़ाकर, ठोड़ी (चुबुक, अगला नोक) पर रखनी चाहिए; और आधी ईंटें दोनों छोरों पर।

श्लोक 14.4

शेषमग्निं बृहतीभिः प्रच्छादयेदर्धेष्टकाभिः संख्यां पूरयेत्

śeṣamagniṁ bṛhatībhiḥ pracchādayedardheṣṭakābhiḥ saṁkhyāṁ pūrayet

शेष अग्नि को बृहती (बड़ी) ईंटों से ढक देना चाहिए; आधी ईंटों से गिनती पूरी करनी चाहिए।

श्लोक 14.5

अपरस्मिन्प्रस्तारेऽपरस्मिन्ननीके सप्तचत्वारिंशत्पादेष्टका व्यतिषक्ता उपदध्यात्

aparasminprastāre'parasminnanīke saptacatvāriṁśatpādeṣṭakā vyatiṣaktā upadadhyāt

दूसरी परत में, दूसरे मुख पर सैंतालीस चौथाई-ईंटें आपस में गुँथी हुई रखनी चाहिए।

श्लोक 14.6

चुबुक एकां शूलपाद्याम्

cubuka ekāṁ śūlapādyām

ठोड़ी पर एक शूल-पाद्या (भाले के आकार की) ईंट।

श्लोक 14.7

दीर्घे चेतरे चतस्रः स्वयमातृण्णावकाश उपदध्यादर्ध्याश्चान्तयोः

dīrghe cetare catasraḥ svayamātṛṇṇāvakāśa upadadhyādardhyāścāntayoḥ

लंबे किनारे पर और दूसरे किनारे पर, स्वतः-विभाजित ईंटों के लिए बने रिक्त स्थान में चार-चार ईंटें रखनी चाहिए; छोरों पर आधी ईंटें।

श्लोक 14.8

शेषमग्निं बृहतीभिः प्राचीभिः प्रच्छादयेदर्धेष्टकाभिः संख्यां पूरयेत्

śeṣamagniṁ bṛhatībhiḥ prācībhiḥ pracchādayedardheṣṭakābhiḥ saṁkhyāṁ pūrayet

शेष अग्नि को बृहती ईंटों से पूर्वाभिमुख ढक देना चाहिए; आधी ईंटों से गिनती पूरी करनी चाहिए।

पञ्चदशः खण्डः

श्लोक 15.1

उभयतः प्रौगं चिन्वीतेति

ubhayataḥ praugaṁ cinvīteti

'दोनों ओर प्रौग (नौका-मुख आकार) का चयन करे' — ऐसा कहा गया है।

श्लोक 15.2

यावानग्निः सारत्निप्रादेशस्तावदुभयतः प्रौगं कृत्वा नवमेन तिर्यङ्मान्याः प्रौगचितोक्ता विकाराः

yāvānagniḥ sāratniprādeśastāvadubhayataḥ praugaṁ kṛtvā navamena tiryaṅmānyāḥ praugacitoktā vikārāḥ

जितना बड़ा मानक सात-भाग वाला अग्नि होता है, उतना बड़ा दोनों ओर प्रौग बनाकर, आड़ी माप के नवें भाग से, प्रौगचित् में बताए गए परिवर्तन (यहाँ भी लागू होते हैं)।

श्लोक 15.3

तथोपधानम्

tathopadhānam

बिछाने की विधि भी वैसी ही है।

श्लोक 15.4

अपरस्मिन्प्रस्तारे चुबुकयोर्द्ध्वे पादेष्टके उपदध्यात् । संध्यन्तयोश्च दीर्घपाद्ये

aparasminprastāre cubukayorddhve pādeṣṭake upadadhyāt | saṁdhyantayośca dīrghapādye

दूसरी परत में, दोनों ठोड़ियों पर दो-दो चौथाई-ईंटें रखनी चाहिए; और जोड़ों के छोरों पर लंबी चौथाई-ईंटें।

श्लोक 15.5

दीर्घे चेतरे च चतस्रः स्वयमातृण्णावकाश उपदध्यादर्ध्याश्चान्तयोः

dīrghe cetare ca catasraḥ svayamātṛṇṇāvakāśa upadadhyādardhyāścāntayoḥ

लंबे किनारे पर और दूसरे किनारे पर, स्वतः-विभाजित ईंटों के लिए बने रिक्त स्थान में चार-चार ईंटें रखनी चाहिए; छोरों पर आधी ईंटें।

श्लोक 15.6

शेषमग्निं बृहतीभिः प्राचीभिः प्रच्छादयेदर्धेष्टकाभिः संख्यां पूरयेत्

śeṣamagniṁ bṛhatībhiḥ prācībhiḥ pracchādayedardheṣṭakābhiḥ saṁkhyāṁ pūrayet

शेष अग्नि को बृहती ईंटों से पूर्वाभिमुख ढक देना चाहिए; आधी ईंटों से गिनती पूरी करनी चाहिए।

षोडशः खण्डः

श्लोक 16.1

रथचक्रचितं चिन्वीतेति विज्ञायते

rathacakracitaṁ cinvīteti vijñāyate

यह जाना जाता है कि रथचक्रचित् (रथ-चक्र आकार अग्नि) का चयन किया जाए।

श्लोक 16.2

द्वयानि तु खलु रथचक्राणि भवन्ति साराणि च प्रधियुक्तानि च । अविशेषात्ते मन्यामहेऽन्यतरस्याकृतिरिति

dvayāni tu khalu rathacakrāṇi bhavanti sārāṇi ca pradhiyuktāni ca | aviśeṣātte manyāmahe'nyatarasyākṛtiriti

रथ-चक्र दो प्रकार के होते हैं: ठोस और परिधि (प्रधि) सहित। चूँकि कोई विशेष भेद नहीं बताया गया, इसलिए हम इनमें से किसी भी आकृति को मानते हैं।

