श्रीशुक उवाच । इत्थं शरत्स्वच्छजलं पद्माकरसुगन्धिना । न्यविशद्वायुना वातं सगोगोपालकोऽच्युतः ॥२१-१॥
śrī-śuka uvāca | itthaṁ śarat-svaccha-jalaṁ padmākara-sugandhinā | nyaviśad vāyunā vātaṁ sa-go-gopālako 'cyutaḥ ||21-1||
।।१।। शुकदेव बोले: कृष्ण गायों और ग्वाल-बालों के साथ वृन्दावन वन में प्रवेश करते हैं। वन शरद ऋतु के स्वच्छ जल से भरा है। कमल-सरोवर की सुगन्ध लिए हवा बह रही है।
Modern Reflection
।।१।। पहला श्लोक शुकदेव का है, गोपियों का नहीं। वे दृश्य रच रहे हैं। ऋतु शरद है, वह ऋतु जो भारतीय संस्कृत कविता तब चुनती है जब हवा साफ़ हो और हृदय छोटी आवाज़ें सुन सके। श्लोक हर तत्व को सही क्रम में नाम देता है: जल, सुगन्ध, हवा, गायें, बालक, और अंत में जा कर कृष्ण। दृश्य उस व्यक्ति से पूरा होता है जो उसमें चल कर आता है। भारतीय कथा-कला अक्सर मुख्य पात्र को अंत के लिए बचाती है, और यह श्लोक उसका पाठ्यपुस्तक उदाहरण है।