श्लोक 16.3

अथाग्निं विमिमीते । यावानग्निः सारत्निप्रादेशस्तावतीं भूमिं परिमण्डलां कृत्वा तस्मिन्यावत्संभवेत्तावत्समचतुरश्रं कृत्वा तस्य करण्या द्वादशेनेष्टकाः कारयेत्

athāgniṁ vimimīte | yāvānagniḥ sāratniprādeśastāvatīṁ bhūmiṁ parimaṇḍalāṁ kṛtvā tasminyāvatsaṁbhavettāvatsamacaturaśraṁ kṛtvā tasya karaṇyā dvādaśeneṣṭakāḥ kārayet

अब अग्नि को नापा जाता है। मानक सात-भाग वाले अग्नि के बराबर एक वृत्ताकार क्षेत्र बनाकर, उसमें जितना बड़ा वर्ग समा सके उतना बनाकर, उसकी भुजा के बारहवें भाग की ईंटें बनानी चाहिए।

श्लोक 16.4

तासां षट् प्रधावुपधाय शेषमष्टधा विभजेत्

tāsāṁ ṣaṭ pradhāvupadhāya śeṣamaṣṭadhā vibhajet

उनमें से छह को परिधि में रखकर, शेष को आठ भागों में बाँटना चाहिए।

श्लोक 16.5

अपरं प्रस्तारं तथोपदध्याद्यथा प्रध्यनीकेषु स्रक्तयो भवन्ति

aparaṁ prastāraṁ tathopadadhyādyathā pradhyanīkeṣu sraktayo bhavanti

दूसरी परत इस प्रकार बिछानी चाहिए कि कोने परिधि के मुखों की संधियों पर पड़ें।

श्लोक 16.6

अथापरः

athāparaḥ

अब एक और विधि।

श्लोक 16.7

पुरुषार्धात्पञ्चदशेनेष्टकाः समचतुरश्राः कारयेन्मानार्थाः

puruṣārdhātpañcadaśeneṣṭakāḥ samacaturaśrāḥ kārayenmānārthāḥ

आधे पुरुष से, मापने के प्रयोजन के लिए, पंद्रहवें भाग की वर्गाकार ईंटें बनानी चाहिए।

श्लोक 16.8

तासां द्वे शते पञ्चविंशतिश्च सारत्निप्रादेशः सप्तविधः संपद्यते

tāsāṁ dve śate pañcaviṁśatiśca sāratniprādeśaḥ saptavidhaḥ saṁpadyate

इनमें से दो सौ पच्चीस से, अरत्नि-प्रादेश सहित सात-भाग वाला अग्नि बनता है।

श्लोक 16.9

तास्वन्याश्चतुःषष्टिमावपेत् । ताभिः समचतुरश्रं करोति । तस्य षोडशेष्टका पार्श्वमानी भवति । त्रयस्त्रिंशदतिशिष्यन्ते । ताभिरन्तान्सर्वशः परिचिनुयात्

tāsvanyāścatuḥṣaṣṭimāvapet | tābhiḥ samacaturaśraṁ karoti | tasya ṣoḍaśeṣṭakā pārśvamānī bhavati | trayastriṁśadatiśiṣyante | tābhirantānsarvaśaḥ paricinuyāt

इनमें और चौंसठ जोड़ देनी चाहिए। उनसे एक वर्ग बनता है, जिसकी भुजा-माप सोलह ईंटों की होती है। तैंतीस ईंटें शेष रह जाती हैं; उनसे चारों ओर के छोरों को सब दिशाओं में घेरकर चयन करना चाहिए।

श्लोक 16.10

नाभिः षोडश मध्यमाः । चतुःषष्टिरराश्चतुःषष्टिर्वेदिः । नेमिः शेषाः

nābhiḥ ṣoḍaśa madhyamāḥ | catuḥṣaṣṭirarāścatuḥṣaṣṭirvediḥ | nemiḥ śeṣāḥ

नाभि (धुरी) मध्य की सोलह ईंटें हैं। अरे (तीलियाँ) चौंसठ हैं; परिधि-चक्र (वेदि) भी चौंसठ है। नेमि (बाहरी घेरा) शेष ईंटें हैं।

श्लोक 16.11

नाभिमन्ततः परिलिखेत् । नेमिमन्ततश्चान्तरतश्च परिलिख्य । नेमिनाभ्योरन्तरालं द्वात्रिंशद्धा विभज्य विपर्यासं भागानुद्धरेत् । एवमावाप उद्धृतो भवति

nābhimantataḥ parilikhet | nemimantataścāntarataśca parilikhya | neminābhyorantarālaṁ dvātriṁśaddhā vibhajya viparyāsaṁ bhāgānuddharet | evamāvāpa uddhṛto bhavati

नाभि को उसके छोर से खींचना चाहिए। नेमि को उसके बाहरी और भीतरी छोर से खींचकर, नेमि और नाभि के बीच के अंतराल को बत्तीस भागों में बाँटकर, उलट-क्रम से भाग निकालने चाहिए। इस प्रकार जोड़ना-घटाना पूर्ण होता है।

टिप्पणी: A dense computational passage on laying out the wheel's nave, spokes and felloe; the geometric procedure is terse and technical even in the source.

श्लोक 16.12

नेमिं चतुःषष्टिं कृत्वा व्यवलिख्य मध्ये परिकृषेत् । ता अष्टाविंशतिशतं भवन्ति

nemiṁ catuḥṣaṣṭiṁ kṛtvā vyavalikhya madhye parikṛṣet | tā aṣṭāviṁśatiśataṁ bhavanti

नेमि को चौंसठ (भागों) में बनाकर और चिह्नित करके, मध्य से एक रेखा खींचनी चाहिए। वे एक सौ अट्ठाईस हो जाते हैं।

श्लोक 16.13

अरांश्चतुर्धा चतुर्धा नाभिमष्टधा विभजेत्

arāṁścaturdhā caturdhā nābhimaṣṭadhā vibhajet

अरों को चार-चार भागों में और नाभि को आठ भागों में बाँटना चाहिए।

श्लोक 16.14

एष प्रथमः प्रस्तारः

eṣa prathamaḥ prastāraḥ

यह पहली परत है।

श्लोक 16.15

अपरस्मिन्प्रस्तारे नाभिमन्ततश्चतुर्थवेलायां परिकृषेत् । नेमिमन्तरतः

aparasminprastāre nābhimantataścaturthavelāyāṁ parikṛṣet | nemimantarataḥ

दूसरी परत में, नाभि के छोर से चौथे बिंदु पर रेखा खींचनी चाहिए; और नेमि को भीतर से।

श्लोक 16.16

नेमिमन्तरतश्चतुःषष्टिं कृत्वा व्यवलिखेत्

nemimantarataścatuḥṣaṣṭiṁ kṛtvā vyavalikhet

नेमि को भीतर से चौंसठ भागों में बनाकर चिह्नित करना चाहिए।

श्लोक 16.17

अराणां पञ्चधा विभाग आपरिकर्षणयोः

arāṇāṁ pañcadhā vibhāga āparikarṣaṇayoḥ

अरों का विभाजन दोनों खिंचाव-बिंदुओं पर पाँच-पाँच भागों में होता है।

श्लोक 16.18

नेम्यामन्तरालेषु द्वे द्वे नाभ्यामन्तरालेष्वेकैकां

nemyāmantarāleṣu dve dve nābhyāmantarāleṣvekaikāṁ

नेमि के अंतरालों में दो-दो, नाभि के अंतरालों में एक-एक (ईंट रखनी चाहिए)।

श्लोक 16.19

यच्छेषं नाभेस्तदष्टधा विभजेत्

yaccheṣaṁ nābhestadaṣṭadhā vibhajet

नाभि का जो भाग शेष रहे, उसे आठ भागों में बाँटना चाहिए।

श्लोक 16.20

स एष षोडशकरणः सारो रथचक्रचित्

sa eṣa ṣoḍaśakaraṇaḥ sāro rathacakracit

यही सोलह-भाग वाला ठोस रथचक्रचित् है।

सप्तदशः खण्डः

श्लोक 17.1

द्रोणचितं चिन्वीतेति विज्ञायते

droṇacitaṁ cinvīteti vijñāyate

यह जाना जाता है कि द्रोणचित् (कठौती-आकार अग्नि) का चयन किया जाए।

श्लोक 17.2

द्वयानि तु खलु द्रोणानि भवन्ति चतुरश्राणि च परिमण्डलानि च । अविशेषात्ते मन्यामहेऽन्यतरस्याकृतिरिति

dvayāni tu khalu droṇāni bhavanti caturaśrāṇi ca parimaṇḍalāni ca | aviśeṣātte manyāmahe'nyatarasyākṛtiriti

द्रोण (कठौती) दो प्रकार के होते हैं: वर्गाकार और वृत्ताकार। चूँकि कोई विशेष भेद नहीं बताया गया, इसलिए हम इनमें से किसी भी आकृति को मानते हैं।

श्लोक 17.3

अथाग्निं विमिमीते । चतुरश्र आत्मा भवति । तस्य त्रयः पुरुषास्त्रिभागोनाः पर्श्वमानी

athāgniṁ vimimīte | caturaśra ātmā bhavati | tasya trayaḥ puruṣāstribhāgonāḥ parśvamānī

अब अग्नि को नापा जाता है। शरीर वर्गाकार होता है। उसकी भुजा-माप तीन पुरुष में से एक तिहाई कम होती है।

श्लोक 17.4

पश्चात्त्सरुर्भवति । तस्यार्धपुरुषो दशाङ्गुलानि च प्राची । त्रिभागोनः पुरुष उदीचीति

paścāttsarurbhavati | tasyārdhapuruṣo daśāṅgulāni ca prācī | tribhāgonaḥ puruṣa udīcīti

पीछे हत्था (त्सरु) होता है। उसका पूर्वी विस्तार आधा पुरुष और दस अङ्गुल होता है; उत्तरी विस्तार एक पुरुष में से एक तिहाई कम।

श्लोक 17.5

एवं सारत्निप्रादेशः सप्तविधः संपद्यते

evaṁ sāratniprādeśaḥ saptavidhaḥ saṁpadyate

इस प्रकार अरत्नि और प्रादेश सहित, सात-भाग वाला (अग्नि) बनता है।

श्लोक 17.6

अथेष्टकानां विकाराः । पुरुषस्य षष्ठ्यस्ता एवैकतोऽध्यर्धाः । तासामर्ध्यास्तिर्यग्भेदाः पुरुषस्य चतुर्थ्य इति

atheṣṭakānāṁ vikārāḥ | puruṣasya ṣaṣṭhyastā evaikato'dhyardhāḥ | tāsāmardhyāstiryagbhedāḥ puruṣasya caturthya iti

अब ईंटों के प्रकार: पुरुष के छठे-भाग की ईंटें; इन्हीं को एक ओर से डेढ़-गुना बनाकर। इनकी आधी, आड़ी काटी हुई, पुरुष के चौथाई-भाग की ईंटें होती हैं।

श्लोक 17.7

तासां त्सरुश्रोण्यन्तरालयोः षट् षष्टीरुपधाय शेषमग्निं बृहतीभिः प्रच्छादयेत् । अर्धेष्टकाभिः संख्यां पूरयेत्

tāsāṁ tsaruśroṇyantarālayoḥ ṣaṭ ṣaṣṭīrupadhāya śeṣamagniṁ bṛhatībhiḥ pracchādayet | ardheṣṭakābhiḥ saṁkhyāṁ pūrayet

हत्थे और कमर-कोने के बीच के अंतराल में छह छठे-भाग की ईंटें रखकर, शेष अग्नि को बृहती ईंटों से ढक देना चाहिए; आधी ईंटों से गिनती पूरी करनी चाहिए।

श्लोक 17.8

अपरस्मिन्प्रस्तारे दक्षिणेंऽसेऽध्यर्धामुदीचीमुपदध्यात् । तथोत्तरे

aparasminprastāre dakṣiṇeṁ'se'dhyardhāmudīcīmupadadhyāt | tathottare

दूसरी परत में, दक्षिणी कंधे पर एक डेढ़-ईंट उत्तराभिमुख रखनी चाहिए। उत्तरी में भी वैसे ही।

श्लोक 17.9

पूर्वस्मिन्ननीके षड्भागीया उपदध्यात्

pūrvasminnanīke ṣaḍbhāgīyā upadadhyāt

अगले मुख पर छठे-भाग की ईंटें रखनी चाहिए।

श्लोक 17.10

दक्षिणोत्तरयोश्चतुर्भागीयाः

dakṣiṇottarayoścaturbhāgīyāḥ

दक्षिण और उत्तर में चौथाई-भाग की ईंटें।

श्लोक 17.11

त्सरोः पुरस्तात्पार्श्वयोर्द्ध्वे चतुर्भागीये उपदध्यात् । तयोरवस्तादभितो द्वे द्वे अध्यर्धे विषूची । तयोरवस्तान्मध्यदेशे द्वे षष्ठ्यौ प्राच्यौ

tsaroḥ purastātpārśvayorddhve caturbhāgīye upadadhyāt | tayoravastādabhito dve dve adhyardhe viṣūcī | tayoravastānmadhyadeśe dve ṣaṣṭhyau prācyau

हत्थे के आगे दोनों ओर दो चौथाई-भाग की ईंटें रखनी चाहिए। उनके नीचे दोनों ओर दो-दो डेढ़-ईंटें आड़ी। उनके नीचे मध्य भाग में दो छठे-भाग की ईंटें पूर्वाभिमुख।

श्लोक 17.12

शेषमग्निं बृहतीभिः प्राचीभिः प्रच्छादयेत् । अर्धेष्टकाभिः संख्यां पूरयेत्

śeṣamagniṁ bṛhatībhiḥ prācībhiḥ pracchādayet | ardheṣṭakābhiḥ saṁkhyāṁ pūrayet

शेष अग्नि को बृहती ईंटों से पूर्वाभिमुख ढक देना चाहिए; आधी ईंटों से गिनती पूरी करनी चाहिए।

अष्टादशः खण्डः

श्लोक 18.1

अथापरः

athāparaḥ

अब एक और विधि।

श्लोक 18.2

पुरुषस्य षोडशीभिर्विंशशतं सारत्निप्रादेशः सप्तविधः संपद्यते

puruṣasya ṣoḍaśībhirviṁśaśataṁ sāratniprādeśaḥ saptavidhaḥ saṁpadyate

पुरुष के सोलहवें-भाग की ईंटों से, एक सौ बीस से, अरत्नि-प्रादेश सहित सात-भाग वाला अग्नि बनता है।

श्लोक 18.3

तासामेकामपोद्धृत्य शेषाः परिमण्डलं करोति

tāsāmekāmapoddhṛtya śeṣāḥ parimaṇḍalaṁ karoti

उनमें से एक को निकालकर, शेष से वृत्ताकार रूप बनता है।

श्लोक 18.4

तत्पूर्वेण रथचक्रचिता व्याख्यातम्

tatpūrveṇa rathacakracitā vyākhyātam

यह पहले रथचक्रचित् के वर्णन में समझाया जा चुका है।

श्लोक 18.5

षोडशीं पुरस्ताद्विशय उपधाय तया सह मण्डलं परिलिखेत्

ṣoḍaśīṁ purastādviśaya upadhāya tayā saha maṇḍalaṁ parilikhet

सोलहवें-भाग की ईंट को आगे, सीमा-रेखा पर रखकर, उसके साथ ही वृत्त खींचना चाहिए।

श्लोक 18.6

यदवस्तादपच्छिन्नं तत्पुरस्तादुपदध्यात्

yadavastādapacchinnaṁ tatpurastādupadadhyāt

जो नीचे से कटा हो, उसे आगे रख देना चाहिए।

श्लोक 18.7

प्रधीनां सप्तधा विभागः

pradhīnāṁ saptadhā vibhāgaḥ

परिधि-खंडों (प्रधि) का विभाजन सात भागों में होता है।

श्लोक 18.8

प्रधिमध्यमाः प्रक्रमव्यासा भवन्ति

pradhimadhyamāḥ prakramavyāsā bhavanti

मध्य के परिधि-खंड एक प्रक्रम चौड़े होते हैं।

श्लोक 18.9

चतुरश्राणामर्ध्याभिः संख्यां पूरयेत्

caturaśrāṇāmardhyābhiḥ saṁkhyāṁ pūrayet

वर्गाकार भागों की गिनती आधी ईंटों से पूरी करनी चाहिए।

श्लोक 18.10

अपरस्मिन्प्रस्तारे प्रधिमध्यमामोष्ठ उपधाय यदवस्तात्तद्द्वेधा विभजेत्

aparasminprastāre pradhimadhyamāmoṣṭha upadhāya yadavastāttaddvedhā vibhajet

दूसरी परत में, मध्य के परिधि-खंड को किनारे पर रखकर, जो नीचे शेष रहे उसे दो भागों में बाँटना चाहिए।

श्लोक 18.11

स एष नवकरणो द्रोणचित्परिमण्डलः

sa eṣa navakaraṇo droṇacitparimaṇḍalaḥ

यही नौ-भाग वाला वृत्ताकार द्रोणचित् है।

श्लोक 18.12

समूह्य परिचाय्यौ पूर्वेण रथचक्रचिता व्याख्यातौ

samūhya paricāyyau pūrveṇa rathacakracitā vyākhyātau

समूह्य (संकलन) और परिचाय्य (आवरण) कर्म पहले रथचक्रचित् में समझाए जा चुके हैं।

श्लोक 18.13

समूह्यस्य दिक्षु चात्वालान् खानयित्वा तेभ्यः पुरीषं समूह्योपदध्यात्

samūhyasya dikṣu cātvālān khānayitvā tebhyaḥ purīṣaṁ samūhyopadadhyāt

समूह्य के लिए दिशाओं में चात्वाल-गड्ढे खुदवाकर, उनसे पुरीष (भराव-मिट्टी) इकट्ठा करके रखना चाहिए।

श्लोक 18.14

परिचाय्य इष्टकानां देशभेदः

paricāyya iṣṭakānāṁ deśabhedaḥ

परिचाय्य ईंटों के स्थान-भेद (व्यवस्था) को कहते हैं।

श्लोक 18.15

तं सर्वाभिः प्रदक्षिणं परिचिनुयात्

taṁ sarvābhiḥ pradakṣiṇaṁ paricinuyāt

उसका चयन सब ओर से प्रदक्षिणा-क्रम में (दाईं ओर रखते हुए) करना चाहिए।

एकोनविंशः खण्डः

श्लोक 19.1

श्मशानचितं चिन्वीतेति विज्ञायते

śmaśānacitaṁ cinvīteti vijñāyate

यह जाना जाता है कि श्मशानचित् (श्मशान-टीले के आकार का अग्नि) का चयन किया जाए।

श्लोक 19.2

सर्वमग्निं चतुरश्रान्पञ्चदश भागान्कृत्वा तेषामाख्यातमुपधानम्

sarvamagniṁ caturaśrānpañcadaśa bhāgānkṛtvā teṣāmākhyātamupadhānam

पूरे अग्नि के वर्ग को पंद्रह भागों में बाँटकर, उनका बिछाना पहले बताया जा चुका है।

श्लोक 19.3

त्रिभिर्भागैर्भागार्धव्यासं दीर्घचतुरश्रं विहृत्य पूर्वस्याः करण्या मध्याच्छ्रोणी प्रत्यालिख्यान्तावुद्धरेत् । तस्य दशधा विभागः

tribhirbhāgairbhāgārdhavyāsaṁ dīrghacaturaśraṁ vihṛtya pūrvasyāḥ karaṇyā madhyācchroṇī pratyālikhyāntāvuddharet | tasya daśadhā vibhāgaḥ

तीन भाग लंबे और आधे भाग चौड़े आयत को बनाकर, उसकी पहली भुजा-रज्जु के मध्य से दोनों कमर-कोनों को पीछे खींचकर, छोरों को निकाल लेना चाहिए। उसका विभाजन दस भागों में होता है।

श्लोक 19.4

तानि विंशतिः सर्वोऽग्निः संपद्यते

tāni viṁśatiḥ sarvo'gniḥ saṁpadyate

ये बीस भाग मिलकर पूरा अग्नि बनाते हैं।

श्लोक 19.5

अपरस्मिन्प्रस्तारे प्रौगमध्येऽनूचीनं विभजेत् । तस्य षड्धा विभागः । ते द्वे पर्श्वयोरुपदध्यात्

aparasminprastāre praugamadhye'nūcīnaṁ vibhajet | tasya ṣaḍdhā vibhāgaḥ | te dve parśvayorupadadhyāt

दूसरी परत में, प्रौग (नौका-मुख) के मध्य से लंबाई में विभाजन करना चाहिए। उसका विभाजन छह भागों में होता है। उनमें से दो भाग दोनों ओर रखने चाहिए।

श्लोक 19.6

भागतृतीयायामश्चतुर्थव्यासाः कारयेत् । तासामर्ध्यास्तिर्यग्भेदाः

bhāgatṛtīyāyāmaścaturthavyāsāḥ kārayet | tāsāmardhyāstiryagbhedāḥ

एक भाग के तिहाई जितनी लंबी और चौथाई जितनी चौड़ी ईंटें बनानी चाहिए। इनकी आधी, आड़ी काटी हुई ईंटें भी होती हैं।

श्लोक 19.7

ता अन्तयोरुपधाय शेषमग्निं बृहतीभिः प्राचीभिः प्रच्छादयेत् । अर्धेष्टकाभिः संख्यां पूरयेत्

tā antayorupadhāya śeṣamagniṁ bṛhatībhiḥ prācībhiḥ pracchādayet | ardheṣṭakābhiḥ saṁkhyāṁ pūrayet

इन्हें दोनों छोरों पर रखकर, शेष अग्नि को बृहती ईंटों से पूर्वाभिमुख ढक देना चाहिए; आधी ईंटों से गिनती पूरी करनी चाहिए।

श्लोक 19.8

ऊर्ध्वप्रमाणमग्नेः पञ्चमेन वर्धयेत्

ūrdhvapramāṇamagneḥ pañcamena vardhayet

अग्नि की ऊँचाई को पाँचवें भाग से बढ़ा देना चाहिए।

श्लोक 19.9

तत्सर्वं त्रेधा विभज्य द्वयोर्भागयोश्चतुर्थेन वा नवमेन वा चतुर्दशेन वेष्टकाः कारयेत्

tatsarvaṁ tredhā vibhajya dvayorbhāgayoścaturthena vā navamena vā caturdaśena veṣṭakāḥ kārayet

उस पूरी (ऊँचाई) को तीन भागों में बाँटकर, दो भागों के लिए चौथे, नवें या चौदहवें भाग की ईंटें बनानी चाहिए।

श्लोक 19.10

ताभिश्चतस्रो वा नव वा चतुर्दश वा चितिरुपधाय शेषमवाञ्चमक्ष्णयापच्छिन्द्यात् । अर्धमुद्धरेत्

tābhiścatasro vā nava vā caturdaśa vā citirupadhāya śeṣamavāñcamakṣṇayāpacchindyāt | ardhamuddharet

उनसे चार, नौ या चौदह परतें बिछाकर, शेष भाग को नीचे की ओर विकर्णतः काट देना चाहिए; आधा भाग निकाल लेना चाहिए।

श्लोक 19.11

तस्य नित्यो विभागो यथायोगमिष्टकानां ह्रासवृद्धि

tasya nityo vibhāgo yathāyogamiṣṭakānāṁ hrāsavṛddhi

उसका नियमित विभाजन ईंटों की उचित घट-बढ़ के अनुसार होता है।

विंशः खण्डः

श्लोक 20.1

कूर्मचितं चिन्वीत यः कामयेत ब्रह्मलोकमभिजयेयमिति । विज्ञायते

kūrmacitaṁ cinvīta yaḥ kāmayeta brahmalokamabhijayeyamiti | vijñāyate

यह जाना जाता है कि 'मैं ब्रह्मलोक को जीत लूँ' — ऐसी कामना करने वाले को कूर्मचित् (कछुआ-आकार अग्नि) का चयन करना चाहिए।

श्लोक 20.2

द्वयाः खलु कूर्मा भवन्ति वक्राङ्गाश्च परिमण्डलाश्च । अविशेषात्ते मन्यामहेऽन्यतरस्याकृतिरिति

dvayāḥ khalu kūrmā bhavanti vakrāṅgāśca parimaṇḍalāśca | aviśeṣātte manyāmahe'nyatarasyākṛtiriti

कछुए दो प्रकार के होते हैं: मुड़े हुए अंगों वाले और गोल। चूँकि कोई विशेष भेद नहीं बताया गया, इसलिए हम इनमें से किसी भी आकृति को मानते हैं।

श्लोक 20.3

अथाग्निं विमिमीते । चतुरश्र आत्मा भवति । तस्य दश प्रक्रमाः पार्श्वमानी भवति । तस्य द्वाभ्यां द्वाभ्यां प्रक्रमाभ्यां स्रक्तीनामपच्छेदः

athāgniṁ vimimīte | caturaśra ātmā bhavati | tasya daśa prakramāḥ pārśvamānī bhavati | tasya dvābhyāṁ dvābhyāṁ prakramābhyāṁ sraktīnāmapacchedaḥ

अब अग्नि को नापा जाता है। शरीर वर्गाकार होता है। उसकी भुजा-माप दस प्रक्रम होती है। उसके कोने दो-दो प्रक्रम से काटे जाते हैं।

श्लोक 20.4

पूर्वस्मिन्ननीके प्रक्रमप्रमाणानि चत्वारि चतुरश्राणि कृत्वा तेषां ये अन्त्ये ते अक्ष्णयापच्छिन्द्यात् । एवं दक्षिणत एवं पश्चादेवमुत्तरतः । स आत्मा

pūrvasminnanīke prakramapramāṇāni catvāri caturaśrāṇi kṛtvā teṣāṁ ye antye te akṣṇayāpacchindyāt | evaṁ dakṣiṇata evaṁ paścādevamuttarataḥ | sa ātmā

अगले मुख पर, एक-एक प्रक्रम की चार वर्गाकार आकृतियाँ बनाकर, उनमें से जो छोर पर हों उन्हें विकर्णतः काट देना चाहिए। इसी प्रकार दक्षिण में, इसी प्रकार पश्चिम में, इसी प्रकार उत्तर में भी। यह शरीर हुआ।

श्लोक 20.5

शिरः पञ्चपदायाममर्धपुरुषव्यासम् । तस्यांसौ प्रक्रमेण प्रक्रमेणापच्छिन्द्यात्

śiraḥ pañcapadāyāmamardhapuruṣavyāsam | tasyāṁsau prakrameṇa prakrameṇāpacchindyāt

सिर पाँच पद लंबा, आधे पुरुष जितना चौड़ा होता है। उसके कंधों को एक-एक प्रक्रम से काट देना चाहिए।

श्लोक 20.6

स्रक्त्यपच्छेदे पादानुन्नयेत् । तस्य द्विपदाक्ष्णया तिरश्ची तद्द्विगुणायाममनूची । तस्य द्विपदाक्ष्णया पूर्वमंसमपच्छिन्द्यात् । एतेनेतरेषां पादानामपच्छेदा व्याख्याताः । अपरयोः पादयोरपरावंसावपच्छिन्द्यात्

sraktyapacchede pādānunnayet | tasya dvipadākṣṇayā tiraścī taddviguṇāyāmamanūcī | tasya dvipadākṣṇayā pūrvamaṁsamapacchindyāt | etenetareṣāṁ pādānāmapacchedā vyākhyātāḥ | aparayoḥ pādayoraparāvaṁsāvapacchindyāt

कोने के कटान पर पैरों को उभारना चाहिए। उनकी आड़ी माप दो पद के विकर्ण जितनी है; उनकी लंबाई उससे दुगुनी। दो पद के विकर्ण से अगले कंधे को काट देना चाहिए। इसी से अन्य पैरों का कटान भी समझाया गया है। शेष दोनों पैरों में, अन्य दोनों कंधों को भी काट देना चाहिए।

श्लोक 20.7

एवं सारत्निप्रादेशः सप्तविधः संपद्यते

evaṁ sāratniprādeśaḥ saptavidhaḥ saṁpadyate

इस प्रकार अरत्नि और प्रादेश सहित, सात-भाग वाला (अग्नि) बनता है।

श्लोक 20.8

तस्येष्टकाः कारयेत्पुरुषस्य चतुर्थ्यस्तासामर्ध्याः पाद्याश्च

tasyeṣṭakāḥ kārayetpuruṣasya caturthyastāsāmardhyāḥ pādyāśca

इसकी ईंटें पुरुष के चौथे भाग की बनानी चाहिए। इनकी आधी और चौथाई ईंटें भी होती हैं।

श्लोक 20.9

अध्यर्धपाद्याश्चतुर्भिः परिगृह्णीयात्प्रक्रमेण द्वाभ्यां पदाभ्यां पदसविशेषेणेति

adhyardhapādyāścaturbhiḥ parigṛhṇīyātprakrameṇa dvābhyāṁ padābhyāṁ padasaviśeṣeṇeti

डेढ़-चौथाई ईंट को चार माप से समझना चाहिए: एक प्रक्रम, दो पद, और एक पद से कुछ अधिक।

श्लोक 20.10

ते द्वे यथा दीर्घसंश्लिष्टे स्यातां तथैकां कारयेत्

te dve yathā dīrghasaṁśliṣṭe syātāṁ tathaikāṁ kārayet

उन दोनों को इस प्रकार जोड़ना चाहिए कि वे लंबाई में मिल जाएँ; इस प्रकार एक बना लेनी चाहिए।

श्लोक 20.11

द्विपदाक्ष्णयार्धेन समचतुरश्रामेकां

dvipadākṣṇayārdhena samacaturaśrāmekāṁ

दो पद के विकर्ण के आधे भाग से एक वर्गाकार ईंट (बनानी चाहिए)।

श्लोक 20.12

उपधाने शिरसोऽग्रे चतुरश्रामुपदध्यात् । हंसमुख्याववस्तात्

upadhāne śiraso'gre caturaśrāmupadadhyāt | haṁsamukhyāvavastāt

बिछाने में: सिर के अग्रभाग में एक वर्गाकार ईंट रखनी चाहिए। नीचे दो हंसमुखी ईंटें।

श्लोक 20.13

पञ्च पञ्च चतुरश्रा द्वे द्वे पादेष्टके इति पादेषूपदध्यात्

pañca pañca caturaśrā dve dve pādeṣṭake iti pādeṣūpadadhyāt

पाँच-पाँच वर्गाकार ईंटें और दो-दो चौथाई-ईंटें — इस प्रकार पैरों में रखनी चाहिए।

श्लोक 20.14

यद्यदपच्छिन्नं तस्मिन्नर्धेष्टका उपदध्यात्

yadyadapacchinnaṁ tasminnardheṣṭakā upadadhyāt

जहाँ-जहाँ कोई भाग कटा हो, वहाँ आधी ईंटें रखनी चाहिए।

श्लोक 20.15

शेषमग्निं चतुर्भागीयाभिः प्रच्छादयेत् । अर्धेष्टकाभिः संख्यां पूरयेत्

śeṣamagniṁ caturbhāgīyābhiḥ pracchādayet | ardheṣṭakābhiḥ saṁkhyāṁ pūrayet

शेष अग्नि को चौथाई-भाग की ईंटों से ढक देना चाहिए; आधी ईंटों से गिनती पूरी करनी चाहिए।

श्लोक 20.16

अपरस्मिन्प्रस्तारे शिरसोऽग्रे हंसमुखीमुपदध्यात्पादेष्टके अभितः

aparasminprastāre śiraso'gre haṁsamukhīmupadadhyātpādeṣṭake abhitaḥ

दूसरी परत में, सिर के अग्रभाग में हंसमुखी ईंट रखनी चाहिए, उसके दोनों ओर चौथाई-ईंटें।

श्लोक 20.17

तयोरवस्तादभितो द्वे द्वे अध्यर्ध पाद्ये विषूची

tayoravastādabhito dve dve adhyardha pādye viṣūcī

उनके नीचे दोनों ओर दो-दो डेढ़-चौथाई ईंटें आड़ी।

श्लोक 20.18

तयोरवस्तादभितश्छेदसंहिते द्वे पादेष्टके

tayoravastādabhitaśchedasaṁhite dve pādeṣṭake

उनके नीचे दोनों ओर जोड़-कटी हुई दो-दो चौथाई-ईंटें।

श्लोक 20.19

द्वे द्वे द्विपदे तिस्रस्तिस्रोऽर्धेष्टका इति पादेषूपदध्यात्

dve dve dvipade tisrastisro'rdheṣṭakā iti pādeṣūpadadhyāt

दो-दो द्विपद ईंटें और तीन-तीन आधी ईंटें — इस प्रकार पैरों में रखनी चाहिए।

श्लोक 20.20

यद्यदपच्छिन्नं तस्मिन्नर्धेष्टकाः पादेष्टकश्चोपदध्यात्

yadyadapacchinnaṁ tasminnardheṣṭakāḥ pādeṣṭakaścopadadhyāt

जहाँ-जहाँ कोई भाग कटा हो, वहाँ आधी और चौथाई ईंटें रखनी चाहिए।

श्लोक 20.21

शेषमग्निं चतुर्भागीयाभिः प्रच्छादयेत्। अर्धेष्टकाभिः संख्यां पूरयेत्

śeṣamagniṁ caturbhāgīyābhiḥ pracchādayet | ardheṣṭakābhiḥ saṁkhyāṁ pūrayet

शेष अग्नि को चौथाई-भाग की ईंटों से ढक देना चाहिए; आधी ईंटों से गिनती पूरी करनी चाहिए।

एकविंशः खण्डः

श्लोक 21.1

अथापरः

athāparaḥ

अब एक और विधि।

श्लोक 21.2

पुरुषस्य षोडशीभिर्विंशशतं सारत्निप्रादेशः सप्तविधः संपद्यते

puruṣasya ṣoḍaśībhirviṁśaśataṁ sāratniprādeśaḥ saptavidhaḥ saṁpadyate

पुरुष के सोलहवें-भाग की ईंटों से, एक सौ बीस से, अरत्नि-प्रादेश सहित सात-भाग वाला अग्नि बनता है।

श्लोक 21.3

तासां पञ्च षोडशीरपोद्धृत्य शेषाः परिमण्डलं करोति । तदुत्तरेण द्रोणचिता व्याख्यातम्

tāsāṁ pañca ṣoḍaśīrapoddhṛtya śeṣāḥ parimaṇḍalaṁ karoti | taduttareṇa droṇacitā vyākhyātam

उनमें से पाँच सोलहवें-भाग की ईंटें निकालकर, शेष से वृत्ताकार रूप बनता है। यह ऊपर द्रोणचित् में समझाया जा चुका है।

श्लोक 21.4

अथ ताः पञ्च षोडश्यस्ताभिरवान्तरदिक्षु पादानुन्नयेच्छिरः पुरस्तात् । तासां परिकर्षणं व्याख्यातम्

atha tāḥ pañca ṣoḍaśyastābhiravāntaradikṣu pādānunnayecchiraḥ purastāt | tāsāṁ parikarṣaṇaṁ vyākhyātam

अब उन पाँच सोलहवें-भाग की ईंटों से, कोने की दिशाओं में पैरों को उभारना चाहिए, सिर आगे की ओर। उनका खींचना पहले समझाया जा चुका है।

श्लोक 21.5

प्रधीनां सप्तधा विभागः प्रधिमध्यमाः प्रक्रमव्यासा भवन्ति

pradhīnāṁ saptadhā vibhāgaḥ pradhimadhyamāḥ prakramavyāsā bhavanti

परिधि-खंडों का विभाजन सात भागों में होता है; मध्य के परिधि-खंड एक प्रक्रम चौड़े होते हैं।

श्लोक 21.6

यदतिरिक्तं संपद्यते तच्चतुरश्राणामध्यर्धाभिर्योयुज्येत

yadatiriktaṁ saṁpadyate taccaturaśrāṇāmadhyardhābhiryoyujyeta

जो भाग अतिरिक्त बचे, उसे डेढ़-भाग के वर्गों से जोड़ देना चाहिए।

श्लोक 21.7

अपरस्मिन्प्रस्तारे पादानां शिरोवद्विभागः शिरसः पादवत्

aparasminprastāre pādānāṁ śirovadvibhāgaḥ śirasaḥ pādavat

दूसरी परत में, पैरों का विभाजन सिर के समान होता है, और सिर का विभाजन पैरों के समान।

श्लोक 21.8

व्यत्यासं चिनुयाद्यावतः प्रस्तारांश्चिकीर्षेत्

vyatyāsaṁ cinuyādyāvataḥ prastārāṁścikīrṣet

जितनी परतें बनानी हों, उतनी बार इसी उलट-क्रम से चयन करना चाहिए।

श्लोक 21.9

कूर्मस्यान्ते तनु पुरीषमुपदध्यान्मध्ये बहुलम् । एतदेव द्रोणे विपरीतम्

kūrmasyānte tanu purīṣamupadadhyānmadhye bahulam | etadeva droṇe viparītam

कछुए (कूर्मचित्) के किनारे पर पुरीष (भराव-मिट्टी) पतली रखनी चाहिए, मध्य में गाढ़ी। द्रोण (द्रोणचित्) में यह बिल्कुल उलटा है।

श्लोक 21.10

अथ हैक एकविधप्रभृतीन्प्रौगादीन् ब्रुवते

atha haika ekavidhaprabhṛtīnpraugādīn bruvate

अब कुछ लोग प्रौग आदि आकृतियों को एक-आकार की श्रेणी से ही आरंभ मानते हैं।

श्लोक 21.11

समचतुरश्रानेक आचार्याः । तस्य करण्या द्वादशेनेष्टकाः कारायेत्तासामर्ध्याः पाद्याश्च

samacaturaśrāneka ācāryāḥ | tasya karaṇyā dvādaśeneṣṭakāḥ kārāyettāsāmardhyāḥ pādyāśca

कुछ आचार्य इन्हें वर्गाकार मानते हैं। उसकी ईंटें उसकी भुजा के बारहवें भाग की बनानी चाहिए; इनकी आधी और चौथाई ईंटें भी होती हैं।

श्लोक 21.12

अथाश्वमेधिकस्याग्नेः पुरुषाभ्यासो नारत्निप्रादेशानां

athāśvamedhikasyāgneḥ puruṣābhyāso nāratniprādeśānāṁ

अब अश्वमेध के अग्नि के लिए, गुणन पुरुष-मापों से होता है, न कि अरत्नि-प्रादेश मापों से।

श्लोक 21.13

प्राकृतो वा त्रिगुणः । त्रिस्तावोऽग्निर्भवतीत्येकविंशोऽग्निर्भवतीत्युभयं ब्राह्मणमुभयं ब्राह्मणम्

prākṛto vā triguṇaḥ | tristāvo'gnirbhavatītyekaviṁśo'gnirbhavatītyubhayaṁ brāhmaṇamubhayaṁ brāhmaṇam

अथवा मानक (माप) को तिगुना कर देना चाहिए। 'अग्नि तिगुने विस्तार का होता है' — 'अग्नि इक्कीस-गुने विस्तार का होता है' — दोनों ही ब्राह्मण-वचन हैं, दोनों ही ब्राह्मण-वचन हैं।

टिप्पणी: The closing sutra of the text, ending with the deliberate doubled refrain 'ubhayaṃ brāhmaṇam ubhayaṃ brāhmaṇam' ('both are brāhmaṇa statements') as it appears in the source, marking the conclusion of the Baudhāyana Śulbasūtra.

स्रोत

Sanskrit Wikisource, बौधायनशुल्बसूत्रम् (21 sections) — https://sa.wikisource.org/wiki/बौधायनशुल्बसूत्रम् · CC BY-SA 4.0